Tuesday, February 25, 2014

National Secondary Education Campaign (NSEC)

  
This scheme was launched in March, 2009 with the objective to enhance access to secondary education and to improve its quality. The implementation of the scheme started from 2009-10. It is envisaged to achieve an enrolment rate of 75% from 52.26% in 2005-06 at secondary stage within 5 years of implementation of the scheme by providing a secondary school within a reasonable distance of any habitation. The other objectives include improving quality of education imparted at secondary level through making all secondary schools conform to prescribed norms, removing gender, socio-economic and disability barriers, providing universal access to secondary level education by 2017, i.e., by the end of 12th Five Year Plan and achieving universal retention by 2020.
Important physical facilities provided under the scheme are:
(i) Additional class rooms, (ii) Laboratories, (iii) Libraries, (iv) Art and crafts room, (v) Toilet blocks, (vi) Drinking water provisions and (vii) Residential Hostels for Teachers in remote areas.
Important quality interventions provided under the scheme are:
(i) appointment of additional teachers to reduce PTR to 30:1, (ii) focus on Science, Math and English education, (iii) In-service training of teachers, (iv) science laboratories, (v) ICT enabled education, (vi) curriculum reforms; and (vii) teaching learning reforms.
Important equity interventions provided in the scheme are:
(i) special focus in micro planning (ii) preference to Ashram schools for upgradation (iii) preference to areas with concentration of SC/ST/Minority for opening of schools (iv) special enrolment drive for the weaker section (v) more female teachers in schools; and (vi) separate toilet blocks for girls.
Implementation mechanism of the Scheme
The scheme is being implemented by the State government societies established for implementation of the scheme. The central share is released to the implementing agency directly. The applicable State share is also released to the implementing agency by the respective State Governments.
Financial and Physical Progress Under the Scheme
During the 11th Five Year Plan, the Central Government bore 75% of the project expenditure during the 11th Plan, with the remaining 25% being borne by State Governments. However, funding pattern was 90:10 for North Eastern States.
Fund Allocation and Disbursal till 29 August 2013

Fund Allocation till 31st October 2013
Year
BE
RE
Actual Expenditure (Released)
2009-10
1353.98
550.00
549.00
2010-11
1700.00
1500.00
1482.00
2011-12
2423.90
2512.85
2500.00
2012-13
3124.00
3172.00
3171.00
2013-14
3983.00
-
2404.2
Total
12584.00
7734.85
10106.20

  Physical Target and Achievements
Sr. No.
Physical Target till 31st March 2014
Achievements
1.
11,000 (approx.) new schools
10230 new schools sanctioned out of which 9219 schools have become functional (as on 31st October 2013)
2
Strengthening of 44,000 existing schools
Strengthening of 34891 existing schools have been approved in which 23407 new science lab, 19641 computer rooms, 25869 libraries, 28969 art/craft/culture rooms, 19401 toilet blocks, 12370 drinking water facilities and 2020 residential quarters  have been approved. Out of these 4632 science labs, 3750 computer rooms,4721 libraries, 4590 art/craft/culture rooms, 3863toilet blocks, 3098 drinking water facilities and338 residential quarters have been completed and remaining structures are in different stages of construction.(as on 31st March 2013)
3
1,79,000 additional teachers
41507 additional teachers have been approved, out of which 21936 additional teachers have been appointed.
4.
Teachers’ recruitment for sanctioned new schools @ 5+1 teachers per new secondary school.
64215 teachers have been sanctioned in respect of new secondary schools out of which 24184teachers have been recruited.
5
88,500 additional classrooms
49,356 additional classrooms have been approved out of which 9516 additional classrooms have been completed and construction in respect of 8220 additional classrooms is in progress.(as on 31st March 2013)
6
In-service training of all teachers every year
In-service training of all Govt. teachers including Govt. aided school’s teachers have been sanctioned.


Monday, February 24, 2014

लोकार्पण से आगे किताबें


 विश्व पुस्तक मेले में बहुत- सी किताबों के घूंघट उठाए जा रहे हैं। रोज़ किताबों को अनावर्नित किया जा रहा है। वो किताबें खुश हैं। मगर उन किताबों का क्या जो अपनी पारी के इंतजार में हैं। उन्हें भी कोई पुचकारे, पलटे और कहीं किसी के बैग में आए और घर में पहंुचे। ऐसी बहुत- सी किताबें हैं जो प्रकाशकों के स्टाॅल पर चुपके- चुपके कह रही हैं, आओ जी हमें भी पढ़ो। हमारे मुखड़े से घूंघट उठा दो। गौरतलब है कि रोज दिन तकरीबन सौ किताबों को लोकार्पण तो इस विश्व पुस्तक मेले में हो ही रहे हैं। उसमें कहानियां, कविताएं, आलोचना, निबंध आदि शामिल हैं। यदि थोड़ा ठहर कर देखें तो पाएंगे कि कविताओं की किताबें ज्यादा लोकार्पित हो रही हैं। वैसे यह एक मोटे तौर पर ही कहा जा सकता है क्योंकि लोकार्पित होने वाली किताबों में न केवल कविताएं हैं बल्कि कहानियों और आलोचनाओं की किताबें भी शामिल हैं। प्रश्न यह उठता है कि जिन किताबों का लोकार्पण इस मेले या अन्य मेलों में हो रहे हैं या हुए हैं क्या उनकी पठनीयता और बिक्री में भी इजाफा हुआ है या महज लोकार्पित होकर प्रकाशक के गोदाम में या फिर पुस्तकालयों में सेल्फ पर सजी हुई हैं।
बड़ी तदाद में किताबों का प्रकाशन एक आत्मतोष तो देता है कि किताबें छप रही हैं। उनके खरीद्दार और पाठक होंगे तभी तो प्रकाशक छापने का जोखिम उठाता है। लेकिन प्रकाशकों के अपने तर्क हैं उस ओर यदि ध्यान दें तो वो हमेशा यही कहते पाए जाते हैं कि किताबें नहीं बिकतीं। हमें दूसरे रास्ते से किताबों को खपाना पड़ता है। लेखक तो लिख कर अपनी जिम्मेदारी से निकल जाता है। मित्रों, परिचितों को किताबें भेंट कर अगली प्रति की मंाग सरका देता है। लेकिन प्रकाशक होने के नाते हमारी जिम्मेदारी बन जाती है कि कैसे किताबों को पाठकों तक पहुंचाया जाए। सामान्यतौर पर प्रकाशक मूल्यों में बढोत्तरी को लेकर जो तर्क चस्पा करते हैं उसके पीछे यही वजह गिनाते हैं कि कागज की कीमत, खरीदने वालों की कमी की वजह से किताबों के मूल्य ज्यादा रखना पड़ता है।
मेले में किताबें तो आ जाती हैं। उनका लोकार्पण भी बड़े नामी गिरामी लेखकों, कलाकारों आदि से कर दिया जाता है। लेकिन क्या उन किताबों का समुचित, समीक्षा, आलोचना भी हो पाती है? क्या उन किताबों का मूल्यांकन पाठक व आलोचक करता है आदि सवालों पर भी आज विचार करने की आवश्यकता है। आलोचना व समीक्षा किस प्रकार होती हैं और किताबों की समीक्षा आज किस रूप में हो रही है इस तरफ यदि नजर डालें तो पाएंगे कि वह समीक्षा कम पुस्तक परिचय ज्यादा होता है। मसलन किताब में कितने पन्ने हैं, कथानक कैसा है, लेखक ने किस विषय पर कलम चलाई आदि। जबकि एक समीक्षा न केवल लेखक के लिए बल्कि पाठकों के लिए मार्गदर्शक का काम करता है। लेखक से कहां कमी रह गई। पाठक को फलां किताब में क्या मिलेगा आदि पर विमर्श किए जाएं और बिना किसी पूर्वग्रह के समीक्षा हो तो वह किताब के साथ ही लेखक और पाठक के लिए ज्यादा लाभकरी साबित होगा।
अमूमन इन दिनों लोकार्पित होने वाली किताबें के भविष्य और वत्र्तमान पर भी ठहर कर विचार करने की आवश्यकता है। क्या आज जिस तरह की किताबें लिखी जा रही हैं वह आज की चुनौतियों से सामने करने के लिए हमें तैयार करती है या सिर्फ अतीत की सुखद-दुखद यादों व समय में विचरने भर की रचना है। क्योंकि अधिकांश कविताएं महज अतीतगामी दिखाई पड़ती हैं। ऐसी किताबों का क्या और कितना भविष्य है यह भी अहम है।

Tuesday, February 18, 2014

घूंघट में किताबें


इस विश्व पुस्तक मेले में बहुत सी किताबों के घूंघट उठाए जा रहे हैं। रोज़ किताबों को अनावर्नित किया जा रहा है। वो किताबें खुश हैं। मगर उन किताबों का क्या जो अपनी पारी के इंतजार में हैं। उन्हें भी कोई पुचकारे, पलटे और कहीं किसी के बैग में आए और घर में पहंुचे। ऐसी बहुत सी किताबें हैं प्रकाशकों के स्टाॅल पर चुपके चुपके कह रही हैं आओ जी हमें भी पढ़ो। हमारे मुखड़े से घूंघट उठा दो।

Wednesday, January 29, 2014

भगोड़े नहीं थे वो


कौन कहता है कि वो भगोड़े थे। उन्होंने तो सबको यही कहा था कि कल सुबह घर से जाएंगे, लेकिन रात में ही निकल गए। इसमें भगोड़ा की बात कहां से आ गई। बड़ी आसान सी बात भी आपको समझ नहीं आती कि घर बेच कर जा रहे थे। यानी दूसरे शहर। अब इस शहर से उनका दाना पानी खत्म हो गया था। बेटा अपना नया मकान बनाना चाहता था, उसे पैसे की आवश्यकता थी। सो उन्होंने बेटे के लिए अपनी गहरी कमाई से बनाए मकान ही तो बेच रहे थे। आखिर मरने क बाद भी तो यह मकान उसका ही होना था। यह अलग बात है कि जीते जी इस मकान को बेच गए। हां इसे भी बनाने के लिए अपने खेत और रिटायरमेंट के मिले पैसे लगाए थे। अब यह मायने नहीं रखता कि कैसे कैसे एक एक कमरे बनवाए और भर भर दुपहरिया, बरसात में बैठकर काम कराए। एक बार मोह टूटता है तो फिर हम कुछ भी कर देते हैं।
सुबह उनके दरवाजे पर ताला भाई साहब थे। खामोश और निरपेक्ष भाव से टंगे ताले की भी अपनी ही कहानी थी। वो ताला भी मास्टर साहब के घर से मांग कर लाए गए थे कि कल नया खरीद कर वापस कर दूंगा। तो ताले की भी मजबूरी रही होगी शायद। वो लटका था और कई कहानी रात की कह रहा था। वो तो रातों रात चले गए और लोगों की बातें, शिकायतें सुनने के लिए इसे लटका गए। ताला भी आखिर मजबूत दिल वाला था। वो भी बिना बेचैन हुए सब की बातें, लानतें सुन रहा था। लोग यही तो कह रहे थे कि बिना बताए चले गए। मेरा 10 हजार उनके पास था। तो कोई कहता मेरी साइकिल उनके पास थी। बैंक पास के साव जी भी आ गए कहने लगे एक महिने से राशन ले रहे थे अचानक पैसे लेकर भाग गए।
अरे भाई आप भी कहां रहते हैं? इसी दुनिया में रहिए। जब उन्हें मकान बेच कर जाना ही था तो फिर इस शहर और शहर के लोगों स ेअब क्या लेना देना। क्यों भला वो पैसे लौटाते? क्यों किसी से लिए उधार चुक्ता कर जाते। कौन उनसे पैसे लेने नए शहर जाएगा। कुछ दिन की ही तो बात है लोग बोल बोल कर थक जाएंगे। धीरे धीरे भूल जाएंगे। जैसे बसंतु वाली घटना अब किसे याद है। सब भूल ही तो गए। मान लिया कि अब वो पैसे नहीं मिलेंगे। यह भी संतोष कर लिया कि आकर दिखाए यहां। मगर जिसके पैसे लेकर बसंतु गया वो तो रो ही रहे थे। कईयों की गहरी कमाई लेकर चंपत हो गए थे बसंतु। मगर कहते हैं न कि समय इज द बेस्ट पेन हिलर सो सब कुछ ठीक हो जाएगा।
याद आता है कैसे इस मुहल्ले में सबों ने धीरे धीरे मकान- दुकान, बच्चे करिअर बनाए थे। स्कूटर से कार तक का सफर तय किया था दुलुकन बाबु ने। और पंडीजी के घर में कैसे पहली बार मजमा लगा था जब दिल्ली की बहुरिया आई थी। इन्हीं गलियों में खेल कर सभी के बच्चे जवान दाढ़ी मूछ वाले हुए थे। सर्दियों में रजाई दुकान से नहीं आती थी लोगों के घर से मांग कर आती थीं रात भर के लिए। दाल-सब्जी और चीनी की मित्रता थी घरों में। यह सब अब आंखों के आगे घूमनेे लगे हैं। हर कोई हर किसी के रिश्तेदार से भी परिचित था इस मुहल्ले में। सब कुछ सारे रिश्ते तार तार कर कैस कोई जा सकता है।

Monday, January 27, 2014

आदरणीय यमराज जी,

आदरणीय यमराज जी,
सादर चरण स्पर्श। सबसे पहले तो मांफी मांगता हूं कि मुझे जिस तरह से स्कूल में पत्र लिखना सिखाया गया था उसी तरह लिख रहा हूं। और कौन कौन से संबोधन लिखने चाहिए इसका इल्म नहीं है मुझे। मैं आपको पत्र इसलिए लिख रहा हूं कि मुझे आपसे कुछ बात करनी है। आप चैंके नहीं। मैं नचिकेता नहीं हूं कि तीन वरदानों में आपसे आपकी नगरी का रहस्य मांग बैठूं।
आगे बात यह है कि यमराज जी आप कई बार बिना बताए बिना किसी सूचना के आधमकते हैं ऐसे में बहुत अफरा तफरी मच जाती है। बहुत से काम अधूरे रह जाते हैं। कितना अच्छा हो कि आप आने से पहले थोड़ी सूचना बरसा सकें। इससे कम से कम इतना तो हम कर ही सकते हैं कि थोड़ी तैयारी कर लें। मगर यह कहना भी उचित न हो क्यांेकि आपके बारे में यही सुना है कि आप बिना बताए ही आ जाते हैं। कोई सूचना नहीं कोई खबर नहीं। बस आपके भेजे दूत आते हैं और लेकर चले जाते हैं।
आईटी का जमाना का है। लैपटाॅप, आईपैड, वाइ फाई कई साधन आ चुके हैं। आप चाहें तो वाट्स एप्प, विवर, जैसे चैट माध्यमों का इस्तेमाल कर सकते हैं। अब तो विवर पर काॅल का भी पैसा नहीं लगता। आईएसडी हो या एसटीडी कोई काॅल बड़े आराम से कर सकते हैं। काॅल न सही कम से कम एक एसएमएस ही टपका दें ताकि दे सकें कि आप आने वाले हैं।
बुरा न मानें प्रभू होता क्या है कि आप जब अचानक आते हैं तब बुरा लगता है। इसलिए बुरा लगता है क्योंकि आपके साथ जाने के बाद कितनों के लिए उधार बिना चुकता किए रह जाते हैं। कितनों से किया गया वायदा यूं ही धरा का धरा रह जाता है। जिनसे उधार लिए हैं उन्हें चुका कर न जाओं तो खामखा बुराई करते हैं। क्या पता मेरे जाने के बाद मेरे परिजन उसे लौटाएं या नहीं। बिना वजह आप पूछेंगे कि फलां फलां को उधार कर के आए हो जाओं वापस और लौटा कर आओ। इसलिए प्रभू पूर्व सूचना दें तो इस तरह के काम निपटान में आसानी होगी।
मान्यवर! टापकी व्यवस्था में हजारों लोग काम कर रहे होंगे। मैं चाहता हूं कि वहां भी निठल्ला न बैठूं सो अपना सीवी भेज रहा हूं। आपके सिस्टम में कुछ काम मिल जाए तो मरना सफल हो जाएगा। मैं लेख, कविता, कहानी और साक्षात्कार आदि लिखता हूं। आप चाहें तो जिन्हें कविता पसंद हो उन्हें कविताएं सुनाउं। जिन्हें बोर करना हो तो ऐसी भी रचनाएं मेरे पास हैं जैसे जैसे लंबे लेख। जिन्हें सुन कर ही प्रताडि़त किया जा सकता है। सर जी डक्यूमेंटशन भी करता हूं। पूरे साल का लेखा जोखा फोटू सहित तैयार कर दूंगा ताकि आपको ज्यादा मेहनत न करनी पड़े। आपका दस्तावेजीकरण का काम भी बखूबी कर सकता हूं। आप कहें तो पीपीटी भी बना दूंगा प्रभू। सीधे उसको प्रेजेंट कर सकते हैं। उसमें विजुअल भी डाल दूंगा ताकि देखने वाले को पूरा का पूरा विश्वास हो सके। यदि आपके पास प्रोजेक्टर की व्यवस्था नहीं है तो ज़रा भी संकोच न करें प्रभू मैं अपने साथ लेकर आ जाउंगा। ओह! भूल गया था कि आपके पास खाली हाथ ही जाना पड़ता है सो मजबूर हूं। यह व्यवस्था तो आपको खुद ही करनी पड़ेगी।
हां एक बात और कहना चाहता हूं कि मैं रिपोटिंग भी कर लेता हूं। यदि चाहें तो आपके नगर वासियों को लाइव व प्रिंट रिपोर्ट भी मुहैया करा सकता हूं। आप कहेंगे तो किसी बड़ी हस्ती का इंटरव्यू भी ले लूंगा। बहुत साल अखबारों में गुजारे हैं सो इसका भी अनुभव है।
आपकी विश्वास पात्र

Friday, January 24, 2014

फेल कर के दिखाओ
‘बच्चों में डर खत्म हो गया है। वो पास के गुजरते हैं और गुटका थूक कर चले जाते हैं। पढ़ने में उनका मन नहीं लगता। मैडम पास तो कर ही दोगो। फेल नहीं नहीं कर सकते। यह बात बच्चों और उनके पेरेंट्स दोनों को मालूम है। इसलिए बच्चों में पढ़ने की लालसा खत्म हो गई है। हमारे हाथ बंधे हैं। हम किसी को भी कक्षा में रोक नहीं सकते। हर किसी को चाहे उसे आता हो या नहीं हमें उसे दूसरी कक्षा में धकेलना ही पड़ता है।’
जिस डर और विचारों को लिखा गया यह लेखक की पंक्तियां नहीं हैं बल्कि ये विचार कई अध्यापकों के हैं। वो कहते हैं कि पेपर में कई बार हमें गाने लिखे मिलते हैं। कुछ बच्चों ने स्पष्ट लिखा कि फेल कर के दिखाओ। उन्हें मालूम है कि शिक्षक के बस में फेल करना नहीं है।
आरटीई की बुनियाद में यह भी है कि कक्षा 8 वीं तक किसी भी बच्चे को फेल नहीं कर सकते। सभी बच्चों को आठवीं तक मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा देना सरकार की जिम्मेदारी है। लेकिन विचार करने की बात है कि क्या यह शिक्षा है या साक्षरता। क्या शिक्षा डर सिखाती है या मुक्ति?
शिक्षा क्या मूल्य देती है या हमें पूर्वाग्रही बनाने में मदद करती है। विचार तो करना ही होगा यदि बच्चों में जीवन मूल्यों का क्षरण हो रहा है तो कहां और कौन इसके लिए जिम्मेदार है इसकी पहचान कर उसे दुरूस्त करना ही होगा।
अध्यापिकाओं एवं अध्यापकों को जेंडर सेंसेटाइजेशन, मूल्यपरक शिक्षा और आरटीई पर बातचीत करते हुए दिल्ली के सरकारी स्कूलों के टीचर्स के साथ




Monday, January 20, 2014

बाॅस की प्रकृति


कौशलेंद्र प्रपन्न
मैं ही क्या दुनिया के हज़ारों- हज़ार लोग अपने बाॅस की प्रकृति से न केवल प्रभावित होते हैं बल्कि त्रस्त भी होते हैं। कुछ के बाॅस जीवन में प्रेरक बन कर आते हैं तो कुछ की जिं़दगी में सुनामी बन कर। बाॅस राय, वर्मा, शर्मा, जुनेजा, तनेजा, तिवारी, कपूर और भी अन्य उपनाम के रूप में हो सकते हैं। तत्वत: बाॅस की प्रकृति में कोई ख़ास अंतर नहीं होता। क्योंकि स्वभावतः बाॅस अपने नीचे काम करने वाले को गोया इंसान ही नहीं मानते। यदि बाॅस रात के 1 बजे काॅल करे तो भी काम होना चाहिए। उनके घर के काम भी हंस हंस के जो करे वो सबसे ज्यादा करीब होता है। स्वभाविक भी है जो हर वक्त बाॅस के आस-पास टघरता है वो बाॅस को कैसे नहीं याद रहेगा। वैसे कहा जाता है कि घोड़े के पिछाड़ी और बाॅस के अगाड़ी कभी नहीं आना चाहिए, लेकिन आज की तारीख में कई ऐसे महारथी हैं जो बाॅस की कृपा से कहां से कहां पहुंच चुके हैं। कुछ करिअर में उछाल का आनंद ले रहे हैं जो कुछ जाॅब से भी हाथ धो चुके हैं। कई के बाॅस अपनी आॅख की किरकिरी को कहीं और भी टिकने नहीं देते।
बाॅस दरअसल नेता होता है। नेता माने नयति इति नेता। जो सदा सर्वदा आगे ले जाने वाला हो। यानी नेता व बाॅस वो होता है जो समाज को रास्ता दिखाए और आगे ले जाए। यदि नेता की दृष्टि स्पष्ट न हो या पूर्वग्रह का शिकार हो जाए तो उस कंपनी व संस्था के साथ ही वहां काम करने वाले अन्य कर्मचारियों के लिए लाभकरी नहीं माना जा सकता। मैनेजमेंट के छात्र व वेत्ता बेहतर बता सकते हैं कि एक बाॅस की प्रकृति यानी उसका स्वभाव किस तरह से न केवल बाॅस के लिए बल्कि संस्था के लिए भी हानिकारक साबित होता है। बतौर बाॅस की अपनी कुछ सनकें भी होती हैं। वो अपने ज्ञान, समझ, कौशल के आगे अपने अंदर काम करने वालों को ज़रा भी तवज्जो नहीं देता। बल्कि कई बार अपनी गलती को न वो स्वीकारता है और न वह नवज्ञान से खुद को ताज़ा करता है। क्योंकि ऐसा करने से उसका अहम उसे रोकता है। और इस तरह से ख़ुद को सही साबित करने के उपक्रम में अपने अंदर काम करने वाले को गलत साबित करने के तमाम हथकंड़े अपनाता है।
बाॅस की प्रकृति कैसी हो, एक बाॅस के अंदर किस किस तरह के गुण होने चाहिए आदि सवालों का जवाब तो मैनेजमेंट के जानकार दे सकते हैं, लेकिन एक आम धारणा की दृष्टि से देखें तो बाॅस की क्लालिटी कंपनी को बेहतर ढंग से चलाने की होनी चाहिए। प्रबंधन के तमाम गुर उसे आना चाहिए कब किसी की भावना को सहलाना है, कब किस के साथ सख्ती बरतनी है? किस के साथ कब कैसे बर्ताव करना है आदि ऐसी बुनियादी मांगें होती हैं जिनपर बाॅस को खरा उतरना चाहिए। लेकिन आज की तारीख में अधिकतर प्रोन्नति, उछाल किन गुणों के आधार पर होते हंै यह किसी से भी छुपा नहीं है। जब कोई बाॅस की नजरों में चढ़ जाता है या पसंद आ जाता है तब बाॅस जो कुछ भी करता है वही नियम बन जाते हैं। वही सही होता है।
हां समाज में देखा जाता है कि बाॅस कई बार आत्महत्या करने पर भी मजबूर कर देता है। व्यक्ति मानसिक रूप से इतना परेशान हो जाता है कि वह आत्महत्या तक सोचने लगता है। यह किसी भी नजर से न तो मानवीय है और न उचित ही। लेकिन आम जीवन में बाॅस ऐसे भी आते हैं कि आप न तो आॅफिस में चैन से काम कर सकते हैं और न घर में सुस्ता सकते हैं। नींद में भी बाॅस की बातें, ताने और चेहरे आपको सोन नहीं देते। एक बार बाॅस की नजर में आप नकारे हो गए तो लाख कोशिश कर लें वह आपको उसी चश्में देखता है। दरअसल बाॅस वह कुर्सी होती है जिसपर सबकी आशा भरी निगाह लगी होती है। वह चाहे सकारात्मक हो या नकारात्मक। कब बाॅस बदले की हम अपनी तरह से काम करें। अपनी फाइल आगे बढ़ाएं आदि उम्मींदें कितनों की पूरी होती हैं यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि आने वाला बाॅस किस पाले है।
सचपूछा जाए तो बाॅस की कुर्सी पर बैठना कोई आसान काम नहीं होता। पहले तो बाॅस की कुर्सी के लायक खुद को साबित करना पड़ता है और फिर सब को खुश रखने की चुनौती से भी सामना करना पड़ता है। सच तो यह भी है कि कुर्सी कभी भी सभी को खुश नहीं रख सकती। लेकिन इन्हीं चुनौतयों के बीच एक मकूल रास्ता भी निकलता है कि कैसे आप मानवीय रहते हुए अपनी बाॅसीय प्रकृति को जीते रहें। यानी कंपनी, आफिस काम भी चलता रहे और आप किसी की जिंदगी को नर्क बनाने से बचें। क्योंकि एक खराब बाॅस न केवल एक की जिंदगी को प्रभावित करता है कि बल्कि प्रकारांतर से उसके साथ परिवार, मित्र और समाज को भी खासे चपेट में लेता है। एक बार यदि बाॅस इन बिंदुओं पर सोचों तो शायद उनकी आंखें खुलें।

Friday, January 17, 2014

किताब का आधार नंबर


कौशलेंद्र प्रपन्न
हर किताब की अपनी अलग पहचान और छवि होती है। कोई कहानी, उपन्यास, आलोचना, निबंध, लघु कहानी, होती हैं तो कुछ महाकाव्य, खंड़ काव्य तो कुछ वृहद ग्रंथ। हर किताब अपनी निजी बुनावट की वजह से अलग ही दिखाई देती हैं। इन किताबों को जन्म देने वाला लेखक तय करता है कि कौन सी किताब की क्या रूपरेखा होगी और किस किताब की रचनात्मक गति क्या होगी। एक बार जब किताब का बीज किसी सृजक के मन में पड़ता है बस वहीं से किताब का जन्म होता है। किताब के गर्भाधान से लेकर उसके सोलहों संस्कार तक उसका जन्मदाता यानी लेखक जुड़ा होता है कि जैसे पिता अपनी संतान से जुड़ा होता है। हां यह कहना ज़रा मुश्किल है कि किताब का अंतिम संस्कार होता भी है या नहीं। जब जर्जर अवस्था में किताब पहुंच जाती है तब उसे लाइब्रेरी से तो विड आउट कर दिया जाता है। लेकिन वह पाठकों के मन से आउट नहीं हो पाती। कई किताबें बड़ी सौभाग्यशाली होती हैं जिनका पुनप्र्रकाशन भी होता है। इस बात से इंकार करना कठिन है कि किताबें भी मानव जीवन में ख़ास स्थान रखती हैं। किताबों  बगैर जीवन की कल्पना करना एक खाली कमरे से कम नहीं है। निर्मल वर्मा ने कभी कहा था कि वे शहर बड़े दुर्भागे हैं जिनके पास अतीत के खंड़हर नहीं हैं। उसी तरह कह सकते हैं कि जिस घर में किताबें नहीं हैं वे घर बड़े दुर्भागे होते हैं। जिस घर में किताबें होती हैं वहां एक शब्दों की दुनिया सांस लेती है। किताबों से हमारा वास्ता गोया कई सदियों का है। हर किताब की अपनी पर्सनालिटी होती है। कुछ किताबें अंतर्मुखी होती हैं और तो कुछ बहिर्मुखी।
एक बार लेखक जब किताबों का आकार, देह देता है उसी वक्त वह किताब गर्भवत् शिशु की तरह अपनी आयु भी लेकर आता है। एक लेखक किताब की विधा खुद तय करता है। बल्कि कहना चाहिए रचना की विधा कौन सी हो यह लेखक पर निर्भर करता है। वह गद्य,पद्य की किस विधा में किताब को जन्म देना चाहता है यह पूरी तरह से लेखक के विवेक, कौशल और गति पर निर्भर करता है। क्योंकि लेखक को ही आगे किताब को पूरी यष्टि प्रदान करनी है इसलिए लेखक से बेहतर कोई दूसरा यह तय नहीं कर सकता कि रचना किन पाठकों के लिए है। लेखक अपनी रचना का सृजक अवश्य होता है लेकिन उसे समाज में लाने वाला प्रकाशक होता है। ठीक उसी तरह जैसे बच्चा अस्पताल में जन्म लेता है। प्रकाशक किताब के नैन नक्श, आकार प्रकार, रूपसज्जा आदि करता है। एक मुकम्मल पहनावे के साथ यानी बुक जैकेट जिसे कवर पेज करते हैं, के बाद छापता है। याद करें कि यदि किताब भी एक पर्सनालिटी है तो उसकी भी कोई पहचान होनी चाहिए। जैसे हर इंसान को सरकारी पहचान के लिए पहचान पत्र, आधार नंबर, पासपोर्ट मिलता है व बनाना पड़ता है उसी तरह किताबें भी भीड़ में खो न जाएं इसलिए उन्हें भी प्रकाशक एक आधार नंबर यानी आइ एस बी एन नंबर प्रदान करता है। यह हर किताब को मिलना आवश्यक है।
लेखक अपनी ओर से कहानी, उपन्यास आदि में पात्रों, घटनाओं, चरित्र चित्रण आदि को तय कर देता है। तब किताब का जन्म हो जाता है। उसके बाद वह किताब पाठकों, आलोचकों के हाथ में आ जाती है। किताब कैसी है, उसकी भाषा, शैली, कथानक आदि की आलोचना, तुलना एवं समीक्षा का दौर शुरू होता है। दूसरे शब्दों मंे कहें तो बच्चा जन्म लेने के बाद मां की गोद से निकल कर जब समाज में आता है तब उसका मूल्यांकन समाज करता है। बच्चे के संस्कार, मूल्य, परवरिश आदि की जांच पड़ताल समाज के हिस्से होता है। साथ ही समाज का जिम्मा न केवल जांच-पड़ताल करना है, बल्कि किताब का सही मूल्यांकन हो इसकी भी जिम्मेदारी समाज की है। लेखक ने तो जो लिखना था वह उसने लिख दिया। अब यह उत्तरदायित्व समाज यानी किताब का समाज ‘पाठक, आलोचक सेे बनता है’, का बन जाता है कि किताब में बनाई गई दुनिया में क्या कमी रह गई। किस स्तर पर किताब कमजोर रह गई। लेखक से कहां चूक हो गई आदि कमजोर पहलुओं की ओर लेखक का ध्यान दिलाना आलोचक का मकसद होता है। इसके साथ ही दूसरे लेखकों को रास्ता दिखाना भी उद्देश्य होता है जो लेखन कर्म से जुड़े हैं। यदि कोई किताब लिख रहा है तो पूर्व के लेखकों की कमियों से कैसे बचा जाए इस ओर भी इंशारा करने का दायित्व आलोचक एवं पाठक का होता है। प्रतिक्रिया वह सूराख है जहां से पाठकों की बात लेखक तक पहुंचती है। पाठक जिस किताब को पढ़ते हुए बोर होने लगे तो समझना चाहिए कि कहीं न कहीं लेखक से कोताही बरती गई है। वरना किताब का जादू तो पाठक को अपनी ओर खींचने के लिए काफी होना चाहिए।
हर किताब की अपनी मैग्नेटिक शक्तियां होती है। मैग्नेटिक शक्तियां ही तो होती हैं जिसकी वजह से हजारों, लाखों पाठक अमुक किताब को पढ़ने के लिए मूल पाठ से लेकर अनूदित भाषा तक में किताब को तलाशते हैं। देवकी नंदन खत्री की किताब चंद्रकान्ता संतति को पढ़ने के लिए पाठकों ने हिन्दी सीखी। यह प्रेमचंद को पढ़ने के लिए गैरहिन्दी भाषा पाठको ने या हिन्दी सीखी या फिर अनुवाद का इंतजार किया। किताब की जादुई शक्तियां ही थीं कि उसे भाषायी चैहद्दी से बाहर भी पाठकों का एक बड़ वर्ग मिला। विश्व की कई क्लासिक साहित्य हैं जिनके अनुवाद कई भाषाओं में इसलिए हुए कि पाठकों की मांग समुद्र की सीमा को भी पार कर गए। हालिया किताब हैरी पाॅटर के साथ जुड़े पाठकों की घटना के साथ किताब की मैग्नेटिक ताकत का अंदाजा लगाया जा सकता है। यदि किताब में कंटेंट ताकतवर नहीं होगा तो वह हजारों लाखों की किताबों की भीड़ में खो जाएगी। आज दुनिया में रोजदिन हजारों लाखों किताबें जन्म लेती हैं और कहीं अंधेरे में खो जाती हैं। काफी हद तक लेखक पर निर्भर करता है कि उसकी रचना व किताब भीड़ में खो जाए या भीड़ में भी अपनी पहचान बनाए रखे।
जो लोग इस डर व आशंका से ग्रस्त हैं कि किताबों की मौत हो चुकी है। इंटरनेट के आ जाने से किताबें मर रही हैं, पाठक वर्ग सिमटते जा रहे हैं आदि सवाल सच पूछा जाए तो सही नहीं है। क्योंकि यदि ऐसा ही होता तो हर साल प्रकाशक किताबें न छापता और न लेखक लिखता। इसके बरक्स किताबें लिखी भी जा रही हैं और छप भी रही हैं। यह अलग विमर्श का मुद ्द हो सकता है कि छपने वाली तमाम किताबें अपनी पहचान बनाने सफल हो पाती हैं या नहीं। क्या वे अपनी पूरी उम्र जी पाती हैं या अकाल मृत्यु को प्राप्त होती हैं।
विश्व पुस्तक मेला का समय पास आ रहा है। हर प्रकाशक लेखक चाहता है कि उसकी किताब इस विश्व पुस्तक मेले में आ जाए। हर स्तर पर कोशिशें तेज हो गई हैं। प्रकाशक रात दिन एक कर बेहतर कलेवर में किताबें छापने में लगा है। किताब के कलेवर, साज सज्जा भी उतना ही जरूरी है जितना की कंटेट। इसलिए कवर पेज डिजाइनर की भी भूमिका से मंुह नहीं मोड़ सकते। एक किताब की सफलता के पीछे कई लोगों का हाथ होता है। यही पर्याप्त नहीं है कि लेखक ने अच्छी व बुरा किताब लिखी। बल्कि उसे प्रकाशक, डिजाइनर, वितरक दुकानदार ने क्या अपनी पूरी जिम्मेदारी का निर्वहन किया। क्योंकि यह पूरी कड़ी है। कहीं भी कोई कड़ी कमजोर रह गई तो किताब लिखे जाने और छपे जाने के बाद भी अंधेरे की जिंदगी बसर करने पर मजबूर हो सकती है।

Thursday, January 16, 2014

आलोचना उपेक्षिता


आलोचनाएं यदि सार्थक हों तो साहितय व रचना को एक व्यापक विस्तार मिलता है। बल्कि न केवल रचना सर्वजनीन होती है अपितु लेखक को भी दृष्टि मिलती है कि वो आगे इन बातों को ध्यान अपनी रचना रखे। एक पाठक भी रचना का सही समीक्षक होता है किन्तु उसे किन शब्दों और किन कमियों की वजह से रचना कमजोर रह गई उस ओर इशारे करने का व्याकरण और भाषा की कमी होती है। यदि पाठक के पास उसकी बात कहने की भाषा हो तो आलोचक की कमी न महसूस हो।
साहित्य, कला, रंगकर्म, फिल्म आदि ऐसी विधाएं हैं जहां समीक्षा, आलोचना, प्रतिक्रियाएं खास महत्व रखती हैं। यदि आलोचना गंभीरता से हो तो रचना में निखार आने की पूरी संभावना होती है। साहतय मे माना जाता है कि आलोचनाएं मुंह देख कर की जाती हैं। मधुर भी रहे और छप भी जाए। बेशक उस आलोचना से न लेखक को कुछ व्यापता है और न पाठक को। कुछ बड़े आलोचकों व कहें लेखकों का मानना है कि हिन्दी में तो आलोचना नाम की कोई चीज है ही नहीं। यदि आलोचना के नाम पर कुछ हो भी रहा है तो वह महज समीक्षाएं हो रही हैं। मेरा तो मानना है कि वह समीक्षाएं भी नहीं हैं वे महज पुस्तक परिचय तक ही सीमित हैं। फलां किताब में इतने पाठ हैं। इस पाठ में यह है। इतने पात्र हैं। उन पात्रों की भाषा यह है आदि। समीक्षा थोड़ी आगे बढ़ी तो किताब में लेखक व रचनाकार ने भाषा के साथ न्याय किया है। शैली रोचक है। कथानक अच्छी है या किसी और किताब की छाया प्रतीत होती है। इससे आगे निकल कर समीक्षाएं कोई मुकम्मल रोशनी आने वाले लेखकों को नहीं देतीं।
हर साल अंतिम पखवाड़े में अखबारों में पूरे साल की महत्वपूर्ण किताबों की सूची और विन्डो शाॅपिंग सी समीक्षा करने का चलन है। जिसमें किसी भी एक दो किताब पर चार पांच लाइन लिख कर आगे बढ़ जाने की परंपरा है। उस समीक्षा का कोई खास मायने नहीं रह जाता। इस तरह की समीक्षाओं की विश्वसनीयता भी कोई ज्यादा नहीं होतीं क्योंकि समीक्षक की सूची में कमोबेश वही किताब स्थान ले पाती हैं जो या तो बहुत चर्चित रहीं या फिर जाने माने नाम रहे। बाकी पत्रिकाओं, अखबारों में तो समीक्षा के काॅलम में भी किताबें बाहर कर दी जाती हैं। पुस्तकें मिलीं काॅलम में कहीं पड़ी किताबें जरूर यह गुहार लगाती हैं कि हम पर भी नजर इनायत हो सरकार। मगर काॅलम की सीमा और वैचारिक झुकाव के आगे वे किताबें महज प्रकाशन स्थान, वर्ष, पेज, मूल्य की सूचनाओं से आगे नहीं जा पातीं।
साहित्य की पत्रिका हो या गैर साहित्यिक दोनों ही स्थानों पर पुस्तक की आलोचना की जगहें सिमटती गई हैं। आलोचना के स्थान पर समीक्षाएं व कह लें परिचय ही छपती हैं। एक बात और भी है कि लेखक ही जब समीक्षक हो जाता है तब यह काम ज़रा गंभीरता की मांग करता है। एक लेखक के जौर पर उसकी अपनी पूर्वग्रहें भी होंगी। जिससे निजात पाना थोड़ा कठिन होता है। आलोचना कर्म माना गया है कि लेखने से कहीं ज्यादा कठिन और श्रमसाध्य है। उसमें रचनाओं को पढ़ने की समझ, भाषा, कहने की कला और रचनाओं के बीच में छुपी कमियों को पकड़ने का कौशल होना चाहिए तभी एक लेखक आलोचना कर्म में सफल हो सकता है।
अव्वल तो आज अपनी किताब के नाम पर कुछ गिने चुने लेखकों की पढ़ने की आदत सी बन गई है। जब हम दूसरे लेखकों को पढ़ते हैं तब पता चलता है कि कौन क्या लिख रहा है केसा लिख रहा है। लेकिन लेखकों के मध्य भी पढ़ने के अपने पूर्वग्रह देखे जा सकते हैं। यह पूर्वग्रह न केवल पढ़ने के स्तर पर हैं बल्कि रचना की समीक्षाएं और राय बनाने तक दिखाई देती हैं। यदि किसी किताब की खरी खरी आलोचना की जाए तो संभव है संपादक उसे या तो छापेगा ही नहीं या फिर उसके धार को कुंद कर छापेगा। संपादन के नाम पर रचना की हत्या कोई आम बात नहीं है। यह अकसर देखा जाता है कि रचनाओं को संपादन की मार भी खूब सहनी पड़ती हैं। उस संपादन के आगे रचना विवश और असहाय हो जाती है। दूसरे शब्दों में कहें तो रचनाओं के साथ कई स्तरों पर भेदभाव होता है। लेखन से लेकर संपादन और समीक्षा तक। रचनाएं हाशिए पर धकेल दी जाती हैं। हाशिए पर खड़ी रचनाएं अपने साथ न्याय की आवाज किस अदालत में उठाए। कहां उसकी सुनी जाएगी। यह भी गंभीर मुद्दा है। क्योंकि रचनाकार मानता है कि एक बार रचना का जन्म हो चुका व छप चुकी उसके बाद उससे लेखक की दूरी स्वभाविक हो जाती है। वहीं संपादक रचना को अपनी संपत्ति माने तो उसके साथ समुचित बर्ताव करे लेकिन वह तो फलां लेखक की है। फलां धड़े की है बांटकर रचना को विलगा देता है।
कविता, कहानी, उपन्यास, व्यंग्य आदि रचनाओं की समीक्षाएं अमुमन अखबारों एवं पत्रिकाओं में देखने-पढ़ने को मिल जाती हैं लेकिन बाल साहित्य, बाल लेखन यानी बच्चों के लिए लिखी गई रचनाओं को तो आलोचक गोया रचना ही नहीं मानते। मानो यह भी कोई साहित्य है इस ओर ध्यान देना जैसे बचकाना कर्म है। आलोचना और समीक्षा के आंगन में वही पुस्तकें व लेखक स्थान ले पाते हैं जो किसी न किसी तरह से पाठक का ध्यान खींच पाने में सुल हुए हैं। ऐसी बहुत सी किताबें हर साल छपती हैं जो किसी की निगाह में भी नहीं आ पातीं और गोदाम में या फिर लेखक के स्वजनांे के घर में शोभा बढ़ाती हैं।
आलोचना उपेक्षिता रचना और रचनाकार की मनःस्थिति को भी समझने की आवश्यकता है। एक रचनाकार अपने आप को ईश्वर मान लेता है। वही भाग्यविधाता है अपनी रचनायी दुनिया का। यह सही है कि वही सृष्टिकर्ता है अपनी रचना संसार कां वही तय करता है अपने पात्रों की नियति और परिणति। वही उत्थान और पतन भी लिख डालता है जिसके आगे रचना नतमस्तक होती है। लेकिन इससे आगे जाकर सोचने की बात यह है कि क्या लेखक लिखने से पूर्व इस बिन्दु पर भी ठहर कर सोचता है कि उसकी रचना की मांग है भी या नहीं? उसकी रचना रचना के उद्देश्य को पूरी करती है या नहीं? क्या पाठक वर्ग उससे कुछ जीवन मूल्य हासिल कर पाएगा या नहीं? आदि सवाल कटू तो हैं पर जरूरी भी हैं। कई बार लेखक मान कर चलता है कि उसका कर्म महज लेखन तक सीमित है। चाहे आलोचक पढ़े या न पढ़ वह उसकी जिम्मेदारी नहीं है। जबकि होना यह चाहिए कि लेखक को इस जोखिम को भी अपने कंधे पर लेना चाहिए।
व्यंग्य की ही बात करें तो परसाई, शरद जोशी, अंजनी चैहान, ज्ञान चतुर्वेदी, प्रेमजनमेजय, लालितय ललित, सुभाष चंदर, हरीश नवल आदि ने क्या लिखा और वो व्यंग्य को कितना सवंर्द्धित करते हैं इसकी भी बिना वैचारिक पूर्वग्रह के समीक्षा की मांग करती है। जो भी व्यंग्य लिख रहा है व अन्य रचनाओं में गति रखता है उसके पास भाषा है इससे तो इंकार नहीं कर सकते। हां विचार करने की बात यह है कि क्या वह लेखक अपनी रचना के साथ पूरा न्याय कर रहा है। क्या उसकी लेखनी रचना आज की चुनौतियों का सामना करने में समर्थ है? क्योंकि महज यह कह देने भर से बात नहीं बनती कि फलां के पास भाषा है, शैली है और कहने को बहुत कुछ है। कहना यह भी पडे़गा कि क्या जो वह कह रहा है वह लेखन की परंपरा को अग्रसारित करने योग्य है भी या नहीं।
समकालीन आलोचकों व समीक्षकों के इशारे भी समझने की आवश्यकता है। समीक्षक किस मानसिक बुनावट के तहत कह रहा है उसे भी समझना होगा। क्या वह रचना के हित में है? क्या वह सिर्फ कलम चलाने और छपने के लिए समीक्षा कर रहा है या उसकी समीक्षा के पीछे उद्देश्य रचना की जांच पड़ताल करना है। वैयक्तिक रूचियां और रूझान भी कई बार रचना को हाशिए पर खड़ी कर देती हैं। इसलिए आलोचना वैसी की जाए जिससे कोई सार्थक दृष्टि न केवल लेखक को मिले बल्कि पाठक को भी पाठ को समझने में मददगार साबित हो। इसलिए ग्रंथों को समझने के लिए भाष्य लिखे जाते हैं, टिकाएं लिखी जाती हैं। लेकिन एक आम किताब को समझने के लिए भाष्य न सही समुचित औजार तो आलोचक दे ही सकता है जिससे आप लेखक की रचना को बेहतर समझ सकें।
कौशलेंद्र प्रपन्न

Wednesday, January 15, 2014

हम न मरब मरीहें संसारा


हम में से कितने ऐसे हैं जो सोचते हैं कि वो नहीं मरेंगे। तकरीबन सब यही सोचतते हैं कि हमें तो मरना ही है। आज या कि कल। मरना तो चींटी भी नहीं चाहती। संसार का कोई भी प्राणी भला क्यों मरना चाहेगा यहां कि सुख सुविधा और चाक चिक्य को छोड़ कर अज्ञात स्थान में क्यों जाना चाहेगा। फिर ये कबीर को क्या हो गया? उन्होंने ऐसी बात क्यों लिखी कि हम न मरब। मरीहैं संसार। कुछ तो दर्शन विमर्श रहा होगा कबीर के अंदरूनी जगत में।
हां पंच तत्व तो पंच तत्वों मे मिल जाएंगे। भौतिक मौत तो हो जाएगी। शरीर तो खत्म हो जाएगा। लेकिन जनाब जिससे प्रेम किया। वो तो प्रेम बरकरार रहेगा। वो तो आपके लिए नम होगी या होगी। ऐसे में आप लोगों के दिलो दिमाग में बसे ही रहेंगे। किसी से उधार लिया, किसी को जीवन भर खूब कोसा, गालियां दीं। तरक्की के लिए किसी को धकेला। भाई का हक हडप लिया जो जीवन भर किया वह तो आपके जाने बाद भी बना रहेगा। कम से कम मरनी पर न बोलें लोग लेकिन बाद में तो बोलेंगे ही। स्याला फलां फलां को बहुत सताया।
अच्छी व बुरी दोनों ही स्मृतिया ंहम अपने पीछे छोड़ जाते हैं। जो नहीं जाता साथ वह आपका जीवन भर का रुपया पैसा नहीं जाता। जो साथ जाता है वह बस आप ही होते हैं। आपके साथ न सहोदर, सहोदरी जाती है न पिता-माता, पत्नी, प्रेमिका कोई भी तो नहीं जाता। जाता है निपट अकेला लंगड़ा सुपना।
जीवन के विस्तार और लंबी सड़क पर हमें तय करना होता है कि हमें कहां तक जाना है। जाने क रास्ते भी खुद ही तय करने होते हैं। अपने लिए मंजिल भी हमें ही चुनना होता है। यह अलग बात है कि कभी कभी मंजिल आपको चुनती है। लेकिन यह तो तय करना ही होगा कि हमारी अपनी सीमाएं क्या हैं और हम कहां तक क्या कर सकते हैं। क्योंकि मरने के बाद कोई नहीं पूछने वाला कि आपने फलां काम अधूरा क्यों छोड़ दिया। वैसे कहने वाले कहते हैं कम से कम बेटी का ब्याह तो कर जाता। बेचारी पर डाल कर चला गया। तो सुनना तो पड़ेगा ही। कबीर ने गलत नहीं कहा मरीहैं संसारा। हमारे लए संसार मरेगा। यानी संसार को जो आपने परेशान किया उसके लिए लोग आपको कोसेंगे। जिसके लिए आप मरे वो आपके लिए मरेगा।

Tuesday, January 14, 2014

टोल के बाद की सड़क


कौशलेंद्र प्रपन्न
जी यदि आप दिल्ली छोड़कर हरियाणा, यूपी या उत्तरा खंड़ की ओर निकलते हैं तब एक अलग दुनिया से वास्ता पड़ता है। नोएडा से आगरा एक्सप्रेस वे पर दौड़ना जितना मजा आता है वह मजा किर किरा तब होता जाता है जब मथुरा, वृंदावन, आगरा की देसी सड़कों पर उतरते हैं। वही मंजर हरियाणा के बहादुरगढ़ छोड़ते झझ्झर की ओर निकलते हैं तब भी कमाल की सड़क मिलती है। लेकिन जैसे ही प्रतापगढ़ की ओर मुड़ते हैं वैसे ही सड़क का सौंदर्य जाता रहता है। चलिए गाजियाबाद की ओर से हरिद्वार की ओर ले चलते हैं। राज नगर एक्सटेंशन तक रोड़ वाकई अच्छी है। जैसे ही मोदी नगर और मुरादनगर की ओर दौड़ते हैं तब सड़क का समाज शास्त्र का दर्शन होता है। मुजफ्फरनगर से रूड़की की ओर निकलते हैं तब टोल रोड़ पर सरपट दौड़ते हुए कुछ ही घंटों में रूड़की पहुंच जाते हैं। लेकिन रास्ते में जैसे ही टोल रोड़ खत्म होता है वैसे ही गांव की या कहें कस्बाई सड़कों से रू ब रू होते हैं।
तेज रफ्तार के लिए हम ज्यादा पैसे देते हैं। तब जाकर वैसी सड़कें मुहैया होती हैं। वहीं एक सवाल यह भी उठता है कि क्या हम आम सड़कों के लिए पैसे नहीं देते? क्या हम सालाना रोड़ टैक्स नहीं भरते? यदि भरते हैं सरकार की जेब तो फिर टोल वाली रोड़ जैसी आम सड़कें आम जनता को क्यों नहीं मिलतीं। फ्लाईओवर, टोल रोड़ और सबवे की ज्यूं पूरे देश में बाढ़ सी आ गई है। जिस भी शहर को देखों विकास की दौड़ में अपनी पहचान एवं सौंदर्य की कीमत चुका रहे हैं। मुजफ्फरनगर से जैसे ही रूड़की की ओर बढ़ते हैं वैसे की प्रकृति के की जा रही छेड़छाड़ के नजारे दिखाई देंगे। सड़क के दोनों ओर हजारों पेड़ काटे जा रहे हैं। काट काट कर बुग्गी, टैक्टर आदि में भरे जा रहे हैं। पूछने पर पता चला रोड़ चैड़ी की जा रही है। दरअसल पैसे वसूलने के बहाने निकाले जा रहे हैं। टोल का बिस्तार होना है। हम खुश होंगे कि कम समय में हरिद्वार आदि शहरों में पहुंच सकते हैं। सवाल सामने यही है कि इसके लिए प्राइवेट कंपनियों को आम सड़कें देने का क्या तुक है। क्या सरकार अपने आप को इस काम के लिए असमर्थ मान चुकी है। शायद इसी का नाम है पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशीप पीपीपी। आज यह माडल तकरीबन हर सार्वजनिक क्षेत्रों में देखा जा सकता है। वह चाहे शिक्षा, स्वास्थ्य, जन सेवाएं ही क्यों हों।
सड़क पर चलने और सुरक्षित चलने का अधिकार हर नागरिक को है। अपनी मंजिल तक सुरक्षित और स्वस्थ्य पहुंचे इसकी जिम्मेदारी हर राज्य सरकार की भी उतनी ही है जितनी केंद्र सरकार की। मगर आज पीपीपी माडल पर हर क्षेत्र में प्रवेश कर रही हैं वह एकबारगी गलत नहीं तो पूरी तरह से उपयुक्त भी नहीं हैं। जिन सड़कों को बनाने व टोल रोड़ बनाने की जिम्मेदारी दी गई क्या उनकी क्रेडिबिलिटी भी परखी गई हैं? क्या वे जिस तरह की सड़कें भारत में बना रहे हैं वह भारतीय गाडि़यों के लिए उपयुक्त हैं आदि ऐसी वास्वकिताएं जिन से मंुह नहीं मोड़ सकते।
रूड़की के बाद जैसे ही हरिद्वार की ओर मुड़ते हैं वैसे ही बादराबाद के बाद सड़के के दोनों तरफ विकास के चिह्न दिखाई देते हैं और दिखाई देने लगता है शहर के सौंदर्यबोध का कत्ल जारी है। गंगा नहर के दोनों ओर लंबे और उंचे यूकलिप्टस के पेड़ सालों सालों से खड़े थे। जो शहर और नहर दोनों को एक बेहतरीन रूप देते थे। लेकिन गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय से लेकर श्रद्धानंद द्वार और प्रेमनगर आश्रम होते हुए डैम तक सारे पेड़ काटे जा चुके हैं। देखने में एक बारगी बियाबान, पेड़ विहीन सड़कों को जन्म दिया जा रहा है।

Monday, January 13, 2014

जेंडर विमर्श और मूल्यपरक शिक्षा पर संवाद


कक्षा में साठ के आस-पास शिक्षक और शिक्षिकाएं थीं। इस शिक्षकों और शिक्षिकाओं के बीच जेंडर सेंसेटाइजेशन पर संवाद करना था। जिन मूल बहानों से मई में रू ब रू हुआ था वही बहाने यहां भी खडत्रे हुए। मसलन बहुत सर्दी है। ठिठुर रहे हैं। सर क्या पढ़ाओंगे। छोड़ो भी क्या पढ़ाओंगे। जेंडर वेडर बस यूं ही है। आप भी मजे करो हमें भी छोड़े धूप सेकने दो। मई में गर्मी का बहाना था। दिसम्बर में सर्दी आ खड़ी हुई थी। मगर संवाद तो करना ही था। लेकिन कक्षा में उपस्थित शिक्षक/शिक्षिकाओं को संवाद के लिए उकसाना एक बड़ी चुनौती थी।
संवाद के लिए उन्हें कुरेदना पड़ा। आपमें से कितने ऐसे हैं जो मानते हैं कि पत्नियां कोई भी निर्णय लेने में स्वतंत्र होती हैं। पति की उनके निर्णय में कितनी भूमिका होती है। अपने पति को अपने निर्णय प्रक्रिया में कितना स्थान देती हैं। बस क्या था कई हाथ खड़े ही गए। नाम रहने देते हैं। उनकी बातें यहां रखते हैं। ‘ मैं तो निर्णय लेने में उनका तब मदद लेती हूं जब निर्णय को टालता होता है।’ ‘हमें निर्णय लेने में अपनी भूमिका व जिम्मेदारी को छुपाना होता है तब हम उन पर डाल देते हैं।’
‘निर्णय तो उनका ही होता है। हम तो बस उनके निर्णय को फाॅलो करते हैं।’ ‘ सर आप भी जानते हो। एक ही छत के नीचे रहना है। कौन चिक चिक सहना चाहेगा सो जो निर्णय पति लेते हैं हम उसे स्वीकार लेते हैं।’
इसी तरह की बातें कक्षा में उभर कर आईं। जब मैंने कहा महिलाएं भी सदियों से गुलाम रही हैं। उन्हें इस गुलामी से मुक्ति के लिए अपनी आवाज़ बुलंद करनी पड़ेगी। पाॅलो फ्रेरा की पंक्ति रखीं ‘ चुप्पी की संस्कृति ही गुलामी को अग्रसारित करती है’ यदि गुलामी को तोड़ना है तो चुप्पी तोड़नी पड़ेगी। पाॅलो फ्रेरा ने उत्पीडि़तों का शिक्षा शास्त्र पुस्तक लिखा उसे पढ़ कर जिस तरह की चेतना जागती है वही अपनी मुक्ति की राह बना पाते हैं। साथ ही उन्हें जाॅन स्टुआॅर्ट मिल की पुस्तक स्त्री और पराधीनता को साइट किया। कुछ स्त्रियों की आंखें विस्फारित हुईं। मगर वहीं शिक्षकों के तेवर बदल चूके थे। ये सब बेकार की बातें हैं। पुरूष प्रधान समाज है। लुगाइयां घर में ही अच्छी लगती हैं। इसी तरह के तर्क कक्षा में तैर रहे थे।
जेंड़र संवेदनशीलता पर लंबी बातचीत हुई मगर शिक्षकों की सोच गोया अभी भी 19 वीं सदी में डोल रही थीं। कक्षा में कैसे इस तरह के विमर्श को वे लोग हैंडल करते होंगे इसका अनुमान लगाया जा सकता है। दरअसल वो नई सोच और शिक्षा के नए विमर्श को अपने दिमाग में उतरने की इज़ाजत ही नहीं देना चाहते थे। बहरहाल यदि शिक्षिकाओं में इसके प्रति थोड़ी भी चेतना जागती है तो उम्मींद की किरण बनी रहेगी।
जेंडर विमर्श और मूल्यपरक शिक्षा पर संवाद
कक्षा में साठ के आस-पास शिक्षक और शिक्षिकाएं थीं। इस शिक्षकों और शिक्षिकाओं के बीच जेंडर सेंसेटाइजेशन पर संवाद करना था। जिन मूल बहानों से मई में रू ब रू हुआ था वही बहाने यहां भी खडत्रे हुए। मसलन बहुत सर्दी है। ठिठुर रहे हैं। सर क्या पढ़ाओंगे। छोड़ो भी क्या पढ़ाओंगे। जेंडर वेडर बस यूं ही है। आप भी मजे करो हमें भी छोड़े धूप सेकने दो। मई में गर्मी का बहाना था। दिसम्बर में सर्दी आ खड़ी हुई थी। मगर संवाद तो करना ही था। लेकिन कक्षा में उपस्थित शिक्षक/शिक्षिकाओं को संवाद के लिए उकसाना एक बड़ी चुनौती थी।
संवाद के लिए उन्हें कुरेदना पड़ा। आपमें से कितने ऐसे हैं जो मानते हैं कि पत्नियां कोई भी निर्णय लेने में स्वतंत्र होती हैं। पति की उनके निर्णय में कितनी भूमिका होती है। अपने पति को अपने निर्णय प्रक्रिया में कितना स्थान देती हैं। बस क्या था कई हाथ खड़े ही गए। नाम रहने देते हैं। उनकी बातें यहां रखते हैं। ‘ मैं तो निर्णय लेने में उनका तब मदद लेती हूं जब निर्णय को टालता होता है।’ ‘हमें निर्णय लेने में अपनी भूमिका व जिम्मेदारी को छुपाना होता है तब हम उन पर डाल देते हैं।’
‘निर्णय तो उनका ही होता है। हम तो बस उनके निर्णय को फाॅलो करते हैं।’ ‘ सर आप भी जानते हो। एक ही छत के नीचे रहना है। कौन चिक चिक सहना चाहेगा सो जो निर्णय पति लेते हैं हम उसे स्वीकार लेते हैं।’
इसी तरह की बातें कक्षा में उभर कर आईं। जब मैंने कहा महिलाएं भी सदियों से गुलाम रही हैं। उन्हें इस गुलामी से मुक्ति के लिए अपनी आवाज़ बुलंद करनी पड़ेगी। पाॅलो फ्रेरा की पंक्ति रखीं ‘ चुप्पी की संस्कृति ही गुलामी को अग्रसारित करती है’ यदि गुलामी को तोड़ना है तो चुप्पी तोड़नी पड़ेगी। पाॅलो फ्रेरा ने उत्पीडि़तों का शिक्षा शास्त्र पुस्तक लिखा उसे पढ़ कर जिस तरह की चेतना जागती है वही अपनी मुक्ति की राह बना पाते हैं। साथ ही उन्हें जाॅन स्टुआॅर्ट मिल की पुस्तक स्त्री और पराधीनता को साइट किया। कुछ स्त्रियों की आंखें विस्फारित हुईं। मगर वहीं शिक्षकों के तेवर बदल चूके थे। ये सब बेकार की बातें हैं। पुरूष प्रधान समाज है। लुगाइयां घर में ही अच्छी लगती हैं। इसी तरह के तर्क कक्षा में तैर रहे थे।
जेंड़र संवेदनशीलता पर लंबी बातचीत हुई मगर शिक्षकों की सोच गोया अभी भी 19 वीं सदी में डोल रही थीं। कक्षा में कैसे इस तरह के विमर्श को वे लोग हैंडल करते होंगे इसका अनुमान लगाया जा सकता है। दरअसल वो नई सोच और शिक्षा के नए विमर्श को अपने दिमाग में उतरने की इज़ाजत ही नहीं देना चाहते थे। बहरहाल यदि शिक्षिकाओं में इसके प्रति थोड़ी भी चेतना जागती है तो उम्मींद की किरण बनी रहेगी।

Tuesday, January 7, 2014

हिन्दी को बचाएं ही क्यों


विश्व हिन्दी साहित्य पुरस्कार सम्मामन समारोह में यूं तो कई बातें अमह रहीं जिन्हें स्वीकारना और अपनाना पड़ेंगा। पहली बात तो यही कि कोई अल्पावधि में भी कैसे अपनी पूरी गति, मति बनाए रखते हुए वर्तमान में अपनी जगह बना सकता है। दूसरी पुरस्कारों में ताज़ातरीन व्यक्तित्वों को तरजीह देना मसलन स्व दीनानाथ मिश्र के नाम पर पुरस्कार दिया जाना भी शामिल है, इस वर्ष सुशील सिद्धांत को यह सम्मान मिला। तीसरी बात कि व्यक्तिगत आग्रह और अनुरोध पर कितने लोग आपके साथ खड़े हो जाते हैं, यह आशीष कंधवे से सीखी जा सकती है जो इस विश्व हिन्दी साहित्य परिषद् के जन्मदाता है। और मुख्य बात यह भी कि राहुल देव जैसे धाकड़ पत्रकार की फटकार कार्यक्रम में उपस्थित तमाम लेखकों ने न केवल सुना बल्कि उन्हें उनकी फटकार के लिए साधुवाद भी दिया।
कार्यक्रम में डायस पर विराजमान बीएल गौड, हीरामन, महेश दर्पण, राहुल देव, मृदुला सिन्हा, हरीश नवल एवं संचालक हरीश अरोड़ा ने जिस बेहतरीन ढंग से पूरे कार्यक्रम में संचालित किया वह वाकई काबिले तारीफ कह सकते हैं।
महेश दर्पण, हीरामन, राहुल देव और मृदुला जी ने जिस अंदाज़ और ठसक के साथ अपनी बात रखी उसे सुनने के लिए हिन्दी साहित्यकारों को जिगरा चाहिए। हिन्दी साहित्य के इतिहास से लेकर वर्तमान और भविष्य की ओर ले जाने वाले वक्तव्यों पर नजर डालें तो एक बारगी या तो अतीत गौरव के बोझ से दब जाएंगे या फिर भविष्य की चुनौतियों एवं हिन्दी की बदहाली को लेकर दुश्चिंता में डूब जाएंगे।
हीरामन जी को कोट करने के मोह से रोक नहीं पा रहा हूं। सो लीजिए, मैं भारत से गांधी और हिन्दी मांगता हूं। क्योंकि यह हमारी भूमि रही है। हमने यहीं से हिन्दी को जाना, माना और पहचाना। यदि आपके यहां हिन्दी नहीं रहेगी तो हमारे यहां से क्या उम्मींद कर सकते हैं।
राहुल देव ने कटू किन्तु हकीकत बयां कर के लोगों को झकझोर दिया। यह झकझोरना अकसर गैर हिन्दी वाले जब करते हैं तब हमारी तंद्रा टूटती है। हमारा हिन्दीपन जागता है और हम कहते हैं आपने हिन्दी के लिए किया ही क्या है? आपको हिन्दी के बारे में जानकारी ही कितनी है आदि सवालों के ढाल से खुद को बचाने की कोशिश करते हैं। सचपूछा जाए तो हिन्दी के बचाने की चिंता किसे है, कौन अपनी रीढ़ दधीच बनाना चाहता है। यह भी विचार का विषय है। क्या महज पुरस्कारों के वितरण से हिन्दी की रक्षा की जा सकती है या कि कोई और तरीका इज़ाद करना होगा।
क्या वास्तव में हिन्दी मर रही है या उसे संरक्षित करने का समय आ गया है? यह कौन से लोग हैं जो हिन्दी की मौत पर रोटी सेक रहे हैं उनकी भी पहचान जरूरी है। हरीश नवल ने जो बात कही कि हर शब्दों को हिन्दी मंे जो ऐत्तर हिन्दी के हैं उन्हें कबूल करने में परहेज क्यों तो हमें विचार करना होगा कि क्या वास्तव में हिन्दी को चलायमान रखने के लिए हमें यह भी जोखिम उठाना होगा।
गोपालदास नेपाली सम्मान से सम्मानित डाॅ लालित्य ललित, सुशील सिद्धांत या कि अन्य सम्मानित लेखकों से हिन्दी समाज और ज्यादा अपेक्षाएं नहीं की जानी चाहिए। की जानी चाहिए क्योंकि उन्हें यह सम्मान इसलिए नहीं मिला कि वो महज लेखक हैं बल्कि इसलिए भी मिला कि वो हिन्दी की चिंता भी करते हैं। लालित्य ललित कविता, व्यंग्य, आलेख से लेकर वाचन परंपरा के भी वाहक हैं उनसे तो सामाजिक को और भी उम्मींद बंधती हैं।

Tuesday, December 31, 2013

संवाद के ललित पुल


मेरे अत्यंत प्रिय लेखक कम बड़े भाई हैं ललित जी, रोज दिन नई कविताओं के सिरजनहार। यह एक चेहरा है उनका। दूसरा चेहरा क्या जानना चाहेंगे आप?
तो दिखाता हूं- वह महज कवि नहीं बल्कि आज के हनुमान भी हैं। हनुमान माफ कीजिएगा मिथ का सहारा ले रहा हूं किन्तु संभव है नारद जी की भी कभी याद आए जाए उन्हें देख कर। नारद हां जिन्हें पत्रकारिता का पहले पत्रकार के नाम से भी  जाना जाता है। ललित न केवल बिछड़े  हुए के बीच संवाद के पुल बनते हैं बल्कि साक्षात भी जा मिलते हैं।
ऐसे ही वल्लभ डोभाल हों, शेरजंग गर्ग हों, गोविंद मिश्र हों, ज्ञान चतुर्वेदी हों या अन्य कथाकार, कवि, हर विधा के कलमकार के साथ सीधी बातचीत और सौहार्दपूर्ण रिश्ती की डोर को मजबूत करने में माहिर इस नारद को और भी शक्ति दे प्रभू ताकि हमारे बीच पुराने, वृद्ध कलमकारों की बातें पढ़ने को मिलें।
नए साल पर और और उर्जा और शक्ति, मन को मनबूती दे आगे बढ़ें कि जैसे बढ़ती की हवा। कि जैसे बढ़ते हैं सृजनशील पग।

कैसे कह दूं


हज़ारों मासूमों को बेघर किया,
आंखें से शर्म टपका,
क्या कहूं कब कब रोया,
कैसे कह दूं आज कि,
सब कुछ अच्छा रहा।
स्कूल से बाहर टहलते रहे बच्चे-
गंव कलह में उजड़ता रहा,
बोलो कैसे कह दूं खूशी मनाउं,
रोती सड़कों पर घूमती घुरली,
गोद में टांगे दुधमुंही बच्ची,
देख देख आगे बढ़े
फिर बोलो कैसे कह दूं,
सब कुछ अच्छा।
प्रेम में किए कत्ल-
ख़ून रहा टपकता पल पल,
तर किया मां का आंचल,
बाबा को वनवास दिया,
फिर तुम ही बोलो कैसे कह दूं,
कुछ भी तो न हुआ।
बेरोजगार हुए अपने घर के-
चुल्हा रहा उदास,
मां की लोरी भी छीज गई,
रहा न कोई उल्लास,
फिर बोलो मेरे मन,
कैसे कह दूं,
अब कुछ है आनंद।
नए साल में नई उम्मींदे टांगी-
दो नहीं हज़ारों अंखियां,
देखें सपने मंगल की,
उन आंखों मंे,
चूल्हों में,
दाने दे,
सपनों को आकाश,
घर में मिले रोटी पानी,
कोई न जाए बिदेस।

Monday, December 23, 2013

पुरस्कार के महरूम भी लेखन


कई बड़े नाम वाले लेखकों से बात होती रही है। वो निर्मल वर्मा हों, वल्लभ डोभाल हों, शेरजंग गर्ग हों या कोई अन्य लेखक जो वास्तव में लेखन करते हैं उनकी नजर में पुरस्कार महज लेखनोत्तर एक सामाजिक स्वीकृति है इससे ज्यादा और कुछ नहीं।
बतौर शेरजंग गर्ग जी ने एक बातचीत में कहा कि पुरस्कार पाने की प्रसन्नता तब ज्यादा होती है जब आपको उसे पाने के लिए कोई जोड़ तोड़ न करना पड़।
वहीं निर्मल वर्मा ने एक बार मुझ से बातचीत में कहा था कि पुरस्कार मिलने से उत्साह मिलता है। लिखने के लिए और और प्रोत्साहन मिलता है। लेकिन पुरस्कार के लिए लेखन मैं बेहद निम्नतर मानता हूं।
वास्तव में देखा जाए तो पुरस्कार मिले और पुरस्कार के लिए कुछ प्रयास किए जाएं दोनों ही अलग बातें हैं। आज की तारीख में किस तरह से पुरस्कार लिए और दिए जाते हैं यह लेखक जगत में किसी से भी छूपा नहीं है।
दूर दराज में भी ऐसे कई लेखक हैं जो अच्छा लिख रहे हैं। लेकिन वे वो लोग हैं जिन्हें न कोई पुरस्कार मिला है और न उन्हें आप किसी बड़े मंच पर विराजमान देखते हैं। वो चुपचाप अपने काम में लगे हैं। संकोची और शर्मीले किस्म के ऐसे लेखकों को बाहर लाने की जरूरत है।
पुरस्कार किसे बुरा लगता है। हर कोई चाहता है कि इस बार का फलां पुरस्कार उन्हें मिल जाए। वो भी कंधे चैड़े कर के दिखा सकें कि देखो आखिर मुझे भी पुरस्कार मिल ही गया।
आप मुझे पुरस्कार दो और मैं आपको। यदि आपके पास मंच है तो मैं आपको उछालूंगा और आप मुझे। बहरहाल पुरस्कार मिले इसके लिए लेखन किस स्तर का होता है इसका मुआयना तो समय करेगा लेकिन आप खुद अपने लेखन के निर्णायक होते हैं।
कई ऐसे लेखक हैं जो पुरस्कार को ध्यान में रखते हुए भी लेखन करते हैं। दृष्टि फलां फलां पुरस्कार पर होती है और उसके बाद उसी के अनुरूप लेखन करते हैं। यानी पाठक या साहित्य के लिए नहीं बल्कि बाजार जैसा मांगेगा वैसा लेखन करेंगे।

Sunday, December 22, 2013

कथाकार वल्लभ डोभाल से मिलना


कथाकार ही नहीं बल्कि एक सहज और सरल व्यक्ति भी हैं। उनसे मिलकर एक पल के लिए भी नहीं लगा कि हम महज कथाकार से मिल रहे हैं, बल्कि घर के सबसे बड़े सदस्य से मिलना हो रहा है।
सवाल था क्या कहानी और उपन्यासकार के पात्र उसके हाथ की कठपुतली होते हैं?
जी बिल्कुल। कथाकार के पात्र कथाकार के हाथों नाचने वाले होते हैं। मेरा तो मानना है कि जो भी पात्र कथा में आते हैं वो कथाकार के आस-पास के लोगों के प्रतिनिधित्व करते हैं। कथाकार जैसे चाहता है वैसे ही उसके पात्र चलते हैं।
दूसरा सवाल था- क्या कहानी के पात्र का जीवन-दृष्टि कथाकार की ही दृष्टि होती है?
डोभाल जी ने कहा कि हां कथाकार का प्रतिबिंब होता है उसके पात्र। कथाकार जिस तरह का जीवन जीता है उसकी छवियां पात्रों में कहीं न कहीं दिखाई देती हैं।
छंद में जिसने आपने आप को साधा है वहीं छंद मुक्त कविता लिख सकता है। इसमें आप क्या कहते हैं?
बिल्कुल सही बात है। मैंने भी शुरू में छंदबद्ध कविताएं लिखी हैं। बाद मैंने कविता का क्षेत्र छोड़कर कहानी में आ गया। क्योंकि कविताएं वास्तव में पूर्ण अभिव्यक्ति के लिए पूरे नहीं होते। इसलिए मैंने कविता से नाता तोड़कर कहानी दामन थामा।
प्रस्तुति
कौशलेंद्र प्रपन्न
रविवार दिसम्बर 22, 2013

Monday, December 9, 2013

खाद्य सुरक्षा अधिनियम और बिलबिलाता बचपन


-कौशलेंद्र प्रपन्न
 समस्त दुनिया के भूगोल से हजारों नहीं बल्कि लाखों बच्चे नदारत हो जाते हैं उसपर तुर्रा यह कि हमारे विकसित समाज के अग्रदूत बच्चे हमारे सुनहले कल के भविष्य हैं। हमने वैश्विक स्तर पर घोषणाएं की कि हम आने वाले वर्षों में बच्चों की सुरक्षा, शिक्षा, विकास और स्वास्थ्य की न केवल देखरेख करेंगे, बल्कि अपने देश में उन्हें बुनियादी हक के तौर पर सांवैधानिक अधिकार भी दिलाएंगे। याद हो कि सार्वभौम मानव अधिकार घोषणा हो या कि 1989 में आयोजित संयुक्त राष्ट बाल अधिकार सम्मेलन की घोषणा जिसे यूएनसीआरसी89 के नाम से जाना जाता है, उसमें तो हमने ख़ासकर बच्चों की स्थिति को ध्यान में रखा था। लेकिन वास्तविकता क्या है यह आज किसी से छुपा नहीं है। ज़रा देश की राजधानी दिल्ली की सड़कों खासकर रेडलाइट्स पर नजर डालें तो गंदी मैली-कुचैली बालों, गेंदरा ओढ़े हजारों लड़के/लड़कियां मिलेंगी जो किसी स्कूल में नहीं जातीं। किसी भी किस्म की सरकारी योजनाओं का लाभ उन्हें नहीं मिलता। उस पर दुखद बात तो यह है कि सरकार एवं प्रशासन अपने शहर को साफ स्वच्छ और विकास यहां दिखता है के चक्कर में उन्हें कई बार सीमा पर अंधेरे में धकेल चुकी है। याद करें काॅमन वेल्थ गेम्स के दौरान न केवल बड़ों को बल्कि बच्चों को भी शहर के बाहर रातों रात खदेड़ा गया था। उनके पुनर्वास, रहने, खाने-पीने का इंतजाम सरकार की जिम्मेदारी थी। उनकी संख्या, आबादी को लेकर सरकार को फिक्रमंद होना था। लेकिन स्थितियां बिल्कुल विपरीत हैं। वो जिन्हें शहर से बाहर हांक दिए गए वो कहां हैं? किन हालात में जीवन बसर कर रहे हैं आदि सवाल सरकार के आंकड़ों के भूगोल से नदारत हैं। बच्चों की चिंता से चिंतातुर सरकार ने शिक्षा का अधिकार कानून 2009 पारित किया और उसे 2010 में लागू भी कर चुकी है। आरटीई के लागू होने के तकरीबन तीन साल बाद भी स्थितियां कोई खास बदली नजर नहीं आतीं। सरकार खुद स्वीकारती है कि अभी भी अस्सी लाख बच्चे स्कूल से बाहर हैं। जबकि अन्य आधिकारिक रिपोर्ट बताती हैं कि ऐसे बच्चों की संख्या जो स्कूल नहीं जाते तकरीबन सात कारोड़ से भी ज्यादा है। यदि खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 की घोषणाओं और उसकी पंक्तियों पर नजर डालें तो एक तस्वीर साफ उभरती है कि जो बच्चे स्कूल जाते हैं उन्हें ही भोजन का अधिकार प्राप्त है। वो भी साफ लिखा हुआ है कि अवकाश के दिनों को छोड़कर, सरकारी, सरकारी मान्यता प्राप्त सभी स्कूलों में दोपहर का भोजन बच्चों को मुहैया कराया जाएगा। बतौर अधिनियम के धारा 5.1 के खंड़ क के अनुसार ‘छह मास से छह वर्ष के आयु समूह के बालकों की दशा में स्थानीय आंगनवाडी के माध्यम से आयु के समुचित निःशुल्क भोजन, जिससे अनुसूची 2 में विनिर्दिष्ट पोषाहार के मानकों को पूरा किया जाए सकेगा-
कक्षा 8 तक के अथवा छह से चैदह वर्ष के आयु समूह के बीच के बालकों की दशा में इनमें से जो भी लागू होता हो, स्थानीय निकायों, सरकार द्वारा चलाए जा रहे सभी विद्यालयों में और सरकारी सहायता प्राप्त विद्यालयों में, विद्यालय अवकाश दिनों को छोड़कर, प्रत्येक दिन निःशुल्क एक बार दोपहर का भोजन पूरा किया जाएगा।’ इन पंक्तियों के क्या निहितार्थ हैं और इससे कैसे बच्चे लाभान्वित होंगे आदि विमर्श आगे करेंगे यहां बस प्रथम दृष्ट्या दिया गया है। अब जो मजेदार बात सामने आती है वो यह कि सरकार के अनुसार अस्सी लाख बच्चे स्कूल से बाहर हैं, तो वे अस्सी लाख बच्चे दोपहर के भोजन से तो महरूम ही हुए।
खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 की प्रस्तावना पर नजर डालें तो सरकार की सद्इच्छा स्पष्ट दिखाई देती है। अपने प्रस्तावना में अंतराष्टीय मानव अधिकार की घोषणा 1949 की पंक्तियां उद्धृत की गई हैं जिसमें कहा गया है कि हरेक नागरिक को पर्याप्त भोजन पाने का अधिकार है। भोजन पाने का अधिकार से मतलब सिर्फ चावल और गेंहू नहीं। बल्कि पका हुआ भोजन है। साथ ही भारतीय संविधान के प्रावधानों को भी साईट किया गया है मसलन अनुच्छेद 21 जिसमें हर व्यक्ति को इज्जत से जीने का अधिकार भी प्राप्त है। अनुच्छेद 39 ए, राज्य अपनी जिम्मेदारी समझते हुए स्त्री-पुरूष सभी को जीविका के पर्याप्त साधनों को देखते हुए चलें। वहीं अनुच्छेद 42 के अनुसार राज्य के सभी काम करने की मानवीय स्थितियों और मातृत्व राहत की व्यवस्था करें। साथ ही अनुच्छेद 47 को भी प्रस्तावना में जगह दी गई है जिसमें कहा गया है कि सभी के पोषण और रहन- सहन के स्तर को उंचा उठाना एवं लोगों के स्वास्थ्य में सुधार लाना भी राज्य सरकार की जिम्मेदारी है। यहां पूरे अधिनियम पर विमर्श अभिष्ट नहीं। बल्कि इस खाद्य सुरक्षा अधिनियम में बच्चों को लेकर क्या प्रावधान है, सरकार किस तरह लाखों बच्चों को कुपोषण से निजात दिलाने के प्रति वचनबद्ध है आदि को केंद्र में रख कर पड़ताल करना है।
हाल ही में ग्लोबल हंगर इंडेक्स जीएचआई की रपट जारी हुई है। इस रिपोर्ट की रोशनी में भारत में 210 मिलियन नागरिक भूखे की श्रेणी में आते हैं। भारतीय नागरिकों, बच्चों एवं इस खाद्य अधिनियम को देखने की आवश्यकता है इससे जो तस्वीर हमारे समाने उभरती है वह कुछ और ही है। जीएचआर रिपोर्ट के अनुसार भारत में कम पोषाहार भोजन पाने वालों की संख्या 2010-12 में 17.5 फीसदी है। बच्चों के लिहाज से देखें तो कम वजन वाले पांच साल से नीचे के बच्चों की संख्या 40.2 फीसदी है। पांच साल से कम उम्र वाले बच्चों की मृत्यु दर की बात करें तो वह भारत में 6.1 फीसदी है। कुछ और भी तथ्यों पर नजर डालने की आवश्यकता इसलिए भी है क्योंकि इससे भारत में बसने वाले बच्चों की संख्या एवं उनकी स्थितियों को बेहतर समझा जा सके। भारत जैसे देश में 6 साल के अंदर के बच्चे पूरी आबादी में से सबसे ज्यादा खतरे के घेरे में आते हैं। छोटे बच्चे खासकर 6 साल से कम उम्र के बच्चों की बात करें तो उन्हें प्राकृतिक मार सहना पड़ता है। अत्यधिक बाल मृत्यु दर और कुपोषण की मार भी बच्चों को ही सहना पड़ता है। भारत में 0-6 आयु वर्ग के बच्चों की संख्या तकरीबन 158.8 मिलियन है। कुपोषण से मरने वालों की संख्या 50 फीसदी से भी अधिक है। 8.3 मिलियन बच्चे औसतन जन्म के समय कम वजन के पैदा होते हैं यानी जिनका वजन 2.500 ग्राम से भी कम होता है। तकरीबन 46 फीसदी बच्चे जिनका उम्र 3 साल से कम होता है ऐसे बच्चों की संख्या 31 मिलियन के आस-पास है। हर दस बच्चों में से 8 बच्चे जिनकी आयु 6-35 माह की है वो एनेमिया के शिकार हैं। ‘‘ बच्चों के जीवन की शुरू के 6-8 साल बेहद गंभीर क्षण होते हैं। यह वैश्विक स्तर पर पहचाना गया कि जीवनपर्यंत चलने वाली विकास की प्रक्रिया की बुनियाद के साथ ही इन सालों में विकास की गति बेहद तेज होती है।’’ ;एनसीइआरटी,2006द्ध न्यूरो साइंटिस्ट की मानें तो बच्चों के दिमाग का अहम हिस्सों का तकरीबन 85 फीसदी विकास एवं निर्माण इन सालों में होता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि हमें बच्चांे के दिमाग का समुचित एवं भरपूर विकास एवं निर्माण हो सके इसके लिए शारीरिक और मनोवैज्ञानिक परिस्थितियां उपलब्ध करानी चाहिए ताकि दिमाग का विकास अपनी पूरी क्षमता के साथ हो सके। ;एनसीइआरटी,2006 एवं वल्र्ड बैंक, 2004द्ध
सेव द चिल्डेन की हालिया रिपोर्ट भारत की कुछ दूसरी ही किन्तु महत्वपूर्ण तस्वीर पेश करती है, इस रिपोर्ट के अनुसार भारत वर्ष में 1990 के बाद बाल मृत्यु दर को कम करने में सबसे अधिक प्रगति करने वाले शीर्ष 10 देशों में शामिल है। बाल मृत्यु दर पर आधारित संस्था की इस रिपोर्ट के अनुसार लाइबेरिया, रवांडा, इंडोनेशिया, मैडागास्कर, भारत, मिस्र, तंजानिया और मोजाम्बिका जैसे देशों का भी बीते दो दशक में प्रदर्शन बेहतर रहा है। पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर कम करने में भारत ने लगातार प्रगति की है। वर्ष 2001 में जहां 25 लाख बच्चों की मौत हुई थी वहीं 2012 मंें यह संख्या घटकर 15 लाख हो गई। जबकि गौरतलब है कि वर्ष 2012 मंे ही 81 जिले ऐसे थे जहां बाल मृत्यु दर एक तिहाई से अधिक रही और इनमें से आधी लड़कियां थीं।
बहरहाल खाद्य सुरक्षा अधिनियम के अनुसार देश के तमाम नागरिकों जिसमें बच्चे भी शामिल हैं, उन्हें भोजन मुहैया कराने की जिम्मेदारी केंद्र व राज्य सरकार की है। ध्यान हो कि यूएनसीआरसी89 जिसका जिक्र पहले किया जा चुका है, उस घोषणा पत्र पर भारत ने भी दस्तखत किए थे। इस लिहाज से भारत प्रतिबद्ध है कि वो अपने देश में 0-14 साल तक के सभी बच्चों को भोजन,सुरक्षा, शिक्षा, विकास एवं सहभागिता का अधिकार प्रदान करे। इसी के साथ ही 1990 में सेनेगल में भी भारत विश्व के अन्य देशों के साथ दस्तखत करने वाला देश है, जिसमे तय किया गया था कि 2000 तक सभी बच्चों को बुनियादी शिक्षा प्रदान कर दी जाएगी। लेकिन स्थितियां कोई खास सुधरी नहीं दिखीं सो 2000 में डकार में एक बार फिर वचनबद्धता दुहराई गई कि 2015 तक यह लक्ष्य प्राप्त कर लिया जाएगा। किन्तु हकीकतन ऐसा नहीं हुआ। लेकिन भारत सरकार ने तकरीबन सौ साल के लंबे संघर्ष के बाद ज्योति बा फुले की पहली आवाज कि हर बच्चे को शिक्षा का अधिकार मिले, को 2002 में भारतीय संविधान में 86 वां संशोधन कर के धार 21 में ए जोड़ कर मूल अधिकार प्रदान किया। जिसे 2009 में हर बच्चे को शिक्षा का मौलिक अधिकार प्राप्त हुआ। इस आरटीई की चर्चा इसलिए प्रासंगिक है, क्योंकि इसमें ‘शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009’ 6-14 आयु वर्ग के बच्चों को ही शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार देती है। खाद्य सुरक्षा अधिनियम भी इसी को आधार बना कर देश के हर बच्चे को ‘0 से 14 वर्ष आयु वर्ग’ भोजन का अधिकार प्रदान करती है। यूं आरटीई में 0से 6 आयु वर्ग को शामिल नहीं किया गया है, लेकिन खाद्य सुरक्षा अधिनियम में 0से 6 आयु वर्ग के बच्चों के लिए आंगनवाडी जैसी संस्थाओं के जरिए भोजन पहुंचाने की सुविधा प्रदान करती है।
0 से 6 आयु वर्ग के बच्चों के लिए कितना विटामिन युक्त भोजन चाहिए और 6से 14 साल तक के बच्चों के लिए कितना इसका पूरा खाका इस अधिनियम में दिया गया है। बतौर अधिनियम- देश के सभी दरिद्रतम व्यक्तियों, स्त्रियों और बच्चों को दोनों टाईम मुफ्त पका पकाया भोजन दिया जाएगा। लेकिन ऐसे देश में जहां मिड डे मील का ठीक से क्रियान्वयन नहीं हो पा रहा है वहां दरिद्र के लिए भोजन कौन और कैसे पकाएगा यह एक बड़ा सवाल है। मिड डे मील के झोल को सभी जानते हैं। केंद्र से लेकर राज्यों मंे स्कूलों में जिस तरह के विषाक्त भोजन खाकर बच्चे मौत के घाट उतर रहे हैं तो क्या ऐसे में सभी बच्चों को पौष्टिक भोजन मिल पाएगा? खाद्य सुरक्षा अधिनियम के अध्याय 2 में खाद्य सुरक्षा के लिए उपबंध के अंतर्गत बालकों को पोषणीय सहायता एवं बालक कुपोषण का निवारण और प्रबंधन खंड़ जोड़े गए हैं। बच्चों को मिलने वाले भोजन के पोषण मानक पर नजर डालना अप्रासंगिक नहीं होगा-
पोषण मानकः छह मास से तीन वर्ष के आयु समूह, तीन से छह वर्ष के आयु समूह के बालकों और गर्भवती स्त्रियों और स्तनपान कराने वाली माताओं के लिए पोषण मानक। उपलब्ध कराके या एकीकृत बाल विकास सेवा स्कीम के अनुसार पोषक गर्म पका हुआ भोजन या खाने के लिए तैयार भोजन उपलब्ध कराके पूरे किए जाने अपेक्षित हैं।
क्रम संख्या प्रवर्ग भोजन का प्रकार कैलोरी किलो.कैलोरी प्रोटीन ग्राम
1 बलक ‘6 माह से 3 वर्ष घर ले जाने वाला राशन 500 12-15
2 बालक ‘ 3 से 6 वर्ष’ स्ुबह का नाश्ता और गर्म पका हुआ भोजन 500 12-15
3 बालक 6 मास से 6 वर्ष तक के जो कुपोषित हैं घर ले जाने वाला राशन 800 20-25
4 निम्न प्राथमिक कक्षाएं गर्म पका हुआ भोजन 450 12
5 उच्च प्राथमि कक्षाएं गर्म पका हुआ भोजन 700 20

सरकार इस मानक के जरिए सभी बच्चों को पका हुआ भोजन मुहैया कराने की घोषणा करती है। गौरतलब बात यह है कि उद्देश्यों और कारणो का कथन के क्रम संख्या 7 के ‘घ’ में लिखा गया है कि चैदह वर्ष तक की आयु के प्रत्येक बालक को 1. छह मास से छह वर्ष की आयु समूह के बालकों की दशा मंे स्थानीय आंगनवाडी के माध्यम से निःशुल्क आयु के अनुसार भोजन उपलब्ध कराने की अपेक्षा जिससे अनुसूची 2 में विनिर्दिष्ट पोषण संबंधी मानकों को पूरा किया जा सके, और 2. कक्षा  8 तक के या छह वर्ष से चैदह वर्ष की आयु समूह के बालकों की दशा में, स्थानीय निकायों या सरकार द्वारा चलाए जा रहे और सरकार से सहायता प्राप्त सभी विद्यालयों में विद्यालय अवकाशों को छोड़कर, प्रत्येक दिन एक बार निःशुल्क दोपहर के भोजन का हकदार बनाना, जिसमें अनुसूची 2 में विनिर्दिष्ट पोषण संबंधी मानकों को पूरा किया जा सके।
अब हमें उस ओर भी विमर्श करने की आवश्यकता है जहां सरकारी दस्तावेज जवाबदेह हैं कि सभी बच्चों को भोजन दिया जाएगा। लेकिन हमने देखा कि सरकार व सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को ही वो भी अवकाश के दिन छोड़ कर भोजन मुहैया कराई जाएगी। अब प्रश्न है कि सरकारी स्कूल साल में कितने दिन खुले होते हैं। दिल्ली के दरियागंज स्थित एचएमडीएवी स्कूल के प्रधानाचार्य श्री रमा कान्त तिवारी ने बताया कि  पिछले साल 212 दिन स्कूल खुले थे वहीं इस साल 210 दिन स्कूल खुलेंगे। बतौर तिवारी  6से 8 वीं कक्षा तक के सभी बच्चों को दोपहर का भोजन मिलता है साथ ही आयरन की गोलियां भी मिलती हैं। दिल्ली के अन्य इलाकों के स्कूलों की भी तकरीबन यही स्थिति है। मगर दिल्ली से बाहर अन्य राज्यांे में मिड डे मील की क्या स्थिति है इसे पूरा देश देखता-सहता रहा है। अब प्रश्न उठता है जो बच्चे स्कूल से बाहर है जिनकी संख्या सरकारी घोषणा के अनुसार 80 लाख है, उन्हें क्या यह लाभ मिल पाएगा? स्कूल से बाहर जीवन बसर करने वाले सड़कों, पार्क, प्लाइ ओवर के आस-पास रहने वाले बच्चे यानी भोजन ग्रहण करने से महरूम ही होंगे। लगभग 7 करोड़ से भी ज्यादा बच्चे देश भर में बजबजाती जिंदगी बसर कर रहे हैं। उन्हें दोपहर तो क्या कई कई दिन भूखे पेट सोना पड़ता है। ऐसे बच्चों की चिंता कौन करेगा।
यूएनसीआरसी 89 के अनुसार सभी बच्चों को सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य, विकास और सहभागिता का अधिकार मिला हुआ है। भारत ने भी इस घोषणा पत्र पर दस्तखत किया था। इस वचनबद्धता के अनुसार सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि जो बच्चे स्कूल नहीं जाते उन्हें स्कूल में दाखिल कराना, उन्हें बुनियादी शिक्षा यानी कक्षा 8 वीं तक शिक्षा मुहैया कराना है। इसी कड़ी में आरटीई, जुबिनाइल जस्टिस एक्ट, राष्टीय बाल अधिकार एवं संरक्षण आयोग आदि को देखने-समझने की आवश्यकता है। एक ओर इन समितियों की सिफारिशें हर बच्चों की सुरक्षा और संरक्षण के साथ ही भोजनादि के अधिकार पर कार्य करता है। आवश्यकता है जिन घोषणा प्रपत्रों पर दस्तखत किए हैं उन्हें अमलीजामा पहनाया जाए।



Friday, December 6, 2013

वो जो कस्बा था



कौशलेंद्र प्रपन्न
 एक ओर सोन और दूसरी ओर नहर। दोनों के बीच में बलखाता कस्बा। तकरीबन तीन ओर नदी और बीच में बसा कस्बा ही था। पड़ोस में चिपनियां थीं जो कागज़, साबुन, डालडा सीमेंट बनाती थीं। जब इस कस्बे का पड़ोसी शहर जवान था यानी डालमियानगर में रौकनें थीं, सड़कें, अस्पतालें, स्कूल आदि थे। साथ ही लोगबाग भी ठीक ठाक ही थे। अस्सी के दशक में कस्बे का पड़ोसी धीरे-धीरे मरने लगा। मरने लगे लोग। उजड़ने लगीं रौनकें। क्योंकि अब डालमियानगर कारखाना की माली हालत खराब होने लगी थी। शुरू में आंशिक और फिर माह, माह से साल हो गए कारखाना बंद हो गया। लोगों में बेचैनी बढ़ने लगीं। कुछ लोग जो दूरगामी दृष्टि रखते थे वो लोग शहर छोड़कर रोजी की तलाश में बाहर चले गए। धीरे-धीरे इस कारखाने में काम करने वाले द्वितीय और तृतीय के साथ चैथी श्रेणी के कामगर जिनके लिए शहर छोड़ना मुश्किल था वो इसी शहर और पड़ोसी कस्बे में दूसरे काम करने पर मजबूर हो गए। किसी के परिवार सब्जी की रेड़ी लगाने लगी तो किसी ने छोटी मोटी दुकानें डाल लीं तो कुछ जो मास्टरी के कौशल रखते थे, उन्होंने टीचिंग शुरू कर दी।
पड़ोस का शहर अब वीरान हो चुका है। वो सड़कें, वो अस्पतालें, मंदिर, बैंक सब के सब अपनी अतीत की दास्तां बयां करती हैं। डालमियानगर से सटा कस्बा डेहरी आॅन सोन जो पहले कह चुका हूं। यह कस्बा दरअसल अपने पड़ोसी की वजह से गुलजार था। यूं तो इस कस्बे का नाम अंग्रेजों ने इसकी भौगोलिक स्थिति को देखते हुए ही रखा डेहरी आॅन सोन। ठीक ही तो है यह डेहरी, सोन नदी के तट पर बसा है। वही शोण भद्र जो मध्य प्रदेश के अमरकंटक पहाड़ से निकल कर बिहार के विभिन्न शहरों को पार करता पटना में गंगा में समाहित हो जाता है। सोनभद्र की कहानी भी दिलचस्प है। यह देश के चार नदों में से एक है। यह नदी नहीं है। दूसरा इसे ब्रह्मा का अभिशाप मिला हुआ है। दूसरी मजे की बात यह कि इसी सोन भद्र के किनारे डेहरी में कभी शरद्चंद ने ठहर कर अपना उपन्यास भी लिखा। इसका जिक्र विष्णु प्रभाकर अपने आवारा मसीहा में करते हैं।
बहरहाल कारखाने के बंद होने से इस कस्बे पर भी ग्रहण लगना शुरू हुआ। जिस कस्बे की गति, रौनक अपने पड़ोसी से थी वो कारखाने के बंद होने के बाद ठहर सी गई। जब डालमियानगर चालू हालत में था तब दिल्ली-कोलकाता लाइन पर चलने वाली डिलक्स अब पूर्वा एक्सप्रेस डेहरी रूका करती थी। जो सीधे-सीधे देश की राजधानी से जुड़ती थी। इधर कारखाना बंद हुआ उधर आस-पास के गांव के लोग इस कस्बे में विस्थापित होने लगे और इस कस्बे के लोग अपनी सुविधा और सामथ्र्य के अनुसार कस्बे को छोड़ने लगे। कभी इस कस्बे की आबादी तकरीबन दो या चार लाख हुआ करती थी। अब उसी कस्बे की आबादी तकरीबन 13 लाख का आकड़ा पार कर चुकी है। लेकिन दुकान, व्यापार और कमाई का कोई व्यावसायिक नियमित स्रोत नहीं है। कैसे यह कस्बा चल रहा है कई बार सोच कर ताज्जुब होता है। लेकिन जहां पहले बाइक, कारें बेहद कम हुआ करती थीं। सड़कों पर मोटर साइकिल गुजरने पर सब की नजरें उस ओर होती थीं। यदि चाहें तो पैदल इस कस्बे का एक चक्कर आप दो से तीन घंटे में काट सकते हैं। लेकिन अब यह चैहद्दी चैड़ी हो चुकी है। लोग सोन की ओर मकान बनाने लगे हैं। जो खुलापन इस शहर को प्रकृति ने दिया था वह अब लोगों के रहने की ललक और प्रोपर्टी सेल के जाल में फसता जा रहा है। इसकी प्राकृतिक छटा अब ज्यादा दिन मुक्त नहीं रह सकती। उस शहर को तब देखा था और अब देखता हूं तो लगता है क्या कोई कस्बा ऐसे भी शहर बनता है? जहां की अपनी पहचान बिकने लगे। जहां के लोग भी दूसरे महानगरों के मानींद अपना मिज़ाज बदल रहे हों तो उस कस्बे को, उसके पुराने लोगों को जी करता है पूछा जाए अपने कस्बे को उसी रूप में ही रहने दो ना। पर क्या यह व्यावहारिक है? उचित है?
भूमंड़लीकरण और आधुनिक माॅल के युग में उनसे इस तरह की चाक- चिक्य से दूर रहना का दुराग्रह कितना जायज है? उन्हें भी हक है कि वो भी अपने कस्बे में नामी गिरामी फास्ट फुड  का लुत्फ उठाएं। माॅल में शाॅपिंग करें और महानगरीय संवेदनशून्यता का जामा ओढ़ लें।
कौशलेंद्र प्रपन्न

Tuesday, November 26, 2013

शिक्षक के कंधे पर बहुभूमिका का जुआ


-कौशलेंद्र प्रपन्न
 सो शिक्षक/शिक्षिका के कंधे पर बहुभूमिका का जुआ रहता है। शिक्षक पर यह जिम्मेदारी समाज ने बहुत सोच- समझ और तैयारी के साथ डाली है। सिविल सोसायटी अपने बच्चों के भविष्य का दारोमदार एक जिम्मेदार और अध्ययन-अध्यापन की रोटी खाने और जीवन दान दे चुके, शिक्षक वर्ग को अपने बच्चों को सौंप कर खुद को मुक्त महसूस करता है। अपने लाडले व लाडली को सात आठ घंटे ही महज नहीं प्रदान करता, बल्कि पूरी जिंदगी की तैयारी के लिए विश्वासपात्र के हाथों देकर आश्वस्त हो जाता है। और यह प्रक्रिया प्राचीन भी है। जब गुरूकुल में राजघराने के बच्चे हों या आम जनता के बच्चे सभी एक ही गुरूकुल में शिक्षा ग्रहण किया करते थे। एक गुरू अपनी पूरी निष्ठा, ईमानदारी और ज्ञान-संपदा छात्रों को सौंपा करता था। यह अगल बात है कि उसी इतिहास में गुरू द्रोण भी मिलते हैं। लेकिन सैंद्धांतिकतौर पर शिक्षक व गुरू से निरपेक्षभाव की उम्मींद ही की जाती है। वह निरपेक्ष भाव दूसरे शब्दों में कहें तो धर्म,जाति, भाषा, बोली, वर्ग,रंग-रूप तमाम कोटियां शामिल हो जाती हैं जिसकी चर्चा और सांवैधानिक शब्दों में कहें तो मौलिक अधिकार में शामिल, किसी भी नागरिक बच्चे भी शामिल हैं, के साथ उक्त आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा, की उम्मींद और अपेक्षा शिक्षक वर्ग से भी की जाती है। काफी हद तक शिक्षक इस निकष पर खरे भी उतरते हैं। लेकिन अब के टीचर गुरू व शिक्षक जो पुराने वाले थे, उन्हें छोड़ दें तो थोड़ी निराशा होती है। समय समय पर अध्यापन वर्ग से जुड़े शिक्षक समुदाय से जिस तरह की खबरें आयी हैं वह एक नए विमर्श की मांग करती है। मसलन शिक्षकों द्वारा बच्चों/बच्चियों का शारीरिक, मानसिक शोषण व बलात्कार आदि। इससे पूरे शिक्षक समुदाय पर सवालिया निशान लग जाता है। यदि स्कूल के प्रांगण से ऐसी खबरें आती हैं तो यह कहीं न कहीं शिक्षा-शिक्षण-प्रशिक्षण की प्रक्रिया पर भी सवाल उठता है। क्या शिक्षक-प्रशिक्षण के दौरान गुणवत्तापूर्ण तालीम नवप्रशिक्षु को शिक्षा दी जाती है? क्या शिक्षा-दर्शन और शिक्षा-मनोविज्ञान एवं शिक्षा का समाज-शास्त्र उन्हें इसी तरह की शिक्षा-दीक्षा देती है जिसे स्कूल में आते ही अमूमन शिक्षककर्मी भूल जाते हैं या ताख पर रख कर अपनी शिक्षण विधि इजाद कर लेते हैं?
बहरहाल सवाल और जिज्ञाया से लगातार और रोजदिन जुझने वाले शिक्षकों को विचार तो करना ही होगा कि क्या वास्तव में वे अपनी पूरी निष्ठा और ज्ञान-संपदा बच्चों को प्रदान कर पा रहे हैं। इस तथ्य और सच्चाई से भी कोई मुंह नहीं मोड़ सकता कि अध्यापक की छवि बच्चों के साथ ताउम्र रहती है। कहना चाहिए न केवल रहती है, बल्कि कई अध्यापक बच्चों के लिए जीवन के मूल्य बन जाते हैं। जहां जाते हैं उनके साथ उनका अध्यापक साथ होता है। इसलिए भी अध्यापक की हर गतिविधि चलना, बोलना, लिखना, पढ़ना आदि बच्चों पर गहरे प्रभाव छोड़ते हैं। ऐसे में अध्यापक को सावधानी तो बरतनी ही पड़ेगी। वरना उसकी एक गलती आने वाली पौध को बरबाद होने से नहीं बचा सकती।
बच्चों के जीवन को जितना अध्यापक प्रभावित करता है उतना शायद समाज का दूसरा घटक नहीं। यूं तो आज की तारीख में समाज में नई नई तकनीकें आ गई हैं। ई-माध्यमों के आ जाने से एकबारगी आशंका जताई जा रही है कि अध्यापकों की भूमिका खत्म हो जाएगी। किन्तु वास्तविकता ऐसा नहीं है। तमाम तकनीक आएं आ जाएं बेशक, किन्तु अध्यापक की जगह कोई मशीनी तत्व नहीं ले सकता। अध्यापक न केवल टेक्स्ट का वाचक है, बल्कि उसके साथ उसकी मुद्राएं, भावभंगिमाएं भी तो हैं जो तकनीक के बूते की बात नहीं। वाचन से लेकर लेखन, पठन तक की ऐसी प्रक्रिया हैं जिसमें तकनीक की घुसपैठ ज़रा मुश्किल है। यही वजह है कि कक्षा में और कक्षा के बाहर भी अध्यापक अपनी पूरी उपस्थिति दर्ज कराता है। यही वजह है कि शिक्षक की भूमिका और उपस्थिति कभी खत्म नहीं होने वाली। तब तो शिक्षक का काम और भी चुनौतिपूर्ण हो जाता है। यदि कोई बच्चा गलत रास्ते पर जाता है या समाज में असामाजिक गतिविधियों में शामिल पाया जाता है तब भी प्रकारांतर से सवाल यही उठता है कि अध्यापक ने यही तालीम दी? यानी अध्यापक केवल कक्षा में पढ़ा कर अपनी भूमिका से हाथ नहीं झाड़ सकता। बल्कि उसका साथ परोक्ष और अपरोक्ष दोनों ही स्तरों पर बच्चों के साथ रहता है। यहां एक दोषारोपण का खेल भी खूब चलता है। वह यह कि अध्यापक ही सब कुछ करे तो अभिभावक क्या करेंगे? अध्यापक पढ़ाए कि उसकी पोटी भी साफ करे, नहलाए धुलाए और संस्कारित भी करे? क्या क्या करे अध्यापक? एक अध्यापक कक्षा भी पढ़ाए, स्कूल के अन्य काम भी करे, दफ्तरी काम भी निपटाए और बीच बीच में सरकारी कामों में भी ड्यूटी दे। सही है कि सरकारी ड्यूटी जिसे इंकार नहीं कर सकते। मसलन जनगणना, चुनाव, आपातकालीन स्थितियां आदि, लेकिन सरकारी रिपोर्ट ‘डाईस’ बताती हैं कि कुल पूरे साल में 16,18 व 20 दिन ही अध्यापकों को गैरशैक्षणिक कामों में लगाया जाता है।
जब हम अध्यापकीय भूमिका पर विहंगम दृष्टि डालते हैं तब तस्वीर और भी साफ होती है। एक अध्यापक की बहुआयामी भूमिका होती है। वह एक सामाजिक होने के नाते बच्चों को एक सामान्य और जिम्मेदार नागरिक बनाने में अपना सहयोग दे। शिक्षित होने के नाते बच्चे को न केवल साक्षर बनाए बल्कि शिक्षित भी करे। शिक्षा किस प्रकार जीवन को बेहतर बनाती है और कैसे जीवन की मुश्किलों में चुनौतियों का सामना करे इसकी के भी औजार प्रदान करे। इससे भी बढ़कर जो भूमिका है वह यह कि एक मुकम्मल इंसान बनने में अध्यापक अपनी भूमिका से किसी भी किस्म की कोताही न करे। क्योंकि एक बेहतर इंसान बनाना शिक्षा की जिम्मेदारी तो है ही साथ ही उद्देश्य भी। इस उद्देश्य को अमली जामा पहनाने में शिक्षक ही उपयुक्त माध्यम हो सकता है। शिक्षा,बच्चे और शिक्षक की त्रिआयामी मिश्रण में समुचित तालमेल और सामंजस्य ही समाज को एक बेहतर नागरिक प्रदान कर सकता है। इस दृष्टि से अध्यापक के इर्द- गिर्द सारा का सारा समीकरण बनता और बिगड़ता है।
यूं तो हर मनुष्य को संवदेनशील होना ही चाहिए। यह अलग बात है कि जिस तेजी से हम आधुनिक होते जा रहे हैं। हम तकनीक से लैस हो रहे हैं नागर हुए है उसी रफ्तार से हमारे अंदर का मनुष्य सूखता जा रहा है। इसकी बानगी समय समय पर देखने को मिलती हैं। कोई सड़क पर तड़प कर जान दे देता है, लेकिन हम उसे बचाने के लिए नहीं रूकते। और भी कई उदाहरण दिए जा सकते हैं। जिसे देख सुन कर यही लगता है कि समाज में मनुष्य वो भी संवेदनशील मनुष्य की कमी होती जा रही है। बच्चा एक वयस्क का छोटा रूप होता है। स्कूल में जो भी बच्चा आता है वह स्कूल में न केवल शिक्षा-वर्णमाला रटने नहीं आता और न ही केवल नौकरी पाने की तैयारी के लिए आता है, बल्कि वह अपने सर्वांगीण विकास का सपना भी ले कर आता है। इस सर्वांगींण विकास में एक संवेदनशील मनुष्य बनने की जिज्ञासा भी शामिल है। इस लिहाज से शिक्षक को प्रथमतः एक संवेदनशील मनुष्य तो होना ही चाहिए ताकि वह इस गुण व प्रकृति को बेहतर तरीके से बच्चों में संक्रमित करें।
एक अध्यापक केवल आदेश और निर्देश देने का घटक नहीं है। और न वह महज पाठ्य पुस्तकों का वाचक ही है। बल्कि अध्यापक को कक्षा और कक्षा के बाहर भी संवाद की संभावनाएं खुली रखनी चाहिए। जे कृष्ण मूर्ति अकसर संवाद पर ध्यान दिया करते थे। उनका तो यहां तक कहना था कि प्रकृति हमसे हर वक्त संवाद करती है। वही दर्शन उन्होंने शिक्षा में आजमाया और वकालत की कि कक्षा में संवाद होना चाहिए। संवाद का अर्थ शोर नहीं है। बल्कि एक सार्थक संवाद में शिक्षक और बच्चे दोनों सहभागी हों। जहां संवाद होता है वहां सच्चे मायने में सकारात्मक सोच और सृजनशीलता के द्वार खुलते हैं। एक अध्यापक को संवाद के लिए बच्चों को उकसाना भी चाहिए। क्योंकि बच्चों में यदि संवाद की क्षमता व कौशल का विकास नहीं होगा तो वह सिर्फ निर्देश लेने और देने की भूमिका तक ही सिमटकर रह जाएंगे।
अभिभावक से अर्थ बच्चे के नाते रिश्तेदार ही नहीं होते। बल्कि समाज का वह हर वर्ग बच्चे का अभिभावक है जिसकी मदद से एक मुकम्मल नागरिक का निर्माण संभव है। इस दृष्टि से अध्यापक तो बच्चों के खासे करीब होता है। स्कूल के प्रांगण से लेकर घर के आंगन तक अध्यापक परोक्ष-अपरोक्ष रूप से उपस्थित रहता है। जिस तरह से अध्यापक अपने बच्चे को देखता-रखता है उससे ज़रा भी कम दूसरे के बच्चों को नहीं रखना चाहिए। क्योंकि अध्यापक पर ऐसे में दोहरी जिम्मेदारी हो जाती है। समाज उनको इस भरोसे अपनी पौध को देता है कि आप ही समर्थ और सक्षम व्यक्ति हैं जो हमारे बच्चे को बेहतर जिंदगी और भविष्य दे सकते हैं। लेकिन यह अलग विमर्श का विषय है कि वही अध्यापक बच्चों के साथ कई बार गैर जिम्मेदाराना बर्ताव भी करता है। इससे पूरी अध्यापकीय परिवार शक के घेरे में आ जाती है।
पठन- पाठन से जुड़े होने के नाते शिक्षकों को तो शोध-अध्ययन के काफी करीब रहना चाहिए। ज्ञान और सूचना नित नए आयाम और शोधों से निखरते हैं। यदि एक शिक्षक शिक्षा, ज्ञान, विज्ञान के क्षेत्र में होने वाले नवाचारों एवं रिसर्च से वाकिफ नहीं  होगा तो वह एक तरह से पिछड़ जाएगा। उसका पिछड़ना बच्चों के लिए हानिकारक है। सो अध्यापकों को कम से कम अपने विषय में होने वाले रिसर्च-खोजों, लेखन से तो अवगत होना ही चाहिए। क्यांेकि अध्यापन के नए नए तरीके और प्रविधियां तैयार हो रही हैं यदि उनका इस्तेमाल अध्यापन में करता है तो वह उसके लिए तो सहज और उत्पादक है ही साथ ही बच्चों में भी पढ़ने-लिखने की ललक पैदा कर सकता है। लेकिन अफसोस की बात है कि कई कार्यशालाओं में ऐसे अध्यापको से भी रू ब रू होने का मौका मिला है जो गैर शैक्षणिक कार्यों का हवाला दे कर अध्ययन के लिए समय की कमी का रोना रोते हैं। जबकि यदि आप पढ़ना चाहें तो समय निकाल सकते हैं। अध्ययन, शोधादि के सम्पर्क में जिन कर्मीयों के लिए आवश्यक है उनमें वकील, डाॅक्टर, टीचर, पत्रकार खासतौर से शामिल हैं। इन्हें अपने क्षेत्र में होने वाले अध्ययनों से हर वक्त ताजा और तत्पर होना चाहिए। यदि अध्यापक ही पढ़ने में रूचि नहीं लेगा तो वह बच्चों में पाठ्यपुस्तकेत्तर समाग्री पढ़ने की रूचि कैसे जगा पाएगा। इसलिए खुद तो अध्यापक पढ़े ही साथ ही बच्चों में भी पढ़ने की ललक पैदा करे।

Friday, November 22, 2013

भविष्य का द्वंद्व यूं ही खड़ा था


अभी तलक बच्चों का भविष्य और करिअर की दिशा अनिश्चिय का शिकार था। सवाल जवाब में बच्चों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। लेकिन सार्वजनिकतौर पर अपने मन की उलझन को साझा करने में हिचकिचाते बच्चों ने अपनी मन की गांठ बाहर घेर कर साझा किया। 
सवाल था शिक्षा हमें क्या देती है? नौकरी, घर, पैसे, आत्महत्या या बेहतर जीवन और क्या हमें बेहतर मनुष्य बनने में मदद करती है?
हलांकि बच्चों ने स्वीकारा कि शिक्षा हमें अच्छा मनुष्य बनाती है। लेकिन उनका अच्छा मनुष्य के पीछे का तर्क ज़रा चैकाने वाला था। उनका मानना था जो पैसे, नौकरी और एमएनसी की जाॅब दिलाती है। एकबारगी यह ताज्जुब की बात भी नहीं है क्योंकि जिस तरह का सामाजिकरण उनका हो रहा है ऐसे में इससे अधिक सार्थक जवाब की उम्मींद भी क्या की जा सकती है। 
अमुमन बच्चों के लिए जाॅब और अच्छी लाइफ से आशय खूब पैसा था। लेकिन वहीं दो-चार बच्चे ने कहा नहीं सर, हम एक अच्छा इंसान बनना चाहते हैं। हम दंगा-फसद नहीं करना चाहते। हमारे मां-बाप गरीब हैं उन्हें सुविधा और आराम देना चाहता हूं। इसके लिए नौकरी और पैसे दोनों ही जरूरी हैं।
इस संवाद से जो चिंताजनक बात निकल कर खड़ी है वह यह कि अभी भी बच्चों के दिमाग में यह साफ नहीं है कि वो क्या करना चाहते हैं? कैसे अपने लक्ष्य को हासिल करेंगे? और उनकी मदद कौन कर सकता है।
यदि बच्चे द्वंद्व से गुजर रहे हैं तो इसमंे अभिभावकों के साथ ही अध्यापक वर्ग भी शामिल है। क्योंकि जितनी जिम्मेदारी अभिभावकों की है उससे ज़रा भाी कम अध्यापकों की नहीं मानी जा सकती। आखिर उम्मींद की एक रोशनी अध्यापक की ओर से भी तो आती है। दिगभ्रमित बच्चों को देख और बात करके लगा कि उन्हें एक दो सत्र और काॅसिलिंग की आवश्यकता है ताकि वो स्पष्ट हो सकें कि वो क्या बनना चाहते हैं और उस योजना निर्माण में कौन उनकी मदद कर सकता है।

लोकतंत्र के चारों स्तम्भ हमाम में नग्न


जी लोकतंत्र के चारों स्तम्भ हमाम में नंगे हैं। चाहे न्याायिक तंत्र हो या विधायिका या फिर कार्यपालिका या फिर पत्रकारिता सब के सब स्त्री के साथ शोषण में लिप्त हैं। समाज जागरूक है उसे सारी ख़बरें मिलती रहती हैं। लेकिन जब पत्रकारिता खुद इसमें लिप्त हो तो यह भी कोई अचरज नहीं है। तरूण तेजपाल हों या कोई और मीडियाकर्मी यदि महिला कर्मीं के साथ दुव्र्यव्यहार करता है या शोषण शारीरिक तौर पर तो ज़रा चैकाता है।
तरूण तेजपाल वही हैं जिन्होंन कई स्टींग आॅपरेशन के जरिए कई राजनैतिक खुलासे किए बधाई लेकिन खुद जब महिला सहकर्मी के साथ शारीरिक शोषण के आरोप लगे तो महज संपादकत्व के धर्म से खुद को कुछ समय के लिए अलग कर लिया। क्या यही इसकी भरापाई है? सोचने कह बात है।
न केवल समाज के पत्रकार, राजनैतिक, शिक्षक तकरीबन हर वर्ग के वे लोग इस तरह के कुकृत्य में शामिल होते हैं तब समाज को सोचने की आवश्यकता है। जब लोकतंत्र के चारों स्तम्भ इस तरह से शक के घेरे में हों तो यह सिविल सोसायटी के लिए खासे चिंता का विषय है और विमर्श का भी।
समाज को आगे की राह तय करने, ले जाने और खबरों से अवगत कराने वालों के कंधों पर समाज बड़ी गंभीर जिम्मेदारी सौंपती हैं लेकिन जब खुद चेत्ता इस किस्म के हरक्कतों में
शामिल हों तो समाज की चिंता और भी बढ़ जाती है।
आज केवल पत्रकारिता बल्कि हर वर्ग इस तरह के कर्म में मुंह काला कर रहे हैं। ऐसे में समय में हमें खुद ही सचेत और चैकन्ना रहने की आवश्यकता है।

Tuesday, November 19, 2013

भविष्य और द्वंद्व


आज डी ए वी स्कूल दरियागंज में 11 वीं और 12 वीं के बच्चों से बात करने का मौका मिला। 
विषय था भविष्य और द्वंद्व। इस विषय पर 30 मिनट की बातचीत का आयोजन डी ए वी ने रखा था। इसमें मैं खासकर बच्चों से उनके करियर के चुनाव और चुनाव में मददगार साबित होने वाले घटकों पर बात करने गया था। क्योंकि यह उम्र और कक्षा भविष्य का निर्धारण करने वाला होता है। तकरीबन 150 बच्चों से संवाद करना यूं भी चुनौतिपूर्ण होता है लेकिन स्कूल के प्रधानाचार्य की व्यवस्था में यह बातचीत बेहद सार्थक और बच्चों के लिए लाभकरी हुआ। 
जब बात आई कि करियर, नौकरी, और बेहतर जिंदगी क्या जरूरी है? तब बच्चों ने खुद जवाब दिया बेहतर जिंदगी। इसमें आपकी मदद कौन कौन से लोग कर सकते हैं इस विषय पर भी बच्चों ने खुल कर हिस्सा लिया। 
बच्चों को समय रहते सही और समुचित मार्गदर्शन मिलना निहायत ही जरूरी है। और यह काम डी ए वी ने किया। उसने अपने बच्चों को इस क्षेत्र में मदद प्रदान करने के लिए कार्यशाला का आयोजन किया इसके लिए तिवारी जी बधाई योग्य हैं। 
कई बच्चों ने संवाद सत्र समाप्त होने के बाद संपर्क किया। उन्हें क्या करना चाहिए? आवश्यकता है बच्चो को समुचित मार्गदर्शन का। सामथ्र्य उनमें भी बस जरूरत है उन्हें निखारने का।

महानगरीय उक्ताहट


कई बार लगता है हम जैसे जैस आधुनिक, नागर समाज के हिस्सा होते जा रहे हैं वैसे वैसे हमसे कुछ अहम चीजें पीछे सरकती जा रही हैं। उस सरकन में सबसे ख़ास चीज यह है कि हमारे अंदर की संवेदना और संवाद की तरलता सूखती जा रही है। 
आज लंदन में रहने वाले मेरे एक मित्र का फोन आया। वह इतना परेशान था कि उसने कहा मैं यहां की जिंदगी जी जी कर अंदर से खाली और बेककार की चीजों से भर गया हूं। चाहता हूं कुछ दिन नगर से दूर एकदम बिना दिखावटी जीवन जी पाउं। 
ज़रा सोचें क्या संभव है कि आम अपने अंदर की सूखन को बचा पाने के लिए परेशान हैं? क्या हम चाहें तो अपनी तरलता को बचा सकते हैं? यदि हां तो फिर देर किस बात की हमें अपने अंदर के गंवईपन को बचाना होगा। अपने अंदर के इंसान को जगा कर रखना होगा। क्या आप सहमत हैं?
मां इस बेटे से उस बेटे के घर उस बेटे से उस बेटी के घर डोलती फिरती है। लेकिन उससे नहीं पूछा जाता कि वह कहां रहना चाहती हैं? जनाब स्थिति तो यह है कि बेटा मां को एयर पोर्ट पर बैठा कर बीवी के संग मकान बेच विदेश रवाना हो जाता है। मां बेघर। न घर पति का घर रहा और न बेटा साथ ले गया।
पेड़ होते थे ऊँचे -
घर से बोहोत ऊँचे,
झांको तो पेड़ लगते थे आशीष देते,
देखते ही देखते पेड़ होगे ठिगने,
पेड़ को ठेंगा दीखते खड़े हो गए मकान।।।
पेड़ से ऊँचे होने लगे बिल्डर फ्लोर-
२० या २५ माले से देखो तो कैसे लगते हैं पेड़ ,
बौने ठिगने,
पेड़ दादू हो गए बूढ़े ,
उनकी नीम शीतलता हो गई खत्म,
पीपल भी सूख गए.
कंक्रीटों के शहर में पेड़ कहाँ हों खड़े।

Thursday, November 14, 2013

आर-पार और ख़बरम् को छोड़ गए दीनानाथ मिश्र


‘14 सितंबर 1936-13 नवंबर 2013’
14 सितंबर 1936 में जन्में दीनानाथ मिश्र जी पत्रकार और संपादक के साथ ही बेहतरीन व्यंग्यों से पाठकों को दशकों तक झकझोरते रहे। उनका आर-पार काॅलम कटाक्षों से भरा होता था तो वहीं ख़बरम् राजनैतिक-सामिजक विश्लेष्णों से लबरेज हुआ करता था। पांच्जन्य में सहायक संपादक और अंतिम तीन वर्षों में प्रधान संपादक रहे। 
आपातकाल में जेल में भी रहे। उन्हीं दिनों अटल बिहारी वाजपेयी की कैदी कविराय की कुंडलियां, का संपादन किया। वहीं नवभारत टाइम्स में विशेष संवाददाता और ब्यूरो प्रमुख भी रहे। आपातकाल में इन्होंने गुप्त क्रांति किताब लिखी वहीं आर एस एसः मिथ एंड रियलिटी किताब भी लिखी। 
शरद जोशी, हरिशंकर परसाई, शंकर पुणतांबेकर जैसे व्यंग्य बाण भी खूब चलाए जिसको प्रभात प्रकाशन ने हर हर व्यंग्ये और घर की मुरगी नाम से किताब के रूप में लाया। 
पपा जी थे मेरे। बचपन से उन्हें इन्हें इसी नाम से पुकारा। सुबह कम से कम 15- 20 अखबार पढ़ते ही देखा। फिर काॅलम लिखवाने की बारी आती। कई कई बार देर रात तक पढ़ते-लिखते देखता आया हूं। एक बार उन्होंने कहा जब पूरी दिल्ली सो रही होती है तब मैं जगा काम कर रहा होता हूं।
उनकी आत्मा को प्रभू शांति दे।
जिन्होंने दैनिक जागरण के लिए इतने लिखे उस अखबार में एक सिंगल काॅलम की जगह भी नहीं मिली। क्या है पत्रकारिता ज़रा सोचें।

पिरितिया काहे के लगवलः भिखारी ठाकुर की याद आ गई


महेंद्र प्रजापति की यू ंतो यह पहली कहानी नहीं है। हां नया ज्ञानोदय अंक नवंबर 2013, के लिए बेशक पहली हो सकती है। लेकिन पढ़ कर अनुमान लगाना कठिन है कि यह कथाकार, संपादक की पहली कहानी है। प्रजापति वास्तव में कथाकार की भूमिका में अच्छे रचे-बसे लगते हैं। एक बार इस कहानी में पढ़ने बैठें तो वास्तव में बिहार अंचल की भाषायी छटा को आनंद तो मिलेगा ही साथ ही तीन चार दशक पहले बल्कि आज भी जो मजूर अपनी ब्याहता को घर-गांव में छोड़ रोटी रोजी के लिए कलकता, पंजाब, मुंबई जाते हैं, उन महिलाओं की अंतरवेदना, छटपटाहट की सिसकिया सुनाई देंगी।
कई बार भिखारी ठाकुर भी बगले ही बैठे मिलेंगे। परदेसिया नाटक जिन्होंने नहीं देखा उनके लिए यह कहानी वह रोशनदान है जिससे परदेसिया को देख सकते हैं। भोजपुरी बोली-बर्ताव को प्रजापति ने कुछ यूं घोला है कि कहानी में सरसता खुद ब ख्ुाद दुगुनी हो जाती है।
सच में एक पढ़नीय कहानी बन पड़ी है। भाषा-शैली तो आंचलिक है ही साथ ही कहानी की जमीन भी जानी पहचानी है लेकिन उसके साथ प्रजापति का तानाबाना बुनना एकदम सामयिक है।
साध्ुावाद और अगली कहानी का इंतजार पाठकों को रहेगा।
कौशलेंद्र प्रपन्न

Monday, November 11, 2013

प्लेटफाम नंबंर 1 से 16 पर पसरी दुनिया


प्लेटफाम पर पसरी दुनिया को देखकर लगता है कितने लोग विस्थापन से गुजरते हैं। उसमें भी दिल्ली के प्लेटफाम 1 और 16 दोनों की दूरियां सामाजिक हैसियत को भी बखूबी बयां करती हैं। चेहरे, सामाजिक दूरियां साफ देख सकते हैं। एक तरफ लगदक बैग, चमकते चेहरे जो राजधानी, दूरंतो आदि तेज गति वाली गाडि़यों में सफर करते हैं और एक वो वर्ग जो अभी भी लंबी दूरी तय करने वाली एक्सप्रेस गाड़ी में यात्रा करते हैं। वही टीस टप्पर, टीवी, कनस्तर लेकर सत्तू खाते, कोक की बोटल में पानी भर कर यात्रा करते हैं। 
सर्दी में भी शीतल जल पीते लोगों को देख कर लगता है कि अभी भी विस्थापन रूका नहीं है। जितनी भीड़ प्लेटफाम नंबंर 16,15 आदि पर होती हैं उतनी दूसरे प्लेटफॅाम पर नहीं। हर साल दिवाली, छठ के मौक पर लाखों लोग यूपी, बिहार की ओर भागते हैं। जो छूट जाते हैं वो दिल्ली में रह जाते हैं। विस्थापन क्लास में भी हुआ है। स्लिपर से थर्ड एसी, सेकेंड एसी मंे फलांग चुके हैं। और हवाई जहाज के यात्री में भी संख्या बढ़ी है। जेनरल बागी में सफर करने वालों में भी विस्थापन देखा जा सकता है। क्या ही अच्छा होता कि राज्य सरकारें उन्हें विस्थापन से बचा पातीं।

Thursday, November 7, 2013

जांता, ढेकी और जीमालय


याद है जब अपनी नानिहाल जाया करता था तब वहां जांता, ढेकी और कुआं से पानी खींचती महिलाएं दिखाई देती थीं। उनकी बदन पर चरबी का नामोनिशान नहीं होता था। वो किसी जीम में नहीं जाती थीं अपनी चर्बी गलाने। चावल, गेहंू घर में ही जांता, ढेकी में कूट-झान लिया करती थीं। पानी के लिए या तो हाथ वाला कल होता था या फिर सामूहिक कुआं हुआ करता था। पानी खींचो और स्वस्थ रहो। घरेलू कामों में मशीन से ज्यादा छोटी मोटी चीजें हाथ से ही निपाटाते थे। सब्जी में पड़ने वाले मशाले के लिए शील और लोढ़ा हुआ करता था।
एक दिन जीम में जाना हुआ यह देखने कि लोग भागते हैं। मेहनत करते हैं। ताकि शरीर पर चढ़ी चरबी को झारा जा सके। क्या देखा कि लोग टेडमिल पर भाग रहे हैं। पसीने से लथपथ। 5 किलो मीटर, 8 किलो मीटर बस भागे जा रहे हैं। मगर कहीं पहंुचते नहीं। बस भाग रहे हैं। कई बार लगता है आज की जिंदगी में हम कई बार बस भाग रहे होते हैं। मगर जाते कहीं नहीं। बस एक ही जगह पर दौड़ते रहते हैं। उसी तरह साइकिल चलाते लोग दिखे। कुएं से पानी खींचते दिखे। तकरीबन गांव की वो तमाम महिलाएं याद आईं जो हाथ से घर का काम निपटाया करती थीं। लगभग उसी कन्सेप्ट पर जीमालय में मशीनें मिलीं।
काश हम आज भी भागमभाग भरी जिंदगी में भी कुछ समय घर के कामों में हाथ बटाएं और मशीन पर कम आश्रित हों तो चर्बी तो यूं ही रफ्फू चक्कर हो जाएगी। साइकिल तो चलाना जैसे महानगर में पिछले जमाने की बात हो गई। बच्चे भी पास में भी जाना हो तो साइकिल की बजाए स्कूटी से जाना पसंद करते हैं। ऐसे में एक 13 14 साल का लड़का भी मिला जो दौड़ लगाते मिला। काश कि उसके मां-बाप उसे आउट डोर गेम खेलने को प्रेरित करते। साइकिल चलाने को कहते तो जीमालय की शरण में न जाना पड़ता।

Friday, November 1, 2013

स्थानांतरित लोग


सरकारी स्तर पर नहीं बल्कि वो उसकी मर्जी से इह लोग से उस लोक के लिए स्थानांतरित होते हैं। इसमें आपकी मर्जी का ख़्याल नहीं रखा जाता। न ही आपसे पूछा जाता है कि कब माईग्रेट होना चाहते हैं। आपकी सर्विस बुक भी उसी के पास है। वो आपके कर्र्मां का मूल्यांकन, परीक्षा और ग्रेडिंग करता है। जिस दिन जन्म लेते हैं उसी दिन आपकी सर्विस बुक में अवकाश प्राप्ति के दिन भी दर्ज कर दिए जाते हैं।
राजेंद्र जी गए, के पी सक्सेना जी गए जिन्होंने उसकी नजर में अवकाश हासिल किया। हम सभी को जाना ही है। यह अलग बात है कि हम किस तरह की सर्विस बुक लेकर उस लो जाते हैं।
साहित्य ही क्यों हर वो जगह हमारे जाने के बाद रिक्त तो होता ही है। लेकिन ठीक सर्विस की तरह आपके स्थान पर कोई और नियुक्त होता है। इस तरह से यह सिलसिला बतौर चलता रहता है।
जिस तरह आप सर्विस से विदा होते हैं उसी तरह आपके जाने के बाद आपकी आलमारी, दराज  आदि सब खाली कर साफ किया जाता है। आपकी चिंदींया, कतरनें, दवाइयां सब कुछ झाड़ पोंछ कर नए सिरे से सब कुछ सजाया जाता है।
तो बंधु जाने से पहले अपने दराज, आलमारी आदि को इस तरह साफ कर के जाएं कि जाने के बाद लोग यह न कहें क्या कबाड़ा किया उसने। ध्यान रहे कि आपकी याद तो आएगी लेकिन गलत कामों के लिए। कुछ दिन बाद ही सही आपका मूल्यांकन बचे हुए लोग करेंगे।

शिक्षकीय दुनिया की कहानी के पात्र

कौशलेंद्र प्रपन्न ‘‘ इक्कीस साल के बाद पहली बार किसी कार्यशाला में बैठा हूं। बहुत अच्छा लग रहा है। वरना तो जी ...