२३ जनवरी के तिमेस ऑफ़ इंडिया के एडिट पेज पर लीड स्टोरी पढने को मजबूर करता है. लेखक ने लिखा है १९८६ में सेतानिक वर्सेस को बिन पढ़े राजीव गाँधी ने फरमान जारी कर दिया. भारत पहला देश बन गया जिसने इस किताब पर पाबंदी लगादी. उसके बाद पुरे देश में फरमान की कतार लग गई. अकेले सलमान नहीं हैं जिनको लिखे की कीमत चुकानी पद रही है. दूसरी और तसलीमा जी भी हैं. इतेफाकन दोनों का रिश्ता भारत से गहरा रहा है. अपनी मिटटी की नमी देश से दूर रह कर भी भूल नहीं पाते. गाहे बगाहे कविता, कहानी, युपन्यास में आ ही जाता है.
बड़ी दुर्भागया की बात है किसी की रचना को पढ़े बिना उस पर पढने की पाबंदी लगा देना किसी भी सभ्य समाज की सकारात्मक लक्षण नहीं कहे जा सकते. किसी लेखक ने क्या लिखा उसे पढने औ सुनने की शक्श्मता तो होनी चाहिए. आलोचना, प्र्तालोचना इक स्वत समाज के लक्षण हैं. लेकिन जब समाज में कुछ कट्टर वादी विचार के पोषक की अंगुली पर देश के नायक नाचने लगें तो उस देश और नायाक पर शक होना कोई बड़ी बात नहीं.
मत भिन्नता रखना सब का हक़ है. किसी के सर कलम करने या उसकी अभिवक्ति की पर क़तर देना सहिष्णुता नहीं कही जा सकती.
हमने विचार करना होगा की हमें हांकने वाले सही हैं या हम खुद खाली कनस्तर हो चुके हैं.
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