Thursday, October 11, 2018

मानसिक स्वास्थ्य भी हो हमारी चिंता


कौशलेंद्र प्रपन्न

हम अपने आस-पास नज़र डालें तो ऐसे लोग सहज ही मिल जाएंगे जो कुछ सामान्य से हट कर बरताव करते नज़र आएंगे। आदतन हम उन्हें नज़रअंदाज़ कर दिया करते हैं। स्थानीय बोलचाल में उन्हें पागल घोषित करते देर नहीं लगाते। जबकि हम एक गंभीर बीमारी की ओर ध्यान नहीं दे रहे हैं। जो व्यक्ति बीमार है उसे तो नहीं मालूम लेकिन नागर समाज को उसकी ओर ध्यान देने की आवश्यकता है। लेकिन हम अपनी अपनी जिं़दगी में इस कदर व्यस्त हैं कि अपना अपना, मेरा मेरा ही के चक्कर में हम और के ग़म भूल जाते हैं। जबकि हमारी शिक्षा बड़ी ही शिद्दत से मानती है कि हमें एक ऐेसे नागर समाज का निर्माण करना है जहां मानसिक, आत्मिक, शारीरिक, संवेदनात्मक आदि स्तर पर समुचित विकास हो। लेकिन अफ्सोसनाक बात यह है कि हमें विश्व भर में हजारों नहीं बल्कि लाखों लोग हैं जो मानसिक तनाव और दुश्चिंता में जी रहे हैं। अंग्रेजी में कहें तो यह मानसिक स्ट्रेस के खाने में आता है। आज हमारी लाइफ इस कदर तनावपूर्ण हो है कि हम कहीं का गुस्सा कहीं और निकाला करते हैं। इतना ही नहीं जिस दौर में जी रहे हैं यह सोशल मीडिया और ख़बर रफ्तार के समय से गुजर रहे हैं। ऐसे में हमारी मनोदशा और अंतरदुनिया सोशल मीडिया से ख़ास प्रभावित होता है। यदि किसी ने सोशल मीडिया पर बेरूख़ी बरती तो हमारा पूरा दिन और पूरी रात तनाव में कट जाती है। सोशल मीडिया से हमारी जिं़दगी संचालित होने लगे तो यह चिंता की बात है। तमाम रिपोर्ट यह हक़ीकत हमारी आंखों में अंगुली डाल कर दिखाना चाहती हैं कि आज हम किस रफ्तार में भाग रहे हैं। और इस भागम-भाग हम अपनी नींद और चैन खो रहे हैं।
आज सच्चाई यह है कि हर पांच में से एक व्यक्ति मानसिकतौर पर बीमार है। बीमार से मतलब अस्वस्थ माना जाएगा। वहीं 46 फीसदी लोग किसी न किसी रूप तनाव से गुजर रहे हैं। वह तनाव दफ्तर से लेकर निजी जिं़दगी क पेचोखम हो सकते हैं। जब व्यक्ति इतने तनाव में होंगे तो अमूमन सुनने में आता है कि मेरे सिर में हमेशा दर्द रहता है। ऐसे लोगों की संख्या तकरीबन 27 फीसदी है। हम जितने तनाव में होते हैं उनमें हम कहीं न कहीं भीड़ में रह कर भी अकेलापन महसूसा करते हैं। हम घर में रह कर भी तन्हा महसूसा करते हैं। ऐसे में व्यक्ति अकेला होता चला जाता है। कई बार तनाव और डिप्रेशन में आदमी ग़लत कदम उठा लेता है। डिप्रेशन में जीने वालों की संख्या 42.5 फीसदी है। हम रात में बिस्तर पर चले जाते हैं। लेकिन रात भर करवटें बदलते रहते हैं। नींद रात भी क्यों नहीं आती। क्योंकि हम उच्च रक्तचाप और तनाव में जीते हैं। इसलिए रात भर सो नहीं पाते। सुबह उठने के बाद भी आंखों में नींद भरी रहती है।
अनुमान लगाना ज़रा भी कठिन नहीं है कि जब हमें रात भर नींद नहीं आती। घर परिवार में भी अकेला महसूसा करते हैं तब हम कहीं न कहीं मानसिक रूप से टूटन अनुभव किया करते हैं। ऐसे लोगों के साथ शायद यार दोस्त भी वक्त गुजारने के कतराते हैं। उन्हें लगता है कि वो तो अपनी ही पुरानी बातें, घटनाओं से पकाने लगेगा। लेकिन हमें नहीं पता कि हम एक ऐसे व्यक्ति के साथ खड़े होकर संबल देने की बजाए उसे अकेला छोड़ रहे हैं। वह किसी भी स्तर पर जा सकता है। शायद आत्महत्या की ओर मुंड़ जाए। ऐसे लोगों की संख्या भारत में कम से कम 45 से 50 फीसदी है। जो कहीं न कहीं जीवन में अकेला हो जाते हैं और जीवन को नकारात्मक नज़र से देखने और लेने लगते हैं।
हमारे पास विभिन्न तरह के विभिन्न रोगों के लिए सुपर स्टार अस्पाल हैं। जहां जाने के बाद विभिन्न सुविधाओं से लैस कमरे, डॉक्टर के विजिट, खान-पान उपलब्ध हैं। एक हजार से शुरू होकर दिन 10,000 तक के कमरे आपकी जेब के मुताबिक उपलब्घ हैं। लेकिन यदि हम मानसिक अस्वस्थ लोगों के लिए अस्पताल तलाश करने निकलें तो बेहद कम मिलेंगे। दिल्ली में सरकारी अस्पतालों जिसमें मानसिक रोगियों के लिए उपलब्ध हैं उनमें वीमहांस और इबहास हैं। इन दो अस्पतालों के छोड़ दें तो प्राइवेट अस्पताल में भी चिकित्सा उपलब्ध हैं लेकिन उसके खर्चे ज़्यादा हैं।
वैश्विक स्तर पर नज़र दौड़ाएं तो पाएंगे कि विभिन्न कारणों से व्यक्ति एक्यूट एंजाइटी, दुश्चिंता और अवसाद का शिकार है। तनाव तो है ही साथ ही अकेलापन भी एक बड़ी वज़ह है कि लोग देखने मे ंतो स्वस्थ लगता हैं लेकिन अंदर टूटे हुए और बिखरे हुए होते हैं। ऐसे लोगों को अकेला छोड़ना कहीं भी किसी भी सूरत में मानवीय नहीं माना जाएगा। गौरतलब हो कि 2007-8 में जब वैश्विक मंदी को दौर आया था तब वैश्विक स्तर पर लोग डिप्रेशन के शिकार हुए थे। लोगों की जॉब रातां रात चली गई थी। शादी के लिए तैयार लड़की शादी के करने से इंकार कर दिया था। आंकड़े तो यह भी बताते हैं कि डेंटिस्ट पास दांत दर्द के रोगियों की संख्या में बढ़ोत्तरी दर्ज़ की गई थी। हालांकि प्रमाणिकतौर पर आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं लेकिन मानसिकतौर पर टूटे हुए और तनावग्रस्त लोगों की संख्या ऐसे अस्पतालों में बढ़ी थी। याद हो कि तब की मीडिया ने अगस्त सितंबर 2008 के बाद वैश्विक मंदी में जॉब गवां चुके लोगों की ख़बरें भी छपना बंद कर चुकी थी। ऐसे में इस प्रकार के आंकड़े निकलाना ज़रा मुश्किल काम रहा कि कितने प्रतिशत लोग मानसिक अस्थिरता की वजह से मनोचिकित्सकों की मदद ली।



Thursday, October 4, 2018

झेलम की कहानी



कौशलेंद्र प्रपन्न

‘‘शाम पांच बजे पूणे से चली थी। भोपाल, आगरा, मथुरा फरीदाबाद पार करतीह हुई दिल्ली पुहंची हूं रात के पौने नव बज रहे हैं। थक गई हूं। थोड़ा सुस्ता लूं फिर रात भर और दौड़ना है।’’
झेलम बुदबुदा रही थी। शाम और रात भर दौड़ती रही ट्रेन रात होते होते थक सी गई थी। उसके पांवों से माने पहिए से आग की चिनगारियां निकल रही थीं। जब स्टेशन पर चीं चीं... कर रूकी। सबने देखा और और देख कर नजरअंदाज कर दिया। पूछोगे नहीं उस ट्रेन का नाम क्या है? जैसे हमारे नाम होते हैं उसी तरह हर ट्रेन के नाम होते हैं। उनके नंबर भी होते हैं। जैसे स्कूल में तुम्हें रोल नंबर मिलते हैं। उसी तरह ट्रेनों को भी रोल नबंर मिले होते हैं। उस ट्रेन का नाम था झेलम। उसे हमने 11077 नबंर दिया है। जब झेलम दिल्ली स्टेशन पर रूकी तो प्लेटफॉम ने उससे क्या बात किया होगा?
‘‘बहन थकती नहीं हो?’’
 ‘‘इतनी लंबी यात्रा करती हो। न जाने कितने ही स्टेशनों से गुजरती हुई चला करती हो।’’
प्लेटफॉम झेलम से बातें करना चाहता था। रास्ते की थकन दूर हो इसके लिए उसने झेलम को टोका। रात भर की यात्रा के बाद ट्रेन में पानी भी तो खत्म हो गया था। सो दिल्ली में झेलम को पानी मिला। थोड़ी देर सांसें लेने के बाद झेलम ने कहा ‘‘तुम तो एक ही जगह पर पड़े रहते हो, तुम्हें क्या मालूम रास्ते कितने लंबे होते हैं।’’ ‘‘थोड़ी देर सुस्ताने तो दो’’
तब तक प्लेंटफॉम पर सफाई वाले, पानी वाले, चिप्स वाले सब आ गए। ट्रेन चुपचुपा खड़ी थी उस दौरान प्लेटफॉम चुपचाप ट्रेन को निहार रहा था। अब ट्रेन ने चुटकी ली और कहने लगी-
‘‘मेरी यात्रा सुनोगे तो होश ही उड़ जाएंगे। बहुत दूर से आती हूं।’’ कहां कहां से गुजरती हूं सुन लोगों तो पता चलेगा तुम भी मेरे साथ घूमना चाहो’’
‘‘अब तुम भी सुबह सुबह मजे न लिया करो झेलम’’
‘‘मैं कहां जा पाउंगा?’’
‘‘मेरी किस्मत उतनी भी अच्छी कहां है जो देश-देश, जगह जगह घूमा करूं। मैं तो यहीं के यही रहता हूं। चुपचाप। देखता भर रहता हूं। कभी तुम आती हो, कभी डिबरू गढ़ आती है तो कभी शताब्दी। कहते हैं शताब्दी ज़रा शोख़ और नजाकत वाली है। उसमें चढने वाले भी मुझे तो अलग ही किस्म के लोग लगते हैं। उनके पास टीस टप्पर के बक्से, झोरा, बोरी भी नहीं होते’’
झेलम सुनते सुनते बीच में बोल पड़ी, ‘‘तुम्हें बस समय चाहिए। अपनी ही कहानी सुनाने की बेचैनी होती है।’’
 ‘‘तो मैं क्या कह रही थी कि मेरी यात्रा बड़ी ही लंबी है। कई राज्यों से गुजरती हुई यहां आती हूं। सूंघों सूंघों तो सही। तुम्हें आगरे का पेठा, मथुरा का पेड़ा, पूणे और मुंबई का आलू बटाटा, भोपाल का पोहा जलेबी की खूशबू आएगी।’’
‘‘अब तुम मुझे चिढ़ावो मत। यह सब बता कर। तुम अपने साथ ला नहीं सकती थी?’’
‘‘चलो यह तो बताओं तुम कहां से चलती हो और कहां तलक जाती हो? ज़रा हम भी तो सुनें।’’
‘‘ अभी मेरी बात पूरी ही कहां हुई। ज़रा सुनो तो। जब मैं करूक्षेत्र, अंबाला और पटियाला पहुंचती हूं तो वहां के वाह! छांछ और लस्सी के भरे परे ग्लास और पराठे!!!’’ मुंह में पानी आ जाएंगे। जब तुम्हें पता चलेगा कि पराठे पर उछलता मक्खन...’’
‘‘बस भी करो झेलम तुम तो जीना ना दोगी। अगर ला नहीं सकती तो ऐसे लजीज खानों के बारे में सुनाकर बेचैन मत किया करो।’’ थोड़ मचलते हुए प्लेटफॉम ने कहा
‘‘कहने वाले कहते हैं और मैंने भी सुना है कि तुम 51 इक्यावन घंटे चला करती हो।’’
‘‘हां हां सच है यह तो। लेकिन सच यह भी है कि कई बार जब देर होती हूं तो वह साठ घंटे भी हो जाते हैं।’’
‘‘कितनी थक जाती होगी है न?’’ प्लेटफॉम ने संजीदगी के साथ कहा।
‘‘अच्छा तो ये बताओ बहन इन घंटों में तुम तो मीलों का सफ़र कर लेती होगी?’’
‘‘हां मीलों कह लो या किलोमीटर। यही कोई 2,176 किलोमीटर की यात्रा करती हूं।’’
अब मुंह बाए प्लेटफॉम झेलम को देख रहा था। प्लेटफॉम को मजाक करने का मन किया और कहने लगा-
‘‘ उफ!!! कितनी थक गई जाती हो। और तुम्हारे पांव दबा दूं।’’ आओ आओ शर्माओ मत।’’
झेलम को यह बात थोड़ी गुदगुदाने वाली लगी।
कहने लगी-
‘‘चलो रहने दो। देखने वाले क्या कहेंगे?’’
‘‘कुछ लोक लाज है या नहीं?’’
‘‘चलो प्लेटफॉम तुम से तो बातें होती रहेंगी। अब मैं तरोताज़ा हो गई हूं। आगे की यात्रा के लिए गार्ड साहब ने हरी झंड़ी भी दिखा दी है। देखते नहीं हो?’’
‘‘लोग मेरा इंतज़ार कुरूक्षेत्र में, अंबाला में और पटियाला से लेकर लुधियाना में कर रहे होंगे। तुम्हारीं बातों में फंस गई तो लेट हो जाउंगी। फिर वो लोग कहेंगे आज फिर देर हो गई।’’
‘‘अपना ख़्याल रखना झेलम....मममम’’
‘‘अच्छे से जाना और कल फिर मिलेंगे तुम्हारी ही बहन मिलेगी मुझे 11078’’
‘‘उसे मेरा हलो बोलना....’’
और झेलम प्लेटफॉम से सरकने लगी।

Monday, October 1, 2018

मी टू यौन शोषण का शिकार


कौशलेंद्र प्रपन्न
मी टू हैश टैग लगा कर अपनी कहानी कहने का इन दिनों एक फैशन सा हो गया है। हालांकि ऐसी कहानियां होती बड़ी दर्दीली हैं। जो इससे गुजरा होता है उसका दर्द वही समझ और महसूस सकता है। वह चाहे बचपन में भोगा हो या फिर बड़े होने के बाद। घर में ऐसी घटना हुई हो या फिर कॉलेज में। कॉलेज के बाद जॉब करने के दौरान ऐसे हादसों से गुजरना हुआ हो आदि। ऐसी घटनाओं से जो निकल कर बाहर आ पाएं। ख्ुद को संभाल पाए वो तो तारीफ के काबिल हैं ही साथ ही अपनी दर्दनाक घटना को एक बड़े मंच पर स्वीकार करना माद्दे की बात होती है। हर कोई अपने यौनशोषण की घटना को न तो स्वीकार करता है और न ही बड़े मंचों पर कहने की ताकत रखता है। यह दरअसल अतीत में घटित घटना को याद करना वास्तव में पुरानी दर्दीले एहसास से गुजरना ही है।
हिन्दी साहित्य हो या अन्य भारतीय साहित्य की विधाएं कथा-कहानी एवं उपन्यास आदि इस मसले को शिद्दत से बतौर विषय चुने हैं। इस कहानियों व उपन्यासों में पात्रों के चुनाव और उनके साथ बरताव बेहद संजीदा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर फिल्मों में भी इस विषय को गंभीरता से उठाया गया है। मसलन मॉनसून बेडिंग, चांदनी बार आदि। इन फिल्मों में बाल यौनशोषण को संजीदगी के साथ उठाया गया है। समाज में विभिन्न किस्म के पात्र वैसे ही उपलब्ध हैं जैसे कथा कहानियों में हुआ करते हैं। ज़रूरत न केवल जागरूकता की है बल्कि ऐसे मसलों के प्रति आवाज उठाने की भी है। यदि हम चुप बैठ जाते हैं तो कहीं न कहीं ऐसे मनोवृत्ति वालों को बढ़ावा ही देते हैं।
इन दिनों पद्मा लक्ष्मी ने अपने बचपन की घटित घटना को मीडिया के सामने स्वीकार किया। उसने स्वीकार किया कि कैसे उसके पापा के दोस्त ने उसके साथ अश्लील बरताव किए। कहां कहां नहीं छूए। जहां छूना या स्पर्श करना वर्जित है उन स्थानों को उत्तेजित किया। पिछले दिनों एक अंग्रेजी अख़बार ने पद्मा लक्ष्मी की अतीतीय दर्दभरी घटना को प्रमुखता से अपने यहा स्थान दिया। पद्मा लक्ष्मी बताते चलें कि ये सलमान रूशदी की पत्नी रही हैं और वैश्विक स्तर पर अपनी अलग पहचान के लिए जानी भी जाती हैं। इधर इनकी कहानी आई उधर भारतीय फिल्म जगत की एक और अदाकारा की कहानी बाहर आई। उन्होंने स्वीकार किया कि उनके साथ यही कोई दस साल पहले नाना पाटेकर ने सही बरताव नहीं किया था। मानसिक और शारीरिक तौर पर तथाकथित शोषण किया गया। यही वजह है कि वो भारतीय फिल्म जगत को अलविदा कह गईं। इस ख़बर के उद्घाटन के बाद तर्क-प्रतितर्क, पक्ष प्रतिपक्ष के जवाब भी मीडिया में आने लगे। जो भी हो दस साल पहले घटित घटना को भूलने व बिसुराने की बजाए आज उन्हें ताजा करना क्या प्रासंगिक हैं? क्या दुबारा उसी मनोदशा को जीना उचित है? मनोविज्ञान में कहा जाता है कि अतीतीय दुखद घटना को जितना याद किया जाए वह उतना ही दुखदायी होता है। बेहतर है कि दुखद घटनाओं को अतीत में छोड़ दिया जाए।
यह एक मानवीय संवेदना है कि हम अकसर स्मृतियों जीया करते हैं। स्मृतियां यानी अतीत की यादों में अपना काफी समय जाया किया करते हैं। उन्हीं घटनाओं में हम सूख के एहसास से भर उठते हैं। जबकि वह हमारा निजी अनुभव होता है। संभव है वह हम किसी और से साझा भी न करना चाहें। लेकिन हम इसलिए साझा किया करते हैं क्योंकि हमें कई बार गर्व का एहसास होता है। कई बार अपनी शेखी बघारने का पल लगता है। वैसे माना जाता है कि अतीत में जाना कई बार जोख़िम भरा होता है। हम अतीत में चले तो जाते हैं लेकिन लौटना हमें नहीं आता। हम अतीत से मार्गदर्शन व सीख हासिल करने की बजाए वहीं उन्हीं घटनाओं में अटक जाते हैं। अतीत की संवेदना हमें कहीं दुखद कर जाता है।
 

Sunday, September 30, 2018

संघर्ष से पूरे होते सपनों की कहानी सूई धागा





कौशलेंद्र प्रपन्न

कोई लंबे समय तक अपनी पुश्तैनी काम को नकार नहीं सकता। लेकिन आज दौर ही ऐसा आ चुका है कि हम अपने पारंपरिक व्यवसाय को छोड़कर बाजार में उतर चुके हैं। बेशक हमें अपनी अस्मिता को गिरवी रखकर हजार पांच हजार मिले शायद हम उसी में खुश हो जाते हैंं। लेकिन हम यानी एकल नहीं होते। बल्कि हम में मां-बाप, पत्नी, बच्चे भी होते हैं। हम अकेले तो कुत्ता बन सकते हैं। अपने बॉस या मालिक की चिरौरी कर सकते हैं। लेकिन घर वालों को यह नागवार गुजर सकता है। यही हुआ है सूई धागा फिल्म में। पति को कुत्ता बनना। मसखरे कर मालिक को दिखाना आदि उस एक व्यक्ति के लिए कोई खास मायने नहीं रखा लेकिन पत्नी और मां-बाप को यह नापसंद रहा। पत्नी से जतला भी दिया। यह एक टर्निंग प्वांइंट है। जहां एक बेइज्जत को सहने को पीछे छोड़ अपनी दुकान लगाने य कह लें सड़क पर सिलाई कटाई करने को ठानना कोई आसान निर्णन नहीं था।

दूसरी टर्निंग प्वांइंट तब आता है जब एक साधारण से व्यक्ति के आइडिया एवं कौशल का नाजायज फायदा उठाया जाता है। एक बड़ी कंपनी एवं कंपनी के घाघ लोग कमतर साबित कर दूसरे के कर्म को नकार कर सड़क पर ला देते हैं। किन्तु सपने देखना और पूरे होने के बीच एक लंबी लड़ाई है जिसे इस फिल्म में मुकाम तक पहुंचाने की कोशिश की गई है।

एक साधारण व्यक्ति और समष्टि के संघर्ष को बड़े मंच और प्लेटफॉम पर पहचान मिली और सम्मान भी। सो एक बार को लगता है कि महज हार मान कर बैठ जाना हमें हमारे सपनां से दूर तो ले जा सकता है लेकिन खत्म नहीं कर सकता।

अंतोत्गत्वा जीत संघर्ष की होती है। सपने भी पूरे होते हैं। रास्ते के रोड़े यूं ही बीच राह में पड़े रह जाते हैं। हम चलने वाले आगे निकल जाया करते हैं।

Friday, September 28, 2018

केयर टेकर रखिए, सब ख्ुश रहेंगे


कौशलेंद्र प्रपन्न
संयुक्त परिवार होने ही चाहिए उसके एक तर्क में यह भी शामिल कर लें कि जब घर में कोई पेट से होता था तो पूरा घर उसकी मदद के लिए हाज़िर होता था। क्या छोटे बच्चे और क्या बड़े सभी का सहयोग उस औरत को मिला करता था। एकल परिवार के सामने आज सबसे बड़ी समस्या यह है कि कहने वाले तो कह कह कर बेटे बहु को तंग ओ तंग कर देंगे। इधर बहु घर में प्रवेश की नहीं कि ममिया सास, फुफुसास, ददिया सास, खुद की सास आदि सब कहने लगते हैं बस इसी दिन के लिए ज़िंदा हैं। बस एक पोता दे दे। देरी मत करना। सुनते हैं कि आज के बच्चे बच्चे करने में देर किया करते हैं। एक ओर हमें देखो! छह छह बच्चे पाल पोस कर बड़ा कर दिए और आज की छोरियां ने एक बच्चा भी पालना दुभर है। कहने वाले खूब कहेंगे। कई सारे वास्ते देंगे। और यही से शुरू होती है एक ऐसी कहानी जिसका सिरा पकड़कर आगे बढ़ें तो पूरी कहानी समझते देर नहीं लगेगी। आपने बच्चा करने की प्लानिंग नहीं की तो भी कहने वाले घर-दफ्तर, राह चलते भी मिल जाएंगे। कहेंगे अब प्लांन कर लो देरी हो रही है। कमाल की बात है कि किस बात की देरी साहब! क्या हमारे एक बच्चे के न आने से देश की अर्थ व्यवस्था ठहर तो नहीं गई। कहीं उस एक बच्चे की बजह से कोई युद्ध अनिर्णय का शिकार तो नहीं हो गया? ऐसा कुछ भी नहीं है। आप भी बच्चा कर लें। आप भी घर के चक्कर में उलझे रहें। न दिन सोएं न रात में चैन ले पाएं। यही तो दुनिया उनकी है जिनके पास करने को दूध, पोतड़े धोना, स्कूली की तलाश में दफ्तर से जल्दी आना या छुट्टियां करना आदि। इन्हीं उलझनों में ढिलमिलाते लोगों को यह ज़रा भी गवारा नहीं की फलां इतना छुट्टा कैसे है? कैसे वह साल में दो बार घूमने चला जाता है। इन्हीं आजादियों को खत्म करने की पीड़ा उन्हें सताती हैं जो कहा करते हैं अब तो कर लो। कर भी लो। उनकी बात नहीं मानेंगे तो कहा करेंगे- हम तो तुम्हारी ही भलाई की बात कर रहे हैं। लेकिन सुनता कौन है। बुढ़ापे का सहारा तो कोई होना ही चाहिए। मन में आता है कि पूछ बैठें कि फलां चाचा के तो छह छह बच्चे हैं। तीन बेटे और तीन बेटियां। दूर न जाईए, मामी को ही देख लें उनके भी तो पांच बच्चे हुए। आज मामा मामी अकेले ही घर में खाना बनाते, बाथरूम में कभी भी गिरती मामी हैं। बच्चे फोन पर पूछ लिया करते हैं देख कर रहा करो। अंधेरे में न निकला करो। दाई रख लो। खाना बनाने वाली रख देता हूं। आदि। उन्हीं बुढ़ापे के सहारे की तो आप बात नहीं कर रहे हैं। तर्कों को क्या है जितने मुंह उतने तर्क। क्यों बच्चा करना ही चाहिए।
जब संयुक्त परिवार टूटा तो दादी, चाची, चाचा, दादा भी तो पीछे छूट गए। बहुरिया पेट से है तो ख्ुद ही संभलती है, गिरती पड़ती आफिस जाती है। देर तक काम करने के बाद भी पति का पेट भरती है। खाना बनाती है। सब कुछ किया करती है। लेकिन कितनी मुश्किलें उठाती है इसका अनुमान शायद आप न लगा पाएं। क्योंकि आप तो सीधे कह बैठेंगे कामवाली क्यों नहीं रख लेते। ठीक ठाक कमाते हो। पैसे की क्या कमी है। अब उन्हें क्या मालूम कि पैसे कितने कमाते हैं और कितने खर्चें हैं। ऐसे रायबहादुरों की बातों में आ गए तो समझें आप तनाव में आएंगे ही। लेकिन वे राय देने में पीछे नहीं हटते। पिछले ही दिनों तो उन्होंने बताया था कि फलां के घर बच्चा हुआ तो जापे वाली रखी गई। अब आप मायने पूछेंगे? ऐसी औरत जो दो माह तक जच्चा बच्चा का ख़याल रखा करती है। घर का कोई और काम नहीं करती। बस और बस मां और बच्चे की सेवा करती है। दो माह बाद उसकी भूमिका बदल जाती है। घर बदल जाता है और बदलता है बच्चा और मां।
आज क्या दिल्ली और क्या बंबे हर महानगर में जापा वाली उपलब्ध हैं। न मां की चिरौरी, न सास का इंतज़ार। न भाई-भौजाई मुंह फुलाएंगे और न बहने कटने लगेंगी। जब आप जापा और घर में काम वाली पूरे दिनभर के लिए रख लेंगे। उनकी चिंता भी जायज है कि क्या हमें दफ्तर से छुट्टी लेकर अस्पताल में रूकना होगा? क्या में घर सेवा टहल करना होगा आदि। इन्हीं चिंताओं में उनके फोन आने बंद हो गए। कहीं रात बिरात बुलावा न आ जाएं। यदि उन फोनों को सुनना चाहते हैं, यदि आप चाहते हैं आपसी रिश्ते बने रहें तो रख लीजिए जापे वाली और बता दीजिए सब को डरने की कोई बात नहीं। आईए और मौज कीजिए। मन भर जाए तो घर जाईए।
जापा कहें या दाई कहें, चाइर्ल्ड केयर टेकर कहें नाम पर मत जाईए। नाम में कुछ भी नहीं रखा। बल्कि काम ख़ास है। एक धनी व्यक्ति पाचस से लेकर लाख रुपए में ऐसी दाई व केयर टेकर रखते हैं जो दिन रात जब तक चाहें वह पूरे मनोयोग से बच्चे का ख़याल रखेंगी। आपके साथ विदेश से लेकर देश भ्रमण भी करेगी। नाते-रिश्तेदारों के यहां भी आपके साथ ही डोला करेंगी। गोया आपकी और आपके बच्चे की वही सच्ची रिश्तेदार है। अब देखें करीना कपूर के बच्चे का देखभाल जो स्त्री करती है उसकी माह की सैलरी डेढ लाख से ज़्यादा है। कभी कभी पौने दो लाख भी हो जाता है। परेशान न हों। जिसकी जितनी जे़ेब उसकी वैसी केयर टेकर। पूरे दिन और पूरी रात रहने वाली बच्चियां या औरतें भी मिला करती हैंं जो आपको चैन की नींद मुहैया करा सकती हैं। जेब ढीली करनी पड़ेगी। शायद बीस से तीस हज़ार माह का खर्च कर सकते हैं तो किसी भी नाते-रिश्तेदारों की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। वैसे भी किसके पास वक़्त है जो तदन चार दिन आपके घर सेवा टहल या देख भाल करे। आप कौन या किसी के घर रूककर उसकी मदद करने जाते हैं। कहने वाले कह देंगे वो कौन या आए थे?

Thursday, September 27, 2018

कभी कभी यूं ही चुप बैठना


कौशलेंद्र प्रपन्न
हम कितना बोलते हैं। जितना बोलते हैं उस अनुपात में सुनते कम हैं। कई बार इतने बोलते हैं कि सुनने के सुख से वंचित रह जाते हैं। जो जितना ज्यादा बोलता है वह उतना ही सुनने की कला में कमजोर माना जाता है। कभी ख्ुद को अकेले में सुनने की कोशिश कीजिए हम तब अंदर की आवाज सुन पाते हैं। हालांकि सुनने के लिए खाली भी होना पड़ता है। खाली यानी पूरी तरह से बाहरी प्रभावों से अलग। किन्तु वही तो नहीं हो पाता। हम सुनने की बजाए सुनाने पर ज्यादा वक्त दिया करते हैं।
कभी किसी नदी के करीब या फिर किसी छोटी सी पुलिया पर बैठ कर शाम गुजारने का अपना ही अलग आनंद है। हालांकि अब न छोटी पुलिया रही और न महानगर में नदी। दोनों के ही स्वरूप बदल चकी हैं। नदी नाले में तब्दील हो चुकी है और पुलिया बड़े बड़े फ्लाईओवर में। जिसपर हजारों हजार गाड़ियां लगातार दिन रात गुजरा करती हैं। जिनके पास से पगडं़डी भी गायब हो चुकी हैं।
नदी के किनारे बैठ कर बस चुपचाप धार को देखना और धार के प्रवाह को महसूसना एक अलग किस्म का अनुभव है। कई बार लगता है क्या सुखद एहसास है बस मौन बिना कुछ बोले नदी को सुनना और देखना। जो हमसे पहले थी और शायद हमारे जाने के बाद भी वहीं रहा करेगी।

Tuesday, September 25, 2018

कहानी कहिए ज़नाब, सुनते हैं हम



कहने सुनने को क्या कुछ नहीं है। किसके पास सुनने को कहानी नहीं है! सब के पास एक से बढ़कर एक कहानी है। जॉब से सबंधित। लाइफ से जुड़ी हुई। सोशल मीडिया के दर्द। और न जाने कितनी कहानियां से भरे हुए हैं हम सब। बस एक बार छेड़ कर तो देखिए। बलबला कर कहानियां बहने लगती हैं। याने कहानी जिं़दगी ही कहानियों से बनी है। एक के बाद कहानियां हमारी लाइफ में बनती और प्रसारित होती हैं। कहने वाले कहते हैंं यदि आपके पास कहन है। आपको मालूम है कि कैसे अपनी बात दूसरे को सुननी है, तो हर कोई सुनता है। सुनेगा कैसे नहीं। सुनाने वाला चाहिए। एक ऐसा स्टोरी टेलर जो अपनी बात कहने और सुनने में दक्ष हो। आज की तारीख़ में सुनने वालों की ज़रा सी भी कमी नहीं है। बस यदि आपके पास सुनने का कौशल है तो सुनने वाले तो तैयार बैठे हैं। सोशल मीडिया के बरक्स यदि हम कोई और विकल्प श्रोताओं को मुहैया करा सकें तो इससे बेहतर और कुछ नहीं हो सकता।
हम सोशल मीडिया या फिर अन्य माध्यमों के मार्फत अपनी या फिर दूसरों की कहानियों का आनंद ही तो लिया या दिया करते हैं। कौन कहां गया? क्या खाया? कहां घूम रहा है आदि की जानकारियां लिया और दिया करते हैं। कई बार खुश होते हैं आपनी निजी पलों को और के संग बांटकर तो कई बार जानकर कि कौन क्या कर रहा है? किसकी जिंदगी में अब नए मेहमानों का आगमन हो चुका है आदि। दरअसल मनुष्य एक ऐसा ही जीव है तो खाली नहीं बैठ सकता। या तो अपने अतीत की कहानियां सुनाया करता है या फिर सुनने में दिलचस्पी रखा करता है।
आप कितनी कुशलता के साथ अपनी या औरों की कहानी सुना सकते हैं यह मायने रखता है। इन दिनों कॉर्पोरेट सेक्टर में कहानी सुनाने और कहने वालों की काफी मांग है। ऐसे स्टोरी टेलर जो छोटी छोटी घटनाओं और रेज़मर्रें की जिं़दगी से जुड़ी घटनाओं के तार को जोड़कर मैनेजमेंट के औज़ारों से रू ब रू कराया करते हैं। एक मैनेजर कैसे अपनी टीम के साथ बरताव करे, कैसे प्रोजेक्ट को सफल बनाए आदि सैद्धांतिक चीजों को स्टोरी के ज़रिए साझा किया करते हैं। एक एक सेशन के चार्ज कम से कम दस हज़ार हुआ करती हैं। उनमें क्या ख़ास बात है? यदि कुछ ख़ास है तो क्या हम स्टोरी टेलिंग के कौशल नहीं सीख सकते? एक सवाल यह भी है इन कहानियों में होता क्या है? कहानियों में हमारा जीवन दर्शन और लाइफ के उतर-चढ़ ही तो दर्ज हुआ करती हैं। फलां के जीवन में ऐसा हुआ तो उसने कैसी कैसी तरकीबें अपनाई और उस स्थिति से बाहर हो गया। हमें उन कहानियों कई बार रास्ते और उम्मींद की रोशनी मिला करती है।
दरअसल हम कहानियों से ज़्यादा समझा करते हैं बजाय कि सिद्धांत के। सिद्धांततः तो बहुत सी चीजें सुना और दूसरे कान से निकाल दिया करते हैं। लेकिन जब दादी नानी या दोस्त कहानियां सुनाया करते हैं तब हमारी दिलचस्पी बढ़ जाती है। क्योंकि यहां पर कहन पर काफी कुछ निर्भर करता है कि कौन किस स्तर का और कितनी दिलचस्पी लेकर आपबीती या दूसरों पर गुजरी बातें बता रहा है। गली मुहल्ले में ऐसी औरतें या पुरूष हुआ करते हैं जिनके पास कहने का कौशल होता है और दिन भर इधर उधर की कहानियां सुनाया करते हैं। लेकिन हमें यहां एक अंतर या रेखा खींचकर ही समझना होगा कि कहानी कहने और निंदारस लेने व देनें में बुनियादी अंतर हुआ करता है। जैसा कि ऊपर जिक्र किया गया कि कॉर्पोरेट सेक्टर में कहानी के ज़रिए बड़ी से बड़ी और छोटी से छोटी घटनाओं और बातों को लोगों तक पहुंचाई जाती हैं। मैनेजमेंट की क्लासेज में भी केस स्टडी मुहैया कराई जाती हैं। बताया जाता है कि फलां कंपनी में फलां कर्मचारी काम करते हैं। वहां पर लोग छुट्टियां ज्यादा करते हैं। ऐसे में एक मैनेजर के तौर पर आप उसे कैसे हैंडल करेंगे। दूसरा उदाहरण यह भी हो सकता है कि फलां कंपनी पिछले दो तीन सालों से घाटे में जा रही थी। प्रोडक्शन समय पर नहीं हो रहा था। लेकिन जब नए मैनेजर व लीडर को नियुक्त किया गया तो उन्होंने कंपनी को छह माह में ही कमियों से निकाल कर सारी चीजें समय पर और लक्ष्य के अनुसार चलाने में सक्षम हो सके। इस प्रकार कह कहानी जिसे हम केस स्टडी का नाम दे सकते हैं। मैनेजमेंट के नए नए छात्र इन्हें पढ़ा करते हैं। और देखा करते हैं कि कैसे व्यवहार में सिद्धांत को उतारा जाए।
सिद्धांतों को व्यवहार में कैसे ढाला जाया व कैसे एक सफल लीडर ने सिद्धांतों को व्यवहार में लाकर कंपनी व संस्था को नई ऊंचाई तक ले जाने में सफल हुआ उनकी कहानी सुन और पढ़कर हम जल्द सीखा करते हैं। यह अलग विमर्श का मुद्दा हो सकता है कि हमारी सोशलाइजेशन कई बार सिद्धांतों और व्याकरणों से ही हुई हैं। उसमें स्कूल, पाठ्यक्रम और पाठ्यपुस्तकें काफी हद तक एक रूढ़ परंपरा को ही पोषित करती हैं। जबकि मैनेजमेंट में हर चीज को टेस्ट कर और व्यवहार में कैसे इस्तमाल कर सत्यापित किया जाए आदि चीजें होती हैं। शायद इसलिए भी एक सफल लीडर व मैंनेजर की वज़ह से कंपनी व संस्था नई नई ऊंचाइयां हासिल किया करती हैं। हमें समझना यह है कि नए लीडर में यदि दृष्टि और विज़न को पूरा करने की रणनीति- निर्माण से लेकर एक्जीक्यूट करने की क्षमता एवं कौशल है तो यह किसी भी प्रोजेक्ट को विकास के राह पर दौड़ा सकता है। यह एक कहानी है। इस कहानी को कंपनियां अपने अन्य कर्मचारियों के बीच साझा किया करते हैं। यही कहानी जब एक प्रोफेशनल स्टोरी टेलर उठाता है तो उसके साथ उसका बरताव बिल्कुल अगल होता है। यहां जब हम स्टोरी व कहानी की बात कर रहे हैं तो वह एक अकादमिक कथाकार, उपन्यासकार की कहानी की एक ज़रा हट कर कहानी की बात हो रही है। ऐसी कहानी तो कई बार कथाकार की नजर से भी फिसल जाती हैं। ऐसी कहानियों को हम केस स्टडी भी कह सकते हैं।



Friday, September 21, 2018

सफाई करते मरना.... वो भी विकास के महानगर में



कौशलेंद्र प्रपन्न
वेद के मंत्रों में वर्णव्यवस्था के बारे में एक मंत्र में ‘‘ब्राह्मणस्य मुखमआश्रित, बाहु राजन्यकृत। उरूतदस्य यद वैश्वयः तद्भ्याम शुद्रो अजायत।।’’ इस में कहां  गया है कि समाज में चार वर्ण हैं जो अपने अपने कर्मों व भाग्य की वजह से विभक्त हैं। ब्राह्म्ण सिर के समान। बाजू के समान क्षत्रिय, वैश्विय उदर के समान और पांव के समान शुद्र। हालांकि इस मंख् की भी काफी आलोचनाएं हुईं। साथ ही मनु के सिद्धांतों को भी आलोचना का शिकार होना पड़ा है। जो भी हो गांधी जी की नजर में जो समाज के नीचले पायदान पर हैं उन्हें भी समाज में विकास के साथ दौड़ने और कदम से कदम मिला कर चलने का अधिकार है।
हाल में दिल्ली में मेन हॉल में उतरे एक सफाई कर्मचारी की मौत हो गई। इस तरह से दिल्ली में पिछले एक सप्ताह में छह मौतें हो चुकी हैं। आंकड़े बताते हैं कि पिछले साल ऐसे सफाई कर्मचारियों की मौतें तकरीबन 300 थीं। जो नाले, मेन हॉल में उतरने के बाद मौत के शिकार हुए। वजहें बताते हैं कि दम घुटने, पर्याप्त जीवन रक्षक संसाधन की कमी से कर्मचारी को अपनी जान गंवानी पड़ी।
रमन मैग्सासे सम्मान से सम्मानित बिजवॉड विल्सन से मिलने और इस मसले पर चर्चा करने का अवसर मिला। इनसे बातचीत में कई बातें स्पष्ट हुईं कि भारत में तकनीक के प्रयोग से काफी हद तक मौतों को रोका जा सकता है। पहली बात तो यही कि मानवीय स्तर पर मेन हॉल में उतरने और सफाई से बचा जा सकता है। आज तकनीक का समय है और हमें यदि ज़रूरी ही हो तो नए नए तकनीक का प्रयोग कर सकते हैं।

Thursday, September 20, 2018

मन आहत हो तो क्या कीजै



कौशलेंद्र प्रपन्न
मन न हुआ गोया खिलौना हो गया। जब मन भर जाए तो तोड़ दीजिए। फोड़ दीजिए। नया खिलौना लेकर आएंगे। आजकल हमारा दिल और दिमाग हमारे हाथ में नहीं है। बल्कि हमारा मन कहीं और किसी और से संचालित होता है। एक कहानी बचपन में सुनी थी। वह कहानी कुछ यूं है- एक राजकुमारी थी। बहुत सुंदर। लेकिन उसकी आत्मा दूर जंगल में किसी पेड़ पर रहने वाले सुग्गा में बसा करता था। उधर सुग्गा के पांव मरोड़ो तो इधर राजकुमारी के पांव में ऐठन महसूस होती थी। कहानी भी दिलचस्प है। वह राजकुमारी कैसे जिं़दा थी। उसकी आत्मा बाहर रहा करती थी।
आजकल हमारा मन और आत्मा हमारे पास नहीं रहा करता। उस राजकुमारी के तर्ज़ पर हमारी आत्मा और आत्म विश्वास, हमारी प्रतिष्ठा और नाक दूसरों के हाथों में हुआ करती हैं। वह कोई और नहीं बल्कि सोशल मीडिया है। इस सोशल मीडिया में हमारी आत्मा और आत्म सम्मान बसा करता है। उधर सोशल मीडिया पर किसी ने आपको ब्लॉक किया नहीं, कुछ ग़लत कमेंट किया नहीं, या इग्नोर किया नहीं कि इधर हमारे पेट में दर्द उठने लगता है। रातों की नींद उड़ जाती है। कैसा है न यह सोशल मीडिया भी।
हमारे ही बस में हमारा मन न रहा। कोई दूर बैठा हमारे मन को संचालित किया करता है। हमारी आत्मा और प्रतिष्ठा को तय किया करता है। हम कब कैसे और कहां आहत हो जाएं इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है। आज की तारीख़ में जो भी सोशल मीडिया में सक्रिय हैं उनसे कभी अकेले में पूछ लें, कैसे हैं? क्या चल रहा है? इसका जवाब आपको ठगा सा कर देगा। कहेंगे, आप फेसबुक पर नहीं हैं? देखा नहीं मेरे पोस्ट पर कितने कमेंट आए। मैंने फलां फलां को ब्लॉक कर दिया। बड़े नवाब बना करते थे। आपक वाट्सएप पर तो होंगे? होंगे न? मैं आपका अपनी ताजा कविता भेजता हूं। पढ़िएगा ज़रूर। इसपर फल्नीं ने क्या खूब कमेंट किया है। इसे मैंने वहां वहां जहां तहां हर जगह गाया और पाठ किया है। आप भी सोचेंगे क्या पूछा बैठा।
गोया कई बार लगता है कि हमारी जिंदगी इस सोशल मीडिया ने कैसे गडपनारायण कर लिया। हाल समाचार पूछो तो इनके पास कमेंट और लाइक के अलावा और कुछ कहने को बचा नहीं। जब हम सोशल मीडिया पर इतने सक्रिय होंगे तो सच में समाज के संवाद की परंपरा में पिछड़ते ही जाएंगे। कभी भी कहीं भी जाएं सबके हाथ में एक टूनटूना होता है। उसे ही बैठकर, सो कर, चलते हुए बजाते रहते हैं। कुछ भी न आया हो लेकिन मजाल है आप उसे टटोलने से बच जाएं। कभी कभी तो ऐसा भी महसूस होता है कि हम जितनी दफा अपनी सांसों को महसूस नहीं करते उससे कहीं ज़्यादा एफबी और अन्य सोशल मीडिया के कान में अंगुली किया करते हैं। गोया वहीं से हमें सांसें मिला करती हैं। शायद वह खिड़की हैं जहां से ताज़ी हवाएं आया करती हैं। कभी इस झरोखों से बाहर भी झांक आईए जनाब जहां और भी हैं। वहां आपको सच्चे मित्र मिला करेंगे।

Wednesday, September 19, 2018

प्रतिउत्तर न मिलने की उदासी


कौशलेंद्र प्रपन्न
अब हमें फर्क नहीं पड़ता कि कौन हमसे बात करता है या नहीं करता। हमें इस बात की भी ज़्यादा चिंता नहीं होती कि कौन हमारे घर आना-जाना छोड़ चुका है। हमें तो इसकी भी ख़बर नहीं रहती कि हमारे दोस्त, नाते रिश्तेदार कब से हमारे घर नहीं आए। हमें चिंता इस बात की ज़्यादा होती है कि कौन हमारे फेसबुक पर, ट्वीट्र पर लाइक किया कि नहीं। किसने रिट्वीट किया। किसने फेसबुक पर कमेंट किया और किसने इनोर किया। हम सोशल मीडिया के मूड से गवर्न होने लगे हैं। हम यह नहीं कहते कि हवाओं के रूख़ के संग न बहा जाए। बहना ही जीना है। और जीना ही बहना है। जो रूक गया। जो ठहर गया समझो मर गया।
हमें इसकी चिंता रोज सताती है कि किसने मुझे मेरे पोस्ट पर कमेंट किया और किसने नहीं। हमने तो उसके पोस्ट और फोटो पर खूब सारी बातें लिखी थीं। लिखी थीं कि क्या खूब लग रहे हो। कहां हो आजकल। आदि आदि।
हमें चिंता इस बात की होती है कि और रात भर नींद नहीं आती। गाहे बगाहे नींद खुल जाए तो फेसबुक के पेट में हाथ डाल कर टटोलना नहीं भूलते कि कल रात जो पोस्ट की थी उसे देखने, पसंद करने और कमेंट करने वाले कौन कौन है और कितने हैं?
हमारी आज की मनःस्थिति काफीहद तक इन्हीं सोशल मीडिया के रूख़ से तय हुआ करते हैं। जबकि जानते सभी हैं कि पोलिट्कली करेट रहने के लिए कई बार न चाहते हुए भी हम लाइक कर के आगे बढ़ जाते हैं। लेकिन यह नहीं जानते कि जिसने लाइक नहीं की वह भी कहीं न कहीं आपका उतना ही पसंद करता है जितना लाइक करने वाला। बेशक उसने आपको वहां पर कमेंट न दिया हो। लेकिन आपकी सराहना हमेशा ही किया करता है।
फर्ज कीजिए आपने किसी को कोई मैसेज भेजे। वह माध्यम कोई भी हो सकता है। आज की तारीख़ में वाट्सएप है जो ज़्यादा ही चलन में है। इसने मैसेज की परंपरा को पीछे छोड़ दिया। शायद फीचर एक बड़ा कारण है। इसमें क्या नहीं भेज सकते? संदेश तो छोटी सी सेवा है। चित्र, आवाज़ और न जाने क्या क्या। यहीं पर पुरानी मैसेज की चौहद्दी शुरू होती है। बहरहाल आपने किसी को संदेश भेजा। आपको मालूम है कि पाने वाला किसी भी संदेश को अनदेखा नहीं करता। बल्कि सरका बेशक दे लेकिन देखता ज़रूर है। वह जब आपके संदेश की प्रतिक्रिया या प्रतिउत्तर न दे तब कैसा महसूस होता है? यदि ज़रा सा भी संवेदनशील हैं तो अपने आप को ठगा सा महसूस करते हैं। अपने आप को उपेक्षित महसूस करते हैं। यहीं से संदेश भेजने वाले से हमारी एक रागात्मक उम्मीद बंध जाती है जो टूटती सी नज़र आती है। आप दो ही स्थितियों से गुजरते हैं। पहला, या तो बेशर्म होकर लगातार बिना उम्मीद किए संदेश भेजते रहते हैं और वह पाने वाला भी लगातार आपने संदेश को पीछे सरकाता रहता है। कई बार वह आपके लंबे संजीदे संदेश को अत्यंत लघु कर हम्म्मम!!!! में जवाब दे डालता है। आप उस स्थिति में कैसा महसूस करते हैं? मन तो यही करता होगा कि अब से कोई संवाद नहीं करूंगा। ख़ुद से वायदे भी करते होंगे कि अब से संदेश नहीं भेजूंगा। लेकिन फिर अगली सुबह अपने आप को रोक नहीं पाते और संदेश सरका देते हैं। दूसरी स्थिति यह हो सकती है कि आपने ठान ली कि अब उस व्यक्ति को संदेश ही नहीं भेजेंगे। और काफी हद तक आप उसपर अमल भी करते हैं। लेकिन पाने वाले पर कोई ख़ास असर नहीं पड़ता। पता नहीं हालांकि एक एकल अनुमान भी हो सकता है। लेकिन अमूमन यही होता है। जिसे आप इतनी शिद्दत से संदेश भेजा करते हैं उसकी नज़र में कोई ख़ास अहम नहीं रहा हो।
बुद्ध ने ठीक ही कहा था- दुख का कारण उम्मीद और अपेक्षा ही है। जब हम किसी और से उम्मीद करते हैं और यह किसी कारण से पूरा नहीं होता तब हम दुखी हो जाते हैं। हमारा मन और दिल दुखता है। लेकिन शायद मनुष्य की यही प्रकृति है वह उम्मीद बहुत जल्द पाल लेता है। और दुखी उसी क्रम में होता रहता है। जबकि यह किसे नहीं मालूम कि एरिया ऑर कंसर्न और एरिया ऑफ इन्फ्यूलेंस दो ऐसी चीजें हैं जिससे हमारा व्यवहार और मनोदशा भी तय हुआ करती हैं। जो हमारे हाथ में नहीं है यानी जो हमारे एरिया ऑफ कंसर्न से बाहर है उसे हम कंट्रोल नहीं कर सकते। क्योंकि उसका व्यवहार किसी और तत्वों और कारणों से प्रभावित और निर्मित हो रहा है। उसमें आपका कोई नियंत्रण नहीं है। हम बस इतना ही कर सकते हैं कि हम अपने व्यवहार को संतुलित कर सकते हैं। हम अपने व्यवहार को नियंत्रित कर सकते हैं ताकि सामने वाले का व्यवहार प्रभावित न हो। लेकिन अफ्सोसनाक स्थिति यही है कि हम अपने व्यवहार और मनोदशा को दूसरे के व्यवहार से नियंत्रित करने लगते हैं। दूसरे की इच्छा, पसंद, नापसंदगी से अपने को चलाने लगते हैं।
मैनेजमेंट का ही एक सिद्धांत है कि जो आपके प्रभाव व कार्यक्षेत्र से बाहर का है जिसपर आपका नियंत्रण नहीं है उसे स्वीकारना ही बेहतर है बजाए कि उसे सुधारने में अपनी क्षमता और ताकत झोंक देने के। क्योंकि आप किसी को प्रेम करने व घृणा करने में आज़ाद है किन्तु दूसरा भी आपसे उतना ही प्रेम करे या नापसंद करे इसका हमारा कोई नियंत्रण नहीं होता बल्कि हो भी नहीं सकता। दूसरे शब्दों में कहें तो हमारा एरिया ऑफ कंसर्न को यदि दुरुस्त करे लें तो काफी हद तक समस्या का हल निकाल सकते हैं।
बात महज इतनी सी है कि जवाब न मिलने पर हम उदास हो जाते हैं। यह एक मानवीय कमजोरी से ज़्यादा और कुछ नहीं है। यदि जवाब नहीं आया तो उसके कारणों को समझा जाए। क्यों ऐसा हुआ होगा? क्यों कोई आपके संदेश को नज़रअंदाज़ करता है? क्या वह संदेश प्रतिउत्तर की मांग करता है? क्या जवाब देना ज़रूरी है आदि। जब इसके कारणों की जड़ में जाएंगे तो महज ही समझ सकते हैं कि कोई तो ऐसी वज़ह नहीं होगी कि आपके संदेश को तवज्जो नहीं दिया गया। 


Tuesday, September 18, 2018

गाड़ी से बाहर कचरा फेंकते हैं हम


कौशलेंद्र प्रपन्न
स्वच्छता की जिम्मेदारी कायदे से सरकार से ज़्यादा हम नागरिकों की बनती है। सरकार कायदे कानून बना सकती है। हमें बता सकती है कि इस योजना में आपको कैसे जुड़ना है। आदि। लेकिन मूलतः स्वच्छता जैसे अभियानों को सफल बनाने में हम नागर समाज को आगे आना होगा। यूं तो वर्तमान सरकार पिछले चार वर्षों से स्वच्छता को अपना आंदोलन के तौर पर शुरू किया है। लेकिन देखा तो इससे उलट जाता है। हम एक ओर स्वच्छता अभियान में नारे लगा रहे होते हैं। वहीं दूसरी ओर गाड़ी में बैठते ही अपना खाया हुआ रैपर खिड़की खोल कर सड़क पर फेंक देते हैं। गोया सड़क न हुई चलता फिरता कूड़ादान हो।
किसे नहीं मालूम कि स्वच्छता जैसे काम को बेशक सरकार हमें जागृत करे किन्तु यह काम तो हमारा है। हमें अपनी आस-पास को साफ रखने में अपनी भूमिका सुनिश्चित करनी होगी। कोई बाहर का आकर एक या दो दिन तो कैम्पेन चला सकता है। लेकिन नियमित तौर पर हमें ही रख रखाव रखने होते हैं।
एक और दिलचस्प है कि एक ओर हम स्वच्छता का अभियान कर रहे होते हैं वहीं घर और घर के बाहर सारे कचरा उडे़ल रहे होते हैं। किसे नहीं पता कि तमाम एमसीडी अपने अपने क्षेत्र में मुफ्त में गाड़ियां चलाती हैं जो सुबह सुबह घर घर जाकर कचरे इकत्र करती हैं। लेकिन उसके बावजूद हम शाम में पार्क के आस-पास भी घर का कचरा डालने में गुरेज नहीं करते।
हाल ही में प्रधानमंत्री जी ने विभिन्न कॉर्पोरेट सेक्टर के सीएसआर को पत्र लिखा और उनसे इस अभियान में मदद मांगी। उन्होंने पत्र में लिखा है कि नागर समाज को स्वच्छ बनाने में कंपनियां आगे आएं। अब कौन कंपनी का मालिक होगा जो इस अनुरोध को मना कर सकता है। हर कोई प्रधानमंत्री जी के पत्र पर संज्ञान लेते हुए अपनी अपनी कंपनियों में अभियान में कैसे जुड़ें व कर सकते हैं इसकी एक रोड़ मैप प्रस्तुत करेंगे।
कितना अच्छा हो कि हम स्वयं बिना किसी और के जगाए स्वच्छता अभियान में अपनी सकारात्मक भूमिका अदा करें। आख़िरकार यह किसी और के लिए नहीं बल्कि हमारी ही जिं़दगी और स्वच्छ वातावरण के लिए है। 

Monday, September 17, 2018

रिश्तों में ऊष्मा बचाएं



कौशलेंद्र प्रपन्न
रिश्ते अपने पांवों से नहीं चलते। चल तो नहीं सकते। रिश्तों को चलने के लिए उसकी स्वयं की ताकत और ऊर्जा चाहिए होता है। इसके बिना रिश्ते बीच सफ़र में ही दम तोड़ देते हैं। हालांकि रिश्तों के दरमियान कई तरह के कई किस्म के उतार चढ़ाव भी आते हैं। यदि रिश्तों में जीवट उत्कंडा हो तो वह सूखे भी प्राण वायु खींच लिया करते हैं। यही कारण है कि कुछ रिश्ते सालों साल, बरस दर बरस जिं़दा रहती हैं। कितने भी सालों के बाद मिलो तो ज़रा भी फासलों का एहसास नहीं होता। गोया कल की ही तो बात है। कल ही तो घंटों बातें की थीं। वहीं कुछ रिश्ते ऐसे भी बन या बंध जाती हैं जिसमें लगातार घुटन सी महसूस होती है। लगता है क्या ही अच्छा हो कि तुरंत मिलना खत्म हो जाए और हम इस रिश्ते से बाहर हो जाएं। जीवन में हम ऐसे लाखों न सही कम से कम सौ से ज़्यादा रिश्तों में आते हैं जहां हमें कई बार मजबूरन रहना पड़ता है। जिन्हें निभाना बोझ लगता है वहीं कुछ तो रिश्ते ऐसे होते हैं जिनमें बेशक हम सालों साल न मिलें लेकिन उस रिश्ते की गरमाहट हम दूर रह कर भी महसूसा करते हैं। इन्हीं रिश्तों के बदौलत हम कई बार सांसें लेते हैं वरना मर न जाते।
रिश्ते मायने वे तमाम लोग शामिल हैं जिन्हें हम कभी न कभी यात्रा में मिले। कहीं काम करते हुए मिले। कभी यूं ही भटकते हुए मिले लेकिन सच्चे अर्थां में मिले। उनसे बिछुड़ने की टीस सदा हमारे साथ रहती है। हम अकसर उन्हें याद किया करते हैं जब भी कोई मिलती जुलती घटना या बातें चला करती हैं। तब तब वो लोग याद आया करते हैं। जब भी हम उन्हें याद करते हैं तब पूरे संदर्भों में याद किया करते हैं। ख़ासकर जो अब हमारे बीच नहीं रहे उन्हें तो बेहद याद किया करते हैं। उनके बोलने, उठने बैठने, प्रतिक्रिया करने के ख़ास अंदाज़ में। कोई कैसे ऐसे व्यक्ति को भूल सकता है जिससे बहुत कुछ सीखने, गुनने को मिला। मुझे अकसर लाल कृष्ण राव, कमल कांत बुद्धकर, प्रो ओ पी मिश्रा याद आते हैं जिन्होंने लिखना सीखाया। एल एन राव नहीं होते तो शायद लेखन की दुनिया में मेरा होना ही मुकम्म्ल नहीं होता। वहीं प्रो. एस एस भगत नहीं होते तो वेद पाठ की तालीम अधूरी ही रह जाती। ऐसे ही हमारे जीवन को आकार देने वाले प्राध्यापक, पत्रकार, लेखक, मित्र आदि होते हैं जिनसे हम कई बार न चाहते हुए भी सीख लिया करते हैं।
जहां तक रिश्तों में आने वाले मोड़ मुंहानों की बात करें तो रोज़ ही कोई न कोई हमें मिला करते हैं। जिनसे हम करीबीयत महसूसा करते हैं। बेशक परो़क्ष ही सही हमारा एक रागात्मक रिश्ता जुड़ जाता है। कई बार हम इन्हें कोई स्थाई या स्थापित नाम कम और छोटे पड़ते हैं। लेकिन हमारे इसी जीवन में ऐसे भी रिश्तों के डोर मिला करते हैं जिन्हें बगैर किसी नाम से जुड़े होते हैंं। ज़रूरी तो नहीं कि हम रिश्ते रोज़ाना ही जीया करें, मिला करें। ज़रूरी तो यह भी नहीं कि जिनसे जुड़े हैं उनसे रोज़ाना ही मुलाकात हो। लेकिन यह ज़रूरी है कि जिनसे भी स्नेह के धागे से बंधे हैं उन्हें जब भी मिलें। जहां भी बातें हों ज़रा भी एहसास न हो कि कितने दिनों बाद मिले। मिलने के बीच एक दूरी साफ न झलके। यह तभी संभव है जब हम मिलने में शिकायातों का पुलिंदा न खोलकर बैठ जाएं। महज फोन नहीं करते, मिलते नहीं, बड़े लोग हो गए हो आदि आदि। क्योंकि हर किसी के पास कहने और शिकायते करने के अपने अपने तर्क मौजूद हुआ करते हैं। जब शिकायत से मुलाकात या बात शुरू होती है तब कहीं न कहीं स्पष्ट और साफ दिल बातचीत संभव नहीं हो पाता।
रिश्तों को टूटने से बचाने के लिए ज़रूरी है कि दोनों ही प़़़क्ष अपनी अपनी प्राथमिकताएं और लगाव को जिं़दा रखें। सिर्फ रिश्ते एक तरफे नहीं चला करते। बल्कि यदि रिश्ते में गरमाहट एक महसूस कर रहा है तो वह भी दूसरे से ऐसी या इसी किस्म की बेचैनी महसूस करे। बल्कि उसे प्रकट करने का माद्दा भी रखता हो। तब मजाल है रिश्ते घिस जाएं या रिश्तों के दरमियान ठंढापन आ जाए।

Wednesday, September 12, 2018

बेचैन हैं मगर क्यों



कौशलेंद्र प्रपन्न
हम इंसानों की भी अजीब कहानी है। हम क्षण में खुश हो जाते हैं और पल में नाखुश। शायद अंदर से निराशा से भर उठते हैं। इस निराशा के कारण कई बार काफी स्पष्ट होते हैं। हम जानते हैं कि फलां की वजह से मन खिन्न है। फलां ने ऐसा क्यों बोल दिया। फलनी ने ऐसा बरताव क्यों किया आदि। लेकिन कई बार हमारा मन यूं ही न जाने क्यों उदास हो जाता है। जगजीत सिंह का गाया गज़ल याद आता है- ‘‘शाम से आंख में नमी सी है, फिर आज किसी की कमी सी है।’’
अगर कारण पता चल सके तो अपनी उदासी को दूर करने का प्रयास किया जाए। लेकिन हर बार ऐसा नहीं होता। बल्कि अकसर ही हमें अपनी उदासी का सबब नहीं मालूम होता। कुछ कुछ मिला मिला सा कारण होता है। किसी के व्यवहार से उदास हो जाते हैं तो कई बार अपने ही वजहों से ।हम कई बार अपनी ही चाहतों को शायद पहचान नहीं पाते। कई बार ऐसा भी होता है कि हम अपनी सीमाओं को पहचाने बगैर कुछ ऐसे ख़ाब देखा करते हैं जिन्हें पूरा करने के लिए अतिरिक्त मेहनत की मांग होती है। जो हम नहीं दे पाते तो विफल होते, बिखरते सपनों की वजह से उदास हो जाया करते हैं। हमें ज़रूरत है अपनी मांगों और उम्मीदों को पहचानना और उन्हें पूरा करना। हर सपने हर किसी के पूरे न तो हुए हैं और न ही संभव ही है।
इस बात की भी पूरी संभावना है कि हमारे अंदर कई तरह की संवेदनाएं एक बार में ही बल्कि साथ साथ ही चल रही होती हैं। जिन्हें लेकर हम एक अंतर या कह लें फांक नहीं कर पाते और उदासी में डूबने लगते हैं। आज की भागम भाग वाली जिंदगी में तकरीबन हर कोई अकेला है, एकांगी है और अधूरा है। यह अधूरापन हम कई बार मॉल में जाकर भरते हैं। हंसी खिलंदड़ी कर के भूलाने की कोशिश करते हैं। मगर अंदर जो टूट रहा है उसे हम बचा नहीं पाते।
शोध बताते हैं कि आज दुनिया भर में अवसाद की गिरफ्त में हज़ारों नहीं बल्कि लाखों में लोग हैं। जिन्हें किसी न किसी किस्म का अवसाद है। अवसाद यानी एक प्रकार की निराशा, एकाकीपन, अकेलापन आदि। इन्हीं मनोदशाओं में हमें कई बार महसूस होता है हम भीड़ में भी कितने अकेले हैं। सब के होते हुए भी हमारा कोई भी नहीं।
बचाना होगा ऐसे मनोदशाओं से। हमें अपने अंदर की सृजनात्मकता को जगाने की आवश्यकता पड़ेगी। अंदर के हास्य को जगाना होगा और अपने एकाकीपन को इनसे दूर करने की कोशिश करनी होगी।

Thursday, September 6, 2018

मंच पर बैठे थे जी और बाकी इत्यादि थे



कौशलेंद्र प्रपन्न
मंच पर देखा बैठे थे सारे के सारे जी। जी की संख्या कुछ ज़्यादा ही थी। यही कोई बीस पचीस होंगे। सारे जी बिल्ला धारी थे। बिल्ले से मालूम चलता था कितने प्रसिद्ध हैं वे। सबको पुष्पगुच्छ देकर स्वागत किया गया। जो बच गए उसका मुंह न उतर जाए इसलिए बीच बीच में को एक प्रमुख जी थे वो उद्घोषक को याद दिला देते है कि फलां जी को भी बुके देने हैं। उन्हें भी सम्मानित किया जाना है। और इस तरह से मंच पर बिराजे सभी जी एक एक कर बुके से सम्मानित हो रहे थे। उन सभी जी के बीच में बैठे थे दो इत्यादि। जिनके लिए यह समारोह था वही मंच से एक सिरे से नदारत थे। यह कोई एक या किसी ख़ास कार्यक्रम का मंज़र न होकर किसी भी कार्यक्रम पर देख सकते हैं। इसलिए चौंकरने की बात नहीं है। भीड़ में कुछ ही जी होते हैं बाकी के इत्यादि की भूमिका होते हैं। किसी भी जी की नाक न नीची हो या सम्मान में कमी हो इसका ख़्याल रखना होता है प्रोग्राम के प्रमुख को। नहीं तो पता नहीं किस जी जी की भावना आहत हो जाए आप अनुमान तब नहीं लगा सकते। बल्कि उसका असर आगामी कार्यक्रम में देखने को मिलता है। वो बहाने बना कर आपके कार्यक्रम से दूरी बना लेते हैं। यदि स्पष्टवादी हुए तो मुंह पर बोल देने से भी गुरेज नहीं करेंगे। कि आपके यहां तो उचित सम्मान भी नहीं मिलता। सो कार्यक्रम प्रमुख की नज़र जी पर होती है न इत्यादि पर।
ख़्याल रहे कि जी हमारे प्रमुख हुआ करते हैं। उनकी भावना आहत हुई नहीं है उसका ख़ामियाजा आपको ही भुगतना होगा। वह किसी भी रूप में हो सकता है। तज़र्बा तो यही कहते है कि जी की भावना आहत न हो इसको गांठ बांध लें। एक बार के लिए इत्यादि की भावना को सहला कर मना भी सकते किन्तु जी को ठेस न पहुंचे।
एक प्रसिद्ध कवि की कविता ही है बाकी सब इत्यादि थे। भीड़ में कुछ ही लोगों के नाम लिए जाते हैं। बाकी को इत्यादि के तौर पर नाम भर गिना दिया जाता है। फलां थे फलां थे बाकी इत्यादि थे। यानी वो भी आए थे। वो भी थे इस कार्यक्रम में। बाकी की गिनती इत्यादि में कर दी जाती है। इत्यादियों की संख्या में भी कम महत्वपूर्ण नहीं होती लेकिन इनकी गिनती भी जी में नहीं की जाती।
दूसरे शब्दों में कहें तो जी कई किस्म के होते हैं। साधारण शब्दों में समझें- कहीं का कोई प्रतिनिधि, किसी का मानित सदस्य, किसी के द्वारा नामित व्यक्ति, किसी राजनीतिक दल का प्रमुख आदि। इन्हें आप चाह कर भी नज़रअंदाज नहीं कर सकते। करने की सोच भी नहीं सकते। कुछ देर के लिए इत्यादियों को नज़रअंदाज कर सकते हैं। लेकिन जी को नहीं।


हर बार


हर सुबह वायदा करता हूं,
प्यार नहीं करूंगा,
चाहूंगा भी नहीं तुम्हें।
मगर हर बार ही हारा हूं,
हर बार ही जीया हूं,
तुम्हें प्यार किया है,
करता हूं
हर सुबह।
सांसों में जीया करता हूं
हर सुबह,
ख़ुद से हारा हूं,
प्यार करने में लगा हूं
हर बार हर सुबह तुम्हारे प्यार में डूबा हूं।

Wednesday, September 5, 2018

सबै भयो टीचर...मुंछ वाली मां गिजूभाई


कौशलेंद्र प्रपन्न
आज कौन टीचर नहीं है! टीवी टीचर। यू ट्यूब टीचर। गूगल टीचर। कौन टीचर नहीं है भला। अगर नज़रें दौड़कर देखें तो टीचर की भरमार है। क्या उतने बच्चे हैं? क्या हम उक्त सभी टीचर को वही सम्मान दे पाते हैं जिनके बारे में बात की गई। यूं तो हम सब के अंदर एक टीचर हुआ करते हैं जिन्हें अकसर याद किया करते हैं। किसी के लिए शारदा जी, किसी के लिए नगीना बाबू, किसी के लिए हरीश नवल तो किसी के लिए सुधा या फिर प्रज्ञा मैडम आज भी एक आइडियल टीचर हैं। जो हमें ताउम्र याद रहते हैं। पूरी जिं़दगी हम इन्हें याद रखा करते हैं। कुछ तो ख़ास बात रही होगी इन शिक्षकों में जिनकी वज़ह से उन्हें हम भूल नहीं पाते। या जब हम टीचर बनते हैं तो उन्हीं की तरह या उनसे एक कदम आगे बढ़ना और बनना चाहते हैं आदि। यदि हम टीचर नहीं भी बनते तो भी कोई अंतर नहीं पड़ता हमारे जेहन में एक टीचर बसा करते हैं। टीचर यानी वह व्यक्ति जिसका चलने, बोलने, उठने-बैठने से लेकर हर चीज हमारे लिए अनुकरणीय हो जाती हैं। शायद टीचर यानी गुरु हमारे लिए जीवन के हर मोड़ पर बेशक वो सशरीर हो न हो लेकिन कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में हमारा आदर्श और मार्गदर्शक के तौर पर मौजूद होते हैं।
टीचर की भूमिकाएं बहुत तेजी से बदली हैं बल्कि बदल रही हैं। टीचर भूमिका को कभी भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। हमारे टीचर ही वो धूरी हैं जो काफी हद तक परिवर्तन को मुकम्मल कर सकते हैं। यदि हमारे टीचर प्रशिक्षित और स्वेच्छा आए हुए हां तो शिक्षा में बदलाव से कोई नहीं रोक सकता। हालांकि आंकड़े और जमीनी हक़ीकत कुछ और ही छवियां प्रस्तुत करती हैं जिन्हें देखकर लगता है शिक्षा में हम जितना और जिस शिद्दत से बदलाव की उम्मीद कर रहे हैं वह नहीं हो पा रहा है। इसके पीछे के कारणों की पड़ताल करें तो पाएंगे कि इस प्रोफेशन को स्वेच्छा से चुनने वालों की बेहद कमी है। इस मसले पर प्रसिद्ध शिक्षाविद् कृष्ण कुमार कई बार लिख और बोल चुके हैं कि शिक्षा-शिक्षण क्षेत्र में आने वाले शिक्षकों की पहली पसंद और चुनाव नहीं होना काफी हद तक शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित करता है। दूसरे शब्दों में कहें तो इस प्रोफेशन में आने वालों में ऐसे लोगों की संख्या ज़्यादा है जिनका चुनाव पहला नहीं था, बल्कि अंतिम विकल्प के तौर पर शिक्षण को चुनना था।
शिक्षक वर्ग को भी हम कई वर्गों में बांट कर देख और समझ सकते हैं-पहला, शिक्षण कर्म जिनके लिए एक आनंदमयी और पसंदीदा काम है। जिन्हें पढ़ने-पढ़ाने और बच्चों से संवाद करना बेहद पसंद है। इसके लिए ऐसे शिक्षक को घर से भी पैसे और श्रम लगाना पड़े तो ज़रा भी हिचकते नहीं हैं। हालांकि इस वर्ग के शिक्षकों की कमी लगातार रेखांकित की जा रही है। दूसरा वर्ग ऐसे शिक्षकों का है जो निर्विकल्प होने की स्थिति में शिक्षण को चुना। उनके लिए हमेशा ही यह दूसरी कमतर प्राथमिकता वाला चुनाव रहता है। धन-सम्मान, प्रतिष्ठा तो शिक्षा से कमाते हैं लेकिन शिक्षा-शिक्षण से प्यार नही कर पाते। अनमने से शिक्षा से जुड़े ऐसे शिक्षकों को न तो कक्षा में पढ़ाने में मन लगता है और न ही अपना सौ प्रतिशत बच्चों को मुहैया ही करा पाते हैं। तीसरा वर्ग ऐसे शिक्षकों का है जिनकी पैदाइश यही कोई 1989 के आस-पास हुई और देखते ही देखते शिक्षा-शिक्षण के आकाश पर छा गए। ये कोई और नहीं बल्कि विभिन्न राज्यों में अलग अलग नामां से जाने जाते हैं। शिक्षा मित्र, शिक्षाकर्मी, तदर्थ शिक्षक, शिक्षगुरु आदि आदि। यह राजनीति और आर्थिक फलक पर उदारीकरण का दौर था। जब सरकार लगातार तर्क दे रही थी कि हमारे पास संसाधन नहीं हैं कि हम सरकारी स्कूलों और शिक्षकों को ढो पाएं। और इन्हीं तर्कां को आधार बनाकर सरकार ने शिक्षामित्रों की फसल बोई। आज वह फसल लहलहा रही है। दूसरे शब्दों में कहें तो इस फसल की स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं है। पंद्रह बीस सालों से इसी नाम पर ऐसे शिक्षक खट रहे हैं लेकिन उन्हें पर्याप्त सैलरी, सम्मान तक मयस्सर नहीं हुआ है। उत्तर प्रदेश हो या बिहार, राजस्थान हो या उत्तराखंड़ तमाम राज्यों में ऐसे शिक्षकों के साथ राज्य सरकारें भौड़ा मजाक ही कर रही हैं। इस मसले को लेकर प्रसिद्ध शिक्षाविद् प्रो अनिल सद्गोपाल ने कहा था कि यह नवउदारीकरण के नाम पर सरकारी शिक्षकों और शिक्षा को वैश्विक बाजार के हवाले किया जाना था। लेकिन अफ्सोस कि उस वक़्त तमाम शिक्षा संस्थान, प्रोफेसर आदि ने इसका विरोध नहीं किया। चौथा वर्ग ऐसे शिक्षकों का है जो अपने अपने व्यवसाय में मगन हैं। किसी का प्रोपर्टी डिलर का काम चकाचक चल रहा है। तो किसी के पास स्कूल के बाद दुकाने बांट जोहा करती हैं। कोई स्कूल में भी स्टॉक एक्सचेंज पर नज़र गड़ाए होते हैं। ऐसे में उनके पास पढ़ाने के सिवा और भी काम होते हैं।
इन तमाम शिक्षकों के बीच ऐसे शिक्षक आज भी बचे हुए हैं जिन्हें पढ़ाना रूचिकर लगता है। वो अपना पूरा समय और जीवन पढ़ाने और बच्चों में लगा देते हैं। ऐसे शिक्षक पुरस्कारों की श्रेणी व दौड़ में भागते नज़र नहीं आते। ऐसे शिक्षकों के लिए बच्चों के मुंह से प्रशंसा मिलना व छात्र जीवन से निकल कर प्रोफेशनल लाइफ में आने के बाद कभी यह सुनना कि आपने जो जीवन की सीख दी वह आज भी हमें काम आते हैं आदि सुनना ही उनके लिए पुरस्कार हुआ करते हैं। ऐसे वेतनभोगी शिक्षकों की कमी लगातार हो रही है जिनके लिए शिक्षण पहली पसंद है। अमूमन तो शिक्षण कर्म लोगों के लिए दूसरी व अंतिम पसंद और चुनाव हुआ करता है। इन सब के बावजूद अभी भी शिक्षक और शिक्षिकाएं ऐसी हैं जो लगातार बिना पहचान और पुरस्कार की उम्मीद पाले अपने कर्म में जुटी हुई हैं। इनके लिए बच्चों की मुसकान और उनके चेहरे पर तैरती खुशी ही पुरस्कार हुआ करता है। हालांकि ऐसे शिक्षकों की कमी हो रही है। इसका एक वजह यह भी हो सकता है कि इस प्रोफेशन को ख़ासकर प्राथमिक कक्षाओं में महिलाओं के मकूल मान लिया गया है। जबकि शिक्षण कर्म में मुंछों वाली मां के नाम से प्रसिद्ध गिजूभाई को कौन नहीं जानता उन्हें पसंद करने वालों की कमी नहीं है।


Tuesday, August 28, 2018

जॉब, तनाव और हम


कौशलेंद्र प्रपन्न
हम सब अपनी अपनी जॉब से परेशान रहते हैं। कोई अपने बॉस से तो कोई अपनी जॉब की प्रकृति से। कहीं न कहीं कुछ तो है जिससे हम सब परेशान रहा करते हैं। यदि काम को समझते हुए और रणनीति बनाकर कर्मचारियों को दी जाएं तो संभव है हमारे कर्मचारी काम को बेहतर तरीके से बिना रोए करें। लेकिन बॉस व कहिए ऊपर बैठे लोगों को भी कई बार इतनी हड़बड़ी होती है कि उस बेचैनी को सीधे नीचे सरका दिया करते हैं।
तकनीके के आ जाने से जैसे जैसे काम आसान हुए वैसे वैसे काम उलझते भी चले गए। हाथ में कम्प्यूटर न आ गया गोया समझते हैं कि हर चीज तुरत फुरत में एक क्लीक में हासिल की जा सकती है। जबकि ऐसा है नहीं।
सरकारी दफ्तर हो या निजी कंपनियां हर जगह ऐसे निराश और हताश लोगों कीं संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ रही है जो काम की अपेक्षा और परिणाम की उम्मींद लगातार कर्मचारी को तनाव में डाल रहे हैं। राखी की ही बात है घर पर सरकारी तंत्र में काम करने वाले भी थे और निजी कंपनी में काम करने वाले भी। जब एक बार शिकायतों और असंतुष्टी की बात चली तो सबके दुःख, दर्द,तनाव एक एक कर खुलने लगे। देखते ही देखते सभी के अंदर दबी या सोई भी निराशा फ्लोर पर फैलने लगी।
गोया कोई अपनी जॉब से खुश नहीं है। सरकारी नौकरी करने वालों के तर्क थे कि जब 2002 के बाद पेंशन भी नहीं है फिर क्यों हम सरकारी नौकरी में आएं। वहीं पहले सरकारी नौकरी को थोड़ा ही सही आराम का पर्याय माना जाता था। लेकिन अब तो वह भी जाता रहा। अब तो वाट्सएप पर काम की लिस्ट भेज दी जाती है। न पैसे हैं और न चैन फिर क्योंकर आज भी बच्चे सरकारी नौकरी की ओर भागते हैं आदि।
जॉब की प्रकृति हर जगह बदली ह,ै बल्कि बदल रही है। क्या सरकारी और क्या निजी। काम का दबाव और काम की त्वरित गति में मांग दोनों ही स्तरों पर रफ्तार और दबाव को महसूसा जा सकता है। हालिया एक वाकया बयां करना चाहता हूं कि एक व्यक्ति से साझा किया कि रात में 11 बजे मेल मिलता है कि कल आपको फलां जगह फलां काम के लिए जाना है आदि। वह व्यक्ति सुबह मेल चेक करता है और प्री प्लान्ड काम को पीछे धकेल कर आज मिले आदेश को पूरे करने में जुट जाता है। ऐसे और भी वाकये हैं जिन्हें देखते और सुनते हुए एहसास होता है कि जब हम स्वयं व्यवस्थित नहीं होते तब ऐसी अफरा तफरी का सामना करना पड़ता है। इतना ही बल्कि जब हमारे पास पूर्व योजनाबद्ध काम की सूची नहीं होती तब भी ऐसी स्थितियां पैदा हो जाती हैं।
फर्ज़ कीजिए जब आपसे अचानक फलां लिस्ट मांगी जाती है जिसे आपने कमतर प्राथमिकता की सूची में रखा था अब उसे रिटी्रव करना हमारे लिए मुश्किल होता है। यानी यदि हम अपने काम को सही तरीके से, सही स्थान पर, सही नाम से आदि सुरक्षित रखें तो कभी भी हमें फाइल डेटा आदि को पुनःपाने में ज़्यादा समय बरबाद नहीं होगा। लेकिन ऐसी ही तो नहीं कर पाते। कहां की फाइल कहां रख देते हैं। कौन सी फाइल किस ड्राइव में सेव कर देते हैं इसका ख़मियाजा हमें तब भुगतना पड़ता है जब हमसे हमारे बॉस या उच्च अधिकारी मांग बैठते हैं। 

Monday, August 27, 2018

तुम्हारी हथेली...




तुम्हारी हथेली ख़ाली नहीं होगी-
रखा करूंगा एक प्यार,
अपना माथा,
माथा याने
तमाम अहम्।
धर दूंगा तुम्हारे आंचल में-
एक उम्मींद,
एक आस,
एक प्यार का पुंज।
रोज़ ही रख दूंगा-
इतना प्यार,
कि कम नहीं होगा कभी,
खरचों जितना भी।
संभालना मेरा प्यार
रोज़ जो बो दूंगा एक प्यार,
तुम्हारी हथेली पर।

चेहरा-विहीन हमजानी



कौशलेंद्र प्रपन्न
हमलोगों ने कभी न कभी बड़ी बड़ी दुकानों में डमी देखी होगी। उसका कोई चेहरा नहीं होता। एक मिट्टी के लोंदे के मानिंद होता है। जिसकी न नाक होती है, न मुंह होता है। और न ही आंखों। बस एक अंड़ाकार लोंदा होता है। उस डमी पर जो भी कैप लगा दें। जो भी कपड़े डाल दें वह वैसा ही हो जाता है।
कई बार लगता है कि हम भी काफी हद तक वैसे ही मिट्टी के लांदे अपने कंधे पर डालकर डोला करते हैं। अपनी न तो इच्छा रही। न ही पसंद। जो उनको हो पसंद वही बात करते हैं। यदि ऐसा नहीं करते तो पिछड़ जाते हैं। या फिर धकीया दिए जाते हैं।
हर व्यक्ति एक नहीं दो नहीं बल्कि तीन से भी ज़्यादा चेहरे लेकर जी रहा है। उन चेहरों से परेशान हो कर भी नहीं उतारता। बल्कि उसकी भी कुछ मजबूरी होती है जिसकी वजह से वह कई कई चेहरे ओढ़ा होता है। एक चेहरा पहचाने जाने के बाद दूसरा चेहरा झट से पहन लेता है।
बचपन में मां एक कहानी सुनी थी कि वह एक मायावी राक्षस है। उसके कई कई चेहरे होते हैं। एक पहचान लिए जाने पर तुरंत रूपधारण कर लेता है। और ऐसे ही वह जीता है।
आज कल ऐसे ही मंज़र हैं समाज में। एक रूप पकड़ लिए जाने पर हम तुरंत दूसरा रूप ओढ़ लिया करते हैं। यह हर जगर देखे जा सकते हैं। ऐसे चेहरे घर-बाहर, स्कूल, दफ्तर हर जगह हैं। इन्हें देख कर कोफ्त सी होती है। लेकिन कई बार हमारी मजबूरी होती है कि हम जानते हुए भी इन्हें साथ लेकर चला करते हैं।

Friday, August 24, 2018

शिक्षा में द्वंद्व और युद्ध प्रभावित क्षेत्र के बच्चे



कौशलेंद्र प्रपन्न
शिक्षा को अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए पल प्रति पल संघर्ष करने पड़ते हैं। वह किसी भी देश, भूगोल की शिक्षा हो, उसे शैक्षिक-अस्तित्व को जिं़दा रखने के लिए विभिन्न किस्म की चुनौतियों (राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक) से रू ब रू होना पड़ता है। इन्हीं संघर्षों के बीच शिक्षा को अपने रास्ते भी बनाने पड़े हैं। शिक्षा और शिक्षण संस्थानों को हमेशा से ही राजनीतिक और सामाजिक साथ ही युद्ध आदि में एक सशक्त औजार के रूप में इस्तमाल किया जाता रहा है। इतना ही नहीं बल्कि स्कूल से लेकर कॉलेज और विश्वविद्यालयों को शिक्षा-शिक्षण से एत्तर सामाजिक आंदोलन के सूत्रधार के तौर पर देखा और स्वीकारा गया है। विश्व के तमाम देशों में स्कूल और स्कूली बच्चों को कई बार युद्ध में एक सस्ते सैनिक के तौर पर इस्तमाल किया गया। शिक्षा भारत की हो या सोमालिया, नेपाल, श्रीलंका, पाकिस्तान, अफगानिस्तान आदि इन संघर्ष और यृद्ध के कगार पर खड़े देशों में शिक्षा को शिकार बनाया गया है। हमारा पड़ोसी देश नेपाल व पाकिस्तान एवं श्रीलंका आदि को समझने की कोशिश करें तो पाएंगे कि इन देशों में स्कूल और स्कूली बच्चों को हमेशा निशाना बनाया गया। कौन भूल सकता है जब पाकिस्तान पर 2014 में स्कूल पर हमला किया गया और बच्चे समेत शिक्षकों की मौत हो गई। वहीं नेपाल में सत्ता परिवर्तन के दौरान बल्कि कहें राजतंत्र से लोकतंत्र की ख़ूनी यात्रा में लाखों बच्चे शिक्षकों को निशाना बनाया गया। सेव द चिल्ड्रेन से लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ की तमाम शोध बताते हैं कि इन संघर्षों और युद्ध आशंकित क्षेत्र में बच्चे स्कूल छोड़ युद्ध में जोत दिए गए।
हाल ही में डॉ संजीव राय द्वारा अंग्रेजी में लिखी पुस्तक ‘‘कॉन्फल्क्टि, एजूकेशन एंड द पीपल्स वॉर इन नेपाल’’ आई है। समीक्ष्य पुस्तक बड़ी ही शिद्दत से नेपाल में प्राथमिक शिक्षा, स्कूल, शिक्षक, बच्चे और जनांदोलन की जिं़दा तसवीर प्रस्तुत करती है। संजीव राय ने इस पुस्तक में जिस गहनता से नेपाल से जनांदोलन जिसे हम राजसत्ता से लोकसत्ता की विकास यात्रा कह सकते हैं, इसकी ऐतिहासिक साक्ष्यों के मद्दे नज़र विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं। 1992, 1995 से लेकर 2007 और 2009 तक की इस लोकतांत्रिक विकास यात्रा को न केवल शैक्षिक लेंस से देखने, समझने की कोशिश की है बल्कि संजीव इस किताब में शिक्षा की यात्रा को सामाजिक एवं राजनैतिक विकास और इतिहास से भी जोड़ते हुए समझना और उन बारीक तंतुओं को पकड़ने का प्रयास करते हैं जिन्हें सुलझाए बिना हम नेपाल की बुनियादी शिक्षा यानी प्राथमिक शिक्षा एवं लोकतंत्र की स्थापना को समझने का दावा नहीं कर सकते।

Monday, August 20, 2018

अस्पताल का बिस्तर



कौशलेंद्र प्रपन्न
जो भी अस्पताल में प्रवेश करता है वही जीवन-दर्शन का भाष्यकार हो जाता है। जीवन ही बीमारी, कराह, टीस का पर्याय सा लगने लगता है। जहां भी नज़रें जाती हैं वही एक पीड़ा, वहीं एक दर्द सुनाई, दिखाई देती है। ख़ुद जाएं या किसी प्रिय को अस्पताल लेकर जाएं एक बार के लिए ही सही कई सारे वायदे ख़ुद से कर लेते हैं। अब ऐसा नहीं खाउंगा। रोज़ टहलने जाउंगा। खाने का ख़्याल रखूंगा आदि आदि। और जैसे ही अस्पताल पीछे छुटता है वैसे ही सारे वायदे पीछे वहीं अस्पताल में बेंच पर छूट जाते हैं।
हम अपने जीवन में कभी न कभी अस्पताल जाते ही हैं या गए ही हैं। कभी ख़ुद तो कभी प्रिय जन को लेकर। अस्पताल के बिस्तर पर लेटा व्यक्ति अचानक दाशर्निक की मुद्रा में दिखाई देता है या फिर निःसहाय। वह व्यक्ति हर सांस ऐसे लेता है गोया यह उसकी अंतिम सांस है। वह हर रिश्तेदार, बच्चों को देख-सुन लेना चाहता है। उन सब से मिल लेना चाहता है जो भी उसकी ज़िंदगी में कभी न कभी आए हों। न जाने किसकी बात से, किसकी घटना से उसे उत्साह मिल जाए। किसी बातचीत में उसे जीने की ऊर्जा मिले इसलिए तीमारदार बिना भूले सब से बातें कराया करते हैं। लेकिन हमें किसी की बात और किसी की प्रवृति से यदि बहुत परिचय नहीं है तो वह बीमार व्यक्ति को और भी घोर निराशा में डाल सकता है। जीने ललक देने की बजाए कभी जीवन के प्रति निराशा और नकारात्मक सोच को तो नहीं बढ़ा रहा है। इसपर हमारा नियंत्रण नहीं होता। और बिस्तर पर लेटा व्यक्ति गहरे निराशा में डूबने लगता है। कहां तो तय था कि फलां से बात कर रोगी को सुखद एहसास होगा। अच्छा लगेगा लेकिन हुआ उलट। रोगी की मनोदशा और भी टूटन से भर गई। रोने लगा। देखने वाले को लगता है कि शारीरिक कष्ट की वजह से रो रहा है। लेकिन होता अलग है। बिस्तर पर लेटे हुए व्यक्ति ने अभी अभी जिससे बात की है उसने ऐसी बात बोल दी जिससे मरीज़ के अंदर निराशा और असहाय होने के भाव प्रबल हो गए। देखने वाले को समझने में समय लग जाता है। लेकिन जो डैमेज होना था वह उस व्यक्ति ने कर दिया।
अस्पताल के दृश्य भी अजीब होते हैं। वहां के कर्मचारियों के व्यवहार भी कई बार हैरान करते हैं। हमें लगता है, सुन नहीं रहा है। हमें यह भी महसूस होता है कि कितना असंवेदनशील है आदि। जबकि ऐसा होता नहीं है। वह संवेदनशील भी है और अपने कर्तव्यों के प्रति सजग भी। समय पर दवा देना। रोगी का देख भाल सब कुछ करता है। बस हमें लगता है कि एक पांव पर क्यों नहीं खड़ा है। क्यों नहीं एक आवाज़ में सुन लेता। आप देखिए अस्पताल के कर्मचारियों के लिए वह रोज़दिन की घटना है। रोज़ ही जहां नए नए और पुराने रोगी आया करते हैं। हर किसी का चेहरा उतरा हुआ। ग़मज़दा और दुख में डूबा हुआ। वह सुबह से रात सोने से पहले तक ऐसे हज़ारों चेहरे देखा करता है। भला अस्पताल में कोई खुश होकर जाता है? हां जब घर में नए मेहमान का आगमन होता है तब खुशी लहर दौड़ जाती है उस वार्ड में। बलून, रंग, किलकारी आदि। इस तरह से देखें तो अस्पताल के लिए कई रंग-रूप हैं। एक हिस्सा ऐसा है जहां मरीज बीमार जाता है और ऑपरेशन के बाद बिस्तर पर लौटता है। जब होश आता है तो पाता है कि फलां अंग में दर्द है। वहीं एक कोना ऐसा होता है जहां तीमारदार, देखने वाले बेंच पर बैठे बैठे अपने सीएल, छुट्टियों के हिसाब में लगे होते हैं। और कितना दिन आना होगा। ऑफिस कब जा पाएंगे। इस कोने की अपनी निराली कहानी होती है। इस कहानी में बीमार तो मुख्य भूमिका में होता है। बाकी अवांतर कहानियां चल रही होती हैं। घर-परिवार। परिवार के सदस्यों की बातें। कौन आया, कौन नहीं आया। कौन रात में रूकेगा किसकी आज रात रूकने की बारी है। इस उधेड़ बुन में कई के चेहरे उतरे होते हैं तो कुछ के चेहरे यथावत् बने रहते हैं।
जो भी हो बुद्ध के जीवन में तीन ही तो घटनाएं आई थीं जिसने सिद्धार्थ को बुद्ध बनाया। बीमारी, वृद्धावस्था और मृत्यु। हम जब भी इनमें से किसी भी अवस्था का चस्मदीद बनते हैं हमारे अंदर भी कहीं न कहीं एक बुद्धत्व जगने लगता है। हम वायदे करने लगते हैं और जब बाहर आते हैं अपनी तमाम घोषणाएं, वहीं पीछे छोड़ आते हैं। और ऐसे ही हम बुद्ध बनने से वंचित रह जाते हैं।

Thursday, August 16, 2018

प्राथमिक शिक्षा में गुणवत्ता को लेकर प्रयासरत सरकार



कौशलेंद्र प्रपन्न
देश के विभिन्न राज्यों में सरकारें प्राथमिक शिक्षा में कई स्तरों पर गुणवत्ता के मसले को लेकर न केवल िंचंतित है, बल्कि प्रयास कर रही हैं। मुख्यतौर पर बच्चों में भाषायी कौशलों मसलन सुनना, बोलना, पढ़ना और लिखना आदि को लेकर दिक्कतें आती हैं। इन कौशलों में भी पढ़ना और लिखना ऐसे कौशल हैं जिनमें बच्चें ने केवल बिहार बल्कि अन्य राज्यों में भी पिछड़ रहे हैं। इसका प्रमाण समय समय पर असर और सरकारी दस्तावेज भी देती रही हैं। हालिया एनसीईआरटी की ओर किए गए अध्ययन में पाया गया कि बच्चों में पढ़ने-लिखने और गणित की दक्षता में ख़ासा परेशानी आती है। यह स्थिति आज से नहीं बल्कि पिछले एक दशक में ज़्यादा संज्ञान में आया है। विभिन्न रिपोर्ट इस मसले पर अपनी चिंता प्रकट कर चुकी हैं। बिहार सरकार इन्हें गंभीरता से लेते हुए राज्य में प्राथमिक स्कूलों में बच्चे गणित और भाषायी दक्षता ख़ासकर पढ़ने और लिखने को कक्षा तीसरी और पांचवीं में सुधारने के लिए प्रयास कर रही है।
बिहार में प्राथमिक शिक्षा के स्तर को सुधारने के लिए यह प्रयास निश्चित ही सराहनीय है। हालांकि न केवल बिहार बल्कि अन्य राज्यों में भी प्राथमिक स्तर पर बुनियादी कौशलों में बच्चे तय स्तर से नीचे पाए गए हैं। इन्हें कैसे दुरुस्त किया जाए इसके लिए बिहार सरकार ने एक योजना का एलान किया है। इस योजना के तहत तमाम प्राथमिक स्कूलों में कक्षा तीसरी और पांचवीं के बच्चों में गणित के सामान्य सवालों को हल करने के कौशल पर काम किया जाएगा। साथ ही भाषायी कौशल विकास को लेकर समय समय पर सवाल उठते रहे हैं। इन्हें संज्ञान में लेते हुए बिहार सरकार ने घोषणा की है कि प्राथमिक स्कूलों में इन्हीं कक्षाओं के बच्चों में पढ़ने और लिखने के कौशल विकास पर भी सघन कोशिश की जाएगी।
बच्चों में भाषायी कौशल और गणित के सामान्य सवालों को हल करने के कौशल प्रदान करने का प्रयास तो ठीक है किन्तु यह एक अन्य चिंता भी जगाती है क्या हमारे शिक्षक और अन्य संसाधन इन योजना और पूरा करने में सक्षम और समर्थ हैं? क्या हमारे पर इस योजना को सफल बनाने के लिए पूरी कार्य योजना और रणनीति तैयार है आदि। क्योंकि इससे पूर्व भी देश भर में इन बुनियादी कौशलों के विकास के लिए विभिन्न योजनाओं की शुरूआत की गई। इसका परिणाम अभी तक पर्याप्त नहीं माना जा सकता। इससे पूर्व देश भर में ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड, सर्व शिक्षा अभियान आदि की भी शुरूआत की गई। इन तमाम अभियानों में जो कमी देखी गई वह इनके कार्यान्वयन स्तर पर थी। ये योजनाएं अपने उद्देश्यों, लक्ष्यों में तो स्पष्ट थे किन्तु इन्हें सही तरीके से रणनीति बनाकर एक्जीक्यूट नहीं किया गया। अब तक का सबसे बड़ा शैक्षिक संघर्ष शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 को बनने में तकरीबन सौ साल का वक़्त लगा। इसे 2010 में अप्रैल देश भर में लागू किया गया। लेकिन इसमें भी ख़ामियां देखी और निकाली गईं। क्या इस आरटीई में कोई कमी थी या फिर इसे जिस शिद्दत से स्वीकारा जाना चाहिए था या फिर एक्जीक्यूट करने में हमसे कोई चूक रह गई इसे भी समझना होगा। इस संदर्भ में हमें बिहार के इस प्रयास को देखने और समझने की आवश्यकता है।
स्कूली स्तर पर जो लोग जुड़े हुए हैं। बल्कि कहना चाहिए जो परिवर्तन की मुख्य कड़ियां हैं जिन्हें हम शिक्षक व प्रधानाचार्य आदि के नाम से जानते हैं? क्या यह कड़ी मजबूत है इसे पूरे करने में? क्या उन्हें इस अभियान की बारीकियों और चुनौतियों से रू ब रू कराया गया है? क्या उन्हें इसके लिए कोई विशेष प्रशिक्षण दी गई है कि कैसे इसे कक्षायी स्तर पर उतारा जाना है। क्योंकि बिना प्रशिक्षित शिक्षकों के यह पढ़ने और गणित की बुनियादी दक्षता को हासिल करना अपने आप में एक बड़ी चुनौती है। जैसा कि सरकारी और गैर सरकारी रिपोर्ट बताती हैं कि न केवल बिहार में बल्कि देश भर के विभिन्न राज्यों में हमारे प्राथमिक स्कूली शिक्षा शिक्षकों की कमी से जूझ रही है। बिहार उनमें से एक है। इस राज्य में भी लाख से ज्यादा प्राथमिक स्कूलों में शिक्षकों के पोस्ट ख़ाली हैं। बिना शिक्षकों के क्या यह अभियान सफल हो पाएगा? 2009 के पूर्व बिहार में भी प्रशिक्षित, अर्द्ध प्रशिक्षित शिक्षकों, शिक्षा मित्रों आदि के सहारे प्राथमिक शिक्षा को आगे बढ़ाया जा रहा था। लेकिन 2010के बाद वर्तमान सरकार ने तब पटना के गांधी मैदान में हज़ारों की संख्या में बीए एम ए पास प्रतिभागियों को स्कूलों में ज्वाइन कराया था। और क्योंकि आरटीई एक्ट 2009 की मुख्य स्थापना है कि गैर प्रशिक्षित शिक्षकों को सरकार तीन वर्ष में सेवाकालीन प्रशिक्षण प्रदान करेगी।
हमें प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी और रिक्त पदों को भरने की ओर भी योजनाबद्ध तरीके से कार्ययोजना तैयार करने की आवश्यकता है। क्योंकि इसके बगैर यह योजना भी अन्य योजनाओं के तर्ज़ पर विफल हो सकती हैं। पढ़ना-लिखना और गणित की बुनियादी कौशल विकास को न केवल सहस्राब्दी विकास लक्ष्य में शामिल किया है बल्कि सतत् विकास लक्ष्य 2030 के लिए भी प्रमुख माना गया है। यदि बिहार सरकार इस लक्ष्य को हासिल कर पाती है तो यह राज्य अन्य प्रदेश सरकार के लिए भी मिसाल कायम करेगी। हमें इसे सफल बनाने के लिए सिर्फ और सिर्फ राज्य सरकार की जिम्मेदारी मान कर नागर समाज ख़ामोश नहीं बैठ सकता। बल्कि नागर समाज को सरकार के इस अभियान में आगे आना होगा। प्रथम संस्था बिहार के इस अभियान में नालंद में कुछ समूहों का निर्माण कर चुकी है। जिनके साथ पढ़ने-लिखने और गणित की बुनियादी दक्षता विकास में सहयोग कर रही है।

Tuesday, August 14, 2018

बहत्तर साल हो गए आज़ाद हुए



कौशलेंद्र प्रपन्न

हां सुना है ऐसा ही कि हम यही कोई बहत्तर साल पहले तमाम गुलामियों से आज़ाद हुए थे। हम आज़ाद हुए थे पूर्वग्रहों से ऐसा कह सकते हैं? क्या यह मान सकते हैं कि इन सालों में हम सचमुच अपनी कट्टर सोचों से मुक्त हो पाए हैं? क्या ऐसा है कि जो हम आजादी से पूर्व थे उससे कहीं ज़्यादा बेहतर से हो गए हैं। आदि ऐसे सवाल हैं जो आज भी अपनी जगह पर खड़े हैं और हमसे जवाब मांग रहे हैं।
हमने इन बहत्तर सालों में और कुछ किया हो या नहीं लेकिन अपने स्कूली बच्चों, आस-पास की बच्चियों को सुरक्षा तक मुहैया नहीं करा पाए। आए दिन स्कूलों या आस पड़ोस में ऐसी घटनाएं घटती हैं जिन्हें देख सुन कर महसूस हेता है कि यह कैसे आजादी हासिल की कि हम अपने बच्चों को कम से कम एक भय और डर मुक्त घर-बाहर तक नहीं दे पाएं।
न हम ऐसा समाज बना पाए जहां हमारे बच्चे, बड़ी लड़कियां या बुढ़े सुरक्षित महसूस कर सकें। हमने संविधान तो बना ली। हमने सरकारें भी खूब बनाईं। मगर जो नहीं बना पाए वह है एक बेहतर इंसान। हालांकि बेहतर इंसान किसी कारखाने में नहीं बनते। और न ही किसी खेत में उपजा करते हैं। बल्कि स्कूल और घर जैसे जमीन में ही पैदा हुआ करते हैं। हमारा न घर और न स्कूल ही ऐसी जमीन बन पाई जहां अच्छी फसल उगाई जा सके।
इन बहत्तर सालों में विकास बहुत किया। शहर से महानगर में बसना सीख लिया। तमाम आधुनिक संसाधनों में जीना सीख लिया। लेकिन हम यह नहीं सीख सके कि मिलजुल कर कैसे रहा जाता है। आज भी उस तक़्सीम में बिखरे परिवार ज़िंदा हैं जिन्हें आज भी अपनों की तलाश है। 

कुछ शब्द


कुछ शब्द हमेशा उगलता हूं-
तेरे लिए लिखता हूं,
रोज़ ही कुछ प्रेम भरे शब्द भेजता हूं,
ख़ाली शब्द नहीं मैं नहीं हूं।
हूं पूरा अर्थ तुम्हारे लिए-
नहीं जानता हूं कितना ज़रूरी तुम्हारे लिए,
मगर लिखता भी हूं सिर्फ तुम्हारे लिए,
गाता भी हूं तुम्हें ही।
मालूम नहीं हूं कितना तेरे पास-
मगर आस रही हमेशा,
तेरे प्यार को महसूसता,
बस इस उम्मीद में,
हूं कहीं न कहीं तुम्में,
शायद तुम मान न पाओ,
कहने ये भी डरो,
मगर सच ही है न,
कहीं तो हूं तुम्में।

Friday, August 10, 2018

कुछ जो रह गया



कौशलेंद्र प्रपन्न
कुछ क्यों रह जाते हैं। कुछ क्यों छूट जाता है, कभी हमने इसपर ठहर कर नहीं सोचा। अक्सर हम अपनी बातें बिना सोचे समझे और समय का ध्यान रखे कहने में लग जाते हैं। हम कहते बहुत हैं। मगर फिर भी कुछ शिकायतें रह ही जाती हैं। काश और वक़्त मिला होता तो अपनी पूरी बात रख पाता। जैसे परीक्षा देने बैठा बच्चा कहता है, आता तो सब था लेकिन कापी छीन ली। वक़्त ही नहीं बचा। थोड़ा और समय मिल जाता तो सारे सवाल कर लेता। लेकिन जिं़दगी में परीक्षा लेने वाला भी कभी ज़्यादा समय नहीं देता। जितना समय तय है उसमें ही अपनी बात कहनी होती है।
दरअसल कल मेट्रो में कुछ लड़कियों को अपने दोस्तों से बातचीत करते सुना वैसे किसी की बात को सुनना ठीक नहीं है लेकिन कानों पर पड़े तो सुन लिया। लड़की कह रही थी यार टाइम ही नहीं मिलता। घर पर आने के बाद पढ़ ही नहीं पाती। आदि उसकी बातों को बाकी के दोस्त समर्थन कर रहे थे। मैं सोचने लगा यदि छात्र के पास पढ़ने के लिए समय नहीं है तो किस चीज के लिए समय है। क्या केवल सोशल मीडिया पर छाने, सेल्फी पोस्ट करने आदि का समय है।
सच में हम अकसर बातचीत में शिकायत करते हैं कि यार समय नहीं है। समय नहीं मिलता आदि। दरअसल यह एक बहाना है। यदि हम अपने टाइम को मैनेज करें तो सब कुछ संभव है। दिक्कत यही आती है कि हम अपने समय और धन दोनों को ही समयोचित मैनेज नहीं कर पाते। यही लापरवाही हमें परीक्षा में पेपर लिखते हुए भी महसूस होती है। हम लिखते चले जाते हैं। इसे रफ्तार में कई सवाल अधूरे रह जाते हैं या फिर छूट ही जाते हैं। जीवन में भी हम अपने समय को ठीक से मैनेज नहीं कर पाते इसलिए हमारे सपने और काम दोनों ही अधूरे रह जाते हैं।

Thursday, August 9, 2018

सपने जो देखे वही मिले




कौशलेंद्र प्रपन्न
सपना देखने और पालने में किसी का कोई दबाव नहीं होता। हम सपने अपने लिए कई बार समाज के लिए और घर परिवार के लिए भी देखा करते हैं।
हम सब ने सपने देखे। बल्कि देखा करते हैं। हमारी लाइफ ऐसी हो जाए। यह हो जाए वह हो जाए आदि आदि। लेकिन सपनों को पूरा करने के लिए शायद प्रयास नहीं करते और सपने यूं ही बिखरा जाया करते हैं।
मैंने बचपन में या कॉलेज में सपने देखे थे कि एक लेखक,पत्रकार बनूं। यह सपना भी काफी हद तक पूरा हुआ। लिखने लगा। छपने भी लगा। दो किताबें भी लिखने की कोशिश कीं और सफल रहा।
दूसरा सपना यह भी था कि स्कूल कॉलेज में पढ़ाउं। स्कूल का सपना तो पूरा हुआ। कॉलेज हाथ से छूट गया।
मेरे भाई ने सपने देखे थे कि दिल्ली विश्वविद्यालय के आवासीय परिसर में वो रहें। यहीं पढ़ाएं। उनका सपना भी पूरा हुआ। आज वो इसी विश्वविद्यालय में पढ़ा भी रहे हैं और इसी परिसर में उनका घर भी है। आपने सपने पूरे करने के लिए उन्होंने मेहनत तो की ही साथ ही जिस प्रकार की तैयारी चाहिए उसे भी निभाया।
हमारे सपने पूरे होते हैं। हो सकते हैं। ज़रूरत बस इतनी सी है कि जो सपने हमने देखे हैं उन्हें कैसे पूरा करें इसकी रणनीति बनानी पड़ती है। और रणनीति को कैसे अमल में लाकर अंजाम तक पहुंचाएं इसके लिए संघर्ष और चुनौतियों को स्वीकारना पड़ता है।
दरअसल सपने सिर्फ हमारी वजहों से ही नहीं टूटा करतीं। बल्कि कई बार हमारे आस-पास के लोगों जिनसे हम प्रभावित हुआ करते हैं उनकी वजह से भी बिखरती हैं।
जिन आंखों में सपने नहीं हैं उन आंखों को क्या नाम देना चाहेंगे? शायद वह मरी हुई आंखें हैं। शायद उन आंखों में जीवन के प्रति लालसा नहीं रही।

Tuesday, August 7, 2018

जानता हूं ग़लत है मगर...



कौशलेंद्र प्रपन्न
महाभारत का सशक्त पात्र दुर्योधन की पंक्ति याद कीजिए जानामि च धर्मं न च मे प्रवृतिः। जानामि न अधर्मम् न च मे निवृतिः।
धर्म क्या है मैं जानता हूं। लेकिन उसमें मेरी कोई गति नहीं है। अधर्म क्या है मैं यह भी जानता हूं लेकिन उससे मेरी निवृति नहीं है। यानी दूर नहीं हो सकता।
यही स्थिति आज सोशल मीडिया के लत की है। हम सभी जानते हैं और मान भी रहे हैं कि सोशल मीडिया हमारा कितना बहुमूल्य समय यूं ही खा जाता है और हम उफ्््!!! तक नहीं करते। हम जानते हैं कि सोशल मीडिया के कारण ही कई सारे लोगों के रिश्तों में दरारें भी आ गईं।
पति-पत्नी, दोस्तों के बीच के रिश्ते भी इससे प्रभावित हो रहे हैं। यदि आपने दूसरों की पोस्ट, स्टेटस लाइक नहीं की। आपके कमेंट नहीं किया। तो समझिए आपका दोस्त मुंह फुला लेगा। फलां को तो इतने लाइक मिलते हैं। फल्नी के पोस्ट पर तो आपने ऐसा लिखा, वैसे लिखा आदि।
कई सारी जटाएं हैं इस सोशल मीडिया के। वह ट्वीटर, वॉट्स एप, लिंगडेन, इस्टाग्राम, फेसबुक आदि। इन्हीं चंगूलों में सोशल मीडिया हमें फांसा करती है। और हम धीरे धीरे इसके गिरफ्त में आते जाते हैं। हम कई बार मालूम ही नहीं होता। शौकीया इन मंचों पर आते हैं और जाने का नाम तक नहीं लेते।
बच्चे, प्रौढ़, वयस्क, छात्र, प्रोफेशनल सब इस हमाम में नंगे हैं। ऐसा कहूं तो बुरा न मान जाइएगा। क्योंकि यहां बेटा और बेटी, पत्नी और प्रेमिका सब अपने अपने छद्म नामों और चित्रों के ज़रिए मौजूद हैं। एक रूप पकड़े जाने पर तत्काल दूसरा रूप धारण कर लेते हैं।
दिक्कत तब ज़्यादा हो जाती है जब आपका आफिस व घर की बॉस आपकी तमामा सोशल मीडिया की गतिविधियों पर नज़र रखे और अचानक पूछ बैठे। तुम तो कह रहे थे घर में किसी की तबीयत ख़राब है। और आप तो फेसबुक, वाट्सएप, ट्वीटर पर उस वक़्त लाइव थे। कैसे कैसे... बोलिए। आप तो कह रहे थे मेरी मींटंग है मैं फोन नहीं उठा पाउंगा। लेकिन आप तो लगातार वाट्सएप पर सक्रिए थे। कैसे कैसे!!!!
इन्हीं सोशल मीडिया के चक्कर में कितने ही छात्रों की परीक्षा रसातल में चली गई। उन्हें अच्छे नंबर आने थे। उन्हें अच्छे कॉलेज में दाखिला लेना था। मगर किन्हीं सोशल मीडिया पर सक्रियता ने उनसे उनके सपने छीन लिए। कोई इन्हीं सोशल मीडिया की वजह से आत्महत्या तक करने पर मजबूर हो जाते हैं। इन्हें कैसे और किस रूप में बेहतर मानें। हालांकि विज्ञान को दोधारी तलवार किसी प्रसिद्दध कवि ने कहा है। ठीक वैसे ही सोशल मीडिया जहां एक ओर पलक झपकते आपको दूर देश तक में प्रसिद्धी के मचान पर चढ़ा देता है वही दूसरी ओर आपकी विश्वसनीयता को खतरे में डाल देता है।

Tuesday, July 31, 2018

गले लगने से पहले


कौशलेंद्र प्रपन्न
गले पड़ना। गले मिलना। गले से नीचे नहीं उतरना। गले की हड्डी बन जाना। गले का हार होना। आदि कई मुहावरे हमने सुने और सुनाए हैं। इनके मायने से भी हम बख़ूबी वाकिफ हैं। इनमें से एक है गले मिलना। गले मिलना यानी किसी को बहुत प्यार और विश्वास से गले लगाते हैं। दोनों ही पक्ष सम होते हैं। किसी भी कोण से देख लिया जाए तो शायद हम उसी के गले मिलते हैं जिन्हें अपना मानते और स्वीकारते हैं। लेकिन हम कई बार भूल जाते हैं कि जिसे गले लगा रहे हैं या जिसके गले लग रहे हैं क्या वो भी आपको उसी शिद्दत से स्वीकार कर रहा है या कहीं आप उसके गले तो नहीं पड़ रहे हैं। वो किसी भी तरह अपसे पीछा छुटाना चाहता है। वो चाहता है कि आपकी इस हरक्कत को सरेआम कोई और न मायने निकाल ले।
अगर ठहर कर देखा और समझा जाए तो गले मिलना और गले पड़ना में कोई ख़ास अंतर नहीं है। जब आप किसी की इच्छा का सम्मान करते हुए उसे गले लगाते हैं या आप उनके गले लगते हैं तब स्थिति बिल्कुल अलग होती है। वहीं यदि सामने वाले की इच्छा और मनसा को समझे बगैर गले लग रहे हैं तब गले पड़ना कहलाएगा।
कई बार आवेश में आकर वह चाहे भावनात्मक हो या फिर संवेदनात्मक वह किसी भी किस्म की भावना हो सकती है किसी को गले लगाते हैं तो यह भूल जाते हैं कि सामने वाला आपको किस नज़र से देख रहा है। क्या वह भी आपक गले लगना चाहता है या हमज़ लोकलाज में पड़कर आपसे लगे लगा। बाद में इस छोटी सी बात को कई दृष्टिकोण से व्याख्या की जाएगी इसके लिए आपको तैयार रहना चाहिए।
कहते हैं हमें अपनी औक़ात और समाज में स्थान को हमेशा याद रखना चाहिए। हम कहां से आते हैं, हमारी सामाजिक पहचान क्या है और किस पद पर हैं आदि ख़ासा मायने रखते हैं जब हम समाज में कोई रिश्ता बनाते हैं। जब हम किसी को गले लगाते हैं। बेशक आपका मकसद साफ और स्पष्ट हो। आपके मन में कोई गंदलापन नहीं है। लेकिन आपके मन की सुनता कौन है। कोई क्यों आपके मन में चलने वाले भावदशाओं को समझने में अपना समय ख़राब करेगा। उसे तो यही लगता है कि यह व्यक्ति कोई ज़्यादा ही अपनापा दिखा रहा है। कोई ख़ास बात होगी। या फिर कुछ ज़्याद नजदीक आने की कोशिश कर रहा है।
समाज में रिश्ते हमस्तर और हमपद के साथ ज़्यादा बना करते हैं। यह आज की भी तारीख़ी हक़ीकत है कि हम अपने और अपनों के जैसों के बीच ही सहज हुआ करते हैं। कुछ देर के लिए जब हम अपनी हैसियत भूल कर ऊपर वाले को गले लगा कर या लग कर एहतराम करते हैं तब सामने वाले के लिए यह समझना ज़रूरी हो जाता है कि इसके गले मिलने का क्या मकसद हो सकता है। यह गले ही क्यों मिला करता है। हाथ भी तो मिला सकता है।

Sunday, July 29, 2018

बकरी ने लड़की से कहा...तब से ख़ामोश हैं!!!




बकरी की पहचान छुपाते हुए उसकी प्रतीकात्मक तस्वीर दी गई है

कौशलेंद्र प्रपन्न
बकरी की मुलाकात लड़की से हो गई। लड़की ग़मज़दा थी। ख़ामोश भी थी। लेकिन उसकी ख़ामोशी को तोड़ते हुए बकरी ने कहा ‘‘ जो हाल तोर सो हाल मोर...’’।
बात यहीं नहीं रूकी। रूकती भी कैसे? मसला था भी कुछ ज़्यादा ही अमानवीय। बकरी ने रोते हुए कहा ‘‘ ये लड़की माना कि तेरे साथ भी चार चार लड़कों ने...’’
‘‘मगर तू तो इंसान की बच्ची है। तेरे साथ जो हुआ उसके लिए तेरे यहां कानून भी है।’’ ‘‘मेरी सोच ज़रा!’’
‘‘मैं किस अदालत में जाऊं? कहां गुहार लगाऊं? कौन किला को फाड़ेगा? न राजा, न बड़ही, न रानी कोई भी तो मेरे लिए आगे नहीं आएगा।’’
‘‘एक बात बताना लड़की तेरे लिए तो कैंडल मार्च लोग कर लेंगे। करेंगे’’
‘‘मेरी प्रजाति तो अनपढ़, गंवार ठहरी। हमें तो अच्छी चिकनी चुपड़ी भाषा में गिटपिट भी करना नहीं आता। कौन सुनेंगा हमारी बात?’’
लड़की बहुत देर तक सुनती रही। उसके गालों पर जो आंसू थे वे सूख चुके थे। जल्दी से उसने अपने आंसू पोंछे और आवाज़ ठीक करते हुए बोली-
‘‘चिंता मत कर बहन, हम दोनों की ही हालत एक सी है।’’
‘‘तू भी भोगी जा सकती है। और हम भी। बस अंतर इतना ही है कि तू बोल नहीं सकती। और हम बोलकर भी बेज़बान हैं।’’
‘‘विश्वास कर मैं तेरे लिए आवाज़ उठाऊंगी।’’
‘‘तेरा केस अलग है।’’
‘‘तू प्रेग्नेंट भी थी उसपर आठ लोगों ने तेरी इज़्जत लूटी।’’
...बकरी और लड़की दोनों ख़ामोश हैं...

Friday, July 27, 2018

बॉस के गले न लगा करो बाबू


कौशलेंद्र प्रपन्न
बाबू आप समझते नहीं हैं! किसी से गले लगने से पहले अपनी और उसकी सामाजिक वजूद तो देख लिया करो। कितने भोले हो बाबू! तुम सोचते हो कितने सफ्फाक दिल से किसी से गले लगते हो। लेकिन उसके लिए यह चाटूकारिता होगी। तुम तो खुले दिल और मन से तपाक से मिल लेते हो गले। वो उसे तुम्हारी कमजोरी मानते हैं बाबू।
तुम्हारी आवभगत उन्हें लगता है तुम छुपा से रहे हो। तुमने उन्होंने सार्वजनिक तौर पर गले क्यों लगाया? क्यों तुमने हंसते हुए उनसे हाथ मिलाया? सब कुछ देखा जा रहा है। देखा जा रहा है कि कैसे तुमने उन्हें विश किया? कैसे तुमने उनसे हाथ मिलाया? बाबू बड़े ही भोले हो।
समझा करो तुम ठहरे मजूर वो रहे हजूर। अंतर तो अंतर होता है। वो हैं तुम्हारे बॉस। तुम ठहरे उनके रिपोटी। यह अंतर यह फासले तुम्हें याद रखने थे। याद तो यह भी रखना था कि आख़िरकर वो हेड ऑफिस से आया करते हैं। तुमने क्या सोचा? उन्होंने एक दो बार हंस कर बात क्या ली, तुमने तो उन्हें अपना दोस्त मान बैठे। जबकि वो दोस्त नहीं। भूलों मत कि जो अंतर बने हैं वो अभी भी कहीं न कहीं मन के किसी कोने में जज्ब हैं। वो भी इस मनोदशा से बाहर नहीं आ पाए हैं।
क्या मजेदार तर्क है गले मिलो मगर अकेले में। अकेले में गले लग सकते हो। सार्वजनिकतौर पर गले न मिला करो। बाबू भोले मत रहो। कभी भी सिर कलम की जा सकती है। तुमने जो सहज ही गले लगाया उसका ख़मियाज़ा भुगतना होगा तुम्हें।

Thursday, July 26, 2018

समकालीन कथाकार एवं संपादक श्री महेश दर्पण से गुफ्तगू




दर्पण जी उन गिने चुने हुए लेखक,कथाकारों में शामिल हैं जिन्होंने तकरीबन चार दशक पत्रकारिता में गुजारे।
दिनमान, नवभारत टाइम्स, धर्मयुग आदि पत्र-पत्रिकाओं में अपनी सेवा दे चुके दर्पण जी ने पिछले दिनों कथा-कहानी और पत्रकारिता पर बातचीत का अवसर मिला।
दर्पण जी की प्रमुख और गहरी चिंता इस बात की थी कि पत्रकारिता से सरोकार एक सिरे से ग़ायब होता गया। कभी प्रभाष जोशी, अज्ञेय, राजेंद्र माथुर, रघुवीर सहाय, सुरेंद्र प्रताप जैसे लोगों से पत्र-पत्रिकाओं की पहचान हुआ करती थीं। ये लोग अपने आप में एक संस्थान हुआ करते थे। प्रभाष जी या फिर अज्ञेय जी अपने पत्रकारों कर ख़बरों को लेकर सांसद, मंत्री और सरकार से भी लड़ पड़ते थे। वह एक युग था। अब एक जमाना है कि दबाव में ख़बरों दम तोड़ देती हैं।
वही हाल कथा-कहानी की है। कहानियां भी इन दिनों कुछ ख़ास दबावों, प्रलोभनों और अन्य प्रभावों की गिरफ्त में लिखी और छापी जाती हैं। 

ठहराव जिं़दगी के


कौशलेंद्र प्रपन्न
ठहराव महज़ ज़िंदगी को ही खत्म नहीं कर देती बल्कि जीने की ललक और छटपटाहट को भी मार देती है। हम सब एक समय, पद, प्रतिष्ठा हासिल करने के बाद ठहरने लगते हैं। एक आत्मतोष घेरने लगता है कि हमने अपनी जिं़दगी में बहुत कुछ पा लिया। जो प्रसिद्ध, मान, पद आदि मिलने थे मिल गए। अब आगे क्या? और क्या हासिल करना शेष रहा? जब इस प्रकार के प्रश्नों के आगे हम चुप हो जाएं तो समझना चाहिए कि हमारी जिं़दगी में ठहराव का डेरा लग चुका है। दूसरे शब्दों में कहें तो लाइफ कोच, मैनेजमेंट के जानकार इसे किसी भी प्रोजेक्ट के लिए बेहतर और लाभकरी स्थिति नहीं मानते। क्योंकि मैनेजर या लीडर या फिर आम इंसा नही जब अपने आप से संतुष्ट हो जाता है, उसे कहीं से भी चुनौतियां नहीं मिलतीं तब कुछ समय के बाद ठहरने लगता है। जानकार व्यक्ति इसलिए ताकीद करते हैं कि रूकना नहीं। ठहरना नहीं। आगे बढ़ना है। जीवन में अपने ही कामों को चुनौती देनी है। या फिर अपने सामने चुनौतियों खड़ी करने से हम हमेशा चौकन्न और सक्रिय हुआ करते हैं।
हम सब की ज़िंदगी में एक वह मकाम आता है या फिर हम मान लेते हैं कि हमने सबकुछ हासिल कर ली। अब कुछ बचा नहीं जिसे पाना हो। वह चाहे पद, पुरस्कार, मान सम्मान आदि ही क्यों न हो। दो किस्म के व्यक्ति होते हैं। पहला, हमेशा ही अतीत प्रेमी और अतीत में जीने वाला। उसके लिए वर्तमान की चुनौतियां कोई ख़ास मायने नहीं रखतीं। वो साहब जिनसे भी जब भी मिलते हैं उनकी जबाव अपनी पुरानी कहानियां, शौर्य, दान, उपकार आदि सुनाने में ख़र्च करती है। उन्हें इसी कहानी वाचन में आनंद बल्कि स्वप्रशंसा में गोते लगाने ज़्यादा भाता है। यदि इन्हें कोई टोक दे, या फिर यह एहसास कराए कि अब वो बात नहीं रही। आप का वो वक़्त था, अब ऐसा नहीं होता। किया होगा आपने ऐसे वैसे काम लेकिन आज ख़ुद को खड़े करने, दौड़ाने में पूरी जिं़दगी खप जाती है। इस प्रकार के लोग अपने जीवन में करते छटाक भर है लेकिन इस छटाक भर काम पर पूरी जिंदगी गुजार देने का माद्दा रखते हैं। वहीं दूसरा, वे व्यक्ति होते हैं जिन्हें अपनी जिं़दगी में ठहर जाना या पुरानी कामों में ही आत्मसुख तलाशाना बहुत देर तक नहीं भाता। इस किस्म के लोग रोज़ नई नई चुनौतियों से लड़ने और रणनीति में बनाने में अपना समय, श्रम, और सोच लगाया करते हैं। शायद इस प्रकार के लोग ही जमीन से आसमान तक की याख करते हैं। यही वो लोग हैं जो न केवल अपनी जिं़दगी बल्कि अपने परिवार के साथ ही समाज को भी एक नई राह और ऊंचाई प्रदान करते हैं। यही वो लोग हैं जो लीडर या समाज चेत्ता कहलाने के हकदार होते हैं। इन्हीं लोगों के कंधे पर समाज, प्रोजेक्ट, लाइफ की प्रगति और गति निर्भर करती है।
घर और समाज में दोनो ही तरह के लोग मिलेंगे। पहले वालों की संख्या कुछ ज़्यादा होती है जिनके प्रभाव में दूसरे वालों के पनपने की संभावना को कमतर करती हैं। पहले वालों के प्रभाव क्षेत्र और औरा बहुत बड़ा और व्यापक होता है। इस प्रभाव क्षेत्र को एरिया ऑफ इन्फ्यूलेंस कहा करते हैं। जो किसी भी व्यक्ति व प्रोजेक्ट की सफलता को प्रभावित करती हैं। एरिया आफ इन्फ्यूलेंस और एरिया और कंसर्न दोनों ही वो ताकतें हैं जो पहले और दूसरे किस्म के लोगों की कोशिशों और सफलता को ख़ासा प्रभावित करती हैं। दूसरें शब्दों में कहें तो कंसर्न यानी जिन तत्वों, परिस्थितियों आदि से हमारा सीधा सीधा साबका पड़ता है। जिसे हम या तो बदलने की ताकत रखते हैं। वहीं एरिया आफ इन्फ्यूलेंस हमारे हर प्रयासों को प्रभावित करता है। हमारे काम और प्लानिंग पर असर डालता है। कई बार एरिया आफ इन्फ्यूलेंस पर हमारी पकड़ नहीं होती। हम इस हैसियत में नहीं होते कि इसे बदल सकें। तब ऐसे में इसे नियंत्रित करना व बदलने हमें मुकम्मल रणनीति बनानी पड़ती है। कई बार आम व्यक्ति एरिया आफ इन्फ्यूलेंस और एरिया और कंसर्न पाट में फंस जाता है।

Tuesday, July 24, 2018

आंसू के मोल


कौशलेंद्र प्रपन्न
कहते हैं इंसान जब इस जमीन पर आता है तब उसे विभिन्न किस्म की विपरीत परिस्थितियों से सामना होता है और उसकी आंख से आंसू निकल आते हैं। शायद जो बच्चा रोता नहीं उसे जबरन रुलाया जाता है। यह भी सुनने में ज़रा अजीब सा लगता है कि यदि आप रोते नहीं तो पीट कर रुलाया जाता है। जब बड़े हो जाते हैं तब भी गाहे बगाहे रोते रहते हैं। कभी परिस्थितियों पर,कभी हालात पर, कभी रिश्तों पर तो कभी अपने काम और जीवन पर रोना आता है। रोते ही रहते हैं। और शिकायत भी करते रहते हैं। रोना और जीना। जीना और शिकायत करना दोनों ही चीजें साथ साथ चला करती हैं। जो रोता नहीं उसे जबरन रुलाने का प्रयास किया जाता है। आपने देखा ही होगा। यदि फलां का पति, बच्चा, पत्नी गुज़र जाती है। और फलां या फल्नीं रोती नहीं या रेता नहीं तो लोग चिंता करने लगते हैं। रुलाओ उसे। रो नहीं रही है। रुलाते तो इसीलिए हैं कि रोने से मन हल्का हो जाएगा। रोने से मन की गुत्थी थोड़ी ढिली होगी। जमा हुआ बर्फ थोड़ी पिघलेगा। तर्क तो यही दिए जाते हैं। रोने से मनोविज्ञान का भी गहरा रिश्ता रहा है। मनोविज्ञान व मनोचिकित्सा शास्त्र मानता है कि रोने से हमारी मनोजगत् की हलचलें व ठहराव कम होता है। मानसिक तनाव कम होते हैं। नस नाड़ियां सहज होती हैं। आदि। यह एकबारगी ग़लत भी नहीं है। तमाम साहित्य- कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक आदि में ऐसे पात्र होते हैं जिन्हें देख,पढ़, सुनकर पाठक सहज ही अपनी घटनाओं से जुड़ जाता है और रुलाई स्वभाविक ही आ जाती है।
साहित्य में ख़ास कर ऐसी रचनाएं लेखकों ने यह सोच कर नहीं कीं कि हमें पाठकों को रुला ही देना है। बल्कि उन्होंने तो समाज के सहज और सामान्य गतिविधियों व घटनाओं को अपनी रचना में पुनर्सृजन करने की कोशिश की। उन्होंने यह प्रयास किया कि समाज में जो हो रहा है वह अप्रिय है। उसके प्रति कम से कम लेखक सामाजिक को संवेदनशील बनाए। उन परिस्थितियों के प्रति नागर सामज को चौकन्ना करे और जिम्मेदारियों का एहसास कराए। इन उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए भी कई रचनाएं चाहे वो कहानी, कविता व उपन्यास ही क्यों न हो समय समय पर रची गई हैं। निर्मला, गोदान, पिंज़र, हज़ार चौरासी की मां, जिन्ने लाहौर नहीं वेख्या ते जन्माई नइ, साकेत, अंतिम अरण्य, बच्चे काम पर जा रहे हैं, खो दो आदि ऐसी रचनाएं हैं जिन्हें पढ़ते व देखत हुए हमारे आंखें नम हो जाती हैं। गोया हम उसी कालखंड़ में यात्रा करने लगते हैं।
रोना अपने आप में न तो शर्म की बात है और न आंसू आ जाना कोई अप्रिय और अनहोनी सी घटना ही। क्योंकि यदि इंसान है तो सहज ही रोना, हंसना, क्रोधादि स्वभावगत प्रक्रियाएं हैं। लेकिन हमारा सामाजिकरण ही ऐसा होता है कि हम बचपन से ही रोने को ख़राब हो और एक ख़ास वर्ग क अांगन में डाल देते हैं। वो रोएं तो उनकी तो यही आदत है। वे तो रोती ही रहती हैं आदि। मगर हम रो दे ंतो आसमान कहीं फटने लगता है। कहीं कोई जमीन दरकने लगती है। सुनाया जाता है कि लड़की की तरह रो रहे हो। कमाल का तर्क है रोना उनके पाले में। हंसना लड़कों के हिस्से आया। प्रसिद्ध संपादक, लेखक,कवि अज्ञेय जी ने शेखर एक जीवनी में लिखा है कि रोना एक ऐसी प्रक्रिया है जिससे मनुष्य का अंतरजगत् कुछ और साफ और हल्का हो जाता है। दूसरें शब्दों में कहें तो रोना, रुदन, रुद्रादि भाव मानवीय स्वभाव के प्रमुख अंग हैं। इनके न तो अलग हुआ जा सकता है और न ही जीया जा सकता है।

Thursday, July 19, 2018

शिक्षा में द्वंद्व


कौशलेंद्र प्रपन्न
शिक्षा में द्वंद्व का मायने व्यापक है। यह द्वंद्व सामान्य कॉफ्लिक्ट नहीं है। जैसे समाज में पाया जाता है। यह द्वंद्व कई स्तरों पर हैं। पहला हम शिक्षा से क्या हासिल करना चाहते हैं? यदि हमने शिक्षा के कुछ सर्वमान्य तय उद्देश्य तय कर रखे हैं तो उन्हें पाने के लिए हमने कौन सी रणनीतियां बनाईं? उन रणनीतियों के ज़रिए हम किन राहों का इस्तमाल करन रहे हैं? क्या हमारे पास पूरी प्लानिंग है? क्या उन्हें कार्यान्वित करने की हमारी राजनैतिक, नीतिगत और सामाजिक इच्छा शक्ति है आदि। तकरीबन सौ साल से भी ज़्यादा सालों से हमारी शिक्षा इन्हीं अंतर द्वंद्वों से लड़ रही है। इसी संघर्ष का परिणाम है कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम को कानून बनने में लंबा समय लगा। प्रकारांतर से शायद सत्ताओं की प्राथमिकता सूची में शिक्षा शामिल ही नहीं हो सकी। जब हमें आजादी मिली वो भी तकरीबन सत्तर साल बीत चुके हैं, अभी भी हमारे प्राथमिक स्कूलों में जाने वाले बच्चों की बड़ी संख्या स्कूली शिक्षा के हाशिए पर हैं। यह विफलता नहीं तो इसे और किस नाम से पुकारा जाए। विभिन्न मंचों पर हमने घोषणाएं तो कीं कि हम फलां वर्ष तक सभी बच्चों को प्राथमिक शिक्षा मुहैया करा देंगे। इनमें 1990, 2000, 2015 आदि ऐसी ही किनारें हैं जहां शिक्षा को किनारे लगना था। अगर मगर किन्तु परन्तु के कारण अब यह किनारा 2030 तक खिसका दिया गया है।
उक्त जिन द्वंद्वों की चर्चा की गई है वे तो हैं ही साथ ही नीतिगत स्तर पर भी बहुत से मोड़ मुहानें हैं जहां से शिक्षा अचानक मुड़ जाती है। जब कुछ साल गुजर जाते हैं तब एहसास होता है कि हम तो शिक्षा के मूल मकसद को कहीं पीछे छोड़ आए हैं। आज की तारीख़ी हक़ीकत यह है कि शिक्षा की बुनियादी मांगों व प्रकृति को भी अच्छे से रेखांकित नहीं कर सके हैं। कभी हम शिक्षा के नाम पर पढ़े-लिखने भाषायी कौशलों को शिक्षा के उद्देश्यों में शामिल कर चिल्लाने से लगते हैं। ‘‘पढ़ेगा इंडिया तभी तो बढ़ेगा इंडिया’’ यहां इन उद्देश्य में क्या हमारी नज़रें सिर्फ बच्चों को साक्षर बनाना है या बच्चे जो पढ़़ रहे हैं उन्हें समझ कर पढ़ और बढ़ रहे हैं इसे भी जांचने की आवश्यकता है। पढ़ना-लिखना शिक्षा का उद्देश्य तो है ही साथ ही यह कौशल भाषा के हिस्से आया करता है। श्रवण-वाचन, पठन और लेखन। क्या हम भाषायी कौशल के कंधे पर शिक्षा के उद्देश्य को बैठा सकते हैं विमर्श इस पर होना चाहिए। सत्ता और आम जनता में बीच भी हमेशा से द्वंद्व रहा है।

मानसिक स्वास्थ्य भी हो हमारी चिंता

कौशलेंद्र प्रपन्न हम अपने आस-पास नज़र डालें तो ऐसे लोग सहज ही मिल जाएंगे जो कुछ सामान्य से हट कर बरताव करते नज़र आएंगे। आदतन हम उन्हें न...