Wednesday, December 12, 2018

...और वो रोने लगीं



कौशलेंद्र प्रपन्न
कभी सोचा न था कि कोई अपनी बात कहते कहते व डायरी पढ़ते पढ़ते रो पड़ेगा। या रो पड़ेंगीं। रोना वैसे कोई स्त्री व पुरूष वर्ग में बांटकर नहीं देख और समझ सकते हैं। किसी कार्यशाला में यदि कोई प्रतिभागी यानी शिक्षक व शिक्षिका रोने लगें तो आप इसे क्या नाम देना चाहते हैं? मेरे लिए यह चौंकाने वाली घटना थीं। लेकिन जब आंसूओं का मोल समझा तो एहसास हुआ कि रोते वो लोग हैं जिन्होंने अपने आंसू को लंबे समय से दबा कर रखा है। किसी के सामने बयां नहीं किया कि उनकी अंतरदुनिया में क्या और किस प्रकार की हलचल चल रही है।
यह वाकया है एक हिन्दी शिक्षकों की कार्यशाला का। इस कार्यशाला में भाषा कौशल की बुनियादी दक्षता की चर्चा हो रही थी। उस विमर्श में भाषायी कौशल श्रवण, वाचन और पठन उसके बाद लेखन कौशल पर अभ्यास का कार्य हो रहा था। पठन कौशल के बाद लेखन पर बात आई। जब बात चली तो हमने कहा आज हम डायरी और यात्रा-संस्मरण लिखते हैं।
तकरीबन सभी प्रतिभागियों ने अपनी समझ से यात्रा-संस्मरण और डायरी विधा में हाथ आजमाया। अब बारी थी पठन की। जब एक एक कर प्रतिभागियों ने पढ़ना शुरू किया तो जिन कौशलों की बात की गई थी उसका प्रयेग वाचन और पठन में कर रहे थे। तभी एक प्रतिभागी की आंखों में आंसुओं का एक रेला लग गया। जैसे ही उनपर नज़र पड़ी तो मेरी आंखें भी भर आईं। लेकिन समझना ज़रूरी था कि क्यों आख़िर क्या वो कहानी है जिससे वो शिक्षिका को ख़ुद को जोड़ पा रही है।
जब उनकी बारी आई तो अपनी डायरी के कुछ पन्ने हमारे साथ साझा किया। वह भी ऐसा कि उससे हमारी आंखों में भी आंसू आ गए। सितंबर में ससुर और अक्टूबर में पिता को कैंसर का पता चला। यह वैसे भी कतना संजीदा घटना थी। डायरी के उन पन्ने को सुनते सुनते सभी की आंखें भर आईं। इसके साथ ही एक और प्रतिभागी थीं जिनकी आंखों में भी आंसू नहीं बल्कि लोर भर भर कर निकल रहे थे।
हर कोई अपने अंदर पता नहीं कितना समंदर दबा कर रखता है। जब कभी मौका मिलता है बस वह अपने अंदर की जज्बातों को उड़ेल देता है। यदि यह विश्वास हो जाए कि जिसके सामने हम अपन बात रख रहे हैंं वह सुरक्षित है। मेरी बात सुनने वाले और समझने वाले हैं। हमारी बात हमारे बीच ही सुरक्षित रहेगी।
हम सब ऐसे व्यक्ति की तलाश ज़रूर करते हैं जिन्हें हम अपनी बात साझा करते हैं उसका मजाक नहीं बनाया जाएगा। हमारी बात और दर्द से कोई जुड़ने वाला होगा। यही हुआ इस कार्यशाला में। शिक्षिका ने अपनी निजी घटनाएं साझा कीं कि कैसे उन्हें पिता और ससुर की बीमारी ने तोड़ा और वो प्रोफेशनल और निजी जिंदगी में सामंजस्य नहीं बैठा पा रही हैं। एक ओर पिता और ससुर और दूसरी ओर स्कूल और शिक्षण। बच्चों के साथ जब न्याय नहीं कर पा रही हैं तो उसका मलाल उन्हें रूलाने लगती है। उन्हें लगता है इनमें बच्चों का क्या दोष? दिन में नींद आने लगती है। लेकिन यह सामंजस्य ज़रा कठिन है। किन्तु पढ़ाने और पढ़ने के प्रति ललक और जिज्ञासा अप्रतीम है। रूचि भी ऐसी कि उन्हें नई चीजें सीखने की ललक उन्हें आगे बढ़ा रही है।

Tuesday, December 11, 2018

पुनर्मूषिको भव



कौशलेंद्र प्रपन्न
कहानी पुरानी है। बहुत पुरानी। इस कहानी को हमने बचपन में ज़रूर पढ़ी व सुनी होगी। शायद पंचतंत्र की है या कथासरित सागर से ली गई होगी। संक्षेप में समझें कि ऋषि तपस्या में लीन थे। एक चूहा परेशान था। ऋषि जी की आंखों खुली और उस चूहे से पूरा कथा जानने के बाद कहा ‘‘ तुम्हें शेर बना देते हैं। और तब से चूहा शेर का रूपधारण कर लिया।
उसकी प्रकृति अपने स्वरूप के अनुसार होनी थी। हिंसक। सो एक दिन उस शेर में तब्दील चूहे ने सोचा। शायद ज़्यादा ही सोच लिया। अपना भविष्य सुरक्षित करने के लिए योजना बनाई की क्यों न इस ऋषि को ही खत्म कर दूं। क्योंकि इसकी वजह से आज मैं शेर हूं। लेकिन...
.....और उसने ऋषि पर ही धावा बोल दिया। होना क्या था? जो आपको शेर बना सकता है। वही आपको चूहे में तब्दील करने का मंत्र-यंत्र भी जानता है। और कहानी का पटाक्षेप यूं हुआ कि ऋषि ने उसे पुनः चूहा बना दिया।
इस कहानी के कई स्तर और कई पेंच हैं। बल्कि इस कहानी की गांठों को खोलें तो पाएंगे कि हमारी जिं़दगी में भी कई ऋषि मिला करते हैं जो हमारी औकात और छवि, व्यक्तित्व को नया आयाम दिया करते हैं। अब यह हम पर निर्भर करता है कि क्या हम उसे अपनी काबिलीयत के आधार बरकरार रख पाते हैं या वर्तमान पद को भी खो देते हैं। पहले वाला स्वरूप तो अपने हाथ से गया ही वर्तमान की पहचान भी खतरे में आ जाती है।
यदि हमारे अंदर दक्षता और कौशल है। योग्यता और पात्रता है तो हम इस शेर के बिंब को जी पाते हैं। हमें अपने पुराने ऋषि के वरदान और श्राप के भय से हमेशा झुक कर नहीं रहना पड़ता। बल्कि नर्ठ भूमिकाओं और चुनौतियों का सामना डट कर करते हैं।
थ्कतनी ही अजीब बात है कि जब आप एक ही संस्थान में प्रमोट होकर नई पोस्ट हासिल किया करते हैं और कुछ ही वक़्त के बाद आपको पहली भूमिका में धकेला जाए। या फिर ऐसी परिस्थितियां पैदा कर दी जाएं कि आपको अपनी पहली भूमिका में लौटना पड़े तो ऐसे में क्या महसूस करते हैं? आपके महसूसने और अनुभव को कोई ख़ास तवज्जो नहीं दिया जाता बल्कि मैनेजमेंट आपको येन केन प्रकारेण कोई न कोई कारण गिना कर जतला देती है कि आप उसके योग्य ही नहीं थे। आप तो अकादमिक कार्यों के लिए बने हैं। आप चूहा ही रहें। चूहेपन का आनंद लीजिए। आपको कुछ देर स्वाद क्या लग गया आप तो बौरा गए।
चूहे की गल़ती क्या थी? क्यों वह पुनः चूहा बन गया? सोचकर लगता है। हर किसी को नए रूप, पद, रूतबा खूब भाया करता है। जब उससे नई भूमिका छीन ली जाती है तब अप्रिय लगना स्वभाविक है। लेकिन आत्मग्लानि और अपराधबोध से भर जाना उसके लिए आगे की लड़ाई और संघर्ष को बढ़ा देता है। पहला आत्मसंघर्ष उसका स्वयं से होता है कि क्या मैं सचमुच इस लायक नहीं था? क्या हममें वह दक्षता ही नहीं थी जिसकी उम्मीद की जा रही थी? जो अक्षमता गिनाई गई क्या वास्तव में इसमें कमतर हूं आदि आदि। और निराश होकर आगे प्रयास करना छोड़ देगा। वहीं दूसरी स्थिति यह भी हो सकती है कि वह इसे सकारात्मक रूप से ले कि अच्छा कियी कमियां बता दीं। आगे से ऐसी गलती या कमियों को दूर करूंगा।
कंपनियां और दुकानें बहुत सी हैं। यदि हमारे अंदर दक्षता और काम के प्रति ललक और रूझान है कि कीमत देने वाले भी इसी बाजार में हैं। बस ज़रूरत है अपने आप को कैसे बेचते हैं। बिकने के लिए तैयार रहें, दक्ष हों तो खरीदने वाले भी बैठें हैं।

Sunday, December 9, 2018

कभी चुनाव विशेषज्ञ तो कभी ज्योतिषाचार्य





कौशलेंद्र प्रपन्न
हमने अपना बचपन और युवावस्था में चुनाव से पूर्व और चुनाव के बाद विश्लेषकों में योगेंद्र यादव को टीवी पर देखा है। इनका विश्लेषण कई मतर्बा आंखें खोलने वाली हुआ करती थीं। जो विश्लेषण और भविष्यवाणियों की जाती थीं परिणाम तकरीबन आस-पास ही होती थीं। इन विश्लेषणों में मंजे हुए पत्रकार भी शामिल होते थे। जिन्हें चुनावी पंड़ित के नाम से जाने थे। इनमें राहुल देव, दीनानाथ मिश्र, सुरेंद्र प्रताप सिंह, राजकिशोर, प्रभाष जोशी आदि। जैसे जैसे मीडिया की प्रतिबद्धता बदलती चली गई वैसे वैसे ये पत्रकार भी बिलाते चले गए। मुंखापेक्षी विश्लेषणों का दौर चल पड़ा।
इन दिनों कई राज्यों में चुनावी मौसम है। इस मौसम में कई तरह की दुकाने सजाए कई लोग बैठे हैं। इनमें मीडिया तो है ही साथ ही ज्योतिषियों की भी दुकाने ंचल पड़ी हैं। इन दुकानों में इन दिनों क्या बेचा जा रहा है? कभी भी न्यूज चैनल खोल लें। दो ही किस्म की बहसें सुनने और देखने को मिलेंगी। पहला सड़क छाप और स्वघोषित चुनाव विश्लेषक और दूसरे ज्योतिषशास्त्री। अंक ज्योतिष, फलित ज्योतिष नक्षत्र, ग्रहों को पढ़ने वाले।
जो आम जनता को नहीं पढ़ पाता वही शायद इन अंक ज्योतिषियों की शरण में जाया करते हैं। आज की घटना है कई न्यूज चैनल बाबाओं को बैठा कर उनसे दो ही पार्टी की जन्मकुंडली बांचने में झोंक रहे हैं। इन सभी ज्योतिषियों की मानें तो भाजपा को सूर्य, राहु, आदि सभी दशाएं ठीक हैं। मूलांक 8, 13, आदि आदि हैं। जो सत्ता, शासन सुख प्रदान करने वाली हैं। वहीं कांग्रेस के मूलांक, फलित ज्योतिष बताते हैं कि इनकी सत्ता से दूरी रहेगी आदि।
है न कमाल की चुनावी और समाजो-सत्ताई विश्लेषण। आप को यकीन हो जाएगा कि कौन जीतने वाले हैं। किस की सत्ता पर ताजपोशी होने वाली है। इन बाबाओं से कोई पूछे कि क्या आपने कभी समाजशास्त्र, चुनाव को मनोविज्ञान, चुनाव को अर्थशास्त्र या फिर मानवीय रूझानों को अध्ययन किया है। भला हो ऐसे विश्लेषकों और ऐसे दर्शकों को जो बड़ी ही चाव से इन्हें देख और परायण कर रहे हैं। 

Friday, December 7, 2018

भाषायी मार



कौशलेंद्र प्रपन्न
कई तरह के मार हम पर पड़ते हैंं। प्राकृतिक, अप्राकृतिक जिसे हम कृत्रिम भी कह सकते हैं। कुछ मार हम खुद पैदा करते हैं और कुछ दूसरों से थोपी जाती हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो इन मारों से हम बचें कैसे? क्या ऐसी कोशिश करें जिससे कि हम इन मारों के काट निकाल सकें।
भाषायी मार भी उक्त मारों में शामिल कर सकते हैं। भाषायी मार से सीधा का मायने यह है कि जो हमारी अर्जित भाषा है उसकी कमाई पूरी जिंदगी खाया करते हैं। यह भाषायी कमाई हमें मेहनत कर के कमाई पड़ती है। हमेशा प्रयास और मेहनत से इसमें इजाफा करना होता है। यदि इन भाषायी संपदा को बढ़ाते नही ंतो हम कहीं न कहीं पिछड़ते चले जाते हैं
हमारी मातृभाषा और प्रथम भाषा के साथ रागात्मक संबंध कई बार मार से बचने और ख्ुद को संभालने में मुश्किलें पैदा करती हैं। इसे इस तरह भी समझ सकते हैं कि भाषा हमें न केवल मांजती है बल्कि हमें बाजार के अनुसार भी तैयार करने में बड़ी भूमिका निभाती है। जो भाषा बाजार में रोजगार और स्वविकास में मददगार साबित होती है उस भाषा को मोलभाव काफी महंगी होती हैं।
भारतीय भाषाएं और अंग्रेजी के बीच हमेशा ही एक तनाव की स्थिति रही है। बनती और बनाई भी जाती है। भाषायी रागात्मक संबंधों की चर्चा उक्त की गई, उसका मायने यह है कि हिन्दी मेरी मातृभाषा है और हिन्दी ही ताउम्र काम करूंगा और हिन्दी को प्रोत्साहित करने में पूरी जिंदगी झोंक दूंगा। लेकिन हम एक बड़े फल्सफे और हक़ीकत से मुंह मोड़ रहे होते हैं।
भाषायी मार छात्रों, प्रोफेशनल्स और जीवन पर भारी पड़ने लगता है। यदि अंग्रेजी उतनी नहीं आती तो प्रोफेशन पर असर तो पड़ता ही है साथ निजी जिंदगी में भी उसका मलाल सालता है। काश अंग्रेजी पर ध्यान दिया होता तो मेरी बाजार गरम होती। मेरी पहुंच और प्रतिष्ठा भी ज्यादा ही होता। लेकिन कई बार दृढ निर्णय और निश्चिय हमें भाषायर मार से बचा सकता है। हमारी हिन्दी व आंचलिक भाषाएं कुछ दूर तक ही हमारा साथ निभा पाती हैं। एक सीमा और पद के बाद हमें अंग्रेजी अपनानी पड़ती है।

Thursday, December 6, 2018

अपेक्षा, उम्मींद, आशा...



कौशलेंद्र प्रपन्न

तीन वर्णों का शब्द है। इसे आशा, उम्मींद आदि नामें से भी पहचानते हैं। बुद्ध ने कभी बहुत खूब कहा था ‘‘ आशा अपेक्षा ही दुख का कारण होता है’’
हम पता नहीं किससे क्या और कितनी उम्मींद कर लेते हैं। और जब पूरे नहीं होते तो दुखी हुआ करते हैं। इस उपजे हुए दुख के लिए शायद वह व्यक्ति दोषी नहीं बल्कि हम हैं जिसने बिना जांचे परखे कि वह अधिकारी है या नहीं? सक्षम है या नहीं? आदि। और हमने उससे ग़लत अपेक्षा कर ली।
हमारे अधिकारी भी ऐसी हो सकते हैं। फर्ज़ कीजिए कोई हिन्दी और संस्कृत का जानकार है लेकिन उससे उम्मींद कर रहे हैं कि वह बेहतरीन अंग्रेजी लिख,बोल पाए। यदि वह व्यक्ति आपकी अपेक्षा पर ख़रा नहीं उतरा तो इसमें उतना दोष उसका नहीं है जिससे आपने उम्मींद की बल्कि आप ज्यादा दोषी हैं जो आपने सुपात्र से अपनी अपेक्षा नहीं की। यहां स्थिति स्पष्ट है वह व्यक्ति अपनी पूरी क्षमता और ताकत लगाकर आपकी अपेक्षाओं पर ख़रा उतरने का प्रयास करेगा। लेकिन आपकी कसौटी पर पूरे न उतर पाएं।
किन्तु जिस पात्र से अपेक्षा की गई यदि वह सफल उनकी नजरों पर नहीं भी हो पाता है तो कोई वजह नहीं कि वह अपनी गति, प्रयास और कोशिश छोड़ दे। जो अपने लक्ष्य को ध्यान में रखेंगे वो अपने रास्ते से भटक सकते। जो रचेगा वो कैसे बचेगा, जो बचेगा वो कैसे रचेगा? श्रीकांत वर्मा की पंक्ति उन्हें ताकत दे सकती है। यदि आप कोशिश करते हैं तो वह आज नहीं कल पहचानी भी जाएगी।

Wednesday, December 5, 2018

अप्राकृतिक प्रसव पीड़ा



कौशलेंद्र प्रपन्न
अस्पताल का कमरा। कमरे में चारों ओर प्रसव पीड़ा की कराह। कोई तेज आवाज में कराह रहा है तो कोई धीरे धीरे। लेकिन सब की पीड़ा एक सी है। स्तर एक है। दर्द समान है। किसी के हाथ में दवाई की बॉटल लगी है। चढ़ रही है नसों में दवाई। पेट पर बंधा है एक बेल्ट। जो सामने रखे मोनिंटर पर दिखाता है कितना दर्द है? दर्द का स्तर कितना है? बार बार नर्स देख जाती है। कई बार टंगी बॉटल को कम ज्यादा कर जाती है। पूछने पर कि और कितना समय लगेगा? बस इतना बताती है- देखिए अभी तो 30 40 की लेबल का दर्द का। ये कम से कम 150 होना चाहिए या उससे भी ज्यादा। मुंह भी अभी तो कम ही खुला है। ये भी दस ये पंद्रह सेंटीमीटर होना चाहिए। इंतजार कीजिए।
बगल वाली बेड की महिला को तुरत फुरत में लेबर रूम ले जाया गया। पास वाली महिला अपने दर्द के स्तर के बढ़ने के इंतजार में है। कब बढ़े तो लेबर रूम जाएं। दर्द की कभी बढ़ता है और कभी घट जाता है।
आधी रात से वो परेशान है। पानी की थैली ही कोई आधी रात में फट चुकी है। पानी रूकने का नाम नहीं ले रहा है। कल शाम की तो बात है। डॉक्टर ने देखा, जांचा और कहा अभी तो हप्ता समय है। लेकिन रातों रात क्या हुआ और भोर में ही अस्पताल आना पड़ा।
डॉक्टर ने देखते ही भर्ती कर लिया। पानी चढ़ाया जाने लगा। दवाई भी। अप्राकृतिक दर्द उठाया जाने लगा। देखते ही देखते वो दर्द से पड़पने लगी। तड़पने लगी। लेकिन दर्द और मुंह का खुलना डॉक्टर के अनुसार अभी कम था। सो इंतजार में वो तड़पती रही। पास में न ननद, न देवर, न सास, न बहन कोई भी तो नहीं था। अगर था तो बस एक पति। जो लगातार नर्स से लड़ झगड़कर वहीं का वहीं बेशर्म सा खड़ा रहा। कई बार बीच बीच में बाहर चला जाता जब वह देख और सह नहीं पा रहा था अपनी प्रिये के छटपटाहटों को। अप्राकृतिक दर्द को नजरअंदाज नहीं कर सकता था।
सुबह से दोपहर और दर्द का पैरामीटर अभी भी डॉक्टर के अनुसार कम। वो थी कि तड़प रही थी। न देखा जाए और न सहा जाए। मुंह था कि वो भी खुलने का नाम नहीं ले रहा था। अंदर बच्चे की भी चिंता की कहीं वो स्ट्रेस में न आ जाए।
मालूम नहीं पति ने ही निर्णय लिया। डॉक्ठर को फोन किया मैडम। आप तो जानती हैं। दर्द है कि रूकने का नाम नहीं ले रहा है। वो है कि अप्राकृतिक दर्द में पछाड़े खा रही है। ऐसे कीजिए ऑपरेशन करना चाहिए। जब डॉक्टर सामने आईं तो पहले उसे देखा और पति के कंधे पर प्यार और विश्वास से भरे हाथ रखे और कहा ‘‘बहुत प्यार करते हो। इसलिए निर्णय ने रहे हो।’’ पति ने कहा ‘‘ पति नाते कम एक इंसान होने के नाते मुझे लगता है कि हमें ऑपरेशन वाले विकल्प को चुनने में कोई हर्ज नहीं। हालांकि डॉक्टर लगातार संपर्क में थीं। उन्होंने कहा था ‘‘मैं इंतजार कर रही हूं कि नॉर्मल किया जाए। लेकिन अब जांच के बाद मालूम चला कि नॉर्मल संभव नहीं। बच्चे के चेहरा उल्टा है और नाल भी क गया है। सो हमें ऑपरेशन की करना पड़ता।’’
कैसी पीड़ होती है अप्राकृतिक प्रसव की शायद दुनिया मर्द न जान पाएं और न ही महसूस कर सकें। पुरुष यदि कुछ कर सकता है तो बस निर्णय ले सकता है। सहानुभूति के बोल छिड़क सकता है। अगर आपको गुमान है कि आप पिता हैं, आपको बच्चे से ज्यादा लगाव है तो कभी मौका मिले तो प्रसव पीड़ा से भरे उस रूम में जाईए महसूस कीजिए की पत्नी किस किस्म की पीड़ा से गुजर रही है। स्वभाविक प्रसव हो तो ठीक वरना इस ठसक के साथ न तने रहें कि हमारे खानदान में तो किसी का भी ऑपरेशन से बच्चा नहीं हुआ। देखिए महसूस कीजिए और स्वविवेक का प्रयोग शायद एक पीड़ा से तड़प् रही स्त्री को राहत दे जाए।

Tuesday, December 4, 2018

दम तोड़त रिश्ते


कौशलेंद्र प्रपन्न
कुछ रिश्ते राह में दम तोड़ देते हैं। कहते हैं हम रिश्ते बनाया करते हैं। पूरी शिद्दत से उसे निभाने और बचाने की कोशिश करते हैं। लेकिन कुछ तो बीच राह में घट जाता है जिसकी वजह से वे रिश्ते कभी भी कहीं भी दम तोड़ सकते हैं। संभव है रिश्ते के टूटने व टूट जाने के पीछे कई वजहें रहा करती होंगी। साथ ही जब हम कुछ अनुमान से ज़्यादा उम्मींदें लगा बैठते हैं तब भी रिश्ते उस बोझ तले धीरे धीरे घूट घूट कर पिघलने लगते हैं और एक दिन वे रिश्ते पानी बन हमारे बीच से बह जाया करते हैं।
समाज ही है जहां हम अपने आस-पास के लोगों से रिश्ते बनाया करते हैं। और वही समाज होता है जहां हम कई बार अनजाने में रिश्तों को टूटने के कगार पर ला खढ़ा करता हैं। वजहें बहुत सी हैं लेकिन जो महत्वपूर्ण बात है वह यह है कि हम शायद रिश्तों का कद्र करना नहीं जानते। एक व्यक्ति दूसरे पर जान छिड़का करता है लेकिन वहीं दूसरे को इसका एहसास तक न हो तो कोई कब तक एक तरफा रिश्ते को बांधने में लगा रहेगा।
एक तो आज कल रिश्तों में लोग विश्वास नहीं किया करते। उस पर तुर्रा यह है कि रिश्तों की नजाकत को हम उठा नहीं पाते। कब कौन बीच राह में मुंह सुजाकर अपने राह हो ले। कुछ भी तय नहीं कहा जा सकता। बस कुछ किया जा सकता है तो बस इतना ही कि अपनी ओर से टूटते रिश्तों को कैसे भी बचाया जाए।

Sunday, December 2, 2018

हमसे स्कूल दूर या स्कूल से बाहर हम


कौशलेंद्र प्रपन्न

कैसा सवाल है। यह सवाल कितना उलझ हुआ सा लगता है। लगता है बच्चे इन्हीं सवालों में अपनी जिं़दगी का बड़ा हिस्सा शिक्षा की मुख्यधारा से बाहर काट देते हैं। दरअसल शिक्षा से ये बाहर नहीं हैं बल्कि शिक्षा को इनसे बेदख़ल कर दिया है। हालांकि वैश्विक स्तर पर संयुक्त राष्ट्र संघ बाल शिक्षा अधिकार अधिवेशन 1989 में हमने विश्व के तमाम बच्चों को कुछ अधिकार देने की वैश्विक घोषणा पत्र पर दस्तख़त किए थे। माना गया कि उन अधिकारों में विकास का अधिकार, सहभागिता का अधिकार, सुरक्षा का अधिकार, जीवन जीने का अधिकार प्रमुखता से शामिल किया गया। यदि इन घोषणाओं की रोशनी में उन बच्चों पर नजर डालें जो दिव्यांग या विशेष बच्चे हैं, तो जमीनी हक़ीकत हमें सोने न दे। हम ऐसे बच्चों के विकास के रास्ते में आने वाली अड़चनों को सामान्य बच्चों के तर्ज पर देखने, समझने की कोशिश करते हैं। यहीं से वे बच्चे हमारे सामान्य स्कूली शिक्षा की परिधि से बाहर होते चले जाते हैं। ‘‘तारे जमीन पर’’ फिल्म बड़ी ही शिद्दत से एक बच्चे के बहाने उन तमाम बच्चों की परेशानियों को उजागर करती है। उस स्कूल का प्रिंसिपल उन अन्य पिं्रसिपल से अगल नहीं सेचता वह भी निर्णय लेता है कि इस बच्चे के विशेष स्कूल में डाल देना चाहिए आदि। जबकि शैक्षिक नीतियां और तमाम फ्रेमवर्क वकालत करती हैं कि दिव्यांग बच्चों को महज उनके किसी ख़ास दिव्यांगता की वजह से शिक्षा के सामान्यधारा से विलगाना अनुचित है। उन्हें भी सामान्य स्कूलों में सामान्य बच्चों के साथ तालीम हासिल करने का अधिकार है। इन्हीं तर्कां की रोशनी में माना गया कि सामान्य स्कूलों को इन बच्चों के पहुंच के अनुरूप तमाम सुविधाएं मुहैया कराना नागर समाज की जिम्मेदारी और जवाबदेही बनती है। दूसरे शब्दों में कहें तो लाइब्रेरी, शौचालय का नल, वॉश बेशीन, टोटी, सीढ़ियां आदि पहुंच में होने चाहिए ताकि बच्चे अपनी आयु, वर्ग के अनुसार स्कूल की अन्य सुविधाओं के इस्तमाल में किसी औरे के सहारे के मुंहताज़ न रहें। किन्तु हक़ीकतन यह कहते हुए अफ्सोस ही होता है कि जो सुविधाएं स्कूल प्रशासन और शिक्षा विभाग को प्रदान करने थे उसमें हम अभी भी काफी पीछे हैं। ऐसे बच्चे चाहकर भी स्कूल के विभिन्न साधनों का प्रयोग अपने लिए नहीं कर पाते। उन्हें यह सुना दिया जाता है बच्चे तुम नीचे ही रहा करो। ऊपर चढ़ना तुम्हारे लिए आसान नहीं है।

Thursday, November 29, 2018

तुमसे न हो पाएगा



कौशलेंद्र प्रपन्न
आंखों में अंगूली डाल कर जगाने का भी प्रयास कर लें लेकिन कुछ लोग हैं जिनकी नींद है कि टूटती नहीं। न जाने किस किस्म की नींद में सो रहे होते हैं और सपने देखा करते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो उन्हें इस बात और हक़ीकत का ज़रा भी एहसास नहीं होता कि क्या उनके सपनों में झोल है या कि उनकी नींद ही नहीं टूटी।
हमारे आस-पास ऐसे बहुत से लोग हैं जिनकी नींद इतनी गहरी होती है कि उन्हें इस बात का इल्म नहीं होता कि उनके आस-पास कुछ नई चीज भी घट रही है। कैसे समीकरण बन और बिगड़ रहे हैं। वो साहब हैं कि देखना ही नहीं चाहते। शायद देखने से डरते हैं। डर शायद इस बात की भी है कि कहीं चूक न जाएं। कहीं रिजेक्ट न कर दिए जाएं। पता किस तरह जीया करते हैं।
जब तक ऐसे लोगों को कहीं ठोकर न लगे। या जब तक कान पकड़ कर यह न कहा जाए की आपकी ज़रूरत नहीं है। आपकी भाषा से बू आती है। भाषा में ग्रामीण ठेठ गंध भरा है। तुम्हारी भाषा ही ऐसी है कि वो गांव देहात, सम्मेलन में तो ठीक है लेकिन यहां के लिए मकूल नहीं है। वो अपने आप में अपने आप को तुर्रमख़ां समझा करते थे। अपनी भाषायी चमक के सामने कुछ और देख ही नहीं पाते थे। उनके पास और उन्हीं की कुर्सी के बगल से जमीन छिनी जा रही थी और वो थे के सपने के पीछे भाग रहे थे।
उन जनाब का सपना था कि फर्र फर्र उनकी भाषा बोलें, उन्हीं की तरह सर्रसर्र बोलकर औरों पर रौब बरसाएं। लेकिन यह हो न सका। जब वो बोलने का प्रयास करते। कोशिश करते कि उन्हीं की भाषा बोलें। गंवई भाषा जिनसे उन्हें बू आया करती थी। वो पीछे धकेल दें। उसने पूरी कोशिश की कि उस भाषा से नाता तोड़ ले। लेकिन क्या यह संभव था? जिस भाषा के कंधे पर चढ़कर यहां तक का सफ़र तय किया था कैसे उसे बिसुरा दे। मगर उसके सामने अब दो ही रास्ते थे। या तो नई भाषायी बहुरिया को अपनाकर आगे बढ़े। दूसरा रास्ता पुरानी राह पर ही चलता रहे अपने शान से। अपनी ठसके के साथ।
उसके सामने भाषा और ओहदा दो ऐसे द्वंद्व थे इनमें से उसे क्या चाहिए था। क्या वह भाषायी ताकत हासिल कर उन लोगों में शामिल हो जाए जो तोहमत लगाया करते थे तुमसे न हो पाएगा। तुम तो रहने दो। मुंह खोलते हो तो भाषायी बू आती है। बोलना आता नहीं और कौआ चला हंस के चाल और अपनी चाल भी भूल गया।

Tuesday, November 27, 2018

पोस्टमैंन बनना पसंद है या कि सुरक्षाकर्मी






कौशलेंद्र प्रपन्न
किसी भी संदेश का वाहक बनना आसान है। संदेश को प्रेषक से लेकर पाने वाले के दरमियां उस पोस्टमैंन की कोई भूमिका होती है तो इतनी ही कि वह संदेश लेकर जा रहा है। कहा भी गया है कि संदेशवाहक अबंध्य होता है। यानी संदेशवाहक को न तो बंदी बनाया जाता है और न ही बद्ध किया जाता है यह कूटनीति भी कहती है। इसजिलए हनुमान को भी छोड़ने की वकालत की गई थी। वैसे ही इतिहास में कई कहानियां मिलेंगी। जब संदेशवाहक को बंधक नहीं बनाया गया है क्योंकि वह सिर्फ और सिर्फ अपने मालिक या राजा का संदेश वाहक है। उस ख़त व संदेश में क्या कंटेंट है उससे उसका कोई दरकार नहीं होता। उधर से संदेश लेकर अपने राजा व मालिक को सौंप देता है। मैंनेजमेंट के गुरु इसे कुछ और अंदाज़ में देखते हैं। प्रो. हीतेश भट्ट इसे मैंनेजमेंट की नज़र से देखते हैं और मानते हैं कि जब तक लीडर या मैनेजर महज संदेशवाहक यानी पोस्टमैंन की भूमिका में होता है वैसी स्थिति में जवाबदेही तय करना मुश्किल होता है। पोस्टमैंन अपना विवेक इस्तमाल नहीं करता। वह न तो तर्क करता है और न ही अपना पक्ष रखता है। दूसरे शब्दों में कहें तो पोस्टमैंन किस्म के मैंनेजर व लीडर न तो अपने कर्मचारियों के हित में कोई वकालत कर पाते हैं और न ही अपने और टीक के हक़ में अपनी बात रख पाते हैं। वहीं सुरक्षाकर्मी यानी जिसके कंधे पर जवाबदेही तय की जा सकती है। यदि हमारे कैम्पस में कोई अवैधतौर पर प्रवेश करता है तो उसकी जवाबदेही सुरक्षकर्मी की बनती है। यानी वह व्यक्ति तमाम गतिविधियों को जिम्मेदार होता है। यदि मैंनेजर व लीडर सुरक्षाकर्मी की भूमिका निभाता है जो कि निभाना चाहिए तो उस व्यक्ति के कंधे पर अपनी टीम और हर कर्मचारी की जवाबदेही अपने सिर पर लेता है।
किसी भी संस्था व देश की सीमा पर तैनात पोस्टमैंन व सुरक्षाकर्मी की भूमिका को समझें तो यही होगा कि एक मैंनेजर व लीडर भी अपनी कंपनी व संस्था का सुरक्षाकर्मी होता है जो अपनी जिम्मेदारी को तय करता है। यदि कर्मी समुचित काम नहीं कर रहा है, यदि टीम का सदस्य तय लक्ष्यों को हासिल करने में पिछड़ रहा है तो ऐसी स्थिति में वह पोस्टमैंन के मानिंद मैंनेजमेंट को अपनी कर्मी की कमियों और असफलताओं को सिर्फ संप्रेषित भर नहीं करता है। बल्कि वह लीडर अपनी जिम्मेदारी स्वीकारते हुए मानता है कि शायद उस व्यक्ति के चुनाव और दक्षता की पहचान में कहीं चूक हो गई। या फिर उसे विशेष प्रशिक्षण प्रदान कर हम अपनी टीम के लक्ष्य को हासिल करने योग्य बना सकते हैं। बस कुछ वक़्त की मांग करता है। दुबारा प्रो. हीतेश भट्ट जी के बिंब व अवधारणा को अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए सभार इस्तमाल कर रहा हूं कि किसी भी कंपनी व संस्था में हमें पोस्टमैंन नियुक्त करने से बचने की आवश्यकता है। वरना वह कंपनी व संस्था प्रगति करने की बजाए महज गतिशील होने का एहसास भर दे सकता है। वहीं जब सुरक्षाकर्मी को नियुक्त करते हैं तब वह सिर्फ और सिर्फ नौ से पांच की नौकरी भर नहीं करता है। और न ही वह अन्य कर्मियों के तर्ज पर सिर्फ सैलरी के लिए काम किया करता है। बल्कि वह कंपनी, संस्था व घराने की ऊंचाई के लिए जी जान लगा देता है।
हमें किसी भी संस्था व कंपनी को विकास और वृद्धि के राह पर लेकर जाना है तो कर्मचारियों के चुनाव के वक़्त काफी सावधानी बरतनी चाहिए। साथ ही समय समय पर उनके कार्य करने की गति और रवैये को भी जांचना और परखना होगा। यदि कोई कर्मी किसी ख़ास समस्या में फंस गया है, उसे किसी भी किस्म की मदद नजर नहीं आ रही है तो ऐसे में हमारा सुरक्षाकर्मी यानी वैसे मैंनेजर व लीडर उस कर्मी के साथ खड़ा होता है। वह अपनी जिम्मेदारी से भी पीछे नहीं हटता कि फलां कर्मी क्यों बेहतर कार्य व प्रतिफल नहीं दे सका। वह स्थितियों और प्रक्रिया का विश्लेषण करता है और इस निर्णय तक पहुंचता है कि उस व्यक्ति को किस तरह की सहायता की आवश्यकता थी। जो किन्हीं वजहों से समय पर नहीं मिल पाई। वह हमेशा अपने ऊपर के मैंनेजमेंट के समक्ष अपना पक्ष और कर्मी की स्थिति से रू ब रू कराता हैं। वह वकालत करता है कि फलां कर्मी को कुछ और वक़्त दिया जाए और देखा जाए कि क्या तमाम मदद के बाद भी वह प्रदर्शन कर पा रहा है या नहीं।

Sunday, November 25, 2018

तालीमगार और उर्दू

अस्लाम वालेकुम
जैसी ही उर्दू स्कूल में प्रवेश किया कुछ स्लोगन हिंदी और इंग्लिश में दिखे। लेकिन जैसे जैसे स्कूल में अंदर जाता रहा वैसे वैसे उर्दू भी दिखने लगी। 
अब संतोष हुवा कि यहां बच्चों को उर्दू देखने को मिलती होगी। इस स्कूल की प्राचार्या ने बताया पहले उर्दू नही थी लेकिन एक ऑब्ज़र्वर ने राय दी कि इस स्कूल में कम से कम इन बच्चों को उर्दू देखने, पढ़ने को मिले। हर दीवार, जगह पर उर्दू में लिखीं गईं थीं। 
आज की तारीख़ में उर्दू बहुत कम ही जगह पर पढ़ने, देखने को मिलती हैं। आज की तारीख़ ने उर्दू, क्लासिक भाषा की प्रकृति को बदल चुकी है। यैसे में भाषा को बचाना हमारा फर्ज़ है। बधाई यैसे स्कूल के तालीम देने वाले शिक्षक शिक्षिका को जो शिद्दत से बच्चों कोतालीम देने में जुड़े हैं। 

Saturday, November 24, 2018

स्कूलों का विलयीकरण और सीखने के प्रतिफल



कौशलेंद्र प्रपन्न
पिछले दिनों दिल्ली के प्राथमिक स्कूलों में कक्षा अवलोकन का अवसर मिला। उस ऑब्जवेशन में पाया कि लगभग सभी कक्षाओं में शिक्षकों ने दीवार पर सीखने के प्रतिफल लिखकर चिपका रखा था। अंग्रेजी हम जिसे लर्निंग आउटकम इडिकेट््रर्स कहते हैं, हम कक्षा में टंगा और चिपका हुआ मिला। उस चार्ट पेपर पर हिन्दी, अंग्रेजी, गणित, समाज विज्ञान आदि विषयों में बच्चा कितना सीख लेगा उसका एक रोडमैप मिला। यह देखकर खुशी हुई कि आदेश के बाद ही सही लेकिन शिक्षकों ने इस प्रकार के चार्ट अपने क्लास में लगा रखे हैं। हालांकि अपेक्षा यह भी कि यह जान सकें कि क्या वो इन प्रतिफलों को हासिल करने के लिए कोई रणनीति भी बनाई हुई है या सिर्फ दिखावे के लिए दीवार का कोना प्रयोग में लाया गया है। शिक्षकों की जबानी जो कहानी सुनी, वह चौकाने वाली थी। उन्हें पढ़ाने का ही समय नहीं मिलता। कब कक्षा से बाहर कागजातों के पेट भरने के लिए बुलावा आ जाता है और पढ़ाते पढ़ाते बीच में दफ्तरी काम में लग जाना होता है।
इन शिक्षकों को विभिन्न संस्थानिक प्रशिक्षण भी दिए गए लेकिन अफ्सोसनाक बात यही है कि वे प्रशिक्षण कार्यशालाओं के दौरान सीखे गए कौशलों का इस्तमाल करने का उन्हें मौका ही बहुत कम मिलता है। उस तुर्रा यह तर्क और लांछन लगाया जाता है कि शिक्षक कक्षा में पढ़ाता ही नहीं। यह कितना बेबुनियाद बात है कि हम शिक्षक को कक्षा पढ़ाने का अवसर कम देते हैं और फिर पूछते हैं बता, तेरे क्लास के बच्चे पढ़ना और लिखना क्यों नहीं सीख सके।
इसी दिल्ली में एक ओर नगर निगम के स्कूल अपनी बदहाली से गुजर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्कूलों में रोजदिन नई नई तकनीक प्रदान की जा रही है। ये कैसे बुनियाद हम बना रहे हैं इसका अनुमान तो तब लगता है जब मालूम चलता है कि इसी दिल्ली में एक ओर स्कूलों को दूसरे स्कूलों में मर्ज कर दिया जाता है या फिर बंद कर दिया जाता है। वही उन्हीं स्कूलों की जमीन पर सरकार पार्किंग बनाने की अनुमति प्रदान करती है। यह भी कमाल की प्राथमिकता है शिक्षा के प्रति।
शायद हमारी प्राथमिकता शिक्षा नहीं बल्कि उत्पादक और आर्थिक स्रोत पैदा करना ज्यादा है। यही स्थिति अन्य राज्यों की भी है। कई राज्यों में सरकारी स्कूल या तो बंद कर दिए गए या फिर स्कूलों को दूसरे स्कूलों में विलय कर दिया गया। बच्चों को उनके भाग्य पर छोड़कर सरकार अपना पल्ला नहीं झाड़ सकती। लेकिन हो तो यही रहा है। हमारे सरकारी स्कूल और सरकारी कॉलेज आदि इसी संक्रमण के दौर से गुजर रहे हैं। 

Thursday, November 22, 2018

स्कूलों में हैं कंपनियां मगर...



कौशलेंद्र प्रपन्न
पिछले दिनों दिल्ली सरकार के प्राथमिक स्कूलों का अवलोकन का अवसर मिला। वो भी त्रिलोकपुरी, कल्याणपुरी आदि क्षेत्रों में जो स्कूल मौजूद हैं इन स्कूलों में शौचालय, पीने का पानी, खेल के मैदान, लाइब्रेरी सब कुछ हैं। अगर नहीं हैं तो बच्चे और पर्याप्त शिक्षक। जिन स्कूलों में कम से कम दस से पंद्रह स्टॉफ होने चाहिए यानी शिक्षक वहां चार या पांच शिक्षक हैं। जिन स्कूलों में नर्सरी क्लास हैं वहां आया मौजूद हैं। कायदे से शिक्षिका होनी चाहिए लेकिन शिक्षिकाओं की कमी को आयाएं पूरी कर रही हैं। अनुमान लगा सकते हैं कि जिन स्कूलों में आयाएं नर्सरी की क्लासेज मैनेज कर रही हैं वहां क्या होता होगा?
इन दिनों विभिन्न स्कूलों पीने का पानी की टंकी की ज़रूरत नहीं है लेकिन सरकारी फरमान जारी के तज र्पर हर स्कूलों में पीने का पानी की टंकी बनाई जा रही हैं। साथ ही गार्ड रूम बनाए जा रहे हैं। स्कूल में शिक्षक नहीं, आया नहीं, अन्य सहायक स्टॉफ नहीं लेकिन बार्ड रूम बनाना ज़रूरी है।
पिछले दिनों दिल्ली के दक्षिणी नगर निगम के स्कूलों को बंद कर दिए गए या फिर उन्हें अन्य स्कूलों में मर्ज कर दिए गए। तर्क जो दिए गए उन तर्कां पर हंसा जाए या रोया जाए कि इन स्कूलों में बच्चे कम हो रहे हैं इसलिए इन्हें बंद कर यहां पार्किंग बनाया जाएगा। सरकार की प्राथमिकताएं बताती हैं कि उन्हें बच्चों की शिक्षा से ज्यादा पार्किंग की चिंता है।
तमाम एनजीओ, सीएसआर कंपनियां इन स्कूलों में बेहतरी के लिए अपना योगदान दे रही हैं। जिनमें टेक महिन्द्रा फाउंडेशन, प्लान इंडिया, रूम टू रीड, सेव द चिल्ड्रेन आदि। ये कंपनियां कुछ स्कूलों मे ंतो अपने शिक्षक भी भेज रहे हैं जो कक्षाओं में शिक्षण काम भी कर रहे हैं। जो काम शिक्षा विभाग और सरकार के जिम्मे था उसे गैर सरकारी संस्थाएं कर रही हैं। इन तमाम हस्तक्षेपों के बावजूद एक बड़ी टीस यह उठती है कि फिर क्या वजह है कि बच्चे पढ़-लिख नहीं पाते?

Wednesday, November 21, 2018

डिग्री मिली पर...



कौशलेंद्र प्रपन्न
डिग्री बांटने और बेचने वाले बहुत हैं। दुकानें भी बहुत हैं। जहां हर किस्म की डिग्रियां मिला करती हैं। सही दुकान की तलाश आपने कर ली तो सारी मेहनत सफल हो जाएगी। वरना पास होने और डिग्री लेने के बाद भी कुछ सालों बाद आपके उस बैंच के उस कोर्स की डिग्री अमान्य भी हो जाती है।
कुछ साल पहले तक बीएड की डिग्रियां ख्ूब अच्छी खेप में बिकीं। डिग्री के दुकानदार मालामाल हो गए। छात्र में सरकारी नौकरियों में मजे कर रहे हैं। लेकिन बच्चों का क्या हुआ। उन्हें कक्षा में कैसे खड़ा होना है, कैसे पाठ योजना बनानी है? कैसे गतिविधियों को अंजाम देना है आदि तक नहीं आते। पता नहीं कैसे उन लोगों को शिक्षा में जगह मिल गई। दो एक साल पहले जम्मू कश्मीर की उच्च न्यायालय ने शिक्षा विभाग की अच्छी क्लास ली थी कि कैसे कैसे संस्थान आप चला रहे हैं जहां बच्चों को कुछ सीखाया नहीं जाता। महज उन्हें डिग्रियां बांटने की बजाए कुछ सीखा भी दें।
न केवल शिक्षा में बल्कि यही हाल लॉ, मैनेजमेंट आदि क्षेत्र के भी हैं। जहां मैनेजमेंट, तकनीक आदि के कोर्स कर डिग्री तो उनके पास होती है लेकिन न तो उन्हें उनकी विषयी समझ पुख्ता होती है और न ही ऑफिस में काम करने का सलीका ही होता है।
केपी सक्सेना का एक व्यंग्य याद आता है जिसमें एक स्कूल की कल्पना की है। वह स्कूल है सैंडलहुड पब्लिक स्कूल। जहां प्रिंसिपल ही चपरासी है। प्रिंसिपल ही टीचर है। वही एक व्यक्ति पूरे स्कूल का स्टॉफ है। उस व्यंग्य को पढ़कर कहानी काफी स्पष्ट हो जाएगी। यह मसला शिक्षा के साथ ही अन्य क्षेत्रों का भी है। कहानी एक सी है।

Monday, November 19, 2018

अपनी ही नज़रों में गिरता रहा



कौशलेंद्र प्रपन्न
‘‘अरे तुम्हारा मुंह तोड़ दूंगी। समझ नहीं आती तुम्हें कि मैं तुम्हें प्यार व्यार नहीं करती। क्यों मेरे पीछे पड़े हो?’’
यह वाक्य आज भी उसके कानों में बजते हैं। हालांकि उसे पुरानी जॉब छोड़े तकरीबन पांच साल हो गए। लेकिन उस लड़की की आवाज आज भी उस ढीठ के कानों में बजा करती है। चाहकर भी आवाज से दूर नहीं जा पाता। कितना दफ़ा उसने चाहा कि भूल जाए या भुला दी जाए वो। लेकिन उसका जादू ही ऐसा रही कि दूर न जा सका। उसके साथ के किस्से अक्सर उसकी आंखों में पनीलापन छोड़ देते हैं। छोड़ जाती हैं उसके साथ के नोक झांक के पल भी।
उसने कभी लड़की का ग़लत नहीं चाहा। न वो उसे हल्के में लेता था। बात ही ऐसी थी कि वो उससे दूर नहीं जा सका। चिट्टी लिखी, मैसेज लिखे, ख़त कह लें क्या नहीं लिखा ।इन तमाम जरिए से अपने स्नेह और लगाव का इजहार किया।
बस ग़लती इतनी सी हो गई कि एक बार गले लगाने की मुहलत मांगी और गले लग कर कानों में कह दिया ‘‘आई लव यू’’
तमतमाई लड़की रूम से बाहर तो चली गई लेकिन उसके पीछे छोड़ गई एक दहकता हुआ सवाल और सवाल से भी बड़ा बवाल। देखते ही देखते उस तीन अल्फ़ाज़ों के ख़मियाजे भुगतने के लिए फरमान आए गए। शायद यह पहली बार हुआ था।
उसे इसकी ज़रा भी भनक नहीं थी कि मसला इतना गहरा और लहक रहा है। अगले ही हप्ते बोलचाल बंद। न देखा देखी और न बातचीत।
बातचीत तो तब भी नहीं हुई जब उसे उस तीन लेटर के लिए कमिटी में बुलाया गया। कहानी खुली तो लंबी कहानी निकली।
हाथ पांव जोड़े। माफी मांगी। आइंदा ऐसा वैसा नहीं करेगा कसमें खाईं और कानूनन कार्यवाई की वायदेनामा पर दस्तख़त किए। उस तीन शब्द ने उसे देखते ही देखते ज़लालत की स्थिति में ला खड़ा किया।
एक बार नजर उठा कर देखा भी उसने। लेकिन उन आंखों में परिचय की रेखाएं गायब थीं। था कुछ तो बस अपरिचय और हिकारत।
जो हो। वो लड़की आज भी याद आती है उसे। याद आए भी क्यों न उसका मनसा ख़राब नहीं था। उसने तो बस इतना ही चाहा कि जो रागात्मक रेसे उसके मन में हैं उसे भी एहसास कराए। न तो परेशान करना उसका मकसद था। और न किसी भी किस्म की दिक्कत पैदा करने की। बस यहीं मात खा गया। और अपनी ही नज़रों में गिरता रहा रोज़दिन।

Friday, November 16, 2018

चुनाव में मीडिया



कौशलेंद्र प्रपन्न
जब जब देश में कोई भी चुनाव होता है तब तब मीडिया के रूख़ बदलते नज़र आते हैं। मीडिया यानी पिं्रट और इलेक्ट्रॉनिक दोनों के ही चरित्र को समझना दिलचस्प होगा। कवर स्टोरी से लेकर, इन्टरव्यू, फीचर, ख़बरें, आम सभाओं को कवर करती स्टोरी पूरे अख़बार में छाई रहती हैं। इन राजनीतिक ख़बरों, हलचलों, आम सभाओं, राजनेताओं के साक्षात्कारों से अख़बार और न्यूज चैनल लबालब भरे होते हैं। इन दिनों ख़बरों के चुनाव और प्रस्तुति की शैली, पेज का निर्धारणा आदि मीडिया के व्यापक सामाजिक दरकार की परतें खोलने लगती हैं। पहले पन्ने पर जिन ख़बरों को प्रमुखता से होना था कहीं अंदर के पन्नों पर सिंगल कॉलम या डब्ल कॉलम में नजर आती हैं। उन ख़बरों पर कितनों की नज़र पड़ती है इससे हमारा कोई ख़ास वास्ता नहीं होता। अख़बार या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया इन दिनों अपने रिपोर्टर को विभिन्न राजनीति दलों के दफ्तारों और बीटों पर बांट देता है। हर राजनीति दलों के कुछ चहेते रिपोर्टर होते हैं जो प्रमुखता से उनकी ख़बरें किया करते हैं। ठीक वैसे ही गन माईक लेकर इन राजनीतिक दलों के दफ्तरों में प्रेस कॉफ्रेंस को कवर करते हैं। यहां प्रेस कॉफ्रेंस में जैसे सवाल जवाब हुआ करते हैं उन पर भी नजर डालना दरपेश होगा। हंसी ठिठोली से शुरू होकर सवालों तक की यात्राएं दिखाई देंगे। यहां शिकवे शिकायत भीं खूब होती हैं। तुमने हमारे उस सवाल के जवाब को ठीक नहीं छापा। बॉक्स में लेते तो ज्यादा प्रभावी होता आदि आदि।
चुनावी मौसम में अख़बारों के पन्नों पर बिखरी राजनीतिक ख़बरों के भार से समाज की अन्य प्रमुख घटनाएं, गतिविधियां कहीं दब जाती हैं। वह चाहे शिक्षा, कृषि, विज्ञान, संस्कृति या फिर व्यापार की ही क्यों न हो अपनी मौत मर जाती हैं। अख़बारी भाषा में कहें तो किल कर दी जाती हैं। कई बार ख़बरें मार दी जाती हैं तो कई मर जाती हैं। ख़बर की भी अपनी एक गति और जीवन होता है। तत्काल प्रभाव और असर वाली ख़बरें यदि समय पर नहीं लगीं तो वो फिर अगले या उससे अगले दिन उसकी प्रासंगिकता ही खत्म हो जाती है। लेकिन हमें इसकी चिंता ज़्यादा नहीं होती। हमारी चिंता इस बात की होती है कि यदि फलां दल की ख़बर, आम सभा कवर नहीं किया गया तो मीडिया को संभव है कोपभाजन का शिकार न होना पड़ जाए। यदि अख़बार ने किसी ख़ास दल की गतिविधियों, आम सभाओं को कवर नहीं करने पीछे रह जाए तो संभव है तत्काल विज्ञापन पर रोक लग जाए। अख़बारों में छपने वाली राजनीतिक ख़बरों की प्रस्तुति पर नज़र डालें तो पाएंगे कि कई बार एक सिंगल कॉलम की ख़बर भी आधे पेजे की ख़बर पर भारी पड़ती है। 

Thursday, November 15, 2018

बहन का ननद बन जाना



कौशलेंद्र प्रपन्न
कहते हैं बहनों के बिना क्या बपचन और क्या जीवन। बिना बहनों से लड़े झगड़े यदि बचपन काट दी तो वह भी जीना है? बहनों के साथ खेलना, लड़ना-मारना पीटना, लात मुक्का सब खेल के हिस्से हुआ करते हैं। कभी उसकी कापी के पन्ने फाड़ना, कभी चोटी खिंचना और कभी उससे लिपट कर रोना और मां-पिताजी से बचाने का गुहार लगाना इतना सब कुछ तो होता बहनों के साथ। और देखते ही देखते एक दिन कोई बाहर का लड़का कर बहन का हाथ पकड़ ले जाता है। हम अचानक एक नए रिश्ते में बंध जाते हैं।
बहनों की भी दोहरी भूमिका हो जाती है। एक ओर मां-बाप, भाई बहन तो दूसरी ओर ठीक इसके उलट इन लॉ, माता-पिता की नई पहचान लिए नए चेहरे बहन को अपनी ओर खींचने लगते हैं। बहन दो घरों की डोर के बीच एक पुल बन जाया करती है। न इसे छोड़ सकती है। न उसे नाराज़ कर सकती है। दोनों ही कोनों पर बंधी बहन डोलने लगती है। भाई को मनाए कि पति को? फादर इन लॉ की मान रखे या पिताजी की इज्जत को बचाए। कितना मुश्किल होता है बहनों के लिए दो अलग अलग धाराओं के बीच खुद को डूबने और बहने से बचा पाना।
जब भाई बहन की शादी के बाद मिलता है तब बहन के सवाल और खेल बदल चुके होते हैं। वो अब पति को बुरा न लग जाए इसलिए भाई से गुजारिश करती है उनके भी बात कर लिया करो। बाहर बाबूजी बैठे हैं कुछ देर उनसे भी बातचीत कर लो। बेशक तुम्हारी इच्छा नहीं है लेकिन क्या करूं इन्हीं के साथ रहना है।
पति के जन्म दिन पर फोन कर के कहती है भाई आज उनका बार्थडे समय निकाल कर फोन कर देना। वरना सुनाते रहेंगे मुझे कोई पूछता नहीं। तुम्हारे घर वाले सिर्फ तुमने वास्ता रखते हैं आदि आदि। बहन के इस मनुहार पर गुस्सा नहीं आता बल्कि उसकी स्थिति पर सोचने और विचारने का मन करता है। क्या ये वही नीरू है जो इतनी अल्हड़ हुआ करती थी। जिसे अपना जन्म दिन याद नहीं रहता था मगर आज उनके जन्म दिन पर कितना चिंतित है।
बहन शादी के बाद ननद बन जाती है। ननद यानी उसकी अपेक्षाएं, उसकी उम्मीदों, उसकी इच्छाएं कहीं और से संचालित और निर्धारित होने लगती हैं। न चाहते हुए भी मान खोजती है। न चाहते हुए भी उम्मीद करती है कि भाई का फोन आए तो मैं जाउं। भौजाई फोन कर बुलाएं तो भाई के बच्चे को देखा आउं। बस यहीं एक फांस अटकी हुई है। भाई तो सोचता है बहन तो मेरी बहन है उस जब पहले बुलावे की चिंता नहीं थी तो अब क्यों मुंह फुलाकर बैठी है कि भाई ने फोन नहीं किया। शुरू में बहन को फर्क नहीं पड़ता था। लेकिन जब से ननद बनी है तब से इन लॉ आदि ने यह उसके दिमाग में ठूंसा है कि ऐसे कैसे जाओगी? क्या तुम्हारी कोई इज्जत नहीं? क्या तुम ऐसे ही उठ उठाकर चली जाओगी भाई भौजाई के घर? बुलावा और न्योता तो आने दो।
न्योता और बुलहटे के इंतजार में कई बार बहन पिछड़ती चली जाती है। इतनी पीछे छूट जाया करती हैं बहने की फिर वो भाइयो के दायरे से ही कई बार दूर निकल जाती हैं। यह प्रक्रिया इतनी तेजी से चलती है कि न वे समझ पाती हैं और न भाई ही।
बहने जब ननद बन जाती हैं तब इनकी भूमिका बदल जाया करती हैं। उनकी प्राथमिकताएं भी बदल जाती हैं। बहन से ननद में तब्दील हुई बहन को भी कई जगहों पर एडजस्ट करना होता है। साथ ही नई भूमिका की अपनी चुनौतियां होती हैं जिसके बीच सामंजस्य बैठना पड़ता है। बहन का ननद हो जाना कई दफ़ा उसके व्यवहार में भी झलकने लगती है और बोलचाल में भी। धीरे धीरे फोन का कम होना और हप्ते से माह और माह से और लंबी चुप्पी पसरने लगती है। काश की बहने ननद की भूमिका में रहते हुए बहन की भूमिका को भी निभा पाएं तो कितना बेहतर हो।
इसके साथ ही ऐसा नहीं है कि भाई भाई ही रहता है इसके व्यवहार में भी परिवर्तनी देखे जा सकते हैं। भाई जैसे पहले बहनों से बेबाकी से बात किया करता था उस बेबाकीपन में कहीं न कहीं तब्दीली दर्ज होने लगती है। फिर तो दोनों ही पक्षों से तर्क कुतर्क और आरोप प्रत्यारोप के खेल शुरू हो जाते हैं। इसे दूसरे शब्दों में ऐसे समझें कि भाई-बहनों के बीच अभिधा, व्यंजना और लक्षण में बातें होने लगती हैं। सीधी बात कम घूमाकर बातें की जाती हैं। यदि आपकी भाषायी समझ कम है तो व्यंजना को पकड़ नहीं पाएंगे।

Tuesday, November 13, 2018

बच्चों से संवाद के सरोकार


कौशलेंद्र प्रपन्न

बच्चों से हम कब बात करते हैं? कहां बात करते हैं? कैसे बात करते हैं आदि सवाल आज की तारीख़ में खत्म होती कड़ी नज़र आती है। संवाद के नाम पर हम शायद उन्हें आदेश दे रहे होते हैं, सूचनाएं परोस रहे होते हैं या फिर उनसे रोजनामचा ले रहे होते हैं। बताओं कि आज स्कूल में क्या हुआ? यह भी बताओं कि ट्यूशन में क्या पढ़ा आदि। क्या इसे संवाद की श्रेणी में रखें? क्या हम इसे मुकम्म्ल संवाद मानें? जहां तक जे.कृष्णमूर्ति का मानना है कि हम संवाद प्रकृति के तमाम चीजों से किया करते हैं। हम पेड़ पौधों, पहाड़, जीव-जंतुओं से भी चाहें तो कर सकते हैं। और ये तमाम तत्व हमारे संवाद में हिस्सा भी लेते हैं। लेकिन हम बच्चों से संवाद स्थापित नहीं करते। जैसा कि ऊपर कहा गया हम बच्चों से संवाद करने की बजाए सूचनाओं का आदान प्रदान ज़्यादा किया करते हैं। ऊपर से बच्चों पर आरोप लगाते थकते नहीं हैं कि बच्चे सुनते नहीं हैं। बच्चे हमारी बातों में दिलचस्पी नहीं लेते। सोचना हमें है कि यदि हम सुनना चाहते हैं तो हमें कहना भी आना चाहिए। कैसे कहें और कितना कहें, कब कहें इसकी समझ हमें विकासित करनी होगी। पहली बात तो यही कि हम स्वयं सुनना नहीं चाहते। यानी भाषा के एक कौशल सुनने मे ंहम कितने कमजोर हैं और दोषी बच्चों को ठहराते हैं कि बच्चे सुनते नहीं हैं। हम कब उन्हें कहते हैं उसका समय, स्थान, और परिवेश का भी ख़्याल नहीं रखते। जब मेहमान आए हुए होते हैं तब हम कहते हैं अजी ये तो सुनता नहीं है। स्कूल से आने के बाद सामान कपड़े इधर उधर फेंक देता है। पढ़ने में तो ज़रा भी इसका मन नहीं लगता। एक हमारा समय था इस उम्र में हम कितने गंभीर थे। मजाल है हम अपने मां-बाप को जवाब दे दें। ऐसे सोचने वाली बात यह है कि क्या आपका बच्चा उस वक़्त सुन रहा है या सुनने का स्वांग कर रहा है। दरअसल वक़्त हम बच्चे से संवाद स्थापित करने की बजाए अपनी आपबीती और बच्चे की दुनिया की उपेक्षा और अस्वीकार्यता औरों के समक्ष रख रहे होते हैं। हमें अनुमान नहीं होता कि इस पूरी प्रक्रिया में बच्चा कहीं न कहीं स्वयं को उपेक्षित और हेय मानने और समझने लगता है। दूसरे शब्दों में कहें तो बच्चे अंदर ही अंदर कुंठित होने लगता है। जब पापा या मम्मी को मेरी बुराई ही करनी है तो करें। मैं तो ऐसी ही हूं। हम अंजाने में बच्चे की अस्मिता और सम्मान को ठेस पहुंचा रहे होते हैं। हमें इसका ख़मियाज़ा आगे चल कर भुगतना पड़ता है। जब बच्चा उच्च या माध्यमिक स्कूल में आ जाता है। अब वह खुल कर अपना तर्क रखने लगता है। आपसे भी तर्क और प्रतितर्क करने लगता है। तब हमें महसूस होता है कि यह हमसे जबाव लड़ा रहा है। जबकि वह जबान नहीं लड़ा रहा है बल्कि वह समझने की कोशिश करता है कि जो चीज पापा-मम्मी को पसंद नहीं है वह हमारे लिए कैसे हितकर हो सकते हैं।
आज की तारीख़ी हक़ीकत यह है कि बच्चों के आत्मस्वाभिमान को हम तवज्जो नहीं देते। बल्कि अपनी प्रतिष्ठा और आत्मपहचान को ज़्यादा अहम मान बैठते हैं। यदि बच्चा फेल हो जाए या आपके कहने पर कोई कविता, कहानी दूसरों को न सुना पाए तो यह आपके लिए प्रतिष्ठा की बात हो सकती है। क्या हमने उस वक़्त बच्चे की पसंदगी पूछी? क्या बच्चे का बाह्य संसार अभी कविता व कहानी सुनाने के लिए मकूल है? हमें इन बातों को भी ध्यान में रखने होंगे। लेकिन हम जिस प्रकार की प्रतिस्पर्धा की दुनिया में सांसें ले रहे हैं ऐसे में ही माहौल में हमारा बच्चा भी जी रहा है। अक्सर हमारी तुलना के खेल बचपन से ही शुरू हो जाते हैं जिसका दबाव मां-बाप पर और आगे चल कर बच्चों में संक्रमित होते नज़र आते हैंं। मसलन हर बच्चे की अपनी प्रकृति होती है वह उसी तरह विकसित होता है। कुछ बच्चे जल्दी बोलने और चलने लगते हैं। हम अपने भाग्य और बच्चों के बरताव पर चिल्लाने लगते हैं कि हमारा बच्चा तो बोलता ही है। फलां का देखो इससे छोटा है मगर साफ बोलता है। चलने भी लगा है। हमें धैर्य से काम लेने की आवश्यकता है।
जैसा कि ऊपर प्रमुखता से इस बात की तस्दीक की गई कि बच्चों से संवाद स्थापित की जाए न कि सूचनाओं का आदान प्रदान। यदि ठहर पर मंथन करें तो पाएंगे कि बच्चों से संवाद करने की संभावनाएं दिन प्रति दिन कमतर होती जा रहा हैं। बच्चों से संवाद की कड़ी जब अभिभावकों के हाथ से निकल कर बाजार के हाथ में आ जाती है तब स्थिति बिगड़ने लगती है। बाजार अपनी शर्तां पर, अपने तरीके से बच्चों से संवाद कम अपना कन्ज्यूमर बनाने लगता है। वह अपने प्रोडक्ट्स के उपभोक्ता तैयार करने लगता है। यही कारण है कि हमारे घरों में बच्चे हमारी कम बाजार और विज्ञापन की भाषा ज़्यादा जल्दी समझने और बोलने लगते हैं। बाजार की यही तो ताकत है कि बाल मनोविज्ञान का इस्तमाल इन्हीं उपभोक्ताओं को फांसने में करता है। हम धीरे धीरे बच्चों की भाषायी और संवादी परिधि से बाहर होने लगते हैं। जब हमारे हाथ से बाल-संवाद की डोर छूटने लगती है तब हमारी िंचंता बढ़ने लगती है। हम आनन-फानन में टीवी के रिमोट छुपाने लगते हैं।

Monday, November 12, 2018

उम्र के उस पड़ाव पर...



कौशलेंद्र प्रपन्न
उम्र हम पर कब भारी पड़ने लगे यह हम कुछ भी तय रूप में नहीं कह सकते। प्रसिद्ध कथाकार,पत्रकार प्रियदर्शन जी की एक कविता से उधार लेकर शब्दों में बांधना चाहूं तो यह होगा कि उम्र हमारी कनपट्टियों से उतरा करती है। यानी सफेदी के साथ एहसास पुख़्ता होने लगता है कि हम अब उम्रदराज़ होने लगे। पता नहीं चलता कि कब हमारी कनट्टियों के काले कलम सफेद होने लगे। जिसे हम रंग रोगन से छुपाने की पूरी कोशिश करते हैं लेकिन सफेदी है कि छुपाए नहीं छुपती।
उम्र के साथ कुछ ज़रूरी पहचान हमारे व्यक्तित्व में आने लगते हैं। मसलन जल्दी चीजें भूलने लगना। ब्लड प्रेशर का बढ़ना, मधुमेह के गिरफ्त में आने लगना आदि। बच्चे बड़े होने लगते हैं। उनकी कॉलेज की पढाई खत्म होकर नौकरी पेशे की चिंता हमारी िंचंता होने लगती है।
यदि सही कॉलेज मिल गए तो तीसरे साल की चिंता कैम्पस प्लेसमेंट में अच्छी कंपनी उठा ले जाए। जॉब का पैकेज अच्छा हो। अगर सरकारी नौकरी मिल जाए और भी अच्छा। सरकारी नौकरी से खुद रिटायर होकर एक मकान तक नहीं बना पाते लेकिन बच्चों के लिए सरकारी नौकरी की उम्मीद पाले बैठे होते हैं।
देश के किसी भी कोने में घूम आएं हर सरकारी क्वाटर का नैन नक्श तकरीबन एक से ही होते हैं। अपनी अपनी पहचान दूर से ही हो जाया करती हैं। रिटायरमेंट के करीब पहुंचने पर एहसास मजबूत होने लगता है कि यार हमने तो जीवन में कुछ किया नहीं कम से कम मेरा बच्चा तो कर ले। मैंने ये नहीं किया, वो नहीं किया आदि आदि के मलालों से भरे हुए हम फिर बच्चों को अपनी कहानियां सुनाया करते हैं।
लाचारगी और दूसरों पर निर्भरता बढ़ने लगती है। यदि बच्चा दूसरे शहर में नौकरी कर रहा है तब हमारी मुश्किलें और भी बढ़ जाती हैं। हम चाहते हैं कि साल में कई दफा चक्कर काटा करे। पर्व त्येहार पर बाल बच्चों के साथ आया करे। लेकिन यह भूल जाते हैं कि हमारा बच्चा जिस कंपनी में काम कर रहा है वहां छुट्टियों की कितनी दिक्कत होती है। लेकिन हम यह समझ नहीं पाते। तकरार यहां भी होती है दो पीढ़ियों के दरमयान।
कई बार हमारी उम्र हमारी आदतों, रोज दिन के कामों और स्वभावों को भी ख़ासा प्रभावित करता है। हम अक्सर छोटी छोटी बात पर नाराज़ हो जाया करते हैं। हमें लगता है कि हमारी तो कोई सुनता ही नहीं। हमने क्या अपने जीवन में यूं ही बाल सफेद किए हैं। मगर होता इससे उलट है। कभी कभी हमें दोनों की ही स्थितियों को समझने की आवश्यकता होती है।

Thursday, November 8, 2018

वो जो एक शहर था



कौशलेंद्र प्रपन्न
शहर क्या पूरा का पूरा इतिहास समेटे सदियों से खड़ा था शहर। शहर के बीचों बीच एक लंबी,चौड़ी झील कहें, तालाब कहें जो भी नाम दें पुराना झील हुआ करता था। जब भी शहर में कोई कार्यक्रम होता। कोई मेला लगता या फिर जलसा होता तो इसी झील के किनारे लोग इकत्र हुआ करते थे। मेला,ठेला, अपरंपार भीड़ का स्वागत यह शहर किया करता था। इतिहास को अपनी प्रगति और अस्तित्व के साथ ओढ़े हुए जिं़दा था। इसी शहर में एक बड़ी फैक्ट्री भी हुआ करती थी जिससे इस शहर की पहचान थी।
शहर के बीचों बीच एक नदी भी हुआ करती थी, बल्कि नदी नहीं यह नद हुआ करता था। देशभर में तीन ही नद हैं जिसमें से एक नद था। बल्कि है। लेकिन समय के साथ वह नद भी महज बरसाती नदी सी हो गई है। सिर्फ साल में कुछ ही माह इसमें भर भर कर पानी हुआ करते हैं।
इस शहर को भी ऐतिहासिक नाम मिला हुआ था क्योंकि इसी शहर के तट पर बाणभट्ट के कुछ पाठ लिखे गए थे। यह देहरी घाट हुआ करता था यह इस शहर का पुराना नाम है। जो बाद में देहरी हुआ, फिर कालांतर में डेहरी हुआ। और जब अंग्रेज आए तो इसका नाम डेहरी ऑन सोन पुकारना शुरू किया। क्योंकि यह शहर पर सोन के किनारे बसा था इसलिए इसे डेहरी ऑन सोन नाम दे दिया। संभव है जिस प्रकार से शहरों के नाम बदले जा रहे हैं इस शहर को भी नामबदलुओं की नज़र न लग जाए। और इस शहर का नाम देहरी ऑन सूत्रपुत्र कर दिया जाए।
शहरों के नाम बदलने की संस्कृति में उन तमाम शहरों को डर है बल्कि शहर भी डरे हुए हैं कि कभी भी उन्हें नया नाम दिया जा सकता है। एक सवाल पूछने का मन कर रहा है कि वॉट इज देयर इन द नेम? वॉट इज देयर इन पर फॉम? आदि। नाम से ज़्यादा मायने काम रखा करता है। लेकिन कहते हैं फैशन के दौर में नाम ही बिका करता है। दूसरे शब्दों में कहें तो नाम पर ख़राब से ख़राब चीजें भी अच्छे दामों पर बिक जाया करती हैं।
दूसरा मेरे शहर में पुराने कुछ एक ही मूर्तिया हुआ करती थीं। जैसे डेहरी पड़ाव। इस मैदान से लगा था गांधी मैदान। संभव है आने वाले दिनों में गांधी के बगल में ही कुछ और लोगों की मूर्तियां रातों रात लगा दी जाएं और नए नाम से पुकारने के फरमान जारी कर दी जाएं।
शहर को बसने और विकसने में वक़्त लगा करता है। धीरे धीरे शहर की पहचान वहां की सांस्कृतिक और सामाजिक बुनावट से हुआ करती है। जिस शहर में कभी बारह पत्थल, बीएमपी, झांबरमल गली हुआ करती थी। वहीं राजपुतान मुहल्ला भी होता था। याद नहीं है लेकिन उसी शहर में एक हिस्सा मुसलमानों का भी हुआ करता था। जिसे कोई ख़ास नाम मयस्सर नहीं था। बस उसे मुसलमानों के मुहल्ले से जाना जाता था। धीरे धीरे उस मुहल्ले को भी नज़र लगने लगी। माना जाता है कि शहर के बसने की प्रक्रिया में कई सारी चीजें, मान्यताएं साथ साथ रचने बसने लगती हैं। मंदिर, गुरूद्वारा, मस्जिद आदि। वहीं छोटी-छोटी दुकानों का भी जन्म होता है। देखते ही देखते वहीं पुरानी दुकानें शहर की पहचान बन जाया करती हैं।
जब एक शहर अपना रंग रूप बदला करता है तो उसके साथ बहुत सी चीजें अपने आप बदलाव की प्रक्रिया से गुजरने लगती हैं। कहते हैं जब टिहरी को डूबोने की प्लानिंग हो रही थी तब वहां के निवासियों ने काफी विरोध किया था। वहां के पत्रकार, लेखक, कवि, कथाकारों ने अपनी अपनी रचनाओं और कलमों से इस विकास को रोकने का प्रयास किया मगर सत्ता और सरकार सबपर भारी पड़ी। दिवाली का ही दिन था जिस दिन टिहरी जलमग्न हो गई थी। वह एक शहर का डूबना भर नहीं था बल्कि उस शहर के साथ एक इतिहास भी जल में समा गया था। वहां ही संस्कृति और मान्यताएं, कथा कहानियों भी एक साथ जलमय हो गईं। जब कभी भी शहर का नाम बदला जाए या शहरों को मूर्तियों का शहर बनाया जाए तब वहां के निवासियों की भी राय ली जाए।

Thursday, November 1, 2018

हिन्दी से अंग्रेजी की यात्रा


हिन्दी से अंग्रेजी की यात्रा
कौशलेंद्र प्रपन्न
पूरी जिं़दगी याने जितनी पढ़ाई लिखाई की वो सब हिन्दी में ही की। हिन्दी में पढ़ना-लिखना, सोचना, बोलना भाषा के चारों कौशलों का काम हिन्दी में रही। सो हिन्दी भाषा के तौर पर दक्षता हासिल की ली। अंग्रेजी को कभी उतना तवज्जो नहीं दी। जबकि देनी चाहिए थी। मेरे पिता अंग्रेजी के ही अध्यापक रहे। हमें स्कूल और घर पर अंग्रेजी और हिन्दी दोनों ही भाषाएं पढ़ाईं। लेकिन बचपना ही कहेंगे कि अंग्रेजी के प्रति अनुराग नहीं जग पाया। न लिखने को लेकर और न पढ़ने और बोलने के स्तर पर। ऐसा भी नहीं था कि अंग्रेजी से कोई गुरेज था बल्कि एक लापरवाही थी कि अंग्रेजी पर ध्यान नहीं दिया।
अब जब बतौर भाषाकर्मी के नाते सोचता और अमल करने की वकालत करता हूं तो महसूस होता है कि हमें किसी भी भाषा के बैर नहीं है। न ही होना चाहिए बल्कि भाषा के लिहाज से एक बेहतर इंसान बनने के लिए बहुभाषी होना ही चाहिए। यह एहसास तब हुआ जब प्रोफेशनली भूमिका बदली। जब तक भाषा विशेषज्ञ था तब अलग ही चश्में से देखा करता था। लेकिन जब से मैंनेजर व लीडर की भूमिका में आया तब महसूस हुआ कि यदि बहुजन तक पहुंचना है तो बहुभाषी होना नितांत ज़रूरी है।
मेरे जीवन में भाषायी और चिंतन तौर पर 360 डिग्री पर परिवर्तन घटित हुआ जब मार्च में मैं आईआरमा में प्रोजेक्ट मैनेजमेंट और लीडरशीप की को कोर्स के लिए गया। वो चार दिन अंग्रेजी में सुनना, बोलने की कोशिश करना आदि बेहतर रहा। वहीं से शायद अंग्रेजी के प्रति राग पैदा हुआ। मैंने अपने आप से वायदा किया कि अब मैं अंग्रेजी से भी मुहब्बत किया करूंगा। यह भाषा भी हमारी है और हमें सीखनी ही चाहिए।
तब का दिन और आज का दिन अंग्रेजी बोलने, सुनने और पढ़ने के अभ्यास को बढ़ा दिया। ज़्यादा से ज़्यादा अंग्रेजी में कंटेंट पढ़ना और बोलने की कोशिश शुरू हो गई। इसका परिणाम यह हुआ कि 23 मार्च को एक संस्थान में देश के विभिन्न राज्यों से टीचर और टीचर प्रशिक्षक उपस्थिति थे। पहले से मालूम नहीं था कि वहां हिन्दी भाषी कम होंगे। ज़्यादा तर दक्षिण भारतीय थे। मैंने जब देखा तो लगा मुझे मेरी हिन्दी यहां काम नहीं आएगी बल्कि अंग्रेजी की मदद चाहिए। और मैंने कंटेंट वही रखा और शुरू हो गया अंग्रेजी में। शाम साढ़े पांच बजे तक चले से सत्र के बाद मैंने लोगों से पूछा क्या उन तक पहुंच सका? क्या मेरी बात उनक तक संप्रेषित हो पाई? तो लोगों ने साफतौर पर कहा कि हां उन्हें मेरी बात ही समझ में नहीं बल्कि जो मैंने उन्हें दिया वो भी ख़ासा मायने वाला था।
अहमदाबाद के बाद यह पहला मौका था जब मैंने बिना किसी हिचकिचाहट के सुबह नौ बजे से शाम पांच बजे तक तकरीबन पांच घंटे अंग्रेजी में व्याख्यान दिए। हिन्दी बीच बीच में छौंक के तौर पर आई। उन दिन मेरा हौसला और बढ़ गया।
अंत में यह कहना चाहता हूं कि जिस भाषा से भागता रहा आख़िर में उसी भाषा को अपनाकर आज खुश भी हूं और अभिभूत भी कि आज मेरे पास दो सशक्त भाषाएं हैं जिनके कंधे पर सवार होकर दुनिया को देख और समझ सकता हूं। मैंने यह जरूर किया कि अंग्रेजी के चैनल, व्याख्यान, इंटरव्यूज आदि देखने पढ़ने शुरू किए ताकि ज़्याद से ज़्यादा अंग्रेजी की तमीज़ और ध्वनियां, नजाकत और मुहावरे कानों में पड़े। जब भी कुछ नया वाक्य या मुहावरे सुनता उसे कहीं न कहीं किसी न किसी के सामने उगल देता। मेरे साथ काम करने वालों को लग गया कि कुछ तो है। कुछ है जो मुझमें घटा है। कुछ है जो मुझमें नया हुआ है। कुछ तो तब्दीली हुई है कि आज कल मेरी भाषा पर अंग्रेजी तारी हो रही है। तैर रही है। साथियों ने पूछा भी कि आख़िर क्या हुआ? क्या हुआ ऐसा कि आज कल मैं अंग्रेजी में बोलने बतियाने लगा हूं। ऐसे क्या हुआ और क्या किया एक माह या दो माह में मेरी भाषा पर नजर आने वाली बारीक ही सही किन्तु अंतर लोगों की नजरों से ओझल नहीं रह सकीं। कुछ ने पूछा भी ऐसा क्या किया व क्या कर रहा हूं कि अंग्रेजी में बोलने, लिखने लगे। सिर्फ और सिर्फ इतना कह सका कि जो बात बड़ी शिद्दत और चिंता से पिताजी कहा करते थे लेकिन कभी नहीं माना बस अब वो कर रहा में। कभी भी देर नहीं है। जब भी अपने प्रति हम सचेत हो जाते हैं तभी से बदलाव घटित होने लगता है।

Wednesday, October 31, 2018

मैं वो शहर बोल रहा हूं...



कौशलेंद्र प्रपन्न
लोकतंत्र के चारों पहरूएं रहा करते हैं। राजपथ और तमाम प्रथम पुरुष के निवास स्थान हुआ करते हैं। हां मैं ही शहर बोल रहा हूं जहां संसद में पास हुआ करती हैं सभी ज़रूरी कानून और लागू भी किए जाते हैं पूरे देश में। हां मैं वहीं से बोल रहा हूं। जहां साफ सफ्फाक लोग बसा करते हैं।
मैं उसी शहर से बोल रहा हूं। मेरे शहर का मौसम इन दिनों ज़रा ख़राब चल रहा है। मेरे शहर के पुल भी इन दिनों परेशान, धुंधले से हो गए हैं। न पुल न सड़क और पेड़ देख जा सकते हैं। सब के सब गोया धुंध के चादर में लिपटे हैं।
सुबह स्कूल जाते बच्चे। दफ्तर की ओर दौड़ते लोग, मजदूर सभी परेशान आंखों को मलते, खखारते नजर आते हैं। बच्चों को तो सांस लेने में भी परेशानी हो रही है। बुढ़े भी तो इसमें शामिल हैं। उन्हें भी सुबह टहलने की आदत बदलनी पड़ी है।
मैं कई बार सोचता हूं शहर कैसे शहर है। हालांकि मैं महानगर से बोल रहा हूं। उस महानगर से जहां सपने पलते हैं। ख़ाब जिंदा रखने की कीमत सेहद से चुकानी पड़ती है। सेहद भी गंवाई और सपने भी अधूरे रह गए तो इससे तो अच्छा था हम किसी छोटे शहर में ही रह लेते।
लेकिन क्या कोई ऐसा शहर बचा है जहां प्रदूषण न हो। क्या कोई ऐसा महानगर भारत में बचा है  जहां की हवा शुद्ध और सांसों में भरने के लिए ठीक हो। मेरे सवालों पर हंस सकते हैं। मुझे बेवकूफ मान सकते हैं। मानने में कोई हर्ज नहीं लेकिन मेरे सवालों और चिंताओं पर गौर कीजिए मैं गलत नहीं हूं। आप कहेंगे वाह! यह भी कोई बात हुई? हमने तुम्हें सपने दिए। सपनों को पूरा करने के लिए संसाधन दिए। और क्या चाहिए तुम्हें।
तुम्हें फास्ट रेल दिए। चार और आठ लेन की सड़कें दीं। रात भर चलने और जलने वाली गाड़ियां दीं। और भी तुम्हें चाहिए? क्या चाहते हो आख़िर?
एक चमचमाती सड़क किसे मयस्सर है आज? हर शहर और नगर, गांव और कस्बा चाहते हैं उनके यहां मॉल्स खुलें, मेट्रो दौड़े और तो और तुम्हें भी ऑन लाइन शॉपिंग का आनंद लेना है जो कुछ तो चुकाने होंगे। तुम्हें तुम्हारे शहर से दर्जी, नाई, जूता साज़, परचून की दुकानें मैं वापस लेता हूं। लेता हूं तुमसे वो तमाम स्थानीय सुविधाएं जिनमें तुम पले बढ़े थे। तुम्हें देता हूं घर बैठे शॉपिंग का मजा। पिज्जा और बरगर, मोमोज और मैक्रोनी का स्वाद। बस तुम्हें छोड़ने होंगे मौलवी साहब की छोटी सी दुकान, मास्टर सैलून से बाहर आना होगा। फिर मत कहना हमारे शहर से मास्टर सैलून की दुकान बंद हो गई और महंगी दुकाने खुल गईं जहां हजामत बनाने के पच्चास और सौ रुपए देने पड़ते हैं।

Monday, October 29, 2018

माथा फोड़ते बच्चे और शिक्षा


कौशलेंद्र प्रपन्न
दिल्ली के एक स्कूल में आठवीं के बच्चे ने शिक्षक के माथे पर लोहे के रड़ से वार किया और शिक्षक अस्पताल में भर्ती हैं। यह पहली मर्तबा नहीं है कि किसी बच्चे ने शिक्षक का माथा फोड़ा। किसी शिक्षिका के हाथ तोड़े या फिर स्कूल में कक्षा से शिक्षिका या शिक्षक के बैग से पैसे चोरी हुए। ऐसी घटनाओं की एक लंबी लाइन है। सवाल यहीं से उठते हैं कि हम कैसी शिक्षा अपने बच्चों को दे रहे हैं। वह कैसी शिक्षा है जो शिक्षक पर ही हमला बोल रहे हैं।
यह शांति के लिए शिक्षा तो नहीं हुई जिसकी वकालत एनसीएफ 2005 कर रही थी। इस दस्तावेज़ में एक पाठ ही है शांति के लिए शिक्षा। हम बच्चों को पिछले पंद्रह सालों में संवेदनशील तक नहीं बना पाए। इतनी भी तमीज़ नहीं दे सके कि वे शिक्षकों की इज्जत न करें तो कम से कम माथा तो न फोड़ें। दूसरे शब्दों में शिक्षक पढ़ाएं भी और माथा हाथ भी फुड़वाएं। यह कैसे शिक्षा है?
हिंसक होते बच्चों से शिक्षा कैसे पेश आती है? हमारी तैयारी इस प्रकार के बच्चों से रू ब रू होने की है? क्या हम ऐसे बच्चों को नजरअंदाज कर दें या फिर जुबिनाइल एक्ट के तहत इनके साथ बरताव करें। कुछ तो रास्ते अपनाने होंगे। वरना इन बच्चों के हौसले कम होने की बजाए बढ़ने ही वाले हैं।
िंहंसा या हिंसक प्रवृत्ति को समझते हुए शिक्षक और शिक्षा को सकारात्मक कदम उठाने का वक़्त आ चुका है। शिक्षक वर्ग की मानें तो उनका कहना है जब से परीक्षा का भय व कहें फेल होने के भय बच्चे मुक्त हो गए हैं तब से उनमें शिक्षकीय डर भी जाते रहे। बच्चे शिक्षकों से डरना तो दूर पढ़ने से भी कतराने लगे हैं। बातों ही बातों में कह देते हैं फेले कर के दिखाओ।
दोनों ही पक्षों के अपने अपने तर्क हैं। शिक्षक वर्ग के तर्क भी कुछ हद तक मजबूत नजर आते हैं। लेकिन सोचना तो यह भी होगा कि शिक्षक क्यों चाहते हैं कि बच्चे उनके डरें। क्यों नहीं चाहते कि बच्चे उनसे मुहब्बत करें। शायद मुहब्बत करें तो हिंसक नहीं हांगे। हालांकि प्रेम में भी हिंसा देखी जाती है। यह अलग मसला है। हमें हिंसक होते बच्चों की मनोदशा को किसी भी सूरत में ठीक करने की आवश्यकता है। वरना वो दिन दूर नहीं जब बच्चे और शिक्षक दोनों ही हथियार ले कर स्कूल जाया करें। जो भारी पड़ा या जिसने भी नियंत्रण खोया वो दाग देगा गोली। विदेशों से ऐसी ख़बरें खूब आती हैं कि बच्चे ने सहपाठी को या फिर शिक्षक को गोली मारी।

Sunday, October 28, 2018

दशकों बाद भी मिलो गोया कल ही मिले थे


कौशलेंद्र प्रपन्न
दशक का फासला कितना लंबा होता है। है न? कभी मिलिए ऐसे व्यक्ति से जिनसे आपकी मुलाकात तकरीबन बीस या तीस साल बाद हुई हो। संभव है आप या कि वो पहचान न पाएं। कई बार आप पुराने डोर को टटोलते हैं पुरानी तस्वीरों से आज के चेहरे, आज की आवाज से मिलान करते हैं। हम कई बार आवाज़ की डोर पकड़कर पहचान को दस्तक देते हैं और सही व्यक्ति को पहचान लेते हैं। कोई कितना भी वयोवृद्ध हो जाए या फिर उम्र की सीढ़ियां चढ़ लें हमारी कुछ आदतें, आवाज़ आदि पहाचन के सूत्र में पीरो देते हैं। और पुरानी यादों की परतें खुलने लगती हैं।
ऐसा ही पिछले दिनों हुआ। एक अपने ही घर के पास रहने वाली दीदी से मुलाकात हो गई। यही कोई तीन दशक बाद। बुनियादी बुनावट चेहरे की वही थी। बस तीस साल का सफ़र चेहरे पर दिखाई दे रहा था। आवाज और आदतें कुछ कुछ वैसी ही थीं। जैसी तब हुआ करती थीं। वैसे ही रफ्तार में बोलना, तेज बोलना और हमेशा हड़बड़ी में रहना। कभी किसी चाची को छेड़ना तो कभी कभी किसी को। वह आदत अभी तीस की मार से कमजोर नहीं पड़ी थी। बस कुछ बदला था तो तीन बच्चे उनके हिस्से आए और पति समय पूर्व चले गए। हालांकि यह कोई छोटी बात और घटना नहीं थी।
इसी तरह से ऐसी ही साथ पढ़ने वाली दोस्त से फोन पर बात हुई। तब हम एम ए में साथ हुआ करते थे। यह भी दो दशक पुरानी बात हो गई। कहीं किसी कॉमन दोस्त से उसका नंबर मिला और मिला दिया फोन। न आवाज़ पहचाना और न नाम ही याद कर पाई। हो भी कैसे कोई आवाज़ का हमारे पास डेटाबैंक तो है नहीं कि हम तुरंत वर्तमान की आवाज़ और चेहरे को मैच कर लें। सो वही हुआ। मैं फोन पर बताता रहा मैं वो हूं। वो हूं। आदि आदि। उधर आवाज़ वैसी स्थर और अपरिचित। फिर मैंने कहा कोई बात नहीं। बीस पच्चीस सालों में आवाज़ और चेहरे पर उम्र की मार साफ दिखाई देने लगती है। किन्तु फिर भी चाहें तो पुराने डोर को मांझा देकर मुलाकात को तरोताज़ा कर सकते हैं।
अब कई बार महसूस हुआ करता है कि आज जिससे हमारे रंज़िश है। किसी से कटते हैं। कोई कुछ ज़्यादा ही पसंद आती हैं। क्या आवाज़ और क्या हंसी है आदि आदि। देखना यह है कि ब बीस या पच्चीस साल बाद मुलाकात होगी यदि हुई तो क्या हम पहचान पाएंगे? क्या हम पहचान कर मुंह फेर लेंगे? तब तक तो रंज़िशें भी पिघल जाएंगी। चेहरे और लुनाई भी जाती रहेगी।
मेरे पिताजी की एक पंक्ति साझा कर रहा हूं बेहद मौजू है-
अभी तो मुझे खींचते हैं नज़ारे
बड़े प्यार से चांद देता बुलावा,
ये अल्साती कलियां कदम धाम लेंती,
बिछुड़ जाएंगी जब ये तब सोच लूंगा।


Friday, October 26, 2018

यात्रा में बातचीत



कौशलेंद्र प्रपन्न
गाहे ब गाहे हम रोज दिन न जाने कितने ही लोगों से मिला करते हैं। उनमें से कुछ लोग याद रह जाते हैं और कुछ भूल या भुला दिए जाते हैं। याद रह जाने वाले लोग शायद अपनी बातचीत की शैली, कंटेंट या फिर कहन के तरीके की वजह हमारी स्मृतियों के अभिन्न हिस्सा हो जाते हैं। भूला वे दिए जाते हैं जिनकी बातों में हमें दिलचस्पी नहीं थी। या फिर हम सुनना या मिलना ही नहीं चाहते थे। क्या करें मिल गए तो सुन लिए, सामने पड़ ही गए तो हाथ मिला ली। इस तरह की घटनाओं से हमारी ज़िंदगी भरी हुई है। कई बार तो सामने बैठा व्यक्ति हमें इतना ऊबाता है कि उससे छुटकारा कैसे मिले बस इस उपक्रम में हां में हां या हुंकारी भरा करते हैं। किसी तरह अपनी बात खत्म करे और पीछा छुटे। लेकिन आपको भी याद होगा कि ऐसे कई सारे लोग हमारे आस-पास हुआ करते हैं जिन्हें सुनने के लिए हम लालायित भी रहते हैं। वहीं ऐसे लोगों की भी कमी नहीं जिन्हें देखना, सुनना कत्तई पसंद नहीं करते। ऐसे ही एक ऑटो चालक से पिछले दिनों मुलाकात हुई। बात नोटबंदी और अगले साल होने वाले चुनावों से हुई। लेकिन कब हमारी बातचीत इतिहास में गोते लगाने लगी यह मालूम ही नहीं चला। हालांकि यात्रा की लंबाई कम थी। हमें जल्द ही उतरना भी था लेकिन बातों में इतनी रोचकता और जीवंतता थी कि यात्रा खत्म होने के बाद भी हम रेड लाइट पर खड़े होकर बात को अंजाम तक पहुंचाने की बेचैनी भरे हुए थे। इस यात्रा में मेरे साथ डॉ रमेश तिवारी और अभिषेक कुमार भी थे। उन सज्जन ने जैसे ही अपनी बात चुनाव और महंगाई से आगे ले जाकर भारतीय इतिहास का पल्ला पकड़ा अब बातों में और भी रोचकता घुलने लगी। वो सज्जन मोहम्मद इज़रिश थे। जिनसे छोटी किन्तु सारगर्भित बातचीत ने हमें लुभा लिया।
उन्होंने इतिहास की इतनी बारीक तथ्यों को इतनी सहजता और रोचकता के साथ साझा की कि लगा ही नहीं कि ये ऑटो चालक होंगे। महसूसा हुआ कि हम किसी इतिहासवेत्ता से बात कर रहे हैं। उन्होंने मुगल काल से लेकर खिलजी सल्तनत और औरंगजेब से लेकर हुमायूं तक यात्रा कराई। उन्होंने अपनी समझ और विश्लेषण की तथ्याता इस रूप में भी स्थापित करते चल रहे थे कि बीच बीच में तारीख़ी हक़ीकत और और तथ्यों को पीरों रहे थे। 1580 से लेकर अब तकी भारतीय ऐतिहासिक यात्रा महज पंद्रह मिनट में करा दी। उन्होंने बातों ही बातों में बताया कि किस प्रकार अविभाजित भारत की सीमा कभी काबूल, अफगानिस्तान, इस्ताम्बूल आदि से मिले हुए थे। कब कब मुगलों, अफ्गानों और अन्य आक्रमणकारियों से भारत की संप्रभूता और अखंड़ता को चोट पहुंचाई। तब की तात्कालिक राजनीतिक परिघटनाओं को भी अपनी बातचीत का हिस्सा बना रहे थे। हमने बीच बीच में यह जानने की कोशिश की कि उनकी तालीम कहां तक की है। उन्हें इन तमाम ऐतिहासिक तथ्यों और कहानियों की जानकारी कैसे मिली आदि। मगर उन्होंने हमारे इन सवालों को अनदेखा कर दिया। गोया उन्होंने हमारी बातों को तवज्जो ही नहीं दी।
दरअसल हमारी यात्राएं अब बंद गाड़ियों में मकदूद हो गई हैं। जब हम सर्वाजनिक परिवहनों को इस्तमाल किया करते थे तब कुछ ज़्यादा ही लोगों से हमारी मुलाकातें हुआ करती थीं। जैसे जैसे हमारी निजी वाहनों की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई वैसे वैसे हमारी सार्वजनिक वहनों से नाता टूटता सा चला गया। हम आम बसों, साझा वाहनों में चलना, यात्रा करना लगभग बंद कर चुके हैं। जिनके पास निजी वाहन वहन करने की क्षमता है उनलोगों की जिं़दगी से सार्वजनिक परिवहन अपनी पहचान खो चुके हैं। यही कारण है कि सार्वजनिक परिवहनों में यात्रा करने वालों की संख्या पर असर पड़ा है। वहीं दूसरी ओर सड़कों पर निजी वाहनों में बाढ़ सी आ गई है। इन लंबी और बड़ी गाड़ियों में यात्रा करने वाले साफ-सफ्फाक कपड़े पहने, महंगी घड़ी और गाड़ी वाले तो आम सार्वजनिक वाहनों में सफ़र करने वालों को क्या ही प्राणी समझा करते हैं। हालांकि यह एक पूर्वग्रह भी हो। लेकिन बंद गाड़ी में घर से दफ्तर और दफ्तर से घर या फिर घर से मॉल और मॉल से घर के दरमियान आपकी कितने लोगों से मुलाकात संभव है? आप कितनों के संपर्क में आते हैं आदि जानना भी बेहद मौजू है। जब हम सार्वजनिक परिवहनों में यात्रा करते हैं, आप जगहों पर घूमा करते हैं तब हमें कई किस्म के लोग टकराते हैं। उन्हीं में से किसी से प्यार, गुस्सा, लगाव के रिश्ते भी पलने लगते हैं। स्कूल या कॉलेज में क्योंकर प्यार हो जाया करता है क्यांकि बच्चे खाना-पीना, घूमना फिरना सब साथ किया करते हैं। लेकिन जैसे हम निजी खोल में खुद को समेटने लगते हैं वैसे ही हमारे रिश्तों की सीमा में तय होने लगती है।
कभी ट्रेन मे ंतो कभी प्लेन में यात्रा करते करते रिश्ते बन जाया करते हैं। ज़रूरत महज इस बात की है कि क्या हम शिद्दत से और सलीके से बातचीत का पहल कर रहे हैं। या फिर अपने अपने खोल और बात न करने की ज़िंद में पास ही बैठे बेगाने से हुआ करते हैं। अब तो इयरफोन की लीड कान में डूंसे अपनी ही गीतों की दुनिया में मग्न रहा करते हैं। लेकिन इन तमाम परिस्थितियों को धत्ता बताते हुए कुछ लोग अभी बचे हैं जिन्हें बातें करना खूब भाता है। ये अलग बात है कि कई बार बातूनी लोगों से हमें परेशानी भी होती है। हम रिजर्ब रहने के अभ्यस्त हो चुके हैं। हमें बातें करना उतना नहीं भाता और न ही यह चाहते हैं कि कोई हमारी निजी जिंदगी में दखल दे।
ट्रेन, बस, प्लेन के पायलट आदि से कभी बात करने की कोशिश की कि आप कैसे हैं? कैसा महसूस होता है जब आप किसी ट्रेन को साठ और बहत्तर घंटे चलाया करते हैं। आपकी कैबीन में कोई तीसरा नहीं होता क्या आपको किसी से बात करने, मिलनी की कमी नहीं अखरती? महसूस तो होता होगा? घर की याद तो आती होगी आदि आदि। शायद हम ड्राइवर, पायलट आदि से बात करना उचित नहीं समझते। नहीं मानते कि उन्हें भी कभी शुक्रिया कहा जाए। कहा जाए कि कितनी चुस्ती और तत्परता से आपने हमें हमारी मंजिल तक की यात्रा सुरक्षित और आनंदपूर्ण तरीके से पूरी की। मुझे याद हम जब पिछली यात्रा में लेह-लद्दाख जा रहा था प्लेन का पायलट जिस खूबी और साहित्यिक शैली में यात्रा में पड़ने वाले जगहों, पहाड़ों, नदियों के बारे में उद्घोषण कर रहे थे उनकी भाषा और वर्णन को सुनकर मन में एक हूंक सी उठी कि क्यों न उनके मिलकर उनकी भाषा और अंदाज ए बयां की तारीफ़ की जाए। जैसे ही लेह उतरा सबसे पहले भागकर पायलट के पास गया और उनकी भाषा और शैली की तारीफ की। उनका मन गदगद हो गया। 

Thursday, October 25, 2018

चिमनी से निकलता धुआं और डेहरी का चेहरा



कौशलेंद्र प्रपन्न
अब जब याद करता हूं तो मेरे जेहन में ऊंची चिमनी से निकलता लगातार धुआं मुझे एकबारगी डेहरी के उस चेहरे से दुबारा रू ब रू कराता है, बल्कि कहना चाहिए उस सुखद पलों में ले जाता है जब अपने छत से तीन चिमनियों को एक साथ गलबहियां करते सीधे खड़े देखा करता था। देखा करता था कैसे ये तीनों चिमनियां अपने बलंद इरादों और इतिहास पर गर्व करते हुए खड़े थे। इन्हीं चिमनियों से शायद डेहरी की भी पहचान हुआ करती थी। जब आप दिल्ली या बनारस से डेहरी की ओर ट्रेन से आया करते थे तब पहले पहल नहर पार करते ही ये चिमनियां ही तन कर हमारा स्वागत किया करती थीं। साथ रोशनी से जगमाती सुबह और रातें बताती थीं कि शहर जगा है, हम बेशक सो रहे हैं। पूरी रात शहर सोया करता था। मगर डालमियानगर जगा रहता था। सिफ्ट में काम करने वाले अफ्सर, मजदूर लगातार मेन गेट से आवाजाही किया करते थे। और इस तरह से डालमियानगर सोते हुए भी जगा रहता था। उत्पादन में तल्लीन डालमियानगर तब कागज़, डालडा, सिमेंट आदि उगला करता था। वैशाली नाम से बच्चों के लिए स्कूली अभ्यास पुस्तिका भी छपा करती थी। जिसमें दाई ओर अशोक स्तम्भ छपा होता था। उन अभ्यास पुस्तकों का इस्तमाल हमने भी किया। हालांकि तब एहसास न था कि इतना व्यापक और मजबूत साम्राज्य काल के गाल में समा जाएगा। सच पूछिए तो शायद डालमियानगर से ही डेहरी की भी पहचान जुड़ी थी। जैसे गर्भनाल से बच्चा जुड़ा होता है। उसी डालमियानगर में स्कूली, कॉलेज, बेहतरीन पार्क, सड़के ऐसी कि देखकर मन प्रसन्न हो जाए। क्वाटर को देखकर महसूसा करता था कि इन घरों में राजा या रानी रहा करती होंगी।
वक़्त की मार से न आप बच पाएं हैं और न कि हम। हम सभी को अपनी गलतियों को ख़ामियाज़ा आज कल भुगतने ही पड़े हैं। सो मैनेजमेंट से लेकर प्रशासन और सरकार की बेरूख़ी कहें या लचर प्रबंधन की मार की धीरे धीरे डालमियानगर की चमक और रौनक धीमी पड़ती चली गई। एक के बाद एक प्लान्ट बंद होते चले गए। करोड़ों की जायदाद, मानव श्रम को न जाने किस डायन की नज़र लगी कि डालमियानगर एक बार अस्पताल की बिस्तर पर गया तो ठीक होने की बजाए उसकी हालत और दिन प्रति दिन ख़राब होती चली गई जैसे मरीज कुछ कुछ ठीक होता सा महसूस होता है तो उसे डाक्टर और तीमारदार घर लेकर चले जाते हैं। लेकिन फिर फिर मरीज की हालत ख़राब होती है और अंत में उसके सेहद मे गिरावट दर्ज़ की जाने लगती है ठीक उसी तर्ज़ पर डालमियानगर की हालत भी धीमी ही सही किन्तु मृत्यु की ओर बढ़ने से लाख कोशिशों के बावजूद बचाना पाना मुश्किल होता चला गया। तब जब की बात कर रहा हूं मैं शायद चौथी या पांचवीं कक्षा में रहा हूंगा वर्ष 1985-86 रहा होगा जब डालमियानगर में हड़ताल और कुछ प्लांटों के बंद होने की ख़बरें बालमन में सुनाई देने लगी।
डेहरी ऑन सोन से रिश्ता यूं तो बचपन से रहा बतौर वहीं की पैदाईश के साथ ही साथ सोणभद्र से असीम जुड़ाव महसूस करता हूं। इसकी दो वजहें हैं पहली की पिताजी के कंधे पर सवार होकर और कई बार हाथ पकड़कर सोन में सालों भर जाया और नहाया करता था। दूसरी वज़ह मेरी प्यारी दादी का देहांत और दाहसंस्कार उसी सोन के किनारे हुआ। जब तक याद आता तो सोन पर बने गेमन पुल से चिल्लाया करता ससुरी दादी सुनती नहीं है। सो गई। आदि आदि। आज जब भी सोन और डेहरी की चर्चा चलती है तो मेरे ख़्याल ये सबसे ज़्याद ताज़ा और टटकी यादें रेलवे स्टेशन और सोन की है। जय हिन्द सिनेमा घर में शायद तब एक या दो ही फिल्में देखीं होंगे। क्योंकि दसवीं करने के बाद डेहरी के विस्थापित होना पड़ा। हालांकि विस्थापन इतिहास में दर्ज़ मानवीय विकास की एक स्वाभाविक प्रक्रिया के रूप में दर्ज़ है। इसलिए डेहरी हाई स्कूल और स्कूल के ठीक सामने एक पुराना ढहने की कगार पर खड़ा एक महल, भूतबंगला आदि आदि नामों से ख़्यात एक किला हुआ करता था। उसके बारे में जो बड़ों और सहपाठियों से कहानियां सुनी थीं वो यही थीं कि यहां किले में बैठा राजा अंदर ही अंदर सुरंग से सासाराम निकल जाता था। यह कितना सच था और कितना झूठ यह तो तब की उम्र में ज़्यादा मायने नहीं रखता था। और वैसे भी यह मसला इतिहास और भूगर्भशास्त्रियों के हिस्से में ज़्यादा आती हैं। कहने को तो कहने वाले यह भी कहते थे कि कोइ इस ओर से उस ओर नहीं पार कर सका है। कहानियां थीं से कहानियों में पात्र भी रहे ही होंगे।
डेहरी हाई स्कूल जाने के रास्ते में डेहरी पड़ाव ख्ुला और गोद में मंच लिए लेटा मिला करता था। इसी मैदान में कई तरह से मेले, जुलुस, सर्कस आदि लगा करते थे। खिचड़ी पर इसी ख्ुले मैदान में पूरे दस या पंद्रह दिन के लिए मजमा मेला और सब कुछ लगा करता था। इन्हीं सड़कों से गुजरते हुए स्कूल जाना और छोटी नहर पार कर मिट्टी के टीले से फिसला आज भी स्मृतियों दर्ज़ हैं। सोन और नहर के बीच में बसा हमारा डेहरी हाई स्कूल काफी पुराना और नामी स्कूल हुआ करता था। डेहरे के अमूमन सभी युवा इन्हीं स्कूलों डेहरी, डिलियां और डालमियानगर स्कूलों में प्रारम्भिक तालीम लेकर आज दुनिया के विभिन्न शहरों में बसे गए। डेहरी वहीं की वहीं बसी है। पची है और विस्तार हासिल कर रही है। झारखंड़ी मंदिर और मिट्टी के टीले के ठीक बीचों बीच एक तालाब किस्म का स्थान हुआ करता था। वहां कुछ पुरानी स्टीमर, पुराने नाव आदि जंग खा रहे थे। कहां से आए? कौन लेकर आया यह तो नहीं मालूम लेकिन उन स्टीमरों पर स्टेयरिंग घुमाना, खेलना और कपड़े फाड़ना अब तक याद है।
अस्सी के दशक के डेहरी को देखें और 2000 के बाद के डेहरी को देखें तो एक बड़ा बदलाव नज़र आएगा। अस्सी के दशक में ही आंखें देखी बात है कि डेहरी पड़ाव के ठीक सामने अप्सरा सिनेमा हॉल खुला, एक स्टेशन रोड़ कर नया सिनेमा हॉल खुला। जो पुराना सिनेमा हॉल था वो जय हिन्द और डालमियानगर में स्टेशन से उतरते ही डि लाइट हुआ करता था। जहां तक याद कर पा रहा हूं तो उस हॉल में बंद होने से पहले नाचे मयूरी फिल्म लगी थी उसके बाद वो सिनेमा हॉल में इतिहास का हिस्सा होने से बच न सका। याद आता है कि गरमी की शाम और रात, या फिर सरदियों की दुपहरी में या फिर शाम में डी लाइट सिनेमा हॉल शो शुरू होने से पहले और बाद में गाने बजाया करता था। इतना ही नहीं स्टेशन के लगभग पास रहने की वजह से कई बार दुपहरी में तो कई बार शांत रात में स्टेशन से होने वाले उद्घोष साफ सुनाई दिया करते थे। अब सियापदह की घोषणा हो रही है, तो कभी बंबे मेल की। बरवाडीह की घोषणा आदि। सन् 1984-85 के आस पर डेहरी ऑन सोन स्टेशन पर पैसिंजर रूका करती थीं। लेकिन डालमियानगर कॉलेज की प्रधानाचार्य शायद नाम सही याद कर पा रहा हूं तो शाही थीं जिन्हें दिल्ली आने जाने में दिक्कतें होती थीं सो उन्होंने दिल्ली सिफारिश कीं कि स्टेशन पर डिलक्स रूका करे। तब इस ट्रेन का नाम यही हुआ करता था। जेनरल टिकट दिल्ली के लिए शायद अस्सी रुपए हुआ करता था। शाही मैडम की सिफारिफ रंग लाई और डेहरी में डिलक्स रूकने लगी। हमें बड़ा अच्छा और गर्व होता था कि सासाराम में यह नहीं रूका करती है।
बाज़ार के नाम पर तब तीन की मुख्य हुआ करते थे-डालमियानगर, डेहरी बाजार और स्टेशन बाजार। हालांकि अब भी ये तीनों बाजार हैं लेकिन बाजार की प्रकृति में तब्दीली आ चुकी है। कला निकेतन, ग्लासिना, मातृभंड़ार, विद्यार्थी पुस्तक भंड़ार, पीयूषी आदि ऐसी दुकानें थीं जो डेहरी बाजार और थाना चौक की शान हुआ करती थीं। अब शायद इन दुकानों के मालिक वृद्ध हो गए। इन मालिकों के बच्चों को इनकी दुकानों में कोई ख़ास दिलचस्पी जाती रही। वे बच्चे दिल्ली, कलकत्ता, बंबे, मद्रास और विदेश जाने लगे। वैश्विक बाजार के हिस्सा बने और पुरानी दुकाने अब मरने की कगार पर हैं। सुना तो यह भी है कि डेहरी में भी एक मॉल खुल चुका है। बदलाव की शुरुआत हो चुकी है। पुरानी दुकाने खुद ब खुद खत्म होती जाएंगी। नए नए मॉल और दुकानें अस्तित्व में आएंगी। ग्लासिना के विनोद मारोदिया, कमला स्टोर कुछ ऐसी दुकानें थीं जो दुकान से ज़्यादा रिश्तें कायम करने में विश्वास रखा करती थीं। यही वजह है आज कि मातृभंड़ार, ग्लासिना, कला निकेतन अपने नाम से जाने जाते हैं। 

Wednesday, October 24, 2018

पेड़ थे और रहेंगे मानें या न मानें





कौशलेंद्र प्रपन्न
सदियों सदियों तलक ये पेड़ यूं ही खड़े रहते हैं। बस अंतर इतना ही पड़ता है कि हम इनके बीच से कहीं दूर की यात्रा पर निकल जाते हैं। कहते हैं वहां से हम जैसे गए थे वैसे ही नहीं लौटते। बल्कि हमारा लौटना कुछ अलग रूप में होता है।
ये नदी, पहाड़, पेड़ जैसे हम इन्हें छोड़ जाते हैं वे वैसे ही खड़े या पड़े रहते हैं। नदी वैसी ही बहती रहती है। बस वो कई बार रास्ते बदल लिया करती है। पहाड़ थोड़े झुक जाते हैं या फिर खिसक जाते हैं। या फिर नदी को सिमटने पर हम मजबूर कर देते हैं। पहाड़ों को काट-छांट कर अपनी जेब में कैद करने लायक बना दिया करते हैं।
नदी विभाजन से पहले भी थी। और अब भी बतौर झेलम, चिनाब बह रही हैं। उनके पानी में कोई अंतर नहीं देख सकते। खेत खलिहान और पहाड़ भी पूरी शिद्दत से खड़े मिलेंगे। बस हमीं हैं कि इनके बीच से निकल लिया करते हैं।
जब तक इस जमीं पर रहते हैं इन्हें खोदते, खंघालते उलीचते रहते हैं। और जब जाते हैं तब इन्हें किसी बांध से बांध दिया करते हैं। कहीं बांध बनाकर तो कहीं इन पर विवाद जन्मा कर हम तो चले जाते हैं लेकिन ये नदियां, ये पहाड़ और ये पेड़ वहीं रहा करते हैं।
कितना अच्छा होता कि हम नदी, पहाड़, पेड़ को संरक्षित कर पाते। इन्हें सुरक्षित रखकर अपने आने वाले बच्चों को दे पाते। गांव का पुराना पेड़ अभी भी वहीं खड़ा है। कहता होगा कि देखों तुम्हारे बाप दादे सब के सब हमारे ही सामने बड़े हुए और अब इस गांव में कोई चराग जलाने वाला भी नहीं बचा। 

Sunday, October 21, 2018

ि( ) हारी हो! कुचले, भगाए जाओगे


कौशलेंद्र प्रपन्न
तुम्हें इतनी सी बात भी समझ में नहीं आती, न ही तुम्हारे मजदूर दिमाग में समाती है कि तुम भारत के नागरिक होने से पहले ि... हारी हो। याने तुम कभी भी, किसी भी राज्य से खदेड़े जा सकते हो, मारे जा सकते हो और दुरदुराए जा सकते हो। तुम्हें महाराष्ट्र से, असम से, पंजाब से, गुजरात से और कहा-कहां  से नहीं भगाया गया। लेकिन तुम हो कि थेथर की तरह राज्य दर राज्य भटकते रहते हो। कहीं रिक्शा खींचते हो, रेड़ी लगाते हो, कारखाने में खटते हो आदि। उस पर तुर्रा यह सुनते हो कि स्याले ि...हारी हमारे पेट पर लात मारने चले आते हैं। हमारे राज्य में नौकरी हथिया लेते हैं। स्यालों को उनके राज्य खदेड़ो। लेकिन तुम्हें इतनी सी बात भी क्यों समझ नहीं आती। अमृतसर रेल हादसों में मरने वालों में तुम्हारी ही संख्या ज्यादा है। दूसरा राज्य उपी के लोगों का है। ख़बरों की मानों तो मालूम होगा कि इस ट्रेन से कटने वालों में उत्तर प्रदेश और बिहार से आए प्रवासी मजदूर ज़्यादा थे जो पास की फैक्ट्री में काम किया करते थे। इन्हीं फैक्टियों में रोटी कमाने वाले मजदूर इस रावण दहन देखने आए थे और सदा सदा के लिए सो गए। तुम अपने राज्य गांव देहात भी नहीं लौटे। अब लौटेंगी ख़बर तुम्हारे गांव। इस बरस दिवाली में न दीया जलेंगे और न ही छठ होगा। सब के सब त्योहार सूने और बच्चों की आंखों में बाप के घर न लौटने की टीस हमेशा के लिए बनी रहेगी। 
पंजाब में रेल हादसों में मरने वालों की संख्या पर नजर डालें तो पाएंगे कि प्रवासी बिहारी और उत्तर प्रदेश के लोग थे। वे वो लोग थे जिनके पास खाने कमाने का और कोई जरिया नहीं था। दूसरे राज्यों में लानत मलानत सह कर अपने घर परिवार को पालने वाले इन लोगों पर तोहमत भी लगाने से हम बाज नहीं आते कि इन्हीं की वजहों से फलां राज्य में उन राज्यों के लोगों को नौकरियां नहीं मिल पा रही हैं। जबकि हमारा संविधान देश के समस्त नागरिक को किसी भी राज्य में, देश के किसी भी कोने में जीने, खाने कमाने और रहने की मौलिक अधिकार प्रदान करता है। फिर वो कौन लोग हैं जो रातों रात फरमान जारी करते हैं कि उनका शहर, उनका राज्य खाली कर अपने अपने देस, गांव लौट जाएं। अफ्सोसनाक बात तो तब है कि प्रशासन और राज्य की सरकार ऐसे मसलों पर मौन साध लेती है। गृह राज्य में यदि रोजगार के अवसर मुहैया करा दिए जाएं तो कौन ऐसा होगा जो अपना गांव घर छोड़कर हजार, दो हजार किलोमीटर दूर देस में मजदूरी करेगा। शायद कुछ चुनिंदे राज्यों से महज इसलिए लोग ख़ासकर मजदूरी करने वाले लोग पलायन करते हैं, क्योंकि उनके राज्य, गांव में उन्हें काम नहीं मिल रहे हैं। यदि इसी घटना को 360 डिग्री कोण पर उलट कर समझें तो किसी भी राज्य, देश से बौद्धिक मजदूर, कमागर लोग इसलिए पलायन करते हैं, क्योंकि उनके लिए उस राज्य? देश आदि में उनके लिए मकूल काम और श्रम की कीमत नहीं है।
वरना क्या वजह है कि भारत के विभिन्न राज्यों से लेकर दिल्ली के तमाम मंत्रालयों में पासपोर्ट और वीजा की लाइन लंबी होती है। बस एक बार बाहर का रास्ता मिल जाए और कुछ भी काम बाहर कर लेंगे। जब बाद में मौका भी मिलेगा तो वापस नहीं आएंगे...वहीं के होकर रहेंगे। आएंगे जब भी तुम्हें फिर हिकारत की नजर से देखेंगे। क्योंकि तुम न बदले, तुम्हारी सोच न बदली और न रहन सहन का सहूर बदला। सिर्फ हज़ारों फ्लाईओवर बना लेने और छह से आठ लेन की सड़क बना लेने से तमीज़ नहीं आती। उसपर यदि किसी राज्य की बुनियादी बुनावट और ढांचें को देख लें तो मालूम चलेगा कि वहां अभी भी सुविधाएं पुराने ढर्रें पर ही उपलब्ध हैं, लेकिन दंभ भरने में हम पीछे नहीं हैं।
हाल ही में गुजरात के वडोदरा में एक घटना की प्रतिक्रियास्वरूप बिहारियों को राज्य छोड़कर अपने प्रांत लौटने पर मजबूर किया गया। टें्रनें, बसों में भर भर कर स्वराज्य लौटे लोगों से मत पूछिए सवाल। पूछना ही है तो उनसे पूछा जाना चाहिए कि लोकतंत्र में जहां सांवैधानिक अधिकार हासिल है कि यहां का नागरिक कहीं भी बिना रोक टोक और मनाही के भ्रमण करने, रोजगार करने, घर बनाने, शादी करने आदि के मौलिक अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। फिर वो कौन लोग थे जिन्होंने संविधान को भी अंगूठा दिखाया और लोकतंत्र के स्तम्भ ख़ामोश रहे। इतना ही नहीं बल्कि ख़बर तो यह भी है लूंगी पहन कर बैठे बिहारियों को भी निशाना बनाया गया। यह कैसे स्वीकार हो सकता है कि जहां की सांस्कृतिक धरोहर बहुसांस्कृतिक और बहुभाषी समाज की वकालत करती हो लेकिन वहां के रहने वाले इस बहुसांस्कृतिक थाती को तार तार कर रहे हों। क्या स्थानीय निकायों और सिविल सोसायटी के समाज की जवाबदेही नहीं बनती कि ऐसे बरताव के ख़िलाफ आवाज़ बुलंद करें। इस प्रकार की दोयम दर्जें के बरताव बिहारियों और अन्य राज्यों के लोगों के साथ अब आम बात हो चुकी है। इस प्रकार की घटनाएं कहीं न कहीं गहरे विमर्श की ओर हमें धकेलती हो है लेकिन हम तुरत फुरत में निर्णय लेने और राय बनान में लग जाते हैं। जबकि हम ऐसे मसलों पर ठहर कर परिचर्चा करने और बेहतर समाधान करने निकालने की आवश्यकता है।
 

Thursday, October 11, 2018

मानसिक स्वास्थ्य भी हो हमारी चिंता


कौशलेंद्र प्रपन्न

हम अपने आस-पास नज़र डालें तो ऐसे लोग सहज ही मिल जाएंगे जो कुछ सामान्य से हट कर बरताव करते नज़र आएंगे। आदतन हम उन्हें नज़रअंदाज़ कर दिया करते हैं। स्थानीय बोलचाल में उन्हें पागल घोषित करते देर नहीं लगाते। जबकि हम एक गंभीर बीमारी की ओर ध्यान नहीं दे रहे हैं। जो व्यक्ति बीमार है उसे तो नहीं मालूम लेकिन नागर समाज को उसकी ओर ध्यान देने की आवश्यकता है। लेकिन हम अपनी अपनी जिं़दगी में इस कदर व्यस्त हैं कि अपना अपना, मेरा मेरा ही के चक्कर में हम और के ग़म भूल जाते हैं। जबकि हमारी शिक्षा बड़ी ही शिद्दत से मानती है कि हमें एक ऐेसे नागर समाज का निर्माण करना है जहां मानसिक, आत्मिक, शारीरिक, संवेदनात्मक आदि स्तर पर समुचित विकास हो। लेकिन अफ्सोसनाक बात यह है कि हमें विश्व भर में हजारों नहीं बल्कि लाखों लोग हैं जो मानसिक तनाव और दुश्चिंता में जी रहे हैं। अंग्रेजी में कहें तो यह मानसिक स्ट्रेस के खाने में आता है। आज हमारी लाइफ इस कदर तनावपूर्ण हो है कि हम कहीं का गुस्सा कहीं और निकाला करते हैं। इतना ही नहीं जिस दौर में जी रहे हैं यह सोशल मीडिया और ख़बर रफ्तार के समय से गुजर रहे हैं। ऐसे में हमारी मनोदशा और अंतरदुनिया सोशल मीडिया से ख़ास प्रभावित होता है। यदि किसी ने सोशल मीडिया पर बेरूख़ी बरती तो हमारा पूरा दिन और पूरी रात तनाव में कट जाती है। सोशल मीडिया से हमारी जिं़दगी संचालित होने लगे तो यह चिंता की बात है। तमाम रिपोर्ट यह हक़ीकत हमारी आंखों में अंगुली डाल कर दिखाना चाहती हैं कि आज हम किस रफ्तार में भाग रहे हैं। और इस भागम-भाग हम अपनी नींद और चैन खो रहे हैं।
आज सच्चाई यह है कि हर पांच में से एक व्यक्ति मानसिकतौर पर बीमार है। बीमार से मतलब अस्वस्थ माना जाएगा। वहीं 46 फीसदी लोग किसी न किसी रूप तनाव से गुजर रहे हैं। वह तनाव दफ्तर से लेकर निजी जिं़दगी क पेचोखम हो सकते हैं। जब व्यक्ति इतने तनाव में होंगे तो अमूमन सुनने में आता है कि मेरे सिर में हमेशा दर्द रहता है। ऐसे लोगों की संख्या तकरीबन 27 फीसदी है। हम जितने तनाव में होते हैं उनमें हम कहीं न कहीं भीड़ में रह कर भी अकेलापन महसूसा करते हैं। हम घर में रह कर भी तन्हा महसूसा करते हैं। ऐसे में व्यक्ति अकेला होता चला जाता है। कई बार तनाव और डिप्रेशन में आदमी ग़लत कदम उठा लेता है। डिप्रेशन में जीने वालों की संख्या 42.5 फीसदी है। हम रात में बिस्तर पर चले जाते हैं। लेकिन रात भर करवटें बदलते रहते हैं। नींद रात भी क्यों नहीं आती। क्योंकि हम उच्च रक्तचाप और तनाव में जीते हैं। इसलिए रात भर सो नहीं पाते। सुबह उठने के बाद भी आंखों में नींद भरी रहती है।
अनुमान लगाना ज़रा भी कठिन नहीं है कि जब हमें रात भर नींद नहीं आती। घर परिवार में भी अकेला महसूसा करते हैं तब हम कहीं न कहीं मानसिक रूप से टूटन अनुभव किया करते हैं। ऐसे लोगों के साथ शायद यार दोस्त भी वक्त गुजारने के कतराते हैं। उन्हें लगता है कि वो तो अपनी ही पुरानी बातें, घटनाओं से पकाने लगेगा। लेकिन हमें नहीं पता कि हम एक ऐसे व्यक्ति के साथ खड़े होकर संबल देने की बजाए उसे अकेला छोड़ रहे हैं। वह किसी भी स्तर पर जा सकता है। शायद आत्महत्या की ओर मुंड़ जाए। ऐसे लोगों की संख्या भारत में कम से कम 45 से 50 फीसदी है। जो कहीं न कहीं जीवन में अकेला हो जाते हैं और जीवन को नकारात्मक नज़र से देखने और लेने लगते हैं।
हमारे पास विभिन्न तरह के विभिन्न रोगों के लिए सुपर स्टार अस्पाल हैं। जहां जाने के बाद विभिन्न सुविधाओं से लैस कमरे, डॉक्टर के विजिट, खान-पान उपलब्ध हैं। एक हजार से शुरू होकर दिन 10,000 तक के कमरे आपकी जेब के मुताबिक उपलब्घ हैं। लेकिन यदि हम मानसिक अस्वस्थ लोगों के लिए अस्पताल तलाश करने निकलें तो बेहद कम मिलेंगे। दिल्ली में सरकारी अस्पतालों जिसमें मानसिक रोगियों के लिए उपलब्ध हैं उनमें वीमहांस और इबहास हैं। इन दो अस्पतालों के छोड़ दें तो प्राइवेट अस्पताल में भी चिकित्सा उपलब्ध हैं लेकिन उसके खर्चे ज़्यादा हैं।
वैश्विक स्तर पर नज़र दौड़ाएं तो पाएंगे कि विभिन्न कारणों से व्यक्ति एक्यूट एंजाइटी, दुश्चिंता और अवसाद का शिकार है। तनाव तो है ही साथ ही अकेलापन भी एक बड़ी वज़ह है कि लोग देखने मे ंतो स्वस्थ लगता हैं लेकिन अंदर टूटे हुए और बिखरे हुए होते हैं। ऐसे लोगों को अकेला छोड़ना कहीं भी किसी भी सूरत में मानवीय नहीं माना जाएगा। गौरतलब हो कि 2007-8 में जब वैश्विक मंदी को दौर आया था तब वैश्विक स्तर पर लोग डिप्रेशन के शिकार हुए थे। लोगों की जॉब रातां रात चली गई थी। शादी के लिए तैयार लड़की शादी के करने से इंकार कर दिया था। आंकड़े तो यह भी बताते हैं कि डेंटिस्ट पास दांत दर्द के रोगियों की संख्या में बढ़ोत्तरी दर्ज़ की गई थी। हालांकि प्रमाणिकतौर पर आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं लेकिन मानसिकतौर पर टूटे हुए और तनावग्रस्त लोगों की संख्या ऐसे अस्पतालों में बढ़ी थी। याद हो कि तब की मीडिया ने अगस्त सितंबर 2008 के बाद वैश्विक मंदी में जॉब गवां चुके लोगों की ख़बरें भी छपना बंद कर चुकी थी। ऐसे में इस प्रकार के आंकड़े निकलाना ज़रा मुश्किल काम रहा कि कितने प्रतिशत लोग मानसिक अस्थिरता की वजह से मनोचिकित्सकों की मदद ली।



Thursday, October 4, 2018

झेलम की कहानी



कौशलेंद्र प्रपन्न

‘‘शाम पांच बजे पूणे से चली थी। भोपाल, आगरा, मथुरा फरीदाबाद पार करतीह हुई दिल्ली पुहंची हूं रात के पौने नव बज रहे हैं। थक गई हूं। थोड़ा सुस्ता लूं फिर रात भर और दौड़ना है।’’
झेलम बुदबुदा रही थी। शाम और रात भर दौड़ती रही ट्रेन रात होते होते थक सी गई थी। उसके पांवों से माने पहिए से आग की चिनगारियां निकल रही थीं। जब स्टेशन पर चीं चीं... कर रूकी। सबने देखा और और देख कर नजरअंदाज कर दिया। पूछोगे नहीं उस ट्रेन का नाम क्या है? जैसे हमारे नाम होते हैं उसी तरह हर ट्रेन के नाम होते हैं। उनके नंबर भी होते हैं। जैसे स्कूल में तुम्हें रोल नंबर मिलते हैं। उसी तरह ट्रेनों को भी रोल नबंर मिले होते हैं। उस ट्रेन का नाम था झेलम। उसे हमने 11077 नबंर दिया है। जब झेलम दिल्ली स्टेशन पर रूकी तो प्लेटफॉम ने उससे क्या बात किया होगा?
‘‘बहन थकती नहीं हो?’’
 ‘‘इतनी लंबी यात्रा करती हो। न जाने कितने ही स्टेशनों से गुजरती हुई चला करती हो।’’
प्लेटफॉम झेलम से बातें करना चाहता था। रास्ते की थकन दूर हो इसके लिए उसने झेलम को टोका। रात भर की यात्रा के बाद ट्रेन में पानी भी तो खत्म हो गया था। सो दिल्ली में झेलम को पानी मिला। थोड़ी देर सांसें लेने के बाद झेलम ने कहा ‘‘तुम तो एक ही जगह पर पड़े रहते हो, तुम्हें क्या मालूम रास्ते कितने लंबे होते हैं।’’ ‘‘थोड़ी देर सुस्ताने तो दो’’
तब तक प्लेंटफॉम पर सफाई वाले, पानी वाले, चिप्स वाले सब आ गए। ट्रेन चुपचुपा खड़ी थी उस दौरान प्लेटफॉम चुपचाप ट्रेन को निहार रहा था। अब ट्रेन ने चुटकी ली और कहने लगी-
‘‘मेरी यात्रा सुनोगे तो होश ही उड़ जाएंगे। बहुत दूर से आती हूं।’’ कहां कहां से गुजरती हूं सुन लोगों तो पता चलेगा तुम भी मेरे साथ घूमना चाहो’’
‘‘अब तुम भी सुबह सुबह मजे न लिया करो झेलम’’
‘‘मैं कहां जा पाउंगा?’’
‘‘मेरी किस्मत उतनी भी अच्छी कहां है जो देश-देश, जगह जगह घूमा करूं। मैं तो यहीं के यही रहता हूं। चुपचाप। देखता भर रहता हूं। कभी तुम आती हो, कभी डिबरू गढ़ आती है तो कभी शताब्दी। कहते हैं शताब्दी ज़रा शोख़ और नजाकत वाली है। उसमें चढने वाले भी मुझे तो अलग ही किस्म के लोग लगते हैं। उनके पास टीस टप्पर के बक्से, झोरा, बोरी भी नहीं होते’’
झेलम सुनते सुनते बीच में बोल पड़ी, ‘‘तुम्हें बस समय चाहिए। अपनी ही कहानी सुनाने की बेचैनी होती है।’’
 ‘‘तो मैं क्या कह रही थी कि मेरी यात्रा बड़ी ही लंबी है। कई राज्यों से गुजरती हुई यहां आती हूं। सूंघों सूंघों तो सही। तुम्हें आगरे का पेठा, मथुरा का पेड़ा, पूणे और मुंबई का आलू बटाटा, भोपाल का पोहा जलेबी की खूशबू आएगी।’’
‘‘अब तुम मुझे चिढ़ावो मत। यह सब बता कर। तुम अपने साथ ला नहीं सकती थी?’’
‘‘चलो यह तो बताओं तुम कहां से चलती हो और कहां तलक जाती हो? ज़रा हम भी तो सुनें।’’
‘‘ अभी मेरी बात पूरी ही कहां हुई। ज़रा सुनो तो। जब मैं करूक्षेत्र, अंबाला और पटियाला पहुंचती हूं तो वहां के वाह! छांछ और लस्सी के भरे परे ग्लास और पराठे!!!’’ मुंह में पानी आ जाएंगे। जब तुम्हें पता चलेगा कि पराठे पर उछलता मक्खन...’’
‘‘बस भी करो झेलम तुम तो जीना ना दोगी। अगर ला नहीं सकती तो ऐसे लजीज खानों के बारे में सुनाकर बेचैन मत किया करो।’’ थोड़ मचलते हुए प्लेटफॉम ने कहा
‘‘कहने वाले कहते हैं और मैंने भी सुना है कि तुम 51 इक्यावन घंटे चला करती हो।’’
‘‘हां हां सच है यह तो। लेकिन सच यह भी है कि कई बार जब देर होती हूं तो वह साठ घंटे भी हो जाते हैं।’’
‘‘कितनी थक जाती होगी है न?’’ प्लेटफॉम ने संजीदगी के साथ कहा।
‘‘अच्छा तो ये बताओ बहन इन घंटों में तुम तो मीलों का सफ़र कर लेती होगी?’’
‘‘हां मीलों कह लो या किलोमीटर। यही कोई 2,176 किलोमीटर की यात्रा करती हूं।’’
अब मुंह बाए प्लेटफॉम झेलम को देख रहा था। प्लेटफॉम को मजाक करने का मन किया और कहने लगा-
‘‘ उफ!!! कितनी थक गई जाती हो। और तुम्हारे पांव दबा दूं।’’ आओ आओ शर्माओ मत।’’
झेलम को यह बात थोड़ी गुदगुदाने वाली लगी।
कहने लगी-
‘‘चलो रहने दो। देखने वाले क्या कहेंगे?’’
‘‘कुछ लोक लाज है या नहीं?’’
‘‘चलो प्लेटफॉम तुम से तो बातें होती रहेंगी। अब मैं तरोताज़ा हो गई हूं। आगे की यात्रा के लिए गार्ड साहब ने हरी झंड़ी भी दिखा दी है। देखते नहीं हो?’’
‘‘लोग मेरा इंतज़ार कुरूक्षेत्र में, अंबाला में और पटियाला से लेकर लुधियाना में कर रहे होंगे। तुम्हारीं बातों में फंस गई तो लेट हो जाउंगी। फिर वो लोग कहेंगे आज फिर देर हो गई।’’
‘‘अपना ख़्याल रखना झेलम....मममम’’
‘‘अच्छे से जाना और कल फिर मिलेंगे तुम्हारी ही बहन मिलेगी मुझे 11078’’
‘‘उसे मेरा हलो बोलना....’’
और झेलम प्लेटफॉम से सरकने लगी।

Monday, October 1, 2018

मी टू यौन शोषण का शिकार


कौशलेंद्र प्रपन्न
मी टू हैश टैग लगा कर अपनी कहानी कहने का इन दिनों एक फैशन सा हो गया है। हालांकि ऐसी कहानियां होती बड़ी दर्दीली हैं। जो इससे गुजरा होता है उसका दर्द वही समझ और महसूस सकता है। वह चाहे बचपन में भोगा हो या फिर बड़े होने के बाद। घर में ऐसी घटना हुई हो या फिर कॉलेज में। कॉलेज के बाद जॉब करने के दौरान ऐसे हादसों से गुजरना हुआ हो आदि। ऐसी घटनाओं से जो निकल कर बाहर आ पाएं। ख्ुद को संभाल पाए वो तो तारीफ के काबिल हैं ही साथ ही अपनी दर्दनाक घटना को एक बड़े मंच पर स्वीकार करना माद्दे की बात होती है। हर कोई अपने यौनशोषण की घटना को न तो स्वीकार करता है और न ही बड़े मंचों पर कहने की ताकत रखता है। यह दरअसल अतीत में घटित घटना को याद करना वास्तव में पुरानी दर्दीले एहसास से गुजरना ही है।
हिन्दी साहित्य हो या अन्य भारतीय साहित्य की विधाएं कथा-कहानी एवं उपन्यास आदि इस मसले को शिद्दत से बतौर विषय चुने हैं। इस कहानियों व उपन्यासों में पात्रों के चुनाव और उनके साथ बरताव बेहद संजीदा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर फिल्मों में भी इस विषय को गंभीरता से उठाया गया है। मसलन मॉनसून बेडिंग, चांदनी बार आदि। इन फिल्मों में बाल यौनशोषण को संजीदगी के साथ उठाया गया है। समाज में विभिन्न किस्म के पात्र वैसे ही उपलब्ध हैं जैसे कथा कहानियों में हुआ करते हैं। ज़रूरत न केवल जागरूकता की है बल्कि ऐसे मसलों के प्रति आवाज उठाने की भी है। यदि हम चुप बैठ जाते हैं तो कहीं न कहीं ऐसे मनोवृत्ति वालों को बढ़ावा ही देते हैं।
इन दिनों पद्मा लक्ष्मी ने अपने बचपन की घटित घटना को मीडिया के सामने स्वीकार किया। उसने स्वीकार किया कि कैसे उसके पापा के दोस्त ने उसके साथ अश्लील बरताव किए। कहां कहां नहीं छूए। जहां छूना या स्पर्श करना वर्जित है उन स्थानों को उत्तेजित किया। पिछले दिनों एक अंग्रेजी अख़बार ने पद्मा लक्ष्मी की अतीतीय दर्दभरी घटना को प्रमुखता से अपने यहा स्थान दिया। पद्मा लक्ष्मी बताते चलें कि ये सलमान रूशदी की पत्नी रही हैं और वैश्विक स्तर पर अपनी अलग पहचान के लिए जानी भी जाती हैं। इधर इनकी कहानी आई उधर भारतीय फिल्म जगत की एक और अदाकारा की कहानी बाहर आई। उन्होंने स्वीकार किया कि उनके साथ यही कोई दस साल पहले नाना पाटेकर ने सही बरताव नहीं किया था। मानसिक और शारीरिक तौर पर तथाकथित शोषण किया गया। यही वजह है कि वो भारतीय फिल्म जगत को अलविदा कह गईं। इस ख़बर के उद्घाटन के बाद तर्क-प्रतितर्क, पक्ष प्रतिपक्ष के जवाब भी मीडिया में आने लगे। जो भी हो दस साल पहले घटित घटना को भूलने व बिसुराने की बजाए आज उन्हें ताजा करना क्या प्रासंगिक हैं? क्या दुबारा उसी मनोदशा को जीना उचित है? मनोविज्ञान में कहा जाता है कि अतीतीय दुखद घटना को जितना याद किया जाए वह उतना ही दुखदायी होता है। बेहतर है कि दुखद घटनाओं को अतीत में छोड़ दिया जाए।
यह एक मानवीय संवेदना है कि हम अकसर स्मृतियों जीया करते हैं। स्मृतियां यानी अतीत की यादों में अपना काफी समय जाया किया करते हैं। उन्हीं घटनाओं में हम सूख के एहसास से भर उठते हैं। जबकि वह हमारा निजी अनुभव होता है। संभव है वह हम किसी और से साझा भी न करना चाहें। लेकिन हम इसलिए साझा किया करते हैं क्योंकि हमें कई बार गर्व का एहसास होता है। कई बार अपनी शेखी बघारने का पल लगता है। वैसे माना जाता है कि अतीत में जाना कई बार जोख़िम भरा होता है। हम अतीत में चले तो जाते हैं लेकिन लौटना हमें नहीं आता। हम अतीत से मार्गदर्शन व सीख हासिल करने की बजाए वहीं उन्हीं घटनाओं में अटक जाते हैं। अतीत की संवेदना हमें कहीं दुखद कर जाता है।
 

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