Saturday, February 28, 2009

तो क्या निराश हुआ जाए

तो क्या यह सोचते हैं की हालत ख़राब हो तो निराश हो कर हाथ पर हाथ धर कर बैठ जाने से कश्ती पार लग जायेगी।
बिल्कुल नही प्रयाश तो करना ही होगा वरना बाद में यह मलाल रह जाएगा की कोशिश की होती तो आज सूरते हाल कुछ और होता।
ज़नाब अन्दर की दुनिया को दुरुस्त रखा तभी जा सकता है जब आप मान और सम्मान के प्रभावों से कुछ खास समाये में ख़ुद को अलग रख सकें।
पर यह कहना आसन है निभना मुस्किल।
पर अगर थान लिया जाए तो क्या मुशिकिल।
चलिए हार के बाद ही जीत आती है अगर विश्वाश डोलने लगे तो इक बार अपने सपने को खोल कर देख लेना चाहिए इससे उर्जा मिलती हुई लगती है।

Thursday, February 26, 2009

मन्दिर के बहने

मन्दिर कब कहाँ कैसे तैयार होजये आप तै नही कर सकते। उसपर तर्क यह देना की हिंदू हो कर येसी बात करते हो जब मस्जिद बन सकता है, गुरूद्वारे तैयार हो सकते हैं तो मन्दिर बनने में रोड़ा कैसे कोई अटका सकता। दरसल हमारे देश में धर्म के नाम पर संपत्ति, पैसे यूँ ही बर्बाद किया जाता है।
अगर मंदिरों में चादावे पर नज़र डालें तो आखें फटी रह जाएँगी। तिरुपति मन्दिर में सालाना कोरोड़ से भी जयादा कमी होती है। इस साल जनवरी में साईं बाबा में मन्दिर में इतना चदवा आया की वह तिरुपति को पीछे धकेल दिया जाएगा




Friday, February 20, 2009

सपने क्या यूँ ही टुटा कर्तवे हैं

सपने तो यूँ ही आखों में आ आ कर बिखर जाया करते हैं, तो क्या सपने देखना हम छोड़ दे नही बिल्कुल नही।

Tuesday, January 27, 2009

जॉब जब चली जा रही हो

जब जब नौकरी पर खतरा आता है यब तब हम बैचन हो उठते हैं

Monday, January 26, 2009

मंदी की गाज मीडिया के माथे

मंदी की गाज मीडिया के माथे

दुनिया की सबसे बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी माइक्रोसॉफ्ट ने अपने 5 हजार स्टाफ को नौकरी से निक
ाल दिया है। अपने 34 साल के इतिहास में माइक्रोसॉफ्ट ने पहली बार जॉब कट किया है। दुनिया की सबसे बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी माइक्रोसॉफ्ट ने अपने 5 हजार स्टाफ को नौकरी से निक
ाल दिया है। अपने 34 साल के इतिहास में माइक्रोसॉफ्ट ने पहली बार जॉब कट किया है। मंदी की वजह से दूसरी तिमाही के खराब नतीजों के बाद कंपनी ने यह ऐलान किया है। दूसरी तिमाही में कंपनी के प्रॉफिट में 11 परसेंट की कमी दर्ज की गई है। कंपनी के सीईओ स्टीव वामर ने कहा है - ' हम फिलहाल ऐसी हालत में हैं जो विरले ही आती है। कैश की कमी की वजह से बिजनेस इंडस्ट्री और कंज्यूमर्स अपने खर्च कम कर रहे हैं। ऐसे में नए कंप्यूटर्स की बिक्री कम हो रही है। '

चौथे खम्भे में लगा मंदी का दीमक

जी हाँ लोकतंत्र के चौथे खम्भे यानि पत्रकारिता जगत में मंदी का दीमक लग्नेलगा है। क्या आप देख प् रहे हैं की किस तरह मंदी के नाम पर रोज दिन मीडिया जगत से लोगों को निकला जा रहा है।
दरसल मंदी का इस्तमाल कैची के रूप में किया जा रहा है। शिकार तो छोटे पत्रकार को होना पड़ रहा है। उचे पड़ पर बैठे लोग तो दुरुस्त हैं। यैसे में इंडिया के कुछ गिने हुए मीडिया हाउस लोगों को निकालने के बजाये बड़े पदों पर बैठे अधिकारीयों के तनख्वा में से कटोती कर रहे है।





Sunday, January 25, 2009

मंदी का रोना हुवा पुराना

अब कुछ यूँ कहने की गुंजाईश बचा कर रखें,
जिसमे आप थोडी देर के लिए अपना सब कुछ भूल जायें,
वो क्या हो सकता है?
कुछ पुराने पल ,
दोस्तों के साथ चाँद देखना,
सुंदर लड़की को देख कर....
पर मन को बहलाना जरुरी है,
क्या है की आप खुदी से निराश हो गए तो,
किसे क्या फर्क पड़ने वाला,
कोण आप के गम में साझा होगा,
ख़ुद ही आसू पोछने होंगे,
गिर कर धुल झाड़ कर फिर से भागना होगा,
ताकि खुले मुह को बंद कर सकें।
इसके लिए आपको हौसला बना के रखना होगा।

गणतंत्र मंदी और आम आदमी की नौकरी

आम आदमी इस गणतंत्र में क्या देख रहा है?
  1. अपनी नौकरी पर लटकती तलवार
  2. घर_बाहर सवाल पूछतीं नज़रें क्या मिया क्या इनदिनों घर में बैठक कर रहे हो
  3. बीवी भी चेहरा देख कर बार बार आखों में सपने लिए टुकुर टुकुर देखती है क्या होगा अब
  4. दोस्तों की बैटन में वो गर्माहट खो गई
  5. दफ्तर में फ़ोन करो तो बहानो की जड़ी मिलती है
  6. उस पर तीन दिन की छुट्टी उफ़ क्या निठल्ला समय भी भरी पड़ता है
  7. और भी सवाल है इस गणतंत्र पर सर उठा रहे हैं
  8. आतंक, बेरोजगार होते कम्पनी के लोग, बिटिया के सवाल आदि आदि

लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ यानि ये भी...

लोकतंत्र के इस चौथे स्तम्भ की खबरें क्या किसी अख़बार में जगह पाती हैं? क्या कभी आप ने सोचा है की इस जगत में काम करने वाले लोगों की खबरें कहाँ छापतीं हैं। शायद कहीं नही, ये अपने ही जगत में खो जाते हैं।
इन दिनों अखबार और न्यूज़ चैनल में जम कर मंदी को लेकर लोगों को बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है। मगर आपने किसे चैनल या अखबार में इस बाबत ख़बर नही पढ़ी होगी। क्यों सोचा है आने वाले दिनों में और कितने लोग रोड पर होंगे यैसे पत्रकार जो आप को हर पल की ख़बर दिया करते थे वो भी हर कीमत पर। लेकिन उनकी हर पल खबरे कहीं नज़र नही आती।
क्या पत्रकारिता का यह कला फिलहाल संकट के दौर गुजर रहा है?



Thursday, January 22, 2009

जिनके जॉब चले गए

ज़रा सोच कर देखें की पल पहले ऑफिस में आप काम कर रहे थे, मगर इक कॉल, इक लैटर आपकी दुनिया बदल देती है। देखते ही देखते आप उस ऑफिस की लिए, वहां अस्त कम करें वाले दोस्तों के लिए गैर हो जाते हैं। नज़रें झुका कर कम करते लोगों की आखें बोहोत कुछ बिन बोले कह देती हैं। उनके अन्दर डर होता है कहीं साथ देख लिया गया तो...
बेचारे इसी डर से आप से खुल करबोल तक नही पते। कहना तो वो भी चाहते हैं मगर डर अनदेर निकल दिए जाने का सताता है। इन दिनों बड़े मीडिया हाउस से लोगो को बहिर का रास्ता दिकाया जा रहा है। यैसे में कोण कोई भी हो हर किसे के सर पर मंदी की तलवार लटक रही है।
कोई भी बेरोजगार नही होना चाहता पर साहिब मंदी की लाठी खूब भांजी जा रहीहै।
दीखते हैं कितने लोग इस आंधी में बर्बाद होते हैं।







Tuesday, January 20, 2009

साजिश में शामिल हूँ

जी हाँ मैं शाजिश में शामिल हूँ ,
यूँ तो साजिश रचना,
किसी के खिलाफ कहीं स्वीकार नही,
लेकिन मैं शामिल हूँ साजिश में उनके खिलाफ,
जो ज़हर उगल रहे हैं धर्म , कॉम के नाम पर।
हाँ मैं स्वीकार करता हूँ_
मैं षडयंत्र रच रहा हूँ,
उनके बिरुद्ध,
जो हर पल लगे हैं देश , समाज को....

Saturday, January 17, 2009

संभावना आश जगती है

जब लाइफ में संभावना हो तो ज़िन्दगी में उमीद बनी रहती है।
आप उसे इक नै रचना करने और ज़िन्दगी से लड़ने की शक्ति देती है। इन दिनों हर सेक्टर में चटनी हो रही है।
नौकरी पर यमराज का शय है। सारे डरे और सम्हे हुए। कब किस की नौकरी चली जाए कहा नही जा सकता। मगर इन्ही हालत में हमें अपनी उर्जा और हिम्मत को बना कर रखन है।
वरना बिखरने से कोई रोक नही सकता। वैसे देखा जाए तो मंदी को औजार के रूप में इस्तमाल किया जा रह है। कम्पनी अपनी बैलेंस शीत में घटा दिखा कर एम्प्ली को हटा रहे हैं। कहा जाता है की समय ठीक होते ही पुराने लोगोको बुला लिया जाएगा। बहरहाल यह मंदी कितने लोगो का नेवला चिनेगी।
किते घरों में मातमी छायेगी पता नही ज़ार जार रोते लोगो को अभी लंबा समाये इन्ही हालत में काटन होगा।
बाज़ार के पंडितों का मानना है की यह दवार अभी दिसम्बर तक रह सकते हैं।







Wednesday, January 14, 2009

क्या आप जानते हैं

आप अंदाजा लगा सकते हैं की पल में कैसे लोगों के नज़र बदल जाया करते हैं। अभी आप के साथ अच्छे से बात कर रहे थे लेकिन जब पता चलता है आप कुर्सी पर नही हैं वैसे ही उनकी सोच बदल जाती है, आप कुछ नही कर सकते बस खेल देखते जायें। उन लोगो पर तो और ही हसी आती है जो दोस्ती की दुहाई देते नही थकते थे लेकिन वही नज़रें फेर लेते हैं।
कभी सोचा है कैसा लगता होगा?
खैर रहने देन इन बैटन को अब कोई मतलब नही। जब साथ थे तो साडी बार\तें हुआ करती थी, अब तो साहिब दिख्वे की रह गई हैं।
चलिए साहिब आप भी खुश की इक हमारे साथ से गया।
मगर ज़रा सोचे की आप पर जब बात आएगी तब भी इसी तरहं सोचा करेंगे शयद न।

Sunday, January 4, 2009

क्या सड़क लाल दिखती है

सपने में कभी आपने सड़क को लाल देखा है ? नही तो दिखाई देगी। यूँ तो सड़कें काली होती हैं। सड़क पर जाने वाली गाड़ी अपनी मंजिल तक जाती है। सड़क दोस्तों कहीं नही आती जाती जाता हैं निर्जीव गाडियां , हम और आप।
सड़कें कहीं नही जाती जाते हैं हम सजीव लोग। मगर रस्ते में बिना देखे की कौन कुचल जाए। सड़क अगर बोलती तो कहती की भाई जावो जहाँ जेआना है। मगर घर जावो। बिटिया राह तक रही है। बीवी की आस में तंगी आखें आपको जोह रही हैं।








Friday, January 2, 2009

साल की सुबह

पिछला साल जैसा भी रहा कम से कम इस साल कुछ बेहतर रहे। न हो बम धमाके, न लोग रहें परेशां। मगर देखिये साल की पहली सुबह बम blast में लोग फिर मरे। पर हम लोग कुछ तो येसा करें की यैसे वारदात न हो।
साल का अमूमन दिन सृजन में बीते।



Friday, December 26, 2008

पाक के नापाक इरादे दोनों देशों पर क्या कहर बअर्प सकते इसके लिए इतिहास के पन्ने मौजूद हैं।

युद्ध दोनों देश नही चाहते मग इनदिनों जैसी बयानबाजी की जड़ी लगी हुई है उससे तनाव बढ़ता जा रहा है।

क्या पाकिस्तान युद्ध के बदौलत अपने देश में राज करना चाहता है। वहांके आवाम को आज से नही लंबे समाये से गुमराह किया जाता रहा है। शयद यही वह तरकश है जिससे पाकिस्तान भारत के खिलाफ इसतमल करता रहा हैं। मगर दोनों देशों के जनता कितनीइ होगा निर्दोष है की हर बार चली जाती है।

बेहतर तो यही होगा की दोनों देशों को युद्ध से हर संभव बचने की कोशिश करनी चाहिए।

पाक के नापाक

Sunday, December 14, 2008

हर दस सेकंड में ....

हर दस सेकंड में इक आदमी को नौकरी से हाथ धोना पड़ रहा है। उस देश या उस आदमी की मनाह्य्स्थाठी क्या होगी आप अंदाजा लगा सकते हैं।
घर में बच्चे की सामत आती होगी , बीवी पिटाई खाती होगी या फिर वह लाइफ को पानी पी पी कर कोसता होगा।
काश उसे ज़िन्दगी में यह दिन न देखने पड़ते। मगर ज़नाब ऋण ले कर घी पीने का मज्जा भी तो अमेरिका ने लिया अब उसके किए का फल यूरोप यसिया सब को भुगतना पड़ रहा है। लोग डरे समाहे ऑफिस जाते हैं कल आयेंगे की नही कुछ पता नही होता।
यस ही हालात लोगो को जीवन समाप्त करने पर मजबुर करता है।
यह दिन भी कट जायेंगे।
नीके दिन जब आयेहे बनत न लाघिये दीर



अनिर्णय की घड़ी

समाज हो या आदमी हरिक के लाइफ में यह पल आता है जब वो किसी मुकमिल निर्णय पर नही आ पता।
क्या आपने कभी सोचा है इस हाल में आप क्या करते हें। या तो सोचना बंद कर देते हें या फिर नए सिरे से सोच चलने लगते हें।

Sunday, December 7, 2008

मंदी का असर

किस पर नही दिख रहा है मंदी का असर? सभी लोग चाहे वो छोटे रेतैलेर हों या बड़ी कंपनी सभी अपने यहाँ इसी का रोना रो रहे हैं। लोगों को बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है। यैसे में हर कोई डरे समाहे हैं। किस की गर्दन कटेगी कोई नही जानता।
जो लोग शादी करने वाले थे वो ज़ल्दी में कर रहे हैं ताकि अची लड़की मिल सके। नौकरी छुटने के बाद कोई नही पूछेगा। दहेज़ भी कम मिलेंगे।
दूसरी तरफ़ चहरे उदास हैं। काम में मनन नही लगता
प्यार में रोटी , नौकरी और लोगों के सवाल घिर गए हैं। क्या खाक प्यार के धुन कोई कैसे सुन सकता है। बाज़ार के चौतरफा मार को समझने के लिए अर्थ शास्त्र के साथ समाज शास्त्र को भी समझने होंगे। मनोबिगायण भी पढ़ना होगा।
क्या कुछ नही प्रभावित होता है। घर से लेकर दफ्तर तक काम से लेकर जीवन तक सब इस समय मंदी के निचे आ गए हैं।
बाज़ार जीवन रेखा को तै कर रही है। उधर सेंसेक्स पर उतर चढ़ होता है इधर जीवन के अहम् फैसले लिए जाते हैं।














Friday, December 5, 2008

दिसम्बर की वो तारीख

आज तक़रीबन सोलह साल बीत चुके मगर घटना वहीं की वहीं खड़ी लगती है। तमाम मीडिया की नज़र यूपी के अयौध्या पर टिकी थी। सारा देश शर्मसार था। मगर इक जोर ने उस येतिसाहिक धरोहर को हमेशा के लिया नस्तानाबुत कर दिया।
आज उसी की वारसी है। वारसी तो मनायेजयेगी लेकिन उस यस्थल पर उडे धुल में लिपटी सचाई को क्या भुला या जा सकता है ? नही ज़नाब यह वो घटना थी जिसके टिश सदा के लिए समय के साथ चलेगी।
कुछ कंदील कुछ आसूं , चाँद बयां के बाद यही इस घटना के साथ होगा जो ....





Monday, December 1, 2008

चलिए साहिब दिसम्बर आ ही गया

दिसम्बर का पहला दिन यानि यह साल भी बस जाने के कगार पर खड़ा है। मुंबई की घटना ने देश को झकझोर कर रख दिया।
उम्मीद की जाए की अच्छी स्टार्टिंग हो।

Friday, November 28, 2008

सोची हुई बात

सोची हुई बात जब सच हो जाए तो उसे क्या कहेंगे औरोबिन्दो घोष ने कहा था के हम जिस तरह के विचार हम करते हैं वो विचार कल्पना आने वाले समय में घटित होती हैं । इस लिए नकारात्मक सोच न तो अपने लिए और न ही दुसरे के लिए रखना चाहिए। क्या पता वो कब कैसे सच में साकार हो जाए। २६ की शाम मैंने इक कविता लिखी की बोहोत दिनों से कुछ हुआ नही, न बम बलास्ट हुआ न आत्महत्या हुई, किसे ने कुछ नही किया। और देखिये शाम होते न होते सच में मुंबई में इतना बड़ा आतंकी हमला हुआ।
या तो इसे आप संजोग कह ले या शब्द की शक्ति की शब्द ब्रमः होता है शब्द की शक्ति होई है।
शब्द की साधना की जाती है। इक शब्द क्या नही कर देता।






Tuesday, November 25, 2008

बोहोत दिन से कुछ हुवा नही

बोहोत दिन बीते न हसी आई,
न दोस्तों की बात पर ताजुब,
क्या कहूँ की बस तेरी याद आई।
क्या कहूँ ,
कुछ दिनों से लोगों को ,
आर्थिक मंदी के आगे ज़िन्दगी खाक करते देख,
बाज़ार पर हसी आई।

Thursday, November 20, 2008

चुनाव के मौसम में

चुनाव के मौसम में अखबारों के पन्ने, टीवी पर प्रचार के भरमार हो जाती है। नेता लोग तरह तरह के करामत करते नज़र आते हैं। इन दिनों अखबारों के पन्नो पर नेता पसरे होते हैं। इससे कमसे कम अखबारों को कमी तो होत्ती ही है ।
किसी के पैर छुते तो किसी को गले लगते नज़र आते नेता जी बेसक साल भर नज़र न आयें लेकिन साहिब चुनाव आते ही नेता जी गली गली भ्रमण करने लगते है। समझा करो सर जी चुनाव का मौसम है।



Wednesday, November 19, 2008

प्यार क्या खतरनाक होता है

प्यार क्या सचमुच बोहत खतरनाक होता है की जो प्यार करने की गलती करता है उसे या तो गोली खानी पड़ती है या फिर रेल के निचे फेक दिया जाता है मरने के लिए। चाहे वो देश का कोई भी कोना हो कई जगह इसी तरह की घटनाये घटी हैं।

Tuesday, November 18, 2008

कुछ बातें कुछ यद्यें

जब बात निकलती है तो पुराने गुजरे समय की कई घटनाएँ खुलती चली जाती हैं। पिछले दिनों अपने पुराने दोस्त से बात हुई इनदिनों वो नेपाल में है वैसे तो वो नेपाल का ही है लेकिन काफी समय से संपर्क टूट सा गया था। चाँद तस्वीरों से झाकता वो लंबा लम्हा यका याक ताजा हो उठा। वही कदकाठी वही अंदाज बस बदला था तो समय। लंबे समय से न मिल पाने के कई मजबूरियां थीं। पर बातें तजा तरीन थीं। लगा ही नही की हम इतने समय की साडी बातें साझा नही किया।
कुछ दोस्त होते हैं जो दूर तो होते हैं मगर जब भी मिलते हैं वही गर्मी वही ज़जबत होती है। कितने खुशनसीब होते हैं वो लोग जिन्हें सचे दोस्त मिला करते हैं। दोस्ती वास्तव में निभाई जाती है। यूँ ही नही दिल लुभाता कोई।








Thursday, November 13, 2008

सच में जो रोज़ शामिल हो....

यह सच है जो आपकी ज़िन्दगी में रोज के उठा पटक , घटनावो में शामिल होता है वही दूर जा कर भी दूर नही होता। बल्कि कहना चाहिए के जो दूर रहा कर भी आपकी रोज के लाइफ में शामिल होते हैं वो भी बेहद याद आते ही हैं। कभी कभी यूँ होता है की वो दोस्त मिल जाता है रस्ते में या कहीं किसी जगह तो वही भावः नही निकलते जो कभी साथ रहते लगाव हुवा करता था। सम्भव है आप भी इस तरह के अनुभव से गुजरे हों। दरअसल होता यह है की जो लोग साथ होते हैं वो लड़ते भी हैं , प्यार भी उतना ही करते हैं। दोनों ही लगावो के रंग हैं ।
यही रंज में न बदल जाए इए का ख्याल रखना चाहिए।





Wednesday, November 12, 2008

उर्दू जौर्नालिस्म रोल एंड....

उर्दू पत्रकारिता का अतीत और भविष्य पर दयाल सिंह कॉलेज में सेमिनार हुवा। इसमे उर्दू और हिन्दी के पत्रकार शामिल थे। लोगोनो की चिंता यह नही थी, के उर्दू पत्रकारिता को कैसे आज की चुनौतियों से लड़ने का औजार मिले या दिया जाए। बल्कि अमूमन वक्तावों ने केवल उर्दू ज़बान की तारीफ के पूल बांधे।
जबकि आज उर्दू पत्रकरिता को टेक्नोलॉजी बाज़ार और पाठक को समझना होगा।

Tuesday, November 11, 2008

क्या कोई दुःख से चिपक कर....

क्या कोई दुःख से चिपक कर लंबे समय तक रह सकता है ? या कोई भी दुःख से लग कर जयादा समय तक चल नही सकता। एक समय का बाद दुःख भी ज़रा हल्का पड़ने लगता है। और देखते ही देखते दुःख का रंग ज़रा से सुखद बयार पा कर फुर्र होने को बैचन हो जाता है। कालिदास की एक लाइन है सुख दुःख चक्र की तरह होता है।
दोनों ऊपर और निचे होते रहते हैं।
फिर क्या कोई इस फलसफा को लाइफ में ढल पता है ? जिसने भी इस पर अमल किया उसका दुःख काल कम होता चला जाता है।


Thursday, November 6, 2008

बहन को गले लगाया तो....

लगा जैसे बोहोत बड़ा हो गया। बहन की आखों में आंसू थे , हाथों की पकड़ में प्यार।

अपने ही शहर में

वो अपने ही शहर में चार दिन और चार रात रुका लेकिन अपने घर नही। वो तो रुका रहा देखते हुए सपने जिससे मिलने के लिए तक़रीबन ८०० किलोमीटर का फासला तै कर आया था अपने ही शहर में। लेकिन अपने घर न ही रुका और न ही ख़बर ही थी घर वालों को की उनका बेटा शहर में है। मगर घर पर नही।
कचोट तो उसे भी हुई जब की कैसे हो की अपने घर नही गए ? कमल है कोई इतना करीब हो जाता है इक लड़की के लिए जो घर न जाए ? तब लगा की कुछ तो सच है। वास्तब में कुछ तो उसमे है की वो अपने घर न जा कर सीधे मिलने उससे चल पड़ा था।
रस्ते में क्या कुछ नही मिले सब कुछ वही रस्ते , वही दुकानें, वही सब कुछ मगर इन सब से बेखबर इक ही धुन में बढ़ता उसके घर जा पंहुचा। वो भी इंतजार में थी लेकिन उससे क्या मालूम की ज़नाब अपने घर न जा कर सीधे उससे मिलने आ धमके।
पर हुजुर यही सच है। चार दिन चार रात अपने ही शहर में रहे मगर अगनाबी की तरह। रेल गाड़ी में बैठे तो लगा पिता कह रहे हों बेटा ठीक से जाना, माँ की आखों में आसू पूछती से की क्या तू तो सब कब आता है और कब चलने का वकुत हो जाता है पता ही नही चलता....
सोच में डूबा बिता था तभी माइक पर आवाज गूंजी गाड़ी बस कुछ ही समय में आने वाली है। और रेल पर बैठ गए कब गाड़ी नदी , खेत , स्टेशन को पर करती गुजर गई तब पता चल जब मूंगफली वाला आवाज लगा रहा था टाइम पास टाइम पास।
समय के दरमियाँ वो , रातें , दिन दिन भर सोचना , आजान की आवाज से जागना सब कुछ घूम जाती थीं।









शहर के प्लात्फोर्म पर

क्या कभी अपने शहर के रेलवे स्टेशन से आपको लगाव रहा है ? क्या कभी अपने ही शहर के प्लात्फोर्म को ट्रेन से पार किया है ? नही फिर आप समझ सकते हैं, कैसा लगेगा ? अपने शहर को ट्रेन से पार करना।
आप स्टेशन पर बिना ....

Thursday, October 30, 2008

ज़िन्दगी में यूँ ही

कुछ लोग यैसे ही मिलते हैं जिन्हें भूल पाना मुमकिन नही होता। अकसर्हन वो तो गाहे बा गाहे ज़िन्दगी में आते जाते रहते हैं। आप इंकार नही कर सकते। हैं कुछ लोगों की मौजूदगी ज़रा भरी पड़ती है। पर कर सकते हैं उनके संग भी सामना करना पड़ता है।
लाइफ होती ही है मिलने और कुछ दूर जाकर अपनी अलग रह निकल जाने की। हर कोई यही तो नही कर पता अतीत में ही चिपक कर रहना चाहते हैं , uनकी भी गलती नही है है वो तो यैसे दौर की लहर साथ लिये होते हैं के साडी नै चीजें ख़राब लगती हैं।
खैर ज़िन्दगी में कुछ पाने के लिए संगर्ष करना पड़ता है।








Sunday, October 26, 2008

सड़क का रंग लाल क्यो

आज कल मुझे सड़क की रंग लाल दिखती हैं । यूँ तो सड़कें काली हुवा करती हैं, लेकिन आजकल काली के बजाये लाल दिखती हैं। सरकारी रिपोर्ट बताती हैं भारत में सड़क पर बेतहाशा खून बह रही हैं ।
लोग और गाड़ी के रेलमपेल में इन्सान के कीमत ख़त्म से होती जा रही है। सिर्फ़ आगे भागने के जुगत में कोई कुचल जाए मगर हम युफ़ तक नही करते। सड़कें कहीं नही जाती जाती है इंसानी भाग। सड़क का क्या कुसूर वो तो लोगों के बेहतरी और मंजिल तक ले जाने के लिए वचनबद्ध होती है लेकिन कोई रह में दम तोड़ दे तो सड़क क्या करे।
इक बार गाड़ी हो या इन्सान घर से निकलने के बाद तै से नही कह सकता की वो सकुशल घर पर वापस आएगा।
हर किसी की कोशिश यही होनी चाहिए की हर कोई घर लौट जाए। स्कूल जाती बिटिया पापा को...
काश हम पापा , भाई , पति को सड़क पर तड़पने को न छोडें।







Friday, October 24, 2008

आखें हैं की मानती नही

सभा में या फिर भीड़ में हमारी आखें अक्सर कुछ तलाशती हैं। वही चेहरा वही , भावों को धुन्दती हैं जिसको देख कर जी खुश हो जाता है ।


सर्दी यूँ ही

सर्दी यूँ ही दबे पाव आती है सर्दी क्या यूँ ही दबे क़दमों से हमारे कमरे , मौसम और जेहन में प्रवेश करा करती है ... अचानक यूँ ही ?धीरे धीरे पंखा कम से बंद हो जाते हैं। नल का पानी ठंढा लगने लगता है। सुबह पावों में सर्दी प्रवेश करने लगती है।दुःख तो शायद यूँ नही आता। खुशी यका याक आया करता है। दुख भी उसी रस्ते आया करती है।

सर्दी यूँ ही चुपके से कमरे में प्रवेश करती है

सर्दी यूँ ही चुपके से कमरे में प्रवेश करती है की जैसे शाम में या फिर सुबह पावों में ठंढ लगा करती है। सर्दी पंखों के बंद होने से लगता है चुपके से कमरे में प्रवेश किया करती है। शायद दुख भी यूँ ही चुपके से हमारे करीब घुमती है समय पा कर हमारे संग हो लेती है। सुख तो धमाहे के साथ आया करती है ।
सब को पता चल जाता है । मगर ज़नाब दुख तो बिन बताये हमारे साथ चला करती है ।


सर्दी यूँ ही दबे पाव आती है

सर्दी क्या यूँ ही दबे क़दमों से हमारे कमरे , मौसम और जेहन में प्रवेश करा करती है ... अचानक यूँ ही ?
धीरे धीरे पंखा कम से बंद हो जाते हैं। नल का पानी ठंढा लगने लगता है। सुबह पावों में सर्दी प्रवेश करने लगती है।
दुःख तो शायद यूँ नही आता। खुशी यका याक आया करता है। दुख भी उसी रस्ते आया करती है।





Thursday, October 23, 2008

लोग क्या यूँ ही चले जाते हैं

लोग कई दफा यूँ ही बिन बताये हमारे बीच चले जाते हैं। उनके जाने के बाद महसूस होता है वो कल तो हमारे साथ था। आज अचानक बिन बताये कहाँ चला गया ? उसके जाने के बाद लगता है वो तो उन हर चीजों में है जिसका इस्तमाल किया करता था। हम बस चीजों में, जगह, बातो में उसे तलाश करते हैं।
लेकिन वो तो इन सब से बेखबर कहीं दूर जा चुका होता है । हमारे पास रह जाती हैं तो बस उसके साथ बीतए पल घत्याने बस ।






Thursday, October 9, 2008

रावन को जलाया

क्या अपने अन्दर के रावन को जलाया? हर के जेहन में एक नही कई रावन रहा करते हैं। पर हम उस रावन से मुहब्बत किया करते हैं। शायद हम कई बार रावन की सिनाखत नही कर पाते या कभी कभी पहचान कर भी नज़रंदाज करते रहते हैं।
रावन महज एक आदमी नही बल्कि कई मानवीय पहलुवो कर प्रतिक है। हर बार दहन के बाद भी बुराइ समाज से जाती कहाँ है। सब के अब हमारे आसपास घुमती रहती हैं।



Sunday, September 28, 2008

आतंकी का धर्म

आतंकी किसी भी देश , धर्म, के हों मूल बात ये है वो महज आतंक ,खून , चीख- पुकार फैलाने में विशवाश करते हैं। चाहे वो सीमा पर की ज़म्मीन हो या भारत की हर जगह सिर्फ़ ब्लास्ट किए जा रहे हैं।
लोग रोते बिलखते हैं। मगर आतंकी इसको अपनी सफलता मानते हैं।
देश संकट में है। रोज कही न कहीं ब्लास्ट हो ही रहे हैं। इससे किस का मकसद सधता है ? रोटी तो मानवता ही है। पर क्या कहें , यूँ के घर परिवार में सदस्य होते हैं या नही ? पता नही पर दिल यूँतो होते नहीं होंगे ।




Thursday, September 25, 2008

आखरी मुलाकात

आज लगा सभी से शायद आखरी मुलाकात हो रही है। फिर कितने दिनों के बाद लोगों से मिलना होगा? इक लम्बी चुप्पी के बाद जब उनलोगों से मिलना होगा तो क्या वही ऊष्मा, वही , मुस्कान दिखेगा?
लेकिन शायद आज दोस्तों से मिल कर लौटना येसा लगा की जैसे पता नही कब फिर मुलाकात होगी।
निर्मल वर्मा की इक बात याद आती है।

Thursday, September 18, 2008

खाली यूँ ही

क्या सोचते हैं जब आप खाली बैठे होते हैं ।।
अकसर हम बीते दिनों और गुजरे समय की घटनावो में डूबता उतरते रहते हैं। या यूँ कह लें की हमें बेहद पसंद होता है यह कहते रहना की तब मैं या था वो करता था ....
दरअसल हम अपने अतीत से निकल ही नही पाते हमें वो दिन ही याद आते हैं जो गुजर चुका है ।
कभी मौजूदा पेचोखम से रूबरू होने की हिम्मत जुटा कर हमें चल रहे समय की और आने वाले कल की चुनौतियें का मुयाना करना बेहतर होता है ।

Tuesday, September 9, 2008

बाज़ार में मीडिया या मीडिया में बाज़ार

बाज़ार का चरित्र ही होता है कुछ समय में बदल जाए। बाज़ार केवल मुनाफा मांगती है। मुनाफे के लिए बाज़ार किसी भावना में नही। शुद्ध रूप से पैसे बनाना ही बाज़ार का लक्ष्य होता है। ठीक उसी तर्ज़ पर आज मीडिया भी केवल मुनाफे की ख़बर उछालता है।
आज मीडिया की कई स्तरों पर आलोचना की जा रही है। केवल हिंसा , सेक्स , तमाशा जैसे लोक रूचि की चटपटी खबरों को प्रमुखता से इतनी बार बजाते है की लोगो को साडी चीजे सच लगती है।
सच वह जो महज नम्बर बनने में कम आते हैं। मीडिया की आलोचना इस बात को लेकर भी होती है की यह चीजों को या तो इस लेवल तक ला देती है की विश्वास कमतर होता जाता है या फिर लोग देखना बंद कर देते हैं।










Tuesday, September 2, 2008

बिहार बाढ़ के समय देश साथ

उधर बिहार में बाढ़ में लोग जूझ रहे हैं इधर रामदेव के पहल पर पुरे देश के बड़े बड़े उद्योग घराने मदद के लिए आगे आ रही हैं। न केवल कम्पनी बल्कि राज्य सरकार भी मदद की राशिःबिहार भेजने में जुट गए हैं। सरकार के साथ ही सैनिक भी अपनी इक दिन का पेमेंट बिहार भेज रही हैं। संसद भी अपनी इक दिन का वेतन दे रहे हैं।
देखा गया है जब भी देश में विपत्ति का दौर आया है पुरा देश एक हो जाता है। बाढ़ से तबाह लोगो को देख कर आखे भर भर आती हैं। लोगो की जमीं छुट गई। घर छुट गए। बस जीने की आस उनकी आखों में झाकती हैं।
या रब उनको इस आपदा से उबार दे।







Monday, September 1, 2008

अतीत के संग

दरसल अतीत के संग चिपक कर रहा नही जा सकता।अतीत को समझा ही जा सकता है। ताकि आगे की सीख ली जा सके। अतीत में अटकी चेतना कभी भी किसी भी देश समाज और आदमी के लिए बेहतर नही होता। अतीत को तो ठीक ही किया जा सकता है।




Sunday, August 24, 2008

होर्डिंग्स को देख कर शहर का मिजाज़ जाने

क्या कभी शहर से गुजरते हुवे शहर की सडको पर लगे होर्डिंग्स पर नज़र डाली है ? नही तो कभी डालें आपको शहर के बदलते मिजाज़ का पता चलेगा। रेस्तरा, होटल से लेकर शहर में होने वाले जलसा , आन्दोलन सब की ख़बर शहर में प्रवेश करते ही मेल जाती है।

Thursday, August 21, 2008

जब खेल में मैडल आया है

सरकार की तरफ़ से तोफा देने का सिलसिला निकल पड़ा है। मगर कोई जमीनी हकुकित नही जान पता की किस हालात में हमारे खिलाड़ी अभ्यास करते हैं। किन बुनादी ज़रूरत के बगैर वो ख़ुद को तैयार करते है।
बेहतर तो ये होता की शुरू से सरकार प्रतिभशाली युवा को बढावा देना होगा।
फिलहाल सरकार सर्वाशिशाका अभिवन को कारगर बनने के लिए विद्यालय में खेल को तवज्जो दिने का मन बनाया है।

Tuesday, August 5, 2008

अर्जुन की गांडीव

कभी सोचता हूँ,
अर्जुन की गांडीव जब पेड़ पर तंगी गई होगी ,
तब कैसे अपनी अन्दर के अर्जुन का समझए होंगे ,
तीर तो चलने को तैयार पर गांडीव ही नही ,
कलम तो पास में हो पर ,
लिखने पर पावंदी लगी हो तो ...
विचार यूँ ही पड़ पर फलते होंगे ,
आज कल कई हैं जिनके विचार की पोटली पड़ पर ही रहा करती है।
.........
बाहर की आवाज़ से तंग आ कर ,
अक्सर अन्दर के कमरे में चला जाता हूँ ,
पर वहां भी माँ के घुटने से उठी आह बजने लगती है,
पिताजी की आखें कहने लगती हैं ढेर से सवाल ,
या फिर कालेज की दोस्त की हँसी गूंजने लगती है॥
तंग आकर बैठ जाता हूँ -
देखने टीवी पर वहां संसद के हंगामे सुनाये जाते हैं ।
परेशां पहले की तस्वीर देखने लगता हूँ ,
सोचा अतीत की फोटो में तोडी देर रह लूँ ,
मगर उन तस्वीरों में मेरे भरे काले बाल सर दिखे ,
जैसे ही अपने उचाट होते सर पर सोचता हूँ ,
तभी काम वाली बेल बजा देती है ,
मैं सोचता ही रह जाता हूँ ,
आवाज कमरे में भी शांत न हो सका।

शिक्षकीय दुनिया की कहानी के पात्र

कौशलेंद्र प्रपन्न ‘‘ इक्कीस साल के बाद पहली बार किसी कार्यशाला में बैठा हूं। बहुत अच्छा लग रहा है। वरना तो जी ...