मीडिया को कोई भी कही भी राह चलते पत्थर मार कर आगे चला जाता है। वास्तव में मीडिया की इस छवि के ज़िम्मेदार वैसे रिपोर्टर हैं जिनके लिए हर घटना इक सनसनी है। खबर संजीदगी की हो या वारदात की उनकी आवाज़ उसी पीच पर रन मर रही होती है। गोया मीडिया खबर देने की जगह भय की दुकान खोल कर बैठ गई हो।
मीडिया की इस पौध को दरअसल सही खाद पानी ही नहीं मिल पाते। जिसका परिणाम यह होता है की वो जब जौर्नालिस्म के कोर्से करने के बाद जब जॉब शुरू करते हैं तब किताबी और वास्तविक खबर में अंतर दिखाई देता है।
यह एक ऐसा मंच है जहां आप उपेक्षित शिक्षा, बच्चे और शिक्षा को केंद्र में देख-पढ़ सकते हैं। अपनी राय बेधड़ यहां साझा कर सकते हैं। बेहिचक, बेधड़क।
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शिक्षकीय दुनिया की कहानी के पात्र
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