Monday, April 8, 2019

तनावों से लड़ने की सीख देती शिक्षा


कौशलेंद्र प्रपन्न
शिक्षा न केवल हमारी जिं़दगी को आकार देने, मायने प्रदान करने और जीवन के मकसद निर्धारित करने में मदद करती है बल्कि जीवन मूल्यों, जीवन कौशलों को सीखने की तमीज़ भी पैदा करती है। संभव है उक्त अपेक्षाएं कोरी मूल्यपरक लगें किन्तु तमाम शिक्षाविद्, शैक्षणिक दस्तावेज़, शिक्षा दार्शनिकों की मानें तो उनपर सबकी एक ही राय शिक्षा के प्रति बनती है कि शिक्षा हमें बेहतर मनुष्य बनने में मदद करती है। बेहतर मनुष्य से सीधा तात्पर्य यही है कि हमारे अंदर अच्छे -बुरे, करणीय अकरणीय, शिष्ट और अशिष्ट के बीच अंतर करने की बौद्धिक समझ हो। क्या स्वयं के लिए और क्या समाज के लिए बेहतर है आदि की समझ शिक्षा अपनी यात्रा में विद्यार्थियों को तालीम दिया करती है। दीगर बात है कि शिक्षा के इस प्रयास में कई अवांतर हस्तक्षेप की वजह से शिक्षा कई बार अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो पाती। इसमें हम राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक हस्तक्षेप को रेखांकित कर सकते हैं। इतिहास बताता है कि राजनीति ने समय समय पर शिक्षा के इस प्रयास को अपने तई बदलने और रास्ते मोड़ने से भरपूर प्रयास किए हैं। काफी हद तक इस राजनीतिक हस्तक्षेप में विभिन्न दलों को सफलता भी हासिल हुई है। यही वजह है कि शिक्षा समय समय पर अपने मूल राह से भटकी हुई भी नज़र आती है। जबकि यह भटकाव शिक्षा की मूल प्रकृति नहीं है, बल्कि इसे प्रभावित करने में कई बाह्य कारक प्रभावी होते हैं।
हमारी शिक्षा एक ओर पाठ्यपुस्तकीय समझ और कौशल प्रदान करती जिसके ज़रिए हम परीक्षा की नदी तो पार कर लेते हैं लेकिन जीवन कौशल और व्यावहारिक दक्षता हासिल करने से चूक जाते हैं। वहीं दूसरी ओर शिक्षा हमें जीवन और इससे जुड़ी बारीक समझ विकसित करने में पीछे रह जाती है। मसलन विपरीत परिस्थितियों में कैसे समायोजन स्थापित करें, यदि कार्य स्थल या निजी जीवन में संघर्षां, तनावों, दुश्चिंताएं हैं तो उन्हें कैसे प्रबंधित किया जाए इसकी समझ व्यापक न होने की स्थिति में बच्चे एवं व्यस्क जीवन से कूच कर जाते हैं। हाल ही में दसवीं की एक बच्ची ने परीक्षा परिणाम देखने के बाद आत्महत्या का राह चुना और शिक्षा-जीवन और समाज को छोड़ गई। परीक्षा परिणाम घोषित होने के बाद आत्महत्या का सिलसिला बतौर जारी है। हर साल परीक्षा परिणाम के बाद देशभर में जो बच्चे असफल होते हैं उनमें कई बच्चे/बच्चियां जीवन की विफलता मान बैठते हैं और वह वयैक्तिक हानि, असफलता मान जीवन जीने के लायक स्वयं को न मान आत्महत्या का रास्ता चुनते हैं। ऐसी घटनाओं को संज्ञान में लेते हुए 2007 के आस-पास एनसीईआरटी, सीबीएससी आदि संस्थाएं मिलीं और शिक्षाविद्ों ने परीक्षा की प्रकृति पर मंथन किया। अंत में इस निर्णय पर आम सहमति बनी कि परीक्षा के प्रश्न पत्रों के स्वरूप में बदलाव किए जाएं। अंक के स्थान पर श्रेणी (ग्रेड) दी जाए। जब अराटीई अप्रैल 2010 में लागू हुई तो इसमें किसी भी बच्चे को फेल न करने के प्रावधान को तवज्जो दी गई। इससे उम्मीद थी कि बच्चों में परीक्षा संबंधी तनाव और भय को कम कर लिया जाएगा। अफ्सोसनाक हक़ीकत तो यथावत् रही। बच्चे आत्महत्याएं करते रहे। परीक्षा का भय बतौर ज़ारी रहा।
शुरू में बच्चों में शिक्षा को लेकर भय का माहौल बनता है। बच्चे स्कूल नहीं जाना चाहते। उन्हें स्कूल और घर के मध्य की दूरी को पाटने में हम विफल रहे। यही कारण है कि बच्चों को स्कूल परिसर लुभाने की बजाए डराते हैं। जबकि स्कूलों को बाल रूचि आधारित विकसित करने की कोशिश की जानी चाहिए थी। जो काफी हद तक इस योजना में स्कूलों को बाल सुरूचिपूर्ण रंगों, चित्रों, रेखा चित्रों का आदि का इस्तमाल भी किया गया। इससे बच्चों को स्कूल आना, पढ़ना रूचने लगा लेकिन अभी भी ऐसे बच्चों की संख्या लाखों में थी जिन्हें स्कूल का विकल्प नहीं मिल सका। वे बच्चे शिक्षा की मुख्यधारा से आज तक कटे हुए हैं। शिक्षा से यह कटाव और भी चौड़ा होता है जब हमारी राजनीतिक शक्तियां कम करने की बजाए उसे और गहरी करते हैं। मसलन शिक्षा हासिल करने से वंचित रह गए बच्चां को कैसे शिक्षा की परिधि में लाई जाए इसको लेकर राजनीति पहलकदमियां कम ही दिखाई देती हैं।
डॉक्टर का मानना है कि एक बच्चा जब गर्भ में होता है तब भी वह तनाव में हो सकता है। बच्चे को स्ट्रेस न हो इसके लिए डॉक्टर सलाह भी देते हैं। ख़ासकर जब प्रसव काल होता है तब तो विशेषरूप से डॉक्टर की सलाह होती है कि कोशिश कीजिए बच्चा स्ट्रेस में न हो। इन्हीं तनावों को दूर करने के लिए न केवल कोठारी आयोग बल्कि बाद के तमाम आयोगों ने अपनी संस्तुतियां दीं। वहीं राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 शांति के लिए शिक्षा पर जोर देते हुए शांति का पाठ को पाठ्यचर्या का मुख्य हिस्सा बनाया। दीगर बात है कि शांति के लिए शिक्षा पर अभी मजबूती से काम होना शेष है। वहीं हैप्पीनेस करिकूलम भी लांच किया गया। इसके मार्फत दावा तो यही किया गया कि बच्चों में शिक्षा और परीक्षा आदि को लेकर भय को दूर किया जा सकेगा। इस हैप्पीनेस करिकूलम का आधार यही शिक्षा की बुनियाद को बनाया गया कि बच्चा प्रसन्न और आनंदपूर्ण तरीके से सीखने-सिखाना की प्रक्रिया का हिस्सा बन सके। बच्चे स्कूल स्वेच्छा से आएं और आनंद आनंद में शिक्षा की बारीकियों से जुड़ सकें। हालांकि यह अभी एक ही राज्य में लागू है। दूसरे शब्दों में कहें तो इस करिकूलम की सफलता की व कहें कितना कारगार है इसकी समीक्षा बाकी है। वहीं दूसरी ओर हाल ही में सोशल, इमोशनल और ईथिकल करिकूलम के नाम से दलाई लामा ने विश्व के तकरीबन तीस से भी ज्यादा शिक्षा के विभिन्न क्षेत्रों से संबद्ध शिक्षाविद्यों द्वारा तैयार करिकूलम लॉच किया। इस करिकूलम के पीछे के विमर्श को समझने की कोशिश करें तो एक बात स्पष्ट होती है कि हमें विश्व में शांति  की स्थापना करनी है और युद्ध को रोकना है तो उक्त पाठ्यक्रमों से बच्चों को जोड़ना होगा। इस करिकूलम की मुख्य स्थापना यह भी है कि पूर्व के पाठ पढ़ाने यानी उपदेश के तर्ज रखने से परहेज किया गया है। इस करिकूलम के जरिए सामाजिक, संवेदनात्मक आदि मूल्यों की शिक्षा देने का प्रयास किया जाएगा।
गौरतलब हो कि सोशल, इमोशनल और ईथिकल करिकूलम (एसइइ) शायद पहली बार एनसीईआरटीएत्तर किसी और संस्था ने निर्माण किया है। इससे पूर्व 1975, 1985, 1988, 2000 और अंतिम 2005 में राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा का निर्माण हुआ। इन तमाम रा.पा.रू में परीक्षा और शिक्षा की प्रकृति को पुनर्परिभाषित करने की कोशिश की गई थी। यदि 1975 की रा.पा.रू की बात करें तो इसमें जिक्र है ‘‘ जहां स्कूल में केवल शुष्क शैक्षिक अनुभव दिए जाते हैं या मूल्यांकन की विधि रटने की प्रवृत्ति को प्रोत्साहित करती है, वहां यह सब निरर्थक हो जाता है, जिस पर हमने अभी तक विचार-विमर्श किया।’’ पेज 47। यह दस्तावेज मानता है कि मूल्यांकन का तरीका ऐसा होना चाहिए जिससे विद्यार्थी अपने ज्ञान के उपयोगपूर्वक नई स्थितियों से जूझने एवं समस्याओं का समाधान ढूंढ़ने की ओर बढ़ सकें। वहीं 1988 की पाठ्यचर्या यह मानती है कि पढ़ने-पढ़ाने के तौर-तरीके, पाठ्यचर्या इत्यादि में कई परिवर्तन किए गए, पर परीक्षा के क्षेत्र में कोई ख़ास प्रयास नहीं हुए। यही वजह है कि शिक्षा पर परीक्षा का वर्चस्व आज भी बना हुआ है। डॉ ऋतुबाला अपने शोध लेख में इस बाबत लिखती हैं कि पाठ्यचर्या 1988 न्यूनतम अधिगम स्तर की सिफारिश करती है, साथ ही साथ राष्ट्रीय टेस्टिंग सेवा की संस्तुति भी। ज्ञातव्य है कि ये दोनों ही विषय राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 एवं उसकी कार्य योजना में देखने को मिलती है। पाठ्यचर्या का मानना है कि शारीरिक, संज्ञानात्मक एवं भाविक एवं साइको-मोटर स्किल को भी परीक्षा अपने दायरे में लाए। परिप्रेक्ष्य, पेज 20, वर्ष 24, अंक 3, दिसंबर 2017 दिलचस्प तो यह भी है कि पीछे तकरीबन हर पांच या दस साल में राष्ट्रीय पाठ्यचर्याएं बनाई गई हैं। अंतिम 2005 में बनी थी। इसे बने हुए भी दस साल से ज्यादा वक्त हो चुका है। कायदे से तनावों, चिंताओं, जीवन के संघर्ष आदि से कैसे एक बच्चा और व्यस्क जूझे और बाहर आ सके इसकी तालीम देने की ज़रूरत है।
हालांकि कई चीजें जीवन-संघर्ष सीखा देती हैं। किन्तु शिक्षा की इसमें अहम भूमिका होती है कि हम कैसे अपनी संवेदनाओं, भावनाओं पर नियंत्रण स्थापित कर सकें। न केवल बच्चों को बल्कि शिक्षकों को भी इसकी तालीम देने की आवश्यकता है कि वो इमोशनल मैंनेजमेंट और भावनाओं की समझ कैसे पैदा करें। बच्चों में इमोशनल साक्षरता कैसे विकसित की जाए इसकी समझ, तैयारी और प्रशिक्षण प्रदान करने की आवश्यकता पड़ेगी। जब एक ओर हमारा शिक्षक स्वयं तनाव और संघर्षों के बीच सामंजस्य स्थापित करने में असफल होता है तो वह कैसे बच्चों को कक्षा में भावना प्रबंधन की सीख दे पाएगा।

Monday, April 1, 2019

व्यक्ति को लीलता तनाव



कौशलेंद्र प्रपन्न 

किसी के भी जाने की न तिथि तय है और न विधि। शायद इसीलिए कहा जाता है हमसब अतिथि हैं। हमारा न आना तय है और न जाना ही। दोनों ही विधि, गति, समय सब कोई और तय करता है। वही लिखकर भेजता है कि किसे कब तक इस धरा पर अपनी भूमिका निभानी हैं। दूसरे शब्दों में हमें न हमारा भविष्य के भूगोल का कुछ अता पता है और न अतीत पर कोई नियंत्रण। यदि हम कुछ कर सकते हैं तो बस इतना ही कि वर्तमान को जीएं और वर्तमान को बेहतर बनाएं। जब कभी कोई हमारे बीच से असमय चला जाता है तो एक बड़ी रिक्तता अपने पीछे छोड़ जाता है। एक ऐसी क्षति जिसे शायद कोई भी भर नहीं सकता। कहने को तो कह सकते हैं कि कोई भी स्थान ख़ाली नहीं रहता। कोई न कोई उस खालीपन को भर देता है। हमारे जीवन में हमारे अत्यंत प्रिये जब जाते हैं तब हम उस क्षति की पूर्ति नहीं कर पाते। उसमें भी जब ऐसा व्यक्ति हो जिसके जाने की अभी उम्र न हो। हालांकि यह तय करना भी हमारे हिस्से या हाथ में नहीं है कि कौन कब जाएगे। कैसे जाएगा? कहां से जाएगा? आदि। किसे कहां की जमीन मयस्सर होगी यह भी आज की तारीख़ अज्ञात है। हम जिस ग्लोबल दुनिया के नागरिक हैं ऐसे में तो और भी यह कहना मुश्किल है कि कौन कहां अंतिम सांसें लेगा। कहां की मिट्टी हासिल होगी। हम जनमते कहीं हैं, पलते बढ़ते कहीं हैं, पढ़ाई लिखाई रोजगार कहीं और करते हैं। ऐसे में जहां रोटी मिलती हैं वहीं के हो कर रह जाते हैं। ताउम्र हमें हमारी मिट्टी याद आती है। हमें हमारी जन्मभूमि पुकारा करती है लेकिन बेहद कम लोग हैं जिन्हें उनकी इच्छा और चाह के अनुसार अपनी मातृभूमि मिल पाती है। 
इस दुनिया आना जितना पीड़ादायी प्रक्रिया से गुजरना होता है उससे ज़रा भी कम तनाव, चिंता, मानोविद्लन नहीं है जीने में। डॉक्टर बताते हैं कि गर्भ में पल रहा बच्चा स्ट्रेस में न हो। प्रसव के वक़्त डॉक्टर कहा करते हैं जितनी मेहनत और कष्ट, प्रयास और तनाव मां सहा करती है वहीं बच्चा भी उतनी भी भावप्रवणता के साथ तनाव में जी रहा होता है। डॉक्टर की सलाह होती है कि बच्चा तनाव में न हो आदि। अनुमान लगाना कठिन नहीं है इस दुनिया में आना भी तनावपूर्ण प्रक्रिया से गुजरना होता है। जब हम आ जाते हैं फिर एक दूसरे किस्म की दुश्चिंताओं, तनावों, संघर्षां, संवेदनात्मक द्वंद्व से रोज़दिन रू ब रू होना होता है। जो लोग विभिन्न तनावों, टकराहटों के बीच सामंजस्य स्थापित करने में कुशल होते हैं वे लोग काम के दबाव एवं तनावों से कैसे निकला जाए इसे मैनेज कर लेते हैं। जो लोग काम और दफ्तर, बॉस और कार्य दबावों को अपनी जिं़दगी से विलगाने में सफल नहीं हो पाते उनके जीवन में दफ्तर और बॉस की छवियां रातदिन परेशान करने लगती हैं। उन्हें समझ नहीं आता कि कब और कहां से एक स्पष्ट रेखा खींची जाए जिसमें दफ्तरी काम और जीवन की अन्य प्राथमिकताओं को तवज्जो दी जाए। ऐसी ही स्थिति में व्यक्ति धीरे धीरे चुप होने लगता है। वह अपने करीबी लोगों से भी कटता चला जाता है। एकाकीपन की ज़िंदगी उसे निराशा और कुंठा की ओर धकेलती चली जाती है। किससे अपनी बात कहे? किससे अपने द्वंद्व साझा करे इस चुनाव में वह और ज्यादा उलझता चला जाता है। एक क्षण ऐसा आता है जब वह या तो हथियार डाल देता है या फिर उसका स्वास्थ्य उसका साथ छोड़ देती है। 
हमारी दुनिया में कौन कौन साथी हैं। किनसे हम अपनी बात कह सकते हैं। किन्हें चुनकर कुछ पल के लिए सहज महसूस कर सकते हैं यह चुनाव करना अपने आप में बेहद कठिन काम है। उसपर दफ्तर में किसे अपनी निजी पीर बताएं। किससे अपने अंतरजगत की हलचल साझा करें यह बहुत दुविधापूर्ण होता है। हमेशा डर लगा रहता है कि कोई निजी कमजोरी का लाभ तो नहीं उठा लेगा। इस तरह के डर हमें दफ्तर में संकुचित करता चला जाता है। जहां हम मानते हैं कि अपने जीवन व दिन का एक बड़ा हिस्सा जीया करते हैं। जिनके बीच रहते, खाते पीते हैं, लड़ते, मुंह फुलाया करते हैं उन्हीं के बीच यदि तनाव में जी रहे हैं तो ऐसे में हमारी कार्यशैली और काम, काम को निर्धारित करने वाला व्यक्ति हमारी निजी जीवन को भी प्रभावित करने लगता है। काम का तनाव इस कदर प्रबल हो जाता है कि हम घर पर भी काम और बॉस की भाषा, उसके व्यवहार से परेशान रहते हैं। रात में भी बड़बड़ाने लगते हैं। दफ्तर और घर के बीच के फासले को मिटा कर जी जान झांक देते हैं। टारगेट और प्रोजेक्ट हमारी जिं़दगी हो जाती है। पीछे छूटता चला जाता है हमारी खुशी, हमारी शांति। 
पैसे और आर्थिकी पक्ष मजबूत करते करते हम कब संवेदनात्मक तौर पर झिझले होते जाते हैं इसका अनुमान ही नहीं होता। काम के बाद भी काम की प्रकृति और कार्य संपन्न कराने वाले की बॉडी लैंग्वेज हमें कोचने लगती है। हम चाह कर भी उस व्यक्ति को अपने रोज़ के जीवन से बाहर नहीं कर पाते। कितना मुश्किल होता होगा उनके लिए जो बॉस और दफ्तर के दबाव तले अपनी सांसों का गला घांट दिया करते हैं। या यूं कहें नौकरी हमारी ज़िंदगी को खाने लगे तो बेहतर है नौकरी बदल ली जाए। लेकिन सच्चाई से भी मुंह नही फेर सकते कि नौकरी पाना कितना कठिन है। मैंनेजमेंट के जानकार मानते हैं कि कई बार सक्षम कर्मी सिर्फ और सिर्फ अपने बॉस या मैंनेजर की वजह से परेशान होकर नौकरी छोड़ जाता है। इससे न केवल संस्था, कंपनी की हानि होती है बल्कि हम अपने बीच से एक कुशल, दक्ष और संवेदनशील व्यक्ति को खो देते हैं।   

Sunday, March 31, 2019

यैसे और इस उम्र में जाना साथी

ये तो ठीक नहीँ किया। कुछ कहा भी नहीँ। कहूँगा, किसी दिन बैठेंगे फिर बातें करूँगा। कितनी सारी बातें थीं तुम्हाते पास कहने को,मगर अनकहे तुम्हारे ही साथ चले गए। हम कितने दिल से कंजूस हैं कि जो बात कहनी है उसे काँख में सुदामा की तरह दबा के रखते हैं। मगर हम भूल जाते हैं कि हमारे दोस्त कृष्ण नहीं रहे जो मन की बात व भाव समझ सकें।
तुम जिस तरह गए वो स्वीकार नहीं हो पा रहा है। कोई संकेत, न आवाज़ कुछ तो इशारा किया होता।मगर कुछ नहीँ। शनिवार क्या आया हम सब पर भारी पड़ा। यैसा भी क्या काम का दबाव था कि कुछ कह न सके। कुछ साझा भी नहीँ कर पाए। बस रूठ कर चले गए।
जब सिद्धार्थ गए थे तब अपने पीछे बच्चा, बीवी छोड़ गए थे। वैसे ही तुम्हारे पीछे भी सब छोड़ गए। घर पर तुम्हारा बच्चा माँ से पूछ रहा था माँ रो क्यों रही हो? माँ इस किस्म के सवालों से रोज़ रु ब रु होगी।
दोस्त बहुत याद आवोगे। जब भी भाई!!!!! शब्द।
हम कितने ही शब्द, रंजिश, ख़फ़ा, दिल में पिरो कर जीते हैं। जबकि मालूम किसी को नहीँ कब कौन हमारे बीच से चला जायेगा। सारी रंजिशें यहीं सिर पटकती रह जाएगी

Friday, March 29, 2019

मैंनेजर का दिल


कौशलेंद्र प्रपन्न
है न दिलचस्प बात कि मैंनेजर के भी दिल हुआ करते हैं। यूं तो कहा जाता है मैंनेजर यदि दिल के काम करने लगे तो वह अच्छा व श्रेष्ठ मैंनेजर की अहर्ता खो देता है। यदि मैंनेजर दिल के काम करने लगे तो प्रोजेक्ट के डूबने के भी चांस काफी होते हैं। लेकिन कहा तो यह भी जाता है कि एक अच्छा मैंनेजर दिल और दिमाग के समुचित योग से बेहतर प्रदर्शन कर पाता है। कहते तो यह भी हैं कि यदि मैंनेजर सभी को दोस्त बना ले तो वह भी ठीक नहीं। यानी मैंनेजर के पास एक ऐसी फाइल होती है जिसमें ज़रूरी, बेहद ज़रूरी, अत्यंत ज़रूरी और गैर ज़रूरी, निहायत ही गैर ज़रूरी कामों को डम्प करता है। वह काम की प्रतिबद्धता और महत्ता को परखते हुए अपने कामों को प्राथमिकता की श्रेणी में डालता है।
मैंनेजर दिल की बात नहीं करता। यदि वह दिल से बातें करने लगेगा तो वह प्रोजेक्ट कहीं न कहीं नुकसान ही पहुंचाएगा। दिल लगाने से मतलब यह भी हो सकता है कि वह अपने काम से तो दिल लगता है व्यक्ति से नहीं। व्यक्ति तो आते जाते रहते हैं। लेकिन प्रोजेक्ट पर असर नहीं पड़े इसको लेकर मैंनेजर सजग होता है।
मैंनेजर को मालूम होता है कि उसे कब, कहां, किससे, कितना और कैसे बोलना है। कैसे बातों को प्रस्तुत करना है। इन कौशलों में वह दक्ष होता है। यदि दक्षता नहीं तो वह मैंनेजर बेहतर नहीं। बोलने में दक्ष होता है तो वह मुश्किल से मुश्किल दौर और समय को भी बेहतर तरीके से डील कर लेता है। कमजोर मैंनेजर वह माना जाता है जो उक्त कौशलों में दक्ष नहीं।

Wednesday, March 27, 2019

चुनावी मौसम में ख़बरों से दूर...चलिए कोई किताब पढ़ी जाए


कौशलेंद्र प्रपन्न
पत्रकार एवं सामाजिक चिंतक रवीश कुमार बड़ी ही शिद्दत से गुज़ारिश करते हैं कि इन दो माह यदि हम टीवी यानी न्यूज चैनल और अख़बार पढ़ना बंद कर दें तो बेहतर हो। इसके पीछे तर्क देते हैं कि जब ख़बरों में से सूचना और विश्लेषण गायब हो जाए तो बेहतर है ऐसी ख़बर को न देखा जाए और न पढ़ें। शुक्रिया रवीश जी कम से कम कोई तो है जो आगाह करने की हिम्मत रखता है। जब सबलोग कहें कि ख़ामोश रहो। सवाल करना क्या ज़रूरी है। ऐसे दौर में कोई तो है जो बोलने और सवाल करने की प्रकृति और सहज दर्शन को समझाने की कोशिश कर रहा है।
चुनावी बयार ज़ोरों पर है। क्या अख़बार और क्या न्यूज चैनल हर जगह ख़बर के मायने बदल चुके हैं। अख़बारों पर नज़र डालें तो बीस और तीस पेज में से अधिकांश पन्ने राजनीतिक ख़बरों से रंगी नजर आती हैं। राजनीतिक में से भी चुनावी ख़बरें तैरती मिलेंगी। विश्लेषण तो इन अख़बारी ख़बरों की भी होनी चाहिए। शायद आज नहीं तो कल कोई तो व्यक्ति या संस्था यह काम करेगी। कितने पन्ने चुनावी ख़बरों में रंगे गए। इन चुनावी ख़बरों की रफ्तार में क्या मुख्य पन्न और क्या आख़िरी पन्ना आद्यांत चुनावी घटनाएं, घोषणाएं, बयान, टूटना, जुड़ना आदि ख़बरों से भरी होती हैं। कई प्रमुख घटनाएं और ख़बरें ऐसे में पन्नों पर आने से रह जाती हैं। इनमें सामाजिक, शैक्षणिक, भौगोलिक आदि को शामिल कर सकते हैं।
यही हाल न्यूज चैनलों का भी है। जिस भी न्यूज चैनल को खंघालिए हर जगह चुनावी बाजार लगा है। कहीं वाद विवाद, कहीं प्रवचन, कहीं भविष्यवाणियों के पत्ते खोले जा रहे हैं। कहीं सुग्गा वाचन कर रहा है आदि आदि। इनके बाजार में वाचल वक्ता प्रमुख दलों के चैनलों पर खखार रहे होते हैं।
एकबारगी मन करता है कि अख़बार लेने बंद कर दिए जाएं। न्यूज चैनल को हमेशा के लिए गला घोट कर चैन से कोई किताब पढ़ी जाए। कोई साहित्य या रूचिकर काम किए जाएं। हम जिस समय में अख़बार पढ़ने या फिर न्यूज चैनल देखा करते थे। उस वक्त संभव है अपने प्रिय से बातचीत की जाए। जिनके लंबे समय से बात नहीं हुई। जिनके हम मिले नहीं ऐसे कुछ काम किए जा सकते हैं। किताबें पढ़ना थोड़ा श्रमसाध्य काम है। धैर्य और रूचि की भी बात है, लेकिन कोशिश की जा सकती है। 

Monday, March 25, 2019

वैमनस्य नहीं प्यार रह जाता है


कौशलेंद्र प्रपन्न
आपको क्या लगता है हमारे जाने के बाद क्या बचेगा? क्या रह जाएगा हमारे बाद? ये सड़कें, ये नदी, ये पहाड़ आदि आदि तो रहेंगे ही। रह जाएंगे कुछ और बरसे हमारे साथ के लोग। जो याद किया करेंगे। हमारे प्यार को। हमारे व्यवहार को। और याद रह जाएंगी साथ बिताए पल। जिसमें वो तमाम चीजें शामिल हैं जिन्हें हम जी कर जाएंगे।
जिनके साथ रूसा रूसी थी। जिन्हें देखना पसंद नहीं किया करते थे। पसंद तो उनका बोलना भी खलता था। खलता था जैसे वो देखा करते थे। लेकिन उनके जाने के बाद उनके साथ बिताए पल पीछे छूट जाती हैं।
वैमनस्य की आयु उतनी लंबी नहीं होती जितनी प्यार की हुआ करती है। प्यार भरे पल ज्याद साथ रह जाया करती हैं। वैमनस्य एक समय के बाद धीमा पड़ जाता है। रह जाती हैं तो बस बिताए हुए सुखद पल। कभी कभी वैमनस्य वाले पल भी हमें रह रह कर कोचते हैं किन्तु उनके जाने के बाद वो भी धूमिल हो जाता है।
जिनसे सोचा था लड़ेंगे। ऐसा कहेंगे। वैसे लड़ेंगे। यह भी कहेंगे। वह भी कह कर लड़ेंगे आदि आदि। लेकिन जब मालूम चला वो तो चले गए। फिर किससे लड़ेंगे। कौन होगा जिनके अपने मन की बात करेंगे। उनके जाने के बाद सारी रंजिशें यहीं रह जाती हैं। रह जाता है तो बस प्यार।

Wednesday, March 20, 2019

रोज़ की ज़िंदगी से कट जाना



कौशलेंद्र प्रपन्न
कुछ लोग ऐसे जाते हैं जैसे जाती है धूप। जैसे जाती है हवा और जाती है यादें। धीरे धीरे सब कुछ धीमी होती जाती है। हमें मालूम भी नहीं पड़ता कि कौन कब चला गया। कहां चला गया आदि। लेकिन जो जाता है अपने पीछे कुछ तो ज़रूर छोड़ जाता है। कुछ अच्छी। कुछ मधुर। कुछ खट्टी यादें। जिन्हें हम जाने के बाद या तो बिसुरा देते हैं या फिर संजोकर रख लिया करते हैं। जब हमारी रोज़ की जिं़दगी से कोई कट जाता है तो वह हमारी चिंताओं, संवेदनाओं आदि से भी कटता चला जाता है। ऐसा अकसर होता है कि जिसे हम रोज़ देखा और मिला करते हैं उससे हम वास्तव में जुड़े होते हैं। उसकी तमाम चीजें हमें खुशी और दुख दोनों ही दिया करती हैं।
जो हमारी जिं़दगी में शामिल होते हैं हम उनकी चिंता भी किया करते हैं। उस व्यक्ति की हर वो छोटी चीज हमें परेशान भी किया करती हैं। कई बार यह प्रक्रिया ऐसी धीमी गति से होती है कि हमें उसकी तीव्रता और रफ्तार महसूस नहीं हो पाती और जाने वाला व्यक्ति यूं ही हमारी जिं़दगी से दूर चला जाता है।
हम जाने अनजाने न जानें ऐसे कितने ही व्यक्ति हमारी ज़िंदगी से साइन आउट हो जाते हैं। इनका कोई बैकअप नहीं रह जाता। कभी कभी बस यादों में आवाजाही किया करते हैं बस। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो अचानक से ग़ायब हो जाते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो ऐसे लोग तुरंत हमारी जिं़दगी से दूर हो जाते हैं। ऐसे वो लोग हुआ करते हैं जिन्हें शायद हम देखना, सुनने और मिलना तक नहीं चाहते।

Thursday, March 14, 2019

प्लेटफॉम और हम



कौशलेंद्र प्रपन्न 
प्लेटफॉम नंबर एक से आठ और सोलह के बीच के फासले को कभी देखने को मिला हो तो आप बेहतर समझ सकते हैं कि हम कहां हैं। ख़ासकर मैं बात कर रहा हूं नई दिल्ली रेलवे स्टेशन की। एक ओर प्लेटफॉम नंबर एक है जहां के लोगों के पहनावे, बोली भाषा, झोला, झक्कर सब अलग होते हैं। देखने भालने में भी अलग होते हैं। भीड़ भी थोड़ी अलग सी होती है। दूसरे शब्दों में कहें तो इलीट किस्म की कह सकते हैं। यू नो!!!
वहीं प्लेटफॉम नंबर आठ से सोलह तक के यात्री, भाषा-बोली, पहनावे, खान-पान, झोला-झक्कर आदि भिन्न मिलेंगी। धकीयाते हुए। ठेलते हुए। लाल और पीली साड़ी में लिपटी बहुरिया मिलेगी। अपने पी के इंतजार में। उसके साथ थैला, कोक की बॉटल में पानी, प्लास्टिक का झोला आदि आदि। जगह मिली तो चूड़ा, तिलकूट आदि का नास्ता करते लोग मिलेंगे। 
स्टेशन पर पूरा देश नजर आता है। जिस प्लेटफॉम पर जहां की ट्रेन आया करती हैं वहां की संस्कृति, खान-पान, पहनाव नजर आएगा। अभी भी आठ और सेलह नंबर के प्लेटफॉम पर लगने वाली ट्रेन में स्लीपर का हाल ज्यादा बदला नजर नहीं आएगा। खिड़कियों से झांकती आंखें, बच्चों के कपड़े, आंखें वैसी की वैसी दिल्ली को आंखे भर कर समा लेने की ललक नजर आएंगी। 
अंतर सिर्फ इतना नजर आएगा जब आप एसी त्री या टू में जाएंगे तो सवारी जो कभी स्लीपर में यात्राएं किया करती थी वो अब टू या त्री में चलने लगी है। जो जेनरल में चला करते थे अब वो स्लीपर में आए गए हैं। सो मंज़र लगभर समान है। स्लीपर में जैसे झोला, टीन का ट्रंक, बड़ी टीवी आदि पहले ठूंसे हुए नजर आते थे वो अब त्री टीयर में नजर आएंगी। नैन नक्श वहीं हैं। अब हैं तो हैं। 
स्टेशन कई बार ज़िंदगी के बडे़ दर्शन से रू ब रू कराया करता है। जहां हर कोई अपनी अपनी ट्रेन के आने के इंतजार में बैठे हैं, लेटे हैं। गपियां रहे हैं। प्लेटफॉम पर थूक रहे हैं। 

Saturday, February 23, 2019

सेवाकालीन शिक्षकों के राष्ट्रीय कार्यशालायी संबोधन के सूत्र



कौशलेंद्र प्रपन्न
पिछलों दो दिनों में दो विभिन्न राष्ट्रीय स्तर के शिक्षा-शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों में सेवाकालीन शिक्षकां को संबोधित करने का अवसर मिला। वास्तव में उन शिक्षकों से मिलकर अभिभूत हूं तो कुछ चकित भी हूं। पहली मुलाकात केंद्रीय शिक्षा संस्थान, शिक्षा विभाग दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षा-शिक्षक- प्रशिक्षक के व्यावसायिक दक्षता विकास कार्यशाला में बतौर विशेषज्ञ अपनी बात रखने का अवसर मिला। इस सत्र में एनजीओ, सीएसआर एवं सरकारी तंत्रों के प्रमुखों ने हिस्सा लिया। इसमें महसूस हुआ कि शिक्षक पढ़ने-लिखने से अभी दूर उतने नहीं हुए हैं जितना अन्य स्रोतों से समाज में ख़बरें नकारात्मक फैलाई जाती रही हैं। इनमें पीएचडी के छात्र भी उपस्थित थे। सबसे दिलचस्प बात यह कि अकादमिक क्षेत्र में लगे हुए शोधार्थी को बाहरी यानी सेवाकालीन शिक्षकों की भौगोलिक, कार्यस्थलों की हक़ीकतों की ख़बरें थोड़े कम मालूम हैं। अभी भी संस्थान में सिर्फ जॉन डिवी, हंटर कमिशन, कोठारी आयोग की तारीखें, सुझावों की परतें खोल रहे हैं। उन्हें उसके बाद की समितियों, वैश्विक प्रतिबद्धताओं, दबावों, जोमेटियन, डकार आदि की घोषणाएं और एसडीजी की घोषणाएं और निहितार्थ अभी परेशान नहीं करतीं। जबकि करनी चाहिए।
दूसरा अवसर सांस्कृतिक एवं स्रोत शिक्षण केंद्र में बतौर मुख्य अतिथि अपनी बात रखने का अवसर मिला। बीस दिवसीय सेवाकालीन शिक्षक प्रशिक्षण कार्यशाला का मकसद देश के विभिन्न राज्यों के शिक्षकों को कला, संस्कृति, संगीत, ऐतिहासिक इमारतों, नाटक आदि को कैसे अपने मुख्य विषय के साथ शामिल कर शिक्षण की जाए, ऐसी समझ उनमें विकसित की जाए। इन बीस शिक्षकों में सबसे ज्यादा प्रतिभागी जम्मू और कश्मीर से थे। हिमाचल से एक और महाराष्ट्र से आठ, बंगाल, तेलंगाना, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड़, आंध्र प्रदेश आदि राज्यों से आए थे।
कुछ लोगों के अपने अपने अनुभव भी साझा किए। हैरानी हो सकती है कि इन बीस दिनों में अधिकांश गैर हिन्दी भाषी प्रतिभागियों ने अपनी बात हिन्दी में रखी। क्या तेलंगाना, आंध्र प्रदेश सब की जबान हिन्दी बोल रही थी। वहीं हिन्दी भाषायी राज्यों से आए प्रतिभागियों ने अपने अनुभव साझा किए कि इन बीस दिनों में हमने उनकी जबाव भी सीखी। इनमें सीसीआरटी की भूमिका को नजरअंदाज नहीं कर सकते।
सीसीआरटी के प्रांगण में आयोजित इस कार्यशाला में जितनी भी चीजें हुइंर् उन्हें क्या शिक्षक अपनी कक्षाओं में करेंगे या नहीं इसे देखने-समझने के लिए सीसीआरटी रिपोर्ट भी तैयार करेगी।
मैंने यहां अच्छा शिक्षक कैसे श्रेष्ठ शिक्षक बन सकता है, इसपर बल दिया। इस बात पर भी ध्यान खींचने की कोशिश की कि अपने शिक्षण, पढ़ने-पढ़ाने का मकसद और रणनीति तैयार करें ताकि आपका मकसद साकार हो सके। 

Tuesday, February 19, 2019

छुट्टी अधिकार नहीं और तनाव


कौशलेंद्र प्रपन्न
आज दिल्ली पुलिस के दो अधिकारियों से बातचीत का मौका मिला। एक थे अस्टिंट इंस्पेक्टर ऑफ पुलिस और सब इंस्पेक्टर। दोनों से ही ठहर कर बातचीत हुई। इन्होंने बातों ही बातों में स्वीकार किया कि हमें छुट्टी नहीं मिलती। हमारे तनाव मैनेजमेंट ऑफिसर हमें तनाव मुक्ति का सुझाव और उपाय बताते हैं। लेकिन वही हमें इतना तनाव देते हैं कि पूछिए मत। पिछले दिनों मेरे घर में रिश्ते के लिए कुछ लोग आने वाले थे। मैंने छुट्टी एप्लाई किया। लेकिन हमारे साहब ने कहा छुट्टी आपका अधिकार नहीं है। पहले काम कीजिए। सर काम का यह आलम है कि कोई भी त्योहार हो, घर में कोई काम हो, बच्चे को अस्पताल ले जाना हो लेकिन हमारे साहब कहते हैंं पहले मैं तहकीकात करूंगा कि वास्तव में ऐसा है या नहीं तभी छुट्टी दूंगा। हमारे बारे में कई तरह की ख़बरें आती हैं। हम क्रूर हैं। इससे कोई गुरेज भी नहीं लेकिन हमारे काम के घंटों को कोई नहीं देखता।
आज पुलिस के अधिकारी से बात के बाद कई सारी बातें और हक़ीकतों से रू ब रू होने का मौका मिला। उन्हें किन हालात में काम करना पड़ता है। कैसे वो लोग अपने घरों, परिवारों के काम नहीं आते। जब घर वालों को उनकी ज़रूरत होती है। इन तनावों के माहौल में वो कैसे काम और घर के बीच सामंजस्य स्थापित करते हैं इसे नागर समाज को समझने की आवश्यकता है।
छुट्टी को लेकर हम हमेशा ही उत्साह और अधिकार के प्रति सचेत होते हैं। लेकिन अपने कर्तव्य के प्रति कोई ख़ास वास्ता नहीं रखते। हमेशा ही अपनी छुट्टी के अधिकार को लेकर लड़ते हैं। जबकि सरकार और कंपनियां छुट्टियों की सैलरी भी देती है। ऐसे में अधिकार की बात करना कई बार बेईमानी सी लगती है। लेकिन सच्चाई है कि जहां दुनिया भर में चार दिन के कार्य दिवस पर चर्चा हो रही है। वहीं हमारी निजी कंपनी और सरकार इन छुट्टियों को खत्म करना चाहती हैं। पांच दिन के कार्य दिवस को छह दिन करने पर आमादा हैं। पता नहीं दुनिया की ख़बरों से हमें कोई वास्ता है या नहीं? क्या हम समझना नहीं चाहते कि जो काम पांच दिनों में हो सकता है उन्हें छह दिनां के लिए बांधना कितना वाजिब होगा।
सिर्फ कार्यदिवस को बढ़ाकर हम अपनी कुर्सी की धौंस तो जता सकते हैंं लेकिन कार्य की गुणवत्ता को लेकर कोई भी दावा नहीं कर सकते। जिस शिद्दत के कर्मचारी पांच दिनों में काम करता है। वह छठे दिन तनाव और मजबूरन करेगा। यानी कहीं न कहीं दिखावे के लिए काम में लगा हुआ दिखाएगा। उसकी प्रेरणा और कार्य के प्रति प्रतिबद्धता कहीं दूर चली जाएगी।
इन्हीं तनावों की वजह से सेना में कई बार गोलीबारी भी हुई है। अपने ही अधिकारी की हत्या की ख़बरें भी आती रही हैं। ऐसे तनाव के पल सिर्फ सेना में नहीं बल्कि आम जिं़दगी में भी देखी-सुनी जा सकती है। ऐसे में बॉस के प्रति किस प्रकार की घृणा और विद्वेष के भाव जगते हैं उन्हें नजरअंदाज नहीं कर सकते।

Sunday, February 17, 2019

बोल दें जो मन है पता नहीं फिर मौका मिले न मिले


कौशलेंद्र प्रपन्न


अपनी पुस्तक भाषा, बच्चे और शिक्षा की प्रति सौंपते हुए 

बोलने में हम कितनी कंजूसी करते हैं। कई बार संकोचवश बोल नहीं पाते। सोचते ही रह जाते हैं कि बोलूं या नहीं। बोलने से कहीं कोई नाराज़ न हो जाएं। इसी अगर मगर के चक्कर में कई बार कहने से चूक जाते हैं। हमारे हाथ से कहने का अवसर निकल जाता है। निकला हुआ वक़्त शायद कहते हैं वापस नहीं आता। आता भी है तो अपनी नई चादर ओढ़े आया करता है। तब शायद बोलने का वो लाभ व असर न पड़े।
कहने वाले कहते हैं जो भी कहना है, करना है आज ही कर डालो। कल किसने देखा। लेकिन मनुष्य का स्वभाव भी तो है कि हम आज कल में कई अहम चीजें, एहसास से हाथ धो बैठते हैं। सोचा था उनसे मिलकर यह कहूंगा, वह कहूंगा आदि आदि। लेकिन जब सूचना मिली कि वो अस्पताल में हैं। अब बोल नहीं सकते। न ही सुन सकते हैं। ऐसे में कितना मन कचोटता है कि काश तब ही बोल दिया होता जो कहना चाहते थे।
मेरे दिल के बेहद करीब रहने वाले प्रो. कमलकांत बुद्धकर जी इन दिनों न बोल पाने की छटपटहाट से गुज़र रहे हैं। आज जब उनसे बात हुई तो कुछ भी समझ न सका। वो कुछ तो कहना चाहते थे। लेकिन समझ से परे था। वो जिस भाषा व ध्वनियों को प्रयोग कर रहे थे उससे मैं परिचित न था। जिन्होंने रेडियो, अख़बार में खूब लिखा और बोला आज उन्हें किस मनोदशा और पीड़ा से गुजरना पड़ रहा होगा इसका अनुमान भर लगा सकता हूं। ख़ासकर जिसके लिए बोलना और लिखना, पढ़ना और सुनना पेश रहा हो। जिसने पूरी जिंदगी पढ़ने-पढ़ाने का ही काम किया हो उसकी जबान चली जाए तो उसे कितना कष्ट होता होगा। गुरूकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय में इन्होंने मुझे हिन्दी पढ़ाई थी। पहले दिन इन्होंने परिचय लेते हुए कहा ‘‘ कमाल की बात है कि नेपाली, गुजराती, क्रिओल, आदि बोलने वाले को एक महाराष्ट्रीयन हिन्दी पढ़ा रहा है’’ यह वाक्य आज भी कानों में कौंध जाते हैं। सन् 1991 में बुध्कर जी ने ज्वाईन ही की थी। कहने को हज़ारों शब्द, भाव मन में आते होंगे लेकिन वह कह नहीं पाता। इन्होंने जनसत्ता, नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तार आदि अख़बारों में बतौर विशेष संवाददाता के तौर पर दो दशकों तक फीचर, ख़बरें और मुख्य पृष्ठ पर लिखा वो आज लिख नहीं पाते। बोलना चाहें भी तो बोल नहीं सकते।
हम न जाने किस गुमान और संकोच में आज के बेहतरीन वक़्त को हाथ से जाने देते हैं। सेचते हैं कल बोल देंगे। लेकिन कल आता कहां है? 

Thursday, February 14, 2019

रोती रहीं साठ आंखें


कौशलेंद्र प्रपन्न
सदन में तकरीबन साठ से अस्सी जोड़ी आंखें टकटकी लगाए सुन रही थीं। सुन नहीं रही थी बल्कि रोए जा रही थी। रोने पर उन्हें शर्म नहीं था। कोई लज्जा नहीं थी किसी को भी। हर कोई जुड़ा था। जुड़ा था इसलिए रो रहा था।
सत्र नहीं पूछेंगे आप? यह नहीं जानना चाहेंगे कि सदन में क्या हो रहा था? यह अवसर क्या था? बताता हूं। बेशक आपने नहीं पूछा। लेकिन मेरा फर्ज है कि आपको मालूम हो।
‘‘बच्चों में समाजिक एवं संवेदनात्मक विकास में शिक्षक की भूमिका’’ इस विषय पर तकरीबन पचास शिक्षकों के साथ परिवर्तन संस्था की संस्थापक सोनल कपूर बात कर रही थीं। हम अपने बचपन में झांकें और देखने की कोशिश करें कि हमारे साथ बड़ों ने क्या किया? क्या किया हमारे रिश्तेदारों ने। एक अबोध बच्ची या बच्चा के साथ उस उम्र में जो घटती हैं जिन्हें वह समझ भी नहीं पाता।
...अभी बातचीत ज़ारी थी। कुछ शिक्षक सकुचाते हुए तो कुछ ने हिम्मत दिखाकर अपनी बातें औरों के अनुभव का नाम देकर सुना रहे थे। तभी एक शिक्षक फूटफूट कर रोने लगे और कक्ष से बाहर चले गए। उन्हें रोता देख मैं भी बाहर गया। और चुप कराने की कोशिश कर रहा था। उन्होंने बताया कि बचपन में उनके साथ भी ऐसी घटना घटी है। बहुत पूछने पर बताया कि उस घटना की जानकारी उन्होंने मां को भी दी। लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला। जब वही घटना मेरे छोटे भाई के साथ भी घटी तो मैं तब असहाय महसूस कर रहा था। वह व्यक्ति आज भी है लेकिन उसके साथ कुछ नहीं हुआ। यहां तक कि शुरू में तो मां ने भी विश्वास नहीं किया। और बात को वहीं अनसूनी कर दी।
यौन शोषण के शिकार बच्चियां ही होती हैं ऐसा बिल्कुल नहीं है। लड़के भी हुआ करते हैं। इस वाक्य को साक्षात सामने देख और सुन पा रहा था। मॉनसून वेडिंग, हाई वे, चांदनी बार आदि फिल्मों में इन घटनाओं को बड़ी ही शिद्दत से प्रस्तुत करती हैं। वहीं मैं लक्ष्मी मैं हिजड़, आदि किताबों में भी ऐसी घटनाओं को उठाने का प्रयास किया गया है। लेकिन कई बार ये पन्नों और सिनेमा हॉल में ही सिमट कर रह जाती हैं। जो बच्चियां या बच्चे इन घटनाओं में शामिल होते हैं उनके साथ वह बरताव बतौर जारी रहता है।

Wednesday, February 13, 2019

सवाल मत करियो रज्जो



कौशलेंद्र प्रपन्न
रज्जो तुम्हें एक बात क्यों समझ में नहीं आती? क्यों तुम्हारे कानों पर जूं नहीं रेंगते? क्यां सवाल किया करती हो? क्यों हर सवाल का जवाब मिले इसकी उम्मीद करती रहती हो? इत्ता वक़्त गुज़र गया इतनी सी बात तुम्हारे भेजे में नहीं समाती कि सवाल करने से उन्हें दिक्कत होती है। उन्हें नहीं पसंद है कि तुम या कोई भी उनके कामों, सोचों और योजनाओं पर सवाल करे। लेकिन तुम्हें तो इतनी सी बात समझ नहीं आती। तुम्हें ताकीद करते करते मेरे न जाने कितने दिन और कितनी रातें गुज़र गईं। लेकिन तुम हो कि अपनी इस आदत से बाज़ नहीं आती। बस बहुत हो गया। अब आखि़री बार समझता हूं कि सवाल करना छोड़ों वरना छोड़ जाओगी इन दर ओ दीवारों को। फिर मत कहना कि समझाया न था। वैसे दफ्तर में कोई दोस्त नहीं होता। न ही हो सकते हैं। हर किसी को अपनी चिंता होती है। उसे कितना छलांग मिला। किसे कितनी बढ़ोत्तरी हुई। इसमें हर कोई अपनी रीढ़ को भी बांस दिया करता है। और एक तुम हो कि सवाल किया करती हो। सवाल सुनने वाले बचे ही कितने हैं। जो बचे हैं उन्हें सवाल नहीं बल्कि कुछ और सुनने की अपेक्षा है। लेकिन ठहरी अपने सिद्धांतों की पक्की लेकिन देखना कहीं ऐसा न हो कि तुम और तुम्हारी फिलॉस्फी ही अंत में साथ रहें। बाकी के साथी जो साथ काम किया करते थे। वो आगे निकल जाएंगे और तुम वहीं की वहीं रह जाओगी।
तुम्हें यह क्यों समझ नहीं आती। निज़ाम को विरोध और प्रतिवाद सुनना पसंद नहीं है। यदि तुमने निज़ाम के हां हां नहीं मिलाया तो तुम्हारी छुट्टी कर दी जाएगी। कलुमर्गी, दुर्गा लंकेश के बारे सुना या पढ़ा है या नहीं। अगर नहीं पढ़ा तो पढ़ने का वक़्त निकालो। वैसे जानता हूं तुम्हें पढ़ने से कोई वास्ता नहीं। तुम और पढ़ों यह कैसा विरोधाभास है?
तुमने से पढ़ना ही छोड़ दिया। बल्कि छूट गया जब से जॉब में आई हो। लेकिन फिर भी एक राय मान लो कि पढ़ो। शायद तुम्हारी सेती आंखें में कुछ खुल पाएं। खोलों अपनी आंखें और देखों कौन साथ है और कौन दूर खड़ा बस खेला देखना चाहता हैं। चलते चलते इतनी सी बात कहूंगा। सुन लो! सुन लो न सवाल मत करना। 

Tuesday, February 12, 2019

लोग जाते गए और कारवां सिमटता गया


कौशलेंद्र प्रपन्न
‘‘यूं तो अकेला ही चला था जानिब ए मंजिल मगर लोग जुड़ते गए और काफला बनता गया’’ बहुत ही प्रसिद्ध पंक्ति है इसे के सहारे अपनी बात बल्कि एक कहानी सुनाने की कोशिश करूंगा।
कभी कभी हम या कि आप अकेला हुआ करते हैं लेकिन जैसे जैसे हम समाज में उठते बैठते हैं वैसे वैसे हम वतन, हम जबान, हमम न, मिलने लगते हैं और दोस्ती गहराती जाती है। इसे ऐसे भी कह सकते हैं कि एक संस्था, कंपनी में भी यह सटीक बैठती है। कंपनी या संस्था में भी धीरे धीरे दक्ष और कुशल लोग आते जाते हैं और एक कुटुम्ब सा बनता जाता है। यहां हर चीज हर काम सभी के बीच हो जाया करती है। सब अपनी जिम्मदारी लेकर हर काम को किया करते हैं। ‘‘साथी हाथ बढ़ाना, एक अकेला थक जाएगे मिल के हाथ...’’ और काम यूं ही हो जाया करते हैं।
एक वक़्त ऐसा भी आता है संस्था या कंपनी में कि कुछ ख़ास या आम वजहों से इस कुटुम्ब में बिखराव आने लगते हैं। एक एक कर या तो छोड़कर जाने लगते हैं या फिर उन्हें जाने के लिए कई सारे तर्कां, वजहों के जाले बुने जाते हैं जिसमें उलझकर सदस्य परेशान होने लगता है। एक दिन सोचता है बेहतर है यहां से चला ही जाए। ... और जैसे झोला उठा कर आया था वैसे ही झोला उठा कर चला भी जाता है।
उसके जाने का असर यह पड़ता है कि दूसरे संगी साथी भी दबाव महसूस करने लगते हैं। एक भय और निराशा के माहौल में सांसें लेने लगते हैं। कई बार यह भयपूर्ण माहौल वास्वत में होता है तो कई बार ऐसा एहसास होता है। कई बार एहसास कराया जाता है कि यदि उसके साथ ऐसा कर सकते हैं व किया जा सकता है तो हम क्या चीज हैं।
चीज ही तो हो जाते हैंं। जिसे कभी भी, कैसे भी संस्था से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। वह जाने वाला सोचता है जिसे उसने अपने जीवन के ख़ास और विशेष कौशल, दक्षता और क्षण दिए आज उन्हें मेरी ज़रूरत नहीं रही। और वह दूसरी दुकान के लिए चल पड़ता है।
कभी सोचें तो शायद इस कहानी की गिरहें ज़रूर खुलेंगी। उस एक के जाने से वैसे तो संस्था पर कोई ख़ास असर नहीं पड़ता। लेकिन कई बार अवश्य ही उस एक के जाने से लगता है हमने एक बेहतर मानव संसाधन को खोया है। हालांकि इस तरह की बातों के लिए अब या तब भी कोई ख़ास मायने नहीं रह जाते।


Saturday, February 9, 2019

लिखने की शुरुआत ही जनसत्ता से





कौशलेंद्र प्रपन्न 
यूं तो लिखने का चस्का हरिद्वार में ही लगा गया था। सन् 1991 रहा होगा। मुझे लिखने की ओर जिन्होंने प्रेरित और आकर्षित किया वो एल एन राव थे। कमाल के मनोचिकित्सक और मनोवैज्ञानिक। साथ ही पत्रकारिता में भी उनकी गति थी। उन्होंने ही मुझे लिखने के लिए प्रेरित किया। 
आज पुरानी फाइलों देख रहा था। दिल्ली में पहली बार जनसत्ता में छपा था। सन् 1998। लेख था ‘‘सावधान! लाल बत्ती खराब है।’’ तब जनसत्ता में रजनी नागपाल, उष्मा पाहवा, प्रियदर्शन, मंगलेश डबराल जी हुआ करते थे। इस लेख के बाद जनसत्ता से एक अटूट रिश्ता सा बन गया। जनसत्ता में बतौर बीस वर्ष से लिख रहा हूं। जनसत्ता के साथ ही साथ हिन्दुस्तान, इंडिया टूडे, कादंबनी आदि में छपने लगा। इस लेखन यात्रा में कई सारे मोड़ मुहाने आए। ख़ुद को मांजने, खंघालने और लगातार लिखने के दबाव भी बने। उन दबाओं के दरमियां गुणवत्ता से समझौता नहीं किया। एक वक़्त ऐसा भी आया जब देश के प्रतिष्ठित पांच छह अख़बारों में एक में दिन छपने भी लगा। चस्का से ज्यादा छपने और लिखने की लत सी लग गई।  
शुरू में किसी भी विषय पर लिखता जो भी संपादक कहते, मांग करते उसपर लिखता। फिर भी उस वक़्त भी बच्चे, शिक्षा, भाषा केंद्र में ही रहे। कभी कभी भटकाव भी आए। आज जब पूरे दो दशक को अपने लेखन के लिहाज से देखता और समझने की कोशिश करता हूं तो यही पाता हूं, इस लिखने ने एक पहचान दी। समझ दी और लोगों से जुड़ने का अवसर दिया। आग चल कर हंस, पाखी, हिन्दी चेतना, आधुनिक साहित्य, इंडिया टूडे, योजना आदि में छपने लगा। जैसे जैसे लेखों का पहाड़ बढ़ रहा था वैसे वैसे विषयों के चुनाव और लिखने की रणनीति में निखार आते आए। याद आता है जनसत्ता में प्रियदर्शन जी और सूर्यनाथ जी ने काफी मार्गदर्शन किया विषयों के चुनाव से लेकर उसके साथ बरताव कैसा हो आदि। 
लिखने साथ ही पढ़ना ही छूटा। किताबों पढ़ता, लेख पढ़ता और इससे शुरू हुई समीक्षा लिखने की तमन्ना। इसे साकार किया इंडिया टूटे, कुबेर टाइम्स, पाखी, हंस आदि ने। समीक्षाएं तभी लिखता जब कोई अच्छी किताब पढ़ता और महसूस होता कि इस किताब के बारे में औरों को भी जानकारी होनी चाहिए। 
लिखने दुनिया में यही कोई दो दशक गुज़ार चुका। दो किताबों को जन्म दे पाया भाषा, बच्चे और शिक्षा, कहने का कौशल और तीसरे किताब भाषायी शिक्षा से सरोकार प्रक्रिया में है। यदि लिखने की चाह हो तो पढ़ना और अभ्यास बेहद ज़रूरी है। 

Wednesday, February 6, 2019

वो चला गया पुरानी कोट पहन कर नए मकां की ओर


कौशलेंद्र प्रपन्न
वो साथ बैठ था पास ही। मगर वो वो नहीं था। जो था वो तो कब का छोड़ चुका था। साथ तो था मगर उसका मन साथ नहीं था। साथ थी तो उसकी यादें। यादों में पुरानी बातें और पीछे घटी घटनाएं। कॉपोरेट जगत में ऐसा ही होता है। होता कुछ ऐसे ही है गोया किसी को ख़बर नहीं लगती। किसी को भी, कभी भी एक पल में बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। और जिसे बाहर का रास्ता दिखाते हैं उसे मालूम होता है कि उसे किस तरह से जाना है। किसी को भी पता न चले और वो चला गया।
कॉपोरेट जगत में यह बहुत आम बात है। एच.आर जिसे बुलाता है उसे दो ही विकल्प देता है- पहला, या तो आप जॉब छोड़ दो या फिर हम आपको निकाल देंगे। सामान्यतौर पर लोग पहला वाला विकल्प चुनते हैं, मैं ही इस्तीफा देता हूं। यह एक इज्ज़त वाला रास्ता है। कम से कम लोगों को वास्तविकता का नहीं इल्म होगा।
लेकिन इंसान है इंसान है तो उसकी कुछ संवेदनाएं होंगी। लेकिन कॉपोरेट संवेदनाओं से नहीं चलती बल्कि यहां सिर्फ तर्क और तर्क काम करता है। विवेक और यथार्थ काम किया करता है। जिसे निकालना है उसे बहुत ही कठोर शब्दों में कह दिया जाता है कल से आपको आने की ज़रूरत नहीं। लेकिन जो कर्मी है वह इस शब्द के ध्वन्यार्थ को समझ नहीं पाता और अपने काम पर लौट आता है। इसका ख़मियाज़ा ज़लालत से पूरा करना पड़ता है। उससे अचानक लॉपटाप मांग लिया जाता है। मांगना नहीं बल्कि छीन लिया जाता है। तब कैसा महसूस होता होगा। इसका अनुमान ही लगा सकते हैं।
कहते हैं शब्दों के बीच की रिक्तता और अर्थों को समझ सकें तो वह समझदार हैं। भावनाएं कई बार हमें मजबूर कर देती हैं। कई बार हम भावनाओं में इस कदर बह जाते हैं कि हमें इस का एहसास तक नहीं होता कि क्या चल रहा है हमारी हवाओं में।
ज़्यादा कुछ नहीं कह सकता शायद कह न सकूं किन्तु विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यास का शीर्षक हमने उधार ली। और कहा जा सकता है कि वो आया और पुरानी कोट पहनकर यूं चला गया कि अंत में औरों से अलविदा कहने का मौका भी न मयस्सर न हो सका।

Saturday, February 2, 2019

बोर्ड रूम से बेड रूम तक


कौशलेंद्र प्रपन्न
बोर्ड रूम में क्या होता है? क्या कुछ नहीं होता है। सब कुछ तो होता है। सपने बुने जाते हैं। सपनों को साकार करने की तरकीबें, रणनीति, योजनाएं आदि बनाई जाती हैं। बंधाई तो उम्मीदें भी जाती हैं। साथ ही कई उम्मीदों पर पानी भी फेरे जाते हैं। चेहरे पर मुसकान और उदासी भी फेरी जाती है। जिन्हें प्रमोशन मिला वह गदगद हो कर हंसते हुए बाहर निकलता है। जिन्हें प्रमोशन तो क्या उनके कामों की प्रशंसा भी नहीं होती वो किस मुंह से बाहर आते हैं और किस चेहरे के साथ बोर्ड रूम में बैठे रहते हैं इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है। तो कहानी बस इतनी भर है कि बोर्ड रूम की मीटिंग हौसला बढ़ाने वाली भी होती है और हौसला तोड़ने वाली भी। कोई टूट कर निकलता है तो वहीं कोई साश्रु कूच करता है।
बोर्ड रूम की बातें, नसीहतें, झांड़ फटकार का कुछ पर यूं भी असर पड़ता है कि या तो वह अपने काम को और बेहतर करने में लग जाता है या फिर जो काम वह कर रहा था उससे उसका मन उचट जाता है। वह फिर सिर्फ जॉब किया करता है। वह उसका करियर भी नहीं होता और आंतरिक कॉल भी नहीं होती है। बल्कि वह सिर्फ रोज़दिन आता है कुछ करता है और शाम में घर चला जाता है। इसमें वह सिर्फ काम करता है। उसकी न तो रूचि होती है और न ही रूझान और न ललक। बस वह करता है। वह क्या कर रहा है, इसका उसे इल्म भी नहीं होता। वह शायद यह जानना भी नहीं चाहता कि वह क्या और क्यों कर रहा है। बस क्योंकि किसी ने कहा है या आदेश है इसलिए किया करता है। इसमें न उस व्यक्ति का हित सधता है और न कंपनी की। दोनों ही किसी न किसी स्तर पर सफ़र करते हैं।
बोर्ड रूम की मींटंग में जहां कंपनी व संस्था की बेहतरी के लिए कार्ययोजनाएं बनाई जाती हैं। आगामी वर्षों के लिए एक्शन प्लान पर चर्चा होती है। व्यक्ति की क्षमताओं और कौशलों का मूल्यांकन भी हुआ करता है। दूसरे शब्दों में, जनवरी, फरवरी वह माह होता है कॉर्पोरेट कंपनियों के लिए जब पूरे साल किसने क्या किया, कितना किया, कैसे किया और क्यों किया आदि सवालों के जवाब तलाशे जाते हैं। इन्हीं बिंदुओं पर व्यक्ति के कार्यों और योगदानों की जांच-पड़ताल होती है। इसे हम एप्रेजल के नाम से जानते हैं। कंपनी और बॉस की क्या अपेक्षा थीं और उन अपेक्षाओं के निकष पर कौन कहां है यह मूल्यांकन अगले साल के बजट और प्लानिंग को ख़ासा प्रभावित करती है।
व्यक्ति जो कंपनी व संस्था में अपनी पूरी क्षमता, ऊर्जा, कंसर्न एवं मकसद की स्पष्टता के साथ काम करता है। वह चाहता है कि न केवल उस व्यक्ति को लाभ मिले बल्कि कंपनी एवं संस्था को भी उसकी दक्षता का लाभ हो। वह अपनी व्यक्तिगत इच्छा और उद्देश्य को पूरी शिद्दत से निभाता है ताकि उसे तो संतुष्टि मिले ही कंपनी को भी नई ऊंचाई प्रदान कर सके। किन्तु उसके महज चाहने से मकसद पूरे नहीं होते, बल्कि बीच बीच में अन्यान्य कामों और अपेक्षाओं के साथ भी उसे तालमेल बैठना होता है। यदि इस काम में चूक हुई तो उसका प्रमुख दायित्य कहीं न कहीं प्रभावित होता है। जो महत्वपूर्ण और ज़रूरी काम थे उसे पूरा करने से रह जाता है। इन्हीं रह गए कामों का मूल्यांकन एप्रेजल के वक़्त मायने रखते हैं। आपके बेहतर कामों के लिए जो भी प्रशंसा मिलती है उससे कहीं ज़्यादा असर छोड़ती है जब आपसे जो नहीं हो सका उसका ठीकरा आपके सिर पर फोड़ा जाता है। तुर्रा यह कि तमाम असफलताओं और प्रोजेक्ट के फेल होने का जिम्मा आपको थमा दिया जाता है। और इस तरह से प्रमोट होने, नई जिम्मेदारियों का हासिल करने से पहले दरकिनार कर दिए जाते हैं।
बोर्ड रूम की चर्चाएं यदि बोर्ड रूम तक ही सीमित रह पाएं तो बेहतर होता है-कंपनी और व्यक्ति दोनों के ही लिए। लेकिन मानवीय स्वभाव है कि हम अपनी सीमाओं, कार्यक्षेत्र में दिलचस्पी रखने की बजाए दूसरे के साथ क्या हुआ? क्यों हुआ? अब क्या करेगा आदि में उलझ पुलझ कर अपने महत्वपूर्ण और ज़रूरी कामों से दूर होते चले जाते हैं। दूसरी स्थिति यह भी होती है कि यदि हम कुशल मैनेजर नहीं हैं तो बोर्ड में कही गई बातों और चर्चाओं को घर और शयन कक्ष तक लेकर चले जाते हैं। यह फांक हमें समझने की आवश्यकता है कि जब हम बोर्ड रूम और बेड रूम के बीच के अंतर को नहीं समझेंगे तो घर बोर्ड रूम से बाहर आने के बाद भी उन्हीं झंझावातों में उलझते चले जाते हैं। बेड रूम में रात रात भर सो नहीं पाते। पत्नी और बच्चों को इसका ख़मियाज़ा भुगतना पड़ता है। बच्चे और पत्नी तो बाद में आती हैं पहले तो हमारा स्वास्थ्य इस चपेट में आता है। रक्तचाप बढ़ जाता है। भूख नहीं लगती और नींद तो कब की दूर छटक जाती है। मैनेजर को जो बोलना था एवं नसीहतें देनी थीं वो तो देकर फारिक हो गया। वह तो उसका रोज का काम है। आज आपको सुनाना था। आपको बोतल में उतारना था। कल किसी और प्रोजेक्ट में किसी की बारी आएगी। वह तो अपने टू डूज में से आपको सुनाने के बाद आपका नाम काट देता है। लेकिन हम घर जाने के बाद भी उसकी फटकारों और तीखी, चुभन वाली बातों को याद कर के अपने सेहद को ख़राब कर रहे होते हैं। इसका असर हमारे कामों पर भी पड़ता है। अगले दिन या तो आप छुट्टी ले लेते हैं। या फिर अपने को समेटने में सक्षम हो सके तो आफिस आ जाते हैं। आप दफ्तर में होते हैं लेकिन आपकी दक्षता, क्षमता, उत्साह और उम्मीद कहीं पीछे छूट जाती है।

Thursday, January 31, 2019

आत्म प्रशंसा करिहहूं सब कोई


कौशलेंद्र प्रपन्न
पूरा का पूरा हॉल तालियों से गूंज रहा था। तालियों की इस अनुगूंज में उनके चेहरे की खिलखिलाहट और मंद मंद मुसकान पूरे हॉल में लोगों को अपनी ओर खींच रही थीं। आत्म प्रशंसा का दौर एक के बाद एक ज़ारी रहा। सब के सब अपने तमाम शब्दों को झांड़ पोछकर सहेजने और फेंकने के लिए उतावले लग रहे थे। अपनी अपनी शब्दावली को खंघालकर नए नए प्रशंसा के शब्द और वाक्यों की बौछार कर रहे थे। इस आत्मप्रशंसा के खेल में कोई भी पीछे नहीं रहना चाहता था। जो पीछे रह गया वह तो छूट ही गया गोया। कोई क्यों पीछे रहे। शब्द ही तो फेंकने थे। उन्हें बताना ही तो था कि मैं आपको कितना चाहा करता हूं। आपके लिए कितनी तत्परता से प्रशंसा के शब्द और वाक्य तलाशा करता हूं। देखिए आपके लिए ही तो इतने सारे आत्मप्रशंसा के शब्दों की माली बनाई है। अब तो प्रसन्न हो जाएं प्रभू।
प्रभू मंद मंद मुसकुरा रहे थे। उनकी मुसकान में पूरा सभा अपनी मुसकान को मिलाने की कोशिश कर रही थी। प्रभू प्रसन्न थे। अपनी इन्हीं आंखों से तमाम मंज़र को पी रहे थे। खुश थे कि उनके कार्यक्रम में इतनी सारी जनता आई है। आई ही नहीं बल्कि उनके लिए कुछ क्या बहुत कुछ कह रही है और कहना चाहती है। जिन्हें कहने का मौका नहीं मिला उन्हें मलाल था कि उन्हें कहने गुणगान का अवसर न मिल सका। हत्भाग्य उनका कि वो प्रभू का कीर्तन नहीं कर सके।
सभा भरी थी। भरी थी बहुत कुछ कहने की। अपने उद्गार प्रकट करने के लिए मचल रही थी। प्रभू मंच पर विराजमान देख-सुन रहे थे कौन कौन आया, कौन नहीं आया। किसके साथ आगे क्या करना है इसके समीकरण में कभी कभी प्रभू खो जाते। लेकिन उनकी अधखुली आंखें शिव की तरह सब को ताड़ रही थी।
आत्मप्रशंसा हो या स्वप्रशंसा हम बहुत उदार हुआ करते थे। जहां जो मिल गया बस अपनी प्रशंसा शुरू कर देते हैं। मैंने यह किया। मैंने तो यह भी किया। मेरी तो इतनी इतनी किताबें आ गईं। मेरा सम्मान फलां जगह किया गया। मुझे तो उस समिति में भी रख रहे थे। मगर मेरा पास वक़्त कहां है। आपको तो पता ही है। और आप हां हां में गर्दन हिला रहे होते हैं। कहीं उन्हें भान न हो जाए कि सामने वाला सुन नहीं रहा है। हम चौकन्ने होकर उन्हें एहसास कराते हैं कि हम सुन रहे हैं। सुनने वाले की भी अपनी सीमा होती है। मगर बोलने वाले प्रभू अपनी ही रफ्तार में सुनाए जाते हैं।
आत्मप्रशंसा कीजिए अच्छी चीज है। कम से कम कोई और नहीं करता प्रशंसा तो हमें ही तो करना होगा। दूसरा क्योंकर प्रशंसा करेगा। सो कई बार अपने उत्पाद की बिक्री और प्रचार हमें ही करना पड़ता है। लेकिन कभी परप्रशंसा कर के देखिए। सामने वाला कितना गदगद हो जाता है। वह आपकी प्रशंसा भरी शब्दावली को गुन और सुन रहा होता है। जब आप देखे और अनुमान लगा सकें कि अब सही वक़्त है अपना छोटा सा काम सरका दें।
आत्मप्रशंसा और स्वप्रशंसा की ताकत इतनी मजबूत होती है कि किसी भी रूठे पी और प्रभू को मना सकते हैं। प्रिये साथी और प्रभू दोनों को ही मनाना संभव है। यदि परप्रशंसा में दक्ष हैं तो काफी लटके काम पूरे हो जाएंगे। मुरझाए चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ पड़ेगी। इसका अनुमान भी शायद आपको न हो कि परप्रशंसा का असर कितना दूरगामी होता है। प्रभू आपको आत्मऔर परप्रशंसा कौशल में दक्षता प्रदान करें। 

Wednesday, January 30, 2019

डरा हुआ व्यक्ति


कौशलेंद्र प्रपन्न
डरा हुआ आदमी क्या करता है? क्या कर सकता है? और क्या नहीं कर सकता। बेहद मौजू सवाल हैं। सवाल नहीं साहब बल्कि हक़ीकत है। डरा हुआ आदमी क्या नहीं कर सकता है। वह सब कुछ कर सकता है सब किसी पर भी विश्वास नहीं कर सकता। हर आवाज़ पर डर सकता है। किसी भी किस्म की आहट पर चौक सकता है। रात बिरात उठ सकता है। बैठे बैठे आंखों में पूरी रात काट सकता है। डर के घेरे में वह पानी पीना भी छोड़ दे। खाना भी धरा का धरा रह जाए।
डर हुआ आदमी कुछ भी कर सकता है। हर किसी को संदेह की नज़र से देख सकता है। देख सकता है कि कौन उसके साथ है और कौन उसके विपक्ष में खड़ा है। डरा हुआ आदमी छिपकली से डर सकता है और रास्ते चलते घबरा सकता है एसी में बैठकर भी पसीने से तर ब तर हो सकता है।
डरा हुआ व्यक्ति अब लिख रहा हूं कि इसमें दोनों ही लिंग शामिल हैं। डरा हुआ व्यक्ति हर वक़्त खुद को बचाना चाहता है। इस बचाव की स्थिति में वह किसी से भी मदद के लिए गुहार लगा सकता है। बेशक उसे सहायता मिले या निराशा। लेकिन वह भरपूर प्रयास करता है कोई तो हो जो उसे निर्भय कर सके।
आज की तारीख़ी हक़ीकत यह है कि डराने वाले ज्यादा मिलेंगे। बजाय कि कैसे बचा जाए और क्या रास्ते हो सकते हैं ताकि आप बच सकें। इसपर चर्चा और समाधान की ओर प्रेरित करने वाले कम। इसमें सब कोई शामिल हो सकते हैं।
हमें कभी समय निकाल कर एक ऐसी सूची वर्गीकृत करनी चाहिए जिसमें हम स्पष्ट लिखें कि हमें किस किस और किन किन से डर लगता है। जब हम ऐसी कोई सूची बना लेंगे तब हमें इससे बचने या निकलने के रास्ते और रणनीति बनाने में आसानी होगी। बजाय की डरते रहें और जीते रहें। फर्ज कीजिए आपको डर लगता है कि अगले साल शायद ही आपको कंपनी जॉब में रखेगी। इस डर में पूरा साल गुजार दें। या फिर डर डर कर रोज जीया करें। हमें अपने उन क्षेत्रों और एरिया पर काम करना होगा जिनकी वजह से कंपनी आपकी दक्षता पर सवाल खड़ी कर सकती है या की है। यदि समय रहते हमने अपने प्लान ऑफ एक्शन में निराकरण या जिसे टू डूज में शामिल कर लें तो इस डर से निज़ात मिल सकती है। लेकिन होता इससे बिल्कुल विपरीत है। हम स्वयं तो डरे ही होते हैं साथ ही अन्यों को भी डराया करते हैं आपनी कहानी सुनाकर। जो डरा नहीं है। जिसे डर नहीं है उसे भी आपकी कहानी सुन कर डर लगने लगता है।
डरना अच्छी बात हो सकती है। लेकिन उस डर से कैसे निपटा जाए उसके लिए सचेत होकर रणनीति बनानी होगी। फिर कोई वजह नहीं कि हम डर में जीया करें।

Monday, January 28, 2019

माफ कर दें लेकिन भूल न जाएं




माफ कर दें लेकिन भूल न जाएं
कौशलेंद्र प्रपन्न
अंग्रेजी का वाक्य है ‘‘फोरगिव नॉट फोरगेट’’ कुछ ऐसी अनुभूति है जिससे हमसब हमेशा ही गाहे बगाहे जीया या सहा करते हैं। कोई आपको आपकी ही नज़रों से सामने से आपको नज़रअंदाज़ कर जाता है। और आप मुंह उठाए देखते रह जाते हैं। कोई जो आपको बेहद जानकार हो और सामने से आपको देखे भी नहीं और नज़रें भी न मिलाए तो आपको कैसा लगेगा? शायद आप ख़्यालों में डूबने लगें। ऐसा क्यों हुआ? क्यों ऐसा किया? क्या वजह रही होगी इस व्यहार के पीछे आदि आदि। सवालों में हम और आप जूझने लगते हैं। यह जानने और समझने के लिए कि ऐसा व्यवहार अपेक्षित नहीं है।
आप क्या करते हैं कुछ घंटे, कुछ दिन तो याद रख पाते हैं फिर सबकुछ भूल कर उन्हीं बीच हंसी ठिठोली करने लग जाते हैं। वह जिसने आपको नज़रअंदाज़ किया। वह तो इस गुमान हो रहता है उसने आपको इग्नोर किया। किन्तु वो भूल जाते हैं कि आपने उसे माफ कर दिया। उनकी नजर में आप निहायत ही इमोशनल फूल हैं। आप समझते नहीं। हालांकि कहा जाता है कि जो माफ कर देता है वह बड़ा होता है। शायद माफ करने में आपका बड़क्कपन का आंका जाता है। लेकिन कब तक माफ करेंगे और वो कब तक आपको नज़रअंदाज़ करते रहेंगे।
यह खेल बड़ा ही दिलचस्प है। कभी यार दोस्त इग्नोर किया करते हैं तो कभी आपके वरीष्ठ। दोनों ही किस्म के लोग होंगे जो आपको नीचा साबित करने में लगे रहते हैंं। उन्हें कब तक आप माफ करेंगे। और कब तक उन्हें भूलते रहेंगे। कभी तो आपको उत्तर देना होगा। कभी तो उन्हें एहसास कराना होगा कि आप सब कुछ समझ रहें हैं।
जब उन्हें ज़रूरत पड़ती है तब आपसे बढ़कर प्रिये कोई और नहीं। संचार के तमाम माध्यमों से आपसे संपर्क करते ज़रा भी नहीं हिचकते। लेकिन जब आप संपर्क करना चाहें तो तमाम बहानों के पहाड़ खड़ा कर दिया जाएगा। उनके तर्कां पर मरा न जाए तो क्या किया जाए।
माफ कर दीजिए लेकिन भूलें नहीं। जिसने भी आपको ठेस पहुंचाया है। वह जो भी हो जैसा भी हो। भूलें नहीं। माफ बेशक कर दें। लेकिन एक सीमा है इसे पार करते ही आपको बताना होगा कि आप सब समझते हैं। माफ किया है भूले नहीं हैं। वक़्त बेहतर जवाब देगा।

Thursday, January 24, 2019

रिक्शावाला कहां से आता है और कहां जाता है?



कौशलेंद्र प्रपन्न
उसने बातों ही बातों में बताया कि आपको छोड़कर मैं वापस चला जाउंगा। कहां जाएगा? कहां से आया था? ये सवाल हमारे सरोकारों से बाहर ही खड़ा रहता है। हम जानना भी नहीं चाहते और हमारी कोई दिलचस्पी भी नहीं होती कि जो आपको अपने पांव और ज़िगर से खींच कर दफ्तर, बाज़ार पहुंचाया करता है। वह हमारे लिए सिर्फ व्यक्ति होता है जिससे बातें करना, उसके बारे में जानने हमारा लक्ष्य नहीं होता। वह किन मुश्किलों से गुज़रता हैं, इसके बारे में हम आंखें मूंद लिया करते हैं। हमारे लिए वह रिक्शावाला सिर्फ रिक्शावाला होता है। हम लोग दस या बीस रुपए देकर उतर जाया करते हैं। आज उसने बताया कि वह उत्तर प्रदेश के बागपत के किसी गांव से दिल्ली रिक्शा खींचने आया करता है। मेरी रूचि जगी और पूछा कब आते हो? उसने बताया सुबह हमारे गांव से एक आदमी अपने कैब में हमें लाता है और सात बजे दिल्ली गगन सिनेमा हॉल के पास छोड़ देता है। शाम में सात बजे हमें उठा लेता है। दोनों फेरे का अस्सी रुपये लेता है। सुबह खा कर आता हूं और दिन में तीन बार खाता हूं। वरना बीमार पड़ा जाउंगा।
वहीं एक और रिक्शावाला जिसके साथ रोज़ जाया करता था वह कल मिला। उसके हाथ में ई रिक्शा की हैंडल थी। मैंने पूछा, पुराना रिक्शा कहां गया? उसने बताया बाबूजी मेरी उम्र हो गई है। मैं तेजी से खींच नहीं पाता। इसलिए लोग मेरी सेवा नहीं लेते थे। सभी को जल्दी पहुंचना होता है। सो मैंने पिछले माह ई रिक्शा किराये पर लिया। बुढ़े रिक्शे वाले के साथ कोई भी जाना नहीं चाहता। धीरे चलते हैं। समय ज्यादा लगता है। अनुमान लगा सकते हैं कि किस तरह से पुराने और वृद्ध रिक्शाचालकों का क्या हुआ होगा।
एक नज़र रिक्शें के इतिहास पर डालते हैं। हमारे भारत में पहली बार शंघई से 1874 में 1000 रिक्शे आए थे। जो कि जापान से आए थे। आगे चल कर इनकी संख्या 1914 में 9,718 हजार हो गई। अगर अनुमान लगाएं तो पाएंगे कि रिक्शा खींचने वाले कितने हैं जानकर ताज्जुब होगा 100,000 रिक्शेवाले वाले 1940 रिक्शा खींचते थे। वहीं 1920 के आप-पास 62,000 रिक्शखींचने वाले थे। हाथ रिक्शेवाले के सामने ई रिक्शा ने नई चुनौती दी। तेज और जल्दी चलने वाली। 2010 में लगभग एक लाख ई रिक्शे रोड़ पर आए। हालांकि कई अभी तक दर्ज नहीं हैं। दिल्ली में 2013 के अप्रैल तक 29,123 ई रिक्शा दर्ज हैं। अब हाथ रिक्शा और ई रिक्शा के बीच द्वंद्व शुरू हो चुका है।

Wednesday, January 23, 2019

उद्देश्य का ताकत



कौशलेंद्र प्रपन्न
‘‘कारणं बिना न कार्यंयूज्यते।’’ न्याय दर्शन के इन सूत्र को समझने की कोशिश करें तो देख और समझ सकते हैं कि बिना किया कारण यानी उद्देश्य के कोई भी काम नहीं होता। यानी बिना कारण के हम कुछ भी नहीं करते। न हम सांस लेते हैं, कोई काम करते हैं और न ही हम किसी पर हंसते ही हैं। कोई न कोई कारण या प्रयोजन और उद्देश्य होता है जिससे हमारा व्यवहार संचालित होता है। हमारा हर वक्तव्य, गति और व्यवहार हमारे उद्देश्य की पूर्ति से प्रभावित और असर के घेरे में होते हैंं। बिना मकसद और औचित्य के हम कुछ भी नहीं किया करते हैं।
हमारे जीवन की असफलता का राज़ ही यही है कि हम अपने रोज़ के जीवन में कई सारे काम बिना उद्देश्य किया करते हैं। यदि उद्देश्य हो तो शायद हम कई सारे कामों को न करने की सूची में डाल दें। लेकिन दिक्कत यहीं आती है कि हम कई बार यह तय नहीं कर पाते कि कौन सा काम और कौन सा कदम हमारे लिए ज़रूरी है और कौन सा काम जिसे हम नज़रअंदाज़ कर सकते हैं। हम अपने उद्देश्य के निर्धारण में इतने उतावले और अधीर होते हैं कि तात्कालिक उद्ेश्य को पाने में अपनी पूरी ताकत लगा दिया करते हैं। होता यह है कि जिसमें हमें पूरी क्षमता लगानी थी वह अधूरी रह गई। और असफलता हमारे हाथ आती है और शुरू होता है शिकायतों और आरोपों का खेल।
हमारे उद्देश्य कई बार हम नहीं बल्कि हमारे अग्रज तय किया करते हैं। मां-बाप, यार दोस्त और कई बार हमारे गुरू। होता यह है कि यदि कोई पूछ बैठे कि क्यों कर रहे हो? क्यों बीएउ कर रहे हो? क्यों डॉक्टर बनना चाहते हो आदि तो हमारा जवाब होता है क्योंकि पिता चाहते थे। क्योंकि चाचा या बुआ ने बताया था। या फिर सारे दोस्तों ने उसी कोर्स के लिए फार्म भरे थे सो मैं ने भी भर दिया। यानी एक बात स्पष्ट है कि आपके उद्देश्य कोई और तय कर रहे थे। आप तो उस ओर जाना ही नहीं चाहते थे। क्योंकि औरों ने बताया और देखा तो उस राह पर चल पड़े। वर्षां गुजारने के बाद महसूस होता है कि मैंने तो यह बनना ही नहीं चाहता था। यह तो उनकी इच्छा थी। उनकी चाहत थी कि मैं इस क्षेत्र में आउं। तो आप क्या चाहते थे यह सवाल आपको परेशान करनी चाहिए।
एक शोध हुआ था जिसमें मनोवैज्ञानिक ने विश्व के तकरीबन 4000 ऐसे लोगों से साक्षात्कार किया जो अपने जीवन और कार्य में सफल माने गए। भारत से गांधी जी को शामिल किया गया था। इस शोध में खिलाड़ी, संगीतकार, कलाकार, पत्रकार, मजदूर आदि शामिल थे। कोशिश यह की गई थी कि समाज के सभी क्षेत्रो के प्रतिनिधियों को इस अध्ययन का हिस्सा बनाया जाए। लेखिका व शोधकर्त्री ने बताया कि अधिकांश लोगों ने बताया कि उनकी लाईफ के पर्पस यानी मकसद किसी और ने तय किए थे लेकिन अपने जीवन और क्षमता को पहचान कर उन लोगों ने अपने लक्ष्य और उद्देश्य को दुबारा लिखा और जीया। एक बडत्र संगीतकार, गिटारवादक जो आगे चल कर एक रसोईया बना और उस काम में उसे प्रसिद्ध ऐेसी मिली कि अमरिका के उच्च सदन में उसे सम्मानित किया गया। उसने बताया कि हम अपनी रूचि और ताकत को पहचाने बगैर पूरी ज़िंदगी दूसरों के उद्देश्यों पूरा करने मे लगा देते हैं। मैंने एक दिन महसूस किया मुझे खाना बनाने में आनंद आता है। रूचि भी जगी और संगीत गिटार छोड़कर कूक में आ गया। ऐसे में हमारे जीवन में कई उदाहरण मिलेंगे जो पूरी जिं़दगी जिस काम में गुजार देते हैं उनके पूछ लीजिए क्या कहते हैं जो उनका कहना होता है मैं तो करना कुछ चाहता था। लेकिन पूरी ज़िदगी गलत क्षेत्र में रहा। काश उस क्षेत्र में रहता तो ज़्यादा आगे बढ़ पाता।
हमारे जीवन की कथा ही यही है कि जाना कहीं और चाहते हैं किन्तु रेलगाड़ी किसी दूसरी दिशा की पकड़ लेते हैं। उस तुर्रा यह कि गुमान कितना बड़ा होता। तोहमत किसी और पर मढ़ा करते हैं। अपनी गलती को दोषी किसी और और परिस्थितियों को ठहराया करते हैंं। यदि हमारा उद्दश्य स्पष्ट होता तो कोई वज़ह नहीं कि हम सफल नहीं होते। इसे ऐसे भी समझ सकते हैं जब हमारे जीवन का लक्ष्य और उद्देरू किसी और के प्रभाव और आकर्षण से निर्धारित होते हैं तो ऐसे में शायद हम अपने लक्ष्य और उद्देश्य से मुहब्बत भी नहीं कर पाते। बिना रूचि और उत्साह के जिस काम को कर रहे हैं उसमें सफलता कितनी हासिल होगी इसमें संदेह हमेशा ही रहेगा।
मैंनेजमेंट गुरू की मानें तो कोई भी सफल व्यक्ति और प्रोजेक्ट तभी सफल और मुकम्मल होता है जब हम शुरू में अनुमानित संकटों और अवरोधों का आकलन कर उससे निपटने की योजना भी बना लेते हैं। हमेशा बल्कि समय समय पर उद्देश्य हासिल करने के रास्ते और रणनीति का मूल्यांकन और पुनर्मूल्याकन करते रहते हैं। यदि हमारा रास्ता ही गलत है तो वह योजना व प्रोजेक्ट को विफल होना ही हैं। अपने जिस लक्ष्य व उद्देश्य को पाना चाहते हैं उसके अनुरूप हमें रणनीति और कार्ययोजना निर्माण बेहद ज़रूरी है। इसके बगैर हम अपने लक्ष्य व उद्देश्य से काफी दूर रहेंगे। हमेशा ही हमें अपने जीवन से शिकायत रहेंगी। दरअसल हम अपने जीवन में कई सारे काम सिर्फ दूसरों को दिखाने और खुश करने के लिए किया करते हैं। इसमें बॉस, अभिभावक, परिवेश सभी शामिल हैं। इसमें हमारी खुद की खुशी और इच्छा कहीं पीछे छूट जाती है। और शिकायत किया करते हैं हमने अपने जीवन में तो यह चाहा था वह चाहा था आदि। हमें अपने जीवन और कार्यक्षेत्र से क्या उद्देश्य है? क्या चाहते हैं यह यदि स्पष्ट हो तो काफी मसले खुद ब खुद हल हो जाते हैं।

Sunday, January 20, 2019

मुश्किल में कौन साथ है पहचान ज़रूरी



कौशलेंद्र प्रपन्न
संस्कृत साहित्य में एक मंत्र है ‘‘संकट में तीन लोगों की पहचान होती है पत्नी, दोस्त’’ और तीसरी मुझे याद नहीं आ रहा है। यह बात काफी हद तक जायद भी है। सचमुच मुश्किल घड़ी में ही इन लोगों की पहचान होती है। पत्नी और दोस्त की। यदि कोई संकट की घड़ी आए तो ऐसी स्थिति में पत्नी और दोस्तों की पहचान होती है। यदि कोई मुश्किल स्थिति आती है और यदि ये लोग साथ नहीं देते तो दोस्तों की पहचान हो जाती है। इसमें न केवल दोस्तों की बल्कि पत्नी की भी पहचान होती है।
जीवन ही है। इसी जीवन में हर बार एक ही स्थिति नहीं होती। बल्कि कभी भी ऐसी स्थिति आ सकती है। जब आप होस्पीटल में होते हैं तब कौन आपके साथ खड़ा है? यह पहचान आपकी होनी चाहिए। पत्नी क्योंकि आपकी है तो वो तो होस्पीटल में होगी ही। किन्तु दोस्तों में से कौन अस्पताल में आता है इसकी पहचान करनी होगी। जो लोग फोन पर पूछते हैं कि ‘‘कोई मदद की ज़रूरत हो तो बताना।’’ लेकिन वो कहने के लिए कह रहे हैं इसे समझिए।
यदि रात में रूकना हो तो शायद उन दोस्तों और परिचितों में से काफी लोग पीछे हट सकते हैं। इन्हीं वक़्तों में पहचान होती है। जब आपके दोस्त या परिवार के लोग आपके साथ अस्पताल में नहीं रूकते  तभी आपको लगता है आप, बिल्कुल अकेले हैं। आपके साथ कोई नहीं है। आप निपट अकेले हैं। कोई आपके साथ नहीं है। पत्नी है तो उसकी अपनी सीमाएं हैं। मगर जो लोग दोस्त होने का दंभ भरते हैं उन्हें पहचानने की जरूरत है।
जब भी हम संकट में होते हैं हमें कई सारे लोग याद आते हैं। हमें लगता है ये सारे लोग हमारे साथ हैं। लेकिन हक़ीकतन ऐसा नहीं होता। हर कोई बस फूल फल लेकर आते हैं। लेकिन जब वास्तव में डिस्चार्ज के वक़्त ज़रूरत पड़ती है तब हम अकेला होते हैं। यह स्थिति बड़ी भयावह है। मुझे याद आता है, मेरे पड़ोस के चचा जी आए और कहा मैंन स्टेशन छोड़ने चलूंगा। और उन्होंने इसे निभाया। उनकी उम्र नब्बे पार की है। तब लगा हम कैसे समय में जी रहे हैं।

Friday, January 18, 2019

अन्न दान करते वो लोग



कौशलेंद्र प्रपन्न
सिमरन नाम है उस युवा का। जो अपने साथ चार और साथियों के साथ सफ़दरजं़ग अस्पताल के बाहर रोगियों के साथ आए अन्य सेवाटहल करने वालों और सड़क पर सोने वालों के लिए शुक्रवार के शुक्रवार भोजन बांटा करते हैं। इस सर्दी पर पूरी दिल्ली सोने की तैयारी कर रही हो उसमें कोई है जो भूखों के लिए भोजन लेकर खड़ा है। उस भोजन को हासिल करने के लिए कम से कम सौ लोग तो लाईन में लगे ही हैं। शायद यह किसी तथाकथित महाकुंभ में स्नान करने से ज़्यादा फलदायी कर्म है।
किसे नहीं मालूम कि सफ़दरज़ंग हो या एम्स यहां लंबी कतारें मर्ज़ दिखाने वालों रोगियों के साथ आने वालों की भी दशा कोई ख़ास ठीक नहीं होती। वो भी तब जब रोगी उत्तराखंड़, बिहार, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों से आता है। उसके लिए पटरी पर ही बसर करना लिखा होता है। यदि उसकी जेब भारी है तो वह लॉज, होटल, या फिर अन्य जगहों पर भी रातों काट लिया करता है। लेकिन जो पहले ही सुविधा से हीन हैं। जिन्हें रोगी के इलाज के लिए मकान, दुकान, खेत भी बेचना पड़ता है वह इलाज में पैसे लगाए या फिर किसी होटल में रहने में। एम्स के बाहर सोने वाले वालों कई बार न्यूज चैनल में स्टोरी कवर की गई। किन्तु सरकारें आती जाती रहीं। उनके लिए वही पटरी आज भी है और कल भी वही बसेरा हुआ करता था।
सिक्ख समुदाय के सिमरन ने बताया कि हर शुक्रवार को शाम दो घंटे इनलोगों को भोजन बांटा करते हैं। आलोचना से परे क्या हम सोच सकते हैं कि जो लेग एक रात के जागरण में लाखों का स्वाहा कर दिया करते हैं। काश वो लेग इन जगहों पर सचमुच के नर सेवा कर पाते। तो संभव है नारायण सेवा भी इसी में शामिल हो जाए। लेकिन नहीं हमारी िंज़द्द है कि हम इन कार्यां में पैसे लगाने की बजाए फलां मंदिर, फलां मूर्ति पर ज़्यादा ध्यान दिया करते हैं। कहने वाले कह सकते हैं कि यह तो सरकार करे उसके जिम्मे ऐसी सुविधाएं मुहैया कराना है। स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षा आदि। लेकिन कभी सरकार के समानांतर हम भी कुछ कर सकते हैं जिससे वास्तव में ज़रूरतमंदों की मदद मिल सकती है।

Thursday, January 17, 2019

ऑपरेशन टले तो मरीज़ बढ़ेंगे


कौशलेंद्र प्रपन्न
जैसे हम मॉल्स जाया करते हैं। वैसे ही हमें कई बार अस्पताल जाना होता है। जाना ही नहीं बल्कि कई बार रात दिन रूकना भी पड़ता है। इस दौरान हमारी समझ तो यही बनती है कि डॉक्टर अपना काम मजबूती से करे। छूट्टी न ले। ऑपरेशन समय पर करे। लेकिन जब उसके पास तय ऑपरेशन से ज्यादा मरीज खड़ें हो तो क्या कहेंगे। फर्ज कीजिए आपका नंबर था आज ऑपरेशन होना है। लेकिन उसी दौरान कोई अन्य क्रीटिकल मरीज आ जाए तो हमें डॉक्टर की स्थिति को समझना चाहिए।
एक डॉक्टर कितने घंटे बिना थके। बिना उफ्््!!! तक किए ऑपरेशन कर सकता है। उसे भी मानवीय थकन तो घेरती होगी। जब वह ऑपरेशन कक्ष में जाता है तब उसे भी मालूम नहीं होता कि वह कब बाहर आएगा। कई बार अनुमान से ज्यादा बड़ी बीमारी की स्थिति उसके सामने प्रकठट हो जाती है। ऐसे में वह तमाम जरूरी और महत्वपूर्ण कामों और पूर्व तय कामों को ताख पर रख देता है।
हमारा डॉक्टर किन हालात में ऑपरेशन कक्ष में जाता है इसका हमें शायद अंदाज भी नहीं होता। लेकिन वह बड़ी ईमानदारी से अपनी जिम्मेदारी निभाने की कोशिश करता है। हालांकि इसी समाज में डॉक्टरी पेशे से भी ऐसी ऐसी ख़बरें आती हैं जिन्हें सुन और देख कर ताज्जुब होता है कि कैसे कैसे डॉक्टर इस पेशे में आ गए हैं। जिन्हें ऑपरेशन करना था दाई टांग की लेकन तनाव या दबाव या फिर काम के दबाव में बिना पूरी तरह से जांच किए ग़लत ऑपरेशन कर देते हैं।
जैसे अन्य पेशों में हड़ताल हुआ करते हैं। वैसे ही इस प्रोफेशन में भी विभिन्न मांगों और सेवाओं के लिए हड़ताल होना स्वभाविक है। लेकिन जब ये लोग सेवा में लौटते हैं वैसे ही फाइलों की तरह ही मरीजों की लंबी फेहरिस्त हो जाती है। जिन्हें ऑपरेट या उपचार करना होता है। जो भी हो। हर पेशे की कुछ सावधानियां और जिम्मेदारियां हुआ करती हैं। जिन्हें पूरा ही करना होता है। डॉक्टर की जिम्मेदारी तो यही हेती है कि वो मरीज का उपचार ठीक करें।

Wednesday, January 16, 2019

सवाल बहादुर



कौशलेंद्र प्रपन्न
हाल ही में एक शिक्षक प्रशिक्षण कार्यशाला में अनुभव हुआ। साहब सवाल पर सवाल दागें जा रहे थे। सवालां की प्रकृति का जब विश्लेषण किया तो मालूम चला दरअसल वो सवालों के मार्फत मेरी इल्म और ज्ञान का थाह लगाना चाह रहे हैं। साथ ही यह स्थापित करना चाह रहे हैं कि वो सब कुछ जानते हैंं। और जो बताया जा रहा है कि वह ग़लत और उनके स्तर का नहीं है। इसे साबित करने में पूरी ताकत झांक रहे थे। बीच बीच में अपनी नकारात्मक मुंडी भी संचालित कर रहे थे। उन्हें स्थापित करना था कि उन्हें सब कुछ आता है। और बेहतर आता है। जो भी बताया जा रहा है वह तुच्छ है। उन्हें तो आता ही है और अच्छे से आता हैं।
उन्होंने सत्र को न चलने देने का प्रण ले रखा था। बार बार कहते कि आप ऐसा क्यों बता रहे हैं, कैसे बता रहे हैं, यह तो ऐसे होता है। वैसे होते है आदि आदि। उन्होंने उस कार्यशाला में अन्य सहभागी को भी अपने इस अभियान में शामिल किया। और लिख और बोलकर किसी भी सूरत में सत्र को आगे कैसे नहीं चलने देना है इसमें अपनी पूरी क्षमता लगा रहे थे।
मैंने उन्हें सम्मान देते हुए सत्र में खड़ा किया आप जो कॉपी पर लिख और बोल रहे हैं अपनी राय यहां सब के सामने रखें तो सबको समझने में आसानी होगी। जनाब बोर्ड़ के समक्ष आए और पूर्व ज्ञान के आधार पर लिखने लगे। बोलने लगे और अपने ज्ञान को स्थापित करने लगे। सत्र में शामिल अन्य लोग या तो अरूचि के शिकार होने लगे या फिर उन्हें लगने लगा वो जो पढ़ा रहे हैं वह सत्यापित है।
मैंने उन्हें लगभग पंद्रह मिनट दिया। लेकिन जब लगने लगा कि ये साहब सिर्फ और सिर्फ आत्मपहचान स्थापित करना चाहते हैं। तब मैंने उन्हें रोका और बोला कि अब और मैं अपने अन्य प्रतिभागियों को खो नहीं सकता। और क्योंकि मैं इस कार्यशाला का जिम्मेदार हूं तो मेरी कुछ योजनाएं हैं जिन्हें मैं बीच रास्ते में दम तोड़ते नहीं देख सकता। सो आप बैठ जाएं और मेरे कंटेंट को आगे बढ़ने दें।
लेकिन वो साहब थे कि अपनी आदत से बाज़ नहीं आ रहे थे।  अंत में कोशिश की कि वो मान जाएं। किन्तु आदतें ऐसे एक दिन में कहां जाती हैं। वो जारी रहे। मैंने में अंत में उन्हें कक्षा से बाहर किया। हालांकि ऐसा करना नहीं चाहता था लेकिन अन्य के हित को ध्यान में रखते हुए उन्हें निवेदन किया और शायद मैं आपकी अपेक्षा और उम्मीद से नीचे हूं सो आप को यदि लगता है कि मेरा कंटेंट आपके स्तर का नहीं है ता आप कक्षा से बाहर जा सकते हैं।
जबकि यह समाधान मुझे अन्य प्रतिभागियों के हित में लेना पड़ा। ऐसे आत्मप्रचार वाले लोग हुआ करते हैं। उनके अनुसार यदि आपने सत्र को बहने दिया तो आपकी योजना और गतिविधियां राह में ही दम तोड़ देती हैं। सवाल पूछना और पूछने के मकसद को को पहचानना चाहिए। और सत्र को हाईजेक होने और आत्मप्रचार से बचाने की आवश्यकता होती है।

Saturday, January 12, 2019

आया फटकार का मौसम


कौशलेंद्र प्रपन्न
हर भाव और बातों का एक मौसम ख़ासकर मुकर्रर होता है। जैसे हमारी ऋतुएं तय समय पर आती हैं यह अलग बात है कि आज कल मौसम में भी समय सीमा पर नहीं आया करते। सर्दी देर से आती है। गरमी कुछ ज्यादा ही उतावली होती है। आ धमकती है मार्च ख़त्म होते होते। और बसंत तो ऐसा ही है। कोयल तो बेमौसम भी...। सब का चक्र सब बदल चुका है। दफ्तरों में भी एक मौसम ख़ास होता है। यह मौसम साल में एक बार आता है। वह मौसम है एप्रेजल का। यह मौसम है डांट डपट का। मौसम पर कर्मियों पर चढ़ जाने का। कर्मियों के हौसले को तोड़ना का मौसम भी शुरू हो जाता है जनवरी और फरवरी में। हमारा कर्मी आवाज़ न उठाए। हमारा कर्मी जिसने साल भी देह तोड़कर काम किया। इससे पहले की वह एप्रेजल में बढ़ोत्तरी की मांग न करे इसलिए यही वक़्त होता है हौसले को धांस देने का। उन्हें मॉरल स्तर पर ऐसे तोड़ा जाए कि मार्च और अप्रैल में बकार न निकाल सके कि इतना ही एप्रेजल हुआ।
दरअसल कर्मी पूरे साल मनोयोग से काम करता है। अपनी क्षमता से बाहर जा कर भी काम में नई उड़ान लाने की कोशिश करता है। एक उम्मीद होती है कि अगले साल पगार में अच्छी ख़बर होगी। लेकिन स्वनाधन्य और स्थापित मैनेजर और रिपोर्टिंग मैनेजर भी इसी ताक में रहते हैंं कि कहीं उनकी दक्षता पर सवाल न खड़ा हो। बस इस मौसम का लाभ उठाने से नहीं बचते। अपने कर्मियों के साल भर का काम का मूल्यांकन शुरू होता है। बताया जाता है कि पूरे साल तुमने क्या किया? कितना किया? क्या क्या तुम्हारे हिस्से में तय काम थे उसमें से कितने काम रास्ते में ही हैं। तुमने तो कुछ किया ही नहीं। तुमने तो वायदे किए थे कि ये कर दोगे। वो कर दोगे लेकिन तुमसे कुछ भी न हो सका। यही वो रिव्यू प्रक्रिया है जिसमें कर्मी के आत्मबल को ध्वस्त किया जाता है।
कंपनी के नए निज़ाम के कंधे पर तो दोहरी जिम्मेदारी होती है। उन्हें अपने बॉस के साथ ही कंपनी के नियंताओं के कृपापात्र भी विश्वासभाजक बनाना भी होता है। ऐसे में वह कई तरह की पहलकदमियां किया करता है। जो काम हुआ भी नहीं उसे नए सिरे से पेश कर अपना नंबर बनाना चाहता है। पिछले कामों को धत्ता बताते हुए अपनी अस्मिता और पहचान स्थिर करने के लिए किसी की पीठ छीलनी पड़े तो उसमें भी ये नए निज़ाम पीछे नहीं हटते।
यह एप्रेजल का मौसम भी अजीब है। एक दूसरे से दूर करने में बड़ी भूमिका निभाता है। जो पूरे साल साथ काम किया करते थे। साथ खाना खाया करते थे। उन्हें अचानक डर घेर लेता है कि कहीं फलां के साथ न देख लिया जाए। गलत असर पड़ेगा। हर कर्मी अपनी पीठ के घाव और चाबूक के दाग को छुपाना चाहता है। कोई भी पीठ पर पड़ी मार रिव्यू के कैसे दिखाए। सब के सामने अच्छा बनने के लिए वह हमेश चेहरे पर एक मुसकान चस्पा रखता है। कहीं देखकर लोग बता न दें कि निज़ाम को या फलां कर्मी की पीठ पर कितने निशान हैं।
इन फटकारों के मौसम के आने से पहले या गुजर जाने के बाद कंपनी से कई कर्मी अपना रास्ता अगल कर लिया करते हैंं। जब चाबूक की मार ही सहनी है तो क्यों न अपने पैसे पर सहा जाए। यदि गांट फटकार सुनने-सुनाने का कोई तय सीमा नहीं है तो बेहतर है किसी और दुकान में अपनी दक्षता बेची जाए। और इस तरह से बेहतर मानव संसाधन एक कंपनी से कूच कर जाता है। वैसे नए निज़ाम पर  इससे कोई ख़ास अंतर नहीं पड़ने वाला क्योंकि उसे लगता है उसे अंदर काम करने वाले निहायत ही नकारे और असक्षम हैं। ये चले जाएं तो ही बेहतर है।

Wednesday, January 9, 2019

सीख ली तुम्हारी भाषा


कौशलेंद्र प्रपन्न
सीख ली मैंने भी तुम्हारी भाषा। तुम्हारी ही जबान अब मैं भी बोल सकता हूं। बोल सकता हूं तुम्हारी ही तरह कई तरह के जुमले। कई तरह की ख़ास शब्दावलियां भी अब मेरे पास आ गई हैं। आ गई हैं वो कौशल जिसमें तुम मुझसे आगे थी। आगे थी तुम्हारी गति और तुम्हारी स्वीकार्यता। इन्हीं भाषाओं के आधार पर ही तो तुम मुझे नीचा दिखाया करती थी। तुम्हीं क्यों मैनेजमेंट भी सोचती थी कि तुम्हारे पास वो लैंग्वेज नहीं है जिससे पीपुल मैनेजमेंट में यूज की जाती है। वो भाषा नहीं है जिसमें हम लोग काम किया करते हैं। और तुम्हीं हो जिसके पास वो भाषा नहीं है।
मैंने भी कोशिश की कि तुम्हारी भाषा बोलने और लिखने लगूं। तुम्हारे पास वो भाषा है जिसमें मैनेजमेंट काम किया करता है। जिस भाषा में दुनिया काम किया करती है। मैंने कोशिश की कि मैं भी वो भाषा सीख लूं जिसमें वो लोग काम करते हैं।
तुम्हारी भाषा में जब से बोलने लगा हूं तब से तुम्हें भी ऐसा लगने लगा है ये तो मेरी भाषा सीख में बातें करने लगा है। ये तो वो तमाम शो कॉल्ड मैनेजमेंट के टर्मस हैं। ये कैसे हुआ? ये भी जब हमारी भाषा में बोलने और लिखने लगेगा तो गजब है। जबकि भाषा पर किसी का एकाधिकार नहीं होता है। जो भी प्रयास और अभ्यास करेगा उसे भाषायी कौशल तो हासिल होंगी ही। मेरी लिखी भाषा पर तुम्हें ताज्जूब हुआ कि ये कैसे मेरी भाषा लिख सकता है? कब इसने सीखी हमारी भाषा।
जो भी हो भाषा हो या कोई अन्य दक्षता अभ्यास से अर्जित कर सकते हैं। सीख सकते हैं दुनिया की कोई भी भाषा बस जज्बे और अभ्यास, लगन और प्रयास जरूरी है। आप किस भाषा में बोल और लिख रहे हैं आज की तारीख़ में सभी की नज़र रहती है। जैसे ही आप उनकी बनाई पूर्वग्रह को तोड़ते हैं वैसे ही महसूस होता है कि ये क्या हुआ? क्या इसने भी हमारी भाषा को बरतना सीख लिया क्या। जबकि दुनिया की हर भाषा हमारी है और हम उस भाषा के हैं।

Tuesday, January 8, 2019

असफलता के डर से आगे


कौशलेंद्र प्रपन्न
निवेश सिर्फ रुपए पैसों का ही नहीं होता। और न केवल जमीन जायदाद का। बल्कि डर भी निवेश करने योग्य ऐसी भाव दशा है जिसपर खुल कर और समझकर निवेश किया जा सकता है। मौत से कौन नहीं डरता। सभी को मरने से डर लगता है। यही वजह है कि मरने को कैसे टाला जा सकता है कुछ देर के लिए ही सही पूरा का पूरा बाजार इसे साकार करने में लगा है। पहले डर को बढ़ाएं और इतना बढ़ाएं कि लोग उस डर से छूटकारा पाने के लिए आपके पास आएं। शिक्षा और परीक्षा को पहले डरवानी साबित किया जाए और फिर एक्जाम डर से कैसे बचें आपके बच्चे इसके लिए वर्कशॉप उपलब्ध कराने वाली दुकानें खुली हुई हैं। जो परीक्षा के भय से कैसे बचा जाए इसके मंत्र सीखाया करते हैं। ठीक उसी तरह कई तरह के डर हमें हमेशा अपनी गिरफ्त में लेने के लिए तैयार बैठें हैं। कभी जीवन में आगे बढ़ने का डर। कभी न बोल पाने का डर। तो कभी जॉब पर जाने का डर। आदि।
डर का समाज शास्त्र और दर्शन को समझे ंतो पाएंगे कि कई बार डर अच्छा भी होता है। अगर जीवन में असफल होने व फेल होने का डर खत्म हो जाए तो संभव है हम प्रयास करना छोड़ दें। हम सावधान न रहें। शायद वेद में निर्भय होना कहा गया है। लेकिन निर्भय होना कई बार हमें असावधान और लापरवाह बना देता है। जैसे ही लापरवाही हुई नहीं कि दुर्घटना घटती है। अगर चौकन्ने हुए और असफल होने से डरे तो हम सावधान भी रहेंगे। शेर और खरगोश की कहानी में यही तो हुआ। शेर के जीवन और दिल से डर खत्म हो गया था। उसे इतना ज्यादा आत्मविश्वास हो गया था कि वह अपने ही अहम में मारा गया। ठीक उसी प्रकार जब हमारे अंदर भय खत्म हो जाता है और स्थिर होकर मंथन नहीं कर सकते तभी हम हारा करते हैं।
आज कई प्रकार का डर हमारे सामने है। जॉब का डर। बीमारी का डर। और आगे बढ़ने का डर। जब रास्ते में व्यवधान आता है तब हम उस डर का कदम नहीं उठाते। हम अपने सुरक्षित जगह पर ही बने रहना चाहते हैं। यही वो डर है जिसकी वजह से हम आगे नहीं बढ़ पाते। हालांकि संस्कृत साहित्य में स्पष्टतौर पर कहा गया है जो निश्चित को छोड़कर अनिश्चित की ओर भागता है वह उचित नहीं। कम से कम निश्चित को तो बनाए रखना चाहिए। लेकिन कई बार यही निश्चितता हमें आगे बढ़ने से रोकती भी है। अनिश्चित सही है कि अंधेरे में है। असफलता संभाव्य है लेकिन यदि संतुष्ट होकर बैठ गए और निश्चित को पकड़कर बैठे रहे तो हमारी प्रगति कहीं न कहीं प्रभावित होती है।
दुनिया में जो भी डर से मुक्त हो सका है उसके जीवन में प्रगति की लव जली हैं। वह आगे ही बढ़ा है। जो डर कर बैठ गया वह वहीं स्थिर रह जाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो जो असफलता से डर गया वह क्या ख़ाक आगे बढ़ेगा।

Friday, January 4, 2019

मेला ए पुस्तक दिल्ली नगरे...



कौशलेंद्र प्रपन्न
आज की तारीख़ में लेखकों की बाढ़ आ चुकी है, इसे मानने और स्वीकारने में किसी को भी गुरेज़ नहीं है। लेकिन देखना यह है कि उन लेखन में क्या और कितने हरिशंकर परसाई, शरद जोशी, शंकर पुणतांबेकर, मृदुला गर्ग आदि निकलने पाते हैं। सदि तुलना करें तो पाएंगे कि पहले लेखक अपनी रचना और लेखन पर वक़्त बिताया करते थे। उन्हें संपादन करने वाले संपादक चुस्ते के साथ संपादित कर उन्हें मार्गदर्शन किया करते थे। किन्तु जैसे जैसे तकनीक का विकास हुआ वैसे वैसे नवलेखकों को विभिन्न स्तरों और स्वरूप में लिखने और प्रकाशित होने का अवसर मिला। यहां लेखक ही संपादक है। एक ही व्यक्ति संपादकख् लेखक, पाठक भी हुआ करता है और आलोचक भी। यहां संपादकीय सत्ता की कमी कहीं न कहीं रचना की गुणवत्ता को तय करने लगीं।
यादा हो कभी ऑरकूट भी अभिव्यक्ति का एक मंच आया। धीरे धीरे वहां भी लेखकों की बाढ़ आई। समय और तकनीक के बयार में वहां बिला गया। फेसबुक, ब्लॉग, ट्वीटर आदि सेशल मीडिया का अभिव्यक्ति का मंच मिला। इन खुले मंचों पर कोई भी लेखक अपनी रचना पोस्ट कर सकता है। उन कंटेंट पर अन्य अपनी राय देने में स्वतंत्र हैं। लेकिन यहां देखने वाली बात यह मौजू है कि टिप्पणियों में निजी राय, राग भी शामिल होते हैं। साथ ही यह भी देखा और पढ़ा जा रहा है कि किस व्यक्ति को इन मंचों पर बदनाम किया जाए व किसे तवज्जो देकर उसे प्रसिद्ध करना यह एक व्यापक अभियान के तौर पर चलाते समूह भी सक्रिय हैं। इन्हें भी हमें समझना होगा।
इन विश्व पुस्तक मेलों में क्या क्या और किस प्रकार सार्थक काम होते हैं इस पर नज़र दौड़ाएं तो पाएंगे कि ऐसे ऐसे लेखकों से बातचीत करने, चर्चा करने का अवसर मिलता है जो सदूर प्रांतों और दुर्गम क्षेत्रों में रहकर सक्रियता के साथ लेखन में लगे हुए हैं। हम पाते हैं कि ऐसे भी लेखक हैं जो महज लिखने में विश्वास किया करते हैं। छपने की ओर प्रेरित करने के लिए उने शुभचिंतक उन्हें मोटिवेट किया करते हैं। लेखकीय कर्म को करीब से देखने, महसूसने और जानने का अवसर कुछ ऐसे पल हुआ करते हैं जो अप्रतीम माना जा सकता है।
आज की तल्ख़ हक़ीकत यह है कि बहुत कम लोग पढ़ना चाहते हैं लेकिन लिखना हर कोई चाहता है। चाहता है कि रातों रात लेखक बन जाए। किन्तु वह उसके अनुरूप अभ्यास और प्रयास कम करता है। बेंजामिल फ्रैंक्लीन अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि वो जन्मना लेखक नहीं थे। उन्होंने अभ्यास के ज़रिए लेखकीय ताकत अर्जित किए। उन्होंने हप्ते, माह, साल लगाए और अभ्यास किया कैसे बेहतर लिखा जाए। और अभ्यास के मार्फत आज वो प्रतिष्ठित और स्थापित लेखक बन पाए। लेकिन आज के लेखक और लेखन कर्म में तुरंत फल की कामना करने वाले लेखक तुरत फुरत में सफलता हासिल करना चाहते हैं। अभ्यास की कमी और स्वाध्याय में कोताही कई बार लेखक को दोयमदर्ज़े का लेखक ही बना पाता है।


Wednesday, January 2, 2019

रूचि लेकर पढ़ें, पढ़ाएं साहित्य


कौशलेंद्र प्रपन्न
साहित्य शिक्षण और पठन में हमारा मुख्य मकसद क्या उन्हें कविता, कहानी पढ़ाना है या फिर साहित्य पढ़ाते वक़्त उन्हें समाज और संवेदनशील बनाना है। जब बच्चा एक मां की बेबसी या फिर बच्चे काम पर जा रहे हैं, पढ़ता है तो कहीं न कहीं बच्चा न केवल आनंद हासिल करेगा बल्कि अपने परिवेश और समाज के प्रति सजग होगा। कविता को पढ़ाते वक़्त अकसर लोग सवाल उठाते हैं व मानते हैं कि कविता पढ़ाने-पढ़ने का मकसद आनंद प्रदान करना है। क्या कविता महज आनंद प्रदान करना है? क्या कविताएं सिर्फ कवि का क्या आशय है आदि के जवाब तक महदूद करना है आदि। दरअसल आज जिस तदाद में कविता कहानियां लिखी जा रही हैं, उन्हें पढ़ने और समझने वाले ख़ासा कम हैं। जो पढ़ते हैं वो या तो पत्रकार हैं, कवि हैं, समीक्षक हैं आदि। लेकिन शुद्ध व सिर्फ पढ़कर आनंद लेने के उद्देश्य से कम लोग पढ़ा करते हैं।
प्राथमिक स्तर पर व कहे लें आरम्भिक तालीम में पढ़ने और पढ़ाने की क्षमता व स्वरूप एकदम भिन्न पाया जाता है। हमारे अधिकांश शिक्षक व शिक्षिकाएं कहानी, कविता पढ़ाने के दौरान सिर्फ पाठ्यपुस्तकों तक सीमित रह जाते हैं। हमारी कोशिश शायद यह होनी चाहिए जो कहीं न कहीं बच्चों में साहित्य पढ़ने के प्रति ललक पैदा करें। यदि बच्चे आनंद व रूचि लेकर पढ़ना सीख लेंगे तब हमें इस बात की वाकलत करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी कि साहित्य पढ़ना चाहिए। हमें भाषायी संस्कार मिलता है, हमारी भाषायी संपदा में बढ़ोत्तरी होती है। बच्चा एक बार पढ़नें में रूचि लेने लगेगा तब हमें ज़्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ेगी।
बेंजामिन फैं्रक्लीन विश्व के ख़्यात लेखक का मानना है कि वो प्रकृतितः लेखक नहीं थे बल्कि उन्होंने लिखना सश्रम सीखा। शुरू में वो अपने पसंदीदा पत्रिका के अपने प्रिय लेखक के आलेख को पढ़ते थे। पढ़ने के बाद दुबारा उसे लिखा करते थे। लिखने के बाद मूल रचना से मिलान किया करते थे। कहां किस प्रकार की चूक रह गई उसे गोला लगाते थे। तीन चार बार भी लिखा करते थे। और दिन, माह, वर्षों उन्होंने अभ्यास किया। इसी का परिणाम है कि आज उनका नाम, उनकी रचना को ससम्मान हम पढ़ा करते हैं। नए व जो लेखक बनना चाहते हैं व लेखन करना चाहते हैं वो इतनी शिद्दत से अभ्यास से बचते हैं। यही कारण है कि वो अपने क्षेत्र में दोयमदर्ज़े के लेखक ही बन पाते हैं।
हमारे बच्चे कैसे लिखना शुरू करें, कैसे अपनी कविता, कहानी, लेख को मॉजें, और परिष्कृत करें यह ख़ासा महत्वपूर्ण है। हमें नई पौध तैयार करनी करनी है तो उन्हें मागदर्शन भी करना होगा। स्वयं उन्हें पढ़ते हुए, लिखते हुए दिखाना भी चाहिए। इसका अर्थ यह हुआ कि शिक्षक स्वयं भी लिखें, पढ़ें, कुछ वक़्त किताब के साथ बिताता हुआ नज़र भी आए। यहीं से बच्चों में भी रूचि लेकर लिखने, पढ़ने की आदत संक्रमित हो सकती है।

शिक्षकीय दुनिया की कहानी के पात्र

कौशलेंद्र प्रपन्न ‘‘ इक्कीस साल के बाद पहली बार किसी कार्यशाला में बैठा हूं। बहुत अच्छा लग रहा है। वरना तो जी ...