क्या अपने अन्दर के रावन को जलाया? हर के जेहन में एक नही कई रावन रहा करते हैं। पर हम उस रावन से मुहब्बत किया करते हैं। शायद हम कई बार रावन की सिनाखत नही कर पाते या कभी कभी पहचान कर भी नज़रंदाज करते रहते हैं।
रावन महज एक आदमी नही बल्कि कई मानवीय पहलुवो कर प्रतिक है। हर बार दहन के बाद भी बुराइ समाज से जाती कहाँ है। सब के अब हमारे आसपास घुमती रहती हैं।
यह एक ऐसा मंच है जहां आप उपेक्षित शिक्षा, बच्चे और शिक्षा को केंद्र में देख-पढ़ सकते हैं। अपनी राय बेधड़ यहां साझा कर सकते हैं। बेहिचक, बेधड़क।
Thursday, October 9, 2008
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शिक्षकीय दुनिया की कहानी के पात्र
कौशलेंद्र प्रपन्न ‘‘ इक्कीस साल के बाद पहली बार किसी कार्यशाला में बैठा हूं। बहुत अच्छा लग रहा है। वरना तो जी ...
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कौशलेंद्र प्रपन्न हमारे शिक्षक पढ़ाने पर ज़ोर देते हैं। ये अपनी कक्षा में पढ़ाने भी चाहते हैं। फिर क्या वजह है कि हमारे शिक्षक न पढ़ा पाने की ...
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कौशलेंद्र प्रपन्न जनमते ही बच्चों को मां की भाषा, नर्स की भाषा, डॉक्टर की भाषा, दाई की भाषा, नाते-रिश्तेदारों की भाषा कानों में पड़ती है...
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कौशलेंद्र प्रपन्न हर जगह उनके होने का एहसास ताज़ा रहती हैं। जहां जहां जैसे वो चलते थे। चलते नहीं बल्कि पांव घसीटकर चलते थे, वह पदचाप सुना...
2 comments:
sahi hai
विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनांयें
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