Tuesday, June 26, 2012

सवाल शिक्षक के निराले
शिक्षा का अधिकार कानून 2009 पर दो दिन दे कार्यशाला में प्रक्षिशन देते हुवे शिक्षक वर्ग से जिस तरह के सवाल आ रहे थे उसे सुन कर अनुमान लगाया जा सकता है कि  यह वर्ग सिर्फ बुनियादी कमियों को रोना रो कर अपनी जिमेदारी से पल्ला झड़ना बेहतर जनता है. पंखा नहीं है, लाइट नहीं है, बच्चे नहीं है, आदि सवाल  तो पूछे गए लेकिन  इक  लड़की ने पुचा आप शिक्षक  व् स्कूल  इतना रोचक  लुभावन  क्यों  नहीं   की बच्चे  भागे च्च्ले आयें. इस सवाल पर शिक्षक  व् शिक्षाक्य वर्ग  टूट पड़े .  आज के बच्चे  पीढ़ी का वामन करने लगे.
जब विद्यालय प्रबंधन समिति के काम व् जिमेद्दारी पर सत्र शुरू हुवा तो सबसे पहले इसका विरोध इसी वर्ग ने किया. ये अनपढ़ , ना समझ  हमें बताएँगे स्कूल कैसे चलाना है? बह्हल ,  शिक्षकों को   सकारात्मक  ढंग  से शिक्षा का अधिकार कानून  को समझना और पढना होगा. जब यह वर्ग  साथ  देगा और अपनी सहभागिता  देगा तभी 2015 सब पढ़े सब सब स्कूल  जायगे का सपना पूरा हो सकेगा.                  

Thursday, May 17, 2012

Hello all of Education lover. We should see how much education get in 2012-13 budget. Today our education system is fighting not only with money shortage but teachers posts are too important issues in several states. 
sharing my story on education in budget 2012-13 which have published in YOJANA hindi and recently webcast in this web magazine 
http://www.swargvibha.in/aalekh/aalekh_writers/kaushlendra%20prapann.html

Sunday, May 13, 2012

Today Aameer khan's program based on child abuse and we parents. How we can save our children. Its important now a days because parents have not too much time to give proper company with our kids. That is why some closest person take advantage and they did wrong with our kids.
NCPCR JJAct 2007 and in state level SCPCR are too active to take action onto such type of cases. Although, we have NCPCR and JJ Act 2007 but still children are suffering from such incident almost every day in our country. Does not matter the place, name, form or cast and society. what is there in the form, name, cast or face. Matter is we have to aware and rise our voice onto this issues.
If you see two months before Times of India published on story on this issue. That report show that 58% children abused every day in our country by family members or closed relatives. It is not a good treatment with our coming future seeds.
Think Think and Than Act.

Thursday, May 10, 2012

शिक्षा का अधिकार कानून लोक सभा में हुवा पास 
राज्य सभा के बाद अब लोक सभा में भी शिक्षा का अधिकार कानून आखिरकार पास हो गया. इस कानून के तहत गौतलब है की कुछ गैर्परामारिक शक्षिक संतान चाहते थे की इससे दूर रखा जाए सो वो दूर ही रहे. मसलन मदरसे और वैदिक संस्थान को आरटी ई के बाहर रखा गया है. 
सवाल  शिक्षा के अधिकार कानून के  तहत अब 0 से 6 आयु वर्ग के बच्चों को भी शामिल किये जाए की बात उठानी चाहिए. मगर अभी यह मुद्दा ठंढे बसते में है. खैर , कम से कम 6 से 14 साल के बच्चों को शिक्षा मिले इसको सुनिषित करना होगा.        

Wednesday, May 2, 2012

दरअसल  जीवन में इक बार ही इक  ही समय  में कई चीजें घाट रही होती हैं. इनको प्रबंधित  करना पड़ता है . जो डूबा हो वही बता सकता है की कैसे कोई घहरे पानी में जीवन बचा सकता है 

Tuesday, May 1, 2012

ग्लोबल एक्शन वीक का समापन २८ अप्रैल को 


डेल्ही सहित देश  के अन्य राज्यों मसलन हरयाणा, मुंबई, उड़ीसा, उत्तराँचल, झारखण्ड आदि में बड़ी ही सफलता के साथ ग्लोबल एक्शन वीक मनाया गया. डेल्ही के जनकपुरी स्थित नगर निगम प्रतिभा विद्यालय सी ५ में २८ अप्रैल को मनाया गया. इस कार्यक्रम में उनिस्को के भारत में प्रतिनधि श्री शिरंग्रू, शिक्षा अधिकारी श्री अलीसेर उम्मेर, उनिसफ़ के प्रोग्राम अधिकारी युकोको फूजी मारो के साथ भुत्पुर्य मेयर पृथ्वी राज सहह्नी, वर्त्तमान कांसलर अनीता ममतानी मौजूद थीं.
डेल्ही के साथ ही उड़ीसा में भी जोरो खरोस के साथ मनाया गया. वहीँ झारखण्ड के बोकारो में हमारे प्रतिनिधि संजय सिंह ने लोकल प्रिमरी स्कूल में ग्लोबल एक्शन वीक का कार्यक्रम किया. वहीँ उत्तर प्रदेश के मेरठ में मुकेश कुमार और संजीव की अगुवाई में कार्यक्रम संपन्न हुवा.  वहीँ मुंबई में विनोद सातवे ने विभिन्न विद्यालयों में ग्लोबल एक्शन वीक के तहत पेंटिंग के साथ कार्यक्रम किया.              




जी पुरे देश में तक़रीबन ११ राज्यों में २२ से २८ अप्रैल के बीच ग्लोबल एक्शन वीक मनाया गया. ऊपर जिन  तस्वीरों   को देख रहे हैं ये ग्लोबल एक्शन वीक २०१२ के हैं. इस साल ० से ६ आयु वर्ग के बच्चों के देखभाल और शिक्षा पर केन्द्रित था. देल्ल्ही के जनकपुरी के निगम प्रतिभा विद्यालय सी५  में में २८ को मनाया गया.
इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि उनिस्को के भारत में प्रमुख श्री शिन्गेरू थे. वहीँ मंच में साथ थीं उनिसफ़ की भारत में शिक्षा विभाग में प्रोग्राम ऑफिसर उकाको फूजी मूरी. साथ ही वर्तमान कांस्लेर अनीता ममतानी मौजूद थीं.
झारखण्ड, मुंबई , उड़ीसा, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश आदि जगहों में ग्लोबल एक्शन वीक मनाया गया.
यह अवसर होता है हर साल राज नेतावो को याद दिलाना की साहब आप लोगों ने डकार में सहमती पात्र पर दस्तखत किया था की २०१५ तक ० से ६ आयु वर्ग के बच्चों को शिक्षा मिल जायेगी. मगर अभी यह लक्ष्य दूर है.
कार्यक्रम के बाद राज्यों में महामहीम राजपाल को ज्ञापन चार्टर सौपा गया.       



   

Friday, April 13, 2012

शिक्षा के अधिकार कानून के आगे हार गई पब्लिक लामबंद

शिक्षा के अधिकार कानून यूँ तो लागू हुवे कुछ साल यानि २००९ में , बीत गए. लेकिन सरकारी स्कूल को छोड़ कर पब्लिक स्कूल और केंद्रीय विद्यालय आदि इसकी परिधि से बाहर थे. पब्लिक स्कूल के तर्क थे की हम इस स्थिथि में नहीं है की २५ फीसदी गरीब बच्चों को मुफ्त में पढ़ा सकें. सरकार की और से दिए ऑफर किये पैसे २१०० रूपये काफी नहीं लगा उन्हें. 
आखिरकार न्यायालय की और से फहल हुई और अब पब्लिक स्कूल को भी अपने यहाँ २५ फीसदी गरीब साधन हीन बचों को शिक्षा देनी पड़ेगी. 
बहस यह भी उठ रही है की क्या गरीब माँ बाप उस बच्चे के बाकि स्कूल के खर्च वहां कर पायेंगे? क्या गारंटी है की ये बच्छे कुछ दिने के बाद द्रौप आयुत में शामिल हो जाएँ?
जो भी हो कम से कम अवसर तो मिला. बुनियादी तालीम तो हाथ में आई. ग्लोबल एक्शन वीक हर साल २३ लस २८ अप्रैल को मनायाजता है. इस के पीछे युद्श्य ग्लोबल कोलितिओं आफ एदुकतिओन पर दुनिया के तमाम नेतायों ने दस्थ्खत किया था की २०१५ तक हम सभी बच्चे के (० से ६ साल के उम्र)  बुनियादी शिक्षा दे दी जायेगी. हकीकत जो भी हो अभी भी लाख से ज्यादा बच्छे स्कूल से बहार हैं.            

Thursday, April 5, 2012

ग्लोवल एक्शन वीक २३ अप्रैल से २९ अप्रैल तक

गौरतलब है की न केवल भारत में बल्कि पूरी दुनिया में भूख, कुपोषण, जन्मते बाल मृतु दर काफी है. २००१ में ९१४ लडकिय जन्मते मर जाती थीं वहीँ यह फीसदी कम होने के स्थान पर २०११ में यह आकड़ा ९४६ तक पहुच गया है. शिक्षा , स्वाथ्य, सुरक्षा भूख आदि से बच्चों को निजाद दिलाने के लिए विश्व के नेतावो ने नेशनल कोन्वेन्तिओन ऑफ़ चिल्ड रिघ्ट्स की घोषणा की थी. यानि २०१५ तक दुनिया के तमाम  बच्चे  शिक्षा, भूख, स्वाथ्य से वंचित नहीं रहेंगे. लेकिन आकडे बताते हैं की अभी भी देश के ८० लाख से भी अधिक बच्चे जनमते ही मर जाते हैं. इनमे लड़कियों की संख्या अधिक है. जनम के पहले २९ घंटे खासे अहम् होते हैं. इसी दौरान तमाम तरह के खतरे बच्चों पर होते हैं. यदि इस समय हमने संभल कर बच्चों को निकल लिया फिर वो जी जाते हैं.
ग्लोवल एक्शन वीक २३ से 29  अप्रैल को पुरे देश में एअर्ली चिल्धूद केयर एंड एदुकतिओन पर केन्द्रित कार्यक्रम करने जा रही है. इस दौरान पिक्टुरेस, स्लोगन, कहानी, बाल केन्द्रित प्रोग्राम आयोजित होंगे. इस के पीछे लक्ष्य आम लोगों के साथ ही सरकार के बीच जागरूकता पैदा करना है.
गौरतलब है की राईट तो एदुकतिओन शिक्षा का अधिकार २००९ महज ६ से १४ साल के बच्चों की शिक्षा की बात करता है. सवाल युथ्ता है की ० से  ६ साल के बच्चों को किसके कंधे पर डालें. ० से ६ साल के बच्चों को संजयान लेते हुवे ग्लोवल एक्शन वीक शुरू के ० से ३ साल के बच्चों की शिक्षा , स्वथ्या का मुदा ले कर आवाज बुलंद कर रहा है.
० से ३ साल का टाइम वो होता है जिसमे बच्चों को स्वाथ्य के प्रति खासे सजग होना होता है. लेकिन दुर्भाग्य है की इसी आयु के बच्चे ज्यादा काल के गाल में समां जाते हैं.                      

Sunday, April 1, 2012

समीक्षक की नज़र में

समीक्षक की नज़र में हर किताब टेक्स्ट किसी तिलस्म से कम नहीं होती. हर पेज हर शब्द हर विचार नए आयाम देता है. यदि समीक्षक किसी किताब को पूर्वाग्रह से पड़ता है तो वो किताब के साथ न्याय नहीं कर सकता. समीक्षा को तथास्त हो कर किताब की समीक्षा करनी चाहिए. किताब की भाषा, विचार, प्रस्तुति, शैली आदि की शाताएं पाठकों के सामने रखना चाहिए.
पाठक आखिर किताब क्यों पढ़े? पाठक किताब से क्या ले सकता है? आदि सवालों के जवाब तलाश कर समीक्षा में दिखने की कोशिश करनी चाहिए. इक होती है समीक्षा, आलोचना, समालोचना, पुस्तक परीचे आदि. इन सब में अंतर होता है. आलोचना, समालोचना जो की पुस्तक की गहराई से जाच पड़ताल करी है. जिसको किसी पत्रिका में जगह मिलती है. लेकिन पुस्तक को रोज दिन प्रकाशित होने वाली अखबारों में पुस्तक परीचे को जगह मिलती है.
पुस्तक परीचे में समीक्षा किताब की इक चलते चलते परिचय लिखता है. वहीँ समीक्षा जो पत्रिका के लिए लिखी जाती है वो आलोचना या समालोचना कह सकते हैं.
पाठक के लिए जरुरी यह है की वो पड़ने के लिए किस किताब का चुना करे. आज इस हकीकत से मुह नहीं मोड़ सकते की टाइम वो भी पड़ने के लिए किसी के पास नहीं है. यदि कोई टाइम निकलाता है तो उस टाइम का सही युप्योग हो सके. इस लिए वह समीक्षा पद कर किताब का चयन कर सकता है.
इस लिहाज से समीक्षक को गंभीर और संतुलित हो कर किताब की समीक्षक की भूमिका निभानी चाहिए                          

Thursday, March 22, 2012

बजट के पैसे कितने मिलते हैं स्कूल के बच्चों के लिए

इक खबर और रिपोर्ट के अनुसार बजट में शिक्षा की बेहतरी के लिए सर्वशिक्षा के मद में हर साल इजाफा हो रहा है लेकिन प्रथम के इक रिपोर्ट की मानें तो मिलने वाले पैसों का अधिकांश भाग रंगे पुताई, रजिस्टर, स्कूल के मरमात में खर्च हो जाते हैं. अगर फीसदी पैसे की बात करें की कितना भाग बच्चों की शिक्षा पर खर्च होता है तो ताजुब होगा सिफर है महज ६ फीसदी ही शिक्षा की बेहतरी पर होता है.
प्रथम ने 14,२८३ हज़ार स्कूल को अपने सतुदी के लिए चुना जिसमे यह हकीकत सामने आया. गौरतलब है की सरकार हर साल सर्वार्शिक्षा, प्राथमिक शिक्षा, उचा शिक्षा को बेहतर बनाने के लिए पैसों को बढ़ाती रही है. इस बार २०११-१२ की तुलना में २९ फीसदी ज्यादा मिले लेकिन हकीकत यह है. २००९-१० में जहाँ २००,४ करोड़ रूपये मिले यहीं २०१० में ४,२६९ करोड़ रूपये मिले. यदि रूपये पर नज़र डालें तो पायेंगे की हर साल बजट में कमी नहीं है. तो सवाल उठता है फिर पैसे जाते कहाँ है? क्यों स्कूल को शिक्षा के मद में मिले पैसे को इस्तेमाल अन्य कामों में करना पद रहा है ?
बहरहाल, पैसे जहाँ भी जिस के भी जेब में जा रहे हैं वह बच्चों के पहुच से काफी दूर है.  
          

Saturday, March 17, 2012

ज़िन्दगी कभी ...

ज़िन्दगी कभी ..
.आगे तो कभी काफी आगे निकल जाती है ,
पीछे कई सारे सवाल फेक जाती है,
धुन्ध्ते रहते हैं हम लोग,
मैथ खुजाते,
बाल नोचते,
सुलझाने को ज़िन्दगी की गुथी.
कई बार ज़िन्दगी हम से आगे निकल जाती है-
तो कभी हम ज़िन्दगी से आगे,
मुद मुद कर आखें,
महसूस करते हैं,
राह के पथिक को,
जो मिले इक बार,
वो जुदा ना हो पाए.             

Friday, March 16, 2012

2012-13 के बजट शिक्षा को कितना मिला



संसद में दादा के दिए भाषण से शब्द उधर लें तो नीचे के तथ्य सामने आते हैं- 
शिक्षा का अधिकार और सर्व शिक्षा अभियान हेतु 2012-13 के बजट अनुमान में 25,555 करोड़ रुपये के आवंटन का प्रस्‍ताव है, जो कि 2011-12 की तुलना में 21.7 प्रतिशत अधिक है।
·         12वीं योजना में मॉडल स्‍कूलों के रूप में ब्‍लॉक स्‍तर पर 6 हजार स्‍कूलों की स्‍थापना का प्रस्‍ताव है।
·         राष्‍ट्रीय माध्‍यमिक शिक्षा अभियान हेतु 3,124 करोड़ रुपये उपलब्‍ध कराए गए हैं, जो कि 2011-12 के बजट अनुमान की तुलना में 29 प्रतिशत अधिक है।
गौरतलब है की इस पुरे बजट में प्राथमिक और कॉलेज के साथ ही शोध संसथान को क्या मिला यह इक्सिरे से गायब है. 
शोध और युनिवेर्सिटी स्तर की शिक्षा के सुधार के लिए साफ साफ़ कोई संकेत नहीं मिलते. इसके पीछे शिक्षा को किस संजीदगी से लिया जाता है इस का पता चलता है. यह हकीकत किसी से छुपा नहीं की आज जितनी आवश्यकता बाज़ार को दुरुस्त करने की है उससे जरा भी कम जरूरत शिक्षा को नहीं है. दिन प्रतिदिन देश की प्राथमिक और युनिवेर्सिटी की शिक्षा महंगी और स्तरहीन होती जा रही उस की चिंता सरकार को न जाने क्यूँ नहीं है.     


Thursday, March 15, 2012

रेल मंत्री तो ट्रैक से उतार दिए गए

दीदी के नहीं मान कर रेल मंत्री ने देखलिया की पानी में रखकर मगर से बैर नहीं किया जाता. लेकिन पता नहीं द्विवेदी ने क्या सोच कर रेल को इचू से बह्हर निकालने पर तुले थे बेचारे खुद बाहर कर दिए गए. गौरतलब हो की रेल मंत्रालय ने पिछले १० सालों में किसी किस्म के किराए में इजाफा नहीं किया था. इसके पीछे हर कोई अपने सर पर ठीकरा नहीं फोड़ना चाहते थे सो किराए में इजाफा के रिश्क नहीं लिया. मगर किसी न किसी को तो रेल विभाग को संजान में लेना था.
अब चीर इंतज़ार वित् बजट आने वाला है. आज की रात सरकार, बाज़ार, कंपनी, घर आदि के लिए बेहद गहरा है. कल यानि १६ मार्च २०१२ की दुपहरी सब के लिए तपिश लाने वाली है. हर सेक्टर को कल कितना मिलने वाला है इस तरफ नज़रें टिकी है.
क्या शिक्षा की बेहतरी के लिए वित् मंत्री कुछ ठीक ठाक आवंटन करने वाले हैं? बस कल इन्सभी पर से पर्दा उठने वाला है. इक बात तो जाहिर है की यदि स्कूल शिक्षा ठीक नहीं किया गया तो देश महज साक्षर बन सकता है शिक्षित नहीं.              

Sunday, February 19, 2012

फिल्म भी दर्पण होते हैं समाज के हलचल दर्ज है

फिल्म बिधा भी कम मसक्कत के नहीं हैं. इस विधा में  भी शोध और दिमागी  कसरत  करना  पड़ता है. पथेर पाचाली आज भी दुनिया के १० क्लास्सिक फिल्म में शामिल है. फ़िल्में भी अपने समाज की धरकनें जज्ब करती है. टाइम गुजर जाने के बाद  जब हम इन फिल्मस के कथानक देश काल पर नज़र डालते हैं तो उस काल, देश के तमाम उठा पथक की जानकारी मिलती है. आलम आरा, हरिश्चंद्र, दो बीघा जमीन, नदिया के पार, शोले आदि यूँ तो लिस्ट लम्बी हो सकती है. लेकिन यहं लिस्ट बनाना न तो मकसद है और न ही जरूरी.
सवाल है फिल्म्स देखते टाइम हम महज़ आनंद उठा कर घर आ जाते हैं. निर्देशक के मेसेज को हॉल में ही दफना कर आते हैं. साहित्य हो या कला के दुसरे दर्पण हर दर्पण में अपने समाज के हलचल कैद होते हैं. पेज थ्री, पिंजर, नो ओने किल जसिका, लगन फिल्म्स को देखते हुवे हम उस बीते काल खंड के हिस्सा हो जाते हैं. यह समय के साथ यात्रा का सुख फिल्म, साहित्य, कविता, पेंटिंग आदि कला की विद्यां ही दे सकती है. हर विधा के अपने आनंद है और जोखिम भी.
फिल्म के साथ इक बात है वो है पढने से दूर जाते मानस को भी शरण में बुलाती है. पढने के लिए समय चाहिए. धर्य की दरकार होती है. लेकिन फिल्म्स को देखने के लिए इतने इंतज़ार की जरूरत नहीं होती. वीर ज़रा, बोर्डर, ग़दर आदि फिलेम्स को देखने जाएँ तो यह मान कर चलें की फिलेम्स के निर्देशक की नज़र पुर्ग्रह मुक्त नहीं होते. यहाँ दर्शक को खुली आखें ले कर जाना चाहिए. हर विधा के साथ यह जोखिम होता है. रचनाकार यदि पुयुराग्रह से ग्रषित है तो वो घटन को अपने नज़र से देखेगा और प्रस्तुत करेगा.
जो भी हो फिल्मस की आलोचना जितनी भी की जाये लेकिन इससे उसकी उपाद्यता को नज़रन्दाज नहीं कर सकते.                                    

Friday, February 17, 2012

इक शिक्षा सामानांतर बोध

शिक्षा के शेत्र में कई तरह के नवाचार चल रहे हैं. लेकिन फिरभी स्कूल बच्चों को  अपनी तरफ  खीच नहीं पा रही है तो यह सोचने की बात है की क्या वजह है. यही सवाल १९८७ में बोध शिक्षा समीति के संस्थापक योगेन्द्र जी को खीचा. काम करने की नै दिशा दी. आज इस बोध संस्था की सपने पुरे राजस्थान में फल फुल रहे हैं.
जयपुराने २० किलो मीटर पहले  बोध परिसर काम के सूक्ष्म तत्वों पर काम करती है. उन सपनो को साकार करने के लिए उसने राजस्थान सरकार के पिलोत प्रोजेक्ट के साथ हाथ मिल्या. आज की तारीख में जयपुर के अलग अलग सरकारी स्कूल में बोध अपनी योजना चला रही है. जिसमें बोध के शिक्षक सरकारी स्कूल के शिक्षक के साथ मिलकर काम कर रहे हैं. बच्चों में पढने के प्रति ललक तो बढ़ी ही है साथ ही समुदय के लोगों में भी इक युथास  दिखाई देती हैं. 
भाति पुर और आमापुर के गरीब परिवार की बच्चे यहाँ अपनी तालीम के खाब पुरे कर रहे हैं. १९८७ में योगेन्द्र जी ने जैसे जिस तरह की कठिन हालात में बोध की शुरुयात की यह इक प्रेरणा का विषय है. आज आमा पुर का शाला पूरी तरह से समुदाय की हाथों में है. 
शिक्षा में यैसे नवाचार के लिए रस्ते निकालने ही होंगे. बोध न्च्फ़ २००५ को आधार बना कर परीक्षा से शिक्षा को मुक्त करने की मुहीम में जुटी है . बोध परिसर में बच्चों को ध्यान में रखा गया है. वह चाहे क्लास रूम हो या पठान पाठन की सामग्री हर उन चीजों में इक न इक न्यू तकनीक की, समझ की, नवाचार की झलक मिलती है. 
kaas बोध के साथ हमारी शिक्षा के मुगलों को विचार करना होगा.                          

Tuesday, February 14, 2012

नौटियाल गए....शहरयार भी चले गए....

नौटियाल गए....शहरयार भी चले गए....साहित्य हो या आम जीवन किसी के जाने के बाद वो लोग बेहद याद  आते  हैं. वहीँ दूसरी और खास बात यह की राम दरश मिश्र जी को उनकी आम के पत्ते के लिए व्यास पुरस्कार मिला.
साहित्यकार जब भी अपनी गवई अनुभवों को कागज़ पर आकार देता है वो पाठकों को तो काफी करिईब लगता है साथ ही वह अनुभवों का नवीकरण भी होता है.   
हम कितने भी शहरी हो लें लेकिन हमारी स्मृति में हमारा गावों और गावों के पल हमेशा साथ रहते हैं. साहित्यकार कुछ भी नहीं करता बल्कि वो हमारी स्म्रित्यों में पड़ी यूँही यादों को सहता और ताज़ा कर देता है. हम सभी को लेखक की बातें अपनी लगती हैं.    

Thursday, February 9, 2012

तुम मुझे मरने की गलती मत करना

यूँ तो पुनिश्मेंट पर हाई कार्ट ने पाबंदी लगा राखी है. लेकिन उनसब के बावजूद स्कूल में इस किस्म की घटनाएँ घटती रहती हैं. 
सहनशीलता दोनों ही तरफ घटी हैं. शिक्षक भी और छात्र भी दोनों ही आज कल अशांत हो चुके हैं. इक तरफ मानसिक तो दूसरी तरफ शारीरिक और समाज की और से शिक्षा और बच्चों पर दब्वो बढता जा रहा है. इसी का परिणाम है, इस किस्म की घटनाएं.
दुसरे शब्दों में कहें तो क्लास्स्रूम की प्रकृति को समझने की बेहद जरुरत है. तनावों, दाबों को पार करते हुवे बच्चों को गढ़ना इक जोखिम भरा काम है.    

Saturday, January 28, 2012

इक अदद दुम्म

मुझ को भी इक दुम्म दे दो,
मैं भी डोलता फिरून,
आगे पीछे,
हर उन जगह,
जहाँ उचाही मिल सके.
जिनके दुम्म सुन्दर थे,
कोमल,
लहरदार उनको मिला,
जो उन्न्ने चाहा,
उम्मीद से ज्यादा उछाल.
मेरे से नहीं हिलाय्गे दुम्म,
जब भी देखता हूँ अपने दुम्म्म,
श्रम  आती है,
हिलाना ही नहीं आता.
हे इश्वर!
मुझे भी दे न इक अदद दुम्म,
दिन भर हिलाता रहूँ    
             

Thursday, January 26, 2012

झाकी में गायब अंदमान निकोबार, लक्ष द्वीप

६३ वीं गणतंत्र पर भी हमारे ही देश के कुछ भाग गायब रहते हैं. बिहार, पंजाब, नागालैंड आदि राज्य तो दिखी. इसके साथ ही अन्य राज्य भी झाकी में शामिल हुवे. लेकिन अपने ही देश के अंदमान निकोबार, लक्ष द्वीप इक्सीरे से नदारत रहे. 
जब की जनपथ राज पथ पर देश के तमाम राज्यों को प्रदर्शन का पूरा पूरा हक़ है. यदि वो इस काबील नहीं की कदम ताल मिला सकें तो अन्यां विकसीत राज्यों को उनको तैयार करने का बीड़ा उठाना चाहिये. कम से कम वो भी भी तो देखें. 
पुरे साल ख़बरों से तो गायब रहते ही हैं कम से कम साल में इक बार राज पथ पर देश के सामने देखें. वर्ना वो हमारे आम जन जीवन से यूँ ही कटे अलग थलग पड़े रहेंगे. इस अलगावो को पाटने का जीमा हमारा होना चाहिए. पिछले             

Tuesday, January 24, 2012

बिन पढ़े ताला किताब पर

२३ जनवरी के तिमेस ऑफ़ इंडिया के एडिट पेज पर लीड स्टोरी पढने को मजबूर करता है. लेखक ने लिखा है १९८६ में सेतानिक वर्सेस को बिन पढ़े राजीव गाँधी ने फरमान जारी कर दिया. भारत पहला देश बन गया जिसने इस किताब पर पाबंदी लगादी. उसके बाद पुरे देश में फरमान की कतार लग गई. अकेले सलमान नहीं हैं जिनको लिखे की कीमत चुकानी पद रही है. दूसरी और तसलीमा जी भी हैं. इतेफाकन दोनों का रिश्ता भारत से गहरा रहा है. अपनी मिटटी की नमी देश से दूर रह कर भी भूल नहीं पाते. गाहे बगाहे कविता, कहानी, युपन्यास में आ ही जाता है. 
बड़ी दुर्भागया की बात है किसी की रचना को पढ़े बिना उस पर पढने की पाबंदी लगा देना किसी भी सभ्य समाज की सकारात्मक लक्षण नहीं कहे जा सकते. किसी लेखक ने क्या लिखा उसे पढने औ सुनने की शक्श्मता तो होनी चाहिए. आलोचना, प्र्तालोचना इक स्वत समाज के लक्षण हैं. लेकिन जब समाज में कुछ कट्टर वादी विचार के पोषक की अंगुली पर देश के नायक नाचने लगें तो उस देश और नायाक पर शक होना कोई बड़ी बात नहीं. 
मत भिन्नता रखना सब का हक़ है. किसी के सर कलम करने या उसकी अभिवक्ति की पर क़तर देना सहिष्णुता नहीं कही जा सकती. 
हमने विचार करना होगा की हमें हांकने वाले सही हैं या हम खुद खाली कनस्तर हो चुके हैं.                     

रहिमन धागा....

यूँ तो रहीम साहब ने आज से कई शताब्दी पहले कहा था, रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चित्काए टूटे तो फिर ना जुड़े जुड़े गत पद जाए.
सब दिन होवाहीं न इक समाना. '
रामिमान चुप व्ह्यें बैठिये देखि दिनन को फेर. नीके दिन जब आइहें बनत न लगिहें देर' 
       

Sunday, January 22, 2012

बच्चे जो कह्हरा नहीं पढ़ पाते

यूँ तो कई रिपोर्ट यह सच दिखा चुकी हैं की देश के लाखों बच्चे स्कूल तो जाते हैं लेकिन जहाँ तक तालीम की गुणवत्ता की बात है वहां वो बेहद ही कमजोर हैं. ५, ६ या ८ क्लास में पढ़ते हैं लेकिन वो क्लास १,२ के पथ पर फिसल जाते हैं. 
इन्फोसिक या प्रथम की रिपोर्ट की माने तो देश के उम्दा स्कूल के बच्चे भी बेहद ही ख़राब शिक्षा पा रहे हैं. उन्हें किस तरह की शिक्षा मिल रही है इस और उस पार की झलक मिलती है की हम अपने बच्चों को की किस्म की शिक्षा दी जा रही है. 
दाखिला तो बढ़ा है लेकिन शिक्षा की गुणवता देखते ही देखते नीचे जा चुकी है. उसे बेहतर करने में कोण अपनी बुमिका पहचानेगा. शिक्षक भी इसमें शामिल है. इसके साथ ही लोकल ऑथरिटी को भी अपनी जिमीदारी निभानी पड़ेगी.         

Saturday, January 21, 2012

तुम्हारे जाने के बाद

तुम्हारे जाने के बाद-
मालुम नहीं था,
अपने ही लोग,
नोच कर ले जायेगे,
तेरे जाने के बाद...
तेरी दी साडी,
गहने,
सब कुछ ले गए नोच कर,
जब बिस्तर पर रोऊ रही होती हूँ तो अब नहीं जागता पूरी रात कोई.
नल पर तुम्हारे संग,
           

Friday, January 20, 2012

बच्चों की सुनेगे तो वो हमरी सुनेगे

हम बच्चों की नहीं सुनते. उनकी बात को बच्चों की बात मान कर दरकिनार कर देते हैं. जबकि सुनने की आदत बच्चे हमीं से सीखते हैं सुनने की आदत. लेकिन जब वो खुद देखते हैं की हमीं सुनना नहीं बल्किन केवल बोलना चाहते हैं तो बच्चे वाही सीखते हैं. 
बोलना भी कला है तो सुनना भी कोई कम धैर्य की और कला नहीं है. सुनना दरअसल बोलने की लिए अछि पाठशाला है. जो सुनने में बैचैनियत महसूस करते हैं वो बेहतर बोलने वाले नहीं हो सकते.
बोलने की लिए पठन  और मनन बेहद जरुरी है. जो भी बेहतरीन वक्ता हुवे हैं उनसे बोलने की कला सीखी जा सकती है. किस तरह से रोचक और सारगर्भित बनाएं यह पढने और सुनने से सीखी जा सकती है.            

Sunday, January 15, 2012

विवाद उठाना भी कला

विवाद बखेड़ा जो भी नाम दें यह भी इक कला है. जो इस कला में माहिर हैं वो हमेशा दिमाग इस बात में लगाते हैं की अब किस पर विवाद उठायागे. टीवी में चेहरे देखने की आदत हो जाती है.
यदि कुछ दिनों से चर्चे में नहीं होते तो नींद नहीं आती. फिर दिमाग के घोड़े दौडाते हैं की क्या किया जाये. अब उड़ीसा के मुख्यमंत्री के नाम कितनो को याद होता है. चेहरे तो श्याद ही किसी को याद हो. यहीं लालू जी का चेहरा देश विदेश में लोग जानते हैं . उन्हें मालुम है की विवाद में कैसे रहा जाए.
टीवी में छाए रहने के कई तरकीब है. चप्पल , स्याही, तमाचा कुछ भी उछाल दो फिर देखिये कैसे नेशनल न्यूज़ में चा जाते हैं. विवाद में खड़े होना जीगर वालों की बात होती है. अखबार, न्यूज़ चानेल हर जगह लोग आलोचना करते हैं आप बिन खर्च के चा जाते हैं.
विवाद संवाद हीनता की स्थिटती में पैदा होता है. कई लोग इसी का खाते हैं. विवाद भी खड़ा karna इक कला है                 

Saturday, January 14, 2012

रुश्दी को रोक और बाबा पर श्याही

रुश्दी को डेल्ही आने पर रोक और बाबा रामदेव पर स्याही  फेका  जाना हमारे अन्दर की कातरता और खीझ ही है. यदि संवाद नहीं होता तो विवाद खड़ा होता है.
रुश्दी   इक  विचार  उत्पादक  हैं. विचार देने वाला सम्मानिनिया होना चाहिए. लेकिन जयपुर में उसे न आने के सरे इंतज़ाम किये जा रहे हैं. जबकि लेखाका  बन्धनों  से मुक्त  होता है. लेकिन समाज का हिस्सा होने के नाते कुछ मूल्या की जिम्मेदारी उस पर भी होती है. किन्तु हम कितने अशिस्नु है की  आलोचना को सह  नहीं पाते. और किसी पर स्याही फेक कर विरोध दर्ज करते है तो किसी पर चप्पल और जुटे.
सहधी की ह्त्या दरअसल गाँधी की विचारो की ह्त्या थी. यही रुश्दी के साथ हो  रहा है. बाबा रामदेव पर स्याही उछालना संवाद  हीनता   है.          

Thursday, January 12, 2012

Tuesday, January 10, 2012

आज रात वो चाहती

आज रात वो चाहती  थी-
नीद ले पूरी ,
दिन भर काम कर थक गई थी,
पिछले दो दिनों से सो नहीं पाई थी.
न नुचे-
न चुसे,
न मसोसे आज की रात,
चाहती है पूरी आँख भर नींद.
लेकिन उसकी इक्षा पूरी नहीं हुई 
नहीं बच पाई-
आधी नींद में उठाई गई आज की रात,
उठाई गई काछी रात,
सहलाई गई,
रुलाई  गई.
रुलाई गई
प्यार पर रोई पूरी रात,
समझ नहीं पाई क्या yahi प्यार है,
जिसका दंभ भरता  है पूरी रात  पुरुष.
बचावो बचावो की पुकार किस को सुनाये-
साथ में सोव्या,
देता है वचन,
वो गले में लटका जेवर है उसका,
टूट जाए तो दुनिया बेवा कहेगी,
मेरे रहने से तू है सुरक्षित,
माकूल प्यार करता हूँ.
इन्हीं वचनों का अचरा में बंधे,
देखती है सपने,
पोचती है आंसूं ,
लाख चाते हुवे भी नहीं मोड़ पाती उससे अपना मुह,
करवट फेर कर सोती तो है,
पर जाने कब,
सुभा उसी में सिमटी मिला करती है...
                
          
     

Saturday, January 7, 2012

दीवार बोल उठी

फ़र्ज़ करें अगर दीवार बोलने लगे तो क्या क्या बोल जायेगी. सब कुछ जो दीवार के पीछे होता है. पतली गली जिस को दीवार अलगाती है. उस तरफ की बात्यें भी जगजाहिर हो जायेगी. कितनो की धडकनें रुक जायेगी. कुछ तो बेवा हो फिरेंगें.
कल यूँ ही कुछ हवा. अचानक दीवार हिलने लगी. मुझे लगा भूकंप होगा. थम जाएगा. मगर भूकंप से भी ज्यादा था. दीवार जो बोलने को बेताब हो रही थी.
कहने लगी-
अबे क्या सोच रह है? तेरी पगार बढ़ेगी या उसके हिस्से में जाएगा मोटा उछाल. तुझे ठेंगा मिलेगा या उसको न्यू कार की चाबी. इस बार क्या वो फिर दो तीन ट्रिप विदेश का लगाएगी और तू देश के सड़ेले शहर में घूम आएगा.
दीवार बोहोत बोल रही थी. जरा भी सोहा नहीं रह था. मैंने कहा चुप कर बदजात. तू कब से बोलने लगी. अब तलक तो सुनना ही तेरा काम था. ये जबान कब चलाने लगी. तुझे बोलने का सहूर कहाँ है जो बोलने को बेक़रार है.
इतना सुनना था की दीवार भी आखीर हमहे बीच ही तो रहती है. गुस्सा आ गया. मुह बिचकाते हुवे कहा,
मैंने सूना है कल तुझे नीला लिफाफा मिलने वाला है...
अब मुझे काटो तो खून नहीं. मुह लिए बैठ गया.
इस पर दुबारा दीवार के जबान चल पड़े सूना तो यह भी है शैली को इस बार बॉस ने तीन बार विदेश यात्रा की पलान्न की है. उसे तो इस बार के ट्रिप में बहाद कीमती चीजें भी दी है. तू तो बस अपनी चोच मत ही खोला कर सारा किया कराया चौपट कर देता है. उसको देख, जहां जितना बोलना होता है उतना ही खुलती है. और इक तू ही शुरू हुवा नहीं की बस शताब्दी फेल करता है.
सुनते सुनते था गया. मन में आया की इक लात मर कर इस दीवार को ही बीच से गिरा दूँ. उधर जो हो रहा है वो दीखता ह्राहे. मगर पैर में मोच जो आ गया.  

Friday, January 6, 2012

यूँ ही इकदा

कई दफा हम कहीं जाना नहीं चाहते लेकिन घर में बैठ कर मन भी नहीं लगता. यैसे में क्या करते हैं हम? कुछ पुरानी यादों की गठरी खोल कर झाड पोच करने लगते हैं. उन्हीं में से चाँद , धुल भरी पगडण्डी, सर्दी की शाम, समंदर की पचाद खाती लहरें सब के सब याद आने लगते हैं. उनमे से भी हम सुखद, ताज़ा यादों को गोद में ले कर सहलाने लगते हैं. उन्हीं पुराणी यादों में कुछ देर सुस्ता कर वापस आने का मन बनाते हैं. लेकिन इतनी आसानी से पुराणी यादें कहाँ पीछा चूद्तीं हैं.
बरबस साथ द्रविंग रूम में आ धमकती हैं. फिर देखिये क्या ही मंजर होता है. कल की यादें मुह बाए कड़ी अपनी और बुलाती है वहीँ वर्त्तमान ताकीद करता है खबरदार जो पीछे मुड़े ह्म्म्म. हम बेचारे अपना मुह लिए बैठ जाते हैं .सर्दी में अजान बोहोत मनमोहक लगता है. वो भी दोपहर वाली. दूर से गुजरती ट्रेन की आवाज़ और इकबारगी लम्बी ट्रेन फिसलती हवी आखों से ओझल हो जाती है. उन ट्रेनों में बैठे लोग हर किसी की आखों में किसी में मिलने, बतियाने, की चाह, किसी से बिछुड़े पल की ताज़ी आह सुबकती दिखाई देती है.
ट्रेन भी मजेदार होती है. कईयों की आखों में आसूं उपादा कर सिटी बजाती अपनी धुन में ट्रैक पर भागती रहती है. हम भी तो उसी की मानिंद भाग ही रहे हैं. पर कई बार पता नहीं चल पता की उतरना किस स्टेशन पर है. अनजाने में गलत जगह उतर जाते हैं.                       

जो लिखे सो दिखे

जो लिखा जाए वो पढ़ा भी जाए इससे लिखने वाले को उत्साह तो मिलता ही है साथ ही यह भी मालुम चलता है की जो लिखा वो संप्रेषित हुवा या नही. यह तबी पता चलता है जब पढने वाले को बिना ज्यादा दिमाग कसरत किये समझ आ जाए.
साहित्य लिखने में कुछ लोग बेहद मशगुल होते है. जो मन में आये रुचे बस वाही लिखते हैं. यह जाचे बिना की पाठक को क्या हासिल होगा. यैसे लेखक महज लिखने का काम करते हैं.  यैसे ही लेखक आरोप लगाते हैं की पाठक आज कल पाठक कम हो गए. जबकि पाठक क्यों वो पढ़े जिसमे कुछ ना मिले.
पाठक वही पढना चाहता है जिसे उससे कुछ मिले.           

Thursday, January 5, 2012

कितनी साड़ी चाहतें,
कुछ उम्मीदें,
इक टूटन,
इक ही जखम,
ता उम्र साथ रहता है.      

Monday, January 2, 2012

खबर की मंदी

खबर की मंदी हाँ सही सुना. मंदी ने न केवल अर्थ तंत्र को झकझोर कर रख दिया बल्कि मीडिया को भी नहीं बक्शा. कई नामी गिरामी पत्रकार बंधू बांधुनी पत्रकारिता में जीवन खपाने के बाद भी मंदी में बाहर अपने लिए रोटी तलाशते नज़र आये. बल्कि आ भी रहे हैं. उस पर बलिहारी यह की उन बह्दुयों के जाने की खबर कोई कहीं छापने को राजी नहीं. जिनने मंदी पर खूब स्तोटी अपने हाथों से पेज पर लगाए मगर उस खबर की तीस तब महसूस हुई जब वो इक दिन खुद बाहर हो गए.
मंदी के नाम पर अखबार घराने खूब जम कर खेल फरुखाबादी खेले. पेज कम किये, स्टाफ को नोऊ काम कहा, और भी खबरे रहीं मगर उनको पूछने वाला आज कोई नहीं. २००८ की मंदी ने बहुतों की उम्मीदों पर पानी ही नहीं फेरे बल्कि उनको मीडिया से मोह भंग किया. कोई पढाने चले गए. कुछ ने अपने पुराने काम पर लौट आये.
बड़े बड़े संपादक बंधुयों को देखा वो साहित्य सृजन, शोध करने कराने में जुट गए. वाही लोग कहीं ना काहीं जौर्नालिस्म के संसथान में हेड बन गए. नए पत्रकारों को मीडिया के  गुर सिखाने लगे.
समय रहते भूल सुधार ली वरना...                  

Saturday, December 31, 2011

साल को सलाम

आदतें इतनी जल्दी नहीं बदलतीं . समय का दरकार और लगातार चेक मांगता है. वरना समान गलतियाँ हम दुहराते रहते हैं. परिणाम वाही धाक के तीन पात.
देश के साथ भी यही है. चाहे शिक्षा का अधिकार कानून हो या महिला कानून बिल अब इसी कतार में लोकपाल बिल भी खड़ा हो चुका है. इस के साथ क्या होगा यह आने वाले साल में कुंडली बाची जायेगी. जनता बेवकूफ बनती है और बनती रहेगी. जब तक की वो जागृत नहीं होती.
जागरण इतना आसान नहीं. सोने में जो आनंद मिलता है उसे तोड़ना आसान नहीं. लेकिन आवाज़ लगाना फ़र्ज़ है. अन्ना ने आवाज़ लगे अब देखना है देश की नींद कब टूटेगी.
आने वाला साल हम सब के लिए शुभ हो.
ऋग्वेद का मंत्र साझा करता हूँ-
सम्गाचाध्वम सम्वादावाम संवो मनांची जनानतम...
यानि हम साथ साथ चलें, सामान बोले और हमरी मनांचा सम हो.                  

Thursday, December 29, 2011

टटोलने के दो दिन या पूरा साल

महज दो दिन शेष रह गए हैं. दनादन अखबार अपने पन्नों के पेट भरने लगे हैं इस साल देश के लिए किस एरिया में क्या रहा? क्या प्रगति हुई और क्या और कहना चाहिए चुक कहाँ गए का विश्लेषण जारी है. साहित्य की हर विधा में महारथी रेखांकित करने में जुड़े हैं कविता, कहानी समीक्षा आदि में किस किताब को ज्यादा ताली मिली और किस किताब को समीक्षों की गाली मिली. पिछले पाच सालों में देख रहा हूँ , बच्चों की किताबें कब आइन कैसी आइन या अगर आप जानना चाहें की कहानी या उपन्यास बचूं के लिए किसने लिखी या उसका नाम क्या है यह विश्लेषण इक्सिरे से नदारत है.
हर किसी को इन दिनों देख सकते हैं जो मनन में लगे हैं की उनके लिए यह साल कैसा रहा? कहाँ चूक गए और कहाँ चप्पर्फाद मुनाफा हुवा. अगले साल के लिए कुछ खुद से वायेदे यह नहीं करूँगा, वह कटाई नहीं दुह्रावो  होगा आदि आदि.
साहिब खुद में झाकना इतना आसान नहीं. हम पहले दुसरे के गिरेबान में झांक कर देखते हैं वह कितना नीचे है. जबकि हमहीं धरातल पर नहीं होते.
जो भी हो साल पल दिन घडी हम सभी के लिए शुभ हो. हमारे मान सामान और प्रेम बरक़रार रहे. हमने इस साल कई स्वरों को ख़ू दिया. उन्हें शांति ....               

Tuesday, December 27, 2011

मौत का खौफ

मौत का खौफ बेहद हावी होता है जिस में इंसान पूरी ज़िन्दगी लुका छिपी का खेल खेलता रहता है. कभी दूर भागता है तो कभी सच के रूप में कुबूल करता है. लेकिन हकीकत है की इंसान यदि किसी चीज से डरता है तो वह है मौत. मौत को हमारे कुछ लोगों ने बड़ा ही भावः और दर्दीला बताया है. मौत मायने अंतिम सत्य, अकाट्य परिणति और न जाये क्या क्या बिम्बों में बंधने की कोशिश की गई है. जबकि गीता इन सब पर से पर्दा उठता है-
अजो नित्यं सहस्वतो अयं... न हन्यते हन्यात्ये शरीरे....
अर्जुन को समझाने के उपक्रम में गीता की रचना सच पुचा जाए तो इंसान के मया मोह के बांध को निर्बंध करने की कोशिश है. लेकिन फिर भी हम हैं की उस सत्य को स्वीकार नहीं कर पाते. हाँ, खुद को अजर अमर मान बैठते हैं.
मौत कोई छोटी चीज नहीं. लेकिन बात बात में कह डालते हैं मर गए यार. मौत है ...बला बला जबकि मौत इतनी सस्ती नहीं होती और ना ही भयावह. मौत को तो हमारे षोडश संस्कारों में अंतिम संस्कार मन गया है. जब कोई बुजुर्ग समय पर कुछ करता है तो इक उत्सवा का सा अंतिम यात्रा सजती है. गाजा बाजा भी साथ होता है. हाँ यदि असमय आकाश की और चल पड़ता है तो उसके जाने का गम ज़्यादा होता है. कई सारे काम, जिमीदारियां पीछे रह जाई हैं.
पाश की पंक्ति उधार ले कर कहूँ तो-
मौत खतरनाक नहीं होती,
आग भी नहीं,
खतरनाक होता है,
आखों में सपने का मर जाना....                           

Monday, December 26, 2011

जाने के बाद....

जाने के बाद....
हाँ जाने के बाद सब कुछ बदल जाएगा,
बिस्तर समेत कर दूसरी जगह रख दिया जाएगा,
आपके पीछे आधी लिखी चिट्ठी यूँ ही रद्दी बना दिया जाएगा.
आपके पन्ने यूँ ही फडफडाते रह जायेगे...
बस आप ही नहीं होगें,
उन पन्नों को सम्तेने को,
कोई उसे पढने की जहमत नहीं उठाएगा,
बस कबाड़ मान उठा कर बेच दिया जाएगा.
कोई इस कदर अचानक...
हमारे बीच से,
चला जाए तो कैसा लगता होगा?
शायद इक राहत की साँस,
की चलो चला गया,
खामखा बात काट कर ,
रखता था अपनी बात,
की बीच बहस में खुद पड़ता था,
ये तो बदिया हुवा,
उसके जाए के बाद,
मौक़ा तो मिला,
खुद को आगे बढाने को...
लोग आगे बढ़ने को क्या नहीं करते,
वो गया तो जाते जाते रह तो खाली कर गया....
पर सच है आज भी_
जाने वाला ,
जा कर भी जा नहीं पाता,
दूर हो कर भी होता है पास,
बेशक कटु अनुभव ही सची,
पर होता तो है...                      
     

Sunday, December 25, 2011

लोकार्पण इक किताब का

इक किताब के बहाने कई सरे विचार, भाव और तंतुएं खुद बा खुद खुलतीं चली जातीं हैं. कितने ही भाव और अर्थ भी धुंध लिए जाते हैं. कोई नारी विमर्श तो कोई नारी का देह विमर्श या फिर उत्तराधुनिक महिला का देह द्वन्द वर्णन में चावो, आनंद और काम के भाव धुन्धने वाले भी का म नहीं होते.
लिखने वाला बेशक जिस भी भाव से लिखा हो लेकिन पाठक व आलोचक उसकी लेखिनी में न जाने क्या से क्या भाव और मायने तलाश लेता है. आज की तारीख में एक महिला का लिखना एक सिरे से स्वभोगित जीवन की तस्वीर करार दिया जाता है. जब की खुद आलोचक , लेखक मानते हैं की कई बार पर काया प्रवेश की तरह ही पर भाव गमन भी लेखक करता है.
आज की तारीख में किसी के पास कहने को कुछ भी तो नहीं है. अगर कुछ है तो बस सेल फ़ोन पर गाने, मेस्सगेस ,  आदि डाउनलोड करना होता है. हर मोमेंट के फोटो खीच कर लोगों की तारीफ़ पाना होता है. सिर्फ बताना, अपनी सुनाना न की किसी की सुनने की चाह होती है.
अगर कुह कहना है तो कह डालो बजाये की पहले शिकायत की पुल बंधा जाए फिर हाल समाचार या कहने की बात राखी जाए.              

Saturday, December 24, 2011

ध्यान दें अन्ना जी

अन्ना जी आपका इरादा बेहद तारीफ़ ये काबिल है. आप अपने लिए नहीं बल्कि देश के लिए लड़ रहे हैं. देश की आवाज़ आपके साथ आवाज़ मिला रही है. 
लेकिन बॉम्बे में इतने महंगे मैदान लेने की क्या जरूरत थी. आप ने कहा हम ये पैसा लोगों से चन्दा से लेंगें. आपको पता होगा की हमारी जनता दो पहर में रोटी खाती है तो शाम का कुछ पता नहीं होता. वो बेचारा रात दिन रोटी कपडा और किड्स के फ़ीस जुगाड़ने में यदि घिश देता है. 
कुछ तो यैसे भी हैं जो रात पेट दबा कर सो जाते हैं.  देश के पप्पू क्लास से बाहर कूड़ा चुनता अपनी ज़िन्दगी बसर कर देता है. देश को नै दिश में ले ही जाना है तो अपने देश के अंकुर को ठीक करना होगा. जो स्कूल जाते हैं उनको यह तक नहीं मालुम की इंदिरा सोनिया और गाँधी में कोण ज़िंदा हैं ? कैसी शिक्षा मिल रही है यह किसी से छुपा नहीं है. 
कभी इस तरफ भी ध्यान दें अन्ना जी 
आमीन          

अन्ना जी अन्ना जी....

अन्ना जी अन्ना  जी....
क्या हुवा आपको,
जनता की म्हणत की कमाई,
मांग बॉम्बे में मैदान के किराए भरने ,
बैठने अनशन पर,
क्योँ चलेगये......
अन्ना जी अन्ना जी...
जरा सोच्लेते,
८, ९ लाख रुप्यी बोहोत होते हैं,
जनता अपने घर के मरमत्त कराई दे ,
बच्चे की फ़ीस दे या,....         

Friday, December 23, 2011

इन्सान से....

इन्सान से जगहों के मायने बदल जाते हैं,
तस्वीरों में मुस्कान जजब हो,
सदियों तलक यूँ ही मुस्कान बिखेरते रहते,
साथ में क्लिक करने वाला हाथ भी देख रहा होता,
इक चेहरे को दूर से देख कर कैद करने में उसका भी हाथ है.....
बेहद खुबसूरत चेहरा है...
चेहरे की मुस्कान,
न न मुस्कान नहीं ये हसी साफाक...
हमेशा आपकी और खीचती है.       

Sunday, December 11, 2011

चले जाने पर खालीपन हो

किसी भी समाज में शुन्य तब पैदा होता है जब किसी के चले जाने पर खालीपन हो जाए. किन्तु येसा ही तो नहीं होता. रामानुजन, जजे कृष्णमूर्ति, गाँधी जाते हैं तो दुसरे लोग उस जगह को भराने को आगे आ जाते हैं. यह स्थानापन्न कह सकते हैं. लेकिन दरअसल हकीकत में किसी के जाने की भरपाई नहीं होती. इक इकाई का जाना पूरी तरह से जाना ही मन जाएगा.
यह अकाट्य नियम है की जनम और मृतु दोनों ही अटल है. जनम तो हाथ में होता है की आप किसी जीव को धरती पर स्थापित कर सकते हैं लेकिन उसे अपनी जरूरत के अनुसार रोक नहीं सकते. जिसे ऑफ होना है वो होगा ही. कबीर की पंक्ति याद आती है -
जल में कुम्भ कुम्भ में जल है , बाहर भीतर पानी,
फुटा कुम्भ जल जल ही सामना ये तट बूझो जयनी.
किसी का हमारे बीच से चला जाना वास्तव में इक रिक्त स्थान छोड़ जाना ही है. बस उसके संघ बिठाये पल, घटनाएं महज हमारे अन्दर गाहे बगाहे बजती रहती हैं. किसी ख़ास अंदाज़, आवाज या उसके बोलने , हसने में जब भी साम्यता मिलते हैं . और हम इक बार उसकी याद में खो जाते हैं.
कभी सोच कर देखें की अचानक कोई शांत हो जाता है. हमारी इस दुनिया से यक पलक उसका कनेक्शन टूट जाता है. फिर लाख कोशिश के बावजूद वो हमारी पकड़ में नहीं आता.                       

Saturday, December 10, 2011

कुछ सवाल

कुछ सवाल बेहद दर्दीले बीते पलों और घ्त्नावो की याद दिलाते हैं. युन्हे याद कर या सवाल को दुहरा कर तकलीफ होती है. मसलन १९४७ के कसूरवार किसे मानें? मस्जिद गिराई गई उसके दोषी किस चेहरे को माने. उसी तरह कैदफा हमारे बीते पल भी सवाल करते हैं. जिनका जवाब बेहतर वाही दे सकता है जो निरपेक्ष हो कर मंथन कर   सके. लेकिन इस काम में इक खतरा है की हम खुद को बचाते हैं और सामने वाले पर दोषारोपण करते हैं.
   दोषारोपण के आगे हमारा विवेक जवाब दे जाता है. दुसरे शब्दों में कहे तो हम अपना पक्ष छुपा कर सापने वाले के सर पर ठीकरा फोड़ते हैं. देश के वर्त्तमान पोलिटिक्स और संसद की करवाई को देख कर भी यह झलक मिल सकती है.  विपक्ष ताल ठोकती है, हमने शासन दो फिर देखो हम चला कर दिखा देंगे. मगर जब सत्ता में होते हैं तब तमाम वायदे भूल जाते हैं. दोष मढना आसन होता है. जीना मुश्किल वो भी सच के साथ.                 

Friday, December 9, 2011

रिश्ते वही जीते हैं जो सच होते

रिश्ते वही  जीते हैं  जो सच होते हैं. सच इन्सान और सन्दर्भ सापेक्ष होते हैं. जब हम कोई रिश्ता बुन रहे होते हैं तब ख्याल नहीं होता की किस शब्द के क्या और कितने गहरे मायने होगें जब आप किसी कारण से अलग रह पर चल पड़ेंगे. लेकिन हम कई सारे वायदे अलफ़ाज़ खर्च देते हैं बिन विचारे.
समय और सन्दर्भ बदल जाने पर यूँही शब्दों के मायने भी अपने अर्थ पीछे दरकिनार कर देते हैं.  जरा सोच कर चलना हर किसी "म्हाज्नाह एन न गतः सह पन्था"    यूँ ही नहीं कहा है.    

Tuesday, December 6, 2011

उनीस साल पहले

उनीस साल पहले अयुध्या में जो कुछ हुवा वो क्या था आज जब यह सवाल सामने होता है तो जबान लाद्खादा जाती है.
पर उसी सरयू के तट पर हज़ारो हज़ार नर नार अपनी पहचान खो कर हम से पूछ रहे हैं क्यूँ जी कैसे हैं आप सब ?
राम के ललाट पर जरुर सिकन आई होगी. बगले झाकते राम को देखा है आपने ?  

Wednesday, November 9, 2011

उड़ कर देखना

जब जमीन से ऊपर होते हैं तब हमारा ही अपना कद स्थिर और बाहर की दुनिया भागती दिखाई देती है. दरअसल बाहर की दुनिया स्थिर होती है और हम भाग रहे होते हैं. ये नदियाँ और नाले, रोड और हमारे झोपड़ सब के सब इक बड़े गोले या रेखावों की तरह दिखाई देती है.
पहाड़ को भी आशीष देने को बाजुएँ उठ सकती हैं जब आप ऊपर उड़ रहे होते हैं. गोया पहाड़ धरती पर उग आये फोड़े फुंसी से गर्मी में उग आये हों. यहीं नदियाँ यूँ फोड़े फुंसी से निकल रही निरंतर धार सी लगती हैं. 
सब के सब खामोश, 
नदियाँ, पहाड़,
रोड,
नाले,
घर,
पुल
सब के सब खामोश,
खुद में गम होते हैं.
सब आप या हम भाग,
उड़ रहे होते हैं....            
       

Sunday, October 2, 2011

बन्दर हो गए शैतान

बापू  के  तीनो -
बन्दर हो गए शैतान,
जो देख सकता है,
वो देख नहीं सकता. 
जो सुन सकता है भरष्टाचार,
वो बोल नहीं पाटा.
जो देख सकता है समाज -
नहीं देखता.
बापू के ये तीनो बन्दर हो गए शैतान...       

Sunday, September 25, 2011

बेटी का दिन इक

   
क्या गजब है की इक दिन बेटी दिवस  साल के बाकि दिन गली , उपेक्षा, शिक्षा से भी महरूम करना कुछ समझ नहीं आता.    
पूजा , अर्चना , आरती या कोई aur नाम भी शामिल हो सकता है जिन्ह्हे पढने जीवन के रु बा रु परेशानियौं को सहते गुजरता है तो क्या बंधू यही है बेटी दिवस. 
सोचना तो होगा जिनको हम हर पग पर बेटी होने के दंश देते हैं. इक दिन छाए वो कंजक पूजा का दिन हो या बेटी दिवस हम उन्हें अचानक तवाज़ो देने लगते हैं. 
बेहतर हो की इक दिन के सम्मान देने की बजाए रोज दिन की जलालत से निजात दें पायें.   

Saturday, September 24, 2011

चूकी हुई कहानी

हमारे बीच में कहानी हवा करती थी. जो रफ्ता रफ्ता दूर जा चूकी. कहानी गढ़ने में वाही मज़ा आता है जो किसी भी क़िस्म के सृज़न में.
कोई आप से पूछे की आपने कब अपने बच्चे को कहानी सुनाई तो शायद आप याद न कर पायें. येसा क्यों घटा? कभी पुचा खुद से?
दरअसल यह सवाल भी बैमानी सी है. इतना पूछना भी टाइम जाया सा लगता है. लेकिन जब हमारा पौध सुनना बंद कर देता है या इगनोरे करता है तब हमारी नीद खुलती है. तब कहानी दादू की तलाश में भटकते हैं .  काश खुद ही कभी कहानी सुन्ने की जहमत उठा लें तो परेशानी काफूर हो जायेगी.        

शिक्षकीय दुनिया की कहानी के पात्र

कौशलेंद्र प्रपन्न ‘‘ इक्कीस साल के बाद पहली बार किसी कार्यशाला में बैठा हूं। बहुत अच्छा लग रहा है। वरना तो जी ...