Wednesday, January 30, 2019

डरा हुआ व्यक्ति


कौशलेंद्र प्रपन्न
डरा हुआ आदमी क्या करता है? क्या कर सकता है? और क्या नहीं कर सकता। बेहद मौजू सवाल हैं। सवाल नहीं साहब बल्कि हक़ीकत है। डरा हुआ आदमी क्या नहीं कर सकता है। वह सब कुछ कर सकता है सब किसी पर भी विश्वास नहीं कर सकता। हर आवाज़ पर डर सकता है। किसी भी किस्म की आहट पर चौक सकता है। रात बिरात उठ सकता है। बैठे बैठे आंखों में पूरी रात काट सकता है। डर के घेरे में वह पानी पीना भी छोड़ दे। खाना भी धरा का धरा रह जाए।
डर हुआ आदमी कुछ भी कर सकता है। हर किसी को संदेह की नज़र से देख सकता है। देख सकता है कि कौन उसके साथ है और कौन उसके विपक्ष में खड़ा है। डरा हुआ आदमी छिपकली से डर सकता है और रास्ते चलते घबरा सकता है एसी में बैठकर भी पसीने से तर ब तर हो सकता है।
डरा हुआ व्यक्ति अब लिख रहा हूं कि इसमें दोनों ही लिंग शामिल हैं। डरा हुआ व्यक्ति हर वक़्त खुद को बचाना चाहता है। इस बचाव की स्थिति में वह किसी से भी मदद के लिए गुहार लगा सकता है। बेशक उसे सहायता मिले या निराशा। लेकिन वह भरपूर प्रयास करता है कोई तो हो जो उसे निर्भय कर सके।
आज की तारीख़ी हक़ीकत यह है कि डराने वाले ज्यादा मिलेंगे। बजाय कि कैसे बचा जाए और क्या रास्ते हो सकते हैं ताकि आप बच सकें। इसपर चर्चा और समाधान की ओर प्रेरित करने वाले कम। इसमें सब कोई शामिल हो सकते हैं।
हमें कभी समय निकाल कर एक ऐसी सूची वर्गीकृत करनी चाहिए जिसमें हम स्पष्ट लिखें कि हमें किस किस और किन किन से डर लगता है। जब हम ऐसी कोई सूची बना लेंगे तब हमें इससे बचने या निकलने के रास्ते और रणनीति बनाने में आसानी होगी। बजाय की डरते रहें और जीते रहें। फर्ज कीजिए आपको डर लगता है कि अगले साल शायद ही आपको कंपनी जॉब में रखेगी। इस डर में पूरा साल गुजार दें। या फिर डर डर कर रोज जीया करें। हमें अपने उन क्षेत्रों और एरिया पर काम करना होगा जिनकी वजह से कंपनी आपकी दक्षता पर सवाल खड़ी कर सकती है या की है। यदि समय रहते हमने अपने प्लान ऑफ एक्शन में निराकरण या जिसे टू डूज में शामिल कर लें तो इस डर से निज़ात मिल सकती है। लेकिन होता इससे बिल्कुल विपरीत है। हम स्वयं तो डरे ही होते हैं साथ ही अन्यों को भी डराया करते हैं आपनी कहानी सुनाकर। जो डरा नहीं है। जिसे डर नहीं है उसे भी आपकी कहानी सुन कर डर लगने लगता है।
डरना अच्छी बात हो सकती है। लेकिन उस डर से कैसे निपटा जाए उसके लिए सचेत होकर रणनीति बनानी होगी। फिर कोई वजह नहीं कि हम डर में जीया करें।

Monday, January 28, 2019

माफ कर दें लेकिन भूल न जाएं




माफ कर दें लेकिन भूल न जाएं
कौशलेंद्र प्रपन्न
अंग्रेजी का वाक्य है ‘‘फोरगिव नॉट फोरगेट’’ कुछ ऐसी अनुभूति है जिससे हमसब हमेशा ही गाहे बगाहे जीया या सहा करते हैं। कोई आपको आपकी ही नज़रों से सामने से आपको नज़रअंदाज़ कर जाता है। और आप मुंह उठाए देखते रह जाते हैं। कोई जो आपको बेहद जानकार हो और सामने से आपको देखे भी नहीं और नज़रें भी न मिलाए तो आपको कैसा लगेगा? शायद आप ख़्यालों में डूबने लगें। ऐसा क्यों हुआ? क्यों ऐसा किया? क्या वजह रही होगी इस व्यहार के पीछे आदि आदि। सवालों में हम और आप जूझने लगते हैं। यह जानने और समझने के लिए कि ऐसा व्यवहार अपेक्षित नहीं है।
आप क्या करते हैं कुछ घंटे, कुछ दिन तो याद रख पाते हैं फिर सबकुछ भूल कर उन्हीं बीच हंसी ठिठोली करने लग जाते हैं। वह जिसने आपको नज़रअंदाज़ किया। वह तो इस गुमान हो रहता है उसने आपको इग्नोर किया। किन्तु वो भूल जाते हैं कि आपने उसे माफ कर दिया। उनकी नजर में आप निहायत ही इमोशनल फूल हैं। आप समझते नहीं। हालांकि कहा जाता है कि जो माफ कर देता है वह बड़ा होता है। शायद माफ करने में आपका बड़क्कपन का आंका जाता है। लेकिन कब तक माफ करेंगे और वो कब तक आपको नज़रअंदाज़ करते रहेंगे।
यह खेल बड़ा ही दिलचस्प है। कभी यार दोस्त इग्नोर किया करते हैं तो कभी आपके वरीष्ठ। दोनों ही किस्म के लोग होंगे जो आपको नीचा साबित करने में लगे रहते हैंं। उन्हें कब तक आप माफ करेंगे। और कब तक उन्हें भूलते रहेंगे। कभी तो आपको उत्तर देना होगा। कभी तो उन्हें एहसास कराना होगा कि आप सब कुछ समझ रहें हैं।
जब उन्हें ज़रूरत पड़ती है तब आपसे बढ़कर प्रिये कोई और नहीं। संचार के तमाम माध्यमों से आपसे संपर्क करते ज़रा भी नहीं हिचकते। लेकिन जब आप संपर्क करना चाहें तो तमाम बहानों के पहाड़ खड़ा कर दिया जाएगा। उनके तर्कां पर मरा न जाए तो क्या किया जाए।
माफ कर दीजिए लेकिन भूलें नहीं। जिसने भी आपको ठेस पहुंचाया है। वह जो भी हो जैसा भी हो। भूलें नहीं। माफ बेशक कर दें। लेकिन एक सीमा है इसे पार करते ही आपको बताना होगा कि आप सब समझते हैं। माफ किया है भूले नहीं हैं। वक़्त बेहतर जवाब देगा।

Thursday, January 24, 2019

रिक्शावाला कहां से आता है और कहां जाता है?



कौशलेंद्र प्रपन्न
उसने बातों ही बातों में बताया कि आपको छोड़कर मैं वापस चला जाउंगा। कहां जाएगा? कहां से आया था? ये सवाल हमारे सरोकारों से बाहर ही खड़ा रहता है। हम जानना भी नहीं चाहते और हमारी कोई दिलचस्पी भी नहीं होती कि जो आपको अपने पांव और ज़िगर से खींच कर दफ्तर, बाज़ार पहुंचाया करता है। वह हमारे लिए सिर्फ व्यक्ति होता है जिससे बातें करना, उसके बारे में जानने हमारा लक्ष्य नहीं होता। वह किन मुश्किलों से गुज़रता हैं, इसके बारे में हम आंखें मूंद लिया करते हैं। हमारे लिए वह रिक्शावाला सिर्फ रिक्शावाला होता है। हम लोग दस या बीस रुपए देकर उतर जाया करते हैं। आज उसने बताया कि वह उत्तर प्रदेश के बागपत के किसी गांव से दिल्ली रिक्शा खींचने आया करता है। मेरी रूचि जगी और पूछा कब आते हो? उसने बताया सुबह हमारे गांव से एक आदमी अपने कैब में हमें लाता है और सात बजे दिल्ली गगन सिनेमा हॉल के पास छोड़ देता है। शाम में सात बजे हमें उठा लेता है। दोनों फेरे का अस्सी रुपये लेता है। सुबह खा कर आता हूं और दिन में तीन बार खाता हूं। वरना बीमार पड़ा जाउंगा।
वहीं एक और रिक्शावाला जिसके साथ रोज़ जाया करता था वह कल मिला। उसके हाथ में ई रिक्शा की हैंडल थी। मैंने पूछा, पुराना रिक्शा कहां गया? उसने बताया बाबूजी मेरी उम्र हो गई है। मैं तेजी से खींच नहीं पाता। इसलिए लोग मेरी सेवा नहीं लेते थे। सभी को जल्दी पहुंचना होता है। सो मैंने पिछले माह ई रिक्शा किराये पर लिया। बुढ़े रिक्शे वाले के साथ कोई भी जाना नहीं चाहता। धीरे चलते हैं। समय ज्यादा लगता है। अनुमान लगा सकते हैं कि किस तरह से पुराने और वृद्ध रिक्शाचालकों का क्या हुआ होगा।
एक नज़र रिक्शें के इतिहास पर डालते हैं। हमारे भारत में पहली बार शंघई से 1874 में 1000 रिक्शे आए थे। जो कि जापान से आए थे। आगे चल कर इनकी संख्या 1914 में 9,718 हजार हो गई। अगर अनुमान लगाएं तो पाएंगे कि रिक्शा खींचने वाले कितने हैं जानकर ताज्जुब होगा 100,000 रिक्शेवाले वाले 1940 रिक्शा खींचते थे। वहीं 1920 के आप-पास 62,000 रिक्शखींचने वाले थे। हाथ रिक्शेवाले के सामने ई रिक्शा ने नई चुनौती दी। तेज और जल्दी चलने वाली। 2010 में लगभग एक लाख ई रिक्शे रोड़ पर आए। हालांकि कई अभी तक दर्ज नहीं हैं। दिल्ली में 2013 के अप्रैल तक 29,123 ई रिक्शा दर्ज हैं। अब हाथ रिक्शा और ई रिक्शा के बीच द्वंद्व शुरू हो चुका है।

Wednesday, January 23, 2019

उद्देश्य का ताकत



कौशलेंद्र प्रपन्न
‘‘कारणं बिना न कार्यंयूज्यते।’’ न्याय दर्शन के इन सूत्र को समझने की कोशिश करें तो देख और समझ सकते हैं कि बिना किया कारण यानी उद्देश्य के कोई भी काम नहीं होता। यानी बिना कारण के हम कुछ भी नहीं करते। न हम सांस लेते हैं, कोई काम करते हैं और न ही हम किसी पर हंसते ही हैं। कोई न कोई कारण या प्रयोजन और उद्देश्य होता है जिससे हमारा व्यवहार संचालित होता है। हमारा हर वक्तव्य, गति और व्यवहार हमारे उद्देश्य की पूर्ति से प्रभावित और असर के घेरे में होते हैंं। बिना मकसद और औचित्य के हम कुछ भी नहीं किया करते हैं।
हमारे जीवन की असफलता का राज़ ही यही है कि हम अपने रोज़ के जीवन में कई सारे काम बिना उद्देश्य किया करते हैं। यदि उद्देश्य हो तो शायद हम कई सारे कामों को न करने की सूची में डाल दें। लेकिन दिक्कत यहीं आती है कि हम कई बार यह तय नहीं कर पाते कि कौन सा काम और कौन सा कदम हमारे लिए ज़रूरी है और कौन सा काम जिसे हम नज़रअंदाज़ कर सकते हैं। हम अपने उद्देश्य के निर्धारण में इतने उतावले और अधीर होते हैं कि तात्कालिक उद्ेश्य को पाने में अपनी पूरी ताकत लगा दिया करते हैं। होता यह है कि जिसमें हमें पूरी क्षमता लगानी थी वह अधूरी रह गई। और असफलता हमारे हाथ आती है और शुरू होता है शिकायतों और आरोपों का खेल।
हमारे उद्देश्य कई बार हम नहीं बल्कि हमारे अग्रज तय किया करते हैं। मां-बाप, यार दोस्त और कई बार हमारे गुरू। होता यह है कि यदि कोई पूछ बैठे कि क्यों कर रहे हो? क्यों बीएउ कर रहे हो? क्यों डॉक्टर बनना चाहते हो आदि तो हमारा जवाब होता है क्योंकि पिता चाहते थे। क्योंकि चाचा या बुआ ने बताया था। या फिर सारे दोस्तों ने उसी कोर्स के लिए फार्म भरे थे सो मैं ने भी भर दिया। यानी एक बात स्पष्ट है कि आपके उद्देश्य कोई और तय कर रहे थे। आप तो उस ओर जाना ही नहीं चाहते थे। क्योंकि औरों ने बताया और देखा तो उस राह पर चल पड़े। वर्षां गुजारने के बाद महसूस होता है कि मैंने तो यह बनना ही नहीं चाहता था। यह तो उनकी इच्छा थी। उनकी चाहत थी कि मैं इस क्षेत्र में आउं। तो आप क्या चाहते थे यह सवाल आपको परेशान करनी चाहिए।
एक शोध हुआ था जिसमें मनोवैज्ञानिक ने विश्व के तकरीबन 4000 ऐसे लोगों से साक्षात्कार किया जो अपने जीवन और कार्य में सफल माने गए। भारत से गांधी जी को शामिल किया गया था। इस शोध में खिलाड़ी, संगीतकार, कलाकार, पत्रकार, मजदूर आदि शामिल थे। कोशिश यह की गई थी कि समाज के सभी क्षेत्रो के प्रतिनिधियों को इस अध्ययन का हिस्सा बनाया जाए। लेखिका व शोधकर्त्री ने बताया कि अधिकांश लोगों ने बताया कि उनकी लाईफ के पर्पस यानी मकसद किसी और ने तय किए थे लेकिन अपने जीवन और क्षमता को पहचान कर उन लोगों ने अपने लक्ष्य और उद्देश्य को दुबारा लिखा और जीया। एक बडत्र संगीतकार, गिटारवादक जो आगे चल कर एक रसोईया बना और उस काम में उसे प्रसिद्ध ऐेसी मिली कि अमरिका के उच्च सदन में उसे सम्मानित किया गया। उसने बताया कि हम अपनी रूचि और ताकत को पहचाने बगैर पूरी ज़िंदगी दूसरों के उद्देश्यों पूरा करने मे लगा देते हैं। मैंने एक दिन महसूस किया मुझे खाना बनाने में आनंद आता है। रूचि भी जगी और संगीत गिटार छोड़कर कूक में आ गया। ऐसे में हमारे जीवन में कई उदाहरण मिलेंगे जो पूरी जिं़दगी जिस काम में गुजार देते हैं उनके पूछ लीजिए क्या कहते हैं जो उनका कहना होता है मैं तो करना कुछ चाहता था। लेकिन पूरी ज़िदगी गलत क्षेत्र में रहा। काश उस क्षेत्र में रहता तो ज़्यादा आगे बढ़ पाता।
हमारे जीवन की कथा ही यही है कि जाना कहीं और चाहते हैं किन्तु रेलगाड़ी किसी दूसरी दिशा की पकड़ लेते हैं। उस तुर्रा यह कि गुमान कितना बड़ा होता। तोहमत किसी और पर मढ़ा करते हैं। अपनी गलती को दोषी किसी और और परिस्थितियों को ठहराया करते हैंं। यदि हमारा उद्दश्य स्पष्ट होता तो कोई वज़ह नहीं कि हम सफल नहीं होते। इसे ऐसे भी समझ सकते हैं जब हमारे जीवन का लक्ष्य और उद्देरू किसी और के प्रभाव और आकर्षण से निर्धारित होते हैं तो ऐसे में शायद हम अपने लक्ष्य और उद्देश्य से मुहब्बत भी नहीं कर पाते। बिना रूचि और उत्साह के जिस काम को कर रहे हैं उसमें सफलता कितनी हासिल होगी इसमें संदेह हमेशा ही रहेगा।
मैंनेजमेंट गुरू की मानें तो कोई भी सफल व्यक्ति और प्रोजेक्ट तभी सफल और मुकम्मल होता है जब हम शुरू में अनुमानित संकटों और अवरोधों का आकलन कर उससे निपटने की योजना भी बना लेते हैं। हमेशा बल्कि समय समय पर उद्देश्य हासिल करने के रास्ते और रणनीति का मूल्यांकन और पुनर्मूल्याकन करते रहते हैं। यदि हमारा रास्ता ही गलत है तो वह योजना व प्रोजेक्ट को विफल होना ही हैं। अपने जिस लक्ष्य व उद्देश्य को पाना चाहते हैं उसके अनुरूप हमें रणनीति और कार्ययोजना निर्माण बेहद ज़रूरी है। इसके बगैर हम अपने लक्ष्य व उद्देश्य से काफी दूर रहेंगे। हमेशा ही हमें अपने जीवन से शिकायत रहेंगी। दरअसल हम अपने जीवन में कई सारे काम सिर्फ दूसरों को दिखाने और खुश करने के लिए किया करते हैं। इसमें बॉस, अभिभावक, परिवेश सभी शामिल हैं। इसमें हमारी खुद की खुशी और इच्छा कहीं पीछे छूट जाती है। और शिकायत किया करते हैं हमने अपने जीवन में तो यह चाहा था वह चाहा था आदि। हमें अपने जीवन और कार्यक्षेत्र से क्या उद्देश्य है? क्या चाहते हैं यह यदि स्पष्ट हो तो काफी मसले खुद ब खुद हल हो जाते हैं।

Sunday, January 20, 2019

मुश्किल में कौन साथ है पहचान ज़रूरी



कौशलेंद्र प्रपन्न
संस्कृत साहित्य में एक मंत्र है ‘‘संकट में तीन लोगों की पहचान होती है पत्नी, दोस्त’’ और तीसरी मुझे याद नहीं आ रहा है। यह बात काफी हद तक जायद भी है। सचमुच मुश्किल घड़ी में ही इन लोगों की पहचान होती है। पत्नी और दोस्त की। यदि कोई संकट की घड़ी आए तो ऐसी स्थिति में पत्नी और दोस्तों की पहचान होती है। यदि कोई मुश्किल स्थिति आती है और यदि ये लोग साथ नहीं देते तो दोस्तों की पहचान हो जाती है। इसमें न केवल दोस्तों की बल्कि पत्नी की भी पहचान होती है।
जीवन ही है। इसी जीवन में हर बार एक ही स्थिति नहीं होती। बल्कि कभी भी ऐसी स्थिति आ सकती है। जब आप होस्पीटल में होते हैं तब कौन आपके साथ खड़ा है? यह पहचान आपकी होनी चाहिए। पत्नी क्योंकि आपकी है तो वो तो होस्पीटल में होगी ही। किन्तु दोस्तों में से कौन अस्पताल में आता है इसकी पहचान करनी होगी। जो लोग फोन पर पूछते हैं कि ‘‘कोई मदद की ज़रूरत हो तो बताना।’’ लेकिन वो कहने के लिए कह रहे हैं इसे समझिए।
यदि रात में रूकना हो तो शायद उन दोस्तों और परिचितों में से काफी लोग पीछे हट सकते हैं। इन्हीं वक़्तों में पहचान होती है। जब आपके दोस्त या परिवार के लोग आपके साथ अस्पताल में नहीं रूकते  तभी आपको लगता है आप, बिल्कुल अकेले हैं। आपके साथ कोई नहीं है। आप निपट अकेले हैं। कोई आपके साथ नहीं है। पत्नी है तो उसकी अपनी सीमाएं हैं। मगर जो लोग दोस्त होने का दंभ भरते हैं उन्हें पहचानने की जरूरत है।
जब भी हम संकट में होते हैं हमें कई सारे लोग याद आते हैं। हमें लगता है ये सारे लोग हमारे साथ हैं। लेकिन हक़ीकतन ऐसा नहीं होता। हर कोई बस फूल फल लेकर आते हैं। लेकिन जब वास्तव में डिस्चार्ज के वक़्त ज़रूरत पड़ती है तब हम अकेला होते हैं। यह स्थिति बड़ी भयावह है। मुझे याद आता है, मेरे पड़ोस के चचा जी आए और कहा मैंन स्टेशन छोड़ने चलूंगा। और उन्होंने इसे निभाया। उनकी उम्र नब्बे पार की है। तब लगा हम कैसे समय में जी रहे हैं।

Friday, January 18, 2019

अन्न दान करते वो लोग



कौशलेंद्र प्रपन्न
सिमरन नाम है उस युवा का। जो अपने साथ चार और साथियों के साथ सफ़दरजं़ग अस्पताल के बाहर रोगियों के साथ आए अन्य सेवाटहल करने वालों और सड़क पर सोने वालों के लिए शुक्रवार के शुक्रवार भोजन बांटा करते हैं। इस सर्दी पर पूरी दिल्ली सोने की तैयारी कर रही हो उसमें कोई है जो भूखों के लिए भोजन लेकर खड़ा है। उस भोजन को हासिल करने के लिए कम से कम सौ लोग तो लाईन में लगे ही हैं। शायद यह किसी तथाकथित महाकुंभ में स्नान करने से ज़्यादा फलदायी कर्म है।
किसे नहीं मालूम कि सफ़दरज़ंग हो या एम्स यहां लंबी कतारें मर्ज़ दिखाने वालों रोगियों के साथ आने वालों की भी दशा कोई ख़ास ठीक नहीं होती। वो भी तब जब रोगी उत्तराखंड़, बिहार, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों से आता है। उसके लिए पटरी पर ही बसर करना लिखा होता है। यदि उसकी जेब भारी है तो वह लॉज, होटल, या फिर अन्य जगहों पर भी रातों काट लिया करता है। लेकिन जो पहले ही सुविधा से हीन हैं। जिन्हें रोगी के इलाज के लिए मकान, दुकान, खेत भी बेचना पड़ता है वह इलाज में पैसे लगाए या फिर किसी होटल में रहने में। एम्स के बाहर सोने वाले वालों कई बार न्यूज चैनल में स्टोरी कवर की गई। किन्तु सरकारें आती जाती रहीं। उनके लिए वही पटरी आज भी है और कल भी वही बसेरा हुआ करता था।
सिक्ख समुदाय के सिमरन ने बताया कि हर शुक्रवार को शाम दो घंटे इनलोगों को भोजन बांटा करते हैं। आलोचना से परे क्या हम सोच सकते हैं कि जो लेग एक रात के जागरण में लाखों का स्वाहा कर दिया करते हैं। काश वो लेग इन जगहों पर सचमुच के नर सेवा कर पाते। तो संभव है नारायण सेवा भी इसी में शामिल हो जाए। लेकिन नहीं हमारी िंज़द्द है कि हम इन कार्यां में पैसे लगाने की बजाए फलां मंदिर, फलां मूर्ति पर ज़्यादा ध्यान दिया करते हैं। कहने वाले कह सकते हैं कि यह तो सरकार करे उसके जिम्मे ऐसी सुविधाएं मुहैया कराना है। स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षा आदि। लेकिन कभी सरकार के समानांतर हम भी कुछ कर सकते हैं जिससे वास्तव में ज़रूरतमंदों की मदद मिल सकती है।

Thursday, January 17, 2019

ऑपरेशन टले तो मरीज़ बढ़ेंगे


कौशलेंद्र प्रपन्न
जैसे हम मॉल्स जाया करते हैं। वैसे ही हमें कई बार अस्पताल जाना होता है। जाना ही नहीं बल्कि कई बार रात दिन रूकना भी पड़ता है। इस दौरान हमारी समझ तो यही बनती है कि डॉक्टर अपना काम मजबूती से करे। छूट्टी न ले। ऑपरेशन समय पर करे। लेकिन जब उसके पास तय ऑपरेशन से ज्यादा मरीज खड़ें हो तो क्या कहेंगे। फर्ज कीजिए आपका नंबर था आज ऑपरेशन होना है। लेकिन उसी दौरान कोई अन्य क्रीटिकल मरीज आ जाए तो हमें डॉक्टर की स्थिति को समझना चाहिए।
एक डॉक्टर कितने घंटे बिना थके। बिना उफ्््!!! तक किए ऑपरेशन कर सकता है। उसे भी मानवीय थकन तो घेरती होगी। जब वह ऑपरेशन कक्ष में जाता है तब उसे भी मालूम नहीं होता कि वह कब बाहर आएगा। कई बार अनुमान से ज्यादा बड़ी बीमारी की स्थिति उसके सामने प्रकठट हो जाती है। ऐसे में वह तमाम जरूरी और महत्वपूर्ण कामों और पूर्व तय कामों को ताख पर रख देता है।
हमारा डॉक्टर किन हालात में ऑपरेशन कक्ष में जाता है इसका हमें शायद अंदाज भी नहीं होता। लेकिन वह बड़ी ईमानदारी से अपनी जिम्मेदारी निभाने की कोशिश करता है। हालांकि इसी समाज में डॉक्टरी पेशे से भी ऐसी ऐसी ख़बरें आती हैं जिन्हें सुन और देख कर ताज्जुब होता है कि कैसे कैसे डॉक्टर इस पेशे में आ गए हैं। जिन्हें ऑपरेशन करना था दाई टांग की लेकन तनाव या दबाव या फिर काम के दबाव में बिना पूरी तरह से जांच किए ग़लत ऑपरेशन कर देते हैं।
जैसे अन्य पेशों में हड़ताल हुआ करते हैं। वैसे ही इस प्रोफेशन में भी विभिन्न मांगों और सेवाओं के लिए हड़ताल होना स्वभाविक है। लेकिन जब ये लोग सेवा में लौटते हैं वैसे ही फाइलों की तरह ही मरीजों की लंबी फेहरिस्त हो जाती है। जिन्हें ऑपरेट या उपचार करना होता है। जो भी हो। हर पेशे की कुछ सावधानियां और जिम्मेदारियां हुआ करती हैं। जिन्हें पूरा ही करना होता है। डॉक्टर की जिम्मेदारी तो यही हेती है कि वो मरीज का उपचार ठीक करें।

Wednesday, January 16, 2019

सवाल बहादुर



कौशलेंद्र प्रपन्न
हाल ही में एक शिक्षक प्रशिक्षण कार्यशाला में अनुभव हुआ। साहब सवाल पर सवाल दागें जा रहे थे। सवालां की प्रकृति का जब विश्लेषण किया तो मालूम चला दरअसल वो सवालों के मार्फत मेरी इल्म और ज्ञान का थाह लगाना चाह रहे हैं। साथ ही यह स्थापित करना चाह रहे हैं कि वो सब कुछ जानते हैंं। और जो बताया जा रहा है कि वह ग़लत और उनके स्तर का नहीं है। इसे साबित करने में पूरी ताकत झांक रहे थे। बीच बीच में अपनी नकारात्मक मुंडी भी संचालित कर रहे थे। उन्हें स्थापित करना था कि उन्हें सब कुछ आता है। और बेहतर आता है। जो भी बताया जा रहा है वह तुच्छ है। उन्हें तो आता ही है और अच्छे से आता हैं।
उन्होंने सत्र को न चलने देने का प्रण ले रखा था। बार बार कहते कि आप ऐसा क्यों बता रहे हैं, कैसे बता रहे हैं, यह तो ऐसे होता है। वैसे होते है आदि आदि। उन्होंने उस कार्यशाला में अन्य सहभागी को भी अपने इस अभियान में शामिल किया। और लिख और बोलकर किसी भी सूरत में सत्र को आगे कैसे नहीं चलने देना है इसमें अपनी पूरी क्षमता लगा रहे थे।
मैंने उन्हें सम्मान देते हुए सत्र में खड़ा किया आप जो कॉपी पर लिख और बोल रहे हैं अपनी राय यहां सब के सामने रखें तो सबको समझने में आसानी होगी। जनाब बोर्ड़ के समक्ष आए और पूर्व ज्ञान के आधार पर लिखने लगे। बोलने लगे और अपने ज्ञान को स्थापित करने लगे। सत्र में शामिल अन्य लोग या तो अरूचि के शिकार होने लगे या फिर उन्हें लगने लगा वो जो पढ़ा रहे हैं वह सत्यापित है।
मैंने उन्हें लगभग पंद्रह मिनट दिया। लेकिन जब लगने लगा कि ये साहब सिर्फ और सिर्फ आत्मपहचान स्थापित करना चाहते हैं। तब मैंने उन्हें रोका और बोला कि अब और मैं अपने अन्य प्रतिभागियों को खो नहीं सकता। और क्योंकि मैं इस कार्यशाला का जिम्मेदार हूं तो मेरी कुछ योजनाएं हैं जिन्हें मैं बीच रास्ते में दम तोड़ते नहीं देख सकता। सो आप बैठ जाएं और मेरे कंटेंट को आगे बढ़ने दें।
लेकिन वो साहब थे कि अपनी आदत से बाज़ नहीं आ रहे थे।  अंत में कोशिश की कि वो मान जाएं। किन्तु आदतें ऐसे एक दिन में कहां जाती हैं। वो जारी रहे। मैंने में अंत में उन्हें कक्षा से बाहर किया। हालांकि ऐसा करना नहीं चाहता था लेकिन अन्य के हित को ध्यान में रखते हुए उन्हें निवेदन किया और शायद मैं आपकी अपेक्षा और उम्मीद से नीचे हूं सो आप को यदि लगता है कि मेरा कंटेंट आपके स्तर का नहीं है ता आप कक्षा से बाहर जा सकते हैं।
जबकि यह समाधान मुझे अन्य प्रतिभागियों के हित में लेना पड़ा। ऐसे आत्मप्रचार वाले लोग हुआ करते हैं। उनके अनुसार यदि आपने सत्र को बहने दिया तो आपकी योजना और गतिविधियां राह में ही दम तोड़ देती हैं। सवाल पूछना और पूछने के मकसद को को पहचानना चाहिए। और सत्र को हाईजेक होने और आत्मप्रचार से बचाने की आवश्यकता होती है।

Saturday, January 12, 2019

आया फटकार का मौसम


कौशलेंद्र प्रपन्न
हर भाव और बातों का एक मौसम ख़ासकर मुकर्रर होता है। जैसे हमारी ऋतुएं तय समय पर आती हैं यह अलग बात है कि आज कल मौसम में भी समय सीमा पर नहीं आया करते। सर्दी देर से आती है। गरमी कुछ ज्यादा ही उतावली होती है। आ धमकती है मार्च ख़त्म होते होते। और बसंत तो ऐसा ही है। कोयल तो बेमौसम भी...। सब का चक्र सब बदल चुका है। दफ्तरों में भी एक मौसम ख़ास होता है। यह मौसम साल में एक बार आता है। वह मौसम है एप्रेजल का। यह मौसम है डांट डपट का। मौसम पर कर्मियों पर चढ़ जाने का। कर्मियों के हौसले को तोड़ना का मौसम भी शुरू हो जाता है जनवरी और फरवरी में। हमारा कर्मी आवाज़ न उठाए। हमारा कर्मी जिसने साल भी देह तोड़कर काम किया। इससे पहले की वह एप्रेजल में बढ़ोत्तरी की मांग न करे इसलिए यही वक़्त होता है हौसले को धांस देने का। उन्हें मॉरल स्तर पर ऐसे तोड़ा जाए कि मार्च और अप्रैल में बकार न निकाल सके कि इतना ही एप्रेजल हुआ।
दरअसल कर्मी पूरे साल मनोयोग से काम करता है। अपनी क्षमता से बाहर जा कर भी काम में नई उड़ान लाने की कोशिश करता है। एक उम्मीद होती है कि अगले साल पगार में अच्छी ख़बर होगी। लेकिन स्वनाधन्य और स्थापित मैनेजर और रिपोर्टिंग मैनेजर भी इसी ताक में रहते हैंं कि कहीं उनकी दक्षता पर सवाल न खड़ा हो। बस इस मौसम का लाभ उठाने से नहीं बचते। अपने कर्मियों के साल भर का काम का मूल्यांकन शुरू होता है। बताया जाता है कि पूरे साल तुमने क्या किया? कितना किया? क्या क्या तुम्हारे हिस्से में तय काम थे उसमें से कितने काम रास्ते में ही हैं। तुमने तो कुछ किया ही नहीं। तुमने तो वायदे किए थे कि ये कर दोगे। वो कर दोगे लेकिन तुमसे कुछ भी न हो सका। यही वो रिव्यू प्रक्रिया है जिसमें कर्मी के आत्मबल को ध्वस्त किया जाता है।
कंपनी के नए निज़ाम के कंधे पर तो दोहरी जिम्मेदारी होती है। उन्हें अपने बॉस के साथ ही कंपनी के नियंताओं के कृपापात्र भी विश्वासभाजक बनाना भी होता है। ऐसे में वह कई तरह की पहलकदमियां किया करता है। जो काम हुआ भी नहीं उसे नए सिरे से पेश कर अपना नंबर बनाना चाहता है। पिछले कामों को धत्ता बताते हुए अपनी अस्मिता और पहचान स्थिर करने के लिए किसी की पीठ छीलनी पड़े तो उसमें भी ये नए निज़ाम पीछे नहीं हटते।
यह एप्रेजल का मौसम भी अजीब है। एक दूसरे से दूर करने में बड़ी भूमिका निभाता है। जो पूरे साल साथ काम किया करते थे। साथ खाना खाया करते थे। उन्हें अचानक डर घेर लेता है कि कहीं फलां के साथ न देख लिया जाए। गलत असर पड़ेगा। हर कर्मी अपनी पीठ के घाव और चाबूक के दाग को छुपाना चाहता है। कोई भी पीठ पर पड़ी मार रिव्यू के कैसे दिखाए। सब के सामने अच्छा बनने के लिए वह हमेश चेहरे पर एक मुसकान चस्पा रखता है। कहीं देखकर लोग बता न दें कि निज़ाम को या फलां कर्मी की पीठ पर कितने निशान हैं।
इन फटकारों के मौसम के आने से पहले या गुजर जाने के बाद कंपनी से कई कर्मी अपना रास्ता अगल कर लिया करते हैंं। जब चाबूक की मार ही सहनी है तो क्यों न अपने पैसे पर सहा जाए। यदि गांट फटकार सुनने-सुनाने का कोई तय सीमा नहीं है तो बेहतर है किसी और दुकान में अपनी दक्षता बेची जाए। और इस तरह से बेहतर मानव संसाधन एक कंपनी से कूच कर जाता है। वैसे नए निज़ाम पर  इससे कोई ख़ास अंतर नहीं पड़ने वाला क्योंकि उसे लगता है उसे अंदर काम करने वाले निहायत ही नकारे और असक्षम हैं। ये चले जाएं तो ही बेहतर है।

Wednesday, January 9, 2019

सीख ली तुम्हारी भाषा


कौशलेंद्र प्रपन्न
सीख ली मैंने भी तुम्हारी भाषा। तुम्हारी ही जबान अब मैं भी बोल सकता हूं। बोल सकता हूं तुम्हारी ही तरह कई तरह के जुमले। कई तरह की ख़ास शब्दावलियां भी अब मेरे पास आ गई हैं। आ गई हैं वो कौशल जिसमें तुम मुझसे आगे थी। आगे थी तुम्हारी गति और तुम्हारी स्वीकार्यता। इन्हीं भाषाओं के आधार पर ही तो तुम मुझे नीचा दिखाया करती थी। तुम्हीं क्यों मैनेजमेंट भी सोचती थी कि तुम्हारे पास वो लैंग्वेज नहीं है जिससे पीपुल मैनेजमेंट में यूज की जाती है। वो भाषा नहीं है जिसमें हम लोग काम किया करते हैं। और तुम्हीं हो जिसके पास वो भाषा नहीं है।
मैंने भी कोशिश की कि तुम्हारी भाषा बोलने और लिखने लगूं। तुम्हारे पास वो भाषा है जिसमें मैनेजमेंट काम किया करता है। जिस भाषा में दुनिया काम किया करती है। मैंने कोशिश की कि मैं भी वो भाषा सीख लूं जिसमें वो लोग काम करते हैं।
तुम्हारी भाषा में जब से बोलने लगा हूं तब से तुम्हें भी ऐसा लगने लगा है ये तो मेरी भाषा सीख में बातें करने लगा है। ये तो वो तमाम शो कॉल्ड मैनेजमेंट के टर्मस हैं। ये कैसे हुआ? ये भी जब हमारी भाषा में बोलने और लिखने लगेगा तो गजब है। जबकि भाषा पर किसी का एकाधिकार नहीं होता है। जो भी प्रयास और अभ्यास करेगा उसे भाषायी कौशल तो हासिल होंगी ही। मेरी लिखी भाषा पर तुम्हें ताज्जूब हुआ कि ये कैसे मेरी भाषा लिख सकता है? कब इसने सीखी हमारी भाषा।
जो भी हो भाषा हो या कोई अन्य दक्षता अभ्यास से अर्जित कर सकते हैं। सीख सकते हैं दुनिया की कोई भी भाषा बस जज्बे और अभ्यास, लगन और प्रयास जरूरी है। आप किस भाषा में बोल और लिख रहे हैं आज की तारीख़ में सभी की नज़र रहती है। जैसे ही आप उनकी बनाई पूर्वग्रह को तोड़ते हैं वैसे ही महसूस होता है कि ये क्या हुआ? क्या इसने भी हमारी भाषा को बरतना सीख लिया क्या। जबकि दुनिया की हर भाषा हमारी है और हम उस भाषा के हैं।

Tuesday, January 8, 2019

असफलता के डर से आगे


कौशलेंद्र प्रपन्न
निवेश सिर्फ रुपए पैसों का ही नहीं होता। और न केवल जमीन जायदाद का। बल्कि डर भी निवेश करने योग्य ऐसी भाव दशा है जिसपर खुल कर और समझकर निवेश किया जा सकता है। मौत से कौन नहीं डरता। सभी को मरने से डर लगता है। यही वजह है कि मरने को कैसे टाला जा सकता है कुछ देर के लिए ही सही पूरा का पूरा बाजार इसे साकार करने में लगा है। पहले डर को बढ़ाएं और इतना बढ़ाएं कि लोग उस डर से छूटकारा पाने के लिए आपके पास आएं। शिक्षा और परीक्षा को पहले डरवानी साबित किया जाए और फिर एक्जाम डर से कैसे बचें आपके बच्चे इसके लिए वर्कशॉप उपलब्ध कराने वाली दुकानें खुली हुई हैं। जो परीक्षा के भय से कैसे बचा जाए इसके मंत्र सीखाया करते हैं। ठीक उसी तरह कई तरह के डर हमें हमेशा अपनी गिरफ्त में लेने के लिए तैयार बैठें हैं। कभी जीवन में आगे बढ़ने का डर। कभी न बोल पाने का डर। तो कभी जॉब पर जाने का डर। आदि।
डर का समाज शास्त्र और दर्शन को समझे ंतो पाएंगे कि कई बार डर अच्छा भी होता है। अगर जीवन में असफल होने व फेल होने का डर खत्म हो जाए तो संभव है हम प्रयास करना छोड़ दें। हम सावधान न रहें। शायद वेद में निर्भय होना कहा गया है। लेकिन निर्भय होना कई बार हमें असावधान और लापरवाह बना देता है। जैसे ही लापरवाही हुई नहीं कि दुर्घटना घटती है। अगर चौकन्ने हुए और असफल होने से डरे तो हम सावधान भी रहेंगे। शेर और खरगोश की कहानी में यही तो हुआ। शेर के जीवन और दिल से डर खत्म हो गया था। उसे इतना ज्यादा आत्मविश्वास हो गया था कि वह अपने ही अहम में मारा गया। ठीक उसी प्रकार जब हमारे अंदर भय खत्म हो जाता है और स्थिर होकर मंथन नहीं कर सकते तभी हम हारा करते हैं।
आज कई प्रकार का डर हमारे सामने है। जॉब का डर। बीमारी का डर। और आगे बढ़ने का डर। जब रास्ते में व्यवधान आता है तब हम उस डर का कदम नहीं उठाते। हम अपने सुरक्षित जगह पर ही बने रहना चाहते हैं। यही वो डर है जिसकी वजह से हम आगे नहीं बढ़ पाते। हालांकि संस्कृत साहित्य में स्पष्टतौर पर कहा गया है जो निश्चित को छोड़कर अनिश्चित की ओर भागता है वह उचित नहीं। कम से कम निश्चित को तो बनाए रखना चाहिए। लेकिन कई बार यही निश्चितता हमें आगे बढ़ने से रोकती भी है। अनिश्चित सही है कि अंधेरे में है। असफलता संभाव्य है लेकिन यदि संतुष्ट होकर बैठ गए और निश्चित को पकड़कर बैठे रहे तो हमारी प्रगति कहीं न कहीं प्रभावित होती है।
दुनिया में जो भी डर से मुक्त हो सका है उसके जीवन में प्रगति की लव जली हैं। वह आगे ही बढ़ा है। जो डर कर बैठ गया वह वहीं स्थिर रह जाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो जो असफलता से डर गया वह क्या ख़ाक आगे बढ़ेगा।

Friday, January 4, 2019

मेला ए पुस्तक दिल्ली नगरे...



कौशलेंद्र प्रपन्न
आज की तारीख़ में लेखकों की बाढ़ आ चुकी है, इसे मानने और स्वीकारने में किसी को भी गुरेज़ नहीं है। लेकिन देखना यह है कि उन लेखन में क्या और कितने हरिशंकर परसाई, शरद जोशी, शंकर पुणतांबेकर, मृदुला गर्ग आदि निकलने पाते हैं। सदि तुलना करें तो पाएंगे कि पहले लेखक अपनी रचना और लेखन पर वक़्त बिताया करते थे। उन्हें संपादन करने वाले संपादक चुस्ते के साथ संपादित कर उन्हें मार्गदर्शन किया करते थे। किन्तु जैसे जैसे तकनीक का विकास हुआ वैसे वैसे नवलेखकों को विभिन्न स्तरों और स्वरूप में लिखने और प्रकाशित होने का अवसर मिला। यहां लेखक ही संपादक है। एक ही व्यक्ति संपादकख् लेखक, पाठक भी हुआ करता है और आलोचक भी। यहां संपादकीय सत्ता की कमी कहीं न कहीं रचना की गुणवत्ता को तय करने लगीं।
यादा हो कभी ऑरकूट भी अभिव्यक्ति का एक मंच आया। धीरे धीरे वहां भी लेखकों की बाढ़ आई। समय और तकनीक के बयार में वहां बिला गया। फेसबुक, ब्लॉग, ट्वीटर आदि सेशल मीडिया का अभिव्यक्ति का मंच मिला। इन खुले मंचों पर कोई भी लेखक अपनी रचना पोस्ट कर सकता है। उन कंटेंट पर अन्य अपनी राय देने में स्वतंत्र हैं। लेकिन यहां देखने वाली बात यह मौजू है कि टिप्पणियों में निजी राय, राग भी शामिल होते हैं। साथ ही यह भी देखा और पढ़ा जा रहा है कि किस व्यक्ति को इन मंचों पर बदनाम किया जाए व किसे तवज्जो देकर उसे प्रसिद्ध करना यह एक व्यापक अभियान के तौर पर चलाते समूह भी सक्रिय हैं। इन्हें भी हमें समझना होगा।
इन विश्व पुस्तक मेलों में क्या क्या और किस प्रकार सार्थक काम होते हैं इस पर नज़र दौड़ाएं तो पाएंगे कि ऐसे ऐसे लेखकों से बातचीत करने, चर्चा करने का अवसर मिलता है जो सदूर प्रांतों और दुर्गम क्षेत्रों में रहकर सक्रियता के साथ लेखन में लगे हुए हैं। हम पाते हैं कि ऐसे भी लेखक हैं जो महज लिखने में विश्वास किया करते हैं। छपने की ओर प्रेरित करने के लिए उने शुभचिंतक उन्हें मोटिवेट किया करते हैं। लेखकीय कर्म को करीब से देखने, महसूसने और जानने का अवसर कुछ ऐसे पल हुआ करते हैं जो अप्रतीम माना जा सकता है।
आज की तल्ख़ हक़ीकत यह है कि बहुत कम लोग पढ़ना चाहते हैं लेकिन लिखना हर कोई चाहता है। चाहता है कि रातों रात लेखक बन जाए। किन्तु वह उसके अनुरूप अभ्यास और प्रयास कम करता है। बेंजामिल फ्रैंक्लीन अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि वो जन्मना लेखक नहीं थे। उन्होंने अभ्यास के ज़रिए लेखकीय ताकत अर्जित किए। उन्होंने हप्ते, माह, साल लगाए और अभ्यास किया कैसे बेहतर लिखा जाए। और अभ्यास के मार्फत आज वो प्रतिष्ठित और स्थापित लेखक बन पाए। लेकिन आज के लेखक और लेखन कर्म में तुरंत फल की कामना करने वाले लेखक तुरत फुरत में सफलता हासिल करना चाहते हैं। अभ्यास की कमी और स्वाध्याय में कोताही कई बार लेखक को दोयमदर्ज़े का लेखक ही बना पाता है।


Wednesday, January 2, 2019

रूचि लेकर पढ़ें, पढ़ाएं साहित्य


कौशलेंद्र प्रपन्न
साहित्य शिक्षण और पठन में हमारा मुख्य मकसद क्या उन्हें कविता, कहानी पढ़ाना है या फिर साहित्य पढ़ाते वक़्त उन्हें समाज और संवेदनशील बनाना है। जब बच्चा एक मां की बेबसी या फिर बच्चे काम पर जा रहे हैं, पढ़ता है तो कहीं न कहीं बच्चा न केवल आनंद हासिल करेगा बल्कि अपने परिवेश और समाज के प्रति सजग होगा। कविता को पढ़ाते वक़्त अकसर लोग सवाल उठाते हैं व मानते हैं कि कविता पढ़ाने-पढ़ने का मकसद आनंद प्रदान करना है। क्या कविता महज आनंद प्रदान करना है? क्या कविताएं सिर्फ कवि का क्या आशय है आदि के जवाब तक महदूद करना है आदि। दरअसल आज जिस तदाद में कविता कहानियां लिखी जा रही हैं, उन्हें पढ़ने और समझने वाले ख़ासा कम हैं। जो पढ़ते हैं वो या तो पत्रकार हैं, कवि हैं, समीक्षक हैं आदि। लेकिन शुद्ध व सिर्फ पढ़कर आनंद लेने के उद्देश्य से कम लोग पढ़ा करते हैं।
प्राथमिक स्तर पर व कहे लें आरम्भिक तालीम में पढ़ने और पढ़ाने की क्षमता व स्वरूप एकदम भिन्न पाया जाता है। हमारे अधिकांश शिक्षक व शिक्षिकाएं कहानी, कविता पढ़ाने के दौरान सिर्फ पाठ्यपुस्तकों तक सीमित रह जाते हैं। हमारी कोशिश शायद यह होनी चाहिए जो कहीं न कहीं बच्चों में साहित्य पढ़ने के प्रति ललक पैदा करें। यदि बच्चे आनंद व रूचि लेकर पढ़ना सीख लेंगे तब हमें इस बात की वाकलत करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी कि साहित्य पढ़ना चाहिए। हमें भाषायी संस्कार मिलता है, हमारी भाषायी संपदा में बढ़ोत्तरी होती है। बच्चा एक बार पढ़नें में रूचि लेने लगेगा तब हमें ज़्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ेगी।
बेंजामिन फैं्रक्लीन विश्व के ख़्यात लेखक का मानना है कि वो प्रकृतितः लेखक नहीं थे बल्कि उन्होंने लिखना सश्रम सीखा। शुरू में वो अपने पसंदीदा पत्रिका के अपने प्रिय लेखक के आलेख को पढ़ते थे। पढ़ने के बाद दुबारा उसे लिखा करते थे। लिखने के बाद मूल रचना से मिलान किया करते थे। कहां किस प्रकार की चूक रह गई उसे गोला लगाते थे। तीन चार बार भी लिखा करते थे। और दिन, माह, वर्षों उन्होंने अभ्यास किया। इसी का परिणाम है कि आज उनका नाम, उनकी रचना को ससम्मान हम पढ़ा करते हैं। नए व जो लेखक बनना चाहते हैं व लेखन करना चाहते हैं वो इतनी शिद्दत से अभ्यास से बचते हैं। यही कारण है कि वो अपने क्षेत्र में दोयमदर्ज़े के लेखक ही बन पाते हैं।
हमारे बच्चे कैसे लिखना शुरू करें, कैसे अपनी कविता, कहानी, लेख को मॉजें, और परिष्कृत करें यह ख़ासा महत्वपूर्ण है। हमें नई पौध तैयार करनी करनी है तो उन्हें मागदर्शन भी करना होगा। स्वयं उन्हें पढ़ते हुए, लिखते हुए दिखाना भी चाहिए। इसका अर्थ यह हुआ कि शिक्षक स्वयं भी लिखें, पढ़ें, कुछ वक़्त किताब के साथ बिताता हुआ नज़र भी आए। यहीं से बच्चों में भी रूचि लेकर लिखने, पढ़ने की आदत संक्रमित हो सकती है।

Tuesday, January 1, 2019

करें कोई भी काम रूचि बनाए रखें, छूटे न उम्मींद का दामन


कौशलेंद्र प्रपन्न
हम काम तो करते ही हैं। काम से उम्मींद भी पाल ही लेते हैं। ये काम हो जाएगा तो वह पा लूंगा। वह कर लूंगा तो वहां जा पहुंचूंगा। आदि आदि। कई लोग ऐसे भी होते हैं जो सिर्फ और सिर्फ सपने देखा करते हैं। उनके जीवन में झांकें तो पाएंगे कि सपनों को पूरा करने के लिए उनके पास न अभ्यास है, न रूचि रह जाती है और न ही अंत तक आते आते उम्मींद ही बची रहती है। और देखते ही देखते उनकी तमाम मेहनत पर पानी गिर जाता है। सपने चकनाचूर हो जाते हैं।
किसी भी मंज़िल को हासिल करने के लिए काम में रूचि होना निहायत ही ज़रूरी है। जब हम स्वयं अपने काम में रूचि लेंगे तो उसके बारे में लगातार सोचा करेंगे। हमेशा योजनाएं बनाया करेंगे। उसे कैसे हासिल करना है उसके लिए टारगेंट तय करेंगे। उस लक्ष्य को पाने के लिए कौन से रास्ते होंगे उसकी तलाश भी किया करते हैं।
रूचि के बाद अहम है अभ्यास। हम अक्सर बीच में निराश होकर अभ्यास करना छोड़ देते हैं। कई बार अहम में आकर तो कई बार दूसरों को देखकर। फलां को तो ऐसे ही मिल गया ढिमका को तो यूं ही बिना पढ़े अंक आ गए आदि। जबकि सब अपने अपने हिस्से का काम और अभ्यास ज़रूर किया करते हैं। तभी आज वो अपने क्षेत्र में नाम कमा चुके हैं। अभ्यास से क्या नहीं हो सकता। अभ्यास से लेखक, कवि, मैनेजर, सफल डॉक्टर सब कुछ संभव है। लेकिन हम बीच के रास्तों में आने वाली अड़चनों से इस कदर डर जाते हैं कि अभ्यास बीच में ही छोड़ देते हैं।
उद्देश्य यह तीसरी कड़ी है। यदि हमारे उद्देश्य स्पष्ट हों तो भटकाव की उम्मींद कम हो जाती है। हमें हमारे उद्देश्य यानी मकसद साफ होने चाहिए। इससे अपने लक्ष्य को पाने में सुविधा होती है।
अंतिम लेकिन एकदम अंत नहीं है किन्तु उम्मींद। उम्मींद जब तक रहती है हम तब तक अपने काम में जुटे होते हैं। जैसे ही उम्मींद का दामन छोड़ देते हैं। वैसे ही हमारी कोशिश कम होने लगती है। रूचि भी घटने लगती है। इतना ही नहीं बल्कि उद्देश्य भी फीके पड़ने लगते हैं। शायद यही वे मूल मंत्र हैं जिन्हें जीवन में अपना कर कोई भी सफल व्यक्ति अपनी मंज़िल तक का सफ़र तय किया करता है।

Monday, December 31, 2018

जो भी जीया, कुछ छूटा गया



कौशलेंद्र प्रपन्न
जो छूटा उसका विश्लेषण करने का मन करता है। कहां पीछे रहा और कौन का काम क्यों नहीं पूरा कर सका इसका पड़ताल तो होना ही चाहिए। बेंजामिन फें्रक्लीन कहा करते थे, उन्हें अपनी विफलता से सीखने को मिला करती थी। उन्होंने कहीं कहा था ‘‘ विशेषज्ञ अपनी सफलता का जश्न मानने से पहले अपनी असफलता और कहां भूल हुई उसकी समझ विकसित करने में ज़्यादा वक़्त लगाया करते हैं।’’ किन्तु सामान्य लोग अपनी सफलता के मद में इस कदर चूर हो जाते हैं कि आगे की चुनौतियां दिखाई नहीं देतीं। हम अक्सर अपनी सफलता में इतने रम जाते हैं कि अपनी असफलता को देख नहीं पाते। साल के इस अंतिम पलों में जो भी लिख रहा हूं वह बस इतनी भर की टीस है कि क्यों हम अपनी असफलता से नहीं सीख पाते और सफलता में वो चीजें भूल जाते हैं जिन्हें याद रखा जाए तो आने वाले दिनां में हम ज़्यादा मजबूती से सफल हो सकते हैं।
मैंने जो पिछले एक सालों में सीखा उसका लब्बोलुआब इतना ही है कि प्लानिंग, प्रैक्टिस, विज़न और पर्पस और उम्मीद रखें तो जीवन में आगे बढ़ने में कभी भी किसी भी किस्म की बाधा नहीं आ सकती। यदि हमारी प्लानिंग दुरूसत हो, प्रैक्टिस करते हैं, पर्पस के साथ उम्मीद रखकर कार्य करते हैं तो जीवन के सपने पूरे होते हैं। सपने जो भी हों जैसे भी हों, उन्हें पाने के लिए हमें उक्त प्लानिंग, प्रैक्टिस, पर्पस और उम्मीद हो तो कोई वज़ह नहीं कि हमारे सपने पूरे न हों। जीवन में कभी भी यू टर्न आ सकते हैं उसके लिए मानसिकतौर पर तैयार रहना हमारी प्राथमिकता की सूची हो तो हम आगे ही बढ़ा करते हैं।
अपने सपनों को पूरा करने में हमें कुछ कठोर निर्णय भी लेने होने हैं। कुछ अपनी आदतों और व्यवहारों में तब्दीली भी लानी पड़ती हैं। जैसे जैसे पद बदलते हैं वैसे वैसे हमारी प्राथमिकताएं भी बदलती हैं। संवेदनाओं को किनारे करना पड़ता है। यही तो सीखा जो कर रहे हैं उसे दिखाना भी आना चाहिए। आपको यह भी आना चाहिए कि जितना कर रहे हैं उसे डॉक्यूमेंटेशन भी करना ज़रूरी है। वरना कहने वाले सवाल खड़े कर सकते हैं कैसे मान लें कि ऐसा हुआ। वैसा हुआ। असर यह हुआ। जो किया उसे दिखाने की कला भी होनी चाहिए। आप जितना करते हैं उन्हें दिखाने के कौशल में आप माहिर हों वरना कोई क्यों मानेगा कि आपने यह किया वह किया आदि आदि।
जो करें उसे पूरी शिद्दत से करें तो वह स्वयं के लिए और और के लिए भी बेहतर होता है। जो ग़लतियां हम कर बैठते हैं कई बार उसे सुधारने में वक़्त लग जाया करता है लेकिन जो डैमेज हुआ उसे पूरा करने व सुधारने में समय लगा करता है। कई लोग हैं हमारे आस-पास जो आपकी मदद करना चाहते हैं वो वक़्त पर मदद भी करते हैं। उससे आगे की जिम्मेदारी हमारी होती है कि हम उनके उस प्रयास व मदद को कितना पूरा कर पाते हैं। कई बार हम उस व्यक्ति की अपेक्षाओं को पूरा करने में विफल होते हैं। और आपको विफल साबित कर दिया जाता है। उसमें कहीं न कहीं उस व्यक्ति का शुक्रगुजार तो होना ही चाहिए जिसने आपको आगे बढ़ाने में मदद की। उसने चाहा कि आप आगे बढ़ो। अब आगे की लड़ाई आपको लड़नी थी। आपको साबित करना था कि आप योग्य हो। आप विफल हुए तो उसमें उसकी ग़लती नहीं। बल्कि आप कहीं न कहीं उसकी अपेक्षाओं पर ख़रे नहीं उतरे। लेकिन इससे निराश होने की ज़रूरत नहीं। ज़रूरत इस बात की है कि अपनी विफलताओं से सीख कर जीवन में आगे बढ़ा जाए।

Sunday, December 30, 2018

दौड़ते घोड़े को चाबूक न मारो प्यारे



कौशलेंद्र प्रपन्न
कहते हैं यदि घोड़ा दौड़ नहीं रहा है तब उसे चाबूक मारा जाए तो वह दौड़ने लगे। बैठा है तो चलते चलते दौड़ लगाने लगे। लेकिन हम कितने उतावले और अधीर हो गए हैं कि हमें यह देखना तक गवारा नहीं कि घोड़ा दौड़ रहा है। वह गति में है और सही दिशा में है। लेकिन क्योंकि हमें दिखाना है। क्योंकि हम मान बैठे हैं कि स्याले घोड़े ऐसे ही होते हैं। इन्हें काम न करने की आदत जो हो गई है। इन्हें जब तक चाबूक न मारा जाए ये दौड़ेंगे नहीं। दरअसल चाबूक मारने वाला कितना चौकन्ना और किस कदर बेचैन है कि उसे भी कहीं और किसी को दिखाने की अधीरता घेरे हुए हैं कि वह भी काम कर रहा है। काम फल तो उसे भी दिखाना है। वह भी तो किसी के प्रति जवाबदेह है।
जवाबदेही तक तो ठीक है लेकिन आप चिल्लाने लगें यह तो हद है। हालांकि कुछ ऐसे और कुछ वैसे किस्म के लोग भी हुआ करते हैं जिन्हें काम कम दिखाने की जल्दी होती है। कुछ वो लोग होते हैं जिन्हें दिखाने से ज्यादा करने में विश्वास हुआ करता है। वो काम करते हैं। दिख जाए तो ठीक वरना अपने धुन में काम में जुते रहते हैं। वहीं पहले किस्म के लोग करते कम दिखाने में ज्यादा विश्वास रखते हैं। कई बार काम होता हुआ दिखना चाहिए। यह तो ठीक है लेकिन काम हो भी और दिखे भी यह भी ज़रूरी है।
कंपनियां मुनाफा कमाने के लिए तरह तरह की स्कीमें निकाला करती हैं। जिन्हें पूरा करने के लिए कर्मचारी को जी तोड़ मेहनत करनी पड़ती है। और उसी के बल पर कंपनी के बड़े ओहदेदारों को तारीफें भी मिला करती हैं। इसका परिणाम यह होता है कि उन बैठकों तय होता है कि आख़िर ये मजदूर पूरे पूरे दिन करते क्या हैं? बैठे बैठे वक़्त जाया किया करते हैं जब ये इतना काम कर सकते हैं तो इनके काम के घंटे क्यों नहीं बढ़ा देते? क्यों इन्हें हप्ते में पांच दिन बुलाया जाए इन्हें तो छह दिन काम करना ही चाहिए। और देखते ही देखते पांच दिन खटने वाले मजदूरों को उसी पगार में छह दिन झोंकने की योजना बना दी जाती है। जवाबदेही वह मैनेजर की होती है कि कैसे अपने मजदूरों को बहला फुसला कर। डरा धमका कर। औरों के उदाहरण दे कि देखो वो तो छह दिन सात दिन काम किया करते हैं और तुम छह दिन में हांफने लगे। करना ही होगा तुम्हें भी छह दिन। जबकि उस मैनेजर को मालूम हो कि विश्व की कई अध्ययनों शोधों से यह बात साबित हो चुकी है कि मजदूरों, कामगारों को लंबी अवधि में काम के लिए विवश करना कहीं न कहीं काम की गुणवत्ता को प्रभावित करता है। कहां तो दुनिया भर में पांच और चार दिन कार्यदिवस करने की तैयारी चल रही है और आप हैं कि छह दिन पर खूटा गाड़े बैठे हैं।
सब का अपना अपना काम करने का तरीका होता है। सबकी अपनी शैली होती है। लेकिन जब भी नया आता है कि पुराने वाले के कामों को ऐसे हिकारत की नज़र देखता है गोया पहले वाले ने कुछ किया ही नहीं। तुर्रा उसपर यह कि हम सिस्टम ठीक करेंगे। सिस्टम बनाएंगे। कुछ भी प्लान वे में नहीं होता था। कोई तय योजना और सिस्टम नहीं था आदि आदि। क्या पहले बिना किसी सिस्टम के सारे काम हुआ करते थे। दरअसल नए जनाब को अपनी पहचान, अस्मिता और पोस्ट की चिंता ज़्यादा हुआ करती है। उन्हें अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराने के किए कई किस्म के हथकंड़े भी अपनाने पड़ते हैं। कुछ पुरानी बेहतर चीजों को ख़राब भी बताना और ठहराना पड़ता है। तब तो बाबू लोग उनकी सुनेंगे कि क्या खूब किया आपने। आपने तो यह भी नया किया, वह भी बदल दिया आदि इत्यादि। इसी उपक्रम में वे दौड़ते घोड़े को चाबूक मारना नहीं भूलते। नहीं भूलते कि हर वक़्त डांटना, कोचना पड़ता है। मगर वो भूल जाते हैं कि दौड़ते घोड़े को चाबूक मारना ग़लत और हानिकारक भी हो सकता है। घोडा़ बिदक भी सकता है।

Saturday, December 29, 2018

अज़ान संग चालीसा भी है फ़ज़ावो में घुला तेरे शहर में

अज़ान और हनुमान चालीसा साथ ही सुनाई देती हैं आज भी तेरे शहर में। हर सुबह इन्हीं उच्चार से भोर हुआ करता है। कुछ ही दिन बीते होंगे तेरे शहर में कई राग फ़ज़ावो में घुलने लगे। चचा फ़ज़ल अब नहीं बैठते पंडित पान की दुकान पर। शायद कुछ जो घटा इस शहर में उससे कोई भी बेख़बर नहीं था। 
सब ने यही चाहा कि मसला कौम पर न जाये। लेकिन कुछ लोग थे जिन्हें शहर की मुहब्बत पसंद न थी।
सच है कि इस शहर क्या कई शहर में आज भी भोर अज़ान और हरी गुरु चरण सरोज रज शब्दों से हुवा करती हैं। अब तलक किसी को इनसे कोई एतराज़ न था और न किसी को कबूलने से गुरेज़ था कि हम साथ साथ हुवा करते हैं। अचानक 30, 35 के हुवे तब महसूस हुआ हम से भिन्न है वो। 
जबकि बचपन मे याद नहीँ कभी पड़ोस की चची ने भी पाला है। अब यकीन नहीं होता हम साथ थे।
आज भी चची और चचा पूछ लिया करते हैं कैसा है हमारा पंडित। अब बड़ा हो गया है। अब तो शहर आता भी है तो मिला नहीं करता। शायद दानिशमंद हो गया

Wednesday, December 26, 2018

गढ़ा करता है शहर

गढ़ता हुआ शहर ! कैसा लगा शीर्षक? समझ तो गए होंगे। बात शहर की कर रहा हूं जो हमेँ गढ़ा करता है। आकार देता है। हम अपने शहर से तमीज़ भी लिया करते हैं।
शहर जिससे दूर चले जाते हैं। जैसे जैसे हम दूर होते हैं शहर भी नए नए रंग रूप अखितयार करता है। धीरे धीरे शहर के गांवों, खेतों बगानों को काटा जाता गई और देखते ही देखते शहर मकानों में तब्दील हो जाता है। शहर से खेत और बगीचो को बेदख़ल करने का खेल जारी है।
हम कई बार शहर से दूर हो जाते हैं। तो कभी शहर हमसे दूर होता जाता है। यह प्रक्रिया कई बार दोतरफ़ा चला करता है। जिसके स्तर को समझना होगा।
शहर हमें कोसता है तो कभी हम शहर को। यह शिकायत का सिलसिला चल पड़ता है। लेकिन तै बात है कि हमारा शहर हमेशा ही याद आया करता है।
शायद कई बार शहर से हमारी पहचान जुड़ जाती है तो कभी कभी शहर हम से पहचान हासिल किया करता है।

Monday, December 24, 2018

अपनो के बीच दफन होना

रिलोकेशन केवल जगह तक महदूद नहीं है। बल्कि पहचान और लोगों के बीच भी हम माइग्रेट सी ज़िंदगी बसर किया करते हैं। 
हम अपनी इसी ज़िन्दगी में कई कई पल, सांसों को भर लेते हैं। 
कभी भी हम वैसी जगह पर खुश नही राह पाते जहां कोई पहचानने वाला न हों। 
हमारे बुज़ुर्ग नई जगह समायोजित नहीं हो पाते। उन्हें महसूस हिया है कि वी अकेले रह गए। कोई पूछता नहीं। तव्वजो नही देता। 
जिस जगह उम्र के बड़े हिस्से को जीया, जिनके साथ सुख दुख साझा किए लेकिन जब कुछ चेहरे पहचान वाले हों आस पास तब कहीं और कैसे चला जाये।
शायद जिनके बीच रवादारी रही है उन्हीं के बीच ही मरना भी चाहते हैं 

Sunday, December 23, 2018

सत्तर के पार

सत्तर पार के शिक्षकों से समूह में मिलना एक अलग एहसास से भर देता है।
जिसके प्रयास से हम क्या देश, क्या विदेश हर जगह अपनी छाप छोड़ा करते हैं। वही शिक्षक अपने उम्र के सातवें दशक में लाचार हो जाता है। भूलने लगता है। घर- समाज में कई बार उपेक्षित भी होते हैं। लेकिन उसमें उनका क्या दोष। यह उम्र का तकाजा है।हर किसी को इस दौर से गुजरना होगा।
जिन शिक्षकों की तालीम के आधार पर हम और हमारी पर्सनालिटी आकार लिया करती हैं।
शिक्षकों, प्रिंसिपल सब ने स्वीकार किया कि इस उम्र में भी हम समाज को कुछ दे सकते हैं। सब के सब अपने तज़र्बा साझा कर रहे थे। उन्हें हौसला बढ़ाने के लिए कुछ सफल कहानियां सुनाई। इससे कुछ देर के लिए ही सही रोशनी भी मिली।

Thursday, December 20, 2018

पढ़ते हुए बच्चे नज़र नहीं आते...



कौशलेंद्र प्रपन्न
कहां हैं ज़नाब!!! इन बच्चियों को देखिए और अपने चश्में के लेंंस को ठीक कीजिए। पढ़ते हुई बच्चियां आपकी आंखों से ओझल कैसे हो जाती हैं। जो मंज़र अन्यान्य रिपोर्ट दिखाती हैं उन्हें ही मान बैठते हैं और उन्हें ही अंतिमतौर पर कबूल कर लिया करते हैं। कभी तो सरकारी स्कूलों में ख़ुद भी जाकर देखें और बच्चों से बात करें कि क्या कर रहे हैं बच्चे स्कूलों में। लेकिन आदतन आप कह देंगे ‘‘ वक़्त ही मिलता ज़नाब’’ ‘‘कहां जाएं और क्या क्या देखें?’’ ‘‘मूवी जाएं, मॉल्स जाएं, पार्टी में जाएं कहां न जाएं।’’ क्या आपको याद है अंतिम दफ़ा आप किसी सरकारी स्कूल में गए हों। जो आपके घर के पास ही है। एकदम पास। पार्क से लगा हुआ। जहां आप देखा करते हैं कुद नीलीवर्दी में बच्चे जाया करते हैं। कुछ टीचर वहां जाया करतीं हैं। एक नागर समाज के नागरिक होने के नाते कभी भी इस चिंता से परेशान नहीं किया कि चलें आज अपने पास के सरकारी स्कूल होकर आएं। ज़रा देखें वहां कैसे बच्चे पढ़ते हैं और टीचर कब और कितना पढ़ाते हैं। हालांकि एसएमसी के सदस्य भी कम ही जाया करते हैं। तो हमारे पास ही इतना वक़्त कहां हैं जो आफिस भी जाएं घर पर भी सोएं। सोईए तान कर सोईए जब हमारे सिरहाने से सरकारी स्कूली शिक्षा छीन ली जाएगी तब हमारे पास बचाने को कुछ भी नहीं बचेगा। कितनी तेजी से सरकारी स्कूलों को हमसे छीना जा रहा है इसका अंदाज़ शायद आपको हो न हो लेकिन एक बड़ा तबका इसको लेकर चिंतित है और वकालत भी कर रहा है। कम से कम उनके हौसले को बढ़ाने ही चाहिए।
स्कूल है ज़ाफ़राबाद, पूर्वी दिल्ली का वह इलाका जिसे हम अक्सर पिछड़ा माना करते हैं। उसपर तुर्रा यह कि वह स्कूल उर्दू माध्यम का है। इस स्कूल में तकरीबन 600 सौ बच्चियां हैं। तीन मंज़िला स्कूल जहां कक्षा एक से पांचवीं तक की तालीम देने में टीचर लगे हैं। लेकिन इससे आपको क्या फ़र्क पड़ता है कि वहां पढ़ाई हो रही है या नहीं। बच्चियां पढ़ रही हैं या नहीं। लेकिन मेरा तज़र्बा कहता है कि इस स्कूल की शिक्षिकाएं और बच्चियां बहुत अच्छा पढ़ रही हैं।
कक्षा तीसरी है। बच्चियां हिन्दी की पाठ्यपुस्तक की एक कहानी पढ़ रही हैं। वह पढ़ना किसी भी कोण से कमतर नहीं कहा जा सकता। बहुत अच्छे से और समझते हुए वाचन और पठन कर रही थीं। कुछ देर के लिए लगा कि शायद कोई प्रसिद्ध तथाकथित निजी स्कूल की कक्षा तो नहीं। लेकिन नहीं। यह सरकारी स्कूल उसमें भी उर्दू माध्यम के स्कूल में हिन्दी इतनी साफ तलफ्फूज़ के साथ बच्चियां पढ़ रही हैं। यह ज़रूर काबील ए तारीफ़ है। चौकाने वाली बात यह भी थीं कि बच्चियां न केवल टेक्स्ट बुक पढ़ रही थीं बल्कि अन्य कथाओं को भी पढ़ने में दक्ष थीं।
हमारे सरकारी स्कूलों में शिक्षक और बच्चे भी बहुत अच्छा कर रहे हैं किन्तु इस किस्म की स्टोरी न तो मीडिया में आती है और न नागर समाज के पैरोकारां की नज़र में। यदि स्कूलों से कोई स्टेरी मीडिया को लुभाती है तो वह है नकारात्मक कहानियां। बच्चियां पढ़ना-लिखना नहीं जानतीं। शिक्षिकाओं को यह नहीं आता। वह नहीं आता आदि आदि। तो उन्हें जो आता है वह भी तो स्टोरी कीजिए ज़नाब। सरकारी स्कूलों को जिस तेजी से सरकारें बंद करने और मर्ज करने का मन बना चुकी हैं बल्कि दिल्ली में ही कई स्कूल बंद कर दिए गए या फिर मर्ज़ कर दिए गए उनके लिए हमें ही आवाज़ उठाने की आवश्यकता है।

Wednesday, December 19, 2018

कहानियां चुन लेती हैं हमें कई बार


कौशलेंद्र प्रपन्न
कई बार हम कहानी को चुना करते हैं। वहीं कई मर्तबा कहानियां हमें चुन लेती हैं। याने यदि आप किस्सागो हैं तो अपने लिए कहानियों के प्लॉट तलाशा करते हैं। उस प्लॉट के अनुसार कहानी बुना करते हैं। वहीं दूसरी ओर कई बार प्लॉट हमें बुलाती हैं कि आओ और मुझे कहो। मुझे कहानी में गूंथो। हम भी सुनने वाले के बीच जाना चाहती हैं। क्या प्रेमचंद और क्या कृष्णा सोबती जी, क्या अलका सरावगी और क्या तसलीमा नसरीन सब ने अपने अपने लिए कहानियां चुनीं। कभी हामिद ने प्रेमचंद को चुना तो कभी सिक्का बदल गया की तकसीम ने कृष्णा सोबती को। कभी गूदड बस्ती की कथानक ने प्रज्ञा को। सब के सब लेखक, कवि, कथाकार कहानियों के लिए चुन लिए जाते हैं।
आज यही हुआ। होना ही था। हमपेशा कोई पास में हो तो कब तक ख़ामोश रह सकते हैं। मेरी बगल की सीट पर बैठ गए आकर। कुछ किताबनुमा या गाईडनुमा कोई किताब जिनमें पन्ने लाल, नीली और पीली रंगों में रेखांकित की हुईं थीं। इन पर मेरी नज़र पड़ी। नज़र पड़ी तो मन में खलबलाहट भी होनी ही थी। सो हुई भी। मांफी के साथ पूछ डाला, ‘‘क्या आपका पेपर है?’’ जवाब मिला, ‘‘जी लॉ का पेपर है इन दिनों परीक्षाएं चल रही हैं।’’ वैसे मैट्रो या अन्य स्टेशन पर ट्रेन में अपरिचितों से बात करना, खाना खाना आदि पर चीख चीख कर ताकीद की जाती है कि बात न करें, खाना न खाएं। लेकिन उन सज्जन ने जवाब दिया। लेकिन क्योंकि उन्हें पेपर देना था। इसलिए ज़्यादा बातों में उलझाना मुझे अपराध सा लगा। बस इतना कहा ज़रूर कि ‘‘आपको देख कर अच्छा लगा। वैसे क्या उम्र होगी आपकी?’’ हालांकि किसी अपरिचित से उम्र क्या पूछना और क्यों पूछना लेकिन रहा नहीं गया। उन्होंने भी सादगी के साथ अपनी उम्र भी बताई वो पैंसठ के हैं। सरकारी नौकरी से अवकाश प्राप्त कर चुके हैं। उनसे जब पूछा कि ‘‘वो क्या चीज है जो आपको पढ़ने के प्रति प्रेरित करती है।’’ उनका कहना था, ‘‘घर बैठ कर स्वास्थ्य ख़राब करने से बेहतर है कुछ सीखा जाए। अपनी तालीम बढ़ाई जाए।’’
ऐसे कई सारे लोग हमारे आप-पास हैं जिन्हें देख,पढ़ और सुनकर एक आशा और उम्मीद जगती है कि कभी भी देर नहीं है? किसी भी उम्र में पढ़ना शुरू कर सकते हैं। कभी भी छूटी हुई पढ़ाई व तालीम का लुत्फ उठाया जा सकता है। हार कर या फिर उम्मीद छोड़कर बैठने वाले भी ख़ासा लोग हमारे आस-पास ही हैं। जिन्हें देख और मिल कर लगता है जीवन अवकाश प्राप्ति के बाद बिस्तर पर या फिर पार्क में चक्कर काटते गुजरती है। जबकि ऐसा है नहीं। यदि हमारे अंदर की ललक बची है और नए नए कोणों और अरमानों को पूरे करने हैं कि उम्र कभी भी बाधा नहीं।
यह कहानी इसलिए साझा कर रहा हूं क्योंकि इसे आपके साथ नहीं बांटता तो मुझ तक ही उनकी लालसा और पढ़ने का अभ्यास रह जाता। और ऐसा ही नहीं चाहता था। चाहा कि ऐसी सकारात्मक कहानी, घटनाएं ज़रूर साझा की जानी चाहिए जिन्हें पढ़ और सुनकर, जिनसे मिलकर एक उत्साह जगे और निराशा से भरे मन में एक नई कोपल निकले। हमारे ही आस-पास ऐसे कई लोग हैं जिन्होंने बड़ी उम्र में अपनी पुरानी आदतों और अरमानों को पूरा करने और जीने की शुरुआत की। हमें तो ऐसे लोगों से प्रेरणा और आगे बढ़ने की ललक मिलती है। बजाय कि रोने से कि अब कुछ नहीं हो सकता। कुछ भी तो नहीं हो सकता। अब कौन सा परीक्षा देना है आदि आदि। क्यों पढ़ें? जब पढ़ना छूट जाता है तो कहीं न कहीं हम एक बड़ी दुनिया से कट जाते हैं। हमारा साबका फिर ऐसे लोगों तक ही महदूद रह जाता है जिन्हें पढ़ने-लिखने में कोई दिलचस्पी नहीं है।

Tuesday, December 18, 2018

पांच साल बाद भी कहानी याद रही, अधूरी कहानी छोड़ आया




कौशलेंद्र प्रपन्न
यही कोई पांच साल बाद यानी 2014 से 2018 का फासला। कायदे से जाना तो लगातार और नियमित चाहिए था। लेकिन काम की व्यस्तता और न जाने के प्रति उदासीनता या कहे लें ज़रूरत ही महसूस नहीं हुई। लेकिन आज जब उर्दू माध्यम के स्कूल, पुरानी सीमापुरी गया तो लगा ही नहीं कि नई जगह आया हूं।
कक्षा पांचवीं में दाख़िल हुआ। मकसद था यह जानना कि क्या उर्दू माध्यम से पढ़ने वाले बच्चों व बच्चियों को हिन्दी लिखने, पढ़ने में कोई किसी भी स्तर की परेशानी होती है? क्या उन्हें मात्राओं, वर्तनी आदि में तो दिक्कतें नहीं आतीं। इस मकसद को पूरा करने व जांचने के लिए मेरे पास कुछ सवाल थे। कुछ कहानी के मार्फत जानना व समझना था कि बच्चों को मात्राओं की समझ दुरुस्त है या नहीं।
पर्चा तो बांट दिया। बच्चे पर्चो लेकर काम करने लगे। लेकिन मैं तब तक क्या करता? क्या करता कक्षा में खड़े व बैठकर? यह सवाल भी था और बेचैनी भी। दूसरे कक्षा में चला गया। वहां पर बच्चों से बातचीत करने लगा। वक़्त था दोपहर के भोजन का। बच्चे मौज मस्ती में थे।
जब कक्षा में वापस आया तो मैंने पूछा आपमें से कौन कहानी, कविता, नज़्म या गीत सुनाएगा? तभी सानिया, फरहा और खूशबू ने कहा ‘‘सर आपने हमें चींटी और हाथी वाल कहानी सुनाई थी। वही सुनाओ।’’ मेरे लिए हैरत की बात थी कि मैंने कब सुनाया? सानिया ने कहा ‘‘जब मैं पहली क्लास में नीचे प्रिंसिपल ऑफिस के सामने पढ़ती थी तब आपने हमें चींटी वाली कहानी सुनाई थी, अब मैं पांचवी में आ गई हूं।’’
मेरे लिए कैसी और कदर की खुशी का मंज़र रहा होगा शायद अंदाज़ न लगा पाएं। पांच साल पहले जिस पहली कक्षा में कहानी सुनाई थी वह कहानी आज भी बच्ची की जिंदगी में शामिल है। उसने न केवल कहानी का नाम बताया बल्कि मुझे पहचान भी लिया। शायद कहानी, कविता और कथाकार, कवि या फिर शिक्षक की सत्ता एवं पहचान यही होती है। यदि इन औजारों का इस्तमाल बेहतर और शिद्दत से किया जाए तो हम बच्चों की जिं़दगी में अपना स्थान बना सकते हैं। अनुमान लगाया जा सकता है कि पहली कक्षा की बच्ची ने कहानी के साथ मेरे अंदाज़ और चेहरे को भी ज़ज्ब कर लिया था। हम कई बार हल्के तरीके से कुछ भी कह कर कक्षा से बाहर आ जाते हैं। हमें मालूम ही नहीं होता कि हमारे किस शब्द और वाक्य का बच्चों के जीवन में असर छोड़ने वाला है।
पांच साल बाद भी पहली कक्षा की बच्ची ने पहचान लिया तो यह एक किस्म से भाषायी और कथा-शैली की ताकत है जिसके बदौलत हम कक्षा और कक्षा के बाहर भी बच्चों में अपना वजूद बना पाते हैं। अब वो बच्चियां अगले साल छठीं में चली जाएंगी तब शायद पता नहीं कब उनसे मुलाकात हो। मैंने चलते चलते कहा ‘‘ आप लोग पहली से जैसे पांचवीं तक आईं इंशा अल्लाह!!! आप कक्षा छठीं और आगे के दर्ज़ें में भी जाएं और तालीम पूरी करें।
जब चलने लगा तो बच्चियों ने कहा एक फोटो आपके साथ लेना है। हालांकि मैं कोई हीरों नहीं था। मैं कोई प्रसिद्ध हस्ती भी नहीं हूं। लेकिन बच्चों के लिए वह व्यक्ति सबसे बड़ा होता है शायद जो उनकी पहुंच में होता है। जिसने भी उनकी जिं़दगी को पहचाना, पढ़ा और खुलेतौर पर उनसे मिला वे लोग ही उनके लिए ख़ास होते हैं। तस्वीर में बच्चियां ऐसे टूट और धक्कामुक्की कर रही थीं गोया कोई फिल्मी हस्ती हो शायद। लेकिन मैं तो था एक अदना या भाषाप्रेमी, शिक्षा का विद्यार्थी जिसे काफी पहले उन स्कूलों में उन कक्षाओं में दुबारा जाना था जहां कहानियां छोड़ आया था। उन कहानियों को पूरा करना था। पूरा करना था उन बच्चों की ख़्वाहिशें भी जिन्हें और और कहानी सुननी थी। जाते जाते वायदा लिया बच्चों ने फिर कब आओगे? अल्ला हाफ़िज़। सलामत रखे सर आपको।

Monday, December 17, 2018

पांव में चप्पल नहीं




कौशलेंद्र प्रपन्न
उसके पांव में चप्पल नहीं थे। जमीन जितनी सर्द थी कि नंगे पांव कुछ देर खड़ा रहना मुश्किल है। लेकिन उसके पांव में न चप्पल और न ही जुराब। कुछ भी नहीं। खाली और नंगे पांव वो बरतन धो रही थी। एक अकेली साड़ी में लिपटी। शॉल था तो बदन पर लेकिन वह भी फैशन वाले लग रहे थे। उस शॉल से सर्दी रूकती हो इसका अनुमान लगाना कठिन है।
लाख कहने पर कि चप्पल पहन लो उसके पांव में चप्पल नहीं आए। लेकिन दुबारा बोलने पर उसने कहा, ‘‘चप्पल तो नीचे है। कोई घर में हमें चप्पल पहन कर नहीं घूसने देता। इसलिए चप्पल नीचे खोल कर आती हूं।’’
यह सुनकर सोच में पड़ा रहा कि घर की रसोई सौंपने, खाना बनवाने में हम पीछे नहीं रहते। घर का सब काम किया करती हैं। ऐसी रानियां, पूजा, बबीता, आंचल आदि आदि। लेकिन घर में चप्पल पहन कर आने में हमारी पवित्रता कहीं गंदली होने लगती है। है न अज़ीब सा दो स्तरीय बरताव। लेकिन अमूमन घर घर में ऐसे ही व्यवहार हुआ करते हैं।
इन्हें आदत है किसी भी घर में जाओ तो अपना चप्पल खोलकर दरवाज़े के अंदर आना है। मैंने अपनी चप्पल दी कि इन्हें पहनों और फिर बरतन बासन साफ करो। जमीन साफ रखना, डस्टींग आदि करना एक उद्देश्य है।
हमसब की आदत होती है कि इन महिलाओं से यदि मुरौअत से पेश आए तो सिर पर नाचने लगती हैं। काफी हद तक होता भी है। यदि ढील दे दो तो छुट्टियों की लड़ियां लग जाती हैं। आपकी रसोई, घर सब के सब उसके न होने की पहचान देते हैं। हम वैकल्पिक बरतन से काम चलाने लगते हैं। वे तो सोचती है कुछ दिन आराम मिला। लेकिन जैसे ही बरतनों का ढेर देखती है वैसे ही भुनभुनाने लगती है। क्या फायदा हुआ छुट्टी करने का। जब इतना बरतन धोना ही था।
आज की हम सब की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुकी हैं ये रानियां, पूजा, रूबी आदि। इनके बगैर कई बार लगता है हम कितने अपंग हो चुके हैं। यदि दो दिन ये न आएं तो रसोई तो रसोई हमें अपने जुराब, जूते, बनियान आदि का भी पता नहीं होता। क्यों न ये भी इतराएं? इन्हें इतराने और भाव खाने का भी पूरा हक़ है। क्योंकि हमारे अधिकांश काम यही तो निपटाया करती हैं। हम घर के साथ अब बिना रानियों के कल्पना भी नहीं कर सकते।
शायद यही वज़ह है कि हर बड़ी बड़ी इमारतों और कॉलोनी, सोसायटी आदि के आस-पास ही इनके भी ज़िंदगी चक्कर काटने लगती है। छोटी छोटी दुकानें और कुछ काम करते इनके पतियों को विश्वास होता है कि उनकी बीवी उनके से ज़्यादा कमा रही हैं। शाम होते घर भी लौट जाया करती हैं।
कभी मौका मिले तो अपने घर के आस-पास के पार्क में रविवार या किसी दिन ग्यारह बजे के बाद देख लीजिए। कमाल का मंज़र होता है। सिर से जूं निकालतीं आपकी रानी, पड़ोस की पूजा से सुबह से कल रात तक की तमाम कहानियां बिनते बांटते नज़र आएंगी। उसकी पूजा, इनकी रानी, या पांच मंजिले एक मकान में लगी रूबी सब अपने अपने काम की प्रकृति और दुख या मजे बांटा करती हैं। काश! हमारे पास कोई रिकॉडिंग होती तो हम जान पाते कि किसी चटनी, किसनी दाल, किसकी रोटी कहां कब पका करती हैं।
कई दफ़ा आपकी रानी मेरी पूजा को बिगाडने का काम भी किया करती है। मेरी भाभी ने तो साड़ी कूकर आदि दिया। तुम्हारी भाभी ने क्या दिया? और अब वो बरतन धोते धोते धीरे से सरका देगी ‘‘ इस बार साड़ी लूंगी और दीवाली पर कूकर देना। हर साल लड्डू दे देती हो भाभी।’’
हमारी लाइफ लाइन बन चुकी रानियों, राजकुमारियों को इंसान के तौर पर देखना और स्वीकारना होगा। यदि साल में एक बार पांच सौ हजार रुपए का कूकर मांग भी बैठी तो देने में कोई हर्ज़ नहीं। ज़रा फर्ज़ कीजिए तीन दिन यदि वो नहीं आती और आप बच्चे को स्कूल छोड़ने और दफ्तर पहंचने में लेट होते हैं तो इससे बेहतर था एक कूकर ही दे देते।   

Sunday, December 16, 2018

बलिहारी सरकार आपने स्कूल बंद कराए...



कौशलेंद्र प्रपन्न
कमाल है सरकार आपका भी। स्कूल बंद करा कर उस जगह पर अपना भव्य कार्यालय बना डाला। उस पर तुर्रा यह कि अन्य सरकारी स्कूलों को भी बंद करने का भरमान ज़ारी कर चुके हैं। वे सरकारी स्कूल और उन स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे किन और कहां स्कूल जाएंगे इसकी ख़बर तक नहीं ली। कहने को तो आपने कहा कि फलां फलां पड़ोस के स्कूल में उन्हें मर्ज कर दिया जाएगा। तब तलक तो ठीक लेकिन आपने यह तर्क देकर तो दिल बाग बाग कर दिया कि उन जगहों पर पार्किंग बनाई जाएगी। क्योंकि इन स्कूलों में बच्चे कम हैं। बच्चों को कैसे इन स्कूलों में लाए जाएं इसकी सूध लेनी आपकी प्राथमिकता नहीं थी। आपकी पहली प्राथमिकता था स्कूल करो बंद और खोला जाए दुधारू पार्किंग। इन स्कूलों से मिलता ही क्या है? ऊपर से शिक्षकों का वेतन, टेंशन लेना अलग से।
नई दिल्ली नगर निगम ने नवंबर में इन तरह कई सरकारी स्कूलों को बंद कर दिए। यहां पार्किंग की योजना पर काम जारी आहे। हाल ही में पुरानी दिल्ली के एक अत्यंत पुराने स्कूल जिसका इतिहास 1948 से जुड़ा है। वहां कौ़मी स्कूल को बंद कर सराय ख़लील इलाके में खुले इस कौ़मी स्कूल को 1976 में तोड़कर यहां ईदगाह स्थानांतरिक कर दिया गया। लेकिन स्कूल में तालीम भी दिए जाए का काम चल रहा था। इस स्कूल को कायदे से संरक्षित भी रखे जाने की आवश्यकता था। लेकिन सरकार आपकी नज़र तो कहीं और थी।
आपने इसी शहर में सरकारी स्कूल की जमीन हथिया कर वहां भव्य कार्यालय खड़ी कर दी। अब इस स्कूल पर आपकी नज़र है। राज्य सरकार ने 4000 वर्गमीटर की जमीन मांगी थी ताकि इस स्कूल को बचाया जा सके और इसे बेहतर बुनियादी सुविधा मुहैया कराई जाए। लेकिन आपसे यह भी न हो सका। जितनी जमीन देने की हांमी भरी वह सीबीएससी के मांपदंड़ों पर ख़रा नहीं उतरता।
ये कौन सी और किस स्कूल में पाठ पढ़े हो सरकार !!! स्कूलों को बंद करने से आपके कौन से निहितार्थ सधते हैं यह तो हमें नहीं मालूम, लेकिन इतना तय है कि सरकारी स्कूलों पर ह़क कहीं न कहीं आम जनता की है। आम बच्चों की है। उन बच्चों को सरकारी स्कूल पर अधिकार है। अधिकार है बच्चों को शिक्षा हासिल करने का। 

Saturday, December 15, 2018

सरकार के समानांतर शिक्षा में टेक महिन्द्रा फाउंडेशन के प्रयास



कौशलेंद्र प्रपन्न
सरकार जब शिक्षा में मुकम्मल गुणवत्ता पर ध्यान नहीं दे पा रही है तब ऐसे में नागर समाज के अन्य घटक आगे आ रहे हैं। उनमें कुछ एनजीओ, सीएसआर आदि की कोशिशों को लंबे समय तक नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। सरकार पिछले कई दशकों से शिक्षा में गुणवत्ता हासिल करने में लगातार विफल होती रही है। इसके प्रमाण गजट ऑफ इंडिया के दस्तावेज़ हैं।
देश के विभिन्न राज्यों में शिक्षा प्रशिक्षण संस्थानों में किस प्रकार की तालीम दी जा रही है इसका अंदाज़ लेना हो तो किसी भी सरकारी व कई बार गैर सरकारी स्कूलों की कक्षाओं में झांकने का अवसर लीजिए और देखें। देखेंगे कि शिक्षक किस शिद्दत से अपने कंटेंट के साथ न्याया कर रहा है।
अव्वल तो शिक्षकों की जबानी कई बार सुनने को मिलती है कि उन्हें पढ़ने का मौका नहीं मिलता। अरसा हुआ कुछ नई किताबों को पलटे हुए। जब पढ़ाई किया करते थे तब पढ़ते थे लेकिन उसका मकसद परीक्षा पास करना था। जब से सेवा में आए पढ़ाई छूट गई। टूट गई किताबों से रिश्ता। यह मेरा कहना नहीं है बल्कि शिक्षकों की कही और स्वीकारी बातें हैं।
टेक महिन्द्रा फाउंडेशन के द्वारा पूर्वी दिल्ली नगर निगम के स्कूलों को केंद्र में रखते हुए संचालित अंतः सेवाकालीन अध्यापक शिक्षा संस्थान लगातार छह वर्षां से शिक्षक सेवाकालीन प्रशिक्षण में लगी हुई है। इसका परिणाम यह हुआ कि शिक्षक अपनी कक्षाओं में नए शिक्षण विधियों और शास्त्रों का प्रयोग कर रहे हैं। यह संख्या और गुणवत्ता अभी हमारी आंखों से ओझल है लेकिन अब और नहीं छुप सकतीं। जब आप काम किया करते हैं वो भी सरकार की जिम्मेदारियों के समानांतर तो वो कईबार अपनी निहितार्थां की वजह से ओझल रखने का खेल भी खेला जाता है।
आज की तारीख़ी हक़ीकत है कि देश भर में सेवापूर्व प्रशिक्षण संस्थान तो हैं लेकिन सेवाकालीन शिक्षकों को शिक्षा-शास्त्र और शिक्षण कौशलों पर हाथ थामने वाले बेहद कम हैं। उनमें टेक महिन्द्रा फाउंडेशन का यह प्रयास किसी भी कोण से कमतर नहीं है। जबकि यह काम सरकार को करने थे। लेकिन सीएसआर गतिविधि के तहत टेक महिन्द्रा फाउंडेशन न केवल दिल्ली बल्कि अन्य राज्यों में भी बच्चों में दक्षता और मेडिकल प्रोफेशनल तैयार करने में जुटी है। हालत यह है कि बच्चे प्रशिक्षण और हुनर हासिल कर देश के जानेमाने अस्पतालों और अन्य क्षेत्रों में अपनी भविष्य तलाश रहे हैं और बना चुके हैं।
सच पूछा जाए तो शिक्षा वह कोना है जहां समाज को झांकना चाहिए लेकिन यही कोना एक सिरे से उपेक्षित भी है। यही वजह है कि नागर समाज के लोग और कंपनियां अपनी जिम्मेदारियां निभाने में पीछे नहीं हैं। हमें खुले मन और दिल से ऐसे प्रयासों को न केवल स्वीकारना चाहिए बल्कि एक कदम आगे बढ़कर अपनी जिम्मेदारी को भी निभाने के लिए समानांतर आगे आना ही शिक्षा को बेहतर स्तर पर ले जा सकती है।

Thursday, December 13, 2018

तुम्हारे हार पर हंसेंगे हम



कौशलेंद्र प्रपन्न
हंसने वाले हजारों हैं। इन्हें हंसने का सबब चाहिए। कोई तो वजह हो जिस पर हंसना चाहिए। हम कई बार हंसने का वजह दिया करते हैं। हम अपनी कमजोरी देते हैं जिसपर हंसा करते हैं। हार भी कई बार हमें जीवन में आगे बढ़ने की वजहें तय किया करती हैं। लेकिन हम हारना ही नहीं चाहते। चाहे वो खेल हो या फिर जिं़दगी। हम हर वक़्त जीतना चाहते हैं। यही सबसे बड़ी चुनौती है। हार में जो जज़्बा है उसे महसूस नहीं किया करते। उस हार में जीतने के प्रति जो प्रयास है उसे नज़रअंदाज़ कर दिया करते हैं।
हार से निकलती है जीत का सबब। और कैसे जीता जाए इसकी योजना हम तब बनाते हैं जब हार जाते हैं। चाहे वह हराने वाले अपने हों या फिर कोई और। हार से जीत की योजना निकला करती है। इसे ऐसे भी समझने की कोशिश करें कि यदि आप किसी प्रोजेक्ट को लीड कर रहे हैं और अपने तई बेहतर करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में अपनी पूरी क्षमता लगा देते हैं। लेकिन अचानक मैंनेजमेंट को एहसास होता है कि यह तो हमारी बात नहीं मानता। हमारी सुनता नहीं। हमारे इशारों पर नहीं चलता। यह उन्हें पसंद नहीं आती। उन्हें यह स्वीकार नहीं कि जिसे हमने चुना वो हमारे इशारों पर क्यों नहीं चलता। अपना विवेक क्यों प्रयोग करता है। आपका विवेक उन्हें पसंद नहीं आता। उन्हें यह भी पसंद नहीं आता कि वो हमारी सारी बातों पर हुंकारी नहीं भरता।
और मैंनेजमेंट की आंखों में खटकने लगते हैं। आपके सामने एक बड़ी लाईन खींच दी जाती है और कहा जाता है उस लाईन को तुम मीट नहीं कर पाते इसलिए क्यों न आपको हटाया जाए। आपको सीधे सीधे हटाया तो नहीं जाता, बल्कि आपके सामने ऐसी चुनौतियां खड़ी कर दी जाती हैं जिन्हें आप मीट नहीं कर पाते। और आपको कहा जाता है कि आप तो हमारे पैरामीटर पर ख़रा नहीं उतरते। क्यों न आपको हटाया जाए।
कई बार ऐसी परिस्थितियों पैदा कर दी जाती हैं जिनसे आपको लड़ना होता है। आपको साबित करना होता है कि आप अभी भी योग्य और दक्ष हैं। हर वक़्त आपको प्रूफ करना होता है कि आप हैं और आपकी अपनी पहचान भी है। लेकिन इसमें आप कई बार उन लोगों से भी जूझते हैं जो कभी आपके साथ हुआ करते थे। सत्ता परिवर्तित होते ही उनकी प्राथमिकताएं बदल जाती हैं। उनके लिए यह चुनाव ज़रा मुश्किल हो जाता है कि नए निज़ाम के साथ कितना ईमानदार रहना है और पुराने वाले के साथ कितना रहना है।
 

Wednesday, December 12, 2018

...और वो रोने लगीं



कौशलेंद्र प्रपन्न
कभी सोचा न था कि कोई अपनी बात कहते कहते व डायरी पढ़ते पढ़ते रो पड़ेगा। या रो पड़ेंगीं। रोना वैसे कोई स्त्री व पुरूष वर्ग में बांटकर नहीं देख और समझ सकते हैं। किसी कार्यशाला में यदि कोई प्रतिभागी यानी शिक्षक व शिक्षिका रोने लगें तो आप इसे क्या नाम देना चाहते हैं? मेरे लिए यह चौंकाने वाली घटना थीं। लेकिन जब आंसूओं का मोल समझा तो एहसास हुआ कि रोते वो लोग हैं जिन्होंने अपने आंसू को लंबे समय से दबा कर रखा है। किसी के सामने बयां नहीं किया कि उनकी अंतरदुनिया में क्या और किस प्रकार की हलचल चल रही है।
यह वाकया है एक हिन्दी शिक्षकों की कार्यशाला का। इस कार्यशाला में भाषा कौशल की बुनियादी दक्षता की चर्चा हो रही थी। उस विमर्श में भाषायी कौशल श्रवण, वाचन और पठन उसके बाद लेखन कौशल पर अभ्यास का कार्य हो रहा था। पठन कौशल के बाद लेखन पर बात आई। जब बात चली तो हमने कहा आज हम डायरी और यात्रा-संस्मरण लिखते हैं।
तकरीबन सभी प्रतिभागियों ने अपनी समझ से यात्रा-संस्मरण और डायरी विधा में हाथ आजमाया। अब बारी थी पठन की। जब एक एक कर प्रतिभागियों ने पढ़ना शुरू किया तो जिन कौशलों की बात की गई थी उसका प्रयेग वाचन और पठन में कर रहे थे। तभी एक प्रतिभागी की आंखों में आंसुओं का एक रेला लग गया। जैसे ही उनपर नज़र पड़ी तो मेरी आंखें भी भर आईं। लेकिन समझना ज़रूरी था कि क्यों आख़िर क्या वो कहानी है जिससे वो शिक्षिका को ख़ुद को जोड़ पा रही है।
जब उनकी बारी आई तो अपनी डायरी के कुछ पन्ने हमारे साथ साझा किया। वह भी ऐसा कि उससे हमारी आंखों में भी आंसू आ गए। सितंबर में ससुर और अक्टूबर में पिता को कैंसर का पता चला। यह वैसे भी कतना संजीदा घटना थी। डायरी के उन पन्ने को सुनते सुनते सभी की आंखें भर आईं। इसके साथ ही एक और प्रतिभागी थीं जिनकी आंखों में भी आंसू नहीं बल्कि लोर भर भर कर निकल रहे थे।
हर कोई अपने अंदर पता नहीं कितना समंदर दबा कर रखता है। जब कभी मौका मिलता है बस वह अपने अंदर की जज्बातों को उड़ेल देता है। यदि यह विश्वास हो जाए कि जिसके सामने हम अपन बात रख रहे हैंं वह सुरक्षित है। मेरी बात सुनने वाले और समझने वाले हैं। हमारी बात हमारे बीच ही सुरक्षित रहेगी।
हम सब ऐसे व्यक्ति की तलाश ज़रूर करते हैं जिन्हें हम अपनी बात साझा करते हैं उसका मजाक नहीं बनाया जाएगा। हमारी बात और दर्द से कोई जुड़ने वाला होगा। यही हुआ इस कार्यशाला में। शिक्षिका ने अपनी निजी घटनाएं साझा कीं कि कैसे उन्हें पिता और ससुर की बीमारी ने तोड़ा और वो प्रोफेशनल और निजी जिंदगी में सामंजस्य नहीं बैठा पा रही हैं। एक ओर पिता और ससुर और दूसरी ओर स्कूल और शिक्षण। बच्चों के साथ जब न्याय नहीं कर पा रही हैं तो उसका मलाल उन्हें रूलाने लगती है। उन्हें लगता है इनमें बच्चों का क्या दोष? दिन में नींद आने लगती है। लेकिन यह सामंजस्य ज़रा कठिन है। किन्तु पढ़ाने और पढ़ने के प्रति ललक और जिज्ञासा अप्रतीम है। रूचि भी ऐसी कि उन्हें नई चीजें सीखने की ललक उन्हें आगे बढ़ा रही है।

Tuesday, December 11, 2018

पुनर्मूषिको भव



कौशलेंद्र प्रपन्न
कहानी पुरानी है। बहुत पुरानी। इस कहानी को हमने बचपन में ज़रूर पढ़ी व सुनी होगी। शायद पंचतंत्र की है या कथासरित सागर से ली गई होगी। संक्षेप में समझें कि ऋषि तपस्या में लीन थे। एक चूहा परेशान था। ऋषि जी की आंखों खुली और उस चूहे से पूरा कथा जानने के बाद कहा ‘‘ तुम्हें शेर बना देते हैं। और तब से चूहा शेर का रूपधारण कर लिया।
उसकी प्रकृति अपने स्वरूप के अनुसार होनी थी। हिंसक। सो एक दिन उस शेर में तब्दील चूहे ने सोचा। शायद ज़्यादा ही सोच लिया। अपना भविष्य सुरक्षित करने के लिए योजना बनाई की क्यों न इस ऋषि को ही खत्म कर दूं। क्योंकि इसकी वजह से आज मैं शेर हूं। लेकिन...
.....और उसने ऋषि पर ही धावा बोल दिया। होना क्या था? जो आपको शेर बना सकता है। वही आपको चूहे में तब्दील करने का मंत्र-यंत्र भी जानता है। और कहानी का पटाक्षेप यूं हुआ कि ऋषि ने उसे पुनः चूहा बना दिया।
इस कहानी के कई स्तर और कई पेंच हैं। बल्कि इस कहानी की गांठों को खोलें तो पाएंगे कि हमारी जिं़दगी में भी कई ऋषि मिला करते हैं जो हमारी औकात और छवि, व्यक्तित्व को नया आयाम दिया करते हैं। अब यह हम पर निर्भर करता है कि क्या हम उसे अपनी काबिलीयत के आधार बरकरार रख पाते हैं या वर्तमान पद को भी खो देते हैं। पहले वाला स्वरूप तो अपने हाथ से गया ही वर्तमान की पहचान भी खतरे में आ जाती है।
यदि हमारे अंदर दक्षता और कौशल है। योग्यता और पात्रता है तो हम इस शेर के बिंब को जी पाते हैं। हमें अपने पुराने ऋषि के वरदान और श्राप के भय से हमेशा झुक कर नहीं रहना पड़ता। बल्कि नर्ठ भूमिकाओं और चुनौतियों का सामना डट कर करते हैं।
थ्कतनी ही अजीब बात है कि जब आप एक ही संस्थान में प्रमोट होकर नई पोस्ट हासिल किया करते हैं और कुछ ही वक़्त के बाद आपको पहली भूमिका में धकेला जाए। या फिर ऐसी परिस्थितियां पैदा कर दी जाएं कि आपको अपनी पहली भूमिका में लौटना पड़े तो ऐसे में क्या महसूस करते हैं? आपके महसूसने और अनुभव को कोई ख़ास तवज्जो नहीं दिया जाता बल्कि मैनेजमेंट आपको येन केन प्रकारेण कोई न कोई कारण गिना कर जतला देती है कि आप उसके योग्य ही नहीं थे। आप तो अकादमिक कार्यों के लिए बने हैं। आप चूहा ही रहें। चूहेपन का आनंद लीजिए। आपको कुछ देर स्वाद क्या लग गया आप तो बौरा गए।
चूहे की गल़ती क्या थी? क्यों वह पुनः चूहा बन गया? सोचकर लगता है। हर किसी को नए रूप, पद, रूतबा खूब भाया करता है। जब उससे नई भूमिका छीन ली जाती है तब अप्रिय लगना स्वभाविक है। लेकिन आत्मग्लानि और अपराधबोध से भर जाना उसके लिए आगे की लड़ाई और संघर्ष को बढ़ा देता है। पहला आत्मसंघर्ष उसका स्वयं से होता है कि क्या मैं सचमुच इस लायक नहीं था? क्या हममें वह दक्षता ही नहीं थी जिसकी उम्मीद की जा रही थी? जो अक्षमता गिनाई गई क्या वास्तव में इसमें कमतर हूं आदि आदि। और निराश होकर आगे प्रयास करना छोड़ देगा। वहीं दूसरी स्थिति यह भी हो सकती है कि वह इसे सकारात्मक रूप से ले कि अच्छा कियी कमियां बता दीं। आगे से ऐसी गलती या कमियों को दूर करूंगा।
कंपनियां और दुकानें बहुत सी हैं। यदि हमारे अंदर दक्षता और काम के प्रति ललक और रूझान है कि कीमत देने वाले भी इसी बाजार में हैं। बस ज़रूरत है अपने आप को कैसे बेचते हैं। बिकने के लिए तैयार रहें, दक्ष हों तो खरीदने वाले भी बैठें हैं।

Sunday, December 9, 2018

कभी चुनाव विशेषज्ञ तो कभी ज्योतिषाचार्य





कौशलेंद्र प्रपन्न
हमने अपना बचपन और युवावस्था में चुनाव से पूर्व और चुनाव के बाद विश्लेषकों में योगेंद्र यादव को टीवी पर देखा है। इनका विश्लेषण कई मतर्बा आंखें खोलने वाली हुआ करती थीं। जो विश्लेषण और भविष्यवाणियों की जाती थीं परिणाम तकरीबन आस-पास ही होती थीं। इन विश्लेषणों में मंजे हुए पत्रकार भी शामिल होते थे। जिन्हें चुनावी पंड़ित के नाम से जाने थे। इनमें राहुल देव, दीनानाथ मिश्र, सुरेंद्र प्रताप सिंह, राजकिशोर, प्रभाष जोशी आदि। जैसे जैसे मीडिया की प्रतिबद्धता बदलती चली गई वैसे वैसे ये पत्रकार भी बिलाते चले गए। मुंखापेक्षी विश्लेषणों का दौर चल पड़ा।
इन दिनों कई राज्यों में चुनावी मौसम है। इस मौसम में कई तरह की दुकाने सजाए कई लोग बैठे हैं। इनमें मीडिया तो है ही साथ ही ज्योतिषियों की भी दुकाने ंचल पड़ी हैं। इन दुकानों में इन दिनों क्या बेचा जा रहा है? कभी भी न्यूज चैनल खोल लें। दो ही किस्म की बहसें सुनने और देखने को मिलेंगी। पहला सड़क छाप और स्वघोषित चुनाव विश्लेषक और दूसरे ज्योतिषशास्त्री। अंक ज्योतिष, फलित ज्योतिष नक्षत्र, ग्रहों को पढ़ने वाले।
जो आम जनता को नहीं पढ़ पाता वही शायद इन अंक ज्योतिषियों की शरण में जाया करते हैं। आज की घटना है कई न्यूज चैनल बाबाओं को बैठा कर उनसे दो ही पार्टी की जन्मकुंडली बांचने में झोंक रहे हैं। इन सभी ज्योतिषियों की मानें तो भाजपा को सूर्य, राहु, आदि सभी दशाएं ठीक हैं। मूलांक 8, 13, आदि आदि हैं। जो सत्ता, शासन सुख प्रदान करने वाली हैं। वहीं कांग्रेस के मूलांक, फलित ज्योतिष बताते हैं कि इनकी सत्ता से दूरी रहेगी आदि।
है न कमाल की चुनावी और समाजो-सत्ताई विश्लेषण। आप को यकीन हो जाएगा कि कौन जीतने वाले हैं। किस की सत्ता पर ताजपोशी होने वाली है। इन बाबाओं से कोई पूछे कि क्या आपने कभी समाजशास्त्र, चुनाव को मनोविज्ञान, चुनाव को अर्थशास्त्र या फिर मानवीय रूझानों को अध्ययन किया है। भला हो ऐसे विश्लेषकों और ऐसे दर्शकों को जो बड़ी ही चाव से इन्हें देख और परायण कर रहे हैं। 

Friday, December 7, 2018

भाषायी मार



कौशलेंद्र प्रपन्न
कई तरह के मार हम पर पड़ते हैंं। प्राकृतिक, अप्राकृतिक जिसे हम कृत्रिम भी कह सकते हैं। कुछ मार हम खुद पैदा करते हैं और कुछ दूसरों से थोपी जाती हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो इन मारों से हम बचें कैसे? क्या ऐसी कोशिश करें जिससे कि हम इन मारों के काट निकाल सकें।
भाषायी मार भी उक्त मारों में शामिल कर सकते हैं। भाषायी मार से सीधा का मायने यह है कि जो हमारी अर्जित भाषा है उसकी कमाई पूरी जिंदगी खाया करते हैं। यह भाषायी कमाई हमें मेहनत कर के कमाई पड़ती है। हमेशा प्रयास और मेहनत से इसमें इजाफा करना होता है। यदि इन भाषायी संपदा को बढ़ाते नही ंतो हम कहीं न कहीं पिछड़ते चले जाते हैं
हमारी मातृभाषा और प्रथम भाषा के साथ रागात्मक संबंध कई बार मार से बचने और ख्ुद को संभालने में मुश्किलें पैदा करती हैं। इसे इस तरह भी समझ सकते हैं कि भाषा हमें न केवल मांजती है बल्कि हमें बाजार के अनुसार भी तैयार करने में बड़ी भूमिका निभाती है। जो भाषा बाजार में रोजगार और स्वविकास में मददगार साबित होती है उस भाषा को मोलभाव काफी महंगी होती हैं।
भारतीय भाषाएं और अंग्रेजी के बीच हमेशा ही एक तनाव की स्थिति रही है। बनती और बनाई भी जाती है। भाषायी रागात्मक संबंधों की चर्चा उक्त की गई, उसका मायने यह है कि हिन्दी मेरी मातृभाषा है और हिन्दी ही ताउम्र काम करूंगा और हिन्दी को प्रोत्साहित करने में पूरी जिंदगी झोंक दूंगा। लेकिन हम एक बड़े फल्सफे और हक़ीकत से मुंह मोड़ रहे होते हैं।
भाषायी मार छात्रों, प्रोफेशनल्स और जीवन पर भारी पड़ने लगता है। यदि अंग्रेजी उतनी नहीं आती तो प्रोफेशन पर असर तो पड़ता ही है साथ निजी जिंदगी में भी उसका मलाल सालता है। काश अंग्रेजी पर ध्यान दिया होता तो मेरी बाजार गरम होती। मेरी पहुंच और प्रतिष्ठा भी ज्यादा ही होता। लेकिन कई बार दृढ निर्णय और निश्चिय हमें भाषायर मार से बचा सकता है। हमारी हिन्दी व आंचलिक भाषाएं कुछ दूर तक ही हमारा साथ निभा पाती हैं। एक सीमा और पद के बाद हमें अंग्रेजी अपनानी पड़ती है।

Thursday, December 6, 2018

अपेक्षा, उम्मींद, आशा...



कौशलेंद्र प्रपन्न

तीन वर्णों का शब्द है। इसे आशा, उम्मींद आदि नामें से भी पहचानते हैं। बुद्ध ने कभी बहुत खूब कहा था ‘‘ आशा अपेक्षा ही दुख का कारण होता है’’
हम पता नहीं किससे क्या और कितनी उम्मींद कर लेते हैं। और जब पूरे नहीं होते तो दुखी हुआ करते हैं। इस उपजे हुए दुख के लिए शायद वह व्यक्ति दोषी नहीं बल्कि हम हैं जिसने बिना जांचे परखे कि वह अधिकारी है या नहीं? सक्षम है या नहीं? आदि। और हमने उससे ग़लत अपेक्षा कर ली।
हमारे अधिकारी भी ऐसी हो सकते हैं। फर्ज़ कीजिए कोई हिन्दी और संस्कृत का जानकार है लेकिन उससे उम्मींद कर रहे हैं कि वह बेहतरीन अंग्रेजी लिख,बोल पाए। यदि वह व्यक्ति आपकी अपेक्षा पर ख़रा नहीं उतरा तो इसमें उतना दोष उसका नहीं है जिससे आपने उम्मींद की बल्कि आप ज्यादा दोषी हैं जो आपने सुपात्र से अपनी अपेक्षा नहीं की। यहां स्थिति स्पष्ट है वह व्यक्ति अपनी पूरी क्षमता और ताकत लगाकर आपकी अपेक्षाओं पर ख़रा उतरने का प्रयास करेगा। लेकिन आपकी कसौटी पर पूरे न उतर पाएं।
किन्तु जिस पात्र से अपेक्षा की गई यदि वह सफल उनकी नजरों पर नहीं भी हो पाता है तो कोई वजह नहीं कि वह अपनी गति, प्रयास और कोशिश छोड़ दे। जो अपने लक्ष्य को ध्यान में रखेंगे वो अपने रास्ते से भटक सकते। जो रचेगा वो कैसे बचेगा, जो बचेगा वो कैसे रचेगा? श्रीकांत वर्मा की पंक्ति उन्हें ताकत दे सकती है। यदि आप कोशिश करते हैं तो वह आज नहीं कल पहचानी भी जाएगी।

Wednesday, December 5, 2018

अप्राकृतिक प्रसव पीड़ा



कौशलेंद्र प्रपन्न
अस्पताल का कमरा। कमरे में चारों ओर प्रसव पीड़ा की कराह। कोई तेज आवाज में कराह रहा है तो कोई धीरे धीरे। लेकिन सब की पीड़ा एक सी है। स्तर एक है। दर्द समान है। किसी के हाथ में दवाई की बॉटल लगी है। चढ़ रही है नसों में दवाई। पेट पर बंधा है एक बेल्ट। जो सामने रखे मोनिंटर पर दिखाता है कितना दर्द है? दर्द का स्तर कितना है? बार बार नर्स देख जाती है। कई बार टंगी बॉटल को कम ज्यादा कर जाती है। पूछने पर कि और कितना समय लगेगा? बस इतना बताती है- देखिए अभी तो 30 40 की लेबल का दर्द का। ये कम से कम 150 होना चाहिए या उससे भी ज्यादा। मुंह भी अभी तो कम ही खुला है। ये भी दस ये पंद्रह सेंटीमीटर होना चाहिए। इंतजार कीजिए।
बगल वाली बेड की महिला को तुरत फुरत में लेबर रूम ले जाया गया। पास वाली महिला अपने दर्द के स्तर के बढ़ने के इंतजार में है। कब बढ़े तो लेबर रूम जाएं। दर्द की कभी बढ़ता है और कभी घट जाता है।
आधी रात से वो परेशान है। पानी की थैली ही कोई आधी रात में फट चुकी है। पानी रूकने का नाम नहीं ले रहा है। कल शाम की तो बात है। डॉक्टर ने देखा, जांचा और कहा अभी तो हप्ता समय है। लेकिन रातों रात क्या हुआ और भोर में ही अस्पताल आना पड़ा।
डॉक्टर ने देखते ही भर्ती कर लिया। पानी चढ़ाया जाने लगा। दवाई भी। अप्राकृतिक दर्द उठाया जाने लगा। देखते ही देखते वो दर्द से पड़पने लगी। तड़पने लगी। लेकिन दर्द और मुंह का खुलना डॉक्टर के अनुसार अभी कम था। सो इंतजार में वो तड़पती रही। पास में न ननद, न देवर, न सास, न बहन कोई भी तो नहीं था। अगर था तो बस एक पति। जो लगातार नर्स से लड़ झगड़कर वहीं का वहीं बेशर्म सा खड़ा रहा। कई बार बीच बीच में बाहर चला जाता जब वह देख और सह नहीं पा रहा था अपनी प्रिये के छटपटाहटों को। अप्राकृतिक दर्द को नजरअंदाज नहीं कर सकता था।
सुबह से दोपहर और दर्द का पैरामीटर अभी भी डॉक्टर के अनुसार कम। वो थी कि तड़प रही थी। न देखा जाए और न सहा जाए। मुंह था कि वो भी खुलने का नाम नहीं ले रहा था। अंदर बच्चे की भी चिंता की कहीं वो स्ट्रेस में न आ जाए।
मालूम नहीं पति ने ही निर्णय लिया। डॉक्ठर को फोन किया मैडम। आप तो जानती हैं। दर्द है कि रूकने का नाम नहीं ले रहा है। वो है कि अप्राकृतिक दर्द में पछाड़े खा रही है। ऐसे कीजिए ऑपरेशन करना चाहिए। जब डॉक्टर सामने आईं तो पहले उसे देखा और पति के कंधे पर प्यार और विश्वास से भरे हाथ रखे और कहा ‘‘बहुत प्यार करते हो। इसलिए निर्णय ने रहे हो।’’ पति ने कहा ‘‘ पति नाते कम एक इंसान होने के नाते मुझे लगता है कि हमें ऑपरेशन वाले विकल्प को चुनने में कोई हर्ज नहीं। हालांकि डॉक्टर लगातार संपर्क में थीं। उन्होंने कहा था ‘‘मैं इंतजार कर रही हूं कि नॉर्मल किया जाए। लेकिन अब जांच के बाद मालूम चला कि नॉर्मल संभव नहीं। बच्चे के चेहरा उल्टा है और नाल भी क गया है। सो हमें ऑपरेशन की करना पड़ता।’’
कैसी पीड़ होती है अप्राकृतिक प्रसव की शायद दुनिया मर्द न जान पाएं और न ही महसूस कर सकें। पुरुष यदि कुछ कर सकता है तो बस निर्णय ले सकता है। सहानुभूति के बोल छिड़क सकता है। अगर आपको गुमान है कि आप पिता हैं, आपको बच्चे से ज्यादा लगाव है तो कभी मौका मिले तो प्रसव पीड़ा से भरे उस रूम में जाईए महसूस कीजिए की पत्नी किस किस्म की पीड़ा से गुजर रही है। स्वभाविक प्रसव हो तो ठीक वरना इस ठसक के साथ न तने रहें कि हमारे खानदान में तो किसी का भी ऑपरेशन से बच्चा नहीं हुआ। देखिए महसूस कीजिए और स्वविवेक का प्रयोग शायद एक पीड़ा से तड़प् रही स्त्री को राहत दे जाए।

Tuesday, December 4, 2018

दम तोड़त रिश्ते


कौशलेंद्र प्रपन्न
कुछ रिश्ते राह में दम तोड़ देते हैं। कहते हैं हम रिश्ते बनाया करते हैं। पूरी शिद्दत से उसे निभाने और बचाने की कोशिश करते हैं। लेकिन कुछ तो बीच राह में घट जाता है जिसकी वजह से वे रिश्ते कभी भी कहीं भी दम तोड़ सकते हैं। संभव है रिश्ते के टूटने व टूट जाने के पीछे कई वजहें रहा करती होंगी। साथ ही जब हम कुछ अनुमान से ज़्यादा उम्मींदें लगा बैठते हैं तब भी रिश्ते उस बोझ तले धीरे धीरे घूट घूट कर पिघलने लगते हैं और एक दिन वे रिश्ते पानी बन हमारे बीच से बह जाया करते हैं।
समाज ही है जहां हम अपने आस-पास के लोगों से रिश्ते बनाया करते हैं। और वही समाज होता है जहां हम कई बार अनजाने में रिश्तों को टूटने के कगार पर ला खढ़ा करता हैं। वजहें बहुत सी हैं लेकिन जो महत्वपूर्ण बात है वह यह है कि हम शायद रिश्तों का कद्र करना नहीं जानते। एक व्यक्ति दूसरे पर जान छिड़का करता है लेकिन वहीं दूसरे को इसका एहसास तक न हो तो कोई कब तक एक तरफा रिश्ते को बांधने में लगा रहेगा।
एक तो आज कल रिश्तों में लोग विश्वास नहीं किया करते। उस पर तुर्रा यह है कि रिश्तों की नजाकत को हम उठा नहीं पाते। कब कौन बीच राह में मुंह सुजाकर अपने राह हो ले। कुछ भी तय नहीं कहा जा सकता। बस कुछ किया जा सकता है तो बस इतना ही कि अपनी ओर से टूटते रिश्तों को कैसे भी बचाया जाए।

Sunday, December 2, 2018

हमसे स्कूल दूर या स्कूल से बाहर हम


कौशलेंद्र प्रपन्न

कैसा सवाल है। यह सवाल कितना उलझ हुआ सा लगता है। लगता है बच्चे इन्हीं सवालों में अपनी जिं़दगी का बड़ा हिस्सा शिक्षा की मुख्यधारा से बाहर काट देते हैं। दरअसल शिक्षा से ये बाहर नहीं हैं बल्कि शिक्षा को इनसे बेदख़ल कर दिया है। हालांकि वैश्विक स्तर पर संयुक्त राष्ट्र संघ बाल शिक्षा अधिकार अधिवेशन 1989 में हमने विश्व के तमाम बच्चों को कुछ अधिकार देने की वैश्विक घोषणा पत्र पर दस्तख़त किए थे। माना गया कि उन अधिकारों में विकास का अधिकार, सहभागिता का अधिकार, सुरक्षा का अधिकार, जीवन जीने का अधिकार प्रमुखता से शामिल किया गया। यदि इन घोषणाओं की रोशनी में उन बच्चों पर नजर डालें जो दिव्यांग या विशेष बच्चे हैं, तो जमीनी हक़ीकत हमें सोने न दे। हम ऐसे बच्चों के विकास के रास्ते में आने वाली अड़चनों को सामान्य बच्चों के तर्ज पर देखने, समझने की कोशिश करते हैं। यहीं से वे बच्चे हमारे सामान्य स्कूली शिक्षा की परिधि से बाहर होते चले जाते हैं। ‘‘तारे जमीन पर’’ फिल्म बड़ी ही शिद्दत से एक बच्चे के बहाने उन तमाम बच्चों की परेशानियों को उजागर करती है। उस स्कूल का प्रिंसिपल उन अन्य पिं्रसिपल से अगल नहीं सेचता वह भी निर्णय लेता है कि इस बच्चे के विशेष स्कूल में डाल देना चाहिए आदि। जबकि शैक्षिक नीतियां और तमाम फ्रेमवर्क वकालत करती हैं कि दिव्यांग बच्चों को महज उनके किसी ख़ास दिव्यांगता की वजह से शिक्षा के सामान्यधारा से विलगाना अनुचित है। उन्हें भी सामान्य स्कूलों में सामान्य बच्चों के साथ तालीम हासिल करने का अधिकार है। इन्हीं तर्कां की रोशनी में माना गया कि सामान्य स्कूलों को इन बच्चों के पहुंच के अनुरूप तमाम सुविधाएं मुहैया कराना नागर समाज की जिम्मेदारी और जवाबदेही बनती है। दूसरे शब्दों में कहें तो लाइब्रेरी, शौचालय का नल, वॉश बेशीन, टोटी, सीढ़ियां आदि पहुंच में होने चाहिए ताकि बच्चे अपनी आयु, वर्ग के अनुसार स्कूल की अन्य सुविधाओं के इस्तमाल में किसी औरे के सहारे के मुंहताज़ न रहें। किन्तु हक़ीकतन यह कहते हुए अफ्सोस ही होता है कि जो सुविधाएं स्कूल प्रशासन और शिक्षा विभाग को प्रदान करने थे उसमें हम अभी भी काफी पीछे हैं। ऐसे बच्चे चाहकर भी स्कूल के विभिन्न साधनों का प्रयोग अपने लिए नहीं कर पाते। उन्हें यह सुना दिया जाता है बच्चे तुम नीचे ही रहा करो। ऊपर चढ़ना तुम्हारे लिए आसान नहीं है।

शिक्षकीय दुनिया की कहानी के पात्र

कौशलेंद्र प्रपन्न ‘‘ इक्कीस साल के बाद पहली बार किसी कार्यशाला में बैठा हूं। बहुत अच्छा लग रहा है। वरना तो जी ...