Friday, April 18, 2014

संविधान की नजर में इंसान हैं किन्नर



कौशलेंद्र प्रपन्न
‘वेलकम टू सज्जनपुर’ फिल्म बड़ी ही शिद्दत से किन्नरों की सामाजिक स्थिति पर विमर्श करती है। इस फिल्म का किन्नर चुनाव में खड़ा होता है, लेकिन समाज के बाहुबली वर्ग के आगे उसकी एक नहीं चलती। अंत में हार थक कर जिलाधीकारी से अपने संरक्षण की गुहार लगाती है, लेकिन अंत दर्दनाक ही होता है। चुनाव में कई किन्नरों का आगमन हुआ किन्तु वह गिनती में बेहद कम हैं। हाल ही मंे न्यायपालिका के उच्च संस्था ने किन्नरांे को अन्य इंसानों की तरह ही मौलिक अधिकार की ओर सभ्य समाज का ध्यान खींचा। न्यायालय ने आदेश दिया कि केंद्र एवं राज्य सरकारें अपने यहां इनके स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार के अवसर मुहैया कराएं। ध्यान हो कि समाज के तृतीय लिंगी किस तरह से सामजा के विकास के केंद्र से हाशिए पर जीवन बसर करते हैं। किसी से भी छूपा नहीं है कि समाज में कुछ विशेष अवसरों पर इन्हें घर की देहारी पार करने की इजाजत दी जाती है। और उसके बाद उनसे सभ्य समाज का वास्ता किस कदर उपेक्षा, डर और तिरस्कार का होता है। पूरे देश में किन्नरों की संख्या और उनकी माली हालत का जायजा लिया जाए तो आंखों में आंसू उतर पड़ेंगी। किन्नर हमारे समाज के वो अंग हैं जो रहते तो हमारे बीच में ही हैं लेकिन उन्हें समाज और सरकार की कल्याणकारी किसी भी योजना का लाभ न के बराबर मिलता है। यूं तो किन्नर यानी तृतीय लिंगी समाज से हमारा रिश्ता महज बलैया लेने वाले वर्ग का रहा है। लेकिन सभ्य समाज ने उनके कल्याण के लिए ठोस कदम नहीं उठाए। यही वजह है कि ये समाज में तो रहते हैं लेकिन समाज की धड़कन बन कर नहीं बल्कि एक बजबजाते कोने में सिमट कर रहते हैं। इनके प्रति जिस तरह का समाजिकरण हमारे बच्चों में पैदा किया जाता है यही उन्हें देखने-समझने के लिए आजौर के रूप में काम करता है। बचपन से ही इस वर्ग को भय और डर की दृष्टि से देखने का पाठ न केवल स्कूलों बल्कि घर में भी पढ़ाया जाता है। यहां तक कि पाठ्यपुस्तकों, पाठ्यक्रमों व पाठ्यचर्या को उठा कर देख लें कहीं भी इनके बारे में न तो जानकारी दी जाती है और न उन्हें समझने के लिए कोई पाठ का निर्माण ही किया जाता है। हमारी शिक्षा-विमर्श इन्हें गोया इन्हें समझने के योग्य ही नहीं मानती। यही कारण है कि तृतीय लिंगी समाज हमारे शिक्षा-दर्शन, शिक्षा विमर्श से एक सिरे के गायब है। यहां तक कि कहानियों, कविताओं, उपन्यासों की दुनिया भी इन्हें बेहद कम जगह देती है।
तृतीय लिंगी समाज के बारे में यदि कोई जानना या समझ बनाना चाहे भी तो हमारे पास कोई पुख्ता और प्रमाणिक किताब का न होना यह साबित करता है कि यह वर्ग कलमकारों की नजर से भी दूर ही छिटके रहे हैं। यदि पुराऐतिहासिक काल खंड़ों में इनके योगादान व भूमिकाओं को नजर अंदाज कर भी चलें तो आज की तारीख में इन्हें समझने के लिए हमारे पास कोई औजार नहीं है। यदि कोई स्रोत इन्हें समझने के लिए हो सकता है तो ये स्वयं हैं। लेकिन इनके समाज में अंधेरा और रहस्य इस कदर कायम रखा जाता है कि कोइ्र बाहरी इनकी दुनिया में सहज रूप से प्रवेश नहीं कर सकता। इनके गुरुओं की सख्त हियादत रहती है कि अपनी दुनिया के बारे में बाहरी लोगों से कोई बातचीत न की जाए। यदि कोई इस नियम का पालन नहीं करता उसे कठोर दंड़ भुगतना पड़ता है।
  पूरे देश में प्राकृतिक तृतीय लिंगी की संख्या बेहद कम है। जो बहुसंख्य दिखाई देते हैं उनमें से अधिकांश आॅपरेशन के द्वारा बनाए जाते हैं। इसकी भी अपनी कहानी है। यह कहानी बेहद दर्दीली और भयावह होती है। आधी रात में गुरु के संरक्षण में लिंग काटा जाता है। इससे पहले एक जलसे का आयोजन भी किया जाता है जिसमें इस समुदाय के समकक्ष और वयोवृद्ध तृतीय लिंग के लोग शामिल होते हैं। इनका लिंग काट कर एक घड़े में डाल कर पेड़ पर टांग दिया जाता है जब तक कि घाव पूरी तरह से भर न जाए। लिंग छेदन से पूर्व विवाह की तरह ही संस्कार भी किए जाते हैं जिसमें हल्दी लेपन, केले का भोजन आदि। एक प्रकार से उपवास एवं रीति रिवाज के साथ यह कार्य सम्पन्न होता है। यह प्रक्रिया खतरनाक और जोखिम भरा भी होता है। लेकिन इस काम को अंजाम बड़े अनुभवी हाथों से दिए जाते हैं। तृतीय लिंगों की एक ही माता व देवता हैं पूरे देश में जिसे बुचरा माता के नाम से जानते हैं। इनकी माता मुर्गे पर सवार रहती हैं।
हमारे संविधान के धारा 21 और वैश्विक मानवाधिकार घोषणा 1948 के अनुसार इन्हें भी सम्मान से जीने, शिक्षा हासिल करने आदि का हक प्राप्त है। लेकिन वस्तुस्थिति जैसी है उसे देखते हुए बेहद चिंता होती है। जिस प्रकार जीते हैं उसी तरह गुमनामी में मौत भी मयस्सर होता है। मरने के बाद इन्हें खड़कर जूते चप्पलों से पिटते हुए शमशान घाट तक ले जाया जाता है। इन तृतय लिंगी को उनके धर्मानुसार अंतिम विदाई दी जाती है। चप्पलों व जूतों से पीटते हुए ले जाने के पीछे इनका मानना होता है कि अगले जन्म इस रूप में न आना।
संविधान और समाज की बुनावट को एक साथ रख कर देखें तो तृतीय लिंगी समाज में अशिक्षा, बेरोजगारी, स्वास्थ्य आदि कुछ ऐसी बुनियादी समानता है जहां हर नागरिक को मिलना चाहिए। यदि केंद्र व राज्य सरकार इस काम में विफल होती है तो ऐसी स्थिति में न्यायपालिका को कठोर कदम उठाने पड़ते हैं। यही कारण है कि न्यायपालिका ने केंद्र व राज्य सरकारों को आदेश दिया है अपने यहां तृतीय लिंगी को शिक्षा, रोजगार का अधिकार सुनिश्चित करें। यदि इस समाज को शिक्षा के अवसर मिलते हैं तो इस वर्ग में भी विकास और बदलाव संभव हो सकते हैं। वरना जिस तरह से हजारों सालों से जिस पेशे में खुद को गला रहे हैं वह निरंतर चलता रहेगा।
तृतीय लिंगी सभी अशिक्षित हैं ऐसा कहना गलत है। क्योंकि काफी समय पहले दिल्ली के तृतीय लिंगी  पर एक शोध किया था। जिसके दौरान जिस तरह की जानकारी व समझ बनी थी उसे साझा करना अप्रासंगिक न होगा कि दिल्ली के संजय गांधी स्मारके पीछे, जहांगीरपुरी, उत्तम नगर आदि इलाकों में रहने वाले हजारों किन्नरों मंे कई तो ग्रेजूएट, 12 वीं एवं 10 वीं पास थे। लेकिन महज सामाजिक दबाव एवं पारिवारिक उपेक्षा की वजह से इस समाज में शामिल हो गए। आज वो गा-बजा कर और सड़कों पर भीख मांग कर अपना जीवन काट रहे हैं। उनमें भी पढ़ने और शिक्षा के प्रति ललक थी लेकिन समाज के कठोर नियमों और विवश परिवार के सामने इनकी एक न चली। गुरु कटोरी देवी बताती हैं कि मेरे पास आज एक हजार चेले हैं जिनमें अधिकांश ग्रेजूएट हैं वो मेरे पास इस लिए रह रहे हैं क्योंकि उनके अपने परिवार ने उन्हें अस्वीकार कर दिया। आंध्र प्रदेश, बिहार, उड़ीसा आदि राज्यों से आए मेरी बहने और भाई आज एक छत के नीचे सम्मान से जीते हैं। जिन्हें परिवार और समाज दुत्कार देता है उन्हें हम लोग शरण देते हैं। वहीं कनाॅट प्लेस के हनुमान मंदिर के पीछे रहने वाली पूजा बताती/बताता है कि वो बंगाल का रहने वाला है जब स्कूल में मास्टर जी ने उसकी प्रकृति को समझा और उसके बाद उसके साथ गलत आचरण किया तब से वो स्कूल और घर छोड़ कर दिल्ली में अपने समाज में रहने लगा। जहांगीर पुरी के तृतीय लिंगी समाज में पिछले बीस सालों से कमला गुरु हैं उनसे बातचीत अव्वल तो बेहद थकाने वाला था। कई बार उन्होंने बात करने से मना कर दिया लेकिन अंत में हार कर उन्होंने समय दिया। उनकी नाराजगी का बड़ा कारण था मीडिया और इस समाज के लेखक वर्ग। उनका कहना था लोग फोटो खींचते हैं, लेख लिखते हैं और अपनी कमाई तो करते हैं लेकिन हमारी स्थिति सुधरे इसके लिए वो कुछ नहीं करते। हमें नुमाईश का साधन मानते हैं इसलिए मैं बातचीत नहीं करती। मेरे पास बहुत काम है। मुझे चेलों को तैयार करना है।
तृतीय लिंगी का एक बड़ा समाज है और ये लोग संगठित भी हैं। इनका पिछले साल दिल्ली में महासम्मेलन भी हुआ था। जिसमें इस समाज के उत्थान के लिए घोषणा पत्र भी जारी हुआ था। लेकिन वह महज घोषणाएं ही रह गई। याद हो कि दिल्ली में ही दो साल पहले विश्व सुंदरी प्रतियोगिता भी आयोजित की गई थी जिसमें देश भर से किन्नरों ने शिरकत की थी। भला हो मीडिया का कि इसने उस प्रतियोगिता का कवर भी किया था। यदि मीडिया और सभ्य समाज इनके प्रति ज़रा भी संवेदनशील हो जाए तो न्यायपालिका को हाथ लगाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी।

Wednesday, April 16, 2014

हम तृतीय लिंगी



-कौशलेंद्र प्रपन्न
सड़क, डैडी,वेल्कम टू सज्जनपुर जैसी फिल्मों में तृतीय पुरुष की जिस संवेदना और सामाजिक दरकार को चित्रित किया है आज वहां से आगे बढ़कर सांवैधानिक पहल और आदेश से थोड़ी ही सही किन्तु उम्मींद की किरण फुटती है। तृतीय लिंगी इस समुदाय को किन- किन और कैसे- कैसे बर्ताव समाज में सहने और झेलने पड़ते हैं यह किसी से भी छुपा नहीं है। कुछ साल पहले अभिमुख सभागार में नामवर सिंह के साथ एक नाटक ‘जानेमन’ नाटक देखा था। उस नाटक को देखने के बाद नामवर सिंह के आंखों से आंसू टपक पड़े थे। वास्तव में इस नाटक को देखना दरअसल तृतीय लिंगी समाज से रू ब रू होना है। किस प्रकार से इस समाज में भी मठाधीशों का बोलबाला है। इसे भी नकार नहीं सकते। जो जितना प्रभावशाली और चेलों का गुरू है उसकी इस समाज में उतनी ही ज्यादा प्रतिष्ठा और मान-सम्मान है। इनके समाज में भी चेलों की खरीद- फरोख़्त होती है। सवा रुपए से लेकर हजारों और लाखों में नए तृतीय लिंगी को अपना चेला बनाया जाता है।
काफी समय पहले दिल्ली के तृतीय पुरुष पर एक शोध किया था। जिसके दौरान जिस तरह की जानकारी व समझ बनी थी उसे साझा करना अप्रासंगिक न होगा कि इस समाज में जिस तरह के अंधकार और घटाटोप की संस्कृति बरकरार रखी जाती है उसके पीछे मकसद यही होता है कि बाहरी समाज को हमारी संरचनाओं और बुनावट का इल्म न हो सके। कोई भी तृतीय लिंगी अपने समाज की हकीकत बयां नहीं करना चाहता। इसके पीछे डर काम कर रहा होता है। गुरू किसी भी कीमत पर यह इज़ाजत नहीं देता कि उसके चेले बाहरी समाज में यहां की वास्तविकता को साझा करें। लेकिन कुछ अत्यंत प्रताडि़त तृतीय पुरुष मंुह खोल ही देते हैं जिसका ख़ामियाजा उन्हें अपने समाज में भुगतना पड़ता है।
आज देश भर में इस समाज के कल्याण और अधिकार के लिए कुछ स्वयं सेवी संस्थाएं सक्रिय हैं, लेकिन इनकी संख्या बेहद कम है और इस समाज की समस्याएं कहीं ज्यादा। दिल्ली के संजय काॅलोनी, जहांगीरपुरी के क्षेत्र, लक्ष्मी नगर, उत्तम नगर आदि क्षेत्रों में रहने वाले तृतीय लिंगी इसी दिल्ली में रहते हुए कई तरह की जोखि़मों का सामना करते हैं। बहुत कम तृतीय लिंगी हैं जिनकी स्थिति अच्छी है। जिनके पास गाड़ी, पैसे, चेले और जिंदगी के तमाम सुख-साधन हैं। बाकी तो किसी तरह भिखारी के मानिंद ही जिंदगी बसर करते हैं। कोई रेड लाइट पर तो कोई काॅलोनी में मांग कर ही जीवन काटते हैं। जो जवान हैं उनके आय के कई अन्य साधन हैं, लेकिन जो बुढ़े हो चुके हैं उनकी स्थिति शायद कुछ कुछ वैसी ही हो गई जैसे वृद्ध वैश्याओं की। जिन्हें जवान तृतीय लिंगी की कमाई और दया पर जीवन व्यतीत करना पड़ता है।
पूरे देश में प्राकृतिक तृतीय लिंगी की संख्या बेहद कम है। जो बहुसंख्य दिखाई देते हैं उनमें से अधिकांश आॅपरेशन के द्वारा बनाए जाते हैं। इसकी भी अपनी कहानी है। यह कहानी बेहद दर्दीली और भयावह होती है। आधी रात में गुरु के संरक्षण में लिंग काटा जाता है। इससे पहले एक जलसे का आयोजन भी किया जाता है जिसमें इस समुदाय के समकक्ष और वयोवृद्ध तृतीय लिंग के लोग शामिल होते हैं। इनका लिंग काट कर एक घड़े में डाल कर पेड़ पर टांग दिया जाता है जब तक कि घाव पूरी तरह से भर न जाए। लिंग छेदन से पूर्व विवाह की तरह ही संस्कार भी किए जाते हैं जिसमें हल्दी लेपन, केले का भोजन आदि। एक प्रकार से उपवास एवं रीति रिवाज के साथ यह कार्य सम्पन्न होता है। यह प्रक्रिया खतरनाक और जोखिम भरा भी होता है। लेकिन इस काम को अंजाम बड़े अनुभवी हाथों से दिए जाते हैं। तृतीय लिंगों की एक ही माता व देवता हैं पूरे देश में जिसे बुचरा माता के नाम से जानते हैं। इनकी माता मुर्गे पर सवार रहती हैं।
अफसोस की बात है कि हमारे इसी समाज के हिस्सा होने के बावजूद इनकी दुनिया हमारी दुनिया से एकदम कटी और डरावनी बना दी गई है। ताज्जुब की बात तो यह भी है कि कवि, लेखक, कथाकार आदि विभिन्न विषयों पर तो खूब लिखते हैं, लेकिन इनकी दुनिया को कलमबद्ध करने वाले बहुत कम हैं। यदि तृतीय लिंगीय समाज के बारे में प्रमाणिक जानकारी हासिल करनी हो तो आज हमारे पास कोई भी ऐसी किताब नहीं हैं।
हमारे संविधान और वैश्विक मानवाधिकार घोषणा 1948 के अनुसार इन्हें भी सम्मान से जीने, शिक्षा हासिल करने आदि का हक प्राप्त है। लेकिन वस्तुस्थिति जैसी है उसे देखते हुए बेहद चिंता होती है। जिस प्रकार जीते हैं उसी तरह गुमनामी में मौत भी मयस्सर होता है। मरने के बाद इन्हें खड़कर जूते चप्पलों से पिटते हुए शमशान घाट तक ले जाया जाता है। इन तृतय लिंगी को उनके धर्मानुसार अंतिम विदाई दी जाती है। चप्पलों व जूतों से पीटते हुए ले जाने के पीछे इनका मानना होता है कि अगले जन्म इस रूप में न आना।

Monday, April 14, 2014

सोन तुम हो


सोन तुम रहते सदा-
निकल अमरकंटक से सुदूर,
बहते मुझी में हो।
चाहता हूं-
पोंछ दूं,
रगड़कर निशान तेरे,
बदन से मेरे,
मगर तेरी धार,
रहती सदा,
बहती मुझी में।
सोन तुम कहां हो-
देश या विदेश में,
जहां भी रहता,
तेरी धार की शांत शोर,
बजती मुझी में है।
खेलने तेरी ही धार में-
तब तलक,
बसा है मेरी रगों में,
सोचता हूं,
अंतिम यात्रा भी हो खत्म तुम्हीं में।
देखता हूं-
निर्निमेश,
तुम हो ख़ामोश,
शांत और सिकुड़े हुए भी,
मुझे देना बिछौना राख को,
जब मैं आउं तुम्हारे ठौर।

Monday, April 7, 2014

टाइटेनिक डूबने से पहले का मंज़र


रैनबक्शी आज सन फार्मा के हाथों 3.2 मिलियन डाॅलर में बिक गई। इससे पहले मंदी के आस-पास 2008 में रैनबक्शी जापान की कंपनी दाइची के हाथों बिक चुकी है। ज़रा कल्पना कीजिए यहां काम करने वाले कर्मियों की मानसिक स्थिति कैसी होगी। हर कुछ सालों में नए ख़रीददार। कौन कैसे बर्ताव करेगा? कौन रहेगा और कौन बाहर होगा जैसी स्थिति में कोई कैसे पल पल जी रहा होगा।
सभी ने देखा और न केवल तीन घंटे बल्कि फिल्म खत्म होने के बाद भी अश्रुपूरित यादों से निकल नहीं पाता। चारों-तरफ हहाकार, चीखपुकार भागदौड़ सब का एक ही प्रयास अपनी जान कैसे बचा सकें। औरत-मर्द, बच्चे, जीव जंतु सब के सब अपनी जान को बचाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं।
जब कोई कंपनी,उद्योग, संस्था दूसरे के हाथ बिक जाती हैं या बंद होने वाली होती हैं तब कैसी मानसिक स्थिति होती होगी? सब के मालूम हो कि अब हमारे नए आका हैं। कब, किसे, कैसे बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है आदि सवाल सभी कर्मी की पहली प्राथमिकता होती है।
जब बड़ी कंपनी छोटी कंपनी को एक्वायर करती है या फिर मंर्जर होता है तब छोटी कंपनी के कर्मीयों की स्थिति, निर्णय, योजनाओं पर एकबारगी सुनामी सी आ जाती है।

Friday, April 4, 2014

उन्होंने कहा-

उन्होंने कहा-
मेरे लिए लिखो कविता,
लिखा।
उन्होंने कहा-
मेरे लिए लिखो गीत,
लिखा।
जो मांगा-
वो लिखा,
जो लिखा,
वो बिका।
जो नहीं बिका-
उनको इंतज़ार है।
इंतज़ार है-
आएंगे तो,
देंगे कोई....।

Thursday, April 3, 2014

कहने का कौशल


कौशलेन्द्र प्रपन्न
पिछले कुछेक हप्तों व सालों के अनुभव के बरक्स यह कहने की हिमाकत कर सकता हूं कि कहने का कौशल हो तो ख़राब से ख़राब कथ्य भी श्रोताओं को बांधे रख सकता है। वहीं कहने की शैली और कला नहीं है तो अच्छी से अच्छी बातें व कथ्य श्रोताओं को लुभाने और सुनने का आनंद नहीं दे पातीं। वाकया हाल ही का है। पिछले कुछ हप्तों से जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान दिल्ली के आर के पुरम, दरियागंज आदि की ओर से प्रधानाध्यापकों, अध्यापकों एवं स्कूल मैंनेजमेंट समिति के सदस्यों की कैपेसिटी बिल्डिंग प्रशिक्षण कार्यशालाओं में आरटीई एक्ट, एसएमसी और स्कूल डेवलप्मेंट प्लान पर प्रशिक्षण देने को बुलाया गया। जहां उन लोगों से बातचीत करनी थी जो शिक्षा में सालों से काम कर रहे हैं। जिनकी शिक्षा के प्रति एक मजबूत समझ बन चुकी है। उनके बीच शिक्षा की स्थिति, उनकी अपनी जिम्मेदारी, नैतिक बोध आदि पर बातचीत करना कोई आसान काम नहीं था। ख़ासकर उन्हें सुनाना व सुनने के लिए तैयार करना भी एक चुनौति ही थी। एक कक्षा अनुभव को साझा करूं तो माज़रा और साफ हो जाएगा। एक दिन पूर्व एनसीइआरटी से सेवा मुक्त प्रोफेसर साहब ने आरटीई पर कक्षा में बातचीत की थी। दूसरे दिन मुझे उसी कक्षा में एसएमसी और एसडीपी पर बात करनी थी। मैंने कक्षा में पूछा आगे बढ़ने से पहले ज़रा टटोल लिया जाए कि आरटीई के दानें आपकी हांड़ी में कितने पके हैं। मैंने उनसे दस मिनट का समय मांगा कि दस मिनट आप मुझें दें फिर हम आगे की बातचीत शुरू करेंगे। उस दस मिनट में जो समझ सामने निकल कर आई वह निराश ही करने वाली थी। कक्षा में उपस्थित तकरीबन 60 सदस्यों ने एक स्वर में कहा आपने जो दस मिनट में आरटीई पर हमें बताया वह कल के ढाई घंटे पर भारी है। इसी दौरान कल वाले प्रोफेसर साहब आ गए और कक्षा में कहा कि वो कुछ बातें उनकी कल रह गई थी जिसे आज पूरा करना चाहते हैं। पूरी कक्षा एक स्वर में मना करने लगी। आज हम इनसे पढ़ना चाहता हैं। बात किसी तरह निपटी। वो तो चले गए लेकिन मेरे सामने एक बड़ा सवाल और जिज्ञासा छोड़ गए।
यह अनुभव मेरे लिए चुनौती भी थी और पुरस्कार भी। मैंने अपनी जिज्ञासा कक्षा में उछाल दी। आप सभी ने ऐसा क्यों किया? जवाब स्पष्ट था-कल पूरी कक्षा सो रही थी। हमें कुछ भी समझ नहीं आया। लगा हमने अपना समय जाया किया। सिर्फ इधर-उधर की बातों में समय काटा। हम भी शिक्षक हैं हमें पता चल गया कि वो समय पास कर रहे थे। न तो उनकी तैयारी थी और न ही विषय की समझ। उसपर उनका पढ़ाने का तरीका भी बेहद बोरीयत वाला था। आपने जो हमें दस मिनट में जिस शैली और अंदाज़ में बताया हमें लगा कि आपके पास कथ्य भी है और कथ्य को पढ़ाने व कहने का कौशल भी। अब मेरा दूसरा सवाल था-ज़रा कल्पना कीजिए जब आप कक्षा में बतौर अध्यापन कर रहे होते हैं तब यदि ऐसी स्थिति होती होगी तो बच्चे कैसा महसूस करते होंगे? क्या हमें अपनी शैली और कथ्य को जांचने-परखने की आवश्यकता नहीं है? इस संवाद में कक्षा सचमुच जीवंत हो उठी थी। मेरे लिए अब अपने विषय पर लौटना आसान हो गया था।
लब्बोलुआब यह है कि कथानक व कथ्य तो महत्वपूर्ण होते ही हैं। लेकिन यदि उनके साथ बरताव ठीक से न किया जाए जो वह संप्रेषित नहीं हो पातीं। यदि संप्रेषित हो भी जाएं तो श्रोताओं के अंग नहीं पातीं। विषय की समझ और जानकारी होना एक बात है और उसको श्रोताओं तक रोचक तरीके से पहुंचाना दूसरी बात। कहा जाता है कि जरूरी नहीं कि अच्छा लेखक अच्छा वक्ता भी हो। या अच्छा वक्ता अच्छा लेखक भी हो। लेकिन कमाल तो यही है कि यदि इन दोनों कौशलों का संजोग यदि शिक्षक में हो जाए तो वह कक्षा जीवंत हो उठती है। सुनने वाले व सीखने की ललक लिए बैठे श्रोता वर्ग को भी ऐसा नहीं लगता कि उनका समय बेकार गया।
इससे किसी को गुरेज नहीं होगा कि आज की तारीख में किसी को कुछ सुनना कितना कठिन है। सुनने वाले से ज्यादा कहने वाले को चुस्त, चैकन्ना और अपनी शैली मंे दक्ष होना होता है। तभी किसी को सुनने के प्रति मजबूर किया जा सकता है। सुनने के नाम पर हम गाने सुन लेते हैं। वहां हमारे पास चुनाव करने की आज़ादी होती है। नहीं पसंद आया तो गाने बदल सकते हैं। ठीक उसी तरह सुनने वाले के पास इस की भी गुंजाईश हो कि वह वक्ता बदल दे। मगर शिक्षण- प्रशिक्षण के दौरान इस बात की उम्मींद बहुत कमजोर होती है। ख़ासकर कक्षाओं में। किसी अध्यापक को दूसरी कक्षा में तो भेजा जा सकता है। लेकिन स्थानांतरण इसका स्थाई समाधान नहीं हो सकता। एक शिक्षक को यदि एक कक्षा में बच्चों ने सुनने व पढ़ने से मना कर दिया तो क्या दूसरी कक्षा के लिए वो उपयुक्त हो सकते हैं? संभव है श्रोता व कक्षा के स्तर में रद्दो बदल से थोड़ा तो अंतर पड़े लेकिन शिक्षक की पढ़ाने की शैली में बदलाव किया जाए तो यह स्थिति ही न पैदा हो।
तमाम रिपोर्ट और शिक्षा में हो रहे नवाचारों पर नजर डालें तो पाएंगे कि शिक्षा को ख़ासकर प्राथमिक कक्षाओं मंे रोचक और आनंददायी प्रक्रिया बनाने पर जोर है। शिक्षा वह जो बच्चों को आनंद दे सके। शिक्षक अपने कथ्य व कहने की शैली में परिवर्तन करे। तभी कक्षा जीवंत हो सकती है। वरना एक ओर शिक्षक पढ़ाते हैं और दूसरी ओर बच्चे उनका मजाक बनाने से भी पीछे नहीं रहते। यही वजह है कि कक्षा में शिक्षण रोचक बनने की बजाए वह बोझ बन जाती है। लेकिन अफसोस कि बच्चों के पास इसका अधिकार नहीं होता कि वह शिक्षक बदल दे। यदि ऐसा होता भी है तो बच्चों को शिक्षक के कोपभाजक भी बनना पड़ जाता है। आरटीई से लेकर एजूकेशन फोर आॅल का लक्ष्य यही है कि शिक्षा आनंद पैदा करे। पढ़ने के प्रति बच्चों में जिज्ञासा का संचार हो। श्रोता-वक्ता एक दूसरे का समय न जाया करें। यह तभी संभव है जब हम अपने कथ्य और कथ्य की शैली पर भी काम करें। कहने का कौशल नहीं, तो श्रोताओं पर दोषारोपण कहां तक उचित है।

Wednesday, April 2, 2014

आज फिर आंखें बरस पड़ी


तुम उस तरफ चले गए-
इधर तुम्हें तलाशती हैं आंखें,
छोड़ गए,
अपने मकान,
अपने लोग,
अपने खेत,
अपनी पहचान।
उधर से भी आए-
वही दर्द,
वही चीख,
अपना बचपन,
जब भी छिड़ती है कोई बात,
आज भी आंखें बरसने लगती है।
तुम्हें याद हो न हो-
मगर आज भी वहां,
गाए जाते हैं यहां के गीत,
इधर भी वही मंज़र है,
बार बार,
याद कर,
डस सैलाब को,
झरने लगती हैं गंग-जमुन।
नहीं बदल सकते-
भूगोल,
न ही खींच सकते और विभाजन की रेखाएं मोटी,
ग़र कुछ कर सकते हैं,
आओ एक बार फिर से गुफ्तगू करें।

Tuesday, April 1, 2014

घड़ा जो टूटा सा


अभी अभी-
जो घड़ा टूटा,
कौन सी मिट्टी थी,
पहचान सको तो पहचान लो,
किस धरती से उठाई गई थी मिट्टी,
किस खेत से लाए गए थे,
पका कर।
टूटा हुआ-
बेडौल सा घड़ा,
आपके पास ही हो,
ज़रा टटोल कर बताएं,
मेरी मदद कर सकते हैं
मैं लगा हूं,
उस मिट्टी की तलाश में।
एक बार जो फूटा-
घड़ा मेरा या कि आपका,
पहचानने में लग जाएं शताब्दियों,
टूटा हुआ घड़ा,
टूटा हुआ आईना,
घर में कहां रखते हैं,
सुना है बचपन से,
मगर जि़द है,
उन्हें ताउम्र रखूं अपने ही करीब।
सदियों से ध्यानस्त
तुम तो सदियों सदियों से यूं ही खड़े हो-
या कि ध्यानमग्न,
एक ही स्थान पर,
जटा- जूट बिखेरे,
जब भी पास आता हूं,
तुम सरसराने लगते हो,
कुछ बुदबुदाते हुए से,
ज्यो कहना चाहते हो,
कान में फूंकने को कोई रहस्य मंत्र।
जब भी टूटा है ध्यान-
त्राहि त्राहि मचा दी है तुमने,
भला ऐसा क्यों किया तुमने,
हां हम कबूलते हैं अपनी ग़लती,
हमने ही खोदी है,
तुम्हारी छाती,
गाड़ दी है फीटों गहरी पाइप।
संभव है-
तुम्हें चुभा हो हमारी घरघरती औजार,
खलबलाकर उठाया होगा तुमने अपना सिर,
मगर मगर सोचा तो होता दादू,
लाखों लाखों तेरी ही संतान,
जमीनदोस्त हो गए,
फिर भी तुम रहे मौन।
तुम्हारी संगिनी-
हां वही सागर,
बार बार पछाड़े खाता,
अपनी ही उत्ताल तरंगों से टकराता,
याद दिलाता,
कितना ग़मज़दा है सागर,
सदियों सदियों से।
तुमने देखा-
पीढि़यां आती रहीं,
और चली भी गईं,
बस बचे रहे तो तुम,
क्या कोई अता पता दोगे,
क्या केाई तस्वीर,
जिससे मिलान कर सकूं।

एक आवाज़


एक आवाज़-
देहारी पर,
हर वक्त देता रहता है।
जब भी-
दरवाजे़ पर आता हूं,
आवाज़ गुम हो जाती है,
न आवाज़ और न ही चेहरा।
चेहरे की पहचान में-
आवाज़ भूल जाता हूं,
बार-बार,
दहलीज़ तक जाता,
बैरन लौट आता हूं।
चैखट पर-
न आवाज़ होती और न चेहरा ही मुकम्मल,
थक कर,
वपस लौटता हूं,
तभी फिर आवाज़ आती है,
उठता हूं,
शिद्दत से बुलाती उस आवाज़ को पहचाने को बेताब,
चल पड़ता हूं,
आवाज़ को मनाने,
प्यार से दुलराने को।

 

Wednesday, March 26, 2014

घोषणाओं से आगे जाए शिक्षा


कौशलेन्द्र प्रपन्न
हमने कई बार कई मंचों पर घोषणा की कि हम फलां तारीख तक शिक्षा को सर्व सुलभ बना देंगे। उन्हीं घोषणाओं में प्रमुख घोषणों को याद करना अप्रासंगिक नहीं होगा। पहली घोषणा हमने 1990 में सेनेगल में की। जिसे हम ‘सब के लिए शिक्षा’ यानी ईएफए के नाम से जानते हैं। इसमें छः लक्ष्य रखे गए थे। जिसमें 2000 तक सभी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण प्राथमिक शिक्षा बिना किसी भेदभाव के समान अवसर के साथ मुहैया कराएंगे। इन छः लक्ष्यों को कबूलने वाले देशों में भारत भी शामिल था। 2000 में हमने देखा कि अभी काफी लक्ष्यों को हासिल करने में हम पीछे हैं। इसलिए हमें और समय चाहिए। सो डकार में तय किया गया कि 2015 तक हम इएफए के लक्ष्य को प्राप्त कर लेंगे। इएफए के साथ ही हमने 2000 में मिलेनियम डेवलप्मेंट गोल में भी सभी बच्चों को बुनियादी शिक्षा प्रदान करेंगे इसकी प्रतिबद्धता दुहराई थी। हमारी घोषणाओं और अंतिम तारीख की दूरी कमती जा रही थी। सो हमने सरकारी पहल की और सर्व शिक्षा अभियान चलाया ताकि कम से कम बुनियादी शिक्षा के लक्ष्य को हासिल किया जा सके। यही प्रतिबद्धताएं थीं जिनकी वजह से हमने 2002 में एक ऐतिहासिक कदम उठाया और भारतीय संविधान में 86 वां संशोधन कर मौलिक अधिकारों में शिक्षा को शामिल किया। हमने अपनी घोषणा को कानून में दर्ज किया और हमने समाज को बताया कि अब हम सभी बच्चों को बुनियादी शिक्षा का अधिकार कानूून संगत बना रहे हैं। 2009 में शिक्षा का अधिकार अधिनियम पारित हुआ और 1 अप्रैल 2010 को यह पूरे देश में लागू हुआ। याद हो कि हमारे सामने 2015 का लक्ष्य बार बार चीख चीख कर कह रहा है कि अब समय बड़ी तेजी से भाग रहा है कहीं ऐसा न हो कि इस बार भी हम झूठे साबित हों। इसलिए सर्वशिक्षा अभियान के अलावे हमने शिक्षा के अधिकार अधिनियम से ठीक कुछ माह पहले राष्टीय माध्यमिक शिक्षा अभियान का आगाज़ भी किया ताकि कई स्तरों पर लक्ष्य को हासिल करने के प्रयास हो सकें। 31 मार्च 2013 पिछले साल जा चुका है हमने तय किया था कि इस तारीख तक आरटीई एक्ट लागू हो।
सब के लिए शिक्षा यानी ‘इएफए’ के छः के छः लक्ष्यों के निकष पर भारत की बुनियादी शिक्षा को परखने की कोशिश करें तो निराशा के सिवाए कुछ भी हाथ नहीं लगता। क्योंकि अभी भी सरकारी आंकड़ों के अनुसार 80 लाख बच्चे शिक्षा और स्कूल के पहुंच से बाहर हैं। गैर सरकारी संस्था की रिपोर्ट की मानें तो यह संख्या 7 करोड़ अस्सी लाख से भी कहीं ज्यादा ठहरता है। नामांकन दरों में सर्व शिक्षा अभियान का यह असर जरूर हुआ कि बच्चे स्कूलों में दाखिल हुए। लेकिन बीच में ही शिक्षा और स्कूल न पूरी करने वालों बच्चों की संख्या भी रूकी नहीं। स्कूल बीच में छोड़ने वालों बच्चों और बच्चियों की संख्या भी लाखों में है। वहीं मध्याहन भोजन की गुणवत्ता, वर्दी, शिक्षा पर नजर डालें तो जो चित्र हमारे सामने उभरती है वह भी बहुत संतोषजनक नहीं कह सकते। हर साल मिड डे मील खाकर कई राज्यों में बच्चे बीमार हुए, और मर चुके हैं। इन पहलकदमियों के पीछे हमारा मकसद यही था कि किसी भी तरह बच्चों को स्कूल तक लाया जाए। बच्चे आए भी और स्कूल बीच में छोड़कर जाने भी लगे। स्कूल छोड़कर जाने वाले बच्चों के कारणों पर नजर डालें तो पाएंगे कि स्कूल का रोचक वातावरण का न होना। स्कूल और घर के बीच की दूरी का होना, अभिभावकों की ओर से अरूचिपूर्ण बर्ताव का होना आदि ऐसे कारण रहे जिनकी वजह से बच्चे स्कूल का स्वाद नहीं चख पाए। शिक्षा का अधिनियन 2009 बड़ी शिद्दत से स्कूल को चाइल्ड फ्रैंडली वातावरण मुहैया कराने की ओर हमारा ध्यान खींचता है। यह कहता है कि हर स्कूल में कम से कम शौचालय, पीने का पानी, स्कूल की चाहरदीवारी, कक्षाएं, खेल के मैदान, पुस्तकालय आदि हों। स्कूल का वातावरण ऐसा हो कि बच्चे भागने की बजाए स्कूल आने के लिए लालायित हों। लेकिन पिछले तीन सालों की गैर सरकारी संस्थाओं के अध्ययन रिपोर्ट को देखें तो अधिकांश सरकारी स्कूल इन 10 बिंदुओं पर खरे नहीं उतरते। अव्वल तो सरकारी स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक ही नहीं हैं और जहां हैं वे या तो प्रशिक्षित नहीं हैं। यदि प्रशिक्षित हैं तो उन्हें गैर शैक्षणिक कार्यों में इस कदर झोंक दिया जाता है कि वो पठन पाठन से दूर हैं। कई राज्यों में आज भी लाखों पद खाली पड़े हैं। दिल्ली भी इससे अछूती नहीं है। यहां भी चार हजार से भी ज्यादा प्रधानाचार्य, शिक्षक आदि के पद खाली पड़े हैं। बिहार, उत्तर प्रदेश, बंगाल, झारखंड़ आदि राज्यों में तो 2 से तीन लाख पद रिक्त हैं। कल्पना कर सकते हैं कि जिन स्कूलों में पूरे शिक्षक ही नहीं हैं वहां किस प्रकार की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दी जा रही होगी। शिक्षकों  की नियुक्ति को लेकर कई बार राज्य सरकारों को न्यायालय की ओर से झाड़ पड़ चुकी है। कई बार सचिवों को तलब भी किया गया कि बताएं कि अब तक पदों को क्यों नहीं भरा गया? आपके पास इस समस्या से निपटने के क्या उपाय व योजना है। मगर हमारी नींद नहीं ख्ुाली। उच्च न्यायालय को कहना पड़ा कि क्यों न यदि राज्य सरकार इसमें अक्षम है तो कोर्ट इसे अपने हाथ में ले। लेकिन राज्य सरकारें अभी भी नींद से नहीं जगी हैं। 2015 अब हमसे दूर नहीं हैं जब हमें विश्व और भारत को भी साबित करना है कि सभी बच्चे शिक्षा हासिल कर रहे हैं। सभी 6-14 वर्ष के आयु वर्ग के बच्चे अपनी कक्षा 1 से 8 कक्षा तक की शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। दुर्भाग्य ही कहना होगा कि तमाम घोषणाओं और योजनाओं के बाद भी हमारे महज 80 लाख बच्चे सरकारी नजरों में स्कूल नहीं जाते।
गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की बात करें तो स्वयं सरकारी आंकड़े भी स्वीकार चुके हैं कि हमारे बच्चों को कक्षा 8 वीं तो पढ़ते हैं लेकिन उन्हें कक्षा 1 के स्तर की शिक्षा यानी भाषा, गणित और विज्ञान की समझ हम नहीं दे पाए हैं। ऐसे लाखों बच्चे हैं जिन्हें सिर्फ वर्णों की पहचान भर है। ऐसे बच्चे वर्ण तो बोल लेते हैं, कुछ बच्चे लिख भी लेते हैं लेकिन समझ की बात करें तो उन्हें लिखे हुए गद्य को पढ़कर समझने की क्षमता नहीं है। नेशनल काॅसिल आफ एजूकेशन रिसर्च एंड टेनिंग ‘एनसीइआरटी’ की ओर बच्चों में खासकर प्रारम्भिक कक्षाओं में भाषा को पढ़ने और शब्दों की पहचान के साथ समझने के स्तर को लेकर सर्वे आयोजित किया जिसमें पाया गया कि 86 फीसदी बच्चे शब्दों को पहचानने में सक्षम थे। वहीं 65 फीसदी बच्चे सुने हुए गद्यांश को समझने में सक्षम थे और 59 फीसदी बच्चे पढ़े हुए गद्यांश को समझने में सक्षम हैं। वहीं एक और दूसरी गैर सरकारी संस्था की ओर से हुए अध्ययन रिपोर्ट पर नजर डालें तो चित्र कुछ और उभरती है एएसइआर की ओर से प्रारम्भिक कक्षाओं में पढ़ने वाले बच्चों में पढ़ने के स्तर को लेकर एक सर्वे किया गया। इस सर्वे की मानें तो 52 फीसदी बच्चे जो कक्षा 5 वीं में पढ़ते हैं, लेकिन उनमें कक्षा 2 री के पाठ पढ़ने की क्षमता नहीं होती। यहां तक कि तकरीबन एक तिहाई बच्चे बुनियादी जोड़ घटाव भी नहीं कर सकते। एएसइआर की ओर की गए सर्वे की मानें तो 2010 में जहां कक्षा 5 वीं के 50.7 फीसदी बच्चे कक्षा 2 री स्तर के पाठ पढ़ सकते थे वहीं यह प्रतिशत 2012 में घटकर 41.7 फीसदी पर गिर चुका है। बहुत अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि हमें आजा़दी के बाद भी प्रारम्भिक पठन- लेखन स्तर में कोई संतोषजनक उपलब्धि हासिल नहीं हो सकी है। लेकिन यह महज साक्षरता में उछाल शिक्षा का लक्ष्य नहीं है। बल्कि साक्षरता के साथ ही बच्चों में पढ़ने और लिखने की क्षमता भी होनी चाहिए। प्रारम्भिक पठन- लेखन के विविध संदर्भों पर नजर डालें तो स्पष्ट होगा कि प्रारम्भिक कक्षों में शिक्षकों का विशेष ध्यान बच्चोें में अक्षरों को पढ़ने के कौशल विकसित करने में होता है। दूसरे चरण में हमारा ध्यान बच्चांे में पढ़े हुए अक्षर को लिखने का कौशल प्रदान करना होता है। बच्चे को न केवल भाषा में बल्कि शिक्षा के मूल उद्देश्यों को हासिल करने में एक कदम आगे बढ़ाने के लिए बुनियादी स्तर पर ही मेहनत करने की आवश्यकता है। लेकिन उन्हें अपने स्तर की न तो भाषा की समझ है और न ही अन्य विषयों में गति। दूसरे शब्दों में कहें तो बच्चा स्कूल और सरकारी आंकड़ों में तो बढ़त हासिल की है लेकिन हकीकत यह है कि वे बच्चे कुछ अन्य कारणों से स्कूल में बने रहते हैं।
देश इन दिनों लोक सभा के चुनाव में व्यस्त है। तमाम तंत्र चुनाव की नैया पार करने में जुटी हैं। शिक्षा इनके मसौदे में यदि है भी तो खानापूर्ति से ज्यादा नहीं है। ऐसे में क्या हम 2015 के लक्ष्य को हासिल कर पाएंगे यह एक गंभीर सवाल हमारे सामने है। क्या हमने जो घोषणाएं 1990 और 2000 में अंतरराष्टीय स्तर पर की थी उसे पूरे करने के लिए हमारी सरकार वचनबद्ध है और यदि है तो उसे पाने के लिए समुचित और पर्याप्त प्रयास हो रहे हैं? इन सवालों को टाल तो सकते हैं किन्तु बच नहीं सकते। राजनैतिक इच्छा शक्ति की भी बात आती है कि क्या हम अपनी घोषणाओं को अमलीजामा पहनाने के प्रति सजग और जागरूक हैं। वरना जिस तरह से पीछे हमने कई डेड लाइनें पूरी नहीं हैं वैसे ही एक बार फिर हम और समय की मांग कर बैठें।

Friday, February 28, 2014

सड़क पर चलने का सहुर

सड़क पर चलने का सहुर
सड़क पर चलने का सहुर न आया
कभी नीचे कभी दाएं
तोड़कर तमाम नियम भगते रहे।
यूं ही जैसे अपना घर हो गोया सड़क-
तमीज की बात करते हो
हम तो सड़क पर अपना ही साम्राज्य मान बैठे हैं
कभी दाएं कभी बाएं
दबाते,धकीयाते बढ़ते रहते।
कोई जो दब जाए तो क्या-
चला जाए उस पार फिर भी क्यों हो अफसोस
चलना है चलते जाना है
सड़क हमरी है
हम सड़क के।

Tuesday, February 25, 2014

National Secondary Education Campaign (NSEC)

  
This scheme was launched in March, 2009 with the objective to enhance access to secondary education and to improve its quality. The implementation of the scheme started from 2009-10. It is envisaged to achieve an enrolment rate of 75% from 52.26% in 2005-06 at secondary stage within 5 years of implementation of the scheme by providing a secondary school within a reasonable distance of any habitation. The other objectives include improving quality of education imparted at secondary level through making all secondary schools conform to prescribed norms, removing gender, socio-economic and disability barriers, providing universal access to secondary level education by 2017, i.e., by the end of 12th Five Year Plan and achieving universal retention by 2020.
Important physical facilities provided under the scheme are:
(i) Additional class rooms, (ii) Laboratories, (iii) Libraries, (iv) Art and crafts room, (v) Toilet blocks, (vi) Drinking water provisions and (vii) Residential Hostels for Teachers in remote areas.
Important quality interventions provided under the scheme are:
(i) appointment of additional teachers to reduce PTR to 30:1, (ii) focus on Science, Math and English education, (iii) In-service training of teachers, (iv) science laboratories, (v) ICT enabled education, (vi) curriculum reforms; and (vii) teaching learning reforms.
Important equity interventions provided in the scheme are:
(i) special focus in micro planning (ii) preference to Ashram schools for upgradation (iii) preference to areas with concentration of SC/ST/Minority for opening of schools (iv) special enrolment drive for the weaker section (v) more female teachers in schools; and (vi) separate toilet blocks for girls.
Implementation mechanism of the Scheme
The scheme is being implemented by the State government societies established for implementation of the scheme. The central share is released to the implementing agency directly. The applicable State share is also released to the implementing agency by the respective State Governments.
Financial and Physical Progress Under the Scheme
During the 11th Five Year Plan, the Central Government bore 75% of the project expenditure during the 11th Plan, with the remaining 25% being borne by State Governments. However, funding pattern was 90:10 for North Eastern States.
Fund Allocation and Disbursal till 29 August 2013

Fund Allocation till 31st October 2013
Year
BE
RE
Actual Expenditure (Released)
2009-10
1353.98
550.00
549.00
2010-11
1700.00
1500.00
1482.00
2011-12
2423.90
2512.85
2500.00
2012-13
3124.00
3172.00
3171.00
2013-14
3983.00
-
2404.2
Total
12584.00
7734.85
10106.20

  Physical Target and Achievements
Sr. No.
Physical Target till 31st March 2014
Achievements
1.
11,000 (approx.) new schools
10230 new schools sanctioned out of which 9219 schools have become functional (as on 31st October 2013)
2
Strengthening of 44,000 existing schools
Strengthening of 34891 existing schools have been approved in which 23407 new science lab, 19641 computer rooms, 25869 libraries, 28969 art/craft/culture rooms, 19401 toilet blocks, 12370 drinking water facilities and 2020 residential quarters  have been approved. Out of these 4632 science labs, 3750 computer rooms,4721 libraries, 4590 art/craft/culture rooms, 3863toilet blocks, 3098 drinking water facilities and338 residential quarters have been completed and remaining structures are in different stages of construction.(as on 31st March 2013)
3
1,79,000 additional teachers
41507 additional teachers have been approved, out of which 21936 additional teachers have been appointed.
4.
Teachers’ recruitment for sanctioned new schools @ 5+1 teachers per new secondary school.
64215 teachers have been sanctioned in respect of new secondary schools out of which 24184teachers have been recruited.
5
88,500 additional classrooms
49,356 additional classrooms have been approved out of which 9516 additional classrooms have been completed and construction in respect of 8220 additional classrooms is in progress.(as on 31st March 2013)
6
In-service training of all teachers every year
In-service training of all Govt. teachers including Govt. aided school’s teachers have been sanctioned.


Monday, February 24, 2014

लोकार्पण से आगे किताबें


 विश्व पुस्तक मेले में बहुत- सी किताबों के घूंघट उठाए जा रहे हैं। रोज़ किताबों को अनावर्नित किया जा रहा है। वो किताबें खुश हैं। मगर उन किताबों का क्या जो अपनी पारी के इंतजार में हैं। उन्हें भी कोई पुचकारे, पलटे और कहीं किसी के बैग में आए और घर में पहंुचे। ऐसी बहुत- सी किताबें हैं जो प्रकाशकों के स्टाॅल पर चुपके- चुपके कह रही हैं, आओ जी हमें भी पढ़ो। हमारे मुखड़े से घूंघट उठा दो। गौरतलब है कि रोज दिन तकरीबन सौ किताबों को लोकार्पण तो इस विश्व पुस्तक मेले में हो ही रहे हैं। उसमें कहानियां, कविताएं, आलोचना, निबंध आदि शामिल हैं। यदि थोड़ा ठहर कर देखें तो पाएंगे कि कविताओं की किताबें ज्यादा लोकार्पित हो रही हैं। वैसे यह एक मोटे तौर पर ही कहा जा सकता है क्योंकि लोकार्पित होने वाली किताबों में न केवल कविताएं हैं बल्कि कहानियों और आलोचनाओं की किताबें भी शामिल हैं। प्रश्न यह उठता है कि जिन किताबों का लोकार्पण इस मेले या अन्य मेलों में हो रहे हैं या हुए हैं क्या उनकी पठनीयता और बिक्री में भी इजाफा हुआ है या महज लोकार्पित होकर प्रकाशक के गोदाम में या फिर पुस्तकालयों में सेल्फ पर सजी हुई हैं।
बड़ी तदाद में किताबों का प्रकाशन एक आत्मतोष तो देता है कि किताबें छप रही हैं। उनके खरीद्दार और पाठक होंगे तभी तो प्रकाशक छापने का जोखिम उठाता है। लेकिन प्रकाशकों के अपने तर्क हैं उस ओर यदि ध्यान दें तो वो हमेशा यही कहते पाए जाते हैं कि किताबें नहीं बिकतीं। हमें दूसरे रास्ते से किताबों को खपाना पड़ता है। लेखक तो लिख कर अपनी जिम्मेदारी से निकल जाता है। मित्रों, परिचितों को किताबें भेंट कर अगली प्रति की मंाग सरका देता है। लेकिन प्रकाशक होने के नाते हमारी जिम्मेदारी बन जाती है कि कैसे किताबों को पाठकों तक पहुंचाया जाए। सामान्यतौर पर प्रकाशक मूल्यों में बढोत्तरी को लेकर जो तर्क चस्पा करते हैं उसके पीछे यही वजह गिनाते हैं कि कागज की कीमत, खरीदने वालों की कमी की वजह से किताबों के मूल्य ज्यादा रखना पड़ता है।
मेले में किताबें तो आ जाती हैं। उनका लोकार्पण भी बड़े नामी गिरामी लेखकों, कलाकारों आदि से कर दिया जाता है। लेकिन क्या उन किताबों का समुचित, समीक्षा, आलोचना भी हो पाती है? क्या उन किताबों का मूल्यांकन पाठक व आलोचक करता है आदि सवालों पर भी आज विचार करने की आवश्यकता है। आलोचना व समीक्षा किस प्रकार होती हैं और किताबों की समीक्षा आज किस रूप में हो रही है इस तरफ यदि नजर डालें तो पाएंगे कि वह समीक्षा कम पुस्तक परिचय ज्यादा होता है। मसलन किताब में कितने पन्ने हैं, कथानक कैसा है, लेखक ने किस विषय पर कलम चलाई आदि। जबकि एक समीक्षा न केवल लेखक के लिए बल्कि पाठकों के लिए मार्गदर्शक का काम करता है। लेखक से कहां कमी रह गई। पाठक को फलां किताब में क्या मिलेगा आदि पर विमर्श किए जाएं और बिना किसी पूर्वग्रह के समीक्षा हो तो वह किताब के साथ ही लेखक और पाठक के लिए ज्यादा लाभकरी साबित होगा।
अमूमन इन दिनों लोकार्पित होने वाली किताबें के भविष्य और वत्र्तमान पर भी ठहर कर विचार करने की आवश्यकता है। क्या आज जिस तरह की किताबें लिखी जा रही हैं वह आज की चुनौतियों से सामने करने के लिए हमें तैयार करती है या सिर्फ अतीत की सुखद-दुखद यादों व समय में विचरने भर की रचना है। क्योंकि अधिकांश कविताएं महज अतीतगामी दिखाई पड़ती हैं। ऐसी किताबों का क्या और कितना भविष्य है यह भी अहम है।

Tuesday, February 18, 2014

घूंघट में किताबें


इस विश्व पुस्तक मेले में बहुत सी किताबों के घूंघट उठाए जा रहे हैं। रोज़ किताबों को अनावर्नित किया जा रहा है। वो किताबें खुश हैं। मगर उन किताबों का क्या जो अपनी पारी के इंतजार में हैं। उन्हें भी कोई पुचकारे, पलटे और कहीं किसी के बैग में आए और घर में पहंुचे। ऐसी बहुत सी किताबें हैं प्रकाशकों के स्टाॅल पर चुपके चुपके कह रही हैं आओ जी हमें भी पढ़ो। हमारे मुखड़े से घूंघट उठा दो।

Wednesday, January 29, 2014

भगोड़े नहीं थे वो


कौन कहता है कि वो भगोड़े थे। उन्होंने तो सबको यही कहा था कि कल सुबह घर से जाएंगे, लेकिन रात में ही निकल गए। इसमें भगोड़ा की बात कहां से आ गई। बड़ी आसान सी बात भी आपको समझ नहीं आती कि घर बेच कर जा रहे थे। यानी दूसरे शहर। अब इस शहर से उनका दाना पानी खत्म हो गया था। बेटा अपना नया मकान बनाना चाहता था, उसे पैसे की आवश्यकता थी। सो उन्होंने बेटे के लिए अपनी गहरी कमाई से बनाए मकान ही तो बेच रहे थे। आखिर मरने क बाद भी तो यह मकान उसका ही होना था। यह अलग बात है कि जीते जी इस मकान को बेच गए। हां इसे भी बनाने के लिए अपने खेत और रिटायरमेंट के मिले पैसे लगाए थे। अब यह मायने नहीं रखता कि कैसे कैसे एक एक कमरे बनवाए और भर भर दुपहरिया, बरसात में बैठकर काम कराए। एक बार मोह टूटता है तो फिर हम कुछ भी कर देते हैं।
सुबह उनके दरवाजे पर ताला भाई साहब थे। खामोश और निरपेक्ष भाव से टंगे ताले की भी अपनी ही कहानी थी। वो ताला भी मास्टर साहब के घर से मांग कर लाए गए थे कि कल नया खरीद कर वापस कर दूंगा। तो ताले की भी मजबूरी रही होगी शायद। वो लटका था और कई कहानी रात की कह रहा था। वो तो रातों रात चले गए और लोगों की बातें, शिकायतें सुनने के लिए इसे लटका गए। ताला भी आखिर मजबूत दिल वाला था। वो भी बिना बेचैन हुए सब की बातें, लानतें सुन रहा था। लोग यही तो कह रहे थे कि बिना बताए चले गए। मेरा 10 हजार उनके पास था। तो कोई कहता मेरी साइकिल उनके पास थी। बैंक पास के साव जी भी आ गए कहने लगे एक महिने से राशन ले रहे थे अचानक पैसे लेकर भाग गए।
अरे भाई आप भी कहां रहते हैं? इसी दुनिया में रहिए। जब उन्हें मकान बेच कर जाना ही था तो फिर इस शहर और शहर के लोगों स ेअब क्या लेना देना। क्यों भला वो पैसे लौटाते? क्यों किसी से लिए उधार चुक्ता कर जाते। कौन उनसे पैसे लेने नए शहर जाएगा। कुछ दिन की ही तो बात है लोग बोल बोल कर थक जाएंगे। धीरे धीरे भूल जाएंगे। जैसे बसंतु वाली घटना अब किसे याद है। सब भूल ही तो गए। मान लिया कि अब वो पैसे नहीं मिलेंगे। यह भी संतोष कर लिया कि आकर दिखाए यहां। मगर जिसके पैसे लेकर बसंतु गया वो तो रो ही रहे थे। कईयों की गहरी कमाई लेकर चंपत हो गए थे बसंतु। मगर कहते हैं न कि समय इज द बेस्ट पेन हिलर सो सब कुछ ठीक हो जाएगा।
याद आता है कैसे इस मुहल्ले में सबों ने धीरे धीरे मकान- दुकान, बच्चे करिअर बनाए थे। स्कूटर से कार तक का सफर तय किया था दुलुकन बाबु ने। और पंडीजी के घर में कैसे पहली बार मजमा लगा था जब दिल्ली की बहुरिया आई थी। इन्हीं गलियों में खेल कर सभी के बच्चे जवान दाढ़ी मूछ वाले हुए थे। सर्दियों में रजाई दुकान से नहीं आती थी लोगों के घर से मांग कर आती थीं रात भर के लिए। दाल-सब्जी और चीनी की मित्रता थी घरों में। यह सब अब आंखों के आगे घूमनेे लगे हैं। हर कोई हर किसी के रिश्तेदार से भी परिचित था इस मुहल्ले में। सब कुछ सारे रिश्ते तार तार कर कैस कोई जा सकता है।

Monday, January 27, 2014

आदरणीय यमराज जी,

आदरणीय यमराज जी,
सादर चरण स्पर्श। सबसे पहले तो मांफी मांगता हूं कि मुझे जिस तरह से स्कूल में पत्र लिखना सिखाया गया था उसी तरह लिख रहा हूं। और कौन कौन से संबोधन लिखने चाहिए इसका इल्म नहीं है मुझे। मैं आपको पत्र इसलिए लिख रहा हूं कि मुझे आपसे कुछ बात करनी है। आप चैंके नहीं। मैं नचिकेता नहीं हूं कि तीन वरदानों में आपसे आपकी नगरी का रहस्य मांग बैठूं।
आगे बात यह है कि यमराज जी आप कई बार बिना बताए बिना किसी सूचना के आधमकते हैं ऐसे में बहुत अफरा तफरी मच जाती है। बहुत से काम अधूरे रह जाते हैं। कितना अच्छा हो कि आप आने से पहले थोड़ी सूचना बरसा सकें। इससे कम से कम इतना तो हम कर ही सकते हैं कि थोड़ी तैयारी कर लें। मगर यह कहना भी उचित न हो क्यांेकि आपके बारे में यही सुना है कि आप बिना बताए ही आ जाते हैं। कोई सूचना नहीं कोई खबर नहीं। बस आपके भेजे दूत आते हैं और लेकर चले जाते हैं।
आईटी का जमाना का है। लैपटाॅप, आईपैड, वाइ फाई कई साधन आ चुके हैं। आप चाहें तो वाट्स एप्प, विवर, जैसे चैट माध्यमों का इस्तेमाल कर सकते हैं। अब तो विवर पर काॅल का भी पैसा नहीं लगता। आईएसडी हो या एसटीडी कोई काॅल बड़े आराम से कर सकते हैं। काॅल न सही कम से कम एक एसएमएस ही टपका दें ताकि दे सकें कि आप आने वाले हैं।
बुरा न मानें प्रभू होता क्या है कि आप जब अचानक आते हैं तब बुरा लगता है। इसलिए बुरा लगता है क्योंकि आपके साथ जाने के बाद कितनों के लिए उधार बिना चुकता किए रह जाते हैं। कितनों से किया गया वायदा यूं ही धरा का धरा रह जाता है। जिनसे उधार लिए हैं उन्हें चुका कर न जाओं तो खामखा बुराई करते हैं। क्या पता मेरे जाने के बाद मेरे परिजन उसे लौटाएं या नहीं। बिना वजह आप पूछेंगे कि फलां फलां को उधार कर के आए हो जाओं वापस और लौटा कर आओ। इसलिए प्रभू पूर्व सूचना दें तो इस तरह के काम निपटान में आसानी होगी।
मान्यवर! टापकी व्यवस्था में हजारों लोग काम कर रहे होंगे। मैं चाहता हूं कि वहां भी निठल्ला न बैठूं सो अपना सीवी भेज रहा हूं। आपके सिस्टम में कुछ काम मिल जाए तो मरना सफल हो जाएगा। मैं लेख, कविता, कहानी और साक्षात्कार आदि लिखता हूं। आप चाहें तो जिन्हें कविता पसंद हो उन्हें कविताएं सुनाउं। जिन्हें बोर करना हो तो ऐसी भी रचनाएं मेरे पास हैं जैसे जैसे लंबे लेख। जिन्हें सुन कर ही प्रताडि़त किया जा सकता है। सर जी डक्यूमेंटशन भी करता हूं। पूरे साल का लेखा जोखा फोटू सहित तैयार कर दूंगा ताकि आपको ज्यादा मेहनत न करनी पड़े। आपका दस्तावेजीकरण का काम भी बखूबी कर सकता हूं। आप कहें तो पीपीटी भी बना दूंगा प्रभू। सीधे उसको प्रेजेंट कर सकते हैं। उसमें विजुअल भी डाल दूंगा ताकि देखने वाले को पूरा का पूरा विश्वास हो सके। यदि आपके पास प्रोजेक्टर की व्यवस्था नहीं है तो ज़रा भी संकोच न करें प्रभू मैं अपने साथ लेकर आ जाउंगा। ओह! भूल गया था कि आपके पास खाली हाथ ही जाना पड़ता है सो मजबूर हूं। यह व्यवस्था तो आपको खुद ही करनी पड़ेगी।
हां एक बात और कहना चाहता हूं कि मैं रिपोटिंग भी कर लेता हूं। यदि चाहें तो आपके नगर वासियों को लाइव व प्रिंट रिपोर्ट भी मुहैया करा सकता हूं। आप कहेंगे तो किसी बड़ी हस्ती का इंटरव्यू भी ले लूंगा। बहुत साल अखबारों में गुजारे हैं सो इसका भी अनुभव है।
आपकी विश्वास पात्र

Friday, January 24, 2014

फेल कर के दिखाओ
‘बच्चों में डर खत्म हो गया है। वो पास के गुजरते हैं और गुटका थूक कर चले जाते हैं। पढ़ने में उनका मन नहीं लगता। मैडम पास तो कर ही दोगो। फेल नहीं नहीं कर सकते। यह बात बच्चों और उनके पेरेंट्स दोनों को मालूम है। इसलिए बच्चों में पढ़ने की लालसा खत्म हो गई है। हमारे हाथ बंधे हैं। हम किसी को भी कक्षा में रोक नहीं सकते। हर किसी को चाहे उसे आता हो या नहीं हमें उसे दूसरी कक्षा में धकेलना ही पड़ता है।’
जिस डर और विचारों को लिखा गया यह लेखक की पंक्तियां नहीं हैं बल्कि ये विचार कई अध्यापकों के हैं। वो कहते हैं कि पेपर में कई बार हमें गाने लिखे मिलते हैं। कुछ बच्चों ने स्पष्ट लिखा कि फेल कर के दिखाओ। उन्हें मालूम है कि शिक्षक के बस में फेल करना नहीं है।
आरटीई की बुनियाद में यह भी है कि कक्षा 8 वीं तक किसी भी बच्चे को फेल नहीं कर सकते। सभी बच्चों को आठवीं तक मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा देना सरकार की जिम्मेदारी है। लेकिन विचार करने की बात है कि क्या यह शिक्षा है या साक्षरता। क्या शिक्षा डर सिखाती है या मुक्ति?
शिक्षा क्या मूल्य देती है या हमें पूर्वाग्रही बनाने में मदद करती है। विचार तो करना ही होगा यदि बच्चों में जीवन मूल्यों का क्षरण हो रहा है तो कहां और कौन इसके लिए जिम्मेदार है इसकी पहचान कर उसे दुरूस्त करना ही होगा।
अध्यापिकाओं एवं अध्यापकों को जेंडर सेंसेटाइजेशन, मूल्यपरक शिक्षा और आरटीई पर बातचीत करते हुए दिल्ली के सरकारी स्कूलों के टीचर्स के साथ




Monday, January 20, 2014

बाॅस की प्रकृति


कौशलेंद्र प्रपन्न
मैं ही क्या दुनिया के हज़ारों- हज़ार लोग अपने बाॅस की प्रकृति से न केवल प्रभावित होते हैं बल्कि त्रस्त भी होते हैं। कुछ के बाॅस जीवन में प्रेरक बन कर आते हैं तो कुछ की जिं़दगी में सुनामी बन कर। बाॅस राय, वर्मा, शर्मा, जुनेजा, तनेजा, तिवारी, कपूर और भी अन्य उपनाम के रूप में हो सकते हैं। तत्वत: बाॅस की प्रकृति में कोई ख़ास अंतर नहीं होता। क्योंकि स्वभावतः बाॅस अपने नीचे काम करने वाले को गोया इंसान ही नहीं मानते। यदि बाॅस रात के 1 बजे काॅल करे तो भी काम होना चाहिए। उनके घर के काम भी हंस हंस के जो करे वो सबसे ज्यादा करीब होता है। स्वभाविक भी है जो हर वक्त बाॅस के आस-पास टघरता है वो बाॅस को कैसे नहीं याद रहेगा। वैसे कहा जाता है कि घोड़े के पिछाड़ी और बाॅस के अगाड़ी कभी नहीं आना चाहिए, लेकिन आज की तारीख में कई ऐसे महारथी हैं जो बाॅस की कृपा से कहां से कहां पहुंच चुके हैं। कुछ करिअर में उछाल का आनंद ले रहे हैं जो कुछ जाॅब से भी हाथ धो चुके हैं। कई के बाॅस अपनी आॅख की किरकिरी को कहीं और भी टिकने नहीं देते।
बाॅस दरअसल नेता होता है। नेता माने नयति इति नेता। जो सदा सर्वदा आगे ले जाने वाला हो। यानी नेता व बाॅस वो होता है जो समाज को रास्ता दिखाए और आगे ले जाए। यदि नेता की दृष्टि स्पष्ट न हो या पूर्वग्रह का शिकार हो जाए तो उस कंपनी व संस्था के साथ ही वहां काम करने वाले अन्य कर्मचारियों के लिए लाभकरी नहीं माना जा सकता। मैनेजमेंट के छात्र व वेत्ता बेहतर बता सकते हैं कि एक बाॅस की प्रकृति यानी उसका स्वभाव किस तरह से न केवल बाॅस के लिए बल्कि संस्था के लिए भी हानिकारक साबित होता है। बतौर बाॅस की अपनी कुछ सनकें भी होती हैं। वो अपने ज्ञान, समझ, कौशल के आगे अपने अंदर काम करने वालों को ज़रा भी तवज्जो नहीं देता। बल्कि कई बार अपनी गलती को न वो स्वीकारता है और न वह नवज्ञान से खुद को ताज़ा करता है। क्योंकि ऐसा करने से उसका अहम उसे रोकता है। और इस तरह से ख़ुद को सही साबित करने के उपक्रम में अपने अंदर काम करने वाले को गलत साबित करने के तमाम हथकंड़े अपनाता है।
बाॅस की प्रकृति कैसी हो, एक बाॅस के अंदर किस किस तरह के गुण होने चाहिए आदि सवालों का जवाब तो मैनेजमेंट के जानकार दे सकते हैं, लेकिन एक आम धारणा की दृष्टि से देखें तो बाॅस की क्लालिटी कंपनी को बेहतर ढंग से चलाने की होनी चाहिए। प्रबंधन के तमाम गुर उसे आना चाहिए कब किसी की भावना को सहलाना है, कब किस के साथ सख्ती बरतनी है? किस के साथ कब कैसे बर्ताव करना है आदि ऐसी बुनियादी मांगें होती हैं जिनपर बाॅस को खरा उतरना चाहिए। लेकिन आज की तारीख में अधिकतर प्रोन्नति, उछाल किन गुणों के आधार पर होते हंै यह किसी से भी छुपा नहीं है। जब कोई बाॅस की नजरों में चढ़ जाता है या पसंद आ जाता है तब बाॅस जो कुछ भी करता है वही नियम बन जाते हैं। वही सही होता है।
हां समाज में देखा जाता है कि बाॅस कई बार आत्महत्या करने पर भी मजबूर कर देता है। व्यक्ति मानसिक रूप से इतना परेशान हो जाता है कि वह आत्महत्या तक सोचने लगता है। यह किसी भी नजर से न तो मानवीय है और न उचित ही। लेकिन आम जीवन में बाॅस ऐसे भी आते हैं कि आप न तो आॅफिस में चैन से काम कर सकते हैं और न घर में सुस्ता सकते हैं। नींद में भी बाॅस की बातें, ताने और चेहरे आपको सोन नहीं देते। एक बार बाॅस की नजर में आप नकारे हो गए तो लाख कोशिश कर लें वह आपको उसी चश्में देखता है। दरअसल बाॅस वह कुर्सी होती है जिसपर सबकी आशा भरी निगाह लगी होती है। वह चाहे सकारात्मक हो या नकारात्मक। कब बाॅस बदले की हम अपनी तरह से काम करें। अपनी फाइल आगे बढ़ाएं आदि उम्मींदें कितनों की पूरी होती हैं यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि आने वाला बाॅस किस पाले है।
सचपूछा जाए तो बाॅस की कुर्सी पर बैठना कोई आसान काम नहीं होता। पहले तो बाॅस की कुर्सी के लायक खुद को साबित करना पड़ता है और फिर सब को खुश रखने की चुनौती से भी सामना करना पड़ता है। सच तो यह भी है कि कुर्सी कभी भी सभी को खुश नहीं रख सकती। लेकिन इन्हीं चुनौतयों के बीच एक मकूल रास्ता भी निकलता है कि कैसे आप मानवीय रहते हुए अपनी बाॅसीय प्रकृति को जीते रहें। यानी कंपनी, आफिस काम भी चलता रहे और आप किसी की जिंदगी को नर्क बनाने से बचें। क्योंकि एक खराब बाॅस न केवल एक की जिंदगी को प्रभावित करता है कि बल्कि प्रकारांतर से उसके साथ परिवार, मित्र और समाज को भी खासे चपेट में लेता है। एक बार यदि बाॅस इन बिंदुओं पर सोचों तो शायद उनकी आंखें खुलें।

Friday, January 17, 2014

किताब का आधार नंबर


कौशलेंद्र प्रपन्न
हर किताब की अपनी अलग पहचान और छवि होती है। कोई कहानी, उपन्यास, आलोचना, निबंध, लघु कहानी, होती हैं तो कुछ महाकाव्य, खंड़ काव्य तो कुछ वृहद ग्रंथ। हर किताब अपनी निजी बुनावट की वजह से अलग ही दिखाई देती हैं। इन किताबों को जन्म देने वाला लेखक तय करता है कि कौन सी किताब की क्या रूपरेखा होगी और किस किताब की रचनात्मक गति क्या होगी। एक बार जब किताब का बीज किसी सृजक के मन में पड़ता है बस वहीं से किताब का जन्म होता है। किताब के गर्भाधान से लेकर उसके सोलहों संस्कार तक उसका जन्मदाता यानी लेखक जुड़ा होता है कि जैसे पिता अपनी संतान से जुड़ा होता है। हां यह कहना ज़रा मुश्किल है कि किताब का अंतिम संस्कार होता भी है या नहीं। जब जर्जर अवस्था में किताब पहुंच जाती है तब उसे लाइब्रेरी से तो विड आउट कर दिया जाता है। लेकिन वह पाठकों के मन से आउट नहीं हो पाती। कई किताबें बड़ी सौभाग्यशाली होती हैं जिनका पुनप्र्रकाशन भी होता है। इस बात से इंकार करना कठिन है कि किताबें भी मानव जीवन में ख़ास स्थान रखती हैं। किताबों  बगैर जीवन की कल्पना करना एक खाली कमरे से कम नहीं है। निर्मल वर्मा ने कभी कहा था कि वे शहर बड़े दुर्भागे हैं जिनके पास अतीत के खंड़हर नहीं हैं। उसी तरह कह सकते हैं कि जिस घर में किताबें नहीं हैं वे घर बड़े दुर्भागे होते हैं। जिस घर में किताबें होती हैं वहां एक शब्दों की दुनिया सांस लेती है। किताबों से हमारा वास्ता गोया कई सदियों का है। हर किताब की अपनी पर्सनालिटी होती है। कुछ किताबें अंतर्मुखी होती हैं और तो कुछ बहिर्मुखी।
एक बार लेखक जब किताबों का आकार, देह देता है उसी वक्त वह किताब गर्भवत् शिशु की तरह अपनी आयु भी लेकर आता है। एक लेखक किताब की विधा खुद तय करता है। बल्कि कहना चाहिए रचना की विधा कौन सी हो यह लेखक पर निर्भर करता है। वह गद्य,पद्य की किस विधा में किताब को जन्म देना चाहता है यह पूरी तरह से लेखक के विवेक, कौशल और गति पर निर्भर करता है। क्योंकि लेखक को ही आगे किताब को पूरी यष्टि प्रदान करनी है इसलिए लेखक से बेहतर कोई दूसरा यह तय नहीं कर सकता कि रचना किन पाठकों के लिए है। लेखक अपनी रचना का सृजक अवश्य होता है लेकिन उसे समाज में लाने वाला प्रकाशक होता है। ठीक उसी तरह जैसे बच्चा अस्पताल में जन्म लेता है। प्रकाशक किताब के नैन नक्श, आकार प्रकार, रूपसज्जा आदि करता है। एक मुकम्मल पहनावे के साथ यानी बुक जैकेट जिसे कवर पेज करते हैं, के बाद छापता है। याद करें कि यदि किताब भी एक पर्सनालिटी है तो उसकी भी कोई पहचान होनी चाहिए। जैसे हर इंसान को सरकारी पहचान के लिए पहचान पत्र, आधार नंबर, पासपोर्ट मिलता है व बनाना पड़ता है उसी तरह किताबें भी भीड़ में खो न जाएं इसलिए उन्हें भी प्रकाशक एक आधार नंबर यानी आइ एस बी एन नंबर प्रदान करता है। यह हर किताब को मिलना आवश्यक है।
लेखक अपनी ओर से कहानी, उपन्यास आदि में पात्रों, घटनाओं, चरित्र चित्रण आदि को तय कर देता है। तब किताब का जन्म हो जाता है। उसके बाद वह किताब पाठकों, आलोचकों के हाथ में आ जाती है। किताब कैसी है, उसकी भाषा, शैली, कथानक आदि की आलोचना, तुलना एवं समीक्षा का दौर शुरू होता है। दूसरे शब्दों मंे कहें तो बच्चा जन्म लेने के बाद मां की गोद से निकल कर जब समाज में आता है तब उसका मूल्यांकन समाज करता है। बच्चे के संस्कार, मूल्य, परवरिश आदि की जांच पड़ताल समाज के हिस्से होता है। साथ ही समाज का जिम्मा न केवल जांच-पड़ताल करना है, बल्कि किताब का सही मूल्यांकन हो इसकी भी जिम्मेदारी समाज की है। लेखक ने तो जो लिखना था वह उसने लिख दिया। अब यह उत्तरदायित्व समाज यानी किताब का समाज ‘पाठक, आलोचक सेे बनता है’, का बन जाता है कि किताब में बनाई गई दुनिया में क्या कमी रह गई। किस स्तर पर किताब कमजोर रह गई। लेखक से कहां चूक हो गई आदि कमजोर पहलुओं की ओर लेखक का ध्यान दिलाना आलोचक का मकसद होता है। इसके साथ ही दूसरे लेखकों को रास्ता दिखाना भी उद्देश्य होता है जो लेखन कर्म से जुड़े हैं। यदि कोई किताब लिख रहा है तो पूर्व के लेखकों की कमियों से कैसे बचा जाए इस ओर भी इंशारा करने का दायित्व आलोचक एवं पाठक का होता है। प्रतिक्रिया वह सूराख है जहां से पाठकों की बात लेखक तक पहुंचती है। पाठक जिस किताब को पढ़ते हुए बोर होने लगे तो समझना चाहिए कि कहीं न कहीं लेखक से कोताही बरती गई है। वरना किताब का जादू तो पाठक को अपनी ओर खींचने के लिए काफी होना चाहिए।
हर किताब की अपनी मैग्नेटिक शक्तियां होती है। मैग्नेटिक शक्तियां ही तो होती हैं जिसकी वजह से हजारों, लाखों पाठक अमुक किताब को पढ़ने के लिए मूल पाठ से लेकर अनूदित भाषा तक में किताब को तलाशते हैं। देवकी नंदन खत्री की किताब चंद्रकान्ता संतति को पढ़ने के लिए पाठकों ने हिन्दी सीखी। यह प्रेमचंद को पढ़ने के लिए गैरहिन्दी भाषा पाठको ने या हिन्दी सीखी या फिर अनुवाद का इंतजार किया। किताब की जादुई शक्तियां ही थीं कि उसे भाषायी चैहद्दी से बाहर भी पाठकों का एक बड़ वर्ग मिला। विश्व की कई क्लासिक साहित्य हैं जिनके अनुवाद कई भाषाओं में इसलिए हुए कि पाठकों की मांग समुद्र की सीमा को भी पार कर गए। हालिया किताब हैरी पाॅटर के साथ जुड़े पाठकों की घटना के साथ किताब की मैग्नेटिक ताकत का अंदाजा लगाया जा सकता है। यदि किताब में कंटेंट ताकतवर नहीं होगा तो वह हजारों लाखों की किताबों की भीड़ में खो जाएगी। आज दुनिया में रोजदिन हजारों लाखों किताबें जन्म लेती हैं और कहीं अंधेरे में खो जाती हैं। काफी हद तक लेखक पर निर्भर करता है कि उसकी रचना व किताब भीड़ में खो जाए या भीड़ में भी अपनी पहचान बनाए रखे।
जो लोग इस डर व आशंका से ग्रस्त हैं कि किताबों की मौत हो चुकी है। इंटरनेट के आ जाने से किताबें मर रही हैं, पाठक वर्ग सिमटते जा रहे हैं आदि सवाल सच पूछा जाए तो सही नहीं है। क्योंकि यदि ऐसा ही होता तो हर साल प्रकाशक किताबें न छापता और न लेखक लिखता। इसके बरक्स किताबें लिखी भी जा रही हैं और छप भी रही हैं। यह अलग विमर्श का मुद ्द हो सकता है कि छपने वाली तमाम किताबें अपनी पहचान बनाने सफल हो पाती हैं या नहीं। क्या वे अपनी पूरी उम्र जी पाती हैं या अकाल मृत्यु को प्राप्त होती हैं।
विश्व पुस्तक मेला का समय पास आ रहा है। हर प्रकाशक लेखक चाहता है कि उसकी किताब इस विश्व पुस्तक मेले में आ जाए। हर स्तर पर कोशिशें तेज हो गई हैं। प्रकाशक रात दिन एक कर बेहतर कलेवर में किताबें छापने में लगा है। किताब के कलेवर, साज सज्जा भी उतना ही जरूरी है जितना की कंटेट। इसलिए कवर पेज डिजाइनर की भी भूमिका से मंुह नहीं मोड़ सकते। एक किताब की सफलता के पीछे कई लोगों का हाथ होता है। यही पर्याप्त नहीं है कि लेखक ने अच्छी व बुरा किताब लिखी। बल्कि उसे प्रकाशक, डिजाइनर, वितरक दुकानदार ने क्या अपनी पूरी जिम्मेदारी का निर्वहन किया। क्योंकि यह पूरी कड़ी है। कहीं भी कोई कड़ी कमजोर रह गई तो किताब लिखे जाने और छपे जाने के बाद भी अंधेरे की जिंदगी बसर करने पर मजबूर हो सकती है।

Thursday, January 16, 2014

आलोचना उपेक्षिता


आलोचनाएं यदि सार्थक हों तो साहितय व रचना को एक व्यापक विस्तार मिलता है। बल्कि न केवल रचना सर्वजनीन होती है अपितु लेखक को भी दृष्टि मिलती है कि वो आगे इन बातों को ध्यान अपनी रचना रखे। एक पाठक भी रचना का सही समीक्षक होता है किन्तु उसे किन शब्दों और किन कमियों की वजह से रचना कमजोर रह गई उस ओर इशारे करने का व्याकरण और भाषा की कमी होती है। यदि पाठक के पास उसकी बात कहने की भाषा हो तो आलोचक की कमी न महसूस हो।
साहित्य, कला, रंगकर्म, फिल्म आदि ऐसी विधाएं हैं जहां समीक्षा, आलोचना, प्रतिक्रियाएं खास महत्व रखती हैं। यदि आलोचना गंभीरता से हो तो रचना में निखार आने की पूरी संभावना होती है। साहतय मे माना जाता है कि आलोचनाएं मुंह देख कर की जाती हैं। मधुर भी रहे और छप भी जाए। बेशक उस आलोचना से न लेखक को कुछ व्यापता है और न पाठक को। कुछ बड़े आलोचकों व कहें लेखकों का मानना है कि हिन्दी में तो आलोचना नाम की कोई चीज है ही नहीं। यदि आलोचना के नाम पर कुछ हो भी रहा है तो वह महज समीक्षाएं हो रही हैं। मेरा तो मानना है कि वह समीक्षाएं भी नहीं हैं वे महज पुस्तक परिचय तक ही सीमित हैं। फलां किताब में इतने पाठ हैं। इस पाठ में यह है। इतने पात्र हैं। उन पात्रों की भाषा यह है आदि। समीक्षा थोड़ी आगे बढ़ी तो किताब में लेखक व रचनाकार ने भाषा के साथ न्याय किया है। शैली रोचक है। कथानक अच्छी है या किसी और किताब की छाया प्रतीत होती है। इससे आगे निकल कर समीक्षाएं कोई मुकम्मल रोशनी आने वाले लेखकों को नहीं देतीं।
हर साल अंतिम पखवाड़े में अखबारों में पूरे साल की महत्वपूर्ण किताबों की सूची और विन्डो शाॅपिंग सी समीक्षा करने का चलन है। जिसमें किसी भी एक दो किताब पर चार पांच लाइन लिख कर आगे बढ़ जाने की परंपरा है। उस समीक्षा का कोई खास मायने नहीं रह जाता। इस तरह की समीक्षाओं की विश्वसनीयता भी कोई ज्यादा नहीं होतीं क्योंकि समीक्षक की सूची में कमोबेश वही किताब स्थान ले पाती हैं जो या तो बहुत चर्चित रहीं या फिर जाने माने नाम रहे। बाकी पत्रिकाओं, अखबारों में तो समीक्षा के काॅलम में भी किताबें बाहर कर दी जाती हैं। पुस्तकें मिलीं काॅलम में कहीं पड़ी किताबें जरूर यह गुहार लगाती हैं कि हम पर भी नजर इनायत हो सरकार। मगर काॅलम की सीमा और वैचारिक झुकाव के आगे वे किताबें महज प्रकाशन स्थान, वर्ष, पेज, मूल्य की सूचनाओं से आगे नहीं जा पातीं।
साहित्य की पत्रिका हो या गैर साहित्यिक दोनों ही स्थानों पर पुस्तक की आलोचना की जगहें सिमटती गई हैं। आलोचना के स्थान पर समीक्षाएं व कह लें परिचय ही छपती हैं। एक बात और भी है कि लेखक ही जब समीक्षक हो जाता है तब यह काम ज़रा गंभीरता की मांग करता है। एक लेखक के जौर पर उसकी अपनी पूर्वग्रहें भी होंगी। जिससे निजात पाना थोड़ा कठिन होता है। आलोचना कर्म माना गया है कि लेखने से कहीं ज्यादा कठिन और श्रमसाध्य है। उसमें रचनाओं को पढ़ने की समझ, भाषा, कहने की कला और रचनाओं के बीच में छुपी कमियों को पकड़ने का कौशल होना चाहिए तभी एक लेखक आलोचना कर्म में सफल हो सकता है।
अव्वल तो आज अपनी किताब के नाम पर कुछ गिने चुने लेखकों की पढ़ने की आदत सी बन गई है। जब हम दूसरे लेखकों को पढ़ते हैं तब पता चलता है कि कौन क्या लिख रहा है केसा लिख रहा है। लेकिन लेखकों के मध्य भी पढ़ने के अपने पूर्वग्रह देखे जा सकते हैं। यह पूर्वग्रह न केवल पढ़ने के स्तर पर हैं बल्कि रचना की समीक्षाएं और राय बनाने तक दिखाई देती हैं। यदि किसी किताब की खरी खरी आलोचना की जाए तो संभव है संपादक उसे या तो छापेगा ही नहीं या फिर उसके धार को कुंद कर छापेगा। संपादन के नाम पर रचना की हत्या कोई आम बात नहीं है। यह अकसर देखा जाता है कि रचनाओं को संपादन की मार भी खूब सहनी पड़ती हैं। उस संपादन के आगे रचना विवश और असहाय हो जाती है। दूसरे शब्दों में कहें तो रचनाओं के साथ कई स्तरों पर भेदभाव होता है। लेखन से लेकर संपादन और समीक्षा तक। रचनाएं हाशिए पर धकेल दी जाती हैं। हाशिए पर खड़ी रचनाएं अपने साथ न्याय की आवाज किस अदालत में उठाए। कहां उसकी सुनी जाएगी। यह भी गंभीर मुद्दा है। क्योंकि रचनाकार मानता है कि एक बार रचना का जन्म हो चुका व छप चुकी उसके बाद उससे लेखक की दूरी स्वभाविक हो जाती है। वहीं संपादक रचना को अपनी संपत्ति माने तो उसके साथ समुचित बर्ताव करे लेकिन वह तो फलां लेखक की है। फलां धड़े की है बांटकर रचना को विलगा देता है।
कविता, कहानी, उपन्यास, व्यंग्य आदि रचनाओं की समीक्षाएं अमुमन अखबारों एवं पत्रिकाओं में देखने-पढ़ने को मिल जाती हैं लेकिन बाल साहित्य, बाल लेखन यानी बच्चों के लिए लिखी गई रचनाओं को तो आलोचक गोया रचना ही नहीं मानते। मानो यह भी कोई साहित्य है इस ओर ध्यान देना जैसे बचकाना कर्म है। आलोचना और समीक्षा के आंगन में वही पुस्तकें व लेखक स्थान ले पाते हैं जो किसी न किसी तरह से पाठक का ध्यान खींच पाने में सुल हुए हैं। ऐसी बहुत सी किताबें हर साल छपती हैं जो किसी की निगाह में भी नहीं आ पातीं और गोदाम में या फिर लेखक के स्वजनांे के घर में शोभा बढ़ाती हैं।
आलोचना उपेक्षिता रचना और रचनाकार की मनःस्थिति को भी समझने की आवश्यकता है। एक रचनाकार अपने आप को ईश्वर मान लेता है। वही भाग्यविधाता है अपनी रचनायी दुनिया का। यह सही है कि वही सृष्टिकर्ता है अपनी रचना संसार कां वही तय करता है अपने पात्रों की नियति और परिणति। वही उत्थान और पतन भी लिख डालता है जिसके आगे रचना नतमस्तक होती है। लेकिन इससे आगे जाकर सोचने की बात यह है कि क्या लेखक लिखने से पूर्व इस बिन्दु पर भी ठहर कर सोचता है कि उसकी रचना की मांग है भी या नहीं? उसकी रचना रचना के उद्देश्य को पूरी करती है या नहीं? क्या पाठक वर्ग उससे कुछ जीवन मूल्य हासिल कर पाएगा या नहीं? आदि सवाल कटू तो हैं पर जरूरी भी हैं। कई बार लेखक मान कर चलता है कि उसका कर्म महज लेखन तक सीमित है। चाहे आलोचक पढ़े या न पढ़ वह उसकी जिम्मेदारी नहीं है। जबकि होना यह चाहिए कि लेखक को इस जोखिम को भी अपने कंधे पर लेना चाहिए।
व्यंग्य की ही बात करें तो परसाई, शरद जोशी, अंजनी चैहान, ज्ञान चतुर्वेदी, प्रेमजनमेजय, लालितय ललित, सुभाष चंदर, हरीश नवल आदि ने क्या लिखा और वो व्यंग्य को कितना सवंर्द्धित करते हैं इसकी भी बिना वैचारिक पूर्वग्रह के समीक्षा की मांग करती है। जो भी व्यंग्य लिख रहा है व अन्य रचनाओं में गति रखता है उसके पास भाषा है इससे तो इंकार नहीं कर सकते। हां विचार करने की बात यह है कि क्या वह लेखक अपनी रचना के साथ पूरा न्याय कर रहा है। क्या उसकी लेखनी रचना आज की चुनौतियों का सामना करने में समर्थ है? क्योंकि महज यह कह देने भर से बात नहीं बनती कि फलां के पास भाषा है, शैली है और कहने को बहुत कुछ है। कहना यह भी पडे़गा कि क्या जो वह कह रहा है वह लेखन की परंपरा को अग्रसारित करने योग्य है भी या नहीं।
समकालीन आलोचकों व समीक्षकों के इशारे भी समझने की आवश्यकता है। समीक्षक किस मानसिक बुनावट के तहत कह रहा है उसे भी समझना होगा। क्या वह रचना के हित में है? क्या वह सिर्फ कलम चलाने और छपने के लिए समीक्षा कर रहा है या उसकी समीक्षा के पीछे उद्देश्य रचना की जांच पड़ताल करना है। वैयक्तिक रूचियां और रूझान भी कई बार रचना को हाशिए पर खड़ी कर देती हैं। इसलिए आलोचना वैसी की जाए जिससे कोई सार्थक दृष्टि न केवल लेखक को मिले बल्कि पाठक को भी पाठ को समझने में मददगार साबित हो। इसलिए ग्रंथों को समझने के लिए भाष्य लिखे जाते हैं, टिकाएं लिखी जाती हैं। लेकिन एक आम किताब को समझने के लिए भाष्य न सही समुचित औजार तो आलोचक दे ही सकता है जिससे आप लेखक की रचना को बेहतर समझ सकें।
कौशलेंद्र प्रपन्न

Wednesday, January 15, 2014

हम न मरब मरीहें संसारा


हम में से कितने ऐसे हैं जो सोचते हैं कि वो नहीं मरेंगे। तकरीबन सब यही सोचतते हैं कि हमें तो मरना ही है। आज या कि कल। मरना तो चींटी भी नहीं चाहती। संसार का कोई भी प्राणी भला क्यों मरना चाहेगा यहां कि सुख सुविधा और चाक चिक्य को छोड़ कर अज्ञात स्थान में क्यों जाना चाहेगा। फिर ये कबीर को क्या हो गया? उन्होंने ऐसी बात क्यों लिखी कि हम न मरब। मरीहैं संसार। कुछ तो दर्शन विमर्श रहा होगा कबीर के अंदरूनी जगत में।
हां पंच तत्व तो पंच तत्वों मे मिल जाएंगे। भौतिक मौत तो हो जाएगी। शरीर तो खत्म हो जाएगा। लेकिन जनाब जिससे प्रेम किया। वो तो प्रेम बरकरार रहेगा। वो तो आपके लिए नम होगी या होगी। ऐसे में आप लोगों के दिलो दिमाग में बसे ही रहेंगे। किसी से उधार लिया, किसी को जीवन भर खूब कोसा, गालियां दीं। तरक्की के लिए किसी को धकेला। भाई का हक हडप लिया जो जीवन भर किया वह तो आपके जाने बाद भी बना रहेगा। कम से कम मरनी पर न बोलें लोग लेकिन बाद में तो बोलेंगे ही। स्याला फलां फलां को बहुत सताया।
अच्छी व बुरी दोनों ही स्मृतिया ंहम अपने पीछे छोड़ जाते हैं। जो नहीं जाता साथ वह आपका जीवन भर का रुपया पैसा नहीं जाता। जो साथ जाता है वह बस आप ही होते हैं। आपके साथ न सहोदर, सहोदरी जाती है न पिता-माता, पत्नी, प्रेमिका कोई भी तो नहीं जाता। जाता है निपट अकेला लंगड़ा सुपना।
जीवन के विस्तार और लंबी सड़क पर हमें तय करना होता है कि हमें कहां तक जाना है। जाने क रास्ते भी खुद ही तय करने होते हैं। अपने लिए मंजिल भी हमें ही चुनना होता है। यह अलग बात है कि कभी कभी मंजिल आपको चुनती है। लेकिन यह तो तय करना ही होगा कि हमारी अपनी सीमाएं क्या हैं और हम कहां तक क्या कर सकते हैं। क्योंकि मरने के बाद कोई नहीं पूछने वाला कि आपने फलां काम अधूरा क्यों छोड़ दिया। वैसे कहने वाले कहते हैं कम से कम बेटी का ब्याह तो कर जाता। बेचारी पर डाल कर चला गया। तो सुनना तो पड़ेगा ही। कबीर ने गलत नहीं कहा मरीहैं संसारा। हमारे लए संसार मरेगा। यानी संसार को जो आपने परेशान किया उसके लिए लोग आपको कोसेंगे। जिसके लिए आप मरे वो आपके लिए मरेगा।

Tuesday, January 14, 2014

टोल के बाद की सड़क


कौशलेंद्र प्रपन्न
जी यदि आप दिल्ली छोड़कर हरियाणा, यूपी या उत्तरा खंड़ की ओर निकलते हैं तब एक अलग दुनिया से वास्ता पड़ता है। नोएडा से आगरा एक्सप्रेस वे पर दौड़ना जितना मजा आता है वह मजा किर किरा तब होता जाता है जब मथुरा, वृंदावन, आगरा की देसी सड़कों पर उतरते हैं। वही मंजर हरियाणा के बहादुरगढ़ छोड़ते झझ्झर की ओर निकलते हैं तब भी कमाल की सड़क मिलती है। लेकिन जैसे ही प्रतापगढ़ की ओर मुड़ते हैं वैसे ही सड़क का सौंदर्य जाता रहता है। चलिए गाजियाबाद की ओर से हरिद्वार की ओर ले चलते हैं। राज नगर एक्सटेंशन तक रोड़ वाकई अच्छी है। जैसे ही मोदी नगर और मुरादनगर की ओर दौड़ते हैं तब सड़क का समाज शास्त्र का दर्शन होता है। मुजफ्फरनगर से रूड़की की ओर निकलते हैं तब टोल रोड़ पर सरपट दौड़ते हुए कुछ ही घंटों में रूड़की पहुंच जाते हैं। लेकिन रास्ते में जैसे ही टोल रोड़ खत्म होता है वैसे ही गांव की या कहें कस्बाई सड़कों से रू ब रू होते हैं।
तेज रफ्तार के लिए हम ज्यादा पैसे देते हैं। तब जाकर वैसी सड़कें मुहैया होती हैं। वहीं एक सवाल यह भी उठता है कि क्या हम आम सड़कों के लिए पैसे नहीं देते? क्या हम सालाना रोड़ टैक्स नहीं भरते? यदि भरते हैं सरकार की जेब तो फिर टोल वाली रोड़ जैसी आम सड़कें आम जनता को क्यों नहीं मिलतीं। फ्लाईओवर, टोल रोड़ और सबवे की ज्यूं पूरे देश में बाढ़ सी आ गई है। जिस भी शहर को देखों विकास की दौड़ में अपनी पहचान एवं सौंदर्य की कीमत चुका रहे हैं। मुजफ्फरनगर से जैसे ही रूड़की की ओर बढ़ते हैं वैसे की प्रकृति के की जा रही छेड़छाड़ के नजारे दिखाई देंगे। सड़क के दोनों ओर हजारों पेड़ काटे जा रहे हैं। काट काट कर बुग्गी, टैक्टर आदि में भरे जा रहे हैं। पूछने पर पता चला रोड़ चैड़ी की जा रही है। दरअसल पैसे वसूलने के बहाने निकाले जा रहे हैं। टोल का बिस्तार होना है। हम खुश होंगे कि कम समय में हरिद्वार आदि शहरों में पहुंच सकते हैं। सवाल सामने यही है कि इसके लिए प्राइवेट कंपनियों को आम सड़कें देने का क्या तुक है। क्या सरकार अपने आप को इस काम के लिए असमर्थ मान चुकी है। शायद इसी का नाम है पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशीप पीपीपी। आज यह माडल तकरीबन हर सार्वजनिक क्षेत्रों में देखा जा सकता है। वह चाहे शिक्षा, स्वास्थ्य, जन सेवाएं ही क्यों हों।
सड़क पर चलने और सुरक्षित चलने का अधिकार हर नागरिक को है। अपनी मंजिल तक सुरक्षित और स्वस्थ्य पहुंचे इसकी जिम्मेदारी हर राज्य सरकार की भी उतनी ही है जितनी केंद्र सरकार की। मगर आज पीपीपी माडल पर हर क्षेत्र में प्रवेश कर रही हैं वह एकबारगी गलत नहीं तो पूरी तरह से उपयुक्त भी नहीं हैं। जिन सड़कों को बनाने व टोल रोड़ बनाने की जिम्मेदारी दी गई क्या उनकी क्रेडिबिलिटी भी परखी गई हैं? क्या वे जिस तरह की सड़कें भारत में बना रहे हैं वह भारतीय गाडि़यों के लिए उपयुक्त हैं आदि ऐसी वास्वकिताएं जिन से मंुह नहीं मोड़ सकते।
रूड़की के बाद जैसे ही हरिद्वार की ओर मुड़ते हैं वैसे ही बादराबाद के बाद सड़के के दोनों तरफ विकास के चिह्न दिखाई देते हैं और दिखाई देने लगता है शहर के सौंदर्यबोध का कत्ल जारी है। गंगा नहर के दोनों ओर लंबे और उंचे यूकलिप्टस के पेड़ सालों सालों से खड़े थे। जो शहर और नहर दोनों को एक बेहतरीन रूप देते थे। लेकिन गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय से लेकर श्रद्धानंद द्वार और प्रेमनगर आश्रम होते हुए डैम तक सारे पेड़ काटे जा चुके हैं। देखने में एक बारगी बियाबान, पेड़ विहीन सड़कों को जन्म दिया जा रहा है।

Monday, January 13, 2014

जेंडर विमर्श और मूल्यपरक शिक्षा पर संवाद


कक्षा में साठ के आस-पास शिक्षक और शिक्षिकाएं थीं। इस शिक्षकों और शिक्षिकाओं के बीच जेंडर सेंसेटाइजेशन पर संवाद करना था। जिन मूल बहानों से मई में रू ब रू हुआ था वही बहाने यहां भी खडत्रे हुए। मसलन बहुत सर्दी है। ठिठुर रहे हैं। सर क्या पढ़ाओंगे। छोड़ो भी क्या पढ़ाओंगे। जेंडर वेडर बस यूं ही है। आप भी मजे करो हमें भी छोड़े धूप सेकने दो। मई में गर्मी का बहाना था। दिसम्बर में सर्दी आ खड़ी हुई थी। मगर संवाद तो करना ही था। लेकिन कक्षा में उपस्थित शिक्षक/शिक्षिकाओं को संवाद के लिए उकसाना एक बड़ी चुनौती थी।
संवाद के लिए उन्हें कुरेदना पड़ा। आपमें से कितने ऐसे हैं जो मानते हैं कि पत्नियां कोई भी निर्णय लेने में स्वतंत्र होती हैं। पति की उनके निर्णय में कितनी भूमिका होती है। अपने पति को अपने निर्णय प्रक्रिया में कितना स्थान देती हैं। बस क्या था कई हाथ खड़े ही गए। नाम रहने देते हैं। उनकी बातें यहां रखते हैं। ‘ मैं तो निर्णय लेने में उनका तब मदद लेती हूं जब निर्णय को टालता होता है।’ ‘हमें निर्णय लेने में अपनी भूमिका व जिम्मेदारी को छुपाना होता है तब हम उन पर डाल देते हैं।’
‘निर्णय तो उनका ही होता है। हम तो बस उनके निर्णय को फाॅलो करते हैं।’ ‘ सर आप भी जानते हो। एक ही छत के नीचे रहना है। कौन चिक चिक सहना चाहेगा सो जो निर्णय पति लेते हैं हम उसे स्वीकार लेते हैं।’
इसी तरह की बातें कक्षा में उभर कर आईं। जब मैंने कहा महिलाएं भी सदियों से गुलाम रही हैं। उन्हें इस गुलामी से मुक्ति के लिए अपनी आवाज़ बुलंद करनी पड़ेगी। पाॅलो फ्रेरा की पंक्ति रखीं ‘ चुप्पी की संस्कृति ही गुलामी को अग्रसारित करती है’ यदि गुलामी को तोड़ना है तो चुप्पी तोड़नी पड़ेगी। पाॅलो फ्रेरा ने उत्पीडि़तों का शिक्षा शास्त्र पुस्तक लिखा उसे पढ़ कर जिस तरह की चेतना जागती है वही अपनी मुक्ति की राह बना पाते हैं। साथ ही उन्हें जाॅन स्टुआॅर्ट मिल की पुस्तक स्त्री और पराधीनता को साइट किया। कुछ स्त्रियों की आंखें विस्फारित हुईं। मगर वहीं शिक्षकों के तेवर बदल चूके थे। ये सब बेकार की बातें हैं। पुरूष प्रधान समाज है। लुगाइयां घर में ही अच्छी लगती हैं। इसी तरह के तर्क कक्षा में तैर रहे थे।
जेंड़र संवेदनशीलता पर लंबी बातचीत हुई मगर शिक्षकों की सोच गोया अभी भी 19 वीं सदी में डोल रही थीं। कक्षा में कैसे इस तरह के विमर्श को वे लोग हैंडल करते होंगे इसका अनुमान लगाया जा सकता है। दरअसल वो नई सोच और शिक्षा के नए विमर्श को अपने दिमाग में उतरने की इज़ाजत ही नहीं देना चाहते थे। बहरहाल यदि शिक्षिकाओं में इसके प्रति थोड़ी भी चेतना जागती है तो उम्मींद की किरण बनी रहेगी।
जेंडर विमर्श और मूल्यपरक शिक्षा पर संवाद
कक्षा में साठ के आस-पास शिक्षक और शिक्षिकाएं थीं। इस शिक्षकों और शिक्षिकाओं के बीच जेंडर सेंसेटाइजेशन पर संवाद करना था। जिन मूल बहानों से मई में रू ब रू हुआ था वही बहाने यहां भी खडत्रे हुए। मसलन बहुत सर्दी है। ठिठुर रहे हैं। सर क्या पढ़ाओंगे। छोड़ो भी क्या पढ़ाओंगे। जेंडर वेडर बस यूं ही है। आप भी मजे करो हमें भी छोड़े धूप सेकने दो। मई में गर्मी का बहाना था। दिसम्बर में सर्दी आ खड़ी हुई थी। मगर संवाद तो करना ही था। लेकिन कक्षा में उपस्थित शिक्षक/शिक्षिकाओं को संवाद के लिए उकसाना एक बड़ी चुनौती थी।
संवाद के लिए उन्हें कुरेदना पड़ा। आपमें से कितने ऐसे हैं जो मानते हैं कि पत्नियां कोई भी निर्णय लेने में स्वतंत्र होती हैं। पति की उनके निर्णय में कितनी भूमिका होती है। अपने पति को अपने निर्णय प्रक्रिया में कितना स्थान देती हैं। बस क्या था कई हाथ खड़े ही गए। नाम रहने देते हैं। उनकी बातें यहां रखते हैं। ‘ मैं तो निर्णय लेने में उनका तब मदद लेती हूं जब निर्णय को टालता होता है।’ ‘हमें निर्णय लेने में अपनी भूमिका व जिम्मेदारी को छुपाना होता है तब हम उन पर डाल देते हैं।’
‘निर्णय तो उनका ही होता है। हम तो बस उनके निर्णय को फाॅलो करते हैं।’ ‘ सर आप भी जानते हो। एक ही छत के नीचे रहना है। कौन चिक चिक सहना चाहेगा सो जो निर्णय पति लेते हैं हम उसे स्वीकार लेते हैं।’
इसी तरह की बातें कक्षा में उभर कर आईं। जब मैंने कहा महिलाएं भी सदियों से गुलाम रही हैं। उन्हें इस गुलामी से मुक्ति के लिए अपनी आवाज़ बुलंद करनी पड़ेगी। पाॅलो फ्रेरा की पंक्ति रखीं ‘ चुप्पी की संस्कृति ही गुलामी को अग्रसारित करती है’ यदि गुलामी को तोड़ना है तो चुप्पी तोड़नी पड़ेगी। पाॅलो फ्रेरा ने उत्पीडि़तों का शिक्षा शास्त्र पुस्तक लिखा उसे पढ़ कर जिस तरह की चेतना जागती है वही अपनी मुक्ति की राह बना पाते हैं। साथ ही उन्हें जाॅन स्टुआॅर्ट मिल की पुस्तक स्त्री और पराधीनता को साइट किया। कुछ स्त्रियों की आंखें विस्फारित हुईं। मगर वहीं शिक्षकों के तेवर बदल चूके थे। ये सब बेकार की बातें हैं। पुरूष प्रधान समाज है। लुगाइयां घर में ही अच्छी लगती हैं। इसी तरह के तर्क कक्षा में तैर रहे थे।
जेंड़र संवेदनशीलता पर लंबी बातचीत हुई मगर शिक्षकों की सोच गोया अभी भी 19 वीं सदी में डोल रही थीं। कक्षा में कैसे इस तरह के विमर्श को वे लोग हैंडल करते होंगे इसका अनुमान लगाया जा सकता है। दरअसल वो नई सोच और शिक्षा के नए विमर्श को अपने दिमाग में उतरने की इज़ाजत ही नहीं देना चाहते थे। बहरहाल यदि शिक्षिकाओं में इसके प्रति थोड़ी भी चेतना जागती है तो उम्मींद की किरण बनी रहेगी।

Tuesday, January 7, 2014

हिन्दी को बचाएं ही क्यों


विश्व हिन्दी साहित्य पुरस्कार सम्मामन समारोह में यूं तो कई बातें अमह रहीं जिन्हें स्वीकारना और अपनाना पड़ेंगा। पहली बात तो यही कि कोई अल्पावधि में भी कैसे अपनी पूरी गति, मति बनाए रखते हुए वर्तमान में अपनी जगह बना सकता है। दूसरी पुरस्कारों में ताज़ातरीन व्यक्तित्वों को तरजीह देना मसलन स्व दीनानाथ मिश्र के नाम पर पुरस्कार दिया जाना भी शामिल है, इस वर्ष सुशील सिद्धांत को यह सम्मान मिला। तीसरी बात कि व्यक्तिगत आग्रह और अनुरोध पर कितने लोग आपके साथ खड़े हो जाते हैं, यह आशीष कंधवे से सीखी जा सकती है जो इस विश्व हिन्दी साहित्य परिषद् के जन्मदाता है। और मुख्य बात यह भी कि राहुल देव जैसे धाकड़ पत्रकार की फटकार कार्यक्रम में उपस्थित तमाम लेखकों ने न केवल सुना बल्कि उन्हें उनकी फटकार के लिए साधुवाद भी दिया।
कार्यक्रम में डायस पर विराजमान बीएल गौड, हीरामन, महेश दर्पण, राहुल देव, मृदुला सिन्हा, हरीश नवल एवं संचालक हरीश अरोड़ा ने जिस बेहतरीन ढंग से पूरे कार्यक्रम में संचालित किया वह वाकई काबिले तारीफ कह सकते हैं।
महेश दर्पण, हीरामन, राहुल देव और मृदुला जी ने जिस अंदाज़ और ठसक के साथ अपनी बात रखी उसे सुनने के लिए हिन्दी साहित्यकारों को जिगरा चाहिए। हिन्दी साहित्य के इतिहास से लेकर वर्तमान और भविष्य की ओर ले जाने वाले वक्तव्यों पर नजर डालें तो एक बारगी या तो अतीत गौरव के बोझ से दब जाएंगे या फिर भविष्य की चुनौतियों एवं हिन्दी की बदहाली को लेकर दुश्चिंता में डूब जाएंगे।
हीरामन जी को कोट करने के मोह से रोक नहीं पा रहा हूं। सो लीजिए, मैं भारत से गांधी और हिन्दी मांगता हूं। क्योंकि यह हमारी भूमि रही है। हमने यहीं से हिन्दी को जाना, माना और पहचाना। यदि आपके यहां हिन्दी नहीं रहेगी तो हमारे यहां से क्या उम्मींद कर सकते हैं।
राहुल देव ने कटू किन्तु हकीकत बयां कर के लोगों को झकझोर दिया। यह झकझोरना अकसर गैर हिन्दी वाले जब करते हैं तब हमारी तंद्रा टूटती है। हमारा हिन्दीपन जागता है और हम कहते हैं आपने हिन्दी के लिए किया ही क्या है? आपको हिन्दी के बारे में जानकारी ही कितनी है आदि सवालों के ढाल से खुद को बचाने की कोशिश करते हैं। सचपूछा जाए तो हिन्दी के बचाने की चिंता किसे है, कौन अपनी रीढ़ दधीच बनाना चाहता है। यह भी विचार का विषय है। क्या महज पुरस्कारों के वितरण से हिन्दी की रक्षा की जा सकती है या कि कोई और तरीका इज़ाद करना होगा।
क्या वास्तव में हिन्दी मर रही है या उसे संरक्षित करने का समय आ गया है? यह कौन से लोग हैं जो हिन्दी की मौत पर रोटी सेक रहे हैं उनकी भी पहचान जरूरी है। हरीश नवल ने जो बात कही कि हर शब्दों को हिन्दी मंे जो ऐत्तर हिन्दी के हैं उन्हें कबूल करने में परहेज क्यों तो हमें विचार करना होगा कि क्या वास्तव में हिन्दी को चलायमान रखने के लिए हमें यह भी जोखिम उठाना होगा।
गोपालदास नेपाली सम्मान से सम्मानित डाॅ लालित्य ललित, सुशील सिद्धांत या कि अन्य सम्मानित लेखकों से हिन्दी समाज और ज्यादा अपेक्षाएं नहीं की जानी चाहिए। की जानी चाहिए क्योंकि उन्हें यह सम्मान इसलिए नहीं मिला कि वो महज लेखक हैं बल्कि इसलिए भी मिला कि वो हिन्दी की चिंता भी करते हैं। लालित्य ललित कविता, व्यंग्य, आलेख से लेकर वाचन परंपरा के भी वाहक हैं उनसे तो सामाजिक को और भी उम्मींद बंधती हैं।

शिक्षकीय दुनिया की कहानी के पात्र

कौशलेंद्र प्रपन्न ‘‘ इक्कीस साल के बाद पहली बार किसी कार्यशाला में बैठा हूं। बहुत अच्छा लग रहा है। वरना तो जी ...