Sunday, May 30, 2010

खाप की थाप सुन रहे हो मुन्ना? गोत्र के कूप में गिर रहे हैं हम

खाप की थाप सुन रहे हो मुन्ना? गोत्र के कूप में गिर रहे हैं हम , सुन रहे हैं कि तुम्हारे गावो में भी लड़के और लड़की को मौत के घाट उतर कर बुजुर्ग लोग खुश हैं कि गावों की नाक कट गई। कम से कम आने वाली पीढ़ी तो प्यार के रह पर कदम बढ़ने से पहले दस बार सोचेगी। मौत का खौफ इनके जेहन में बैठना बेहद ज़रूरी है। सुना तो यह भी है लड़की के बाप और भाई खुद मिल कर लड़की को रात में काट कर नहर में बहा आये? क्या यह सच है मुन्ना ?
पुरे गावों जेवार में उनकी नाक उची हो गई। और उनके बेतवा के लिए रिश्ता इक बड़ी ही मालदार घर से आई है। किसी ने आवाज तक नहीं उठाई कि बेटी के हत्यारे हैं। कल को बहु को भी वही हस्र कर सकते हैं जो बेटी को किया। इनको बेटा चाहिए छये कुछ भी हो जाये। आज कल सुनने में आया है बेटी को स्कूल भी जाने से मन कर दिया गया है। गावों के तमाम लड़कियां घर बैठ गई हैं। लेकिन बहु पढ़ी लिखी की मांग करते हैं। मुन्ना ये तो साफ ज्यादती है। तुम कुछ नहीं बोलते क्या? तुम तो ओज्फोर्ड से पढ़ कर आये हो जी। तुम से उम्मीद लगा रखें हैं। मगर सुना है तुम भी उनकी ही हाँ में हाँ मिला रहे हो। लोग तो यह भी कह रहे हैं कि तुम वोट की खातिर यह सब कर रहे हो। का ई सच है ?
जब पढ़े लिखे लोग जवान खून भी पुराणी जर्जर और बुरी रीति की प्रशंसा करेंगे तो फिर गावों तो गावों शहर भी इससे बच नहीं पायेगा। कल्पना चावला, उषा , चाँद कोचर जैसे बेहतरीन महिला समाज को किसे मिल पाएगीं? कभी सोचा था कि अपने भतीजे की शादी मैं अपनी पड़ोस की उस लड़की के करायुन्गा जो बेहद ही शालीन और पढ़ी लिखी है मगर है नीची जाती की। मगर अब यह भी खाब ख्याब ही रह जायेगा। तुम्हारे गावों में तो मुझे घुसने भी नहीं देंगे। शादी किये मुझे तक़रीबन १५ साल हो गए। तब गावों भी पीछे धकेल आया था। मैं तेरी भाभी को किसे भी हाल में नहीं अलग कर सकता था सो हमने साथ रहने का वचन लिया। तुम तब छोटे थे। तेरी माँ ने हमें अपने पीहर में पनाह दी थी। जिसका परिणाम नुको अपनी जान से हाथ धो कर हमारी जान की रक्षा करनी पड़ी।
मैं अपनी भाभी का कर्ज दार हूँ। मैं उनके बेटे का घर यूँ उजड़ने नहीं दूंगा। तुम को जब भी मेरी मदद की जरुरत हो बेहिक आ जाना। गावों में रह कर न तुम बच सकते और न ही तेरे साथ की दोस्त ही। १६ सालों में बेशक दुनिया बदल गई हो। गावों में सड़क , बिजली पानी , टीवी और फोन आगये हों लेकिन लोगों को अभी भी उसी खोह में रहना भाता है। प्यार करना या अपने पसंद की लड़की को जीवन साथी बनाना सबसे संगीन जुर्म लगता है।
मैं अपना प्यारा भतीजा नहीं खोना चाहता। माँ जैसी भाभी नहीं खोना चाहता।
तुम्हारा
चाचू

Thursday, May 27, 2010

आई हेत यू वैरी मच

आई हेत यू वैरी मच आप इस लाइन पर ज़रा चौक गए होंगे। बात बिलकुल दुरुस्त है। कोई कितने प्यार से आप को कह रहा है आई हेत यू वैरी वैरी मच। इस पर आप क्या सोच सकते हैं? यही न कि सामने वाला नाराज़ है। लेकिन ज़रा सोच कर देखें कि मान लें आज हम यह निश्चित कर लें कि आई हेत यू का मतलब आप को मैं बेहद प्यार करता हूँ। तब आपको बुरा नहीं लगेगा।
भाषा इसी को तो कहते हैं कि जिस शब्द के मतलब हमने निश्चित कर लेते हैं वही अर्थ सदियों तक चलते रहते हैं। धीरे धीरे वही अर्थ रुद्ध हो जाते हैं। कमल नाम सुनते ही हमारे दिमाग में इक खास किस्म का फूल आता है यही तो बिम्ब व् प्रतीक कहलाता है। शब्द इसी तरह हमारे आस पास बनते बिगड़ते रहते हैं। मिट्ठे गढ़ते रहते हैं। यही शब्द हमारे संस्कार में शामिल हो जाते हैं।
भाव के बिना बोले शब्द निरा ध्वनि मात्र होते हैं। लेकिन जब वही हमारे अनुभव से पग कर निकलते हैं तब मन उन्ही शब्दों को सुन कर मयूर सा नाच उठता है। यही तो शब्दों का जादू कहलाता है। वर्ना कई शब्द तो जैसे कोड़े से लगते हैं। कानों में पीड़ा पहुचाते हैं। वहीँ कुछ शब्द यैसे भी होते है जिन्हें सुन कर आप दिन भर मस्त रहते हैं। यूँ तो शब्द अपने आप में कोई मायने नहीं रखते लेकिन जब हमारी ज़िन्दगी की कोई खास पल को उकरते हैं तो वही शब्द हमारे लिए ख़ुशी के सबब बन जाते हैं।

Wednesday, May 26, 2010

कितने राठोर


कितने राठोर हमारे आस पास घूमते रहते हैं। सीना फुला कर गोया कह रहे हों मेरा कोई क्या बिगाड़ लेगा। मगर आपने जो भी भूत में किया वो आपके पीछे पीछे चली ही आती है। देखिये, राठोर ने कभी सोचा होगा कि १९९० की बात २० साल बाद उनके गले पद जाएगी। आडवानी व् उनके साथ राम मंदिर की तमन्ना लिए बाबरी मस्जीद को ख़ाक में मिलते समय सोचा होगा कि उनपर इतने सालों के बाद केश भी खुल सकता है। लेकिन सच है कि कभी न कभी हमारे अतीत वर्तमान में रोड़े अटकाते हैं तब लगता है हमने क्या गलती की जिसकी सज़ा मिल रही है।

हमारे समाज में कई सारे राठोर हैं खुलम खुल्ला खेल खेलते हैं। उनके मनोबल इतने बढ़ जाते हैं कि कानून को अपने घर की दाई समझने की भूल कर बैठते हैं। इन्द्र गाँधी की हत्या के बाद देल्ली में किस कदर सिखों पर जुल्म किये गए क्या इसे कोई भुलाये भूल सकता है। पूरे देश में सिखों पर जैसे हज़ारों यमराज इक समय में हमला बोल दिया हो। लोगों ने जम कर लूट पात किया। सिखों ने बाल काट डाले। हिन्दू होने का हमने क्या ही लाज़वाब परिचय दिया। सज्जन कुमार या तित्लर तो इक आध चेहरे थे जिनको आज की तारीख में किये का फल मिल रहा है। मगर उन हज़ारों चेहरे को कैसे पहचान किया जाये।

राठोर, कसाब या यैसे ही कई नाम हो सकते हैं, नाम बेशक बदल जायेगे लेकिन उनकी करतूतों में कोई कमी नहीं आ सकती। इस लिए हमने यैसे चेहरे को समाज के सामने बे नकाब करना होगा। उनके हौसले तोड़ने होगें तब संभव है समाज में महिलायों को शायद सुरक्षा दिला सकें।

कर्म हमने किया तो भोगना होगा

कर्म हमने किया तो भोगना होगा। कर्म प्रधान इस देश में गीता, उपनिषद , व् अन्य ग्रन्थ भी कर्म पर जोर देते हैं। कर्म प्रधान यही जग माहि। बिना कर्म के हम चाहते हैं हमने जो किया भी नहीं उसके भी फल हमें मिले। पर क्या यह संभव है ?
हमारे कर्म हमारे साथ चलते हैं। चाहे लोक में इसके उद्धरण देखें या अन्य पर लेकिन कर्म अपना रंग दिखाता है। हमने यदि म्हणत की है तो वह इक न इक दिन अपना रंग लायेगा ही। दो भाई व् बहन इक घर में पल बढ़ कर समाज में अपनी जगह बनाते है। दोनों के कर्म और परिश्रम काम आता है न ही जिस घर में जन्म लिया। पिता कितने भी धनि , ज्ञानी हों लेकिन यदि उनके बच्चे उनसे नहीं सीखते तो पिता के नाम बस तभी तक साथ होते हैं के फलना के बेटे हैं। देखो , पिता इतना पढ़ा लिखा लेकिन बेटे रोड पर हैं।
कर्म की प्रध्नता कोई भी नकार नहीं सकता । कुछ देर के लिए आप कुबूल न करे लेकिन है तो हकीकत की आप जो कर्म के पेड़ बोते है वही फल आप को मिलता है। यह अलग बात है कि कुछ लोगों को बिना बोये ही आम खाने को मिल जाता है। लेकिन यैसे लोगों की संख्या कम होती है। इसलिए कर्म करने में विश्वास करना बेहतर है न कि भाग्य पर हाथ धर कर।

Thursday, May 20, 2010

भाषा की चमक


भाषा की चमक जी आपने सही सुना भाषा की अपनी चमक भी होती है। भाषा को जितना बोला, लिखा , सुना और पढ़ा जाये उतनी ही हमारी भाषा दुरुस्त और चमकीली होती चली जाती है। वैसे तो हीरानंद सचिद्यानंद अजेय ने कहा था कि बासन को ज़यादा मांजने से मुल्लमा छूट जाता है। इसको भाषा पर उतर कर लोगों ने देखा और कहा कि उसी प्रकार शब्द को ज्यादा प्रयोग से उसकी अथ्त्वाता मधिम पद जाती है। लेकिन मेरा मानना है कि भाषा एसी चीज है जिसे जितना मांजा जाये उसकी चमक और दुगनी हो जाती है।

हम गाली अपनी ज़बान में क्या ही फर्र्रते से देते हैं वही अगर कहा जाये कि इंग्लिश में उसी अधिकार से दें तो शायद हम न दे पायें जब गाली देने में मुश्किल होती है तो कोई इंग्लिश बोलने में कितना हिचकेगा इसका अंदाजा लगा सकते हैं। भाषा को तो जितना बोलो उतना ही सुन्दर और निखरता है । अमिताभ ने इक फिल्म में बोला था- "आई वाक् इंग्लिश, आई ईट इंग्लिश, आई स्लीप इंग्लिश" कितनी गंभीर बात है मगर इसे क्या ही सरल तरीके से गाने में अमिताभ ने गाया। भाषा पर इसे घटा कर देखें तो पाते हैं कि जिसने भी भाषा के साथ इस तरह का रिश्ता कायम कर लिया उसकी भाषा के साथ गहरी छनती है। भाषा डरावनी नहीं होती। और न ही भाषा कठिन होती है। वास्तव में भाषा बेहद ही नाज़ुक , कोमल , और कमसीन होती है। इस के साथ ज़रा भी बेवफाई उम्र भर के लिए दुखद होता है।

भाषा के साथ मुहब्बत करने वाले दुनिया में बेहद ही कम लोग हुवे हैं। जिसने भी भाषा के साथ इलू इलू किया है उसको पूरी दुनिया ने पलकों पर बैठ्या है। गोर्की , प्रेमचंद , प्रसाद, निराला, महादेवी वर्मा ही नहीं बल्कि और भी नाम हैं जिनकी प्रसिधी भाषा पर जबरदस्त पकड़ और कमाल की दोस्ती ने रंग दिखा दिया।

इनदिनों स्कूल की छुट्टियाँ हो गई हैं बच्चे विभिन्न कोर्से में सिखने जा रहे हैंइंग्लिश स्पेअकिंग , पेर्सोनालिटी देवेलोप्मेंट आदि। इंग्लिश बोलने की ललक ने इन बच्चों को गर्मी में भी चैन से बैठने नहीं दिया। हर कोई चाहता है बेधरक र्न्ग्लिश बोले। मगर झिझक है कि बोलने नहीं देती। स्कूल बोलने से मना करता है। माँ पिता बोलने के लिए क्लास में भेजते हैं। मगर यहाँ उनकी ज़बान ही नहीं खुलती। वैसे तो चपर चपर बोल लेंगे लेकिन जब बोलने को कहा जाये तो मौन साध लेंगे। पता नहीं सही बोल पायूँगा या नहीं।

भाषा को आज याद कर परीक्षा में सवाल कर आने तब सीमित कर दिया गया है। वही वजह है कि बोलने में कतराते हैं। परीक्षा बोलने की नहीं होती बल्कि लिखने की होती है। इसलिए लिख कर ९० ९७ फीसदी अंक तो आजाते हैं मगर बोलने को कहा जाये तो गला सूखने लगता है।

भाषा व्याकरण से पहले आती है। व्याकरण भाषा का अनुसरण करती है न कि भाषा व्याकरण के पीछे भागती है। बचपन में बिना व्याकरण का ख्याल किये बोलते हैं जब स्कूल जाना शुरू करते हैं तब व्याकरण सीखते हैं। इसका मतलब यह हुवा कि भाषा व्याकरण की मुहताज नहीं है। भाषा को जितना बोल सकें, सुने उतना ही वह भाषा हमारे करीब आती चली जाती है।

शर्माना छोड़ दाल और भाषा से मुहब्बत कर ले यार। फिर देखना लोग कैसे तेरी तरफ खीचे चले आते हैं।

Wednesday, May 19, 2010

जो रचेगा वो कैसे बचेगा

जो रचेगा वो कैसे बचेगा श्रीकांत वर्मा की इन पंक्ति उधर ले कर कुछ कहना चाहता हूँ। पिछले दिनों न्यू देल्ली के इंडिया habitat सेंटर में इक विचार विमर्श हुवा. विषय था- 'मीडिया में साहित्य की कम होती जगह' कई नामी लोग इस मंच से अपनी मन की भड़ास निकल कर अपने अपने घर को चले गए। सवाल यह है कि क्या वास्तव में साहित्य सेवा से समाज या कि रचनाकार का क्या काय कल्प हुवा है? जवाब है बेहद कम। अगर रचनाकार का भला होता तो क्या कारन है कि अमरकांत को अपनी मेडल या अन्य पुरस्कार बेचने की घोषणा करनी पड़ी। नागार्जुन, त्रिलोचन या निराला को साहित्य रचना के बल पर बेहतर ज़िन्दगी मिल सकी। निराला जिस ने तो सरोज स्मृति लिख कर अपनी मन की भावना रख दी। वहीँ अमरकांत को बुढ़ापे में दवा के लिए अपनी तमाम रचना को नीलाम करने की स्थिति का सामना करना पद रहा है। आखिर इक रचना किसे किसे रूप में साहित्यकार से मूल्य लेती है।

याद करने प्रेमचंद को घर की तमाम बर्तन बासन बेचने की स्थिति का मुह देखना पड़ा। साहित्य वास्तव में रोटी तो दे सकती है मगर दवा पानी सुरक्षा आदि में असमर्थ होती है। कई बार लगता है साहित्य कठोर हकीकत से पलायन का इक रास्ता है। कविता, कहानी लिख कर खुद पढ़े , दोस्तों को पढाये जुगाड़ दुरुस्त है तो कई जगह समीक्षा छपा ली। पुरस्कार मिल जाये इसके पीछे नहा धो कर पिल गए। अगर सफल हुए तो चर्चा होगी वर्ना आपकी किताब कहीं धुल फाक रही होगी।

आज साहित्य की ज़ुरूरत किसे है? इस पर भी सोचना होगा। साहित्य पढने वाले या तो कॉलेज , विश्वविद्यालय के छात्र- अध्यापक रह गए हैं या शोधकर्ता जिनको मजबूरन रूबरू होना पड़ता है। इसके अलावे ज़रा नज़र उठा कर देखें कितने हैं जो अख़बार , पत्रिका के बाद साहित्य पढ़ते हैं। संख्या कम है। आज साहित्य किसी को मानसिक शांति तो दे सकती है मगर दो जून की रोटी मुश्किल है। साहित्य पढने वाले को आज के ज़माने में पिछड़ा हुवा ही मानते हैं। आप माने या नकार दें आपकी मर्जी लेकिन सच है कि साहित्य वही पढता है जिसके पास अराफात समय है।

मीडिया दरअसल आज के ज़माने की मांग और चुनौतयों को कुबूल करता बाज़ार की धरकन सुनता है। इसलिए यहाँ साहित्य से कहीं ज़यादा स्टोरी चलती है। वह स्टोरी जो दर्शक जुटाए, टीआरपी दिलाये। जो साहित्य नहीं दिला सकती। सेक्स , धोखा और सिनेमा वो दम है जो मीडिया को बाज़ार में टिके रहने की ज़मीन मुहैया कराती है। फिर साहित्य कैसे ब्रेअकिंग न्यूज़ बन सकती है। जब कोई विवाद खड़ा होता है या कि किसी नामी साहित्य कार रुक्षत तब कुछ देर के लिए न्यूज़ आइटम बन पाते हैं साहित्यकार। वर्ना पूरी ज़िन्दगी लिखत पढ्त जीवन काट देते हैं आज की मांग है कोर्से या किताब वही सफल जो जॉब दिलायु हो । वर्ना लिब्ररी में किताबें पाठक को देखने को लालायेत रहती हैं। कोई पन्ना पलटने वाला नहीं मिलता। टेक्स्ट बुक तो मज़बूरी में पढ़ी जाती हैं क्योकी यह सीधी सीधी परीक्षा से वास्ता रखता है।

साहित्य को टेक्स्ट बुक की तरह बन्दिय जाये तो इसके भी पाठक मिल जायेंगे। इससे कहीं ज़यादा ज़रूरी यह है कि साहित्य जो ज़िन्दगी से वास्ता रखने का मादा रखता हो तब साहित्य हम से जुड़ जाएगी।

Sunday, May 16, 2010

मकानमालिक की जलन

मकानमालिक की जलन या यूँ कहें कि अगर आप कुछ खरीद कर ला रहे हैं और आपका मकान मालिक देख ले तो आपनी खैर नहीं। वो सोचते हैं किरायेदार को कंजर होते हैं उन्हें फ्रिज, टीवी के इस्तमाल का हुक ही नहीं। किरायेदार हैं तो वो भिखमंगे हैं। उन्हें कभी भी घर से खदेर जा सकता है। इतना ही नहीं मकान मालिक के नखरे और घर खली करने की कई नायब तरीके होते हैं -

घर रेनोवेत करना है, घर में शादी है, बला बला। दरअसल उन्हें ज़यादा किराया चाहिए होता है लेखिन मुह खोल कर नहीं मांगते। मांगते किसे कहेंगे ? लेकिन साहिब किरायेदार तो खानाबदोश होता है। हर समय डेरा डंडा सर पर लेकर चलना होता है।

घर नहीं तो सामान खरीदने का हक़ नहीं। घर नहीं तो कुछ भी नहीं। पहले इन्सान को घर बनाना चाहिए। तब कुछ और काम करे। दिल्ली में गेम होना है मगर हर्जाना स्टुडेंट्स, कम कमाने वाले को भरना होगा। हर चीज महँगी। घर किराये पर लेने चलें तो सर चक्र जाता है। जिस कोठरी का दम १००० रूपये होगें उसकी कीमत ३००० मांगी जाती है। कोई सवाल करने वाला नहीं। उस पर आप को कई सवाल के जबाब देने होंगे - बिहार , पत्रकार , वकील , फॅमिली को जिस हम घर नहीं देते। यानि किराये पर रहना है तो न शादी करें और न सामान रखें। तब मकान मिल सकता है।

जगजीत सिंह का ग़ज़ल है -

हम तो हैं परदेश में देश में निकला होगा चाँद .....

इक अकेला इस शहर में आशियाना धुन्धता है आबुदाना धेन्द्ता है.....

गुलाम अली को याद करने का मन हुवा -

हम तेरे शहर में आये हैं मुसाफिर की तरह....

ग़ज़ल या गीत तो बोहोत हैं मगर इनमे रह नहीं सकते। इक मकान ही चहिये। जो आपके शहर में मुश्किल है। चलो ग़ालिब अब तेरे शहर में जी नहीं लगता। सब के सब सलीब है॥

Saturday, May 15, 2010

रास्ते कहीं नहीं जाते

रास्ते कहीं नहीं जाते जाते हैं हमारे कदम। इसको इस रूप में समझ सकते हैं कि रास्ते अगर कहीं जाते तो हर राहगीर कहीं न कहीं ज़रूर पहुच जाता। रास्ते तो यहीं के यहीं रहते हैं चले वाला अपनी मंजिल तक पहुच पता है। दुसरे शब्दों में , अगर सही राह , सही समय पर, सही दिशा में चुना जाये तो संभव है इक न इक दिन चलने वाला अपनी मंजिल तक पहुच जायेगा। लेकिन जब रास्ते सही न हों, दिशा ठीक न हो तो उस राही को ता उम्र भटकते देख सकते हैं। इसलिए यदि हम चाहते हैं हैं कि हम उम्र भर चलते ही न रहें बल्कि निश्चित लक्ष्य भी पा सकें तो पहले हमें अपनी मंजिल और उस तक पहुचने वाली दिशा को जाँच लेना होगा।
आज अधिसंख्य के साथ यही त्रासदी है कि उसे चलना तो मालुम है मगर किसे राह जाये यह नहीं पता। इसलिए वह कई बार गलत राह पर, गलत दिशा में अपनी तमाम ऊर्जा जाया करदेता है। ज़रूरी है कि आज के युवा को सफल, कुशल और मंजे हुवे लोगों के द्वारा मार्ग दर्शन मिले। ताकि इक युवा अपनी उर्जा को सही दिशा में अपनी प्रकृति रुझान के अनुसार लक्ष्य निर्धारित कर आगे बढ़ सके।
कई बार माँ बाप या भाई बहन की अदुरी खवाइश को बच्चों के कंधे पर लड़ दिया जाता है जिसे वह पूरी ज़िन्दगी लिए लिए फिरता है। आधे अधूरे मन से मिली मंजिल को पाने में इक युवा अपनी पूरी उर्जा झोक देता है। बेमन , गलत फिल्ड और कई बार तो अपनी चुनी मंजिल को तिलांजलि दे माँ बाप की अधूरी इक्षा को पूरा करता रहता है।
हम राह दिखाने, लक्ष्य निर्धारित करने और विधि चुनने में मदद कर सकते हैं। लेकिन चलने वाला वही राही लक्ष्य तक पहुच पता है जिसने उचित समय पर, अपनी उर्जा की पहचान कर राह पकड़ कर चला करते हैं।

Thursday, May 13, 2010

पहले गली फिर अफ़सोस

कितनी मजे की बात है अपनी राजनीती में पहले नेता दुसरे को गली देते हैं और जब बात पर प्रतिक्रिया आती है तब तुरंत से अफ़सोस ज़ाहिर कर देते हैं यह कहते हुवे कि मेरा इरादा किसी कि भावना को ठेस पहुचाना नहीं था मगर दुःख हुवा तो मैं उसके लिए खेद प्रगट करता हूँ। कितना आसन काम है यह कह देना। मगर उतना ही कठिन है शब्द की मर को महसूस कर पाना।
बीजेपी प्रेसिडेंट नितिन गर्कारी ने लालू और मुलायम जिस को कांग्रेस और सोनिया गाँधी के तलवे चाटने वाला बताया। मगर जब बात बदती नज़र आई तो कह दिया कि वह तो मुहावरा था। मेरा मकसद किसी को चोट पहुचाना नहीं था। यह तो चलता ही रहता है। खास कर चुनाव के दिनों में इक दुसरे पर कीचड़ उछालना बेहद ही आम बात है। यद् कर सकते हैं मनमोहन जिस को आडवानी जिस ने क्या कहा था और पलट वर में मनमोहन जिस भी कम नहीं कहा। मगर सर्कार बनजाने के बाद दोनों नेता संसद में दोस्त की तरह मिले। दोनों ने ही कहा चुनाव के दौरान जो कुछ भी कहा सुना गया उसे भूल जाया जय।
राजनीती में कहा सुनी तो चलती ही रहती है। कोई इन पर कान देने लगे तो उसका तो हो गया दिमाग ख़राब। इस लिए तोर मोर चोर तो चलता ही रहता है।

Tuesday, May 11, 2010

बिन सोच के बोलने वाले

जय और थरूर दोनों बडबोले यानि मरे बिन सोच के बोलने वाले। कबीर ने कहा था , बोलने से पहले परख कर ही बोले। वही समझदार है। वो क्या जो ठोकर खा कर सीखे। वाणी होती ही है इतनी मारक कि इक शब्द किसी को सुख दिला देती है तो वही इक शब्द जूता भी खिलाती है। इक शब्द ने दशरथ की जीवन लीला ख़त्म कर दी। वहीँ इक शब्द इन्सान को कहाँ से कहाँ बैठा देता है।
जय राम रमेश को क्या ज़रूरत थी दुसरे की मिनिस्ट्री में घुसने की। मगर हम आदतों से लचर होते हैं। अपने घर में झाकने की बजाये दुसरे की काम, घर में तक झक करना अच लगता है। ब्रितिब्रिन्जल मामले में देख लें यही मुख है जिसने पत्रकारों को कहा था , अपने दिमाग का इलाज कराये। और भी इस तरह के शब्द तीर जय राम ने चलाये थे। उधर थरूर साहब भी कभी गोरु डंगर कहा तो कभी नहरू की चाइना निति की आलोचना की। समझने के बाद भी नहीं मने तो आखिर में कमान ने नाप दिया।
राजनीती हो या आम जीवन सोच के बोलने वाले कहीं मात नहीं खाते । जिसने भी शब्द के साथ बद्तामाजी की उसे उसका परिणाम भुगतना पड़ा है।

Sunday, May 9, 2010

राधा को भी मरना पड़ता

पत्रकार उस पर लड़की और तो और सुन्दर यानि इक के बाद इक बेहतर का मुलम्मा। उस पर दिल्ली में पढ़ी लाधे से प्यार न हो जाये क्या यह संभव है ? हुवा नम्रता को भी प्यार हुवा। प्यार में क्या कौम और क्या कास्ट। कुछ भी मायने नहीं रखता। अगर कुछ महत्वपूर्ण होता है तो वह है लड़का प्यार करने वाला, सच्चा, नेक दिल इन्सान हो। और निरुपमा का प्यार भी निकल पड़ा। लड़का नीची कास्ट का। लड़की ब्रह्मिन। न तो घर को पसंद न रिश्तदार को। यैसे में माँ बाप पशो पेश में। लड़की जो थी, भावना का इस्तमाल किया गया। निरुपमा को माँ की बीमारी की खबर के बहाने घर बुलाया गया। वहां जो कुछ हुवा सभी जानते हैं।

पिछले दो इक दिनों में मुजफ्फर नगरसे भी येसी ही घटना घटी.

आज राधा कृष्ण होते तो ज़रा कल्पना कर सकते हैं राधा का क्या हस्र होता। या तो राधा पंखे से लटकी मिलती या कहीं खेत में पड़ी रहतीं शिनाख्त के लिए। दूसरी ओर कृष्ण या तो जेल में होते। वैसे भी जेल से यतो उनका गर्भनाल रिश्ता है या ननिहाल फिर उनको ज्यादा परेशनी नहीं होती। लेकिन राधा के बारे में सोच कर दिल भर आता है बेचारी राधा का क्या हाल होता।

आज के माँ बाप प्रेम विवाह के विरोध में यूँ तन गए हैं गोया प्रेम न हुवा किसी का क़त्ल कर दिया हो। दिल इतना कठोर कैसे हो सकता है की अपनी औलाद को अपने ही हाथों मार सकते हैं। रिश्तेदार क्या अपनी औलाद से ज्यादा प्यारी हो जाती है की नाक के लिए क़त्ल कर सकती हैं वाही हाथ जिसने दूध मिलाया हो?

कुछ दिनों से आनर किल्लिंग के नाम पर देश के विभिन्न राज्यों से ख़बरें मिल रही हैं। पहले हरयाणा के खाप समुदाय के लोगों ने प्यार कर के घर बसने की चाह रखने वालों को सरे आम कतला कर दिया गया। या फिर सरपंच ने दोनों को भाई बहन के रूम में रहने के लिए विवश किया। गोया हरयाणा भारत का हिस्सा ही नहीं। वहां संविधान लागु ही नहीं होता। साफ तौर से कार्ट का आदेश है की प्रेम विवाह गलत नहीं है। प्रशासन यैसे जोड़ों को पूरी सुरक्षा देगी। लेकिन जो हुवा वो किसी से छुपा नहीं है।

Friday, May 7, 2010

कितने कसाब

कितने कसाब यह सवाल अपने आप में बड़ा मौजू है। यूँ तो कसाब इक नाम है। हिंदी याकरण के नियम से देखें तो यह व्यक्ति वाचक संजिया है। लेकिन वास्तव में आज कसाब समूह वाचक संजय बन चूका है। बहुवचन कसाब किसी भी देश के लिए घोर खतरा पैदा कर सकते हैं। इक कसाक को सजा य मौत देने से मसला हल नहीं हो सकता। हमें कसाब को पैदा करने वाले उस जमीन को बंजर बनाना होगा। कसाब के मौत की खबर पर पाकिस्तान के अखबार जंग ने लिखा, ' कसाब स्कूल बीच में थप करने वाला लड़का है। वो तो घरसे काम की तलाश में निकला था मगर वो आतंकी संगठन के हाथ में पद गया। जहाँ उसे गन थमा दिया गया। प्रशिशन दिया गया। आज पाकिस्तान की युवा पीढ़ी रोजगार, रोटी दी तलाश में गलत संघटन आतंकी लोगो के हाथ लग जाते हैं। हमें इस तरफ गंभीरता से सोचना होगा।

जंग की शब्दों से पाकिस्तान की युवा पीढ़ी की दर्द और किश्मत, और भविष्य की झलक मिलती है। सच ही है पिछले साल इस बाबत कुछ रिपोर्ट भी आये थे जिसमे कहा गया था कि पाकिस्तान में युवा पीढ़ी के मदर्शे में नै वर्णमाला रटाये जा रहे हैं। जिस में अलिफ़ की जगह आतंक, बे का मायेने बम आदि की तालीम दी जा रही है। ज़रा कल्पना कर के देखें कि जहाँ के युवा इस तरह की तालीम हासिल कर रहे हो वहां किसे तरह की भविष निर्माण हो रहा है। पाकिस्तान की आम जनता को मूल जरूरतों से भटक कर कश्मीर पाने के सपने दिखाना इक तरह से वहां की सियासत और सेना की गहरी चाल है। ताकि आम जनता रोजगार, घर, तालीम जैसे बुनियादी हक़ की मांग को भूल कर कश्मीर पाने के सपने में सोये रहें।

पाकिस्तान और भारत दोनों ही देशों को बखूबी मालूम हो चूका है कि तमाम पुराने मुद्दे बातचीत से ही सुलझी जा सकती है। थिम्पू में दोनों देशों के प्रधनमंत्री मिल कर इक नै पहल की कि रुके हुवो संवाद को आगे बाध्य जाये। गिलानी ने वचन दिया कि हम अपने देश की जमीन का इस्तमाल भारत के खिलाफ आतंक फ़ैलाने के लिए नहीं होने देंगे। और इस बात पर एतबार कर संवाद की रेलगाड़ी को हरी झंडी दिखा दी गई। अब दोनों देशों के विदेश मंत्री के बीच बातचीत होगी।

आतंक ने दोनों देशों के रिश्ते को लम्बे समय से नुकसान ही पहुच्या है। जब तब वार्ता की गाड़ी डेरेल हुई तो इसके पीछे आतंकी बर्दातें रही हैं। लेकिन इस का खामियाजा तो आम जनता को भुगतना पड़ा है। व्यापारी कामगार और आम जनता अपने दिल को किसी तरह समझाते रहे हैं कि इक दिन दोनों देशों के बीच के फासले मिट जायेंगे ये लोग अपने रिश्तेदारों से मिल सकेंगें। देखिया विभाजन ने किसे तरह दो दिलों, रिश्तों के बीच इक गहरी खाई बना दी। जो ६५ साल बाद भी बार्कर है।

Thursday, May 6, 2010

शास्त्र का मलमूत्र


शास्त्र का मलमूत्र , धो रहे रहे हम, कहा हिंदी के इक वरिष्ट लेखक, कथाकार और हंस के संपादक ने । अवसर था इक बुक के लोकार्पण का। यादव ने कहा, ' शारीरिक और भौतिक मलमूत्र से कहीं ज़यादा हम शास्त्रों का मलमूत्र धो रहे हैं। ' ज़रा विचार करने की बात है कि आधुनिक और प्रयोगवादी, प्रगतिशील विचार के कहलाने के लिए और समय समय पर अपनी पहचान बांये रखने के लिए क्या इस तरह के बयां दिन ज़रूरी होता है? यूँ तो साहित्य को गलियाने में किसी का क्या जाता है। यह किसी कि न तो जोरू है न ज़मीन, फिर कोण सर दर्द ले। जिसे जो मन करता है साहित्य को कह देता है। जब कि लोग उसी की रोटी खा रहे होते हैं।

यहाँ मामला साहित्य से निकल कर शास्त्र तक पंहुचा है। यानि हमारे तमाम शास्त्र आज तक मलमूत्र ही विसर्जित करते रहे हैं। और हम हैं कि उसी के तहर पर बैठ कर शादी, मरनी, वचन आदि खाते आये हैं। हमारा न्याय मंदिर टट्टी के ढूह पर हाथ रख कर कसम खिलाता है -

'जो कुछ भी कहूँगा सच कहूँगा......' क्या यह संविधान का मजाक उड़ना नहीं है ?

रामायण, महाभारत , गीता आदि आप्त ग्रंथों को कुछ दीर के लिए महज साहित्य मानकर चलें तो भी यह साहित्य के साथ न्याय नहीं कहा जायेगा। यह तो मीमांशा उचित नहीं कह सकते। इससे पहले पन्त के साहित्य को कूड़ा कहा गया था। तब कोई और मुह था। आज कोई और। मुह बदल सकते हैं लेकिन अपमान जिस हुवा उसे तो वापस नहीं किया जा सकता।

लिखे हुवे शब्द की सत्ता हमारे पहले से चली आ रही है... शायद हमारे बाद भी शब्द रह जाएँ, शब्द मरते नहीं। शब्द से पहले हम अक्षर पर विचार करें तो पाते हैं - 'न क्ष्रम टी अक्षरम' जिसका नाश नहीं होता वही अक्षरम होता है। ईश्वरवादी इसीलिए उस ब्रम्हा, तत्वा के लिए अक्षर नाम भी दिया है। शब्द शास्वत होते हैं। उस शास्वत शब्द से रची कृति मलमूत्र तो नहीं हो सकती हाँ कम महत्वा कि हो सकती है।

'शब्द इवा ब्रम्ह:' इसका अर्थ किसी सर्वशक्तिमान सत्ता से न ले कर यदि लौकिक अर्थ ही लें तो होगा- शब्द के उचित प्रयोग से हमें धन, समृधि, मान , सब कुछ तो मिलता है। फिर शब्द मलमूत्र को धोने वाले कैसे हो सकते हैं।

Wednesday, May 5, 2010

शहर नहीं मरता

शहर तो आप और हम लोगों से बना करता है। बियाबान में न लोग रहते हैं और न शहर ही बस्ता है। लोगो के आकर घर बनाने से मोहल्ला, कालोनी, अप्पर्त्मेंट में तब्दील हो जाते हैं। यही वजह है कि किसी खास शहर से हमें राग हो जाता है। चाहे वो जन्मभूमि हो या जहाँ आपने उम्र के लम्बे काल बिताये हों। या फिर जहाँ प्यार हुआ हो।

इसीलिए शहर हर किसी के ज़ेहन में ताउम्र घर बना लेता है। कभी जिस शहर में बचपन बिता हो। साथ के दोस्त बड़े हुए। बालबच्चे दार हो गए। जहाँ बचपन की चची , साथ खेलती वो लड़की अब ब्याह कर घर चली गई। यैसे में वही शहर काटने को दौरते हैं।

शहर की खासबात यही होती है कि वो आपको पुराणी यादों में ले जाता है। वो शहर इसीलिए हमारी जिन्दगी में अहम् होते हैं। जिस शहर में माँ- भाई , बचपन , खोया हो उस शहर से नफ़रत हो जाता है। शहर तो शहर होता है इस से क्या राग और क्या नफरत। जन्म से पहले वो शहर था और हमारे बाद भी वो शहर रहता है।

रुका हुवा फैसला और कसाब

कसाब को दुनिया ने नंगी आखों से देखा है कि कदर उसने मुंबई में कहर बरपाया। उसने कुबूल भी किया। फैसला अभी तक रोक कर रखा गया है। कुछ लोगों का मन्नना है कि उसकी उम्र महज २२ साल है उसे सुधरने का मौका मिलना चाहिए। क्या इस दलील में दम है? यदि वो खुद से पूछे तो उसकी रूह बोल उठेगी कि तुमको इस काम के लिए दुनिया का कोई भी न्याय बचा नहीं सकता।
कितने आशु , कितने सपने का खून किया है इस का शयद उसे इल्म नहीं। लेकिन जिस बच्ची के सर से बाप का शाया उठ गया उस से कोई पूछे कि बाप का मरना क्या होता है। उस औरत से कोई जा कर पूछे कि पति के बिना ज़िन्दगी क्या मायने रखती है? लेकिन सवालों से कसाब को क्या लेना। उसे तो आकयों ने सिखाया है आशुयों पर मत जाना, उदास चहरे मत देखना। वर्ना मनन करने लगोगे कि कहीं गलत तो नहीं कर रहा। हमारा धर्म दहशत, खून बहाना, चीखें पैदा करना है। हमारी न तो कोई बहन, माँ , बाप , भाई बेटी, हैं नहीं हम किसी के पिता ही हैं।

Friday, April 30, 2010

रुका हुवा दौरे वार्ता चल पड़ी

रुका हुवा दौरे वार्ता चल पड़ी। भूटान की राजधानी थिम्पू में भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के बीच हुई बातचीत से उम्मीद बंधी है कि रुकी हुई वार्ता की ट्रेन चल पड़ेगी। पिचले साल शर्म अल शेख में हुई मुलाकात का कुई खास असर इसलिए दिखाई नहीं दिया क्योकि पाकिस्तान ने किये वादे को पूरा नहीं कर सका। बतौर पाक की ज़मीन का इस्तमाल भारत के खिलाफ आतंकवाद को बढ़ने में किया जाता रहा। यही वजह है कि वार्ता रुक गई थी।
दोनों देशों के बीच इस वार्ता से राजनिक के लेवल की वार्ता शुरू होगा। बेहतर है मामले वार्ता से सालता लिए जाये। वर्ना वो भी कमतर नहीं। हम भी तो बाज नहीं आयेंगे। और दोनों की आन शान में बिला बजह आम नागरिक परशान होंगे।
भारत और पाक के रिश्ते के कई आयाम हैं। कई मोड़ हैं। उन मोड़ और रेशे को समझना होगा। तभी दोनों देशों के रिश्ते के खटरस समझ पाएंगे। दरअसल १९४७ के सपने पाकिस्तान की आखों में है। वो कश्मीर को लेने में कोई कसार उठा नहीं रखना चाता। और भारत भी कैसे कश्मीर को दान कर दे। यहीं पर दोनों देशों के रिश्ते की उष्मा दबी है।
बेहतर हो की सियाचिन, पानी, कश्मीर के मामले को बातचीत के ज़रिये सल्ताया जाये। वर्ना पाकिस्तान का विकास रुका है अब डाउन होना शुरू होगा। इकोनोमी का बड़ा हिस्सा तो वह सेना पर खर्च करता है। तो यैसे में बाकि शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार आदि पर ध्यान देना संबव नहीं।

Monday, April 5, 2010

आत्मविश्वास का पेंडुलम

गति में भी जड़ता का सिधांत काम करता है। गति में रहते रहते हम इक तरह के रफ़्तार में जीने के आदि हो जाते हैं। इसलिए गति और बदलावों ज़िन्दगी में बेहद ज़रूरी है। परिवर्तन हमारे सोच, रहन सहन बोल चाल सब में दिखाई देता है। लेकिन आत्मविश्वास का डोलना कुछ देर के लिए हमें सोचने पर मजबूर करता है। हमारा आत्मविश्वास क्योंकर डोलता है ? किन हालत में हम अपने रह से विचलित होते हैं इसकी भी तहकीकात करनी होगी।
लेकिन इतना तो निश्चित है कि लाइफ में आत्मविश्वास तभी डोलने लगता है जब हम अन्दर से असुरक्षित महसूस करते हैं। इक दर हमारे अन्दर घर बनाने लगता है तब हम अपने से ज़यादा दुसरे पर विश्वास करने लगते हैं। किन्तु आत्मविश्वास का दोलायेमान अवस्था सही संकेत नहीं देते। यानि कहीं कुछ बड़ा घट रहा है। जब हम खुद ही विश्वासी नहीं हो पाते तो दुसरे के बारे में क्या कह सकते है।

Monday, March 29, 2010

नाले की लाश

नाले की लाश और आम लाश में क्या अंतर हो सकता है ? बेहद आसन सवाल है, इक आम लाश को कम से कम कफ़न तो मयस्सर हो गति है लेकिन इक लावारिश लाश को वो सब चीजें मुनासिब कहाँ। जो इक आम लाश को होता है।
रोने को तो हर लाश के साथ कुछ आखें होती ही हैं। कुछ के लिए आखें सूखती ही नहीं तो कुछ के लिए आसूं ही नहीं आतीं। नाले में बहती लाश को देखने के लिए लोग तो खड़े हो जाते हैं लेकिन उसकी शिनाख्त में मदद करने में पीछे हो जाते हैं। वैसे भी नाले में बहती लाश के साथ वो कुछ भी नहीं होता जो इक आम लाश के साथ किया जाता है। यानि उसकी अंतिम यात्रा में वर्दी वाले ही होते हैं। अपने तो धुंध में दिन, महीने काट देते हैं। आश कब कि ख़त्म हो जाती है। इक दिन अचानक फ़ोन का आना कि इक बॉडी मिली है पहचान के लिए आज्ये।
आखों में उम्मीद लिए लाश को देखते हैं। कोई पुराना निशान को मोहताज़ पड़ा इक प्यारा अब और हमारे साथ शामिल नहीं जान कर धक्का लगता है। कुबूल तो करना ही पड़ता है। यह तो शुक्र है कि कम से कम लाश तो मिल गई। वर्ना परिवार के लोग पूरी ज़िन्दगी तलाश करते उम्मीद में जीते रहते।
लाश नाले की हो या जेरो लैंड की दोनों का हस्र इक सा ही होता है।

Friday, March 12, 2010

भारत पाक का रिश्ता

भारत पाक का रिश्ता है बड़ा रोचक
क्या कभी सोच है वो कोण क्या है जहाँ पर दोनों दोस्त मिला करते हैं?
वो बिंदु है कश्मीर, आतंक और बम। इससे आगे चलें तो पाते हैं कि दोनों देशों में लोगों के रंग रूप, बोली बनी भी कामो बेश इक से है। जो इक नहीं है वो है मुहब्बत।
जब भी लोगों को मौका मिलता है हम विष बमन करने से गुरेज नहीं करते। कुल मिला कर मामला यही है कि हम वो हर पल को बेहद सिधात्ता से जिया करते है।

Sunday, March 7, 2010

सम्मान के इक दिन बाकि हैं.....

सम्मान के लिए इक दिन है विमेंस डे के नाम पर। लेकिन बाकि के साल भर जो भी करें वो माफ़। साल भर हम उनको हाशिये पर धकेल कर सुकून महसूसते हैं। हर संभव कोशिश करते हैं उनको आगे न आने दिया जाये। लेकिन वो तो उनकी लगन और जुनून है कि लाख रुकावट के बावजूद वो आगे आ रही हैं। तो यैसे में उनकी इज्ज़त के साथ लोकतान्त्रिक बेहैवे करना चाहिय।
लेकिन अक्सर यही होता है कि जहाँ भी मौका मिलता है हम उन्हें नीची जगह ही बैठते रहने के लिए जुगत भिड़ते रहे हैं। पर किसी को ज़यादा दिन तक रोक नहीं सकते। आज आलम यह है कि वो चाहती हैं हर जगह, हर मोड़ पर मजबूत कदम रखना। यैसे में हमारी जिम्मेदारी बनती है कि उनको रास्ता दें। वर्ना वो दिन क्या दूर है जब आप को उसे रह देने कि जगह उन से मांगना होगा।
आज लड़कियां हर जगह अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही है। उनको लाइफ में अब पुरुषों की जुररत नहीं रही। साफ कहती है जीवन में राहगीर प्यारा हो तो उसपर तंगने की जगह मजबूत बने।

Wednesday, March 3, 2010

दिल फुकती लड़की

दिल फुकती लड़की कहीं आप गलत न सोच लें इसलिए बता दें कि दिल्ली विश्वविद्लाया हो या अन्य कॉलेज हर जगह स्मोकिंग करती लड़कियां मिल जाएँगी। ताजुब न करें इसमें उन्हें गलत नहीं लगता। ३५ फीसदी का हक़दार जो हैं। ख़ुशी में, गम में, लड़ाई में, प्यार में पर जगह साथ साथ।

दिल्ली विश्वालय के कानून के प्रांगन में कभी सिगरेट की दुकान लगाने वाली अम्मा से इनदिनों मुलाकात हुई वो भी तक़रीबन ७, ८ साल बाद। उन आखौं में आज भी मेरी तस्बीर बरक़रार थी॥ बताया कि पिचिले दिनों जेतली आये थे मुझ से इक सिगरेट मांग कर ५०० का नोट पैर पर रख दिया। लगा अपना बेटा क्या ज़यादा प्यार करेगा। आज भी कई पुराने वकील आते है। वो रुक कर हाल समाचार जानते हैं लगता है अपने से कहीं अधिक ये लोग प्यार करते है। बात चल रही थी कि इक लड़की ५ पैकट क्लास्सिक की मांग कर ले गई। अम्मा ने बताया, आख्यें मत चौड़ी करो बेटा। आज कल लड़कियां खूब सिगरेट पीती हैं। इतना ही नही बल्कि भरकर पीनेवाली ज़यादा मिलेंगी। कल की बात है दो लड़कियां थीं इक घंटे में दोनों मिल कर १० डिब्बी क्लास्सिक पी गईं। लाल लाल आखें हो गई थीं। पर बेटा क्या कर सकते हैं। पता नहीं लड़कियां क्यों सिगरेट पिने लगीं।

मुझे लगता है बेटा, लड़कियां लड़कों से ज़यादा बिगड़ गई हैं। लाल पीले और भी रंग के पैंटी दिखाती है। शर्म नहीं आती।

दिल तो जलती है लड़कियां मगर इस में उनका भी तो दिल जला करता है। बराबरी का दौर है.... देखते रहें आगे क्या क्या जलता हैक्या कुछ दीखता है॥ लगे रहो देखन हरे।

Friday, February 26, 2010

रंग प्यार के

बिन भेद वाले रंग,

जिस रंग में न हो भेद किसी कौम या कि धर्म कि,

रंग हो तो बस प्रेम और स्नेह कि,

क्या उस पर क्या उन पर सब पर,

रंग हो इक सा।

वह रंग न डाले-

कोई भी यैसे रंग जिस में,

दिख जाये उपरी प्यार कि,

मुस्कान।

आप सभी को रंग प्यार के मुबारक।

Friday, February 19, 2010

ज़िन्दगी यूँ ही चलेगी

ज़िन्दगी यूँ ही चलेगी , चुकी हम किसी से समझोता नहीं करते। जबकि ज़िन्दगी में तो सुख दुःख तो पहिया के समान चलते रहते है। लेकिन हम तो सुख का दामन हाथ से निकलने नहीं देते। हमारी कोशिश तो यही होती है कि हम बेहतर ज़िन्दगी जीयें। लेकिन हम जैसा चाहते हैं वैसा हर समय कहाँ होता है। कोई जिसे आप या हम बेहद करीब मानते हैं जब उससे रुखसत की बरी आती है तब दिल बैठना शुरू होजाता है ।

छह कर भी उससे दूर नहीं जा पाते। लाख मनन कर लेते हैं कि यह गलत है लेकिन दिमाग हमेशा से ही बस अपने बारे में ही सोचता है। यैसे में प्यार, नफरत, दूरिय, सब के सब रह रह कर चहलकदमी कर ने लगते हैं। यैसे में कोई खुद के अपने प्रिय से को अलग कर सकता है। अलग होने या करने के लिए मनन, चिंतन जैसे भावुक पलों को बिलकुल भूलना पड़ता है। कठोर हो कर सोचना होत्ता है।

मन क्या करे उसे जब इन्द्रिय अपनी और खेचती हैं तो वह रुक नहीं पाटा। यही वो पल होता है जब इन्सान खुद को धुखा देता है। खुद के साथ झूठ बोलता है। जब की मनन हकीकत जनता है। बस दिल इसे शिकार नहीं कर पाटा।

जब की यह सच है कि इन्सान को अपनी जमीन देखनी चाहिए।

Friday, February 12, 2010

कुम्भ में स्नान

कुम्भ में स्नान को लेकर जिस तरह से भीड़ हरिद्वार में जमा हुई है उसे देख कर लगता है समस्त देश गंगा के तट पर जमा है। देश की आर्थिक, सामाजिक या फिर राजनीतिक हालत जो भी हो हमें स्नान करने से वास्ता है। वहां की जनता परेशां होती है हो। स्कूल, कॉलेज बंद रहें तो हों। मगर स्नान में किसी भी किस्म की बदिन्ताज़मी बर्दास्त नहीं होगी।

कुम्भ में अखाड़ों में पहले मैं पहले मैं की लड़ाई में किसे कदर आम जन को भय से गुजरना होता है उसका अंदाजा लगा सकते हैं। मगर न तो सरकार और न ही अखाड़ों को इससे कोई खास लेना होता है और न ही स्नान करने वालों को।

साधू समाज को समाज के प्रति भी कोई जिम्माधारी होती है है तो उसका पालन किया जाना चाहिय। लेकिन साधू समाज का वास्ता स्नान से ज़यादा होता है। काश वो लोग समाज की सर्स्कृति व् धर्म या फिर संस्कार के लिए स्चूलों में नैतिक मूल्यों का प्रसार करें तो कम से कम आज के बच्चों में कुछ मूल्य, संस्कार या फिर भारतीय धरोहरों के बारे में लगाओ पैदा करने में रूचि जागेगी। लेकिन इस काम के लिए मेहनत करना होगा। साधू समाज को धार्मिक कर्मकांडों से फुरशत ही कहाँ है जो इस काम में समय दे सकें।

Wednesday, February 10, 2010

बेगुन हुवा ब्रिंजल

बेगुन हुवा ब्रिंजल, आखिर जनता और जैव संबर्धित उत्पाद पर चल रहे विवाद का अंत हो गया। जय राम रमेश ने आख़िरकार जैव आधरित बैगन के उत्पाद को लेकर सरकार के कदम का खुलासा कर दिया। पहले तो रमेश १० फरबरी को येलन करने वाले थे लेकिन इक दिन पहले ९ तारीख को ही घोषणा कर दी कि फ़िलहाल भारत में जैव आधरित उत्पाद के लिए प्रयाप्त समय नहीं है।

इस एरिया में अभी जाँच पड़ताल करना बाकि है। पूरी तरह से सुरक्षित है इस बात की पुस्ती जब तक नहीं हो जाती इस मौसदे को सरकार आगे नहीं बध्यागी।

यानि बैगुन का भरता निकल गया। हो भी क्यों न बिना पूरी तहकीकात के बेगुन की जैविक खेती का मन बनालेने से तो बात नहीं बन जाती। इसीलिए इस परियोजना को मुह की खानी पड़ी। जानकारों का मानना है कि इस पारकर कि खेती से न केवल इन्सान पर बल्कि जीव जनत्वों पर भी बुरा असर पद सकता है। अमरीका में कपास की जैविक खेती के दौरान पाया गया कि जिन जनत्वों ने उस पौद्ध को खाया था उनकी या तो मौत हो गई या फिर उनकी किडनी में खराबी पायी गई। यैसे में बिना पर्याप्त जाच पड़ताल के आनन् फानन में सरकार इस मौसदे को अमली जामा पहनना चाह रही थी।

मगर देश की जनता और खुद देश के ११ राज्यों ने जैविक बैगुन की खेती के खिलाफ आवाज बुलंद कि की हम अपने यहाँ जैविक खेती नहीं होने देंगे।

Monday, February 8, 2010

कुम्भ में चक्षु स्नान करने वाले

कुम्भ में चक्षु स्नान करने वाले

चक्षु स्नान करने वालों की अची खबर ली है। सही है कि कुछ लोग नहाने कम नहाते हुए का देह दर्शन करने आते हैं और देह दर्शन से तृप्त होकर अपने अपने घर लौट जाते हैं। इस कर्म में क्या बूढ़े और क्या बच्चे, क्या मीडिया कर्मी और क्या आमजन सब के सब यहाँ नंगे हैं।

आपकी इस टिपण्णी पर कुछ लोग जिनकी चमड़ी अभी नर्म होगी उन्हें ज़रा चुभ सकती है। चलिए कम से कम सुधर जाये तो सार्थक हो। आदते इतनी ज़ल्दी कहाँ जाती है। जाते जाते टाइम लग जाता है।

Wednesday, February 3, 2010

चंद सवाल यूँ ही टंगे रहते हैं

हाँ कुछ सवाल यूँ ही हमारे आगे टंगे रहते हैं गोया किसी ने उन्हें कह रखा हैं कि जब तक न कहा जाये तब तक यूँ ही बने रहना है।
मसलन क्या प्यार महज किसी का बे इन्तहां चाह ही है? क्या उस चाह को इतना प्यार करना गुनाह है कि किसी दिन यही बोल पड़े कि यार इतना प्यार मत किया करो।
कभी कभी लगता है कि इक सीमा प्यार में होती है। गर किसी को ज़यादा प्यार करेंगे तो संभो है वो सोचने लगे कि आखिर माज़रा क्या है?
इसलिए बंधू यह सवाल हमेशा ही तंग जाते हैं कि कहीं आप के प्यार को सामने वाला आपकी कमजोरी तो नहीं मान बैठा है? कहीं आपका प्यार उसे खीझ तो पैदा नहीं करती? सवालों की लम्बी कतार लग सकती है। मगर खतम नहीं होगा सवाल।
सो ज़रा सोच तो लें क्या प्यार उतना ही दिया या किया जाए जितना पाच जाये।

Sunday, January 31, 2010

गाँधी बाबा सुन लो ना

बाबा आप क्या गए आपके साथ आपके तीनो बन्दर भी चले गए। हमें अब बुरा देखने, सुन्सुने, और बोलने में ज़रा भी शर्म नहीं आता। आप क्या गए भारत में कई भारत बसने लगे। हाल की ही बात है अपनी मुंबई , ताजुब हो रहा होगा कि यह कहाँ कि बात बता रहा हूँ, लेकिन बाबा आप के चले गाने के बाद हमने नै नै नाम इजाद किये हैं। आप तो मद्रास जानते होंगे। कलकत्ता का नाम भी आप के लिए अन्य शहरों की तरह है। मगर आप का मद्रास अब चन्नी हो गया। कलकत्ता कोलकत्ता हो गया। और तो और दिल्ली को तो आप से बेहतर क्या कोई जन सकता है। यहीं तो आपने अंतिम बार प्राथना में मौन हो गए।
अब तो आपके समय का लुटियन जों का नाम भी हमने बदल दिया अब वह ज़गह राजीव गाँधी और इंदिरा गाँधी के नाम से जाना जाता है। हमने तो आपके जाने के बाद सब कुछ नै सिरे से सब कुछ सजाया। सुन रहे हैं बापू ? आपकी अश्थी महा सागर में विसर्जित की जा चुकी है। आपकी प्रपोत्र के हाथों आप अब महासागर में जा मिले। चलिए बाबा कभी इधर आना हो तो अपने साथ अपना आईडी ज़रूर लाना। वर्ना मुश्किल में पद जायोगे। हाँ बाबा अगर मुंबई जाना ही हो तो मराठी सिख लेना नहीं तो कभी भी महाराष्ट्र से ख्देरे जा सकते हो।

Friday, January 29, 2010

लोकतन्त्र के चौथे स्तम्भ से एक जिम्मेदार एवं सृजनात्मक भूमिका

लोकतन्त्र के चौथे स्तम्भ से एक जिम्मेदार एवं सृजनात्मक भूमिका निभाने की उम्मीद एवं मांग नाजायज नहीं ठहराई जा सकती। इस चौथे स्तम्भ यानी पत्रकारिता की शक्ति को कमतर नहीं माना जाना चाहिए। क्योंकि पत्रकारिता की एक आवाज़ जर्जर, भ्रष्ट एवं स्वार्थपूर्ण राजनीति एवं छद्म जनचेतना को बेनकाब करने के लिए पर्याप्त है। यह बताने की आवश्यकता नहीं कि एक सिंगल कॉलम की ख़बर (स्टोरी) अपनी मारक क्षमता से सरकार, संस्थान व व्यक्ति विशेष को धूल चटाने की माद्दा रखती है। मुद्रित माध्यम अर्थात अखबार, पत्रिका में प्रकाशित एक-एक शब्द, वाक्य एवं फोटो कितने व्यापक स्तर पर मार करते हैं, इसकी बानगी वक़्त-वक़्त पर देखने को मिली है।

Tuesday, January 26, 2010

देश की रास्ट्रीय गान पर ख़ामोशी

देश की रास्ट्रीय गान पर ख़ामोशी!!!
जी जहाँ देश भर में ६१ वे गणतंत्र दिवस मनाया जा रहा था। इंडिया गेट पर राष्ट्रपति महा महिम प्रतिभा देवी सिंह पाटिल जवानों की सलामी ली रही थीं। राज पथ पर जवान, विभिन राज्यों से आये युवा अपनी मिटटी, संस्कृति, लोक धुन आदि का परिचय दे रहे थे। इसी बीच जब देश का रास्ट्रीय गान, ' जन गन मन गया जा रहा था उस धुन पर कुछ लोगों की ख़ामोशी देखी जा सकती थी। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, वित् मंत्री प्रणव मुखर्जी , सोनिया गाँधी की होठ सिले हुवे थे। यदि किसी का होठ हिल रहा था तो वह था , उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी का। क्या ही विडम्बना है कि देश के प्रमुख पदों पर विराजे लोग बिना ही शर्म के देश के रास्ट्रीय गान का अपमान कर रहे थे मगर कोई इस ध्यान देने वाला नहीं था।
देश या की देश की शान तिरंगा झंडा का खुलम खुला मखोल बने और हम या की नयायपालिका, पत्रकरिता, कार्यपालिका सब के सब खामोश रहें तो फिर किसे से उम्मीद किया जायेगा। आम जनता अपने नेतावों को बड़ी ही उम्मीद से देखा करती है। मगर जब वो ही देश के सम्मान में गए जाने वाले गान को गुनगुनाना में कोताही बर्तेगें तो आम जनता में किसे तरह का सन्देश जायेगा।
यूँ तो कोर्ट ने समय समय पर इस बाबत आदेश जारी किये हैं लेकिन परिणाम यही धाक के तीन पात। पहले देश के सम्मान में गए जाने वाले गीत के दरमियाँ लोगों से उम्मीद की जाती थी की वो देश गान के समय कम से कम सावधान खड़े हो कर इज्जत देंगे। धीरे धीरे देखा गया कि लोगों को खड़े होने में भी परेशानी होती है। रास्त्र गान की इज्जत बनी रहे इस लिए कोर्ट में पीएल डाला गया कि कोर्ट इस मामले में हस्तचेप करे। लेकिन कोर्ट के अन्य आदेशों की तरह इस का भी हस्र हुवा।
स्कूल, कॉलेज में या कि अन्य अवसरों पर भी देश गान का अपमान किया जाता रहा है। याद करें इस से पहले इक प्रधानमंत्री देश गान के समय हाथ पीछे बांध कर खड़े थे। बाद में जब इस बाबत मीडिया में ख़बरें गरम हुई तो उनने अपनी गलती स्वीकारी। मगर देखते हैं ६० वे गणतंत्र पर सोनिया जी, मनमोहन सिंह, प्रणव मुखर्जी साहब अपनी इस चुप्पी पर कुछ बोलते हैं या नहीं।

Monday, January 18, 2010

शब्द साधक ही साधू

आप अस्सी पड़ावों को बेहतर ढंग से पार कर चुके,
जिस उम्र में आकर,
अमूमन लोग खुद को काम से मुक्ति पर्व मानते हैं,
किन्तु आपने कर्म प्रधान यही जग माहि,
जीया,
किया,
दुनिया को दिया,
शब्द समझ का औजार....
शब्द ब्रम्ह के करीब आप या
गंगा में स्नान,
आचमन,
तिलक,
धुनी राम कट ली ज़िन्दगी,
इस गुमान में कि,
हैं वो उसके बेहद करीब ...
पर सच है यह कि,
जो शब्द साधना करे-
एकांत वासी अरविन्द हो,
आप के जन्म दिन पर मेरी शुभ कामना स्वीकार करें,
आप का,
कौशलेन्द्र

Sunday, January 17, 2010

कोई रोटी बिन जान देवे तो जश्न में पैसा खर्चे

क्या ही गजब की बात है कि जहाँ इक और पूरी दुनिया २५ दिसम्बर को खुशियाँ मना रही ही वहीँ राजस्थान में उदयपुर के पास गावों में इक किसान परिवार की आर्थिक कंगाली ने भूख से किसान का जान ले रही थी। ज़रा देखना होगा कि आप जितनी रोटी थाली में बर्बाद कर देते हैं वह रोटी का टुकरा अगर उस परिवार का मिला होता तो कम से का परिवार की आश न खत्म होती।
जितनी बर्बादी पार्टी में होती है उस खर्च से कई बेहाल परिवार को रोटी मिल सकती थी। अगर हम येसा करें तो कई बेसहारा मौत की बजाय जीवन का सामना कर्येंगा।

Thursday, January 14, 2010

घरघुसना

घरघुसना से कुछ याद आया, बचपन में वैसे लड़कों या आदमी को घरघुसना कहते थे जो घर से निकलता ही नहीं। उसे यक बयक लोग देख कर कहते थे क्या माँ की या बीवी की पल्लू से बाहिर कैसे निकल गए। हर समय बीवी का देखते रहने वाले आलोचना के शिकार होते ही थे। लेकिन उनकी भी आदत पुरानी थी सो नहीं निकला तो नहीं ही निकला करते थे।
आज भी कई लोग मिलेंगे जिन्हें घर से निकलना हो तो कई बार तलने की कोशिश करते हैं।

Wednesday, January 13, 2010

साथ साझा चुल्हा कैसे जले

साथ साझा चुल्हा कैसे जले,
हमने तो मंदिर,
आँगन,
चूल्हा,
बर्तन,
सब अब तक दो फाक कर चुके।
नदियाँ,
नाले,
पोखर भी,
उस पार दी ही डाले,
झेलम,
चिनाब,
शिप्रा,
गंगा,
यमुना,
अपने पास रख लिया,
कुछ को हमने उसपार उलीचा,
सागर भी हमने सोचा दो फाक कर ही डालीं,
पर्वत खोदी,
माँ की आँचल फाड़ चुके हम,
अब क्या फाड़ें तुम हे बोलो,
कहते हो कश्मीर भी दे दो
बोलो खुद ही अपने वतन का संभल बन पाए जो,
कश्मीर दे दें,
यह तो भीख में दी नहीं जा सकती,
फिर तो माज़रा यहीं पर अटके,
पर बोलो गर कश्मीर तेरा हो ही जाये तो,
कब तलक,
कौम पर राज कर ही सकोगे...
साझा सब कुछ खतम हो चुका,
अब तो दर्द,
आसूं अपने हैं साझा,
बोलो इस को जी सकते हो,
तब तो जंग ख़त्म हो जाये,
लहू तम्हारे भी बह जायेंगे.....

Tuesday, January 12, 2010

ग़ालिब तेरे शहर में जी नहीं लगता

ग़ालिब तेरे शहर में अब जी नहीं लगता,
कभी तेरे कूचा ये मुहबत में रौनक हुवा करती थी,
अब तो तेरे उन गलियों से खून, चीख आती है।
ग़ालिब चलो अब वहां आशियाँ बनायें जहाँ मिलती हों,
झेलम सतलुज या गोदावरी की आचल में हिलोद्ये मरती हो चेनाब,
फिर से चलो किसी के कोठे पर पतंग काटें मंझा लगा,
भाई ग़ालिब अब तो तेरा शहर हर रोज बस्ता और बर्बाद होता है।
ग़ालिब सुना है रब की घर में कोई बड़ा या की छोटा नहीं,
तो फिर चलो ग़ालिब खुदा से बात करें रोते के आसूं कैसे कोई पोचे।
लाहौर या की इस्लामाबाद शहर तेरा भी डरा डरा रहता है,
बम की गूंज वहां भी लहू पीती है, ग़ालिब कुछ करते हैं।
उन्हें अपने घर से निकाल देते हैं, फिर देखते हैं।
हम फिर खुली हवा में जी भर कर साँस लेंगे,
ग़ालिब मीर तकी मीर हों या कर्तुल यां हेडर,
सब ने पैगाम ये अमन की खातिर कलम थामी,
हम भी चलो कुछ येसा गीत लिख्यें जो साथ गुनगुना सक्यें।
अब तो ग़ालिब हद हो चूका कहाँ बर्लिन की दिवार भी गिर चुकी,
लेकिन हम हैं की अब तलक रूठे रूठे बैठे हैं
और कितना इंतज़ार करोगे की कोई आएगा हाथ में लेकर कश्मीर,
कश्मीर को यहीं रहने दो, हम वहां अमन की खेती करते हैं।
बच्चे गायें गीत प्यार की गूंज गूंगे को मीठे की स्वाद सा लगे,
बस भी करो मेरा तेरा हो गया पुराना, अब कुछ नया राग में अलाप्यें।
कुछ सुबह की नमाज़ की तरह या ब्रहम मुहर्त में गंगा स्नान की बाद शंकर को जल डालते,
अंजुरी में भर दें मुठी भर प्यार की रजकण ताकि हाथ से छुए जिसे भी वह मह मह हो जाये....

Saturday, January 9, 2010

जब तक

जब तक आपके या मुझ में कुछ करने की लालसा होगी तब तक दुनिया में श्रीजन काम करते ही रहेगें। मसलन कुछ लोग तो दुसरे की कमी निकालने में इतने माहिर होते हैं कि आपने कहा नहीं कि उधर आलोचना तैयार। मगर यदि कुछ लिखने या रहने की बात हो तो फिर देखने लायक होता है यैसे लोग पहले पलायन करते हैं।
साहित्य में भी काफी लोग मिलेंगे जो आलोचना कर्म में इतने मंजे होते हैं कि खुद कुछ लिख ही नहीं पते। उनकी लेखनी बस विष वमन कर सकती हैं जो ताउम्र चलती रहती है। कई बार आलोचना की सरोकार होती है लेकिन तब कलम नहीं चलती। लेकिन किसी की खाल उध्रनी हो तो साहब सबसे आगे रहते हैं। खुद बेशक सालों साल कलम न पकड़ी हो लेकिन लेखन पर व्याखान देने दूर दूर बुलाये जाते हैं। यैसे बकता वास्तव में अपने आगे किसी को बढ़ते नहीं देख सकते। वैसे तो यह शास्त्र सभी जगह लागु होती है लेकिन लेखन में कुछ ज़यादा ही सटीक है।
कई लेखक किताब छपने से पहले ही इतना हवा बंधते हैं कि सामने वाला कुछ देर के लिए अपना आप खो बैठे। लेकिन इनकी असलियत तब सामने आती है जब पाठकों के साथ ही समिश्कों की नज़र इनकी पुस्तक पर कोई सेमिनार, बहस तक नहीं आयोगित करती। फिर साहब खुद ही अपने करीबी को बोल गोष्टी रखते हैं जिस सारा खर्च खुद उठाते हैं। लोगों को कानो तक यह बात पहुच नहीं पाती और लगता है इनके किताब पर इतनी गोष्टी, इतनी समीक्षा प्रकाशित हो चुकी है, जब की माज़रा कुछ और ही हुवा करता है। खुद साहब समीक्षा लिख कर कई अखबारों, पत्रिका में भेजा करते हैं। छपने के बाद लोगों को दीखते फिरते हैं। फलना फलना अख़बार, पत्रिका में मेरी किताब की समीक्षा छापी है।
तो यैसे किताब और समीक्षा लिखने या छपने का क्या लाभ। बेशक लोग आपको लेखक के रूप में जानने लगेगे लेकिन हकीकत तो आप या आपकी पत्नी जानती है। बसरते के आपने पत्नी को सच बताया हो। वर्ना वो भी इसी मुगालते में जीती रहेगी कि उसके पतिदेव लेखक हैं। लोग जानते हैं। और आप सीना फुला कर पत्नी के सामने तो चल सकते हैं लेकिन जब मंच पर साहित्य के परखी मौजूद होंगे तब आपकी रचना का सही मूल्याङ्कन होगा। वास्तव में आपकी लेखनी में कितना दम है, इसका मूल्याङ्कन तो परखी लोगों के द्वारा ही हो सकता है। लिखे हुवे शब्द को चिरकाल तब संजोने की लिए गुण करी रचना करनी होती है। और उसके लिए पढंत लिख्यंत और स्वाध्याय जरुरी होती है। आज कितने लोग है जो अपनी रचना के अलावे दुसरे को पढ़ते हैं। बहुत ही कम लोग होंगे जो किसी की रचना पर अपनी राये लिख कर लेखक को भेजते हैं। कुछ करते है तो उनको लेखक की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिलती। यानि लेखक- पाठक के बीच के रिश्ते ख़त मेल सब कब के अर्थ हीन हो चुके हैं।

Thursday, January 7, 2010

साहित्य में अतीत


साहित्य में अतीत बड़े ही ब्यापक रूप से वर्णित होता रहा है। किसी की कृति में लमही की जमीन, लोग, बोली वाणी साकार रूप पाते हैं, तो किसी की रचना में मैला आँचल रचा बसा होता है। वहीँ बाबा नागार्जुन के यहाँ छिपकली दीवारों पर गश्त लगा रही होती है तो कानी कुतिया बुझे चूल्हे के पास बैठी खुजला रही होती है इस उमीद में की कभी तो सब लोग होंगे बोहुत दिनों के बाद।

लेखक, कथाकार, उपन्यासकार अपनी लेखनी से अपने आस पास की हाल, उठा पटक को बखूबी पकड़ कर पाठक को परोसते हैं। कालिदास की रचना हो या विद्या निवास मिश्र या फिर निर्मल वर्मा ही क्यों न हों इन सभी की रचना अपने समय और तत्कालीन समय की करवट भी सुनी देखि जा सकती है। कोई लेखक अपने समय की धरकन को भला कैसे नज़रंदाज कर सकता है। जो येसा करता है उसके पाठक वर्ग बड़े ही सिमटे और अपने कुप्प में सिमित रहा करते हैं। किसी भी रचना की व्यापकता की पह्च्यां उसके पाठक की रूचि , पसंद - नापसंदगी पर काफी निर्भर करती है। जो ज्यादा पढ़ा जाएगा उसकी बाज़ार में मांग तो होगी ही साथ ही उससे पाठक वर्ग को उमीद भी होती है। लोग इंतजार करते हैं की अगला क्या आने वाला है। लेखक कुछ नया कहने लिखने के लिया किसे दौर से गुजर कर लिख पता है इसका अनुमान शायद पाठक को न हो लेकिन जो इस दुनिया के लोग हैं वो तो बेहतर समझते हैं।

जो समय के कपाल पर चरण धरने का मादा रखता है वही लेखक कुछ लिख सकता है। वर्ना रोज दिन लेखक उगते हैं और शाम से पहले ही ढल जाते हैं। लेकिन इक हकीकत यह भी है जिसे इंकार नहीं किया जा सकता कि लेखक आज की तर्रिख में केवल लिख पढ़ कर जीवन नहीं चला सकता। घर के लिया चाहिय नून तेल और रोटी। और यह लिख कर संभव नहीं। कभी हमारे साहित्य जगता में यैसे लोग थे। लेकिन आज समय कुछ और है। आज तो यैसे लोगों से कोई अपनी बेटी भी ब्याहना नहीं चाहता।

पैसे का मोल जानना होगा। स्वन्था सुख्या के बजाए बाज़ार और पाठक को ध्यान में रख कर लिखना होगा। वर्ना कई लेखक अपने उम्र के ढलान पर बुनयादी दवा चिकित्सा के घर के कोने में चारपाई पर खस्ते रहते हैं। अपने मेडल, अवार्ड को बेच कर जीवन की आखरी घडी को काटना मज़बूरी होती है। हर कोई प्रेमचंद, रेनू या संसद तक के सफ़र कर आने वाले की पंक्ति में नहीं आता। इक इक पुस्तक छपने में कितनी मसक्कत करनी होती है यह किसी उस लेखक से जान सकता है जिसे प्रकाशक कैसे कैसे नचाते हैं।

बॉस , बस आज इतना ही वर्ना कहीं आप या हम निराश हो कर उमीद छोड़ कर बैठ जाएँ , जो लिखयेगा वही तो आज न कल छापेगा।

Saturday, January 2, 2010

हेल्थ के साथ मजाक

हेल्थ के साथ मजाक कभी भी फायदेमंद नहीं होता। आप भगवन को याद करें या नहीं इससे ज़यादा अंतर नहीं पड़ता। लेकिन यदि हेल्थ को ज़रा भी नज़रंदाज़ किया तो वो आपको ज़रा भी माफ़ नहीं करती। आपको इसी जन्म में यदि कहीं नरक है तो भोगना पड़ेगा।
मैंने दो दिनों में २००० रूपी खर्च कर चूका हूँ। वजह, रक्त चाप की मात्र २५५ हो गया। डॉक्टर को लग रहा था इस उम्र में रक्त चाप इतना कैसे हो सकता है? सो उसने कई तरह के जांच करा डाले। रिपोर्ट के अनुसार मुझे मीठा, बुट्टर, धुयाँ नहीं लेना है। डॉक्टर का कहना था, आप चाहें तो ड्रिंक कर सकते हैं मगर ध्यान रहे इससे ज़यादा खतरनाक धुयाँ होता है। सो मैं इसकी इज्ज़ज़त नहीं दे सकता।
अब लगता है, सच में सेहद ज़यादा नाज़ुक हुवा करता है , अगर लापरवाही की तो उसका हर्जाना तो देना ही होगा।
बस यही कहना है की सेहद के बड़ा कोई नहीं। लापरवाही तो बिलकुल नहीं।

Friday, January 1, 2010

भाषा मुझसे बार बार कहती है वो आपसे शेयर करना चाहता हूँ

हाँ , साल की पहली सुबह भाषा मुझसे कहने लगी ज़रा सोचो तो सही- तुम लोग मुझसे बात करने से डरा करते हो। भला क्योँ ? क्या मैं इतनी बुरी हूँ, या की मेरी सूरत बुरी है। अगर नहीं तो मुझसे बात करने में बेरुखी भला क्यों?
मैंने बोहोत दिमाग खपाया मगर समझ से बाहर थी भाषा की ये बातें। मगर जब गहरे सोच कर देखा तो अमिताभ जी की फिल्म शराबी के संवाद याद आने लगे। " आई वाक् इंग्लिश , आई इत इन्ग्ल्सिः , आई स्लीप इंग्लिश"
वाह !!! क्या बात कह दी अमीत जी ने कहा -
कितनी गजब की बात है भाषा की साथ सोने , खाने , घुमने जैसे रिश्ते बनाने से भाषा तो हमारी हो ही जाती है साथ ही वो हमें समाज में मान , इज्ज़त , और पैसे भी दिलाती है। फिर मैंने सोचा इतनी मज़े की बात को खुद तक दबा कर रखना भाषा की तौहीन ही तो होगी। भाषा सब की सब भाषा की परिवार के हों जाएँ तो कितनी गज़ब की बात होगी। फिर भाषा दर दर हमें ठोकरे खाने नहीं देगी। 'सिंह इस किंग' फिल्म की इक गीत के बोल है - 'इक बारी हो इक बारी ....' हाँ बिलकुल सही समझे इक बरी अगर भाषा से गठजोड़ हुआ तो मान कर चलिए की आपके रिश्ते में तलाक तलाक तलाक के मौके नहीं आयेंगे। आप भाषा से रिश्ता तोड़ सकते हैं मगर भाषा बेवफा नहीं होती।
जब भाषा आप से वफ़ा कर रही है तो आप भाई ! काहे को बेवफाई करने पर उतारू हैं। खा मखा पंगा लेना ज़रूरी है क्या। यार बनी बनायीं, बसी बसाई गृहस्ती में क्योँ आग लगा रहे हैं। ज़रा आप भाई भाषा के संग रह कर देखें तो सही , अगर उसकी यारी बुरी लगे तो बेशक गलियाते , कोसते भाग जाएँ। फिर मैं नहीं कहूँगा की भाषा के साथ ज़िन्दगी बिताने की बात।
सच है , भाषा की दोस्ती अगर निभ जाये तो क्या ही कमाल की बात होती है , आपसे हर कोई बात करना चाहे। आप ज़हन में कहीं भी जाएँ आपके संग भाषा ससा ससा कस्तो ससा तपन कुंजर कस्तो ससा.... आपके मान में चार चाँद लगा देती है। तो फिर सोच का रहे हो भैया? भकुए काहे हैं जी ज़रा भाषा की यारी कुबूल तो कर के देखो क्या ही मज़ा है। माल की क्या बात करते हो भाई , ये तो आपको विदेश भी घुमती है। यानि शादी भारत में और भाषा की पीहर विदेश में आप हो आते हैं। अरे दुलहा राजा अब मान भी जायो , भाषा की संग उसकी बहने साथ में मिला करती हैं। यानि इक के साथ अन्य फ्री.... सौदा घाटे का बिलकुल नहीं है।
मणि सेल्स मैं हूँ आप यही सोच रहे हैं ? हहा हां , मैं हूँ भाषा का सेल्स मैं.... तो क्या इस साल इक भाषा के साथ अन्य भाषा को घर लाना न चाहेंगे? आये न सर जी, आपकी बात सही है वही भाषा लेना चाहते हैं जिस को बाद में आप बेच कर खरीद दाम से ज़यादा कमाना चाहते हैं। तो बस आपके लिए बिलकुल सही मौक़ा है हाथ से इस अवसर को न जाने दीं।
बस इसी उम्मीद के साथ आज की दूकान बढ़ता है। कल फिर आयूंगा गली गली , शहर शहर घूम कर भाषा बेचता हौं। हाँ मैं भाषा बेचता हौं। क्या आप खरीदोगे?

Thursday, December 31, 2009

तो अब चाँद के डूबने के साथ ही २००९ इतिहास का हिस्सा बन जायेगा। लेकिन तरिख्यें तो घटनायों को दर्ज कर चुकी हैं। उसे मिटा पाना मुमकिन नहीं। सो उसे स्वीकार करना ही होगा। यानि तमाम उन चीजों को स्वीकार करने के लिया अमन की उम्मीद तो रखनी होगी।
हमारे समय की सब से बड़ी चुनौती यही है की हम अपनी कमजोरी कुबूल नहीं करते। जब की स्वीकारने में ही भलमनसत होगी। हम आगे से उन गलतियों को दुहराएंगे नहीं। मगर हम अपनी आदतों से कहाँ बाज आते हैं। लेकिन हमें देश और खुद के लिए करना होगा। यही की अपनी भूल को आने वाले समय में न दुहरायें।
अतीत कितनी भी सुखद या की दुखद क्यों न हो उसके संग चिपक कर रहा नहीं जा सकता। यदि कोई भी समाज या की लोग येसा करते हैं तो सच माने की वह विकास नहीं कर सकता। हम अतीत से सीख ले कर अपने वर्तमान को तो सुधर ही सकते हैं साथ ही भविष को भी बना सकते हैं।
अब यह इस बात पर निर्भर करता है की आपको क्या पसंद है। या तो आप अपने अतीत से चिपक कर लाइफ ख़त्म कर लें यह फिर अपने बेहतर भविष का निर्माण कर सकते हैं। यह बात देश और समाज पर भी लागु होता है। यही समाज विकास कर पता है जो अपने वर्त्तमान के साथ प्रयोग करने के लिए तैयार रहता है। जो भी प्रयोग करने में हिचकिचाहट महसूस करते हैं। तो सम्झ्यें की वो अपने विकास के रफ़्तार को ब्रेक लगा रहे हैं।
२००९ कई कोण से खास है - कोपन्हागें में वर्ल्ड सुम्मित। भारत का रुख, भारत के सम्मान में अमरीका के प्रेसिडेंट हाउस में आमंत्रण। देश के लिए राजनायक के रूप में देखा गया। १९९२ में अयोध्या में शर्मनाक घटना मस्जीद को गिरा कर जिस तरह की सहिशुनता का मिसाल पेश किया जाया उसपर शर्म तो आती ही है। लिब्राहन आयोग ने १९ साल बाद उस घटना पर आयोग की रिपोर्ट संसद में पेश की।
सरकार रेस्सेशन के दौर के ख़त्म होने का और्र बना चुकी है। लेकिन सरकार के रिपोर्ट पर विश्वास नहीं होता। यही सरकार है जिसने दिसम्बर २००८ के आखरी हप्ते में कुबूल की थी की हाँ , देश में ६८,००० लोगों की नौकरी जा चुकी है। फिनांस मिनिस्टर ने उद्योग से जुड़े लोगों से कहा की लोगों की नौकरी न ख़त्म करें बल्कि वेतन कम कर दें। आज यही सरकार है जो कह रही है की देश मंदी के बुरे दौर से बाहर निकल चुकी है। अब देखना यह होगा की क्या वास्तव में यह है या की सरकारी बयानबाज़ी भर है।
उम्मीद की किरण साथ होने से रात की काली सेः ज़ल्द खत्म होने की उम्मीद जगती है। न हम हार माने न ही उम्मीद का दमन तोड़ें। रहिमन चुप हो बैठ्या देखि दिनन को फेर। नीके दिन जब आयेहं बनत न लागियाह दीर।
अलबिदा २००९ और अतिथि २०१० को सलाम आइय साहब अब आप क्या रंज या के रंग उछालते है।

साल की पहली मुलाकात

आपके हर सपने को उम्मीद भरी आखें,
हर सुबह इक आशा की किरण,
हर शाम सुकून भरी,
रात विश्राम...
जीवन में काम-
इक मुकाम,
जिस की चाह,
उसे पूरा का सकने का आत्म बल...
शुभ साल करे इन्त्ज्ज़र...
आप का कौशल

Wednesday, December 30, 2009

जाने वाले साल की मार

जी हाँ, जाना वाले साल की उपलब्धि और खोने का परताल तो करना ही चाहिए। क्या हमने खोया और क्या पाया। दरअसल हम अपनी कमजोरी को छुपा कर ही रखना चाहते हैं। समस्या यहीं पीड़ा देती है। पाकिस्तान में इस साल लगभग हर दिन आतंकियों के कहर बरपे हैं। क्या लाहोर, क्या इस्लामाबाद , हर शहर बम की आवाज़ और लोगों की चीख से गूंज उठी है। हर शहर में बम और कुचे में आतंकी रह रहे हैं। मदर्द्से में तालीम तो दहशत , खून , चीख और निर्दोष को मारने की दी जाती है। तो इस माहौल में क्या हम उस देश से शांति की उम्मीद कर सकते हैं ?
पाकिस्तान से क्या हमारे रिश्ते यैसे ही रहा करेंगे। या दोनों देशों की जनता बस खाबों में ही पुनर्मिलन के सपने देखा करेंगे या हकीकत में भी येसा घाट सकता है। पाकिस्तान में हुक्मरान बाद के दिनों में केवल अपनी कुर्सी बचाने के प्रयास में लगे नज़र आते हैं। वो बेहतर जानते हैं की अगर शासन करना है तो लोगों को बुनियादी ज़रूरतों से विचलित करना होगा। वर्ना वो लोग रोज़गार, शिक्षा , सुरक्षा , देश की प्रगति के बारे में सोचने लगेगे। इस लिए उन्हें मूल मुद्द्ये से बहकाना होगा। और यह खेल १९४७ से आस पास से खेली जा रही है।
भारत और पाकिस्तान के बीच सद्भावना पूर्ण रिश्ते तब तक नहीं कायम हो सकते जब तब दोनों देशों के राज्नेतावों को अपने स्वार्थ से ऊपर उठ कर सोचना शुरू नहीं करते।

Monday, December 28, 2009

बात हमने जहाँ रोक कर चले गए थे वहीँ से आगे की यात्रा आरम्भ करते हैं। हम बात कर रहे थे कि २००९ में क्या कुछ घटा क्या बढ़ पाया इसके बारे में संषेप में चर्चा की जाये। तो हम क्यों न भारत से ही शुरू करें।
इस साल देश में आम चुनाव हुवा जिसमे कांग्रेस की सरकार सत्ता में आई। कांग्रेस के खाते में ज्यादा तो वोट नहीं गिरे लेकिन राज्य में सरकार बनाने की बारी को हाथ से जाने नहीं दी।
सरकार तो बनी। लेकिन संसद में सांसदों की हाज़री बेहद चिंता वाली रही। लोक सभा और राज्य सभा दोनों ही सदनों में सांसदों की गैर हाज़री को स्पीकर ने ले कर सभी दलों के प्रमुख से चिंता प्रगट की। जिस पर कांग्रेस की आला कमान ने नेतावों जो हाज़िर नहीं थे उनसे कारन बताने को कहा। गौर तलब है की संसद में इक दिन करवाई पर ७०, ८० लाख रुपया खर्च आता है। ज़रा सोच कर देखे इक दिन में अगर तीन बार भी संसद अवरुद्ध होती है तो देश को कितना नुकशान होता है। आम जनता की खून पसीने की कमाई को यूँ जाया कैसे कर सकते हैं।
अब हम बात करते हैं अपने प्रधान मंत्री मनमोहन जी को अमरीका में ओबामा सरकार ने खासकर अपने पद ग्रहण के बाद किसी राजनायक को भोज पर आमंत्रित कर देश की शान यानि पहले देश को न्योता मिलना वाकई महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

Friday, December 25, 2009

२००९ की अंतिम साँस

२००९ की अंतिम साँस के बारे में आपभी सोच रहे हैं या नहीं? अगर नहीं तो क्यों नहीं क्या आपके दिलचस्पी नहीं रही इन सब में या कि संत हो गए। दोनों ही दशा में आदमी साथ साथ अपनी जमा पूंजी का लेखा जोखा भूल जाता है। तो क्या आप नहीं चाहते कि जाते हुआ साल में ज़रा जानें तो कि क्या खोया और अपने हाथ क्या लगा?
देश दुनिया की राजनीती हो या भूगोल हर जगह कुछ बड़ा घटा है इस साल वह जगह है कोपेन्हागें जहाँ दुनिया की तमाम लीडर्स मिले। आवास तो वर्ल्ड इन्वोर्न्मेंट को बचाने के लिए कुछ खास दस्तावेज़ पर सहमती होनी थी। मगर यह मीटिंग बेनातिज़ रहे। खुद ओबामा मानते है कि देशों के बीच सही तालमेल की कमी की वजह से यह मीटिंग अपने उधेश्य में सफल नहीं हुई।
साहित्य एंड कला की बात करें तो हिंदी की लब्ध नाम कैलाश वाजपई के २००९ का साहित्य अकादमी अवार्ड से नवाजा जायेगा। कुछ वरिष्ठ पत्रकार ,लेखक हमारे बीच से रुख्शत हुए। प्रभाष जोशी जी भी आखिर कागद कारे करने अब उस लोक चले गए। बातें और भी हैं _ रफ्ता रफ्ता हम इक इक कर बात करेंगे.....

Wednesday, December 23, 2009

मीडिया के न्यू पौध

मीडिया को कोई भी कही भी राह चलते पत्थर मार कर आगे चला जाता है। वास्तव में मीडिया की इस छवि के ज़िम्मेदार वैसे रिपोर्टर हैं जिनके लिए हर घटना इक सनसनी है। खबर संजीदगी की हो या वारदात की उनकी आवाज़ उसी पीच पर रन मर रही होती है। गोया मीडिया खबर देने की जगह भय की दुकान खोल कर बैठ गई हो।
मीडिया की इस पौध को दरअसल सही खाद पानी ही नहीं मिल पाते। जिसका परिणाम यह होता है की वो जब जौर्नालिस्म के कोर्से करने के बाद जब जॉब शुरू करते हैं तब किताबी और वास्तविक खबर में अंतर दिखाई देता है।

Sunday, December 13, 2009

तकनीक से डरता मन

तकनीक जहाँ हमारे रोजमर्रे की ज़रूरतों को आसान किया है वहीं कुछ लोगों के लिए आफत से कम भी नही होती है तकनीक का इस्तमाल करना। डर हलाकि कई तरह की होती हैं मसलन पानी, आग, उचाई, किसी वस्तु, या किसी भी खास चीज से आपके मन में भय बैठ सकता है। बचपन की कोई भयावह घटना भी डर का कारन बनते हैं। अगर बच्चे को शुरू में ही डर के वजह को ख़त्म कर दे तो आगे चल कर वह उस चीज से डरेगा नही। मगर हम चीजों को समझने की जगह डर को बार्कर रखने में मदद करते हैं। परिणाम यह होता है की बच्चपन का डर जीवन भर साथ रहता है। हो सकता है वही डर अगली पीढ़ी में भी ट्रांसफर हो जाए।
पिछले दिनों अपने पिता जी को मोबाइल उसे करना सिखा रहा था तब मैंने महसूस किया की उन्हें मोबाइल के बटन प्रेस करने में कठिनाई हो रही है। कई बार इक बात समझा कर थक गया। मुझे लगा शायद मैं सिखने में सफल न हो सकूँ। मगर इक बार मुझे बचपन में पढ़ते समय पिताजी के चहरे पर उदासी दिखी। पिताजी निराश से लग रहे थे। पास की चाची ने कहा पंडी जी पूरे शहर के लड़कों को पढ़ाते हैं मगर अपना बेटा ही नही पढ़ा पाते। पिताजी को बात लग गई। उन्होंने कहा अगर मैं सही में कुशल मास्टर हूँ तो इसे को पढ़ा कर ही दम लूँगा। और देखते ही देखते वह दिन भी आया की वह लड़का इक दिन पढ़ लिख गया। यह ज़वाब था मेरे पिताजी का चाची के लिए। पिताजी ने उस टाइम तो कुछ नही कहा था मगर मन में बैठा लिया की इस को पढ़ा कर ही रहूँगा। वह लड़का कोई और नही बल्कि मैं ही हूँ।
अब मेरे आखों के सामने २० २२ साल पहले की घटना घूम गई । मैंने सोचा जब पिताजी मुझे पढ़ा कर ही चैन लिए तो मैं भी उनको मोबाइल का इस्तमाल करना सिखा दूंगा। तीन ऋण में इक ऋण पित्री ऋण भी है, सो मोबाइल के इस्तमाल के सिख दे कर ऋण में मुक्त होना चाह थी। और देखा की उन को मोबाइल के कमांड और बटन के इस्तमाल में परेशानी हो रही है। सो कई तरह के उद्धरण से मोबाइल का प्रयोग सिखा दिया। मुझे उस टाइम गुस्सा, खीज भी होती की क्या है पढ़े लिखे हैं फिर क्यों समझने में बाधा क्या चीज है। मैंने देखा की दरअसल जो लोग जीवन में तकनीक के इस्तमाल से भागते हैं उन के लिए नये नए तकनीक इक डर से कम नही है।
अपने डर के ऊपर ख़ुद को काबू पाना होता है।

Wednesday, December 9, 2009

अथातो म्रत्यु दर्शनं

अक्सर अपन मौत को कितना भयानक मानते हैं। बल्कि हम तो मौत को पास भी फटकने भी नही देना चाहते। हमारी कोशिश होती है के यह हमारे दुश्मन को ही भाय। बचपन से ही हमारे दिमाग में यह बात ठूस दी जाती है के मौत बड़ी ही डरावनी और दुःख से भरी होती है। जीवन से कहीं ज़यादा नजदीक मौत को हम याद कर लिया करते हैं। दरअसल मौत डरावनी नही होती, और न ही मौत भयावह ही होती ही। हम लोगों के दिमाग में न केवल स्कूल, घर, माता- पिता बल्कि धर्म भी मौत के बारे में सही सही जानकारी नही देते।
भारतीय दर्शन के अनुसार आत्मा का पुनर्जन्म नही होता। कुछ दर्शन मानते हैं की आत्मा अपने कर्मों के अनुसार जन्म लेती है। मगर संख्या , योग , न्याय और चार्वाक दर्शन न तो पुनर्जन्म को मानती है और न आत्मा की कोई सत्ता ही स्वीकारती है। बलिक दर्शन का तो यह भी कहना है के अनु परमाणु आदि ही नही बल्कि हमारे शरीर में पाए जाने वाले सेल जब काम करना बंद कर देते हैं तब हमारा शरीर मृत मान लिया जाता है। आप इसे मोक्ष, निर्वान, मुक्ति जो भी नाम दे लें दरअसल शरीर को त्याग कर हमारी सासें यानि हवा, पानी , मिटटी, आकाश और आग इन पञ्च तत्वा में विलीन हो जाती है।
मौत जब की कितनी करीब होवा करती है इसका अंदाज़ा नही लगा सकते।

Tuesday, December 8, 2009

तेरे मन्दिर मेरे राम

तेरे मन्दिर मेरे राम
सार्वजनिक स्थानों पर धार्मिक स्थल नही होना चाहिए। जो पहले से बन चुके हैं उसे गिरना यदि संभव नही तो कम से कम राज्य और केन्द्र सरकार कोर्ट को विश्वास दिलाये के सरकार किसी भी कीमत पर सार्वजनिक स्थल पर मन्दिर , मस्जीद, गुरुद्वारा आदि का निर्माण नही होने देगी। सरकार को इससे पहले भी कोर्ट ने इस बाबत आदेश दिया था मगर सरकार के और से बरती जा रही लापरवाही को कोर्ट ने गंभीरता से लिया है। कोर्ट ने कड़े शब्द में कहा है सार्वजनिक स्थल पर धार्मिक प्रतिक यानी मन्दिर , मस्जीद आदि का निर्माण नही होगा। अगर एसा नही हुवा तो भुगता नही जाएगा।
सुप्प्रेम कोर्ट ने सेंट्रल और स्टेट गवर्नमेंट को आगाह किया है। किसी को भी पब्लिक प्लेस पर धार्मिक स्थल निर्माण की इज़ाज़त नही होगी। अक्सर देखा गया है की मन्दिर या मस्जीद आदि के बहाने सरकारी जमीन पर कब्ज़ा कर लिया जाता है। शुरू शुरू में तो यह छोटे छोटे स्थर पर किया जाता है मगर जब लगता है की अब यहाँ मन्दिर बनाई जा सकती है तब सांसदों , अन्य अधिकारी के बल पर निर्माण कार्य शुरू हो जाता है । सरकार देखती ही रह जाती है उसके सामने पब्लिक प्लेस पर कुछ खास लोगों का कब्ज़ा हो जाता है। इतना ही नही जब इक बार मजार बन जाता है या की मन्दिर बन कर पूजा होने लगती है तब उस जगह को खली करना बोहोत मुश्किल काम होता है। समाज में मन्दिर, मस्जीद , गुरुद्वारा को ले कर आम जनता में खासे लगाव होता है। यदि कोई सरकार भी तोडना चाहे तो समाज में लोग विरोध करने उतर जाते हैं। इसे मुद्दा बना कर विपक्ष सरकार को घेर लेती है। मामला धर्म से जुड़ने के कारण कोई भी सरकार धार्मिक स्थल को तोडना नही चाहती। यही वो जमीन है जिस पर आम लोगो के पीछे चुप कर कुछ खास लोग जमीन पर कब्ज़ा करते रहते हैं। इसी प्रवृति को काबू में करने के लिए कोर्ट ने राज्य और केन्द्र सरकार को आदेश दिया है।

Sunday, December 6, 2009

सरयू में बह गए हजारों खोयाहिशों

आज ही के दिन भारत के धर्निर्पेचता के धज्जी उडी थी। जी सही समझ रहे हैं। अगर नही पल्ले पड़ा तो ज़रा मेमोरी पर सर्च बटन प्रेस कीजिये। हाँ अब आपके मेमोरी के सेर्फस पर दिसम्बर ६ १९९२ उभरा होगा। साथ ही खून से लाल सरयू नदी भी खामोश दिख रही होगी। सरयू का पानी लाल होगा। इस के साथ ही सरिया, तोड़ फोड़ के आवाज़ भी सुनाये दे रही होगी।

बस अब आप देख सकते हैं, अजी साहिब ज़रा कानो को साफ करे तो वह आवाज़ भी सुन सकते हैं, जय श्रीराम मन्दिर वहीं बनायेंगे.... जो राम का नाम नही लेगा वो हिन्दुस्ता का काफ़िर है। अब मथुरा की बारी है। और लोग नारे लगा कर अपनी पौरुश्ता का प्रमाण दे रहे थे। साथ ही हिंदू होने के निकष भी दुनिया के सामने रख रहे थे। मीडिया की नज़रें उत्तर प्रदेश के सस्र्यु के तट पर टिके थे।

देखते ही देखते गुम्बद सदियों से धुप , पानी , धुल फाक रहा था। आज उसे सचे हिंदू भीड़ ने ज़मिन्दोस्त कर दिया। चलिए साहिब गुम्बद को अब रहत मिली या नही पर कुछ लोगों के आत्मा ज़रूर शांत हुई। मगर अभी उनकी मुराद पुरी नही हुई है। उन्होंने तो देश के हिंदू समाज को वचन दे रखा है की जब तक राम लाला का मन्दिर नही बन जाता तब तक हम कैसे कह सकते हैं गर्व से कहो हम हिंदू हैं। अभी आगे की लड़ाई बाकि है।

इन्ही दिनों लिब्राहन कमिटी की रोपोर्ट संसद में रख दी गई , लेकिन उस पर चर्चा होना बाकि था। मगर अगले दिन मीडिया में आयोग की रिपोर्ट प्रकाशित हो गई। बीजेपी के नेतायों को इक मुद्दा मिल गया की यह कांग्रेस की चाल है। कुछ स्टेट में इलेक्शन होने हैं इसी को ध्यान में रख कर रिपोर्ट लीक की गई।

बहरहाल, बहस तो संसद में होगी ही। मगर ध्यान देने की बात यह है की जब यह घटना को अंजाम दिया जा रहा था उस टाइम सेण्टर में कांग्रेस की सरकार थी। नर्शिन्घा राव प्रध्यान्मंत्री थे। उन्होंने लापरवाही की। इस को कोई झुठला नही सकता। मग राव sahib के समिति बा इज्ज़त बरी कर देती है। समिति की रिपोर्ट जो भी हो। इक बात साफ है, सरकारें बदलती हैं, पार्टी के चहरे बदल सकते हैं। मगर राम लाला की ज़मी पर लाखों लोगों की खून से सनी ६ दिसम्बर १९९२ नही बदल सकती। सरयू में जल मग्न तमाम चहरे आज भी अपने गावों की तरफ़ आस लगाये टुकुर टुकुर देख रही हैं.

Tuesday, December 1, 2009

संसद से अनुपस्थित रहे संसद

संसद फिर शर्मसार हुवा इस बार न कोई मुंबई का था और न किसी ने किसी को भाषा को लेकर गालियें ही दी मगर यह संसद की हिस्टरी में तीसरी घटना है। दरअसल स्कूल के दिनों में जिस तरह बच्चे स्कूल से भाग लेते हैं ठीक उसी तर्ज पर सोमवार यानि ३० नवम्बर को संसद के ३४ सांसद गैर हाज़िर थे। जब की उन सांसदों ने प्रश्न लिख कर लोक सभा स्पीकर मीरा कुमार को भेजा था। मगर जब मीरा कुमार ने सवालों के ज़बाब तलब करने के लिए सांसदों के नाम पुकारे तो उनमे से कोई भी संसद में हाज़िर नही था। जब की सम्बंधित मिनिस्टरी के मंत्री मौजूद थे । पर सवाल के ज़वाब जानने के सरोकार ने वास्ता नही रखने वाले संसद नदारत थे। मीरा कुमार ने इस मुदे पर संसद में श्लील भाषा में कहा के यह जिमेदार सांसदों के रवैया नही कह सकते।
इस तरह आज यानि मंगलवार को तमाम अख़बारों के प्रथम पेज पर बड़ी महत्तया के साथ ख़बर छापी गई । कुछ हेडिंग पर नज़र डालते हैं ' और संसद में सवाल तो पूछे मगर ज़वाब सुनने के लिए संसद ही नही', ' सवाल पूछने में दिखाई बे रुखी संसद से नदारत रहे सदस्य', आदि।

शिक्षकीय दुनिया की कहानी के पात्र

कौशलेंद्र प्रपन्न ‘‘ इक्कीस साल के बाद पहली बार किसी कार्यशाला में बैठा हूं। बहुत अच्छा लग रहा है। वरना तो जी ...