Friday, September 11, 2015

अपने अतीत से टकराती हिन्दी


कौशलेंद्र प्रपन्न
आधुनिक समय में हमारी भाषा, संस्कृति और शिक्षा एक गहरे संकट के तौर से गुजर रही है। संभव है पाठाकों को लग सकता है कि आलेया की शुरुआत ही नकारात्मक वाक्य और स्थापनाओं से हो रही है। कम से कम सकारात्मक सोच के साथ बात कही जाती। भारतीय भाषाओं उसमें भी हिन्दी की यदि जमीनी तल्ख हकीकत यही है तो क्या हम इस सच्चाई को देखते हुए भी आंखें मूंदे रह सकते हैं? क्या हम उस कठोर सच को नकार सकते हैं जिससे ख़ासकर हमारी तमाम भारतीय भाषाएं भोग रही हैं। हमारी हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं को सबसे बड़ी चुनौती बाहर से नहीं मिली, बल्कि हमारे भारतीय शासकों और नीति नियंताओं की ओर से ही मिली। यदि भारतीय भाषाओं के लिए मील का पत्थर कोई निर्णय व नीति बनी तो वह राजभाषा अधिनियम 1963 है। इस राजभाषा अधिनियम ने भारतीय भाषाओं की चैहद्दी तय कर दी। इतनी ही नहीं बल्कि हिन्दी भाषा के साथ अंग्रेजी को अटैच्मेंट फाईल की तरह नत्थी की दी गई। जो आज तक अलग नहीं हो पाई। यह अलग विमर्श का मुद्दा हो सकता है कि शुरू में तो पंद्रह साल का समय सीमा तय किया गया था लेकिन वस्तुस्थिति यह है कि आज भी हमारी हिन्दी उसी राह पर चल रही है जो 1963 में रास्ते बनाए गए थे। भारतीय भाषा और हिन्दी के जानकार एवं भाषाविद्ों की दृष्टि में यह 1963 का राजभाषा अधिनियम काफी हद तक हमारे नीति नियांताओं की नियति की ओर स्पष्ट संकेत करता है। दरअसल इस टर्निंग प्वाइंट से हिन्दी की भूमिका और स्थिति एक नई दिशा में मुड़ती है। इस पर व्यापक और विस्तृत विमर्श यहां अपेक्षित है जो आगे किया जाएगा। लेकिन क्या नागर समाज भाषा की हमारी जिंदगी से हाशिए पर सिमटते जाने की सच्चाई से विचलित नहीं होना चाहिए? क्या भाषा के संरक्षण और संवर्धन के लिए हमें आगे आने की आवश्यकता नहीं है आदि कुछ ऐसे सवाल हैं जो हमारे कंधे पर सवार हैं उन्हें उतार कर फेंका नहीं जा सकता।
भाषा की मरने की ख़बरें दुनिया के तमाम कोनों से आती ही रही हैं। जो भी भाषा से जुड़े हैं उन्हें भाषा के मरने की आहट सुनाई देती होगी। लेकिन उन्हें बिल्कुल इससे कोई फर्क नहीं पड़ता होगा जो महज भाषा की रोटी खाते होंगे। भाषा जिंदा रहे या मरे उन्हें हर साल विदेश भ्रमण का मौका मिलता रहे। हिन्दी भी भारतीय भाषायी परिवार एक सदस्या है। इसकी स्थिति भी कोई बहुत अच्छी नहीं मानी जा सकती। यदि हम भाषा के वृहत्तर परिवार की बात करें तो आज की तारीख में विश्व की कई भाषाएं या तो मर चुकी हैं या मरने की कगार पर खड़ी हैं। अफसोस की बात तो यही है कि उसे बचाने की चिंता सरकारी प्रयासों पर छोड़ दिया गया है। ताज्जुब तो तब और ज्याद होता है जब हम सरकारी दस्तावेजों और आयोगों में भी हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं को एक ख़ास किस्म की नीति के तहत होते बर्ताव को देखते हैं। इस दृष्टि से विमर्श करें तो 1963 की राजभाषा अधिनियम भाषा के साथ होने वाले दोयम दर्जंे के व्यवहार की परते खोलती हैं। आजादी से पहले और उसके बाद भी हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं के साथ उपेक्षापूर्ण बर्ताव ही किया गया है। आश्चर्य हो सकता है कि आजादी के बाद कई सारे आयोग और समितियों का गठन किया गया। शिक्षा की बेहतरी के लिए भी आजादी पूर्व से लेकर आजादी के पश्चात भी आयोग और नीतियां बनाई गईं। उन आयोगों और नीतियों में भाषा के नाम पर त्रिभाषा सूत्र तो पकड़ा दिया गया। यह एक कैसी विचित्र बात है कि देश के समग्र विकास की डफली बजाने वालों को कभी भी भाषा -नीति बनाने की चिंता ही नहीं सताई। यदि सरकारी पहलकदमी पर नजर डालें तो हमारे पास 1963 की राजभाषा अधिनियम ही है जिसमें सच पूछा जाए तो न केवल हिन्दी के साथ बल्कि अन्य भारतीय भाषाओं के साथ भी गंदा मजाक सा ही किया गया है। लेकिन इस सच और अतीतीय यथार्थ को हम नहीं बदल सकते। हां हम जो कर सकते हैं वह यही हो सकता है कि अभी भी हमारे पास समय है यदि हम चाहते हैं कि हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं को बचा लें तो उसके लिए सरकारी के साथ ही हमारी सांस्थानिक और व्यक्तिगत प्रयास भी अपेक्षित है।
किसी भी देश की सरकारी कामकाज की भाषा कौन सी हो यह उस देश की भाषायी अस्मिता की ओर इशारा करता है। जिस भाषा में देश की सरकारी महकमा कर करती है उस भाषा की सत्तायी ताकत और मान का अनुमान लगाना कठिन नहीं है। हिन्दी को भारत की राजभाषा के रूप में 14 सितंबर 1949 को स्वीकार किया गया। यह जानना भी बड़ा दिलचस्प होगा कि इसके बाद संविधान में राजभाषा के संबंध में धारा 343 से 352 तक की व्यवस्था की गई। धारा 343 ‘1’ के अनुसार भारतीय संघ कह राजभाषा हिन्दी एवं लिपि देवनागरी होगी। साथ ही यहां यह भी स्पष्ट किया गया है कि संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतरराष्टीय स्वरूप यानी 1,2,3 आदि होगा। यहां यह भी जानते ही चलें कि संसद का कार्य हिन्दी में या अंग्रेजी में किया जा सकता है। इस सकता है को विशेष संदर्भ में समझने की आवश्यकता है। परन्तु राज्यसभा के सभापति महोदय या लोकसभा के अध्यक्ष महोदय विशेष परिस्थिति में सदन के किसी सदस्य को अपनी मातृभाषा में सदन को संबोधित करने की अनुमति दे सकते हैं। किन प्रयोजनों के लिए हिन्दी का प्रयोग किया जाना है, किन के हिन्दी हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं का प्रयोग आवश्यक है और किन कार्यों के लिए अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया जाना है? यह राजभाषा अधिनियम 1963, राजभाषा नियम 1976 और उनके अंतर्गत समय समय पर राजभाषा विभाग, गृहमंत्रालय की ओर जारी किए गए निर्देशों द्वारा निर्धारित किया गया है। गौरतलब है कि अनुच्छेद 343 में जिसका प्रावधान किया गया है उसके पीछे की मनःस्थिति को समझने की अवश्यकता है। खंड़ 1 में कहा गया है कि इस संविधान के प्रारंभ से पंद्रह वर्ष की अवधि तक संघ के उन सभी शासकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया जाता रहेगा जिनके लिए उसका ऐसे प्रारंभ से ठीक पहले प्रयोग किया जा रहा था।
राजभाषा अधिनियम 1963 पर राजनीतिक धड़ों में काफी हंगामा हुआ। विद्वानों और सांसदों के विरोध को देखे हुए इस अधिनियम में संशोधन किया गया जो 1967 में हमारे सामने आया। वास्तव में यह अधिनियम हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं के पक्ष को झिझला करने वाला था। इसमें कई धाराएं और उपधाराओं में एक खास मानसिकता को बहाया गया। एक धारा 3 की उपधारा 5 के क्या मायने है वो आपके सामने नजीर पेश करना चाहता हूं- ‘‘अंग्रेजी भाषा का प्रयोग समाप्त कर देने के लिए ऐसे सभी राज्यों के विधानमंडलों द्वारा, जिन्होंने हिन्दी को अपनी राजभाषा के रूप में नहीं अपनाया है, संकल्प पारित नहीं कर दिण् जते और जब तक पूर्वाेक्त संकल्पों पर विचार कर लेने के प्श्चात् ऐसी समाप्ति के लिए संसद हर सदन द्वारा संकल्प पारित नहीं किया जाता।’’ यदि हमें इन पंक्तियों और शब्दों के बीच के पर्दं करे उठाया जाए तो वह छवि कुछ इस तरह की उभर सकती है कि अधिनियम अंग्रेजी को सदा के लिए राजकाज की भाषा बनाए रखने का निर्णय प्रस्तुत करता है। यहां जिस तरह से कहा गया है उससे एक बात तो स्पष्ट होती है कि अंग्रेजी केवल तभी छोड़ी जाएगी जब हरेक राज्य की विधान सभ्ज्ञा उसे छोड़ने का संकल्प ले लेगी। इस बात का कोई महत्व नहीं है कि हिन्दी के पक्ष में कितने राज्य हैं। यहां अहम यह हो जाता है कि अंग्रेजी के पक्ष में एक भी राज्य हो तो अंग्रेजी चलती ही रहेगी। ख़ास बात यह भी है कि बेशक हिन्दी चले या अन्य भारतीय भाषाएं हाशिए पर बिलबिलाती रहें। ध्यान देने की बात यह भी है कि लोकतंत्र में यह उम्मीद रखना ही व्यर्थ है कि समाज और देश में किसी मुद्दे को लेकर पूर्ण मतैक्य हो। यह कल्पना ही अजीब लगती है कि हम यह आशा लगाए बैठे हैं कि हरेक राज्य अंग्रेजी के उपर हिन्छी को वरीयता मुहैया करा देंगे। जबकि सूक्ष्मता से देखा जाए तो त्रिभाषा सूत्र जो कि केंद्रीय सरकार की समिति की स्थापना और सिफारिफ थी, को ही कुछ राज्यों ने अपनाने से इंकार कर दिया। दुखद बात है कि आज भी उन राज्यों का बर्ताव हिन्दी के प्रति वही है। ऐसी स्थिति मेें कैसे सोचा जा सकता है कि सभी राज्य अंग्रेजी छोड़ने को तैयार होंगे। 

संसदीय समिति की रिपोर्ट पर संसद में बहस हुइ।फ तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री जवाहर लाल नेहरू द्वारा आश्वासन किया गया कि अंग्रेजी को सह-भाषा के रूप में प्रयोग में लाए जाने हेतु व्यावधान उत्पन्न नहीं किया जाएगा और न ही इसके लिए कोई समय-सीमा ही निर्धारित की जाएगी। भारत की सभी भाषाएं एमान रूप से आदरणीय हैं और ये हमारी राष्टभाषाएं हैं। गौरतलब है कि अनुच्छेद 343 ‘3’ के प्रावधान व श्री जवाहर लाल नेहरू के आश्वासन को ध्यान में रखते हुए राजभाषा अधिनियम बनाया गया। इसके अनुसार हिन्दी संघ की राजभाषा व अंग्रेजी सह-राजभाषा के रूप में प्रयोग में लाई गई। यदि हम इनकी भाषा और शब्दों में गौर करें तो एक बात स्पष्ट नजर आती है कि हिन्दी की स्वतंत्र सत्ता को बड़ी ही होशियारी कमतर की गई। अंग्रेजी को साथ साथ साझा सत्ता प्रदान करने की कोशिश की गई। माना जाता है कि राजभाषा अधिनियम एक तरह से हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं के साथ एक छल था। क्योंकि इस अधिनियम को शब्द दर शब्द पढ़ें तो सरकार की मनसा साफ क्या थी वह नजर आती है। लोकतंत्र के तीनों स्तम्भों की राजकाज की भाषा हिन्दी के साथ ही साथ अंग्रेजी को भी रखी गई। हिन्दी को अनुवाद का दर्जा दिया गया। दूसरे शब्दों में कहें तो न्यायपालिका, कार्यपालिका की भाषा मूलतः हिन्दी नहीं रखी गई। बल्कि मूल आदेश, निर्देश अंग्रेजी में लिखे गए और उनका आवश्यकतानुसार हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद करने का प्रावधान किया गया।
यदि हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं जितनी हानि राजभाषा अधिनियम से हुई उतनी शायद हिन्दी साहित्य के इतिहास में कहीं नहीं मिलता। दरअसल हिन्दी को अनुवाद और अंग्रेजी के कंधे पर बैठाकर सब्जबाग दिखाने की कोशिश राजनीतिज्ञों की ओर हुई। इसी का परिणाम है कि इस अधिनियम में वर्णित हिन्दी के विकास और संवर्धन के लिए सरकारी प्रयास जारी रहेंगे। साथ ही हिन्दी में सरकारी स्तर पर काम हो इसके लिए हिन्दी प्रशिक्षण कार्यशाला और प्रशिक्षण केंद्रों की स्थापना भी की गई। यह अलग विमर्श का मुद्दा है कि उन संस्थानों में किस प्रतिबद्धता और उद्देश्य प्राप्ति के लिए प्रशिक्षण दिए जाते हैं। दूसरी बात यह कि उन सरकारी हिन्दी प्रशिक्षण कार्यशालाओं में किस किस्म के और कितनी शिद्दत से सीखने की लालसा प्रतिभागी आ पाते हैं। यह विचारणीय सवाल है कि उन प्रशिक्षण कार्यशालाओं की कार्य योजना और उद्देश्यों की डिजाइनिंग पर काम होता है। क्या प्रशिक्षण के लिए पाठ्यक्रम बनाते वक्त प्रतिभागियों की आवश्यकताओं का विश्लेषणादि भी होता है या एकतरफा पाठ्यक्रम निर्माण कर सीधे सीधे प्रशिक्षण कक्ष में उतार दिया जाता है। अमूमन यह देखा गया है कि इस तरह के कार्यशालाओं में विषय विशेषज्ञों के चयन भी बहुत गंभीरता से नहीं किया जाता। दोनों ही पक्ष इस मनोदशा से आते हैं कि इन्हें आने के पैसे मिल रहे हैं और हमें यहां आकर सुन लेने भर के। उनका ध्यान और उद्देश्य इस बात की ओर अव्वल तो जाता ही नहीं है कि कार्यशाला का उद्देश्य क्या है और किस तरह से पाठ्यक्रम को बनाया गया है। क्योंकि सरकारी आदेश पालक होते हैं इस तरह के कार्यशालाओं में तो वे उसी मानसिकता से आते हैं। एक और मुख्य मुद्दा यह भी है कि जिन्हें कार्यशाला में प्रशिक्षण दिया गया क्या कोई ऐसी प्रक्रिया होती है जिससे यह जांचा जा सके कि जो इन्हें दिया गया उसका कितना भाग उन तक पहुंच पाया? दूसरा जिन्हें हमने प्रशिक्षण कार्यशाला में बुलाया क्या उन्हें दुबारा बुला कर यह देखने की कोशिश व योजना बनाते हैं कि उन्हें व्यवहारिक स्तर पर अमल में लाने में परेशानी हो रही है तो किस स्तर की। किसी भी प्रशिक्षण कार्यशाला की सफलता की बुनियाद दो बातों पर खासे निर्भर होती है। पहला, क्या हमने प्रतिभागियों की आवश्यकता विश्लेषण किया कि उन्हें किस चीज की और किस स्तर की ज्ञान व समझ देना है। दूसरा जो हिन्दी की समझ व ज्ञान देने का प्रयास कार्यशाला में किया गया उसका फाॅलोअप करने की रणनीति व योजना है या नहीं? इन दोनों ही स्तरों पर सरकारी हिन्दी प्रशिक्षण कार्यशालाएं अमूमन असफल साबित होती हैं।
हिन्दी की राह में तकनीक रोड़े
आज की तारीख में हिन्दी को सबसे बड़ी और धारदार चुनौती किसी से मिल रही है तो वह है तकनीक। हिन्दी और हिन्दी को बरतने वालों के आगे तकनीक कई बार ऐसी स्थिति पैदा कर देती है कि हम समय के साथ चल पाने में खुद को पीछे पाते हैं। दूसरे शब्दों में देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में 2000 और 2005 के आस पास हिन्दी विभाग से लेकर तमाम विभागों में सूचना तकनीक से लैस करने के लिए डेस्क टाॅप मुहैया कराए गए थे। लेकिन अफसोस की बात है कि कई विश्वविद्यालयों के विभागों मंे वे ज्यों के त्यों रखे रहे, क्योंकि उसका इस्तमाल कैसे किया जाए इसकी कमी थी। दूसरी स्थिति यह रही कि जो पुरानी पीढ़ी के हिन्दी के विद्वान हैं उन्हें आज की आधुनिक तकनीक इस्तमाल करने में खासे परेशानी होती है। हिन्दी की इसी दुनिया में एक बड़ा वर्ग अभी है जो कागज-कलम से आगे नहीं निकल पाया है। वेब मैग्जीन, जर्नल्स, पत्रिकाओं ई-पत्रिकाओं की दुनिया में भी हम आज मुद्रित दुनिया में ही सांस लेना चाहते हैं। ऐसे में हिन्दी और हमारी पहंुच सीमित पाठकों तक होगी। जबकि हिन्दी को वैश्विक पटल पर लाना है तो एक माध्यम तकनीक भी है जिसके मार्फत हिन्दी को पलक झपकते ही एक कोने से दूसरे कोने तक प्रसारित कर सकते हैं। यदि ठहर कर विमर्श करेें तो तकनीक ने एक ओर प्रकाशकों की एकछत्र राज्य को तोड़ा है। प्रकाशन की दुनिया में सत्ता का विकें्रदीकरण हुआ है। यह अलग बात है कि इससे कहीं न कहीं प्रकाशित सामग्री की गुणवत्ता भी प्रभावित हुई है। क्योंकि समुचित संपादन हीनता की स्थिति में प्रकाशित रचनाओं में संपादन से लेकर कई स्तरों पर खामियां रह जाती हैं। हिन्दी को वैश्विक बनाने में कई युवा पीढ़ी तो तकनीक में विधा में दक्ष हैं वे हिन्दी को सूचना प्रौद्योगिकी के साथ तालमेल बैठाने कीे कोशिश कर रहे हैं। यू ट्यूब से लेकर अन्स वेब साइट्स हैं जो हिन्दी में पर्याप्त गुणवत्तापूर्ण सामग्रियों को न केवल पाठकों के सामने परोस रहे हैं बल्कि पुरानी पीढ़ी के रचनाकारों की रचनाओं को एक स्थान पर संरक्षित कर रहे हैं। इस दृष्टि से देखें तो
ीजजचरूध्धंअपजंावेीण्वतहध् ीजजचरूध्ध्ेूंतहअपइींण्पदध् ीजजचरूध्ध्ूूूण्ीपदकपेंउंलण्बवउध् ीजजचरूध्ध्ूूूण्ीपदकपेंीपजलंण्वतहध् ीजजचरूध्ध्ूूूण्रंदातपजपचंजतपांण्बवउध्ीजजचरूध्ध्ूूूण्हंतइींदंसण्बवउध् ीजजचरूध्ध्ूूूण्रंदापचनसण्बवउध्
यहां न तो सूची उपलब्ध कराना मक्सद और न ही किसी साइट का प्रचार करनाहै। बल्कि एक झलक प्रस्तुत करना है कि इन साइटों पर काफी अच्छी और रोचक सामग्री जो मिलती हैं वो कहीं न कहीं हिन्दी को बढ़ाने और संरक्षित करने में जुटी हुई हैं। इन साइटों के अलावे कई प्रसिद्ध ब्लाॅग हैं जो प्रकारांतर से हिन्दी और भाषा के संवर्धन में अपना सकारात्मक सहयोग दे रही हैं। इन ब्लाॅग्र्स में न केवल पत्रकार, कवि, लेखक, कलाकार शामिल हैं बल्कि एक आम सचेत पाठक भी काफी अच्छी सामग्री हिन्दी में हिन्दी के विकास में प्रदान कर रही हैं। आज कई रोज़ाना अख़बार किसी ने किसी के ब्लाॅग से सामग्री चुन कर अपने अख़बार में छापते हैं जिसके लिए वे लेखक को भुगतान भी करते हैं। यानी कहीं न कहीं तकनीक ने लिखी हुई सामग्री को वैश्विक बनाने में अपना योगदान दे रही है। अब आवश्यकता इस बात की है कि हमें तकनीक के साथ मिल कर हिन्दी को आगे लेकर जाना है।
मीडिया के आंगन में हिन्दी
मीडिया की हिन्दी व मीडिया में किस तरह की हिन्दी बरती जा रही है इस पर विचार अपेक्षित है क्योंकि इसके आंगन में जैसी हिन्दी उठती बैठती है उसका असर आस-पड़ोस में भी दिखाई देता है। यानी वह हिन्दी न केवल अकादमिक बहसों में जगह लेने लगती हैं बल्कि बोलचाल में तो अपनाई जा चुकी होती है। मीडिया यानी श्रव्य-दृश्य दोनों ही माध्यमों की हिन्दी को देखना रखना होगा। किन्तु यहां विस्तार में जाना विषयांतर होगा इसलिए हम यहां रेडियो, न्यूज चैनल, अखबार और पत्रिकाओं पर चलते चलते विमर्श करेंगे। एक ओर हमारे पास मिडियम वेब पर प्रसारित होने वाले समाचार हुआ करते थे जिसे सुनने के लिए गांव-घर में लोग पौने आठ का इंतजार किया करते थे। समाचार वाचक की भाषा और उसका उच्चारण मानक माना जाता था। युवा पीढ़ी को कहा जाता था कि हिन्दी सीखनी हो तो समाचार चुना करों काफी हद तक अभी भी आकाशवाणी के समाचार प्रभाग इस स्तर को बनाए हुए हैं। वहीं बीबीसी, में कभी आंेकारेश्वर पांडे से समाचार सुनिए आवाज को आंख बंद कर भी पहचान लिया करते थे। लेकिन रेडियो की भाषा और हिन्दी के स्तर में गिरावट तब दर्ज की जाने लगी जब निजी चैनलों की बाढ़ सी आ गई। उनके यहां हिन्दी को छौंक के तौर पर इस्तमाल किया जाता है। हर वाक्य में दो तीन शब्द हिन्दी के और बाकी अंग्रेजी के शब्द हुआ करते हैं। ऐसे में युवा पीढ़ी यदि हिन्दी सुननी भी चाहे तो कहां सुने। क्योंकि रेडियो माने एफएम हो चुका है। आज की तारीख में अमूमन आकाशवाणी के कार्यक्रम शहरों में बहुत कम ही सुने जाते हैं। इस अवसर का लाभ उठाते हुए निजी रेडियो चैनल पर खुलआम हिन्दी की परते उतारी जा रही हैं। जिस तरह के हिन्दी के व स्थानीय बोलियों का इस्तमाल किया जाता है उसे सुन कर महसूस होता है यह किस रूप में ढली हिन्दी का संकेत है। यही स्थिति दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले समाचार के बारे में कही जा सकती है। दूरदर्शन के समाचार प्रस्तोता की भाषा और हिन्दी की समझ के साथ ही भाषायी मानकता को भी तवज्जो दिया जाता था। ठीक यही हाल निजी न्यूज चैनलों में कुछ समाचार प्रस्तोता की छोड़ दें तो बाकी न्यूज चैनज की हिन्दी बड़ी ही झिझली हो चुकी है। समाचार प्रस्तोता या संवाददाता जब ग्रहमंत्री बोलता है, प्रस्तोता बोलता और टीकर पर स्त्रोत स्रोत के स्थान पर लिखता और बोलता है तो माथा डनक जाता है। यह तो न्यूज चैनल की बात हुई। जब हम अखबारों की बात करते हैं तो यहां तो कूप में ही भंग पड़ौं हैं। हिन्दी का एक ऐसा अखबार है जिसे राजेंद्र माथुर, एम पी सिंह, दीनानाथ मिश्र, राजकिशोर विद्या निवास मिश्र जैसे संपादकों और लेखकों का संसर्ग मिला लेकिन आज उसकी हिन्दी देख कर रोना ही आता है। क्योंकि जिसका मासहेड तक अंग्रेजी हो चुकी है। इस अखबार की कोई भी खबर की हेडिंग में दो तीन शब्द हिन्दी की होती वह भी सहायक क्रिया व कर्म के रूप में बाकी अंग्रेजी के शीर्षक होते हैं। कहा जाता है कि जितनी हानि अखबारों में हिन्दी की हुई है उसका एक बड़ा हिस्सा इस अखबार का है। यह एक अलग अखबार नहीं है बल्कि आज की तारीख में सहज और सरल हिन्दी आम फहम की हिन्दी का तर्क देकर और भी अखबार इसी राह पर चल रहे हैं। हालांकि शुद्धतावादी दृष्टिकोण एक जगह है और मिश्रित भाषा का विकास दूसरी बात है। लेकिन शुद्धता के नाम पर कहीं हम ऐसी हिन्दी का निजात तो नहीं करना चाहते जो सिर्फ किताबों और विद्वानों की भाषा हुआ करती है। यदि वैसी हिन्दी विकसित करना चाहते हैं तो वह एक सीमित वर्ग की पसंदीदा तो हो सकती है वह एक बड़े जनसमूह की भाषा नहीं हो सकती।
स्कूल में हिन्दी की टकराहट
स्कूलों में बच्चों की हिन्दी जिस तरह से सीखाई जा रही है उसे देख-पढ़कर घोर निराशा ही होती है क्योंकि यहां पर सिर्फ पाठ्यपुस्तकों को पूरा कराने पर ज्यादा जोर होता है। जैसे तैसे आठवीं तक बच्चे हिन्दी पढ़ते हैं लेकिन आंठवीं में उन्हें विकल्प दे दिया जाता है कि चाहे तो विदेशी भाषा ले सकते हैं। बस यहीं पर एक भूल करते हैं। बच्चे अभिभावकों की चाह को पूरा करने के पीछे विदेशी भाषा चुनते हैं और हिन्दी पीेछे रह जाती हैं। स्कूल की हिन्दी बस खानापूर्ति से ज्यादा नहीं लगती। इन पंक्तियों के लेख को कम से कम 200 स्कूलों में भाषा-शिक्षण निरीक्षण और मूल्यांकन के साथ ही जहां हिन्दी शिक्षण की स्थिति को करीब सो देखने समझने का अवसर मिला। स्वयं हिन्दी के शिक्षकों/शिक्षिकाओं की लेखन, वाचन के स्तर पर वर्तनी के लेकर उच्चारण तक की खामियां देखने को मिलीं। हिन्दी की बारीक बुनावट को लेकर खुद शिक्षकों की भ्रांतियां बरकरार थीं। यदि तटस्थ हो कर देखें तो उसमें उन शिक्षकों की कमी ज्यादा नहीं थी। बल्कि वे संस्थाएं, शिक्षक ज्यादा दोषी हैं जिनके कंधों पर हिन्दी शिक्षण का कार्य सौंपा गया था। एक बच्चा प्राथमिक कक्षा में जिस तरह की भाषायी कमजोरियों को लेकर आगे की कक्षाओं में जाता है वह उसकी जिंदगी भर की कामई होती है। लेकिन इन कमियों को दूर भी किया जा सकता है यदि हमारी इच्छा और आवश्यकता हो। जब हिन्दी को आठवीं कक्षा में ही विकल्प के तौर पर पेश किया जाता है तो काॅलेज के स्तर तक आते आते वे बच्चे हिन्दी की पूरी तरह से कट चुके होते हैं। यही वजह है कि काॅलेज और विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ने वाले छात्रों की संख्या में खासे गिरावट दर्ज की गई है। ख़बर तो पटना विश्वविद्यालय से यह भी आई कि हिन्दी विभाग में महज पांच बच्चों को दाखिला हुआ। यह स्थिति केवल पटना विश्वविद्यालय की ही नहीं है बल्कि अन्य विश्वविद्यालयों में भी इसी के आस पास ठहरता है। सवाल यह है कि हम बच्चों और अभिभावकों को संतुष्ट नहीं कर पाते कि बच्चा हिन्दी आॅनर्स पढ़ने व एम ए करने के बाद किस क्षेत्र व व्यवसाय को चुनेगा। प्राथमिक स्तर पर जिस शिद्दत से हिन्दी पढ़ाई जानी चाहिए वह अभी नहीं हो पा रही है। हिन्दी शिक्षण और प्रशिक्षण को नजदअंदाज नहीं किया जा सकता। क्यांेकि कक्षा-कक्षा तक वही हिन्दी उसी रूप में तभी पहुंच सकती है जब शिक्षक स्वयं इस कला में दक्ष हो।
लब्बोलुआब
हिन्दी को सबसे ज्यादा जिससे से टकराना है वह स्वयं हिन्दी जगत है। हिन्दी की टकराहट हिन्दी वालों और हिन्दी की अपनी प्रकृति है। अतीत से टकराती हिन्दी को एक और बड़े पहाड़ से भी टकराना पड़ रहा है वह है तकनीक। आज की तारीख में तकनीक का सहारा लेकर यदि हिन्दी आगे बढ़ती है तो आगामी यात्रा सहज और सरल हो सकती है। लेकिन यह भी बड़ा मौजू है कि क्या हिन्दी वाले इसे कितनी उदारता से इसे स्वीकार करते हैं। हिन्दी का जो अतीत है वह तो है ही उसे बदलना जरा मुश्किल है लेकिन राजभाषा अधिनियम 1963 के बरक्स जब हम हिन्दी के विकास को देखने की कोशिश करते हैं तब यह अधिनियम एक बड़ो रोड़े की तरह नजर आता है। यदि वास्तव में हिन्दी को सवंर्धित करना चाहते हैं तो हमें जमीनी हकीकत को समझते हुए मुकम्मल रणनीति बनानी पड़ेगी तभी हिन्दी का विकास संभव है। इसके साथ ही हिन्दी को बाजार की मांग के अनुसार अपनी प्रकृति और बुनावट में भी बदलाव करने पड़ेंगे तभी आज की युवा पीढ़ी इसे पढ़ने-पढ़ाने के प्रति उत्साही होगी।



Friday, August 28, 2015

दर्जी की दुकान



कौशलेंद्र प्रपन्न
अभी हाल ही में मैंने उदयपुर से शर्ट के लिए कपड़े खरीदे थे। सोचा अपनी मर्जी से सिलवाकर पहनूंगा। लेकिन दर्जी मास्टर जी ने चाइनिज काॅलर की बजाए सामान्य शर्ट बना दी। कुछ देर गुस्सा भी आया कि कपड़ा खराब कर दिया। इतनी शिद्दत से इंतजार था कि सिलवाकर शर्ट पहनूंगा। लेकिन कुछ देर जब दुकान में खड़ा बहस कर रहा था तभी गुस्सा शांत होता चला गया। मैंने पूछा आज कल लोग कपड़े नहीं सिलवाते क्या जो इस तरह की लापरवाही हो गई। मास्टर जी ने जो जवाब दिया फिर तो गुस्सा क्या आना था मैं सोचने पर मजबूर ही हो गया। उन्होंने कहा सर आज कल कपड़े कौन सिलवा कर पहनता है। सभी तो माॅल में जाकर बने बनाए कपड़ी ही पहनते हैं। पता नहीं आपने क्या सोचा और कपड़े सिलवाकर पहनना चाह रहे थे। पिछले पंद्रह साल से बामुश्किलन कोई पैंट व शर्ट सिलवाकर ले गया होगा। मेरा सवाल फिर मास्टर जी की ओर था कि तो फिर आपकी दुकान कैसे चलती है? पेट कैसे पालते हैं?
जैसे जैसे कपड़े सिलवाने कम हो गए अब या तो दुकान में चैकीदारी करते हैं या फिर बड़ी बड़ी दुकानों के बाहर आॅल्टर करने का काम किया करता हूं। उसमें क्या ही बचता है और क्या घर चला पाता हूं। रात में चैकीदारी करना भी मजबूरी है। मास्टर जी की बातों से सोचने का सिलसिला चल पड़ा। खुद याद आता है तकरीबन बीस साल तो हो ही गए होंगे जब मैंने भी दर्जी के सिले कपड़े पहने हों। आज चारों ओर स्मार्ट सिटी, डिजिटल इंडिया की गुहार सुनी जा रही है। हमें यह देखना बड़ा ही दिलचस्प होगा कि इस डिजिटल इंडिया और स्मार्ट सिटी में हमारे मास्टर जी कहां अपनी दुकान खोलेंगे। वो भी ऐसे में जहां एक ही छत के नीचे तमाम जरूरतों की चीजों उपलब्ध हांेगी। क्या सब्जी और क्या तेल। क्या कपड़े और क्या जूते रोजदिन की जरूरतों के सारे सामान एक स्थान पर मिलना एक किस्म से समय की बचत तो हो सकती है लेकिन इन एक छतीय हाट में सामान की कीमतों में खासे अंतर दिखा जा सकता है। यदि कपड़े की ही बात करें तों तमाम राष्टीय अंतरराष्टीय ब्रांड के कपड़े जिनकी कीमतों की शुरुआत ही हजार से होती है। जिस शर्ट व पैंट की कीमत दो सौ ढाई सौ की लागत में तैयार होती है उसकी कीमत हम सभ्य नागर समाज के लोग सत्तर प्रतिशत प्लस बीस प्रतिशत की छूट के टैग पर हजार, पंद्रह सौ देकर खरीदकर चैड़े हो रहे होते हैं। यह बाजार का एक छत में सिमटना है या बाजार का विकेंद्रीकरण यह तो समाजशास्त्री व बाजार के गुरु बेहतर जानते हैं। लेकिन इन एक छतीय बाजार में खुदरा व्यापारी रो रहा है।
बचपन में अपने शहर डेहरी आॅन सोन में मुहल्ले में ही एक मास्टर सलून हुआ करता था। हालांकि अब भी है लेकिन नैन नक्श बदल गए हैं। लकड़ी के तख्ते पर बैठकर कर बाल कटाना और लगातार रोते रहना भी याद है। शायद बचपन में तब के बच्चे बाल कटाते वक्त रोया ही करते थे। पिछले दस सालों में उनके भी रेट बढ़े हैं लेकिन एक छतीय बाजार की तुलना में काफी कम है। मास्टर जी अभी भी पंद्रह रुपए में और बीस रुपए में बाल दाढ़ी काटा करते हैं। लेकिन इन एक छतीय दुकानों में सौ रुपए तो शुरुआता हुआ करता है। यह अंतर साफतौर पर दर्जी पेशे में भी देखा जा सकता है। आज भी कस्बों और छोटे शहरों में दर्जी की दुकानें हैं लोग कपड़े खरीद कर सिलवाने में विश्वास रखते हैं। लेकिन रेडिमेट का चस्का जिस भी शहर व गांव देहात को लग चुका है वहां टेलर मास्टर अब खास अवसरों पर ही व्यस्त रहा करते हैं।
ईदगाह में हामिद दौड़कर दर्जी के पास जाता है और वहां से अपना नया कुर्ता और नाड़े वाला पाज़ामा पहन कर पूरे मेले में रोशन होता है। ठीक उसी तरह हम लोग भी बचपन में शर्ट व पैंट सिलवाने के लिए मास्टर जी के पास जाते थे तब नाप लेने के बाद जब तक तैयार नहीं हो जाते थे रोज दुकान का चक्कर काटा करते थे। जब तक हमारी शर्ट दुकान में टंगी हुई नहीं दिखाई देती थी तब तक मास्टर जी का जान आफत में होता था। पिछले साल उन्हीं बचपन के मास्टर जी से मुलाकात हुई बताने लगे अब तो हमारी द ुकान पर भीड़ ही नहीं होती। जिसे देखो वही बने बनाए कपड़े पहनने लगा है। किसी के पास इतना वक्त कहां है जो सिलने का इंतजार करे। जब जी चाहा तभी बनी बनाई शर्ट और पैंट खरीद कर पहन लेते हैं। इन्हें देख कर लगता है पुराने कपड़े छोड़कर वे नई कमीज पहन कर निकल गए विचार की तरह।
हमारा समाज और बाजार बहुत तेजी से बदलाव के चक्र से गुजर रहा है। जहां मूल्य और कपड़े का ब्रांड अहम हो चुका है। हालांकि ब्रांड की पहचान और प्रतिष्ठा का मसला बड़े शहरों में ज्यादा है तबकि छोटे शहरों में आज भी स्थानीय कपड़ा मील के कपड़े सिलवा कर पहनते हैं। लेकिन चिंता की बात यह भी है कि जिस रफ्तार से बाजार हमारे घरों में खड़ा हो चुका है उसे देखते हुए लगने लगा है कि हम बाजार में हैं या बाजार हम में। दजी की दुकानों में कपड़ों के थान और डंड़ों में लिपटे विभिन्न ब्रांडों के कपड़ों पर जाले लग रहे हैं। यदि जेंडर की दृष्टि से इन मसलों पर नजर डालें तो थोड़ी उम्मीद की किरण दिखाई देती है। लड़कियां फिर भी सलवार कमीज़ अभी भी लड़कों की तुलना में दर्जी से सिलवाती हैं। यूं तो फैशन और सिले सिलाए कपड़ों की ललक उनमें भी पनप चुकी है। काश की हम अपने आस पास के दर्जी को बचा पाएं।

Thursday, August 27, 2015

तुम से मिलता हूं गोया जहां पूरा समा जाता हो


पहाड़ से मिलता हूं
मिलता हूं
जंगल से भी।
जब भी गले लगाया
किसी मोटे बिरिछ को तो लगा
तुम्हीं में समा गया गोया।
काले थे या गोरे
रंग उनके
कहां मायने रखता अब
बस गले लगा लो
तो लगता है अपने ही तो हैं।
वैश्विक दुनिया में
लगाने को गले मचलता है मन
उन वर्ण को भी जो हमारे यहां क्रीम से साफ करना चाहते हैं
धो देना चाहती हैं पैदाइशी रंग
क्या सांवला और क्या गौर
जब भी मिला करता हूं किसी गैर से
वो अपना सा ही लगता है।
अब क्या बात करें उनकी
जो कहा करते थे
हमीं तो हैं दुनिया तुम्हारी
हमीं से तो रिश्ते अर्थवान हुआ करते हैं
वे शब्द अब खाली खोखले से लगते हैं
लगते हैं वे चुनावी घोषणाओं से
ग़र कैसे हो सकता था
दर्द में तड़पे कोई
आप टपका दें
एक मैसेज
गेट वेल...
और इधर मेरा बुखार उतर जाए।
इन दिनों लगने लगे हैं वहीं लोग प्यारे
जो अपने न थे
ना ही जिनकी पहचान थी
लेकिन क्या हुआ बता सकते हैं?
क्योंकर कोई ग़ैर अपनी ओर खींचने लगा
बरबस उसकी आंखों से टपकते लोर अपनी ओर खींचते हैं।

शिक्षा की प्रकृति और राजनीतिक इच्छा शक्ति




शिक्षा की प्रकृति को राजनीति और अर्थनीति काफी गहरे तक प्रभावित करती है। शिक्षा को गढ़ने में समाजो- सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के साथ ही साथ देश की राजनीति और अर्थनीति किस प्रकार एक अहम भूमिका निभाती है इस पर गंभीरता से विमर्श करना यहां उद्देश्य है। यहां हमारी अपेक्षा शिक्षा को केंद्र में रखते हुए राजनीति और अर्थनीति के देशीय और वैश्विक प्रतिबद्धताओं,घोषणाओं और समितियों की बुनियादी चरित्र को पहचानना और उसकी मारक क्षमता को समझना है। हम यहां स्वातंत्रोत्तर शैक्षिक परिघटनाओं पर अपनी नजर रखेंगे। नई शिक्षा नीति निर्माण के पीछे की मनसा और उसकी राजनीति की परतें भी खोलने की कोशिश की जाएगी। वत्र्तमान सरकार नई राष्टीय शिक्षा नीति निर्माण की प्रक्रिया शुरू कर चुकी है। देश के विभिन्न घटकों को इस विमर्श में शामिल करने की घोषणा की जा चुकी है। गौरतलब है कि अपने विचार व अपनी राय ट्विटर के तर्ज पर 180 कैरेक्टर में देने का प्रावधान है। जिन वैचारिक-मान्यताओं के आधारा पर नई राष्टीय शिक्षा नीति निर्माण की जा रही है उससे ज्यादा सकारात्मक परिवत्र्तन की उम्मीद करना व रखना निराशा को बढ़ाना है। जिस किस्म की भाषायी परिवर्तनों की बात इसमें की गई है उसपर भी उचित स्थान पर विमर्श की जाएगी। पहली बात तो यही कि यदि हमें शिक्षा में राजनीति और अर्थतंत्र की धार को देखना है तो हमें 1990 में थाईलैंड के जमितियन शहर में हुए सब के लिए शिक्षा यानी ईएफए के सम्मेलन पर नजर डालना होगा। जहां से कम से कम भारतीय प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव करवट ले रहा था। दूसरे शब्दों में 1990 के ईएफए से पूर्व और एईएफए के उत्तर भारतीय शिक्षा यानी प्राथमिक शिक्षा में कठोर और वैश्विक परिवत्र्तन घटित हुए। इससे पूर्व भारतीय प्राथमिक शिक्षा भारतीय संविधान, भारतीय समाजो-सांस्कृतिक और बुनावट को ध्यान में रखते हुए नीतियां और समितिओं की सिफारिशों के मद्दे नजर कदम उठाए गए। लेकिन 1990 की इस वैश्विक परिघटना के बाद वैश्विक बैंक, मुद्र कोष एवं नीतियां हमारी प्राथमिक शिक्षा पर हावी होती चली गईं। विस्तार से हम आगे उन प्रभावों और दुष्परिणामों की चर्चा जरूर करेंगे लेकिन यहां इतना बताना भी अपेक्षित है कि ईएफए से पूर्व और पश्चात् भारतीय शैक्षिक मानस पर बुनियादी अंतर और दृष्टि बदल रही थी। शिक्षा में हम अपने भौगोलिक, सांस्कृतिक,भाषायी पहचानों को तवज्जो दिया करते थे, लेकिन 1990 मंे हमने शिक्षा की डोर विश्व बैंक और आकाओं के हाथों सौंप दिया। इन शैक्षिक परिघटनाओं पर शिक्षाविद् प्रो. अनिल सद्गोपाल जैसे चिंतकों ने अपने स्वर और प्रतिबद्धताएं प्रकट कीं कि यदि शिक्षा का इतिहास लिखा जाएगा तो यह काल और घटना काले अक्षरों में लिखा जाएगा। प्रो सद्गोपाल ने तब आगाह किया था कि जो काम भारतीय सरकार को करना चाहिए था वह काम सरकार वल्र्ड बैंक के हाथों सौंप कर ताली पीट रही है।
आजादी के बाद शिक्षा संबंधी बनी समितियों और आयोगों की बुनियाद में झांकें तो पाएंगे कि राजनीति की बीज खासे गहरे पैठी है। आजादी के बाद के आयोगों और समितियों की संस्तुतियों और स्थापनाओं पर नजर डालने पर एक बात तो स्पष्ट हो जाती है कि इन समितियों पर राजतंत्र गहरे प्रभावित करता रहा है। तत्कालीन सत्ता और सरकारी की भाषा और नीति ही शिक्षा समितियों में मुखर रही हैं। हम यदि 1964-66 की कठोरी आयोग की बात करें तो कोठारी आयोग ने बड़ी शिद्दत से शिक्षा की गुणवत्ता, बजट, समान स्कूल सिस्टम, शिक्षक-छात्र अनुपात आदि पर विचार किया था। इस समिति ने जो भी सिफारिशें की थीं उन्हें एकबारगी ठंढे बस्ते में डाल दिया गया। इसका हश्र इस रूप में भी देखने में आता है कि यशपाल समिति से दो ‘तीन वर्ष पूर्व आचार्य राममूर्ति समिति ;1990द्ध ने बस्ते के बोझ को कम करने के लिए ठोस शैक्षिक सिद्धांत पेश किए। इस समिति का दुखद अंत यह हुआ कि केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड ने इस रपट की समीक्षा जनार्दन रेड्डी समिति ;1992द्ध से करवाई। रेड्डी समिति ने जैसे तैसे राममूर्ति समिति की रिपोर्ट को खारिज कर दिया।’ देखें कमलानंद झा लिखित पुस्तक पाठ्यपुस्तक की राजनीति। गौरतबल है कि समितियों की कार्यवाही को कहीं न कहीं राजनीतिक दलों एवं विचारधाराओं ने खासे प्रभावित किया। लेकिन तथ्य को नकारा नहीं जा सकता था। आधे से अधिक बच्चे जो स्कूल छोड़ देते उका कारण गरीबी नहीं,वरन स्कूली शिक्षा का उबाउपनख् नीरस पाठ्यक्रम और भयावह परीक्षा प्रणाली है। यही वजह है कि राममूर्ति समिति या फिर यशपाल समिति या अरुण घोष समिति सभी ने बस्ते के बोझ को कम करने की सिफारिश की। यह शैक्षिक गंभीरता शैक्षिक महकमों में तो महत्व रखती थीं लेकिन सरकार व राजनीति के लिए यह अहम नहीं था।
शैक्षिक समितियों को जिस राजनीति जिस दृष्टि से देखती और बरतती है वह खासे अहम है। आजादी के बाद निर्मित शैक्षिक समितियों की संस्तुतियों को वर्तमान सरकार ने कान नहीं दिया। इसका जीता जागता उदाहरण 1937 में आयोजित वर्धा शिक्षा सम्मेलन में महात्मा गांधी और डाॅ जाकिर हुसैन के नेतृत्व में आयोजित इस सम्मेलन में मूल्यों की शिक्षा पर सरकार के कान पर जू तक नहीं रेंगे। जिन मूल्यों की शिक्षा में समावेश की वकालत की गई थी उसकी जमक र अवहेलना हुई। इस तरह से अमूमन अधिकांश आयोग आम जनता के साथ होने की बजाए सत्ता के हाथों की कठपुतली बन कर रह गई। यह दुर्भाग्यपूर्ण नहीं तो और क्या है। थोड़ा और पीछे जा कर इतिहास में झांके तो पाएंगे कि उन्नीसवीं सदी के अंत आते आते हर प्रसाद शास्त्री, गुरुदास बनर्जी, रवींद्र नाथ टैगोर और लोकेंद्रनाथ पालित ने पढ़ाई के माध्यम के रूप में मातृभाषा पर जोर दिया। 1929 की हार्टोग समिति और 1937 की बूड-एबाॅट समिति ने भी पढ़ाई के माध्यम को मातृभाषा बनाए रखने की वकालत की लेकिन इन्हें भी नजरअंदाज ही किया गया। इन पदिघटनाओं की रोशनी मंे शिक्षा में राजनीति की भूमिका को साफतौर पर समझ सकते हैं।
आजादी के बाद भारतीय प्राथमिक शिक्षा के पूरे परिदृश्य को दो भागों में बांट कर देख सकते हैं। पहला 1990 के पूर्व और दूसरा 1990 के बाद यानी सबके लिए शिक्षा शिक्षा सम्मेलन के पश्चात्। इसे दूसरे शब्दों में कहें तो विश्व बैंक के सौजन्य से आयोजित ‘सब के लिए शिक्षा’ सम्मेलन में शिक्षा के व्यावसायीकरण का बीज पड़ा। इस ऐतिहासिक वैश्विक घटना को प्रो अनिल सद्गोपाल इस नजर से देखते हैं कि इस सम्मेलन ने भारत की शिक्षा के पूरे इतिहास को एक नया और नकारात्मक मोड़ दिया। थाईलैंड के जोमतियन शहर के इस सम्मेलन के पश्चात् भारतीय शिक्षा व्यवस्था इस रूप मंे करवट ली कि जहां इससे पूर्व संविधान को प्रश्रय देते हुए सांवैधानिक जवाबदेही थी वहीं जोमतियन सम्मलेन के  उत्तराद्र्ध संविधान के आधार की जगह भूमंड़लीकरण की बाजार आधारित नीतियों ने स्थान ले ली। वहीं भारत सरकार का स्थान अंतरराष्टीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक ने ले ली। यह एक प्रस्थान बिंदु था जहां से शिक्षा नई चाल ढली। गौरतलब है कि यहीं से शिक्षा में एक नई कसमसाहट मरोड़ ले रही थी। केंद्र और राज्य सरकारों की ओर गठित तकरीबन सभी आयोगों-बिड़ला अंबानी समिति, एन.जनार्दन रेड्डी समिति, उच्च शिक्षा पर न्यायाधीश पुन्नेय्या समिति, सैमपित्रोदा की अध्यक्षता में गठित राष्टीय ज्ञान आयोग सभी ने निजीकरण-व्यापारीकरण की प्रक्रिया को हवा ही देने का काम किया।
सन् 1968 में बनी राष्टीय शिक्षा नीति और तकरीबन बीस वर्ष बाद बनी दूसरी राष्टीय शिक्षा नीति की मूल स्थापना को किस प्रकार राजनीति से ध्वस्त किया इसे देखना भी दिलचस्प होगा। इससे पूर्व मालूम ही है कि 1964-66 में काठोरी आयोग शिक्षा की बेहतरी के लिए सिफारिशें दे चुका था। लेकिन उसपर अमल करने की बजाए उसकी धार और प्रभाव को कुंद ही करने की कोशिश की गई। यही वजह है राजनीति इच्छा शक्ति की कमी साफ झलकती है। यही वजह है कि 1986 की राष्टीय शिक्षा नीति की घोषणा कि सन् 1995 तक 14 आयु वर्ग के सभी बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान कर दी जाएगी। गौरतलब है कि यह काम हमारे संविधान की धारा 45 के अनुसार 1960 तक पूरा कर लिया जाना था। अफसोसजनक बात है कि 2015 में भी यह लक्ष्य रास्ते में ही हांफ रहा है। इसे रफ्तार देने के लिए 2000 में डकार में संपन्न सम्मेलन में भी लक्ष्य को दुहराया गया था कि 2010 तक हम इस लक्ष्य को प्राप्त कर लेंगे। लेकिन इस बार फिर राजनीति इच्छा शक्ति हार गई। सर्वविदित है कि 2015 का लक्ष्य वैश्विक स्तर पर तय किया गया था सब के लिए शिक्षा का लक्ष्य हम हासिल करे लेंगे। लेकिन अब इस तिथि को आगे खिचकाने पर विमर्श जारी है।


किताबों की दुनिया में विभेदीकरण




साहित्य शब्द सुनते ही हमारे जेहन में जिस तरह की छवि बनती है वह कविता, कहानी और उपन्यास की ही होती है। क्या साहित्य महज यही है या साहित्य की सीमा में और भी विधाएं शामिल होती हैं। साहित्य का अपना क्या चरित्र है और साहित्य व्यापक स्तर पर क्या करती है? इन सवालों पर विचार करें तो पाएंगे कि साहित्य का मतलब महज पाठ्यपुस्तकों में शामिल कविता और कहानी पढ़ाना भर नहीं हैं, बल्कि पाठकों को जीवन दृष्टि प्रदान करना भी है। जीवन मूल्यों और संवेदनशीलता पैदा करना भी है। साथ ही समाज में खास वर्गों के प्रति समानता का भाव जागृत हो इसकी भी गंुजाइश साहित्य में हो।
साहित्य का शिक्षा शास्त्रीय विमर्श करें तो पाएंगे कि साहित्य हमारी पूर्वग्रहों को भी अग्रसारित करने का काम करती है। यदि कहानी व कविता विधा को लें तो वहां भी कहानियां कुछ यूं शुरू होती हैं- एक समय की बात है। किसी गांव में एक ब्राम्हण होता थे। उनके दो बेटे थे। बड़ा बहुत ज्ञानवान और छोटा नकारा। इन शुरूआती पंक्तियों में देख सकते हैं कि गांव में क्या ब्राम्हण ही होते थे। क्या उनकी बेटियां नहीं थीं। क्या उस गांव में अनुसूचित जाति व जनजाति के लोग नहीं रहते थे। इस तरह से कहानियों में लिंग, जाति, वर्ण आदि को लेकर एक खास विभेद स्पष्ट देखे जा सकते हैं। शिक्षा शास्त्र और शिक्षा दर्शन इस तरह की विभेदी शिक्षा के पक्षधर नहीं हैं लेकिन पाठ्यक्रम और पाठ्यपुस्तक निर्माताओं ने इस तरह की कहानी और कविताओं को पाठ्यपुस्तकों में शामिल किया है जिसे पढ़ कर बच्चों में एक खास किस्म के वर्गांे के साथ स्वस्थ धारणा का निर्माण नहीं होता। अपने से कमतर मानने की प्रवृत्ति का जन्म पहले पहल कक्षा में पैदा होता है। एक बुदेलखंड़ी, मालवा, भोजपुरी, डोगरी बोलने वाले बच्चों से सवाल हिन्दी में पूछे जाते हैं तब वे बच्चे जवाब जानते हुए भी भाषायी मुश्किलों की वजह से चुप रहते हैं। यदि उन बच्चों को कक्षा में उनकी भाषा और भाषायी दक्षता को लेकर मजाक बनाया जाता है तब साहित्य कहीं पीछे छूट जाता है। स्थानीय भाषा पर मानक भाषा सवार हो जाती है। यहां बच्चों की मातृभाषायी समझ को धत्ता बताते हुए मानक भाषा को अपनाने की वकालत की जाती है।
यदि राष्टीय पाठ्यचर्या 1977, 1990 व उसके बाद 2000 पर नजर डालें तो पाएंगे कि वहां चित्रों, लिंग, भाषा को लेकर संतुलित छवि नहीं मिलती। यही वजह था कि 1990 में मध्य प्रदेश में एक सर्वे किया गया कि जनजाति और महिलाओं को किस प्रकार पाठ्यपुस्तकों में दिखाया गया है। उस रिपोर्ट में पाया गया कि महज 0.1 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति की भागिदारी दिखाई गई थी। वहीं महिलाओं की उपस्थिति सिर्फ 0.2 प्रतिशत थी। एक और सर्वे और शोध पर नजर डालना जरूरी होगा जो 1994-95 में हुई। यह शोध दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षा विभाग में हुई थी। इस शोध में पांच हिन्दी भाषी राज्यों की कक्षा 5 से 8 वीं के पाठ्यपुस्तकों का अध्ययन किया गया था। इस शोध का उद्देश्य था कि इन पाठ्यपुस्तकों में महिलाओं और जनजातियों को शामिल किया गया है। रिपोर्ट की मानें तो स्थिति बेहद चिंताजनक है। महज 0.00 और 0.1 फीसदी उपस्थिति दर्ज देखी गई थी।
राष्टीय शिक्षा नीति 1986 की रोशनी में बनी पाठ्यपुस्तकों पर भेदभाव-जाति, वर्ग, लिंग का आरोप लगा था। इन आरोपों से उबरने के लिए 1990 में आचार्य राममूर्ति समिति का गठन किया गया। उन्हें सुझाव देना था कि कहां कहां इस तरह की गलतियां हुईं हैं और उन्हें कैसे सुधारा जा सकता है। उस सुझाव के बाद बने पाठ्यपुस्तकों पर नजर डालें तो स्थिति और भी हास्यास्पद नजर आती है। महिलाओं की उपस्थिति तो बढ़ी लेकिन उनमें काम और पूर्वग्रह पूर्ववत् बनी रहीं। महिलाएं बाल बनाती हुईं महिलाएं खाना बनाती हुई पारंपरिक कामों में लीन दिखाई गईं।
सचपूछा जाए तो साहित्य की दुनिया इस प्रकार के विभेदीकरण का स्थान नहीं देती। लेकिन न तो साहित्य और न साहित्यकार अपने पूर्वग्रहों से बच पाता है। कहीं न कहीं किसी न किसी रूप मंे निजी मान्यताओं, धारणाओं और मूल्यों को साहित्य तो जीवित रखता है। यदि हमें कहें तो किताबें निर्दोष नहीं होतीं तो गलत नहीं होगा। साहित्य का मकसद पाठकों को एक बेहतर मनुष्य बनाने और अपने अनुभवों को व्यापक करने में मदद करना है।
साहित्य की दुनिया पर एक नजर दौड़ाएं तो पाएंगे कि साहित्य भी कक्षा कक्षा होने वाले विभेद के फांक को बढ़ाने वाला ही होता है। विभिन्न तरह के विभेदों और वादों में बंटा साहित्य चाहे वह दलित विमर्श हो या आदीवासी साहित्य या फिर प्रवासी साहित्य अमूमन इन साहित्यिक कृतियों में अपने वादों और विचारों को ही पोषित किया जाता है। एक बच्चे की दृष्टि से साहित्य को देखें तो उनके पास कविता और कहानी के रूप में पहंुचती हैं। वह कहानी बड़ों की दुनिया के बारे में होती हैं। बच्चों के साहित्य जिन नामों से मिलते हैं वे चिन्टू के कारनामें, टीपू की सैर आदि। जहां वैज्ञानिक सोच और कल्पना की गुंजाइश के स्थान पर पूर्व निर्धारित सोच और निर्णय को परोसा जाता है। बाल साहित्य पर नजर डालें तो जंगल, पेड़-पौधे, जानवर आदि की कहानियां होती हैं या फिर परियों, सपनों की दुनिया बुनी जाती हैं। इस किस्म के साहित्य से कैसे गुजरें इसकी समझ और औजार शिक्षकों को देना बेहद जरूरी है। ऐसे में कक्षा में शिक्षक की भूमिका अहम हो जाती है। यदि शिक्षक इस तरह की स्थिति में स्वविवेक का इस्तमाल नहीं करता तब बच्चों में स्वस्थ विचार नहीं पहुंच पाते।
बच्चों के साहित्य और आम साहित्य में यदि कोई बुनियादी फांक या बारीक सा विभाजन कुछ हो सकता है तो वह यही कि एक साहित्य वयस्कों की दुनिया की कहानी बताती है तो दूसरा साहित्य बड़ों के द्वारा बच्चों की दुनिया को समझने और समझाने की कोशिश करता है। एक ओर हम अपनी आपबीती घटनाओं, अनुभवों को अपने ही वर्गों में साझा करते हैं। वहीं दूसरी ओर बच्चों की दुनिया को बड़ों के चश्मों से देखकर व्याख्यायित करते हैं। दरअसल बाल साहित्य के नाम पर हम वयस्क अपनी ही नजर से उनकी दुनिया को देखने और समझने की कोशिश करते हैं। जरूरत इस बात की भी है कि हमें बच्चों की आवश्यकता और उनकी जरूरतों को ध्यान में रखकर उनके लिए साहित्य तैयार करें।
साहित्य के अंदर की दुनिया में कैसे और किन वर्गों को हाशिए पर धकेला जाता है इसे भी देखते चलें। हमारे ही समाज के कई वर्ग हैं जो हमारे पाठ्यपुस्तकों और पाठ्यक्रमों से बाहर रखे जाते हैं। पाठ्यपुस्तकों से ख़ासजाति संबंधी एवं वर्ग संबंधी शब्द जगत को भी हाशिए पर रखना व मुख्यधारा की भाषा से काट कर रखा जाता है। हाल ही में एक खास विचार धारा की ओर से मानव संसाधन विकास मंत्रालय को सुझाव दिया गया कि बच्चों की किताबों से उर्दू, अरबी, फारसी एवं अंगरेजी शब्दों को हटा दिया जाए। उस सुझाव में उदाहरण स्वरूप शब्दों की सूची भी सौंपी गई थी। तर्क दिया गया कि उक्त शब्द हमारे हिन्दी के वर्णमाला को दुषित कर रहे हैं। ज़रा उन शब्दों पर नजर डालते हैं जिन्हें पाठ्यपुस्तकों से निकाल बाहर करने की वकालत की गई वे शब्द हैं- शरारत, ख़बरदार, दोस्त, गायब, मौका, मुश्किल आदि जिन शब्दों को बच्चों की स्कूली किताबों से बाहर का रास्ता दिखाया गया था। अजेय कुमार, ‘वैज्ञानिक सोच के विरूद्ध’, जनसत्ता, 12 दिसंबर 2014, उन जगहों पर संस्कृत और हिन्दी के शुद्ध शब्दों को स्थानांतरित किया गया था।
सवाल यह है कि कुछ शब्दों, वाक्यों, गद्यांशों को बदल देने से शिक्षा में समता और समानता की स्थिति पैदा हो सकती है? क्या हिन्दी के शब्दों को किताबों में ठूंस देने से तथाकथित मूल्य, संस्कार बच्चों में कोचे जा सकते हैं? क्या बच्चों के दिमाग में वयस्कों की समझ और पूर्वग्रह को रोपना उचित है? आदि प्रश्नों से मुंह नहीं मोड़ सकते। लेकिन अफसोस की बात है कि इस तरह की घटनाएं बड़ी ही सोची समझी रणनीति के तहत की जा रही हैं। हम अपने बच्चों को किस तरह की तालीम देने की कोशिश कर रहे हैं उसे स्पष्ट करने की आवश्यकता है। हमें यह भी साफ करने की जरूरत है कि हम किस किस्म की शिक्षा किसकी भाषा में देना चाह रहे हैं। महज शब्दों, वाक्यों, उदाहरणों को किताबों से बाहर कर देना ही समाधान नहीं है।
दरअसल साहित्य कुछ पूर्वग्रहों को अग्रसारित करने का भी काम करता है। यदि समग्रता में देखें तो हमारा स्कूल और हमारी पाठ्यपुस्तकें भी विभेदीकरण के अंतर को निरंतर बरकरार रखने में अपनी भूमिका निभाते हैं। यदि हम झूठन व मुर्दहिया या फिर मणीकर्णिका को ध्यान से पढ़े ंतो वहां स्कूल का शिक्षक खुद डाॅ तुलसी राम के शब्दों में भाषायी हिंसा किया करता था। साथ ही जाति सूचक शब्दों का इस्तमाल डाॅ तुलसी के साथ साथ अन्य दलित बच्चों के साथ भी किया करते थे। जिन मानसिक तनावों और संवेदनात्मक उथलपुथल से डाॅ तुलसी का बालमन गुजरा ऐसे हजारों बच्चे यदि आज भी विभिन्न स्कूलों में जी रहे हैं तो इसे किस दृष्टि से देखे जाने की आवश्यकता है। क्या हमें ठहर कर इसपर विचार नहीं करना चाहिए कि आजादी के 6 दशकों के बाद भी यदि समाज में जाति,धर्म,वर्ण, भाषा के आधार पर स्कूलों में बच्चों के साथ भेदभाव हो रहे हैं तो इसके पीछे हमारी कौन सी और किस स्तर की चिंतन प्रक्रिया जिम्मेदार है।
हम दलित व समाज के अन्य पिछड़े तबकों से आने बच्चों की बात तो बाद में करेंगे यहां तो पूरा का पूरा पाठ्यक्रम, पाठ्यचर्या और पाठ्यपुस्तकें भी बच्चों में खास वर्ग, जाति, भाषा की श्रेष्ठता को लेकर लगातार विष वमन कर रहे हैं। ऐसे में हमें अपने शिक्षा और साहित्य के वृहत्त उद्देश्यों को पुनः व्याख्यायित करने की आवश्यकता है। शिक्षा की पात्रता कभी भी जाति, वर्ण, भाषा आदि नहीं रही है। यदि किसी भी समाज में ऐसा हो रहा है तो वह शैक्षिक दर्शन और शैक्षिक विमर्श से कोई वास्ता नहीं रखता। उसका यदि कोई रिश्ता होता होगा तो वह राजनीतिक व अन्य प्रलोभनों को हो सकता है कम से कम शिक्षा का उससे कोई लेना देना नहीं है।

Monday, August 24, 2015

तुम्हारे पास समंदर था और मेरे पास पहाड़ दादू

तुम्हारे पास समंदर था और मेरे पास पहाड़ दादू

तुम्हारे पास समंदर था सो मचलते रहे ताउम्र
मेरे पास पहाड़ था,
सो भटकता रहा मोड़ मुहानों से ताउम्र।
तुम्हारे पास समंदर की लहरें थीं खेलने उलीचने को
जो तुमने किया,
तटों से टकराती लहरें गिनते रहे उम्र भर
मेरे पहाड़ मुझे ताकीद करते रहे उम्र भर
सावधानी घटी कि गए हजारों हजार फीट नीचे।
पहाड़ अकसरहां कहा करते थे
मैदान भला या पहाड़ तय कर लो
खुद सोच विचार कर लो
फिर निकलो
मगर पेट था कि माना नहीं
चला गया
पहाड़ के सन्नाटे को पीछे धकेल।
पर तुम्हारे पास तो समंदर था-
लहराता
बलखाता
जहां गिरने की कोई निशानी न थी
डूबता भी कौन है किनारों पर बसने वाले
मगर तुमने क्यों छोड़ा समंदर का साथ?
पहाड़ों के दर्द को भूला
भला मैं कब तलब मैदान फांकता
बार बार लौटता रहा पहाड़ मगर
अब पहाड़ ग़मज़दा था
खाली खाली खोखला पहाड़
मौन बस यही कहता रहा
अब मैं भी थक गया हूं
इन मोड़ मुहानों पर जी नहीं रमता
तुम क्या गए सारी रौनकें चली गईं गोया।

क्रांतिवादी शिक्षक मारे जाएंगे





हाल में जिस शिक्षक की शिकायत पर उत्तर प्रदेश उच्च न्यायालय ने एक परिवर्तनकारी निर्देश जारी किए जिसकी प्रशंसा चारों ओर हो रही है जिसपर तमाम अखबारों, सोशल मीडिया एवं शैक्षिक जगत में तारीफ हो रही है उसी शिक्षक को इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। उस शिक्षक को बर्खास्त किया जा चुका है। एक शिक्षक कैसे आवाज बुलंद कर सकता है। सत्ता इस आवाज को किसी भी कीमत पर सुनने को तैयार नहीं है। शिक्षक वर्ग को माना ही जाता है कि यह महज आज्ञाकारी होना चाहिए। यह वर्ग सिर्फ और सिर्फ आदेशों का पालन करने के लिए बना है। वह आदेश गैर शैक्षिक कामों में लगाने का हो या फिर शिक्षण प्रशिक्षण जैसे गंभीर कर्म। शिक्षक सिर्फ पाठ्यपुस्तकों, पाठ्यक्रमों को पूरा कराने वाला सस्ता और सुलभ साधन मात्र है। जब भी किसी शिक्षक ने अपनी स्थिति और पद के विपरीत आवाज उठाने की कोशिश की है तब तब उसे फरमान पकड़ाए गए हैं। लेकिन इन तमाम परिघटनाओं पर नजर डालें तो यह सहज ही जान पड़ता है क्योंकि शिक्षक की अपनी न तो कोई सत्ता होती है और न सामाजिक पहचान ही। समाज इस वर्ग को जिस नजर से देखता है उसमें भी एक कातरता और बेचारगी का भाव होता है। एक शिक्षक ने प्राथमिक स्कूलों में हो रहे शैक्षिक परोड़ों का समाज और न्यायपालिका के समक्ष रखने की कोशिश की। लेकिन उसकी आवाज और छटपटाहटों को सत्ता और सरकार जिस रूप में ली यह किसी से दबा-छुपा नहीं रहा।
गौरतलब है कि शिक्षक की सामाजिक हैसियत और सत्तायी चरित्र को हमेशा से ही कमतर आंका गया है। जबकि शिक्षण और शिक्षक की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। यदि एक शिक्षक कम पढ़ा लिखा व खास वैचारिक पूर्वग्रह का है तो वह हजारों लाखों बच्चों को प्रभावित करता है और उसी के अनुरूप गढ़ता है। इस खतरे को हम देख नहीं पा रहे हैं। याद हो कि सन् 2009 के आसपास बिहार सरकार ने प्राथिमक स्कूलों में शिक्षा को ठेके पर यानी तदर्थवाद के हाथों सौंप दिया। हजारों गैर प्रशिक्षित स्नातकों, परास्नातकों के हाथों बिहार की प्राथमिक शिक्षा को सौंप दिया गया। जिन्हें मानदेय के नाम पर 4000 से 6000 पर रखा गया। इस तरह से वहां की प्राथमिक शिक्षा को गैर प्रशिक्षित शिक्षकों के हाथों सौंप कर सरकार फारिक हो गई। इसके परिणाम एक दो सालों के बाद आने शुरू हुए। बल्कि कहना चाहिए कि इस तरह से गैर प्रशिक्षित शिक्षकों के हाथों सौंपे गए प्राथमिक शिक्षा के परिणाम आने में थोड़ा वक्त लगता है लेकिन उन परिणामों के भयावहता को भांप कर डर लगता है। आज की तारीख में पूरे देश भर प्राथमिक शिक्षा की स्थिति को देखते हुए घोर निराशा होती है। बच्चे कक्षा 3 री, 5 वीं व आंठवीं में पढ़ते तो हैं लेकिन उन्हें भाषा, गणित, विज्ञान आदि विषयों की समझ, ज्ञान एवं कौशल अत्यंत कमतर होते हैं। इस बाबत कई सारी रिपोर्ट सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं से हर साल आती रही हैं। लेकिन सरकार की नींद नहीं खुलती। सरकार बस पूरी कोशिश में है कि किसी भी तरह से सरकारी स्कूलों को नकारा साबित कर प्राथमिक स्कूलों को बंद किया जाए और यह काम जिनी कंपनियों के हाथों गिरवी रख दी जाए। सरकार इस मनसा में तेजी से आगे बढ़ भी रही है। यदि 2014-15 के आंकड़ों पर नजर डालें तो पाएंगे कि विभिन्न राज्यों में सरकारी स्कूलों को बंद कर दिए गए। राजस्थान में 1800, छत्तीसगढ़ में 3000, उत्तराखंड़ में 4000 एवं अन्य राज्यों मंे भी सरकारी स्कूलों मंे ताले लगाने के प्रयास किए जाए रहे हैं। इन बंद किए गए स्कूलों के पीछे सरकारी तर्क शास्त्र यह है कि हमारे पास पर्याप्त संसाधन नहीं है। हमारे पास शिक्षक नहीं हैं आदि। इन तर्कों की रोशनी में देखें तो आरटीई स्पष्ट मानती है कि हर स्कूल में प्रशिक्षित शिक्षक, 31 और 1 का अनुपात एवं भवन होने चाहिए। इन दृष्टि से देखें तो अमूमन सरकारी स्कूलों के पास जमीन है। भवन भी हैं किन्तु जर्जर हालत में हैं। उन्हें दुरूस्त करने की बजाए निजी हाथों में देने के लिए सरकार बेचैन है। उत्तराखंड़ में तो एक निजी संस्थान को सरकारी स्कूलों को चलाने की जिम्मेदारी सौंपी जा चुकी है।
जिस रफ्तार से सरकारी स्कूलों को नकारा साबित करने पर सरकारें तत्पर हैं उन्हें देखते हुए वह दिन दूर नहीं जब सरकारी स्कूलों की बागडोर निजी संस्थानों के हाथों में होगी। ज़रा कल्पना कीजिए ऐसा होता है तो लाखों गरीब परिवारों के बच्चा कहां शिक्षा हासिल करने जाएंगे। यूं तो यूपी हाई कार्ट ने निर्देश तो जारी किए हैं लेकिन हजूर और मजूर के बच्चे किस स्कूल में पढ़ने जाएंगे। सरकारी की बेचैनी और चिंता सरकारी स्कूलों को बचाने की बजाए उन्हें अपने हाथों तर्पण करने की ज्यादा है। यह तर्पण का खेल 1990 सब के लिए शिक्षा यानी जेमितियन सम्मेलन के बाद शुरू हुआ था। इस सम्मेलन के पश्चात् प्राथमिक शिक्षा सरकार की बजाए विश्व बैंकों और वैश्विक पूंजी से तय की जाने लगी। तत्कालीन शैक्षिक परिघटनाओं पर नजर रखने वाले प्रसिद्ध शिक्षाविद् प्रो अनिल सद्गोपल का मानना था कि यदि शिक्षा का इतिहास लिखा जाएगा तो यह एक दुखड़ माना जाएगा। क्योंकि इस सम्मेलन के बाद प्राथमिक शिक्षा का समूचा परिदृश्य ही बदल गया।
प्राथमिक शिक्षा और शिक्षक को जब तक पाठ्यपुस्तकों और पाठ्यक्रमों के निर्माण में सहभागिता सुनिश्चित नहीं जाएगी तब तक सकारात्मक परिवर्तन की कल्पना अधूरी ही रहेगी। शिक्षक स्वयं बेशक समाज में एक दिन में क्रांति न ला पाए किन्तु वह जिस बीजों को सींचता और पालता है वह एक दिन क्रांति के सबब बनते हैं। आज की तारीख में प्राथमिक शिक्षा को जिस हल्के में लिया जाता है यही वजह है कि हमारे बच्चे कक्षा 6 ठी तक पहुंचते पहुंचते या तो स्कूल से बाहर की दुनिया में खम जाते हैं या फिर जिस स्तर की शिक्षा हासिल करते हैं वह बड़ी चिंता में शामिल हो जाती हैं।


Wednesday, August 19, 2015

हजूर के बच्चे भी पढ़ेंगे सरकारी स्कूल में



कौशलेंद्र प्रपन्न
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने शिक्षा की गुणवत्ता को सुधारने के लिए उत्त्र प्रदेश सरकार को निर्देश जारी किया है जिसके निहितार्थ को समझने की आवश्यकता है। उच्च न्यायालय ने हाल ही में उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को निर्देश दिया है कि सरकारी नौकरी वाले,सांसदों, न्यायपालिका आदि से संबद्ध कर्मियों के बच्चे भी सरकारी स्कूल में पढ़ें। दूसरे शब्दों में हजूर और मजूर के बच्चे एक ही टाट पर बैठें। जहां उच्च और निम्न वर्ग का भेद न हो। यह अवधारणा नया तो नहीं है हां यह दिलचस्प जरूर है। जमीनी तल्ख़ हकीकत यह है कि आज सरकारी स्कूलों में उन्हीं परिवारों के बच्चे पढ़ने जाते हैं जो निजी स्कूलों के नाज़ नखरे नहीं उठा सकते। यूं तो मजूर और अशक्त मां बाप की भी तमन्ना यही होती है कि उनके बच्चे निजी स्कूलों में ही पढ़ें। लेकिन उनकी माली हालत साथ नहीं देती। बहुत पहले शिक्षा में यह बात जोर शोर से उठी थी कि सभी के लिए समान शिक्षा और समान स्कूल हों। ताकि समाज का ताकतवर और कमजोर वर्ग का बच्चा भी एक साथ शिक्षा हासिल करे। यदि इतिहास में झांकें तो पाएंगे कि राजा और प्रजा दोनों के ही बच्चे एक समान स्कूल में ही पढ़ा करते थे। गुरुकुल की परंपरा यही बताती है कि गुरुकुल में राजा का बच्चा और आम प्रजा का बच्चा दोनों ही समान शि़क्षा पाता था। गुरु की नजर में वे महज बच्चा हुआ करते थे। लेकिन जैसे जैसे हमारे समाज में शक्ति और अर्थ का वर्चस्व बढ़ा वैसे वैसे स्कूलों में विभाजन की रेखाएं चैड़ी होती चली गईं। कोठारी आयोग से लेकर शिक्षा नीति, राष्टीय शिक्षा आयोगों में भी समान स्कूली शिक्षा की वकालत की गई। आज प्राथमिक शिक्षा की पतली होती गुणवत्ता के चादर को देखकर घोर निराशा होती है। यह निराशा कम होने की बजाए निरंतर गहराती ही जा रही है। प्राथमिक शिक्षा में गुणवत्ता एक अहम मसला है। कई सारी सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं की रिपोर्ट हमें ताकीद करती हैं कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की पढ़ने-लिखने और समझने की क्षमता का स्तर अपनी कक्षानुरूप नहीं है। कक्षा छः में पढ़ने वाला बच्चा कक्षा दूसरी व तीसरी की भाषा की किताब नहीं पढ़ पाता। यही हाल गणित और विज्ञान विषय का है।
उच्च न्यायालय की चिंता और निर्देश एक उम्मीद की रोशनी की तरह लगती है। उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया है कि सरकारी स्कूलों की दशा सुधारने के लिए वह इन स्कूलों में सरकारी अधिकारियों-कर्मचारियों, स्थानीय निकायकर्मियों, जनप्रतिनिधियों तथा न्यायव्यवस्था के जुड़े लोगों के बच्चे भेजे जाएं और छः महीने के बाद मुख्य सचिव इस बाबत रिपोर्ट दे कि इस बीच इस आदेश का किस हद तक पालन किया गया है। गौरतलब है कि न्यायालय के आदेशों की माखौल इतिहास में कैसे उड़ाए गए हैं। जिस तरह से पिछले आदेशों व निर्देशों की धज्जियां उड़ाई गईं हैं क्या इस निर्देश का हस्र भी वही नहीं होगा। यदि सरकारी स्कूलों की स्थिति पर नजर डालें तो देख पाएंगे कि पिछले साल से इस वर्ष जुलाई तक विभिन्न राज्यों में सरकारी स्कूलों में तालें लटका दिए गए हैं। महाराष्ट में 14 हजार, राजस्थान में 17 हजार, तेलंगाना में 4 हजार, उत्तराखंड़ में 3 हजार, छत्तीसगढ़ में 4 हजार से ज्यादा सरकारी स्कूलों को विभिन्न तर्कांे के आधार पर बंद कर दिए गए। यहां सरकार की मनसा की झलकी मिलती है। क्या सरकार इन स्कूलों को बंद कर समाज को एक बेहतर सरकारी स्कूलों का विकल्प दे रही है?क्या सरकार की मनसा निजी स्कूलों को बढ़ाने का है? क्या यह एक वैश्विक उपक्रम का हिस्सा है कि सरकारें अपने स्कूलों को नकारा साबित कर बंद कर दें फिर सस्ते दामों पर मिली जमीनों पर निजी स्कूलों को खाद पानी दे फलने फुलने का वातावरण बनाया जाए आदि।
सरकारी स्कूलों में यदि स्थिति खराब है तो इसके लिए सरकार तो जिम्मेदार है ही साथ ही सरकारी स्कूलों में अध्यापन करने वाले अध्यापक वर्ग भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। क्योंकि एक बार सरकारी टीचर बन जाने के बाद कितने प्रतिशत शिक्षक ऐसे हैं जो अपनी नैतिक और पेशागत जिम्मेदारियों को समझते और निभाते हैं? कितने शिक्षक हैं जो अपनी शैक्षिक समझ और ज्ञान को अधुनातन करने का प्रयास करते हैं? जितनी प्रतिबद्धता और बेचैनी सरकारी स्कूल में नौकरी पाने की होती है क्या उसका दस फीसदी भी जिम्मेदारी एवं शिक्षण की छटपटाहट शिक्षकों में बची रहती है आदि सवाल भी पूछे जाने चाहिए। क्योंकि जितना वेतन अध्यापकों को आज की तारीख में मिल रही है वह दुनिया के अन्य पेशों की नजर से देखें तो एक अच्छी सैलरी मानी जा सकती है। अब सवाल उठना स्वभाविक है कि क्या सरकारी शिक्षक अपने वेतन के साथ न्याय करता है। यदि नहीं तो क्यों न ऐसी व्यवस्था की जाए कि जिस कक्षा का रिजल्र्ट खराब हो उसक अध्यापक की प्रोन्नति, वेतन आदि में कटौती की जाए। यह विमर्श तेजी से आगे आकार ले रहा है कि शिक्षकों की जिम्मेदारी और उत्तरदायित्व को सुनिश्चित किया जाए। यदि सरकार उन्हें एक अच्छी सैलरी दे रही है तो उनसे बेहतर शिक्षा और गुणवत्तापूर्ण शैक्षिक स्तर की उम्मीद तो की ही जा सकती है।
निजी स्कूलों के बेल लगातार बढ़ने के पीछे सरकारी सुस्तता और मौन स्वीकृति भी एक बड़ा कारण है। वरना क्या वजह है कि सरकारी स्कूलों में एक निजी स्कूलों के शिक्षकों से कहीं ज्यादा पढ़े लिखे शिक्षकों की टीम है किन्तु जब कक्षा में शिक्षण शिक्षा के स्तर की बात आती है तब निजी स्कूल के लिए तालियां बजती हैं और सरकारी टीचर के लिए लानत मलानत ही हिस्से आते हैं? क्या वजह है कि सरकारी स्कूल का शिक्षक अपने वेतन से आधी या उससे भी कम सैलरी पाने वाले निजी स्कूलेां के शिक्षकों के बरक्श कमतर परिणाम देता है। कहीं न कहीं सरकारी ढर्रे की सोच भी एक बड़ा रोड़ा है जिसके वजह से सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता संदेह के घेरे में है। यदि ठहर कर देखें तो सरकारी स्कूलों की भी कई कोटियां हैं- नवोदय विद्यालय, सर्वाेदय विद्यालय, केंद्रीय विद्यालय, सैनिक विद्यालय, प्रतिभा विद्यालय आदि। इन तमाम विद्यालयों में भी शिक्षा के स्तर और गुणवत्ता में अंतर देखे जा सकते हैं।
उत्तर प्रदेश उच्च न्यायालय के निर्देश को सकारात्मक सोच की पहलकदमी मानी जा सकती है। संभव है इस निर्देश को माॅडल मान कर अन्य राज्यों में भी ऐसे ही कदम उठाए जाएं। इस निर्देश में स्पष्टतौर पर कहा गया है कि जो सरकारी अधिकारी, न्यायव्यस्था, कार्यपालिका,जनप्रतिनिधि आदि से अपने बच्चे को सरकारी स्कूलों में नहीं भेजेंगे उन्हें निजी स्कूलों की फीस के बराबर राशि खजाने में जमा कराना होगा। इतनी ही नहीं बल्कि उनके प्रमोशन और इक्रिमेंट आदि भी रोके जाएं। यह अगले शैक्षिक सत्र से लागू होने की आशा है।


Tuesday, August 11, 2015

घोषणाएं हंै घोषणाओं का क्या



घोषणाएं होती हैं करने के लिए। किसने कह दिया कि घोषणाओं को पूरा भी करना है। नहीं किया तो आपकी जान पर पड़ जाएगी। वो भी राजनीति में तो बेहद आमफहम बात है। हाल में प्रधानसेवक जी ने बिहार में घोषणाओं की नई पौध लगाई है। उन्होंने कहा है कि बिहार को बिमारू राज्य से बाहर निकालना है। उन्होंने तो यह भी कहा कि बिहार को विकास के राह पर हांक देंगे बस शर्त यह है कि राज्य का कमान उनके हाथों में सौंप दिया जाए। सवाल यह उठता है कि क्या केंद्र में रहते हुए वे बिहार की स्थिति को नहीं सुधार सकते। क्या बिहार के विकास के लिए इस राज्य की बागडोर अपने हाथ में लेना जरूरी है या राजनीतिक फैलाव भर करना चाहते हैं। बिहार राज्य की शिक्षा, तकनीक, विकास आदि को लेकर बहुत हांफते हुए बहुत सारी घोषणाएं की गई हैं। कौन नहीं जानता कि जो सपने व घोषणाएं बिहार व अन्य राज्यों की आंखों में चुनाव के इर्द गिर्द दिखाई जाती है उनका उत्ता चुनाव क्या हस्र हुआ करता है।
किसी समाज व राज्य की खुशहाली,विकास संपन्न्ता वहां की शिक्षा,स्वास्थ्य, रोजगार आदि के आधार पर देखा जाता है। यदि इन बिंदुओं पर बिहार पर नजर डालें तो पाएंगे कि शिक्षा के नाम पर फर्जी डिग्रीधारी शिक्षक प्राथमिक कक्षाओं में अध्यापन कर रहे हैं। इस बाबत न्यायालय के आदेश के बाद 14 से ज्यादा शिक्षकों ने त्यागपत्र दे दिया। यह संख्या कहां तक पहुंची इसकी फाॅली अप स्टोरी किसी भी समाचार पत्र, पत्रिका में शायद नहीं छपी। तय था कि आठ जुलाई तक जिनके पास भी फर्जीडिग्री है वे अपना इस्तीफा दे दें। लेकिन आठ जुलाई के बाद कितने इस्तीफे आए क्या सरकार को पता है? क्या मीडिया ने इसका फाॅलो अप किया। जवाब आप सभी को पता है। समाचार पत्र एक बाद खबरों को उछाल कर अगली खबर की ओर मुड़ जाया करती है। हालांकि यह सरलीकरण होगा किन्तु कम से कम इस खबर व हकीकत के साथ तो यही हुआ है। शिक्षा की स्थिति तो यह है कि प्राथमिक स्तर से लेकर उच्चतर और विश्वविद्यालीय शिक्षा में भी उम्मीद की रोशनी नजर नहीं आती। पटना विश्वविद्यालय में इस अकादमिक सत्र में हिन्दी विभाग में महज पांच दाखिले हुए। यह खबर भी पिछले माह आई थी। अभी यह संख्या कहां तक पहुंची किसे मालूम है?
शिक्षा ही वो आधार है जिस जमीन पर खड़े होकर हम राज्य व देश की तबीयत कैसी है, का अंदाजा लगा सकते हैं। प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च स्तर पर अव्वल तो शिक्षा की छीजती हुई परते नजर आती हैं। जहां कुछ शिक्षक पढ़ने का अपना मूल कर्तव्य मानकर पढ़ाते हैं उन्हें गैर अकादमिक कामों में हांक दिया जाता है।

Saturday, August 8, 2015

काव्य संवाद एक नजर मंे




किसी दिन सुबह नहीं आया तो किससे लड़ोगे...गुड की तरह याद आउंगा जब रोटी खाओगे। कौशलेंद्र प्रपन्न की कविता पर जम कर तालियां बजीं। वहीं डाॅ शशि सहगल ने मीठा चावल पंजाबी की कविता का पाठ किया जिसे श्रोताओं ने हाथों हाथ लिया। वहीं दूसरी ओर डाॅ लालित्य ललित की कविता गांव का खत शहर के नाम सुन कर श्रोताओं में एक उत्साह दौड़ गई।
इस कार्यक्रम में टेक महिन्द्रा फाउंडेशन की शिक्षा और थीम प्रमुख डाॅ नुज़हत अली ने महानगर की त्रास्दी को उजागर करते हुए अपनी कविता नए मकान में झांकती हुई चिरियां को याद किया।
कार्यक्रम का संचालन सुश्री शैलजा चैधरी ने किया। अपनी अलग अंदाज़ में श्रोताओं को भरपूर आनंद दिया। सुश्री शैलजा ने कार्यक्रम में छोटी छोटी क्षणिकों और काव्य पंक्तियों से कार्यक्रम में रस का संचार किया।
इस कार्यक्रम में डाॅ नुज़हत अली, श्री सलमान यू खान, मदन मोहन शर्मा, डाॅ मनिषा मिनोचा डाॅ लालित्य ललित, डाॅ शशि सहगल के साथ तकरीबन पचास शिक्षक,शिक्षिकाएं शामिल थीं। श्रोताओं में से श्री विमल कुमार, श्री विनोद कुमार, सुश्री रूचि, सुश्री प्रिया गोस्वामी, सुश्री सुमन लता ने अपनी कविताओं का पाठ किया।

Tuesday, July 28, 2015

साहित्य की शिक्षा


साहित्य की अच्छी और बेहतर समझ विकसित करने के लिए हमें साहित्य की भी शिक्षा पर विचार करना होगा। साहित्य की शिक्षा को महज कक्षाओं में पढ़ाए जाने वाले पाठ्यक्रमों और पाठ्यपुस्तकीय कविता, कहानी, उपन्यास से निजात दिलाना होगा। साहित्य की सलीके से तालीम की आवश्यकता है। इसका अर्थ यह हुआ कि साहित्य की विधिवत् शिक्षण-प्रशिक्षण की रूपरेखा तैयार करने होंगे। साहित्य की तमाम विधाओं में महज लेखन को साहित्य की शिक्षा का नाम नहीं दे सकते। कविता,कहानी, उपन्यास को पढ़ने और समझ कौशल विकास के लिए हमें विभिन्न कार्यशालाओं की मदद लेनी पड़ेगी। यहां विमर्श का मुद्दा यह है कि जिस तरह से बीए व एम ए की कक्षाओं में साहित्य की समझ विकसित की जाती है वह पर्याप्त नहीं माना जा सकता। कविता व कहानी लिखना और साहित्य की शिक्षा दो अलग अलग चीजें हैं। पाठ्क्रमों में साहित्य को पढ़ना और स्वतंत्र रूप से समीक्षीय दृष्टि से रचना को पढ़ना दो बातें हैं। एक पर्चा पास करने की दृष्टि से पढ़ी जाती है और दूसरा अपनी समझ विकसित करने और आलोचकीय नजरिया पैदा करने की लिहाज से रचना को पढ़ी जाती है। अमूमन देखा यही गया है कि पारंपरिक पाठ्यक्रमों में रचनाओं की व्याख्याएं एक खास सीमा में बंधी रह जाती हैं। कबीर, सूरदास, तुलसी को बीए व एम ए के पाठ्यक्रम में पढ़ना और बाद में समीक्षा की नजर से पढ़ने में खासे अंतर पाया जाता है। दरअसल साहित्य को पढ़ने की तालीम ही नहीं दी जाती। यदि कुछ दी जाती है तो वह है परीक्षा पास कैसे करें। आज भी साहित्य में अधिकांश ऐसे विद्यार्थियेां की कमी नहीं है जो साहित्य के पर्चे देने के बाद भूल जाते हैं कि उन्होंने कौन कौन सी किताबंे व रचनाएं पढ़ीं।

Friday, July 24, 2015

नदी को कहना बहती रहे


रास्ते ज़रा खराब होंगे
लेकिन कहना उसे
बहती रहे।
बहना ही तो बचना है
बचना है तो बहना है
ठहर गई किसी दिन तो
तो क्या
मर ही तो जाएगी।
सेा कहना उससे बहती रहे
चाहे रास्ते में किसी भी तरह की बाधा आए
न रूके
न झुके
बिना उफ्फ किए
आगे ही जाए
कहना उसे
कोई है जो कर रहा है इंतजार
नदी तुम बहती रहना
ताउम्र यूं ही
बेखौफ।

Monday, July 13, 2015

सरकारी स्कूलों में ताले लटकने का दौर



कौशलेंद्र प्रपन्न
राज्य सरकार जिस रफ्तार और तर्कों के आधार पर सरकारी स्कूलों को बंद कर चुकी है या ताला लगाने का एलान कर चुकी है उसे देखते हुए उम्मीद की जा सकती है कि आने वाले दिनों में हमारे देश में सरकारी स्कूल हाशिए पर नजर आएंगी। हाल ही में छत्तीसगढ़ सरकार ने 3000 सरकारी स्कूलों को बंद करने का फरमान जारी किया है। गौरतलब है कि छत्तीसगढ से पहले राजस्थान, उडि़या, महाराष्ट आदि राज्यों में भी सरकारी स्कूलों में ताले लगाए जा चुके हैं। छत्तीसगढ़ राज्य सरकार ने इसे तर्कपूर्ण कार्यवाई बताया है। एजूकेशन डेवलप्मेंट इंडेक्स में इस राज्य को 28 वें स्थान पर रखा गया है। सरकार के तर्क शास्त्र पर गौर करें तो सरकार की नजर में इन स्कूलों में बच्चों की तदाद बहुत कम थी, कोई दूसरा स्कूल चल रहा है, शिक्षकों की कमी, इमारत जैसे दूसरे कारण भी गिनाए गए हैं। जिन इलाकों में सरकारी स्कूल में ताले लगे हैं वे आदिवासी बहुल इलाका माना जाता है। इनमें नारायणपुर, बस्तर, दंतेवाड़ा जैसे क्षेत्र हैं जो जंगल,पहाड़ और दूसरी भौगालिक बाधाओं से घिरी हैं।
पिछले साल राजस्थान, महाराष्ट, उडि़सा, उत्तराखंड़ आदि राज्यों में भी स्कूल बंद हो चुके हैं। नेशनल कोईलिएशन फाॅर एजूकेशन की रिपोर्ट के अनुसार राजस्थान में 17,129, गुजरात में 13,450, कर्नाटक में 12,000, आंध्र प्रदेश में 5,503, उडि़सा में 5000, तेलंगाना में 4000, मध्य प्रदेश में 35,00, उत्तराखंड़ में 12,000 स्कूल बंद हो चुके हैं। तुर्रा यह कि उत्तराखंड़ के जिन स्कूलों को बंद किए गए उनमें से कुछ स्कूलों के कमान एक निजी संस्था के हाथों सौंपे जाने की बात हो रही है। वह संस्था इन सरकारी स्कूलों को अपने टीचर के मार्फत शिक्षण का कार्य संपन्न कराएगी।
सरकारी स्कूलों को बंद करने के पीेछे के तर्क शास्त्र को देखें तो निराशा होती है। तर्क यह दिया जा रहा है कि हमारे पास शिक्षकों की कमी है। हमारी सरकारी स्कूलों की इमारतें माकूल नहीं हैं। स्कूलों में बच्चों की कमी है आदि। यदि इन तर्कों पर विचार करें तो पाएंगे कि इनमें से कोई भी तर्क ऐसे नहीं हैं जो सरकार की सद्इच्छा की ओर इशारा करते हों। दरअसल सरकार शिक्षा के अधिकार अधिनियम 2009 के तहत प्रतिबद्ध तो है कि वो सभी बच्चों को अनिवार्य शिक्षा मुहैया कराए लेकिन जिस तरह के संकेत मिल रहे हैं उससे ऐसा लगता है कि दो विरोधी स्थापनाएं चल रही हैं। उत्तराखंड़ में तो कुछ स्कूलों को बंद कर दिया गया लेकिन कुछ स्कूलों को निजी संस्थानों के हाथों सौंप कर सरकार अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो गई।
यदि किसी भी राज्य में शिक्षकों की कमी है तो आरटीई के अनुसार प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति कर इस कमी से निपटा जा सकता है। लेकिन अभी भी विभिन्न राज्यों में हजारों और लाखों की संख्या में पद रिक्त हैं। कुछ साल पहले बिहार, उत्तर प्रदेश में बीए एमए और बीएलएड आदि डिग्रीधारी प्रतिभागियों को बतौर शिक्षक नियुक्त किया गया था। अफसोस की बात है कि सीटीईटी एवं अन्य डिग्रियां फर्जी पाई गईं। फर्जी डिग्री की वजह से हाल ही में बिहार में 1400 शिक्षकों ने इस्तीफा दे दिया। भवन की हालत ठीक नहीं होने के तर्क के पीछे भी कोई खास दम नजर नहीं आता। यदि भवन कमजोर है तो उन्हें दुरुस्त किया जा सकता है। इन तर्कांे को आधार बना कर स्कूल ही बंद कर देना सीधे सीेधे राज्य सरकार की मनसा को प्रकट करता है।
स्कूलों को बंद करना व बंद होना एक तरह से उस ओर इशारा करता है कि वह दिन दूर नहीं जब केंद्र और राज्य सरकार अपनी शिक्षा प्रदान करने की जिम्मेदारी से हाथ पीछे खींच ले। जबकि शिक्षा का मौलिक अधिकार भारतीय संविधान की धारा 21 में शामिल है। वहीं शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 देश के भी 6-14 आयु वर्ग के बच्चों को बुनियादी शिक्षा का अधिकार प्रदान करता है। समाज का एक बड़ा तबका सरकारी स्कूलों पर ही निर्भर है। उनपर पास स्कूल चुनाव का विकल्प नहीं है। ऐसे में हमारे समाज का एक बड़ा गरीब वर्ग विकास और शिक्षा की मुख्यधारा से कट जाएगा।
कितनी विचित्र बात लगती है कि एक ओर हमारा देश डिजिटल इंडिया का सपना देख रहा है और दूसरी ओर गरीब बच्चों के पहंुच से सरकारी स्कूलों को छीना जा रहा है। सरकारी स्कूलों को सुधारने की बजाए उन्हें बंद करना व निजी हाथों में सौंपना कोई सकारात्मक विकल्प नहीं हो सकता। होना तो यह चाहिए कि सरकारी शिक्षा तंत्र यानी विद्यालय संजाल को सुदृढ किया जाए। इसके लिए विश्व बैक से हमें आर्थिक मदद भी मिलते रहे हैं। इतना ही नहीं बल्कि सर्वशिक्षा अभियान के तहत भारत को हर साल करोड़ों रुपए मिले हैं। भारत ने 1990 में एजूकेशन फार आॅल यानी ‘सब के लिए शिक्षा’ के दस्तावेज पर दस्खत किया था। उस दस्तवेज के अनुसार सन 2000 तक सभी बच्चों को शिक्षा मुहैया करा देना था। लेकिन ग्लोबन मोनिटरिंग रिपोर्ट के अनुसार अभी भी 80 हजार बच्चे स्कूल से बाहर हैं। जीएमआर ईएफए ने 2015 के 31 मार्च तक के वैश्विक समय सीमा को बढ़ाने की मांग को स्वीकारते हुए अब 2030 तक किए जाने की बात चल रही है।
दो विरोधाभासी सपनों में हमारा देश सांस ले रहा है। एक ओर डिजिटल इंडिया के सपने आंखों में ठूसे जा रहे हैं वहीं दूसरी गरीब बच्चों से सरकारी स्कूल दूर किए जा रहे हैं। कल्पना कर सकते हैं कि उस डिजिटल इंडिया में कौन वासी हांेगे। लाखों गरीब बच्चे निश्चित ही उस विकसित समाज का हिस्स नहीं बनने वाले हैं। ठीक वैसे ही जैसे छत्तीसगढ़ के आदिवासी समाज से 3000 स्कूल छीन लिए गए। हम नहीं चाहते कि आदिवासी व अन्य बच्चे शिक्षा हासिल कर विकसित समाज में सवाल न पूछने लगंे इसलिए उनसे शिक्षा के अवसर ही छीनने की कोशिश हो रही है।

Friday, July 10, 2015

भाषा नीति बनाने की चिंता


भाषा की मरने की ख़बरें दुनिया के तमाम कोनों से आ रही हैं। जो भी भाषा से जुड़ा है उसे भाषा के मरने की आहट सुनाई देती होगी। लेकिन उन्हें बिल्कुल इससे कोई फर्क नहीं पड़ता होगा जो महज भाषा की रोटी खाते होंगे। भाषा जिंदा रहे या मरे उन्हें हर साल विदेश भ्रमण का मौका मिलता रहे। भाषा के परिवार में हिन्दी एक सदस्या है। इसकी स्थिति को बहुत अच्छी नहीं मानी जा सकती। यदि हम भाषा के वृहत्तर परिवार की बात करें तो आज की तारीख में विश्व की कई भाषाएं या तो मर चुकी हैं या मरने की कगार पर खड़ी हैं। उसे बचाने की चिंता सरकारी प्रयासों पर छोड़ दिया गया है। अफसोस तो तब होता है जब हम सरकारी दस्तावेजों और आयोगों में भी हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं को एक ख़ास किस्म की नीति के तहत होते बर्ताव को देखते हैं। इस दृष्टि से विमर्श करें तो 1963 की राजभाषा अधिनियम भाषा के साथ होने वाले दोयम दर्जंे के व्यवहार की परते खोलती हैं। आजादी से पहले और उसके बाद भी हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं के साथ उपेक्षापूर्ण बर्ताव ही किया गया है। आश्चर्य हो सकता है कि आजादी के बाद कई सारे आयोग और समितियों का गठन किया गया। शिक्षा की बेहतरी के लिए भी आजादी पूर्व से लेकर आजादी के पश्चात भी आयोग और नीतियां बनाई गईं। उन आयोगों और नीतियों में भाषा के नाम पर त्रिभाषा सूत्र तो पकड़ा दिया गया लेकिन कभी भी स्वतंत्र रूप से भाषा आयोग का गठन हुआ हो इसका ध्यान नहीं आता। यह एक कैसी विचित्र बात है कि देश के समग्र विकास की डफली बजाने वालों को कभी भी भाषा आयोग व भाषा नीति बनाने की चिंता ही नहीं सताई। यदि सरकारी पहलकदमी पर नजर डालें तो हमारे पास 1963 की राजभाषा अधिनियम ही है जिसमें सच पूछा जाए तो न केवल हिन्दी के साथ बल्कि अन्य भारतीय भाषाओं के साथ भी गंदा मजाक सा ही किया गया है। लेकिन इस सच और अतीतीय यथार्थ को हम नहीं बदल सकते। हां हम जो कर सकते हैं वह यही हो सकता है कि अभी भी हमारे पास समय है यदि हम चाहते हैं कि हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं को बचा लें तो उसके लिए सरकारी के साथ ही हमारी सांस्थानिक और व्यक्तिगत प्रयास भी अपेक्षित है।

Wednesday, July 8, 2015

स्कूल में पढ़ाई नहीं



स्कूल में बच्चे नहीं आते, मास्टर जी पढ़ाते नहीं हैं। स्कूल में पढ़ाई नहीं होती। इस तरह के आरोप अक्सर लगाए जाते हैं। कहा तो यह भी जाता है कि सरकारी स्कूलों में कामचोर और गैर जिम्मेदाराना लोग आते हैं। उन्हें पढ़ाने नहीं आता। बच्चों को कुछ नहीं बनाना तो सरकारी स्कूल में भेज दो आदि।
ज्बकि हकीकत यह है कि आज भी सरकारी स्कूलों मंे खासे पढ़े लिखे टीचर हैं। उनमें पढ़ाने का जज्बा भी है। लेकिन सबसे बड़ी समस्या यह है कि कई स्कूलों में बच्चे ही नहीं हैं। जहां बच्चे हैं वहां पूरे टीचर नहीं हैं।
सचपूछा जाए तो सरकारी स्कूल कुछ सालों के बाद शायद इतिहास का हिस्सा हो जाए। हम बताया करेंगे कि इस तरह के सरकारी स्कूल हुआ करते थे। इस तंत्र को बचाना जरूरी है। 

Sunday, July 5, 2015

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Friday, July 3, 2015

फर्जी डिग्री वाले मास्टर जी


कौशलेंद्र प्रपन्न
‘कमला बाबू कभी टीचर नहीं बनना चाहते थे। न ही उनके खानदान में कोई टीचर हुआ। परिवार के सभी सदस्य लाल बत्ती की लालसा में बुढ़ा गए। उम्र के ढलान पर कोई बैंक पीओ की परीक्षा पास कर बैंक में लगा तो कोई रेलवे मंे नौकरी कर रहा है। कमला बाबू भी शुरू से ही मास्टर जाति से ही चिढ़ते थे। लेकिन भाग्य का खेल देखिए कि अंत में मास्टरी करनी पड़ी। उम्र निकली जा रही थी सो उनके अपने जमाने में गांव जेवार में प्रसिद्ध पिताश्री ने राय दी कि कहीं से बी.एड की डिग्री मिल जाए तो तेरा बेड़ा पार हो जाएगा। मेरा क्या है आज हैं कल चले जाएंगे। लेकिन तेरी में पूरी जिंदगी पड़ी है। ...और देखते ही देखते फस्ट डिविजन की बी एड की डिग्री कमला बाबू के हाथ में आ गई और गांधी मैदान में जाकर धक्का मुक्की कर नौकरी भी अपने गांव के पास वाले उच्च विद्यालय में पा ली।’
उक्त पंक्तियां किसी कहानी या उपन्यास की हो सकती है। रोचक भी लगेंगी जब आप इस कहानी को पढ़ेंगे। लेकिन वास्तव में यह कहानी की पंक्तियां नहीं हैं। यह जमीनी तल्ख हकीकत बयां करती सच्चाइयंा हैं। बिहार राज्य में अब 1400 स्कूली शिक्षकों ने स्वतः ही नौकरी से इस्तीफा दे दिया है। लेकिन आप चैंके नहीं। उन्होंने प्रसन्नता व स्वेच्छा से नहीं किया है। बल्कि उच्च न्यायालय का आदेशों का पालन किया है इन 1400 शिक्षकों ने। उच्च न्यायालय का आदेश आया था कि जिन भी शिक्षक के पास फर्जी डिग्री है वे स्वयं से इस्तीफा दे दें वरना पकड़े जाने पर आर्थिक दंड़ भुगतना पड़ सकता है। उच्च न्यायालय के इस आदेश के बाद इस्तीफा देने वालों की संख्या और भी बढ़ सकती है। बिहार शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव आर के महाजन ने स्वीकारा है कि हमें उम्मीद है अभी और इस्तीफे होंगे। यह संख्या हजारों में हो सकती है। गौरतबल है कि बिहार में प्राथमिक शिक्षकों की संख्या तकरीबन 3.5 लाख है। उच्च न्यायालय ने आठ जुलाई तक का समय दिया है कि जिनके पास भी फर्जी डिग्री है वे स्वतः ही इस्तीफा दे दें।
याद हो कि नितीश कुमार ने 2010 में खुलेतौर पर गांधी मैदान में शिक्षकों को नियुक्ति पत्र बांटे थे जिनके पास भी बीए एम ए एव ंबी एड की डिग्री थी वे सब शिक्षक बन गए थे। सरकारी आंकड़ों के में दर्ज हो गया कि बिहार में शिक्षकों के पद भर लिए गए। क्योंकि आरटीई के अनुसार शिक्षकःछात्र अनुपात 25ः1 और 35ः1 का रखा गया है। वहीं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मुहैया कराने के लिए पर्याप्त शिक्षकों की आवश्यकता थी। इस कमी को बिहार सरकार ने इस तरह से पूरा किया। जबकि आरटीई में यह भी प्रावधान है कि शिक्षक प्रशिक्षित होंगे। लेकिन हालिया बिहार राज्य से आ रही खबरें बताती हैं कि अधिकांश शिक्षकों के पास टीईटी के प्रमाण पत्र तक फर्जी हैं। टीईटी पास के प्रमाणपत्रों में दर्ज अंकों में भी झोल पाया गया है। माना जा रहा है कि टीईटी के प्रमाण पत्रधारियों में कई तो ऐसे हैं जिन्होंने दो दो जिलों से हासिल किए हैं। खबर के अनुसार पटना प्रमंडल में 75 से 76 नियोजित शिक्षकों के टीईटी प्रमाण पत्र कई जिलों से मिले हैं। पचीस से तीस टीईटी प्रमाण पत्र के सीरियल नंबर में काफी अंतर पाया गया है।
गौरतलब हो कि जम्मू के उच्च न्यायालय में न्यायाधीश ने एक शिक्षक को गाय पर लेख लिखने को कहा था लेकिन शिक्षक जब नहीं लिख पाया तब न्यायाधीश ने आदेश दिया था कि इस तरह की शिक्षा की मिठाई की दुकानें बंद होनी चाहिए। कुछ कुछ ऐसा ही मंजर बिहार की इस घटना में दिखाई देती है। बल्कि न केवल बिहार,उत्तर प्रदेश एवं अन्य राज्यों में भी कड़ाई की जाए तो हकीकत सामने आने मंे देरी नहीं लगेगी। इस तथ्य से कोई कैसे इंकार कर सकता है कि यदि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे सामान्य हिन्दी के वाक्य, शब्द, एवं गणित में सक्षम नहीं हो रहे हैं तो इसके पीछे कहीं न कहीं शिक्षक भी शक के घेरे में आता है। यह कहना सरलीकरण नहीं होगा कि आज शिक्षण पेशे में वही लोग आते हैं जिनके लिए बाकी सारे रास्ते बंद हो जाते हैं। पहली इच्छा व चुनाव बहुत कम शिक्षकों का होता है।
एक मौजू सवाल यह उठता है कि जब शिक्षण कर्म ने आपको नहीं चुना। आपने जब अंत में ही सही यदि शिक्षण को पेशे के तौर पर चुन लिया तो इस कर्म और पेशे का धर्म तो निभाना बनता है। जब शिक्षक खुद धोखाधड़ी से डिग्रियां हासिल कर जीवन में कम से कम शिक्षक बन रहा है वह बच्चों को किस तरह के मूल्य और आदर्श का पाठ पढ़ा पाएगा। कहते हैं बच्चे सबसे ज्यादा अपने शिक्षक/शिक्षिकाओं का अपना आदर्श ही नहीं मानते बल्कि अपने शिक्षक के करीब भी होते हैं। जब बच्चों को मालूम चलेगा कि उनके शिक्षक के पास फर्जी डिग्री थी और उन्होंने इसलिए नौकरी छोड़ दी तो बच्चों और समाज में किस तरह की छवि और संदेश जाएगा। हालांकि फर्जीवाड़ा न केवल शिक्षक कर रहे हैं बल्कि अन्य नौकरियों में भी फर्जी डिग्री की अनुगंूज सुनाई देती रहती है। यानी समस्या का जड़ कहीं और है। उस जड़ को समाप्त करने की बजाए तने और पत्तियों को काटने छांटने से समस्या का हल तात्कालिक तो हो सकता है स्थाई नहीं।
अध्यापक भी इसी समाज का हिस्सा है। इस नाते उसमें भी सामाजिक चालाकियां, धूर्तता आदि आनी स्वभाविक है। जब हमने बीएलएड, बी एड किए हुए शिक्षकों की योग्यता पर सवाल खड़ा किया और उन्हें एक नए किस्म की छलनी से छानने की बात पूरे देश में मानव संसाधन मंत्रालय ने शुरू किया तब तमाम नागर समाज मौन साध कर बैठ गए। सबने शामिल बजा बजाया कि हां हां सही है ठीक है मास्टर हमारे नालायक हैं। उन्हें कुछ नहीं आता। इनको एक और परीक्षा से गुजारा जाए। जो पास हुआ वो पार हुआ। जो पास नहीं हुआ उसने जुगाड़ लगाया। जबकि एक बार संदेह करने से पहले शिक्षक-प्रशिक्षण संस्थानों की चाल-ढाल पर भी नजर डालना लाजमी था कि क्या इन पूर्व शिक्षक प्रशिक्षण कोर्स में इस लायक बनाया जाता है कि वो कक्षा-कक्ष में पढ़ा सकें। क्या उन्हें स्वयं गुणवत्तापूर्ण शिक्षण-प्रशिक्षण मिल पाए जिसकी उम्मीद नागर समाज करती है। यह एक प्रश्न यह भी उठता है कि जिस गैर जिम्मेदाराना तरीके से बी एड की डिग्रियां चबेने की तरह बांटी गईं व बांटी जा रही हैं ऐसे में हम कितनी गंभीरता की उम्मीउद कर सकते हैं। क्या यह किसी से छूपी बात है कि इसी समाज में साठ से अस्सी हजार में बी एड में नामांकन से लेकर बिना क्लास में पढ़ाए सीधे परीक्षा में बैठने की प्रक्रिया पूरी कर ली जाती है। उन्हें सत्तर और अस्सी प्रतिशत अंक भी आ जाते हैं लेकिन जब वे कक्षा में जाते हैं तब उनके वे अंक साथ नहीं देते। साथ देती है तो सिर्फ उनकी समझ और पूर्व ज्ञान जो कभी उन्होंने पढ़ा और गुना हो तो।


Thursday, June 25, 2015

अरविंद गौंड के साथ एक दिन हमारे शिक्षक प्रशिक्षक


23 जून की सुबह भी कोई खास नई तो नहीं थी, लेकिन एक उत्साह जरूर था कि आज हमारी मुलाकात नाटक के चर्चित नाम- हस्ती श्री अरविंद गौंड़ के साथ काम करने का मौका मिलने वाला है। ये वही अरविंद गौंड़ हैं जिन्होंने रांझना फिल्म में अभिनय तो किया ही है साथ ही फिल्मी जगत के कई हस्तियों को अभिनय का पाठ पढ़ाया है। उनमें कंगणा रानावत हों या फिर सोनम कपूर या रणधीर कपूर इन्हें अभिनय के लिए अरविंद गौंड़ के पास कभी न कभी आना ही पड़ा है। अस्मिता थिएटर ग्रूप के निर्देशक अरविंद गौंड़ ने हमारे साथ पूरा दिन व्यतीत किया।
अंतःसेवाकालीन अध्यापक शिक्षा संस्थान में मास्टर टेनर यानी शिक्षक प्रशिक्षक कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस कार्यशाला से पूर्व हमने शिक्षक प्रशिक्षक कार्यशाला में इंडक्शन मैनुअल और विभिन्न विषयों की कार्यशाला आयोजित की। हमने महसूस किया कि नाट्य विधा को कार्यशाला में शामिल किया जाए। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए हमने एक दिवसीय कार्यशाला की रूपरेखा तैयार की। इस कार्यशाला का उद्देश्य यही था कि शिक्षकों को नाट्य विधा को कैसे कक्षा में इस्तमाल किया जाए इसकी समझ प्रदान की जाए। हमारा मकसद यह भी था कि किसी भी विषय को पढ़ाने के दौरान नाटक का प्रयोग किस तरह से कर कक्षा को जीवंत बनाया जा सकता है।
श्री अरविंद गौंड नाटक के क्षेत्र के जाने माने नाम हैं। इन्हें बुलाने के पीछे मकसद यह था कि प्रशिक्षकों को नाटक विधा की बारीकी और इस्तमाल के बारे में समझ बन सके। नाटक का प्रयोग गणित, भाषा, विज्ञान आदि विषय को पढ़ाने के दौरान नाट्य विधा को प्रयोग कैसे किया जाए।
सुबह 9 बजे से 2 बजे के बीच व्याख्यान कम गतिविधि आधारित कार्यशाला संपन्न हुआ। श्री अरविंद गौंड जी की शैली बातचीत और गतिविधि पर निर्भर थी। मसलन नंबर सेंस को लेकर एक गतिविधि कराई गई जिसमें मानसिक चैकन्नापन की जरूरत तो थी ही साथ ही अपनी बाॅड़ी का समायोजन भी खासे अहम था। वहीं बादल, बंदर, पेड़ की कहानी को नाटक के जरिए कैसे कक्षा में कराया जाए इस पर एक छोटी सी प्रस्तुति की गई।

बंदर और टोपी वाला फेरीवाला की कहानी खासे चर्चित है इस कहानी को वर्तमान समय में किस तरह से आधुनिक तकनीक से जोड़ कर रचा जाए इसका आस्वाद प्रतिभागियों को मिला। बंदर सेल्फी खींच कर फेसबुक पर अपलोड कर रहे थे। लोगों से गुजारिश की गई कि वे लाइक करें और कमेंट भी करें। इस कहानी को नाटक में ढाल कर सबको बेहद आनंद आया।
पुरानी कहानी को नए सिरे से सिरजने का आनंद और सुख बच्चों को कैसे दिया जाए इस तरह की गतिविधियों को जरिए प्रशिक्षकों को मिल पाया। अंत में चार समूहों को स्कूल और शिक्षा से जुड़े मुद्दों को कक्षा में कैसे बच्चों के समक्ष प्रस्तुत किया जाए यह कार्य दिया गया। इन नाटकों/नुक्कड़ नाटकों को जरिए बच्चों और बड़ों के बीच किस तरह से संवेदशीलता पैदा की जाए यह समझ विकसित हो पाई।





कार्यक्रम संयोजक
कौशलेंद्र प्रपन्न

Monday, June 22, 2015

आंगन कहां है अम्मा


घर भर में एक आंगन ही हुआ करता था
जहां अम्मा बैठाकरती थीं
अंचरा में बायन लेकर
रखा करती थीं हाथ में बायन
तोड़ तोड़कर गाजा, लड्डू
ठेकुआं।
आंगन ही था-
जहां बैठा करते थे
पिताजी
स्कूल से लौटकर
रखा करते थे
झोला भरे तरबूज से या मकई से।
हमें पिताजी का इंतजार कम
झोले का जोहा करते थे बाट
डांट भी वहीं मिला करता आंगन में,
धीरे धीरे आंगन बदल गया कमरे में
कमरे दबडे में।
आंगन ही हुआ करता था
जहां गड़ता था बांस
मंड़प भी वहीं छवाया जाता था
हल्दी भी वहीं लगती थी बहन या भाई को।
आंगन ही था जहां दादी रखी गई थीं-
सोई थीं दादी अंतहीन यात्रा पर जाने के बाद
सभी वहीं हुए थे इकट्ठे
चाचा, चाची,
बुचुनिया की माई
ओमबहु
सब वहीं लोर बहाए थे
वह आंगन ही था।
टू प्लस वन
या त्रि प्लस वन में
कई बार चक्कर काट चुका हूं
कहीं आंगन नहीं मिला
न मिली वह जगह जहां संग संग बैठ सकें सभी
कभी जुट जाएं रिश्तेदार,
भाई बहन।
वैसे भी अब ये लोग भी तभी आते हैं
जब कोई शादी ब्याह हो
या फिर......

Sunday, June 14, 2015

अथा तो योग विवाद अनुशासनम्


अथा तो योगानुशासनम् पातंजलि के योगदर्शन का पहला सूत्र है। छः दर्शनों में एक दर्शन योग दर्शन है। इन दिनों योग पर ही विवाद खड़ा हो गया है। यहां स्पष्ट हो जाना चाहिए कि यम,नियम,आसन,प्राणायाम,धारणा, ध्यान समाधिः आदि मिल कर योग बनते हैं। लेकिन विवाद योग के एक अंग आसन पर उठा है। आसन में भी सिर्फ एक आसन सूर्यनमस्कार पर। यह कहीं भी जिक्र नहीं मिलता कि सूर्यनमस्कार में मंत्रों का उच्चारण किया ही जाए। माना जाता है कि सूर्यनमस्कार में दस आसनों का समावेश है। इस एक आसन को करने से तकरीबन दस आसनों का लाभ मिलता है। आसन प्राणायाम करने से शारीरिक और मानसिक शांति और सौष्ठव से किसी को भी गुरेज नहीं हो सकता। विवाद यहां उठा कि सूर्यनमस्कार के दौरान मंत्रोंच्चारण करना पड़ता है।
मेरा खुद का अनुभव कुछ और कहता है। मैंने कभी मंत्रों का जाप नहीं किया लेकिन आसन नियमित करता रहा। इसका परिणाम यह हुआ कि आज भी कठिन से कठिन आसन कर लेता हूं। हाथ पर चलना हो या अद्र्ध त्रिकोणासन सहजता से करता हूं। बद्ध मयूरासन से लेकर बद्ध सिरसासन भी करता हूं। पिछले कुछ सालों से नियमित नहीं कर पाने की वजह से कमर बढ़ गया था। पुरानी पैंटें नहीं आती थीं। लेकिन पिछले दिसंबर से नियमित आसन करने की वजह से आज पुरानी पैंटें पहन पा रहा हूं।
मेरी तो राय यही है कि एक खास आसन के साथ मंत्र को जोड़ कर योग के महत्व को नकारा नहीं जा सकता।

Thursday, June 4, 2015

कहां हो उर्दू




कौशलेंद्र प्रपन्न
पिछले दिनों पूर्वी दिल्ली नगर निगम के उर्दू शिक्षकों के लिए टेक महिन्द्रा फाउंडेशन में तीन दिवसीय उर्दू शिक्षण कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस कार्यशाला में तकरीबन 11 प्रतिभागियों की सहभागिता रही। यूं तो पूर्वी दिल्ली नगर निगम में उर्दू माध्यम में पढ़ाने वाले कम से कम 200 शिक्षक हैं। अकेले पूर्वी दिल्ली नगर निगम में 17 उर्दू माध्यम के स्कूल चल रहे हैं। लेकिन प्रशिक्षण कार्यशाला में अनुपस्थिति बताती है कि हम कितनी संजीदगी से उर्दू और उर्दू शिक्षण को लेते हैं। जो आए थे उनकी खुद की उर्दू की समझ जिस स्तर की थी उसे देखकर अंदाजा लगाना कठिन नहीं था कि इनके द्वारा कक्षा में किस गंभीरता के साथ उर्दू पढ़ाई जाती होगी। हमलोग अक्सरहां तमाम रिपोर्ट के हवाले से कहते रहते हैं कि कक्षा 6 ठीं व आठवीं में पढ़ने वाले बच्चों को कक्षा 2 री व तीसरी की भाषायी समझ और गणित की दक्षता नहीं है। यहां तो एम ए और बी एड किए हुए उर्दू शिक्षकों का आलम यह था कि उन्हें यह भी नहीं मालूम था कि उर्दू में कितने वर्ण होते हैं और तलफ्फुज़ कैसे दुरुस्त करें। बच्चों को अलिफ, बे, पे ते से आदि वर्णों को कैसे पढ़ाएं यह तो दूर की बात है। किसी भी भाषा के कौशलों की जब बात की जाती है कि उसके चार कौशलों की बात किए बगैर हम आगे नहीं बढ़ सकते। सुनना, बोलना, पढ़ना और लिखना। उर्दू शिक्षण में अल्फाजों को कैसे बोलें, लिखें और पढ़ें इन कौशलों के विकास के लिए शिक्षक अभी भी पुरानी तरकीबें ही अपना रहे हैं। गौरतलब है कि दिल्ली में उर्दू माध्यम के स्कूल और शिक्षकों की ख़ासे कमी है। उर्दू माध्यम के शिक्षकों की नियुक्ति 1990 के बाद नहीं हुई।
बतौर एक अध्यापिका, ‘अब बच्चे उर्दू माध्सम से पढ़ना नहीं चाहते।’ वजह बताती हैं कि कई बार हमारे पुराने बच्चे जो अब छठीं व आठवीं में आ चुके हैं वे बताते हैं कि उन्हें उर्दू में पढ़ाने वाला कोई नहीं है। विज्ञान, गणित, समाज विज्ञान को उन्हें हिन्दी माध्यम में पढ़ाया जाता है उन्हें कुछ भी समझ नहीं आता। यह एक बड़ा कारण है कि बच्चे तो बच्चे बच्चों को अभिभावक भी खुद अब नहीं चाहते कि उनका बच्चा उर्दू माध्यम से तालीम हासिल करे। क्योंकि जैसे जैसे बच्चे उपर के दर्जें में दाखिल होते हैं उन्हें उर्दू माध्यम में तालीम मुहैया नहीं कराई जातीं। ऐसे में बच्चे हतोत्साहित होते हैं।
यदि उर्दू जुबान की बात करते हैं तो पुरानी दिल्ली और ज़ाफराबाद की उर्दू में भी फ़र्क मिलता है। जिस किस्म की उर्दू के उच्चारण हमें पुरानी दिल्ली में सुनने को मिलती है वह दिल्ली के दूसरे कोनों में बोली जाने वाली उर्दू से कहीं अलग है। उर्दू बतौर भाषा एवं विषय के तौर पर पूरे भारत में पढ़ाई जा रही है लेकिन अफसोसजनक बात यह है कि इस भाषा के साथ राजनीतिक बरताव तो होते हैं किन्तु इस भाषा के विकास और उन्नयन के लिए पुख्ता कोई कदम नहीं उठाए गए हैं।
अक्सर भाषायी गोष्ठियों में यह सवाल बड़ी शिद्दत से उठायी जाती है कि उर्दू और हिन्दी को दो नजरिए से देखा जाता रहा है। एक ओर हिन्दी और दूसरे मुहाने पर खड़ी उर्दू हमेशा से ही उपेक्षित रही है। जबकि यह तर्क देने वाले भूल जाते हैं कि आमफहम ही भाषा में उर्दू का समावेश जिस सहजता के साथ होता आया है उसे देखते सुनते हुए इसका इल्म भी नहीं होता कि हिन्दी में उर्दू इस कदर गुम्फित है कि उसे निकालना संभव नहीं है। यदि उर्दू, अरबी, फारसी के शब्दों को हिन्दी से कान पकड़कर बाहर कर दें तो वह हिन्दी कैसी होगी इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है। हाल ही में मानव संसाधन मंत्रालय को सुझाव दिए गए कि हिन्दी से उर्दू, अरबी, फारसी के शब्दों मसलन दोस्त, अखबार, दफ्तर, बाजार जैसे शब्दों को निकाल बाहर करना चाहिए। इसके पीछे के तर्क को सुन कर हंसी ही आ सकती है कि इससे हिन्दी खराब हो रही है। इस तरह हिन्दी अशुद्ध हो रही है। इन तर्कों की मनसा पर ठहर कर विचार करें तो पाएंगे कि यह एक ख़ास वैचारिक पूर्वग्रह से उठाई गई मांग है। जबकि भाषा विज्ञान और भाषाविद् की दृष्टि से विचार करें तो पाएंगे कि किसी भी भाषा में विभिन्न बोलियों, भाषाओं के शब्द उन्हें खराब करने की बजाए उन्हें सवंर्धित ही करते हैं। वह चाहे हिन्दी हो उर्दू हो या फिर अन्य भाषाएं।
प्रेमचंद ने शुरूआती दौर में हिन्दी मंे नहीं लिखा करते थे। प्रेमचंद साहित्य के जानकार इस बात से वाकिफ हैं। उनकी पहली हिन्दी कीह कहानी तकरीबन 1916 के आसपास आती है। उससे पहले प्रेमचंद की लेखकीय भाषा हिन्दी नहीं थी। इस तथ्य से भी मुंह नहीं मोड़ सकते कि भाषा की छटाएं विभिन्न भाषा-बोलियों के शब्दों से और भी प्रभावकारी हो जाती हैं। जो लोग भाषायी शुद्धता के तर्क पर हिन्दी और उर्दू को अलग करना चाहते हैं उन्हें इसपर भी विचार करना होगा कि क्या वे गंगा जमुनी संस्कृति यानी हिन्दी-उर्दू की मिलीजुली तहजीब को विलगाना चाहते हैं? क्या वे चाहते हैं कि भाषायी संघर्ष और भाषायी फांक को बढ़ाया जाए।
आज उर्दू की हालत कुछ तो राजनीति और कुछ भाषायी शुद्धतावादियों की वजह से खराब है। यदि उर्दू भाषा को एक खास वर्ग,जाति, धर्म एवं संप्रदाय के अलग कर के देखने की कोशिश करें तो पाएंगे  िकवह जुबान हमारे हिन्दुस्तानियों की आज भी रही है। आजादी के बाद की जो पीढ़ी जिंदा है वो आज भी पंजाबी एवं हिन्दु परिवार उर्दू के अखबारों को चाव से पढ़ते है। उनकी पंजाबी भी कहीं न कहीं उर्दू के साथ गलबहियां किया करती है।


Wednesday, June 3, 2015

गुणवता के लिए शिक्षक प्रशिक्षण जरूरी



हाल ही में बिहार राज्य में शिक्षकों को प्रशिक्षित करने के लिए विश्व बैंक ने पैंतालीस हजार डाॅलर देने की घोषणा की है। इस राशि को देने के पीछे तर्क यह दिया गया कि बिहार में शिक्षा की गुणवत्ता में गिरावट का एक बड़ा वजह वहां के शिक्षकों में प्रशिक्षण की कमी है। इन पैसों के आधार पर बिहार के प्रारम्भिक शिक्षकों को प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा। कहा यह भी गया है कि यदि बिहार में सभी बच्चों को स्कूल में दाखिल करना है तो उतने ही शिक्षकों की आवश्यकता भी पड़ेगी और इस लिहाज से वहां के शिक्षक पर्याप्त नहीं हैं। शिक्षकों की कमी भी इन्हीं आर्थिक सहायता राशि से दूर की जाएगी। यूं तो पूरा ही देश शिक्षकों की कमी से जूझ रहा है। दिल्ली से लेकर झारखंड़ तक। जम्मू से लेकर कन्या कुमारी तक हर राज्य में हजारों के पद खाली पड़े हैं। शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के अनुसार शिक्षकों की कमी भी 31 मार्च 2013 तक पूरी कर ली जानी थी। शिक्षकों की को लेकर उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय ने भी समय समय पर सरकार से जवाब तलब किए हैं लेकिन परिणाम में कोई अंतर नहीं देखाई दिया। हालात वहीं के वहीं हैं। आरटीई के प्रावधानों के अनुसार 25 एवं 31 बच्चों पर एक शिक्षक होने चाहिए। वे शिक्षक प्रशिक्षित होने चाहिए इसकी वकालत और सिफारिश आरटीई करती है। लेकिन देश के अधिकांश सरकारी स्कूलेां में स्थितियां बिल्कुल विपरीत हैं। राज्यों में प्रशिक्षित शिक्षक नहीं हैं। बारहवीं और बीए, एमएम पास छात्रों को तदर्थ पर शिक्षण कर्म में लाया जा रहा है। गौरतबल है कि 2010 के आसपास बिहार में गांधी मैदान में खुलआम नियुक्ति पत्र बांटे गए थे। लेकिन आरटीई के अनुसार नियुक्ति के दो वर्ष के भीतर उन शिक्षकों को प्रशिक्षण मुहैया कराना राज्य सरकार की जिम्मेदारी बताई गई थी। इसी तर्ज पर उत्तर प्रदेश राज्य में भी हजारों की संख्या में शिक्षकों के रिक्तों को भरा गया था।
शिक्षा की गुणवत्ता का जहां तक प्रश्न है तो कोई भी राज्य ऐसा नहीं है जहां एक ओर जिला प्रखंड़ शिक्षण संस्थान यानी डाईट की स्थापना की गई है। वहीं विभिन्न विश्वविद्यालयों में शिक्षक-प्रशिक्षण कार्यक्रम एवं पाठ्यक्रम चलाए गए। इन संस्थानों की स्थापना के पीछे मकसद यही था कि राज्यों में शिक्षकों की प्रशिक्षण गुणवत्ता सुनिश्चित की जाएगी। लेकिन जिन हालात में इन संस्थानों से छात्र निकलते हैं उनकी शैक्षिक समझ और शिक्षण गति को देखकर लगता है इनके द्वारा कक्षा में किस प्रकार शिक्षण किया जाता होगा। हर साल गैर सरकारी और सरकारी आंकड़े जारी किए जाते हैं जिन्हें देखकर चिंता गहरी हो जाती है कि हम अपने बच्चों को किस प्रकार की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मुहैया करा रहे हैं। हमारे बच्चे प्राथमिक स्तर पर कक्षा एक व छः कक्षा की भाषायी समझ और गणित के सामान्य से हल नहीं कर पाते। भाषा और गणित के अलाव विज्ञान और सामान्य विज्ञान की समझ भी उनकी कक्षा और उम्र के अनुसार नहीं है। क्या हमारी प्रशिक्षण और शिक्षण विधि पर एक बड़ा सवाल खड़ा नहीं करता। क्या हमें हमारी शिक्षा की पतली होती धारा दिखाई नहीं दे रही है? यदि हम इस प्रवृति को अभी नहीं देख पा रहे हैं तो निश्चित ही आने वाले वर्षांे में हम किस प्रकार के पौध बो रहे हैं इसका अनुमान होना चाहिए।
शिक्षकों के प्रशिक्षण को लेकर सरकारी और गैर सरकारी तंत्र अपने अपने तरीके से प्रशिक्षण कार्यक्रम चला रही हैं, लेकिन विचार करने की आवश्यता यह है कि इन संस्थानों में दी जाने वाली प्रशिक्षण औजारों की गुणवत्ता कितनी है? किस स्तर की प्रशिक्षण दक्षता उनमें प्रदान की जा रही है। क्या महज अंकों के पहाड़ खड़े किए जा रहे हैं? क्या सिर्फ परीक्षा पास करने की तालीम दी जा रही है या आगामी वर्षों में शिक्षा को किस प्रकार की चुनौतियां से सामना करना होगा इस ओर भी सचेत किया जा रहा है। शिक्षा के क्षेत्र में आने वाले छात्र अमूमन पाठ्यपुस्तकों के अलावा कुछ भी पढ़ाना नहीं चाहते। वे अपनी पाठ्यपुस्तकों को भी महज अंकीय दृष्टि से ही पढ़ते हैं। उन्हें जो अन्य सहायत पुस्तकें बताई जाती हैं वे पढ़ना उन्हें वक्त जाया करना सा लगता है। यही वजह है कि शिक्षण कर्म में आने के बाद उनकी शैक्षिक लेखन, शोध पत्रों आदि अकादमिक गतिविधियों में रूचि नहीं पैदा हो पाती। क्या इस रूचि के पैदा करने में उनके शिक्षकों के योगदान को नकारा जा सकता है।

शिक्षकीय दुनिया की कहानी के पात्र

कौशलेंद्र प्रपन्न ‘‘ इक्कीस साल के बाद पहली बार किसी कार्यशाला में बैठा हूं। बहुत अच्छा लग रहा है। वरना तो जी ...