Tuesday, May 8, 2018

बच्चों को परीक्षा शुरू








कौशलेंद्र प्रपन्न 



बच्चों को परीक्षा शुरू होने से तकरीबन ढाई घंटे पहले परीक्षा केंद्र में प्रवेश कराया गया। परीक्षा दस बजे शुरू होनी थी और बच्चों को 7.30 से 8.30 के बीच ही प्रवेश करना था। प्रवेश भी कोई मामूली नहीं कहा जाएगा। बच्चे सुबह सुबह बिना खाए पीए परीक्षा देने पहुंच गए। गेट पर ही चप्पल, जूते, शर्ट, पैंट, बालों तक की तलाशी ली गई। बच्चियों को तो कान की बाली भी निकालनी पड़ी। बालों के स्टॉइल की भी तलाशी हुई। 
अगर आपको याद हो तो पिछले माह विभिन्न अख़बारों में विज्ञापन आए थे कि परीक्षा केंद्र पर बच्चियां पोनी टेल भी बना कर नहीं जा सकतीं। खुले बाल होंगी। कानों में बालियां नहीं होगी आदि। इससे पहले भी विभिन्न राज्यों से आने वाली ख़बरों पर नज़र डालें तो पाएंगे कि लड़कों की पैंट तक उतरवा दी गई थी। बच्चे कच्छे में बैठकर पेपर दे रहे थे। सोचने वाली बात यह भी है कि आख़िर इस कदर अविश्वास की स्थिति ही क्यों पैदा हुई। क्यों हमें अपने ही बच्चों पर विश्वास नहीं रहा। गोया बच्चे परीक्षा देने नहीं बल्कि नहाने धोने जा रहे हैं। 
परीक्षा में पेपर का लीक होना, परीक्षा के दौरान अनियमितताएं होना आदि हमारी परीक्षा की प्रकृति और पूरी परीक्षा प्रणाली को संदेह के घेरे में ला खड़ी की है। पिछले दिनों तमाम परीक्षाओं के प्रश्न पत्र लीक हुए। इसके जद में बड़ी से बड़ी संस्थाएं शक के घेरे में आईं। परीक्षा आयोजित करने वाली संस्थाओं को जांच एजेंसियों के हवाले किया गया। यह कहीं न कहीं हमारी स्वयं की शिक्षा और परीक्षा को लेकर जिम्मेदारी पर सवाल खड़े करती है। 
परीक्षा तो शिक्षा के साथ चलने वाली समानांतर प्रक्रिया हो चुकी है। हां यह अगल मसला है कि समय के साथ परीक्षा और परीक्षार्थीं के मायने और प्राथमिकताएं बदल गई हैं। परीक्षा तो महाभारत काल में भी होता था। बस अंतर इस बात की है कि तब पात्रों की परीक्षा होती थी। तब शायद अंक नहीं, ग्रेड नहीं बल्कि दक्षता की पड़ताल होती थी। धीरे धीरे दक्षता और कौशल जांचने की बजाए हम अंकों पर सिफ्ट हो गए। आज की तारीख में बच्चों को शिक्षा के स्तर और गुणवत्ता की चिंता से ज़्यादा अंकों और ग्रेडों की चिंता होती है। बिना अंकों के उन्हें तथाकथित अच्छे नामी कॉलेजों में दाखिला नहीं मिल पाता। जब उन्हें इसकी चिंता होती है कि कैसे अच्छे अंक आएंगे तब वे या उनके अभिभावक दूसरे रास्तों की ओर मुड़ते हैं। 
कई बार महसूस होता है कि उच्च शिक्षा का केंद्रीकरण हो चुका है। दिल्ली ही वह केंद्र है जहां उच्च शिक्षा बेहतर चल रही है। यही वजह है कि देशभर के तमाम युवाओं का सपना दिल्ली के किसी भी कॉलेज में दाखिला लेना होता है। जबकि यदि राज्य स्तरीय कॉलेज बेहतर होते तो वे युवा क्योंकर दिल्ली में धक्के खा रहे होते। हमें अपनी उच्च शिक्षा की गुणवत्त को विकेंद्रीकृत करने की आवश्यकता है। हालांकि पहले पटना, इलाहाबाद, हैदराबाद आदि भी उच्च शिक्षा के केंद्र हुआ करते थे। लेकिन समय के साथ इन संस्थानों को बढ़ाने की बजाए हमने इन्हें हाशिए पर धकेलने का काम किया। इसी का परिणाम है कि आज अपने समय के स्थापित शिक्षा केंद्र ध्वस्त होते चले गए। जो बचे हैं वे बुनियादी संसाधनों, समुचित प्राध्यापकों की बदहाली से त्रस्त हैं। 
परीक्षा तो तब ली जाए जब कॉलेज में शिक्षण विधिवत हुआ। पिछले दिनों एडीटीवी पर प्राइम टाइम में रवीश कुमार ने तकरीबन 28 कड़ियों में उच्च शिक्षा की दशा दिशा का एक विकास यात्रा किया। उन तमाम स्टोरी से गुजरते हुए यही महसूस हुआ कि हम दिल्ल में बैठ कर उच्च शिक्षा यानी कालेज और विश्वविद्यालयों की शैक्षिक स्थिति का अनुमान नहीं लगा सकते। जहां राज्यों में नियमित रूप से कक्षाएं नहीं चलतीं। जहां परीक्षा और शिक्षा तीन और चार साल पीछे चल रही हो। वहां किस प्रकार की शैक्षिक गुणवत्ता की उम्मीद की जा सकती है। 
ऐसे में हमारे लाखों युवा छात्र/छात्राएं बस हर साल परीक्षा पास कर अगली सीढ़ी पर बढ़ रहे हैं। उन्हें किस ओर जाना है? किस कोर्स में दाखिला लेना है आदि के बारे में कोई मार्गदर्शन करने वाला नहीं। हम शिक्षा बेशक गंभीरता से उन्हें मुहैया न कराएं लेकिन परीक्षा के वक़्त उन्हें कच्छा में बैठाने से नहीं हिचकते। और यही कारण है कि आज परीक्षा शिक्षा पर दबाए बनाती जा रही है। परीक्षा पास करना ही शिक्षा का मकसद हो चुका है। फिर ऐसे में क्यों न किसी भी तरह अंक हासिल की जाए। इसके लिए कुछ भी करना पड़े। इन्हें ही रोकने के लिए सरकार को इस प्रकार के कदम उठाने पड़े। लेकिन परीक्षा में चोरी चकारी न हो इसके लिए शायद और भी तरीके अपनाए जा सकते हैं। हमें इसकी योजना बनाने की आवश्यकता है। न कि बच्चों को कच्छा और शर्ट में परीक्षा में बैठने पर मजबूर किया जाए। इन अविश्वास का ख़मियाज़ा बच्चों को क्यों भुगतना चाहिए। 

Friday, May 4, 2018

लिखते कैसे हैं वो




कौशलेंद्र प्रपन्न
यह सवाल बेहद दिलचस्प और दरपेश है। बल्कि कहना चाहिए यह सवाल अकसर लेखकों, पत्रकारो कवियों आदि से पूछा जाता रहा है। इस सवाल के जवाब में मेरे ख़्याल से काफी कुछ कहा और लिखा जा चुका है। पिछले दिनों इन्हीं सवालों से रू ब रू होना पड़ा। साथ काम करने वालों ने बड़ी हैरानी से पूछा कि आप इतने और रोज़ कैसे लिख लिया करते हैं। क्या कोई मशीन है? वो कौन सी ताकत है जो रोज़ लिखा ले जाती है आदि। इन सवालों से बड़े-बड़े लेखक, पत्रकारों एवं कवियों आदि को अपने समय में सामना करना पड़ा है। सबने अपने अनुभवां के आधार पर जवाब भी देने की कोशिश की है।
पहले पहल तो लेखक,कवि,पत्रकार आदि कोई दूसरी दुनिया का जीव नहीं होता। वह भी इसी समाज में हम सब के साथ रहा करता है। जैसे अन्य लोगों को जीवन में तरह तरह के अनुभवों से गुजरना होता है वैसे ही एक लेखक भी उन अनुभवों को जीता, पकता, बेचैन होता है। अंतर बस इतना है कि सामान्य व्यक्ति अपने अनुभवों, निजी एहसासातों को अपने में ज़ज्ब कर जीता है। किसी से कहता भी है तो वह आत्म पीड़ा के तौर पर रो गा कर चुप हो जाता है। लेकिन एक लेखक, कवि जिन हालातों से गुजरता है। उन्हें बड़ी शिद्दत से महसूसकर शब्दों में बांधने की कोशिश करता है। वह प्रयास करता है कि जो मेरे साथ गुजरा है, वह दुनिया के किसी न किसी कोने में किसी की भी निजी टीस हो सकता है। मैं जैसा महसूस कर रहा हूं। मैं जैसे इन हालातों से निकलने की कोशिश कर रहा हूं। उन औजारों से क्यों न औरों को भी वाकिफ कराउं। क्या पता औरों को मेरे अनुभव व कहानी से कुछ रोशनी मिले। क्या मालूम मेरा लिखना किसी की ज़िंदगी को बेहतर राह पर ला पाएं। लेखकों, कवियां आदि का मकसद लेखन से हमज आत्मतुष्टी, आत्मसंतोष और प्रसिद्धी हासिल करना ही नहीं होता बल्कि वह वैश्विक स्तर पर अपने तजर्बों को बांटने में विश्वास करने लगता है। इन्हीं ताकतों के आधार पर वह कुछ लिख पाने की कोशिश करता है।
विचारों, भावनाओं को बांध पाना, रोक सकना या फिर दुबारा जीना कोई आसान काम नहीं होता। बल्कि इस शब्द साधना में समय, श्रम, धैर्य, अभ्यास आदि बहुत काम करते हैं। बिना अभ्यास, प्रयास, चिंतन, पुनर्चिंतन, विचारों को शब्दों में ढालने के धर्यपूर्ण साधना के कोई लेखक नहीं लिख सकता। लिखने के लिए जिन चरणों के बारे में स्थापित और प्रसिद्ध लेखकों ने अपनी राय रखी है यदि उन पर नज़र डालें तो वे कुछ इस प्रकार की हो सकती हैं-
विचार, अनुभव, घटना, कोई वाकया आदि को देखना, अनुभव करना, उन अनुभवों की गहराई को महसूस करना, उन्हें तटस्थ होकर निरीक्षण करना, जहां भावनाओं की आवश्यकता हो वहां भावनाएं, संवेदना को प्रयोग करना, टाइम मैनेजमेंट, थॉट मैनेजमेंट, आकार प्रकार, शैली, फारमेट को चुनाव और अंत में भाषा, शब्दों आदि का चयन। इन्हीं सोपानों के ज़रिए कोई भी लेखक,कवि, पत्रकार आदि लिखा करते हैं।
हमें अपने विचारों को वो भी इतने चंचल होते हैं जिन्हें रेक पाना, बांध पाना बेहद श्रम साध्य और अभ्यास की मांग करता है आदि को ठहकर देखना,महसूसना तो एक प्रक्रिया है। लेकिन अब लेखक को महसूसे हुए अनुभव को कैसे, कब, कहां, क्यों प्रसारित करना है, क्यों लिखे कवि,लेखक, पत्रकार इन सवालों का जवाब ख़ुद को पहले देना होता है। तब तलाश की जाती है कहां, किसके लिए लिखना है।
क्योंकि कई बार नए लेखकों की शिकायत होती है कि उनके लेख छपते नहीं। संपादक लौटा दिया करते हैं। आदि इन सवालों का हल यही है कि लिखने से पहले किनके लिए, कब,कहां लिखना चाहते हैं उसके फारमेट को ध्यान में रखना होगा। उस पत्र-पत्रिका की प्रकृति और पन्नों के स्वरूप और स्थान को भी लिखने से पहले ध्यान में रखना होगा तब आपकी रचना अस्वीकृत नहीं हो सकेगी। इस काम के लिए अभ्यास, अध्ययन, पैनी नज़र और समय की दिशा पर पकड़ बनाना बेहद ज़रूरी होता है। इन्हें नकार कर या नज़रअंदाज़ कर कोई लिख नहीं पाएगा।
लिखने से पहले हज़ार बार सोचना भी मानिख़ेज होता है कि क्यों लिखना है, किसके लिए लिखना है आदि। इससे क्या हासिल होगा। इसलिए समाज में ऐसे भी लेखक और कवि आदि हैं जो निरंतर लिख रहे हैं लेकिन कहीं छपने की चाह उन्हें नहीं होती। मेरा ऐसा मानना है कि यदि लेखक कवि, पत्रकार आदि लिख रहे हैं तो उस पर नागर समाज का हक है। हक़ यह भी है कि लेखक, कवि आदि जिस समाज में रह रहे हैं वे भी नागरीय जिम्मेदारी के तहत लिखें और समाज में अपने शब्दों के ज़रिए अपनी राय रखें। क्या पता एक प्रतिशत भी असर आपके लिखने के होता है तो लेखकीय प्रतिबद्धता का एक अंश पूरा हो जाता है।
लिखने से पहले, लिखने के बाद अपने विचार, अनुभव,शब्दों के चुनाव, प्रस्तुती आदि पर काफी काम करने की आवश्यकता होती है। यदि कोई लेखक इनसे बच बचाकर लिखता है तो वह कहीं न कहीं लेखकीय जवाबदेही से न्याय नहीं करता।

Thursday, May 3, 2018

वायदे का तारीख़ बना जाना



कौशलेंद्र प्रपन्न
वायदे कई स्तरों पर कई लोगों, संस्थानों, सरकारों की ओर किए जाते हैं। कुछ वायदे पूरे होते हैं। कुछ बीच राह में ही दम तोड़ देते हैं। कुछ तो ऐसे भुला दिए जाते हैं गोया कभी किए ही न गए हों। जो वायदे याद रह जाती हैं उसका फॉलोअम किया जाता है। जो भूल जाते हैं वे तारीख़ों में दर्ज़ हो जाते हैं। वायदों का भी अपना इतिहास हुआ करता है। उन इतिहासों में जाना इस लेख का मकसद नहीं है। लेकिन इतनी अपेक्षा तो ज़रूर की ता सकती है कि हम किन वायदों को भूल जाते हैं और किन्हें हमेशा हमेशा याद रखते हैं।
सरकारी वायदे व घोषणा कह लें सबसे ज़्यादा की और भुलाई जाती हैं। ही सरकार सत्ता में आने से पहले नागरिकों से किया करती है। सत्ता में आने के बाद उनमें से कुछ को भी मुकम्मल अंजाम तक पहुंचा पाते हैं। बाकी के वायदे इतिहास के पन्नों में दर्ज हो जाते हैं। जिन्हें गाहे ब गाहे जनता याद कराया करती है तब हम तरह तरह के बहानों, परिस्थितियों का हवाला देकर नागरिक को बरगलाते रहते हैं। घोषणा और वायदे में न तो सरकार पीछे रहती है और न हम। हम भी कई बार अपने वर्कस्टेशन पर, आफिस में, आफिस के लोगों को वायदे करते हैं। हम यह कर देंगे। वह कर देंगे। यह काम पूरा कर लेंगे। कुछ वायदे जॉब में आने से पहले इन्टरव्यू में किया करते हैं। जब जॉब में आ जाते हैं तब काफी वायदे इतिहास हो जाया करती हैं। बार बार याद दिलाने पर उन वायदों में से कुछ को पूरा कर देते हैं।
रिश्तों में भी तो हम वायदे किया करते हैं। दूसरे शब्दां में घोषणाएं किया करते हैं। शादी से पहले कुछ वायदे होते हैं और शादी के बाद जब चेक लिस्ट बनती है किन किन वायदों को पूरा किया गया तब रिजल्ट कुछ और ही निकलता है। इसे ऐसे भी समझें कि कुछ वायदे शादी के पहले मनुभावन, लोकलुभावन ही होते हैं। यह कहने वाले और सुनने वाले दोनों ही समझते हैं लेकिन मन है कि मानने से इंकार नहीं करता। दूसरे वायदे शादी के बाद की होती हैं। ये घोषणाएं जांची और समय समय पर इत्तला की कराई जाती हैं कि तुमने तो यह कहा था। तुमने तो यह भी कहा था लेकिन तुमने तो पूरा नहीं किया। अब आप यह तो नहीं कह सकते कि वह तो यूं ही कह या था। ठीक उसी तरह किसी भी रिश्ते में इसे जांचा और परखा जा सकता है। दोस्त ही कम हैं क्या जांचने के लिए। हम अपने दोस्तों के बीच भी वायदे किया करते हैं। लेकिन वे वायदे कितने पूरे होते हैं यह तो वास्तविकता की जांच में मालूम होता है कि काफी वायदे खाली के खाली अब भी वहीं पड़े हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो वायदे उन्हीं चीजों, मदद की करनी चाहिए जो हम पूरा करने के सामर्थ्य रखते हों। जिन्हें हम पूरा नहीं कर सकते उसके बारे में इंकार करना ज़्यादा बेहतर है बजाए कि किसी भी अपेक्षा को बढ़ा दिया जाए। जब अपेक्षाएं व उम्मीद टूटती है तब इसकी आवाज़ बाहर तो सुनाई देती लेकिन व्यक्ति अंदर टूट जाता है।
हम अपनी जिं़दगी में झांक कर देखें कितने की वायदे किया करते हैं। कई बार ख़ुदी से वायदे करते हैं और कई बार औरों से। ख़ुद से किए गए वायदे का हालांकि कोई पूछनहार नहीं होता। ऐसे में सावधानियों का घटना, भूल जाना आदि की संभावनाएं ज़्यादा होती हैं। वायदे पूरे न होने पर हम भिन्न तरह के बहानों से ख्ुद को बहला लेते हैं। लेकिन कभी हम अकेले में ख़ुद से पूछते हैं कि जो वायदे हमने पूरे नहीं किए उसका ख़मियाज़ा कौन भुगतता है। हमें ही अपने वायदों के परिणाम भी भुगतने पड़ते हैं। इसलिए यदि हम ख़ुद से भी वायदे कर रहे हैं जो चौकन्ना रहना चाहिए। वायदे पूरे होंगे या फेल होंगे यह निर्भर करता है कि हम उन्हें पूरी करने के लिए कितने सजग और जागरूक हैं। वरना वायदे तो होते ही हैं फेल होने के लिए। फिल्म का गाना भी तो है- ‘‘वायदे हैं वायदे का क्या...’’ दूसरा एक और मौजू गाना प्रासंगिक है-‘‘मिलने की तुम कोशिश करना वादा कभी न करना, वादा तो टूट जाता है।’’सो ख़ुद से भी झूठे वायदे करने से बचें। जो वायदें करें उसके प्रति जवाबदेही तो रखनी बनती है।

Wednesday, May 2, 2018

प्राथमिकता, प्रयास और सफलता



कौशलेंद्र प्रपन्न
यह कोई नई बात नहीं की जा रही है बल्कि लंबे समय पर इसपर कई तरह बात की जा चुकी है फिर क्या वजह है आज इस पुराने मुद्दे पर लिखने की आवश्यकता महसूस की गई। वज़ह है मनोविज्ञान में कहा जाता है जब हम किसी भी चीज व आदतें हों, काम हो, विचार हो उसे बार बार दुहराते हैं तब वह हमारी लॉग टर्म मेमोरी का हिस्सा हो जाती हैं। यानी जिस भी विचार, आदत को हम अपने जीवन में जितनी बार दोहराते हैं वह हमारी स्थायी स्मृति का हिस्सा हो जाती हैं। उसे भूलना तकरीबन मुश्किल होता है। यह दोहराव तय करता है कि कौन सा कंटेंट, कौन सा वाकया हम अपने लिए चुनते हैं। कौन सी घटना, कौन सी परिस्थितियों को हम भूलना नहीं चाहते। यह तय करता है हमारे जीवन की प्राथमिकता। प्राथमिकता तय हो जाने के बाद हम उसे सफलता तक पहुंचाने के लिए प्रयास किया करते हैं। जब हम प्राथमिकता तय कर चुके होते हैं तब हमारी कोशिशें, हमारे बरताव, हमारी जीवनचर्या भी उसी के अनुसार निर्धारित होने लगती है। जहां भी जाते हैं, जो कुछ भी सुनते-पढ़ते, देखते हैं उसमें हमारी प्राथमिकता एक अहम भूमिका निभाती है। दूसरे शब्दों में कहें तो हमारी जीवन की प्राथमिकताएं ही जीवन की दिशा भी तय किया करती हैं।
सबसे पहले हमें अपने जीवन से क्या चाहिए यह तय करना होता है। हम जीवन को बने बनाए रास्ते, बनी बनानी मान्यताओं पर ही हांक देना चाहते हैं या कोई और रास्ते का इज़ाद करना चाहते हैं। जब हम यह तय कर लेते हैं तब हम अपने जीवन में प्राथमिकताएं तय किया करते हैं। जो एक सुनियोजित रणनीति और प्लानिंग की मांग करता है। क्योंकि जीवन में करने और खोने को बहुत कुछ है। यदि उन्हीं खाने पाने में उलझे रहे। कौन क्यों आपसे रूस गया? क्यों फलां आपसे अब ठीक से बात नहीं करता। अब वह आपके साथ घूमता नहीं आदि आदि। यह आपकी प्राथमिकता है तो आपकी दूसरी ज़रूरी चीजें जिसे आपने चाहा है। जिसे आप शिद्दत से पाना या होना चाहते हैं वह बाधित होती है। कई बार अर्जुन की दृष्टि हासिल करना बेहतर होता है जिसमें हमें हमारे जीवन में जो पाना चाहते हैं वही दिखाई दे। आस-पास की लुभावनी चीजें बहुत हैं जो बार बार आपको भटकाएंगी। यदि बीच में ही भटक गए। ठहर गए तो आपने जो सपना देखा था वह चकनाचूर तो होना ही है।
उपनिषद् की एक कहानी यहां कहना बेहद मौजू होगा। नचिकेता ने यमराज से कुछ सवाल किए। उन सवालों ने तय किया। उन सवालों की संरचना पर नज़र डालें तो पाएंगे कि वह नचिकेता अपनी प्राथमिकता में कितना स्पष्ट था। उसे मालूम था कि उसे क्या चाहिए। उसने यह भी तय कर रखा था कि उसे यमराज से कितना क्या और कैसे पाना है आदि। बीच बीच में यमराज किसिम किसिम के प्रलोभन देते हैं। राजपाट, आभूषण, धन आदि। यदि नचिकेता अपनी प्राथमिकता से समझौता कर लेता तो उसे जीवन, आत्म आदि के रहस्य जानने की प्राथमिकता पीछे रह जाती। ठीक उसी प्रकार जीवन में भी कई प्रकार के यमराज आया करते हैं। कई तरह के प्रलोभन-पद, पैसे, स्त्री सुख आदि दिया करते हैं। यदि आप अपनी प्राथमिकता से समझौता कर लेते हैं तब आप अपने जीवन के लक्ष्य को पाने में पिछड़ जाते हैं।
इसे इस तरह भी समझ सकते हैं कि जब हम अपने जीवन के लिए प्राथमिकताएं तय करते हैं तब बहुत सी चीजें हमारी प्राथमिकताओं के निर्धारण में भूमिका निभाती हैं। अभिभावक, दोस्त, परिवेश, संस्कृति आदि। रास्ते, सुझाव हमें कई ओरों से सुनने को मिलती हैं। अंत में हमें ख़ुद तय करना होता है कि हमें इनमें से क्या और कितना चाहिए। हम कैसे अपने लक्ष्य को पा सकते हैं इसके लिए अब प्रयास जिसे एर्फ्ट कहते हैं। एक्शन कहते हैं करना होता है। जब तक एर्फ्ट यानी प्रयास नहीं करेंगे तब तक सफलता की उम्मीद करना बेकार है। जब सफलता नहीं मिलती तो हम अपने प्रयास को जांचने की बजाए परिस्थितियों को कोसने लगते हैं। बजाए कि हमने अपने लक्ष्य को पाने के लिए किस प्रकार के और कितनी शिद्दत से प्रयास किए इसे जांचने, पुनः जांचने, समझने के हम अपने लक्ष्य और प्राथमिकताएं बदलने लगते हैं। हम अपने लक्ष्य और प्राथमिकताओं से समझौता करने लगते हैं।
यदि प्राथमिकता तय की है तो हमें प्रयास और प्रयास के स्तर क्या होंगे इसे भी निर्धारित करना बेहद ज़रूरी है। जब हम प्रयास और दिशा भी तय कर चुके होते हैं तब हमें उस लक्ष्य को पाने के लिए क्या क्या और कौन कौन से एप्रोच हो सकते हैं उसे स्पष्टतौर पर तय करने होते हैं। इन्हीं स्पष्ट रणनीतियों, एप्रोचों, प्लांनंग और एक्जीक्यूशन पर हमारा जीवन प्रोजेक्ट, या कोई भी प्रोजेक्ट चला करता है। उक्त तत्वों की स्पष्टता और मानवीय इच्छा शक्ति पर निर्भर करता है हमने जो शुरू में अपने लिए प्राथमिकताएं तय की थीं क्या वह सफल हो पाईं। वरना तो पूरी उमग्र पड़ी है कोसने की उसने, इसने, ऐसे, परिस्थितियों आदि ने साथ नहीं दिया वरना हम भी काम के ही थे।

Tuesday, May 1, 2018

इमोशनली यूज़ होने से बचें



कौशलेंद्र प्रपन्न
हम कई स्तर पर लाइफ में यूज़ हो रहे होते हैं। कई बार हमें एहसास होता है कि हम यूज़ किए जा रहे हैं या यूज़ हो रहे हैं। लेकिन हमें इस यूज़ होने में मजा आ रहा होता है। हम अपने आप को यूज़ होने से मना नहीं कर पाते। क्योंकि उस यूज़ होने में हमें आनंद आता है। उदाहरण क्या बताना आप तो समझते ही हैं जैसे बच्चों द्वारा मा-बाप को यूज़ करना। मां-बाप के द्वारा बच्चों का यूज़ करना। देस्तों के बीच भी यूज़ करने की परिपाटी खूब है। इससे कोई मुंह नहीं मोड़ सकता। वहीं कई रिश्ते ऐसे भी हुआ करते हैं जिसमें हमें मालूम होता है कि हम यूज़ किए जा रहे हैं लेकिन मना करने की हिम्मत नहीं होती। वैसे ही कई बार हम अपने दफ्तर में यूज़ किए जा रहे होते हैं लेकिन इतनी ताकत नहीं होती कि आप यूज़ होने से ख्ु़ाद को बचा लें या पीछे खींच लें। क्योंकि यह आपको भी मालूम है कि यदि आपने यूज़ होने से इंकार किया तो उसका असर दूरगामी हो सकता है। फिर शिकायत मत करना कि हमें क्यों यूज़ नहीं किया। आज तो दफ्तर हो या घर, दोस्त हों या देश हर जगह लोग यूज़ होने के लिए तैयार बैठे हैं। कोई तो यूज़ करे और सफलता, सुख, उपलब्धि की ओर धकेले। ऐसे यूज़ एंड थ्रो के जमाने में स्थायी कुछ भी नहीं होता। यदि आप यूज़ होने के लिए कब से रेडी तैयार बैठे हैं तो फिर क्या कहने। आपही का सिक्का चलेगा। बल्कि बजेगा। इतना बजेगा कि कोई सुनने वाला आपसे जलने लगेगा।
यूज़ एंड थ्रो का बजरीया चलन अब हमारे रिश्तों में भी आ चुका है। जब जिसकी ज़रूरत होती है हम उसके पास उससे चिपक लेते हैं। काम निकाल लेते हैं। जैसे ही काम निकल चुका होता है फिर अपने अपने रास्ते हो लेते हैं। आप कौन और मैं कौन की स्थिति आ जाती है। जब आप अपने ही घर में यूज़ किए गए या हो रहे हों तो इसकी शिकायत किससे करेंगे। कौन नहीं हंसना चाहेगा। हर किसी के लिए आपका यूज़ होना एक रोमांच और मनोरंजन का विषय बनता है। ऐसे में आप किसी से भी अपनी बात, एहसासात साझा नहीं करते। क्योंकि आप इस कदर यूज़ हुए हैं कि किसी को बता नहीं सकते। मन ही मन ख़ुद को कोसते हैं कि काश समय रहते ख़ुद को यूज़ होने से बचा लेता। काश इमोशनल न होता। काश ! समझ पाता कि अचानक रिश्तों में यह गरमाहट क्यां आ रही है। कभी तो वक़्त था कि न चिट्ठी, न फोन, न आना न जाना कुछ भी तो नहीं था। फिर अचानक ऐसा क्या हो गया कि प्यार के सोते निकल पड़े आदि आदि।
सच पूछिए तो हम पहले पहल घर में कई स्तरों पर यूज़ हो रहे होते हैं। उसे अगल अलग नामों से जानते हैं। बबुआ है। अपना बच्चा है। भाई है न! मेरी बात नहीं मानेगा? अरे अरे!! अपने बड़ों से ऐसे जवाब लड़ाते हैं आदि आदि। लेकिन यह भी सच है कि कई बार हम इन इमोशनल परिवेश में ठग लिए जाते हैं। छल लिए जाते हैं। बल्कि यूज़ कर लिए जाते हैं। हमें इसका एहसास बहुत बाद में होता है। वो भी तब जब खेत की लिखा पढ़ी हो चुकी होती है। जब पिता के एकाउंट से पैसे निकाल लिए जाते हैं। दूसरा स्तर घर में जो किसी भी स्तर पर यदि कमजोर है तो उसे कौन यूज़ नहीं करता। हर कोई अपने अपने तरीके से कोई खखार कर, कोई दबे पांव, तो कोई प्यार से आपको यूज़ करते हैं। हम जानते समझते हुए भी ख़ुद यूज़ होने से नहीं बचा पाते।
बात सिर्फ घर की नहीं है। बल्कि यह हक़ीकत तो दफ्तर की भी है। इस दफ्तर की कहानी में बस पात्र बदले होते हैं। स्थान बदला होता है। लोगों के स्वार्थ के मायने बदले होते हैं। और कोई बड़ा अंतर आप नहीं देख सकेंगे। कोई आपके स्वभाव का फायदा उठाता है (इसे यूज़ पढ़ें), कोई आपके इतिहास का लाभ उठाते हुए आपको यूज़ करता है। तो कई ऐसे भी मिलेंगे जो आपसे चिकनी चुपड़ी बातें कर आपको आसमान में चढ़ाकर धीरे से अपनी बात, ज़रूरत सरका देते हैं और आप यूज़ होने से रोक नहीं पाते। वहीं आप बॉस से तो हंसते हंसते यूज़ हो जाया करते हैं। बॉस से यूज़ होने में एक अगल किस्म का सुख मिलता है। हमें लगता है काश! और यूज़ हो पाता? कितना अच्छा होता कि हमें यूज़ होने का और मौका मिलता। लेकिन हम कहीं न कहीं अपनी जमीर को धोखा दे रहे होते हैं।
सावधान रहें। चौकन्ने रहें। यूज़ हों लेकिन अपनी शर्तों पर। जानते समझते हुए यूज़ हों। आपको मालूम हो कि आप यूज़ किए जा रहे हैं। लेकिन उसके लिए आपके मन में या कभी भी यह एहसास न हो कि आप ग़लत यूज़ किए गए। आप इमोशनली यूज़ न हों।

Monday, April 30, 2018

नदी सी थी तुम-



याद है मुझे,
धीरे धीरे किनारों से टकराती,
बहती रही न जाने किन किन कंदराओं,उपत्यकाओं से गुज़रती रही,
बिन कुछ कहे।
धार में तेरे,
निमग्न होती रही पीढ़ी,
बहती रही हमारी उम्र से आगे,
निकल गई।
हम तुम्हें छोड़ बस गए नगर नगर,
शहर दर शहर,
ल्ेकिन तुम संग रही,
हमेशा ही रगों में दौड़ती रही।
त्ुम नदी थी तुम्हें समंदर में जाना ही था,
मिलना ही था सागर में,
तुम्हें ख़ुद को खोना नहीं था।

Friday, April 27, 2018

भूल गया, भूल कैसे जाते हैं हम



कौशलेंद्र प्रपन्न
हमें अकसर सुनने को मिलता है कि यार भूल गया बताना। कैसे भूल सकता है कोई? क्यों हम भूल जाते हैं? भूलने के बाद डांट खाते हैं। लेकिन जो नुकसान होना था वह हो गया। यदि आपको बजट बनाकर अपने बॉस को भेजना था जिसे आपका बॉस किसी और के सामने पेश करने वाला था, अब उसकी स्थिति का अंदाजा लगा सकते हैं। वह डांट कर भी क्या कर लेगा। आनन फानन में उसे बजट व प्लांनिंग शीट प्रेजेंट करनी पड़ेगी। आपने तो सहजता से कह दिया शॅारी फाईल अटैव करना भूल गया। दरअसल आपने तो अपनी जिम्मदारी का प्रमाण दे दिया कि आपके अपने काम के प्रति कितने चौकन्न और जिम्मेदार हैं। आगे से आप पर विश्वास करने से पहले या काम देने से पहले कोई हज़ार बार सोचेगा। यानी आपने अपने लिए एक संभावना के दरवाजे बंद कर दिए। दूसरी बात हम भूलते तब हैं जब हमें उस काम या सूचना में कोई दिलचस्पी नहीं होती। हम उस काम में रूचि ही नहीं लेते। क्योंकि यदि हमारी रूचि होती। यदि हम अपनी जिम्मदारी व लावबदेही समझते तो भूलते ही नहीं। यह कोई मैनेजमेंंट का फंडा नहीं बल्कि आम जीवन की कहानी है। लेकिन जब सिस्टम में काम करते हैं तो सूचना, ख़बर आदि को तत्काल या सही समय परख् सही व्यक्ति तक पहुंचाना बेहद ज़रूरी होता है। इसलिए भूलें नहीं बल्कि जो बात, ख़बर जिसे देनी हैं उसे उसी समय पर, उसकी आवश्यकता के अनुरूप दे देनी चाहिए।
कोई ख़बर है तो उसे सही तरीके से बिना किसी पूर्वग्रह के पाठकों तक पहुंचाना सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती है। पत्रकार अपने इस काम में बेहद चौकन्ना और जिम्मेदार होता है। मान लीजिए पत्रकार के पास कोई ख़बर आई, किसी प्रकार की सूचना उसे मिली जिससे बेहतर ख़बर बन सकती है वह उस ख़बर को अपने पास रख ले। या फिर तय समय सीमा में स्टोरी में तब्दील न कर देर से दे तो वह ख़बर मर जाएगी। वह ख़बर पुरानी हो जाएगी। अगले दिन हो सकता है उस ख़बर को फॉलोअप करना पड़े। लेकिन पत्रकार ने अपनी लापरवाही या गै़रजिम्मेदाराना रवैए से एक ख़बर की हत्या कर दी। उसी प्रकार हम सबके पास कहने और सुनाने को बहुत सी ख़बरें होती हैं। यदि हम उन्हें सही समय पर और सही तरीके से पाठक या श्रोता तक नहीं पहुंचाएं तो यह प्रकारांतर से ख़बर के साथ न्याय नहीं होगा।
यह तो बात पत्रकारिता की हुई। उसी प्रकार यदि किसी प्रोजेक्ट की बात करें तो कई सारी सूचनाएं, ख़बर, जानकारी ऐसी होती हैं जिसपर तत्काल कदम उठाने होते हैं वरना प्रोजेक्ट की डेड लाइन प्रभावित हो सकती है। ऐसे में प्रोजेक्ट मैनेजर अपने रिपोटिंग व्यक्ति पर काफी हद तक निर्भर रहता है। जैसे ही कोई ऐसी सूचना आई जिसे बिना देरी किए प्रोजेक्ट मैनेजर या प्रोग्राम मैनेजर को मालूम होनी चाहिए उसे उस खबर से अपडेट होना होगा। ऐसे में मानवीय भूलें या भूल भी काफी मायने रखती हैं। कई बार व्यक्ति अनुमान लगा लेता है कि उन्हें तो पता ही होगा। उन्हें कल बता दूंगा। कल नहीं तो मिल कर बता दूंगा आदि। उस व्यक्ति को उस सूचना की गंभीरता नहीं मालूम कि उस ख़बर से प्रोजेक्ट पर ख़राब असर पड़ सकता है। इसलिए कई बार प्रोजेक्ट मैनेजर को आने तई फॉलोअप करना होता है। बार बार पूछना होता है उस प्रोजेक्ट का क्या हुआ? कल की प्लानिंग के अनुसार सार चीजों की तैयारी हो गई या कोई अड़चने आ रही है? आदि। कायदे यह काम रिपोटिंग व्यक्ति की है। क्यों प्रोजेक्ट मैनेजर को फॉलोअप करना पड़ रहा है। यदि व्यक्ति अपडेट लगातार देता रहे तो फॉलोअप करने की आवश्यकता ही नहीं होगी।
मैनेजमेंट में या कहे लें कॉम्यूनिकेशन के क्षेत्र में ख़बर, सूचना को लेकर कुछ महत्वपूर्ण बातें कहीं जाती हैं। संप्रेषण सही समय पर, समुचित व्यक्ति को, सही तरीके से दी जानी चाहिए। किसी कितनी सूचना की आवश्यकता है, कब ज़रूरत है, क्यों ज़रूरत है? क्या वह सूचना उसी के लिए है या किसी और को भी दी जात सकती है आदि को ध्यान रखना होता है। क्योंकि कई बार हम अपनी जिम्मदारी से बचते हुए सही व्यक्ति को ख़बर करने की बजाए किसी और को सूचित कर अपनी जिम्मेदारी बच जाते हैं। जबकि हर ख़बर, सूचना का एक अधिकारी होता है। उसे किसी भी सूरत में वह ख़बर मिलनी ही चाहिए।
एक्टिव कम्यूनिकेशन, प्रो एक्टिव कम्यूनिकेशन, जिसे सक्रिय, निष्क्रिय, तत्पर, आदि के नाम से पुकार सकते हैं। यानी कुछ ऐसे व्यक्ति होते हैं जो ख़बर व सूचना को तत्परता और तत्काल सही व्यक्ति तक सूचना पहुंचा देता है। वहीं कुछ ऐसे भी होते हैं जो थोड़ी सुस्ती बरतते हुए ख़बर पहुंचाया करते हैं। वहीं ऐसे भी लोग होते हैं जिन्हें ख़बर को दबाकर बैठने में आनंद आता है। कई बार ऐसे भी व्यक्ति मिलेंगे जिन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनकी लापरवाही ख़मियाज़ा कई बार पूरी कंपनी, मीडिया हाउस को भुगतना पड़े।
आम जीवन में ही देखें। हमारे पास रोज़दिन विभिन्न सेशल मीडिया के ज़रिए हज़ारों की संख्या में सूचनाएं, जानकारियां हमारे हाथख् आंखों में ठूंसा जाता है। उन खबरों, सूचनाओं के साथ हमारा क्या बरताव होता है? हम किस तरह से पेश आते हैं ख़ासकर फोन पर मिलने सूचनाओं के साथ? कुछ ख़बरें, नज़रअंदाज़ की जाती हैं, कुछ से बेहद परेशान हो चुके होते हैं, कुछ को तो ओपन भी नहीं करते। वहीं कुछ ऐसी ख़बरें होती हैं जिन्हें पढ़कर आपको एहसास होता है कि अच्छा! तो यह हो रहा है आदि। इस प्लेटफाम पर दो किस्म के लोग मिलेंगे। पहला, आपकी सूचनाओं, संदेशों का आनंद तो लेते हैं किन्तु कभी अपनी राय, इच्छा अनिच्छा, पसंदी नापसंदगी आदि से वाकिफ नहीं कराते। उनके लिए सूचना का आना न आना कोई मायने नहीं रखता। इसे ही निष्क्रिय संदेश प्राप्त कर्ता कह सकते हैं। जो पढ़ तो लेते हैं लेकिन कोई राय नहीं देते। अपनी पंसदगी से परिचित नहीं कराते। ऐसे में व्यक्ति एक समय के बाद संदेश भेजना बंद कर देता है। यहीं से शुरू होती है कम्यूनिकेशन गैप, संवाद हीनता।

Thursday, April 26, 2018

इतिहास की यात्रा में सावधानियां


कौशलेंद्र प्रपन्न
इतिहास केवल समाज, देश,काल का ही नहीं होता बल्कि इंसानों का भी होता है। हम अपने इतिहास से कितना भी दूर भाग लें या फिर भागने की कोशिश करें इतिहास हमारा पीछा किया करता है। इतिहास भी तो एक कहानी सी ही है। इसमें तारीख़ें होती हैं। तारीख़ के साथ कुछ घटनाएं होती हैं। उन घटनाओं में कोई पात्र भी तो होता है। हमें उस पात्र से मुहब्बत हो जाती है ज बवह पात्र हंसता है तो हंसते हैं। जब वह रोता है तो देखने वाला रोता है। इंसानों के साथ भी ऐसे पात्र हमेशा ही चला करते हैं। कई बार कुछ पात्र इतने वाचाल हो जाते हैं कि हमारे लिए ही मुश्किलें पैदा हो जाती हैं।
हमारे साथ यही तो एक ख़ास बात है कि हमें इतिहास और अतीत बेहद प्यारा होता है। जब देखो तब हम अपने अतीत को लेकर बैठ जाते हैं। आज की चुनौतियों को कल के औजार से ठीक करने की कोशिश करते हैं। जबकि ऐसा संभव नहीं है। अतीत की घटनाएं, भूलें आज के संदर्भ में एकदम नए आयाम में आती हैं। उनसे उलझने व बाहर आने के औजार भी नए होने चाहिए। लेकिन अफ्सोस कि हम पुराने औजारां से आज की चुनौतियों का समाधान करना चाहते हैं।
इतिहास ख़ासकर इंसानों के साथ हमेशा ही दो तरीके से साथ रहा है। पहला जिसमें हम गौरवान्वित महसूस करते हैं। उसी अतीतीय संवेदना में जीना चाहते हैं। उसे बाहर निकालना ही नहीं चाहते। इसी का परिणाम होता है कि हमारे जीवन के मुहावरे, घटनाएं, कहानियां भी एक ही होने लगती हैं। सुनने वाला कहता है कि फलां कहानी तो आपने तब सुनाई थी। अगर कोई और कहानी हो तो सुनाओ। पक चुके हैं आपकी एक ही कहानी सुन सुन कर। यह अकसर बच्चे अपने मां-बाप या दादा दादी को बोल दिया करते हैं। क्योंकि उनके पास कहने का नया कुछ बचा नहीं होता। अपने ही अतीत को बार बार कुरेद कर आनंद लिया करते हैं।
जब तब कहानी में रोचकता और नयापन न हो तब तक कोई भी सुनने वाला आपमें दिलचस्पी नहीं लेगा। इतिहास भी कुछ कुछ ऐसा ही है। यदि इतिहास का आज की तारीख़ में बता रहे हैं तो पुरानी घटनाओं को आज किस रूप में हमें देखने और सीखने की आवश्यकता है इसपर सोचना होगा। लेकिन हम ऐसा ही नहीं करते। जब हम युवा थे। कॉलेज में पढ़ा करते थे तब कह कहानियां हम अपने बच्चों को साझा किया करते हैं। अपने संघर्षों की कहानी से हमें तो रागात्मक संबंध हो सकता है कि लेकिन सुनने वाले को वही दिलचस्पी हो ऐसी उम्मीद नहीं कर सकते।
इतिहास दरसअल हमें तत्कालीन चुनौतियों,समाजो-सांस्कृतिक हलचलों, परिवर्तनों के बारे में न केवल जानकारी मुहैया कराया करती है। बल्कि हमें आज कैसे वैसी घटनाओं व परिस्थितियों से सामना करना चाहिए इसकी समझ प्रदान करता है। इतिहास व अतीत गमन कोई बुरा नहीं है बल्कि हम कैसे इतिहास में जाकर वहां से सकुशल लौटते हैं यह कुशलता हमें सीखने की ज़रूरत है। इतिहास व अतीतीय यात्रा जितना आसान माना जाता है वह उतना ही कठिन काम भी है। क्योंकि अतीती यात्रा के साथ एक दिक्कत यह है कि हमें अतीत बेहद रोचक लगने लगता है और हम वहीं रहना चाहते हैं। जबकि कायदे से देखा जाए तो जिस प्रकार एक यात्रा अपनी यात्रा से लौट आने के लिए करता है। यदि राहगीर या यात्री रास्ते में या फिर यात्रा में अटक जाएगा तो वह आगे की यात्राएं नहीं कर पाएगा। इतिहास में भी यही होता है हम चले तो आसानी से जाते हैं लेकिन वापसी के लिए चौकन्ने रहना पड़ता है। हमें हमेशा यह याद रखना होता है कि यात्रा के बाद हमें वर्तमान में लौटना भी है। आज की तारीख़ी हक़ीकत को नज़रअंदाज़ करना इतिहास हमें नहीं सीखाता बल्कि इतिहास वह रोशनी प्रदान करता है जिससे हम आज और आने वाले समय का बेहतर बना सकते हैं।

अपने दायरे और सीमा की पहचान



कौशलेंद्र प्रपन्न
हमें हमारे दायरे की पहचान नहीं होती। हमें यह भी नहीं मालूम होता कि हमारी सीमाएं क्या हैं? हमारी क्षमताएं क्या हैं आदि। हम क्या कर सकते हैं और किस हद तक कर सकते हैं इसकी समझ हो तो हमें अपने जीवन में अपने लिए योजना बनाने, सपने देखने में  आसानी होती है। लेकिन अफ्सोसनाक बात यही है कि अधिकांश लोगों का अपनी सीमाओं, क्षमताओं, ताकत एवं दायरे के बारे जानकारी नहीं होती। यह अलग बात है कि क्षमताएं और दायरे बढ़ाई भी जा सकती हैं। लेकिन उसके लिए हमें अतिरिक्त समय, क्षमता, प्रयास और इच्छा शक्ति को बढ़ाने की आवश्यकता पड़ती है। अपनी क्षमता, सीमा और दायरे की चौहद्दी को चौड़ी भी की जा सकती है बशर्ते की हम अपनी कार्यशैली और कार्य दक्षता को समय समय पर मांजा करें और सीखने के लिए तैयार रहें।
हमें कई बार जीवन में अपने दायरे से बाहर भी निकलना होता है। बल्कि निकल कर औरों की ज़िंदगी, कार्य, कार्यशैली को देखने, समझने की आवश्यकता पड़ती है। क्योंकि कोई भी पूर्ण नहीं होता। हमें इसी जीवन में इसी समाज में सीखने का अवसर मिला हुआ है। यह हम पर निर्भर करता है कि हम नई सोच, नए योजनाओं, परिवर्तनों को कितनी उदारता के साथ स्वीकार कर रहे हैं और अपने दायरे से बाहर निकल कर समझने के लिए ख़ुद को तैयार कर रहे हैं।
पिछले दिनों अपने दफ्तर में कार्यरत फाइनांस और एडमिन दे रहे व्यक्ति से बातचीत का मौका मिला। बल्कि दूसरे शब्दों में कहें तो मैंने पहल की कि ज़रा दूसरों के काम को भी समझा जाए। क्योंकि अपने काम के दायरे से बाहर निकल कर दूसरों के कार्य क्षेत्र के बार में अपनी समझ बनाई जाए। वह व्यक्ति भगत हो सकता है, मदन हो सकता है या फिर नाम तो बदलते ही रहेंगे जो चीज नहीं बदलेगी वह है काम और काम की प्रकृति। सो बातचीत में कई सारी बारीकियों सा साबका पड़ा। मालूम चला व्यक्ति बेशक व्यवस्थित तौर पर प्रबंधन का कोर्स न किया हो लेकिन काम करने के दौरान कई सारी दक्षताएं स्वतः ही काम करने की शैली में शुमार हो जाती हैं। जिसे सिद्धांत के तौर पर बाद में पढ़ सकते हैं। हमें में से कई सारे लोग हैं जो निश्चित ही प्रबंधन के कोर्स से नहीं गुजरे होते हैं। लेकिन जिस शिद्दत और दक्षता से काम करते हैं उससे लगता है काश! इनके साथ कुछ देर बैठ कर बात ही कर लें। एक घरेलू महिलाएं व व्यक्ति जिस प्रकार से माह के खर्चों, ख़रीद फरोख़्त आदि की प्लानिंग करता है ताकि ज़रूरत की चीजों भी न घटें और बीच बीच में आने वाली अनप्लान्ड प्रोग्राम भी मैनेज हो जाएं ऐसी प्लानिंग एक एडमिन और फाइनांस के व्यक्ति को करना होता है।
उन्होंने वह शीट भी दिखाई जो वो पूरे साल की बजटीय प्रावधान कर रखा था। साथ ही किस प्रकार से अनप्लान्ड बजट व खर्चे को मैनेज करना है किन मदों में आबंटित करना आदि की प्लानिंग देखकर लगा यह व्यक्ति कितने कामों के बीच रहा करता है लेकिन कभी शिकायत नहीं करता। कभी ऊबा नहीं करता। दरअसल हम अपने काम में तभी उलझे रहते हैं, तभी शिकायत करते हैं जब हम अपने काम को रोज़ाना और हप्ते, माह और साल में समुचित और योजनाबद्ध तरीके से व्यवस्थित नहीं करते। यदि हम अपने काम को सही प्लानिंग करें और बीच बीच में उसका मूल्यांकन भी करते रहें कि कितनी दूरी तय हो गई। कितना और चलना है? बची हुई दूरी को कैसे कम समय में व तय समय सीमा में पूरा करना आदि की पड़ताल करते हुए चलेंगे तो कभी भी काम को बोझ हम पर सवार नहीं हो सकता। दिक्कत यहीं आती है कि जब एक कामगर व छात्र अपने लिए दिन, सप्ताह, माह और साल की योजना बनाता है तब वह रास्ते में आने वाली अड़चनों, रिस्कों का अनुमान नहीं कर पाता। अनुमान कर भी लेता है तो उसके प्रति लापरवाह हो जाता है।
यदि हमें अपनी सीमाओं और दायरे का अनुमान हो और अपनी क्षमताओं का एहसास हो तो हम उसी के अनुसार अपने लिए मिशन और विज़न तय करेंगे। लेकिन हम अपने आप में इतने स्पष्ट नहीं होते कि अपनी क्षमताओं और दायरे की पहचान में समय लगाएं। बस दूसरे क्या कह रहे हैं? उनके सपने व दायरे क्या हैं? आदि को जानने और आलोचना करने में वक़्त ज़ाया किया करते हैं। कितना बेहतर हो कि हमें हमारे दायरे और सीमाओं का एहसास हो और उसके अनुसार हम अपने और कंपनी के लिए कार्ययेजना बनाएं तो कभी भी जीवन और कार्य में विफल नहीं हो सकते।


Wednesday, April 18, 2018

अभिमन्यू हो गया उदास



कौशलेंद्र प्रपन्न
आप सब की यादाश्त बहुत तेज है। अभिमन्यू की पूरी जन्मकुंडली जानते हैं। कब पैदा हुआ। किसका बेटा था। क्यांकर मारा गया आदि आदि। वह कोई और अभिमन्यू था। जो गर्भ में ही ज्ञान और समझ पा चुका था। आपको तो यह भी याद होगा कि उसे चक्रव्यूह से निकलने का रास्ता नहीं मिल सका तो उसके पीछे क्या वजह थी। शायद यही वज़ह है कि अभिमन्यू की मृत्यू होती है। बल्कि आज के शब्दों में कहें तो हत्या की गई।
आपको क्या लगता है वह सिर्फ और सिर्फ एक ही अभिमन्यू रहा जिसकी हत्या की गई? ज़रा विचार कीजिए। यदि आपके पास सोशल मीडिया से वक़्त मिल जाए तो। यदि समय हो तो विचार कीजिएगा। हमारा अभिमन्यू आज भी जूझ रहा है। कई सारे कौरवों की फौज उसे रेजदिन घेर कर मार रही हैं। वह निहत्था असहाय मरने को मजबूर है।
कश्मीर में क्या हुआ? बिहार में क्या हुआ? उत्तर प्रदेश में ही देख लीजिए सिर्फ भूगोल अलग हैं। जगहें अलग हैं। वारदात तो एक है। मारा तो अभिमन्यू ही गया। वह लड़की थी। जो ख़ुद को कौरवों से बचा न सकी। बचना तो वह भी चाहती थी। उसे भी अपनी जिं़दगी प्यारी थी। वह भी हौवानों से बचकर अपने घर पाप के पास जाना तो चाही होगी। मां की याद तो उसे भी आई होगी। अभिमन्यू की मां की तरह उसकी मां सोई नहीं होगी बल्कि इंतज़ार कर रही होगी कि उसकी बुधिया वापस आएंगी।
वह बुधिया लौट कर नहीं आई। वह आज की अभिमन्यू बन गई। बनना उसकी चाहत या चुनाव नहीं था बल्कि मजबूरी थी। न चाहते हुए भी उसे शिकार होना ही था। लेकिन कौरवों को कोई भी रोक न सका। आप ही देखें कश्मीर की घटना से पहले दिल्ली दहल गई थी। उस घटना की थरथराहट वैश्विक स्तर पर महसूस की गई। लेकिन अभी भी कौरवां की सेना यूं ही अभिमन्यू को शिकार बना रहे हैं। कभी चाकलेट के प्रलोभन पर कभी घूमाने के नाम पर किन्तु गुमराह तो हमारी बेटियां ही हो रही हैं।
हमने बच्चों की सुरक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा प्रदान करने की घोषणा वैश्विक स्तर पर 1989 में यूएन में की थी। लेकिन आज भी हमारे बच्चे न तो सुरक्षित हैं और न ही स्वस्थ्य। हां हमने इन तीस सालों और कुछ किया हो या नहीं लेकिन विकास ज़रूर किया। फ्लाईओवर से शहर को पार कर दिया। पूरे शहर को सोशल मीडिया पर अपलोड कर दिया। जब शहर सोशल मीडिया पर लाइक और शेयर करेगा तो भावनाएं भी भी शेयर होंगी। भावनाओं का क्या है यह तो समय और व्यक्ति के अनुसार बदला करती हैं। हमारी नज़र में तो अस्सी साला महिला और आठ साला बच्ची दोनां ही बस हवस, सेक्स और यूज की वस्तु भर हैं।
काश! हम सोशल मीडिया पर भावनाओं को उडेलने की बजाए हक़ीकत में कुछ सोच और कर पाते। हालांकि आप कहेंगे मैं क्या कर रहा हूं। मैं भी तो उसी मंच का प्रयोग का कर रहा हूं। लेकिन दोनों में एक बुनियादी अंतर है। वह यह कि यहां लाइक और कमेंट की उम्मीद नहीं है। बल्कि आपसे महज इतनी सी गुजारिश है कि यदि आज भी हम ठान लें कि कम से कम मैं अपनी आंखों के सामने किसी भी अभिमन्यू की हत्या नहीं होने दूंगा। कोशिश करूंगा कि अपनी नागरीय जिम्मदारी निभाउंगा। तो काफी हद तक हम अपने अभिमन्यू को बचा सकें। वरना अभिमन्यू उदास सा सोचता रहेगा कि काश मैं बाहर ही नहीं आता। 

Monday, April 16, 2018

कॉपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व और शिक्षा



कौशलेंद्र प्रपन्न
शिक्षा के क्षेत्र में सरकार की मदद के लिए नागर समाज आगे आ चुका है। इनमें सरकारी और गैर सरकारी संस्थाएं बढ़ चढ़ कर हिस्सा ले रही हैं। क्योंकि सरकार शिक्षा में बेहतर स्थिति पैदा करने के लिए तत्पर है। लेकिन अफ्सोस कि सरकारी तंत्र एक सीमा के बाद असहाय हो जाती है। इसे ऐसे समझ सकते हैं कि सरकार ही है जिसने 1990, 2000 में विभिन्न वैश्विक मंचों पर स्वीकार कर चुकी हैं कि हम प्राथमिक शिक्षा में विश्व बैंक और नागर समाज की मदद चाहते हैं। इसी का परिणाम है कि आज हमारे देश में सर्व शिक्षा अभियान, राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान आदि अन्य संस्थानां की मदद से सरकारी स्कूलों में अपना योगदान दे रहे हैं। किन्तु जमीनी हक़ीकत यह है कि ये तमाम योजनाएं स्कूली शिक्षा में गुणवत्ता लाने में काफी नहीं हैं। यही कारण है सरकार को कॉपोरेट व कंपनी जो मुनाफा कमाती हैं। उनके लिए सामाजिक उत्तरदायित्व में काम करने के लिए कानून बना कर आमंत्रित किया गया। यही वज़हें हैं कि आज की तारीख़ में देश में विभिन्न कंपनियां कॉपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के तहत स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार आदि के क्षेत्र में काम कर रहे हैं।
टेक महिन्द्रा फाउंडेशन पिछले तकरीबन दस सालों से देश के विभिन्न राज्यों में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के क्षेत्र में काम कर रहा है। चेन्नई,मुंबई, हैदराबाद, दिल्ली, भुवनेश्वर, कोलकोता आदि जगहों पर इन सर्विस टीचर एजूकेशन इंस्टीट्यूट चला रही है। दिल्ली में पूर्वी दिल्ली नगर निगम के साथ मिलकर इन सर्विस टीचर एजूकेशन इंस्टीट्यूट की स्थापना 2013 में की गई। इस संस्थान ने पिछले पांच वर्षों में तकरीबन 6888 शिक्षकों की विभिन्न विषयों में प्रशिक्षण दे चुकी है। साथ ही निगम के स्कूलां में कार्यरत प्रधानाचार्यां की भी ट्रेनिंग संस्थान कर में संपन्न हुआ है। इसी दिल्ली में स्मार्ट हेल्थ केयर एकेडमी भी टेक महिन्द्रा फाउंडेशन के द्वारा स्थापित किया जा चुका है। जहां से बच्चे अस्पतालां में सहायक, डेटा रिकार्ड, ऑपरेशन थिएटर सहायक आदि के कोर्स करने के बाद विभिन्न अस्पतालों में रोजगार पा चुके हैं।

दरअसल शिक्षा की बेहतरी के लिए देशभर में भरपूर काम हो रहे हैं। कमी यही रह जा रही है कि जो लोग व संस्थान प्राथमिक शिक्षा में शिक्षकों के साथ मिल कर काम कर रहे हैं उन्हें न तो कोई पहचान पाते हैं और न ही उनकी मेहनत को रेखांकित किया जाता है। टेक महिन्द्रा फाउंडेशन के साथ मिल पुणे में ग्राममंगल, हैदराबाद में साहित्या ट्रस्ट, टीस आर ध्वनि बंगलुरू में, नवनिर्मिति और सेव द चिल्ड्रेन इंडिया मुंबई आदि स्थानीय प्रशासन से मिल कर सरकारी स्कूलों में शिक्षकों, बच्चों के साथ स्कूलां में काम कर रहे हैं।
वर्तमान सरकार लगातार कौशल विकास पर जोर दे रही है। वह कौशल विकास न केवल बच्चों और  युवाओं भर के लिए है। बल्कि टीचर की भी दक्षता विकास करना बेहतर ज़रूरी है। यही कारण है कि दिल्ली में मिशन बुनियाद, बच्चों में पढ़ने की दक्षता विकास, टीचर की प्रोफेशन डेवलप्मेंट को लेकर गंभीरता से काम हो रहा है। हो भी क्यों न तमाम रिपोर्ट, नेशनल एचिवमेंट रिपोर्ट, डाइस, जीईएमआर आदि बताती हैं कि हमारे बच्चे साधारण से वाक्य तक नहीं पढ़ पाते। गणित के सामान्य के जोड़ घटाव नहीं कर पाते। ऐसी स्थिति में टीचर के साथ कंटेंट पर काम करने की बज़ाए कैसे पढ़ाएं पर काम करने की आवश्यकता है।

Saturday, April 14, 2018

उत्सव पैसे और मजा



कौशलेंद्र प्रपन्न
हम सब अपनी जिं़दगी के एकरसता को तोड़ना चाहते हैं। सब के अपने अपने तरीके होते हैं। कोई दोस्तों के साथ टहल आता हैं। कोई फिल्म,नाटक देखकर मन को बहला लेता है। खेल तो ख़ैर धीरे धीरे कम ही होते जा रहे हैं। यदि कोई खेलते दिखाई दे जाए तो सुनना पड़ता है यार यह भी कोई उम्र है खेलने की। अब तो मैच्योर हो जाओ। और किसी और के कहने पर हम खेलना छोड़ देते हैं। हमारे जीवन से कुछ ख़ास चीजें बड़ी ही तेजी से ग़ायब हो रही हैं। खेल, मनोरंजन, मिलजोल की चाह आदि। हम जैसे जैसे नागर समाज का हिस्सा होते जा रहे हैं वैसे वैसे अकेला भी होते जा रहे हैं। हम अपनी शामें घर में टीवी के सामने गुजारते हैं। या फिर सप्ताहांत में किसी मॉल में टहलते, बिन ज़रूरतों की शॉपिंग करते गुजार देते हैं। शामें और सप्ताहांत हमारा लोगों, रिश्तेदारों से मिलने में नहीं अकेले गुज़रा करता है। पैसे की तो चिंता ही नहीं। हम बड़ी सहजता से एक बैठक में पांच सौ हज़ार या दो हज़ार खर्च कर देते हैं।
उत्सव हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा रहा है। बस माध्यम और स्वरूप अलग अलग रहे हैं। समय प्रमाण है कि हमें अपने जीवन की मनोभाविक, समाजोसांस्कृतिक एकरूपता को तोड़ने के लिए विभिन्न अवसरां पर विशेष आयोजन किया करते थे। यह एक बहाना था स्व और परिजनों से मिलने का। लेकिन जैसे जैसे हम नागर समाज का हिस्सा होते गए हैं वैसे वैसे मॉल या घूमने में आनंद तलाशा करते हैं। आपने भी अनुभव किया होगा कि आज हम दिखावे में ज़्यादा जीया करते हैं। जिन चहजों के बगैर भी काम चल सकता है लेकिन हम सामानों से घर भरना सीख चुके हैं। जैसे जैसे हमने घर भरा है वैसे वैसे हम अंदर से ख़ाली होते जा रहे हैं।
किसी के भी जीवन में बच्चे की किलकारी बहुत रोमांचक अनुभव से कम नहीं हेता। हर किसी को इस पल का इंतज़ार रहा करता है। और यदि ऐसे नहीं हुआ तो उनका जीवन एकरेखीय एकांगी सा हो जाता है। ऐसा कहते हैं। लड़कियों का सामाजिकरण ऐसा ही होता है कि यदि वे मातृत्व सुख से वंचित हैं तो उनका जीवन बेकार और ठूंठ है। जबकि इस अवधारणा से उबरने की आवश्यकता है। ज़रूरत तो इस बात की भी है कि हमें बच्चों के न होने की स्थिति में ग़मज़द होने की बजाए जीवन में उत्सव और आनंद के अन्य रास्तों के राही बनना चाहिए।

Tuesday, April 10, 2018

उनके आने से पहले...


कौशलेंद्र प्रपन्न
घर में कोई आने वाला हो तो मंज़र देखने लायक होता है। घर का कोना कोना साफ हो जाता है। घर के सभी लोग सफाई अभियान में लग जाते हैं। घर का कोना कोना वाह से आह!!! करने लगता है। बच्चे तो बच्चे बड़े भी साफ सफाई करते नज़र आते हैं। डाइनिंग टेबल पर लंबे समय से लेटे किताबें, दवाई की डिबिया, अख़बार सब के दिन बिहुर जाते हैं। सब अपनी अपनी जगहों पर शोभने लगते हैं।
कई तरह की ऐसी भी चीजें हाथ लग जाती हैं जो कई बार की ढूंढीया पसारने के बाद भी गुम थे। वो भी आंखें फाड़े नजर आने लगते हैंं। सफाई का एक लाभ तो यह होता ही है कि ऐसी फाइलें, किताबें, कागज पतर सब मिल जाया करते हैं। काश कि हर हप्ते कोई न कोई आए।
लेकिन कहां संभव है रोज़ और हर हप्ते किसी की ख़ातिरदारी करने की। ख़ातिरदारी से ज़्यादा सामानों की लिस्ट बनाने दस बार बाज़ार जाने के बाद भी कुछ सामान रह ही जाते हैं उनके लिए डांट खाओं और डांट से पेट भर जाए तो उसपर कॉफी के रूप में यह मिलता है कि कितना अच्छा लगा रहा है। तुम्हें तो ऐसे ही गंध कबाड़े में रहने की आदत सी हो गई है।
कभी तो कहा करते थे मुझे गंदे में रहा नहीं जाता और अब यह आलम है कि जब तक कोई घर में आने वाला न हो तो जो चीजे दस दिन पहले जहां थी वहीं पड़ी रहती है। कितनी बार कहा फला बैग कई दिनों से तुम्हारी राइटिंग टेबल के नीचे सुस्ता नहीं है उसे उपरी आलमारी में रख दो मगर सुनना कहां है। हां अख़बार पूछो, पत्रिका पूछो या पूछ लो किताब तो इनकी सारी जगहें पूरी शिद्दत से बता दोगो। बोलो याद है कि नहीं।
ठीक इसी तर्ज़ पर जब किसी संस्थान में या फिर आफिस में कोई अधिकारी आने वाले होते हैं तब भी घर जैसा ही अफरा तफरी मच जाया करती है। इसे सजाओ, इस बोर्ड को उेकोरेट करो, फला फाईल वहां होनी चाहिए। इस चेयर का एंगल चेंज करे आदि आदि। देखते ही देखते पूरा संस्थान चमक जाया करता है।
साहब के आने से पहले पूरे संस्थान पर सब एक टांग पर खड़े भाग रहे होते हैं। बॉस की सांसें भी टंगी रहती हैं। पता नहीं कौन सा कोना संस्थान की हक़ीकत बता दे। किस बात पर सुनना पड़ जाए। जैसे ही उनका जाना होता है सब की सांसें सामान्य चलने लगती हैं। यह तो दस्तूर है प्यारे किसी के आने से पहले और जाने बाद स्थितियां सामान्य ढर्रे पर आने लगती हैं।
कितना अच्छा हो कि किसी के आने पर ही हमारी प्रेजेटेबल स्थिति को क्यां ठीक की जाए। क्यां न इसे हम अपनी आदतों शामिल कर लें। फिर चाहे कोई भी आए चाहे मोहतरमा हों या फिर मोहतरम। चीजें अपनी जगहों पर ही फबा करती हैं। अब आप ही बताएं किताबें, अख़बार, चाय की प्याली यूंह र जगह पर पड़ी, बिखरी अच्छी लगती हैं भला? एक बार व्यवहार में शामिल हो जाए तो फिर संस्थान में कोई आए या घर में अफरा तफरी नहीं मचती।

Monday, April 9, 2018

जब आप नहीं होंगे दफ्तर में तो...



कौशलेंद्र प्रपन्न
कुछ भी नहीं होगा। होना क्या है? कुछ लोगों के लिए आपका न होना होने से ज़्यादा मायने नहीं होगा। कुछ के लिए शायद सुबह की सांसों जैसी होगी। संभव है कुछ के लिए कल शाम की फाईल और सिस्टम की तरह होंगे आप। जिसे कल सटडाउन कर दिया गया। रोज़ दिन की नई चुनौतियां और कामों के बीच शायद ही कोई याद करे। करे भी तो शायद अच्छे के लिए कम आपकी कमियां और कुछ ख़राब आदतों के लिए याद किए जाएंगे। अगर विश्वास नहीं तो कभी कुछ दिनों के लिए आफिस के दूर होकर तो देखिए।
वैसे भी किसी के होने या न होने से दफ्तर जैसे जगहों को कोई ख़ास फ़र्क नहीं पड़ता। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि आप न होंगे तो कोई काम रूक जाएगा। या कुछ प्रोजेक्ट थम जाना है। हां बस अंतर इतना ही पड़ेगा कि आपकी सीट पर कोई और हुआ करेगा। होते ही आपकी तमाम चीजों को पहले ख़ारिज करेगा। आपने डिसिजन को ग़लत बताकर अपनी बात और राय को स्थापित करना चाहेगा। यदि ऐसा नहीं करेगा तो उसे कौन पूछेगा। हर बात पर सुनना होगा कि फला जी ऐसे करते थे। ऐसे कहा करते थे। क्या काम किया करते थे आदि। सो सबसे पहले आपकी सीट पर आने वाले/वाली आपके कामों को ख़ारिज़ करने में लगेंगे।
सच पूछिए तो आपही तो नहीं होंगे। आपकी आदतें कहीं न कहीं किसी न किसी कोने में या फिर किसी की स्मृतियां का हिस्स हुआ करेंगी। आप होंगे लेकिन कुछ ऐसे वाकयों पर जब आपही छा जाया करते थे। तब आवाज़ किसी और की होगी तब आप याद किए जाएंगे। तब याद किए जाएंगे जब आपकी आवाज़ को कोई और रिप्लेस किया करेगा। फिर कोई कहानी नहीं सुनेगा। क्योंकि उसे कहानी नहीं बल्कि लोगों को क्या सुनाना है इस कला में दक्ष हैं।
फ़र्ज कीजिए आपको अपने होते तरह तरह के व्यंग्य सुनने को मिले और हर वक़्त टांग खींचाई की जाती हो। तो आप खुश भी हो सकते हैं कि कम से कम आपकी चर्चा तो होती है। आप हैं ही ऐसे जिसपर चर्चाएं हुआ करती हैं। चर्चाएं उन्हीं की तो हुआ करती हैं या तो वे अच्छी होती हैं या फिर...।
कुछ है हमारे आप-पास जो कभी नहीं बदला करता। न तो किसी की आदतें अचानक बदल जाती हैं और न किसी की आवज़ इतनी जल्दी बदल जाया करती है। कहते हैं कुछ आवाज़ें बहुत ख़ास हुआ करती हैं। उन आवाज़ को सुन कर ही आपकी पूरी स्मृतियां एक बार चक्कर काट लिया करती हैं। वहीं कौन कहां कैसे बैठा करता है। किस बात पर कैसे रिएक्ट किया करता है। आदि ही आपके जाने के बाद आपका पीछा किया करती हैं।
कोई न तो दफ्तर में ज़िंदगी के दस्तावेज़ लिखा कर आता है। और न सच की जिं़दगी में। यह तो सच ही है कि जो आज ज्वाइन किया है उसे या तो रिटायर होना होगा या फिर एक समय के बाद कुछ इतिहास को कंधे पर लटकाए कहीं और किसी दफ्तर में सेट हो जाना होता है।
वैसे एक बात कहना चाहता हूं। हम जहां भी रहें। जिनके साथ भी रहें। कुछ ऐसी चीजें ज़रूर छोड़ जाएं जिसमें आपकी उपस्थिति मौजूद हो। हालांकि वक़्त हर दर्द और टीस को भर दिया करता है। लेकिन फिर भी कुछ बातें और एहसास ऐसी रह जाती हैं जिन्हें आप कभी पीछे नहीं छोड़ पाते। वह हमेशा आपके साथ रहा करती हैं।

Friday, April 6, 2018

इमोशन को मैनेज करो साहब


कौशलेंद्र प्रपन्न
आज की तारीख़ी हक़ीकत है कि लोग अपने इमोशन को मैनेज नहीं कर पाते। आप भी तो नहीं कर पाते होंगे। और परिणाम यह होता है कि कोई न कोई मुंह फुला लेता है। वह चाहे घर के लोग हों या फिर ऑफिस या फिर यार दोस्त। रूठे हुए को मनाना भी मैनेजमेंट का एक हिस्सा है। लेकिन अफ्सोस कि इमोशन को हम मैनेज करने के लायक ही नहीं मानते।
मार्केट मैनेज होते हैं। वोट मैनेज होते हैं। लेग मैनेज होते हैं और प्रोजेक्ट भी। ख़ास बात यह है कि हम अपने इमोशन को कई बार समझ ही नहीं पाते कि हम क्या चाहते हैं। क्या चाहते हैं अपनी ज़िंदगी से और क्या अपेक्षा रखते हैं रिश्तों से। जब हम यह समझ लेंगे कि फलां की आपसे क्या उम्मीद है और आप उसे कैसे पूरा कर सकते हैं तब हमें औरों की अपेक्षाएं भी पूरी करने में दिक्कतें नहीं आएंगे।
दरअसल हम लोगों की अपेक्षाओं में खुद को ऑल्टर करना चाहते हैं। हम चाहते हैं कि सभी की नज़रों में अच्छा अच्छा बने रहें। जो संभव नहीं है। एक मैनेजर कभी भी सभी के लिए अच्छा नहीं हो पाता। यदि वह मैनेजमेंट की बेहतरी चाहता है। यदि कंपनी या प्रोजेक्ट की बेहतरी चाहता है और समय पर पूरा करना चाहता है तो उसे कई बार कठोर कदम उठाने ही पड़ते हैं। संभव है उसके निर्णय से कुछ लोगों के सपने बिखर जाएं। लेकिन वह बड़े लक्ष्य और सफलता की ओर दृष्टि रखता है। इसलिए कई बार प्रोजेक्ट को सफल करने के लिए कठोर और बने बनाने रास्ते से हट कर भी निर्णय लेता है। ठीक उसी तरह हमें अपने कई इमोशन पर कठोरता से निर्णय लेने की आवश्यकता पड़ती है। यदि हम अपने इमोशन की प्रकृति को समझ लें तो उसे मैनेज करना आसान हो जाता है।
फ़र्ज कीजिए आपको किसी से इमोशनली अटैच्मेंट हो गया है। व हो गया था। यदि अतीत में ही अटके रहेंगे तो आगे नहीं बढ़ सकते। दरअसल इमोशनल कंफ्लिक्ट यहीं शुरू होता है। आप चाहते हैं कि दोनों ही रिश्ते को खुश खुश रखें। मगर बीच में मूल्य, नैतिकता, धार्मिक आस्था आदि आ जाती हैं जो आपके मूल्य और रिश्तों को सुलझाने की बजाए और पेचिंदा कर देती हैं।
पहली बात तो यही कि आप रिश्ते से क्या चाहते हैं? क्या अपेक्षा है? और किस हद तक अपनी ज़िंदगी को सहज जीना चाहते हैं। यदि आपने रिश्तों की मांगों और उष्मा को संभालना सीख गए तो कभी भी जीवन में तनाव और द्वंद्व पैदा नहीं होगा। कहेंगे कहना कितना आसान है और जीना कितना मुश्किल। लेकिन कठिन नहीं है। इमोशन को मैनेज कर पाए तो लाइफ में आप या कि हम काफी सहज रह सकेंगे।

Thursday, April 5, 2018

मैनेजर का चुनावः सावधान रहें चौकन्ने रहें


कौशलेंद्र प्रपन्न
मैनेजमेंट में प्रोजेक्ट को चलाने के लिए कई प्रोजेक्ट मैनेजर की ज़रूरत पड़ती है। कोई भी प्रोजेक्ट हो चाहे वह सरकारी हो या फिर गैर सरकारी। प्रोजेक्ट मैनेजर के चुनाव में यदि प्रोग्राम मैनेजर चैकन्ना न हो या फिर यदि पूर्वग्रह में मैनेजर नियुक्त करता है तो उसका असर प्रोजेक्ट के पूरे होने, सफल और विफल होने में बड़ी भूमिका निभाता है। अपनी ही टीम में से यदि किसी को चुनना होता है तब कई सावधानियां रखनी पड़ती है। क्या जिसे हम नई भूमिका के लिए चुन रहे हैं वह कैपेबल है? क्या उसके अंदर क्षमता और दक्षता है? क्या उसकी कार्यशैली टीम को लीड करने, टीम को गाइड करने आदि की रणनीति बनाने और विज़न बनाने आदि बनाने की क्षमता है आदि।
हमारे प्रोजेक्ट इसलिए भी समय पर पूरे नहीं होते क्योंकि प्रोजेक्ट मैनेजर सही तरीके से रणनीति नहीं बना पाता। समय पर सही व्यक्ति को कम्युनिकेट नहीं कर पाता। प्रोजेक्ट के विज़न और मिशन को हर टीम तक संप्रेषित नहीं कर पाता। यदि टीम में गोल ही स्पष्ट नहीं है तो टीम आख़िर किस दिशा में बढ़गी। दिशा और लक्ष्य की अस्पष्टता की स्थिति में समय, पैसे, मैनपावर आदि लगते हैं।
हालांकि हर व्यक्ति अपनी दिनचर्या को मैनेज तो करता ही है। लेकिन प्रोजेक्ट को मैनेज करना थोड़ा अलग है। वह इस मायने में कि जब आप अपनी ज़िंदगी मैनेज करते हैं तो ज़्यादा लोग नहीं होते। वहीं प्रोजेक्ट में चार से अधिक भी व्यक्ति शामिल होते हैं। जब व्यक्ति हैं तो उनके साथ कुछ व्यवहार, कुछ संवेग, कुछ इमोशन भी साथ होती हैं। इमोशन को मैनेज करना भी एक कौशल है।
मैनेजर को अपनी और अपने अंदर काम करने वाले कर्मियों के इमोशन को भी बैलेंस करना होता है। काम का दबाव तो होता है। इससे किसी को भी गुरेज़ नहीं हो सकता। लेकिन काम के दबाव में आप किसी और के इमोशन और काम करने की टेम्पो को कुचल नहीं सकते। शायद यहां मैनेजर ग़लती कर बैठता और अपना आपा खो बैठता है। गुस्सा या खीझ किसी और की थी लेकिन वह अपने से नीचे व्यक्ति पर उतार देता है। ऐसे में वह टीम के अन्य सदस्यों के बीच अपनी प्रतिष्ठा और सम्मान खो देता है। मैनेजर का रोल दूधारी तलवार पर चलने जैसा है। एक ओर अपने से उच्च अधिकारियों क निर्दशों, इगो, दबाव को सहता है वहीं अपने अंदर काम करने वाले व्यक्तियों की अपेक्षाओं और इगो को भी संतुलित करना पड़ता है।
यदि एक ग़लत मैनेजर का चुनाव करते हैं तो कुछ समय के लिए ही सही हमारा प्रोजेक्ट व प्रोग्राम पर उसका असर तो पड़ता ही है।
कुछ बेहतर मैनेजर की सूत्र-
सही समय पर, सही तरीके से, सही व्यक्ति तक संवाद का सक्रिय एवं सकारात्मक और निरंतर संप्रेषण नितांत ज़रूरी होता है।

Tuesday, April 3, 2018

आज नदी खुश थी...



कौशलेंद्र प्रपन्न
खुश थी नदी कि उसके साथ पूरा गांव है। गांव के लोग उसके लिए लड़ने के लिए आग आ रहे हैं। लेकिन नदी की खुशी ज़्यादा समय पर बरकरार न रह सकी। कुछ लोग थे जो गांव के बाहर के थे। जिन्होंने गांव के लोगों को सपने दिखाने लगे कि यदि नदी पर बांध बनेगा तो लोगों को रोजगार मिलेगा। गांव के बच्चे शहर और महानगर नहीं जाएंगे। और भी थे वायदे जिसपर गाव के लोग लुठित हो रहे थे। वही पास खड़ी एक बुढ़ा पेड़ ग़मज़दा था। उसे मालूम था नदी अब वही नहीं रहेगी। नहीं रहेगी उसकी धार। पहले भी इस गांव और पेड़ ने ऐसे मंज़र देखे हैं। जब गांव को कहीं और बसाया गया था। कुछ उजड़ गए तो कुछ कहीं और चले गए।
नदी का क्या था। उसके अपने तो गांव ही था। गांव के लोग थे। जंगल और पहाड़ों के बीच से बहना ही उसका जीवन था। मगर अब उस पर भी दूसरां की नज़र लग गई थी। आख़िर नदी अपने मन की बात किससे कहती। कोई सुनने वाला नहीं बचा था।
क्या शहर और क्या गांव वैश्विक स्तर पर नदी को मोड़ने और बांध बनाने की चर्चा गर्म थी। जो खिलाफ में थे वे मुट्ठी भर बच गए थे। उन्हें कहा जाने लगा यह तो विकास ही नहीं चाहता। इसे बिजली नहीं चाहिए। इसे रेजगार नहीं चाहिए। पानी के धार पर स्टीमर चलते नहीं देख सकता। जलता है।
ऐसे में राजतंत्र से लेकर लोकतंत्र के चारों खंभों में चर्चा चल रही थी। दूसरी ओर नदी की उदासी देखी नहीं जाती थी। दिन प्रतिदिन नदी सूखने सी लगी। देखते ही देखते नदी की धार गांव छोड़कर दूर होती चली गई। कभी वक़्त था कि बच्चे खूब मजे में नहाया करते थे। पर्वतीनें इसी नदी में नहा कर खरना करती थीं। सूर्य देवता के पर्व रखा करती थीं। वो भी नदी के साथ उदास तो थीं पर उनकी सुनने वाला कौन था।
ऐसे ही हमारी नदी हमारे बीच से गायब हो जाएंगी। हो भी रही हैं। मगर किस पर और क्यांकर अंतर पड़ेगा। सभी को विकास चाहिए। विकास के नाम पर नदी और जंगल, पहाड़ और पर्वतों की बली चढ़ाई जा रही है।
नदी आज खुश कम उदास ज़्यादा थी।

Monday, April 2, 2018

टीचर रिटायर नहीं होते



कौशलेंद्र प्रपन्न
टीचिंग और टीचर ऐसे प्रोफेशन से जुड़े कर्मी होते हैं जो कभी रिटायर नहीं होते। उनके लिए कभी भी 31 मार्च या किसी भी माह की अंतिम तारीख अवकाश के लिए मुकरर्र नहीं होती। यूं तो सरकारी दस्तावेज़ में उनके लिए अवकाश प्राप्ति के दिन तय होते हैं। और बतौर दस्तावेज़ वे स्कूल से सेवामुक्त हो जाते हैं लेकिन सचपूछें तो शिक्षक कभी भी कार्यमुक्त नहीं होता। शर्त इतनी सी है कि यदि वह शिक्षक अपने जीवन में महज नौकरी के तौर पर अध्यापन न किया हो। ऐसे शिक्षक बेशक संख्या में कम हों लेकिन जिन्होंने शिक्षण में आनंद लिया हो। बच्चों से संवाद किया हो। जिनके लिए शिक्षण महज़ पाठ्यपुस्तक, पाठ्यक्रम पूरा कराने भर तक महदूद नहीं रहा वे कभी भी शिक्षण से मुक्त न होते हैं और न ही हो पाते हैं। वे वास्तव में दिल से शिक्षक होते हैं। उनके लिए स्कूल घर सा होता है जहां वे समय से पहले आते हैं और समय के बाद ही घर जाया करते हैं। पूरी जिं़दगी ऐसे शिक्षक पूरी शिद्दत से बच्चों से संवाद करने में विश्वास करते हैं। शिक्षा के मूल दर्शन संवाद और प्रतिवाद से बच्चों में चिंतन दक्षता और वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने में कभी भी चूक नहीं करते। बेशक श्ज्ञिखा व्यवस्था में ऐसे शिक्षकों को उतना मान-सम्मान न मिलता हो। लेकिन शिक्षा विभाग के बाहर बच्चों और अभिभावकों में उन्हें भरपूर सम्मान और मुहब्बत मिला करता है। शायद इन्हीं शक्तियां के बदौलत ऐसे शिक्षा पूरी ऊर्जा और ताकत के साथ शिक्षण किया करते हैं। ऐेसे शिक्षक न तो कभी मरा करते हैं और न ही स्वयं मरते हैं। इस प्रकार के शिक्षक शिक्षण को न केवल इन्ज्वाय किया करते हैं बल्कि बच्चों को किताबें पढ़ाने की बज़ाए जीवन के संघर्षां और वास्तविक समझ दिया करते हैं। बच्चों को जीवन में किस ओर और दिशा में बढ़ना चाहिए उस ओर भी राय दिखाया करते हैं। इस तरह के शिक्षक पढ़ाने की बज़ाए संवाद करने, कहने और सवाल करने की कला और माद्दा विकसित किया करते हैं।

Saturday, March 31, 2018

मार्च में शिक्षा...


कौशलेंद्र प्रपन्न
मार्च पहले बजट के नाम से बदनाम था बेचारा। हर कोई मार्च से डरा करते थे। दूसरा डर बच्चों में नींद उड़ाने के लिए काफी होता था। यही वह माह है जिसमें बच्चे पूरे साल की मेहनत परीक्षा के मत्थे चढ़ा दिया करते हैं। मार्च ही है जो पूरी ज़िंदगी पर भारी पड़ा करता है। बच्चे और बच्चांे के साथ ही अभिभावकों के लिए भी तनाव भरा हुआ करता है।
इस बार का मार्च कुछ ज़्यादा ही उथल पुथल भरा रहा। दसवीं और बारहवीं के पेपर लीक हुए। बच्चे निराश और तनाव सह रहे हैं। अभिभावकों को अपनी नौकरी और यात्रा के बीच ज़द्दो जहत करनी पड़ रही है। यह पहली दफ़ा नहीं है जब परीक्षा के पेपर लीक हुए हों। लेकिन आख़िर भी नहीं है। जब जब परीक्षा के पेपर लीक होते हैं तब एक परीक्षा तंत्र शक के घेरे में नहीं आते बल्कि पूरी शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े होते हैं।
परीक्षा शिक्षा को बेहतर बनाने के लिए है या परीक्षा बच्चों की जिं़दगी में तनाव घोलने के लिए? क्या परीक्षा सचमुच बच्चों की प्रतिभा और दक्षता को मापने मंे सक्षम है? सवाल कई हैं जिनके उत्तर दिए जाने चाहिए। परीक्षा व्यवस्था को संचालित करने वाले तंत्र को प्रबंधित करना होगा। वरना इसकी तरह की लापरवाही व चूक होती रहेंगी।
परीक्षा शिक्षा की मुंहबोली बहन सी है। कभी कभी इतनी रूखी हो जाती है कि पहली वाली को दुखी कर जाती है। जबकि परीक्षा को शिक्षा के साथ सहयोग का रिश्ता रखना चाहिए। वास्तव में परीक्षा के रूपरूप समय समय पर सत्ता के अनुसार बदलते रहे हैं। जब भी सत्ता ने शिक्षा को औजार के रूप में प्रयोग किया है तब तब शिक्षा और परीक्षा की मूल प्रवृत्ति से छेड़छाड़ किया ही गया है।
सरकार और सत्ता शिक्षा को हमेशा ही इस्तमाल करती रही है। जब भी पाठ्यपुस्तकों, पाठ्यक्रमों में बदलाव किए गए हैं तब तब शिक्षा की चिंता कम अपनी नीति और दिशा को मजबूत करने का प्रयास किया गया है।

Thursday, March 29, 2018

च्ुप यूं क्यों रहती हो बोलो...


कौशलेंद्र प्रपन्न
यूं ही कहां कहां कैसे कैसे गहन कंदराओं, वन उपत्यकाओं, पहाड़ों के बीच से चुप चाप बहती हो। कभी इतनी वाचाल और शोख़ हो जाती हो कि समझ नहीं आता तुम वही हो जो कहीं तो एकदम ख़ामोश रहती हो तो कभी झूमने लगती हो। तुम जितनी शांत नज़र आती हो उतनी ही अंदर से बेचैन भी होती हो। जब तुम बेचैन होती हो तो गांव गांव के जल समाधि...
पूरा का पूरा का गांव रातों रात भूगोल से ग़ायब। टिहरी को ही लो अब वहां नामों निशान नहीं। लेकिन कभी तुम उस गांव की शान और पहचान हुआ करती थी। तुम्हीं तो हो कहीं के लिए जीवन रेखा बन जाती हो तो कहीं के लिए जीने मरने का सवाल। तुम्हें लेकर दो राज्यां और देशों के बीच फसाद होता रहा है। क्या चनाब, क्या झेलम और क्या व्यास इन सब को अकेले और शहर के बीच से गुजरते हुए देखना और उन्हें महसूसना बेहद दिलचस्प एहसास होता है। देखा तो सिन्धू नदी को भी है। उसके अकेलेपन को भी देखा। कैसे दो पहाड़ों के बीच ख़ामोशी से बहती रहती है।
एक नदी मेरे पास भी है। उसे अब तक तो ज़िंदा रखा है। मगर डरता हूं कहीं मेरी नदी खो न जाए। वैसे भी शहर और महानगरों में नदी हो या न हो कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता। नदी सूखे या गंधाए किसी की नींद नहीं टूटती। लेकिन हमारे हिस्से नदी नहीं बल्कि नद मिला। वह नद जो तथाकथित अभिशप्त है। देश के चार नदों में से एक नद मेरे शहर के हिस्से आया है। अब आप कहेंगे कौन सा नद मेरे हिस्से आया तो बता ही देता हूं सोनभद्र। यह निकलता तो अमरकंटक से है लेकिन हमारे शहर से गुजरता हुआ आगे निकल जाया करता है।
किसी भी शहर के पास नदी का होना कई बार लगता है एक ईश्वरीय या प्राकृतिक धाय का मिलना है। पर्व त्योहार में डूबकी लगाना हो तो नदी। कभी शहर से उदास हुए तो नदी का तट। कभी उल्लास के पलों की तटस्थ नदी। तो कभी जीवन ख़त्म करने में मां समान गोदी की तरह नदी हुआ करती है।

Wednesday, March 28, 2018

कुछ सपनों का प्रबंधन



कौशलेंद्र प्रपन्न
सपने देखना और उन सपनों को पूरा करना दोनों ही अलग अलग हक़ीकतें हैं। सपने देखना हमारी छूट है। जो भी सपने देखना चाहें। देख सकते हैं। लेकिन उन्हें पूरा करना कई बार हमारे हाथ में नहीं होता। हालांकि यह दूसरों पर दोष मढ़ने जैसा है। लेकिन कुछ हद तक ठीक हो सकता है।
मैनेजमेंट के जानकार मानते और कहते हैं कि यदि कोई भी प्रोजेक्ट व प्लान को शुरू में ही पूरी शिद्दत से योजना, रणनीति, रास्ते,प्लान दो और तीन, रिस्क, संभाव्य चुनौतियों , बजट प्रबंधन, मानवीय ताकतों की समुचित प्रबंधन आदि को ध्यान में रखते हुए कदम उठाए जाएं तो वे सपने और प्रोजेक्ट दोनों ही पूरे होते हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, डेटा से लेकर आम जिं़दगी की तमाम योजनाएं और प्लान यूं ही फूसससस नहीं हो जातीं बल्कि उनके पिछड़ने में या न पूरा हो पाने में हमारी योजना और काम करने की क्षमता और गति, दिशा और इच्छा शक्ति दोनों ही काम करती है। यदि किसी सपने को उक्त चीजें समय पर नहीं मिलीं तो वे सपने अधूरे ही दम घुट कर मर जाते हैं।
आज हमारे युवा सपनों के साथ यह दुर्घटना खूब घट रही है। यदि सपने हैं तो उन्हें पूरा करने की इच्छा शक्ति व ताकत नहीं है। सपने पाल तो लेते हैं कि लेकिन जब बीच में संघर्ष व विपरीत स्थितियों आती हैं तब उनसे डट कर सामना नहीं कर पाते। सामना नहीं कर सकने के पीछे भी अभिभावकों और शिक्षकों आदि के हाथ होते हैं। हम उनके अंदर यह जज़्बा व एहसास ही पैदा नहीं कर पाते कि वे अपनी ताकत का अंदाज़ा लगा सकें। हमेशा उन्हें हाथ में सब कुछ दे देना। सब कुछ रेडीमेड नहीं होता। यह हम तब बताते हैं जब हमारे बच्चे हमारी ही आंखों के सामने अपने सपनों को ऑल्टर करते नज़र आते हैं।
नागर समाज का हर वह व्यक्ति, संस्था व परिस्थितियां सपने ऑल्टर करने की दुकानें हैं जहां हम बच्चों को सीखाते हैं कि कोई बात नहीं यदि फलां सपना पूरा नहीं हो पा रहा है तो वह वह वे वे सपने पाल हो। पाल लो न।
नीरज जी प्रसिद्ध कविता याद आ रही है-
कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है
कुछ चेहरों की उदासी से दर्पण नहीं....

Tuesday, March 27, 2018

शिक्षा में हिचकी यानी हाशिए से मुख्यधारा का सफ़र


कौशलेंद्र प्रपन्न
शिक्षा की कई सारी कहानियां हैं। इनमें से कुछ कहानियां समय समय पर फिल्मों में देखने को मिलती रही हैं। हिचकी हमारी शैक्षिक कहानियों में से एक है। यह फिल्म दरअसल हमारी शिक्षा में समावेशीकरण और बहिष्करण के विभिन्न पहलुओं को विमर्श पटल पर गहरे उभारती है। बात सिर्फ फिल्म की ही नहीं है बल्कि हमारी शिक्षा ऐसे दिव्यांग बच्चों के साथ किस प्रकार का बरताव करती है उस ओर भी शिद्दत से विमर्श करती है। छुटपन में बच्ची को स्कूलों से इसलिए निकाल बाहर किया गया क्योंकि वो बोलते न बोलते हिचकी लेती है। चक चक करती है आदि आदि। उस पात्र को स्कूल से यह कहते हुए निकाला जाता है कि हम इसे क्यों निकाल रहे हैं उस वज़ह को हम नहीं बताएंगे। अंत में वह बच्ची न केवल स्कूलों से निकाल बाहर की जाती है बल्कि कक्षा में भी उसे अपने सहपाठी और शिक्षक की डांट और उपहास का पात्र बनना पड़ता है। वहीं दूसरी ओर हमारी शिक्षा समावेशीकरण के सिद्धांत को तवज्जो देती है। इसी शैक्षिक दर्शन को मानते हुए विभिन्न निजी स्कूलों में मोटी फीस लेकर बच्चों को कहीं न कहीं आत्मकुंठा और बहिष्करण की मार झेलनी पड़ती है।

Saturday, March 24, 2018

कहानी जब औजार बन जाए



कौशलेंद्र प्रपन्न ं
मैनेजमेंट प्रोफेशनल अकसर कहानी के ज़रिए कुछ कहा करते हैं। सीधे सीधे सिद्धांत कहने की बजाए कहानी के मार्फत कहने की कला ख़ासकर श्रोताओं को लुभाया करती हैं।
कहना और प्रभावशाली तरीके से कहना दोनां ही दो बातें हैं। आज की तारीख़ को हर कोई कहने को बेताब होते हैं लेकिन उन्हें श्रोता नहीं मिलते। मिलते हैं तो सुनाया करते हैं यार पका देगा भाग आ रहा है। वही दूसरे की इंतज़ार किया करते हैं। लोग सुनने के लिए पैसे भी खर्च किया करते हैं। कहो ऐसा कि सुनने वाले पीछे पड़ जाएं।
कहानी है ही ऐसी विधा जिसके ज़रिए हम गंभीर से गंभीर और हल्की सी हल्की बातें कह दिया करते हैं। ख़ासकर व्यंजना और लक्षण में भी भाषा के इस कौशल का इस्ताल किया जाता है। कहानी वही विधा है जिसमें सीधे सीधे कहने की बजाए कहानी के पात्रों के ज़रिए कह दिया करते हैं।
हम सब के पास बहुत सी कहानियां हैं। उनमें से कुछ को कह पाते हैं और कुछ अनकही रह जाती हैं। ं

Thursday, March 22, 2018

शिक्षा पर नहीं लिखूंगा पर लिखने से बच नहीं पाता




कौशलेंद्र प्रपन्न
रोज़ दिन मन कड़ा करता हूं। अपने आप से वायदा करता हूं कि आज शिक्षा और शिक्षक पर बिल्कुल ही नहीं लिखूंगा। मगर रोज़ ही ऐसी कुछ घटनाएं घट जाती हैं जिन्हें नज़रअंदाज़ करने का मतलब है कहीं न कहीं हम अपनी जिम्मदारी से दूर भाग रहे हैं। फर्ज़ कीजिए हम शिक्षा जैसे मसलों पर बात नहीं करेंगे तो कौन करने वाला है। किसी को भी शिक्षा की बेहतरी से कोई ख़ास लेना देना है। हाल में ही एक लड़की ने आत्महत्या की। स्कूल प्रिंसिपल जिस गैरजिम्मेदराना तरीके से मीडिया के सवालों को जवाब दे रहा था उससे ज़रा भी नहीं लगता कि उसे किसी भी बच्ची या बच्चे से संवेदना रखता होगा। उसे स्कूल के बाजार से पैसे बनाने है चाहों तरीके जो भी हों।
वहीं कई बार आपको और हमें राह चलते कुछ ऐसे भी टीचर और टीचिंग संस्थाएं हमें अपनी ओर मोड़ लेती हैं। ऐसी ही एक संस्था है सेंटर फोर सोशल एंड कल्चरल प्रशिक्षण,यहां देश भर से कलाकार, बच्चे, टीचर, गुरु आदि छात्रवृति पाते हैं। साथ ही विभिन्न राज्यों के टीचर और बच्चों को पूरे साल छात्रवृति देकर उनकी प्रतिभा को बढ़ावा दिया जाता हैं। यहां की चयन प्रक्रिया में कलाकारों और प्रतिभावान बच्चां, टीचर, मेंटर आदि को प्रोत्साहित किया जाता हैं।
फर्ज़ कीजिए एक ऐसा हॉल हो जहां कर्नाटक, असम, ओड़िसा, बिहार, तमिलनाडू, केरल आदि प्रांतों से बच्चे और शिक्षक मौजूद हैं। इस हॉल में विभिन्न आयु और कक्षा, भाषा भाषी श्रोता हों तो आप उनसे किस भाषा में और किस स्तर पर बात करना चाहेंगे? क्या यह उतना आसान होगा जैसा एक सामान्य समूह में हो सकता है। निश्चित ही अपने आप में एक चुनौतीभरा काम रहा होगा।
इस मायने में मैं अपने आप को सौभाग्यशाली मान सकता हूं कि हाल ही में ऐसे ग्रुप के साथ पूरे दिन बातचीत करने और सीखने का अवसर मिला। कितनी कमाल की बात है कि पूरे दिन आप अपनी मूल भाषा भूल कर दूसरी भाषा को संप्रेषण का माध्यम चुनते हैं। इसमें ख़तरे हैं तो फायदे भी हैं। आप अपने आप को भी चेक करते रहते हैं कि क्या आप चल सकते हैं या नहीं। े
जैसा कि पहले कहा कि इस ग्रूप में दस साल से लेकर पचास साल तक से बच्चे और किशोर और वयस्क थे। विभिन्न भाषा भाषी। जब दस वर्षीय अर्थव ने कहा मैं तो बहुत इन्ज्वाय किया। आप जैसे पढ़ाया बहुत बहुत अच्छा लगा। वहीं प्रसन्न ने कहा कि मेरी भाषा हिन्दी नहीं है। मेरे को यह अच्छा लगा कि आपने हम सभी को एक परिवार की तरह से बना दिया। पहले हम अलग अलग थे। हम किसी को जानते तक नहीं थे। लेकिन आपकी टीचिंग और एक्टिविटी ने हमें जोड़ दिया। आदि आदि। जब इस प्रकार की प्रतिक्रियाएं आती हैं तो लगता है कि शायद आज मैंने कुछ अच्छा किया। उसपर भी जब लोग अपना लंच छोड़कर काम कर रहे हों और छुट्टी ने मांग रहो हों। समय हो जाने के बावजूद भी बैठे सुन और सुना रहे हों तो लगता है कि कुद अच्छा हो रहा है। शिक्षा में अच्छा भी काफी हो रहा है और ख़राब भी। ख़राब को जल्दी लोग जान जाते हैं और अच्छाई थोड़ी देर लेती है।

Wednesday, March 21, 2018

पिछली यात्रा की कुछ बातें



कौशलेंद्र प्रपन्न
पिछले दिनों कुछ शिक्षण-संस्थानों और बच्चों से बातचीत करने का अवसर मिला। पहला देहरादून और दूसरा सेंटर फोर कल्चर एवं रिसोर्स प्रशिक्षण केंद्र दिल्ली। दोनां ही जगहां के तज़र्बे अपने आप में कई स्तर पर शिक्षा और प्रशिक्षण की पद्धति को खोलने और समझने के लिए झरोखे सा काम करने वाली रही।
एक और देहरादून में मनोरम पहाड़ों के बीच बसा पुरकल यूथ डेवलप्मेंट सोसायटी की ओर से पहाड़ी और पिछड़े क्षेत्रों के बच्चे और बच्चियों के लिए तमिलनाडू के श्री स्वामी ने यही कोई बीस साल पहले इस बीया बान में बच्चों को पढ़ाने की ठानी। उनकी दिली ख़्वाहिश रही कि दिल्ली, चेन्नैय, मुंबई आदि शहरां में तो बच्चों को पढ़ने, स्कूल जाने के भरपूर अवसर मिलते हैं। बच्चे बेहतर प्रदर्शन भी करते हैं। लेकिन इन बच्चों के पास न तो सुविधा है और न व्यवस्था। व्यवस्था और संसाधन की कमी उनकी ज़िंदगी को ख़राब कर रही हैं। सो स्वामी जी ने यहां इस पुरकल गांव में यहीं कोई पांच बच्चों को लेकर पढ़ाना शुरू किया।
आज की तारीख़ में इस स्कूल में तकरीबन 502 बच्चे हैं। कुछ बच्चों से बातचीत हुई। एक गुलमोहर सदन की बच्ची ने बताया कि उसका बीजा नहीं बन पाया बरना वो भी यूएस जाती। कॉमर्स की छात्रा जो कि 11वीं में पढ़ रही है। वहीं पूनम जोशी जो यही की छात्रा रहीं और अब यहीं पर पैडागोजी और फैकेल्टी के तौर पर काम रही हैं। बताती हैं कि यहां पर पढ़ने के लिए बच्चों और अभिभावकों को कड़े प्रोसेंसंग से गुजरना पड़ता है। वहीं एक दस साला बच्चे से बात कर के लगा कमाल है कॉफिडेंस है। जिस अंदाज़ में वह अंग्रेजी में अपनी बात रख रहा था। वह सच में प्रशंसनीय था। हमने कई सवाल पूछे। मजाल है कहीं भी अटका हो। वो बच्चा प्रोजेक्ट कर नेशनल लेबल की प्रतियोगिता में शामिल हुआ। संभव है अगले साल वो यूएस चला जाए।
इस स्कूल में पढ़ने के लिए दूर दराज के गांव से बच्चे आते हैं। कुछ के लिए हॉस्टल की सुविधा है लेकिन वह सिर्फ 11 वीं और 13 वीं के लिए। यहां हर बच्चे को कोई न कोई गोद लिए हुए है। इसका मतलब है हर एक बच्चे के खर्चें को कोई और उठा रहा है। बच्चों को कुछ भी नहीं देना पड़ता। यहां के पिं्रसिपल ने बताया कि एक बच्चे की साल भर का खर्च तकरीबन 70से अस्सी हजार आता है।

Sunday, March 18, 2018

जीवन एक कहानी ..

जीवन एक कहानी सी है. जब जीवन कहानी है तो कई सारे पात्र और घटनाएं भी होती हैं.कुछ समय के साथ धूमिल हो जाती हैं तो कुछ एहसास हमेशा साथ रहा करती हैं.
मंसूरी कई बार आना हुवा.लगातार बदलते मसूरी को देखा. बाज़ार और चमकदार ही गए. लोग पर वही हैं. कई बार जीवन बाज़ार सा भी लगता है दूकान के सामान सा भी.मगर जीवन के बाज़ार में वही लोग और एहसास मायने रखते हैं जो बेहद करीब होते हैं. कई एहसास चलते चलते भी मिल जाया करती हैं जिन्हें ताउम्र सहेज सकते हैं.

Saturday, March 17, 2018

गुड और योजनाबद्ध मैनेजमेंट....

 जीवन और प्रोजेक्ट वही सफल होते हैं जिसकी प्लानिंग और अवलोकन लगातार हो.मैनेजमेंट एक्सपर्ट मानते हैं प्रोग्राम वही फेल या सफल होते हैं जिसकी प्लानिंग में रिस्क का अनुमान लगा लिया जाए और समाधान की योजना और पथ बना ली जाती है.
भारत प्रोजेक्ट इसीलिए फेल हो जाती है या डेडलाइन मीट नहीं कर पातीं क्योकिं प्रॉपर प्लानिंग और बजट की योजना नहीं बनाई जाती. दूसरी बात जिमेदारी तय नहीं किये जाते.

Thursday, March 15, 2018

पेपर लीक या व्यवस्था में छेद



कौशलेंद्र प्रपन्न
साल भर तैयार में लगे रहे। कहां कहां नहीं कोचिंग में समय लगाया। कितनां लोगों की नसीहतें सुनीं। घर में टीवी बंध। बाहर खाना बंद। घूमना फिरना बंद। लोगों का घर में आने जाने पर कर्फ्यू। खुद कितने दिन हो गए कहीं आना जाना सब बंद हो चुका है। बच्चों की बात तो है ही बड़ों की भी दिनचर्या कोई अच्छी नहीं है। दफ्तर से लेकर पड़ोसी तब। घर से लेकर कोचिंग तक हर जगह एक ही चर्चा। किसके घर में कौन पेपर दे रहा है। कितने सपनों को आंखों में संजोकर एक्जाम सेंटर पर जाते हैं। जूता,चप्पल, उतार कर परीक्षा कमरे में बैठते हैं। कहीं तो अंडरवीयर और बनियान में बच्चे बैठकर बच्चे परीक्षा देते हैं।
इधर हमारे बच्चे परीक्षा में कलम घीस रहे होते हैं उधर परीक्षा की रीढ़ प्रश्न-पत्र घर जेवार और दुकान में चक्कर काट रहा होता है। न जाने कहां कहां किस किस के हाथ में प्रश्न पत्र हल हो रहा होता है। धीरे से क्लास में भी हल सवाल पहुंच जाता है। जिनकी जितनी पहुंच उनके पास उत्तर हाज़िर। बाकी बच्चे जवाब लिखने में लगे होते हैं।
उन्हें क्या मालूम कि जिन सवालां को शिद्दत से हल कर रहे हैं वो तो बाहर कब का हल हो चुका है। कुछ बच्चे अच्छे अंक लेकर कहीं बड़े नामी गिरामी संस्थान में दाखिल हो जाएंगे। रह जाएंगे तो बस वे जिन्हें कहीं कोई नहीं सुनता।
परीक्षा से पहले पेपर कैसे लीक हो जाते हैंं। कौन सी कड़ी है या वो कौन का छेद है जिसमें से पेपर हुर हुर कर नीचे गिरने लगता है। गोया रेत हो। हमें जानने की ज़रूर है और जिम्मदार कड़ी भी देखने होंगे ताकि उसे ठीक किया जा सके। पेपर का परीक्षा हॉल से बाहर आना कोई नई बात नहीं है। लेकिन जब अत्यंत विश्वसनीय संस्थानों के पेपर भी बाजार में लुढ़कते नज़र आएं तो एकबारगी विश्वास की पेंदी डोलने लगती है।
परीक्षा के पेपर बनाने वाले जानते हैं कि किन किन स्तरों पर सावधानी बरती जाती है। चाहे वह स्कूल स्तर हो, कॉलेज हो या विश्वविद्यालय हर स्तर संभवतः सावधानी तो बारती ही जाती है फिर पेपर बाहर कैसे आ जाते है? क्या उनके पर निकल आते हैं या पांव जिसके बदौलत बाजार घूमने लगते हैं?
न तो पर निकलते हैं, न पांव, और न ही कोई ताकत जो पेपर को बाजार में चलने और दौड़ने की ताकत दे सके। बल्कि हमारी ख़ुद की इच्छा और लोभ इतनी ताकतवर हो जाती है कि उसके आगे हम घुटने टेक देते हैं। वह चूक किसी भी किसी भी स्तर पर संभव हैं पेपर बनाने वाले से लेकर डिस्पैच, टाइपराइटर, कंपोजर, प्रिंटिंग, से लेकर परीक्षा केंद्र पर पहुंचने में कहीं भी कभी भी चूक हो सकती है। किसी का भी ईमान डोल सकता है। यदि एक बार डोला तो क्या वज़ह है कि दूसरी बार न डोले। और यह सिलसिला निकल पड़ता है।
सीबीएससी 2018 के 12 वीं के कैमेस्टी और एकॉउंट के पेपर लीक हो चुके हैं। वहीं फरवरी में कर्मचारी चयन आयोग क पेपर लीक हो चुके हैं। 2003 में पहली बार आईआईएम ने मिलकर ज्वाइंट पेपर ऑनलाइन कराने फैसला किया। इस सिस्टम में चूक नहीं होगा ऐसा मानना था। लेकिन टाईटेनिक की तरह वह विश्वास चूर चूर हो चुका। लेकिन इस आईस बर्ग से टकराने तो हमारे बच्चे हैं। बच्चों के विश्वास और जीवन टकराती हैं। उनके सपने डूबने से लगते है।

Wednesday, March 14, 2018

बच्चों के सपने उनके हैं तो संघर्ष भी...



कौशलेंद्र प्रपन्न
बच्चे सिर्फ परीक्षा के भय से भयभीत नहीं हैं बल्कि बच्चां पर अपने और और के सपनों को पूरा करने का भी भार होता है जिसे वे ढोते हैं। ढोने की पूरी कोशिश करते हैं। भला कौन अपने सपनों को पूरा होते नहीं देखना चाहेगा? किसी अच्छा नहीं लगेगा कि उसके देखे, पाले सपने साकार हो रहे हैं। लेकिन दिक्कत तब आती है जब हम दूसरों के सपनों में अपने सपने का एहसास करने लगते हैं। दूसरे के सपनों को अपना मान कर जीवन के लक्ष्य तय करने लगते हैं। जितने लोग हैं उतने ही सपने हैं। कई बार तो लगता है सड़क पर चलते हैं हम कितने ही सपनों से रू ब रू होते हैं। कितने ही सपने टकराकर आगे निकल जाते हैं। हम कितनी बेरूख़ी से दूसरों के सपनों को सुनकर मुसकुरा के चल दिए... चल देते हैं। बजाए कि उसके सपने को साकार करने में यदि अपनी भिमका निभाई होती तो शायद उसके सपने पूरे हो जाते। बल्कि हम एक कुंठा में जी रहे होते हैं। हम सोचते हैं मेरे सपने अधूरे रह गए तो भला उसके सपने क्योंकर पूरे हों। कांफ्लिक्ट यहीं पैदा होती है। हम पोजेटिव पोजेटिव कांफ्लिक्ट को जीने और सुलझाने की बजाए निगेटिव सेच और अवधारणा की ओर मुड़ने लगते हैं।
इन दिनों बच्चों पर चौतरफा दबाव है। न केवल अभिभावकों का बल्कि रिश्तेदारों, दोस्तों और स्कूली दबाव भी कम नहीं होते। कौन किस कोर्स को चुन रहा है? कहां कहां परीक्षा के फार्म भरे हैं? वहां नहीं हुआ तो क्या होगा? उस एक्जाम में पास नहीं हुआ तो सब हंसेंगे। दोस्त भी मजाक उड़ाएंगे। इतने पैसे लग गए कहां कहां नहीं कोचिंग में पैसे दिए आदि आदि। आर्थिक दबाव भी कम नहीं है। एक ओर परीक्षा दूसरी ओर परीक्षा के आगामी प्रभाव की चपेट में हमारे बच्चे जी रहे हैं।
इन्हें कैसे बचाया जाए इस ओर सोचने की बज़ाए हमारा पूरा ध्यान समाज में घटने वाले अन्य घटनाओं में दिलचस्पी लेता है। उससे अपने परिवार और घर पर असर तो पड़ेगा लेकिन आपकी औलाद जिस मनोदशा से गुजर रहा है। उससे न तो रिश्तेदारों को वास्ता होता है और न समाज के अन्य लोगों को। इसलिए पहले पहल हमें अपने घर के चराग को दुरुस्त करने की आवश्यकता है।
परीक्षा की चपेट में सपने इस तरह आते हैं कि परीक्षा में यदि पेपर अच्छे नहीं हुए या नहीं जा रहे हैं तो हम अपने सपनों और लक्ष्यों को ऑल्टर करने लग जाते हैं। और यहीं से दुश्चिंता, तनाव, अवसाद आदि घर करने लगते हैं। किसी की शुभकामनाओं में इतनी ताकत नहीं होती कि वो आपके पेपर कर दे। बल्कि वे शुभकामनाएं महज़ दिल को तसल्ली ज़रूर देती हैं। दरअसल सपने हमारे हैं तो उसकी पीड़ा और संघर्ष भी हमारे ही होंगे।हमें उसे भी स्वीकार करना होगा। यदि सपनों को ऑल्टर करना हो तो करने में हिचकिचाहट क्यों। क्योंकि जतो हंसने वाले हैं वो तो वैज्ञानिक पर भी हंसते हैं और सड़क चलते रहगीर पर भी। हमें अपने सपने को पाने के लिए कठोर भी होना होता है। कभी कभी अपने आप से तो कभी दूसरों से भी। इसे ग़लत भी नहीं कह सकते। क्यांकि प्रेमचंद ने कहा है ,‘‘सक्सेस हैज नंबर आफ फादर बट डिफिट इज ऑर्फन’’

Tuesday, March 13, 2018

कविता की मांग


कौशलेंद्र प्रपन्न
सामान्यतौर पर कविता और कहानी को क्लास या फिर पाठ्यपुस्तकों तक महदूद कर दिया जाता है। जब कविता को क्लास से निकाल कर जनसामान्य तक ले जाने की कोशिश होती है तब कई प्रकार की चुनौतियों सामने आती हैं।
आज देश में कई सारे मंच हैं। कई सारे मंचीय कवि। सब की अपनी अपनी शैली है। सब की अपनी अपनी पहचान। किसी कोई को भी अच्छा या ख़राब नहीं कह सकते। डॉ राहत इंदौरी से लेकर मुनौव्वर राण हैं तो वहीं इमरान प्रतापगढ़ी भी हैं। कुमार विश्वास हैं तो कविता भी हैं। वंदना यादव भी हैं। इनकी आवाज़ और गले में नज़्म या गीत उतर कर एक आकार पाती हैं। लगता है इन पंक्तियों को इन्हीं के लिए रची गई हैं। वहीं मंच पर चिल्लाने वाले कवि और शायर भी हैं। जो छोटे मोटे शेर या कविता से मंच को जीत लेना चाहते हैं। मंच तो जीत लेते हैं। तालियां भी बटोर लेते हैं। लेकिन कुछ है जो पीछे छोट जाता है। वह है श्रोताओं के दिलों में बसना। स्मृतियों में अपनी कविता को बो देना।
मुझे अपने ही संस्थान के एक कार्यक्रम में कविता पढ़ने का आदेश कहें या मनुहार हुआ है। मैं तब से सोच रहा हूं कंपनी के लोगों ( मैनेजर, प्रोजेक्ट मैनेजर, सिनीयर मैनेजर, सीओओ, सीइओ) के बीच कैसी कविता का चुनाव किया जाए। क्योंकि मेरे श्रोता काव्य या फिर साहित्य के नहीं हैं। वे हैं मैनेजमेंट के लोग। इन्हें कविता सुनाना जोखिम भरा काम है। इनकी अपेक्षाओं को पूरा करना भी एक मसला है। हास्य गीत सुनाएं जो लोग हंसते हैं। हंसेंगे। संवेदनशील सुनाएंगे तो मनोरोगी कहलाएंगे। मुझे लगता है जो भी कवि या मंच पर बोलने अपनी रचनाओं से मोह छोड़कर श्रोताओं को ध्यान में रखकर रचना पाठ करता है तब आधी समस्या तभी खत्म हो जाती है।
कभी हरिवंश राय बच्चन जी को भी साहित्य में वह स्थान नहीं मिला था जो समकालीन कविओं को प्राप्त था। वजह इतनी सी थी कि मंचीय कवि का टैग बच्चन जी को लगा था। वो मंच पर आने के लिए पैसे भी लेते थे। आलोचना तो इसकी भी हुई किन्तु मंच पर कवियों को पैसे मिलने लगे यह एक अच्छी शुरुआत थी। वरना कवि अपनी कविता और श्रम के लिए कुछ मांगने तक से डरते थे।

Friday, March 9, 2018

चलो दोस्तों ! बडोदरा शराफ् फाउंडेशन कौशल विकास केंद्र




कौशलेंद्र प्रपन्न
इन दिनों गुजरात के आणंद स्थित इंस्टीट्यूट आफ रूलर मैंनेजमेंट में प्रोग्राम मैंनेजमेंट एंड लीडरशीप प्रोग्राम करने करने का अवसर मिला है। सो आपको भी इस शैक्षिक यात्रा का आनंद दिलाता हूं। यदि आपकी रूचि है तो वास्तव में आपको भी आनंद आने वाला है।
विभिन्न सत्रों में विभिन्न प्रोफेसर के साथ बातचीत और विमर्श का मौका मिला रहा है। जिनमें संस्थान के निदेशक प्रो हितेश भट्ट की शैली कमाल की है। कहानियों के ज़रिए जिस साफगोई से कठिन से कठिन सिद्धांतों को समझा देते हैं। सच में एमबीए के कई पेचों को एक पल में खोल कर रख देते हैं। उन्होंने अपने लेक्चर में बताया कि कोई भी प्रोग्राम व प्रोजेक्ट बाद में विफल नहीं होता बल्कि प्रोग्राम के शुरू में ही बेहतर प्लानिंग, परिकल्पना, रणनीति, संभावित चुनौतियों के अनुमान न लगा पाने की वजह से देश में कई बड़ी से बड़ी योजनाएं और प्रोजेक्ट फेल हो जाते हैं। बल्कि हुए हैं। उनके इस उदाहरण से मैंने दिल्ली के यमुना पर बनने वाले सिग्नेचर ब्रिज का उदाहरण पेश किया। और कहा कि ओर वह ब्रिज है और दूसरी और डीएमआरसी है। दोनों की कार्यशैली तय करती है कि कौन सा प्रोजेक्ट समय पर खत्म होगा और किसमें विलम्ब होगा बल्कि हो रहा है। कहां तो सिग्नेचर ब्रिज को 2010 में पूरा होना था। जो आज भी जारी है। वहीं उसके बाद के डीएमआरसी के दूसरे प्रोजेक्ट न केवल पूरे हुए बल्कि सफलता पूर्वक चल रहे हैं।
इस कोर्स के अंतर्गत हमें बडोदरा के पास शराफ फाउंडेशन विजिट कराया गया। यहां की ख़ासियत यह है कि आस पास के ट्राइवल क्षेत्र के बच्चों और वयस्कों को कौशल दक्षता प्रदान की जाए। यानी हाथ का काम सीखाया जाए ताकि भविष्य में उन्हें नौकरी मिल सके। इस संस्थान में बच्चे और बच्चियां दोनों ही विभिन्न कोर्स में प्रशिक्षण हासिल कर अपना जीवन बेहतर जी रहे हैं।
गौरतलब हो कि जब वर्तमान प्रधानमंत्री गुजरात के मुख्यमंत्री हुआ करते थे तब उन्होंने राज्य भर में कई ऐसे केंद्रों की शुरूआत की थी जहां युवाओं को रोजगार मिल सके इसके लिए प्रशिक्षण दिया जाता था। शराफ कौशल केंद्र की तारीफ करने के लिए नहीं लिख रहा हूं बल्कि इसलिए आज इसपर कहानी सुना रहा हूं ताकि इस सक्सेस स्टोरी को देख पढ़ और सुन कर हम अपने आस पास के युवाओं के सपनां को पूरा करने में मदद कर सकें।
मैंन उन युवाओं से पूछा कि आपका सपना क्या है? तो एक ने जवाब दिया नौकरी करना। वहीं दूसरे ने कहा परिवार को सुख देना आदि आदि। इस केंद्र में वो सब चीजें सिखाई जाती हैं जो आईटीआई में कोर्स हुआ करती है। अंतर बस इतना है कि इन बच्चों से कोई भी शुल्क नहीं लिया जाता। अगर हमारे युवा सपने देख रहे हैं तो उन्हें पूरा करना हम नागर समाज की जिम्मेदारी बनती है।  
 

Thursday, March 8, 2018


कौशलेंद्र प्रपन्न
कल एक फ्रैंड का फोन आया उसका दाखिला दिल्ली विश्वविद्यालय में पीएचडी में हो गया है। ख्ुशी हुई। दोस्त है आखिर। पीएचडी करेगी। विषय पूछने पर जो बताया तब निराशा हुई। निराशा को साझा भी किया। आज की तारीख में विश्वविद्यालयों में होने वालों शोधों पर कितना समय और पैसे खर्च होते हैं इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है। कठिन तो यह भी नहीं है कि एक शोधकर्ता अपने जीवन का कितना अहम वक़्त शोध लिखने में लगाता है। उसके बदले उसे का़ग़ज के प्रमाण पत्र मिल जाते हैं। इसका और लाभ हो न हो समाज में दिखाने और नौकरी में थोड़ा और आगे जाने में मदद मिलती है।
यदि सम्मान की बात करें तो समाज में कोई ख़ास नहीं मिल पाता। डॉक्टर लिखने और बुलवाने में अच्छा तो लगता है। क्यों न लगे क्योंकि उसके लिए कम से कम पांच से छह साल तो छात्र खर्च करता ही है। उसके बाद क्या वह डॉ लिखने से भी चूके।
साहित्य शास्त्र कहता है कि किसी भी साहित्य की रचना के मकसद हुआ करती हैं। मसलन-अर्थ, प्रसिद्धी, समाज में सम्मान, भार्या प्रीति आदि आदि। सामान्यतौर पर साहित्य लेखन में और भी मकसदों को ध्यान में रखा जाता है। ठीक वैसे ही यदि पीएचडी के शोधों की बात करें तो इसमें भी मकसद तो होंगे ही। जैसे प्रसिद्धी, भार्या प्रीति, समाज में सम्मान आदि। लेकिन इससे एक कदम आगे बढ़कर समाज को क्या उस शोध से कोई मार्गदर्शन या बेहतर कार्ययोजना में मदद मिलती है? क्या शोध से समाज और देश को विकास करने में तर्कपूर्ण रणनीति मिल पाती है। सामान्यतः देखा यही जाता है कि आज की तारीख में शोध पुस्तकालयों और शोधार्थी की आलमारी में शोभा बढ़ाती हैं।
ख़ासकर भाषा, समाज विज्ञान, शिक्षा आदि क्षेत्र में हुए शोधों के शीर्षक शोध के मज़मून बता देते हैं। फलां शोध किस विषय को कवर करता है। मसलन कालिदास के साहित्य में वनस्पति और जीव जंतु, प्रेमचंद के साहित्य में स्त्री पात्र, जयशंकर प्रसाद की कविताओं में नारी चित्रण आदि आदि। क्या इन शोधों से समाज को कोई रोशनी मिलती है? क्या कोई दिशा मिलती है? कितने लोग उन शोधों को पढकर समाज को कुछ वापस लौटा पाते हैं? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनका उत्तर दिया जाना चाहिए।
कई शोध प्रपत्र बताते हैं कि भारत में होने वाले शोध ख़ासकर पीएचडी के वे कूड़े से ज़्यादा नहीं होते। उसमें भी भाषा घेरे में आती है। न केवल भाषा बल्कि अन्य मानविकी विषयों में कोई बेहतर स्थिति नहीं है। सवाल यह उठता है कि पीएचडी करने बाद क्या करने वाले की ज़िंदगी में कोई बड़ा बदलाव घटित हो जाता है या समाज में कोई अनहोनी घटना घटती है। शायद दोनों ही घटनाएं व परिणाम पोस्ट पीएचडी की ऐसी है जिससे अनुमान लगाया जा सकता है कि न तो समाज को और न ही साहित्य में कोई विशेष परिवर्तन दिखाई देता है। यदि स्वांतः सुखाए की गई है तो बात अलग है। पीएचडी करने में कोई आपत्ति किसी को भी नहीं हो सकती। बल्कि सवाल ज़रूर पूछा जाना चाहिए कि उस पीएचडी का औचित्य क्या है जिसका आम जिंदगी में इस्माल नहीं है। या जिससे समाज को कोई नई दृष्टि नहीं मिल पाती।

Monday, March 5, 2018

परीक्षा के डर पर चर्चा ए आम


कौशलेंद्र प्रपन्न
शायद पहली बार हुआ है कि जब प्रधानमंत्री, प्रेसिडेंट ने बच्चों को परीक्षा से पूर्व संवाद किया। संवाद करने के तरीके बेशक अलग थे। किन्तु संवाद तो स्थापित किया। इससे पहले किसी भी प्रधानमंत्री ने बच्चों की परीक्षा को शायद इस गंभीरता से नहीं लिया। यदि लिया होता तो बच्चों से संवाद भी करता। जो भी हो इस बार प्रेसिडेंट साहब ने भी परीक्षा से पूर्व बच्चों को बधाईयां एवं शुभकामनाएं दीं।
प्रधानमंत्री ने तो बाजाप्ता बच्चों से कांफ्रेंसिंग कॉल के ज़रिए संवाद स्थापित किया। इसमें केंद्रीय विदयालय और कॉलेज के छात्र भी शामिल थे। क्या उत्तर भारत, दक्षिण भारत, पूर्वोत्तर राज्य बल्कि जम्मू कश्मीर से लेकर लेह लद्दाख तक के बच्चों से जुड़कर परीक्षा बिना भय के संदेश संप्रेषित किया।
प्रो. यशपाल ताउम्र बच्चों को शिक्षा और परीक्षा बिना बोझ के लिए काम करते रहे। लेकिन आज तक तो बच्चे परीक्षा के भय से बाहर निकल सके। बल्कि प्रो. यशपाल जी ने तो नीतियों और समितियों के माध्यम से भी शिक्षा और परीक्षा को भय से मुक्ति दिलाने का प्रयास करते रहे।
आज तकनीक बदली है। संदेश प्रेषित करने के माध्यम बदले हैं। वैसे ही संदेश भेजने वाले का चेहरा भी बदला है। वह वह चेहरा है जो बच्चों में प्रिय बनने के लिए लालायित है। इतना ही नहीं विभिन्न राज्यों में शिक्षा के मार्फत घर घर बस्मे में पहुंच बनाना चाहता है।
साहब ने परीक्षा से पूर्व बच्चों से कहा कि परीक्षा में मुसकुराते हुए रहना। चिंता मत करना। लेकिन क्या ऐसा हो पाएगा? क्या बच्चे मुस्कुराते हुए परीक्षा भवन से बाहर आएंगे। अगर आ भी गए तो मई के अंतिम पखवाड़े में उनकी मुस्कुराहट खत्म हो जाएगी। उम्मीद तो की ही जा सकती है कि प्रधानमंत्री जी तब भी मन की बात करेंगे और कहेंगे चिंता मत करना। अगर फेल भी हो गए तो क्या अगला साल फिर बैठ जाना। अगर पास हो गए तो और भी अच्छा।
कितना अच्छा होता कि संदेश की बजाए ऐसी नीतियां बनतीं और उन नीतियों को अमल में भी लाया जाता जिनसे वास्तव में बच्चे चिंता और भय मुक्त हो परीक्षा दे पाते।

Thursday, March 1, 2018

मसान चारों ओर जहां चाहों खेलो होरी...


कौशलेंद्र प्रपन्न
शंकर को मसान की तलाश थी। शंकर थे तब उन्हें मसान ढूंढ़ना पड़ा होगा। अब शहर और गांव, महानगर चारां ओर मसा नही मसान है। कभी वक़्त था जब श्मशान शहर के बाहर हुआ करते थे। गांव या फिर कस्बे के सीमांत पर जला करती थी लाशें। अब तो शहर सिकुड़ते चले गए और मसान
शहर के अंदर ही आ गया।
इससे पहले की लोग धुत्त हो जाए कुछ समझदार लोगों से बात कर ली जाए। क्यों कल का असर आज से ही दिखने लगा है। एक दिन पहले ही बधाइयां भी आने लगी हैं। गोया मरना तो है ही क्यों न आज ही कफ़न ख़रीद कर रख लें। क्या पता कल को कफ़न के भाव बढ़ जाएं। लकड़ी और घी भी ख़रीदकर रख लेने में कोई हर्ज नहीं।
समझदार किस्म के लोग प्लान कर के लाइफ में चला करते हैं। ऐेसे लोग जीवन में सक्सेस होते हैं। चलिए हम भी थोड़े समझदार हो जाएं और मौत के सामना आज ही ख़रीद कर रख लें। होली में मसान क्यां जाया जाए? क्यों शंकर को मसान के लिए दर ब दर भटकना पड़े। उन्हें क्यों न शहर के भीतर ही मसान मुहैया करा दी जाए। सर्विस एट योर डोर।
अब तो मसान कहां नहीं है। कौन धुत्त नहीं है। क्या अस्पताल क्या स्कूल, क्या बैंक सब जगह मसान ही तो है। अस्पताल में ऑपरेशन उन अंगों का हो जाता है जो खराब नहीं है। स्कूल में बच्चे पढ़ने की बजाए मरने मारने जाते हैं। अब बताईए कौन धुत्त नहीं है। बैंक वाले अलग ही रो रहे हैं। बैकर को बीम बेचने कर अपना टॉरगेट पूरा करना होता है। टीचर को भी तो टारगेट मिलता है इतना प्रतिशत आना ही चाहिए। सो जैसे तैसे कर कर बच्चों को कूटते हैं।
सड़कों पर कौन पी कर नहीं चलता। सब होश को घर पर छोड़कर आते हैं। जैसे ही गाड़ी में खरोच आ जाए तो मर्डर किया जाता है। जब गाड़ी व्यक्ति से ज़्यादा अहम हो जाए तो बताईए और धुत्त नहीं है।
होली तो होली हम रोज़ ही रंगों की नहीं बल्कि ख़ून की होली खेला करते हैं। अभी अभी ख़बर आई है कि होली में सड़क पर हुड़दंग मनाना खतरे से खाली नहीं। साहब कहां हुड़दंगई नहीं है। संसद क्या इससे महरूम हैं। वहां भी रोज़ ही भाषाओं में खेला करते हैं होली। होली इज्जतों की। होली बिलों की और न जाने कैसी कैसी होली हो रही है।

शिक्षकीय दुनिया की कहानी के पात्र

कौशलेंद्र प्रपन्न ‘‘ इक्कीस साल के बाद पहली बार किसी कार्यशाला में बैठा हूं। बहुत अच्छा लग रहा है। वरना तो जी ...