Friday, November 1, 2013

स्थानांतरित लोग


सरकारी स्तर पर नहीं बल्कि वो उसकी मर्जी से इह लोग से उस लोक के लिए स्थानांतरित होते हैं। इसमें आपकी मर्जी का ख़्याल नहीं रखा जाता। न ही आपसे पूछा जाता है कि कब माईग्रेट होना चाहते हैं। आपकी सर्विस बुक भी उसी के पास है। वो आपके कर्र्मां का मूल्यांकन, परीक्षा और ग्रेडिंग करता है। जिस दिन जन्म लेते हैं उसी दिन आपकी सर्विस बुक में अवकाश प्राप्ति के दिन भी दर्ज कर दिए जाते हैं।
राजेंद्र जी गए, के पी सक्सेना जी गए जिन्होंने उसकी नजर में अवकाश हासिल किया। हम सभी को जाना ही है। यह अलग बात है कि हम किस तरह की सर्विस बुक लेकर उस लो जाते हैं।
साहित्य ही क्यों हर वो जगह हमारे जाने के बाद रिक्त तो होता ही है। लेकिन ठीक सर्विस की तरह आपके स्थान पर कोई और नियुक्त होता है। इस तरह से यह सिलसिला बतौर चलता रहता है।
जिस तरह आप सर्विस से विदा होते हैं उसी तरह आपके जाने के बाद आपकी आलमारी, दराज  आदि सब खाली कर साफ किया जाता है। आपकी चिंदींया, कतरनें, दवाइयां सब कुछ झाड़ पोंछ कर नए सिरे से सब कुछ सजाया जाता है।
तो बंधु जाने से पहले अपने दराज, आलमारी आदि को इस तरह साफ कर के जाएं कि जाने के बाद लोग यह न कहें क्या कबाड़ा किया उसने। ध्यान रहे कि आपकी याद तो आएगी लेकिन गलत कामों के लिए। कुछ दिन बाद ही सही आपका मूल्यांकन बचे हुए लोग करेंगे।

Wednesday, October 30, 2013

गरियाते क्यों नहीं भाई साहब


गरियाना क्यों छोड़ दिया,
जब मैंने कहा कहानी कविता उपन्यास का दौर खत्म हो गया,
मैंने ही छेड़े जब विवाद रंगों के,
रंगों की दुनिया और राजनीति की बात जब कही,
तब तो आपने खूब कोसा,
अब कोसना क्यों छोड़ दिया भाई साहब।
आपके गरियाने में आनंद था
जीवंतता थी,
अपनापा था और था रोज आपसे मुखातिब होना का सबब,
जब से गरियाना छोड़ दिया सूना सूना लगता है रोजनामचा।
गरियाइए कि मैं ही था जिसने आपको काहिल कहा-
मैं ही था जिसने सभा में,
मंच पर आप पर आरोप लगाए,
मगर आप थे कि गरियाना छोड़ दिया था,
गरियाइए भाई साहब।
क्या अब गरियाने का रिश्ता भी खत्म हो गया-
नहीं भाई साहब,
दोस्त न सही गरियाने का संबंध तो रहना ही चाहिए,
कम से कम एक दूसरे को याद तो किया करते थे,
गरियाइए कि मैंने ही भूगोल से उन्हें धकीया दिया,
भाषा की पगड़ंडी से मैंने ही उन्हें घिसुका दिया,
गरियाने का फर्ज तो बनता है भाई साहब।

लालित्य ललित की काव्य-भूमिः प्यार, भूख, नदी,लड़की और गांव का ख़त

लालित्य ललित के काव्य संसार
प्रिय लेखक लालित्य ललित के काव्य संसार में झांकने, ठहर कर देखने और आनंद लेने का मौका मिला। वास्तव में एक व्यंग्यकार जब कविता कर्म में रत होता है तब उसकी लेखनी में मूल स्वर व्यंग्य के तो होते ही हैं साथ ही उसमें काव्य-रस का भी प्रवाह होता है। यह एक व्यंग्यकार से कवि की भूमिका में अंगीकृत लालित्य ललित पर एक नजर आगामी वृहत्तर रूप में प्रकाशन घराने से छपने वाली पुस्तक व पत्रिका में भी पढ़ी जा सकेगी।

-कौशलेन्द्र प्रपन्न
‘गद्यः कविनाम निकषं वदंति’ बहुत प्रसिद्ध संस्कृत का सूत्र वाक्य है यानी कवियों के लिए गद्य एक निकष के समान होता है। दूसरे शब्दों में, गद्य की रचना काव्य से कहीं ज्यादा चुनौती भरा माना गया है। गद्य की साधना और फिर काव्य सृजन में प्रवृत्त होना दोनों ही प्रकारांतर से साहित्य की दो धारी तलवार पर चलने जैसा है। कई साहित्यकार पहले कवि कर्म में प्रवृत्त हुए फिर गद्य में उनका स्थानांतरण हुआ। काव्य रचना अपने आप में एक कठोर शब्द साधना से जरा भी कम नहीं है। लालित्य ललित वह नाम हैं जिन्होंने दोनों ही विधाओं में खुद को साधा और तपाया है। इसलिए इनका काव्य-संसार विविध आयामों के द्वार खोलते हैं। हिन्दी काव्य इतिहास पर नजर डालें तो छंद-बद्ध और छंद- मुक्त काव्य सृजन की लंबी परंपरा रही है। आगे चल कर काव्य में कई धाराएं एवं उपधाराएं देखी जा सकती हैं। बतौर लालित्य ललित ‘एक सच्ची कविता का राग-द्वेष से कोई नाता नहीं, चाहे किसी भी खेमे की कविता हो। किसी का लहू हो। आज वह लहू चाहिए जो वक्त पड़ने पर देश की रक्षा, मां की इज़्ज़त, बहन की लाज बचा सके। किन्तु जो चीज तमाम धाराओं में गुम्फित रही हैं वह है आम व्यक्ति, समाज, प्रकृति की छटपटाहटों को व्यक्त करना। यही निदर्शन हमें ललित की काव्य रचनाओं में प्रचूर मात्रा में मिलती हैं। मूलतः व्यंग्यकार ललित की रचनाओं में एक टीस, एक वेदना और साथ ही समाज की बजबजाती संवेदनाओं पर प्रहार करती इनकी कविताओं की प्राण वायु हैं। जब एक व्यंग्यकार कवि हृद होता है तब काव्य में एक अलग हुंकार सुनाई देती है। यही अनुगूंज ललित की कविताओं में प्रतिध्वनित होती हैं। व्यापक काव्य भूमि पर काव्य प्राचीर कर्मी ललित कभी लड़कियों के विविध रूपों, लावण्यताओं, प्रारूपों, आकर्षणों को अपनी कविता में जगह देते हैं वहीं परिवार-समाज की धूरी हमारे वृद्ध वृक्ष की उपेक्षा की ओर भी ध्यानाकृष्ट करते हैं। काव्य में प्रकृति तो है ही। उसकी बुनावट बाह्य और आंतर दोनों ही धरातलों पर देखी-सुनी जा सकती है।
आज के दौर में जहां रिश्तें महज सूत्रों में बनते बिगड़ते हैं। जहां हर रिश्ता कुछ न कुछ वजह और स्वार्थ से बुने जाते हैं ऐसे समय में कवि सावधान तो करता ही है साथ ही सुझाव भी देता है-‘जिन्हें तुम चाहते हो/ और सच्चे मन की मुराद/हमेशा पूरी होती है/अगर किसी को भी चाहो/ तो निष्कपट चाहो/पूरी शिद्दत से चाहो।’ यह चाहना महज किसी को प्रेम पत्र लिखने से कहीं ज्यादा मुश्किल है। लेकिन इसे भी ललित के यहां फलित देख सकते हैं। इंसान की ख़्वाहीशें बहुत होती हैं। वह बड़ा आदमी बनना चाहता है, लेकिन एक अदद पूर्ण इंसान बनने की इच्छा सांसारिक भाग-दौड़ में कहीं पीछे छूटती चली जाती हैं। उस ओर इंशारा देखिए-‘ छोटे-छोटे चक्करों में लगा है/छोटा आदमी/और बड़ा आदमी/बड़े-बड़े चक्करों मंे रमा है। इसी कविता की अन्य पंक्तियों के सहारे आगे बढ़ंें तो पाएंगे कि सुर्खियों में भी नहीं आता/केवल चंद पंक्तियां/अज्ञात युवती को/अज्ञात गाड़ी/सवार ने कुचला/मौके से गाड़ी चालक फरार। इन पंक्तियों को पढ़ते हुए महसूस करना कठिन नहीं कि जिस तरह की सहजता और सरलता वाक्यों में है उससे कहीं अधिक गंभीरता उसमें बज़्ब भावनाओं में हैं जिसे कवि प्रेषित करना चाहता है।
तकनीक पर सवार समाज के सामने सबसे बड़ी और कठिन चुनौती यह है कि वह अपनी संवेदना और सामाजिक प्रतिबद्धता किस प्रभावशाली माध्यम में करता है। जब पाठकों का संसार नित नए माध्यमों में ढलेगा तो ऐसे में साहित्कार की लेखनी भी कीपैड में तब्दील होगी ही। यदि ऐसा नहीं करता तो वह एक व्यापक जन-पाठकों तक पहुंचने से महरूम हो जाएगा। लेकिन ललित ने इस नए माध्यम को भी साधा है और कवि के सामाजिक दरकार को भी निभा रहा है। सोशल मीडिया के नए अवतार को नकारा नहीं जा सकता। जिसमें फेसबुक, ट्वीटर जैसे माध्यमों में अपनी बात रखना भी एक कला है। जिसे ललित रोज-दिन बखूबी निभाते हैं। फेस बुक पर रोज एक नई भाव-भूमि की कविता परोसना इन्हें खूब आता है। यहां भी इन्हें पाठकों कमी नहीं है। पाठक न केवल इनकी कविताएं पढ़ते हैं, बल्कि उसपर अपनी टिप्पणियां भी देते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि जो लोग यह स्यापा करते हैं कि पाठक अब नहीं रहे। पाठकों की कमी हो गई है आदि यह यहां बेईमानी लगने लगता है। पाठकों को कम समय में ,कम भटके यदि उचित, सार्थक कविता व रचनाएं मिलें तो उसे जरूर पढ़ता है। इस दृष्टि से ललित की फेसबुकीए कविताओं का संसार भी सराहनीय है। काव्य संग्रह आने में महिनों और साल लगते हैं। यह किसी से छुपा नहीं है। तो क्या कवि की कविताओं से पाठक अज्ञात रहे। नहीं यह अज्ञातवास ललित रोज तोड़ते हैं और फेसबुक पर इनकी कविताओं को पढ़ा जा सकता है। ललित की इन दिनों की फेसबुकीए कविताएं एक खास अंदाज और रूख की ओर इशारा करती हैं। वह बुढ़ा, अस्पताल, लड़की,किसिम किसिम के लोग आदि ऐसी कविताएं हैं जिन्हें पढ़ते वक्त एक चलती फिरती कहानी, घटनाओं से रू ब रू होने जैसा है।
दीवार पर टंगी तस्वीर, गांव का खत शहर के नाम, इंतजार करता घर, यानी जीवन सीख लिया और तलाशते लोग लालित्य ललित की काव्य दुनिया में प्रवेश के द्वार हैं। जिसे काव्य-संग्रह भी कहा जाता है। इन काव्य-संग्रहों में वैविध्यता कई दृष्टिकोणों से है। कहीं खतूत हैं गांव के नाम तो कहीं दीवारों पर टंगे लोग हैं। जहां पत्राचार अब पुराने जमाने की बात सी लगती है। लेकिन कवि यहां भी खत लिखने-भेजने की आदत से बाज़ नहीं आता। आज भी कुछ लोग हैं जो तमाम तकनीक के आ जाने के बावजूद ख़त की महत्ता को भूल नहीं पाएं हैं। एक बानगी देखें खत की शक्ल में कविता-
उस दिन डाकिया
बारिश में
ले आया था तुम्हारे प्यारी चिट्ठी
                           उसमें गांव की सुगंध
                           मेरे और तुम्हारे हाथों की गर्माहट से
मेरे भीतर ज्वालामुखी फूट पड़ा था
सच! बहुत सारी बातें लिख छोड़ी थीं तुमने -
״समय से काम पर जाना
ठीक वक्त पर ख़ाना खाना
और सबसे जरूरी शहरी सांपिनों से दूर रहना
कितना ख़याल रखती हो मेरा
या कहूं कि अपना।
जमुना देवी
काली मंदिर के पास
चमारों की गली
गांव और पोस्ट आॅफिस-ढ़ूंढसा
जिला-अलीगढ़
उत्तर प्रदेश।

और इस कविता का अंत भी पत्राचार की शैली में अंत में पता के साथ होता है। ऐसे में ललित भी शामिल हैं। सच पूछें तो यह कवि का सहज उदगार आज की तारीख में ज्यादा मायने रखती है इसे कई संदर्भों में देखे-पढ़े जाने की आवश्यकता है। सड़क पर कूड़ा बिनते बच्चों की ओर किसका ध्यान जाता है। कौन इनकी भावनाओं को अपना मानता है? ऐसे दौर में ललित की कविता अनाथ गौरतलब है-
भोर होते ही
ठंड से सिकुड़
झोपड़ी से बाहर आ गया
चंदू।
चल पड़ा आजीविका की ओर
गली-गली
पड़े कूड़े के ढेर में
ढ़ूंढने लगा
पाॅलिथीन की थैलियों को
अधजली तीलियों को।
तमाम अच्छी कविताओं में कुछ ऐसी कविताएं भी मिलेंगी जो हमें अंदर झांकने, ठहर कर सोचने पर विवश करती हैं। ऐसी ही कविता 6 दिसम्बर 1992 और निगम बोध हैं। निगम बोध वास्तव में बोध कराता है कि अंततः हम कहां पहुंचने वाले हैं-
यहां का रास्ता
दुनिया का वास्ता
अकेला आया था
गया अकेला है
रोये-धोए कुछ दिन
दुनिया की रफ्तार
पकड़ न सकी समय को
निष्ठुर प्राणी
मौसम हावी
पूरक है इस समाज के।
कवि की व्यापक दृष्टि और विभिन्न भाव-भूमि की कविताएं उसे सर्वजनीन बनाती हैं। इधर की कविताओं में जिस तरह से सामाजिक दरकारों, हाशिए के लोगों को दरकिनार किया गया है यह दर्शाता है कि कवि अपने समष्टि-निष्ठा से पल्ला झाड़ रहा है। लेकिन इस निकष पर जब हम ललित की कविताओं का पड़ताल करते हैं तब एक सात्विक तोष होता है कि नहीं अभी भी कुछ कलमें हैं जो डक्यूमेंटेशन में लगी हुई हैं। ‘इंतजार करता घर’ अंठावन कविताओं का यह घर धौलाधार, हिमाचल की लड़कियों की दर्शन तो कराता ही है साथ ही कवि चिंता इससे कहीं आगे तक जाती है। इसकी बानगी देखी जा सकती है।
कितना अच्छा होता
यदि लोग गरीब न होते
औरतें शरीर न बेचतीं
बच्चों का बचपन संग होता
नलों में पानी रहता
सड़कों पर भय न होता
पुलिस भी ‘रक्षक‘ होती
मास्टर भी ‘गुरु‘ होते
कोई अनाथ महसूस न करता
गलियों में गर्भपात न होता।
देखने में यह कविता बेशक छोटी काया की है लेकिन इसकी चिंता इसकी काया से बाहर झांकती नजर आती है जो कहीं लंबी है। विमला कविता दो वजहों से खास बन पड़ी है जिसमें आज की शिक्षा व्यवस्था जिस तरह से कुछ ही इलाकों, शहरों, गांवों में पांव धर पाया है साथ ही गांव में किस कदर शहर की गंदी आदतें पहुंच चुकी हैं इस पर गांव की विमला कविता बेहतरीन है।
गांव में नही आती बिजली
नहीं मिलती शिक्षा
नहीं पहुंचते अध्यापक
नहीं पहुचती समय से पगार
पर समय से पहुंच जाती हैं
कच्ची शराब की थैलियां बेहिसाब
गुटखों की सौगात
तंबाकू के बोरे
पूरा गांव नशे में है
औरते़़ं ठगी-सी खड़ी हंै़
विमला व्यक्तिवाचक संज्ञा से बाहर निकल कर समूह चेतना बन चुकी है। जिसे ललित अपने किरदार से जरिए बातें पहुंचाने की कोशिश करते हैं। बाल मजदूरी और बाल शोषण आज पूरी दुनिया के लिए गहरे चिंता का विषय है। हजारों नहीं बल्कि लाखों बच्चे स्कूल, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा आदि न मिलने की वजह से जलालत की जिंदगी बसर करने पर मजबूर हैं। सरकारें आती हैं और कई मनमोहक घोषणाओं की चिंगारी जला कर चली जाती हैं। लेकिन हमारे समाज का बच्चा जो काम पर लगा है वह काम पर ही जाता है। घर की आर्थिक स्थिति उसे पढ़ने-लिखने नहीं देती। क्योंकि बच्चे न तो वोट बैंक हैं और न नागरिक ऐसे में उनकी ंिचंता करता ही कौन है। यह अलग बात है कि 1989 में संयुक्त राष्ट अमेरिका में एक सम्मेलन हुआ जिसे यूएनसीआरसी 89 कहा जाता है जिसमें विश्व के तकरीबन 120 देशों ने दस्तखत किए थे कि अपने यहां बच्चों को शिक्षा, सुरक्षा, भोजन आदि देंगे। लेकिन हकीकत है कि अभी भी भारत में 7 करोड़ से भी ज्यादा बच्चे स्कूल से बाहर हैं। 80 लाख से अधिक बच्चे कुपोषित हैं। ऐसे लाखों बच्चों के बचपन पर नजर डालती कविता ‘बाल मजदूर बने नवनिहाल’ को संजीदगी भरी अभिव्यक्ति ही कहना होगा।
 15 साल के दर्जनभर बच्चे
जिनके कपड़े फटे हुए हैं
अंगुलियों पर कई जगह पट्टी
बंँधी है
काम में लगे हैं
दे रहे हैं बर्तनों को
एक आकार
इस तरह की फैक्टरियां कई
कई इलाकों में कर रहे हैं काम
बचपन की उम्र
फैक्टरी में गर्द
जवानी के कोठे में
और बुढ़ापा आने से पहले ही
बिरजू, सूरज, कन्हैया ने
अपनी जि़न्दगी से
धो लिया बचपन
वे नहीें जानते
बचपन के गीत

इंटरनेट ने सच में हमारे आगे एक आाभासीय दुनिया रची है। जिसमें आज सब कुछ होता है। बल्कि कहना चाहिए किया जा सकता है। एक थका पिता दुल्हा देख सकता है, एक जवान बेटी अपने लिए पति तलाश सकती है, बेरोजगार नौकरी, कुछ मनमैले ‘चित्र’ लेकिन लिखे हुए शब्द को मिटा नहीं सकते। नेट के समानांतर एक और दुनिया जीती है इस ओर इशारा करती कविता ई- किताब हमारे सामने एक और दुनिया खोलती है-
भले ही इंटरनेट
कितना जादू चला ले
किताब का कुछ भी बिगाड़ नहीं पाएगा
छतों पर टंग जाए कितनी
डिश ऐंटीना
बनारस का घाट
अयोध्या के राम
इलाहाबाद का संगम
आगरा का ताज
लोग जाएंगे, आएंगे
गंगा में डुबकी लगाएंगे
गंगा की डुबकी
इंटरनेट पर थोड़े ही लगेगी।
लड़कियों को देखने, समझने और स्वीकारने के कई स्तर हो सकते हैं। बल्कि हमारे समाज में हैं भी। लड़कियों की दुनिया लड़कों की दुनिया से बिल्कुल भिन्न होती है। उनकी दिनचर्या भी अलग होती है। घर-परिवार के कामों में इतनी उलझी कि अपने लिए उनके पास समय नहीं होता। छोटे भाई को तो स्कूल छोड़ने जाती हैं लेकिन खुद स्कूल का मुंह नहीं देख पातीं। हमारे इसी समाज में लड़कियों के विभिन्न स्वरूप हैं। अलग-अलग चेहरे हैं जिसे ललित ने ‘यानी जीना सीख लिया’ में दर्ज किया है।
शीशे को खटखटाती
कटोरे को झुलाती
बारह-तेरह साल की लड़की
बदन पर फटी कमीज पहने
गुंजल बालों को फिराती
दांतों में बड़बड़ाती है-
बाबू जी! भूखी हूं
एक रुपया दे दो।
एक तरफ यह लड़की है तो दूसरी ओर सज धज कर बस में सवार लड़की व कामकाजी महिलाएं हैं जो पूरी ठसक के साथ अपनी जिंदगी अपने तई जी रही हैं। लड़कियों की विभिन्न छवियां देखनी हों तो यहां देखी जा सकती हैं।
सलवार-कमीज में लिपटी लड़की
जींस-टी शर्ट में कसी लड़की
गोरी लड़की काली लड़की
घुंघराले बालों के संग लड़की
मुस्कराती हुई लड़की
जानती है कि उसे मर्दों को
कैसे नचाना है
मर्द हैं कि....
अंगुलियांे पर नाचते है
प्यार एक ऐसा विषय पर व बिंदु पर जिस पर मजाल है किसी कवि, लेखक, कलाकार की लेखनी ना चली हो। अमूमन हर लेखक अपनी लेखनी से प्यार को परिभाषित करता आया है। ललित की कविताएं भी प्यार को छूती हैं। सहलाती हैं और एक साथ प्यार पर कई कडि़यों में  लिखा ले जाती हैं। एक नजर डालें
प्यार
छिपा हो कहीं भी
फूटकर बहेगा
अतःस्थल से
जिस तरह दीये से
रोशनी बहती है
और नहला देती है पूरे कमरे को
हां! उसी तरह
बिल्कुल वैसे ही
जिस तरह
बाजे से निकली मधुर ध्वनि
फैल जाती है दूर तक।
कई अलग अलग विषयों पर लिखी छोटी छोटी कविताओं को ललित ने विविध शीर्षक में पीरोया है। जिसमें गांव, नेता, विश्वास, तलाश, स्वागत, बच्चा, सोया नहीं आदमी आदि शीर्षकों में जल्दी में पढ़ी जाने वाली कविताओं को जगह दी है। जिसे एक सांस में एक ही समय में पढ़ी जा सकती हैं।
एक बानगी यह भी देखने योग्य है-
रोते बच्चों को मैं
चुप करा लेता हूं
बड़ों को मना लेता हूं
पर तुमको
मना न पाया
कहीें कोई कमी थी
सोचता हूं हैरान होता हूं।
और अंत में ललित यह निष्कर्ष निकालते हैं-
कोरे सपने में
जीना पसंद नहीं
लिखना सीख लिया
क ख ग घ।
पढ़ना सीख लिया
म से मेरा
ह से हिन्दुस्तान
यानी जीना सीख लिया।

एक कवि-कथाकार, लेखक से समाज एवं पाठकों को क्या अपेक्षाएं होती हैं? इस पर विमर्श करना और अपने लिए चुनौती स्वीकारना यह एक लेखक-कवि के लिए अहम होता है। पाठक एवं समाज की उम्मींदें इस वर्ग से यह होती हैं कि ये लोग अपनी लेखनी, शब्दों के माध्यम से कम से कम क्रांति न सही एक मुकम्मल राह जरूर दिखाएं। यूं तो विश्व में लिखे हुए साहित्य के बदौलत कं्रातियां भी हुईं हैं। समाज में बदलाव भी सफल हुए हैं। लेकिन इसके लिए जिस भाव-भूमि की दरकार होती है उसे भी नजरअंदाज नहीं कर सकते। यदि कवि की कर्म भूमि व भाव-जगत में होने वाली हलचलों पर नजर दौड़ाएं तो पाएंगे कि समाज में होने वाली सुगबुगाहटों के साथ ही थरथराती जनचेतना भी दस्तावेजित होती हैं। यह दस्तावेजीकरण हर कलमकर्मी करता है। उस लिहाज से देखें तो अपने समय की बेचैनी, क्रंदन और करवटों के साथ ही बदलते भाव-संवेगों को कवि बड़ी ही बारीकि से पकड़ता है। ललित की कविताओं का वितान व्यापक और विस्तृत है। इन्होंने समाज की चिंताओं को तो व्यक्त की हैं साथ ही शाश्वत सवाल जीवन क्या है? प्यार तेरे रूप क्या हैं? बुढ़ापा जिसने बुद्ध को बुद्ध बनाया, सवाल भी ललित को बेचैन करती हैं। अवकाश प्राप्ति के बाद की जिंदगी, अस्पताल की बैंच पर बैठा बीमार आदमी कैसे उम्र की ढलान पर लुढकता चला जाता है जिसकी वेदना भी कई कविताओं में रूप बदल कर ही सही किन्तु साफ सुनाई देती हैं।
झणिकाओं की रचना में भी ललित ने हाथ आजमाए हैं जो प्रीतिकर हैं। इस आंगन में विविधताएं हैं। किसिम किसिम के जीवन रंगों की छटाएं यहां देखी जा सकती हैं। जहां प्रेम कई रूपों, रंगों और भंगिमाओं में खूब फबा है। वहीं लड़कियां जो सड़क, बस, घर, गांव शहर हर जगह हैं उनकी अपनी ही जिंदगी है जिसे ललित ने अलग-अलग आयामों से देखने-समझने की कोशिश की है।  
हर कविता में एक कहानी जी रही होती है। हर कविता एक कथा कहती है। वैसे ही ललित की कविताएं भी अपने समय की कहानी कहती है। उस कहानी का दानव हमारे समाज का धत्ता बताता है। लेकिन कविता अपने तई इस दानव का प्रतिकार भी करती है। ऐसे प्रतिकार के स्वर ललित की कविताओं में सहज देखी-सुनी जा सकती हैं। प्रकृति की घटना कई बार ललित को झंकझोरती हैं। अंदर तक आलोढित करती प्रकृति विछोह की एक बानगी यह भी है-
कांटे को भी
दुख होता है
फूल के टूटने पर
पŸिायां रोती हैं
जड़े कंपकंपाती हैं।
इस कंपन की प्रतिध्वनि हमें मानवीय स्तर पर टूटन पर भी सुनाई देती है। जब व्यक्ति एकांत में स्वगत संवाद करता है। और निरा निपट अकेला महसूस करता है। तब कवि की लेखन और भी मुखर हो उठती है।
बोलते-बोलते
मैं चुप हो जाता हूं जब
लगता है धरा भी चुप हो गई
शान्ति का वास हो गया
मोटर-गाडि़यों का शोर
थम-सा गया
चहचहाट रुक गई
और मातम भी
भागीदार सा लगता है
कुहासे की किरण-सा
पतझड़ की ऋतु-सा
मन की मैल-सा
धुलकर कवच बनना।
दरअसल ललित हमारे बीच से ही संवाद के सूत्र भी ढंूढ़ लाते हैं ताकि बीच में अटकी बातचीत आगे बढ़ाई जा सके। इस उपक्रम में सड़क जैसी निर्जीव काया को भी मरहम मलने की वकालत करते ललित सड़क की पूरी काया को भी मानवत् आकार दे देते हैं। जिस तरह सड़कें कहीं नहीं जातीं। केवल उस पर चलने वाला पहुंचता है। कुछ बीच राह में ही ठहर जाते हैं या गंतव्य तक पहुंचने से पहले ही काल-कवलित हो जाते हैं। इस पर सड़कों के प्रति संवेदनशीलता लाजवाब है-
 सच हमारी जि़न्दगी में
सड़कांे का कितना महत्व है
और आज आदमी भी
तब्दील होता जा रहा है सड़क में
हो गए हैं ज़ख्म
खून रिस रहा है
पर
क्या करें ?
सड़कों पर कोई नहीं लगाता
मरहम-पट्टी
कोई नही आता
दुख-सुख प्रकट करने
अरे! सड़क तो
एक बेटी है, मां है
जो हदों का पार कर
बनाती है जीवन भर नक और रास्ता।
सचपूछा जाए तो ललित जी की कविताओं का एक अपना व्याकरण और अपना ही मानचित्र है जिसमें विविधताएं जीवन पाती हैं। जहां तक भाषाई संरचना और वाक् वैशिष्ठ्यता की बात है तो सहज और कई जगहों पर आम फहम की भाषा वाकई ध्यानाकृष्ट करती हैं। अमूमन भाषा की दृष्टि से कहीं कोई बाधा नहीं हैं। किन्तु यदि कवि खुद को विषयों को लेकर अपने आप को समेटकर आगे बढ़ता तो पाठकों को राहत मिलती। विषय वैविध्यता की वजह से कई बार पाठक कवि की संवेदना के सागर में डूबने सा लगता है। लेकिन संतोष यह जरूर है कि तकनीक के टेरा बाइट के युग में भी रोज दिन फेसबुक पर कविता लिखना और पाठकों को बांधे रखना एक चुनौती है तो इस चुनौती को भी ललित ने सहर्ष स्वीकारा है।
कौशलेंद्र प्रपन्न

Tuesday, October 29, 2013

शब्दकार का जाना


राजेंद्र जी का जाना सचमुच शब्द-संसार में जीने वालों के लिए दुखद खबर है। यू ंतो कोई भी यहां शाश्वततौर पर रहने नहीं आया है। सभी को तो जाना ही है। लेकिन उस व्यक्ति का जाना ज्यादा यादगार हो जाता है जिसने समाज में समाज के लिए अपनी कलम से काफी कुछ किया हो। विवाद-वाद और संवाद के लिए प्रसिद्ध राजेंद्र जी को उनकी कलमकारी के लिए भी खद किया जाएगा। 
नई कहानी और कथाकार के तौर पर तो वो एक मजबूत स्तम्भ थे ही। इससे किसे गुरेज होगा। यह अलग बात है कि उन्होंने विवादों से भी उसी तरह साबका रखा। 
शब्दकार को कोटी कोटी नमन

तो


अगर सुबह टहल कर नहीं लौटा तो,
बाजार में ही गुम हो गया तो,
लिखते लिखते कलम रूक गई तो,
या फिर बोलते बोलते जबान खामोश हो जाए जो।
तो क्या कुछ नहीं-
कुछ लोगों के लिए एक घटना होगी,
कुछ के लिए चलो एक जगह खाली हुई,
कुछ के लिए जीने की शर्त,
जीने की वजह,
पर ज़रा सोचिए अचानक आपका नेटवर्क काम करना बंद कर दे तो?

Thursday, October 24, 2013

आॅल्मनैक यानी तिथि पत्री या पंचांग


कौशलेंद्र प्रपन्न
बारिश कब होगी, इस बार चंद्र या सूर्य ग्रहण कब लगेगा, दशहरा या दीवाली या ईद कब की है आदि सवाल तुम लोग जरूर पूछते होगे। इसका जवाब मम्मी या टीचर कैलेंडर देख कर बताते हैं। ज्योतिष के जानकार अपने पंचांग में देख कर बताते हैं कि फलां त्योहार किस दिन पड़ने वाला है। तुमने देखा होगा कि कई बार एक ही पर्व दो दिन पड़ जाते हंै। इसके पीछे क्या कारण है? कारण साफ है जो सूर्य और चंद्रमा के साथ अन्य ग्रहों की परिक्रमा को पढ़ते,समझते हैं वो बताते हैं कि सूर्य- चंद्र की स्थिति से ईद या अन्य पर्व के दिन बदलते हैं। ऐसी बातों, घटनाओं को तुम जिस पुस्तक व पत्र में देख सकते हो उसे ही आॅल्मनैक कहते हैं। इसे हिन्दी में पत्री, पंचांग व जन्त्री भी कहा जाता है।
पंडि़त जी के पास तुमने कभी इस तरह की पत्री-पंचांग देखी होगी। आकार में यह आम किताबों से अलग होती हैं। लंबे और बही खाते से मिलते हुए। इस पंचांग व आॅल्मनैक में चंद्र-सूर्य एवं ग्रहों की गतिविधि के साथ ही पूरे साल के त्योहार, किसानों के लिए भविष्यवाणियां आदि की जानकारी दी जाती हैं।
न केवल हमारे भारत में बल्कि इस तरह के पत्री व पंचांग बनाने का चलन ग्रीक एवं अन्य देशों में भी रहा है। इस तरह आॅल्मनैक में किसानों के लिए बुआई, कटाई बारिश आदि की महत्पूर्ण जानकारी दी जाती हैं। इसके अलावा ज्योतिष शास्त्र के जानकारों के लिए ग्रहों की गति-दशा और दिशा की जानकारी भी दी जाती है।
आॅल्मनैक यानी पंचांग हर साल बनाया जाता है। आॅलम्नैक में पूरे साल के महत्वपूर्ण पर्वों, सूर्य-चंद्र ग्रहण आदि की सटीक जानकारी दी जाती है। इस तरह के पंचांग में तुम अपने देश के महत्वपूर्ण पर्वों-त्योहारों की जानकारी हासिल कर ही सकते हो। हमारे पूर्वजों के पास जब कैलेंडर नहीं हुआ करता था तब वो इसी तरह के पंचांगों के जरीए आने वाले दिनों, महिनों एवं साल भर की जानकारियां पाया करते थे।

बलात्कारालय यानी बाबाश्रम


बचपन में संधि पढ़ाया गया था। जैसे विद्यालय विद्या$आलय, यानी जहां विद्या व ज्ञान का घर। वैसे ही आलय से आशय घर निकलता है। बलात्कारालय यानी बलात्कार का घर। जी चैंकने की कोई बात नहीं। क्योंकि पूरा देश आसाराम के बलात्कारालय से अब रू ब रू हो चुके हैं। वहां न केवल बलात्कार बल्कि अन्य किस्म के शोषण भी हुआ करते थे। आप को पता चल चुका है। हाल ही में ख़बर सोनीपत से आई है कि ओशो धारा आश्रम में भी यहां तथाकथित संत ने एक महिला के साथ बलात्कार किया। अब आप बताएं आश्रम, बाबालय नाम सुनते ही कैसी छवि आपके मन-मस्तिष्क में बनती है?
दरअसल बाबालय व बबंगों के लिए धर्म महज साधन है। साध्य नहीं। साध्य है राजनीति, संसद, धनार्जन और आम जन को बरगलाना। जो वो पूरी शिद्दत से करते हैं। एक बात तो स्पष्ट है कि किसी भी बाबा, कथावाचक को सुने लें वो एक अच्छे, कुशल वक्ता तो होते ही हैं। वक्तृत्व कला में पारंगत बबंगों के अपने स्वाध्याय होते हैं जो उन्हें आम जन की भावनाओं और आस्था को अपनी ओर बहाने में मददगार साबित  होती हैं। दर्शन, वेद, गीता, अन्य शास्त्रीय अध्ययन के साथ विज्ञान आदि की समझ विकसित करने के बाद व्याख्यान देने वाले बबंग सहज ही अपनी वाणी से औरों को लुभाने में सफल हो जाते हैं।
गौरतलब है कि प्रवचन देना और साधना करना दो अलग अलग चीजें हैं। जो साधना करते हैं वो वाचाल नहीं होते। जो वाचाल होते हैं वो साधक नहीं। बुल्लेशाह की पंक्ति उधार ले कर कहूं तो ‘जो बोले वो जानत नाहिं, जो जानत वो बोलत नाहिं।’

Wednesday, October 16, 2013

रोंदू प्रकाशक जी


रोंदू प्रकाशक से हर लेखक को रू ब रू होना पड़ता है। तकरीबन हर प्रकाशक केवल और केवल अपना मुनाफा देखता और पकड़ने की कोशिश करता है। यही वजह है कि कई बार लेखक-प्रकाशक के बीच तन जाती है। यह तनातनी कई बार कोर्ट रूम तक पहुंच जाती है। याद करें न केवल निर्मल वर्मा की पत्नी बल्कि कई अन्य लेखक-प्रकाशक के बीच वाक-युद्ध बल्कि आगे चल कर कोर्ट चक्कर तक बातचीत पहुंची है। र्वायल्टी देने के नाम पर प्रकाशक रोंदू मुद्रा में आ जाते हैं। क्या आपने लिखा? यह किताब तो बिकती ही नहीं। गोदाम में ही पड़ी है। ऐसा क्यों नहीं करते इन्हें अपने रिश्तेदारों, दोस्तों आदि में बांट दें। कम से कम हमारी आल्मारी तो खाली होगी। 
लेखक-प्रकाशक को रिश्ता भी अज़ीब है। जब पहली पहली बार लेखक पांडुलिपि लेकर जाता है या भेजता है तब के संवाद काबिलेगौर है- इन किताबों के पाठक कहां हैं? कौन पढ़ेगा इन्हें? बच्चे तो बच्चे बड़े भी कहां पढ़ते हैं आज कल? साहब लेखक लेखक को ही पढ़ता है। उसी पर टिप्पणियों का सिलसिला चल पड़ता है। मैं पाठकों के लिए छापता हूं। लेकिन अब कविता कहानी पढ़ने वाले हैं ही कहां?
आप पाठ्य पुस्तक क्यों ही लिखते? बी.ए चार साल का हो गया है किसी भी विषय पर लिख डालिए छाप दूंगा। ऐसी किताबों की खपत भी है। कविता, कहानी से बेहतर है किखी किताब का हिस्सा हो जाएं।
ऐसे सुझाव प्रकाशक तुरंत देते हैं। साथ ही एक नत्थी सुझाव देंगे कि छाप दूंगा आपकी किताब लेकिन आप क्या सहयोग करेंगे?
कगज का खर्च आप वहन कीजिए छपाई मेरी ओर से। यानी 100, 200 कापी आपकी और पैसे भी आपके। मंजूर हो तो काम आगे बढ़ाएं। हां हमारे आस-पास ऐसे लेखक हैं जो अपनी जेब से किताबें छपवाने पर मजबूर हैं।

मलाला रूक जाना नहीं


प्यारी मलाल,
शुभाशीष। तुम्हें अभी काफी आगे जाना है। जाना है वहां तक जहां शिक्षा बच्चों से दूर है। जहां आतंक का कहर है। जहां तुमने सहा वहां भी जाना है। तुम्हारी अभी उम्र ही क्या है अभी तो पूरा आसमान तुम्हारा है। उड़ो जितनी ताकत हो पंख में। पूरी दुनिया तुम्हें चाहती है कि तुम आगे बढ़ों। 
तुमने कहा कि तुम बच्चों की शिक्षा के लिए बहुत कुछ करना चाहती हो। तुम उन यतीमांे के लिए करना चाहती हो जो किन्हीं वजहों से शिक्षा, परिवार से दूर हो गए। तुमने कहा कि पाकिस्तान के लिए कुछ करना चाहती हो। वहां प्रधानमंत्री बनना चाहती हो। बिल्कुल तुम्हारा यह सपना पूरा होगा। या खुदा मलाला की ख़्वाहिशे पूरी करना। 
मलाला एक बताना चाहता हूं कि अभी तुम्हारी उम्र छोटी है ज़रा ठहर कर अपने सपनों, विचारों और कल्पनाओं को देखो, समझो और फिर उसी हिसाब से योजनाएं बनाओं, रणनीतियां तैयार करो। तभी सपनों को पंख लग सकेंगे। वरना हम तो सपनों हजारों देखते हैं और वो अपनी मौत भी मर जाते हैं। अपने सपनों को जि़दा रखना है तो उन्हीं सपनों को पूरा करने के लिए अहर्निशम् कर्म में जुटना होगा। 
आमीन

Friday, October 4, 2013

‘हूज हू ऑफ इंडिया’ पढ़ो

‘हूज हू ऑफ इंडिया’ पढ़ो
कौशलेंद्र प्रपन्न
First Published:02-10-13 11:49 AM
Last Updated:02-10-13 11:49 AM
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अभी तक हमने जिस तरह की किताबों के बारे में बात की है, वे सभी एक खास किस्म की किताबें थीं। मसलन डिक्शनरी, एनसाइक्लोपीडिया, ईयर बुक आदि। आज हम जिस किताब की बात करने जा रहे हैं, यह भी कम महत्व की नहीं है। ‘भारत के ये कौन हैं’, यानी ‘हूज हू ऑफ इंडिया’ नाम है इस किताब का। वैसे ‘हूज हू इंटरनेशनल’ भी होता है। लगभग सारे देश ‘हूज हू’ छापते हैं। यह किताब सामान्य से जरा हटकर है।
‘हूज हू ऑफ इंडिया’ किताब में तुम भारत के महत्वपूर्ण एवं चर्चित व्यक्तियों के बारे में पूरी जानकारी पढ़ सकते हो। इस किताब में प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति से लेकर दूसरे महत्वपूर्ण साहित्यकारों, नेताओं, अभिनेताओं, वैज्ञानिकों आदि की पूरी जीवनी सचित्र पढ़ सकते हो। इस किताब से तुम्हें यह पता चलेगा कि एक ही किताब में तमाम प्रमुख लोगों के बारे में जानकारी मिल सकती है।
इसलिए बेशक घर में न रखो, लेकिन लाइब्रेरी में इस किताब को देख-पढ़ सकते हो। स्कूल में कई बार तुम्हारी मैडम या सर ऐसे प्रोजेक्ट्स व असाइनमेंट्स देते हैं, जिसमें किसी राजनेता या प्रधानमंत्री के बारे में पूरी फाइल तैयार करनी होती है। ऐसे प्रोजेक्ट्स में ‘हूज हू ऑफ इंडिया’ किताब तुम्हारी मदद कर सकती है। इस किताब में भी लोगों को तुम डिक्शनरी की तरह की अल्फाबेटिकली या वर्णों के क्रम में देख सकते हो। इसका अर्थ यह हुआ कि इंग्लिश में ए, बी, सी से शुरू होने वाले लोगों के बारे में पहले पढ़ोगे। हिन्दी में वही अ, आ, इ, ई क, ख, ग आदि नामों के क्रम में पढ़ सकते हो।
इस किताब के बारे में रोचक बात यह है कि इस किताब को लाइब्रेरी व अन्य खास जगहों को छोड़ दो तो कहीं और नहीं देख सकते हो, क्योंकि इस किताब को पढ़ने वाले बहुत ही सीमित होते हैं। इसलिए इस किताब को छापने वाले भी प्रकाशक कम ही हैं। लेकिन तुम्हें एक बार इस किताब को जरूर पढ़ना चाहिए। हो सकता है यह स्कूल की लाइब्रेरी में ही मिल जाए तुम्हें।

स्कूलों में शौचालय बनाने की ओर ज़रा सोचें नमो


नमो नारायण जी ने फरमाया कि देवालय से ज्यादा शौचालय की आवश्यकता है। माननीय महोदय! स्ही कहा आपने काश आप इसे अपनी चुनावी घोषणा पत्र में भी शामिल कर लें।
नमो जी मालूम हो कि देश भर मंे ऐसी लड़कियों की संख्या लाखों में हैं जो महज स्कूल में शौचालय न होने की वजह से स्कूल नहीं जा पातीं। हाल में रिपोर्ट आई है कि अकेली दिल्ली में 50 फीसदी ऐसे सरकारी स्कूल हैं जहां शौचालय नहीं हैं। यह हाल तो दिल्ली का है जहां आप हाल ही में गरज कर गए हैं। यदि देश के अन्य राज्यांे की बात करें तो गुजरात, हरियाणा, राजस्थान, बिहार आदि में तो और भी बत्तर स्थिति है। आरटीई लागू हुए तीन एक साल हो चुके लेकिन स्थितियां कोई खास नहीं बदली हैं। जिन बुनियादी ढांचों की सिफारिश आरटीई करती है उनमें शौचालय भी एक है।
कितना बेहतर हो कि आप दूसरी पार्टी की आलोचना करने में जितना समय खर्चते हैं उसका एक अंश भी स्कूलों में शौचालय बनाने की ओर दें तो निश्चित मानें लड़कियां स्कूल जाने लगंेगीं।

Thursday, September 26, 2013

तलाक विकास का राह

तलाक विकास का राह
क्या यह सच है? समाज में ऐसी कई महिलाएं मिलेंगे जिनकी जिंदगी में विकास के नए आयाम खुले ही तलाक के बाद। उनके लिए तो तलाक वरदान से कम नहीं था। कोई प्रसिद्ध फोटोग्राफर बना तो कई जज कोई प्रोफेसर। कई की जिंदगी तलाक के बाद सुधर गई।
ल्ेकिन यह कहना सरलीकरण होगा कि सभी महिलाओं जो विकास और जीवन में कुछ बनना चाहती हैं, उन्हें तलाक ले लेना चाहिए। आस-पास नजर दौड़ाएं तो पाएंगे कि ऐसी महिलाएं हैं जो पति के साथ खुश नहीं थीं। जिंदगी नरक सी थी। लेकिन जैसे ही अलग हुईं उनके जीवन में विकास और आगे बढ़ने के रास्ते साफ होते चले गए।
यह सवाल उन महिलाओं से भी पूछा जाना चाहिए जो पति के साथ हैं। लेकिन किन्हीं कारणों से जीवन में आगे व पति के समकक्ष नहीं आ पाईं वो तलाक चाहती हैं? यह एक शोध का विषय है। लेकिन इतना तो साफ है कि यदि पति कुछ पत्नियों के जीवन में बाधा बने तो कुछ महिलाओं के विकास में पतियों ने अपनी सारी उर्जा झोंक दी।
तलाक के बाद की जिंदगी सामाजिक और आन्तरिक कैसी होती है यह वह महिला ही बेहतर बता सकती है। लेकिन यदि तलाक के वह महिला सजती संवरती और पहले से बेहतर दिखने के लिए जीम आदि जाती है तो लोग सीधे कटाक्ष ही करते हैं। किन्तु इसका एक पहलू यह भी ह ैअब वह महिला एक बार फिर से जीने की कोशिश कर रही है। उसे सकारात्मक नजरीए से देखने की जरूरत है।

Tuesday, September 24, 2013

शहर के नामी चौराहों पर पिज़्ज़ा और इंग्लिश लैटर के बर्गर

कुछ बरस पहले मेरे शहर में इक जनांदोलन हुवा। युवा जन जो मांग कर रहे थे की हमारा शहर भी कुछ कम नहीं। ५ सिनेमा हाल है. कॉलेज स्कूल हैं , कोर्ट है , क्या नहीं है इस शहर में , फिर हमने क्या बुरा किया की हम ख़ास पिज़्ज़ा शॉप , ख़ास इंग्लिश लैटर की दुकान में बर्गर नहीं खा सकते।।।
बात मौजू थी. शहर के नेता , डीएम सब के सब परेशां।  क्या करें।  रोड जाम , सड़क पर युवा वर्ग क्रोधित घूम रही है इन्हें शांत करना पड़ेगा। 
सो साहिब इक दिन देखें इक माह के भीतर पुरे शहर के नामी चौराहों पर पिज़्ज़ा और इंग्लिश लैटर के बर्गर की ठंढी हवा वाली दुकान खुल गई. 
आज मेरा शहर ही नहीं बल्कि देश के दूर दराज कस्बाई इलाकों में भी इन दुकानों को देखा जा सकता है।     

Sunday, September 22, 2013

वो बेचारी हमेशा रहती घर से बाहर,
धुप पानी ,
सर्दी गर्मी ,
हर मौसम में सदा बिना उफ़ किये। 
उसकी कहाँ किस्मत की रहे गैराज में 
हाँ कुछ को मिल जाती हैं गैराज ,
लेकिन कई हैं कारें जो हमेश रहती हैं ,
घर के बाहर ,
इंतज़ार में की साहेब,
हमें भी नहला दो ,
की जैसे नहाते हैं बच्चे ,
बेचारी कार ,
नहीं आ पाती घर में,
की जैसे नहीं आती घर में धुप ,
रौशनी ,
 कई कारो के भाग्य में नहीं होता नहाना ,
घर.

Thursday, September 19, 2013




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राष्ट्रीय बाल अधिकार एवं संरक्षण आयोग की पहल पर कश्मीर में राज्य आयोग बनाने की पहलकदमी

श्रीनगर में कुछ स्कूल के बचों से मुलाकात हुई. उनसे शिक्षा स्कूल और विभिन्य मुद्दों पर भी चर्चा हुई. शालीमार बाघ में बचों ने लोकल गीत भी सुनाये  जो गहरे उतर गया.
इक ६ साल की अमिन वाणी जो की १ ली कक्षा में पढ़ती है वो अपने घर से २० किलो मीटर दूर स्कूल में जाती है. सरकारी स्कूल की बदहाली से मजबूर उसके घर वाले महंगे निजी स्कूल में भेजते हैं. हलाकि शिक्षा का कानून श्रीनगर जम्मे पर लागु नहीं होता लेकिन सरकारी स्कूल की स्थिथि कुछ अची नहीं है.
पहलगाम , गुलमर्ग , अनंतनाग जिलों में भी स्कूल तो हैं पर न टीचर प्राप्यत हैं और न बच्चे ही जाते हैं. यूँ तो रोड पर सरकारी किस्म के ड्रेस में बच्चे दिखाई दिए मगर अधिकांस लोग बच्चों को निजी स्कूल में भेजते हैं.
राष्ट्रीय  बाल अधिकार एवं संरक्षण आयोग की पहल पर कश्मीर में राज्य आयोग बनाने की पहलकदमी चल रही है. यहाँ भी आयोग बन जाये तो बेहतर हो.

Wednesday, September 4, 2013

सावधान रहो, गलत इरादे से कोई छूने की कोशिश करे तो



कौशलेंद्र प्रपन्न
स्कूल हो या घर-परिवार तुम्हें हर जगह सावधान रहने की आवश्यकता है। सावधान इसलिए क्योंकि कई लोग प्यार-दुलार के बहाने तुम्हें गलत इरादे से छूने की कोशिश करते हैं। ऐसे लोगों में कोई भी हो सकता है। वह भाई,पापा, चाचा व अन्य रिश्तेदार के साथ ही स्कूल के टीचर भी हो सकते हैं। ऐसे लोगों की नजर न केवल लड़कियों पर होती है बल्कि लड़कियां भी इनकी गिद्ध नजर में होती हैं। कई बार हो सकता है तुम्हें समझ ही न आए कि वे तुम्हारे साथ क्या कर रहे हैं। लेकिन निश्चित मानो धीरे-धीरे ऐसे लोग तुम्हारे साथ गलत करने की शुरुआत कर रहे होते हैं।
जब भी तुम्हें ऐसे महसूस हो कि कोई तुम्हारे प्राईवेट पार्ट को छूने व प्यार से ही सही लेकिन तुम्हें सहला रहा हो तो पहली बार ही तुरंत विरोध करो। तुम स्कूल में प्रिसिपल को बता सकते हो। घर में मम्मी-पापा व किसी भी बड़े सदस्य को जरूर बताओ।
दुनिया में ऐसी बच्चियों की संख्या काफी है जिन्हें स्कूल में इस तरह के हरक्कतों का सामना करना पड़ा है। जिन्होंने विरोध किया तभी ऐसे लोगों के खिलाफ कार्यवाई हो पाई। जो चुप रह गए वे बच्चे शिकार होते रहे। इसलिए तुम्हें शिकार नहीं होना बल्कि इनलोगों के खिलाफ अपने से बड़ों को बताना है।
बच्चों तुम्हें पता होगा कि ऐसे लोगों से न केवल तुम्हें बल्कि बच्चियों को भी संभल कर रहने की जरूरत है। क्योंकि कई ऐसे रिसर्च हो चुके हैं जिनके आंकड़ों के अनुसार लड़कों के साथ भी ऐसे लोग गलत करते हैं। जो बच्चे बोल नहीं पाते वे जिंदगी भी इंटोवर्ट या अंतर्मुखी नेचर के हो जाते हैं। उनका आॅल राउड डेवलप्मेंट नहीं हो पाता।
लड़कियां व लड़के दोनों को ही अपने आस-पास के ऐसे लोगों से न केवल बच के रहना रहना है, बल्कि यदि तुम्हारे किसी दोस्त के साथ ऐसा हो रहा है तो उसकी मदद भी करनी चाहिए। मदद तभी कर सकते हो जब तुम खुद सजग और चैकन्ने रहोगे।

गिजूभाई अब भी हैं हमारे स्कूलों मे


मास्टर जनगणना में, मास्टर पोलियो पिलाने के अभियान में, मास्टर चुनाव ड्यूटी में, मास्टर भोजन पकाने, परोसने में, मास्टर स्कूल के दफ्तरी कामों में आदि आदि खूब सुनते  और पाते भी हैं। लेकिन मास्टर का एक दूसरा पहलू भी है और यह कि मास्टर पढ़ाने के लिए बेचैन भी होते हैं। मास्टर पढ़ाने से पीछे नहीं हटते लेकिन कई बार दूसरे अन्य काम इतने हावी हो जाते हैं कि मुख्य काम दूसरे पायदान पर आ जाता है।
मास्टर शोषण करता है। बलात्कार करता है। बच्चियों को बरबाद करता है। लेकिन ऐसे मास्टरों की भी कमी नहीं है जो सचिन तेंदुल्कर, अमिताभ बच्चन, राजेंद्र प्रसाद, अब्दुल कलाम जैसे बच्चों को गढ़ता और संवारता भी है। उन्हें सही राह भी दिखाता है। इतना ही नहीं मुझे याद आता है मेरे पिताजी अपने स्कूल के गरीब बच्चों जिनमें भी उन्हें उकसने और विकसने की संभावनाएं दिखती थीं उसकी फीस, कापी किताब आदि के पैसे घर में विरोध होने पर चुपके से मदद किया करते थे।
उन्हीं की मदद से आज कई बैंक में मैनेजर हैं, कोई रेलवे में उच्च पद पर हैं, कई मास्टर बन और कुछ अन्य नौकरियों में। आज भी उनमें से कई पिताजी के संपर्क में हैं। वे हमारे घर के सदस्यों में शामिल हैं। ऐसे कई मास्टर हैं जो बच्चों के विकास के लिए घर और स्कूल में अंतर नहीं करते।
आज के गिजूभाई के कंधे पर कई जिम्मेदारियां हैं जिनको पूरा करना है। समाज की अपेक्षाएं, हिकारतें आदि को सहते हुए ये गिजूभाई अपने काम में लगे हुए हैं। ऐसे गिजूभाई किसी पुरस्कार से सम्मानित भी नहीं होते। इससे भी इनके मनोबल कम नहीं पड़ते। लगातार जुटे हुए हैं।
एचएमडीएवी स्कूल दरियागंज जो लगभग सौ साल का हो चुका हैं। इसके विकास और संवर्द्धन में लगे वहां के प्रधानाचार्य रमा कान्म तिवारी भी गजब के उत्साह से भरे हैं। उन्होंने तो इस स्कूल की काया पलट ही कर दी है। लगातार वहां के बच्चे कई विभिन्न अंतर विद्यालयी प्रतियोगिताऔ में जीत हासिल कर रहे हैं। पूरा का पूरा दारोमदार निश्चित ही वहां मुखिया और मास्टरों, अध्यापिकाओं के मेहनत का ही तो फल है। इस तरह कई सरकारी स्कूल हैं जहां के मास्टर गिजूभाई की तरह लगे हैं।

Thursday, August 29, 2013

वहां का मैप

वहां का मैप
वहां का मैप न गुगल देता है,
और न जाने वाले रिपोटिंग ही करते हैं,
जो जाता है उस देस वहीं का हो जाता है,
कैसा है न वह देस।
कोई भी सर्च इंजन-
या कि किताब,
नहीं बताता पता,
न ईमेल आडी,
कुछ भी तो मालूम नहीं उस देस के बारे में।
जो जाते हैं-
वे कब लौट कर आएंगे,
यह भी तयशुदा नहीं,
आएंगे तो किस रूप में यह भी अज्ञात।
जो जाते हैं उस देस-
अपने साथ लैपटाप,
फोन महंगे वाले ले जाएं,
भेजें कोई तस्वीर तो हम भी लाइक करें या शेयर करें,
मगर वहां शायद आईएसडी भी नहीं लगता,
कोई नहीं ले जाता कोई भी उपकरण सब यहीं छूअ जाते हैं,
बस जाते हैं तो अकेले निरा निपट।

शिक्षकीय दुनिया की कहानी के पात्र

कौशलेंद्र प्रपन्न ‘‘ इक्कीस साल के बाद पहली बार किसी कार्यशाला में बैठा हूं। बहुत अच्छा लग रहा है। वरना तो जी ...