यह एक ऐसा मंच है जहां आप उपेक्षित शिक्षा, बच्चे और शिक्षा को केंद्र में देख-पढ़ सकते हैं। अपनी राय बेधड़ यहां साझा कर सकते हैं। बेहिचक, बेधड़क।
Saturday, February 28, 2009
तो क्या निराश हुआ जाए
बिल्कुल नही प्रयाश तो करना ही होगा वरना बाद में यह मलाल रह जाएगा की कोशिश की होती तो आज सूरते हाल कुछ और होता।
ज़नाब अन्दर की दुनिया को दुरुस्त रखा तभी जा सकता है जब आप मान और सम्मान के प्रभावों से कुछ खास समाये में ख़ुद को अलग रख सकें।
पर यह कहना आसन है निभना मुस्किल।
पर अगर थान लिया जाए तो क्या मुशिकिल।
चलिए हार के बाद ही जीत आती है अगर विश्वाश डोलने लगे तो इक बार अपने सपने को खोल कर देख लेना चाहिए इससे उर्जा मिलती हुई लगती है।
Thursday, February 26, 2009
मन्दिर के बहने
अगर मंदिरों में चादावे पर नज़र डालें तो आखें फटी रह जाएँगी। तिरुपति मन्दिर में सालाना कोरोड़ से भी जयादा कमी होती है। इस साल जनवरी में साईं बाबा में मन्दिर में इतना चदवा आया की वह तिरुपति को पीछे धकेल दिया जाएगा
Friday, February 20, 2009
सपने क्या यूँ ही टुटा कर्तवे हैं
सपने तो यूँ ही आखों में आ आ कर बिखर जाया करते हैं, तो क्या सपने देखना हम छोड़ दे नही बिल्कुल नही।
Tuesday, January 27, 2009
Monday, January 26, 2009
मंदी की गाज मीडिया के माथे
मंदी की गाज मीडिया के माथे
दुनिया की सबसे बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी माइक्रोसॉफ्ट ने अपने 5 हजार स्टाफ को नौकरी से निक
ाल दिया है। अपने 34 साल के इतिहास में माइक्रोसॉफ्ट ने पहली बार जॉब कट किया है। दुनिया की सबसे बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी माइक्रोसॉफ्ट ने अपने 5 हजार स्टाफ को नौकरी से निक
ाल दिया है। अपने 34 साल के इतिहास में माइक्रोसॉफ्ट ने पहली बार जॉब कट किया है। मंदी की वजह से दूसरी तिमाही के खराब नतीजों के बाद कंपनी ने यह ऐलान किया है। दूसरी तिमाही में कंपनी के प्रॉफिट में 11 परसेंट की कमी दर्ज की गई है। कंपनी के सीईओ स्टीव वामर ने कहा है - ' हम फिलहाल ऐसी हालत में हैं जो विरले ही आती है। कैश की कमी की वजह से बिजनेस इंडस्ट्री और कंज्यूमर्स अपने खर्च कम कर रहे हैं। ऐसे में नए कंप्यूटर्स की बिक्री कम हो रही है। '
चौथे खम्भे में लगा मंदी का दीमक
दरसल मंदी का इस्तमाल कैची के रूप में किया जा रहा है। शिकार तो छोटे पत्रकार को होना पड़ रहा है। उचे पड़ पर बैठे लोग तो दुरुस्त हैं। यैसे में इंडिया के कुछ गिने हुए मीडिया हाउस लोगों को निकालने के बजाये बड़े पदों पर बैठे अधिकारीयों के तनख्वा में से कटोती कर रहे है।
Sunday, January 25, 2009
मंदी का रोना हुवा पुराना
जिसमे आप थोडी देर के लिए अपना सब कुछ भूल जायें,
वो क्या हो सकता है?
कुछ पुराने पल ,
दोस्तों के साथ चाँद देखना,
सुंदर लड़की को देख कर....
पर मन को बहलाना जरुरी है,
क्या है की आप खुदी से निराश हो गए तो,
किसे क्या फर्क पड़ने वाला,
कोण आप के गम में साझा होगा,
ख़ुद ही आसू पोछने होंगे,
गिर कर धुल झाड़ कर फिर से भागना होगा,
ताकि खुले मुह को बंद कर सकें।
इसके लिए आपको हौसला बना के रखना होगा।
गणतंत्र मंदी और आम आदमी की नौकरी
- अपनी नौकरी पर लटकती तलवार
- घर_बाहर सवाल पूछतीं नज़रें क्या मिया क्या इनदिनों घर में बैठक कर रहे हो
- बीवी भी चेहरा देख कर बार बार आखों में सपने लिए टुकुर टुकुर देखती है क्या होगा अब
- दोस्तों की बैटन में वो गर्माहट खो गई
- दफ्तर में फ़ोन करो तो बहानो की जड़ी मिलती है
- उस पर तीन दिन की छुट्टी उफ़ क्या निठल्ला समय भी भरी पड़ता है
- और भी सवाल है इस गणतंत्र पर सर उठा रहे हैं
- आतंक, बेरोजगार होते कम्पनी के लोग, बिटिया के सवाल आदि आदि
लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ यानि ये भी...
इन दिनों अखबार और न्यूज़ चैनल में जम कर मंदी को लेकर लोगों को बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है। मगर आपने किसे चैनल या अखबार में इस बाबत ख़बर नही पढ़ी होगी। क्यों सोचा है आने वाले दिनों में और कितने लोग रोड पर होंगे यैसे पत्रकार जो आप को हर पल की ख़बर दिया करते थे वो भी हर कीमत पर। लेकिन उनकी हर पल खबरे कहीं नज़र नही आती।
क्या पत्रकारिता का यह कला फिलहाल संकट के दौर गुजर रहा है?
Thursday, January 22, 2009
जिनके जॉब चले गए
बेचारे इसी डर से आप से खुल करबोल तक नही पते। कहना तो वो भी चाहते हैं मगर डर अनदेर निकल दिए जाने का सताता है। इन दिनों बड़े मीडिया हाउस से लोगो को बहिर का रास्ता दिकाया जा रहा है। यैसे में कोण कोई भी हो हर किसे के सर पर मंदी की तलवार लटक रही है।
कोई भी बेरोजगार नही होना चाहता पर साहिब मंदी की लाठी खूब भांजी जा रहीहै।
दीखते हैं कितने लोग इस आंधी में बर्बाद होते हैं।
Tuesday, January 20, 2009
साजिश में शामिल हूँ
यूँ तो साजिश रचना,
किसी के खिलाफ कहीं स्वीकार नही,
लेकिन मैं शामिल हूँ साजिश में उनके खिलाफ,
जो ज़हर उगल रहे हैं धर्म , कॉम के नाम पर।
हाँ मैं स्वीकार करता हूँ_
मैं षडयंत्र रच रहा हूँ,
उनके बिरुद्ध,
जो हर पल लगे हैं देश , समाज को....
Saturday, January 17, 2009
संभावना आश जगती है
आप उसे इक नै रचना करने और ज़िन्दगी से लड़ने की शक्ति देती है। इन दिनों हर सेक्टर में चटनी हो रही है।
नौकरी पर यमराज का शय है। सारे डरे और सम्हे हुए। कब किस की नौकरी चली जाए कहा नही जा सकता। मगर इन्ही हालत में हमें अपनी उर्जा और हिम्मत को बना कर रखन है।
वरना बिखरने से कोई रोक नही सकता। वैसे देखा जाए तो मंदी को औजार के रूप में इस्तमाल किया जा रह है। कम्पनी अपनी बैलेंस शीत में घटा दिखा कर एम्प्ली को हटा रहे हैं। कहा जाता है की समय ठीक होते ही पुराने लोगोको बुला लिया जाएगा। बहरहाल यह मंदी कितने लोगो का नेवला चिनेगी।
किते घरों में मातमी छायेगी पता नही ज़ार जार रोते लोगो को अभी लंबा समाये इन्ही हालत में काटन होगा।
बाज़ार के पंडितों का मानना है की यह दवार अभी दिसम्बर तक रह सकते हैं।
Wednesday, January 14, 2009
क्या आप जानते हैं
कभी सोचा है कैसा लगता होगा?
खैर रहने देन इन बैटन को अब कोई मतलब नही। जब साथ थे तो साडी बार\तें हुआ करती थी, अब तो साहिब दिख्वे की रह गई हैं।
चलिए साहिब आप भी खुश की इक हमारे साथ से गया।
मगर ज़रा सोचे की आप पर जब बात आएगी तब भी इसी तरहं सोचा करेंगे शयद न।
Sunday, January 4, 2009
क्या सड़क लाल दिखती है
सड़कें कहीं नही जाती जाते हैं हम सजीव लोग। मगर रस्ते में बिना देखे की कौन कुचल जाए। सड़क अगर बोलती तो कहती की भाई जावो जहाँ जेआना है। मगर घर जावो। बिटिया राह तक रही है। बीवी की आस में तंगी आखें आपको जोह रही हैं।
Friday, January 2, 2009
साल की सुबह
साल का अमूमन दिन सृजन में बीते।
Friday, December 26, 2008
पाक के नापाक इरादे दोनों देशों पर क्या कहर बअर्प सकते इसके लिए इतिहास के पन्ने मौजूद हैं।
युद्ध दोनों देश नही चाहते मग इनदिनों जैसी बयानबाजी की जड़ी लगी हुई है उससे तनाव बढ़ता जा रहा है।
क्या पाकिस्तान युद्ध के बदौलत अपने देश में राज करना चाहता है। वहांके आवाम को आज से नही लंबे समाये से गुमराह किया जाता रहा है। शयद यही वह तरकश है जिससे पाकिस्तान भारत के खिलाफ इसतमल करता रहा हैं। मगर दोनों देशों के जनता कितनीइ होगा निर्दोष है की हर बार चली जाती है।
बेहतर तो यही होगा की दोनों देशों को युद्ध से हर संभव बचने की कोशिश करनी चाहिए।
Sunday, December 14, 2008
हर दस सेकंड में ....
घर में बच्चे की सामत आती होगी , बीवी पिटाई खाती होगी या फिर वह लाइफ को पानी पी पी कर कोसता होगा।
काश उसे ज़िन्दगी में यह दिन न देखने पड़ते। मगर ज़नाब ऋण ले कर घी पीने का मज्जा भी तो अमेरिका ने लिया अब उसके किए का फल यूरोप यसिया सब को भुगतना पड़ रहा है। लोग डरे समाहे ऑफिस जाते हैं कल आयेंगे की नही कुछ पता नही होता।
यस ही हालात लोगो को जीवन समाप्त करने पर मजबुर करता है।
यह दिन भी कट जायेंगे।
नीके दिन जब आयेहे बनत न लाघिये दीर
अनिर्णय की घड़ी
क्या आपने कभी सोचा है इस हाल में आप क्या करते हें। या तो सोचना बंद कर देते हें या फिर नए सिरे से सोच चलने लगते हें।
Sunday, December 7, 2008
मंदी का असर
जो लोग शादी करने वाले थे वो ज़ल्दी में कर रहे हैं ताकि अची लड़की मिल सके। नौकरी छुटने के बाद कोई नही पूछेगा। दहेज़ भी कम मिलेंगे।
दूसरी तरफ़ चहरे उदास हैं। काम में मनन नही लगता
प्यार में रोटी , नौकरी और लोगों के सवाल घिर गए हैं। क्या खाक प्यार के धुन कोई कैसे सुन सकता है। बाज़ार के चौतरफा मार को समझने के लिए अर्थ शास्त्र के साथ समाज शास्त्र को भी समझने होंगे। मनोबिगायण भी पढ़ना होगा।
क्या कुछ नही प्रभावित होता है। घर से लेकर दफ्तर तक काम से लेकर जीवन तक सब इस समय मंदी के निचे आ गए हैं।
बाज़ार जीवन रेखा को तै कर रही है। उधर सेंसेक्स पर उतर चढ़ होता है इधर जीवन के अहम् फैसले लिए जाते हैं।
Friday, December 5, 2008
दिसम्बर की वो तारीख
आज उसी की वारसी है। वारसी तो मनायेजयेगी लेकिन उस यस्थल पर उडे धुल में लिपटी सचाई को क्या भुला या जा सकता है ? नही ज़नाब यह वो घटना थी जिसके टिश सदा के लिए समय के साथ चलेगी।
कुछ कंदील कुछ आसूं , चाँद बयां के बाद यही इस घटना के साथ होगा जो ....
Monday, December 1, 2008
चलिए साहिब दिसम्बर आ ही गया
उम्मीद की जाए की अच्छी स्टार्टिंग हो।
Friday, November 28, 2008
सोची हुई बात
या तो इसे आप संजोग कह ले या शब्द की शक्ति की शब्द ब्रमः होता है शब्द की शक्ति होई है।
शब्द की साधना की जाती है। इक शब्द क्या नही कर देता।
Tuesday, November 25, 2008
बोहोत दिन से कुछ हुवा नही
न दोस्तों की बात पर ताजुब,
क्या कहूँ की बस तेरी याद आई।
क्या कहूँ ,
कुछ दिनों से लोगों को ,
आर्थिक मंदी के आगे ज़िन्दगी खाक करते देख,
बाज़ार पर हसी आई।
Thursday, November 20, 2008
चुनाव के मौसम में
किसी के पैर छुते तो किसी को गले लगते नज़र आते नेता जी बेसक साल भर नज़र न आयें लेकिन साहिब चुनाव आते ही नेता जी गली गली भ्रमण करने लगते है। समझा करो सर जी चुनाव का मौसम है।
Wednesday, November 19, 2008
प्यार क्या खतरनाक होता है
Tuesday, November 18, 2008
कुछ बातें कुछ यद्यें
कुछ दोस्त होते हैं जो दूर तो होते हैं मगर जब भी मिलते हैं वही गर्मी वही ज़जबत होती है। कितने खुशनसीब होते हैं वो लोग जिन्हें सचे दोस्त मिला करते हैं। दोस्ती वास्तव में निभाई जाती है। यूँ ही नही दिल लुभाता कोई।
Thursday, November 13, 2008
सच में जो रोज़ शामिल हो....
यही रंज में न बदल जाए इए का ख्याल रखना चाहिए।
Wednesday, November 12, 2008
उर्दू जौर्नालिस्म रोल एंड....
जबकि आज उर्दू पत्रकरिता को टेक्नोलॉजी बाज़ार और पाठक को समझना होगा।
Tuesday, November 11, 2008
क्या कोई दुःख से चिपक कर....
दोनों ऊपर और निचे होते रहते हैं।
फिर क्या कोई इस फलसफा को लाइफ में ढल पता है ? जिसने भी इस पर अमल किया उसका दुःख काल कम होता चला जाता है।
Thursday, November 6, 2008
बहन को गले लगाया तो....
अपने ही शहर में
कचोट तो उसे भी हुई जब की कैसे हो की अपने घर नही गए ? कमल है कोई इतना करीब हो जाता है इक लड़की के लिए जो घर न जाए ? तब लगा की कुछ तो सच है। वास्तब में कुछ तो उसमे है की वो अपने घर न जा कर सीधे मिलने उससे चल पड़ा था।
रस्ते में क्या कुछ नही मिले सब कुछ वही रस्ते , वही दुकानें, वही सब कुछ मगर इन सब से बेखबर इक ही धुन में बढ़ता उसके घर जा पंहुचा। वो भी इंतजार में थी लेकिन उससे क्या मालूम की ज़नाब अपने घर न जा कर सीधे उससे मिलने आ धमके।
पर हुजुर यही सच है। चार दिन चार रात अपने ही शहर में रहे मगर अगनाबी की तरह। रेल गाड़ी में बैठे तो लगा पिता कह रहे हों बेटा ठीक से जाना, माँ की आखों में आसू पूछती से की क्या तू तो सब कब आता है और कब चलने का वकुत हो जाता है पता ही नही चलता....
सोच में डूबा बिता था तभी माइक पर आवाज गूंजी गाड़ी बस कुछ ही समय में आने वाली है। और रेल पर बैठ गए कब गाड़ी नदी , खेत , स्टेशन को पर करती गुजर गई तब पता चल जब मूंगफली वाला आवाज लगा रहा था टाइम पास टाइम पास।
समय के दरमियाँ वो , रातें , दिन दिन भर सोचना , आजान की आवाज से जागना सब कुछ घूम जाती थीं।
शहर के प्लात्फोर्म पर
आप स्टेशन पर बिना ....
Thursday, October 30, 2008
ज़िन्दगी में यूँ ही
लाइफ होती ही है मिलने और कुछ दूर जाकर अपनी अलग रह निकल जाने की। हर कोई यही तो नही कर पता अतीत में ही चिपक कर रहना चाहते हैं , uनकी भी गलती नही है है वो तो यैसे दौर की लहर साथ लिये होते हैं के साडी नै चीजें ख़राब लगती हैं।
खैर ज़िन्दगी में कुछ पाने के लिए संगर्ष करना पड़ता है।
Sunday, October 26, 2008
सड़क का रंग लाल क्यो
लोग और गाड़ी के रेलमपेल में इन्सान के कीमत ख़त्म से होती जा रही है। सिर्फ़ आगे भागने के जुगत में कोई कुचल जाए मगर हम युफ़ तक नही करते। सड़कें कहीं नही जाती जाती है इंसानी भाग। सड़क का क्या कुसूर वो तो लोगों के बेहतरी और मंजिल तक ले जाने के लिए वचनबद्ध होती है लेकिन कोई रह में दम तोड़ दे तो सड़क क्या करे।
इक बार गाड़ी हो या इन्सान घर से निकलने के बाद तै से नही कह सकता की वो सकुशल घर पर वापस आएगा।
हर किसी की कोशिश यही होनी चाहिए की हर कोई घर लौट जाए। स्कूल जाती बिटिया पापा को...
काश हम पापा , भाई , पति को सड़क पर तड़पने को न छोडें।
Friday, October 24, 2008
आखें हैं की मानती नही
सर्दी यूँ ही
सर्दी यूँ ही चुपके से कमरे में प्रवेश करती है
सब को पता चल जाता है । मगर ज़नाब दुख तो बिन बताये हमारे साथ चला करती है ।
सर्दी यूँ ही दबे पाव आती है
धीरे धीरे पंखा कम से बंद हो जाते हैं। नल का पानी ठंढा लगने लगता है। सुबह पावों में सर्दी प्रवेश करने लगती है।
दुःख तो शायद यूँ नही आता। खुशी यका याक आया करता है। दुख भी उसी रस्ते आया करती है।
Thursday, October 23, 2008
लोग क्या यूँ ही चले जाते हैं
लेकिन वो तो इन सब से बेखबर कहीं दूर जा चुका होता है । हमारे पास रह जाती हैं तो बस उसके साथ बीतए पल घत्याने बस ।
Thursday, October 9, 2008
रावन को जलाया
रावन महज एक आदमी नही बल्कि कई मानवीय पहलुवो कर प्रतिक है। हर बार दहन के बाद भी बुराइ समाज से जाती कहाँ है। सब के अब हमारे आसपास घुमती रहती हैं।
Sunday, September 28, 2008
आतंकी का धर्म
लोग रोते बिलखते हैं। मगर आतंकी इसको अपनी सफलता मानते हैं।
देश संकट में है। रोज कही न कहीं ब्लास्ट हो ही रहे हैं। इससे किस का मकसद सधता है ? रोटी तो मानवता ही है। पर क्या कहें , यूँ के घर परिवार में सदस्य होते हैं या नही ? पता नही पर दिल यूँतो होते नहीं होंगे ।
Thursday, September 25, 2008
आखरी मुलाकात
लेकिन शायद आज दोस्तों से मिल कर लौटना येसा लगा की जैसे पता नही कब फिर मुलाकात होगी।
निर्मल वर्मा की इक बात याद आती है।
Thursday, September 18, 2008
खाली यूँ ही
अकसर हम बीते दिनों और गुजरे समय की घटनावो में डूबता उतरते रहते हैं। या यूँ कह लें की हमें बेहद पसंद होता है यह कहते रहना की तब मैं या था वो करता था ....
दरअसल हम अपने अतीत से निकल ही नही पाते हमें वो दिन ही याद आते हैं जो गुजर चुका है ।
कभी मौजूदा पेचोखम से रूबरू होने की हिम्मत जुटा कर हमें चल रहे समय की और आने वाले कल की चुनौतियें का मुयाना करना बेहतर होता है ।
Tuesday, September 9, 2008
बाज़ार में मीडिया या मीडिया में बाज़ार
आज मीडिया की कई स्तरों पर आलोचना की जा रही है। केवल हिंसा , सेक्स , तमाशा जैसे लोक रूचि की चटपटी खबरों को प्रमुखता से इतनी बार बजाते है की लोगो को साडी चीजे सच लगती है।
सच वह जो महज नम्बर बनने में कम आते हैं। मीडिया की आलोचना इस बात को लेकर भी होती है की यह चीजों को या तो इस लेवल तक ला देती है की विश्वास कमतर होता जाता है या फिर लोग देखना बंद कर देते हैं।
Tuesday, September 2, 2008
बिहार बाढ़ के समय देश साथ
देखा गया है जब भी देश में विपत्ति का दौर आया है पुरा देश एक हो जाता है। बाढ़ से तबाह लोगो को देख कर आखे भर भर आती हैं। लोगो की जमीं छुट गई। घर छुट गए। बस जीने की आस उनकी आखों में झाकती हैं।
या रब उनको इस आपदा से उबार दे।
Monday, September 1, 2008
अतीत के संग
Sunday, August 24, 2008
होर्डिंग्स को देख कर शहर का मिजाज़ जाने
Thursday, August 21, 2008
जब खेल में मैडल आया है
बेहतर तो ये होता की शुरू से सरकार प्रतिभशाली युवा को बढावा देना होगा।
फिलहाल सरकार सर्वाशिशाका अभिवन को कारगर बनने के लिए विद्यालय में खेल को तवज्जो दिने का मन बनाया है।
Tuesday, August 5, 2008
अर्जुन की गांडीव
अर्जुन की गांडीव जब पेड़ पर तंगी गई होगी ,
तब कैसे अपनी अन्दर के अर्जुन का समझए होंगे ,
तीर तो चलने को तैयार पर गांडीव ही नही ,
कलम तो पास में हो पर ,
लिखने पर पावंदी लगी हो तो ...
विचार यूँ ही पड़ पर फलते होंगे ,
आज कल कई हैं जिनके विचार की पोटली पड़ पर ही रहा करती है।
.........
बाहर की आवाज़ से तंग आ कर ,
अक्सर अन्दर के कमरे में चला जाता हूँ ,
पर वहां भी माँ के घुटने से उठी आह बजने लगती है,
पिताजी की आखें कहने लगती हैं ढेर से सवाल ,
या फिर कालेज की दोस्त की हँसी गूंजने लगती है॥
तंग आकर बैठ जाता हूँ -
देखने टीवी पर वहां संसद के हंगामे सुनाये जाते हैं ।
परेशां पहले की तस्वीर देखने लगता हूँ ,
सोचा अतीत की फोटो में तोडी देर रह लूँ ,
मगर उन तस्वीरों में मेरे भरे काले बाल सर दिखे ,
जैसे ही अपने उचाट होते सर पर सोचता हूँ ,
तभी काम वाली बेल बजा देती है ,
मैं सोचता ही रह जाता हूँ ,
आवाज कमरे में भी शांत न हो सका।
शिक्षकीय दुनिया की कहानी के पात्र
कौशलेंद्र प्रपन्न ‘‘ इक्कीस साल के बाद पहली बार किसी कार्यशाला में बैठा हूं। बहुत अच्छा लग रहा है। वरना तो जी ...
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कौशलेंद्र प्रपन्न शिक्षा और परीक्षा दो पाटन के बीच में बच्चे साबूत नहीं बचे। यह सिलसिला जमाने से बतौर जारी है। लेकिन हालिया घटनाएं बता...
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कौशलेंद्र प्रपन्न हमारे शिक्षक पढ़ाने पर ज़ोर देते हैं। ये अपनी कक्षा में पढ़ाने भी चाहते हैं। फिर क्या वजह है कि हमारे शिक्षक न पढ़ा पाने की ...
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कौशलेंद्र प्रपन्न श्री पंकज चतुर्वेदी जी के सानिध्य में तकरीबन चालीस शिक्षकों ने आधे घंटे में अख़बार और पत्रिकाओं का बनाकर अपन...