Wednesday, February 22, 2017

शैक्षिक बजट में उछाल गुणवत्ता बेहाल


कौशलेंद्र प्रपन्न
‘‘सरकार और उसके पीछे खड़ा विश्व बैंक और उसके पीछे खड़ा वैश्विक पूंजीपति वर्ग लोगों को गुणवत्तापूर्ण  शिक्षा न देकर उन्हें केवल साक्षर बनाना, कुछ कौशल सिखाना औश्र इस प्रकार उन्हें एक संसाधन बनाकर अपनी पूंजी को बढ़ाना तथा वैश्विक बाजार पर अपना कब्जा बनाए रखना चाहता है।’’ प्रो अनिल सद्गोपाल ने कहीं लिखा है जिसे आज के संदर्भ में व्याख्यायित करने की आवश्यकता है। यदि हम इसे सरकारी दस्तावेज में देखने की कोशिश करें तो यह 11 वीं पंचवर्षीय योजना के दृष्टिपत्र में स्पष्ट दिया गया है कि माध्यमिक शिक्षा का उद्देश्य अंतरराष्टीय बाजार के लिए कुशल मजदूर पैदा करना है। इस बार के बजट में कौशल विकास का ख़ासा ध्यान दिया गया है। यह कौशल किस क्षेत्र में किनके लिए विकसति करने की बात की जा रही है इसे भी समझने की आवश्यकता है। शिक्षा को इस बार समग्रता में देखें तो पिछले बजटीय वर्ष 2016-17 की तुलना में ज्यादा राशि आबंटित की गई है। लेकिन गहराई देखने पर तथ्य कुछ और ही मिलता है। पिछले साल सकल घरेलु उत्पाद के 0.48 से घटकर 0.47 मिला है। यूं तो शिक्षा के विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए 79,686 करोड़ का प्रावधान किया गया है। एक सवाल शिद्दत से उठती रही है कि हर साल शिक्षा के क्षेत्र में सरकार करोड़ों रुपए  खर्च करती है फिर क्या वजह है कि बच्चों को फिर भी लिखने पढ़ने में दिक्कतें आ रही हैं। क्या वजह है कि सरकारी और गैर सरकारी संगठन की ओर किए गए अध्ययन बार बार हमें ताकीद करते हैं कि हम खर्च तो करोड़ों रुपए कर रहे हैं लेकिन गुणवत्ता की दृष्टि से हमें निराशा ही हाथ आ रही है। शिक्षा में गुणवत्ता के मसले को भी समझने की आवश्यकता है क्योंकि यदि सरकार पैसे खर्च कर रही है फिर क्या कारण है कि 7 करोड़ से भी ज्यादा बच्चे प्राथमिक स्कूलों से बाहर हैं। सरकारी आंकड़ों की बात करें तो 80 लाभ बच्चे स्कूलों से बाहर हैं। जो बच्चे स्कूलों में दाखिल हैं और स्कूल की पढ़ाई प्राप्त कर रहे हैं उन्हें किस प्रकार की शिक्षा मिल रही है। इस पर हम नागर समाज को गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।
पिछले वित वर्ष 2016-17 में जहां स्कूली एवं साक्षरता, शिक्षा विभाग को 43896 करोड़ रुपए मुहैया कराए गए थे वहीं 2017-18 वित्त वर्ष में बढ़ाकर 46356 करोड़ रुपए कर दिए गए। इन्हीं वित्त वर्षों में उच्च शिक्षा के मद में भी बढ़ोत्तरी दर्ज की गई जहां 2016-17 में 29703 करोड़ रुपए प्रदान किए गए वहीं 2017-18 में 33330 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। राश्अीय शिक्षा मिशन सर्व शिक्षा अभियान में 2016-17 में 22500 करोड़ रुपए दिए गए वहीं वर्ष 2017-18 में 23500 करोड़ रुपए प्रदान किए गए हैं। वहीं राश्अीय माध्यमिक शिक्षा अभियान को 2016-17 में 3700 करोड़ रुपए मिले थे वहीं 2017-18 में 3830 करोड़ रुपए दिए गए हैं। इन अभियानों में देखा जाए तो हर साल वित्त आवंटन में बढ़ोत्तरी ही दिखाई देती है। यहां एक मौजू सवाल यह उठ सकता है कि इतनी बड़ी राशि का इस्तमाल किस तरीके से हो रहा है? क्या जो राशि राज्य सरकारों तक जा रही हैं वो पूरा सार्थक मदों में खर्च हो रही हैं? हकीकत तो यह है कि हर साल केंद्र सरकार राज्य सरकारों पर आरोप लगाती है कि उन्होंने दिए गए पैसों का इस्तमाल नहीं किया और मार्च के बाद साठ से अस्सी फीसदी पैसे केंद्र को वापस कर दी जाती हैं। बजटीय प्रावधान को देखते हुए यह आरोप भी नहीं लगा सकते कि इसमें शिक्षक प्रशिक्षण जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर खर्च नहीं किए जा रहे हैं। क्योंकि शिक्षण प्रशिक्षण एवं साक्षर भारत जैसे कामों के लिए 2016-17 में जहां 751 करोड़ रुपए प्रदान किए गए वहीं 2017-18 में इस राशि को बढ़ाकर 926 करोड़ रुपए किया गया। संभव है इन्हीं पैसों पर डाइट्स, एससीइआरटी द्वारा शिक्षकों के प्रशिक्षण कार्यशालाओं को अंजाम दिया जाता है। अब यहां एक प्रश्न उठता है कि जब शिक्षक प्रशिक्षण पर भी करोड़ों रुपए खर्च हो रहे हैं फिर क्योंकर स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा शिक्षण हो रही है। संभव है कार्यशाला योजना, कार्यशाला की कंटेंट रूपरेखा पर गंभीरता से काम नहीं किया जाता।
केंद्रीय विद्यालय और नवोदय विद्यालय संगठनों के स्कूलों पर सरकार का ध्यान ज्यादा है बजाय कि राज्य स्तरीय स्कूलों की स्थिति को सुधारी जाए। क्योंकि हर साल केंद्रीय विद्यालयों और नवोदय विद्यालयों की संख्या बढ़ाई जा रही है। पिछले साल 2016-17 में जहां 3987 स्कूल खोले गए वहीं 2017-18 में 4300 स्कूल खोले गए। गौरतलब है कि इन स्कूलों को सरकारी स्तर पर तमाम सुविधाएं पहले से ही मिली हुई हैं। उन्हें ही और मजबूती प्रदान की जा रही है। जबकि राज्य सरकारों द्वारा चलाई जा रही स्कूलों को नजरअंदाज किया जा रहा है। यही कारण है कि विभिन्न राज्यों में सरकार स्कूलों को या तो बंद कर रही है या फिर निजी कंपनियों के हाथों सौंप रही है। राजस्थान में तकरीबन 1800 से ज्यादा स्कूल बंद हो चुके हैं। वहीं उत्तराखंड़ और छत्तीसगढ़ में भी 4000 से ज्यादा सरकारी स्कूलों में या तो ताले लग गए या फिर निजी कंपनियों को दे दिए गए। कितना अच्छा होता कि सरकार इन्हें भी बेहतर बनाने की योजना बनाती। यदि दिल्ली की ही बात करें तो दक्षिणी दिल्ली के हौज़ख़ास इलाके में लक्षमण पब्लिक स्कूल के बगल में चल रही प्राथमिक स्कूल बंद करने की नौबत आ गई थी। अंत में उसे एक निजी संस्था को दे दिया गया और आज वहां चालीस बच्चे हैं। कई बार निजी संस्थाएं मृतप्राय घोषित स्कूलों को जीवित भी की हैं।
गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की जहां तक बात है तो इसे प्रभावित करने वाले अन्य कई घटक हैं जिसे ठीक करने की आवश्यकता है। शिक्षा के अधिकार अधिनियम 2009 के अनुसार 25ः1 और 30ः1 शिक्षकःबच्चा अनुपात की वकालत की गई है। लेकिन हकीकतन यह नहीं है। दिल्ली के सरकारी स्कूलों में अवलोकन के बाद इन पंक्तियों के लेखक के तौर कह सकता हूं कि कक्षा में पच्चास साठ बच्चे तो आम होते हैं। कई स्कूलों में तो यह भी पाया कि एक ही कमरेनुमा हॉल में दो तीन कक्षाएं एक साथ लग रही हैं। एक ही हॉल में एक कोने मे हिन्दी तो दूसरे कोने में गणित पढ़ाई जा रही है। कमरे की कमी और शिक्षकों की कमी दिल्ली के कई स्कूलों में देखने को मिला। किसी स्कूल में चार पांच शिक्षक हैं जिनमें से एक कार्यालयी कामों को अंजाम देने में लगे होते हैं बाकि के शिक्षक शिक्षण कर रहे होते हैं उनमें से भी बचे हुए शिक्षकों पर बैंक एकाउंट खुलवाने, आधार कार्ड से जोड़ने का काम मिला होता है। कई शिक्षकों से बातचीत हुई जिन्होंने बताया कि कई बार पढ़ाने की तैयार कर कक्षा में आते हैं लेकिन अचाकन बीच में ही बुला लिख जाता है और हमें अन्य कामों में झोंक दिया जाता है। पढ़ाने का तमाम उत्साह धरा का धरा रहा जाता है।
शिक्षकीय प्रशिक्षण की गुणवत्ता पर बार बार सवाल खड़े किए जाते हैं। शिक्षाविदों को मानना है कि हमें अपने शिक्षक शिक्षा प्रशिक्षण संस्थानों को भी बेहतर बनाने की आवश्यकता है। यदि दिल्ली के विभिन्न नौ मंडलीय शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थानों डाइट्स की बात करें तो नौ में से सात में गणित, भाषा के स्थाई शिक्षक नहीं हैं। कल्पना की जा सकती है कि अस्थाई शिक्षकों व तदर्थ शिक्षकों के कंधे पर शिक्षण प्रशिक्षण प्रक्रिया को क्या छोड़ा जा सकता है। ठीक इसी तर्ज पर स्कूलों में भी तदर्थ शिक्षकों के भरोसे हम गुणवता की उम्मीद कर रहे हैं।

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