क्या यह ज़रूरी है की जो भी कूड़ा आप लिखें उसे पढने वाला मिले ही नही बिल्कुल नही सो चिंता किस बात की लिखते जावो लिखने की सच्ची भावना से। अगर यह लालसा मन में होगी तो पाठक न मिलने पर दुःख होना निश्चित है। तो कुछ लोगो को बिना इसकी परवाह किए की कोई पढेगा भी बस लिखना जारी रखना चाहिए।
तभी तो हिम्मत कर के लंबे समय के बात पोस्ट कर रहा हूँ।
यह एक ऐसा मंच है जहां आप उपेक्षित शिक्षा, बच्चे और शिक्षा को केंद्र में देख-पढ़ सकते हैं। अपनी राय बेधड़ यहां साझा कर सकते हैं। बेहिचक, बेधड़क।
Tuesday, April 28, 2009
Subscribe to:
Posts (Atom)
शिक्षकीय दुनिया की कहानी के पात्र
कौशलेंद्र प्रपन्न ‘‘ इक्कीस साल के बाद पहली बार किसी कार्यशाला में बैठा हूं। बहुत अच्छा लग रहा है। वरना तो जी ...
-
कौशलेंद्र प्रपन्न शिक्षा और परीक्षा दो पाटन के बीच में बच्चे साबूत नहीं बचे। यह सिलसिला जमाने से बतौर जारी है। लेकिन हालिया घटनाएं बता...
-
कौशलेंद्र प्रपन्न हमारे शिक्षक पढ़ाने पर ज़ोर देते हैं। ये अपनी कक्षा में पढ़ाने भी चाहते हैं। फिर क्या वजह है कि हमारे शिक्षक न पढ़ा पाने की ...
-
कौशलेंद्र प्रपन्न श्री पंकज चतुर्वेदी जी के सानिध्य में तकरीबन चालीस शिक्षकों ने आधे घंटे में अख़बार और पत्रिकाओं का बनाकर अपन...