Tuesday, August 28, 2018

जॉब, तनाव और हम


कौशलेंद्र प्रपन्न
हम सब अपनी अपनी जॉब से परेशान रहते हैं। कोई अपने बॉस से तो कोई अपनी जॉब की प्रकृति से। कहीं न कहीं कुछ तो है जिससे हम सब परेशान रहा करते हैं। यदि काम को समझते हुए और रणनीति बनाकर कर्मचारियों को दी जाएं तो संभव है हमारे कर्मचारी काम को बेहतर तरीके से बिना रोए करें। लेकिन बॉस व कहिए ऊपर बैठे लोगों को भी कई बार इतनी हड़बड़ी होती है कि उस बेचैनी को सीधे नीचे सरका दिया करते हैं।
तकनीके के आ जाने से जैसे जैसे काम आसान हुए वैसे वैसे काम उलझते भी चले गए। हाथ में कम्प्यूटर न आ गया गोया समझते हैं कि हर चीज तुरत फुरत में एक क्लीक में हासिल की जा सकती है। जबकि ऐसा है नहीं।
सरकारी दफ्तर हो या निजी कंपनियां हर जगह ऐसे निराश और हताश लोगों कीं संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ रही है जो काम की अपेक्षा और परिणाम की उम्मींद लगातार कर्मचारी को तनाव में डाल रहे हैं। राखी की ही बात है घर पर सरकारी तंत्र में काम करने वाले भी थे और निजी कंपनी में काम करने वाले भी। जब एक बार शिकायतों और असंतुष्टी की बात चली तो सबके दुःख, दर्द,तनाव एक एक कर खुलने लगे। देखते ही देखते सभी के अंदर दबी या सोई भी निराशा फ्लोर पर फैलने लगी।
गोया कोई अपनी जॉब से खुश नहीं है। सरकारी नौकरी करने वालों के तर्क थे कि जब 2002 के बाद पेंशन भी नहीं है फिर क्यों हम सरकारी नौकरी में आएं। वहीं पहले सरकारी नौकरी को थोड़ा ही सही आराम का पर्याय माना जाता था। लेकिन अब तो वह भी जाता रहा। अब तो वाट्सएप पर काम की लिस्ट भेज दी जाती है। न पैसे हैं और न चैन फिर क्योंकर आज भी बच्चे सरकारी नौकरी की ओर भागते हैं आदि।
जॉब की प्रकृति हर जगह बदली ह,ै बल्कि बदल रही है। क्या सरकारी और क्या निजी। काम का दबाव और काम की त्वरित गति में मांग दोनों ही स्तरों पर रफ्तार और दबाव को महसूसा जा सकता है। हालिया एक वाकया बयां करना चाहता हूं कि एक व्यक्ति से साझा किया कि रात में 11 बजे मेल मिलता है कि कल आपको फलां जगह फलां काम के लिए जाना है आदि। वह व्यक्ति सुबह मेल चेक करता है और प्री प्लान्ड काम को पीछे धकेल कर आज मिले आदेश को पूरे करने में जुट जाता है। ऐसे और भी वाकये हैं जिन्हें देखते और सुनते हुए एहसास होता है कि जब हम स्वयं व्यवस्थित नहीं होते तब ऐसी अफरा तफरी का सामना करना पड़ता है। इतना ही बल्कि जब हमारे पास पूर्व योजनाबद्ध काम की सूची नहीं होती तब भी ऐसी स्थितियां पैदा हो जाती हैं।
फर्ज़ कीजिए जब आपसे अचानक फलां लिस्ट मांगी जाती है जिसे आपने कमतर प्राथमिकता की सूची में रखा था अब उसे रिटी्रव करना हमारे लिए मुश्किल होता है। यानी यदि हम अपने काम को सही तरीके से, सही स्थान पर, सही नाम से आदि सुरक्षित रखें तो कभी भी हमें फाइल डेटा आदि को पुनःपाने में ज़्यादा समय बरबाद नहीं होगा। लेकिन ऐसी ही तो नहीं कर पाते। कहां की फाइल कहां रख देते हैं। कौन सी फाइल किस ड्राइव में सेव कर देते हैं इसका ख़मियाजा हमें तब भुगतना पड़ता है जब हमसे हमारे बॉस या उच्च अधिकारी मांग बैठते हैं। 

Monday, August 27, 2018

तुम्हारी हथेली...




तुम्हारी हथेली ख़ाली नहीं होगी-
रखा करूंगा एक प्यार,
अपना माथा,
माथा याने
तमाम अहम्।
धर दूंगा तुम्हारे आंचल में-
एक उम्मींद,
एक आस,
एक प्यार का पुंज।
रोज़ ही रख दूंगा-
इतना प्यार,
कि कम नहीं होगा कभी,
खरचों जितना भी।
संभालना मेरा प्यार
रोज़ जो बो दूंगा एक प्यार,
तुम्हारी हथेली पर।

चेहरा-विहीन हमजानी



कौशलेंद्र प्रपन्न
हमलोगों ने कभी न कभी बड़ी बड़ी दुकानों में डमी देखी होगी। उसका कोई चेहरा नहीं होता। एक मिट्टी के लोंदे के मानिंद होता है। जिसकी न नाक होती है, न मुंह होता है। और न ही आंखों। बस एक अंड़ाकार लोंदा होता है। उस डमी पर जो भी कैप लगा दें। जो भी कपड़े डाल दें वह वैसा ही हो जाता है।
कई बार लगता है कि हम भी काफी हद तक वैसे ही मिट्टी के लांदे अपने कंधे पर डालकर डोला करते हैं। अपनी न तो इच्छा रही। न ही पसंद। जो उनको हो पसंद वही बात करते हैं। यदि ऐसा नहीं करते तो पिछड़ जाते हैं। या फिर धकीया दिए जाते हैं।
हर व्यक्ति एक नहीं दो नहीं बल्कि तीन से भी ज़्यादा चेहरे लेकर जी रहा है। उन चेहरों से परेशान हो कर भी नहीं उतारता। बल्कि उसकी भी कुछ मजबूरी होती है जिसकी वजह से वह कई कई चेहरे ओढ़ा होता है। एक चेहरा पहचाने जाने के बाद दूसरा चेहरा झट से पहन लेता है।
बचपन में मां एक कहानी सुनी थी कि वह एक मायावी राक्षस है। उसके कई कई चेहरे होते हैं। एक पहचान लिए जाने पर तुरंत रूपधारण कर लेता है। और ऐसे ही वह जीता है।
आज कल ऐसे ही मंज़र हैं समाज में। एक रूप पकड़ लिए जाने पर हम तुरंत दूसरा रूप ओढ़ लिया करते हैं। यह हर जगर देखे जा सकते हैं। ऐसे चेहरे घर-बाहर, स्कूल, दफ्तर हर जगह हैं। इन्हें देख कर कोफ्त सी होती है। लेकिन कई बार हमारी मजबूरी होती है कि हम जानते हुए भी इन्हें साथ लेकर चला करते हैं।

Friday, August 24, 2018

शिक्षा में द्वंद्व और युद्ध प्रभावित क्षेत्र के बच्चे



कौशलेंद्र प्रपन्न
शिक्षा को अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए पल प्रति पल संघर्ष करने पड़ते हैं। वह किसी भी देश, भूगोल की शिक्षा हो, उसे शैक्षिक-अस्तित्व को जिं़दा रखने के लिए विभिन्न किस्म की चुनौतियों (राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक) से रू ब रू होना पड़ता है। इन्हीं संघर्षों के बीच शिक्षा को अपने रास्ते भी बनाने पड़े हैं। शिक्षा और शिक्षण संस्थानों को हमेशा से ही राजनीतिक और सामाजिक साथ ही युद्ध आदि में एक सशक्त औजार के रूप में इस्तमाल किया जाता रहा है। इतना ही नहीं बल्कि स्कूल से लेकर कॉलेज और विश्वविद्यालयों को शिक्षा-शिक्षण से एत्तर सामाजिक आंदोलन के सूत्रधार के तौर पर देखा और स्वीकारा गया है। विश्व के तमाम देशों में स्कूल और स्कूली बच्चों को कई बार युद्ध में एक सस्ते सैनिक के तौर पर इस्तमाल किया गया। शिक्षा भारत की हो या सोमालिया, नेपाल, श्रीलंका, पाकिस्तान, अफगानिस्तान आदि इन संघर्ष और यृद्ध के कगार पर खड़े देशों में शिक्षा को शिकार बनाया गया है। हमारा पड़ोसी देश नेपाल व पाकिस्तान एवं श्रीलंका आदि को समझने की कोशिश करें तो पाएंगे कि इन देशों में स्कूल और स्कूली बच्चों को हमेशा निशाना बनाया गया। कौन भूल सकता है जब पाकिस्तान पर 2014 में स्कूल पर हमला किया गया और बच्चे समेत शिक्षकों की मौत हो गई। वहीं नेपाल में सत्ता परिवर्तन के दौरान बल्कि कहें राजतंत्र से लोकतंत्र की ख़ूनी यात्रा में लाखों बच्चे शिक्षकों को निशाना बनाया गया। सेव द चिल्ड्रेन से लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ की तमाम शोध बताते हैं कि इन संघर्षों और युद्ध आशंकित क्षेत्र में बच्चे स्कूल छोड़ युद्ध में जोत दिए गए।
हाल ही में डॉ संजीव राय द्वारा अंग्रेजी में लिखी पुस्तक ‘‘कॉन्फल्क्टि, एजूकेशन एंड द पीपल्स वॉर इन नेपाल’’ आई है। समीक्ष्य पुस्तक बड़ी ही शिद्दत से नेपाल में प्राथमिक शिक्षा, स्कूल, शिक्षक, बच्चे और जनांदोलन की जिं़दा तसवीर प्रस्तुत करती है। संजीव राय ने इस पुस्तक में जिस गहनता से नेपाल से जनांदोलन जिसे हम राजसत्ता से लोकसत्ता की विकास यात्रा कह सकते हैं, इसकी ऐतिहासिक साक्ष्यों के मद्दे नज़र विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं। 1992, 1995 से लेकर 2007 और 2009 तक की इस लोकतांत्रिक विकास यात्रा को न केवल शैक्षिक लेंस से देखने, समझने की कोशिश की है बल्कि संजीव इस किताब में शिक्षा की यात्रा को सामाजिक एवं राजनैतिक विकास और इतिहास से भी जोड़ते हुए समझना और उन बारीक तंतुओं को पकड़ने का प्रयास करते हैं जिन्हें सुलझाए बिना हम नेपाल की बुनियादी शिक्षा यानी प्राथमिक शिक्षा एवं लोकतंत्र की स्थापना को समझने का दावा नहीं कर सकते।

Monday, August 20, 2018

अस्पताल का बिस्तर



कौशलेंद्र प्रपन्न
जो भी अस्पताल में प्रवेश करता है वही जीवन-दर्शन का भाष्यकार हो जाता है। जीवन ही बीमारी, कराह, टीस का पर्याय सा लगने लगता है। जहां भी नज़रें जाती हैं वही एक पीड़ा, वहीं एक दर्द सुनाई, दिखाई देती है। ख़ुद जाएं या किसी प्रिय को अस्पताल लेकर जाएं एक बार के लिए ही सही कई सारे वायदे ख़ुद से कर लेते हैं। अब ऐसा नहीं खाउंगा। रोज़ टहलने जाउंगा। खाने का ख़्याल रखूंगा आदि आदि। और जैसे ही अस्पताल पीछे छुटता है वैसे ही सारे वायदे पीछे वहीं अस्पताल में बेंच पर छूट जाते हैं।
हम अपने जीवन में कभी न कभी अस्पताल जाते ही हैं या गए ही हैं। कभी ख़ुद तो कभी प्रिय जन को लेकर। अस्पताल के बिस्तर पर लेटा व्यक्ति अचानक दाशर्निक की मुद्रा में दिखाई देता है या फिर निःसहाय। वह व्यक्ति हर सांस ऐसे लेता है गोया यह उसकी अंतिम सांस है। वह हर रिश्तेदार, बच्चों को देख-सुन लेना चाहता है। उन सब से मिल लेना चाहता है जो भी उसकी ज़िंदगी में कभी न कभी आए हों। न जाने किसकी बात से, किसकी घटना से उसे उत्साह मिल जाए। किसी बातचीत में उसे जीने की ऊर्जा मिले इसलिए तीमारदार बिना भूले सब से बातें कराया करते हैं। लेकिन हमें किसी की बात और किसी की प्रवृति से यदि बहुत परिचय नहीं है तो वह बीमार व्यक्ति को और भी घोर निराशा में डाल सकता है। जीने ललक देने की बजाए कभी जीवन के प्रति निराशा और नकारात्मक सोच को तो नहीं बढ़ा रहा है। इसपर हमारा नियंत्रण नहीं होता। और बिस्तर पर लेटा व्यक्ति गहरे निराशा में डूबने लगता है। कहां तो तय था कि फलां से बात कर रोगी को सुखद एहसास होगा। अच्छा लगेगा लेकिन हुआ उलट। रोगी की मनोदशा और भी टूटन से भर गई। रोने लगा। देखने वाले को लगता है कि शारीरिक कष्ट की वजह से रो रहा है। लेकिन होता अलग है। बिस्तर पर लेटे हुए व्यक्ति ने अभी अभी जिससे बात की है उसने ऐसी बात बोल दी जिससे मरीज़ के अंदर निराशा और असहाय होने के भाव प्रबल हो गए। देखने वाले को समझने में समय लग जाता है। लेकिन जो डैमेज होना था वह उस व्यक्ति ने कर दिया।
अस्पताल के दृश्य भी अजीब होते हैं। वहां के कर्मचारियों के व्यवहार भी कई बार हैरान करते हैं। हमें लगता है, सुन नहीं रहा है। हमें यह भी महसूस होता है कि कितना असंवेदनशील है आदि। जबकि ऐसा होता नहीं है। वह संवेदनशील भी है और अपने कर्तव्यों के प्रति सजग भी। समय पर दवा देना। रोगी का देख भाल सब कुछ करता है। बस हमें लगता है कि एक पांव पर क्यों नहीं खड़ा है। क्यों नहीं एक आवाज़ में सुन लेता। आप देखिए अस्पताल के कर्मचारियों के लिए वह रोज़दिन की घटना है। रोज़ ही जहां नए नए और पुराने रोगी आया करते हैं। हर किसी का चेहरा उतरा हुआ। ग़मज़दा और दुख में डूबा हुआ। वह सुबह से रात सोने से पहले तक ऐसे हज़ारों चेहरे देखा करता है। भला अस्पताल में कोई खुश होकर जाता है? हां जब घर में नए मेहमान का आगमन होता है तब खुशी लहर दौड़ जाती है उस वार्ड में। बलून, रंग, किलकारी आदि। इस तरह से देखें तो अस्पताल के लिए कई रंग-रूप हैं। एक हिस्सा ऐसा है जहां मरीज बीमार जाता है और ऑपरेशन के बाद बिस्तर पर लौटता है। जब होश आता है तो पाता है कि फलां अंग में दर्द है। वहीं एक कोना ऐसा होता है जहां तीमारदार, देखने वाले बेंच पर बैठे बैठे अपने सीएल, छुट्टियों के हिसाब में लगे होते हैं। और कितना दिन आना होगा। ऑफिस कब जा पाएंगे। इस कोने की अपनी निराली कहानी होती है। इस कहानी में बीमार तो मुख्य भूमिका में होता है। बाकी अवांतर कहानियां चल रही होती हैं। घर-परिवार। परिवार के सदस्यों की बातें। कौन आया, कौन नहीं आया। कौन रात में रूकेगा किसकी आज रात रूकने की बारी है। इस उधेड़ बुन में कई के चेहरे उतरे होते हैं तो कुछ के चेहरे यथावत् बने रहते हैं।
जो भी हो बुद्ध के जीवन में तीन ही तो घटनाएं आई थीं जिसने सिद्धार्थ को बुद्ध बनाया। बीमारी, वृद्धावस्था और मृत्यु। हम जब भी इनमें से किसी भी अवस्था का चस्मदीद बनते हैं हमारे अंदर भी कहीं न कहीं एक बुद्धत्व जगने लगता है। हम वायदे करने लगते हैं और जब बाहर आते हैं अपनी तमाम घोषणाएं, वहीं पीछे छोड़ आते हैं। और ऐसे ही हम बुद्ध बनने से वंचित रह जाते हैं।

Thursday, August 16, 2018

प्राथमिक शिक्षा में गुणवत्ता को लेकर प्रयासरत सरकार



कौशलेंद्र प्रपन्न
देश के विभिन्न राज्यों में सरकारें प्राथमिक शिक्षा में कई स्तरों पर गुणवत्ता के मसले को लेकर न केवल िंचंतित है, बल्कि प्रयास कर रही हैं। मुख्यतौर पर बच्चों में भाषायी कौशलों मसलन सुनना, बोलना, पढ़ना और लिखना आदि को लेकर दिक्कतें आती हैं। इन कौशलों में भी पढ़ना और लिखना ऐसे कौशल हैं जिनमें बच्चें ने केवल बिहार बल्कि अन्य राज्यों में भी पिछड़ रहे हैं। इसका प्रमाण समय समय पर असर और सरकारी दस्तावेज भी देती रही हैं। हालिया एनसीईआरटी की ओर किए गए अध्ययन में पाया गया कि बच्चों में पढ़ने-लिखने और गणित की दक्षता में ख़ासा परेशानी आती है। यह स्थिति आज से नहीं बल्कि पिछले एक दशक में ज़्यादा संज्ञान में आया है। विभिन्न रिपोर्ट इस मसले पर अपनी चिंता प्रकट कर चुकी हैं। बिहार सरकार इन्हें गंभीरता से लेते हुए राज्य में प्राथमिक स्कूलों में बच्चे गणित और भाषायी दक्षता ख़ासकर पढ़ने और लिखने को कक्षा तीसरी और पांचवीं में सुधारने के लिए प्रयास कर रही है।
बिहार में प्राथमिक शिक्षा के स्तर को सुधारने के लिए यह प्रयास निश्चित ही सराहनीय है। हालांकि न केवल बिहार बल्कि अन्य राज्यों में भी प्राथमिक स्तर पर बुनियादी कौशलों में बच्चे तय स्तर से नीचे पाए गए हैं। इन्हें कैसे दुरुस्त किया जाए इसके लिए बिहार सरकार ने एक योजना का एलान किया है। इस योजना के तहत तमाम प्राथमिक स्कूलों में कक्षा तीसरी और पांचवीं के बच्चों में गणित के सामान्य सवालों को हल करने के कौशल पर काम किया जाएगा। साथ ही भाषायी कौशल विकास को लेकर समय समय पर सवाल उठते रहे हैं। इन्हें संज्ञान में लेते हुए बिहार सरकार ने घोषणा की है कि प्राथमिक स्कूलों में इन्हीं कक्षाओं के बच्चों में पढ़ने और लिखने के कौशल विकास पर भी सघन कोशिश की जाएगी।
बच्चों में भाषायी कौशल और गणित के सामान्य सवालों को हल करने के कौशल प्रदान करने का प्रयास तो ठीक है किन्तु यह एक अन्य चिंता भी जगाती है क्या हमारे शिक्षक और अन्य संसाधन इन योजना और पूरा करने में सक्षम और समर्थ हैं? क्या हमारे पर इस योजना को सफल बनाने के लिए पूरी कार्य योजना और रणनीति तैयार है आदि। क्योंकि इससे पूर्व भी देश भर में इन बुनियादी कौशलों के विकास के लिए विभिन्न योजनाओं की शुरूआत की गई। इसका परिणाम अभी तक पर्याप्त नहीं माना जा सकता। इससे पूर्व देश भर में ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड, सर्व शिक्षा अभियान आदि की भी शुरूआत की गई। इन तमाम अभियानों में जो कमी देखी गई वह इनके कार्यान्वयन स्तर पर थी। ये योजनाएं अपने उद्देश्यों, लक्ष्यों में तो स्पष्ट थे किन्तु इन्हें सही तरीके से रणनीति बनाकर एक्जीक्यूट नहीं किया गया। अब तक का सबसे बड़ा शैक्षिक संघर्ष शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 को बनने में तकरीबन सौ साल का वक़्त लगा। इसे 2010 में अप्रैल देश भर में लागू किया गया। लेकिन इसमें भी ख़ामियां देखी और निकाली गईं। क्या इस आरटीई में कोई कमी थी या फिर इसे जिस शिद्दत से स्वीकारा जाना चाहिए था या फिर एक्जीक्यूट करने में हमसे कोई चूक रह गई इसे भी समझना होगा। इस संदर्भ में हमें बिहार के इस प्रयास को देखने और समझने की आवश्यकता है।
स्कूली स्तर पर जो लोग जुड़े हुए हैं। बल्कि कहना चाहिए जो परिवर्तन की मुख्य कड़ियां हैं जिन्हें हम शिक्षक व प्रधानाचार्य आदि के नाम से जानते हैं? क्या यह कड़ी मजबूत है इसे पूरे करने में? क्या उन्हें इस अभियान की बारीकियों और चुनौतियों से रू ब रू कराया गया है? क्या उन्हें इसके लिए कोई विशेष प्रशिक्षण दी गई है कि कैसे इसे कक्षायी स्तर पर उतारा जाना है। क्योंकि बिना प्रशिक्षित शिक्षकों के यह पढ़ने और गणित की बुनियादी दक्षता को हासिल करना अपने आप में एक बड़ी चुनौती है। जैसा कि सरकारी और गैर सरकारी रिपोर्ट बताती हैं कि न केवल बिहार में बल्कि देश भर के विभिन्न राज्यों में हमारे प्राथमिक स्कूली शिक्षा शिक्षकों की कमी से जूझ रही है। बिहार उनमें से एक है। इस राज्य में भी लाख से ज्यादा प्राथमिक स्कूलों में शिक्षकों के पोस्ट ख़ाली हैं। बिना शिक्षकों के क्या यह अभियान सफल हो पाएगा? 2009 के पूर्व बिहार में भी प्रशिक्षित, अर्द्ध प्रशिक्षित शिक्षकों, शिक्षा मित्रों आदि के सहारे प्राथमिक शिक्षा को आगे बढ़ाया जा रहा था। लेकिन 2010के बाद वर्तमान सरकार ने तब पटना के गांधी मैदान में हज़ारों की संख्या में बीए एम ए पास प्रतिभागियों को स्कूलों में ज्वाइन कराया था। और क्योंकि आरटीई एक्ट 2009 की मुख्य स्थापना है कि गैर प्रशिक्षित शिक्षकों को सरकार तीन वर्ष में सेवाकालीन प्रशिक्षण प्रदान करेगी।
हमें प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी और रिक्त पदों को भरने की ओर भी योजनाबद्ध तरीके से कार्ययोजना तैयार करने की आवश्यकता है। क्योंकि इसके बगैर यह योजना भी अन्य योजनाओं के तर्ज़ पर विफल हो सकती हैं। पढ़ना-लिखना और गणित की बुनियादी कौशल विकास को न केवल सहस्राब्दी विकास लक्ष्य में शामिल किया है बल्कि सतत् विकास लक्ष्य 2030 के लिए भी प्रमुख माना गया है। यदि बिहार सरकार इस लक्ष्य को हासिल कर पाती है तो यह राज्य अन्य प्रदेश सरकार के लिए भी मिसाल कायम करेगी। हमें इसे सफल बनाने के लिए सिर्फ और सिर्फ राज्य सरकार की जिम्मेदारी मान कर नागर समाज ख़ामोश नहीं बैठ सकता। बल्कि नागर समाज को सरकार के इस अभियान में आगे आना होगा। प्रथम संस्था बिहार के इस अभियान में नालंद में कुछ समूहों का निर्माण कर चुकी है। जिनके साथ पढ़ने-लिखने और गणित की बुनियादी दक्षता विकास में सहयोग कर रही है।

Tuesday, August 14, 2018

बहत्तर साल हो गए आज़ाद हुए



कौशलेंद्र प्रपन्न

हां सुना है ऐसा ही कि हम यही कोई बहत्तर साल पहले तमाम गुलामियों से आज़ाद हुए थे। हम आज़ाद हुए थे पूर्वग्रहों से ऐसा कह सकते हैं? क्या यह मान सकते हैं कि इन सालों में हम सचमुच अपनी कट्टर सोचों से मुक्त हो पाए हैं? क्या ऐसा है कि जो हम आजादी से पूर्व थे उससे कहीं ज़्यादा बेहतर से हो गए हैं। आदि ऐसे सवाल हैं जो आज भी अपनी जगह पर खड़े हैं और हमसे जवाब मांग रहे हैं।
हमने इन बहत्तर सालों में और कुछ किया हो या नहीं लेकिन अपने स्कूली बच्चों, आस-पास की बच्चियों को सुरक्षा तक मुहैया नहीं करा पाए। आए दिन स्कूलों या आस पड़ोस में ऐसी घटनाएं घटती हैं जिन्हें देख सुन कर महसूस हेता है कि यह कैसे आजादी हासिल की कि हम अपने बच्चों को कम से कम एक भय और डर मुक्त घर-बाहर तक नहीं दे पाएं।
न हम ऐसा समाज बना पाए जहां हमारे बच्चे, बड़ी लड़कियां या बुढ़े सुरक्षित महसूस कर सकें। हमने संविधान तो बना ली। हमने सरकारें भी खूब बनाईं। मगर जो नहीं बना पाए वह है एक बेहतर इंसान। हालांकि बेहतर इंसान किसी कारखाने में नहीं बनते। और न ही किसी खेत में उपजा करते हैं। बल्कि स्कूल और घर जैसे जमीन में ही पैदा हुआ करते हैं। हमारा न घर और न स्कूल ही ऐसी जमीन बन पाई जहां अच्छी फसल उगाई जा सके।
इन बहत्तर सालों में विकास बहुत किया। शहर से महानगर में बसना सीख लिया। तमाम आधुनिक संसाधनों में जीना सीख लिया। लेकिन हम यह नहीं सीख सके कि मिलजुल कर कैसे रहा जाता है। आज भी उस तक़्सीम में बिखरे परिवार ज़िंदा हैं जिन्हें आज भी अपनों की तलाश है। 

कुछ शब्द


कुछ शब्द हमेशा उगलता हूं-
तेरे लिए लिखता हूं,
रोज़ ही कुछ प्रेम भरे शब्द भेजता हूं,
ख़ाली शब्द नहीं मैं नहीं हूं।
हूं पूरा अर्थ तुम्हारे लिए-
नहीं जानता हूं कितना ज़रूरी तुम्हारे लिए,
मगर लिखता भी हूं सिर्फ तुम्हारे लिए,
गाता भी हूं तुम्हें ही।
मालूम नहीं हूं कितना तेरे पास-
मगर आस रही हमेशा,
तेरे प्यार को महसूसता,
बस इस उम्मीद में,
हूं कहीं न कहीं तुम्में,
शायद तुम मान न पाओ,
कहने ये भी डरो,
मगर सच ही है न,
कहीं तो हूं तुम्में।

Friday, August 10, 2018

कुछ जो रह गया



कौशलेंद्र प्रपन्न
कुछ क्यों रह जाते हैं। कुछ क्यों छूट जाता है, कभी हमने इसपर ठहर कर नहीं सोचा। अक्सर हम अपनी बातें बिना सोचे समझे और समय का ध्यान रखे कहने में लग जाते हैं। हम कहते बहुत हैं। मगर फिर भी कुछ शिकायतें रह ही जाती हैं। काश और वक़्त मिला होता तो अपनी पूरी बात रख पाता। जैसे परीक्षा देने बैठा बच्चा कहता है, आता तो सब था लेकिन कापी छीन ली। वक़्त ही नहीं बचा। थोड़ा और समय मिल जाता तो सारे सवाल कर लेता। लेकिन जिं़दगी में परीक्षा लेने वाला भी कभी ज़्यादा समय नहीं देता। जितना समय तय है उसमें ही अपनी बात कहनी होती है।
दरअसल कल मेट्रो में कुछ लड़कियों को अपने दोस्तों से बातचीत करते सुना वैसे किसी की बात को सुनना ठीक नहीं है लेकिन कानों पर पड़े तो सुन लिया। लड़की कह रही थी यार टाइम ही नहीं मिलता। घर पर आने के बाद पढ़ ही नहीं पाती। आदि उसकी बातों को बाकी के दोस्त समर्थन कर रहे थे। मैं सोचने लगा यदि छात्र के पास पढ़ने के लिए समय नहीं है तो किस चीज के लिए समय है। क्या केवल सोशल मीडिया पर छाने, सेल्फी पोस्ट करने आदि का समय है।
सच में हम अकसर बातचीत में शिकायत करते हैं कि यार समय नहीं है। समय नहीं मिलता आदि। दरअसल यह एक बहाना है। यदि हम अपने टाइम को मैनेज करें तो सब कुछ संभव है। दिक्कत यही आती है कि हम अपने समय और धन दोनों को ही समयोचित मैनेज नहीं कर पाते। यही लापरवाही हमें परीक्षा में पेपर लिखते हुए भी महसूस होती है। हम लिखते चले जाते हैं। इसे रफ्तार में कई सवाल अधूरे रह जाते हैं या फिर छूट ही जाते हैं। जीवन में भी हम अपने समय को ठीक से मैनेज नहीं कर पाते इसलिए हमारे सपने और काम दोनों ही अधूरे रह जाते हैं।

Thursday, August 9, 2018

सपने जो देखे वही मिले




कौशलेंद्र प्रपन्न
सपना देखने और पालने में किसी का कोई दबाव नहीं होता। हम सपने अपने लिए कई बार समाज के लिए और घर परिवार के लिए भी देखा करते हैं।
हम सब ने सपने देखे। बल्कि देखा करते हैं। हमारी लाइफ ऐसी हो जाए। यह हो जाए वह हो जाए आदि आदि। लेकिन सपनों को पूरा करने के लिए शायद प्रयास नहीं करते और सपने यूं ही बिखरा जाया करते हैं।
मैंने बचपन में या कॉलेज में सपने देखे थे कि एक लेखक,पत्रकार बनूं। यह सपना भी काफी हद तक पूरा हुआ। लिखने लगा। छपने भी लगा। दो किताबें भी लिखने की कोशिश कीं और सफल रहा।
दूसरा सपना यह भी था कि स्कूल कॉलेज में पढ़ाउं। स्कूल का सपना तो पूरा हुआ। कॉलेज हाथ से छूट गया।
मेरे भाई ने सपने देखे थे कि दिल्ली विश्वविद्यालय के आवासीय परिसर में वो रहें। यहीं पढ़ाएं। उनका सपना भी पूरा हुआ। आज वो इसी विश्वविद्यालय में पढ़ा भी रहे हैं और इसी परिसर में उनका घर भी है। आपने सपने पूरे करने के लिए उन्होंने मेहनत तो की ही साथ ही जिस प्रकार की तैयारी चाहिए उसे भी निभाया।
हमारे सपने पूरे होते हैं। हो सकते हैं। ज़रूरत बस इतनी सी है कि जो सपने हमने देखे हैं उन्हें कैसे पूरा करें इसकी रणनीति बनानी पड़ती है। और रणनीति को कैसे अमल में लाकर अंजाम तक पहुंचाएं इसके लिए संघर्ष और चुनौतियों को स्वीकारना पड़ता है।
दरअसल सपने सिर्फ हमारी वजहों से ही नहीं टूटा करतीं। बल्कि कई बार हमारे आस-पास के लोगों जिनसे हम प्रभावित हुआ करते हैं उनकी वजह से भी बिखरती हैं।
जिन आंखों में सपने नहीं हैं उन आंखों को क्या नाम देना चाहेंगे? शायद वह मरी हुई आंखें हैं। शायद उन आंखों में जीवन के प्रति लालसा नहीं रही।

Tuesday, August 7, 2018

जानता हूं ग़लत है मगर...



कौशलेंद्र प्रपन्न
महाभारत का सशक्त पात्र दुर्योधन की पंक्ति याद कीजिए जानामि च धर्मं न च मे प्रवृतिः। जानामि न अधर्मम् न च मे निवृतिः।
धर्म क्या है मैं जानता हूं। लेकिन उसमें मेरी कोई गति नहीं है। अधर्म क्या है मैं यह भी जानता हूं लेकिन उससे मेरी निवृति नहीं है। यानी दूर नहीं हो सकता।
यही स्थिति आज सोशल मीडिया के लत की है। हम सभी जानते हैं और मान भी रहे हैं कि सोशल मीडिया हमारा कितना बहुमूल्य समय यूं ही खा जाता है और हम उफ्््!!! तक नहीं करते। हम जानते हैं कि सोशल मीडिया के कारण ही कई सारे लोगों के रिश्तों में दरारें भी आ गईं।
पति-पत्नी, दोस्तों के बीच के रिश्ते भी इससे प्रभावित हो रहे हैं। यदि आपने दूसरों की पोस्ट, स्टेटस लाइक नहीं की। आपके कमेंट नहीं किया। तो समझिए आपका दोस्त मुंह फुला लेगा। फलां को तो इतने लाइक मिलते हैं। फल्नी के पोस्ट पर तो आपने ऐसा लिखा, वैसे लिखा आदि।
कई सारी जटाएं हैं इस सोशल मीडिया के। वह ट्वीटर, वॉट्स एप, लिंगडेन, इस्टाग्राम, फेसबुक आदि। इन्हीं चंगूलों में सोशल मीडिया हमें फांसा करती है। और हम धीरे धीरे इसके गिरफ्त में आते जाते हैं। हम कई बार मालूम ही नहीं होता। शौकीया इन मंचों पर आते हैं और जाने का नाम तक नहीं लेते।
बच्चे, प्रौढ़, वयस्क, छात्र, प्रोफेशनल सब इस हमाम में नंगे हैं। ऐसा कहूं तो बुरा न मान जाइएगा। क्योंकि यहां बेटा और बेटी, पत्नी और प्रेमिका सब अपने अपने छद्म नामों और चित्रों के ज़रिए मौजूद हैं। एक रूप पकड़े जाने पर तत्काल दूसरा रूप धारण कर लेते हैं।
दिक्कत तब ज़्यादा हो जाती है जब आपका आफिस व घर की बॉस आपकी तमामा सोशल मीडिया की गतिविधियों पर नज़र रखे और अचानक पूछ बैठे। तुम तो कह रहे थे घर में किसी की तबीयत ख़राब है। और आप तो फेसबुक, वाट्सएप, ट्वीटर पर उस वक़्त लाइव थे। कैसे कैसे... बोलिए। आप तो कह रहे थे मेरी मींटंग है मैं फोन नहीं उठा पाउंगा। लेकिन आप तो लगातार वाट्सएप पर सक्रिए थे। कैसे कैसे!!!!
इन्हीं सोशल मीडिया के चक्कर में कितने ही छात्रों की परीक्षा रसातल में चली गई। उन्हें अच्छे नंबर आने थे। उन्हें अच्छे कॉलेज में दाखिला लेना था। मगर किन्हीं सोशल मीडिया पर सक्रियता ने उनसे उनके सपने छीन लिए। कोई इन्हीं सोशल मीडिया की वजह से आत्महत्या तक करने पर मजबूर हो जाते हैं। इन्हें कैसे और किस रूप में बेहतर मानें। हालांकि विज्ञान को दोधारी तलवार किसी प्रसिद्दध कवि ने कहा है। ठीक वैसे ही सोशल मीडिया जहां एक ओर पलक झपकते आपको दूर देश तक में प्रसिद्धी के मचान पर चढ़ा देता है वही दूसरी ओर आपकी विश्वसनीयता को खतरे में डाल देता है।

Tuesday, July 31, 2018

गले लगने से पहले


कौशलेंद्र प्रपन्न
गले पड़ना। गले मिलना। गले से नीचे नहीं उतरना। गले की हड्डी बन जाना। गले का हार होना। आदि कई मुहावरे हमने सुने और सुनाए हैं। इनके मायने से भी हम बख़ूबी वाकिफ हैं। इनमें से एक है गले मिलना। गले मिलना यानी किसी को बहुत प्यार और विश्वास से गले लगाते हैं। दोनों ही पक्ष सम होते हैं। किसी भी कोण से देख लिया जाए तो शायद हम उसी के गले मिलते हैं जिन्हें अपना मानते और स्वीकारते हैं। लेकिन हम कई बार भूल जाते हैं कि जिसे गले लगा रहे हैं या जिसके गले लग रहे हैं क्या वो भी आपको उसी शिद्दत से स्वीकार कर रहा है या कहीं आप उसके गले तो नहीं पड़ रहे हैं। वो किसी भी तरह अपसे पीछा छुटाना चाहता है। वो चाहता है कि आपकी इस हरक्कत को सरेआम कोई और न मायने निकाल ले।
अगर ठहर कर देखा और समझा जाए तो गले मिलना और गले पड़ना में कोई ख़ास अंतर नहीं है। जब आप किसी की इच्छा का सम्मान करते हुए उसे गले लगाते हैं या आप उनके गले लगते हैं तब स्थिति बिल्कुल अलग होती है। वहीं यदि सामने वाले की इच्छा और मनसा को समझे बगैर गले लग रहे हैं तब गले पड़ना कहलाएगा।
कई बार आवेश में आकर वह चाहे भावनात्मक हो या फिर संवेदनात्मक वह किसी भी किस्म की भावना हो सकती है किसी को गले लगाते हैं तो यह भूल जाते हैं कि सामने वाला आपको किस नज़र से देख रहा है। क्या वह भी आपक गले लगना चाहता है या हमज़ लोकलाज में पड़कर आपसे लगे लगा। बाद में इस छोटी सी बात को कई दृष्टिकोण से व्याख्या की जाएगी इसके लिए आपको तैयार रहना चाहिए।
कहते हैं हमें अपनी औक़ात और समाज में स्थान को हमेशा याद रखना चाहिए। हम कहां से आते हैं, हमारी सामाजिक पहचान क्या है और किस पद पर हैं आदि ख़ासा मायने रखते हैं जब हम समाज में कोई रिश्ता बनाते हैं। जब हम किसी को गले लगाते हैं। बेशक आपका मकसद साफ और स्पष्ट हो। आपके मन में कोई गंदलापन नहीं है। लेकिन आपके मन की सुनता कौन है। कोई क्यों आपके मन में चलने वाले भावदशाओं को समझने में अपना समय ख़राब करेगा। उसे तो यही लगता है कि यह व्यक्ति कोई ज़्यादा ही अपनापा दिखा रहा है। कोई ख़ास बात होगी। या फिर कुछ ज़्याद नजदीक आने की कोशिश कर रहा है।
समाज में रिश्ते हमस्तर और हमपद के साथ ज़्यादा बना करते हैं। यह आज की भी तारीख़ी हक़ीकत है कि हम अपने और अपनों के जैसों के बीच ही सहज हुआ करते हैं। कुछ देर के लिए जब हम अपनी हैसियत भूल कर ऊपर वाले को गले लगा कर या लग कर एहतराम करते हैं तब सामने वाले के लिए यह समझना ज़रूरी हो जाता है कि इसके गले मिलने का क्या मकसद हो सकता है। यह गले ही क्यों मिला करता है। हाथ भी तो मिला सकता है।

Sunday, July 29, 2018

बकरी ने लड़की से कहा...तब से ख़ामोश हैं!!!




बकरी की पहचान छुपाते हुए उसकी प्रतीकात्मक तस्वीर दी गई है

कौशलेंद्र प्रपन्न
बकरी की मुलाकात लड़की से हो गई। लड़की ग़मज़दा थी। ख़ामोश भी थी। लेकिन उसकी ख़ामोशी को तोड़ते हुए बकरी ने कहा ‘‘ जो हाल तोर सो हाल मोर...’’।
बात यहीं नहीं रूकी। रूकती भी कैसे? मसला था भी कुछ ज़्यादा ही अमानवीय। बकरी ने रोते हुए कहा ‘‘ ये लड़की माना कि तेरे साथ भी चार चार लड़कों ने...’’
‘‘मगर तू तो इंसान की बच्ची है। तेरे साथ जो हुआ उसके लिए तेरे यहां कानून भी है।’’ ‘‘मेरी सोच ज़रा!’’
‘‘मैं किस अदालत में जाऊं? कहां गुहार लगाऊं? कौन किला को फाड़ेगा? न राजा, न बड़ही, न रानी कोई भी तो मेरे लिए आगे नहीं आएगा।’’
‘‘एक बात बताना लड़की तेरे लिए तो कैंडल मार्च लोग कर लेंगे। करेंगे’’
‘‘मेरी प्रजाति तो अनपढ़, गंवार ठहरी। हमें तो अच्छी चिकनी चुपड़ी भाषा में गिटपिट भी करना नहीं आता। कौन सुनेंगा हमारी बात?’’
लड़की बहुत देर तक सुनती रही। उसके गालों पर जो आंसू थे वे सूख चुके थे। जल्दी से उसने अपने आंसू पोंछे और आवाज़ ठीक करते हुए बोली-
‘‘चिंता मत कर बहन, हम दोनों की ही हालत एक सी है।’’
‘‘तू भी भोगी जा सकती है। और हम भी। बस अंतर इतना ही है कि तू बोल नहीं सकती। और हम बोलकर भी बेज़बान हैं।’’
‘‘विश्वास कर मैं तेरे लिए आवाज़ उठाऊंगी।’’
‘‘तेरा केस अलग है।’’
‘‘तू प्रेग्नेंट भी थी उसपर आठ लोगों ने तेरी इज़्जत लूटी।’’
...बकरी और लड़की दोनों ख़ामोश हैं...

Friday, July 27, 2018

बॉस के गले न लगा करो बाबू


कौशलेंद्र प्रपन्न
बाबू आप समझते नहीं हैं! किसी से गले लगने से पहले अपनी और उसकी सामाजिक वजूद तो देख लिया करो। कितने भोले हो बाबू! तुम सोचते हो कितने सफ्फाक दिल से किसी से गले लगते हो। लेकिन उसके लिए यह चाटूकारिता होगी। तुम तो खुले दिल और मन से तपाक से मिल लेते हो गले। वो उसे तुम्हारी कमजोरी मानते हैं बाबू।
तुम्हारी आवभगत उन्हें लगता है तुम छुपा से रहे हो। तुमने उन्होंने सार्वजनिक तौर पर गले क्यों लगाया? क्यों तुमने हंसते हुए उनसे हाथ मिलाया? सब कुछ देखा जा रहा है। देखा जा रहा है कि कैसे तुमने उन्हें विश किया? कैसे तुमने उनसे हाथ मिलाया? बाबू बड़े ही भोले हो।
समझा करो तुम ठहरे मजूर वो रहे हजूर। अंतर तो अंतर होता है। वो हैं तुम्हारे बॉस। तुम ठहरे उनके रिपोटी। यह अंतर यह फासले तुम्हें याद रखने थे। याद तो यह भी रखना था कि आख़िरकर वो हेड ऑफिस से आया करते हैं। तुमने क्या सोचा? उन्होंने एक दो बार हंस कर बात क्या ली, तुमने तो उन्हें अपना दोस्त मान बैठे। जबकि वो दोस्त नहीं। भूलों मत कि जो अंतर बने हैं वो अभी भी कहीं न कहीं मन के किसी कोने में जज्ब हैं। वो भी इस मनोदशा से बाहर नहीं आ पाए हैं।
क्या मजेदार तर्क है गले मिलो मगर अकेले में। अकेले में गले लग सकते हो। सार्वजनिकतौर पर गले न मिला करो। बाबू भोले मत रहो। कभी भी सिर कलम की जा सकती है। तुमने जो सहज ही गले लगाया उसका ख़मियाज़ा भुगतना होगा तुम्हें।

Thursday, July 26, 2018

समकालीन कथाकार एवं संपादक श्री महेश दर्पण से गुफ्तगू




दर्पण जी उन गिने चुने हुए लेखक,कथाकारों में शामिल हैं जिन्होंने तकरीबन चार दशक पत्रकारिता में गुजारे।
दिनमान, नवभारत टाइम्स, धर्मयुग आदि पत्र-पत्रिकाओं में अपनी सेवा दे चुके दर्पण जी ने पिछले दिनों कथा-कहानी और पत्रकारिता पर बातचीत का अवसर मिला।
दर्पण जी की प्रमुख और गहरी चिंता इस बात की थी कि पत्रकारिता से सरोकार एक सिरे से ग़ायब होता गया। कभी प्रभाष जोशी, अज्ञेय, राजेंद्र माथुर, रघुवीर सहाय, सुरेंद्र प्रताप जैसे लोगों से पत्र-पत्रिकाओं की पहचान हुआ करती थीं। ये लोग अपने आप में एक संस्थान हुआ करते थे। प्रभाष जी या फिर अज्ञेय जी अपने पत्रकारों कर ख़बरों को लेकर सांसद, मंत्री और सरकार से भी लड़ पड़ते थे। वह एक युग था। अब एक जमाना है कि दबाव में ख़बरों दम तोड़ देती हैं।
वही हाल कथा-कहानी की है। कहानियां भी इन दिनों कुछ ख़ास दबावों, प्रलोभनों और अन्य प्रभावों की गिरफ्त में लिखी और छापी जाती हैं। 

ठहराव जिं़दगी के


कौशलेंद्र प्रपन्न
ठहराव महज़ ज़िंदगी को ही खत्म नहीं कर देती बल्कि जीने की ललक और छटपटाहट को भी मार देती है। हम सब एक समय, पद, प्रतिष्ठा हासिल करने के बाद ठहरने लगते हैं। एक आत्मतोष घेरने लगता है कि हमने अपनी जिं़दगी में बहुत कुछ पा लिया। जो प्रसिद्ध, मान, पद आदि मिलने थे मिल गए। अब आगे क्या? और क्या हासिल करना शेष रहा? जब इस प्रकार के प्रश्नों के आगे हम चुप हो जाएं तो समझना चाहिए कि हमारी जिं़दगी में ठहराव का डेरा लग चुका है। दूसरे शब्दों में कहें तो लाइफ कोच, मैनेजमेंट के जानकार इसे किसी भी प्रोजेक्ट के लिए बेहतर और लाभकरी स्थिति नहीं मानते। क्योंकि मैनेजर या लीडर या फिर आम इंसा नही जब अपने आप से संतुष्ट हो जाता है, उसे कहीं से भी चुनौतियां नहीं मिलतीं तब कुछ समय के बाद ठहरने लगता है। जानकार व्यक्ति इसलिए ताकीद करते हैं कि रूकना नहीं। ठहरना नहीं। आगे बढ़ना है। जीवन में अपने ही कामों को चुनौती देनी है। या फिर अपने सामने चुनौतियों खड़ी करने से हम हमेशा चौकन्न और सक्रिय हुआ करते हैं।
हम सब की ज़िंदगी में एक वह मकाम आता है या फिर हम मान लेते हैं कि हमने सबकुछ हासिल कर ली। अब कुछ बचा नहीं जिसे पाना हो। वह चाहे पद, पुरस्कार, मान सम्मान आदि ही क्यों न हो। दो किस्म के व्यक्ति होते हैं। पहला, हमेशा ही अतीत प्रेमी और अतीत में जीने वाला। उसके लिए वर्तमान की चुनौतियां कोई ख़ास मायने नहीं रखतीं। वो साहब जिनसे भी जब भी मिलते हैं उनकी जबाव अपनी पुरानी कहानियां, शौर्य, दान, उपकार आदि सुनाने में ख़र्च करती है। उन्हें इसी कहानी वाचन में आनंद बल्कि स्वप्रशंसा में गोते लगाने ज़्यादा भाता है। यदि इन्हें कोई टोक दे, या फिर यह एहसास कराए कि अब वो बात नहीं रही। आप का वो वक़्त था, अब ऐसा नहीं होता। किया होगा आपने ऐसे वैसे काम लेकिन आज ख़ुद को खड़े करने, दौड़ाने में पूरी जिं़दगी खप जाती है। इस प्रकार के लोग अपने जीवन में करते छटाक भर है लेकिन इस छटाक भर काम पर पूरी जिंदगी गुजार देने का माद्दा रखते हैं। वहीं दूसरा, वे व्यक्ति होते हैं जिन्हें अपनी जिं़दगी में ठहर जाना या पुरानी कामों में ही आत्मसुख तलाशाना बहुत देर तक नहीं भाता। इस किस्म के लोग रोज़ नई नई चुनौतियों से लड़ने और रणनीति में बनाने में अपना समय, श्रम, और सोच लगाया करते हैं। शायद इस प्रकार के लोग ही जमीन से आसमान तक की याख करते हैं। यही वो लोग हैं जो न केवल अपनी जिं़दगी बल्कि अपने परिवार के साथ ही समाज को भी एक नई राह और ऊंचाई प्रदान करते हैं। यही वो लोग हैं जो लीडर या समाज चेत्ता कहलाने के हकदार होते हैं। इन्हीं लोगों के कंधे पर समाज, प्रोजेक्ट, लाइफ की प्रगति और गति निर्भर करती है।
घर और समाज में दोनो ही तरह के लोग मिलेंगे। पहले वालों की संख्या कुछ ज़्यादा होती है जिनके प्रभाव में दूसरे वालों के पनपने की संभावना को कमतर करती हैं। पहले वालों के प्रभाव क्षेत्र और औरा बहुत बड़ा और व्यापक होता है। इस प्रभाव क्षेत्र को एरिया ऑफ इन्फ्यूलेंस कहा करते हैं। जो किसी भी व्यक्ति व प्रोजेक्ट की सफलता को प्रभावित करती हैं। एरिया आफ इन्फ्यूलेंस और एरिया और कंसर्न दोनों ही वो ताकतें हैं जो पहले और दूसरे किस्म के लोगों की कोशिशों और सफलता को ख़ासा प्रभावित करती हैं। दूसरें शब्दों में कहें तो कंसर्न यानी जिन तत्वों, परिस्थितियों आदि से हमारा सीधा सीधा साबका पड़ता है। जिसे हम या तो बदलने की ताकत रखते हैं। वहीं एरिया आफ इन्फ्यूलेंस हमारे हर प्रयासों को प्रभावित करता है। हमारे काम और प्लानिंग पर असर डालता है। कई बार एरिया आफ इन्फ्यूलेंस पर हमारी पकड़ नहीं होती। हम इस हैसियत में नहीं होते कि इसे बदल सकें। तब ऐसे में इसे नियंत्रित करना व बदलने हमें मुकम्मल रणनीति बनानी पड़ती है। कई बार आम व्यक्ति एरिया आफ इन्फ्यूलेंस और एरिया और कंसर्न पाट में फंस जाता है।

Tuesday, July 24, 2018

आंसू के मोल


कौशलेंद्र प्रपन्न
कहते हैं इंसान जब इस जमीन पर आता है तब उसे विभिन्न किस्म की विपरीत परिस्थितियों से सामना होता है और उसकी आंख से आंसू निकल आते हैं। शायद जो बच्चा रोता नहीं उसे जबरन रुलाया जाता है। यह भी सुनने में ज़रा अजीब सा लगता है कि यदि आप रोते नहीं तो पीट कर रुलाया जाता है। जब बड़े हो जाते हैं तब भी गाहे बगाहे रोते रहते हैं। कभी परिस्थितियों पर,कभी हालात पर, कभी रिश्तों पर तो कभी अपने काम और जीवन पर रोना आता है। रोते ही रहते हैं। और शिकायत भी करते रहते हैं। रोना और जीना। जीना और शिकायत करना दोनों ही चीजें साथ साथ चला करती हैं। जो रोता नहीं उसे जबरन रुलाने का प्रयास किया जाता है। आपने देखा ही होगा। यदि फलां का पति, बच्चा, पत्नी गुज़र जाती है। और फलां या फल्नीं रोती नहीं या रेता नहीं तो लोग चिंता करने लगते हैं। रुलाओ उसे। रो नहीं रही है। रुलाते तो इसीलिए हैं कि रोने से मन हल्का हो जाएगा। रोने से मन की गुत्थी थोड़ी ढिली होगी। जमा हुआ बर्फ थोड़ी पिघलेगा। तर्क तो यही दिए जाते हैं। रोने से मनोविज्ञान का भी गहरा रिश्ता रहा है। मनोविज्ञान व मनोचिकित्सा शास्त्र मानता है कि रोने से हमारी मनोजगत् की हलचलें व ठहराव कम होता है। मानसिक तनाव कम होते हैं। नस नाड़ियां सहज होती हैं। आदि। यह एकबारगी ग़लत भी नहीं है। तमाम साहित्य- कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक आदि में ऐसे पात्र होते हैं जिन्हें देख,पढ़, सुनकर पाठक सहज ही अपनी घटनाओं से जुड़ जाता है और रुलाई स्वभाविक ही आ जाती है।
साहित्य में ख़ास कर ऐसी रचनाएं लेखकों ने यह सोच कर नहीं कीं कि हमें पाठकों को रुला ही देना है। बल्कि उन्होंने तो समाज के सहज और सामान्य गतिविधियों व घटनाओं को अपनी रचना में पुनर्सृजन करने की कोशिश की। उन्होंने यह प्रयास किया कि समाज में जो हो रहा है वह अप्रिय है। उसके प्रति कम से कम लेखक सामाजिक को संवेदनशील बनाए। उन परिस्थितियों के प्रति नागर सामज को चौकन्ना करे और जिम्मेदारियों का एहसास कराए। इन उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए भी कई रचनाएं चाहे वो कहानी, कविता व उपन्यास ही क्यों न हो समय समय पर रची गई हैं। निर्मला, गोदान, पिंज़र, हज़ार चौरासी की मां, जिन्ने लाहौर नहीं वेख्या ते जन्माई नइ, साकेत, अंतिम अरण्य, बच्चे काम पर जा रहे हैं, खो दो आदि ऐसी रचनाएं हैं जिन्हें पढ़ते व देखत हुए हमारे आंखें नम हो जाती हैं। गोया हम उसी कालखंड़ में यात्रा करने लगते हैं।
रोना अपने आप में न तो शर्म की बात है और न आंसू आ जाना कोई अप्रिय और अनहोनी सी घटना ही। क्योंकि यदि इंसान है तो सहज ही रोना, हंसना, क्रोधादि स्वभावगत प्रक्रियाएं हैं। लेकिन हमारा सामाजिकरण ही ऐसा होता है कि हम बचपन से ही रोने को ख़राब हो और एक ख़ास वर्ग क अांगन में डाल देते हैं। वो रोएं तो उनकी तो यही आदत है। वे तो रोती ही रहती हैं आदि। मगर हम रो दे ंतो आसमान कहीं फटने लगता है। कहीं कोई जमीन दरकने लगती है। सुनाया जाता है कि लड़की की तरह रो रहे हो। कमाल का तर्क है रोना उनके पाले में। हंसना लड़कों के हिस्से आया। प्रसिद्ध संपादक, लेखक,कवि अज्ञेय जी ने शेखर एक जीवनी में लिखा है कि रोना एक ऐसी प्रक्रिया है जिससे मनुष्य का अंतरजगत् कुछ और साफ और हल्का हो जाता है। दूसरें शब्दों में कहें तो रोना, रुदन, रुद्रादि भाव मानवीय स्वभाव के प्रमुख अंग हैं। इनके न तो अलग हुआ जा सकता है और न ही जीया जा सकता है।

Thursday, July 19, 2018

शिक्षा में द्वंद्व


कौशलेंद्र प्रपन्न
शिक्षा में द्वंद्व का मायने व्यापक है। यह द्वंद्व सामान्य कॉफ्लिक्ट नहीं है। जैसे समाज में पाया जाता है। यह द्वंद्व कई स्तरों पर हैं। पहला हम शिक्षा से क्या हासिल करना चाहते हैं? यदि हमने शिक्षा के कुछ सर्वमान्य तय उद्देश्य तय कर रखे हैं तो उन्हें पाने के लिए हमने कौन सी रणनीतियां बनाईं? उन रणनीतियों के ज़रिए हम किन राहों का इस्तमाल करन रहे हैं? क्या हमारे पास पूरी प्लानिंग है? क्या उन्हें कार्यान्वित करने की हमारी राजनैतिक, नीतिगत और सामाजिक इच्छा शक्ति है आदि। तकरीबन सौ साल से भी ज़्यादा सालों से हमारी शिक्षा इन्हीं अंतर द्वंद्वों से लड़ रही है। इसी संघर्ष का परिणाम है कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम को कानून बनने में लंबा समय लगा। प्रकारांतर से शायद सत्ताओं की प्राथमिकता सूची में शिक्षा शामिल ही नहीं हो सकी। जब हमें आजादी मिली वो भी तकरीबन सत्तर साल बीत चुके हैं, अभी भी हमारे प्राथमिक स्कूलों में जाने वाले बच्चों की बड़ी संख्या स्कूली शिक्षा के हाशिए पर हैं। यह विफलता नहीं तो इसे और किस नाम से पुकारा जाए। विभिन्न मंचों पर हमने घोषणाएं तो कीं कि हम फलां वर्ष तक सभी बच्चों को प्राथमिक शिक्षा मुहैया करा देंगे। इनमें 1990, 2000, 2015 आदि ऐसी ही किनारें हैं जहां शिक्षा को किनारे लगना था। अगर मगर किन्तु परन्तु के कारण अब यह किनारा 2030 तक खिसका दिया गया है।
उक्त जिन द्वंद्वों की चर्चा की गई है वे तो हैं ही साथ ही नीतिगत स्तर पर भी बहुत से मोड़ मुहानें हैं जहां से शिक्षा अचानक मुड़ जाती है। जब कुछ साल गुजर जाते हैं तब एहसास होता है कि हम तो शिक्षा के मूल मकसद को कहीं पीछे छोड़ आए हैं। आज की तारीख़ी हक़ीकत यह है कि शिक्षा की बुनियादी मांगों व प्रकृति को भी अच्छे से रेखांकित नहीं कर सके हैं। कभी हम शिक्षा के नाम पर पढ़े-लिखने भाषायी कौशलों को शिक्षा के उद्देश्यों में शामिल कर चिल्लाने से लगते हैं। ‘‘पढ़ेगा इंडिया तभी तो बढ़ेगा इंडिया’’ यहां इन उद्देश्य में क्या हमारी नज़रें सिर्फ बच्चों को साक्षर बनाना है या बच्चे जो पढ़़ रहे हैं उन्हें समझ कर पढ़ और बढ़ रहे हैं इसे भी जांचने की आवश्यकता है। पढ़ना-लिखना शिक्षा का उद्देश्य तो है ही साथ ही यह कौशल भाषा के हिस्से आया करता है। श्रवण-वाचन, पठन और लेखन। क्या हम भाषायी कौशल के कंधे पर शिक्षा के उद्देश्य को बैठा सकते हैं विमर्श इस पर होना चाहिए। सत्ता और आम जनता में बीच भी हमेशा से द्वंद्व रहा है।

Tuesday, July 17, 2018

सामान बटोरू स्वभाव और सेल



कौशलेंद्र प्रपन्न
कभी सेल का मौसम साल में एक या दो बार आया करता था। जनवरी, फरवरी या फिर पंद्रह अगस्त के आस-पास। या फिर राखी, दिवाली या फिर होली के आस-पास। अब तो सेल का कोई मौसम न रहा। जब मन किया बाजार ने तय किया तभी सेल का मौसम तारी हो जाती है। कभी कोई कंपनी तो कभी दूसरी कंपनी में हाड़ लगती है और सेल का मौसम शहर, महानगरों पर हावि हो जाते हैं। कभी महासेल तो कभी महामेघा सेल। सिर्फ नाम में अंतर देखे जा सकते हैं। प्रवृत्ति एक सी होती है। कैसे कस्टमर की जेब से पैसे निकलवाए जाएं। गोया कस्टमर तैयार बैठे होते हैं कि आईए और मेरी जेब काटें। जब कटने वाला तैयार तो काटने वाला क्योंकर सस्त हो। जो सामान सामान्य दिनों में हज़ार की होती है उसपर तीन से चार हज़ार का प्राईस टैग लगाकर पचास$पचीस$ बीस फीसदी के सेल के टैग लगाकर वही सामान पंद्रह सौ में पिचका दिया जाता है। ख़रीदने वाला खुश कि तीन चार हजार का सामान सेल में सस्ते में मिल गया। वह एक नहीं दो नही बल्कि तीन चार पैंटें, शर्ट खरीद लेता है। बिना इसको जांचे कि उसे शर्ट व पैंट की ज़रूरत है भी या नहीं। बस इस तर्क पर खरीद लेता है सेल में मिल रहा है खरीद लो कभी तो काम आएगी।
पूरी तरह से हमें याद होगा कि कभी वक़्त था जब शादी ब्याह या फिर तीज त्योहारों पर नए नए कपड़े दिलाए जाते थे। जिन्हें बहुत जतन से रखते, धोते और सूखा कर अगली बार पहने के लिए रख दिया करते थे। माम-मामी, बुआ के घर जाना होता तो जैसे खरीदी वैसे ही पहनी हम नए कपड़े पहन कर जाते और आकर वैसे ही टीन या स्टील के बक्शे में धर दिया करते थे। तब महसूस होता था कि नए कपड़ों की इज्जत क्या होती है। वे कपड़े फिर समय के साथ फटे भी किया करते थे। मुहल्ले वाले, यार दोस्त मजाक भी उड़ाया करते थे अब तो नई कमीज़ खरीद ले भाई। देख नहीं रहा है कंधे पर शर्ट झांक रही है। मगर नई कमीज़ अगली होली या दिवाली में ही मिला करती थी। वो भी कई कई बार कपड़े खरीदे जाते और दर्ज़ी के पास नाप देकर हर दिन पूछने जाना कि सील गई क्या? टंगी हुई कमीज़ों और पैंटों में अपनी कमीज़ देखने का इंतज़ार हुआ करता था।
ईदगाह का हामीद याद आता है। पूरे तीस दिन के रोज़े के बाद गांव में हलचल है। किसी के पाजामे में नाडा नहीं है, कोई नई बुशर्ट पहने हुए है। तो कोई अपने जूते को चमकाने में लगा है। वहीं कोई अपने जूते में तेल डाल कर गिला कर रहा है। यही तो वर्णन प्रेमचंद अपनी कहानी ईदगाह में करते हैं। तब लोगों को नए कपड़ोंख् जूतों, चप्पलों का इंतजार होता थ। किसी के पास भी एक या दो से ज़्यादा जूते या अंगरक्खा नहीं होता था। जब फट जाती थी तब नई खरीदी जाती थी।
अब तो सेल महासेल के मौसम में किसी के पास इतना भी वक़्त नहीं है कि एक बार घर में अपनी आलमारी को खोल कर गिनती कर लें कि कितनी पैंटें, शर्ट, टी शर्ट हैं जो पिछले साल भी पहनने की बारी नहीं आई थी। वे तमाम कपड़े अपनी बारी के इंतजार में सिमटे जा रहे हैं। कभी तो उनके भी भाग्य बिहुरेंगे। कभी तो उन्हें भी पहना जाएगा। मगर नई नई शर्ट, पैंट और आलमारी में ठूंस दी जाती हैं। वही हाल जूते शैंडिलों का है। एक नहीं बल्कि कम से कम पांच छह जूते शैंडिल तो काम बात है। एक चमड़े के, दौड़ने जिसे वॉक करने के हल्के जूते, बिना फीते वाले, फीते वाले भी जूते एक दूसरे पर चढ़े रहते हैं। लेकिन क्योंकि किसी ख़ास ब्रांड के जूते सेल में तीन या चार हजार में मिल रहे हैं तो बिना ज़रूरत के उसे खरीद कर शू रेक में अडसा देते हैं।
जब कभी मौका मिले तो कभी अपनी आलमारियों की सफाई कीजिए मालूम चलेगा कि जिन्हें भी छांटते हैं कि इसे तो अब नहीं पहनता किसी और को दे दें। तभी सामान बटोरू प्रवृत्ति सवार हो जाती है। और उसका घर से बाहर निकलना ठल जाता है। और इस तरह से सामानों की लाइन लंबी होती जाती है। आख़िर एक आलमारी से काम क्यों नहीं चल सकता? क्या पहले घरों में शू रेक हुआ करते थे? शायद ही किसी किसी घर में। लेकिन जब से आठ दस जोडत्रे जूते चप्पल होंगे तो उसे सलीके से रखना भी तो होगा।
काश हम अपनी पुराने, जिन्हें अब नहीं पहनते। बल्कि शरीर पहनने नहीं देता। कभी बड़े शौक से मन पसंद पैंट या शर्ट खरीदी थी। तब उसे बचा कर रख दिया करते थे। अब शरीर वैसे छरहरा रहा नही ंतो वे कपड़े हमारे काम के नहीं रहे। लेकिन किसी और के तो काम आ सकते हैं। बहुत कम ऐसे घर होंगे जिनके यहां ऐसे कपड़ों, जूतों, चप्पलों की भीड़ होगी जिन्हें हम चाहें तो जरूरतमंद लोगों के तन ढक सकते हैं।
सामानों का अति संग्रह कही न कहीं संसाधनों का ग़लत इस्तमाल भी तो है। क्योंकि चीजें सेल में मिल रही हैं इसतर्क पर घरों को सामानों से भर दिया जाए। क्या यह बिना सोचे कि इस चीज की ज़रूरत हमें है या नहीं? बस सेल का लाभ उठाते हुए घरों को कबाड़ घर बना दिया जाए। घर का घर रहने देना अपने आप में कठिन है। लेकिन घर में चलने, उठने-बैठने, की जगह तभी रखी जा सकती है जब अनावश्यक सामानों से घर को न भर दें।

Tuesday, July 10, 2018

भाषायी हत्यारे...इतने निष्ठुर कैसे हो सकते हैं हम?




कौशलेंद्र प्रपन्न
यदि किसी व्यक्ति की हत्या होती है या की जाती है तो उसके लिए भारतीय संविधान मे सज़ा का प्रावधान है। विभिन्न धाराओं उपधाराओं के तहत आजीवन कारावास या सज़ा ए मौत तय है। लेकिन ताज्जुब की बात है कि जब मानवीय विकास से गहरे जुड़ी किसी भाषा की हत्या होती है या की जाती है जो उसके लिए कोई सज़ा का प्रावधान नहीं है। राहुल देव, वरीष्ठ पत्रकार और भारतीय भाषाओं के संरक्षण की वकालत बड़ी ही शिद्दत से कर रहे हैं। उनका मानना है कि भारत को बचाना है तो भारतीय भाषाओं को बचाना होगा।
पिछले दिनों टेक महिन्द्रा फाउंडेशन के शिक्षा ईकाई अंतःसेवाकालीन अध्यापक शिक्षा संस्थान में शिक्षांतर व्याख्यान माला की नौंवी कड़ी में बतौर वक्ता अपनी बात रखी कि हम सब रोज भाषाओं के साथ अन्याय करते हैं। बल्कि हम सब भाषा के हत्यारे हैं। वह इस रूप में कि न तो हम हिन्दी ही ठीक से बरत पाते हैं और न अंग्रेजी ही। दो भाषाओं के बीच में हमारी पूरी जिं़दगी गुज़र जाती है। हमें न तो अच्छे से हिन्दी आ पाती है और न अंग्रेजी ही। उदाहरण से इस वक्तव्य को स्पष्ट किया कि क्रू कभी हमने किसी अंग्रेजी के सेमिनार में या व्याख्यान में हिन्दी को सुना है? कितनी प्रतिशत हिन्दी उन सेमिनारों में बोली जाती हैं? आदि। वहीं हिन्दी के सेमिनार में अंग्रेजी के शब्दों और वाक्यों का इस्तमाल प्रचूरता से होता है।
राहुल जी का मानना था कि यदि हम हिन्दी बोल रहे हैं तो पूरी हिन्दी ही बोलें। उसमें अंग्रेजी की छौंक न लगाएं। दरअसल इसके पीछे हमारी मानसिकता का परिचय भी मिलता है। आज की तारीख़ में हज़ारों भाषाएं मर चुकी हैं बल्कि हर साल मर रहीं हैं लेकिन उन्हें बचाने के लिए हमारी संवेदना नहीं जगती। हम इतने निष्ठुर कैसे हो सकते हैं?
भाषायी विमर्श में राहुल जी ने बड़ी संजीदगी से इसे स्थापित किया कि भाषा के बगैर हमारा अस्तित्व नहीं है। भाषा मरती है तो एक पूरा का पूरा जीवन दर्शन मर जाता है। एक अस्मिता और भाषायी समाज खत्म हो जाती है।


Thursday, July 5, 2018

आनंदपूर्ण पढ़ना-पढ़ाना पर किसके कंधे पर



कौशलेंद्र प्रपन्न
तकरीबन पांच व छह दशक पहले प्रो. यशपाल ने ‘शिक्षा बिना बोझ के’ वकालत की थी। उनका तर्क था कि शिक्षा-शिक्षण, पढ़ना-पढ़ाना आदि कोई बोझ न हो। सीखना-सिखाना प्रक्रिया सहज और आनंदपूर्ण प्रक्रिया हो। बजाए कि स्कूल और स्कूली परिवेश बच्चों को आकर्षित करने के उन्हें डराएं आदि। बड़ी ही शिद्दत से प्रो. यशपाल ने अपनी इन सिफारिशों को सरकार को सौंपी थी। सरकार तो सरकार होती है। उसकी अपनी प्राथमिकताएं होती हैं। कन्हें कब और कितना उछालना है, किसे तवज्जो देनी है आदि सरकार और सत्ता तय किया करती है। क्यर हम इसे सरकार और सरकारी सत्ता कह इच्छा शक्ति की कमी न मानें कि छह दशक के बाद भी हम ज्वायफुल लर्निंग की ही बात कर रहे हैं। सिर्फ नाम बदले हैं। रैपर बदले हैं अंदर का कंटेंट, कंसेप्ट तकरीबन समान है। यदि दिल्ली सरकार हैप्पी करिकुलम की बात करती है। साथ ही कई महीनों की मेहनत से कंटेंट तैयार करवाया गया। अब उसे स्कूलों में लागू का जाएगा। कहा तो यह भी जा रहा है कि कक्षा में स्कूल की शुरुआत में तीस मिनट बच्चे ध्यान से किया करेंगे। इसमें कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन गैर हिन्दू संप्रदाय के बच्चों को भी हमें विमर्श के केंद्र में रखने होंगे। क्योंकि स्कूल किसी एक ख़ास संप्रदाय व मान्यताओं का परिसर नहीं है बल्कि यहां एक ऐसा समाज बसता और आकार लेता है जो भविष्य में व्यापक समाज का दिशा देते हैं।
दूसरा उदाहरण मानव संसाधन मंत्रायल के निर्णय को लिया जाए। हाल ही में एमएचआरडी मंत्री ने घोषणा की कि हमारे बच्चों का करिकुलम बहुत भारी है। उस भार को कम करना होगा। कम किया जाना चाहिए। यह पहली सरकार है जो शिक्षा के इस भार को पहचान कर कम करने की इच्छा शक्ति रखती है। अब उन्हें कौन समझाए कि कभी कभी शिक्षा और मंत्रालय के निर्णयों, दस्तावेज़ों को पढ़ लेने में कोई हर्ज़ नहीं है। जैसा कि पहले ही कहा जा चुका कि प्रो. यशपाल से लेकर जस्टिस जे एस वर्मा की कमिटि ने भी शिक्षा की बेहतरी और ज्वायफुल लर्निंग के लिए पहले सिफारिशें दे चुकी हैं। यह अलग बात है कि हमने उसे नज़रअंदाज़ कर दिया। उस पर तर्रा यह कहना कि पहली बार उनकी सरकार इस ओर ध्यान दे रही है।। यह अफ्सोसनाक बात नहीं तो और क्या नाम दे सकते हैं।

Friday, June 29, 2018

हिन्दी मातृभाषी पैंतालीस फीसदी फिर हिन्दी बेगानी




कौशलेंद्र प्रपन्न

हिन्दी को बोलने-बतियाने वालों की संख्या फीसदी में बात की जाए तो पैंतालीस 45 है। कुल जनसंख्या का 45 फीसदी जनता हिन्दी को अपनी मातृभाषा के रूप में बरतती है। बाकी बची भाषाएं, बोलियां भी प्रचलन में हैं। जो खड़ी हिन्दी 45 फीसदी के आगे कमतर सी महसूस करती हैं। गै़र हिन्दी भाषी समाज की बात की जाए तो उन्हें लगता है कि खड़ी हिन्दी उनकी बघेली, भोजपुरी, हरियाणवी, राजस्थानी, गढ़वाली को निगल जाएगी। ऐसा डर आख़िर उन्हें क्यों लगता है? शायद इसलिए क्योंकि हिन्दी कई बार अन्य भारतीय भाषाओं को शुद्धता के तर्क पर स्वीकार नहीं कर पाती। शुद्ध हिन्दी के पैरोकारां को यह कत्तई स्वीकार नहीं कि हिन्दी में गै़र हिन्दी भाषा के शब्द, शैली शामिल हो। उन्हें यह डर रहता है कि इससे शुद्ध खड़ी हिन्दी ख़राब हो जाएगी। जबकि बहुत पहले बहुभाषा और हिन्दी को बरतने वालों ने कहा भी कि हिन्दी और उर्दू गंगा-जमुनी संस्कृति की साझा विरासत की पहचान है। यदि ऐसा है तो हिन्दी को अन्य भारतीय भाषाओं और बोलियों को दूरी बनाकर चलने का क्या औचित्य है? साझा संस्कृति में हिन्दी भी कहीं न कहीं बनती, सजती और संवरती रही है। हिन्दी भाषा की सबसे बड़ी ताक़त ही यही रही है कि इसके अपने दामन में उर्दू, संस्कृत, फारसी, भोजपुरी, ब्रज, अवधी आदि भाषाओं को उदारता के साथ स्वीकार किया है। यदि इतिहास में झांक कर देंखें तो पाएंगे कि प्रसिद्ध कथासम्राट प्रेमचंद शुरू में हिन्दी में नहीं लिखा करते थे। वो सोज़े वतन पर पाबंदी लगी और प्रेमचंद हिन्दी में लिखना शुरू करते हैं। हिन्दल्वी, हिन्दुस्तानी भाषा का प्रयोग गांधी से लेकर ऋषि दयानंद तक ने की है। यही कारण है कि हिन्दी समय के अनुसार समृद्ध होती गई है।
हिन्दी को बोलने-बरतने वालों की संख्या आज की तारीख़ में लाखों और करोड़ों में हैं। वह देशज दहलीज़ को लांघ कर वैश्विक स्तर पर लोग मिलेंगे जो हिन्दी बोलते-समझते हैं। क्यो वो दुबई हो, बाली हो, थाईलैंड हो, श्रीलंका,मॉरिशस हो इन तमाम जगहों पर हिन्दी भाषा-भाषी लोग सहजता से मिलेंगे। जिन्हीं हिन्दी से रागात्मक संबंध है। उनके लिए हिन्दी मां से कहीं ज़्यादा बढ़कर है। वे जब भी हिन्दी में कहीं उलझते हैं तब वे भारत की ओर उम्मीद भरी नज़रों से देखते हैं और अपेक्षा करते हैं कि उन्हें हिन्दी भाषाई मुश्किल दौर से निकलने में भारत के भाषा-भाषी मदद करेंगे। लेकिन यहां हालत यह है कि हिन्दी को या तो बाज़ार में बैठाने के लिए हम आमादा हैं या फिर शुद्ध शाकाहारी किस्म की कोई वस्तु बनाने पर तुले हुए हैं। ऐसे में हानि किसी और की नहीं होती बल्कि हिन्दी का ही नुकसान हम कर रहे होते हैं। हमें आपसी राय और सुझावों के ज़रिए हिन्दी की आंतरिक द्वंद्वों को निपटा कर वैश्विक स्तर पर स्वीकार्य बनाने के प्रयास करने होंगे। हालांकि कहने वाले कह सकते हैं जनाब हमने कब कसर छोड़ी है। हर साल अंतरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन करते हो हैं। कभी दिल्ली कभी मॉरिशस, कभी लंदन आदि। लेकिन इस हक़ीकत से भी हम मुंह नहीं फेर सकते कि इन सम्मेलनों में होता क्या है? क्या उन सम्मेलनों में शामिल लोगों की सच में इच्छा होती है कि हिन्दी बेहतर बनें? क्या उनका अपना निजी एजेंड़ा नहीं होता कि नई जगह घूम आएं। कुछ निजी रिश्ते बुन आएं ताकि उस देश में दुबारा हिन्दी के कंधे पर सवार होकर टहलने का मौका मिले। इन सम्मेलनों में कुछ रटे रटाए, स्टीरियो टाइप के विषय रखे जाते हैं जिसपर पर्चां की प्रस्तुती होती है। फिर कविता, कहानी, व्यंग्य का दौर चलता है। कविता सुन-सुना कर वाह वाह की अनुगूंज के साथ अगले सम्मेलन की तारीख़ तय हो जाती है। जिनसे इस बार नहीं मिल सके उनके अगले मेले में मुलाकात का वायदा कर आते हैं। हिन्दी वहीं की वहीं खड़ी रह जाती है।

Thursday, June 28, 2018

आग में जलें मगर...




कौशलेंद्र प्रपन्न
जलना अच्छा है। जलन न तो हो हम शायद ठहर जाते हैं। शायद कुछ समय के बाद मरने से लगते हैं। भौतिक मौत नहीं होती बल्कि हमारी गति, विकास, प्रगति ठहर सी जाती है। मनुष्य हैं जो स्वभावतः जलन आ ही जाती है। हम जलते हैं किसी की प्रगति से। किसी की संपदा से। हम जलते हैं किसी की दो गज़ जमीन से। यदि हम कम जलते हैं तो किसी की ज्ञान संपदा से। ज्ञान के लिए जलना, ज्ञान व समझ हासिल करने के लिए जलना कहीं न कहीं हमें आगे बढ़ने में मदद करता है। मगर हमें जिन चीजों से जलना चाहिए उससे नहीं जलते। जलते हैं तो उन चीजों से जो अस्थिई होती हैं। किसी की नई कार से जलने लगते हैं। दूसरे की कार को देखकर अपने आपे से बाहर जाकर लोन लेकर भी समानांतर कार ख़रीद लेते हैं। दूसरे के प्रतिभावान बच्चे से जलने लगते हैं और अपने बच्चे को कोचने लगते हैं। बच्चा का जीना दुभर कर देते हैं। जलन यदि न हो तो हमारी जिं़दगी में एक ठहर सी आ सकती है।
कभी हमारे ऋषि-मुनि दूसरों के तप, योग,साधना आदि से जलते थे। ईर्ष्या उनमें भी होती थी। मगर वह जलन उन्हें और और तपस्या करने, ज्ञान, साधना हासिल करने के लिए प्रेरित करती थीं। वहीं दूसरी ओर असुर शक्तियां ़ऋषियों की तपस्या से जलते थे। क्योंकि वे उस स्तर की साधना नहीं कर पाते थे इसलिए उनकी तपस्या में बाधा पैदा किया करते थे। पूरा का पूरा आर्ष ग्रंर्थ ऐसे उदाहरणों से भरे हुए हैं।
आम जिं़दगी में झांक कर देखें तो हमारी अधिकांश ऊर्जा, ताकत, श्रम आदि दूसरों से प्रतिस्पर्धा में गुज़र जाती है। हालांकि स्वस्थ प्रतिस्पर्धा ग़लत नहीं है इससे कहीं न कहीं हमें आगे बढ़ने, विकसने में मदद करती है। मगर जब प्रतिस्पर्धा सिर्फ और सिर्फ जलन में तब्दील हो जाए तो वह हमारी ही ऊर्जा, और इच्छा शक्ति को खत्म करने लगती है। हम अंदर से खोखले होने लगते हैं। कई बार हमें ख़ुद महसूस नहीं हो पाता कि हम अंदर से कितने जल भुन कर राख हो चुके हैं। जिन वज़हों व जिनकी वजह से जल रहे थे उसकी गति और प्रगति में कोई अंतर नहीं आया बल्कि हम उस जलन में धीरे धीरे बुझते जा रहे हैं। ज्ञान और सूचना आज की तारीख में सबसे बड़ी ताकत है। यदि किसी ने ज्ञान और  सूचना-तकनीक को साध लिया तो मानना चाहिए कि उसके पास हज़ारों हज़ारा हॉर्स पावर की ताकत है।
मानवीय स्वभाव में प्रेम, ईर्ष्या, डाह,क्रोध आदि तो मिले हैं लेकिन ये भाव स्थायी नहीं हैं। इन्हें सश्रम व प्रयास के ज़रिए साधा भी जा सकता है। यह इतना भी कठिन नहीं है कि इसपर जीत न हासिल की जा सके। कई बार हमारा स्वभाव परआलोचना जिसे दूसरों की निंदा के नाम से भी पुकार सकते हैं, उसमें इतना रस मिलने लगता है कि हम अपनी गति, अपना स्वभाव उससे संचालित करने लगते हैं। आप जिससे जल रहे हैं उसे कई बार इसबारे में जानकारी तक नहीं होती और आप हैं कि उनकी चिंता, जलन में न रात सोते हैं और न दिन में चैन की नींद ले पाते हैं।
यदि जलन सात्विक हो तो इससे आर्ष ग्रंर्थों में भी साराहा गया है। सात्विक जलन मनुष्य को आगे बढ़ने और जीवन में आगे बढ़ने के लिए उत्प्रेरित करता है। लेकिन जब वही जलन हमारी आंतरिक दुनिया को संचालित करने लगे। हमारे स्वभाव को निर्धारक बन बैठे तब हमारी वास्तविक गति, प्रगति और विकास बाधित होने लगती है। किसी की प्रगति या प्रोन्नति से जलना कैसे और क्यों? क्या इसलिए कि कभी वह हमारी ही स्थिति में हुआ करता था। क्या इसलिए कि आज वह अपने श्रम और ज्ञान की वजह से अब हमारे बीच का नहीं रहा आदि। जलना ही है तो उसकी प्रगति और विकास की प्रक्रिया को अपनाने के लिए होनी चाहिए। जलन इसबात के लिए महसूस हो कि मैं कैसे उसकी गति को हासिल कर सकता हूं। जलन इस बात की हो और आगे की रणनीति बनाने के लिए हो कि हम कैसे बेहतर हो सकते हैं।
आज की तारीख में हमारा अधिकांश श्रम और समय सिर्फ तुलना कर जलन में जाया हो जाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो दूसरों के विकास से तो हमें खुश होना चाहिए कि फलां ने आज वह मकाम हासिल की है। हम कैसे वहां तक पहुंच सकते हैं व कैसे अपनी जिं़दगी को और बेहतर बना सकते हैं। आग का बुझ जाना गति का शांत होना ही तो है। जब हमारे अंदर की आग धीमी होने लगती है तब हम धीरे धीरे मरने से लगते हैं। यदि हमें जिं़दा रहना है तो आग को जिं़दा रखना है। जलन को बचाकर रखना है। बस ज़रूरत इस बात को ध्यान में रखने की है कि उस जलन की प्रकृति दूसरों के विकास से डाह के रूप में न हो बल्कि आत्म विकास के लिए हो भी हो। 


Friday, June 22, 2018

सूरज नहीं आता




कौशलेंद्र प्रपन्न 
अब हमारे दरवाज़े और आंगन में सूरज नहीं आता। न तो आंगन में और न ही मुंडेर पर सूरज चढ़ा करता है। कभी वक़्त था जब गर्मियों में सुबह सुबह आंगन और खिड़कियों से कमरों में झांका करता था। नींद ख़ुद ब ख़ुद खुल जाया करती थीं। नींद का क्या है, रात में छत पर सोया करते थे। सुबह चिड़ियों की आवाज़ से या फिर थोड़ी देर चादर तान कर सोते तो अह्ले सुबह सूरज अपनी सेना के साथ छत पर आ धमकते थे। सुबह के साढ़े पांच या छह बजते बजते छत से नीचे उतरना पड़ता। तब सूरज हमारे बेहद करीब हुआ करते थे। सूरज हां वही सूरज जो गर्मियों में निकले की जल्दबाजी होती और शाम देर तक ठहरा करते। कम से कम साढ़े छह और सात बजे तक तो हमारे साथ ही हुआ करते थे। हां तभी गोधूली भी हुआ करती थी। अब न गोधूली रही और न सूरज का इंतज़ार सा रहा। क्योंकि सूरज हमारे आंगन, छत, दहलीज़ से दूर जा चुके हैं। 
हम जहां हैं जहां हमारा घर हुआ करता है। ठीक उसके सामने ऊंची इमारत बन चुकी है। इतनी ऊंची की सूरज को भी ढल लिया है। न तो सुबह सूरज नज़र आता है और न धूप ही आया करती है। कभी मां होती थी तो वो सुबह नहा धोकर जलार्पण किया करती थी। रसोई में जाने से पहले नहा लेती और एक लोटनी पानी सूरज बाबा को चढ़ाकर फिर रसोई का काम करती। अब न सूरज हमारे घर के पास रहे और न उनकी रोशनी हमें मयस्सर है। जब से हमारे घर के सामने हमारे घर के समानांतर ऊंची इमारत बन चुकी है तब से सूरज का बेधड़क आना-जाना रूक सा गया है। बस घर ने निकलने के बाद गली में या फिर सड़क पर आने के बाद सूरज से रू ब रू होता है। कोई और वज़ह नहीं बस यूं ही सूरज को देखकर आंखें मूंद लिया करता हूं। आंखें बंद कर मांफी भी मांग लिया करता हूं कि हमारी ही गलती की वज़ह से अब आपसे हमारी सुबह का प्रणामपाती नहीं हो पाता। आपके और मेरे बीच ऊंची -ऊंची इमारतें खड़ी हो गई हैं। जिनकी वज़ह से हमारे सीधे मुलाकात टल सी गई है। 
यह सिर्फ मेरी या आपकी स्थिति नहीं बल्कि कम से कम महानगरों में रहने वाले हज़ारों लोगों की दास्तां है जिसमें सूरज देखते ही देखते गायब होते जा रहे हैं। उसपर तुर्रा यह कि जैसे जैसे हमारी कॉलोनी, मुहल्ले में पुराने मकान टूट कर बिल्डर के हाथों सौंपे जा रहे हैं उसमें छोटे घरों पर संकट से आ गए हैं। जो घर बीस तीस साल पुराने हो चुके हैं और घरवालों के पास पैसे हैं तो वे घर ख़तरे में हैं। अब छोटे घरों का चलन खत्म होता जा रहा है। घर हो तो पांचख् छह मंजिल का तो होना ही चाहिए। बिल्डर बनाकर अपने लिए एक फ्लारे ले लेता है और आपके सिर पर एक किरायदार बैठा देता है। आप न चाहते हुए भी एक पराए परिवार को अपने सिर पर पनाह देते हैं। यदि खरीदने की ताकत है तो आप ऐसा होने से रोक सकते हैं। लेकिन अमूमन होता नहीं है। 
अभी सूरज को पीछे धकेलने का काम महानगरों, सेकेंड और थर्ड टियर वाले शहरों में बिल्डर कल्चर शुरू हो चुका है। जहां पुराने घरों को तोड़कर नई नई ऊंची- ऊंची इमारतों को जनमा जा रहा है। ऐसे में कई बार लगता है कि लोगां को अपने पुराने मकान कोई लगाव ही न रहा। कभी मां-बाप जिस मुश्किल हालात में घर में कमरे, दुछत्ती, सीढ़ियां जोड़करते थे। उसमें वे स्वयं कई बार ईट तोड़ने, रेत लाने का काम भी कर लिया करते थे। एक एक दीवार में घर के हर सदस्य का योगदान हुआ करता था। ऐसे में यदि एक भी ईट तोड़ने की या बेचने की बात आती तो मां-बाप पहले खड़े हो जाते कि यह मैंने ख़ून पसीने की कमाई से बनाई है कम से कम मेरे जीते जी तो इसे न तो बेच सकते हैं और न तोड़ सकते हैं। लेकिन पुराने लोग जैसे जैसे हमारे बीच से खिसकते गए वैसे वैसे पुराने मकानों को तोड़कर ऊंची इमारतों को तवज्जो दिया जाने लगा। कभी वक़्त तो यह भी था कि एक घर में जिसमें दो से तीन कमरे हुआ करते थे लेकिन उसमें रहने वाले पांच-छह सदस्य होते थे। सब के सब ख्ुश और प्रसन्न। किसी को भी अगल से कमरे का दरकार नहीं होता। वक्त़ ने करवट ली और आज ऊंची इमारतों में पांच-छह कमरे होते हैं लेकिन रहने वाले वही दो या तीन। यदि उदार हुए तो जब तक ज़िंदा हैं मां-बाप रह लिया करते हैं। उसके बाद बच जाते हैं बस मां-बाप। बच्चे बड़े होते ही अपनी राह ले लेते हैं। ऐसे में पांच-छह कमरे यूं ही ढन ढन तवाते रहते हैं। रहने वालों के इंतज़ार में कमरे की साफ सफाई भी कठिन लगने लगता है। 

Wednesday, June 20, 2018

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2018 में श्री अरविंद की शारीरिक शिक्षा हुई शामिल



कौशलेंद्र प्रपन्न
शिक्षा के उद्देश्य समय और काल की मांग के अनुसार ज़माने से तय होते रहे हैं। आज़ादी पूर्व शिक्षा के मायने और मकसद अलग थे। तब हमें गुलामी की जंजीरों से छुटकारा पाना था। इसलिए तब की शिक्षा और उसके मकसद तत्कालीन ज़रूरतों के अनुसार तय हुए। आज़ादी के पश्चात् हमें देश की नवनिर्मिति के लिए दिशा और दशा तय करने थे। सो हमने कई सारे आयोग बनाए, नीतियां बनाई ताकि देश की शिक्षा राष्ट्रनिर्माण में मददगार हो सकें। ठीक इसी तर्ज़ पर समय समय पर देश के विभिन्न चेत्ताओं ने शिक्षा की दिशा और दशा निर्धारित की। इनमें महर्षि अरविंद, टैगोर, गांधी,जे कृष्णमूर्ति आदि के नाम बड़े सम्मान और एहतराम से लिए जाते हैं। इन्होंने नई शिक्षा नीति और दिशा को ही तय करने में अपनी भूमिका नहीं निभाई बल्कि शिक्षा के स्वरूप तय करने में भी अपने अविस्मरणीय योगदान के लिए जाने जाते हैं।
महर्षि अरविंद शिक्षा के जिन पांच प्रमुख घटकों पर जोर देते हैं उन्हें सरकार और शिक्षा नीति निर्माताओं ने अहमियत दी। श्री अरविंद ख़ासकर आत्मिक, शारीरिक, मानसिक आध्यात्मिक आदि शिक्षा को प्रमुखता विमर्श करते हैं। इनमें भी शारीरिक शिक्षा पर श्री अरविंद इसलिए भी वकालत करते नज़र आते हैं क्योंकि यदि शरीर ही स्वस्थ नहीं रहेंगे तो शिक्षा कैसे और किस सूरत में हासिल की जा सकती हैं। श्री अरविंद की इस वकालत को नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2018 शिद्दत से स्वीकारती है। हालांकि कोठारी आयोग से लेकर राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1968, 1986 आदि ने भी शारीरिक शिक्षा को शिक्षा की मुख्यधारा में शामिल करने की सिफारिश कर चुकी है।
श्री अरविंद के शारीरिक शिक्षा की सिफारिश को इस रूप में भी समझने की आवश्यकता है कि यदि वर्तमान सरकार शारीरिक शिक्षा को शिक्षा नीति में शामिल करने का नीतिगत मन बना चुकी है तो यह कहीं न कहीं श्री अरविंद की शैक्षिक स्थापनाओं को संस्थागत पहचान और स्वीकृति मिल रही है।
गौरतलब है कि शारीरिक शिक्षा को लंबे समय से हाशिए पर रखा गया है। वह नीतिगत कमियां ही मानी जाएंगी। लेकिन देर से ही सही किन्तु श्री अरविंद की प्रमुख शैक्षिक स्थापनाओं को शिक्षा नीति में प्रमुखता से स्थान दिया जा रहा है।

Tuesday, June 19, 2018

फाईल की गति, अधिकारी ही जानें




 कौशलेंद्र प्रपन्न
कभी हरिशंकर परसाई ने एक कहानी लिखी थी ‘‘ भोलाराम का जीव’’ यह कहानी बड़ी शिद्दत से सरकारी दफ्तर में फाईलों की गति, दशा-दिशा का चित्रण करती है। एक भोलाराम की फाईल कहीं किसी बंड़ल में दब जाती है। उस फाईल की तलाश में यमराज भी धरा धरती पर आते हैं भोलाराम की आत्मा ले जाने। जो भी हो यमराज को भी सरकारी दफ्तर में हज़ारों चक्कर काटने पड़ते हैं। वहीं फाईल पर वोट होना चाहिए जैसे शब्दों और वाक्यों सुनकर वो अपना वाद्ययंत्र रख देते हैं। दफ्तर के बाबू कहते हैं वेट होना चाहिए वोट समझे। इस कहानी को जब भी पढ़ें लगता है आज की ही कहानी कही जा रही है। फाईलों की भी अपनी अपनी किस्मत होती है। कोई कोई फाईल तो समय से चला करती हैं। उनमें कोई दिक्कत नहीं आती। मुकम्म्ल टिप्पणी के साथ फरियादी तक पहुंच जाती हैं। लेकिन ऐसी भी दुर्भागी फाईलें होती हैं जिन्हें इस टेबल से उस टेबल तक सुस्ताना पड़ता है।
हर फाईल को एक नाम यानी नंबर दिया जाता है। जिसे नंबर या डिपाटमेंट्स के नाम से पुकारा जाता है। किस विभाग की फाईल है। कौन इसका अधिकारी है, कौन इसपर एक्शन लेगा यह सब तय होता है। लेकिन कई बार वोट कम होने। सही व्यक्ति की पहचान के बगैर वे फाईलें कहीं किसी टेबल पर हज़ारों फाईलों में दब जाती हैं। जब कोई सुध लेने वाला आता है तब से काफी माथा पच्ची करनी पड़ती है कि फलां फाईल की मूवमेंट क्या है, कहां है? कौन तलाश करेगा। वो भी जब उस फाईल का क्रिएटर लंबी छुट्टी पर चला जाए तो यह एक अगल कहानी बन जाती है।
भला हो डिजिटल युग का कि धीरे धीरे हमारे काग़जात डिजिटल फार्म में तब्दील हो रहे हैं। ऐसे में फाईलों के लोकेशन पता करना ज़्यादा कठिन नहीं है। तकनीक भाषा में आप इसे रिट्रीवल सिस्टम के नाम से पुकार सकते हैं। अगर फाईलों को सही लोकेशन पर रखी जाए तो वे पाथ वे स्टोरेज की तलाश की जा सकती है। लेकिन यदि फाईलों को बेतरतीब से रखी गई हो तो मजाल है आप निकाल पाएं।
डिजिटलाइजेशन ने कम से कम पुराने दस्तावेज़ों, किताबों, पांडुलिपियों आदि को संरक्षित करने, सुरक्षित रखने और करने में मददगार साबित हो रही हैं। लेकिन दो दुनिया समानांतर चल रही हैं। ख़ासकर सरकारी ऑफिस में। यहा अभी भी नीले रंग के हाशिए वाले पन्नों पर टिप्पणियां लिखी जाती हैं। टिप्पणियां तय करती हैं कि फाईल समय पर सही व्यक्ति तक पहुंच जाएगी। टिप्पणियों के लेखक यानी अधिकारियों की भाषा भी नायाब होती है। जानकार बताते हैं कि अधिकारी ऐसी भाषा का प्रयोग करते हैं जिनके बहुआयामी अर्थ होते हैं। इतने अस्पष्ट की कितनी भी बुद्धि लगा ली जाए आम व्यक्ति उसके मायने नहीं समझ सकता। जब फाईल को पास नहीं करना हो तो ऐसी ही घुमावदार भाषा का इस्तमाल अधिकारी करते हैं। ऐसे ऐसे कमेंट लिख देंगे कि उसकी भाषा बाबूजन भी समझ पाते हैं। उस भाषा को डिकोड करने के लिए बाबुओं की मदद लेनी पड़ती है।
ऐसे ही एक फाईल की गति और दिशा-दशा जानने के लिए पिछले दिनों पूर्वी दिल्ली नगर निगम और दक्षिणी दिल्ली नगर निगम के दफ्तर का चक्कर काटना हुआ। फाईल की मूवमेंट ही पता नहीं चल पा रहा है। फाईल आख़िरकार हैं कहां? कौन उस फाईल को बपौती मान कर दबाए बैठा है? आदि। उस फाईल के पेट पर कई सारी आधिकारिक भाषा में कमेंट लिखे गए थे। जिस हम आमबुद्धि वाला व्यक्ति शायद समझ न पाए। बाद में वहीं के एक अधिकारी ने समझने में मदद की कि आपकी फाईल फलां साहब के पास है। वे जैसी टिप्पणियां लिखा करते हैं उसे सिर्फ वही समझते हैं। फिर भी कोशिश कर लें शायद अब उनका मूड अच्छा हो। वैसे फाईल निकलवानी हो या काम कराना हो तो दो हज़ार उन्नीस दिसंबर का इंतज़ार करें। मतलब समझाया वो दिसंबर में रिटायर हो रहे हैं।
फाईलों की गति, भाग्य को बांचना इतना भी आसान नहीं होता। बड़े बड़े गुणीजन भी चक्कर खा जाते हैं। हलांकि हरिशंकर परसाई जी ने बड़ी बारीक नज़र से फाईलों के भाग्य को बांचने की कोशिश की है ‘‘ भोलाराम का जीव’’ में। इसे पढ़ना दरअसल फाईलों की गति और सरकारी दफ्तर की कार्यप्रणाली का समझ विकसित करना ही है।

Monday, June 18, 2018

टीम की ताकत...


कौशलेंद्र प्रपन्न
बहुत प्रसिद्ध वाक्य ‘‘अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता’’ हमसब ने सुना है। इसके अर्थ भी बचपन में ज़रूर रटे व समझे होंगे। जब इस वाक्य के व्यापक मायने की ओर मुड़कर देखते हैं तो कई सारे निहितार्थ समझ में आते हैं। अकेला चना यानी वह व्यक्ति जो समर्थवान तो है लेकिन अपनी ताकत और क्षमता का सही तरीके से इस्तमाल नहीं कर पा रहा है। हालांकि कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो अकेला बहुत सही प्रदर्शन करते हैं। लेकिन उन्हें टीम में डाल दिया जाए व टीम में काम दिया जाए तो वे टीम-भावना से व टीम में सबके साथ बेहतर कॉडिनेशन से प्रदर्शन नहीं कर पाते। शायद अकेले अकेला अच्छा करते हैं। क्योंकि उसमें किसी और से समायोजन बैठने, कम्यूनिकेशन के दरकार नहीं होते। जितना कि टीम में कॉडिनेशन, कम्यूनिकेशन की आवश्यकता पड़ती है। वे एकला काम करने में विश्वास करते हैं। इस तरह सिंगल पर्फारमर तो होते हैं लेकिन उनमें टीम में काम करने की दक्षता व रूझान की कमी नज़र आती है। ऐसे में टीम लीडर की जिम्मेदारी होती है कि ऐसे इंडिविजूवल पर्फारमर को उसके नेचर और स्कील के अनुरूप काम सौंपे। धीरे धीरे उस व्यक्ति को टीम भावना और टीम वर्क की ओर मोल्ड किया जा सकता है।
वहीं दूसरी ओर कुछ ऐसे व्यक्ति होते हैं जो अकेले में काम करने की बजाए समूह जिसे टीम वर्क कहा जाता है उसमें विश्वास करते हैं। उनमें टीम के अन्य सदस्यों के साथ कैसे इमोशनल और प्रोफेशनल व्यवहार करने हैं इसकी समझ होती है और उसी के अनुरूप व्यवहार भी करते हैं। समूह में काम करने वालों में समायोजन, कम्यूनिकेशन, विज़न और रणनीति बनाने की क्षमता कुछ ज़्यादा विकसित होती है। इन्हीं बुनियादी स्कील के आधार पर ऐसे पर्फारमर बेहतर प्रदर्शन करते हैं। इसमें टीम लीडर की सूझ बुझ की पहचान भी हो जाती है कि क्या उसकी नज़र में सभी सदस्यों की क्षमता और दक्षता की पहचान है या नहीं। क्या लीडर की नज़र में सिर्फ बेहतर प्रदर्शन करने वाले सदस्य ही हैं या वे टीम मेंबर भी हैं जो थोड़े कमतर प्रदर्शन कर पा रहे हैं। जो थोड़े कम प्रदर्शन कर पा रहे हैं क्या उनके लिए लीडर के पास कोई विशेष कार्य नीति, रणनीति है या उन्हें वह नज़रअंदाज़ तो नहीं कर रहा है। आदि ऐसे टीम लीडर की विशेषताएं होती हैं जो टीम में काम करने की भावना को हमेशा हवा दिया करता है। टीम में कैसे कम्यूनिकेट करना है, कैसे कॉडिनेट करना है और ज़रूरत के अनुसार इंफर्मेंशन कब और कैसे देना है आदि की समझ टीम लीडर की विशेषता होती है।
एक बेहतर टीम लीडर कमतर पर्फारमर से भी अच्छा काम ले सकता है। उसके पास हर किस्म के और हर स्तर के मानव संसाधन से काम लेने और व्यक्ति को मोटिवेट करने की दक्षता होती है व लीडर की इसकी अपेक्षा की जा सकती है। एक बेहतर टीम लीडर किसी भी सदस्य को पीछे नहीं छोड़ सकता। वह हर व्यक्ति की वैयक्तिक ख़ासियत को ध्यान में रखता है और समय और स्थान के अनुसार उसे समुचित इस्तमाल करता हे। यदि टीम लीडर में इस प्रकार की विशेषता नहीं है तो कई बार वह व्यक्ति की वैयक्तिक ख़ामियत को जाया कर देता है। इसका परिणाम यह होता है कि उसका एक सदस्य जो अच्छा पर्फारमर था वह धीरे धीरे डाउन होने लगता है। दूसरे शब्दों में वह डिमोटिवेशन का शिकार होना शुरू हो जाता है। इससे न केवल टीम के प्रदर्शन पर असर पड़ता है बल्कि कंपनी और टीम के अन्य सदस्यों पर भी विपरीत प्रभाव छोड़ता है। यदि टीम के मोटिवेशन स्तर को बरकरार रखने हैं कि समय समय पर टीम बिल्डिंग के कुछ एक्सर्साइज कराने चाहिए। कुछ कंपनियां के टीम लीडर व मैनेजर अपनी टीम को दफ्तर के बाहर या भीतर ही कुछ वर्कशॉप या एक्सकर्शन टूर प्लान करते हैं ताकि वर्क से बाहर निकल कर टीम आपस में संवाद कर सकें। इस एक्टीविटी का परिणाम यह होता है कि आफिस के वर्क कल्चर के बाहर निकल कर हर सदस्य एक दूसरे के वैयक्तिक ख़ासियतों से वाकिफ हो पाता है। एक दूसरे को बेहतर तरीके से जान पाता है साथ ही टीम भी भावना विकसित हो पाती है।

Monday, June 11, 2018

लिखते रहे,सुनते रहे और गुनते रहे बच्चे


कौशलेंद्र प्रपन्न
रिपोर्टों की मानें तो भारत में स्कूली स्तर पर बच्चों की लर्निंग स्थिति चिंताजनक है। लेकिन कई बार वास्तविकता इन रिपोर्ट से भिन्न मिलती है। हाल ही में पटना स्थिति बाल भवन में तकरीबन पैंतीस बच्चों की कार्यशाला में बातचीत करने का अवसर मिला। वह भी कुछ घंटे नहीं बल्कि पूरे तीन दिन। पूरे दिन सुबह दस से शाम पांच और छह बच्चे तक बच्चे कार्यशाला से जाने का नाम नहीं ले रहे थे। इस बाल भवन का किलकारी के नाम से जानते हैं। जहां विभिन्न आयु के बच्चे आते हैं। कुछ समर कैंप में तो कुछ पूरे साल। इन बच्चों के सर्वांगीण विकास को ध्यान में रखते हुए विभिन्न गतिविधियों को अंज़ाम दिया जाता है। इनमें थिएटर, नृत्य, संगीत, नुक्कड़ नाटक, सृजनात्मक लेखन आदि। इन तमाम गतिविधियों से परिसर गुलजार रहा करता है। बच्चों से बातचीत के दौरान यह भी मालूम चला कि इन बच्चों के सुझाव, राय आदि को प्रमुखता से परिसर में स्थान दिया जाता है।
सृजनात्मक लेखन के इन तीन दिनों में विभिन्न आयु वर्ग के बच्चों के जिन मुद्दों पर बातचीत और काम हुए वह वास्तव में उक्त रिपोर्ट को आईना दिखाती हैं। क्या पढ़ना और क्या लिखना इन भाषायी कौशलों में बच्चे ख़ास दक्ष थे। इनकी लिखी कहानियों, कविताओं आदि से गुज़रते हुए ज़रा भी एहसास नहीं होता कि इन्हें लिखने वाले बच्चे कक्षा दूसरी, तीसरी या पांचवीं के हैं। इन बच्चों की लेखन क्षमता और लिखने के प्रति जिज्ञासा और ललक को देखते हुए हमें यह एहसास होता है क्या ये रिपोर्ट आसमान में बनाई जाती हैं? इन रिपोर्ट लेखन में किन्हें नरअंदाज़ किया जाता है? कहां से आते हैं ऐसे डेटा जो बताते हैं कि बच्चे पढ़ नहीं सकते। बच्चे लिख नहीं सकते।
कक्षा दूसरी और तीसरे के बच्चे जब नाटक क्या है और कहानी में क्या महत्वपूर्ण घटक होते है जो कहानी को रोचक बनाते हैं आदि का समुचित और प्रसांगिक विश्लेषण के साथ बताएं तो क्या कहना चाहेंगे। इस प्रकार के जवाबों से तीन दिन रू ब रू होने का अवसर मिला। इनमें यह उत्कंठा प्रबल थी कि मैं कहानी तो लिखता हूं। कविताएं तो लिख लेता हूं लेकिन मंच पर या सब के सामने अच्छे से प्रस्तुत नहीं कर पाता। आप तो बड़े हैं आपने तो कई प्रस्तुतियां देखीं होंगी हमें भी वे कौशल बताएं ताकि हम और बच्चों से पीछे न रहें। हम भी अपनी कहानी को बेहतर तरीके से प्रस्तुत कर सकें। इन बच्चों की तार्किक क्षमता और तथ्यपरक िंचंतन एक बार के लिए सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम इतने छोटे बच्चों से मिल रहे हैं या एक प्रखर और इतनी छोटी आयु में सृजनशीलता की बारीक बुनावटों को समझ और इस्तमाल कर रहे थे।

Tuesday, June 5, 2018

शिक्षा बिना बोझ के या सिलेबस जटिल का खेल



कौशलेंद्र प्रपन्न
बच्चों को क्या और कितना पढ़ना चाहिए यह राजनीतिक दल तय करेगी या कि शिक्षविद्ों के ऊपर यह जिम्मेदारी सौंपी जानी चाहिए। यह एक ऐसा मसला है जिसपर राजनीति धड़ों और अकादमिक समूहों के बीच हमेशा ही तनातनी रही है। लेकिन हमें यह नहीं भूलना होगा कि मतभिन्नताएं कितनी भी हों। हमारी चिंता के केंद्र में बच्चे के सर्वागींण विकास होना चाहिए। वह किसी भी कीमत पर निभाने के प्रयास करने चाहिए। पूर्व की सरकारें व राजनीतिक दलों ने शिक्षा में बदलाव परिवर्तन के नाम जो भी कदम उठाए हैं उसका विश्लेषण राजनीतिक कम अकामिक स्तर पर होना चाहिए।
हाल ही में मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावेडकर ने कहा है कि बच्चों पर करिकूलम के बोझ को करना होगा। हमारे बच्चों पर करिकूलम का बोझ है। बच्चों का विकास अवरूद्ध होता है। 1990 के आस-पास या इससे थोड़ा पीछे जाएं तो प्रसिद्ध वैज्ञानिक और शिक्षाविद् प्रो. यशपाल ने एजूकेशन बिदाउट बर्डेन की बात की थी। यानी शिक्षा बिना बोझ के की वकालत न केवल यशपाल ने नीति के स्तर पर की बल्कि पाठ्यपुस्तकों के निर्माण और पाठ्यचर्याओं में भी रद्दोबदल की मांग की थी। यह एक नए ज़िद्द को हमें अकादमिक स्तर पर समझना होगा कि जहां प्रो. यशपाल बस्ते बोझ को कम करने की मांग कर रहे थे वहीं वर्तमान सरकार करिकूलम के बोझ को कम करने की बात कर रही है। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के हवाले से कहा तो यह भी जा रहा है कि इस नीति में बच्चों की परीक्षा प्रणाली को भी बदला जाएगा। यानी कक्षा पांचवीं और आठवीं में फेल की प्रक्रिया को बदला जाएगा।
शिक्षा में परिवर्तन न तो कोई नई बात है और न ही अपूर्व घटना। बल्कि शिक्षा का स्वरूप हमेशा ही बदला किया है। शिक्षा का परिप्रेक्ष्य समय और कालानुसार बदलता रहा है। लेकिन जो चीज नहीं बदली है वह है शिक्षा का उद्देश्य। किसी भी कालखंड़ पर नज़र डालें शिक्षा का मकसद एक बेहतर इंसान बनान है। बच्चों को भविष्य के जीवन की तैयारी के रूप में भी शिक्षा के सरोकारों को रेखांकित किया जाता रहा है।
शिक्षा में करिकूलम, पाठ्यक्रम, पाठ्यपुस्तकें तो सहायिका की भूमिका निभाती हैं। ये सहगामी प्रक्रियाएं जिन्हें हम नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते। हम बस इतना कर सकते हैं कि इन सहभागी क्रियाओं को कैसे बेहतर तरीके से इस्तमाल करें ताकि शिक्षा के वृहत्तर मकसद का हासिल किया जा सके।
आज की तारीख़ में शिक्षा के उद्देश्य में यदि कोई बड़ी तक़्सीम हुई है तो वह यही कि हमारा फोकस बदल चुका है। हम पूरी तरह से शिक्षा को नंबरों के पहाड़ पर चढ़ा चुके हैं। जिसका परिणाम यह हुआ कि आज की तारीख़ में अंकों का मायने हमारे बच्चों की जिं़दगी दिशाएं तय करने लगी हैं। हालांकि कें्रदीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड जिस प्रकार से नबंरों को बढ़ा-चढ़ाकर कर परिणाम घोषित कर रही है इस बाबत उसने इस ग़लती को स्वीकार भी कर चुकी है।
वर्तमान में एमएचआरडी का मानना है कि सरकार ने पहली बार रेखांकित किया है कि बच्चों का सिलेबस जटिल है। इसे हल्का करना चाहिए। दूसरे शब्दों में कहें तो सरकारें जो अब तक रही हैं क्या उनके संज्ञान में ऐसी बड़ी घटना कभी आई ही नहीं या उन सरकारों की प्राथमिकता सूची में शिक्षा के इतने बड़े बोझ को नज़रअंदाज़ ही किया गया। दरअसल जब जब सरकारें सत्ता में आई हैं उन्होंने शिक्षा को अपना एजेंड़ा ज़रूर बनाया है। बस अंतर इतना रहा कि किसी ने बेहतरी के लिए कदम उठाए तो किसी ने अपने एजेंड़ा को पूरा करने के लिए शिक्षा का इस्माल किया।

Thursday, May 31, 2018

डर का दर्शन



कौशलेंद्र प्रपन्न
हम सब में एक डर है। हम सब एक भय में जीया करते हैं। शायद पूरी जिं़दगी डर में ही गुजार देते हैं। शायद हम खुल कर अपनी लाइफ नहीं जी पाते। शायद हम दूसरों की इच्छाओं, शर्तां, चाहतों को जी रहे होते हैं। अपनी लाइफ तो बस डर में ही कट जाती है। यदि हम डर के दर्शन में जाएं तो पाएंगे कि मनुष्य न केवल एक सामाजिक सदस्य है बल्कि समाज में रहने के नाते दूसरों की अपेक्षाओं, लालसाओं, उम्मींदों को भी जीया करता है। उसे हमेशा यह डर रहता है कि कहीं फलां नाराज़ न हो जाएं। कहीं फल्नीं रूठ न जाए। कहीं बॉस गुस्सा न हो जाए, कहीं रिश्तेदार हुक्का पानी न बंद कर दें। शायद यही वह डर का दर्शन है जिसमें हमारी पूरी जिं़दगी भय के साथ गुज़र जाती है। हालांकि दर्शन और उपनिषद् निर्भय होने की कामना करते हैं। ऋग्वेद के एक मंत्र में इसका झांकी मिलती है- ‘‘अभयंमित्रादभयंमित्रा...मम्मित्रम् भवंतु’’ इस मंत्र में कामना की गई कि हमें अपने मित्र से भी भय न हो। हमें अपने अमित्र या शत्रु या परिचित से भी भय न हो। हम निर्भय हो सकें। मेरी कामना है कि तमाम विश्व मेरा मित्र हो। हालांकि यह कामना बहुत कठिन नहीं है। लेकिन व्यवहारिक दृष्टि से दखें तो यह संभव नहीं है। क्योंकि हर कोई आपका मित्र नहीं हो सकता। सबकी अपनी अपनी सीमाएं हैं। सब के अपने स्वार्थ हैं। जहां स्वार्थों के बीच टकराहट होगी वहां मित्रवत् भाव बरकरार रखना ज़रा कठिन काम है।
पूरा भारतीय आर्ष ग्रंथ, मनोविज्ञान, दर्शन शास्त्र आदि मित्रवत् व्यवहार करने की वकालत करते हैं। यह अगल बात है कि हम सभी को खुश नहीं कर सकते। ख़ासकर जब आप किसी प्रमुख व शीर्ष पद पर हों तो हर कोई आपसे खुश रहे ऐसा संभव नहीं है। वह होना ज़रूरी भी नहीं। कोशिश तो की जा सकती है लेकिन दावा करना भूल होगा। कोई भी मैनेजर, डाइरेक्टर, सीइओ, या एमडी आदि पूरी कंपनी के हित के लिए कठोर कदम उठाते हैं। इसमें निश्चित ही किसी न किसी की हानि तो होती है। किसी न किसी का मुंह तो उतरेगा लेकिन क्या महज इस भय से कोई निर्णय को टाला जाना चाहिए? क्या आलोचना और निंदा के डर से कोई निर्णय नहीं लिया जाना चाहिए? आदि ऐसे सवाल हैं हां मैनेजमेंट के जानकार मानते हैं कि व्यापक हित के लिए कठोर से कठोर निर्णय भी लिए जाने चाहिए। वहीं गांधी जी मानना था कि यदि एक गांव के बरबाद होने से यदि एक शहर बचता है तो इसमें कोई हर्ज़ नहीं। एक शहर व राज्य के बरबाद होने से देश बचता हो तो राज्य व शहर को बरबाद होने में कोई हानि नहीं है। यही दर्शन और मनोविज्ञान मैनेजमेंट में भी अध्ययन किया जाता है और इन्हें माना जाता है। यदि एक व्यक्ति की वज़ह से कोई संस्था ख़राब हो रही हो। या फिर संस्थान के कर्मियों में निराशा घर कर रही हो, फिर लोग छोड़कर जा रहे हों तो ऐसे में मैनेजमेंट उस एक व्यक्ति को बदलने के निर्णय में पीछे नहीं हटेगी जिसकी वजह से पूरी संस्था पर ग़लत असर पड़ रहा हो। यहां डर नहीं भय नहीं बल्कि तार्किक कदम उठाने होते हैं।
डर व भय कई किस्म के होते हैं। मनोविज्ञान की दृष्टि ये देखें तो इसे फोबिया माना जाता है। कई किस्म की फाबिया का जिक्र मनोविज्ञान में आता है। पानी का डर, अंधेरे का डर, अनजान से डर, ऊंचाई से डर आदि। यह सूची लंबी हो सकती है। ख़ासकर मनोविश्लेषण और मनोचिकित्सा शास्त्र में विभिन्न तरह की फोबिया व भय का ट्रिटमेंट किया जाता है। दूसरे शब्दों में इन भयों का अध्ययन किय जाता है ताकि मनोरोगी को निदान प्रदान किया जा सके। जानकार मानते हैं कि हम न केवल व्यक्ति, वस्तु, परिस्थितियों से ही डरा करते हैं बल्कि सबसे बड़ा डर हमारा दूसरों की नज़र में असफल होना होता है। हम किसी भी कीमत पर फेल स्वीकार नहीं कर पाते। दूसरों की हंसी और दूसरों की नज़र में श्रेष्ठ साबित करने की चाहत कई बार हमें गहरे भय और निराशा में धकेल देती है। यानी हमारे डर व भय का एक सिरा दूसरों की नज़रों में असफल न होने, नकारा न होने की छवि से बचना है। जबकि हमें अपनी लाइफ अपनी शर्तां पर जीना आना चाहिए न कि दूसरों की इच्छाओं को ही ढोते रहे और कंधे, पीठ छिलते रहे।
असफलता का डर, लोगों के हंसने का डर, दूसरों की नज़रों में बेहतर साबित करने का डर आदि ऐसे आम डर हैं जिनसे हमसब रोज़ गुज़रा करते हैं। कोई हंस तो नहीं रहा है? कहीं कोई मेरी आलोचना तो नहीं कर रहा है? कोई मुझ से नाराज़ न हो जाए आदि िंचंताएं हमें डर की ओर धकेलती हैं। बच्चे जब आत्महत्या करते हैं। ख़ासकर दसवीं व बारहवीं के परीक्षा परिणाम के बाद तो इसके जड़ में यही वज़ह है लोग क्या कहेंगे? दोस्त क्या कहेंगे? मम्मी-पाप की उम्मीदें मुझ से बहुत थी। मैं तो नकारा हूं। मुझसे यह भी नही हो सका आदि मनोवृतियां व्यक्ति को डर के गिरफ्त में लाती हैं। जबकि मंथन करने की आवश्यकता यह है कि क्या आप उन लोगों के लिए पढ़ रहे थे? क्या उनके लिए जीवन के लक्ष्य तय कर रहे थे, क्या एक बेहतर इंसान उनके लिए बन रहे थे या आपको एक सफल व्यक्ति बनना ही था। आपको जीवन में अपनी शर्तां पर जीना ही था इसलिए जी रहे हैं।
कोई भी व्यक्ति लाइफ में असफल नहीं होना चाहता। लेकिन सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि हम अपनी सफलता के लिए किस शिद्दत से काम कर रहे हैं। कितनी प्लानिंग से योजना बनाकर उसे अमल कर रहे हैं। असफल होने के डर से बचने के लिए हमें अतिरिक्त मेहनत करनी होती है। तब यह डर भी खत्म हो जाता है।


Wednesday, May 30, 2018

इंटरनेट में खोते चैन




यह बात साबित हो चुकी है कि क्या वयस्क और क्या बच्चे सभी अपनी लाइफ से एक बड़ा हिस्सा इंटरनेट पर जाया किया करते हैं। कभी लाइक्स को देख कर इतने खुश हो जाते हैं गोया और कोई दुनिया में हमसे ज़्यादा खुश है ही नहीं। वहीं कम लाइक्स मिलने या न मिलने पर इतनी मायूस हो जामे हैं जैसे दुनिया में कोई प्यार करने वाला बचा ही नहीं। यह इंटरनेटी लव और केयर ऐसी बीमारी बन चुकी है कि हम वास्तविक जीवन में खुशियों की तलाश की बजाए आकाशीय सुख में खुश हो जाया करते हैं। 
हमारे आस-पास हज़ारों लाखों गेगा बाइट्स में सूचनाएं बह रही हैं। उनमें से कौन सी सूचना सचमुच हमारे लिए हैं इसका निर्णय नहीं कर पाते। हम तो यह भी तय नहीं कर पाते कि इन सूचनाओं में से कितने को अपनी ज़िंदगी में तवज्जो देनी है। 
थोड़ी थोड़ी बात पर जैसे कभी औज़ार निकाल लिया करते थे। वैसे ही आज हम थोड़ी सी कोई बात हुई नहीं कि सीधे इंटरनेट के पेट में गुदगुदी करने लगते हैं। जो भी सूचना इंटरनेट उगल पाता है उसे ब्रह्मत वाक्य की तरह मानने लगते हैं। 
यदि पेट दर्द हुआ, यदि सीने में दर्द हो रहा है तो इंटरनेट हजारों किस्म की बीमारियों के लक्षणों में आपको उलझा देगा। अब आप तनाव में आ जाते हैं अरे ये क्या हुआ? अब तो मेरी जिं़दगी ख़तरे में हैं आदि। जबकि हम विवेक और वैज्ञानिक चिंतन की बजाए उन्हें ही सच मानने लगते हैं। रातों की नींद ख़राब करने लगते हैं। 
इंटरनेट किसी वयैक्तिक ज़रूरतों को ध्यान में रखकर सूचनाएं संग्रहीत नहीं करता। बल्कि वह वैश्विक स्तर पर ज्ञान और सूचनाओं का सरलीकरण करता है। हर सूचना का अधिकारी वयैक्तिक और सामूहिक दोनों ही स्तरों के हो सकते हैं। यहां ध्यान देने की बात इतनी सी है कि हमें इंटरनेटी सूचना व ज्ञान को हासिल करते वक़्त इतना ख़्याल ज़रूर रखना चाहिए कि कौन सी सूचना व ज्ञान मेरे मकूल और कौन सी त्याज्य है। 
सूचना के विक्रेताओं और बाजार की नज़र ये देखें और डेटा मैनेजर के तौर पर समझने की कोशिश करें तो पाएंगे कि हर सूचना और ग्राहक की ज़रूरतों के अनुसार गढ़ा और बिकाउ बनाया जाता है। जो सूचना बाजार के अनुसार नहीं है उसे बाजार की शर्तां और मांग के अनुसार तैयार किया जाता है। 
आज की तारीख़ में दुनिया गोया डेटा में सिमट कर मुट्ठी में आ चुकी है। दुनिया के किसी भी कोने से किसी भी कोने में हम एक दूसरे की ख़बर ले और दे सकते हैं। यह तो एक काम हुआ। इंटरनेट महज हाल समाचार जानने और देने का माध्यम भर नहीं है बल्कि इसका इस्माल हमें व्यापकतौर पर करना सीखना होगा। मसलन सोशल मीडिया व प्लेटफॉम का प्रयोग क्या हम सिर्फ फोटो, जीपीएस लोकेशन शेयर के लिए ही करें या फिर इसका प्रयोग कुछ और सकारात्मक तौर पर भी हो सकता है इसओर भी हमें ध्यान देने की आवश्यकता है। 
हमारे बच्चे और वयस्क दोनों ही वर्ग सूचनाओं और डेटा का इस्तमाल अपनी जीवन शैली को बेहतर बनाने के लिए कर रहे हैं। लेकिन हम भूल जाते हैं कि जो भी सूचनाएं व जानकारी हम सोशल मीडिया व प्लेटफॉम पर फेंकते हैं वह फिर हमारी निजी नहीं रह जाती। वे तमाम सूचनाएं सबकी हो जाती है। हाल ही में एक सोशल साइट विवादों में रहा। इसके पीछे सवाल निजता का ही उठा। हम बिना सोचे समझे सोशल साइट्स पर अपनी तमाम कदमों, सांसों की धड़कनों को दर्ज़ कर खुश हो रहे होते हैं कि देखों देखों मैं आज यहां हूं। मैं यह कर रहा हूं। मैं यूं भी हूं आदि आदि। कई बार कोफ्त सी होती है कि क्यों हम अपनी निजी क्षणों को सरेआम करते हैं। क्यों हमें दूसरों को दिखाने व खुश करने में आनंद आता है। 
सूचनाओं और डेटा ने हमारी निजता का जिस कदर प्रभावित किया है उसका अंदाज़ा शायद हम अभी नहीं लगा सकते। लेकिन वह दिन दूर नहीं है जब हम सोशल मीडिया व प्लेटफॉम पर ही मिला करेंगे। हमारी तमाम निजताएं खत्म हो चुकी हांगी। हमारी ज़िंदगी एक डेटा में तब्दील हो जाएंगी। 
डेटा और सूचनाएं ज़रूरत के हिसाब से देनी और मिलनी चाहिए। जिसकों जितनी ज़रूरत हो उतनी ही सूचना देना बेहतर होता है। यदि आप पात्र के अनुसार सूचना नहीं देते तो वह ओवर फ्लो होने लगेगा। फिर हमें डेटा मैनेजर की आवश्यकता पड़ेगी। सूचनाओं को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना ऐसा हमें अपने आप से वायदा करना होगा। तब शायद हम अपनी जिं़दगी बेहतर ढंग से जी सकते हैं। जीवन की हर कड़ी और हर गांठें खोलने के लिए नहीं होतीं। कुछ तो ऐसे कोने होते हैं जो किसी ख़ास के साथ ही खोले जा सकते हैं। उन्हें सरेआम करना कहीं की भी समझदारी नहीं होती। 

शिक्षकीय दुनिया की कहानी के पात्र

कौशलेंद्र प्रपन्न ‘‘ इक्कीस साल के बाद पहली बार किसी कार्यशाला में बैठा हूं। बहुत अच्छा लग रहा है। वरना तो जी ...