सर्दी यूँ ही चुपके से कमरे में प्रवेश करती है की जैसे शाम में या फिर सुबह पावों में ठंढ लगा करती है। सर्दी पंखों के बंद होने से लगता है चुपके से कमरे में प्रवेश किया करती है। शायद दुख भी यूँ ही चुपके से हमारे करीब घुमती है समय पा कर हमारे संग हो लेती है। सुख तो धमाहे के साथ आया करती है ।
सब को पता चल जाता है । मगर ज़नाब दुख तो बिन बताये हमारे साथ चला करती है ।
यह एक ऐसा मंच है जहां आप उपेक्षित शिक्षा, बच्चे और शिक्षा को केंद्र में देख-पढ़ सकते हैं। अपनी राय बेधड़ यहां साझा कर सकते हैं। बेहिचक, बेधड़क।
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शिक्षकीय दुनिया की कहानी के पात्र
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