Tuesday, June 29, 2010

शब्दों के मेनेजर


शब्दों के शिल्पी नहीं कहा आप को लग रहा होगा इसके पीछे कोई ख़ास वजह होगा। हाँ सही समझ रहे हैं, आज कई लेखक नहीं बल्कि उनको शब्दों के मेनेजर ही कहना ठीक होगा क्योंकि वो लोग कोई साहितिक पृष्ठभूमि से नहीं आये हैं वो तो मैनेजमेंट , होस्पेतिलिटी वो इसी तरह के अन्य सेविक एरिया से ए हैं इस लिए उनके लिए शब्दों के मारक अबिलिटी पर पूरा विश्वास है। उनको पाठक वर्ग भी मिल रहे हैं। क्या फर्क पड़ता है कि उनको पढने वाले कॉलेज, काम्पुस के न्यू क्लास है। लेकिन वो चेतन, थककर, जैसे न्यू व्रितिन्ग्स को बिना दीर किये पढ़ते हैं। जो भाई उनको नहीं पढ़ा हो उसको शर्म का सामना करना पड़ता है। जब दोस्तों के बीच बात चलती है कि क्या तुमने चेतन की वो वाली नोवेल पढ़ा? अगर नहीं पढ़ा तो आपको लगेगा कि मैंने क्या किया, उसे ही पढ़ा तो कुछ नहीं पढ़ा। इसी तरह के कई शब्दों के मेनेजर हमारे बीच अपनी सफलता के लोहा मनवा चुके हैं। यह अलग बात है कि उनकी नोवेल तथाकथित तौर पर गंभीर नहीं कह सकते। गंभीर आज की तारीख में किसे के पास पचाने की शक्श्मता है। पेट चलने लगेगा। इसलिए मिलावट के ही खाद्य पदार्थ खाना चाहिए। तो ये लोग येसी ही रचनाएँ ले कर आ रहे हैं।

ज़ुरूरत तो हिंदी वालों को भी चाहिए कि वो इस तरह की लेखनी को बढ़ावा देने पर सोचना चाहिय। जब पढने वालों को साहित्य मिलने लगे तो कोई क्यों नहीं पढना चाहेगा। आप उनको केंद्र में रख कर लेखन करके तो देखें वो पढने पर मजबूर हो जायेंगे। पर उसके लिए कलम में वो लोच्पन लाना होगा। लेकिन इसका यह मतलब अहि कि फिल्म वालों की तरह इस तर्क को आधा बना कर अलर बालर कुछ भी परोस कर निशिचित ही विश्वास तोड़ने का काम करेंगे.

angreji में इनदिनों इस तरह की रेटिंग वाले लेखक नहीं बल्कि मेनेजर किस्म के ने आथर रोज दिन बाजार में खूब बिक रहे हैं। प्रकाशक राइटर पाठक की जोड़ी खूब जम रही है। क्यों न हिंदी में भी अपना कर देखा जाये.

1 comment:

निर्मला कपिला said...

अच्छा है आलेख । धन्यवाद्

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