Friday, April 27, 2018

भूल गया, भूल कैसे जाते हैं हम



कौशलेंद्र प्रपन्न
हमें अकसर सुनने को मिलता है कि यार भूल गया बताना। कैसे भूल सकता है कोई? क्यों हम भूल जाते हैं? भूलने के बाद डांट खाते हैं। लेकिन जो नुकसान होना था वह हो गया। यदि आपको बजट बनाकर अपने बॉस को भेजना था जिसे आपका बॉस किसी और के सामने पेश करने वाला था, अब उसकी स्थिति का अंदाजा लगा सकते हैं। वह डांट कर भी क्या कर लेगा। आनन फानन में उसे बजट व प्लांनिंग शीट प्रेजेंट करनी पड़ेगी। आपने तो सहजता से कह दिया शॅारी फाईल अटैव करना भूल गया। दरअसल आपने तो अपनी जिम्मदारी का प्रमाण दे दिया कि आपके अपने काम के प्रति कितने चौकन्न और जिम्मेदार हैं। आगे से आप पर विश्वास करने से पहले या काम देने से पहले कोई हज़ार बार सोचेगा। यानी आपने अपने लिए एक संभावना के दरवाजे बंद कर दिए। दूसरी बात हम भूलते तब हैं जब हमें उस काम या सूचना में कोई दिलचस्पी नहीं होती। हम उस काम में रूचि ही नहीं लेते। क्योंकि यदि हमारी रूचि होती। यदि हम अपनी जिम्मदारी व लावबदेही समझते तो भूलते ही नहीं। यह कोई मैनेजमेंंट का फंडा नहीं बल्कि आम जीवन की कहानी है। लेकिन जब सिस्टम में काम करते हैं तो सूचना, ख़बर आदि को तत्काल या सही समय परख् सही व्यक्ति तक पहुंचाना बेहद ज़रूरी होता है। इसलिए भूलें नहीं बल्कि जो बात, ख़बर जिसे देनी हैं उसे उसी समय पर, उसकी आवश्यकता के अनुरूप दे देनी चाहिए।
कोई ख़बर है तो उसे सही तरीके से बिना किसी पूर्वग्रह के पाठकों तक पहुंचाना सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती है। पत्रकार अपने इस काम में बेहद चौकन्ना और जिम्मेदार होता है। मान लीजिए पत्रकार के पास कोई ख़बर आई, किसी प्रकार की सूचना उसे मिली जिससे बेहतर ख़बर बन सकती है वह उस ख़बर को अपने पास रख ले। या फिर तय समय सीमा में स्टोरी में तब्दील न कर देर से दे तो वह ख़बर मर जाएगी। वह ख़बर पुरानी हो जाएगी। अगले दिन हो सकता है उस ख़बर को फॉलोअप करना पड़े। लेकिन पत्रकार ने अपनी लापरवाही या गै़रजिम्मेदाराना रवैए से एक ख़बर की हत्या कर दी। उसी प्रकार हम सबके पास कहने और सुनाने को बहुत सी ख़बरें होती हैं। यदि हम उन्हें सही समय पर और सही तरीके से पाठक या श्रोता तक नहीं पहुंचाएं तो यह प्रकारांतर से ख़बर के साथ न्याय नहीं होगा।
यह तो बात पत्रकारिता की हुई। उसी प्रकार यदि किसी प्रोजेक्ट की बात करें तो कई सारी सूचनाएं, ख़बर, जानकारी ऐसी होती हैं जिसपर तत्काल कदम उठाने होते हैं वरना प्रोजेक्ट की डेड लाइन प्रभावित हो सकती है। ऐसे में प्रोजेक्ट मैनेजर अपने रिपोटिंग व्यक्ति पर काफी हद तक निर्भर रहता है। जैसे ही कोई ऐसी सूचना आई जिसे बिना देरी किए प्रोजेक्ट मैनेजर या प्रोग्राम मैनेजर को मालूम होनी चाहिए उसे उस खबर से अपडेट होना होगा। ऐसे में मानवीय भूलें या भूल भी काफी मायने रखती हैं। कई बार व्यक्ति अनुमान लगा लेता है कि उन्हें तो पता ही होगा। उन्हें कल बता दूंगा। कल नहीं तो मिल कर बता दूंगा आदि। उस व्यक्ति को उस सूचना की गंभीरता नहीं मालूम कि उस ख़बर से प्रोजेक्ट पर ख़राब असर पड़ सकता है। इसलिए कई बार प्रोजेक्ट मैनेजर को आने तई फॉलोअप करना होता है। बार बार पूछना होता है उस प्रोजेक्ट का क्या हुआ? कल की प्लानिंग के अनुसार सार चीजों की तैयारी हो गई या कोई अड़चने आ रही है? आदि। कायदे यह काम रिपोटिंग व्यक्ति की है। क्यों प्रोजेक्ट मैनेजर को फॉलोअप करना पड़ रहा है। यदि व्यक्ति अपडेट लगातार देता रहे तो फॉलोअप करने की आवश्यकता ही नहीं होगी।
मैनेजमेंट में या कहे लें कॉम्यूनिकेशन के क्षेत्र में ख़बर, सूचना को लेकर कुछ महत्वपूर्ण बातें कहीं जाती हैं। संप्रेषण सही समय पर, समुचित व्यक्ति को, सही तरीके से दी जानी चाहिए। किसी कितनी सूचना की आवश्यकता है, कब ज़रूरत है, क्यों ज़रूरत है? क्या वह सूचना उसी के लिए है या किसी और को भी दी जात सकती है आदि को ध्यान रखना होता है। क्योंकि कई बार हम अपनी जिम्मदारी से बचते हुए सही व्यक्ति को ख़बर करने की बजाए किसी और को सूचित कर अपनी जिम्मेदारी बच जाते हैं। जबकि हर ख़बर, सूचना का एक अधिकारी होता है। उसे किसी भी सूरत में वह ख़बर मिलनी ही चाहिए।
एक्टिव कम्यूनिकेशन, प्रो एक्टिव कम्यूनिकेशन, जिसे सक्रिय, निष्क्रिय, तत्पर, आदि के नाम से पुकार सकते हैं। यानी कुछ ऐसे व्यक्ति होते हैं जो ख़बर व सूचना को तत्परता और तत्काल सही व्यक्ति तक सूचना पहुंचा देता है। वहीं कुछ ऐसे भी होते हैं जो थोड़ी सुस्ती बरतते हुए ख़बर पहुंचाया करते हैं। वहीं ऐसे भी लोग होते हैं जिन्हें ख़बर को दबाकर बैठने में आनंद आता है। कई बार ऐसे भी व्यक्ति मिलेंगे जिन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनकी लापरवाही ख़मियाज़ा कई बार पूरी कंपनी, मीडिया हाउस को भुगतना पड़े।
आम जीवन में ही देखें। हमारे पास रोज़दिन विभिन्न सेशल मीडिया के ज़रिए हज़ारों की संख्या में सूचनाएं, जानकारियां हमारे हाथख् आंखों में ठूंसा जाता है। उन खबरों, सूचनाओं के साथ हमारा क्या बरताव होता है? हम किस तरह से पेश आते हैं ख़ासकर फोन पर मिलने सूचनाओं के साथ? कुछ ख़बरें, नज़रअंदाज़ की जाती हैं, कुछ से बेहद परेशान हो चुके होते हैं, कुछ को तो ओपन भी नहीं करते। वहीं कुछ ऐसी ख़बरें होती हैं जिन्हें पढ़कर आपको एहसास होता है कि अच्छा! तो यह हो रहा है आदि। इस प्लेटफाम पर दो किस्म के लोग मिलेंगे। पहला, आपकी सूचनाओं, संदेशों का आनंद तो लेते हैं किन्तु कभी अपनी राय, इच्छा अनिच्छा, पसंदी नापसंदगी आदि से वाकिफ नहीं कराते। उनके लिए सूचना का आना न आना कोई मायने नहीं रखता। इसे ही निष्क्रिय संदेश प्राप्त कर्ता कह सकते हैं। जो पढ़ तो लेते हैं लेकिन कोई राय नहीं देते। अपनी पंसदगी से परिचित नहीं कराते। ऐसे में व्यक्ति एक समय के बाद संदेश भेजना बंद कर देता है। यहीं से शुरू होती है कम्यूनिकेशन गैप, संवाद हीनता।

Thursday, April 26, 2018

इतिहास की यात्रा में सावधानियां


कौशलेंद्र प्रपन्न
इतिहास केवल समाज, देश,काल का ही नहीं होता बल्कि इंसानों का भी होता है। हम अपने इतिहास से कितना भी दूर भाग लें या फिर भागने की कोशिश करें इतिहास हमारा पीछा किया करता है। इतिहास भी तो एक कहानी सी ही है। इसमें तारीख़ें होती हैं। तारीख़ के साथ कुछ घटनाएं होती हैं। उन घटनाओं में कोई पात्र भी तो होता है। हमें उस पात्र से मुहब्बत हो जाती है ज बवह पात्र हंसता है तो हंसते हैं। जब वह रोता है तो देखने वाला रोता है। इंसानों के साथ भी ऐसे पात्र हमेशा ही चला करते हैं। कई बार कुछ पात्र इतने वाचाल हो जाते हैं कि हमारे लिए ही मुश्किलें पैदा हो जाती हैं।
हमारे साथ यही तो एक ख़ास बात है कि हमें इतिहास और अतीत बेहद प्यारा होता है। जब देखो तब हम अपने अतीत को लेकर बैठ जाते हैं। आज की चुनौतियों को कल के औजार से ठीक करने की कोशिश करते हैं। जबकि ऐसा संभव नहीं है। अतीत की घटनाएं, भूलें आज के संदर्भ में एकदम नए आयाम में आती हैं। उनसे उलझने व बाहर आने के औजार भी नए होने चाहिए। लेकिन अफ्सोस कि हम पुराने औजारां से आज की चुनौतियों का समाधान करना चाहते हैं।
इतिहास ख़ासकर इंसानों के साथ हमेशा ही दो तरीके से साथ रहा है। पहला जिसमें हम गौरवान्वित महसूस करते हैं। उसी अतीतीय संवेदना में जीना चाहते हैं। उसे बाहर निकालना ही नहीं चाहते। इसी का परिणाम होता है कि हमारे जीवन के मुहावरे, घटनाएं, कहानियां भी एक ही होने लगती हैं। सुनने वाला कहता है कि फलां कहानी तो आपने तब सुनाई थी। अगर कोई और कहानी हो तो सुनाओ। पक चुके हैं आपकी एक ही कहानी सुन सुन कर। यह अकसर बच्चे अपने मां-बाप या दादा दादी को बोल दिया करते हैं। क्योंकि उनके पास कहने का नया कुछ बचा नहीं होता। अपने ही अतीत को बार बार कुरेद कर आनंद लिया करते हैं।
जब तब कहानी में रोचकता और नयापन न हो तब तक कोई भी सुनने वाला आपमें दिलचस्पी नहीं लेगा। इतिहास भी कुछ कुछ ऐसा ही है। यदि इतिहास का आज की तारीख़ में बता रहे हैं तो पुरानी घटनाओं को आज किस रूप में हमें देखने और सीखने की आवश्यकता है इसपर सोचना होगा। लेकिन हम ऐसा ही नहीं करते। जब हम युवा थे। कॉलेज में पढ़ा करते थे तब कह कहानियां हम अपने बच्चों को साझा किया करते हैं। अपने संघर्षों की कहानी से हमें तो रागात्मक संबंध हो सकता है कि लेकिन सुनने वाले को वही दिलचस्पी हो ऐसी उम्मीद नहीं कर सकते।
इतिहास दरसअल हमें तत्कालीन चुनौतियों,समाजो-सांस्कृतिक हलचलों, परिवर्तनों के बारे में न केवल जानकारी मुहैया कराया करती है। बल्कि हमें आज कैसे वैसी घटनाओं व परिस्थितियों से सामना करना चाहिए इसकी समझ प्रदान करता है। इतिहास व अतीत गमन कोई बुरा नहीं है बल्कि हम कैसे इतिहास में जाकर वहां से सकुशल लौटते हैं यह कुशलता हमें सीखने की ज़रूरत है। इतिहास व अतीतीय यात्रा जितना आसान माना जाता है वह उतना ही कठिन काम भी है। क्योंकि अतीती यात्रा के साथ एक दिक्कत यह है कि हमें अतीत बेहद रोचक लगने लगता है और हम वहीं रहना चाहते हैं। जबकि कायदे से देखा जाए तो जिस प्रकार एक यात्रा अपनी यात्रा से लौट आने के लिए करता है। यदि राहगीर या यात्री रास्ते में या फिर यात्रा में अटक जाएगा तो वह आगे की यात्राएं नहीं कर पाएगा। इतिहास में भी यही होता है हम चले तो आसानी से जाते हैं लेकिन वापसी के लिए चौकन्ने रहना पड़ता है। हमें हमेशा यह याद रखना होता है कि यात्रा के बाद हमें वर्तमान में लौटना भी है। आज की तारीख़ी हक़ीकत को नज़रअंदाज़ करना इतिहास हमें नहीं सीखाता बल्कि इतिहास वह रोशनी प्रदान करता है जिससे हम आज और आने वाले समय का बेहतर बना सकते हैं।

अपने दायरे और सीमा की पहचान



कौशलेंद्र प्रपन्न
हमें हमारे दायरे की पहचान नहीं होती। हमें यह भी नहीं मालूम होता कि हमारी सीमाएं क्या हैं? हमारी क्षमताएं क्या हैं आदि। हम क्या कर सकते हैं और किस हद तक कर सकते हैं इसकी समझ हो तो हमें अपने जीवन में अपने लिए योजना बनाने, सपने देखने में  आसानी होती है। लेकिन अफ्सोसनाक बात यही है कि अधिकांश लोगों का अपनी सीमाओं, क्षमताओं, ताकत एवं दायरे के बारे जानकारी नहीं होती। यह अलग बात है कि क्षमताएं और दायरे बढ़ाई भी जा सकती हैं। लेकिन उसके लिए हमें अतिरिक्त समय, क्षमता, प्रयास और इच्छा शक्ति को बढ़ाने की आवश्यकता पड़ती है। अपनी क्षमता, सीमा और दायरे की चौहद्दी को चौड़ी भी की जा सकती है बशर्ते की हम अपनी कार्यशैली और कार्य दक्षता को समय समय पर मांजा करें और सीखने के लिए तैयार रहें।
हमें कई बार जीवन में अपने दायरे से बाहर भी निकलना होता है। बल्कि निकल कर औरों की ज़िंदगी, कार्य, कार्यशैली को देखने, समझने की आवश्यकता पड़ती है। क्योंकि कोई भी पूर्ण नहीं होता। हमें इसी जीवन में इसी समाज में सीखने का अवसर मिला हुआ है। यह हम पर निर्भर करता है कि हम नई सोच, नए योजनाओं, परिवर्तनों को कितनी उदारता के साथ स्वीकार कर रहे हैं और अपने दायरे से बाहर निकल कर समझने के लिए ख़ुद को तैयार कर रहे हैं।
पिछले दिनों अपने दफ्तर में कार्यरत फाइनांस और एडमिन दे रहे व्यक्ति से बातचीत का मौका मिला। बल्कि दूसरे शब्दों में कहें तो मैंने पहल की कि ज़रा दूसरों के काम को भी समझा जाए। क्योंकि अपने काम के दायरे से बाहर निकल कर दूसरों के कार्य क्षेत्र के बार में अपनी समझ बनाई जाए। वह व्यक्ति भगत हो सकता है, मदन हो सकता है या फिर नाम तो बदलते ही रहेंगे जो चीज नहीं बदलेगी वह है काम और काम की प्रकृति। सो बातचीत में कई सारी बारीकियों सा साबका पड़ा। मालूम चला व्यक्ति बेशक व्यवस्थित तौर पर प्रबंधन का कोर्स न किया हो लेकिन काम करने के दौरान कई सारी दक्षताएं स्वतः ही काम करने की शैली में शुमार हो जाती हैं। जिसे सिद्धांत के तौर पर बाद में पढ़ सकते हैं। हमें में से कई सारे लोग हैं जो निश्चित ही प्रबंधन के कोर्स से नहीं गुजरे होते हैं। लेकिन जिस शिद्दत और दक्षता से काम करते हैं उससे लगता है काश! इनके साथ कुछ देर बैठ कर बात ही कर लें। एक घरेलू महिलाएं व व्यक्ति जिस प्रकार से माह के खर्चों, ख़रीद फरोख़्त आदि की प्लानिंग करता है ताकि ज़रूरत की चीजों भी न घटें और बीच बीच में आने वाली अनप्लान्ड प्रोग्राम भी मैनेज हो जाएं ऐसी प्लानिंग एक एडमिन और फाइनांस के व्यक्ति को करना होता है।
उन्होंने वह शीट भी दिखाई जो वो पूरे साल की बजटीय प्रावधान कर रखा था। साथ ही किस प्रकार से अनप्लान्ड बजट व खर्चे को मैनेज करना है किन मदों में आबंटित करना आदि की प्लानिंग देखकर लगा यह व्यक्ति कितने कामों के बीच रहा करता है लेकिन कभी शिकायत नहीं करता। कभी ऊबा नहीं करता। दरअसल हम अपने काम में तभी उलझे रहते हैं, तभी शिकायत करते हैं जब हम अपने काम को रोज़ाना और हप्ते, माह और साल में समुचित और योजनाबद्ध तरीके से व्यवस्थित नहीं करते। यदि हम अपने काम को सही प्लानिंग करें और बीच बीच में उसका मूल्यांकन भी करते रहें कि कितनी दूरी तय हो गई। कितना और चलना है? बची हुई दूरी को कैसे कम समय में व तय समय सीमा में पूरा करना आदि की पड़ताल करते हुए चलेंगे तो कभी भी काम को बोझ हम पर सवार नहीं हो सकता। दिक्कत यहीं आती है कि जब एक कामगर व छात्र अपने लिए दिन, सप्ताह, माह और साल की योजना बनाता है तब वह रास्ते में आने वाली अड़चनों, रिस्कों का अनुमान नहीं कर पाता। अनुमान कर भी लेता है तो उसके प्रति लापरवाह हो जाता है।
यदि हमें अपनी सीमाओं और दायरे का अनुमान हो और अपनी क्षमताओं का एहसास हो तो हम उसी के अनुसार अपने लिए मिशन और विज़न तय करेंगे। लेकिन हम अपने आप में इतने स्पष्ट नहीं होते कि अपनी क्षमताओं और दायरे की पहचान में समय लगाएं। बस दूसरे क्या कह रहे हैं? उनके सपने व दायरे क्या हैं? आदि को जानने और आलोचना करने में वक़्त ज़ाया किया करते हैं। कितना बेहतर हो कि हमें हमारे दायरे और सीमाओं का एहसास हो और उसके अनुसार हम अपने और कंपनी के लिए कार्ययेजना बनाएं तो कभी भी जीवन और कार्य में विफल नहीं हो सकते।


Wednesday, April 18, 2018

अभिमन्यू हो गया उदास



कौशलेंद्र प्रपन्न
आप सब की यादाश्त बहुत तेज है। अभिमन्यू की पूरी जन्मकुंडली जानते हैं। कब पैदा हुआ। किसका बेटा था। क्यांकर मारा गया आदि आदि। वह कोई और अभिमन्यू था। जो गर्भ में ही ज्ञान और समझ पा चुका था। आपको तो यह भी याद होगा कि उसे चक्रव्यूह से निकलने का रास्ता नहीं मिल सका तो उसके पीछे क्या वजह थी। शायद यही वज़ह है कि अभिमन्यू की मृत्यू होती है। बल्कि आज के शब्दों में कहें तो हत्या की गई।
आपको क्या लगता है वह सिर्फ और सिर्फ एक ही अभिमन्यू रहा जिसकी हत्या की गई? ज़रा विचार कीजिए। यदि आपके पास सोशल मीडिया से वक़्त मिल जाए तो। यदि समय हो तो विचार कीजिएगा। हमारा अभिमन्यू आज भी जूझ रहा है। कई सारे कौरवों की फौज उसे रेजदिन घेर कर मार रही हैं। वह निहत्था असहाय मरने को मजबूर है।
कश्मीर में क्या हुआ? बिहार में क्या हुआ? उत्तर प्रदेश में ही देख लीजिए सिर्फ भूगोल अलग हैं। जगहें अलग हैं। वारदात तो एक है। मारा तो अभिमन्यू ही गया। वह लड़की थी। जो ख़ुद को कौरवों से बचा न सकी। बचना तो वह भी चाहती थी। उसे भी अपनी जिं़दगी प्यारी थी। वह भी हौवानों से बचकर अपने घर पाप के पास जाना तो चाही होगी। मां की याद तो उसे भी आई होगी। अभिमन्यू की मां की तरह उसकी मां सोई नहीं होगी बल्कि इंतज़ार कर रही होगी कि उसकी बुधिया वापस आएंगी।
वह बुधिया लौट कर नहीं आई। वह आज की अभिमन्यू बन गई। बनना उसकी चाहत या चुनाव नहीं था बल्कि मजबूरी थी। न चाहते हुए भी उसे शिकार होना ही था। लेकिन कौरवों को कोई भी रोक न सका। आप ही देखें कश्मीर की घटना से पहले दिल्ली दहल गई थी। उस घटना की थरथराहट वैश्विक स्तर पर महसूस की गई। लेकिन अभी भी कौरवां की सेना यूं ही अभिमन्यू को शिकार बना रहे हैं। कभी चाकलेट के प्रलोभन पर कभी घूमाने के नाम पर किन्तु गुमराह तो हमारी बेटियां ही हो रही हैं।
हमने बच्चों की सुरक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा प्रदान करने की घोषणा वैश्विक स्तर पर 1989 में यूएन में की थी। लेकिन आज भी हमारे बच्चे न तो सुरक्षित हैं और न ही स्वस्थ्य। हां हमने इन तीस सालों और कुछ किया हो या नहीं लेकिन विकास ज़रूर किया। फ्लाईओवर से शहर को पार कर दिया। पूरे शहर को सोशल मीडिया पर अपलोड कर दिया। जब शहर सोशल मीडिया पर लाइक और शेयर करेगा तो भावनाएं भी भी शेयर होंगी। भावनाओं का क्या है यह तो समय और व्यक्ति के अनुसार बदला करती हैं। हमारी नज़र में तो अस्सी साला महिला और आठ साला बच्ची दोनां ही बस हवस, सेक्स और यूज की वस्तु भर हैं।
काश! हम सोशल मीडिया पर भावनाओं को उडेलने की बजाए हक़ीकत में कुछ सोच और कर पाते। हालांकि आप कहेंगे मैं क्या कर रहा हूं। मैं भी तो उसी मंच का प्रयोग का कर रहा हूं। लेकिन दोनों में एक बुनियादी अंतर है। वह यह कि यहां लाइक और कमेंट की उम्मीद नहीं है। बल्कि आपसे महज इतनी सी गुजारिश है कि यदि आज भी हम ठान लें कि कम से कम मैं अपनी आंखों के सामने किसी भी अभिमन्यू की हत्या नहीं होने दूंगा। कोशिश करूंगा कि अपनी नागरीय जिम्मदारी निभाउंगा। तो काफी हद तक हम अपने अभिमन्यू को बचा सकें। वरना अभिमन्यू उदास सा सोचता रहेगा कि काश मैं बाहर ही नहीं आता। 

Monday, April 16, 2018

कॉपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व और शिक्षा



कौशलेंद्र प्रपन्न
शिक्षा के क्षेत्र में सरकार की मदद के लिए नागर समाज आगे आ चुका है। इनमें सरकारी और गैर सरकारी संस्थाएं बढ़ चढ़ कर हिस्सा ले रही हैं। क्योंकि सरकार शिक्षा में बेहतर स्थिति पैदा करने के लिए तत्पर है। लेकिन अफ्सोस कि सरकारी तंत्र एक सीमा के बाद असहाय हो जाती है। इसे ऐसे समझ सकते हैं कि सरकार ही है जिसने 1990, 2000 में विभिन्न वैश्विक मंचों पर स्वीकार कर चुकी हैं कि हम प्राथमिक शिक्षा में विश्व बैंक और नागर समाज की मदद चाहते हैं। इसी का परिणाम है कि आज हमारे देश में सर्व शिक्षा अभियान, राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान आदि अन्य संस्थानां की मदद से सरकारी स्कूलों में अपना योगदान दे रहे हैं। किन्तु जमीनी हक़ीकत यह है कि ये तमाम योजनाएं स्कूली शिक्षा में गुणवत्ता लाने में काफी नहीं हैं। यही कारण है सरकार को कॉपोरेट व कंपनी जो मुनाफा कमाती हैं। उनके लिए सामाजिक उत्तरदायित्व में काम करने के लिए कानून बना कर आमंत्रित किया गया। यही वज़हें हैं कि आज की तारीख़ में देश में विभिन्न कंपनियां कॉपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के तहत स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार आदि के क्षेत्र में काम कर रहे हैं।
टेक महिन्द्रा फाउंडेशन पिछले तकरीबन दस सालों से देश के विभिन्न राज्यों में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के क्षेत्र में काम कर रहा है। चेन्नई,मुंबई, हैदराबाद, दिल्ली, भुवनेश्वर, कोलकोता आदि जगहों पर इन सर्विस टीचर एजूकेशन इंस्टीट्यूट चला रही है। दिल्ली में पूर्वी दिल्ली नगर निगम के साथ मिलकर इन सर्विस टीचर एजूकेशन इंस्टीट्यूट की स्थापना 2013 में की गई। इस संस्थान ने पिछले पांच वर्षों में तकरीबन 6888 शिक्षकों की विभिन्न विषयों में प्रशिक्षण दे चुकी है। साथ ही निगम के स्कूलां में कार्यरत प्रधानाचार्यां की भी ट्रेनिंग संस्थान कर में संपन्न हुआ है। इसी दिल्ली में स्मार्ट हेल्थ केयर एकेडमी भी टेक महिन्द्रा फाउंडेशन के द्वारा स्थापित किया जा चुका है। जहां से बच्चे अस्पतालां में सहायक, डेटा रिकार्ड, ऑपरेशन थिएटर सहायक आदि के कोर्स करने के बाद विभिन्न अस्पतालों में रोजगार पा चुके हैं।

दरअसल शिक्षा की बेहतरी के लिए देशभर में भरपूर काम हो रहे हैं। कमी यही रह जा रही है कि जो लोग व संस्थान प्राथमिक शिक्षा में शिक्षकों के साथ मिल कर काम कर रहे हैं उन्हें न तो कोई पहचान पाते हैं और न ही उनकी मेहनत को रेखांकित किया जाता है। टेक महिन्द्रा फाउंडेशन के साथ मिल पुणे में ग्राममंगल, हैदराबाद में साहित्या ट्रस्ट, टीस आर ध्वनि बंगलुरू में, नवनिर्मिति और सेव द चिल्ड्रेन इंडिया मुंबई आदि स्थानीय प्रशासन से मिल कर सरकारी स्कूलों में शिक्षकों, बच्चों के साथ स्कूलां में काम कर रहे हैं।
वर्तमान सरकार लगातार कौशल विकास पर जोर दे रही है। वह कौशल विकास न केवल बच्चों और  युवाओं भर के लिए है। बल्कि टीचर की भी दक्षता विकास करना बेहतर ज़रूरी है। यही कारण है कि दिल्ली में मिशन बुनियाद, बच्चों में पढ़ने की दक्षता विकास, टीचर की प्रोफेशन डेवलप्मेंट को लेकर गंभीरता से काम हो रहा है। हो भी क्यों न तमाम रिपोर्ट, नेशनल एचिवमेंट रिपोर्ट, डाइस, जीईएमआर आदि बताती हैं कि हमारे बच्चे साधारण से वाक्य तक नहीं पढ़ पाते। गणित के सामान्य के जोड़ घटाव नहीं कर पाते। ऐसी स्थिति में टीचर के साथ कंटेंट पर काम करने की बज़ाए कैसे पढ़ाएं पर काम करने की आवश्यकता है।

Saturday, April 14, 2018

उत्सव पैसे और मजा



कौशलेंद्र प्रपन्न
हम सब अपनी जिं़दगी के एकरसता को तोड़ना चाहते हैं। सब के अपने अपने तरीके होते हैं। कोई दोस्तों के साथ टहल आता हैं। कोई फिल्म,नाटक देखकर मन को बहला लेता है। खेल तो ख़ैर धीरे धीरे कम ही होते जा रहे हैं। यदि कोई खेलते दिखाई दे जाए तो सुनना पड़ता है यार यह भी कोई उम्र है खेलने की। अब तो मैच्योर हो जाओ। और किसी और के कहने पर हम खेलना छोड़ देते हैं। हमारे जीवन से कुछ ख़ास चीजें बड़ी ही तेजी से ग़ायब हो रही हैं। खेल, मनोरंजन, मिलजोल की चाह आदि। हम जैसे जैसे नागर समाज का हिस्सा होते जा रहे हैं वैसे वैसे अकेला भी होते जा रहे हैं। हम अपनी शामें घर में टीवी के सामने गुजारते हैं। या फिर सप्ताहांत में किसी मॉल में टहलते, बिन ज़रूरतों की शॉपिंग करते गुजार देते हैं। शामें और सप्ताहांत हमारा लोगों, रिश्तेदारों से मिलने में नहीं अकेले गुज़रा करता है। पैसे की तो चिंता ही नहीं। हम बड़ी सहजता से एक बैठक में पांच सौ हज़ार या दो हज़ार खर्च कर देते हैं।
उत्सव हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा रहा है। बस माध्यम और स्वरूप अलग अलग रहे हैं। समय प्रमाण है कि हमें अपने जीवन की मनोभाविक, समाजोसांस्कृतिक एकरूपता को तोड़ने के लिए विभिन्न अवसरां पर विशेष आयोजन किया करते थे। यह एक बहाना था स्व और परिजनों से मिलने का। लेकिन जैसे जैसे हम नागर समाज का हिस्सा होते गए हैं वैसे वैसे मॉल या घूमने में आनंद तलाशा करते हैं। आपने भी अनुभव किया होगा कि आज हम दिखावे में ज़्यादा जीया करते हैं। जिन चहजों के बगैर भी काम चल सकता है लेकिन हम सामानों से घर भरना सीख चुके हैं। जैसे जैसे हमने घर भरा है वैसे वैसे हम अंदर से ख़ाली होते जा रहे हैं।
किसी के भी जीवन में बच्चे की किलकारी बहुत रोमांचक अनुभव से कम नहीं हेता। हर किसी को इस पल का इंतज़ार रहा करता है। और यदि ऐसे नहीं हुआ तो उनका जीवन एकरेखीय एकांगी सा हो जाता है। ऐसा कहते हैं। लड़कियों का सामाजिकरण ऐसा ही होता है कि यदि वे मातृत्व सुख से वंचित हैं तो उनका जीवन बेकार और ठूंठ है। जबकि इस अवधारणा से उबरने की आवश्यकता है। ज़रूरत तो इस बात की भी है कि हमें बच्चों के न होने की स्थिति में ग़मज़द होने की बजाए जीवन में उत्सव और आनंद के अन्य रास्तों के राही बनना चाहिए।

Tuesday, April 10, 2018

उनके आने से पहले...


कौशलेंद्र प्रपन्न
घर में कोई आने वाला हो तो मंज़र देखने लायक होता है। घर का कोना कोना साफ हो जाता है। घर के सभी लोग सफाई अभियान में लग जाते हैं। घर का कोना कोना वाह से आह!!! करने लगता है। बच्चे तो बच्चे बड़े भी साफ सफाई करते नज़र आते हैं। डाइनिंग टेबल पर लंबे समय से लेटे किताबें, दवाई की डिबिया, अख़बार सब के दिन बिहुर जाते हैं। सब अपनी अपनी जगहों पर शोभने लगते हैं।
कई तरह की ऐसी भी चीजें हाथ लग जाती हैं जो कई बार की ढूंढीया पसारने के बाद भी गुम थे। वो भी आंखें फाड़े नजर आने लगते हैंं। सफाई का एक लाभ तो यह होता ही है कि ऐसी फाइलें, किताबें, कागज पतर सब मिल जाया करते हैं। काश कि हर हप्ते कोई न कोई आए।
लेकिन कहां संभव है रोज़ और हर हप्ते किसी की ख़ातिरदारी करने की। ख़ातिरदारी से ज़्यादा सामानों की लिस्ट बनाने दस बार बाज़ार जाने के बाद भी कुछ सामान रह ही जाते हैं उनके लिए डांट खाओं और डांट से पेट भर जाए तो उसपर कॉफी के रूप में यह मिलता है कि कितना अच्छा लगा रहा है। तुम्हें तो ऐसे ही गंध कबाड़े में रहने की आदत सी हो गई है।
कभी तो कहा करते थे मुझे गंदे में रहा नहीं जाता और अब यह आलम है कि जब तक कोई घर में आने वाला न हो तो जो चीजे दस दिन पहले जहां थी वहीं पड़ी रहती है। कितनी बार कहा फला बैग कई दिनों से तुम्हारी राइटिंग टेबल के नीचे सुस्ता नहीं है उसे उपरी आलमारी में रख दो मगर सुनना कहां है। हां अख़बार पूछो, पत्रिका पूछो या पूछ लो किताब तो इनकी सारी जगहें पूरी शिद्दत से बता दोगो। बोलो याद है कि नहीं।
ठीक इसी तर्ज़ पर जब किसी संस्थान में या फिर आफिस में कोई अधिकारी आने वाले होते हैं तब भी घर जैसा ही अफरा तफरी मच जाया करती है। इसे सजाओ, इस बोर्ड को उेकोरेट करो, फला फाईल वहां होनी चाहिए। इस चेयर का एंगल चेंज करे आदि आदि। देखते ही देखते पूरा संस्थान चमक जाया करता है।
साहब के आने से पहले पूरे संस्थान पर सब एक टांग पर खड़े भाग रहे होते हैं। बॉस की सांसें भी टंगी रहती हैं। पता नहीं कौन सा कोना संस्थान की हक़ीकत बता दे। किस बात पर सुनना पड़ जाए। जैसे ही उनका जाना होता है सब की सांसें सामान्य चलने लगती हैं। यह तो दस्तूर है प्यारे किसी के आने से पहले और जाने बाद स्थितियां सामान्य ढर्रे पर आने लगती हैं।
कितना अच्छा हो कि किसी के आने पर ही हमारी प्रेजेटेबल स्थिति को क्यां ठीक की जाए। क्यां न इसे हम अपनी आदतों शामिल कर लें। फिर चाहे कोई भी आए चाहे मोहतरमा हों या फिर मोहतरम। चीजें अपनी जगहों पर ही फबा करती हैं। अब आप ही बताएं किताबें, अख़बार, चाय की प्याली यूंह र जगह पर पड़ी, बिखरी अच्छी लगती हैं भला? एक बार व्यवहार में शामिल हो जाए तो फिर संस्थान में कोई आए या घर में अफरा तफरी नहीं मचती।

Monday, April 9, 2018

जब आप नहीं होंगे दफ्तर में तो...



कौशलेंद्र प्रपन्न
कुछ भी नहीं होगा। होना क्या है? कुछ लोगों के लिए आपका न होना होने से ज़्यादा मायने नहीं होगा। कुछ के लिए शायद सुबह की सांसों जैसी होगी। संभव है कुछ के लिए कल शाम की फाईल और सिस्टम की तरह होंगे आप। जिसे कल सटडाउन कर दिया गया। रोज़ दिन की नई चुनौतियां और कामों के बीच शायद ही कोई याद करे। करे भी तो शायद अच्छे के लिए कम आपकी कमियां और कुछ ख़राब आदतों के लिए याद किए जाएंगे। अगर विश्वास नहीं तो कभी कुछ दिनों के लिए आफिस के दूर होकर तो देखिए।
वैसे भी किसी के होने या न होने से दफ्तर जैसे जगहों को कोई ख़ास फ़र्क नहीं पड़ता। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि आप न होंगे तो कोई काम रूक जाएगा। या कुछ प्रोजेक्ट थम जाना है। हां बस अंतर इतना ही पड़ेगा कि आपकी सीट पर कोई और हुआ करेगा। होते ही आपकी तमाम चीजों को पहले ख़ारिज करेगा। आपने डिसिजन को ग़लत बताकर अपनी बात और राय को स्थापित करना चाहेगा। यदि ऐसा नहीं करेगा तो उसे कौन पूछेगा। हर बात पर सुनना होगा कि फला जी ऐसे करते थे। ऐसे कहा करते थे। क्या काम किया करते थे आदि। सो सबसे पहले आपकी सीट पर आने वाले/वाली आपके कामों को ख़ारिज़ करने में लगेंगे।
सच पूछिए तो आपही तो नहीं होंगे। आपकी आदतें कहीं न कहीं किसी न किसी कोने में या फिर किसी की स्मृतियां का हिस्स हुआ करेंगी। आप होंगे लेकिन कुछ ऐसे वाकयों पर जब आपही छा जाया करते थे। तब आवाज़ किसी और की होगी तब आप याद किए जाएंगे। तब याद किए जाएंगे जब आपकी आवाज़ को कोई और रिप्लेस किया करेगा। फिर कोई कहानी नहीं सुनेगा। क्योंकि उसे कहानी नहीं बल्कि लोगों को क्या सुनाना है इस कला में दक्ष हैं।
फ़र्ज कीजिए आपको अपने होते तरह तरह के व्यंग्य सुनने को मिले और हर वक़्त टांग खींचाई की जाती हो। तो आप खुश भी हो सकते हैं कि कम से कम आपकी चर्चा तो होती है। आप हैं ही ऐसे जिसपर चर्चाएं हुआ करती हैं। चर्चाएं उन्हीं की तो हुआ करती हैं या तो वे अच्छी होती हैं या फिर...।
कुछ है हमारे आप-पास जो कभी नहीं बदला करता। न तो किसी की आदतें अचानक बदल जाती हैं और न किसी की आवज़ इतनी जल्दी बदल जाया करती है। कहते हैं कुछ आवाज़ें बहुत ख़ास हुआ करती हैं। उन आवाज़ को सुन कर ही आपकी पूरी स्मृतियां एक बार चक्कर काट लिया करती हैं। वहीं कौन कहां कैसे बैठा करता है। किस बात पर कैसे रिएक्ट किया करता है। आदि ही आपके जाने के बाद आपका पीछा किया करती हैं।
कोई न तो दफ्तर में ज़िंदगी के दस्तावेज़ लिखा कर आता है। और न सच की जिं़दगी में। यह तो सच ही है कि जो आज ज्वाइन किया है उसे या तो रिटायर होना होगा या फिर एक समय के बाद कुछ इतिहास को कंधे पर लटकाए कहीं और किसी दफ्तर में सेट हो जाना होता है।
वैसे एक बात कहना चाहता हूं। हम जहां भी रहें। जिनके साथ भी रहें। कुछ ऐसी चीजें ज़रूर छोड़ जाएं जिसमें आपकी उपस्थिति मौजूद हो। हालांकि वक़्त हर दर्द और टीस को भर दिया करता है। लेकिन फिर भी कुछ बातें और एहसास ऐसी रह जाती हैं जिन्हें आप कभी पीछे नहीं छोड़ पाते। वह हमेशा आपके साथ रहा करती हैं।

Friday, April 6, 2018

इमोशन को मैनेज करो साहब


कौशलेंद्र प्रपन्न
आज की तारीख़ी हक़ीकत है कि लोग अपने इमोशन को मैनेज नहीं कर पाते। आप भी तो नहीं कर पाते होंगे। और परिणाम यह होता है कि कोई न कोई मुंह फुला लेता है। वह चाहे घर के लोग हों या फिर ऑफिस या फिर यार दोस्त। रूठे हुए को मनाना भी मैनेजमेंट का एक हिस्सा है। लेकिन अफ्सोस कि इमोशन को हम मैनेज करने के लायक ही नहीं मानते।
मार्केट मैनेज होते हैं। वोट मैनेज होते हैं। लेग मैनेज होते हैं और प्रोजेक्ट भी। ख़ास बात यह है कि हम अपने इमोशन को कई बार समझ ही नहीं पाते कि हम क्या चाहते हैं। क्या चाहते हैं अपनी ज़िंदगी से और क्या अपेक्षा रखते हैं रिश्तों से। जब हम यह समझ लेंगे कि फलां की आपसे क्या उम्मीद है और आप उसे कैसे पूरा कर सकते हैं तब हमें औरों की अपेक्षाएं भी पूरी करने में दिक्कतें नहीं आएंगे।
दरअसल हम लोगों की अपेक्षाओं में खुद को ऑल्टर करना चाहते हैं। हम चाहते हैं कि सभी की नज़रों में अच्छा अच्छा बने रहें। जो संभव नहीं है। एक मैनेजर कभी भी सभी के लिए अच्छा नहीं हो पाता। यदि वह मैनेजमेंट की बेहतरी चाहता है। यदि कंपनी या प्रोजेक्ट की बेहतरी चाहता है और समय पर पूरा करना चाहता है तो उसे कई बार कठोर कदम उठाने ही पड़ते हैं। संभव है उसके निर्णय से कुछ लोगों के सपने बिखर जाएं। लेकिन वह बड़े लक्ष्य और सफलता की ओर दृष्टि रखता है। इसलिए कई बार प्रोजेक्ट को सफल करने के लिए कठोर और बने बनाने रास्ते से हट कर भी निर्णय लेता है। ठीक उसी तरह हमें अपने कई इमोशन पर कठोरता से निर्णय लेने की आवश्यकता पड़ती है। यदि हम अपने इमोशन की प्रकृति को समझ लें तो उसे मैनेज करना आसान हो जाता है।
फ़र्ज कीजिए आपको किसी से इमोशनली अटैच्मेंट हो गया है। व हो गया था। यदि अतीत में ही अटके रहेंगे तो आगे नहीं बढ़ सकते। दरअसल इमोशनल कंफ्लिक्ट यहीं शुरू होता है। आप चाहते हैं कि दोनों ही रिश्ते को खुश खुश रखें। मगर बीच में मूल्य, नैतिकता, धार्मिक आस्था आदि आ जाती हैं जो आपके मूल्य और रिश्तों को सुलझाने की बजाए और पेचिंदा कर देती हैं।
पहली बात तो यही कि आप रिश्ते से क्या चाहते हैं? क्या अपेक्षा है? और किस हद तक अपनी ज़िंदगी को सहज जीना चाहते हैं। यदि आपने रिश्तों की मांगों और उष्मा को संभालना सीख गए तो कभी भी जीवन में तनाव और द्वंद्व पैदा नहीं होगा। कहेंगे कहना कितना आसान है और जीना कितना मुश्किल। लेकिन कठिन नहीं है। इमोशन को मैनेज कर पाए तो लाइफ में आप या कि हम काफी सहज रह सकेंगे।

Thursday, April 5, 2018

मैनेजर का चुनावः सावधान रहें चौकन्ने रहें


कौशलेंद्र प्रपन्न
मैनेजमेंट में प्रोजेक्ट को चलाने के लिए कई प्रोजेक्ट मैनेजर की ज़रूरत पड़ती है। कोई भी प्रोजेक्ट हो चाहे वह सरकारी हो या फिर गैर सरकारी। प्रोजेक्ट मैनेजर के चुनाव में यदि प्रोग्राम मैनेजर चैकन्ना न हो या फिर यदि पूर्वग्रह में मैनेजर नियुक्त करता है तो उसका असर प्रोजेक्ट के पूरे होने, सफल और विफल होने में बड़ी भूमिका निभाता है। अपनी ही टीम में से यदि किसी को चुनना होता है तब कई सावधानियां रखनी पड़ती है। क्या जिसे हम नई भूमिका के लिए चुन रहे हैं वह कैपेबल है? क्या उसके अंदर क्षमता और दक्षता है? क्या उसकी कार्यशैली टीम को लीड करने, टीम को गाइड करने आदि की रणनीति बनाने और विज़न बनाने आदि बनाने की क्षमता है आदि।
हमारे प्रोजेक्ट इसलिए भी समय पर पूरे नहीं होते क्योंकि प्रोजेक्ट मैनेजर सही तरीके से रणनीति नहीं बना पाता। समय पर सही व्यक्ति को कम्युनिकेट नहीं कर पाता। प्रोजेक्ट के विज़न और मिशन को हर टीम तक संप्रेषित नहीं कर पाता। यदि टीम में गोल ही स्पष्ट नहीं है तो टीम आख़िर किस दिशा में बढ़गी। दिशा और लक्ष्य की अस्पष्टता की स्थिति में समय, पैसे, मैनपावर आदि लगते हैं।
हालांकि हर व्यक्ति अपनी दिनचर्या को मैनेज तो करता ही है। लेकिन प्रोजेक्ट को मैनेज करना थोड़ा अलग है। वह इस मायने में कि जब आप अपनी ज़िंदगी मैनेज करते हैं तो ज़्यादा लोग नहीं होते। वहीं प्रोजेक्ट में चार से अधिक भी व्यक्ति शामिल होते हैं। जब व्यक्ति हैं तो उनके साथ कुछ व्यवहार, कुछ संवेग, कुछ इमोशन भी साथ होती हैं। इमोशन को मैनेज करना भी एक कौशल है।
मैनेजर को अपनी और अपने अंदर काम करने वाले कर्मियों के इमोशन को भी बैलेंस करना होता है। काम का दबाव तो होता है। इससे किसी को भी गुरेज़ नहीं हो सकता। लेकिन काम के दबाव में आप किसी और के इमोशन और काम करने की टेम्पो को कुचल नहीं सकते। शायद यहां मैनेजर ग़लती कर बैठता और अपना आपा खो बैठता है। गुस्सा या खीझ किसी और की थी लेकिन वह अपने से नीचे व्यक्ति पर उतार देता है। ऐसे में वह टीम के अन्य सदस्यों के बीच अपनी प्रतिष्ठा और सम्मान खो देता है। मैनेजर का रोल दूधारी तलवार पर चलने जैसा है। एक ओर अपने से उच्च अधिकारियों क निर्दशों, इगो, दबाव को सहता है वहीं अपने अंदर काम करने वाले व्यक्तियों की अपेक्षाओं और इगो को भी संतुलित करना पड़ता है।
यदि एक ग़लत मैनेजर का चुनाव करते हैं तो कुछ समय के लिए ही सही हमारा प्रोजेक्ट व प्रोग्राम पर उसका असर तो पड़ता ही है।
कुछ बेहतर मैनेजर की सूत्र-
सही समय पर, सही तरीके से, सही व्यक्ति तक संवाद का सक्रिय एवं सकारात्मक और निरंतर संप्रेषण नितांत ज़रूरी होता है।

Tuesday, April 3, 2018

आज नदी खुश थी...



कौशलेंद्र प्रपन्न
खुश थी नदी कि उसके साथ पूरा गांव है। गांव के लोग उसके लिए लड़ने के लिए आग आ रहे हैं। लेकिन नदी की खुशी ज़्यादा समय पर बरकरार न रह सकी। कुछ लोग थे जो गांव के बाहर के थे। जिन्होंने गांव के लोगों को सपने दिखाने लगे कि यदि नदी पर बांध बनेगा तो लोगों को रोजगार मिलेगा। गांव के बच्चे शहर और महानगर नहीं जाएंगे। और भी थे वायदे जिसपर गाव के लोग लुठित हो रहे थे। वही पास खड़ी एक बुढ़ा पेड़ ग़मज़दा था। उसे मालूम था नदी अब वही नहीं रहेगी। नहीं रहेगी उसकी धार। पहले भी इस गांव और पेड़ ने ऐसे मंज़र देखे हैं। जब गांव को कहीं और बसाया गया था। कुछ उजड़ गए तो कुछ कहीं और चले गए।
नदी का क्या था। उसके अपने तो गांव ही था। गांव के लोग थे। जंगल और पहाड़ों के बीच से बहना ही उसका जीवन था। मगर अब उस पर भी दूसरां की नज़र लग गई थी। आख़िर नदी अपने मन की बात किससे कहती। कोई सुनने वाला नहीं बचा था।
क्या शहर और क्या गांव वैश्विक स्तर पर नदी को मोड़ने और बांध बनाने की चर्चा गर्म थी। जो खिलाफ में थे वे मुट्ठी भर बच गए थे। उन्हें कहा जाने लगा यह तो विकास ही नहीं चाहता। इसे बिजली नहीं चाहिए। इसे रेजगार नहीं चाहिए। पानी के धार पर स्टीमर चलते नहीं देख सकता। जलता है।
ऐसे में राजतंत्र से लेकर लोकतंत्र के चारों खंभों में चर्चा चल रही थी। दूसरी ओर नदी की उदासी देखी नहीं जाती थी। दिन प्रतिदिन नदी सूखने सी लगी। देखते ही देखते नदी की धार गांव छोड़कर दूर होती चली गई। कभी वक़्त था कि बच्चे खूब मजे में नहाया करते थे। पर्वतीनें इसी नदी में नहा कर खरना करती थीं। सूर्य देवता के पर्व रखा करती थीं। वो भी नदी के साथ उदास तो थीं पर उनकी सुनने वाला कौन था।
ऐसे ही हमारी नदी हमारे बीच से गायब हो जाएंगी। हो भी रही हैं। मगर किस पर और क्यांकर अंतर पड़ेगा। सभी को विकास चाहिए। विकास के नाम पर नदी और जंगल, पहाड़ और पर्वतों की बली चढ़ाई जा रही है।
नदी आज खुश कम उदास ज़्यादा थी।

Monday, April 2, 2018

टीचर रिटायर नहीं होते



कौशलेंद्र प्रपन्न
टीचिंग और टीचर ऐसे प्रोफेशन से जुड़े कर्मी होते हैं जो कभी रिटायर नहीं होते। उनके लिए कभी भी 31 मार्च या किसी भी माह की अंतिम तारीख अवकाश के लिए मुकरर्र नहीं होती। यूं तो सरकारी दस्तावेज़ में उनके लिए अवकाश प्राप्ति के दिन तय होते हैं। और बतौर दस्तावेज़ वे स्कूल से सेवामुक्त हो जाते हैं लेकिन सचपूछें तो शिक्षक कभी भी कार्यमुक्त नहीं होता। शर्त इतनी सी है कि यदि वह शिक्षक अपने जीवन में महज नौकरी के तौर पर अध्यापन न किया हो। ऐसे शिक्षक बेशक संख्या में कम हों लेकिन जिन्होंने शिक्षण में आनंद लिया हो। बच्चों से संवाद किया हो। जिनके लिए शिक्षण महज़ पाठ्यपुस्तक, पाठ्यक्रम पूरा कराने भर तक महदूद नहीं रहा वे कभी भी शिक्षण से मुक्त न होते हैं और न ही हो पाते हैं। वे वास्तव में दिल से शिक्षक होते हैं। उनके लिए स्कूल घर सा होता है जहां वे समय से पहले आते हैं और समय के बाद ही घर जाया करते हैं। पूरी जिं़दगी ऐसे शिक्षक पूरी शिद्दत से बच्चों से संवाद करने में विश्वास करते हैं। शिक्षा के मूल दर्शन संवाद और प्रतिवाद से बच्चों में चिंतन दक्षता और वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने में कभी भी चूक नहीं करते। बेशक श्ज्ञिखा व्यवस्था में ऐसे शिक्षकों को उतना मान-सम्मान न मिलता हो। लेकिन शिक्षा विभाग के बाहर बच्चों और अभिभावकों में उन्हें भरपूर सम्मान और मुहब्बत मिला करता है। शायद इन्हीं शक्तियां के बदौलत ऐसे शिक्षा पूरी ऊर्जा और ताकत के साथ शिक्षण किया करते हैं। ऐेसे शिक्षक न तो कभी मरा करते हैं और न ही स्वयं मरते हैं। इस प्रकार के शिक्षक शिक्षण को न केवल इन्ज्वाय किया करते हैं बल्कि बच्चों को किताबें पढ़ाने की बज़ाए जीवन के संघर्षां और वास्तविक समझ दिया करते हैं। बच्चों को जीवन में किस ओर और दिशा में बढ़ना चाहिए उस ओर भी राय दिखाया करते हैं। इस तरह के शिक्षक पढ़ाने की बज़ाए संवाद करने, कहने और सवाल करने की कला और माद्दा विकसित किया करते हैं।

Saturday, March 31, 2018

मार्च में शिक्षा...


कौशलेंद्र प्रपन्न
मार्च पहले बजट के नाम से बदनाम था बेचारा। हर कोई मार्च से डरा करते थे। दूसरा डर बच्चों में नींद उड़ाने के लिए काफी होता था। यही वह माह है जिसमें बच्चे पूरे साल की मेहनत परीक्षा के मत्थे चढ़ा दिया करते हैं। मार्च ही है जो पूरी ज़िंदगी पर भारी पड़ा करता है। बच्चे और बच्चांे के साथ ही अभिभावकों के लिए भी तनाव भरा हुआ करता है।
इस बार का मार्च कुछ ज़्यादा ही उथल पुथल भरा रहा। दसवीं और बारहवीं के पेपर लीक हुए। बच्चे निराश और तनाव सह रहे हैं। अभिभावकों को अपनी नौकरी और यात्रा के बीच ज़द्दो जहत करनी पड़ रही है। यह पहली दफ़ा नहीं है जब परीक्षा के पेपर लीक हुए हों। लेकिन आख़िर भी नहीं है। जब जब परीक्षा के पेपर लीक होते हैं तब एक परीक्षा तंत्र शक के घेरे में नहीं आते बल्कि पूरी शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े होते हैं।
परीक्षा शिक्षा को बेहतर बनाने के लिए है या परीक्षा बच्चों की जिं़दगी में तनाव घोलने के लिए? क्या परीक्षा सचमुच बच्चों की प्रतिभा और दक्षता को मापने मंे सक्षम है? सवाल कई हैं जिनके उत्तर दिए जाने चाहिए। परीक्षा व्यवस्था को संचालित करने वाले तंत्र को प्रबंधित करना होगा। वरना इसकी तरह की लापरवाही व चूक होती रहेंगी।
परीक्षा शिक्षा की मुंहबोली बहन सी है। कभी कभी इतनी रूखी हो जाती है कि पहली वाली को दुखी कर जाती है। जबकि परीक्षा को शिक्षा के साथ सहयोग का रिश्ता रखना चाहिए। वास्तव में परीक्षा के रूपरूप समय समय पर सत्ता के अनुसार बदलते रहे हैं। जब भी सत्ता ने शिक्षा को औजार के रूप में प्रयोग किया है तब तब शिक्षा और परीक्षा की मूल प्रवृत्ति से छेड़छाड़ किया ही गया है।
सरकार और सत्ता शिक्षा को हमेशा ही इस्तमाल करती रही है। जब भी पाठ्यपुस्तकों, पाठ्यक्रमों में बदलाव किए गए हैं तब तब शिक्षा की चिंता कम अपनी नीति और दिशा को मजबूत करने का प्रयास किया गया है।

Thursday, March 29, 2018

च्ुप यूं क्यों रहती हो बोलो...


कौशलेंद्र प्रपन्न
यूं ही कहां कहां कैसे कैसे गहन कंदराओं, वन उपत्यकाओं, पहाड़ों के बीच से चुप चाप बहती हो। कभी इतनी वाचाल और शोख़ हो जाती हो कि समझ नहीं आता तुम वही हो जो कहीं तो एकदम ख़ामोश रहती हो तो कभी झूमने लगती हो। तुम जितनी शांत नज़र आती हो उतनी ही अंदर से बेचैन भी होती हो। जब तुम बेचैन होती हो तो गांव गांव के जल समाधि...
पूरा का पूरा का गांव रातों रात भूगोल से ग़ायब। टिहरी को ही लो अब वहां नामों निशान नहीं। लेकिन कभी तुम उस गांव की शान और पहचान हुआ करती थी। तुम्हीं तो हो कहीं के लिए जीवन रेखा बन जाती हो तो कहीं के लिए जीने मरने का सवाल। तुम्हें लेकर दो राज्यां और देशों के बीच फसाद होता रहा है। क्या चनाब, क्या झेलम और क्या व्यास इन सब को अकेले और शहर के बीच से गुजरते हुए देखना और उन्हें महसूसना बेहद दिलचस्प एहसास होता है। देखा तो सिन्धू नदी को भी है। उसके अकेलेपन को भी देखा। कैसे दो पहाड़ों के बीच ख़ामोशी से बहती रहती है।
एक नदी मेरे पास भी है। उसे अब तक तो ज़िंदा रखा है। मगर डरता हूं कहीं मेरी नदी खो न जाए। वैसे भी शहर और महानगरों में नदी हो या न हो कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता। नदी सूखे या गंधाए किसी की नींद नहीं टूटती। लेकिन हमारे हिस्से नदी नहीं बल्कि नद मिला। वह नद जो तथाकथित अभिशप्त है। देश के चार नदों में से एक नद मेरे शहर के हिस्से आया है। अब आप कहेंगे कौन सा नद मेरे हिस्से आया तो बता ही देता हूं सोनभद्र। यह निकलता तो अमरकंटक से है लेकिन हमारे शहर से गुजरता हुआ आगे निकल जाया करता है।
किसी भी शहर के पास नदी का होना कई बार लगता है एक ईश्वरीय या प्राकृतिक धाय का मिलना है। पर्व त्योहार में डूबकी लगाना हो तो नदी। कभी शहर से उदास हुए तो नदी का तट। कभी उल्लास के पलों की तटस्थ नदी। तो कभी जीवन ख़त्म करने में मां समान गोदी की तरह नदी हुआ करती है।

Wednesday, March 28, 2018

कुछ सपनों का प्रबंधन



कौशलेंद्र प्रपन्न
सपने देखना और उन सपनों को पूरा करना दोनों ही अलग अलग हक़ीकतें हैं। सपने देखना हमारी छूट है। जो भी सपने देखना चाहें। देख सकते हैं। लेकिन उन्हें पूरा करना कई बार हमारे हाथ में नहीं होता। हालांकि यह दूसरों पर दोष मढ़ने जैसा है। लेकिन कुछ हद तक ठीक हो सकता है।
मैनेजमेंट के जानकार मानते और कहते हैं कि यदि कोई भी प्रोजेक्ट व प्लान को शुरू में ही पूरी शिद्दत से योजना, रणनीति, रास्ते,प्लान दो और तीन, रिस्क, संभाव्य चुनौतियों , बजट प्रबंधन, मानवीय ताकतों की समुचित प्रबंधन आदि को ध्यान में रखते हुए कदम उठाए जाएं तो वे सपने और प्रोजेक्ट दोनों ही पूरे होते हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, डेटा से लेकर आम जिं़दगी की तमाम योजनाएं और प्लान यूं ही फूसससस नहीं हो जातीं बल्कि उनके पिछड़ने में या न पूरा हो पाने में हमारी योजना और काम करने की क्षमता और गति, दिशा और इच्छा शक्ति दोनों ही काम करती है। यदि किसी सपने को उक्त चीजें समय पर नहीं मिलीं तो वे सपने अधूरे ही दम घुट कर मर जाते हैं।
आज हमारे युवा सपनों के साथ यह दुर्घटना खूब घट रही है। यदि सपने हैं तो उन्हें पूरा करने की इच्छा शक्ति व ताकत नहीं है। सपने पाल तो लेते हैं कि लेकिन जब बीच में संघर्ष व विपरीत स्थितियों आती हैं तब उनसे डट कर सामना नहीं कर पाते। सामना नहीं कर सकने के पीछे भी अभिभावकों और शिक्षकों आदि के हाथ होते हैं। हम उनके अंदर यह जज़्बा व एहसास ही पैदा नहीं कर पाते कि वे अपनी ताकत का अंदाज़ा लगा सकें। हमेशा उन्हें हाथ में सब कुछ दे देना। सब कुछ रेडीमेड नहीं होता। यह हम तब बताते हैं जब हमारे बच्चे हमारी ही आंखों के सामने अपने सपनों को ऑल्टर करते नज़र आते हैं।
नागर समाज का हर वह व्यक्ति, संस्था व परिस्थितियां सपने ऑल्टर करने की दुकानें हैं जहां हम बच्चों को सीखाते हैं कि कोई बात नहीं यदि फलां सपना पूरा नहीं हो पा रहा है तो वह वह वे वे सपने पाल हो। पाल लो न।
नीरज जी प्रसिद्ध कविता याद आ रही है-
कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है
कुछ चेहरों की उदासी से दर्पण नहीं....

Tuesday, March 27, 2018

शिक्षा में हिचकी यानी हाशिए से मुख्यधारा का सफ़र


कौशलेंद्र प्रपन्न
शिक्षा की कई सारी कहानियां हैं। इनमें से कुछ कहानियां समय समय पर फिल्मों में देखने को मिलती रही हैं। हिचकी हमारी शैक्षिक कहानियों में से एक है। यह फिल्म दरअसल हमारी शिक्षा में समावेशीकरण और बहिष्करण के विभिन्न पहलुओं को विमर्श पटल पर गहरे उभारती है। बात सिर्फ फिल्म की ही नहीं है बल्कि हमारी शिक्षा ऐसे दिव्यांग बच्चों के साथ किस प्रकार का बरताव करती है उस ओर भी शिद्दत से विमर्श करती है। छुटपन में बच्ची को स्कूलों से इसलिए निकाल बाहर किया गया क्योंकि वो बोलते न बोलते हिचकी लेती है। चक चक करती है आदि आदि। उस पात्र को स्कूल से यह कहते हुए निकाला जाता है कि हम इसे क्यों निकाल रहे हैं उस वज़ह को हम नहीं बताएंगे। अंत में वह बच्ची न केवल स्कूलों से निकाल बाहर की जाती है बल्कि कक्षा में भी उसे अपने सहपाठी और शिक्षक की डांट और उपहास का पात्र बनना पड़ता है। वहीं दूसरी ओर हमारी शिक्षा समावेशीकरण के सिद्धांत को तवज्जो देती है। इसी शैक्षिक दर्शन को मानते हुए विभिन्न निजी स्कूलों में मोटी फीस लेकर बच्चों को कहीं न कहीं आत्मकुंठा और बहिष्करण की मार झेलनी पड़ती है।

Saturday, March 24, 2018

कहानी जब औजार बन जाए



कौशलेंद्र प्रपन्न ं
मैनेजमेंट प्रोफेशनल अकसर कहानी के ज़रिए कुछ कहा करते हैं। सीधे सीधे सिद्धांत कहने की बजाए कहानी के मार्फत कहने की कला ख़ासकर श्रोताओं को लुभाया करती हैं।
कहना और प्रभावशाली तरीके से कहना दोनां ही दो बातें हैं। आज की तारीख़ को हर कोई कहने को बेताब होते हैं लेकिन उन्हें श्रोता नहीं मिलते। मिलते हैं तो सुनाया करते हैं यार पका देगा भाग आ रहा है। वही दूसरे की इंतज़ार किया करते हैं। लोग सुनने के लिए पैसे भी खर्च किया करते हैं। कहो ऐसा कि सुनने वाले पीछे पड़ जाएं।
कहानी है ही ऐसी विधा जिसके ज़रिए हम गंभीर से गंभीर और हल्की सी हल्की बातें कह दिया करते हैं। ख़ासकर व्यंजना और लक्षण में भी भाषा के इस कौशल का इस्ताल किया जाता है। कहानी वही विधा है जिसमें सीधे सीधे कहने की बजाए कहानी के पात्रों के ज़रिए कह दिया करते हैं।
हम सब के पास बहुत सी कहानियां हैं। उनमें से कुछ को कह पाते हैं और कुछ अनकही रह जाती हैं। ं

Thursday, March 22, 2018

शिक्षा पर नहीं लिखूंगा पर लिखने से बच नहीं पाता




कौशलेंद्र प्रपन्न
रोज़ दिन मन कड़ा करता हूं। अपने आप से वायदा करता हूं कि आज शिक्षा और शिक्षक पर बिल्कुल ही नहीं लिखूंगा। मगर रोज़ ही ऐसी कुछ घटनाएं घट जाती हैं जिन्हें नज़रअंदाज़ करने का मतलब है कहीं न कहीं हम अपनी जिम्मदारी से दूर भाग रहे हैं। फर्ज़ कीजिए हम शिक्षा जैसे मसलों पर बात नहीं करेंगे तो कौन करने वाला है। किसी को भी शिक्षा की बेहतरी से कोई ख़ास लेना देना है। हाल में ही एक लड़की ने आत्महत्या की। स्कूल प्रिंसिपल जिस गैरजिम्मेदराना तरीके से मीडिया के सवालों को जवाब दे रहा था उससे ज़रा भी नहीं लगता कि उसे किसी भी बच्ची या बच्चे से संवेदना रखता होगा। उसे स्कूल के बाजार से पैसे बनाने है चाहों तरीके जो भी हों।
वहीं कई बार आपको और हमें राह चलते कुछ ऐसे भी टीचर और टीचिंग संस्थाएं हमें अपनी ओर मोड़ लेती हैं। ऐसी ही एक संस्था है सेंटर फोर सोशल एंड कल्चरल प्रशिक्षण,यहां देश भर से कलाकार, बच्चे, टीचर, गुरु आदि छात्रवृति पाते हैं। साथ ही विभिन्न राज्यों के टीचर और बच्चों को पूरे साल छात्रवृति देकर उनकी प्रतिभा को बढ़ावा दिया जाता हैं। यहां की चयन प्रक्रिया में कलाकारों और प्रतिभावान बच्चां, टीचर, मेंटर आदि को प्रोत्साहित किया जाता हैं।
फर्ज़ कीजिए एक ऐसा हॉल हो जहां कर्नाटक, असम, ओड़िसा, बिहार, तमिलनाडू, केरल आदि प्रांतों से बच्चे और शिक्षक मौजूद हैं। इस हॉल में विभिन्न आयु और कक्षा, भाषा भाषी श्रोता हों तो आप उनसे किस भाषा में और किस स्तर पर बात करना चाहेंगे? क्या यह उतना आसान होगा जैसा एक सामान्य समूह में हो सकता है। निश्चित ही अपने आप में एक चुनौतीभरा काम रहा होगा।
इस मायने में मैं अपने आप को सौभाग्यशाली मान सकता हूं कि हाल ही में ऐसे ग्रुप के साथ पूरे दिन बातचीत करने और सीखने का अवसर मिला। कितनी कमाल की बात है कि पूरे दिन आप अपनी मूल भाषा भूल कर दूसरी भाषा को संप्रेषण का माध्यम चुनते हैं। इसमें ख़तरे हैं तो फायदे भी हैं। आप अपने आप को भी चेक करते रहते हैं कि क्या आप चल सकते हैं या नहीं। े
जैसा कि पहले कहा कि इस ग्रूप में दस साल से लेकर पचास साल तक से बच्चे और किशोर और वयस्क थे। विभिन्न भाषा भाषी। जब दस वर्षीय अर्थव ने कहा मैं तो बहुत इन्ज्वाय किया। आप जैसे पढ़ाया बहुत बहुत अच्छा लगा। वहीं प्रसन्न ने कहा कि मेरी भाषा हिन्दी नहीं है। मेरे को यह अच्छा लगा कि आपने हम सभी को एक परिवार की तरह से बना दिया। पहले हम अलग अलग थे। हम किसी को जानते तक नहीं थे। लेकिन आपकी टीचिंग और एक्टिविटी ने हमें जोड़ दिया। आदि आदि। जब इस प्रकार की प्रतिक्रियाएं आती हैं तो लगता है कि शायद आज मैंने कुछ अच्छा किया। उसपर भी जब लोग अपना लंच छोड़कर काम कर रहे हों और छुट्टी ने मांग रहो हों। समय हो जाने के बावजूद भी बैठे सुन और सुना रहे हों तो लगता है कि कुद अच्छा हो रहा है। शिक्षा में अच्छा भी काफी हो रहा है और ख़राब भी। ख़राब को जल्दी लोग जान जाते हैं और अच्छाई थोड़ी देर लेती है।

Wednesday, March 21, 2018

पिछली यात्रा की कुछ बातें



कौशलेंद्र प्रपन्न
पिछले दिनों कुछ शिक्षण-संस्थानों और बच्चों से बातचीत करने का अवसर मिला। पहला देहरादून और दूसरा सेंटर फोर कल्चर एवं रिसोर्स प्रशिक्षण केंद्र दिल्ली। दोनां ही जगहां के तज़र्बे अपने आप में कई स्तर पर शिक्षा और प्रशिक्षण की पद्धति को खोलने और समझने के लिए झरोखे सा काम करने वाली रही।
एक और देहरादून में मनोरम पहाड़ों के बीच बसा पुरकल यूथ डेवलप्मेंट सोसायटी की ओर से पहाड़ी और पिछड़े क्षेत्रों के बच्चे और बच्चियों के लिए तमिलनाडू के श्री स्वामी ने यही कोई बीस साल पहले इस बीया बान में बच्चों को पढ़ाने की ठानी। उनकी दिली ख़्वाहिश रही कि दिल्ली, चेन्नैय, मुंबई आदि शहरां में तो बच्चों को पढ़ने, स्कूल जाने के भरपूर अवसर मिलते हैं। बच्चे बेहतर प्रदर्शन भी करते हैं। लेकिन इन बच्चों के पास न तो सुविधा है और न व्यवस्था। व्यवस्था और संसाधन की कमी उनकी ज़िंदगी को ख़राब कर रही हैं। सो स्वामी जी ने यहां इस पुरकल गांव में यहीं कोई पांच बच्चों को लेकर पढ़ाना शुरू किया।
आज की तारीख़ में इस स्कूल में तकरीबन 502 बच्चे हैं। कुछ बच्चों से बातचीत हुई। एक गुलमोहर सदन की बच्ची ने बताया कि उसका बीजा नहीं बन पाया बरना वो भी यूएस जाती। कॉमर्स की छात्रा जो कि 11वीं में पढ़ रही है। वहीं पूनम जोशी जो यही की छात्रा रहीं और अब यहीं पर पैडागोजी और फैकेल्टी के तौर पर काम रही हैं। बताती हैं कि यहां पर पढ़ने के लिए बच्चों और अभिभावकों को कड़े प्रोसेंसंग से गुजरना पड़ता है। वहीं एक दस साला बच्चे से बात कर के लगा कमाल है कॉफिडेंस है। जिस अंदाज़ में वह अंग्रेजी में अपनी बात रख रहा था। वह सच में प्रशंसनीय था। हमने कई सवाल पूछे। मजाल है कहीं भी अटका हो। वो बच्चा प्रोजेक्ट कर नेशनल लेबल की प्रतियोगिता में शामिल हुआ। संभव है अगले साल वो यूएस चला जाए।
इस स्कूल में पढ़ने के लिए दूर दराज के गांव से बच्चे आते हैं। कुछ के लिए हॉस्टल की सुविधा है लेकिन वह सिर्फ 11 वीं और 13 वीं के लिए। यहां हर बच्चे को कोई न कोई गोद लिए हुए है। इसका मतलब है हर एक बच्चे के खर्चें को कोई और उठा रहा है। बच्चों को कुछ भी नहीं देना पड़ता। यहां के पिं्रसिपल ने बताया कि एक बच्चे की साल भर का खर्च तकरीबन 70से अस्सी हजार आता है।

Sunday, March 18, 2018

जीवन एक कहानी ..

जीवन एक कहानी सी है. जब जीवन कहानी है तो कई सारे पात्र और घटनाएं भी होती हैं.कुछ समय के साथ धूमिल हो जाती हैं तो कुछ एहसास हमेशा साथ रहा करती हैं.
मंसूरी कई बार आना हुवा.लगातार बदलते मसूरी को देखा. बाज़ार और चमकदार ही गए. लोग पर वही हैं. कई बार जीवन बाज़ार सा भी लगता है दूकान के सामान सा भी.मगर जीवन के बाज़ार में वही लोग और एहसास मायने रखते हैं जो बेहद करीब होते हैं. कई एहसास चलते चलते भी मिल जाया करती हैं जिन्हें ताउम्र सहेज सकते हैं.

Saturday, March 17, 2018

गुड और योजनाबद्ध मैनेजमेंट....

 जीवन और प्रोजेक्ट वही सफल होते हैं जिसकी प्लानिंग और अवलोकन लगातार हो.मैनेजमेंट एक्सपर्ट मानते हैं प्रोग्राम वही फेल या सफल होते हैं जिसकी प्लानिंग में रिस्क का अनुमान लगा लिया जाए और समाधान की योजना और पथ बना ली जाती है.
भारत प्रोजेक्ट इसीलिए फेल हो जाती है या डेडलाइन मीट नहीं कर पातीं क्योकिं प्रॉपर प्लानिंग और बजट की योजना नहीं बनाई जाती. दूसरी बात जिमेदारी तय नहीं किये जाते.

Thursday, March 15, 2018

पेपर लीक या व्यवस्था में छेद



कौशलेंद्र प्रपन्न
साल भर तैयार में लगे रहे। कहां कहां नहीं कोचिंग में समय लगाया। कितनां लोगों की नसीहतें सुनीं। घर में टीवी बंध। बाहर खाना बंद। घूमना फिरना बंद। लोगों का घर में आने जाने पर कर्फ्यू। खुद कितने दिन हो गए कहीं आना जाना सब बंद हो चुका है। बच्चों की बात तो है ही बड़ों की भी दिनचर्या कोई अच्छी नहीं है। दफ्तर से लेकर पड़ोसी तब। घर से लेकर कोचिंग तक हर जगह एक ही चर्चा। किसके घर में कौन पेपर दे रहा है। कितने सपनों को आंखों में संजोकर एक्जाम सेंटर पर जाते हैं। जूता,चप्पल, उतार कर परीक्षा कमरे में बैठते हैं। कहीं तो अंडरवीयर और बनियान में बच्चे बैठकर बच्चे परीक्षा देते हैं।
इधर हमारे बच्चे परीक्षा में कलम घीस रहे होते हैं उधर परीक्षा की रीढ़ प्रश्न-पत्र घर जेवार और दुकान में चक्कर काट रहा होता है। न जाने कहां कहां किस किस के हाथ में प्रश्न पत्र हल हो रहा होता है। धीरे से क्लास में भी हल सवाल पहुंच जाता है। जिनकी जितनी पहुंच उनके पास उत्तर हाज़िर। बाकी बच्चे जवाब लिखने में लगे होते हैं।
उन्हें क्या मालूम कि जिन सवालां को शिद्दत से हल कर रहे हैं वो तो बाहर कब का हल हो चुका है। कुछ बच्चे अच्छे अंक लेकर कहीं बड़े नामी गिरामी संस्थान में दाखिल हो जाएंगे। रह जाएंगे तो बस वे जिन्हें कहीं कोई नहीं सुनता।
परीक्षा से पहले पेपर कैसे लीक हो जाते हैंं। कौन सी कड़ी है या वो कौन का छेद है जिसमें से पेपर हुर हुर कर नीचे गिरने लगता है। गोया रेत हो। हमें जानने की ज़रूर है और जिम्मदार कड़ी भी देखने होंगे ताकि उसे ठीक किया जा सके। पेपर का परीक्षा हॉल से बाहर आना कोई नई बात नहीं है। लेकिन जब अत्यंत विश्वसनीय संस्थानों के पेपर भी बाजार में लुढ़कते नज़र आएं तो एकबारगी विश्वास की पेंदी डोलने लगती है।
परीक्षा के पेपर बनाने वाले जानते हैं कि किन किन स्तरों पर सावधानी बरती जाती है। चाहे वह स्कूल स्तर हो, कॉलेज हो या विश्वविद्यालय हर स्तर संभवतः सावधानी तो बारती ही जाती है फिर पेपर बाहर कैसे आ जाते है? क्या उनके पर निकल आते हैं या पांव जिसके बदौलत बाजार घूमने लगते हैं?
न तो पर निकलते हैं, न पांव, और न ही कोई ताकत जो पेपर को बाजार में चलने और दौड़ने की ताकत दे सके। बल्कि हमारी ख़ुद की इच्छा और लोभ इतनी ताकतवर हो जाती है कि उसके आगे हम घुटने टेक देते हैं। वह चूक किसी भी किसी भी स्तर पर संभव हैं पेपर बनाने वाले से लेकर डिस्पैच, टाइपराइटर, कंपोजर, प्रिंटिंग, से लेकर परीक्षा केंद्र पर पहुंचने में कहीं भी कभी भी चूक हो सकती है। किसी का भी ईमान डोल सकता है। यदि एक बार डोला तो क्या वज़ह है कि दूसरी बार न डोले। और यह सिलसिला निकल पड़ता है।
सीबीएससी 2018 के 12 वीं के कैमेस्टी और एकॉउंट के पेपर लीक हो चुके हैं। वहीं फरवरी में कर्मचारी चयन आयोग क पेपर लीक हो चुके हैं। 2003 में पहली बार आईआईएम ने मिलकर ज्वाइंट पेपर ऑनलाइन कराने फैसला किया। इस सिस्टम में चूक नहीं होगा ऐसा मानना था। लेकिन टाईटेनिक की तरह वह विश्वास चूर चूर हो चुका। लेकिन इस आईस बर्ग से टकराने तो हमारे बच्चे हैं। बच्चों के विश्वास और जीवन टकराती हैं। उनके सपने डूबने से लगते है।

Wednesday, March 14, 2018

बच्चों के सपने उनके हैं तो संघर्ष भी...



कौशलेंद्र प्रपन्न
बच्चे सिर्फ परीक्षा के भय से भयभीत नहीं हैं बल्कि बच्चां पर अपने और और के सपनों को पूरा करने का भी भार होता है जिसे वे ढोते हैं। ढोने की पूरी कोशिश करते हैं। भला कौन अपने सपनों को पूरा होते नहीं देखना चाहेगा? किसी अच्छा नहीं लगेगा कि उसके देखे, पाले सपने साकार हो रहे हैं। लेकिन दिक्कत तब आती है जब हम दूसरों के सपनों में अपने सपने का एहसास करने लगते हैं। दूसरे के सपनों को अपना मान कर जीवन के लक्ष्य तय करने लगते हैं। जितने लोग हैं उतने ही सपने हैं। कई बार तो लगता है सड़क पर चलते हैं हम कितने ही सपनों से रू ब रू होते हैं। कितने ही सपने टकराकर आगे निकल जाते हैं। हम कितनी बेरूख़ी से दूसरों के सपनों को सुनकर मुसकुरा के चल दिए... चल देते हैं। बजाए कि उसके सपने को साकार करने में यदि अपनी भिमका निभाई होती तो शायद उसके सपने पूरे हो जाते। बल्कि हम एक कुंठा में जी रहे होते हैं। हम सोचते हैं मेरे सपने अधूरे रह गए तो भला उसके सपने क्योंकर पूरे हों। कांफ्लिक्ट यहीं पैदा होती है। हम पोजेटिव पोजेटिव कांफ्लिक्ट को जीने और सुलझाने की बजाए निगेटिव सेच और अवधारणा की ओर मुड़ने लगते हैं।
इन दिनों बच्चों पर चौतरफा दबाव है। न केवल अभिभावकों का बल्कि रिश्तेदारों, दोस्तों और स्कूली दबाव भी कम नहीं होते। कौन किस कोर्स को चुन रहा है? कहां कहां परीक्षा के फार्म भरे हैं? वहां नहीं हुआ तो क्या होगा? उस एक्जाम में पास नहीं हुआ तो सब हंसेंगे। दोस्त भी मजाक उड़ाएंगे। इतने पैसे लग गए कहां कहां नहीं कोचिंग में पैसे दिए आदि आदि। आर्थिक दबाव भी कम नहीं है। एक ओर परीक्षा दूसरी ओर परीक्षा के आगामी प्रभाव की चपेट में हमारे बच्चे जी रहे हैं।
इन्हें कैसे बचाया जाए इस ओर सोचने की बज़ाए हमारा पूरा ध्यान समाज में घटने वाले अन्य घटनाओं में दिलचस्पी लेता है। उससे अपने परिवार और घर पर असर तो पड़ेगा लेकिन आपकी औलाद जिस मनोदशा से गुजर रहा है। उससे न तो रिश्तेदारों को वास्ता होता है और न समाज के अन्य लोगों को। इसलिए पहले पहल हमें अपने घर के चराग को दुरुस्त करने की आवश्यकता है।
परीक्षा की चपेट में सपने इस तरह आते हैं कि परीक्षा में यदि पेपर अच्छे नहीं हुए या नहीं जा रहे हैं तो हम अपने सपनों और लक्ष्यों को ऑल्टर करने लग जाते हैं। और यहीं से दुश्चिंता, तनाव, अवसाद आदि घर करने लगते हैं। किसी की शुभकामनाओं में इतनी ताकत नहीं होती कि वो आपके पेपर कर दे। बल्कि वे शुभकामनाएं महज़ दिल को तसल्ली ज़रूर देती हैं। दरअसल सपने हमारे हैं तो उसकी पीड़ा और संघर्ष भी हमारे ही होंगे।हमें उसे भी स्वीकार करना होगा। यदि सपनों को ऑल्टर करना हो तो करने में हिचकिचाहट क्यों। क्योंकि जतो हंसने वाले हैं वो तो वैज्ञानिक पर भी हंसते हैं और सड़क चलते रहगीर पर भी। हमें अपने सपने को पाने के लिए कठोर भी होना होता है। कभी कभी अपने आप से तो कभी दूसरों से भी। इसे ग़लत भी नहीं कह सकते। क्यांकि प्रेमचंद ने कहा है ,‘‘सक्सेस हैज नंबर आफ फादर बट डिफिट इज ऑर्फन’’

Tuesday, March 13, 2018

कविता की मांग


कौशलेंद्र प्रपन्न
सामान्यतौर पर कविता और कहानी को क्लास या फिर पाठ्यपुस्तकों तक महदूद कर दिया जाता है। जब कविता को क्लास से निकाल कर जनसामान्य तक ले जाने की कोशिश होती है तब कई प्रकार की चुनौतियों सामने आती हैं।
आज देश में कई सारे मंच हैं। कई सारे मंचीय कवि। सब की अपनी अपनी शैली है। सब की अपनी अपनी पहचान। किसी कोई को भी अच्छा या ख़राब नहीं कह सकते। डॉ राहत इंदौरी से लेकर मुनौव्वर राण हैं तो वहीं इमरान प्रतापगढ़ी भी हैं। कुमार विश्वास हैं तो कविता भी हैं। वंदना यादव भी हैं। इनकी आवाज़ और गले में नज़्म या गीत उतर कर एक आकार पाती हैं। लगता है इन पंक्तियों को इन्हीं के लिए रची गई हैं। वहीं मंच पर चिल्लाने वाले कवि और शायर भी हैं। जो छोटे मोटे शेर या कविता से मंच को जीत लेना चाहते हैं। मंच तो जीत लेते हैं। तालियां भी बटोर लेते हैं। लेकिन कुछ है जो पीछे छोट जाता है। वह है श्रोताओं के दिलों में बसना। स्मृतियों में अपनी कविता को बो देना।
मुझे अपने ही संस्थान के एक कार्यक्रम में कविता पढ़ने का आदेश कहें या मनुहार हुआ है। मैं तब से सोच रहा हूं कंपनी के लोगों ( मैनेजर, प्रोजेक्ट मैनेजर, सिनीयर मैनेजर, सीओओ, सीइओ) के बीच कैसी कविता का चुनाव किया जाए। क्योंकि मेरे श्रोता काव्य या फिर साहित्य के नहीं हैं। वे हैं मैनेजमेंट के लोग। इन्हें कविता सुनाना जोखिम भरा काम है। इनकी अपेक्षाओं को पूरा करना भी एक मसला है। हास्य गीत सुनाएं जो लोग हंसते हैं। हंसेंगे। संवेदनशील सुनाएंगे तो मनोरोगी कहलाएंगे। मुझे लगता है जो भी कवि या मंच पर बोलने अपनी रचनाओं से मोह छोड़कर श्रोताओं को ध्यान में रखकर रचना पाठ करता है तब आधी समस्या तभी खत्म हो जाती है।
कभी हरिवंश राय बच्चन जी को भी साहित्य में वह स्थान नहीं मिला था जो समकालीन कविओं को प्राप्त था। वजह इतनी सी थी कि मंचीय कवि का टैग बच्चन जी को लगा था। वो मंच पर आने के लिए पैसे भी लेते थे। आलोचना तो इसकी भी हुई किन्तु मंच पर कवियों को पैसे मिलने लगे यह एक अच्छी शुरुआत थी। वरना कवि अपनी कविता और श्रम के लिए कुछ मांगने तक से डरते थे।

Friday, March 9, 2018

चलो दोस्तों ! बडोदरा शराफ् फाउंडेशन कौशल विकास केंद्र




कौशलेंद्र प्रपन्न
इन दिनों गुजरात के आणंद स्थित इंस्टीट्यूट आफ रूलर मैंनेजमेंट में प्रोग्राम मैंनेजमेंट एंड लीडरशीप प्रोग्राम करने करने का अवसर मिला है। सो आपको भी इस शैक्षिक यात्रा का आनंद दिलाता हूं। यदि आपकी रूचि है तो वास्तव में आपको भी आनंद आने वाला है।
विभिन्न सत्रों में विभिन्न प्रोफेसर के साथ बातचीत और विमर्श का मौका मिला रहा है। जिनमें संस्थान के निदेशक प्रो हितेश भट्ट की शैली कमाल की है। कहानियों के ज़रिए जिस साफगोई से कठिन से कठिन सिद्धांतों को समझा देते हैं। सच में एमबीए के कई पेचों को एक पल में खोल कर रख देते हैं। उन्होंने अपने लेक्चर में बताया कि कोई भी प्रोग्राम व प्रोजेक्ट बाद में विफल नहीं होता बल्कि प्रोग्राम के शुरू में ही बेहतर प्लानिंग, परिकल्पना, रणनीति, संभावित चुनौतियों के अनुमान न लगा पाने की वजह से देश में कई बड़ी से बड़ी योजनाएं और प्रोजेक्ट फेल हो जाते हैं। बल्कि हुए हैं। उनके इस उदाहरण से मैंने दिल्ली के यमुना पर बनने वाले सिग्नेचर ब्रिज का उदाहरण पेश किया। और कहा कि ओर वह ब्रिज है और दूसरी और डीएमआरसी है। दोनों की कार्यशैली तय करती है कि कौन सा प्रोजेक्ट समय पर खत्म होगा और किसमें विलम्ब होगा बल्कि हो रहा है। कहां तो सिग्नेचर ब्रिज को 2010 में पूरा होना था। जो आज भी जारी है। वहीं उसके बाद के डीएमआरसी के दूसरे प्रोजेक्ट न केवल पूरे हुए बल्कि सफलता पूर्वक चल रहे हैं।
इस कोर्स के अंतर्गत हमें बडोदरा के पास शराफ फाउंडेशन विजिट कराया गया। यहां की ख़ासियत यह है कि आस पास के ट्राइवल क्षेत्र के बच्चों और वयस्कों को कौशल दक्षता प्रदान की जाए। यानी हाथ का काम सीखाया जाए ताकि भविष्य में उन्हें नौकरी मिल सके। इस संस्थान में बच्चे और बच्चियां दोनों ही विभिन्न कोर्स में प्रशिक्षण हासिल कर अपना जीवन बेहतर जी रहे हैं।
गौरतलब हो कि जब वर्तमान प्रधानमंत्री गुजरात के मुख्यमंत्री हुआ करते थे तब उन्होंने राज्य भर में कई ऐसे केंद्रों की शुरूआत की थी जहां युवाओं को रोजगार मिल सके इसके लिए प्रशिक्षण दिया जाता था। शराफ कौशल केंद्र की तारीफ करने के लिए नहीं लिख रहा हूं बल्कि इसलिए आज इसपर कहानी सुना रहा हूं ताकि इस सक्सेस स्टोरी को देख पढ़ और सुन कर हम अपने आस पास के युवाओं के सपनां को पूरा करने में मदद कर सकें।
मैंन उन युवाओं से पूछा कि आपका सपना क्या है? तो एक ने जवाब दिया नौकरी करना। वहीं दूसरे ने कहा परिवार को सुख देना आदि आदि। इस केंद्र में वो सब चीजें सिखाई जाती हैं जो आईटीआई में कोर्स हुआ करती है। अंतर बस इतना है कि इन बच्चों से कोई भी शुल्क नहीं लिया जाता। अगर हमारे युवा सपने देख रहे हैं तो उन्हें पूरा करना हम नागर समाज की जिम्मेदारी बनती है।  
 

Thursday, March 8, 2018


कौशलेंद्र प्रपन्न
कल एक फ्रैंड का फोन आया उसका दाखिला दिल्ली विश्वविद्यालय में पीएचडी में हो गया है। ख्ुशी हुई। दोस्त है आखिर। पीएचडी करेगी। विषय पूछने पर जो बताया तब निराशा हुई। निराशा को साझा भी किया। आज की तारीख में विश्वविद्यालयों में होने वालों शोधों पर कितना समय और पैसे खर्च होते हैं इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है। कठिन तो यह भी नहीं है कि एक शोधकर्ता अपने जीवन का कितना अहम वक़्त शोध लिखने में लगाता है। उसके बदले उसे का़ग़ज के प्रमाण पत्र मिल जाते हैं। इसका और लाभ हो न हो समाज में दिखाने और नौकरी में थोड़ा और आगे जाने में मदद मिलती है।
यदि सम्मान की बात करें तो समाज में कोई ख़ास नहीं मिल पाता। डॉक्टर लिखने और बुलवाने में अच्छा तो लगता है। क्यों न लगे क्योंकि उसके लिए कम से कम पांच से छह साल तो छात्र खर्च करता ही है। उसके बाद क्या वह डॉ लिखने से भी चूके।
साहित्य शास्त्र कहता है कि किसी भी साहित्य की रचना के मकसद हुआ करती हैं। मसलन-अर्थ, प्रसिद्धी, समाज में सम्मान, भार्या प्रीति आदि आदि। सामान्यतौर पर साहित्य लेखन में और भी मकसदों को ध्यान में रखा जाता है। ठीक वैसे ही यदि पीएचडी के शोधों की बात करें तो इसमें भी मकसद तो होंगे ही। जैसे प्रसिद्धी, भार्या प्रीति, समाज में सम्मान आदि। लेकिन इससे एक कदम आगे बढ़कर समाज को क्या उस शोध से कोई मार्गदर्शन या बेहतर कार्ययोजना में मदद मिलती है? क्या शोध से समाज और देश को विकास करने में तर्कपूर्ण रणनीति मिल पाती है। सामान्यतः देखा यही जाता है कि आज की तारीख में शोध पुस्तकालयों और शोधार्थी की आलमारी में शोभा बढ़ाती हैं।
ख़ासकर भाषा, समाज विज्ञान, शिक्षा आदि क्षेत्र में हुए शोधों के शीर्षक शोध के मज़मून बता देते हैं। फलां शोध किस विषय को कवर करता है। मसलन कालिदास के साहित्य में वनस्पति और जीव जंतु, प्रेमचंद के साहित्य में स्त्री पात्र, जयशंकर प्रसाद की कविताओं में नारी चित्रण आदि आदि। क्या इन शोधों से समाज को कोई रोशनी मिलती है? क्या कोई दिशा मिलती है? कितने लोग उन शोधों को पढकर समाज को कुछ वापस लौटा पाते हैं? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनका उत्तर दिया जाना चाहिए।
कई शोध प्रपत्र बताते हैं कि भारत में होने वाले शोध ख़ासकर पीएचडी के वे कूड़े से ज़्यादा नहीं होते। उसमें भी भाषा घेरे में आती है। न केवल भाषा बल्कि अन्य मानविकी विषयों में कोई बेहतर स्थिति नहीं है। सवाल यह उठता है कि पीएचडी करने बाद क्या करने वाले की ज़िंदगी में कोई बड़ा बदलाव घटित हो जाता है या समाज में कोई अनहोनी घटना घटती है। शायद दोनों ही घटनाएं व परिणाम पोस्ट पीएचडी की ऐसी है जिससे अनुमान लगाया जा सकता है कि न तो समाज को और न ही साहित्य में कोई विशेष परिवर्तन दिखाई देता है। यदि स्वांतः सुखाए की गई है तो बात अलग है। पीएचडी करने में कोई आपत्ति किसी को भी नहीं हो सकती। बल्कि सवाल ज़रूर पूछा जाना चाहिए कि उस पीएचडी का औचित्य क्या है जिसका आम जिंदगी में इस्माल नहीं है। या जिससे समाज को कोई नई दृष्टि नहीं मिल पाती।

Monday, March 5, 2018

परीक्षा के डर पर चर्चा ए आम


कौशलेंद्र प्रपन्न
शायद पहली बार हुआ है कि जब प्रधानमंत्री, प्रेसिडेंट ने बच्चों को परीक्षा से पूर्व संवाद किया। संवाद करने के तरीके बेशक अलग थे। किन्तु संवाद तो स्थापित किया। इससे पहले किसी भी प्रधानमंत्री ने बच्चों की परीक्षा को शायद इस गंभीरता से नहीं लिया। यदि लिया होता तो बच्चों से संवाद भी करता। जो भी हो इस बार प्रेसिडेंट साहब ने भी परीक्षा से पूर्व बच्चों को बधाईयां एवं शुभकामनाएं दीं।
प्रधानमंत्री ने तो बाजाप्ता बच्चों से कांफ्रेंसिंग कॉल के ज़रिए संवाद स्थापित किया। इसमें केंद्रीय विदयालय और कॉलेज के छात्र भी शामिल थे। क्या उत्तर भारत, दक्षिण भारत, पूर्वोत्तर राज्य बल्कि जम्मू कश्मीर से लेकर लेह लद्दाख तक के बच्चों से जुड़कर परीक्षा बिना भय के संदेश संप्रेषित किया।
प्रो. यशपाल ताउम्र बच्चों को शिक्षा और परीक्षा बिना बोझ के लिए काम करते रहे। लेकिन आज तक तो बच्चे परीक्षा के भय से बाहर निकल सके। बल्कि प्रो. यशपाल जी ने तो नीतियों और समितियों के माध्यम से भी शिक्षा और परीक्षा को भय से मुक्ति दिलाने का प्रयास करते रहे।
आज तकनीक बदली है। संदेश प्रेषित करने के माध्यम बदले हैं। वैसे ही संदेश भेजने वाले का चेहरा भी बदला है। वह वह चेहरा है जो बच्चों में प्रिय बनने के लिए लालायित है। इतना ही नहीं विभिन्न राज्यों में शिक्षा के मार्फत घर घर बस्मे में पहुंच बनाना चाहता है।
साहब ने परीक्षा से पूर्व बच्चों से कहा कि परीक्षा में मुसकुराते हुए रहना। चिंता मत करना। लेकिन क्या ऐसा हो पाएगा? क्या बच्चे मुस्कुराते हुए परीक्षा भवन से बाहर आएंगे। अगर आ भी गए तो मई के अंतिम पखवाड़े में उनकी मुस्कुराहट खत्म हो जाएगी। उम्मीद तो की ही जा सकती है कि प्रधानमंत्री जी तब भी मन की बात करेंगे और कहेंगे चिंता मत करना। अगर फेल भी हो गए तो क्या अगला साल फिर बैठ जाना। अगर पास हो गए तो और भी अच्छा।
कितना अच्छा होता कि संदेश की बजाए ऐसी नीतियां बनतीं और उन नीतियों को अमल में भी लाया जाता जिनसे वास्तव में बच्चे चिंता और भय मुक्त हो परीक्षा दे पाते।

Thursday, March 1, 2018

मसान चारों ओर जहां चाहों खेलो होरी...


कौशलेंद्र प्रपन्न
शंकर को मसान की तलाश थी। शंकर थे तब उन्हें मसान ढूंढ़ना पड़ा होगा। अब शहर और गांव, महानगर चारां ओर मसा नही मसान है। कभी वक़्त था जब श्मशान शहर के बाहर हुआ करते थे। गांव या फिर कस्बे के सीमांत पर जला करती थी लाशें। अब तो शहर सिकुड़ते चले गए और मसान
शहर के अंदर ही आ गया।
इससे पहले की लोग धुत्त हो जाए कुछ समझदार लोगों से बात कर ली जाए। क्यों कल का असर आज से ही दिखने लगा है। एक दिन पहले ही बधाइयां भी आने लगी हैं। गोया मरना तो है ही क्यों न आज ही कफ़न ख़रीद कर रख लें। क्या पता कल को कफ़न के भाव बढ़ जाएं। लकड़ी और घी भी ख़रीदकर रख लेने में कोई हर्ज नहीं।
समझदार किस्म के लोग प्लान कर के लाइफ में चला करते हैं। ऐेसे लोग जीवन में सक्सेस होते हैं। चलिए हम भी थोड़े समझदार हो जाएं और मौत के सामना आज ही ख़रीद कर रख लें। होली में मसान क्यां जाया जाए? क्यों शंकर को मसान के लिए दर ब दर भटकना पड़े। उन्हें क्यों न शहर के भीतर ही मसान मुहैया करा दी जाए। सर्विस एट योर डोर।
अब तो मसान कहां नहीं है। कौन धुत्त नहीं है। क्या अस्पताल क्या स्कूल, क्या बैंक सब जगह मसान ही तो है। अस्पताल में ऑपरेशन उन अंगों का हो जाता है जो खराब नहीं है। स्कूल में बच्चे पढ़ने की बजाए मरने मारने जाते हैं। अब बताईए कौन धुत्त नहीं है। बैंक वाले अलग ही रो रहे हैं। बैकर को बीम बेचने कर अपना टॉरगेट पूरा करना होता है। टीचर को भी तो टारगेट मिलता है इतना प्रतिशत आना ही चाहिए। सो जैसे तैसे कर कर बच्चों को कूटते हैं।
सड़कों पर कौन पी कर नहीं चलता। सब होश को घर पर छोड़कर आते हैं। जैसे ही गाड़ी में खरोच आ जाए तो मर्डर किया जाता है। जब गाड़ी व्यक्ति से ज़्यादा अहम हो जाए तो बताईए और धुत्त नहीं है।
होली तो होली हम रोज़ ही रंगों की नहीं बल्कि ख़ून की होली खेला करते हैं। अभी अभी ख़बर आई है कि होली में सड़क पर हुड़दंग मनाना खतरे से खाली नहीं। साहब कहां हुड़दंगई नहीं है। संसद क्या इससे महरूम हैं। वहां भी रोज़ ही भाषाओं में खेला करते हैं होली। होली इज्जतों की। होली बिलों की और न जाने कैसी कैसी होली हो रही है।

Tuesday, February 27, 2018

लिखने से पहले....



कौशलेंद्र प्रपन्न
लिखना कौन नहीं चाहता। हर कोई जिसके पास कहने को कुछ है वह लिख लेना चाहता है। इधर के कुछ सालों में लिखने वालों की एक बाढ़ सी आ गई है। बैंक, कंपनी की नौकरी छोड़ पूरी तरह से लिखने के क्षेत्र में भी उतर चुके हैं। जिन्हें कंपनी में अच्छी सैलरी मिल रही थी उन्हें नौकरी छोड़ लेखन क्षेत्र में  आने की क्या पड़ी थी? सोचिए तो कई कहानी निकल कर आएंगी। उन्हीं कहानियों में लिखने की छटपटाहटें सुनाई देंगी। इसलिए लेखन क्षेत्र में आए क्योंकि कभी वे स्कूल या कॉलेज के दिनों में लिखा करते थे लेकिन नौकरी में आने के बाद लिखने का वक़्त नहीं मिलता। आदि
जो भी लिखने का अपना कार्य क्षेत्र चुना वे यूं ही अचानक नहीं उठ कर नहीं आ गए। बल्कि इस क्षेत्र में उतरने से पहले एक ग्राउंड रिसर्च किया। रिसर्च के साथ ज़रूरतों की पहचान की। साथ यह भी रिसर्च किया कि किस प्रकार की ऑडिएंस यानी पाठक वर्ग है जो वास्तव में पढ़ना चाहता है। पाठक वर्ग किस प्रकार की राईटिंग पढ़ने में दिलचस्पी लेगी आदि। यदि कहानी उपन्यास आदि में रूचि है तो किस प्रकार की कहानी या उपन्यास पाठक पढ़ना चाहता है इसपर उन लेखकों ने अच्छे से रिसर्च किया और फिर कंटेट का चुनाव किया। उदाहरण मांगेंगे तो चेतन भगत, अमीश त्रिवेदी आदि ऐसे नाम हैं जिन्हें बेशक गंभीर साहित्यकार साहित्यकार न मानते हों लेकिन उनकी किताबें लाखों में पढ़ी और खरीदी जाती हैं। एक प्रकाशक और लेखक देनां को ही मुद्रा और प्रसिद्धी हासिल हो रही है।
अंग्रेजी में इस प्रकार के लेखन और लेखकों की राइटिंग 2000 के आस पास शुरू होती है। और देखते ही देखते इनके नाम और किताबें पाठकों को खूब भाने लगीं। देखते ही देखते हिन्दी साहित्य में भी कुछ लेखक जो पहले से लिख तो रहे थे किन्तु बिना मार्केट रिसर्च किए लिखा करते थे। जिसका परिणाम यह हुआ कि सीमित पाठक वर्ग तक उनकी पहुंच रही। इश्क में शहर होना, प्यार कोई ब्रेकिंग न्यूज नहीं, पतनशील पत्नीयों के नोट्य आदि किताबें 2015 के बाद आई और पाठकों को खूब भाने लगीं। अब के नए लेखक नए नए कथानक और प्रस्तुती के आधार पर ख़ासा चर्चा में हैं।
लेखन से पूर्व रिसर्च और अध्ययन बेहद ज़रूरी चीजों में से एक है। अभ्यास कई बार आपको लेखक बना देता है। लेकिन अभ्यास भर से आप लेखन में ज़्यादा देर तक नहीं रह सकते। आपको खड़े रहने के लिए कंटेंट और कंटेंट की प्रस्तुती पर भी ठहर कर काम करना होता है। तब आपको बाजार हाथों हाथ उठाता है।
आप किसके लिए लिख रहे हैं? क्यों लिख रहे हैं? अपने लेखन से क्या हासिल करना चाहते हैं इन बिंदुओं पर रिसर्च करना बेहद ज़रूरी है वरना लिख कर अपने लैपटॉप या काग़ज़ का पेट ही भरेंगे और एक मुगालता ज़रूर पाल लेंगे कि आप लिखते हैं। यदि आप लिख रहे हैं तो उसका एक पाठक वर्ग भी जहां उस लेखन को पहुंचाना है। लिखना जितना आसान है उतना ही कठिन भी राह है। क्योंकि कुछ भी लिख देने से वे न तो छपती हैं और न ही पढ़ी जाती हैं। बल्कि पठनीय लिखने के लिए लेखकीय प्रतिबद्धता की भी मांग की जाती है।
यदि अख़बार, पत्रिका, जर्नल के लिए लिखना चाहते हैं तो पहले अपने उस टार्गेट अख़बार व पत्रिका को बारीकी से रिसर्च करें कि उसकी प्रकृति कैसी है? किस प्रकार की सामग्री छपती हैं? कहां आप लिख सकते हैं आदि। यदि आप पत्रिका या अख़बार की प्रकृति के अनुरूप लिखते हैं तब छपने की भी संभावनाएं ज़्यादा हो जाती हैं।
बाकी छपने के लिए लिखना ज़रूरी है और लिखने के लिए छपना दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।

Monday, February 26, 2018

प्रिये बच्चों (अकाल मौत के शिकार) !!!


प्रिये बच्चों (अकाल मौत के शिकार) !!!
नमन।
क्षमा के साथ यह फोटो साझा कर रहा हूं।
ग़मज़दा हूं। दुखी भी। दोनों ही मौतें हैरान और दुखी करने वाली हैं। एक ओर फिल्मी अदाकारा श्रीदेवी की असामयिक मृत्यु और दूसरी तरफ तुम बच्चों की अकाल मृत्यु। ग़लत समय में मरे तुम। समय का चुनाव सही नहीं था। जब श्रीदेवी की मौत हुई तब तुम्हें नहीं मरना था। समय सही चुनते तो शायद तुम्हारी मौत पर भी कुछ लोग, लोकतंत्र के पहरूएं कुछ संवेदना बयां करते। समाज के राजनीतिक हस्तिष्यां कुछ लिखतीं और बोलतीं। मगर तुम एक साधारण परिवार में जन्मे। साधारण से राज्य के एक शहर मुज़फ्फरपुर के सरकारी स्कूल में पढ़ते थे। मरना ही था तुम्हें। ट्रक या कोई भी वाहन आसानी से कुचल कर भाग सकती है। जो भाग गई। जिस राज्य में तुमने सांसें लीं। जन्म लिए। पढ़ने का हौसला रखा उस राज्य के मुखिया ने एक शब्द भी तुम्हारी मौत पर नहीं कहा। लेकिन अदाकारा की मौत पर मरसिया ज़रूर पढ़ आए।
तुम्हारी मौत भी असामयिक ही थी। बल्कि ज़्यादा दर्दनाक। सड़क पर तुम छटपटाते रहे होगे। लेकिन मालूम नहीं तुम्हारी सहायता के लिए कितने लोग आए होंगे। लेकिन उधर उनकी मौत पर लोकतंत्र के तीनों प्रमुखों ने अपनी गहरी संवेदना अभिव्यक्त की। उन्हें शायद यह ख़बर भी न मिली हो। क्यांकि तुम्हारी मौत से ठीक बाद उनकी मौत की ख़बर आ गई। निश्चत ही दूसरी वाली ख़बर बडी और वजनी थी। उस ख़बर की रफ््तार में तुम्हारी मौत की ख़बर पिछड़ गई। मुझे अब तक नहीं मालूम कि उस राज्य के शिक्षामंत्री, गृह राज्यमंत्री या किसी अधिकारी ने अपनी संवेदना प्रकट की है। बच्चों तुम्हें तो मरना ही था। या तो अकाल मृत्यु के शिकार होते या फिर भूख से मरते। यदि इन सब से बच भी जाते तो तुम्हें हम जीवन भर मारते रहते। तरीके कुछ भी हो सकते थे।
अब तो लगता है मरना और मौत भी फैशनेबल होनी चाहिए। जब आप मरें तो वह वक़्त भी माकूल हो। कोई बड़ा व्यक्ति न मरा हो। बजट का मौसम न हो। कोई बड़ी घटना न घटी हो। तब तो मरना फलेगा वरना मरे भी और चर्चा भी न हो। यह भी मरना कोई मरना है। बच्चों तुम तो तभी चर्चा में रहते हो जब या तो स्कूल में मरते हो, खाकर मरते हो, शौचालय में हत्या हो जाती है, या फिर मास्टर की मार से मरते हो। पूरी मीडिया तुम्हारी मौत पर मातम मनाती है। नागर समाज भी मोमबत्तियां लेकर कर शहर शहर, नगर नगर घूमते हैं।

Friday, February 23, 2018

टीचर बहनों के नाम खुली चिट्ठी



कौशलेंद्र प्रपन्न
हालांकि मेरी कलाई पर कई बहनों ने राखी न बांधी हो। साथ में बचपन न गुजारी हों। साथ लड़ी-झगड़ी भी न हों। लेकिन उन हज़ारां बहनों के साथ मेरी रिश्ता तभी जुड़ गया जब उन्होंने शिक्षा और शिक्षण में कदम रखा। जब वे डाइट से या फिर बीएड कर रही थीं तब से हमारा रिश्ता बन गया था।
मेरी बहन पिछले कई दिनों परेशान थी। बल्कि है। वैसी ही मैं समझता हूं कई बहने परेशान होती होंगी जब उन्हें क्लास में पढ़ाने जाना होता होगा। जब उनकी क्लास ऑब्जर्ब की जाती होंगी। जब उन्हें कहा जाता होगा कि फलां तारीख को तैयार रहें आपकी क्लास ऑब्जर्ब की जाएगी।
हालांकि क्लास ऑब्जर्ब हो इसमें किसी को भी कोई एतराज़ नहीं हो सकती। लेकिन इस फरमान से उपजे तनाव और चिंता को हम कभी भी नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते। मेरी बहन तनाव में थी। उसकी िंचंता थी कि क्लास रूम ऑब्जर्ब होने हैं उसके लिए पाठ योजना कैसे बनाएं। कैसे क्लास में शिक्षण करें ताकि ऑब्जर्बर खुश हो जाए और अच्छे कमेंट दे कर जाए।
चिंता तो कुछ और होनी चाहिए थी कि मैं अपनी कक्षा को कैसे रोचक तरीके से पढ़ाउं कि बच्चे आनंदविभोर हो जाएं। बच्चां की सहभागिता इस तरह की हो कि बच्चे तो बच्चे मैम भी उसमें शामिल हो जाएं। लेकिन इसके लिए प्लानिंग की ज़रूरत पड़ती है। और प्लानिंग के लिए सोचना होता है। यही सोचने की आदत व चस्का हमारी टीचर बहनां और भाइयों को नहीं दी जाती।
बातचीत में बहने ने बताया कि उसकी कक्षा में बच्चे बहुत शोर करते हैं। उसकी कक्षा के बच्चे उसकी बात नहीं मानते। शांत नहीं बैठते आदि। बहन ने फोन पर अपनी कहानी सुनाई। मैं सुनता रहा। जब रहा नहीं गया तो एक वाक्य कहा ‘‘ तुम क्यों चाहती हो कि बच्चे सुनें? क्यों सोचती हो कि बच्चे कक्षा में चुप्प बैठे रहें। क्यों चाहती हो कि बच्चे तुम्हारी बात मानें?’’ इसपर बहन रूंआंसी हो गई। कहने लगी आप नहीं समझते। प्रिंसिपल डांटती है। एकेडमिक हेट गुस्सा होती है। यदि क्लास में शोर हो रहा होता है।
मुझे मेरी बहन की बातों में सच्चाई तो लगी लेकिन कमी भी मिली। जब वो मान कर चल रही है कि बच्चे शरारती हैं। बच्चे नहीं सुनते यानी कहीं न कहीं वो एक नकारात्मक सोच की गिरफ्त में है। जबकि उसे बच्चों को कैसे मैनेज किया जाए और क्लास में कैसे सकारात्मक माहौल बनाएं इसकी समझ और योजना प्रशिक्षण के दौरान दी जानी चाहिए थी। मुझे बहनों से ज़्यादा प्रशिक्षण संस्थानों की कमी नज़र आती है। हमारे शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान महज शिक्षक बनने की पात्रता तो दे देते हैं। उन्हें दक्षता और शिक्षकीय कौशल प्रदान करने में पिछड़ जाते हैं। यही कारण है कि हज़ारों लाखों टीचर डिग्री तो हासिल कर लेते हैं लेकिन जब क्लास में प्रवेश करते हैं तब उन्हें ख़ासा मुश्किलें आती हैं।
मेरी हज़ारों बहनें याद रखो- क्लास की तुम मालकीन हो। तुम जैसे अपने कीचन को सजा संवार कर रखती हो वैसे ही क्लास को भी सजाना होता है। उन्हें हमेशा डस्टिंग भी करते रहना होता है। तब जा कर आपकी क्लास चमकती है। और आपको अपने कीचन में जाने में तब डर नहीं लगता तब सब साफ सुधरा और आपके मनोनकूल हो। आपको अपनी कक्षा भी अनुकूलित करनी होती है। जो पढ़ाओ पूरी शिद्दत से पढ़ावा। यह चिंता किए बगैर कि कोई ऑब्जर्ब कर रहा है। आप ख्ुद ऑब्जर्बर बनोगी तब आपको किसी से भी डर नहीं लगेगा।
अगर फिर भी डरती हो तो लिखो न यहां पढ़ाने में क्यां डरती हो? क्यों ऑब्जर्ब होने भय खाती हो? मिल कर संवाद करते हैं।

Wednesday, February 21, 2018

कभी देखिएगा शाम




कौशलेंद्र प्रपन्न
किसी शाम आप यूं ही बैठे हैं। कभी मायने कभी। जब से जॉब करने लगे हैं। जब से कॉलेज पूरे हो गए। जब से शादी हो गई आदि आदि। अव्वल तो कई कई दफ़ा आफिस में ही शाम हो जाया करती है। आते तो सुबह हैं जब सूरज उग चुका होता है। दोपहर भी कभी कभी देख लिया करते हैं यदि दफतर से बाहर निकले तो। लेकिन अरसे हो जाते हैं शाम न देखे। शाम देखने का मतलब बिना कुछ करते हुए बस यूं ही एक टक सूरज को ढलते देखना। देखना उसकी कम होती लालिमा को। धीरे धीरे आसमान का रंग बदलना। वैसे यह भी कोई देखना हुआ। आप कह सकते हैं? देखना ही है तो शाम की रौनक देखिए। देखिए बाजार कैसे जगमग जगमग हो रहे हैं। देखिए सड़के कैसे गाड़ियां की लाइट से झिलमिलाने लगती हैं।
शाम भी कोई देखने की चीज होती है। उदास और बेलौस। मगर नहीं कभी देखनी ही हो शाम को तो कन्याकुमारी में देखें। पटाया में देखें। मुंबई या किसी भी समंदर किनारे देखें। या फिर मनाली, कुल्लू या फिर खजियार में देखें कैसे देखते ही देखते पहाड़ी में गुम हो जाता है दिन और कैसे अचानक शाम उतर आती है घाटियों में। देखते ही देखते पहाड़ के घरों में रोशनी जलने लगती है।
ये सब कल्पना नहीं हैं। न ही यह कहानी का कोई प्लॉट है। बल्कि हक़ीकत है। यदि आपने शिद्दत से शाम होती देख ली तो सच में उस शाम को अपनी डायरी या फिर स्मृतियों में संजो लेंगे। लेकिन अफ्सोस कि हमारे पास संजोने को शाम नहीं है। कब सुबह होती है और कब देखते ही देखते शाम हो जाती है इसका एहसास तक नहीं होता।
बड़े बड़े शहरों में तो रात भी कहां होती हैं। कहां होती है अंधेरी रात। अंधेरा देखने के लिए आपको सीमांत में जाना होगा। हर तरफ रोशनी ही रोशनी। कई बार इतनी ज़्यादा रोशनी से आगे मिचमिचाने लगती हैं। कई बार जी चाहता है कुचकुच अंधेरी रात देखें। देखें अंधेरे में आसमान से ताकते तारों को। मगर दिल्ली क आसमान में तारे गोया आते ही नहीं।
कभी गुलमर्ग तो कभी कन्नाताल में शाम और रात दोनों देखी है। रात में इतने सारे तारे कि आंखें कम पड़ जाएं। कितने तारों को आंखें में जगह दी जाए। कहते हैं रात वो भी काली रात डरावनी होती है। मगर मेरी मानें रात कभी भी डरावनी नहीं होती। बल्कि रात जितनी खूबसूरत कोई और नहीं होती।
कभी देखिएगा शाम को। शाम वही जो आपके गांव में मिला करती थी। मिलती थी दूर ख्ेतों में चहलकदमी करती हुई। मैंने भी कभी शाम देखी है। मगर हज़ारों ऐसे लोग हैं जिनका काम इसकी इज़ाजत नहीं देता कि वो शाम देखें। मीडिया हाउस हो या रिसर्च या फिर डॉक्टरी पेशा इसमें हर वक़्त लाइट और लाइअ में काम करने पड़ते हैं। जब अचानक बाहर आते हैं तो आंखें प्राकृतिक रोशनी में चौंधिया जाती हैं।

Tuesday, February 20, 2018

कहानी बुनों तो सही




 कौशलेंद्र प्रपन्न
चित्र में आप दो टीम को पीछे देख रहे हैं। यही वो टीम है जिन्हें निर्णायक मंडल ने आम सहमति से विजेता चुना है। विजेता वे भी कहानी बुनने में। कहानी के बुनकरों को बधाई। संभव है आज के समय में हम कहानी बुनना तो दूर कहानी सुनना और सुनाना जैसे गैर उत्पादक कामों को तवज्जो न दें। लेकिन आने वाली पीढ़ी जब कहानी की मांग करेगी तो क्या देगें हम? सोचिए और पढ़ें आज की बात-
वैसे हमसब कहानी बुनने में तेज हैं। तेजी से कहानियां बुन लिया करते हैं। परिस्थिति जो भी हो। यही कारण है कि हम अपनी बात और कई बार अपनी पीड़ा भी कहानी के ज़रिए कह दिया करते हैं। लेकिन कल्पना कीजिए आपको चार मिनट का मौका मिले और कहा जाए चलिए साहब इस मसले पर कहानी बुनें। तब चुनौती बड़ी हो जाती है।
श्री राम कॉलेज ऑ कॉमर्स के हिन्दी विभाग में स्पंदन कार्यक्रम में सुनने और गुनने को मिला। विभिन्न कॉलेजों से आए छात्रों ने कहानी बुनने में अपनी दक्षता दिखाई। उन तमाम छात्रों ने अपनी काबिलीयत का परिचय दिया जिन्होंने कहानियां बुनीं। कहानी बुनने की प्रक्रिया और उस कालखंड़ का चस्मदीद गवाह बनने का अवसर मिला। कैसे बच्चे कहानियां बुन रहे थे। बल्कि कहानी कह रहे थे।
कहानी बुनने और उसके बाद कहानी कहने में अंतराल इसलिए दिया गया ताकि आपसी तालमेल बैठाया जा सके। गौरतलब है कि कहानी बुनने वाला अकेला कत्तई नहीं था। बल्कि दो लोगों को एक साथ कहानी बुननी थी। है न दिलचस्प !!!
कहा हम साथ साथ चल नहीं पाते। चलते हैं तो लड़खड़ाते हैं। उसपर तुर्रा यह कि दो लोगों को एक साथ कहानी की घटना, संवाद, कथानक और प्रवाह सब खुद ही आपस में तय करना था। इसमें आपसी मंथन, एकीकृत सोच और संवाद को जीवंत बनाने के लिए वाक्यों, संवेदनाओं को होना नितांत ज़रूरी है।
कहानी बुनने की पूरी प्रक्रिया का गवाह रहा तो यह भी जिम्मेदारी बनती है कि मैं आपको बताउं कि कुछ छात्रों ने अच्छी कहानियां बुनीं। कुछ बच्चों के कंटेंट अच्छे थे। तो कुछ ज़्यादा ही जल्छबाज़ी में थे। जल्दबाज़ी बुनने में नहीं थी बल्कि कहानी कहने में थी। यहां अंतर समझते चलें कि कहानी बुनना और कहानी कहना दो अलग अलग कौशलों की मांग करती हैं।
न जाने हमारे छात्र क्यों रफ्तार में थे ज बवे कहानी सुना रहे थे। बहुत तेजी से आगे बढ़ जाना चाहते थे। शायद यहीं पर कहानी सुनने और कहने का आनंद जाता रहता है। हालांकि वक़्त की पाबंदी थी। तय समय में ही कहानी कह देनी थी। सवाल है क्या कहानियां कही जाती हैं? या कहानियां सुनाई जाती हैं। यदि यह अंतर छात्रों में बता दिया जाता तो शायद पवे कहानी बुनने और सुनाने के कौशल से महज दो टीम ही नहीं बलिक और टीम भी पुरस्कृत हो पाती।
बहरहाल जो हो कहानी बुनी गई। कहानी सुनाई गई। सुनने वाले भी अघाए। कहानी सुनकर जिन्हें निर्णय देना था वे भी आनंदित हुए। साधुवाद डॉ रवि शर्मा का जिन्होंने हमेशा ही हिन्दी साहित्य सभा, श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में नवाचार करते रहते हैं।

Thursday, February 15, 2018

कैसे रखें अपनी बातें



कौशलेंद्र प्रपन्न
कहना एक कला है तो इसे विकसित भी कर सकते हैं। आज काफी वक्ता और प्रोफेशनल इस फील्ड में उतर चुके हैं जो ज्ञान और अनुभव साझा किया करते हैं कि जीवन में कैसे आगे बढ़े। कैसे ऑफिस और घर को मैनेज करें आदि। उसी प्रकार से बाज़ार ऐसे वक्ताओं और प्रोफेशनल से भरे हुए हैं। पैसे दीजिए और गुण सीखिए। कहते हैं यदि आपके पास कहने का हुनर है तो ख़राब से ख़राब कंटेंट को सुना सकते हैं। ज्ञोताओं की भीड भी मिल जाएंगी।
दो बातें प्रमुख हैं बोलने से पहले शब्दां का चयन बेहद ज़रूरी है।उसके बाद अपनी बात को किसी कहानी या कथन से शुरू की जाए तब भी श्रोता सुनते हैं। हां यदि कहानी लंबी हो गई तो बारीयत की स्थिति पैदा हो सकती है। इससे बचने के लिए श्रोताओं को हमेशा नज़रों में रखना होता है।
ज़रूरत इस बात की है कि क्या आपको श्रोताओं के अनुसार बोलना और बतियाना आता है। क्या आप मनोदशा और मनोस्थिति के साथ परिवेश को ध्यान में रखक रबात कर सकते हैं। आज की तारीख़ी हक़ीकत है कि हर कोई बोलना और सुनाना चाहता है। लेकिन कैसे सुनाएं व कैसे बोलें कि हर केई सुनने में दिलचस्पी ले इसके लिए सावधानियां बरतनी पड़ती हैं। साथ ही कहने के कौशल को मांजना होता है। बिना अभ्यास और कौशल के अच्छे कंटेंट बरबाद हो जाते हैं।


Wednesday, February 14, 2018

किताबें रिश्ते बुनती हैं मानें या न मानें



कौशलेंद्र प्रपन्न
आज की ही बात है। मेट्रो में सुबह बैठा किताब पढ़ रहा था। किताब थी ‘‘इमेजिनेशनः नो चाइल्ड लेफ्ट इंभिजिबल’’ एक सज्जन अपने तकरीबन चौदह साला बेटे के साथ मेरी सीट के बगल में बैठे। अपने बेटे से लगातार बात कर रहे थे और मेरी किताब पर भी उनकी नज़र थी।
हालांकि मेट्रो में लगातार हमें ताकीद किया जाता है कि अपरिचितों से बात न करें। आदि लेकिन ऐसे कई मर्तबा हुआ है कि मैंने भी कई बार साथ बैठे वाले ने भी बातचीत का सिलसिला शुरू किया है। कई बार इतनी अच्छी बात और व्यक्ति मिला करते हैं लगता है इनसे तो रोज़ ही मुलाकात होती रही है।
ऐसे ही रफ्ता रफ्ता तीस हज़ारी स्टेशन पर उन्होंने कहा कितनी अच्छी बात लिखी है इस किताब में। कैसे बच्चों से बात करें। नकारात्मक बात न करें। हमेशा प्रोत्साहन वाले अंदाज़ में बच्चों से बात करें। बात करें। भाषा कैसी हो। सचमुच किताबें एक अच्छी दोस्त होती हैं। वो जनाब लगातार बोले जा रहे थे। मुझे भी बुरा नहीं लगा। क्योंकि एक किताब का प्रेमी जो मिला था।
दूसरा वाकया कोलकाता से दिल्ली लौटने के दौरान साथ बैठे फ्लाइट सहयात्री काफी देर के बाद बोल पड़े। कौन सी किताब पढ़ रहे हैं? क्या लिखा है? पाकिस्तान तो हमें बरबाद करने पर तुला है और आप एक पाकिस्तानी लेखिका की किताब पढ़ रहे हैं आदि।
जब उस किताब का मजमून बताया तब थोड़े झेप गए। क्यांकि वह किताब ‘‘1947 दिल्ली से पाकिस्तान भाया पिंड’’ सबूहा ख़ान की आटोबायोग्राफी थी। जिसमें उन्होंने बड़ी ही संजीदगी से तकसीम के मंज़र को भोगा और जीया हुआ यथार्थ लिखा था।
लेकिन अच्छा लगा उनके हाथ में भी एक किताब थी जो हडसन लेन, कैंप, आदि को आधार बनाकर प्रेम आधारित अंग्रेजी की किताब थी। जब मैंने उसे उलट पुलट कर देखा तो बड़ी घोर निराशा हुई। किस प्रकार नवोदित लेखक ने प्रेम और दोस्ती को इन जगहों पर फैला कर बीच बीच में सेक्स का छौंक मार कर लिखा था।
जो भी हो। मैंने तो यही पाया है कि जब भी आप अच्छी किताब पढ़ते हैं तो न केवल आपको बल्कि कई बार सामने वाले की नज़र भी बदल देती है। दोस्ती तो आपको घलुआ में मिल जाया करती है।
अच्छी किताबें और अच्छे दोस्त इस भीड़ में बहुत मुश्किल से मिला करते हैं। उन्हें बचा कर रखना भी ज़रा कठिन होता है। लेकिन चाह लें तो दोनों ही चीजें बचाई जा सकती हैं।

Tuesday, February 13, 2018

प्रेम पहला या दूसरा



कौशलेंद्र प्रपन्न
प्रेम पहली दफ़ा या दूसरी बार। लेकिन कहते हैं कि प्रेम तो प्रेम होता है। वह न पहला होता है और न दूसरा या फिर आख़िरी। करने वाला प्रेम किस मनसा से कर रहा है। यह भी काफी कुछ तय करता है कि प्रेम का स्वरूप और बारंबारता क्या होगी।
कभी इन पंक्तियों के लेखक से बात करते हुए निर्मल वर्मा जी ने कहा था कि मैंने तो जीवन में दूसरी बार प्यार किया। यह जवाब ज़रा हजम नहीं हुआ। सो आग्रह किया कि कृपया इस वाक्य का खुलासा करें। तब उन्होंने कहा पहली दफ़ा हम अपने मन और चिंतन में प्यार करते हैं। किससे करने वाले हैं। प्रकृति है या मनुष्य। जीव है या जीवन। लेखन है या भ्रमण। दूसरी बार हम सोचे हुए प्यार को एक्जीक्यूट किया करते हैं। तो इस तरह से हम कभी भी पहली बार प्यार नहीं करते।
आज देखें तो व्यक्ति जीवन भर प्यार के लिए तड़पता रहता है। लेकिन सच्चे प्रेम की तलाश में जीवन और जगत रीत जाता है। दरअसल सच्चा और झूठा प्रेम का तय कौन करे। मसला यह भी है। जो हमारे समाज में अश्लील है। वह संभव है दूसरे समाज में एक सामान्य और सहज व्यवहार माना जाए। इसलिए यह तय करना ज़रा मुश्किल है कि कौन सा प्रेम और कौन सी प्रेमाभिव्यक्ति सहज और कौन सी अस्वीकार्य।
समाज और और समय बदलते ही मान्यताएं भी बदल जाती हैं। यह इतनी तेजी से घटित होता है कि हम खुद को संभाल भी नहीं पाते। दो से तीन घंटे में या फिर रातों रात हम वैश्विक नागरिक हो जाते हैं। हमारे खान पान, रहने सहन, पहनावा आदि सबकुछ बदल जाता है। जहां हम भारत में पूरे तन के कपड़े पहने होते हैं और जैसे ही एयरपोर्ट पर उतरते हैं वैसे ही कपड़े कम और कमतर होते जाते हैं। यह देखे बगैर कि जो कपड़ा पहन रहे हैं क्या हमारी बॉडी उसमें अट भी रही है या नहीं। क्योंकि वहां की दुनिया वही पहन रही है इसलिए हमें भी पहनना है। ठीक वैसे ही प्रेम का मसला भी है।
क्योंकि किसी देश व समाज में प्रेम बंधन नहीं है। वस्त्र किसी के चरित्र प्रमाण पत्र नहीं है। वहां हम अपनी सोच और चिंतन छोड़ वहीं की संस्कृति अपनाने लगते हैं। हालांकि इसमें किसी को कोई एतराज़ भी नहीं होगा कि वैश्विक संस्कृति और नागरिकता हमें विश्व बंधुत्व की ओर ले जाती है। ऐसे में दूसरे की संस्कृति भी स्वीकार करने और मान्यता देने का माद््दा हो।

शिक्षकीय दुनिया की कहानी के पात्र

कौशलेंद्र प्रपन्न ‘‘ इक्कीस साल के बाद पहली बार किसी कार्यशाला में बैठा हूं। बहुत अच्छा लग रहा है। वरना तो जी ...