Thursday, August 8, 2013

ममनून हुसैन से लगी उम्मीद


पाकिस्तान और भारत का रिश्ता तत्कालीन घटनाओं के उठा-पटक पर उतरता चढता रहता है। हाल ही में फिर पांच भारतीय सैनिकों को मार डाला गया इससे एक बार फिर पाकिस्तानी रवैए का मनसा का पता चला। इस तरह से एक ओर सरकार की घोषणों, पहलकदमियों सद्इच्छाओं पर से भरोसा उठता है तो वहीं भवष्यि के रिश्ते की नई डोर कमजोर होती दिखाई देने लगती है। सन् 1947 में यदि देश महज आज़ाद हुआ होता और विभाजन टल जाता तो आज एक संपूर्ण भारत होता। यदि जिन्ना का हठ न होता तो आज पकिस्तान न होता। भारत एक अविभाजित राष्ट के तौर पर दुनिया के सामने होता। लेकिन यह सब अब निरा निरर्थक बातें हैं। क्योंकि इतिहास को पलटा नहीं जा सकता। जो हुआ उसे उसी रूप में कबूल करना ही होगा। देश किन शर्तों, बलिदानों और क्षत् विक्षत हालत में विभाजित हुआ यह आज इतिहास का हिस्सा है। लेकिन इससे मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि जो हुआ उस राजनैतिक खेल में आम जनता को बहुत कुछ खोना पड़ा। किस तरफ लोगों ने क्या और कितना खोया इसका अनुमान और प्रमाण दोनों ही आज इतिहास के पन्नों में कैद हैं। जिन्हें पलटना एक दुखद अनुभव से गुजरने सा है। जब भी विभाजन की बात उठती है तो एक असहनीय पीड़ा दिलो दिमाग को झकझोर देती है। 1930 से लेकर 1940 तक का ऐसा काल खंड़ है जिसमें पाकिस्तान की लालसा जिन्ना में प्रबल आकार ले रहा था। जिन्ना को लाख समझाने की कोशिश की गई, लेकिन उनका व्यक्तित्व उन सभी सुझावों को दरकिनार कर रहा था। अंततः भारत का विभाजन हुआ। इस विभाजन के दंश पर हर दशक में फिल्में, उपन्यास, कहानियां, कविताएं एवं नाटक की रचनाएं हुई। जिनमें जिन्ने लाहौर नई वेख्या ते जन्मया नई, अमृतमर आने वाला है, टेन टू पाकिस्तान, सिक्का बदल गया, और मंटो की कहानियां प्रसिद्ध हैं। इन कहानियों, उपन्यासों और फिल्मों से गुजरते हुआ एहसास होता है कि विभाजन के एक दो साल पहले और बाद में दोनों ही देशों की क्या स्थिति थी। लोग किस कदर मार काट मचा रहे थे। इसको रूपहले पर्दे पर देख कर रूह कांप जाते हैं। वहीं कहानियों- उपन्यासों के पन्नों पर एक बार फिर से 1947 की घटनाएं नाचने लगती हैं।
भारत में जिस तरह से पाकिस्तान को लेकर भावनाएं प्रबल हुईं उससे ज़रा भी कम पाकिस्तान में भारत को लेकर भावनाएं नहीं गढ़ी गईं। एक ओर आज भी पाकिस्तान भारत के जनमानस में एक शुत्र, आतंकी मुल्क के तौर पर ही छवि बनाए हुए है। वहीं पाकिस्तान में भी भारत को लेकर कोई साकारात्मक छवि नहीं गढ़ी गई। पाकिस्तान के स्कूली समाजशास्त्र की किताबों में आज भी भारत का जिक्र एक ऐसे मुल्क के तौर पर मिलता है जैसा हम अपने भारत में पाकिस्तान को लेकर पढ़ाते हैं। प्रो कृष्ण कुमार ने बड़ी ही शिद्दत से पाकिस्तान के स्कूली पाठ्य पुस्तकों का विश्लेषण मेरा देश तुम्हारा देश किताब में किया है। इस किताब को पढ़ते हुए महसूस होता है कि वहां आज भी समाजशास्त्र की पाठ्यपुस्तकें 1947 में ही अटकी हुई हैं। बेगम अनिशा किदवई की किताब हो या कमलेश्वर की कितने पाकिस्तान आज भी प्रासंगिक हैं। जिन्हें खुले मनोदशा के साथ पढ़े जाने की आवश्यकता है।
भारत का विभाजन अनिता इंदर सिंह की किताब जो नेशनल बुक टस्ट से छपी है इसे आज की तारीख में पढ़ते हुए मालूम होता है कि इतिहास में हमने यानी दोनों ही मुल्कों के राजनैतिक हस्तियों, रणनीतिकारों ने कहां कहां भूलें कीं। वह चाहे जिन्ना हों या नेहरू। कांग्रेस पार्टी हो या मुस्लिम लींग दोनों ही ओर से कई भयानक चूकें हुईं जिसका खामियाज़ा हमें विभाजन के तौर से भुगतना पड़ा है। अनिता इंदर सिंह बड़ी ही तफ्सील से विभाजन के परत को खोलती और विश्लेषित करती हैं। वहीं बलराम नंदा लिखित गांधी और उनके आलोचक जो कि सारांश प्रकाशन से प्रकाशित है इसमें भी गांधी और भारत विभाजन, अमृतसर 1919 और विभाजन पर नरसंहार आदि लेख बेहद सारगर्भित हैं। गांधी जी का अहिंसावादी रूख वास्तव में बंगाल, बिहार में आग की तरह फैल रही हिंसा, नरसंहार को रोकने में सफल रही, लेकिन भारत को विभाजित होने से बचा नहीं पाई।
आज की तारीख में विभाजन और पाकिस्तान को एक स्वतंत्र लोकतंत्रिक देश स्वीकार करना चाहिए न कि इस रूप में स्वीकार करना कि वह हमारा अविभाजित हिस्सा है। क्योंकि हम अभी भी अतीत मंे अटके हुए हैं। हमें अतीत से निकल कर आज की चुनौतियों और हालात को कबूल करना होगा। शिक्षा शास्त्र और समाजशास्त्र की आम समझ यह बताती है कि ईष्या- द्वेष की भावनाओं को कम से कम बच्चों के दिमाग में भरने की बजाय उन्हें स्वस्थ चिंतन और मानवीय बर्ताव सीखें। जिस देश में अभी भी स्कूली पाठ्य पुस्तकों में विभाजन एवं इससे जुड़े व्यक्तियों के बारे में गलत तालीम दी जा रही हो तो ऐसे में किस तरह के नागरिक पैदा होंगे इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है।
पाकिस्तान में पांच साल तक जनता की चुनी सरकार अपना कार्यकाल पूरी कर चुकी है। साथ ही उसे निर्वाचित नए राष्टपति भी मिल चुके हैं जो सितम्बर में जरदारी के बाद कार्य भार संभालेंगे ममनून हुसैन। आशा की जा रही है कि नवाज़ शरीफ सरकार भारत के साथ मैत्रीपूर्ण रिश्ते को आगे बढ़ाने में सकारात्मक कदम उठाएंगे। साथ ही ममनून हुसैर जो कि आगरा में 1940 में जन्मे हैं उनसे भारत खासकर आगरे के लोगों को काफी उम्मीद बंधी है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि ममनून हुसैन और शरीफ साहब क्या सचमुच भारत के साथ सहज रिश्ता बनाने में रूचि लेते हैं या कि यह भी आम घोषणाओं की तरह महज राजनैतिक बयान तक सीमित रह जाएगा।

Friday, August 2, 2013

बोलने की करो प्रैक्टिस



कौशलेंद्र प्रपन्न
बोलना भी एक कला है। दोस्तों के बीच बोलना और किसी प्रतियोगिता या सभा में बोलना बिल्कुल अलग बात है। जब हम दोस्तों से बातचीत कर रहे होते हैं तब हमें डर नहीं लगता। क्योंकि वहां कोई आपको जज नहीं करता। लेकिन जब बच्चे पोडियम पर खड़े होते हैं तब उन्हें हाॅल में बैठे मैडम, जज, बच्चे और बाहर के स्कूलों से आए दूसरे बच्चे भी सुन रहे होते हैं। ऐसे में कई बच्चे ठीक से नहीं बोल पाते। कुछ तो हकलाने लगते हैं तो कुछ बोलते बोलते चुप हो जाते हैं। उन्हें याद किया हुआ भाषण, कविता याद ही नहीं आती। ऐसे में बच्चे रूआंसा सा चेहरा लेकर वापस आ जाते हैं। और दूसरा बच्चा जो बेधड़क बोल कर जाता है उसे एवाड मिल जाता है।
बोलने से डरना नहीं है। बल्कि कैसे बोलना है? क्या बोलना है? किस तरह से बोलना है इसकी तैयारी तुम्हें करनी चाहिए। जो भी विषय यानी टाॅपिक मिला है उसपर मैडम, पापा, भईया या दीदी से विचार-विमर्श यानी जानकारी हासिल कर अच्छे से तैयारी करनी चाहिए।
पोडियम पर सीधे खड़ा होना ही अच्छा रहता है। दूसरी जरूरी बात यह कि तुम्हारे सामने जो बैठे या खड़े हैं उनकी आंखों में आंखें डाल कर बोलना चाहिए। इससे पता चलता रहता है कि सुनने वाले तुम्हारी बात ध्यान से सुन भी रहे हैं या नहीं। हां पता है कि जब तुम बच्चों को देखते हो तो वो तुम्हें मुंह चिढ़ाते हैं। हंसाने की कोशिश करते हैं। लेकिन तुम्हें उन लोगों को ऐसे देखना है जैसे वो कुछ नहीं कर रहे हैं। अगर एक बच्चे पर देखोगे तब मुश्किल है। इसलिए किसी भी एक पर नजरें मत टिकाना। सभी की नजरों में देखने की कोशिश करना।
जिस भी विषय पर बोलना है उसकी प्रैक्टिस घर पर, ग्राउंड में, मिरर के सामने कई बार बोल कर करना चाहिए। इससे पता चलता है कि कहां गलती हो रही है। कई बार बच्चे पाॅकेट में हाथ डालकर खड़े होते हैं तो कई अपने कपड़े, बाल ही संवारते रहते हैं। ऐसे में आपके माक्र्स कटते हैं और दूसरा जीत जाता है।
बोलते समय आपका उच्चारण बिल्कुल साफ, शुद्ध और धाराप्रवाह होनी चाहिए। आपकी प्रस्तुती कैसी है इसपर भी ध्यान दिया जाता है। इसलिए हाथों, चेहरे, बाॅडी के हाव-भाव भी जीत दिलाने में मदद करते हैं।

फोड़कर ठीकरा तुम्हारे सिर


भगवन हम फोड़कर ठीकरा तुम्हारे सिर-
कोसते रहते हैं हर पल,
तुमने अच्छा नहीं किया,
मैं क्या बिगाड़ा था किसी का,
भगवन हम हैं ऐसे ही,
कोसना और रोना अपने भाग्य पर।
जब जब हुई अनहोनी-
हमने आरोपित किया तुम्हें,
मंदिर या मस्ज़द में लड़ आते हैं हम,
गंगा में डुबकी लगा धोने को समस्त पाप,
लगाते हैं दौड़ कांवड़ लेकर,
मगर तुम तुम ठहरे।
किसी भी किस्म का रिश्वत नहीं तुम्हें कबूल-
तुम वही देते हो जो किया हमने कर्म,
ख़ामख़ा तुम करते हैं बदनाम,
हे ! प्रभू सुन रहे हो तुमत्र
मैं कोई रिश्वत नहीं दूंगा,
कोसूंगा भी नहीं,
नहीं करूंगा दर्शन तेरात्र
किसी कैलाश या अमरनाथ की यात्रा से तौबा,
करूंगा अपना कर्म तन-मन लगाकर,
तुम क्रुद्ध मत होना।
ग़र मेरे हाथ में न हो आचमन-
या कि नमाज़ भी न करूं अदा तो,
नाराज़ न होना,
अगर न किया हवन तो भी,
मेरी समिधा पहुंचा देना,
उन्हें जिन्हें दरकार है।

Friday, July 26, 2013

प्राथमिक शिक्षा की चुनौतियां
प्राथमिक शिक्षा जिन अहम चुनौतियों से गुजर रही है उन्हें मोटे तौर पर इन वर्गों में देख सकते हैं-
शिक्षकों को गैर शैक्षणिक कार्यों में लगाया, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, शिक्षकों की रिक्त पदें, दोपहर का भोजन और शिक्षक की मनः स्थिति आदि।
जहां तक गैर शैक्षणिक कार्योंं में लगाए जाने की बात है तो नूपा की रिपोर्ट की मानें तो असम में 32 फीसदी, पश्चिम बंगाल में 30 फीसदी, बिहार में 22 फीसदी, राजस्थान में 17 फीसदी आदि शिक्षकों को पूरे साल में गैर शैक्षणिक कार्यों में लगाया गया। डाईस की रिपोर्ट जो नूपा ही हर साल छापती है इस रिपोर्ट के अनुसार भी साल भर में किसी राज्य में 17 दिन, 22 दिन और 30 दिन से ज्यादा गैर शैक्षणिक कार्यों में नहीं लगाए गए।
गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तो बेचारी कहीं पिछड़ ही गई है। कुछ गैर सरकारी संस्थाओं की ओर से कराए सर्वे में पाया गया कि कक्षा 6 या 8 में पढ़ने वाले बच्चे कक्षा 1 या 2 री के स्तर के भी गणित व भाषा पढ़ने में असमर्थ हैं।
शिक्षकों के पदों सालों साल से खाली हुईं तो वो खाली ही पड़ी हैं। बिहार में तकरीबन 3 लाख, उत्तर प्रदेश में 2 लाख, झारखंड़ में 78 हजार, दिल्ली में 8 हजार पद रिक्त हैं। ऐसे में तदर्थ शिक्षकों जिसमें शिक्षा मित्र, पैरा टीचर, अनुबंध आदि पर तैनात शिक्षक पढ़ाने का काम कर रहे हैं। दिल्ली मंे ही कई प्राथमिक स्कूल ऐसे हैं जहां दो स्थाई और बाकी के सात आठ अध्यापक अनुबंध पर हैं।
दोपहर का भोजन। इसके बारे में कुछ कहना बेईमानी है। क्योंकि बिहार की घटना तो एक झलक मात्र है। ऐसी स्थिति अमूमन हर राज्य में ही है। कहीं मेढक मिलते हैं तो कहीं छिपकली। हालांकि भोजन के लोभ में काफी बच्चे स्कूल में दाखिल हुए। दाखिले की कहानी तो और भी हैं ममसलन वजीफा मिलने वाले दिन पूरी उपस्थिति होती है। बाकी दिन स्कूल ढनढन बजता है।
मनः स्थिति तो यह है कि पढ़ाने के प्रति अरूचि के शिकार शिक्षक बस एक एक दिन काट रहे हैं। ऐसी स्थिति दिल्ली सहित कई राज्यों की है। जहां पर शिक्षक पढ़ाने की बजाए शिकायतों की पोटली लिए बैठा है। बस आप सवाल करें और वे फूट पड़ते हैं। माना की स्थितियां खराब हैं लेकिन जितने दिन आप स्कूल में होते हैं क्या अपना 100 फीसदी बच्चों के देते हैं यह महत्वपूर्ण है।

Thursday, July 25, 2013


घर सा बनाओ स्कूल
स्कूल खुले तकरीबन एक महीना दिन हो चुके हैं। कैसा लगा छुट्टियों के बाद स्कूल आना। हां छुट्टियों के बाद ज़रा पढ़ाई में मन नहीं लग रहा होगा। लेकिन पढ़ाई तो करनी है। स्कूल तो जाना है। वैसे भी देश के हर बच्चे को शिक्षा पाने का हक जो मिल चुका है। तो अब 6 से 14 साल तक के सभी बच्चे स्कूल जाएं और शिक्षा हासिल करें, इसके लिए सरकार ने आपके लिए कानून जो पास कर दिया है। जिसे शिक्षा का अधिकार कानून 2009 के नाम से जानते हैं।
मगर स्कूल हैं कि आपको अपनी ओर खींचते ही नहीं। स्कूल के नाम पर तरह तरह के बहाने बनाते हैं। ताकि स्कूल न जाना पड़े। लेकिन ज़रा सोचो अगर स्कूल नहीं जाओगे तो तालीस कैसे पाओगे। स्कूल जाना तुम्हें अच्छा लगे। स्कूल तुम्हें डरावने न लगें इसलिए शिक्षा का अधिकार कानून में बताया गया है कि स्कूल को कैसे बच्चों की रूचि के अनुसार बनाया जाए।
स्कूल में खेलने के मैदान हों। लाईब्रेरी हो। आपके क्लास रूम सुंदर सजे- धजे मन मोहक हों इसके लिए भी इस कानून में निर्देश और राय दी गई है। स्कूल की दीवारें, क्लास रूम की दीवारें, पंखे, छत रंगीले हों। दीवारों पर तुम चाहो तो खुद कलाकारी कर सको। जहां बैठते हो वह जगह भी आरामदायक और मजेदार हो इसके लिए आम आगे आ सकते हो।
स्कूल हो घर जैसा कैसे बना सकते हो। हां वैसे ही जैसे घर में आप डाईंग रूम, बेड रूमको सजाते हो वैसे ही अपने स्कूल कके हर कोने, क्लास को अपनी रूचि से सजा सकते हो। आप अपनी बनाई पेंटिंग, माॅडल, चित्र आदि को क्लास रूम में लगा सकते हो।
इतना ही नहीं अगर आप कविता लिखते हो, कोई कहानी या घटना अपने दोस्तों के साथ शेयर करना चाहते हो तो उसे साफ-संुदर हैंडराईटिंग में लिख कर अपने क्लास रूम या नोटिस बोर्ड पर सजा कर चिपका सकते हो। ऐसे करोगे तो खुद को भी अच्छा लगेगा। ज़रा कर के देखो तब तुम्हे अपना स्कूल अपने घर सा लगने लगेगा।
कौशलेंद्र प्रपन्न

Thursday, July 18, 2013

अब लाश उठाएं
जिन बच्चों की जानें गईं वो तो चले गए। आंसुओं से तरबतर आंखों में न खत्म होने वाली उदासी रह गई। मां-बाप बिलबिलाते रहेंगे। राजनीति बतौर जारी रहेगी। आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला भी चलता रहेगा। कुछ सालों बाद रिपोर्ट आ भी गई तो क्या होना कुछ अन्य लोगों पर कार्यवाई होगी बाकी बेफ्रिक बाहर घूम रहे होंगे।
वैसे देखा जाए तो कितनी भी पंक्तियां लिख दी जाएं उसका न तो सरकार पर असर पड़ने वाला है और न जिन्होंने अपनी औलादें खोई हैं उन्हें सान्त्वना मिलने वाली है। बस इतना जरूर है कि हमें एक आत्मतोष मिलेगा कि हमने अपने स्तर पर कुछ तो किया।
ठीक ही तो है बिल्कुल चुप बैठ जाने से तो बेहतर है रिरियाती आवाज ही सही विरोध के स्वर उठेंगे तो किसी न किसी के कानों में टकराएगी ही। सो मौन की संस्कृति को तोड़ते हुए अपने अपने स्तर पर विरोध और लड़ाई लड़नी ही चाहिए ताकि उन बच्चों के साथ साथ उनके मां-बाप को भी महसूस हो कि वो अकेले नहीं हैं।

मिड डे भोजन ने ली फिर बच्चों की जान
एक निजी न्यूज चैनल के अनुसार बिहार में 11 बच्चों की मौत हो गई। माना जा रहा है कि 40 से ज्यादा बच्चे अस्पताल में हैं। यह पहली और आखिरी घटना नहीं है। मिड डे भोजन खाकर देश के विभिन्न राज्यों में बच्चे मौत के शिकार हो चुके हैं। सरकार है कि जागती नहीं। 
शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 और बच्चों के जुड़े मिड डे भोजन दोनों का एक सा हाल है। कहीं खीचड़ी खाकर तो कहीं रोटी और सब्जी खाकर मौत के घट तो बच्चे ही उतरते हैं। वो बच्चे जो निजी स्कूलों में नहीं जा पाते। वे बच्चे जिनके मां-बाप गैर सरकारी स्कूलांे के नखरे नहीं उठा सकते गोवा उनके बच्चे बच्चे नहीं हैं। 
सरकारी स्तर पर कितनी ही स्तर पर कमियां दिखाई देने के बावजूद यदि दुरुस्त नहीं किया जाएगा तो ऐसे बच्चों की संख्या कम होने की बजाए बढ़ेंगे ही। मिड डे भोजन परोसने वाली निजी संगठनों और भोजन मुहैया कराने वाली संस्थाएं इस जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकतीं। उन्हीं इन मौतों का जिम्मा लेना ही होगा।
गौरतलब बात है कि देश भर में मिड डे भोजन के नाम पर जिस तरह के खाद्यपदार्थ परोसे जाते हैं वो किसी भी कोण से पौष्टिकता के निकष पर खरे नहीं उतरते। इन पंक्तियों के लेखक ने उत्तर प्रदेश, अंध्र प्रदेश, बिहार आदि राज्यों के दौरे के दरमियान पाया कि रोटी अधपकी, सब्जी के नाम पर चने या न्यूटीनेगेट के पनीली सब्जियां परोसी जताती हैं। यू ंतो स्कूल के प्रांगण में कई जगह हप्ते भर के भोजन की सारणी दिखाई देगी कि फलां दिन पूरी-खीर, खीचड़ी, रोटी दाल, आदि मिलेंगी। लेकिन हकीकत बच्चे बताते हैं कि उन्हें क्या मिलता है। जिस जगह पर कुत्ते गस्त मार रहे हों वहीं पास में रोटी भी पक रही हो तो ऐसे में स्वच्छता का अंदाजा लगाया जा सकता है।
बेहतर हो कि या तो मिड डे भोजन पकना बंद हो या उसकी गुणवत्ता एवं पकने की प्रक्रिया पर खास नजर रखा जाए।

Friday, July 12, 2013



फेसबुक का काव्य संसार

कौन कहता है साहित्य मर रहा है। साहित्य लेखक व पाठक नहीं रहे। ग़लत आरोप है। यह अलग बात है कि जिस तरह के साहित्य की अपेक्षा एक मंजे हुए लेखक समूह से की जाती है वह नदारत है। नदारत इसलिए क्योंकि आज जिस तरह की साहित्य देखने पढ़ने को मिलता है वह आत्ममुग्धता से ग्रस्त है। स्वप्रकटकरण के व्यामोह से लबरेज़ है। काव्य सृजन जितना कठिन कर्म है उतना ही आसान भी। मन के भावों को प्रकट करने में अब महज लय का ध्यान रखना काफी माना जाता है। जिसे नामवर सिंह जैसे आलोचक मानते हैं कि छनद मुक्ति का आशय लय मुक्ति नहीं है। कोई भी कविता छनद मुक्त तो हो सकती है लय मुक्त नहीं। तो इसकी बानगी फेसबंक पर बहुतायत मात्रा में मिलती है। देश के कोने कोने से हिन्दी भाषा, अहिन्दी भाषी सब कविता लिखने में लगे हैं।
कविता व काव्य साहित्य का एक अंग है। संपूर्ण साहित्य कहना अनुचित होगा। पद्य और गद्य। कविता पद्य के पाले मंे बैठती है। कविता के प्राचीन और आधुनिक दोनों ही रूपों से हम बचपन से वाकिफ हैं। बचपन में पाठ्यपुस्तकों में शामिल भवानी प्रसाद मिश्र, सुभद्रा कुमारी चैहान, महादेवी वर्मा, निराला, नागार्जुन आदि से लेकर बच्चन जी की कविताओं का आस्वाद लिया है। तब से काव्य के प्रति एक अनुराग हम सब को रहा है। यह अलग बात है कि पाठ्य पुस्तकों में शामिल कविताओं को पढ़ने की मजबूरीवश पढ़ना पड़ता था। उसकी व्याख्या करनी पड़ती थी। लेकिन, तब बोझ लगने वाली कविताएं बड़े होने पर अपने व्यापक अर्थ गाम्भीर्यता से खुलने लगीं। तुलसी या सूर या फिर कबीर को पढ़ते वक्त लगता था क्या कठिन कविता है। कैसी भाषा है। अब नाहि रहिहों इसि देस गोंसाईं। जैसी भाषा को पढ़ते वक्त कोफ्त होती थी। लेकिन अब उन्हीं भाषिक छटाओं को देख देख, पढ़ पढ़ कर गौरव महसूस होता है कि उन्हीं भाषाओं में ब्रज, मागधी, अवधी, भोजपुरी की व्यापक छटाएं खुल कर खिलती थीं।
सूर तुलसी, कबीर या घनानंद, जायसी को पढ़ना ठीक वैसी ही अनुभूति से भर जाना है जैसे कोई कालीदास, भवभूति, दंड़ी को पढ़ने में मिलता है। जहां संस्कृत के इन विद्धान कवियांे, नाटककारों ने अपनी प्रतिभा का निदर्शन कराया वहीं हिन्दी में भी रीति काल भक्ति काल से होते हुए आधुनिक काल की कविताएं पढ़ते सुनते हुए महसूस की जा सकती हैं। जहां न केवल सांैदर्य वर्णन मिलते हैं बल्कि अन्य रसों का का स्वाद भी चखने को मिलता है। जहां घनानंद, जायसी प्रेम पूर्ण कविताएं लिखते हैं वहीं प्रकारांतर से राजनीति, प्रकृति, धर्म, समाज एवं अर्थ की भी स्थिति भी हमारे सामने खुलती है।
फेसबुक पर कविताओं की रचनाएं खूब देखी जा सकती हैं। रोज दिन सृजित कविताओं को फेसबुक पर पाठकों ‘‘ फ्रैंड लिस्ट में शामिल’’ के बीच परोस कर एक खुशी से भर उठना कि देखिए, पढि़ए और सराहिए कैसे कविता है। दरअसल वे कविताएं प्रेम रस में पगी होती हैं। तुकबंदी प्रधान ये कविताएं क्षणिक आवेश में लिखी चार पांच लाइन की कविताएं बहुत दूरगामी नहीं होतीं। दूरगामी से मतलब है लंबी आयु वाली। कितना अच्छा हो कि जिस तरह फेसबुक पर कविताओं की नदी बहा करती है उस अनुपात में कम ही सही कुछ अच्छी आलोचनाएं, समीक्षाएं लिखी जाए तो अच्छा हो।

Tuesday, July 9, 2013


परीक्षा बड़ ठगनी हम जानी
-कौशलेंद्र प्रपन्न
यूं तो ‘माया बड़ ठगनी हम जानी’ माया के बारे में कहा गया है, लेकिन शिक्षा की दुनिया में परीक्षा किसी माया से किसी भी कोण से कमतर नहीं है। परीक्षा लुभाती है। परीक्षा डराती है। और परीक्षा ही है जो किशोरों और युवाओं की जान भी लेती है। बल्कि कहना चाहिए कि पिछले दस सालों में हमारे  नवनिहालों की जान ले चुकी है। जिन जानों की एफआईआर हुईं वो आंकड़े चीख-चीखकर बताती हैं कि आज की तारीख में परीक्षा मौत के समकक्ष खड़ी हो चुकी है। परीक्षा के चरित्र पर नजर डालें तो नचिकेता को भी परीक्षा की घड़ी को पार करना पड़ा था। वैदिक काल हो या महाकाव्य काल इस समय में भी परीक्षा वजूद में मिलती है। लेकिन आज की परीक्षा और तब की परीक्षा की प्रकृति में बुनियादी अंतर यह था कि उस समय की परीक्षा छात्रों की ज्ञान, समझ, कौशल और सर्वांगीण विकास को परीक्षित करती थीं। साथ ही श्रुति परंपरा में शास्त्रार्थ के जरिए ज्ञान की परीक्षा होती थी। द्रोणाचार्य का पांड़वों की परीक्षा लेना हो या राम की परीक्षा भी समझ और अर्जित ज्ञान का इस्तेमाल व्यवहार की कसौटी पर करने में लिया जाता था। उस समय की परीक्षाएं अंकों, ग्रेड़ों पर आधारित नहीं थीं बल्कि वे परीक्षाएं छात्रों की पठित और स्मृत ज्ञान का व्यावहारिक जीवन में इस्तेमाल पर केंद्रीत हुआ करता था।
समय और समाज की चुनौतियों के आगे परीक्षा की प्रकृति अपना स्वरूप बदलती चली गई। साल का फरवरी-मार्च ख़ासकर 10 वीं और 12 वीं क्लास में पढ़ने वालों की जिंदगी को जीवन-मृत्यु तुल्य दो पाटों में बांट देती है। परीक्षा में बैठने वालों के दिमाग में अभिभावकों और अध्यापकों की ओर से बड़ी चतुराई और ढीठता से ठूंसी जाती है कि यही वो देहरी है जहां से जिंदगी के व्यापक रास्ते खुलते हैं। यदि विफल हुए तो जीवन भर खुद को मांफ नहीं कर पाओगे। न केवल खुद की, बल्कि मां-बाप की आशाओं, उम्मीदों को मटियामेट कर दोगो। परीक्षा देने वाले इन्हीं उम्मीदों, आशाओं और हिदायतों की परतों के साथ विषय की पेचिंदगियों को सहते हुए परीक्षा में बैठते हैं।
परीक्षा को भयावह और मार्केटेबल भी बनाने का चलन देखने में आता है। तकरीबन जनवरी और फरवरी के महिनों में विभिन्न संचार माध्यमों में परीक्षा के बरक्स एक युद्ध सा माहौल बनाया जाता है। परीक्षा न हुआ गोया युद्ध की आशंका से अस्त्र-शस्त्र, तीर-कमान आदि की सफाई संजाई शुरू हो जाती है। उसी तरह से परीक्षा से पहले इतना सोएं, इतना पढ़ें, यह न करें, वह न करें। कोई- कहीं ज्योतिषी तो कहीं मनोचिकित्सक, कहीं डाॅक्टर या फिर विषय विशेषज्ञों के पाचक बांटने तेज हो जाते हैं। बड़ी ही चिंताजनक बात है कि पहले तो अभिभावकों और अध्यापकों की तरफ से पेट में दर्द पैदा की जाती है फिर मर्ज बढ़ाकर चुरनें बांटीं जाती हैं। कितना बेहतर होता कि दर्द ही न पैदा हो इसकी कोशिश की जाती।
कुछ नवाचारी स्कूल हैं मसलन बोध शिक्षा समिति और अरविंद आश्रम में स्थित मिरांबिका जहां किसी भी कक्षा में परीक्षाएं नहीं होतीं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं निकालना चाहिए कि वहां बच्चे कैसे अलगी कक्षा में जाते हैं? तथाकथित सालाना व मासिक परीक्षाएं नहीं होतीं। वहां सतत् मूल्यांकन को अपनाया जाता है। बच्चों की समझ, बौद्धिक स्तर, रूचि आदि के अनुसार विषय पढ़ाए जाते हैं। जिस विषय में बच्चे की जिस स्तर की समझ और क्षमता है उसे उसी स्तर की शिक्षा दी जाती है। दूसरे शब्दों में कहें तो इन स्थानों पर पुस्तकीय ज्ञान को रोचक और गतिविधि से जोड़कर बच्चों के साथ साझा किया जाता है।  
नेशनल करिकूलम फे्रमवर्क 2005 बच्चों को रटे रटाए तथ्यों को यथावत् उत्तर पुस्तिका पर उगलने के खिलाफ अपनी सिफारिशे दे चुकी है। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए एनसीइआरटी की किताबें बनाई गईं। उन किताबों में सवालों की प्रकृति को बदला गया। यहां तक कि अध्यापकों की ओर से गतिविधियां कराने की भी गुंजाईश पैदा की गई। लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि आज भी बच्चे परीक्षा से उतने ही डरते और मरते हैं जितने 2000 के आस-पास अपनी जान दिया करते थे। बल्कि आंकड़े तो घटने की बजाए बढ़े ही हैं। स्कूल स्तर से लेकर काॅलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर दाखिले के लिए छात्रों को परीक्षा के द्वार को पार करने पड़ते हैं। लेकिन जिस संख्या में रिजल्ट से हताश होकर आत्महतया करने की प्रवृत्ति 10 वीं और 12 वीं कक्षाओं में देखी जाती हैं। उतनी अन्य स्तर की परीक्षाओं में नहीं। शिक्षा से संबद्ध विभिन्न निकायों को इस मुहाने को दुरुस्त करना होगा जहां पर हमारे भविष्य के पौध दम तोड़ देते हैं। परीक्षा को डरावनी छवि से निजात दिलाना होगा।

एकांत में नहाते हुए
वो जब नहा रही थी उसी वक्त जीजा झांक रहा  था। कुछ उसके गिले बदन को देख देख कर अपने भाग्य को कोसता जीजा सोच रहा था कि मुझे क्यों नहीं मिली ऐसी संुदर बदना। कि तभी दीवार से कुछ खिसका और उसके आभास हुआ कि कोई है जो झांक रहा है।
झांक रहा है उसे एकांत में नहाते हुए। कोई कौन हो सकता है? घर में केवल दीदी और जीजा ही तो हैं। दीदी देख नहीं सकती। फिर वह दूसरा कौन है। सहज ही था दूसरा कोई और नहीं उसका जीजा ही था। उसने इस वाक्या को दबा दिया कि कहीं दीदी के घर में बवाल न हो जाए। कहीं इसका खामियाजा दीदी को न भुगतना पड़े।
बात आई गई हो गई। लेकिन बात तो बात थी नहीं। वह एक घटना बिन सोचे नहीं घटित नहीं हुई थी। सो एक बार फिर घटित हुई। लेकिन इस बार घर भी उसी का था और बार्थरूम भी। बस झांकने वाला व्यक्ति एक ही था। इस बार उसने विरोध का जोखि़म उठाना ही बेहतर समझा।
वैसे उसका पति कब का दूसरी लड़की के प्रेम में जा चुका था। ले देकर एक अपंग लड़का साथ था। शायद यही वो सहजता और सकून था उसके जीजा की नजर में। सो बाज नहीं आता। जबकि उसके भी जवान बेटी थी और बेटा भी। इस बार उसने सब के सामने यह बात रखने की हिम्मत जुटाई।


बहार ए बाहर
कभी सोचा भी नहीं होगा कि कल जब वो आॅफिस आएंगे तो उनका एसेस राइट छीन ली जाएगी। वो कम्प्यूटर नहीं खोल सकते। गेट से अंदर आने के बाद सब कुछ बदला बदला होगा। साथ काम करने वाले भी उनसे मंुह चुराएंगे। उनकी गलती क्या थी इस पर कोई खुल कर बोलेगा भी नहीं। सब तरफ ख़ामोशी और शांति पसरी होगी। सब को इसका डर सता रहा होगा कि कहीं बात करते कोई नोटिस न कर ले। 
दुनिया भर में 2008 में मंदी के दौरान इस तरह की घटनाएं आम देखी जा रही थीं। रातों रात लोगों के हाथ से नौकरी यूं फिसल रही थी जैसे रेत हो मुट्ठी में। रात काम कर के गए सुबह बे नौकरी हो गए। किसको क्या बताएं। कि घर जल्दी क्यों आ गया वो। 
2008 ही नहीं बल्कि कई कंपनियों में आज भी यह मंजर देखा जा सकता है। कोई कैसे रोतों रात सड़क पर आ जाता है इसका उसे इल्म तक नहीं होता। घर बाहर हर जगह उससे कई सवाल करती आंखें घूरने लगती हैं। न घर में चैन से रह पाता है और न बाहर।
ऐसे में कई लोगों के मधुर प्रणय संबंध खटाई में मिल गए। जो जोड़े शादी के लिए तैयार थे उसपर स्थगन के ग्रहण लग गए। होस्पिटल में किसिम किसिम के बीमार लोग आने लगे। दांत का दर्द। सिर में दर्द। खीझ, चिड़चिड़ापन। गुस्सा आदि इससे सेहद तो खराब हुई ही साथ ही कई रिश्ते दूर चले गए। छः छः माह या साल भर तक लोग तमाम नेटवर्क तलाशते रहे नौकरी के लिए। लेकिन एक टीस एक भूत कि आपको तो निकाला गया था उनका पीछे नहीं छोड़ते थे।
निकाले गए लोगों पर म्ंादी के व्यापक प्रभाव एवं दुष्परिणामों पर सही मायने में न विश्लेषण हुआ और न ही विमर्श ही। अखबारों, मीडिया एवं आम मंचों पर इस मुद्दे पर चर्चा भी गोया सेंसर के शिकार हो गए थे। अखबारों में तो खास कर चेतावनी दी गई थी कि मंदी और इससे जुड़े मामले अखबारों में नहीं दिखने चाहिए। सो नहीं दिखा। दृश्य माध्यमों पर भी इससे जुड़ी ख़बरें नदारत रहीं।
विभिन्न कंपनियों ने मंदी की आड में जम कर कत्ल ए आम मचाया। जिसमें कई निर्दोष जानें भी स्वाहा हो गईं। उन्हें संभलने में साल लग गए। किन्तु यह खेल अभी थमा नहीं है। कंपनी को घाटे से बचाने के तर्क पर यह खेल बतौर जारी है। ऐसे में जान तो कमजोर, असहायों की ही जाती है। जो ‘करीब’ होते हैं उन्हें एक खरोच तक नहीं आती।
ऐसे लाखों कामगरों के लिए सहानुभूत रखना कहां का गुनाह है। और यदि हमसे बन पड़े तो उनकी मदद करना किसी आपदा से प्रभावित पीडि़त की जान बचाने से कम नहीं है।
बोध गया और लाहौरः दर्द एक सा
इधर बोध गया में धमाका उधर लाहौर में भी। इधर मरने वालों की संख्या कम उधर 20 से भी ज्यादा। ख़ून दोनों ही जगह। दोनों ही जमीन पर आतंकी हमला। न वो सुरक्षित और न हम। 
सच है। लाहौर में बाजार था उनके निशाने पर और यहां मंदिर। एक शांति स्थल तो दूसरा भोजन स्थल। शाम में लोग घरों से निकल कर विभिन्न तरह के व्यंजन खाने आए थे। वहीं वहां मन की शांति की तलाश मंे। एक ओर क्षुधा तृप्ति थी तो दूसरी ओर मानसिक। 
उनके लिए दोनांे ही जगह एक समान। सिर्फ और सिर्फ लोग। जिनके बीच दहशत खौफ पैदा करना और खून बहाना मकसद था। जो उन्होंने किया। कत्ल, खून, आतंक न बौद्ध को स्वीकार है और न इस्लाम को। लेकिन ऐसे लोग तमाम धर्माें, संप्रदायों और वादों ने परे अपने ही दर्शन पर चलते हैं। जो चीख, हत्या, ख़ून आदि की ही भाषा बोलता, समझता है। 
या ख़ूदा उन्हें सही इल्म दे।

Sunday, June 16, 2013

पिता मेरे गुरु भी रहे
स्कूल में मेरे पिता क्लास टीचर भी थे। उन्होंने एक अध्यापक और पिता दोनों की भूमिका एक साथ निभाई। क्लास में पिटाई भी खाया और घर पर भी। घर से स्कूल के दरमियान रास्ते भर मुझे वाक्य संरचना, शब्दों और भाषा की दुनिया से परिचय कराते चलते।
भाषा के प्रति रूझान, साहित्य एवं जीवन दर्शन से रू ब रू कराया। उनसे सीखने को बहुत था मगर काफी कुछ छूट गया। जब मैं छोटा था तब अक्सर वो कहा करते थे, मेरी लंगोटी पर तो मेरे बच्चों का अधिकार है लेकिन मेरी ज्ञान संपदा पर नहीं। कितना मुझ से ले सकते हैं, यह उनकी क्षमता पर निर्भर करता है।
पिताजी से भाषा की शुद्धता, जीवन दर्शन और पढ़ाई की महत्ता की तालीम मिली। कई बार उनकी कविता को गुनगुनाते हुए पिताजी को याद कर लिया करता हूं। जब कभी उन्हीं की कविता जो उन्हें अब याद नहीं, गा कर सुनाता हूं तो अंदर तक गदगद हो जाते हैं। उनकी खुशी देख मन आनंदित हो जाता है।  

Wednesday, June 12, 2013

मार्केट @11
नाम बेशक अलग मिल सकते हैं लेकिन आशय, उद्देश्य एक ही है वो यह कि कम दाम में सब्जियां मिल जाएं। जाते जाते दुकानदार अपनी सब्जियां कम दामों में बेच कर घर जाना चाहता है और इसी का फायदा ख़रीद्दार उठाता है।
दिल्ली में विभिन्न इलाकों में अलग-अलग दिन के नाम पर ही बाजार के नाम है। मसलन सोम बाजार, वीर बाजार, रवि बाजार, शुक्र बजार आदि। हर हप्ते के नाम पर बाजार। दिल्ली के बाहर भी ऐसे बाजारों को देख सकते हैं।
हरिद्वार में पीठ नाम है ऐसे बाजारों का। कहीं हाट तो कहीं मीना बाजार। हर बाजार में भीड़ वही, दुकानदारों के साथ मोल भाव करते ग्राहक और ताम-झाम।
दिल्ली में अमूमन अब लोग ऐसे बाजार में रात 11 बजे ज्यादा जाना पसंद करते हैं। क्योंकि इस समय दुकानदार अपनी दुकान बढ़ाकर घर जाना चाहता है। तो जाहिर है जैसे-तैसे सामानांे को बेच कर फारिक होना चाहता है। और इसी का फायदा उठाने वाले रात 11 बजे के आस पास बाजार आया करते हैं। हालत यह होती है कि इस समय भीड़ टकरा रही होती हैं।

Thursday, June 6, 2013

जि़या के ग़म में 12 साला लड़का भी उसी के राह पर
कौन कहता है कि बच्चों में संवेदना नहीं होती। बच्चे खाली स्लेट होते हैं। जो चाहो लिख दो। पढ़ा दो। जि़या ख़ान की आत्महत्या की घटना से हताहत एक 12 वर्षीय बच्चा जो 5 वीं कक्षा में पढ़ता था उसने आत्महत्या कर ली। यह घटना राजस्थान की है।
एक कहानी हरिसुमन विष्ट जी की है जिसमें जो जिक्र करते हैं कि किस तरह विज्ञापनों के होडिंग्स बच्चों के लिए मौत के रास्ते बन कर आते हैं। सच भी है विज्ञापनों, फिल्मी चक्कर में तो अच्छे-अच्छे दिमागदार लोग पड़ जाते हैं तो वह तो महज 12 साला बच्चा ठहरा।
क्या उसे जि़या से प्रेम था? क्या वह उससे शादी करना चाहता था? क्या वह जि़या को सपने में रोज देखा करता था? ये सवाल अब तो उसी के संग चले गए। तमाम सवाल अनुत्तरित। लेकिन हम नागर समाज के सामने वह बच्चा एक बड़ा सवाल जरूर छोड़ गया कि हम नागर समाज में बच्चे किस तरह पल-बढ़ रहे हैं। पर्दे की दुनिया और हकीकत की दुनिया में हम बुनियादी अंतर समझा पाने में कहीं न कहीं विफल हो रहे हैं।

Wednesday, June 5, 2013

पढ़ाने की छटपटाहट

-कौशलेद्र प्रपन्न
शिक्षक जाति में सभी निराश एवं हताश ही हैं ऐसा कहना एक तरह से शिक्षकीय प्रजाति के साथ सरलीकरण होगा और ग़लत भी। यह तो हर व्यवसाय में होता है। सभी अपने धंधे से संतुष्ट हों ऐसा न तो संभव है और न ही हकीकत ही। असंतोष की भावना हर व्यवसाय में देखी जाती है। लेकिन उन्हीं के बीच कुछ फीसदी ऐसे भी कर्मी होते हैं जिन्हें अपने व्यवसाय की निष्ठा, जिम्मेदारी का भरपूर ख़्याल रहता है। लेकिन अनुभव बताते हैं कि उदास मना शिक्षकों की संख्या ज्यादा है। अध्यापक वर्ग की निराशा के पीछे कई बार गैर शैक्षणिक कार्यों, नीतिगत एकरूपता एवं व्यावहारिक न होना भी पाया जाता है। यह कहना उचित नहीं होगा कि पूरा का पूरा शिक्षक समुदाय निराश एवं अरूचि के शिकार हो चुके हैं। इन दिनों छुट्टियों में दिल्ली सरकार के शिक्षा विभाग ‘इन सर्विस’ प्रशिक्षण कार्यशालाएं आयोजित कर रही हैं। इन कार्यशालाओं में जीवन कौशल, संप्रेषणीयता, पाठ्यक्रम, सुरूचिपूर्ण कक्षा अध्यापन, सृजनात्मक लेखन, शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 आदि पर विशेष प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इसके पीछे उद्देश्य यही है कि अध्यापक/अध्यापिकाएं अपनी दक्षता में वृद्धि कर सकें और स्कूल खुलने पर कक्षा में इस्तेमाल कर सकें। इसका लाभ सीधे-सीधे बच्चों को मिल सके। इन पंक्तियों के लेखक को इस कार्यशाला में शिक्षा का अधिकार अधिनियम, जीवन कौशल और सृजनात्मक लेखन पर बातचीत करने का अवसर मिला। तकरीबन 2000 से भी अधिक अध्यापक/अध्यापिकाओं से रू ब रू होने के बाद जो हकीकत सामने आई वह यह कि अध्यापक वर्ग बेहद निराश एवं उदास हैं। उनकी उदासी, निराशा का कारण प्रशासनिक एवं नीतिगत स्तर पर थीं। मसलन शिक्षा के अधिकार अधिनियम बनाते वक्त अध्यापकों की राय क्यों नहीं ली गई। नीति-निर्माताओं को भी कभी कक्षा में पढ़ाने आना चाहिए ताकि वो देख सकें कि कैसे  एक कक्षा में 60, 80 से भी ज्यादा बच्चों को एक अध्यापक पढ़ाता है व पढ़ा सकता है।
इस तरह की शिकायतें, रोष, असंतोष से तकरीबन हर क्लास में दो चार होना पड़ा। लेकिन इन्हीं निराशाओं के बीच कुछ ऐसे अध्यापक/अध्यापिकाएं भी मिलीं जिन्हें कक्षा में न पढ़ा पाने का मलाल भी साल रहा था। उनका कहना था मैं पढ़ाना चाहती हूं। लेकिन पिछले एक साल से क़ागजी कामों में उलझी हुई हूं। कई बार लगता है आई तो पढ़ाने थी, लेकिन यह क्या कर रही हूं। वहीं एक मास्टर जी ने भी अपनी व्यथा बयां की कि मैं कक्षा में पढ़ाने डूब जाता हूं। बच्चे आनंद लेकर पढ़ाता हूं। लेकिन अक्सर हेटमास्टर साहब की बुलालट आ जाती है और मेरा अध्यापन बीच में ही ठहर जाता है।
संवाद के दौरान एक पूर्व कथित वाक्य ‘तो क्या निराश हुआ जाए’ का सहारा लिया और कोशिश की कि बात सकारात्मक राह पर आ जाए। इस वाक्य को सुन कर तकरीबन बीस एक अध्यापकों ने एक स्वर में कहा, नहीं। निराश होने की आवश्यकता नहीं। हां यही वाक्य उस वक्त सहारा बना जब कक्षा में संवाद कर रहा था। उनके सवाल, उनकी चिंता, उनकी खीझ, उनकी बेचैनी को सुनते वक्त कुछ पल के लिए लगा मैंने उनके दुखते रगों पर हाथ धर दिया। उनकी पीर थोड़ी और दर्दीली हो गई। लेकिन अपनी पीड़ा कह चुकने के बाद सभी बड़े खुश और राहत महसूस रहे थे। बल्कि एक महिला ने कहा भी कि आपसे अपना दर्द साझा कर बहुत अच्छा लग रहा है। वरना हमारी बात सुनता ही कौन है। दो दो घंटे के सत्र में कई बार ऐसा भी वक्त आया जब मैंने ख़ुद को असहाय अनुभव किया। क्योंकि कई बार उनकी बात सोलहो आने सच थीं, मगर मैं भी कुछ दिलासों, राहत एवं उम्मीद की रोशनी बांटने के सिवा कुछ और नहीं कर सकता था। सच मायने में यदि यह वर्ग निराश या हताश है तो इसे गंभीरता से लेने की आवश्यकता है। क्योंकि इन्हीं के कंधों पर हमारे बच्चे बैठे हैं। ये जैसी दुनिया दिखाएंगे बच्चे संभवतः वैसी ही दुनिया देखेंगे। सरकार गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की बात करती है लेकिन हमारा अधिकांश वक्त कागजी कामों को अंजाम देने में बीत जाता है आदि।
अध्यापकों के बीच इस तरह की निराशा के माहौल को हमें सहजता से नहीं लेनी चाहिए। क्योंकि यदि अध्यापक वर्ग इतना निराश एवं हताश होगा तो इसका प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष असर बच्चों पर पड़ेगा इससे इंकार नहीं कर सकते। यूं तो बतौर दस्तावेज आरटीई एक्ट 2009 बेहद संभावनाओं को संजोए हुए है, लेकिन जमीनी हकीकत पर यह फेल होती दिखाई दे रही है। एक ओर बेहतर स्कूली ढ़ांचा, पेयजल, बच्चों के नामांकन, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की सिफारिश करता है वहीं सरकारी स्कूलों में इन मापदंड़ों पर अधिकांश फिसलन दिखाई दे रही है। जहां तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की बात करें तो गैर सरकारी संस्थाओं की ओर से जारी रिपोर्ट दूसरी ही तस्वीर पेश करते हैं। इस तस्वीर में कक्षा 6,7 में पढ़ने वाला बच्चा कक्षा 1 ली के जोड़ घटाव, लिखित वाक्य पढ़ने में असमर्थ हैं। इसके पीछे अध्यापक वर्ग का अपना तर्क है कि जब से किसी भी बच्चे को फेल नहीं कर सकते। कक्षा 8 वीं तक हर बच्चे को अगली कक्षा में भेजना ही है, किसी भी बच्चे का नाम नहीं काट सकते आदि कुछ ऐसे पहलू हैं जहां बच्चों में पढ़ने की ललक और उत्साह कम ही हुआ है। तर्क तो यह भी दिए जा रहे हैं कि मां-बाप कई बार खुद अनुरोध करते हैं कि बच्चे को वर्तमान कक्षा में ही रोक लो। क्योंकि इसे अभी इस स्तर की तालीम ही नहीं मिली है कि वो अगली कक्षा में जाए। लेकिन अध्यापकों का मानना है कि वो नियमतः मजबूर हैं। किसी भी बच्चे को कक्षा में नहीं रोक सकते। लेकिन इन्हीं कक्षाओं में पढ़ाने की लालसा छटपटाते शिक्षक/शिक्षिकाएं भी मिलीं जिससे महसूस हुआ कि उम्मीद की रोशनी और सांस लेने की छटपटाहट अभी इनमें शेष है। इसीलिए जि़ंदा हैं। जब तक ऐसे अध्यापक समाज में हैं तब तक उम्मीद पूरी तरह से ख़त्म नहीं मानी जा सकती।

Wednesday, May 22, 2013

तो क्या निराश हुआ जाए
इस वाक्य को सुन कर तकरीबन बीस एक अध्यापकों ने एक स्वर में कहा नहीं। निराश होने की आवश्यकता नहीं। हां यही वाक्य उस वक्त सहारा बना जब कक्षा में संवाद कर रहा था। उनके सवाल, उनकी चिंता, उनकी खीझ, उनकी बेचैनी को सुनते वक्त कुछ पल के लिए लगा मैं उनके दुखते रगों पर हाथ धर दिया। उनकी पीर थोड़ी और दर्दीली हो गई। लेकिन अपनी पीड़ा कह चुकने के बाद सभी बड़े खुश और राहत महसूस रहे थे। बल्कि एक महिला ने कहा भी कि आपसे अपना दर्द साझा कर बहुत अच्छा लग रहा है। वरना हमारी बात सुनता ही कौन है।
दो दो घंटे के सत्र में कई बार ऐसा भी वक्त आया जब मैं ख़ुद को असहाय अनुभव किया। क्योंकि कई बार उनकी बात सोलहो आने सच थे मगर मैं भी कुछ दिलासों, राहत एवं उम्मीद की रोशनी बांटने के सिवा कुछ और नहीं कर सकता था।
सच मायने में यदि यह वर्ग निराश या हताश है तो इसे गंभीरता से लेने की आवश्यकता है। क्योंकि इन्हीं के कंधों पर हमारे बच्चे बैठे हैं। ये जैसी दुनिया दिखाएंगे बच्चे संभवतः वैसी ही दुनिया देखेंगे।
फिल्म और बच्चों की दुनिया

‘लकड़ी की काठी काठी पे घोड़ा घोड़े के दुम पे जो मारा हथैाड़ा दौड़ा दौड़ा....’खिलखिलाती अपनी धुन में गाती गुनगुनाती लड़की आज भी इस गाने को सुनते आंखों के आगे घूमने लगती है। वहीं एक दूसरे गाने के बोल उधार लेकर कहूं ‘मां मां मां सुनाओ मुझे वो कहानी जिसमें राजा न हो ना हो रानी...जहां परियां हों आसमानी...’इन गानों की मदद से आगे बढ़ता हूं। इन गानों में समय के साथ साथ बच्चों की मांगों, भूमिकाओं में बदलाव तो आए ही हैं साथ ही बच्चे ज्यादा मुखरता से अपनी दुनिया की झलक देते हैं। वहीं एक ऐसा बच्चा हमारा ध्यान अपनी ओर कुछ इस तरह खींचता है-‘बादल आवारा था वो कहां गया उसे ढूढ़ोंकृहर इक पल का जश्न मनता..’ यह गाना और फिल्म तारे जमीं पर बच्चों की बदहाल स्थिति से रू ब रू कराती है। हर बच्चा खास होता है और बच्चे की अपनी दुनिया। बच्चे की इस दुनिया को हम वयस्क कितनी गंभीरता से लेते हैं इसकी झांकी समय समय पर फिल्मों में मिलती हैं। लेकिन अफसोस की ज्यादा तर फिल्मों में बच्चों का इस्तेमाल महज खाली स्पेस को हलका करने व तलाक जैसे दर्दीले वक्त में लड़ाई के सूत्र के रूप में किए जाते हैं। बहरहाल बच्चों को फिल्मों में किन किन छवियों में कैद किए जाते हैं इसकी पड़ताल जरूरी है। क्योंकि इस तथ्य से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि कुछ फिल्मों ने बच्चों को लेकर अच्छा और धारदार बहस की शुरुआत की। बच्चों की समस्याओं को लेकर सरकार, न्यायपालिका, जनसमुदाय में एक जागरूकता भी आई।
फिल्मों से समाज का रिश्ता लंबा और काफी करीब का रहा है। कहते हैं कि फिल्मों में वही प्रतिबिंबित किया जाता है जो समाज में घटता है व घट रहा है। इसीलिए फिल्म को समाज का दपर्ण भी कहा गया है। इसमें ज़रा भी अतिशयोक्ति नहीं है। उदाहरण देखने निकलें तो कई फिल्मों की एक लंबी सूची बन सकती है जिसमें समाज, इतिहास, संस्कृति, भाषा आदि की तत्कालीन करवटें, दर्द-पीर साफ सुने-देखे जा सकते हैं। सचपूछें तो हिन्दी सिनेमा में कई फिल्में बड़े प्रसिद्ध उपन्यास, कहानी पर आधृत रहे हैं और उनका महत्व आज भी कम नहीं हुआ है। पथेर पांचाली, हजार चैरासी की मां, पींजर, पीली छतरी वाली लड़की आदि। जैसा कि पहले भी निवेदन किया जा चुका कि फिल्मों की सूची लंबी हो सकती है। इसलिए यहां सूची बनाने की बजाए उन फिल्मों व दूसरे शब्दों में कहें तो फिल्मों की बुनावट में बच्चा-समाज कहां ज़ज्ब है, उसकी पहचान की जाए। किन्तु यहां स्पष्ट कर देना प्रासंगिक होगा कि आलेख में हम फिल्म और बच्चे के द्वैत की गुत्थी को सुलझाने की कोशिश करेंगे। क्योंकि बच्चे हमारे समाज के वो दलित, उपेक्षित वर्ग हैं , बल्कि हैं भी, की पहचान फिल्मों में की जाए। इसी मनसा से हिन्दी फिल्मों में बच्चे किस रूप, व्यक्तित्व, रंग एवं भूमिका के साथ इस्तेमाल किए जाते रहे हैं, इसपर विमर्श करना है। यहां यह भी स्पष्ट कर देना अप्रासंगिक नहीं होगा कि दुनिया के हर बच्चे को 0 से 18 आयु वर्ग को वो तमाम अधिकार प्राप्त हैं जो एक आम नागरिक को संविधान प्रदान करता है। किन्तु अफसोस की बात यही है कि इन सांवैधानिक प्रावधानों के बावजूद बच्चे हमारे समाज की मुख्यधारा से अलग-थलग नजर आते हैं। उस पर तुर्रा यह कि फिल्म निर्माताओं, निर्देशकों के तर्क यह होते हैं कि दर्शक यही देखना चाहता है। यह पूरा सच नहीं है। समाज की धड़कनों, करवटों, छटपटाहटों को एक व्यापक फलक पर लाना और एक वृहद् विमर्श खड़ा करना भी फिल्म का सरोकार है।
अपना शहर और वो नदी
हां सही कह रहा हूं अपना शहर छूट कर भी नहीं छूटता। वो नदी सूखकर भी नहीं सूखती जिसकी कभी लबालब पानी भरा रहता था। पानी के सूखने के बाद भी रेत पर दौड़ते कुछ दूर तक जाना और पानी की आस में घूटने भर पानी में छप छप करना कहां छूट पाता है। न शहर छूटता है और न नदी।
एक नदी हम सब के अंदर बहा करती है। जिसका पानी साफ निर्मल और पारदर्शी होता है। मगर समय के साथ हमने उसको गंदला कर दिया। ताकि कोई हमारी तलहट्टी न देख पाए। सच कहूं तो वो नदी, वो शहर जहां बचपन गुजरे वो कभी पीछे नहीं छूटता। ताउम्र हमारी स्मृतियों में छलकती रहती है।
उदास मना शिक्षक
गर्मी की छुटिटयों में दिल्ली सरकार के शिक्षा विभाग 'इन सर्विस प्रशिक्षण कार्यशालाएं आयोजित कर रही हैं। इन कार्यशालाओं में जीवन कौशल, संप्रेषणीयता, पाठयक्रम, सुरूचिपूर्ण कक्षा अध्यापन, सृजनात्मक लेखन, शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 आदि पर विशेष प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इसके पीछे उददेश्य यही है कि अध्यापकअध्यापिकाएं अपनी दक्षता में वृद्धि कर सकें और स्कूल खुलने पर कक्षा में इस्तेमाल कर सकें। इसका लाभ सीधे-सीधे बच्चों को मिल सके। इन पंकितयों के लेखक को इस कार्यशाला में शिक्षा का अधिकार अधिनियम, जीवन कौशल और सृजनात्मक लेखन पर बातचीत करने का अवसर मिला। तकरीबन 900 अध्यापकअध्यापिकाओं से रू ब रू होने के बाद जो हकीकत सामने आर्इ वह यह कि अध्यापक वर्ग बेहद निराश एवं उदास हैं। उनकी उदासी, निराशा का कारण प्रशासनिक एवं नीतिगत स्तर पर थीं। मसलन शिक्षा के अधिकार अधिनियम बनाते वक्त अध्यापकों की राय क्यों नहीं ली गर्इ। वास्तव में एक कक्षा में 60 से लेकर 80 और 100 बच्चों की उपसिथति और अध्यापक एक। इतने बच्चों को एक अध्यापक कैसे पढ़ा सकता है। सरकार गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की बात करती है लेकिन हमारा अधिकांश वक्त कागजी कामों को अंजाम देने में बीत जाता है आदि। इसी तरह की प्रतिकि्रयाएं इन कक्षाओं में सुनने को मिलीं।
सांस लेने की छटपटाहट
शिक्षक जाति में सभी निराश एवं हताश ही हैं ऐसा कहना एक तरह से पूरी प्रजाति के साथ सरलीकरण होगा और ग़लत भी। यह तो हर व्यवसाय में होता है। सभी अपने धंधे से संतुष्ट हों। असंतोष की भावना हर व्यवसाय में देखी जाती है। लेकिन उन्हीं के बीच कुछ फीसदी ऐसे भी कर्मी होते हैं जिन्हें अपने व्यवसाय की निष्ठा, जिम्मेदारी का भरपूर ख़्याल रहता है। ऐसे ही जैसे कि पहले आलेख में उदास मना शिक्षक में लिख कि अध्यापक वर्ग में निराशा ज्यादा है। वहीं 10 फीसदी ऐसे उत्साही शिक्षक भी हैं जो पूरी ईमानदारी के साथ अपना शिक्षक धर्म निभा रहे हैं। यह अलग बात है कि इनकी संख्या कम है। ऐसे ही तकरीबन हर क्लास में दो चार अध्यापक/अध्यापिकाएं मिलीं जिन्हें कक्षा में न पढ़ा पाने का मलाल भी साल रहा था। उनका कहना था मैं पढ़ाना चाहती हूं। लेकिन पिछले एक साल से क़ागजी कामों में उलझी हुई हूं। कई बार लगता है आई तो पढ़ाने थी लेकिन यह क्या कर रही हूं। वहीं एक मास्टर जी ने भी अपनी व्यथा बयां की कि मैं कक्षा में पढ़ाने डूब जाता हूं। बच्चे आनंद लेते हैं लेकिन तभी अक्सर हेटमास्टर साहब की बुलालट आ जाती है और मेरा अध्यापन बीच में ही ठहर जाता है।
उम्मीद की रोशनी और सांस लेने की छटपटाहट ही व्यक्ति को जि़ंदा रखता है। जब तक ऐसे अध्यापक समाज में हैं तब तक उम्मीद पूरी तरह से ख़त्म नहीं मानी जा सकती।

Wednesday, April 17, 2013

लो मैंने भी बदल ली रूख



जिधर से बाॅस आते  हों,
उधर दांत निपोर कर हो जाता हूं खड़ा,
जहां बैठते हैं उसके इर्द गिर्द,
मडराने लगता हूं।
मैंने भी मोटी कर ली है अपनी चाम-
वो कितना भी भला बुरा कहे,
कोई असर नहीं
बस मंुह पर मुस्कान,
जी हां जी हां का जाप।
जिधर तू चलेगा-
जह जह विराजे,
वहीं तेरी स्तुति गान हो जाए शुरू,
देखते हैं,
इस बरस कौन है जो रोक ले।

Tuesday, November 13, 2012

इस बरस भी देवता घर उदास
तुलसी गई सूख,
जोरने वाला नहीं कोई दीया,
मेरे घर के देवता घर में लगा है ताला। 
इस बरस किसी ने नहीं बनाया घरौंदा,
चुक्के में लाई खील बतासेनहीं भरे,
खाली है घर,
घर का छत सूना,
कभी छोड़ा करते थे पटाखे,
शोर पर नाराज होते थे पिता,
अब खामोश हैं पिता दूसरे शहर में।
इस बरस घर उदास है और मन सूना,
पर क्या करें,
रेल गाडि़यां तो बढ़ीं बेतहाशा मेरे भी शहर के लिए,
पर अपने शहर से दूर नहीं रह पाने की छटपटाहट है,
अच्छे हैं वे दोस्त वे संगी साथी जो हैं अपने ही शहर में,
इस बरस भी घर सूना है
देवता घर उदास।

Friday, October 26, 2012


 हाशिए पर बिलबिलाते और बाल अधिकार से वंचित बच्चे
-कौशलेंद्र प्रपन्न
सड़क पर एक बच्चा नाक पोछते हुए सूखी नजरों से बड़ों को बड़ी उम्मींद से देखता है। देखता है कि उसे कुछ पैसे दे दें या रोटी खिला दें। ऐसे में उस बच्चे को दुत्कार मिलती है। उपेक्षा मिलता है। चोर-लफाड़े, और न जाने किस किस तरह के विशेषणों से नवाजे जाते हैं। ये वो बच्चे हैं जिनका घर यदि घर की संज्ञा दी जा सकती है तो, फ्लाई ओवर, रेलवे स्टेशन, बस अड़्डे, सड़क के किनारे, पार्क आदि हुआ करता है। ऐसे लाखों बच्चे देश भर में कहीं भी कभी भी चलते-फिरते नजर आते हैं। हम वयस्क जो उन्हें हिकारत की नजर से देखते हैं दरअसल यह हमारे विकास के गाल पर तमाचा से कम नहीं है। इन्हीं बच्चों में से खासकर लड़कियों को कहां तक शोषण का शिकार होना पड़ता है इसका अंदाजा ही लगाया जा सकता है। लड़कियां तो लड़कियां लड़के भी शारीरिक और मानसिक शोषण के शिकार होते हैं। लेकिन अफसोस की बात है कि इनकी फरियाद कहीं नहीं सुनी जाती। ऐसे ही बच्चे रोज तकरीबन 100 की तदाद में हमारे बीच से लापता हो जाते हैं लेकिन उन्हें तलाशने की पुरजोर कोशिश तक नहीं होती। एक अनुमान के अनुसार देश से 55,000 बच्चे गायब हो जाते हैं लेकिन सरकार को मामूल तक नहीं पड़ता कि आखिर इतने सारे बच्चे कहां गए। सरकार की नींद तब खुलती है जब न्यायपालिका आंख में अंगूली डाल कहती है, देखो इतने सारे बच्चे गायब है पता करो कहां गए? किस हालत में हैं। तब सरकार की नींद जबरन खुलती है। गायब होने वाले बच्चों के पारिवारिक पृष्ठभूमि भी खासे अहम भूमिका निभाता है उन्हें पता लगाने में। गुम होने वाले बच्चे यदि गरीब तबके के हुए तो संभव है ताउम्र उनके मां-बाप, अभिभावक बच्चे के लिए तड़पते मर जाएं। लेकिन वहीं अमीर घर के बच्चे हुए तो उस बच्चे को ढूंढ़ निकालने के लिए पूरी प्रशासनिक तंत्र लगा दिया जाता है। लोकतंत्र के चार स्तम्भ माने गए हैं। एक न्यायपालिका और दूसरा जिसे चैथा स्तम्भ भी कहते हैं, मीडिया को शामिल किया जाता है। न्यायपालिका समाज में घटने वाली ऐसी घटनाओं जिससे आम जनता की सांवैधिनिक अधिकारांे का हनन होता हो तो वह खुद संज्ञान लेते हुए कदम उठा सकती है। मीडिया भी समाज के अंदर की हलचलों को करवटों को अपनी नजर से देखता पकड़ता और समाज के व्यापक फलक पर परोसता है ताकि नीति नियंताओं, न्यायपालिका, कार्यपालिका आदि उस मुद्दे को गंभीरता से लें और समुचित कार्यवाई करें।हाल सुप्रीम कोर्ट ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र एवं राज्य सरकारों को आदेश दिया है कि राज्यों से गायब होने वाले बच्चों के बारे में पता करें एवं कोर्ट को इस बाबत सुचित करें। गौरतलब है कि कोर्ट ने देश से 55,000 हजार बच्चों के गायब होने के मामले पर संज्ञान लेते हुए केंद्र एवं राज्य दोनों ही सरकारों को आदेश जारी किया।
बच्चों का हमारे समाज,देश से इतनी बड़ी संख्या में लापता होना एक गंभीर मामला है। बच्चे रातों रात शहर के भूगोल और सरकारी एवं प्रशासनिक तंत्र के नेटवर्क से गायब हो जाते हैं। मगर गुम हुए बच्चों की खबर कहीं नहीं लगती। गुम हुए बच्चों में से कितने बच्चों को खोज लिया गया इसका भी कोई ठोस जानकारी न के बराबर उपलब्ध है। दिल्ली में बीते सात महिनों में तकरीबन 935 बच्चे शहर से गायब हो गए। हमारे नवनिहाल हमारी चिंता के विषय न बनें तो यह एक गंभीर मसला है। गौरतलब है  कि काॅमन वेल्थ गेम से पहले दिल्ली से 2000 से भी ज्यादा बच्चे गायब हुए थे। हमारे आप-पास से इतनी संख्या में बच्चे गायब होकर आखिर कहां जाते हैं? यदि 2006 में गायब होने वाले लड़के एवं लड़कियों की संख्या की बात करें तो 4118 लड़के गुम हुए थे जिनमें से 3446 बच्चों को खोज लिया गया लेकिन सवाल यह उठता है कि 672 बच्चे आखिर कहां हैं? लड़कियों की संख्या पर नजर डालें तो 2910 लड़कियां गुम हुई थीं जिनमें से 2196 लड़कियों को ढूंढ लिया गया, लेकिन फिर सवाल यहां पैदा होता है कि 714 लड़कियों के साथ क्या हुआ। क्या उन्हें देह व्यापार में धकेल दिया गया? उनकी हत्या कर दी गई? या फिर बाल मजदूरी में डाल दिया गया? क्या हुआ उन न मिले बच्चों के साथ। यह सवाल आज भी मुंह खोलकर खड़ा है। गौरतलब है कि हमारे देश में हर साल तकरीबन 44,475 बच्चे हर साल लापता होते हैं। जिनमें से 11,000 बच्चों के बारे में कुछ भी जानकारी नहीं मिल पाती। वहीं दूसरी ओर गृहमंत्रालय ने स्वीकार किया कि 2008-10 के बीच देश के 392 जिलों से 1,17000 बच्चे गायब हुए थे। यदि गायब होने वाले बच्चों की लिंग की दृष्टि से देखें तो लड़कियों की संख्या ज्यादा है। यहां एक बात स्पष्ट है कि लड़कियों की गुमशुदगी के पीछे कई निहितार्थ होते हैं।
देश के नीति-निर्माताओं एवं नीति-नियंताओं ने बच्चों के अधिकार को लेकर अपनी संजीदगी दिखाई थी जिसका परिणाम यह हुआ कि 1974 में राष्टीय बाल नीति निर्माण करने की पहलकदमी हुई। लेकिन यह कदम सुस्त पड़कर रूक गया। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय एक बार फिर से कमर कसकर राष्टीय बाल नीति बनाने के लिए तैयार है। गौरतलब है कि 22 अगस्त 1974 को सरकार को लगा था कि देश को एक अलग और मुकम्मल बाल नीति की आवश्यकता है। लेकिन अगर, मगर, किंतु व तात्कालिक पचोखम में उलझ कर यह प्राथमिकता ठंढ़े बस्ते में डाल दिया गया था। अगस्त में  महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय ने ज्ञापन दिया था कि इस नीति निर्माण में यदि आम जनता को कोई सुझाव देना है तो वो फलां फलां ई मेल एवं डाक पते पर भेज सकते हैं। पहली नजर में यह लोकतांत्रित प्रक्रिया दिखाई देती है। लेकिन दरअसल ‘होईहैं वही जो राम रचि रखा’ यानी सरकार जिस मनसा के साथ इस नीति को लेकर आ रही है परिणाम इस पर काफी निर्भर करता है। यदि मंत्रालय के वेब साईट पर उपलब्ध डाफ्ट पेपर से गुजरें तो पाएंगे कि इसमें जवाबदेही पूरी तरह से राज्य सरकार के मत्थे थोप कर केंद्र सरकार अलग खड़ी नजर आती है। इस पूरे प्रपत्र के अवलोकन के बाद यह साफ हो जाता है कि इस नीति में यह प्रावधान का कहीं एक पंक्ति में भी जिक्र नहीं है कि यदि इस नीति का उल्लंघन किसी स्तर पर हो रहा है तो ऐसे में किस के प्रति कार्यवाई होगी। वह कार्यवाई करने का अधिकार किसका होगा। क्योंकि इस नीति में कहीं भी इस बात की चर्चा नहीं है कि किस विभाग, अधिकारी को न्यायिक अधिकार प्राप्त होगा।
इस डाफ्ट के प्रेम्बल्स में वही सारे वायदे,घोषणाएं एवं वचनों को शामिल किए गए हैं जो 1989 में संयुक्त राष्ट बाल अधिकार की सार्वभौमिक घोषणा में स्वीकार की गई थी। 1989 इस यूएनसीआरसी की घोषणा के अनुसार बच्चों को निम्न चार अधिकार दिए गए हैं- जीवन का अधिकार, सुरक्षा का अधिकार, विकास का अधिकार और सहभागिता का अधिकार। आज जब बाल नीति निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई है तो उन्हीं वचनों को दुहराया गया है। इस प्रपत्र पर नजर दौड़ाएं तो पाएंगे कि वो तमाम आदर्शपरक परिस्थितियों, अधिकारों, व्यवहारों को दुहराया गया है जिसकी ओर हमारा संविधान नजर खींचता है। मसलन बच्चों को बिना किसी भेदभाव के गुणवत्तापूर्ण प्राथमिक शिक्षा, सुरक्षा, भोजन, व्यक्तित्व विकास, संवेदनात्मक,संवेगात्मक,मानसिक विकास के माहौल मुहैया कराया जाएगा। इसमें राज्य सरकार किसी भी बच्चे/बच्चियों को वंचित नहीं रखेगा। राज्य सरकार यह भी सुनिश्चित करेगी कि उनके क्षेत्र में किसी भी बच्चे के साथ किसी भी किस्म के भेदभाव ;जाति,वर्ग,वर्ण,धर्म,संप्रदाय,भाषा-बोली,संस्कृति आदि के आधार परद्ध नहीं हो रहा है। सभी बच्चों को शिक्षा, विकास, सुरक्षा और स्वास्थ्य की बुनियादी सुविधाएं मिलें इसके लिए राज्य सरकार का पूरी तरह से जिम्मेदार ठकराया गया है।
भारत में बच्चों को लेकर सरकार पहले भी संजीदा हुई है जिसके पदचाप हमें दिखाई देते हैं लेकिन वे महज पदचाप ही बन कर रह गए। यूं तो बच्चों के देह व्यापार रोकने के लिए बने कानून 1956, बाल विवाह निषेध कानून 1929, बाल मजदूरी निषेध कानून 1986, जे.जे. एक्ट 2000, 86 वां संविधान संशोधन 2002 जो हर बच्चे को 6 से 14 आयु वर्ग के बच्चों को मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा पाने का हक पर बल देता है। 2009 शिक्षा का अधिकार कानून बना और 1 अप्रैल 2010 को लागू तो हो गया लेकिन अभी भी उसके अपेक्षित परिणाम आने बाकी हैं। इतने तमाम सांवैधानिक अधिकारों के बावजूद बच्चे एवं बच्चियों के साथ जिस तरह की घृणित व्यवहार की घटनाएं देखने- सुनने में आती हैं वह शर्मनाक बात है। विश्व के अधिसंख्य बच्चे उपेक्षा के शिकार होते रहे हैं। इससे कोई इंकार नहीं कर सकता कि युद्ध,विस्थापन,पलायन आदि में बच्चे और महिलाएं सबसे अधिक मूल्य चुकाते हैं। बच्चे वो ईकाई हैं जिनपर समस्त देश यह कहते, घोषित करते थकता नहीं कि बच्चे देश के भविष्य हैं। बच्चों के कंधे पर देश एवं समाज का भविष्य आधारित है। अब इस घोषणा की रोशनी में भारत में बच्चों को लेकर उठाए गए कदमांे को परखने की आवश्यकता है।
यह दुर्भाग्य ही कहना होगा कि 2000 तक बच्चों के अधिकार, सुरक्षा को लेकर देश में कोई स्वतंत्र आयोग तक नहीं था। आखिर बच्चों की बात, पीड़ा को कहां उठाया जाता। अंततः सरकार ने राष्टीय बाल आयोग का गठन किया। 2000 आते आते हमारे माननीय सांसदों, नीति निर्माताओं को यह भी ख्याल आया बल्कि कहना चाहिए सरकार को कई स्तरों से इस ओर ध्यान खींचने की कोशिश की गई कि साहब बच्चों के अधिकारों, उनकी समस्याओं,उनके साथ होने वाले अमानीय घटनाओं को सुनने-निवारण करने के लिए संविधान में मौलिक अधिकार के बरक्स एक नई नीति, कानून की आवश्यकता है। तब दोनों ही सदनों ने 2000 में जुबिनाइल जस्टिस एक्ट 2000 ;जे.जे.एक्ट 2000द्ध बनाया गया। जे.जे. एक्ट 2000 विस्तार से बच्चों के अधिकारों और उनके साथ सरकार और प्रशासन के रूख को आईना दिखाता है। इस एक्ट में कहा गया कि यदि पुलिस किसी नाबालिक बच्चे को किसी जुर्म में गिरफ्तार करने जाएगी तो क्या क्या एहतियात बरतने होंगे। एक्ट कहता है कि पुलिस अपनी वर्दी में नहीं जाएगी। बच्चों के साथ पुलिस थाने में पूछताछ नहीं करेगी। सााि ही 24 घंटे के अंदर पुलिस को तथाकथित अपराधी बच्चे को मजिस्टेट के सामने पेश करना होगा आदि। यह अलग विमर्श का विषय है कि वास्तव में पुलिस का रवैया बच्चों के प्रति किस प्रकार का होता है। यदि याद करें तो मध्य प्रदेश में मई के महीने में थाने में ही बच्चे का कान उखाड़ लिया गया था। वहीं अन्य राज्यों में भी बच्चों के साथ पुलिस किस कदर बरताव करती है यह किसी से छूपा नहीं है। इन्हीं बर्तावों को देखते हुए बच्चों को मानवाधिकार के हनन को रोकने के लिए राष्टीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ;एनसीपीसीआरद्धका गठन किया गया।
एक ओर देश के संविधान की धारा 14, 15, 21, 21 ए, 23, 24 और 45 खासकर बच्चों की सुरक्षा, भेदभाव रहित, समान अवसर, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पाने और समानता का हक तो देती है लेकिन व्यवहारिकता में देखने में नहीं आता। संविधान के प्रावधानों की रोशनी में देखें तो इस बाल नीति के तानाबाना में एक समतामूलक,समान अवसर, बिना भेदभाव के सभी वर्ग के बच्चों की सुरक्षा,शिक्षा, स्वास्थ्य आदि की वचनबद्धता दुहराई गई है। अब देखना यह है कि क्या इस नीति से वास्तव में बच्चों की जिंदगी में बदलाव आ पाएंगे।
गौरतलब है कि बच्चे वो दीर्घ कालीन पूंजी निवेश हैं जो 15- 20 साल बाद मैच्योर होते हैं। लेकिन हम इस पूंजी को यूं ही गंवाते रहते हैं। उनकी सुरक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा तक मुहैया नहीं कराते। एजूकेशन मिलेनियम डेवलप्मेंट गोल ‘ एमडीजी’ का लक्ष्य एक और दो हर बच्चे को ‘0 से 18 साल’ शिक्षा, स्वास्थ्य एवं सुरक्षा के साथ ही विकास एवं सहभागिता की बात करता है। न केवल बात करता है बल्कि दुनिया के तमाम विकसित एवं विकासशील देशों ने लक्ष्य बनाया था कि 2000 एवं 2015 तक यह लक्ष्य हासिल कर लेंगे। किन्तु अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि अभी भी यूनेस्को की एक रिपोर्ट के अनुसार दो देशों के अन्तर्कलह एवं अपाताकाल की स्थिति में 20 मिलियन बच्चे अपने घर से बेघर हो गए। वहीं हर साल 150 मिलियन लड़कियां एवं 73 मिलियन लड़के दुनिया भर में शारीरिक शोषण एवं बलात्कार के शिकार होते हैं। स्थिति यहीं नहीं थमती बल्कि बच्चों पर होने वाले अत्याचार व कहें शोषण एवं दुव्र्यवहार और भी आगे जाते हैं। वार्षिक आंकड़ों पर नजर डालें तो पाते हैं कि 500 मिलियन एवं 1.5 बिलियन बच्चे किसी न किसी तरह के हिंसा के शिकार होते हैं। घरेलू हिंसा की बात करें तो हरेक साल 275 मिलियन बच्चे इसके चमेट में आते हैं। न्यायालयों सरकारी नीतियों को धत्ता बताते हुए हमने खतरनाक किस्म के माने जाने वाले कमों में भी 115 मिलियन बच्चों को झोंका है। इतने व्यापक स्तर पर जब बच्चों के साथ भेदभाव एवं अमानवीय बरताव हो रहे हों तो ऐसी स्थिति में यह मुद्दा खासे गंभीर एवं विचारणीय बन जाता है। 

लेखक परिचय-
;नेशनल कैम्पेन काडिनेटर हैद्ध
नेशनल कोइलीएशन फोर एजूकेशन ‘एनसीई’

Tuesday, October 23, 2012

"श ब्दों के नए मैनेजर
-कौषलेंद्र प्रपन्न
पिछले दस साल में हिंदी में कितने नए युवा नेखकों को प्रकाषकों ने छापा? कितने युवा कथाकारों, उपन्यासकारों की कृतियां 5,000 से ज्यादा प्रति बिकीं? क्या आप बता सकते हैं कि कितने युवा कथाकारों, कवियों की पृश्ठभूमि साहित्यिक रही है। यानी जिनकी रूचि, षिक्षा आदि साहित्य में हुआ हो और उन्होंने रचनाएं स्वतंत्र रूप से लिखनी षुरू कीं। सवाल और भी उठ सकते हैं लेकिन यहां सवालों से बड़ी जो बात है वह यह कि एक तरफ हिंदी में बड़े ही गिने चुने नाम आएंगे जिनकी किताबें साल भर में 5000 से अधिक बिकी हों। बिक्री पर न भी जाएं तो उनकी पठनीयता कितने पाठकों तक रही इसका अंदाजा लगाना हमारा मकसद नहीं बल्कि, इसकेे पीछे की मुख्य बात को उजागर करना है। दूसरी ओर अंग्रेजी को लेकर हमारे अंदर जिस तरह की नफरत भरी हुई है वही भाशा आज की तारीख में हमारे खास युवाओं को न केवल पैसे, प्रसिद्धि बल्कि एक अलग पहचान दिला रही है। वो न तो किसी साहित्य घराने से ताल्लुक रखते हैं और न ही जिन्होंने कभी पढ़ाई के दौरान लिट्रेचर को बहुत चाव से पढ़ा ही होगा। लेकिन उन्होंने जो रास्ता चुना वह उन्हें अच्छी नौकरी, पैसे, इज्जत एवं समाज में एक पाठक वर्ग मुहैया कराया। उन्होंने पेषे के तौर पर बेषक मैनेजमेंट, काॅल सेंटर, आई आई टी व अन्य दूसरे क्षेत्रों का चुनाव किया हो, लेकिन एक अच्छी नौकरी पा लेने के बाद उन्होंने लिखने की भूख मिटाने की ठानी। आज चेतन भगत को लेखन की दुनिया में आए 10 साल भी मुष्किल से हुए हैं, लेकिन आज उसके पास पैसे, प्रतिश्ठा, पाठक वर्ग एवं प्रकाषक सब हैं। चेतन हों या करन बजाज या फिर मंडर कोकटे इन्हें मालूम था कि नौकरी में रहते पैसे कमाए जाए सकते हैं जो तकरीबन सभी आईआईटीयन कमा रहे हैं। मुझमें क्या खासियत है जो उनसे अलग पहचान दिला सकती है। उन्होंने अपने अंदर षब्दों की अपार षक्तिपूंज को जगाया और आज देखते ही देखते बाजार तो बाजार यहां तक कि हिंदी व अन्य क्षेत्रिय भाशाओं के लेखकों को सोचने पर मजबूर किया।
हिंदी व अन्य क्षेत्रिय भाशाओं में एक युवा लेखक की उम्र 20 से लेकर 50-55 तक की होती है। बेषक महाषय की किताबें कहानी, कविता एवं उपन्यास बाजार में हों, लेकिन उनकी पहचान हिंदी में युवा लेखक की ही रहती है। जब तक किसी मठ से उन्हें प्रमाणित न कर दिया जाए कि फलां ने क्या खूब लिखा है। कुछ पुरस्कार उनकी झोली में हो तो बात में वजन तौलने वाले भी खड़े हो जाते हैं। वहीं अग्रेजी में कुछ अलग फिज़़ा है। यहां जो 24 साल का अनाम लेखक भी अपनी किताब की सेलिंग के आधार पर अपनी पहचान बना लेता है। पिछले 10 सालों में जिस प्रकार से अंग्रेजी में लेखक उभरे हैं उसे देख कर एक तोश जरूर होता है कि जो पाठक की कमी का रोना रोते हैं उनके इस रोदन के पीछे क्या वजह हो सकती है। दरअसल हिंदी में पहले लिखना षुरू करते हैं फिर बाजार और प्रकाषक की मांग देखते हैं। जबकि अंग्रेजी में लेखक पहले पाठक वर्ग को ध्यान में रखते हैं फिर विशय का चुनाव करते हंै। किस प्रकार की राइटिंग युवाओं को भाएगी उसकी पहचान कर फिर कलम उठाते हैं। लेकिन हिंदी में जरा स्थिति उलट है पहले हम अपने मन की लिखते हैं। वही लिखते हैं जिसे पूर्व के लेखकों ने लिखा है। इसके पीछे एक कारण यह हो सकता है कि नए लेखक को सदर्भ के तौर पर सामग्री मिल जाती है। फिर वह पूर्व के कथानक को नए संदर्भों में रच डालता है। उसे इस बात से कोई खास लेना नहीं होता कि इसको पढ़ने वाले पसंद भी करेंगे या नहीं। प्रकाषक कभी भी घाटे का सौदा आखिर क्यों करें। पैसे फसाना कोई नहीं चाहता। वह देखता है कि फलां लेखक की किताब पिछले साल कितनी बिकी थी। उसकी नई पांडूलिपि पर जुवा खेला जा सकता है। इसलिए चेतन भगत, किरण बाजपेई व अन्य अंग्रजी लेखकों को बड़ी से बड़ी एवं छोटी प्रकाषन कंपनियां छापने से गुरेज नहीं करतीं।
अगर गौर से इन नए युवा षब्दों के मैनेजरों की रचनाओं की कथानकों उनके द्वारा चुनी गई प्लाट को गंभीरता से देखें तो पाएंगी कि उनके प्लाट अमूमन काॅलेज के प्रांगण में पलने, बनने, टूटने वाले प्रेम के इर्द- गिर्द घूमते हैं। थोड़ा- सा मसाला और सरल भाशा में परोसने की कला में माहिर षब्द मैनेजर आज पाठकों के बीच स्थान तो बना ही चुके हैं वहीं प्रकाषकों के भरोमंद लेखक भी। वहीं हिंदी में विपिन चंद पांडेय, नीलाक्षी सिंह, संजय कुंदन, कुंदन आदि को कुछ खास प्रकाषकों के अलावा कितनों ने छापने में दिलचस्पी दिखाई। साथ ही सवाल यह भी है कि इन युवा लेखकों की किताबें बाजार में अपने दम पर कितनी निकल पाईं। यह एक व्यावहारिक पहलू है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आज यदि हिंदी या अन्य भारतीय भाशाओं में पाठकों की कमी की बात प्रमुखता से उठाई जा रही है तो इसके पीछे के अन्य बुनियादी कारणों का भी पड़ताल करना जरूरी होगा।
निर्मल वर्मा ने इन पंक्तियों के लेखक से एक बातचीत में कहा था कि लेखक को विशय का चुनाव बड़ी ही सावधानी से करना चाहिए। विशय कोई भी धांसू या फिसड्डी नहीं होते। बल्कि यह लेखक पर निर्भर करता है कि उसने जिस विशय को चुना है उसके साथ पूरी ईमानदारी बरती या नहीं। हिदंी में इन दिनों नए युवा लेखकों की फसल लहलहा रही है। बड़े लेखकों को इन नए कलमों से काफी उम्मीद है। उनकी नजर में आज की लेखनी नए तेवर, कथानक एवं षैली में ताजगी के साथ दस्तक दे रहे हैं। आज के हिंदी व अन्य भाशायी युवा लेखकों के पास भी अंग्रेजी वर्ग के लेखकों के बरक्स विशय हैं। वो भी उतनी ही बखूबी कलम चलाने के हुनर में माहिर हैं, लेकिन सवाल यह उठता है कि तुरंत एक वर्ग सामने झंड़ा लेकर खड़ा हो जाएगा कि यह भी कोई साहित्य है। इससे साहित्य की हानि होगी। षुद्धता बनाए रखने के लिए जरूरी है कि ऐसे लेखकों को दूर रखा जाए। वहीं दूसरी तरफ लिखने की पूरी छूट है जो लिखों, खूब लिखों, खूब बिको और नाम कमाओं के सिद्धांत पर चला जाता है। आज जरूरत है कि अन्य भाशाओं में भी युवा लेखकों के साथ ही कलम के सिद्धों को लिखने से पूर्व पाठक वर्ग की रूचि, बिक्री के लिए विशय के चुनाव के वक्त चूजी हों तो हिंदी व अन्य भाशाओं में भी पाठकों की कमी नहीं है। अंग्रेजी के हाल के बेस्ट सेलर किताबों की अनुदित कृतियां बाजार में खूब बिक रही हैं। उसके भी पाठक हैं। प्रकाषकों ने भी अंग्रेजी के बेस्ट राईटरों को अनुवाद कर छापने में परहेज नहीं किया।
 
बाल-साहित्य से प्रभावित बचपन 
-कौशलेंद्र प्रपन्न
आज हमारे पास ऐसे कितने दादा-दादी, नाना-नानी, मां-बाप हैं जो बच्चों को कहानियां सुनाते हैं? यदि सुनाते भी हैं तो वे कहानियां कौन- सी होती हैं? साथ ही कुछ और भी इसी तरह के अन्य सवाल यहां उठने लाज़मी हैं। कथा कहानियों से बच्चों का संबंध बेहद पुराना है। वही वजह है कि आज भी हमारे अंदर कोई न कोई कहानी जिं़दा है जो हमने बचपन में सुनी थी। बड़ी ही दुख के साथ कहना पड़ता है कि आज के बच्चों को कहानियों का स्वाद न के बराबर मिल पा रहा है। कहानी के नाम पर नैतिकता, मूल्य व आदर्श आदि ठूंसने को बेताब कहानी व बाल साहित्य अटी हुई हैं। हर कहानी के बाद सवाल इस कहानी से कया सीख मिलती है? क्या हर कहानी के पीछे कोई न कोई सीख मिलना जरूरी है? क्या कहानियां महज कोई न कोई शिक्षा, नैतिकता व संदेश देने के लिए ही लिखी जाती हैं या फिर कुछ कहानियां महज मनोरंजन के लिए भी होती हैं? कथासत्सई, पंचतंत्र, बेताल पचीसी, तेनाली राम, अकबर बीरबल, चंदामामा, नल-दमयंती, सवित्री आदि की कथा परंपरा भारत में बेहद पुरानी हैं। लेकिन समय के साथ कहानियों के कथावस्तुओं में बदलाव देखे जा सकते हैं।
बाल साहित्य व बच्चों को विमर्श की परिधि में रख कर जो भी साहित्य लिखे गए हैं वो दरअसल बच्चों के लिए नहीं, बल्कि बड़ों के द्वारा बड़ों को संबोधित लेखन ज्यादा मिलता है। इन साहित्यों में बच्चे महज चिंता के तौर पर उभर कर आते हैं। यदि हम हिंदी साहित्य के इतिहास के आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, काल ख्ंाड़ यानी 1900 से 1920 तक पर एक विहंगमदृष्टि डालें तो पाते हैं कि ‘सरस्वती’ पत्रिका में द्विवेदी के संपादकत्व काल 1903-1920 तक में उस समय के  समकालीन लेखकों, साहित्यकारों, कवियों आदि की रचनाओं को व्यापक स्तर पर सुधार कर प्रकाशित किया जा रहा था। इस काल ख्ंाड़ में बाल- लेखन में कौन कौन सक्रिय थे इसकी जानकारी साहित्येतिहास में नगण्य है। यदि समग्रता से इस काल खंड़ व इससे पूर्व भारतेंदु काल में तो कुछ रचनाएं मिल भी जाती हैं पर उसे पर्याप्त नहीं कह सकते। हालांकि भारतेंदु ने ‘बाल बोधिनी’ पत्रिका निकाल रहे थे लेकिन बाकी के रचनाकार तकरीबन बाल- साहित्य पर सम्यक लेखन न के बराबर किया है। द्विवेदी काल खंड़ से निकल कर जब हम प्रेमचंद की रचनाओं को टटोलते हैं तो इनके साहित्य में बाल मनोविज्ञान और बाल जगत् पर केंद्रीत रचनाएं मिलने लगती हैं। इनकी कहानी गिल्ली डंड़ा, ईदगाह का हामिद आज भी कई कोणों से विवेचित होता रहा है। साथ ही ‘मंत्र’ कहानी को भी भुल नहीं सकते। वहीं दूसरी ओर विश्वंभरनाथ शर्मा कौशिक की कहानी ‘काकी’, सुदर्शन की कहानी ‘हार की जीत’ ख़ासे महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। इससे आगे विष्णु प्रभाकर, सत्यार्थी, नागार्जुन आदि ने भी बाल साहित्य को नजरअंदाज नहीं किया। इन्होंने भी बच्चों को ध्यान में रखते हुए बच्चों के लिए कहानियां, कविताएं लिखीं। साथ ही निरंकार देव, कृष्ण कुमार के संपादकद्वे द्वारा तैयार बच्चों के लिए कविता की किताबें मिलती हैं। इसके साथ ही बच्चों की सौ कहानियां, बाल कथा, बच्चों की रोचक कहानियों का दौर भी मिलता है। 1970 के दशक में बालकृष्ण देवसरे, विभा देवसरे, प्रकाश मनु, कृष्ण कुमार आदि ने बच्चों की जरूरतों, रूचियों को ध्यान में रखते हुए बच्चों के लिए रचनाएं कीं।
बाल- साहित्य की व्यापक विवेचना करने से पहले हमें भारतीय भाषाओं के साथ ही अंग्रेजी में भारतीय लेखकों की रचनाओं को भी विमर्श में शामिल करना होगा। जिस प्रचूरता से हिंदी के अलावा भारत की अन्य भाषाओं में रचनाएं मिलती हैं उससे एक संतोष जरूर मिलता है कि कम से कम भारत में बाल साहित्य उपेक्षित नहीं है। चंदामामा, नंदन, बाल- हंस, पराग आदि पत्रिकाएं साक्षी हैं कि सत्तर के दशक के बाद के बच्चों को इन पत्रिकाओं का साथ मिला। वहीं अंग्रेजी में आर के नारायण की लेखनी धुआंधार चल रही थी। ‘मालगुडीडेज’ इसका जीता जागता उदाहरण है। इस उपन्यास की लोकप्रियता ने ही दूरदर्शन पर धारावाहिक प्रसारण को विविश किया। इनके पात्रों को जीवंतता तो मिली ही साथ ही खासे प्रसिद्ध भी हुए। वहीं दूसरी ओर गुलज़ार के योगदान को भी कमतर नहीं कह सकते। ‘पोटली वाले बाबा’, ‘सिंदबाद’, ‘मोगली’ आदि के गीत एवं कहानियां न केवल कर्णप्रिय हुईं। बल्कि बच्चों में बेहद पसंद की गईं। ‘चड्डी पहन के फूल खिला है फूल खिला है’ अभी तक बच्चों एवं बड़ों को गुदगुदाते हैं। वहीं सिदबाद जहाजी का टाइटिल साॅंग ‘डोले रे डोले डोले डोले रे/ अगर मगर डोले नैया भंवर भंवर जाय रे पानी’। गुलज़ार ने बच्चों के लिए जिस प्रतिबद्धता से बाल गीत, कविताएं लिखीं वह आज तलक लोगों की स्मृतियों में कैद हैं।
पं विष्णु शर्मा रचित पंचतंत्र की विभिन्न कहानियों को आधार बनाकर अलग-अलग लेखकों ने अपनी परिकल्पना के छौंक लगा कर पुनर्सृजित किया। खरगोश और कछुए की दौड़, प्यासा कौआं, लोभी पंडि़त, लालची लोमड़ी, ईमानदारी का फल, आदि कुछ ऐसी प्रसिद्ध कहानियां हैं जिसे 1960 के दशक से लेकर आज भी बच्चे पढ़कर आनंदित होते हैं। इन कहानियों की खूबी यही है कि इनमें जीव जंतु, सामान्य प्राणि शामिल हैं। इसके पीछे नैतिक शिक्षा देने का उदेश्य तो है ही साथ ही बच्चों का मनोरंजन करना भी एक महत्वपूर्ण उद्देश्यों में से एक है। तेनालीराम, अकबर बीरबल, शाबू, चाचा चैधरी, मामा-भांजा आदि बाद की चित्र कथाएं भी बच्चों में खासे लोकप्रिय हुईं। लेकिन जो आनंद एवं पढ़ने की लालसा पंचतंत्र की कहानियों को लेकर मिलती हैं वह इन चित्रकथाओं में कम है। इन चित्रकथाओं को पढ़ने वाले बच्चे मां-बाप, अभिभावकों से छुप कर किताब में दबा कर अकेले में पढ़ते थे। जबकि पंत्रतंत्र की कहानियों की किताबें अभिभावक स्वयं खरीद कर देते थे। इसके पीछे क्या कारण है। वजह यही था कि इनमें साकाल, शाबू, एवं अन्य पात्र हिंसक, बच्चों में आक्रामक्ता, गुस्सा आदि के भाव को जागृत करने में मदद करते थे। हिंसा, घृणा, आक्रामक्ता जैसे भाव को पहले इन चित्रकथाओं में स्थान मिला। जब इस तरह की कथा शृंखलाएं पसंद की जाने लगीं तब इन्हीं का दृश्य श्रव्य माध्यमों में ढ़ाल कर परोसा जाने लगा। 
बच्चों के खेल खिलौनों के निर्माता जहां कभी प्रेमचंद के हामिद के संगी साथी सिपाही, मौलवी, चिमटा, मिट्टी के हाथी घोड़े, विभिन्न जीव जंतुओं के माध्यम से बच्चों का मनोरंजन करते थे। लेकिन जैसे जैसे तकनीक में बदलाव आया मशीनें आईं उसके बाद मिट्टी के खिलौनों का कायाकल्प हो गया। वो अब चीनी मिट्टी की चमचमाती सफेद रंगों वाली आवरणों में बच्चों के बीच जगह बनाने लगी। मिट्टी के खिलौनों का रंग रूप बदला। साथ ही खिलौने की मुद्राएं बदलीं। बंदूक, गन, हेलिकाॅप्टर, युद्धपोत, कार, चमकीली विदेशी फूरे बालों वाली गुडि़या बच्चों की गोद में खेलने लगी। एक तो बदलाव यह था दूसरा था हिंसा प्रधान पात्रों के साथ सचल खिलौने जो चाबी से गतिविधियां करती थीं। इसमें बच्चों को खुद से ज्यादा कुछ नहीं करना था। बस चाबी भरो और बंदर ढोल बजाने लगता था। यह वह प्रस्थान बिंदु हैं जहां से भारतीय बाल खिलौनों के बाजार में एक महत्वपूर्ण करवट लेने की आहट सुनाई पड़ती है।
बच्चों के खिलौनों के बाजार का जिक्र करना इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इनके लिए जिस तरह के खिलौने, वीडियों गेम बाजार में छाने लगे उसके प्रति हमने ध्यान नहीं दिया। वे ऐसे गेम थे जो बच्चों में चुपके चुपके हिंसात्मकता, क्रोध, घृणा आदि के भाव पैदा कर रहे थे। लेकिन बड़ों की दुनिया इसके परिणामों से बेखबर थी। बच्चे आक्रामक्ता में जब स्कूल, घर यार दोस्तों में उसी दृश्य की पुनरावृत्ति करने लगे तब हमारे कान खड़े हुए। लेकिन तब भी हमने रक्षात्मक कदम उठाने की बजाए बच्चों को वैसी ही गेम, खेल खिलौने ला कर उनकी जिद्द को पूरा करते रहे।
बच्चों के खेल खिलौने के बाद चलते चलते दृश्य-श्रव्य माध्यमों द्वारा परोसी जा रही सामग्रियों पर नजर डालना अन्यथा न होगा। छः से दस साल के आयु वर्ग के बच्चों से बातचीत में साफतौर पर एक बात निकल कर आई कि टीवी पर गंदी चीजें दिखाई जाती हैं। उनकी दृष्टि में जो गंदी चीजें थीं उस पर गौर करें- हिंसा, मार- काट, ख़ून, हत्या, चोरी करना, किडनैप, प्यार आदि। इनकी सूची में शामिल प्यार को छोड़कर बाकी चीजें तो समझ आईं। लेकिन प्यार को बच्चों ने गंदी चीजों में क्यों शामिल किया? इसपर बातचीत में ही निकल कर उसका जवाब आया। इस पर ध्यान देने की आवश्यकता है कि लड़की को छेड़ना, फूल देना, चिट्ठी देना आदि टीवी से सीखा है जिसके लिए मम्मी-पापा मारते हैं। इसलिए यह गंदी चीज है। इस बातचीत में कालका जी मंदिर के पास रहने वाला संजय, अंजलि और नेहरू प्लेस झुग्गियों में रहने वाली पूजा, प्रशांत, अनिल, विजय सेवालाल, सौरभ आदि बच्चे शामिल थे। यदि समय-समय पर विभिन्न संस्थाओं की ओर से कराए गए रिसर्च परिणामों पर नजर डालें तो आंकड़े बताते हैं कि बच्चों के कोमल मन पर सबसे ज्यादा प्रभाव दृश्य-श्रव्य माध्यम चाहे वह टीवी हो या वीडियो गेम आदि का पड़ता है। बच्चों में चिड़चिड़ापन, हिंसात्मक प्रवृत्ति को भी इसी माध्यम से हवा पानी मिलती है। रिपोर्ट तो यहां तक कहते हैं कि बच्चों ने कितना समय टीवी के सामने जाया किया। हालांकि टीवी के प्रभाव से बच्चे तो बच्चे यहां तक कि बड़े भी अछूते नहीं हैं। टीवी पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों की कथावस्तु, संवाद, चित्रण आदि पर नजर डालें तो साफ पता चल जाएगा कि इन कार्यक्रमों के जरिए हमारे आम जीवन पर किस तरह का प्रभाव पड़ रहा है। भाषा से लेकर आम बोलचाल, रहन- सहन, बरताव सब प्रभावित होते हैं। कहने की जरूरत नहीं कि रीति-रिवाज़ भी ख़ासे प्रभावित हुए हैं।
अब हम अपने मुख्य चिंता पर पुनः लौटते हैं बाल साहित्य को भी श्रव्य दृश्य माध्यमों ने कहीं न कहीं प्रभावित किया। अव्वल तो स्कूल जाने और लौट कर आने के बाद होमवर्क और थोड़ी सी पढ़ाई के बाद जो समय हाथ में बचा वह टीवी देखने में गुजर जाती हैं। बहुत सीमित बच्चे हैं जो इस तरह की दिनचर्या में बाल-कहानी, बाल-उपन्यास, बाल कविताएं व बच्चों की पत्रिकाओं को पढ़ते हों। यह अलग बात है कि अंग्रेजी भाषा ने अपनी चमत्कारिक छटा में बच्चों को खिंचने में कुछ हद तक सफल रही है। मसलन हैरी पोटर की श्र्ृंखला बद्ध उपन्यास जो सात से आठ सौ पेज से कम नहीं हैं बच्चों ने अभिभावकों को खरीदने पर विवश किया। कई ऐसे बच्चे मिले जिन्होंने दो से तीन दिन के अंदर मोटी किताब खत्म कर दी। यहां लेखक की कौशल एवं प्रस्तुतिकरण की दाद देनी पड़ेगी कि उसने न केवल यूरोप बल्कि एशियन देशों के बच्चों को भी पढ़ने पर विवश किया। और देखते ही देखते इस उपन्यास पर झटपट फिल्म भी आ गई। जो मज़ा पढ़ने में आता है वह अलग बात है। लेकिन पढ़ी हुई घटनाओं को पर्दे पर आवाज़, सचल रूप में देखने का एक अलग आनंद है जो बच्चों ने उठाया। यहां पाठक और पुस्तक के बीच भाषा बाधा नहीं बन पाई। देखते ही देखते इस उपन्यास को कुछ प्रकाशन संस्थानों ने हिंदी में अनुवाद करा कर पाठकों को मुहैया करा रहे हैं।
एक मुख्य सवाल यहां उठता है कि किन बच्चों को कहानियों की आवश्यकता है। किन बच्चों को घरों में कहानियां सुनाई जाती हैं ? किन स्कूलों में बच्चों को कहानी की कक्षा उपलब्ध है? किन स्कूलों में कोई कथा वाचक होता हैं? शायद कोई स्कूल ऐसा न मिले जहां कथा वाचक हो। जबकि बच्चों को इच्छाओं को टटोलें तो पाएंगे कि उन्हें कहानियां बेहद पसंद आती हैं। वो अपने अपने माता- पिता, टीचर से कहानी सुनाने की जि़द करते हैं लेकिन अक्सर उन्हें डांट कर चुप्प करा देते हैं। ज्यादा हुआ तो कोई कहानी अनमने से कहानी किताब उठाई और पढ़ डालते हैं। जबकि कहानी पढ़ी नहीं बल्कि कही जाती है। कहने की कला नहीं आती तो वो बच्चों को नहीं बांध पाएंगे। बच्चों को कहानियां कहीं न कहीं बेहद अंदर तक छूती हैं। जिन्हें वो ताउम्र नहीं भूल पाते। लेकिन जरूरत इस बात की है कि कहानियां संपूर्ण आंगिक मुद्राओं के साथ सुनाई जाए। लेकिन अफ्सोस कि कथा वाचन की कौशलों से अनभिज्ञ अध्यापक/अध्यापिका या अभिभावक आनन-फानन में कहानियां पढ़कर सुना देते हैं। यहीं पर कहानी की हत्या हो जाती है। 
 

Monday, October 22, 2012

ठहरा हुआ शहर
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तकरीबन छब्बीस साल पहले सन् 1984 से पहले मेरा शहर, मेरा मुहल्ला आबाद था। इधर डालमिया कारखाने का बंद होना था कि उधर एक-एक कर लोगों का शहर से पलायन शुरू कर चुका था। सबसे पहले बड़े ओहदे पर काम करने वाले अफसर शहर छोड़ कर जाने लगे। देखते ही देखते शहर एकबारगी खाली- खाली- सा लगने लगा। यूं तो शहर कभी खाली नहीं होता, रोज़ लोग आते रहते हैं और सपने बुनते लोगों से शहर हमेशा आबाद रहता है। लेकिन कारखाने का बंद होना था कि गोया मेरे शहर की रफ्तार बल्कि यूं कहें उसकी जिंदगी ठहर- सी गई थी। कारोबार, दुकानों, मकानों में रहने वाले लोग अचानक बेकार से हो गए थे। दुकानों पर भीड़ खत्म होने लगी थी। महंगी चीजें खरीदने वालों के टोटे पड़ने लगे। बाजार सूना- सूना रहने लगा। वैसे तो बाजार में बल्ब लटकाए सब्जी, फल, कपड़े बेचने वाले दुकान तो लगाते थे, लेकिन पहले वाली बात नहीं रह गई थी। हर कोई ...

Saturday, August 4, 2012

Out of record and Nats right too
History is proof that in India one community is out of government. They are surviving in our society with this tag " Khanabadosh" "Zippsi" and so on. In every city,town or in cepatil of India. They live side of of the road. They have their own transportation. Their van is their home and all. Now we can able to recognise them. Usually they work making iron tools. 
In history they fight with invaders. But in Mugal era they also fight for the nation. After the independence still they have not right which are provided by Indian constitution. They have not fundamental right too. Their children do not go in any school. They are not registered in voter list. Ironically our government have not any welfare policy for them. Right to education is far from their children. They too will work their traditional work. They will not go and take basic education too.

Tuesday, June 26, 2012

सवाल शिक्षक के निराले
शिक्षा का अधिकार कानून 2009 पर दो दिन दे कार्यशाला में प्रक्षिशन देते हुवे शिक्षक वर्ग से जिस तरह के सवाल आ रहे थे उसे सुन कर अनुमान लगाया जा सकता है कि  यह वर्ग सिर्फ बुनियादी कमियों को रोना रो कर अपनी जिमेदारी से पल्ला झड़ना बेहतर जनता है. पंखा नहीं है, लाइट नहीं है, बच्चे नहीं है, आदि सवाल  तो पूछे गए लेकिन  इक  लड़की ने पुचा आप शिक्षक  व् स्कूल  इतना रोचक  लुभावन  क्यों  नहीं   की बच्चे  भागे च्च्ले आयें. इस सवाल पर शिक्षक  व् शिक्षाक्य वर्ग  टूट पड़े .  आज के बच्चे  पीढ़ी का वामन करने लगे.
जब विद्यालय प्रबंधन समिति के काम व् जिमेद्दारी पर सत्र शुरू हुवा तो सबसे पहले इसका विरोध इसी वर्ग ने किया. ये अनपढ़ , ना समझ  हमें बताएँगे स्कूल कैसे चलाना है? बह्हल ,  शिक्षकों को   सकारात्मक  ढंग  से शिक्षा का अधिकार कानून  को समझना और पढना होगा. जब यह वर्ग  साथ  देगा और अपनी सहभागिता  देगा तभी 2015 सब पढ़े सब सब स्कूल  जायगे का सपना पूरा हो सकेगा.                  

Thursday, May 17, 2012

Hello all of Education lover. We should see how much education get in 2012-13 budget. Today our education system is fighting not only with money shortage but teachers posts are too important issues in several states. 
sharing my story on education in budget 2012-13 which have published in YOJANA hindi and recently webcast in this web magazine 
http://www.swargvibha.in/aalekh/aalekh_writers/kaushlendra%20prapann.html

Sunday, May 13, 2012

Today Aameer khan's program based on child abuse and we parents. How we can save our children. Its important now a days because parents have not too much time to give proper company with our kids. That is why some closest person take advantage and they did wrong with our kids.
NCPCR JJAct 2007 and in state level SCPCR are too active to take action onto such type of cases. Although, we have NCPCR and JJ Act 2007 but still children are suffering from such incident almost every day in our country. Does not matter the place, name, form or cast and society. what is there in the form, name, cast or face. Matter is we have to aware and rise our voice onto this issues.
If you see two months before Times of India published on story on this issue. That report show that 58% children abused every day in our country by family members or closed relatives. It is not a good treatment with our coming future seeds.
Think Think and Than Act.

Thursday, May 10, 2012

शिक्षा का अधिकार कानून लोक सभा में हुवा पास 
राज्य सभा के बाद अब लोक सभा में भी शिक्षा का अधिकार कानून आखिरकार पास हो गया. इस कानून के तहत गौतलब है की कुछ गैर्परामारिक शक्षिक संतान चाहते थे की इससे दूर रखा जाए सो वो दूर ही रहे. मसलन मदरसे और वैदिक संस्थान को आरटी ई के बाहर रखा गया है. 
सवाल  शिक्षा के अधिकार कानून के  तहत अब 0 से 6 आयु वर्ग के बच्चों को भी शामिल किये जाए की बात उठानी चाहिए. मगर अभी यह मुद्दा ठंढे बसते में है. खैर , कम से कम 6 से 14 साल के बच्चों को शिक्षा मिले इसको सुनिषित करना होगा.        

Wednesday, May 2, 2012

दरअसल  जीवन में इक बार ही इक  ही समय  में कई चीजें घाट रही होती हैं. इनको प्रबंधित  करना पड़ता है . जो डूबा हो वही बता सकता है की कैसे कोई घहरे पानी में जीवन बचा सकता है 

Tuesday, May 1, 2012

ग्लोबल एक्शन वीक का समापन २८ अप्रैल को 


डेल्ही सहित देश  के अन्य राज्यों मसलन हरयाणा, मुंबई, उड़ीसा, उत्तराँचल, झारखण्ड आदि में बड़ी ही सफलता के साथ ग्लोबल एक्शन वीक मनाया गया. डेल्ही के जनकपुरी स्थित नगर निगम प्रतिभा विद्यालय सी ५ में २८ अप्रैल को मनाया गया. इस कार्यक्रम में उनिस्को के भारत में प्रतिनधि श्री शिरंग्रू, शिक्षा अधिकारी श्री अलीसेर उम्मेर, उनिसफ़ के प्रोग्राम अधिकारी युकोको फूजी मारो के साथ भुत्पुर्य मेयर पृथ्वी राज सहह्नी, वर्त्तमान कांसलर अनीता ममतानी मौजूद थीं.
डेल्ही के साथ ही उड़ीसा में भी जोरो खरोस के साथ मनाया गया. वहीँ झारखण्ड के बोकारो में हमारे प्रतिनिधि संजय सिंह ने लोकल प्रिमरी स्कूल में ग्लोबल एक्शन वीक का कार्यक्रम किया. वहीँ उत्तर प्रदेश के मेरठ में मुकेश कुमार और संजीव की अगुवाई में कार्यक्रम संपन्न हुवा.  वहीँ मुंबई में विनोद सातवे ने विभिन्न विद्यालयों में ग्लोबल एक्शन वीक के तहत पेंटिंग के साथ कार्यक्रम किया.              




जी पुरे देश में तक़रीबन ११ राज्यों में २२ से २८ अप्रैल के बीच ग्लोबल एक्शन वीक मनाया गया. ऊपर जिन  तस्वीरों   को देख रहे हैं ये ग्लोबल एक्शन वीक २०१२ के हैं. इस साल ० से ६ आयु वर्ग के बच्चों के देखभाल और शिक्षा पर केन्द्रित था. देल्ल्ही के जनकपुरी के निगम प्रतिभा विद्यालय सी५  में में २८ को मनाया गया.
इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि उनिस्को के भारत में प्रमुख श्री शिन्गेरू थे. वहीँ मंच में साथ थीं उनिसफ़ की भारत में शिक्षा विभाग में प्रोग्राम ऑफिसर उकाको फूजी मूरी. साथ ही वर्तमान कांस्लेर अनीता ममतानी मौजूद थीं.
झारखण्ड, मुंबई , उड़ीसा, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश आदि जगहों में ग्लोबल एक्शन वीक मनाया गया.
यह अवसर होता है हर साल राज नेतावो को याद दिलाना की साहब आप लोगों ने डकार में सहमती पात्र पर दस्तखत किया था की २०१५ तक ० से ६ आयु वर्ग के बच्चों को शिक्षा मिल जायेगी. मगर अभी यह लक्ष्य दूर है.
कार्यक्रम के बाद राज्यों में महामहीम राजपाल को ज्ञापन चार्टर सौपा गया.       



   

Friday, April 13, 2012

शिक्षा के अधिकार कानून के आगे हार गई पब्लिक लामबंद

शिक्षा के अधिकार कानून यूँ तो लागू हुवे कुछ साल यानि २००९ में , बीत गए. लेकिन सरकारी स्कूल को छोड़ कर पब्लिक स्कूल और केंद्रीय विद्यालय आदि इसकी परिधि से बाहर थे. पब्लिक स्कूल के तर्क थे की हम इस स्थिथि में नहीं है की २५ फीसदी गरीब बच्चों को मुफ्त में पढ़ा सकें. सरकार की और से दिए ऑफर किये पैसे २१०० रूपये काफी नहीं लगा उन्हें. 
आखिरकार न्यायालय की और से फहल हुई और अब पब्लिक स्कूल को भी अपने यहाँ २५ फीसदी गरीब साधन हीन बचों को शिक्षा देनी पड़ेगी. 
बहस यह भी उठ रही है की क्या गरीब माँ बाप उस बच्चे के बाकि स्कूल के खर्च वहां कर पायेंगे? क्या गारंटी है की ये बच्छे कुछ दिने के बाद द्रौप आयुत में शामिल हो जाएँ?
जो भी हो कम से कम अवसर तो मिला. बुनियादी तालीम तो हाथ में आई. ग्लोबल एक्शन वीक हर साल २३ लस २८ अप्रैल को मनायाजता है. इस के पीछे युद्श्य ग्लोबल कोलितिओं आफ एदुकतिओन पर दुनिया के तमाम नेतायों ने दस्थ्खत किया था की २०१५ तक हम सभी बच्चे के (० से ६ साल के उम्र)  बुनियादी शिक्षा दे दी जायेगी. हकीकत जो भी हो अभी भी लाख से ज्यादा बच्छे स्कूल से बहार हैं.            

Thursday, April 5, 2012

ग्लोवल एक्शन वीक २३ अप्रैल से २९ अप्रैल तक

गौरतलब है की न केवल भारत में बल्कि पूरी दुनिया में भूख, कुपोषण, जन्मते बाल मृतु दर काफी है. २००१ में ९१४ लडकिय जन्मते मर जाती थीं वहीँ यह फीसदी कम होने के स्थान पर २०११ में यह आकड़ा ९४६ तक पहुच गया है. शिक्षा , स्वाथ्य, सुरक्षा भूख आदि से बच्चों को निजाद दिलाने के लिए विश्व के नेतावो ने नेशनल कोन्वेन्तिओन ऑफ़ चिल्ड रिघ्ट्स की घोषणा की थी. यानि २०१५ तक दुनिया के तमाम  बच्चे  शिक्षा, भूख, स्वाथ्य से वंचित नहीं रहेंगे. लेकिन आकडे बताते हैं की अभी भी देश के ८० लाख से भी अधिक बच्चे जनमते ही मर जाते हैं. इनमे लड़कियों की संख्या अधिक है. जनम के पहले २९ घंटे खासे अहम् होते हैं. इसी दौरान तमाम तरह के खतरे बच्चों पर होते हैं. यदि इस समय हमने संभल कर बच्चों को निकल लिया फिर वो जी जाते हैं.
ग्लोवल एक्शन वीक २३ से 29  अप्रैल को पुरे देश में एअर्ली चिल्धूद केयर एंड एदुकतिओन पर केन्द्रित कार्यक्रम करने जा रही है. इस दौरान पिक्टुरेस, स्लोगन, कहानी, बाल केन्द्रित प्रोग्राम आयोजित होंगे. इस के पीछे लक्ष्य आम लोगों के साथ ही सरकार के बीच जागरूकता पैदा करना है.
गौरतलब है की राईट तो एदुकतिओन शिक्षा का अधिकार २००९ महज ६ से १४ साल के बच्चों की शिक्षा की बात करता है. सवाल युथ्ता है की ० से  ६ साल के बच्चों को किसके कंधे पर डालें. ० से ६ साल के बच्चों को संजयान लेते हुवे ग्लोवल एक्शन वीक शुरू के ० से ३ साल के बच्चों की शिक्षा , स्वथ्या का मुदा ले कर आवाज बुलंद कर रहा है.
० से ३ साल का टाइम वो होता है जिसमे बच्चों को स्वाथ्य के प्रति खासे सजग होना होता है. लेकिन दुर्भाग्य है की इसी आयु के बच्चे ज्यादा काल के गाल में समां जाते हैं.                      

Sunday, April 1, 2012

समीक्षक की नज़र में

समीक्षक की नज़र में हर किताब टेक्स्ट किसी तिलस्म से कम नहीं होती. हर पेज हर शब्द हर विचार नए आयाम देता है. यदि समीक्षक किसी किताब को पूर्वाग्रह से पड़ता है तो वो किताब के साथ न्याय नहीं कर सकता. समीक्षा को तथास्त हो कर किताब की समीक्षा करनी चाहिए. किताब की भाषा, विचार, प्रस्तुति, शैली आदि की शाताएं पाठकों के सामने रखना चाहिए.
पाठक आखिर किताब क्यों पढ़े? पाठक किताब से क्या ले सकता है? आदि सवालों के जवाब तलाश कर समीक्षा में दिखने की कोशिश करनी चाहिए. इक होती है समीक्षा, आलोचना, समालोचना, पुस्तक परीचे आदि. इन सब में अंतर होता है. आलोचना, समालोचना जो की पुस्तक की गहराई से जाच पड़ताल करी है. जिसको किसी पत्रिका में जगह मिलती है. लेकिन पुस्तक को रोज दिन प्रकाशित होने वाली अखबारों में पुस्तक परीचे को जगह मिलती है.
पुस्तक परीचे में समीक्षा किताब की इक चलते चलते परिचय लिखता है. वहीँ समीक्षा जो पत्रिका के लिए लिखी जाती है वो आलोचना या समालोचना कह सकते हैं.
पाठक के लिए जरुरी यह है की वो पड़ने के लिए किस किताब का चुना करे. आज इस हकीकत से मुह नहीं मोड़ सकते की टाइम वो भी पड़ने के लिए किसी के पास नहीं है. यदि कोई टाइम निकलाता है तो उस टाइम का सही युप्योग हो सके. इस लिए वह समीक्षा पद कर किताब का चयन कर सकता है.
इस लिहाज से समीक्षक को गंभीर और संतुलित हो कर किताब की समीक्षक की भूमिका निभानी चाहिए                          

Thursday, March 22, 2012

बजट के पैसे कितने मिलते हैं स्कूल के बच्चों के लिए

इक खबर और रिपोर्ट के अनुसार बजट में शिक्षा की बेहतरी के लिए सर्वशिक्षा के मद में हर साल इजाफा हो रहा है लेकिन प्रथम के इक रिपोर्ट की मानें तो मिलने वाले पैसों का अधिकांश भाग रंगे पुताई, रजिस्टर, स्कूल के मरमात में खर्च हो जाते हैं. अगर फीसदी पैसे की बात करें की कितना भाग बच्चों की शिक्षा पर खर्च होता है तो ताजुब होगा सिफर है महज ६ फीसदी ही शिक्षा की बेहतरी पर होता है.
प्रथम ने 14,२८३ हज़ार स्कूल को अपने सतुदी के लिए चुना जिसमे यह हकीकत सामने आया. गौरतलब है की सरकार हर साल सर्वार्शिक्षा, प्राथमिक शिक्षा, उचा शिक्षा को बेहतर बनाने के लिए पैसों को बढ़ाती रही है. इस बार २०११-१२ की तुलना में २९ फीसदी ज्यादा मिले लेकिन हकीकत यह है. २००९-१० में जहाँ २००,४ करोड़ रूपये मिले यहीं २०१० में ४,२६९ करोड़ रूपये मिले. यदि रूपये पर नज़र डालें तो पायेंगे की हर साल बजट में कमी नहीं है. तो सवाल उठता है फिर पैसे जाते कहाँ है? क्यों स्कूल को शिक्षा के मद में मिले पैसे को इस्तेमाल अन्य कामों में करना पद रहा है ?
बहरहाल, पैसे जहाँ भी जिस के भी जेब में जा रहे हैं वह बच्चों के पहुच से काफी दूर है.  
          

Saturday, March 17, 2012

ज़िन्दगी कभी ...

ज़िन्दगी कभी ..
.आगे तो कभी काफी आगे निकल जाती है ,
पीछे कई सारे सवाल फेक जाती है,
धुन्ध्ते रहते हैं हम लोग,
मैथ खुजाते,
बाल नोचते,
सुलझाने को ज़िन्दगी की गुथी.
कई बार ज़िन्दगी हम से आगे निकल जाती है-
तो कभी हम ज़िन्दगी से आगे,
मुद मुद कर आखें,
महसूस करते हैं,
राह के पथिक को,
जो मिले इक बार,
वो जुदा ना हो पाए.             

Friday, March 16, 2012

2012-13 के बजट शिक्षा को कितना मिला



संसद में दादा के दिए भाषण से शब्द उधर लें तो नीचे के तथ्य सामने आते हैं- 
शिक्षा का अधिकार और सर्व शिक्षा अभियान हेतु 2012-13 के बजट अनुमान में 25,555 करोड़ रुपये के आवंटन का प्रस्‍ताव है, जो कि 2011-12 की तुलना में 21.7 प्रतिशत अधिक है।
·         12वीं योजना में मॉडल स्‍कूलों के रूप में ब्‍लॉक स्‍तर पर 6 हजार स्‍कूलों की स्‍थापना का प्रस्‍ताव है।
·         राष्‍ट्रीय माध्‍यमिक शिक्षा अभियान हेतु 3,124 करोड़ रुपये उपलब्‍ध कराए गए हैं, जो कि 2011-12 के बजट अनुमान की तुलना में 29 प्रतिशत अधिक है।
गौरतलब है की इस पुरे बजट में प्राथमिक और कॉलेज के साथ ही शोध संसथान को क्या मिला यह इक्सिरे से गायब है. 
शोध और युनिवेर्सिटी स्तर की शिक्षा के सुधार के लिए साफ साफ़ कोई संकेत नहीं मिलते. इसके पीछे शिक्षा को किस संजीदगी से लिया जाता है इस का पता चलता है. यह हकीकत किसी से छुपा नहीं की आज जितनी आवश्यकता बाज़ार को दुरुस्त करने की है उससे जरा भी कम जरूरत शिक्षा को नहीं है. दिन प्रतिदिन देश की प्राथमिक और युनिवेर्सिटी की शिक्षा महंगी और स्तरहीन होती जा रही उस की चिंता सरकार को न जाने क्यूँ नहीं है.     


Thursday, March 15, 2012

रेल मंत्री तो ट्रैक से उतार दिए गए

दीदी के नहीं मान कर रेल मंत्री ने देखलिया की पानी में रखकर मगर से बैर नहीं किया जाता. लेकिन पता नहीं द्विवेदी ने क्या सोच कर रेल को इचू से बह्हर निकालने पर तुले थे बेचारे खुद बाहर कर दिए गए. गौरतलब हो की रेल मंत्रालय ने पिछले १० सालों में किसी किस्म के किराए में इजाफा नहीं किया था. इसके पीछे हर कोई अपने सर पर ठीकरा नहीं फोड़ना चाहते थे सो किराए में इजाफा के रिश्क नहीं लिया. मगर किसी न किसी को तो रेल विभाग को संजान में लेना था.
अब चीर इंतज़ार वित् बजट आने वाला है. आज की रात सरकार, बाज़ार, कंपनी, घर आदि के लिए बेहद गहरा है. कल यानि १६ मार्च २०१२ की दुपहरी सब के लिए तपिश लाने वाली है. हर सेक्टर को कल कितना मिलने वाला है इस तरफ नज़रें टिकी है.
क्या शिक्षा की बेहतरी के लिए वित् मंत्री कुछ ठीक ठाक आवंटन करने वाले हैं? बस कल इन्सभी पर से पर्दा उठने वाला है. इक बात तो जाहिर है की यदि स्कूल शिक्षा ठीक नहीं किया गया तो देश महज साक्षर बन सकता है शिक्षित नहीं.              

शिक्षकीय दुनिया की कहानी के पात्र

कौशलेंद्र प्रपन्न ‘‘ इक्कीस साल के बाद पहली बार किसी कार्यशाला में बैठा हूं। बहुत अच्छा लग रहा है। वरना तो जी ...