Friday, June 23, 2017




विडुआ : शेखर जोशी की रचना का बाल मंचन
प्यारे लाल हॉल में शेखर जोशी की रचना विडुआ का बाल मंचन देखकर ज़रा भी महसूस नहीं हुआ कि इसे बच्चों ने कितनी शिद्दत से जीया। इस नाटक के सह निर्देशक श्री गौरव वर्मा ने अपनी आवाज और निर्देशन से जीवंत बना दिया। गौरव वर्मा सचमुच पूर्वी दिल्ली नगर निगम स्कूल के हजारों शिक्षक, अधिकारियों और दोस्तों को यह संदेश देने में कामयाब रहे कि अपनी रूचि को पंख लगा सकते हैं।
विडुआ पहली बार सुनने में अर्थ स्पष्ट नहीं करता। जैसे पंचलाइट वैसे ही विडियो को विडुआ कहा गया। गांव की भाषा,बोली, पहनाने के साथ बच्चों ने इस कथानक को िंजंदा कर दिया।
मंचन के बाद दिल्ली हिन्दी अकादमी की उपाध्यक्ष सुश्री मैत्रयी पुष्पा और सचिव डॉ जीत राम भट्ट ने फूल दे कर स्वागत किया। दिल्ली अकादमी ने ग्रीष्म कालीन बाल नाट्य रंग महोत्सव का आयोजन किया जिसमें दो सौ से भी ज्यादा बच्चों ने हिस्सा लिया।

Thursday, June 22, 2017

लिंग बदलो


बचपन में,
बदल देता था
तमाम लिंग।
लड़का-लड़की,
वचन भी बदल देता था,
एक को बहुवचन में।
मास्टर जी-
सीखाते,
लिंग वचन बदलो
और झट से बदल देता था दुनिया के लिंग।
अब जब
बड़ा हो गया हूं
एक लिंग भी नहीं बदल पाता।
स्त्री लिंग-पुंलंग में-
सीखी तालीम,
सब गड़बडत्र हो गई।
िंलंग बोध-
गोया भूल सा गया हूं,
सब के सब नपुंसक लिंग नजर आते हैं।

Wednesday, June 21, 2017

टेक महिन्द्रा फाउंडेशन में योग दिवस



वैश्विक स्तर पर योग दिवस पर उल्लास और प्रसन्नता देखी गई। हजारों लाखों की संख्या में लोगों ने योग यानी आसन कर एक अच्छा संदेश दिया। टेक महिन्द्रा फाउंडेशन ,में  दिल्ली के अंतःसेवाकालीन अध्यापक शिक्षा संस्थान में भी योग गुरू राम लवण जी के निरीक्षण में योग के विभिन्न आयामों पर चर्चा हुई और सौ से ज्यादा शिक्षकों ने आसन कर बच्चों के बीच योग पहुंचाने की वजनबद्धता प्रकट की।

Tuesday, June 20, 2017

शिक्षक बिना पगार कब तक पढ़ाए

कौशलेंद्र प्रपन्न
दिल्ली व दिल्ली के बाहर विभिन्न राज्यों में प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों के शिक्षकों को नियमित वेतन नहीं मिल पाते। अब तो यह ख़बर भी नहीं बनती। यदि ख़बर बनती भी है तो वह महज अन्य ख़बरों की मंड़ी में शामिल हो जाती है। यदि दिल्ली की बात करें तो पूर्वी दिल्ली नगर निगम के प्राथमिक शिक्षकों को अमुमन हर तीन चार माह पर वेतन मिला करती हैं। यह सिलसिला पिछले तकरीबन तीन साल से बतौर बिना रूकी जारी है। गौर करें कि शिक्षक दो या तीन ही वजहों से ख़बरों में आता है। या तो वह धराना प्रदर्शन कर रहा होता है या फिर परीक्षा में परिणाम ख़राब आए हों। जब गुणवतापूर्ण शिक्षा की तहकीकात होती है और बच्चे अपने कक्षानुरूप समझ नहीं रखते तब शिक्षक की गर्दन मापी जाती है। पूरे साल शिक्षक किन हालातों में शिक्षण करता है इसकी ख़बर लेने कोई नहीं आता। जो आते भी हैं तो वे नसीहतों के गट्ठर लाद कर चले जाते हैं। रिपोर्ट में बताई जाती है कि शिक्षक ठीक से पढ़ाते नहीं हैं इसलिए परीक्षा परिणाम ख़राब हुए। क्या किसी ने यह जानने की कोशिश की कि वह शिक्षक बच्चे आधार कार्ड बनवाने और बैंक के खातों के साथ संबद्ध कराने में कितना समय बरबाद कर चुका है। क्या यह जानने की जरूरत महसूस की गई कि शिक्षक कितने और किस स्तर के बच्चों के साथ वह काम कर रहा है। हालांकि आरटीई कानून के बाद बच्चों को उम्र के अनुसार कक्षा में नामांकन देने का आदेश है। लेकिन यहां सवाल उठता है कि क्या एक कक्षा में बहुस्तरीय और बहुभाषी बच्चे हैं उनमें नए आए उम्र के अनुसार उन्हें कैसे पढ़ाया जाए इसकी तालीम व प्रशिक्षण उन्हें दिया गया। यदि ऐसा नहीं हुआ तो बच्चे कक्षा में पिछड़ेंगे। इसके लिए हमें जमीनीतौर पर शिक्षकों की दक्षता को बढ़ाने की आवश्यकता है न कि उन्हें पानी पी पीकर कोसते रहें।
इन दिनों पूर्वी दिल्ली नगर निगम तकरीबन 55,000 शिक्षक पिछले तीन माह से बिना वेतन के काम कर रहे हैं यह घटना अब उनके लिए नई नहीं है।लेकिन एक सवाल खडा हैकि कोई कितनी बार और कितने माह तक बिना वेतन के अपनी नैतिक और पेशेगत प्रतिबद्धता को बनाए रख सकता है।उन्हें भी बाल बच्चे पालने हैंहजार किस्म के खर्च हैं जिन्हें उठाने हैं आखिर वे कभी तो प्रदर्शन करेंगे। कभी तो कहीं तो आवाज उठाएंगे। गौरतलब हो कि जब भी शिक्षक सडक पर अपनी आवाज उठाकर कर उतरता हैतब यही बात गूंजती हैकि इन्हें तो पढ़ाना चाहिए। इन्हीं की वजह से बच्चे पढ़ नहीं पाते। इनकी नौकरी आधी दिन की होती हैआदि। यदि ऐसा ही हैतो क्यों न ऐसी बात करने वाले शिक्षक बन जाते हैं। उपदेश और हकीकत में इस पेशे को चुनने में काफी अंतर हैं
शिक्षक प्रशिक्षण कार्यशाला में कुछ प्राथमिक शिक्षकों से बातचीत के दौरान मालूम चला कि पिछले साल नोट बंदी का असर स्कूलों पर भी देखा गया एकबारगी बात समझ में नहीं आई। नेटबंदी का असर सकूलां पर कैसे? तब शिक्षकों ने खुलासा किया कि जिन बच्चों के मां-बाप देहाड़ी मजदूर थे वे काम न मिलने की वजह से अपने गांव लौट गए। कक्षाएं खाली होती चली गईं। दिसंबर की छुट्टियों के बाद जो बच्चे घर गए वे लौटकर नहीं आए। हमें इतना दुख हुआ कि फलां बच्चा पढ़ने में कितना अच्छा था लेकिन अब वह स्कूल में नहीं है।कहीं किसी खेत व मचान पर काम कर रहा होगा। दिसंबर तक जहां कक्षाओं में पचास बच्चे थे वही जनवरी के बाद बीस बाइस रह गए। जो बच्चे छूट गए वो शिक्षा से ही गायब हो जाएंगे। यह स्थिति सिर्फ दिल्ली की नहीं हैबल्कि देश के विभिन्न राज्यों के महानगरों व मंझोले किस्म के शहरांं के स्कूलों के हैं। शिक्षक पढ़ाना तो चाहते हैं लेकिन या तो स्कूल में बच्चे नहीं हैं या फिर हैं भी तो उन्हें स्कूल और कक्षा से बाहर कर दिया गया।

Friday, June 16, 2017

शाबाश सूर्योदय!!! यूं ही अपनी सोच को हवा पानी दो...


उसकी बातें खोलती परतें बचपन की
सूर्योदय ने कहा ‘‘अंकल! आपके पास दस रुपए हैं?’’
मैंने कहा ‘‘हां है, क्या करोगे?’’
उसने कहा ‘‘दीजिए।’’ और उसने वो दस रुपए लगकर बल्टी हाथ में लिए बच्चे को पकड़ा दिया।’’ बच्चे ने खाने की बात कर रहा था।
मैंने पूछा ‘‘ऐसा क्यों किया सूर्योदय?’’
उसने जवाब दिया ‘‘ पापा उसे पांच रुपए देते हैं। पांच रुपए क्या आता है अंकल आप ही बताओ?’’
सूर्योदय ने आगे अपने बातें जारी रखीं।
उसने पूछा ‘‘क्या मैं आपसे कुछ पूछ सकता हूं?’’
और उसने सवाल पूछने शुरू किए।
‘‘अंकल पाकिस्तान का नाम पाकिस्तान क्यां और कब पड़ा?’’
मैंने उसे इतिहास की हकीकत को आसान बनाते हुए जवाब देने की कोशिश की। फिर मैंने यह जांचने की कोशिश की कि क्या उसे मेरी बात समझ में आई। और मैंने पाया कि उसे मेरी बात समझ में आ रही हैं।
‘‘अंकल चीन ने हम पर क्यों हमला किया? नेहरू जी ने क्या जवाब दिया था?’’
फिर मैंने उसे इन ऐतिहासिक तथ्यों से रू ब रू कराने की कोशिश की।
सूर्योदय के सवाल अभी रूके नहीं थे। उसके सवाल मुझे किसी और स्तर पर सोचने की ओर धकेल रहे थे।
और इस तरह से सूर्योदय से मेरी बातचीत तकरीबन आधे घंटे चली होगी। उस चर्चा के दौरान मालूम चला कि एक दूसरी कक्षा में पढ़ने वाले बच्चे की सोच और चिंतन प्रक्रिया कितनी तेज और किस दिशा में जा रही है। उम्र से बच्चे की दुनिया को आंकने की बजाए उसकी चिंतन भूमि को ध्यान में रखना चाहिए।
शाबाश सूर्योदय यूं ही अपनी सोच को हवा पानी दो

Wednesday, June 14, 2017

रचना का विद्रोह और लेखकीय प्रतिबद्धता


कौशलेंद्र प्रपन्न
लेखक व कवि या फिर कलाकार की रचनाएं यदि प्रसिद्धी के शिखर पर बैठाती हैं तो वहीं उसे देश-निकाला तक दे देती हैं। लेखक को दर ब दर भटकने को भी मजबूर करने की ताकत उसकी रचनाएं रखती हैं। लेखक व कलाकार को  विस्थापित करने की क्षमता से भरपूर रचनाएं अपनी शक्ति के आधार पर वैश्विक पटल पर पहचानी जाती है और लेखक उसके कंधे पर चढ़कर विश्व की अन्य भाषाओं के मार्फत पाठकों तक पहुंचता है। एक ओर तस्लीमा नसरीन, सलमान रूश्दी, कल मुर्गी आदि लेखक हैं जिन्हें अपनी रचना की वजह से पराई जमीन पर जीवन बसर करने पर मजबूर हैं। कुछ को तो अपनी जिंदगी से ही हाथ धोनी पड़ गई। वहीं उर्दू की कलमकार इस्मत चुग्ताई को 1941 में लिखी कहानी की वजह से लाहौर हाई कोर्ट में मुकदमा का सामना करना पड़ा।
ये रचनाएं भी अजीब होती हैं। जब तक लेखक के जेहन में रहती हैं तब बेइंत्तेहां परेशान करती हैं कागज पर उतरने के लिए और जब लेखक उतार देता है तो वही रचनाएं खिलाफ में खड़ी हो जाती हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो रचनाएं वो ताकत रखती हैं कि वो एक बड़े पाठक वर्ग तक जुड़ सकें। अभिव्यक्ति की इस बेचैनी को लेखक,कवि,कलाकार, पत्रकार से बेहतर और कौन समझ सकता है। यही वो लोग हैं जिन्हें शब्दों की सृजना का परिणाम भी इसी भावभूमि और दुनिया में स्वीकार करने पड़ते हैं। इसे अभिव्यक्ति का खतरा उठाना के रूप में पहचाना गया है। हर लेखक,कवि, कलाकार व पत्रकार महज लिखने के लिए नहीं लिखता। बल्कि वह अपने समाज, संस्कृति, परिवेश की घटनाओं, बजबजाहटों एवं छटपटाहटों को अपनी रचनाओं में प्रकट करता है। जब लेखक अपनी रचना में वर्तमान समय की चुनौतियों को दर्ज करता है तो प्रकारांतर से एक इतिहास का अध्याय ही लिख रहा होता है। उसे यदि उसकी रचना लेखक के खिलाफ खड़ी होती है तो हो इसकी चिंता लेखक को नहीं सताती। उसे निर्भय होकर वर्तमान के टकराहटों से बचने की बजाए अभिव्यक्त करना होता है।
इतिहास गवाह है कि लेखक,कवि, कलाकार एवं पत्रकार आदि क्यां लिखते हैं? यह सवाल कई मर्तबा लेखक को परेशान करती रही है। कई लेखकों ने इसका जवाब भी देने की कोशिश की है। यदि साहित्यकारों, साहित्य के सिद्धांतकारों की मानें तो कोई भी कवि, लेखक कुछ तय लक्ष्यों एवं उद्देश्यों के महत ही लिखने के लिए विवश होता है। यश, कीर्ति, प्रसिद्धि, धन, भार्या प्रीत आदि। दूसरे शब्दों में कहें तो लेखक यश प्राप्ति, धन प्राप्ति, भार्या को रूचे आदि उद्देश्यों के लिए लिखता है। रचनाएं किसी न किसी उद्देश्य के लिए ही लिखी जाती हैं। यह काफी हद तक लेखक व कवि पर निर्भर करता है कि वह अपनी रचना से क्या अपेक्षा करता है। क्या उसे महज प्रसिद्धि की चाह है या उसे धन की भी मांग है। बाजार लेखक को धन और प्रसिद्धि दोनों ही दिलाने में सक्षम है। लेखक यदि बाजार की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए लेखन करता है तो उसे उक्त दोनां ही अपेक्षाओं की पूर्ति हो जाती है। लेकिन लेखक समाज में उसे वह स्थान नहीं मिल पाता जिसकी उम्मीद की जाती है। क्योंकि लेखक समाज जानता है कि फलां लेखक किस दबाव व मानसिकता के गिरफ्त में फलां रचना कर रहा है।
इस्मत चुग्ताई तो एक उदाहरण हैं ऐसे ही मंटो, कृष्णा सोबती, कृशन चंदर, निर्मल वर्मा, राजेंद्र यादव, उषा प्रियंवद, ममता कालिया, गीताश्री, प्रज्ञा आदि लेखिकाएं क्यों लिखती हैं और क्यों इनकी रचनाएं समय की शिला पर एक अमिट छाप छोड़ने की ताकत रखती हैं। निश्चित ही इनकी रचनाएं उनके व्यक्तित्व से आग निकल कर पाठक समाज के समक्ष एक नई छवि निर्मित करती हैं। हर लेखक/लेखिका की अपनी बनाई और रचनागत छवियां होती हैं जिससे उसे ताउम्र टकराना ही होता है। अपने समय और इतिहास से टकराने की ताकत रखने वाला रचनाकार ही लंबी दूरी तक अपनी रचना के कारण याद किया जाता है। तात्कालिक प्रसिद्धि व प्रभाव में लिखी गई रचनाएं समय के बाद अपनी चमक खो देती हैं।
कहानियां,कविताएं, उपन्यास,यात्रा संस्मरण आदि विधाओं में लिखी जाने वाली भावप्रवण अभिव्यक्तियां जब पाठकों तक पहुंचती हैं तब वह अपनी पूरी ताकत के साथ उपस्थित होती हैं। एक बार लेखक,कवि, पत्रकार की कलम से लिखी जाने के बाद रचनाएं उसके हाथ से निकल जाती हैं। उन रचनाओं पर लेखक का भी अधिकार नहीं होता। अब वह पाठक समाज की हो कर रह जाती हैं। कभी निर्मल वर्मा ने इन पंक्तियों के लेखक से कहा था कि एक बार लेखक जब कुछ लिख लेता है और वह प्रकाशित होकर पाठकों तक पहुंच जाती है उसके बाद उन रचनाओं पर लेखक से ज्यादा अधिकार पाठक वर्ग का होता है। लेखक एक रचना करने के बाद वह दूसरी रचना में तल्लीन हो जाता है। उसे लेखक के तौर जो कहना था वह कह चुका। पाठक की पूरी छूट है कि वह उसकी रचना का किस रूप मेंं, किस स्तर पर अर्थ की परतें खोल पाने में सक्षम हो पाता है।
विश्व के कई लेखक, कवि, कलाकार, पत्रकार एवं चित्रकार अपनी ही रचनाओं की ताकत के आगे झुकने पर मजबूर हुए हैं। उन्हें देश, समाज, परिवार, और घर छोड़कर विस्थापित की जिंदगी बसर करनी पड़ी है। कुछ नामां का जिक्र भर यहां किया गया है। किन्तु यह मसला इतना आसान नहीं है जितना यह देखने में आता है। क्योंकि रचनाएं ही हैं जो किसी को नोबल पुरस्कार, साहित्य आकदमी, ज्ञानपीठ आदि पुरस्कारों से सम्मानित कराती हैं तो वहीं दूसरी ओर लेखक को अपन रचनाओं की ताकत व बगावत के सामने घुटने टेकने पड़ते हैं। कोर्ट कचहरी के चक्कर भी लगाने पड़ते हैं। तो क्या लेखक इस भय से लिखना छोड़ दे। क्या लेखक विचार की अभिव्यक्ति के खतरे उठाने छोड़ दे। संभव है लेखक निर्भर होकर लेखन प्रक्रिया में जुड़ा होता है। उसे इसकी चीज की परवाह नहीं होती कि उसकी रचना उसके खिलाफ खड़ी होने वाली है या उसके साथ खड़ी होगी। लेखक कोई भी हो वह सिर्फ अपने पाठक के लिए लिखता है। भारतीय भाषाओं के लेखक,कवि, कलाकार एवं पत्रकार पाठक समाज के लिए लिखता है। उसके लेखन में वैश्विक चिंताएं होती हैं जिसका पाठक वर्ग व्यापक होता है। यह पाठक वर्ग पर निर्भर करता है वह रचना को किस रूप में अर्थ ग्रहण कर रहा है।
रचना की ताकत और रचना का विद्रोह कई बार इस स्तर पर भी निर्भर करता है कि लेखक व कवि किस भाव दशा और उद्देश्य के स्तर पर रचना रच रहा है। रचना सृजन के पीछे हर लेखक का अपना मकसद होता है। कुछ लेखक महज विवाद के लिए लिखते हैं तो कुछ लेखक बाजार की मांग के अनुसार लेखन करते हैं काफी हद तक ऐसे लेखकों की रचनाएं विवाद, पाठकीय ध्यान तो केद्रीत कर पाती हैं लेकिन आलोचकीय दिष्ट उनकी रचना के गायब होती हैं।


Tuesday, June 6, 2017

खिलाफ़ हैं आज मेरी ही कविताएं


मेरी ही कविताओं ने आज खिलाफत छेड़ दी
मेरे ही सामने खड़ी हो गईं तन कर,
सवाल करती हैं
पूछती हैं वो अनुभव किसका था
जिसमें तुमने हमें डुबोया,
पूछती हैं मेरी ही कविताएं
कि वो तर्जबा किसका था जिसे तुमने मुझमें उतारा।
मेरी ही कविताएं आज खिलाफ में खड़ी हैं-
कहती हैं वो हवाएं,
वो तंज़ करती बातें
कहां से लाए थे
कहां से लाए थे
वे एहसासात
जिसमें सिसकियां थीं,
वो तडपन थी,
वो किसका था।
मेरी ही कविताएं आज खड़ी हैं-
मेरे ही बरक्स
सवाल करती हैं
कि वो घटनाएं किसकी थीं
जिसे तुमने अपने नाम कर लिया,
वो बातें किसकी थीं
जिसमें हमें डूबोया,
बता तो ज़रा
वो तोहमत किसकी थी
जो हम पर मढ़ा।
मेरी ही खिलाफ़त पर उतारू
कविताएं
साक्ष्य मांगती हैं
कि वो किनकी हैं
जो लिखे हैं
ख़ाली पन्नों पर
जिनपर आज सवाल उठते हैं।

Friday, May 19, 2017

आईटी सेक्टर कर्मियों की छंटनी शुरू


सूचना तकनीक सेवा में इन दिनों अच्छे दिन नहीं चल रहे हैं। आईटी कंपनियों में इन दिनों बड़ी तेजी से उच्च पदों पर कर्मियों को बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है। एलिक्जर, एचसीएल,टेक महिन्द्रा आदि ने अपने कर्मियों की छंटनी शुरू कर दी है। कुछ कंपनियों में वीपी स्तर के कर्मियों को एचआर बुलाकर विकल्प दे रही हैं कि छह माह या साल भर की सैलरी लेकर कल से आना बंद कर दें। अनुमान लगाना कठिन नहीं है कि जिन्हें इस विकल्प से गुजरना पड़ रहा होगा उनपर क्या गुजर रही होगी। हालांकि अभी जिन लोगों को यह विकल्प दिया गया है उनकी सैलरी करोड़ रुपए तो हैं ही। यह एक कौशल विकास भारत की दूसरी तस्वीर है। एक ओर स्कील इंडिया पर करोड़ों रुपए खर्च किए जा रहे हैं वहीं उसी देश में जॉब्स जा रही हैं। लोग बेरोजगार भी हो रहे हैं। आईटी सेक्टर के जानकार ताकीद कर रहे हैं कि यह एक वैश्विक मंदी का दौर है। सन् 2008-10 के दरमियान आई मंदी की पुनरावृत्ति है। विशेषज्ञों को मानना है कि आने वाले तीन साल तक हर साल दस लाख से भी ज्यादा नौकरियां कम से कम आईटी सेक्टर में खत्म होने वाली हैं। मैक्कींसे की जनवरी में आई रिपोर्ट की मानें तो भारत में आईटी सेक्टर ने 3.7 मिलियन जॉब्स प्रदान की हैं। लेकिन इस रिपोर्ट में यह भी हिदायत दी गई है कि आने वाले दो तीन सालों में इनमें से आधी अप्रासंगिक हो जाएंगी। यानी आईटी के जिस क्षेत्र में आज कर्मचारी काम कर रहे हैं कल उन्हें नई तकनीक का सामना करना होगा जिसके लिए वे तैयार नहीं होंगे। इस बाबत उन लोगों की नौकरियों पर तलवार लटकी हुई है।

Thursday, May 11, 2017

दक्षिणभर बैठी बेचूआ की माई-

ताक रही है लगातार
बरस बीते
बरसात गई,
घुरना जो गया
लौटा नहीं।
सुना है-
उसकी एक सुन्नर पतोहू है,
सेवा टहल करती,
उमीर गुजर रही है।

Wednesday, May 10, 2017

सरकारी स्कूलों में छुट्टियां


सरकारी स्कूल अब तकरीबन सवा महिने के बाद खुलेंगी। शिक्षकों को भी इन अवकाश में घर जाने, घुमने फिरने का मौका मिलेगा और बच्चों को भी। बच्चे अपनी अपनी नानी, दादी के गांव जाएंगे। कुछ समय के लिए शहराती बरतावों से दूर गांव की हवा खाकर आएंगे। जिनके पास उड़ने के पैसे हैं वे देश विदेश घूम कर आएंगे। और जो यहीं रह जाएंगे वो अपने अपने घरों में रहेंगे। कुढ़ेंगे और कोसेंगे।
शिक्षकों के पास इन छृट्टियों का सही इस्तमाल की कोई येजना तय नहीं होती। अपनी व्यावसायिक कौशल विकास, दक्षता आदि की योजना न होने के कारण वे वहीं के वहीं रह जाते हैं। जबकि सरकारी स्तर पर इन छृट्टियों में कुछ कार्यशालाओं को आयोजन होता है जिसमें वे बेमन और दबाव में आया करते हैं। जबकि उनकी खुद की इच्छा होनी चाहिए ताकि वे अपना प्रोफेशनल विकास कर सकें।
शिक्षक वर्ग में यह सवा महिने पूरी तरह से छृट्टियों के तौर पर आते हैं। इनका इस्तमाल वे केवल घर-देहात घूमने और घर ठीक कराने में लगाते हैं। जबकि होना यह भी चाहिए कि वे अपने इस समय का सदुपयोग अपनी दक्षता और व्यावसायिक विकास के लिए भी करें। अमूमन देखा तो यही जाता है कि वे घरेलू कामों और निजी व्यस्तता में अपने प्रोफेशन को भूल जाते हैं।

सिमट गई


सिमट गई कहन
अपनी खुशी भी बयां करते हैं
वाट्सएप के मार्फत,
ग़म ग़र हो कोई तो भी,
फेंक आते हैं
किसी सोशल प्लेटफॉम पर।
बजबजाते रहते हैं,
कुढते भी रहते हैं ख्ुदी में
न किसी से कुछ कहते हैं
न सुनते हैं किसी की,
बस मुंह फुलाए घूमते हैं।
ये कैसा दौर है बाबुजी
अकेले में चाहते हैं
किसी दूर ख़ाब को जीने की
चाह पूरी जीते हैं
मगर आकाशीय मंचों
रिश्तों में तलाशते हैं
कुछ पल सकून के,
कुछ चाहते जो रहती हैं दूर।
ये ऐसा ही दौर आया है बाबुजी,
न पास रहते जी पाते
न ही दूर ही रह सकते,
तो फिर कहीं दूर निकल जाते हैं,
एक सकून की तलाश में।
कहीं क्या जाएं,
कहते हैं
गरमी है
आज ज्यादा घर में ही रहें
सरदी है काफी
कहां जाएं
किसी से मिलने।

Friday, May 5, 2017

बर्फ का पिघलना


सिर्फ पहाड़ां पर ही बर्फ नहीं पिघलते। बल्कि रिश्तां के दरमियान भी बर्फ मेल्ट होते हैं। कोई भी रिश्ता स्थाई भाव में नहीं रह सकता। स्थाई जब कुछ है ही नहीं तो रिश्ते कैसे एकल, एकांत में पनप सकते हैं। रिश्तों को पनपने के लिए समाज और व्यक्ति की दरकार होती है।
देश और समाज के बीच भी एक आइस बर्क बन जाता है जिसका इल्म हमें नहीं होता। यह धीरे धीरे मजबूत होता है। इसकी गहराई का अनुमान भी कई बार नहीं होता। और हमारे रिश्तों का जहाज इससे टकरा जाता है।
आप लाख तर्जेबेकार कैप्टन हों। आप के पास हजारों घंटों का अनुभव हो। लेकिन एक चूक, एक ग़लती जहाज को डूबोने के लिए काफी होती है। रिश्तें भी तो ऐसे ही होते हैं। यदि हमने रिश्ते की गहराई और जड़ को ठीक से नहीं समझा तो वह रिश्ता आइसबर्क से टकरा कर डूब जाता है।
पाकिस्तान और भारत का रिश्ता ही लीजिए तकरीबन सत्तर साल से यह आइस एक पहाड़ बना है। इसे एक दिन में न तो तोड़ सकते हैं और न ही पिघला ही सकते हैं। दरपेश बात यह है कि क्या हमारी कोशिश पूरी है कि हम रिश्ते को ठीक करना चाहते हैं। ग़लतियां किसी भी रही उसका ख़ामियाज़ा तो बड़े स्तर पर समाज और वहां-यहां के नागरिकों को भुगतना पड़ रहा है।
इतिहास में अटकी हुई चेतना न तो समाज, न व्यक्ति और न ही देश हित में होती है। हमें अतीत में अटकी हुई चेतना से आगे निकला ही पड़ता है। इतिहास हमें इसकी समझ देता है कि अतीत की ग़लतियों को ध्यान में रखते हुए कैसे बेहतर आज का निर्माण कर सकते हैं।

Wednesday, April 26, 2017

पाठ्यपुस्तकों की राजनीति और कथ्य


कौशलेंद्र प्रपन्न
अकादमिक हलकों में कोई शोर नहीं। सहज स्वीकार्य। कोई विरोध नहीं, कोई विकल्प नहीं। दिल्ली विश्वविद्यालय के बीए के पाठ्यक्रम में अंग्रेजी के लेखक चेतन भगत का उपन्यास ‘फाइब प्वांइट समवन’ शामिल करने की घोषण हुई है। यह घोषणा कई संदेश प्रेषित करते हैं। पहला यही कि अकादमिक घटकों में इस पहलकदमी को लेकर किसी प्रकार के प्रतिवाद नहीं उठ रहे हैं। दूसरा केएम पणिक्कर, टैगोर की रचना को स्थनांतरित एक ऐसे उपन्यास से किया जा रहा है जिसकी स्वीकार्यता एक गंभीर अकादमिक कामां में नहीं गिनी जाती। सवाल यह उठना चाहिए कि क्या चेतन भगत की यह रचना टैगोर और पणिक्कर की रचना को विस्थापित करने की रचनात्मक ताकत रखती है? क्या इस निर्णय से पूर्व विश्वविद्यालय की अकादमिक समिति की राय ली गई? यदि ली गई तो उनमें क्या सहमति बनी इसे भी समझने की आवश्यकता है। अमूमन पाठ्यपुस्तकें और पाठ्यक्रम कई बार ख़ास पार्टी व राजनीतिक दलों की वैचारिक प्रचार, प्रसार के साधन के तौर पर इस्तमाल किए जाते रहे हैं। इसके इतिहास में ज्यादा पीछे नहीं जाते हैं। महज पंद्रह साल पहले 2002 में भी ऐसी ही एक अकादमिक घटना घटी थी। सीबीएससी ने प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी मंत्र को हटा कर मृदुला सिंन्हा की कहानी ज्यो मेंहदी के रंग को पाठ्यपुस्तकों में शामिल किया था। तब भी विवाद उठे थे कि क्या केंद्रीय शिक्षा सलाहकार समिति केब की राय ली गई? क्या आकदमिक बहसों और विमर्श का इस बदलाव में शामिल किया गया? उस वक्त विभिन्न शिक्षाविद्ों, साहित्यकारों ने इस कदम की आलोचना की थी। नागर समाज ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की कि क्या यह निर्णय अकादमिक विमर्शों के मद्दे नजर ली गई या सरकार की निहित स्वार्थ के लिए कदम उठाए गए। न्यायालय का निर्णय दिया कि यह गलत है और तकरीबन एक साल बाद दुबारा गलती को सुधारा गया।
प्रो. अनिल सद्गोपाल ने इस पूरी घटना पर विस्तार से लिखा और बोला भी। उन्होंने लिखा कि सन् 1990 के आस पास जब विश्वविद्यालयों को निजी हाथों में सौंपे जाने की चालें चलीं जा रही थीं। विश्व बैंक को भारत के शैक्षिक संस्थानों में प्रवेश के लिए द्वार खोले जा रहे थे तब शिक्षाविद्ों, साहित्यकारों, प्राध्यापकों की ओर से कोई भी विरोध दर्ज नहीं किए गए। तमाम विश्वविद्यालयों के प्राध्यापक मौन थे। हमें उसका ख़ामियाजा आज भुगतना पड़ रहा है। अनिल सद्गोपाल जिस चुप्पी की ओर इशारा कर रहे हैं वह कहीं न कहीं मौन स्वीकारोक्ति नहीं तो क्या थी। क्या वह चुप्प होकर सरकारी हस्तक्षेप को बिना विरोध किए कबूल करना नहीं था। साहित्यिकारों, शिक्षाविद्ों और नागर समाज की चुप्पी कितनी ख़तरनाक हो सकती है इसका अनुमान लगाया जा सकता है। समय समय पर शैक्षिक संस्थानों और पाठ्यपुस्तकों में प्रवेश की कोशिश होती रही है। राघवेंद्र प्रपन्न अपनी किताब ‘ज्ञान का शिक्षण शास्त्र’ में लिखते हैं कि 2002 में  इतिहास और समाज विज्ञान की स्कूली पाठ्यपुस्तकों से विमर्श के दरकार को हाशिए पर डाला गया। बिना किसी अकादमिक विमर्श के स्कूली पाठ्यपुस्तकों से अमूक अंश, पैराग्राफ, पाठ नहीं पढ़ाने के फरमान जारी कर दिए गए। शिक्षकों को आदेश दे दिया गया कि वे कल से कक्षा में बच्चों से उस खास गद्यांश को न तो पढ़ाएंगे और न ही उस पर किसी भी प्रकार की चर्चा करेंगे। आखिर यह बताने की भी आश्यकता नहीं महसूस की गई कि क्यों उस अंश को पढ़ाने से रोका जा रहा है। शिक्षा को बेहद सहज और सरल मानकर उसकी प्रकृति के साथ छेड़छाड़ होती रही हैं। इसमें राजनीति दलों ख़ासकर सत्तारूढ़ दलों ने खुल कर ऐसे खेल खेले हैं। इसमें राज्य स्तर पर भी पाठ्यपुस्तकों और पाठ्यक्रमों के साथ फेरबदल की गई हैं। राजस्थान, बंगाल, बिहार आदि की पाठ्यपुस्तकों में बड़ी ही साफगोई से यह खेल हुआ है। बंगाल के स्कूली पाठ्यपुस्तकों में शंगूर के आंदोलन को ममता बैनर्जी के नाम कर दिया गया। वहीं राजस्थान की किताबों में भी तत्कालीन मुख्यमंत्रियों के जीवन चरित को शामिल किया गया। पाठ्यपुस्तकें भी समाज का जीता जागता आईना हुआ करती हैं और इसमें हम समाज के हलचलों, छटपटाहटों को देख और पढ़ सकते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या इसके पीछे अकादमिक विमर्श की आवश्यकता महसूस की गई। क्या शामिल करने से पहले इसपर शैक्षिक चर्चाएं हुईं?
शिक्षा और साहित्य को जब तब अपने निजी स्वार्थ पूर्ति के लिए इस्तमाल किए जाने की घटनाएं होती रही हैं। कमलानंद झा अपनी पुस्तक ‘पाठ्यपुस्तकों की राजनीति’ में बड़ी शिद्दत से यह सवाल उठाते हैं कि किस प्रकार विभिन्न राजनीतिक दलों ने समय समय पर सत्ता में आने के बाद अपनी वैचारिक प्रतिबद्धताओं को आगे बढ़ाने के लिए स्कूली पाठ्यपुस्तकों का गलत इस्तमाल किया। सरकार जिस भी राजनीति दल की सत्ता में आई उन्होंने स्कूली पाठ्यपुस्तकों के साथ छेड़छाड़ करन में पीछे नहीं रहे। माना जाता है कि स्कूली पाठ्यपुस्तकें और पाठ्यचर्याएं बड़ी ही आसानी से अपने हित में प्रयोग की जा सकती हैं। एनसीइआरटी एक स्वायत्त विमर्श संस्था है जो सरकार को स्कूली शिक्षा के बाबत राय देती है। यही इसकी भूमिका है। सरकार इसकी बात मानें या न माने इसपर संस्था की कोई पकड़ नहीं है। इतिहास गवाह है कि हर सरकार सत्ता में आते ही एनसीइआरटी और मानव संसाधन मंत्रालय का अपने हित साधन के लिए प्रयोग करना शुरू करती है। सरकारें अपनी वैचारिक तंत्र को मजबूत करने वाले लोगों को इन संस्थानों पर प्रमुख पदों पर नियुक्त किया करती है ताकि मन चाही रद्दोबदल की जा सके। आज की तारीख में प्रमुख शैक्षिक संस्थानां पर वर्तमान सरकार के मतों में हां में हां मिलाने वालों को ऐसी संस्थाएं सौंपी गई हैं। नेशनल बुक टस्ट, भारत, इतिहास, संस्कृति, भाषा आदि के अगुए संस्थानों में भी वर्तमान सरकार के अपने विचारधारा को पोषित करने वाले लोग हैं। वे वही करते हैं जो सरकार कराना चाहती है। सबसे ज्यादा बदलाव एनसीइआरटी ने 2000 के आस पास स्कूली पाठ्यपुस्तकों और पाठ्यचर्याओं में की। इस पाठ्यर्चा 2000 पर आधारित पुस्तकों पर भी भगवाकरण का आरोप लगा। यदि ठहर कर इन किताबों को पाठ्यचर्याओं का अनुशीलन करें तो यह आरोप बेबुनियाद नहीं हैं।
शिक्षा और शिक्षण की दिशा और दशा तय हो तो उससे देश को भी रास्ते मिलते हैं। देश की युवा पीढ़ी को शिक्षा क्या राह व रोशनी दिखाना चाहती है यह काफी कुछ तत्कालीन सरकार की दृष्टि और मान्यताओं पर निर्भर करती है। प्रत्येक सरकार की अपनी प्रतिबद्धताएं रही हैं। जब प्रो अनिल सद्गोपाल 1990 की चर्चा करते हैं तब हमें यह समझने की आवश्यकता है कि तब की सरकार की नजर में क्या करना प्राथमिकता की सूची में पहला था। वह सरकार उस वक्त सरकारी शिक्षण संस्थानों को चलाने  अपना हाथ पीछे खींचना चाह रही थी। वहीं दूसरी ओर वैश्विक स्तर पर बाजार का आर्थिकी दबाव सरकार पर थी। सरकार ने विश्व बैंक और बाजार को सरकारी शैक्षिक संस्थानों के संचालन का काम सौंप दिया। इसे 2000 के आस पास बिड़ला अंबान समिति की रिपोर्ट में भी देख सकते हैं जिन्होंने सरकारी शैक्षिक संस्थानों को निजी हाथों में सौंपे जाने की सिफारिश की थी। सरकार ने इस समिति के सुझावों को माना भी। जब भी बाजार और सरकार एक मंच पर आती हैं तब सबसे पहला शिकार शिक्षा होती है। क्योंकि शिक्षा एक साफ्ट टारगेटेड रही है। विरोध करने वाले अकादमिक विमर्शकार, शिक्षाविद्ों को अपनी नौकरी बचानी ज्यादा पसंद है बजाए कि शिक्षा को बचाई जाए।
हालांकि प्रो अनिल सद्गोपाल जैसे शिक्षाविद्ों और जनांनदोलन से जुड़े शिक्षविद् कम हैं जो शिक्षा की प्रकृति और संस्थानों को बचाने के लिए आगे आएं। अमूमन सरकारी फरमानों को मान और स्वीकारने वालों की संख्या ज्यादा है इसलिए शिक्षा के साथ कोई भी कभी भी मनचाही पहलकदमियां थोप देता है। इसका विरोध,्र प्रतिवाद नागर समाज करना भूल जाती है। कुछेक सुगबुगाहटें हुई हैं जिनकी वजह से 2002 में शैक्षिक मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा और उसका सकरात्मक परिणाम भी मिले। उसी तरह से शिक्षा के अधिकार अधिनियम 2009 में 6 से 14 आयु वर्ग के बच्चों की शिक्षा की बात तो की गई किन्तु बड़ी चतुराई से 0 से 6 आयु वर्ग के बच्चों के अधिकार पर सरकार मौन हो गई। इस सरकारी चुप्पी पर देश भर में आवाजें उठीं। बड़ी तेजी से नागर समाज वकालत कर रही है कि आरटीई में 0 से 6 आयु वर्ग के बच्चों को शामिल किया जाए। संभावना बनती है कि नागर समाज के इस व्यापक वकालत की वजह से संशोधन हो पाए। शिक्षा वास्तव में जीवन की बेहतरी और समाज सापेक्ष रही है।इसके गठन में वर्तमान चुनौतियों और बाजार के दबाव भी रहे हैं। किन्तु हमें यह समझने की आवश्यकता हैकि हम अपनी शैक्षिक संस्थानों को निजी हित साधकों के माध्यम बनाना चाहते हैं या समाज के सर्वांगीण विकास का औजार।
चेतन भगत के उपन्यास फाइब प्वाइंट समवन, टू स्टेट, वन नाइट एट कॉल सेंटर आदि कोई न तो अंग्रेजी साहित्ययकारों ने गंभीरता से लिया है और न अंग्रेजी साहित्य के पाठकों ने ही इसकी प्रशंसा की है। इतना श्रेय जरूर है कि चेतन भगत के उपन्यासों के पाठक कॉलेज के छात्र हैं। छात्रों ने रूचि लेकर पढ़े। इसकी भाषा, वाक्य संरचनाएं बेहद सहज और सरल हैं। लेकिन समग्रता में देखें तो इन उपन्यासों के कथ्य बेहद सतही और उथले हैं। कॅालेज के प्रांगण को प्रमुखता से चित्रित किया है इसलिए भी छात्रों को ज्यादा पसंद आईं। अभी चेतन भगत की रचनाओं की समीक्षा और समालोचना होना बाकी है। लेकिन एक बात तो स्पष्ट है कि विश्वविद्याल के अकादमिक समिति को पुनर्विचार करना होगा कि हमें भविष्य में किस प्रकार के साहित्य को प्रश्रय दे रहे हैं और उसके पीछे क्या सम्यक तर्क और विमर्श शामिल किए गए।



Tuesday, April 25, 2017

सतत विकास लक्ष्य चार और नागरिक सहभागिता


सभी बच्चां को गुणवत्तापूर्ण और समान शिक्षा मुहैया कराने की घोषणा 1990 और 2000 में की थी। 1990 जिसे सभी के लिए शिक्षा के नाम से जानते हैं और 2000 में सहस्राब्दि लक्ष्य में तय किया था कि हम सभी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण भेदभाव रहित बुनियादी शिक्षा प्रदान करेंगे। इसके लिए हमने 2015 का लक्ष्य रखा था। लेकिन यह तय समय सीमा गुजरे भी दो साल बीत चुके हैं। ध्यान हो कि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए हमने 2016 में सतत् विकास लक्ष्य की शुरुआत की। ग्लोबल कंपेन फार एजूकेशन, जीसीइ और नागर समाज ने अब इस लक्ष्य का हासिल करने के लिए शिक्षा 2030 तक की समय सीमा तय की है। इस एसडीजी में कई लक्ष्य बनाए गए हैं किन्तु जो शिक्षा से संबंधित है उसमें लक्ष्य 3 और 4 ख़ास हैं। लक्ष्य चार में घोषित किया गया है कि हम अपने बच्चों को समावेशी और न्यायसंगत गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करेंगे और सभी के लिए आजीवन सीखने के अवसरों को बढ़ावा देंगे। इन लक्ष्यों की रोशनी में हमें हमारी क्षमता, गति और नीतियों की जांच करनी होगी। बल्कि कहना चाहिए कि हमें वर्तमान शैक्षिक हकीकतों को भी नजरअंदाज नहीं करना होगा। वर्तमान शैक्षिक चुनौतियों के मद्देनजर अपनी रणनीति और योजनाओं में बदलाव करने होंगे तब संभव हैइस बार हम अपने लक्ष्य को हासिल कर पाएंगे।

Friday, April 21, 2017

फास्ट एवं फ्यूरिअस 8 और हिन्दुस्तानी संवाद


ये छमिया, बीडू, और ऐसे ही संवाद जब अंग्रेजी फिल्म के हिन्दी रूपांतरण में सुनने को मिले तो आपकी पहली प्रतिक्रिया हो होगी? जब आप गोरों और अश्वेत पात्रों को मुंबईया हिन्दी बोलते हुए सुन कैसे एहसास होगा? हां यही तो हुआ है फास्ट एवं फ्यूरिअस 8 फिल्म में। इस कहानी पात्रों के संवाद हिन्दी में तर्जमा करने वाले ने मुंबईया बोलचाल को इस फिल्म में हल्केपन और सरलीकरण के तर्क पर किया गया है। पात्रों के संवाद कई बार महसूस होता है कि वे फिल्म के दृश्य को हंसी और हल्का करने के लिए किया गया है। लेकिन बात काबीले गौर है कि संवादों के अनुवाद में उर्दू-हिन्दी और मुंबईया बोलचाल को ध्यान में रखा गया है। उर्दू के इस्तमाल कई बार इतने साफ तलफ्फूज़ के साथ किए गए हैं कि इन फिल्म के पात्रों की जबान से ए किस्म का हास्य ही पैदा करता है। माना जाता है कि पात्रों के संवाद, परिवेश, वेशभूषा काल खंड़ कहानी को रोचक और प्रासंगिक बनाने में मददगार साबित होते हैं।
नाटक,नुक्कड़, मंचीय कला में ख़ासकर संवाद अदायगी और कहानी कहन की ख़ास शैली ही कहानी को रोचक बनाती है। पात्रों को संवाद, परिवेशीय प्रोपर्टी कहानी को प्रभावकारी बनाती है। गौरतलब है कि पहले भी हिन्दी साहित्य में प्रसिद्ध कहानियों, नाटकों के हिन्दी अनुवाद किए गए हैं। जयशंकर प्रसाद, भारतेंदु हश्चिंद आदि ने जब विश्व के प्रसिद्ध नाटकों का हिन्दी अनुवाद किया तो उन्होंने न केवल कथ्य को बचाकर रखा बल्कि उस नाटक की बुनियादी पहचान बरकरार रखी। उन्होंने नाटकों के संवाद, पात्रों के नाम, गीत-संगीत भारतीय कर दिए। ताकि वे नाटक भारतीय दर्शकों से जुड़ पाए। इस फिल्म को देखते हुए महसूस हो सकता है कि काशा इसके संवाद और अनुवाद पर थोड़ा और काम हुआ होता।

Tuesday, April 18, 2017

अवसाद, उदासी और शिक्षा


अवसाद, उदासी, अकेलापन, दुःिंचंता, निराशा आदि जिस नाम से भी इस अवस्था को पुकारें किन्तु यह मानसिक स्थिति बहुत तेजी से युवाओं और प्रौढ़ों को अपने गिरफ्त में ले रही है। वैश्विक स्तर पर नजर दौड़ाएं तो स्थिति और भी भयावह दिखाई देती है। हाल ही में गुरूग्राम के एक बहुराष्टीय कंपनी में कार्यरत महिला कर्मी का कूद कर जान दे देना अवसाद की मनोदशा का महज एक तस्वीर भर नहीं है। बल्कि इससे पहले भी अवसाद की चपेट में आकर कई व्यक्यिं ने जिंदगी की डोर बीच में भी छोड़ दी है। मनोविज्ञान की भाषा में इसे अवसाद कहें या फिर आमजन की भाषा में अकेलेपन व उदासी का सबब किन्तु व्यापक स्तर पर निराशा एवं घोर उदासी जान ले लेती है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है यह हम बचपन से पढ़ते और रटते बड़े हुए हैं। फिर क्या वजह है कि बड़े होने के बाद व्यक्ति इतना एकांगी, अकेला और उदासी में डूब जाता है कि उससे समाज, परिवार दूर चला जाता है और वो हमसे काफी दूर। यह सवाल एक नागर समाज के सामने बड़ी चिंता के तौर पर उभरी है। यही कारण है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वर्ष 2017 को अवसाद, उदासी से मुक्ति के तौर पर सात अप्रैल को घोषित किया है। वैश्विक स्तर पर लाखों की संख्या में युवा एवं प्रौढ़ महिला एवं पुरुष अवसाद के घेरे में हैं। इन्हें अपनी भावनाओं, संवेदनाओं को प्रकट करने का मौका नहीं मिलता। इस तरह के लोग भीड़ में होते हुए भी निपट अकेला महसूस करते हैं। घर परिवार में होकर भी उदास और निराशा में खुद को पाते हैं। शिक्षा इस तरह के लोगों को कितनी मदद करती है इस पर विचार करने की आवश्यकता है।
शिक्षा यदि जिंदगी की तालीम दे पाती तो संभव है कोई इस तरह अपनी जिंदगी से मायूस होकर उम्मीद की डोर नहीं छोड़ सकता। वास्तव में वर्तमान शिक्षा कुछ दक्षताएं ही पैदा कर पाती हैं जिसके बदौलत व्यक्ति अपनी रोजीरोटी कमा पाता है। तनाव व एकाकीपन एवं आम जिंदगी के दबाव को कैसे सहा और समायोजन स्थापित की जाए इसकी समझ शिक्षा नहीं दे पाती। यूं तो शिक्षा दर्शन और दाशर्निकों ने जीवन और शिक्षा को एक साथ लेकर चलने और समझ की वकालत की है। किन्तु स्थितियां विपरीत हैं। हमारी अपेक्षाओं पर बाजार और प्रतियोगिताएं सवार हैं जो तय करती हैं कि हमारी जिंदगी की प्राथमिकताएं क्या होंगी। हमारे जीवन में आनंद किस प्रकार के होंगे। बाजार और वैश्विक प्रतियोगिताओं के दबाव में हमारे अपने जीवन के लक्ष्य भी नए तय किए हैं। इस चुने हुए लक्ष्यों में तनाव, एकाकीपन स्वभाविक है। जब तक हम परिवार और समाज से कटेंगे नहीं तब तक तय लक्ष्य हासिल नहीं कर पाएंगे। बहुराष्टीय कंपनियां यदि आपको लाखों का पैकेज देती हैं तो आपसे आपके निजी समय चुरा लेती हैं। कब आप खाना खाएंगे कब आप घूमने जाएंगे यह सब बाजार और कंपनी तय करती है। बाजार निजी स्वतंत्रता और निजता के लिए केई स्थान नहीं देती। बल्कि उसे समय और टारगेट के अनुसार काम मिलना चाहिए। यही वो दबाव है जिसमें आज हमारी पीढ़ी जी रही है। शिक्षा दरअसल न केवल दक्षताओं का विकास करती है बल्कि संवेदनाओं को परिष्कृत भी करने का काम करती है। लेकिन आज शिक्षा में संवेदनाओं और भावनाओं का कोई स्थान नहीं है। बाजार शिक्षा के मापदंड़ कर रही है। तय कर रही है कि आज शिक्षा किस दिशा में और किस तरह की दी जानी चाहिए।
शिक्षा का मकसद बच्चे के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करना रहा है। इस विकास में तकनीक, संवेदना, सहभागिता आदि भी शामिल है। शिक्षा और हमारी जिंदगी से जो चीज तेजी से गायब हो रही है वह है संवेदना और सहभागिता। हम जिस कदर असहिष्णु हुए हैं, जिस तरह साझा संस्कृति से दूर हुए हैं यह बहुत साफ तौर पर देखा और महसूस किया जा सकता है। हमें नागर समाज के जीवन में गहरे पैठ चुकी उदासी और एकाकीपन के समाधान के लिए गंभीरता से विमर्श करना होगा। क्योंकि अवसाद व उदासी जिस तेजी से महानगर, शहर और कस्बों में फैल रही है यह शुभ संकेत नहीं है। महानगरों में तो एकाकीपन के मायने समझ आते हैं क्योंकि व्यक्ति की जिंदगी की शुरुआत सुबह दफ्तर और शाम दफ्तर से लौटने में ही खत्म हो जाती है। इतना समय और क्षमता भी नहीं बची रहती कि अपने दोस्तों या परिवार के सदस्यों से मिल सकें। यह प्रकारांतर से हमें अकेलेपन की ओर धकेलती है। हम अपने खालीपन को बाजारीय सामानों और अट्टहासों और खोखली हंसी से भरने की कोशिश करते हैं।
मानवीय संवेदनाओं और स्पर्श जिस शिद्दत से हमें आनंद और अपनेपन के एहसास से भर देती है वह सोशल मीडिया पर उपलब्ध लाइक्स और कमेंट्स से कहीं ज्यादा प्रभावी और लाभकरी होता है। किन्तु अफ्सोसनाक हकीकत यही है कि हमने अपनी निजता और मानवीय संवेदनाओं को बाजार के हवाले कर दिया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने यूं ही वर्ष 2017 को अवसाद व उदासी से निराकरण के तौर पर घोषित किया है। आज की तारीख में यदि किसी व्यक्ति व समाज को किसी चीज की आवश्यकता है तो वह है सुख, शांति और अपनों का साथ। बड़ी साफगोई से बाजार इन्हीं चीजों में सेंध लगाती है बल्कि लगा चुकी है।
शिक्षा के लक्ष्यों को मानवीय जीवन से जोड़ने वाले घटकों को बिना ठीक किए यह संभव नहीं है। अध्यापक वह प्रमुख घटक है जो कक्षा में बच्चों के साथ अधिकांश समय रहता है। बच्चों की दुनिया को सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाला व्यक्ति कोई होता है तो वह शिक्षक है। यदि वह जीवन और समाज के प्रति स्वस्थ दृष्टिकोण पैदा कर सके तो बच्चों के लिए सबसे बड़ी घटना हो सकती है। यहां एक दिक्कत यह है कि कई बार शिक्षण अपने पूर्वग्रहों से बाहर नहीं आ पाता और वही दृष्टिकोण प्रकारांतर से बच्चों में अनजाने ही हस्तांतरित हो जाते हैं।

Monday, April 17, 2017

किस खेत से....


किस खेत से लाई थी गेहूं,
किस पेड़ से डाली
बोलो मेरी चिड़िया रानी
अपनी बातें मुझ से बोलो।
किस बाग से लाई थी लकड़ी
किस नद से पानी,
तिनक तिनका कहां से लाई
अपनी कहो कहानी मैना।
तुमने बुना था घर वो अपना
जहां न धर सकते थे दाना,
तुमने बनाया घर वो अपना,
जोड़ जोड़कर गेहूं का दाना।
दिया जहां पर अंड़ा तुमने
जगह भी वो कितना तंग था,
सेने को सहा घाम दुपहरी तुमने
तिनका ला ला सांझ किया था।
एक दिवस देखा मैंने क्या,
चांच निकाल झांका था नभ में
वो तेरा ही बच्चा था क्या,
मिच मिच करती आंखों में।
सपने संजोए आई थी
जग के इस मेले में
वो सुबह भारी कैसी थी
उड़ गए वे खुले वितान में।
खोई खोई ताक रही थी,
जिसमें पले थे वो दो बच्चे,
कहां गए किस ओर उड़ चले,
क्या वापस वो आ पाएंगे।
आज उदास बैठी थी चिड़िया,
सूझ नहीं रहा था कुछ भी
किस खेत से लाई थी गेहूं
किस पेड़ से डाली
बना उन्हें पाला था।

Friday, April 14, 2017

सपनों से भी बाहर


उसने करीने से अपना सामान बटोरा और सिस्टम से लॉग आउट हो गया। आस पास सब देख रहे थे। बल्कि देखते हुए भी नहीं देख रहे थे।
देख रही थीं आस पास की वो खिड़कियां, दरवाज़े और एसी के बटन वो आज जा रहा था। जा रहा था वहां से जहां उसने अपने करियर के तकरीबन छह साल गुजारे। क्या मालूम था कि एक दिन वही मंदी उसकी नौकरी पर बन पड़ेगी। जिन स्टोरी को अखबार के पन्नों पर बनाया करता था आज वह भी एक सिंगल कॉलम की ख़बर बन जाएगा।
लेकिन अफ्सोस की वह उस कॉलम में भी समा न सका। लोग महज बातें करते रहे कि अच्छा था। मेहनती थी आदि। लेकिन किसी ने भी मदद तो नहीं की। किसी ने भी आश्वासन तक नहीं दिया।
आज अकेला ही उस का़गज पर दस्तख़त कर ऑफिस से बाहर हो गया। शायद अपने सपनों से भी बाहर।

Thursday, April 13, 2017

अकेली हो गई


वो शायद अकेली हो गई थी। निराश और हताश भी होगी। शायद जॉब ही वो कारण रहा हो। रहा भी। इक्रीमेंट। पैसे में बढ़ोत्तरी। उसके जीवन पर हावी हुआ हो गया। पैसे और पद उसकी जिंदगी पर भारी पड़ गया।
वो इस दुनिया से ही कूच कर गई। वो अकेली नहीं थी। उस जैसे और भी हैं जिन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह गए। तनाव और हताशा। इन द्वंद्वों के दबाव में जीवन हार गई। जीने की ललक और ताकत चूक गई।
हम जिस दौर में जी रहे हैं वो बड़ी तनाव और द्वंद्वों भरा है। हमारा स्वयं का जीवन इतना रिक्त हो चुका है कि बाहरी तत्वों से जीवन भरा चुका है। आंतरिक खुशी और उल्लास रिक्त हो चुका है। पैसे और पद हमारी जिंदगी के मकसद तय किया करते हैं।
हम यहीं अपनी पकड़ जिंदगी पर खोते जा रहे हैं। तय करना होगा कि जिंदगी बड़ी है या पद, पैसे और प्रमोशन।

Friday, April 7, 2017

पास फेल की चक्की में ...

पास फेल की चक्की में पीस रहे हैं बच्चे, पीस रही है शिक्षा। शिक्षा कहीं न कहीं अपने लक्ष्य से भटकी नजर आती है।हमारा मकसद महज अंक और ग्रेड हासिल करने तक महदूद हो चुका है।संभवतः हमारे पास डिग्रियां तो होती हैंलेकिन उस स्तर की समझ विकसित नहीं हो पाती। अफसोसनाक बात यह हैकि फिर भी हमारा पूरा का पूरा ध्यान और मेहनत सिर्फ परीक्षा पास करने तक सिमट चुका है।इससे बेहतर तो यह होता कि हम बच्चों में तालीम की समझ और जीवन में इस्तमाल पर जोर देते। हम उन्हें बता पाते कि जीवन में इनमें से कौन सी चीज, इल्म काम आ सकती है।अपने जीवन को कैसे बेहतर बना सकते हो। लेकिन जब हम नीति, समिति, राजनीतिक पहलों को देखते हैंतब भी एक निराशा हमें घेर लेती है।कितना बेहतर होता कि हम शिक्षा को आम जिंदगी में इस्तमाल के योग्य बना पाते।
हाल ही में एक बच्चे से आत्महत्या कर ली। वह प्राथमिक कक्षा का नहीं था। बल्कि वह मेडिकल का छात्र था। लेकिन क्योंकि उसने परीक्षा में वही लिख पाने में पीछे रह गया जो पूछा गया था। उसे फेल हो जाने का भय सता रहा था। गांव-घर, यार दोस्त, मां-बाप क्या कहेंगे इसकी चिंता ने उसे इस जिंदगी से जुदा कर दिया।इसमें उस लडके से ज्यादा उस शिक्षा पर सवाल खडे होते हैंजिसने एक एक इंसान की जान ले ली।

Tuesday, April 4, 2017

कितना आसान है


कितना आसान है
तोहमत लगाना
कितना आसान है
हंसी उड़ाना
कितना आसान है
नीचा दिखाना।
कितना कठिन है
ख़ुद पर हंसना
कितना कठिन है
खिलंदड़ बनना
कितना कठिन है
राह निभाना।
कठिन है कितना
स्नेह बचाना
कठिन है कितना
बंधन निभाना
कठिन है कितना
बस जाना
कठिन है कितना
आंखों में चुभना।

Tuesday, March 7, 2017

फिल्मांे में आजाद महिलाएं


                                                                                                                                                                 कौशलेंद्र प्रपन्न
फिल्में हर समाज और काल में आम जन को प्रभावित करती रही हैं। फिल्मों के सामाजिक दरकार भी समय और संदर्भ सापेक्ष बदलती रही हैं। राजा हरिश्चंद्र मूक फिल्मों से लेकर सवाक फिल्मों तक, ब्लैक एंड वाइट के लेकर डिजिटल फिल्मों तक के सफ़र में ठहर कर देखें तो पाएंगे कि समाज का प्रतिबिंब तत्कालीन फिल्मों में दिखाई देती हैं। आजादी पूर्व की फिल्मों के कथानक, परिवेश,संवाद आदि तत् संबंधी होती थीं। आजादी के बाद की फिल्मों के विषय, बोल, परिधान आदि भी बदले यह परिवर्तन भी लाजमी थी। महिलाओं की दृष्टि से फिल्मी जगत को समझने की कोशिश करें तो फिल्मों का एक बड़ा कालख्ंाड़ और भूमिका महिलाओं की स्थिति बदलाती हैं। एक दौर था जब फिल्मों में तथाकथित बड़े परिवार की लड़कियां नहीं आती थीं। बड़ी क्या आम घरों की महिलाओं को फिल्मों में अभिनय करने की आजादी नहीं थी। तब पुरुष ही महिलाओं की भूमिका किया करते थे। समय ने करवट ली और धीरे धीरे लड़कियों का आना फिल्मों शुरू हुआ। महिलाएं किस रूप में दाखि़ल हुईं यह भी एक दिलचस्प कहानी है। महज गाना गाने,ठुमका लगाने,मां या पत्नी की भूमिकाओं ने इन्हें चुना। सत्तर के दशक तक कथानकों में एक बड़ा परिवत्र्तन घटता है। महिलाएं आभूषण,वस्त्र आदि के आकर्षण से बाहर निकल अभिनय के समानांतर चुनौतियां देने लगीं।
अस्सी के दशक में अस्मिता पाटिल,शबाना आज़मी ने निश्चित ही यादगार अभिनय से अपनी पहचान बनाई। इन्होंने फिल्मों में महिलाओं की भूमिकाओं को तो रेखांकित किया ही साथ ही समाज में बढ़ रहे वर्चस्व को भी पर्दे पर उतारा। यदि फिल्मों के सामाजिक सरोकारों की ओर नजर डालें तो नाच गाने,मार-धाड़ से आगे निकल कर सामाजिक स्थितियों को भी पर्दे पर जी रही थीं। फिल्मों ने चाहते हुए भी हमारे समाज की चेतना को झकझोरना का काम किया है। समाज का एक बड़ी तबका जो जवान हो रहा था व कहें किशोर से युवा हो उन्हें ख़ासे प्रभावित किया। एक्शन हीरो से लेकर एग्री यंग मैन की छवि भी समाज में खूब चली। साथी दुखांत भूमिकाओं के लिए दिलीप कुमार,साधना,गुरुदत्त को आज भी हम भूल नहीं पाएं हैं। कहानियां और कहानियों को पर्दे पर जीवंत करने वाले कलाकारों की निजी जिंदगी जैसी भी रही हो किन्तु पर्दे पर उन्हें देखना दिलचस्प था। ठीक उसी तरह से महिलाओं की भूमिकाएं भी दिन प्रति दिन बदल रही थी जैसे आम जिंदगी में बदलाव घट रहे थे। परिवर्तन की सुगबुगाहटें महिला कलाकारों में भी दिखाई देने लगी थी।  
स्त्री विमर्श की एक दुनिया समानांतर रची जा रही थी। सावित्री बा फुले महिला शिक्षा के लिए संघर्ष कर रही थीं। वहीं समाज में शिक्षा और महिलाओं की जागरूकता में तेजी आ रही थी। बच्चियां घरों से निकल कर स्कूल जाना शुरू कर चुकी थीं। धीरे धीरे ही सही लेकिन शिक्षा और स्व अधिकार की ललक भी महिलाओं में जगने लगी थी। यह एक संक्रमण काल था जिसमें महिलाएं अपने चैका बर्तन से बाहर दुआर पर निकलने की कोशिश कर रही थीं। यह दृश्य फिल्मों से ओझल नहीं था। क्योंकि फिल्मों की नजर से सामाजिक बदलाव छुपे नहीं रहे। एक ओर प्रेमचंद के उपन्यासों,कहानियों पर फिल्में बन रही थीं वहीं टैगोर की रचनाओं को भी फिल्मों में चुना जा रहा था। गैर भारतीय भाषाओं मे लिखी जा रही रचनाओं और कथानकों पर फिल्में बनीं। लेकिन गौरतलब है कि आजादी पूर्व की कथानकों और फिल्मों में महिलाओं को रूढ छवियों में बंधी नजर आती हैं।
नब्बे के दशक के अंत अंत तक फिल्मों के कथानक और महिलाओं की प्रस्तुतिकरण में काफी बदलाव हुए। नाच गाने और ठुमके लगाने से आग बढ़ कर बैंडेड क्वीन,एलओसी,डोर,पिंजर,लज्जा आदि फिल्में आईं जिसमें समाज में महिलाओं की स्थिति को प्रकारांतर चित्रित करती हैं। वहीं 2000 और 2010 के बाद स्त्री विमर्श को आगे बढ़ाती फिल्में भी आईं जो बाजार और महिलाओं के अंतर्संबंध को उदघाटित करती हैं। कार्पोरेट, पेज थ्री, चांदनी बार, एनएच 8,मेरीकाॅम,नीरजा आदि ऐसी फिल्में हैं जिसमें हमारे समाज की महिलाओं की उलझनों को भी पकड़ने की कोशिश करती हैं। बाजार किस तरह से महिलाओं को महज वस्तु व विज्ञापन की तरह देखती है इसका भी उदघाटन हमें कई फिल्मों में मिलता है। समाज में जैसे जैसे महिलाओं की भूमिकाएं बदली सवाक फिल्मों में अछूत कन्या, पाकीज़ा दोनों ही फिल्मों में महिलाएं रूढ़ वैचारिक समाज की प्रतिबद्धताओं से लड़ती हैं। एक ओर अछूत कन्या होने की वजह से ब्राह्मण लड़के से शादी नहीं कर पाती वहीं विवाहेत्तर विवाह की धारणा पर बनी फिल्मों का सिलसिला भी एक नई जमीन तैयार करती है। जख़्म, जिस्म, क्वीन काॅपोरेट जैसी फिल्में महिलाओं के प्रगतिशील सोच और समाज के बदलते मूल्यों को पकड़ने की कोशिश करती हैं। क्वीन अपनी इच्छा और स्त्री की सोच और निर्णय की आजादी की कहानी कहती है। वहीं डेढ इश्किायां, कहानी, राजनीति,मर्दानी,उर्टी पिक्चर,रिवाल्वर रानी, तनु वेड्स मनु रिटर्न्स आदि फिल्में हैं जिसमें महिलाएं अपनी जमीन पर खड़ी नजर आती हैं।
सन् 1985 और 2000 के बाद बनी फिल्में मंे रूढ़ कथानकों में काफी तेजी से बदलाव नजर आता है। जहां अछूत, बाल विवाह, समाज के मुख्य धारा से कटी महिलाएं समाज के झंझावातों में अपनी भूमिका निभाती दिखाई देती हैं। मेरी काॅम, पीकू, एनएच 8, कहानी फिल्मों की नायिकाएं अपपी उपस्थिति को मजबूती के साथ स्थापित करती हैं। यह समाज में महिलाओं के साथ हो रहे बड़े बदलाव और सोच को आईना दिखाने वाली फिल्मों में साफ तौर से स्त्री अधिकार और वर्चस्व की कहानी पढ़ी और देखी जा सकती है। यदि पीकू और मेरी काॅम के कथानक को देखें तो एक लड़की अपने घर में पिता,पति को संभालते हुए दफ्तर भी जाती है। दो समानांतर चलने वाली भूमिकाओं और जिम्मेदारियों को निभाती लड़कियां नजर आती हैं। यह साबित करता है कि फिल्मों में कई बार समाज में घटने वाली हकीकतों को स्थान तो मिलता ही है और कई बार फिल्मों में चित्रित कथानक को देख समाज में युवा पीढ़ी कदम उठाती है। हाल ही में नोएडा से लापता दूसरे शब्दों में अपहृत लड़की ने कबूल किया क्राइम पेटोल देख कर उसने अपनी अपहरण की कहानी रच डाली। यह बताता है कि समाज और फिल्मों के संबंध बड़ी करीब के रहे हैं। दोनों ही एक दूसरे को गहरे प्रभावित करते रहे हैं। कई बार नागर समाज जब फिल्मों पर आरोप लगाता है कि फिल्मांे की वजह से समाज में अपराध,विवाहेत्तर संबंध, हत्याएं आदि बढ़ रह हैं। बच्चे फिल्मों को देखकर बिगड़ रहे हैं आदि। इस पर निर्देशकों को अपना तर्कशास्त्र है कि समाज यानी दर्शक जो देखना पसंद करता है हम उसे ही दिखाते हैं। अब सवाल उठ सकता है कि वो किन वर्गों के दर्शकों को इसमें शामिल कर रहे हैं। क्या सचमुच समाज और दर्शक हिंसा, बालात्कार देखना चाहता है या फिर आरोपित तर्कजाल हैं?
 फिल्मों का समाजशास्त्र तो यह कहता है कि फिल्में मनोरंजन और विचारों को परिमार्जन में एक साधन बनें। लेकिन परेशानी यही है कि मनोरंजन के पैमाने और परिमार्जन के आधार तत्व कौन तय करेगा। क्या समाज के कुछ वर्ग और विचार के कुनबे इसे तय करेंगे कि कौन सी फिल्म समाज में दिखाई जाए और कौन सी फिल्म समाज की समरसता को तोड़ने वाले हैं। यहां यह सवाधानी बरतनी पड़ेगी कि वो कौन सा धड़ा है जो फिल्मों पर प्रतिबंध की मांग करता है? वो कौन सा वर्ग है जो मूल्यांे और नैतिकताओं की दुहाई देकर तोड़ फोड़ करता है। उसकी पहचान भी नितांत आवश्यक है। यही वजह है कि कई फिल्में कानूनी जालों में उलझकर आज तक दर्शकों के बीच नहीं आईं। या आईं भी तो विवादों का दरिया पार कर आईं। वाटर, फायर आदि फिल्मों पर हो हल्ला मचा यह सभी को याद होगा लेकिन प्रश्न उठता है कि यदि समाज का दपर्ण फिल्मों को मानते हैं तो समाज में घटने वाली घटनाओं को चित्रित करने मंे यदि ज़रा सी मर्यादा रखकर दिखाई जा रही है तो उसे स्वीकारें मंे क्या हर्ज है।
आंधी फिल्म की नायिका का राजनीति में वर्चस्व स्थापित करना क्या प्रकारांतर से समाज में बदलते राजनीति समीकरणों को उद्घाटित नहीं करता? क्या राजनीति, सरकार, गंगाजल नई वाली में स्त्री के उस स्वरूप को दिखाने की कोशिश नहीं है जहां महिलाएं चैके से बाहर निकल राजनीति में अपना हाथ आजमा रही हैं। एनएच 8 की गांव की महिला स्वयं अपनी बेटी को मरवा देती है तो यह क्या आकाशीय कथानक है या हमारे ही राज्यों में ऐसी घटनाओं को अंजाम नहीं दिया जा रहा है। यदि रांझना की नायिका की ओर नजर डालें तो वह एक क्रांतिचेत्ता और अपनी निजी खुन्नस निकालने के लिए नायक को नस्तनाबूत कर देती है। वहीं बाजीराव मस्तानी में भी एक महिला किस तरह से मुस्लिम बहु को मरवाने में पूरी ताकत लगा देती है इसकी झलकी मिलती है।
समग्रता में देखें और फिल्मों में चित्रित महिलाओं की भूमिका को समझने की कोशिश करें तो पाएंगे कि समय और कालखंड़ के अनुसार कथानक और प्रस्तुतिकरण में काफी बदलाव आया है। यहां तक की समाज की घटनाएं किस तरह से रूपहले पर्दे पर स्थान लेती हैं वह भी देखना दिलचस्प है। अछूत कन्या से लेकर वाटर, फायर, कहानी, एनएच 8 और क्वीन तक का सफ़र करती महिलाओं की छवियां रूढ़ भूमिकाओं को धत्ता बताती हुई नई सोच और वैचारिक बदलाव को ओढ़ चुकी हैं। 


शिक्षकीय दुनिया की कहानी के पात्र

कौशलेंद्र प्रपन्न ‘‘ इक्कीस साल के बाद पहली बार किसी कार्यशाला में बैठा हूं। बहुत अच्छा लग रहा है। वरना तो जी ...