Tuesday, July 16, 2019

भाषायी चुनाव और सरकारी मनसा



कौशलेंद्र प्रपन्न
मैथिली के महान महाकवि विद्यापति की पंक्ति ज़रा देखें और समझें ‘‘हम नहि आजु रहब अहि आंगन जं बुढ होइत जमाय, गे माई। एक त बैरी भेल बिध बिधाता दोसर धिया केर बाप। तेसरे बैरी भेल नारद बाभन। जे बुढ आनल जमाय। गे माइ।’’ विद्यापति की काव्य संपदा से जो बेहद सहज और सरल भाषा एवं भाव प्रवण कविता है। उसे यहां उदाहरण के तौर पर रखा है। हमारा हिन्दी का शिक्षक अनुमान लगाकर शायद इसे बच्चों को समझा पाए। विद्यापति ही नहीं बल्कि नागार्जुन की मैथिली कविताएं भी ठेठ भाषा बोली के शब्दों से अटी हुई हैं ऐसे में भावानुवाद एवं बच्चों को समझाने की विशेष दक्षता की मांग हो जाती है। हमारे पास मैथिली भाषा के प्रवीण शिक्षकों की आवश्यकता पड़ेगी। हमारे स्कूली शिक्षकों को यदि हिन्दी की पाठ्यपुस्तकों में भोजपुरी के शब्द कहानियों में मिलते हैं तां उन्हें उसके अर्थ समझने में बड़ी मुश्किल आती है मसलन ‘‘केरा के पता आइल की ना’’ ‘‘अइसर जाड पहिले कबहु ना देखनि’’ यदि समग्रता में देखें में मैथिली भाषा में कई समर्थ कवि और उपन्यासकार भी हुए हैं। यह अलग विमर्श का मुद्दा है कि भाषा के चुनाव और सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में राजनीति का हस्तक्षेप प्रकारांतर से भाषायी विमर्श और भाषा के शिक्षण शास्त्र को नजरअंदाज करना है। एक ओर जहां नई शिक्षा नीति प्रारूप और पूर्व की शिक्षा नीतियां, समितियां मानती और सिफारिश करती हैं कि बच्चों को बहुभाषी परिवेश प्रदान करना है। स्कूल इस प्रक्रिया में एक अहम भूमिका में माना गया है। स्कूल में जिस भाषा को तवज्जो दी जाती है वही भाषा बच्चों के लिए स्वीकार्य और महज सी मान ली गई है। अमूमन पाया जाता है कि बच्चों को स्कूली और घर की भाषा के बीच के द््वंद््व में डोलना पड़ता है। हालांकि जहां एक ओर नीतियां मातृभाषा, स्थानीय भाषा, क्षेत्र विशेष की भाषा को शिक्षा का माध्यम मानती हैं वहीं दूसरी ओर इससे भी मुंह नहीं फेर सकते कि सरकार व सत्तासीन ताकतें भाषा के चुनाव में अपने हित और स्वार्थ को तरजीह देती हैं। यही उदाहरण दिल्ली सरकार ने पेश किए हैं। हाल ही में घोषित बयान को देखें और समझने की कोशिश करें तो एक बात स्पष्ट होगी कि दिल्ली में मैथिली को स्कूलों में पढ़ाए जाने का निर्णय अकादमिक विमर्श से नहीं निकला है, बल्कि आगामी चुनाव के मद््दे नजर एक ख़ास वर्ग, राज्य और भाषा-भाषी के समर्थन और वोट अपनी ओर करने का प्रयास है।
त्रिभाषा सूत्र को ताख पर रखकर मैथिली व भोजपुरी को राजनीतिक प्रश्रय देना सीधे सीधे त्रिभाषा सूत्र को हाशिए पर धकेलना भी है। यदि भोजपुरी व मैथिली को स्कूलों में पढ़ाने के प्रति सरकार संजीदा है तो क्यों नहीं यह सरकार गढ़वाली, कोंकणी, अवधी मालवी, मारवाडी, मेवाती मलयाली आदि भाषाओं को भी स्कूलों में पढ़ाने के प्रति सजग है? कम से कम दिल्ली से सटे राज्यों राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश में ब्रज आदि के क्षेत्र विशेष की भाषा को स्कूलों में शामिल करने की योजना बना रही है। जबकि बच्चों और अभिभावकों की संख्या पर नजर डालें तो इन्हीं राज्यों से बच्चे दिल्ली के सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे हैं। बिहार प्रांत से भी अभिभावक दिल्ली में हैं किन्तु सिर्फ बिहार की मैथिली को ही क्यों राज्याश्रय प्रदान किया जाए। उस पर तुर्रा यह कि भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए केंद्र सरकार से सिफारिश करने की मनसा भी दिल्ली सरकार प्रकट कर चुकी है।
यह कहीं न कहीं राजनीति लाभ से प्रेरित कदम ही माना जाएगा। इसमें अकादमिक, भाषाविदों, शिक्षाशास्त्र के जानकारों से राय नहीं ली गई होगी। यदि इस कदम को उठाने से पूर्व शैक्षिक मंथन किए गए होते तो शायद महज मैथिली व भोजपुरी को ही यह तवज्जो नहीं मिलता, बल्कि अन्य भारतीय भाषाओं को भी चिंतन की परिधि में रखा जाता। त्रिभाषा सूत्र हो या फिर भाषा पर अविभिन्न समितियों की सिफारिशों पर विचार किया जाता तो ऐसी गलती नहीं होती। कोठारी आयोग की सिफारिशें भी इस ओर इशारा करती हैं कि मातृभाषा, क्षेत्र की भाषा एवं एक भारतीय भाषा का अध्ययन-अध्यापन किया जाए। बच्चों को स्कूली स्तर पर भारतीय भाषाओं से परिचय कराना मुख्य स्थापनाओं में से एक है। जब भारतीय भाषाओं के संरक्षण और संवर्द्धन की सिफारिश की गई तो इसमें यह संदेश निहित है कि राज्य की भाषा के साथ ही बच्चे की मातृभाषा एवं एक भारतीय भाषा का चुनाव बच्चे को प्रदान किया जाए। यहां दिल्ली सरकार को विचार करने होंगे कि क्या वो पूर्व और वर्तमान की शिक्षा नीतियों की सिफारिशों और निर्देशों को नजरअंदाज कर एक नई शुरुआत करना चाहती है?
हालांकि गांधी जी ने वर्धा में शिक्षामंत्रियों के सम्मेलन में कहा था कि प्राथमिक स्तर पर शिक्षा का माध्यम मातृभाषा हो। उस वक़्त गांधी जी के इस अनुमोदन का समर्थन जाकिन हुसैन ने भी की थी। लेकिन राजनीति ताकतें इसे अमल में लाने से रोक पाने में सफल रहीं। भाषा सीखने-सिखाने को लेकर समय समय पर राजनीति हस्तक्षेपों का एक लंबा इतिहास रहा है। भाषायी संघर्ष और भाषायी द््वंद््व से बच्चों के साथ ही बड़ों को भी जूझना पड़ता है। एक बच्चे की नज़र से देखें और सोचें तो पाएंगे कि एक बच्चा जिसकी घर की भाषा और स्कूली भाषा के बीच एक फांक है तो ऐसे में वह किसी भी भाषा के साथ न्याय नहीं कर पाता। एक ओर भाषायी भूगोल में विस्तार हो रहा है वहीं बच्चा ऐसी भाषा का चुनाव करना चाहता है जिस भाषा का बाजार हो और बाजार में रोजगार हो। एक ओर हिन्दी की पाठ््य पुस्तकें समय पर बच्चो को उपलब्ध नहीं हो पातीं ऐसे में क्या सरकार मैथिली भाषा में तमाम विषयों के पाठ््यक्रम, पाठ््यचर्या और पाठ््यपुस्तक निर्माण को समय पर पूरी कर पाएगी। इस प्रकार के सवाल बल्कि चुनौतियां इसका पूर्वानुमान लगा कर हमें रणनीति और रोडमैप बनाने की आवश्यकता पड़ेगी। साथ ही यदि मैथिली को आठवीं से 12 वीं कक्षा में पढ़ाने की योजना है। क्या हमारे पास मैथिली भाषा के प्रशिक्षित शिक्षक हैं जो सीखने-सिखाने में दक्ष हैं। जमीनी हक़ीकत को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते। यदि भाषायी सर्वेक्षण को आधार बनाया जाता तो यह कदम वैद्धय माना जाता किन्तु इस मसले में सिर्फ हड़बड़ाहट दिखाई देती है। कैसे आनन फानन में एक भाषा विशेष के वर्ग को अपने पक्ष में किया जाए। हालांकि हम लोग अभी भी पुरानी भाषायी सर्वे से ही काम चला रहे हैं। वह सर्वेक्षण देश की विभिन्न भाषाओं पर आधारित है। अकेले दिल्ली की बात की जाए तो हमारे पास प्रमाणिक और वैद्धय आंकड़े शायद नहीं हैं जिसके आधार पर कह सकें कि दिल्ली के स्कूलों में इतने प्रतिशत बच्चे फलां भाषा बोलते और पढ़ते-समझते हैं। यदि हमारे पास प्रमाणित और वैज्ञानिक भाषायी सर्वे के आधार ही नहीं हैं तो ऐसे में एक विशेष भाषा को कैसे स्कूली पाठ्यक्रमों का हिस्सा बनाने की घोषणा कर सकते हैं। समझने की बात तो यह भी है कि क्या शिक्षा विभाग इस नई पहल के लिए तैयार है? क्या उसकी तैयारी है कि वह मैथिली भाषा में शिक्षक, किताबें, पाठ्यक्रम आदि बच्चों को मुहैया करा पाएंगी। हमारे पास प्रशिक्षित शिक्षकों की बेहद कमी है। मंथन इस पर भी करना होगा कि क्या हमारे पास मैथिली के शिक्षकों को तैयार करने के लिए सेवापूर्व शिक्षक प्रशिक्षण क्षमता और दक्षता है जिन्हें हम बतौर मैथिली भाषा के शिक्षक के तौर पर नियुक्त कर सकें। हमें मैथिली व भोजपुरी व अन्य भारतीय भाषाओं को स्कूलों में लागू करने से पूर्व शिक्षक-प्रशिक्षण, पाठ्यक्रम, पाठ्यपुस्तक आदि निर्माण की प्रक्रिया को दुरुस्त करने होंगे। वरना अन्य घोषणाओं के तर्ज पर यह भी महज घोषणा से आगे नहीं जा सकेगी। नई नियुक्तियों में डीएसएसबी पहले ही उच्च न्यायालय से फटकार खा चुकी है कि शिक्षकों की नियुक्तियों में क्यां समिति समय पर अपना काम पूरी नहीं कर पाती है। तो क्या ऐसे में मैथिली शिक्षकों की भर्ती सरकार सुनिश्चित करती है। क्या यह रेकी की गई है कि दिल्ली के सरकारी स्कूलों में कितने बच्चे हैं जिनकी मातृभाषा मैथिली है? यदि उन बच्चों की घर की भाषा तो मैथिली है तो क्या कितनों बच्चों की ओर से यह मांग आई कि उन्हें मैथिली भाषा में पढ़ाई चाहिए? यदि आंकड़े हैं तो सरकार को यह भी स्पष्ट करना और सामने रखने चाहिए कि इतने प्रतिशत बच्चे मैथिली भाषी हैं और उनकी मांग है कि उन्हें मैथिली भाषा में पढ़ाई जाए। एक बारगी महसूस होता है कि या यह सिर्फ अनुमान प्रमाण पर आधारित अवधारणा है कि हमें मैथिली भाषा भी स्कूलों में पढ़ाना चाहिए। ऐसे में भारत के अन्य राज्यों से भी सवाल उठा सकते हैं कि क्यों न उनके राज्य की भाषा को भी स्कूलों में शामिल की जाए?
चुनाव पूर्व सरकारें और राजनीति संगठन घोषणाएं किया करते हैं क्या यह भी महज राजनीति घोषणा भर है या फिर इसे लॉच करने से पूर्व होम वर्क भी किए गए हैं। यदि सिर्फ एक ख़ास प्रांत के ख़ास लोगों को लुभाने के लिए सरकार ने यह घोषणा की है तो हमें इस पर भाषायी एवं अकादमिक हस्तक्षेप करने होंगे। एक भी प्रकार से उस विशेष भाषायी समुदाय को सपने बेचना ही है जिन्हें एक आस बंध जाएगी कि अब तो हम दिल्ली में भी स्कूलों में पढ़े-पढ़ाए जाने लगे। हमें आश्वासन मिले हैं कि इन्हें संविधान में शामिल करने के लिए वकालत की जाएगी आदि।



Wednesday, June 19, 2019

सुनने का कौशल और आनंद



कौशलेंद्र प्रपन्न

सुनना उसपर भी किसी और की बात, कहानी, घटनाएं अपने आप में बेहद चुनौतिपूर्ण है। डिजिटल युग में जहां हर चीज तेजी से बदलती और सरकाई जाती है ऐसे में सुनना और सुनाना बेहद दिलचस्प और मानिख़ेज़ है। एक घटना से सुनने के कौशल और सुनाने वाले की दक्षता को स्पष्ट करना चाहता हूं। पिछले दिनों बच्चों ‘‘ विभिन्न आयु वर्ग के जिसमें छह साल से लेकर 16 साल तक’’ को कहानी की कार्यशाला में कहानी सुनाना, कहना, लिखना और पढ़ना आदि पर तीन दिन की बिताने थे। मेरे लिए भी यह चुनौतिपूर्ण इस रूप में था कि उस कार्यशाला में विभिन्न आयु वर्ग के बच्चों को कैसे समान और रूचिपूर्ण, आनंदप्रद एहसासों से गुज़ारा जाए और उन्हें ये तीन दिन ज़ाया सा न लगे। सत्र की शुरुआत एक कहानी से की। कहानी क्या था इस संसार की रचना को विषय बनाया। कैसे गैलेक्सी, यूनिवर्स की रचना हुई। इसमें हमने 13.7 मिलियन वर्ष पीछे ले जाकर सृजन और निर्माण की रोचक जानकारी तो देना था ही साथ ही एहसास से भरना था कि हम आज जहां हैं उस पृथ्वी को बनने में कितने वर्ष की यात्राएं करनी पड़ी। कहानी में बच्चों का प्रवेश हो चुका था। मेरी आवाज़ और शब्दों, वाक्यों के माध्यम से बच्चे बंधते चले गए थे। शायद ही कोई बच्चा ऐसा रहा होगा जो इस यात्रा में पीछे रह गया हो। जब कहानी खत्म हुई तो सभी बच्चों से प्रक्रियाएं और अपने अनुभव साझा करने के लिए कहा गया। बच्चों ने स्पष्टतौर पर स्वीकार किया कि बहुत मज़ा आया। वापस आने की इच्छा नहीं हो रही थी। जैसे जैसे आप पृथ्वी पर लेकर आए। विश्व से एशिया पर आए, फिर भारत पर। भारत के बाद राज्य पर और राज्य से शहर पर फिर राजेंद्र नगर स्थित इस कक्ष तक लेकर आए। तो हमने अनुमान लगा लिया था कि अब आप इस जगह पर आने वाले हैं। इस कहानी को सुनते हुए बच्चों ने कल्पनाएं करना, अनुमान लगाना, कथा की भाषा, कथा का कथ्य, विभिन्न विषयों का समायोजन जिसमें गणित, इतिहास, विज्ञान, खगोल विज्ञान, अंतरिक्ष विज्ञान आदि सब शामिल थे। छह साला बच्ची ने कहा ‘‘ इसमें गणित के अंक भी थे।’’ ‘‘ऐसा लगा ही नहीं कि हम जमीन पर हैं। जब आपने आंखें बंद कराईं तो लगा कुछ गेम कराने वाले हैं। लेकिन आवाज़ की जादू ऐसी थी कि उसके मोह में बंधते चले गए।’’ ग्यारहवीं में पढ़ने वाली दूसरी बच्ची ने कहा।
बातचीत का सिलसिला ज़ारी रहा ‘‘ यह कहानी क्यों पसंद आई?’’ इस सवाल का जवाब बच्चों ने दिया कि इसमें रोचक जानकारी थी, कहानी सुनने का आनंद था। आपकी आवाज़ बेहद प्रभावी थी। हम लोग डूब कर सुन रहे थे। अगला सवाल कुछ यूं पूछा ‘‘आप लोगों की नज़र में एक कहानी में क्या क्या होनी चाहिए जिसे पर देखना, सुनना चाहेंगे?’’ इसपर अन्य बच्चों ने बारी बारी से कहा ‘‘ कहानी में रोचकता हो, कहने वाला व्यक्ति रूचि ले। कहानी में इतिहास भी हो, समाज शास्त्र भी हो। विज्ञान भी हो और अच्छी कहानी हो जाती है।’’ ‘‘हमें कहीं भी इस कहानी को सुनते हुए भाषा कठिन और शब्द मुश्किल नहीं लगे।’’
तीन दिन कैसे गुज़र गए पता ही नहीं चला। अंतिम दिन दो तीन बच्चों और बच्चियों ने कहा ‘‘कार्यशाला में सबसे खराब जो रहा हो वो कहना चाहता हूं’’ यह कहना था आर्यन का। सबकी नज़र उसकी ओर चली गई। उसने कहा ‘‘सर का आज अंतिम दिन है। आज के बाद इनसे मुलाकात नहीं होगी। इनकी कहानी और कहानी कहने की शैली को आज के बाद नहीं सुन सकेंगे।’’ लगभग अन्य बच्चों का भी यही कहना था। लेकिन प्रियदर्शनी ने स्वीकार किया कि उन्हें भी चिंता थी कि तीन दिन कहानी पर बोर हो जाएंगे। पहले भी कई सर आए और बोर कर के चले गए। इस बार भी तीन दिन बोर होने वाले हैं। लेकिन पहले ही दिन, पहले ही एक घंटे में हमें अंदाज़ हो गया कि हम बोर नहीं होंगे।’’
यह एक कार्यशालायी तजर्बा था जिससे हम आगे सुनने के कौशल कैसे कहने के कौशल पर ख़ासा निर्भर है इसे समझने की कोशिश करें। सुनने का धैर्य न तो बच्चों में शेष है और बड़ों में। हम मान कर चलते हैं कि कहने वाला बोर करने वाला है। जो भी कहने वाला है वो अपनी कहानी, अपनी बातें सुनाकर समय काटेगा। यह मानना भी एकबारगी ग़लत भी नहीं है। क्योंकि सुनाने वाले कई बार यही किया करते हैं ऐसे अनुभव हम सब की ज़िंदगी में आए ही होंगे। हमारे ही बीच में ऐसे भी कहने वाले होते हैं जिन्हें सुनने के लिए लालायित रहते हैं। ऐसे व्यक्ति कई बार हमें प्राथमिक कक्षाओं में बतौर शिक्षिका/शिक्षक मिले होंगे जिन्हें जी चाहता था ये बोलते जाएं और हम बस सुनते रहें। ऐसे ही वक्ताओं, कथा कहने वाले कविता सुनाने वाले हमारी ज़िंदगी में शामिल हो जाते हैं। लेकिन जैसे जैसे बड़े होते जाते हैं वैसे वैसे इस प्रकार के लोग कम होते चले जाते हैं। हालांकि प्राथमिक स्तर पर हमारे अधिकांश शिक्षक पढ़ाने आते हैं। शायद पढ़ाने की क्रिया में पढ़ने और सुनने के आनंद की हत्या करते रहते हैं। वो पाठ्यक्रम पूरा कराने के दबाव में ‘‘सुनने का आनंद’’ पीछे धकेलते जाते हैं। हमारी प्रारम्भिक सुनने की प्रक्रिया में सुनने के आनंद कहीं छूट जाते हैं यदि कुछ रह जाता है तो बस सुनकर याद रखने, रटने, परीक्षा में सुने हुए शब्दों के अर्थ बताने आदि कार्यां में बीतता रहा है तो ऐसे में हमारे बच्चे सुनने के कौशल में एक बात गांठ बांध कर सुनने की कोशिश करते हैं कि इस कहानी, कविता में कौन कौन से कठिन शब्द आए हैं, उनके विपरीतार्थक शब्द, समानार्थक शब्द, वाक्य आदि में प्रयोग कैसे करेंगे? आदि संभावित सवालों की जाल में खो जाते हैं। ऐसे में हमारा बच्चा सुनने के कौशल में सिर्फ कुछ शब्दों, कहां कहां किसने कौन से शब्द, संवाद बोले हैं उन्हें याद रखने में उलझ जाते हैं।
बताने और सुनाने में एक बुनियादी अंतर को समझ लें तो आगे की यात्रा आसान और आनंदपूर्ण हो सकती है। जब हम कक्षा-कक्ष में या फिर आम ज़िंदगी में किसी को कुछ बता रहे होंते हैं तब हम शायद कोई सूचना, कोई घटना या फिर अपनी बातों में तथ्यों को शामिल कर रहे होते हैं। हमारी अपेक्षा तो होती है कि जिसे बता रहे हैं उसे सुने। उसे सुनकर कितना भागीदार हो या फिर उसपर किस प्रकार का एक्शन ले इसकी अपेक्षा शायद नहीं रहती। लेकिन जब हम किसी को कुछ सुना रहे होते हैं तो हमारी अपेक्षा सुनने वाले से होती है कि वह सुनकर अपनी राय भी दे। सुनने में दिलचस्पी भी ले और हूंकारी भी भरे। हूंकारी भरना वैसे तो कहानी में ज़्यादा होती है। इससे हमें पल पल हर पग पग पर प्रतिक्रियाएं और सुनने वाले की मनःस्थिति के बारे में जानकारी मिल रही होती है। जब हम कक्षा-कक्ष में सुना रहे होते हैं तब यह जानना बेहद ज़रूरी हो जाता है कि सुनने वाले बच्चे उसे समझ भी रहे हैं या नहीं। यहां सुनने के साथ ही समझना एक अपेक्षा जुड़ जाता है। यदि बच्चा सुनकर अर्थ नहीं समझ पा रहा है, संदर्भ की समझ नहीं बन पा रही है तो शायद यह सुनना मुकम्म्ल नहीं माना जाएगा। इसलिए सुनाने वाले यानी कहने वाले को अपनी कहन पर काम करने अभ्यास करने की आवश्यकता पडे़गी। कहन में जो जितना चुस्त और दक्ष होगा उसकी सुनाने की प्रक्रिया उतनी ही सहज और सारगर्भित होगी ऐसा मान कर चल सकते हैं। सुनाने के दौरान हम किस प्रकार की भाषा, कथ्य, परिवेश आदि की रचना कर रहे हैं यह भी बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। क्योंकि सुनना अपने आप में श्रमसाध्य कामों में से एक है। कोई क्यों किसी की सुने? क्यों सुनाने वाला सुनाना चाहता है? आदि के पीछे के मकसद स्पष्ट नहीं होंगे तो वह कहने और सुनने की आम प्रक्रिया तो हो सकती है वह समझ कर सुनने की प्रक्रिया का हिस्सा बनने से वंचित हो जाएगी।
यदि किसी कक्षा की परिकल्पना करें तो हमारा शिक्षक जिस तरीके व शैली में बच्चों को कहानी, कविता, विज्ञान, गणित या समाज विज्ञान की बातें, अवधारणाएं सुना रहा है किस कदर उसकी भाषा और अपेक्षा स्पष्ट नहीं तो ऐसी स्थिति में बच्चे नहीं सुनते। बल्कि बस सुनने का ढोंग कर रहे होते हैं। ठीक वैसे ही जैसे हम बड़े भी कई बार सुनने का स्वांग कर रहे होते हैं। सुनते नहीं हैं। जब पूछा जाता है ‘‘ सुन रहे हैं? मैं क्या कह रहा हूं?’’ ‘‘ क्या आप बता सकते हैं मैं किस पर चर्चा कर रहा था?’’ इन वाक्यों से हमारी तंद्रा टूटती है। हम कह देते हैं, शॉरी सुन नहीं पाया।  हम क्यों नहीं सुन पाए या बच्चा क्यों नहीं सुन सका? इसके दो जवाब हो सकते हैं, पहला- हम सुनना नहीं चाहते थे। हमारी अंतर दुनिया में बड़ी हलचल मची हुई थी। इसलिए सुन नहीं पाए। बच्चा यदि भूखा है, असुरक्षित है, पीड़ित है तो वह सुन नहीं पाएगा। दूसरी स्थिति सुनाने वाला यानी कहने वाला यदि पुरानी और आदतन बोर की शैली में कह रहा है तब वैसी स्थिति में हमारी सुनने की इच्छा मर जाती है। तब बोलने वाले के शब्द/ध्वनियां भर हमारे कानों से टकराया करती हैं।
सुनने से गहरा जुड़ा है पढ़ने की लालसा। जब हमारा बच्चा कोई कहानी, कोई कविता आदि सुनता है तब उसमें उसे पढ़ने की जिज्ञासा पैदा होती है। बच्चा सुनने के बाद उस कहानी को पढ़ कर आनंद उठाना चाहता है। लेकिन उसके पढ़ने के रास्ते में वर्णमालाएं, अक्षर ज्ञान, शब्दों की प्रकृति आदि बाधा बनती हैं। बच्चा शब्दों और वाक्यों की पहचान से संघर्ष कर बाहर निकलता है तब उसे पढ़े उसे शब्दों और वाक्यों में निहित कहानी के मर्म को समझने के दूसरे स्तर पर संघर्ष करना पड़ता है। हमें बच्चों को पढ़ने की सीढ़ी पर चलाने से पूर्व सुनने की कला में प्रवीणता मुहैया करानी पड़ेगी तब पढ़ने की प्रक्रिया सुगम और सहज हो सकती है।
हमारा बच्चा अक्षर ज्ञान से लेकर, वर्णमालाओं के चक्रव्यूह को तोड़ते तोड़ते पांचवीं कक्षा पार कर जाता है। जैसे जैसे अगली कक्षाओं में जाता है यह वर्ण, अक्षर, वाक्य उसे डराने लगते हैं। वह या तो भाषा एवं साहित्य पढ़ने से मुंह मोड़ चुका होता है। और हम एक भविष्य के साहित्य प्रेमी व साहित्य के छात्र पाने से वंचित रह जाते हैं। बच्चे तो साहित्य से दूर हो ही जाते हैं यह तो एक हानि होती ही है साथ ही हमारा साहित्य महज बड़ों की रूचि और विलास की वस्तु बन कर सीमित हो जाती है। ऐसे में बच्चां को साहित्य से दूर होना कहीं न कहीं बच्चों में पढ़ने, सुनने, बोलने की क्षमता को कमतर करती है। वहीं बच्चों में भाषायी साक्षारता को भी कम करती है। बच्चे वर्ण आदि तो फिर भी पहचान लेते हैं किन्तु जब पढ़ या सुनकर समझने का जायजा लेते हैं तब हमारा बच्चा पिछड़ जाता है।

Tuesday, June 18, 2019

शपथ की भाषा



कौशलेंद्र प्रपन्न
संसद में कौन सांसद किस भाषा में शपथ ले रहे हैं इस बाबात मीडिया और सोशल मीडिया में ख़ासा चर्चा है। कोई अंग्रेजी में शपथ ले रहा है तो विवाद तो कोई भोजपुरी में शपथ लेने की मांग कर रहा है तो उसे यह तर्क दे कर रोका गया कि यह संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल भाषा नहीं है इसलिए इस भाषा में शपथ नहीं ले सकते। जिन भाषाओं में शपथ लेने से रोका गया उसमें बघेली भी शामिल है। अचानक संस्कृत भाषा को मुहब्बत करने वाले ज्यादा ही जोश में हैं। फलां ने संस्कृत में शपथ लिया। उसने भी लिया और इसने भी संस्कृत में शपथ ली। क्या हम नहीं जानते कि आज संस्कृत कुछ फीसदी लोगों की व्यवहार की भाषा हो सकती है। कुछ संस्थानों, स्कूलों आदि में ही पढ़ी और पढ़ाई जाती हैं। बाकी तो आम जिं़दगी से नदारत भाषा के दिन अचानक शिक्षा नीति के मसौदे आने से जान आ गई है। न केवल संस्कृत बल्कि पालि, प्राकृत, संस्कृत आदि भाषाएं इन दिनों खूब इठला रही हैं। हिन्दी भी उन्हें के संग ज्यादा खुश हो रही है। यह अगल बात है कि कुछ राज्यों ने इसे अनिवार्यतौर पर पढ़ने-पढ़ाने पर सवाल उठाए और सरकार को यह निर्णय वापस अपनी झोली में रखना पड़ा।
संस्कृत में शपथ लेने वाले वे सांसद हैं जो कभी कभार शौकीयातौर पर बोल लिया करते हैं। इनमें साध्वी प्रज्ञा, प्रताप सारंग, देबू सिंह पटेल आदि। वहीं अंग्रेजी में शपथ लेने वालों में राहुल गांधी, गौतम गंभीर, बाबुल सुप्रियो हैं। इन्हें क्या दोष देना कि क्यों इन्होंने अंग्रेजी में शपथ ली? राहुल बेशक जनता को हिन्दी में संबोधित करते हैं क्या वह स्क्रीप्ट हिन्दी में होती है या रोमन में? बाबुल सुप्रियो गाने तो हिन्दी की भी गाते हैं लेकिन संभव है उसकी स्क्रीप्ट भी रोमन की होती हो। लेकिन हम सवाल उठा रहे हैं। जबकि यह किसे नहीं मालूम कि पूरा का पूरा हिन्दी फिल्म जगत रेमन मार्का हिन्दी में ही पैसे पीटा करती है। जहां तक हिन्दी में शपथ लेने वालों की बात है तो ये लोग सीधे सीधे हिन्दी पट्टी से आया करते हैं या फिर हिन्दी सी दीखने की कोशिश करते हैं7 स्मृति ईरानी, रविशंकर प्रसाद, रमेश पोखरियाल निशंक, डॉ महेंद्र नाथ पांडे, जनरल वीके सिंह आदि।
भाषा से मुहब्बत शायद थोपी जाए तो यह हमारी अपनी नहीं हो सकती बल्कि वह दूसरी भाषा के तौर पर ही बरती जा सकती है। कौन किस भाषा में सहज है इसको लेकर किसी दूसरी शक्ति या दबाव तो कोई भी स्वीकार नहीं कर सकता। ठीक वैसे ही जब उत्तर भारतीय भाषायी समाज दक्षिण भारतीय भाषायी समाज पर हिन्दी सीखने-सिखाने की मजबूरी पैदा करते हैं तब भाषायी संघर्ष को जन्म देते हैं। जबकि यही कहानी उलट भी सकती है। फ़र्ज कीजिए दक्षिण भारतीय इतनी ताकत हासिल कर लें कि भाषायी समाज को प्रभावित कर सकते हैं तो संभव है हिन्दी के स्थान पर तमिल, कन्नड़, मलयाली आदि भाषाओं को सीखना-सिखाना अनिवार्य कर दे। तब भी संघर्ष शुरू होंगे ही। दरअसल भाषायी समाज को राजनीति हस्तक्षेपों को ख़ासा आकार दिया है। सत्ताएं तय करती रही हैं कि कौन सी भाषा कब और कैसे अचानक शक्ति प्रदाता भी भूमिका में आ जाएंगी।
भाषाओं को लेकर लंबे समय से संघर्ष और वाक्युद्ध चले हैं, जिसकी सत्ता और ताकत प्रभावित करने वाली रही है उसने दूसरी भाषा को पनपने से पहले ही कूचलने की पूरी कोशिश की है। इस पददलन में वे भाषाएं काफी हद तक सफल भी रही हैं। जबकि यदि हम 1968 की राष्टीय शिक्षा नीति की बात करें तो स्पष्टतौर पर कहा गया है कि अंग्रेजी को प्राथमिक स्तर पर शिक्षण का माध्यम नहीं बनाया जा सकता। न ही इतनी बड़ी संख्या में शिक्षक ही मुहैया करा सकते हैं। लेकिन वही अंग्रेजी हमारे करीब रहकर अन्य भारतीय भाषाओं की नींव खोदती रही है। एक भाषा के तौर पर अंग्रेजी सीखने-सिखाने में किसी को भी कोई गुरेज़ नहीं सकता किन्तु दूसरी भारतीय भाषाओं को धकेलकर अंग्रेजी को थोपना किसी को भी खटकेगा। हालांकि नई राष्टीय शिक्षा नीति आधुनिक और भारतीय भाषाओं को संरक्षित करने और पढ़ने-पढ़ाने के माहौल सृजित करने के प्रति गंभीर है। भारतीय भाषाओं को बचाना और सीखना-सिखाना ग़लत नहीं है बल्कि किसी एक भाषा को ताज पहनाना और अन्य भाषाओं को हाशिए पर धकेलना उचित नहीं। 

Friday, June 14, 2019

बहुभाषायी शक्ति और बच्चों की दुनिया


कौशलेंद्र प्रपन्न
जनमते ही बच्चों को मां की भाषा, नर्स की भाषा, डॉक्टर की भाषा, दाई की भाषा, नाते-रिश्तेदारों की भाषा कानों में पड़ती है। क्या इसे बहुभाषायी समाज कह सकते हैं? सीधे सीधे बहुभाषा से जुड़ती तारें पहली नजर में दिखाई न दे पाए किन्तु है तो बहुभाषायी समाज का उदाहरण ही। मां अपनी भाषा में पुचकारती है। दादी नानी अपनी भाषा बोली में। डॉक्टर अपनी भाषा में जच्चा बच्चे से बात करता है। यह प्रकारांतर से बहुभाषा का ही उदाहरण है। जब बच्चा घर में आता है तब उसके आस-पास बोलने वाले अपनी अपनी भाषा में बातें किया करते हैं। अपने परिवेश की ध्वनियों को बच्चा सुन और ग्रहण कर रहा होता है। वैज्ञानिक स्थापनाएं भी सत्यापित कर चुकी हैं कि बच्चे गर्भ में रहते हुए अपने परिवेश की ध्वनियों को संग्रहीत करता रहता है। वही ध्वनियां उसे बड़े होने पर मदद करती हैं भाषा सीखने में। इसे स्वीकारने में किसी को भी गुरेज़ नहीं होगी कि बच्चा जो भाषा गर्भ में सुनता है बड़े होकर वही ध्वनियां उस भाषायी कौशल में दक्षता प्रदान करती हैं। जब बच्चा स्कूल जाने योग्य आयु को होता है तब वह स्कूल में एक दूसरी या तीसरी भाषा सुनता,बोलता और लिखता है। बच्चा अब द्वंद्व व संघर्ष गुज़रने लगता है। जो भाषा उसकी घर की थी उसमें न किताबें होती हैं, न शिक्षक उसकी भाषा में पढ़ाता है, न बच्चे उस भाषा को बरत रहे होते हैं। जो कक्षा में आता है वह दूसरी या तीसरी भाषा में निर्देश देता है। कई स्कूलों में तो मातृभाषा व स्थानीय भाषा के इस्तमाल पर दंड़ित भी किया जाता है। ऐसे में भाषायी दंड़ व द्वद्व गहरे होने लगते हैं। इस स्तर पर बच्चों के बीच भाषा चुनाव की बड़ी चिंता पैदा होती है। इस चिंता की गहराई कॉलेज, विश्वविद्यालय तक और चौड़ी हो जाती है। इसका एक सीधा उदाहरण है, विश्वविद्यालय स्तर पर राजनीति शास्त्र, समाज-शास्त्र, विज्ञान, वाणिज्य आदि की पढ़ाई न तो मातृभाषा/स्थानीय भाषा में होती है और राज्य स्तरीय भाषा में बल्कि यहां अंग्रेजी में सीखने-सिखाने की प्रक्रिया चल रही होती है। ऐसे में बच्चे की मातृभाषा/स्थानीय भाषा साथ छोड़ देती है और बच्चा अंग्रेजी से लड़ने-जूझने के लिए तैयारी करता है। बच्चे की भाषायी दक्षता उसकी मातृभाषा/स्थानीय भाषा में थी किन्तु जब वह तीसरी भाषा के मार्फत विषय का अध्ययन करता है तब उसे तीसरी भाषा की तमीज़ को समझने और उस भाषा की प्रकृति को समझते बूझते एक बड़ा हिस्सा निकल जाता है।
घर वाली और बाहर वाली भाषा के मध्य झूलता हमारा युवावर्ग अंततः भाषायी अंतरविरोधों, भाषायी अलगाववाद में अपनी निजी पेशेवर क्षमता खोता चला जाता है। विशेषतौर पर हमारा युवा विज्ञान, गणित आदि में तो बेहतर प्रदर्शन करता है लेकिन जब भाषा की बारी आती है तब उसका सरोकार महज इतना ही होता है कि फलां भाषा के पेपर में पास मार्क्स ही तो अर्जित करने हैं। वह बच्चा पास अंकीय द्योढ़ी को पार कर प्रोफेशनल क्षेत्र में उतर जाता है। जब हमारा युवा कार्यक्षेत्र में आता है वहां उसे बहुभाषी होना एक अनिवार्य अहर्ता पूरी करनी पड़ती है। यहां पर हमारा युवा एक क्षेत्र, राज्य विशेष तक बंध कर रह जाता है। इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि एक दक्षिण भारतीय युवा अपने विषय और पेशेवर क्षेत्र में दक्ष है किन्तु यदि उसे दक्षिण भारतीय भाषा के एत्तर अन्य भारतीय भाषाएं नहीं आतीं तो ऐसे में वह युवा एक राज्य, जिला, गांव की चौहद्दी नहीं पार कर पाता। हालांकि यदि युवा श्रम और अभ्यास करे तो दूसरी अन्य राज्यीय भाषाएं सीखकर अपनी रोजगार के द्वारा को व्यापक स्तर पर खोल सकता है। इसमें क्या दक्षिण भारतीय और क्या उत्तर भारतीय बल्कि एक देश से देशांतर तक अपने पेशेवर फलक को व्यापक बनाना है तो हमें बहुभाषी होना ही होगा।
तकरीबन बत्तीस तेतीस वर्ष बाद राष्ट्रीय शिक्षा नीति को पुनरीक्षित करने और नवा करने का प्रयास किया गया। इसकी शुरुआत 2015 में हो चुकी थी। अंतिम प्रारूप आने में तकरीबन चार साल लग गए। इसके पीछे कई वज़हें हो सकती हैं। उसमें राजनीति इच्छा शक्ति, योजना-रणनीति का चुस्त न होना आदि। देर आए दूरुस्त आए पर आए तो। मई में राष्ट्रीय शिक्षा नीति का प्रारूप जनता के बीच है। इस प्रारूप में बड़ी ही संजीदगी और शिद्दत से भाषा-बहुभाषा और भाषायी शक्तियों को कैसे स्कूली कक्षाओं तक पहुंच बनाई जाए आदि मसलों पर विमर्श की गई है। दूसरे और तीसरे अध्याय को प्रमुखता से रेखांकित कर सकते हैं। इनमें अध्यायों में ख़ासकर बाल्यावस्था पूर्व देखभाल और शिक्षा पर नीतिपरक बदलावों और स्थापनाओं को रखा गया है। अंग्रेजी में अर्ली चाईल्डवुड केयर एंड एजूकेशन के नाम से जानते हैं। इसे पूर्व में आरटीई एक्ट में शामिल नहीं किया है। इसकी वजह से लाखों बच्चे आयु वर्ग 3 से 6 वर्ष के बच्चे स्कूली शिक्षा और देखभाल के अधिकार से बाहर हैं। इस प्रारूप में प्रस्तावित है कि ईसीसीई को आरटीई एक्ट में संशोधित कर जोड़ा जाए।
बाल्यावस्था में जब बच्चा अपने परिवेश से गहरे जुड़ता है इसमें स्कूल एक प्रमुख अंग है, वहां मातृभाषा/स्थानीय भाषा को जिम्मदारी और जवाबदेही के साथ स्वीकारने की वकालत की गई है। बच्चों को ग्रेड एक बलिक इससे पूर्व से ही मातृभाषा/स्थानीय भाषा में शिक्षा दी जाए पर ख़ासा जोर है। पांचवीं तक आते आते बच्चे में संख्या और वर्ण/ध्वनियों आदि की पहचान हो जाए साथ ही इन भाषाओं में बच्चे बोलने, पढ़ने और स्वयं को अभिव्यक्त करने में दक्ष हो सकें,इसके लिए प्रमुखतः नीति में कई सारी गतिविधियों और रास्ते बताए गए हैं। जब नीति में भाषा-मातृभाषा-स्थानीय भाषा के बाबत सुझाव दिए गए हैं तब वहीं पर इसे बतात नहीं भूला गया है कि कैसे इसे अमल में लाया जाएगा। मसलन कक्षा एक दो में बच्चों को मातृभाषा में बोलने, सुनने और पढ़ने कर दक्षता को बहुतायत मात्रा में अवसर प्रदान किए जाएंगे ताकि बच्चे में बोलने की कला और बोल कर अपने ऑब्जर्वेशन को अभिव्यक्त कर सके इसकी दक्षता विकसित की जा सके। बच्चों को ख़ासकर जो चौथी व पांचवीं में हैं उन्हें लिखने के लिए अतिरिक्त एक घंटा दिया जाना चाहिए। वहीं छोटे बच्चों को भी अपनी मातृभाषा/स्थानीय भाषा में बोलने बतियाने का अवसर मिले। उनकी भाषा-बोली में लिखने वाले कवि, कथाकारों, कलाकारों से मिलने और संवाद करने का अवसर स्कूल प्रदान करेगा। स्कूल में साल भर गणित, भाषा मेला का आयोजन किया जाएगा। इस गतिविधि का मकसद स्पष्ट है कि बच्चां को अपनी भाषा व अन्य भाषा के साहित्यकारों से मिलने और संवाद करने का असवर मिल सके। इससे अपनी भाषा से जुड़ने और लगाव पैदा हो सके आदि उद्देश्य है।
भाषा के शिक्षकों के लिए यह नीति एक ऐसा अवसर प्रदान करने का दावा करती है जिसमें बताया गया है कि आने वाले दिनों, वर्षों में भाषायी शिक्षकों के लिए नौकरियां हजारों और लाखों में सृजित होंगी। उदाहरण के तौर यदि एक शिक्षक अपनी मातृभाषा के साथ एक दूसरी भारतीय भाषा सीखता है तो उसे अपने राज्य में तो नौकरी की संभावनाएं हैं ही साथ दूसरे राज्य में भी शिक्षक का अवसर द्वार खुलते हैं। इस प्रकार से भाषा शिक्षकों को तैयार करने, प्रशिक्षण प्रदान की जिम्मेदारी यह नीति उच्च शिक्षा संस्थानों में भाषा-संकायों के देती है। इन संस्थानों में भाषा-शिक्षकों का प्रशिक्षण होगा और प्रशिक्षण के बाद ये देश के विभिन्न स्कूलों में पदस्थापित हो किए जाएंगे। खा़सकर अध्याय 22 में भारतीय भाषाओं के अध्ययन-अध्यापन को ध्यान में रखा गया है जिसमें कहा गया है कि प्राकृत, पालि, संस्कृत आदि भाषाओं को संरक्षित करने और सुरक्षित करने के लिए विशेष संकायों की स्थापना की जाएगी। इतनी ही बल्कि भारतीय भाषाओं को रोजगारोन्मुख बनाने के लिए भी वकालत की गई है।

Thursday, May 30, 2019

कागा बोली बोले



कौशलेंद्र प्रपन्न
कौवों को लेकर हमारा पूरा आर्ष ग्रंथ भरा हुआ है। लोकचेतना से लेकर दंतकथाएं तक कौवों की बातें, कौवों की कहानी कहती हैं।
कोई इस निगुर्ण को कैसे भूल सकता है, ‘‘कागा सब तन खाइओ, दो नयना मत खाइओ पीया मिलन की आस’’ आबीदा परवीन हों, कुमार गंधर्व हों या फिर अन्य शास्त्रीय गायक सब ने इसे गया है। जब भी इन्हें सुनते हैं वह कौवा याद आ जाता है।
वैसे तो देखने भालने में कोई सुंदर तो होता नहीं है किन्तु यह हमारे घरों के आस-पास ज़रूर सहज उपलब्ध होता है। गांव देहात में यह कथा भी सुनी जाती थी। कि जब सुबह सुबह आंगन में मुंडेर पर बैठ कोई कौवा बोलता था, तो पूछ बैठते थे ‘‘कौन आ रहा है? किसके आने की ख़बर दे रहे हो।’’ तब यही काला बदसूरत माने जाने वाला कौवा एक ख़बरनवीस की तरह होता था। एक डाकिए की भूमिका निभाता था।
अब न आंगन रहे और न मुंडेर। कहां बैठेंगे ये कौवे? बाजे बाजे तो शहर के कौवे बोलना भी नहीं जानते। चुपचाप बिजली की तार पर बैठ जाते हैं या फिर किसी पेड़ की डाल पर बैठे बैठे ताका करते हैं। इन्हें न पानी मयस्सर होता है और खाना। दर ब दर उड़ते रहते हैं।
रामायण में भी इनका जिक्र आता है शायद कागभुसुड़ी के नाम से। वहीं जब भी किसी श्राद्ध के पीड़ की बात आती है तब कौवों को बुलाया जाता है। कहते हैं। जब ये तृप्त हो जाएंगे तो हमारे पुरखों को भी शांति मिलेगी।
पशु पक्षियों से हमारा वास्ता बहुत पुराना रहा है। बल्कि मानव जाति के विकास इतिहास से जुड़ा है। हमें हमारे परिवेश में ज़िंदा जीव जंतुओं को बचाने की भी जिम्मेदारी है। इन्हें बचाएंगे तो शायद पर्यावरण के संतुलन को बना सकेंगे।

Wednesday, May 29, 2019

मिशन मात्रा जी


कौशलेंद्र प्रपन्न
हम सब शिक्षाकर्मी की एक बड़ी चिंता यह होती है कि हमारे बच्चे पढ़ना नहीं जानते। हमारे बच्चों को हिन्दी में ख़ासकर मात्रा लगाने में कठिनाई आती है। यह एक आम एवं ख़ास चिंता है। इस चिंता के साथ हम क्या करते हैं यह महत्वपूर्ण है। अहम तो यह भी है कि बच्चे यदि मात्रा नहीं लगा पाते या उन्हें मात्राओं की समझ नहीं है तो हमारी रणनीति या प्लानिंग क्या हो ताक उन्हें मात्रा में आने वाली दिक्कतों को दूर कर पाएं। वैसे याद हो कि दिल्ली सरकार ने यही कोई दो साल पहले मिशन बुनियाद की शुरुआत की थी। यह मिशन बुनियाद की कक्षाएं मई माह में लगा करती हैं। यूं तो कुछ शिक्षकों के लिए यह अतिरिक्त कार्यभार ही होता है जिन्हें छुट्टियों में भी कक्षाएं लेनी पड़ती हैं। लेकिन उन्हें इस बात खुशी भी होती हो कि उनके अथक प्रयास और बच्चों की लगन देखते हुए बच्चे जब पढ़ने लगते हैं तब उन्हें उतनी थकन न होती हो।
आप किसी भी ऐसी कक्षा में जाकर देखिए सच मानें बच्चे बहुत खुश और प्रसन्नता के साथ पढ़ रहे होते हैं। ऐसी ही एक कक्षा में जाने का मौका इन दिनों मिला। बच्चे ु  ू ि  ी मात्रा लगा कर पढ़ने और लिखने की कोशिश कर रहे थे। शिक्षिका पूरी तल्लीनता के साथ बच्चों को बोर्ड पर शब्दां को लिख और बच्चों से लिखने का काम दे रही थीं। बच्चे उसी उत्साह से नए नए शब्दों बना रहे थे। वे बच्चे एक वर्ण पर मात्राएं लगा कर उन्हें बोल भी रहे थे।
मैंने उनके कहा ‘‘चिड़िया नदी किनारे एक पेड़ पर बैठी थी। क्या कर रही होगी?’’
बच्चों ने जवाब दिया ‘‘वो अपने बच्चों के लिए घर बना रही होगी।’’
‘‘घर वो किन चीजों से बनाती है?’’ मैंने पूछा ‘‘ क्या वो ईट भट्ठे से ईट लाती होगी? क्या वो लकड़ी लकड़ी टाल जाकर लाती होगी?’’
बच्चों ने मना कर दिया। बच्चों ने कहा ‘‘वो मैदान में या खेत में जाकर बाहर से तिनके, घास, रस्सी लाती है। उससे वो घोसला बनाती है।’’
यह संवाद चल ही रहे थे। बीच में मैंने कहा वो जो चिड़िया है उसे लिखना नहीं आता। क्या कोई उस चिड़िया जी की मदद करेगा कि वो लिख कर अपनी बात आप सभी को समझा पाए।
इस कक्षा में उपस्थित तकरीबन चार पांच बच्चियों सामने आने लगीं। उन्होंने लिखने की कोशिश। कुछ ने बिल्कुल सही सही लिखा। हां दो बच्चियां ऐसी थीं जिन्होंने सच्ची को सची लिखा। चोच में चौच लिखा लेकिन जैसे ही इन दोनों से लिखा वैसे ही बाकी कक्षा की बच्चियों ने उसे सुधारने के लिए कहा। और बच्ची बोर्ड के सामने आकर उसे ठीक कर लिख गई। लिखने में प्रति बच्चों में काफी उत्साह देखने को मिला। बल्कि न केवल लिखने के प्रति बल्कि लिखे हुए शब्द को पढ़ने में भी उन्हें आनंद आ रहा था।
लिखते रहे और कहानियां बनाते रहे। इसमें बच्चों की सहभागिता ख़ासा अहम रही। हमने एक शब्द चुना कि आप सभी किस नदी के किनारे रहते हैं। दिल्ली किस नदी के किनारे है। बच्चों ने पहले जमुना कहा फिर सुधार कर यमुना जवाब दिया। फिर हमने इसे कहा ‘‘ चिड़िया को बोलना नहीं आता। कैसे बोले वो यमुना बोले कि जमुना बोले? इस पर बच्चों ने ही जवाब दिया यमुना ठीक रहेगा। तो कहानी आगे बढ़ी ‘‘एक चिड़िया यमुना किनारे के एक पेड़ पर बैठी थी। उस पेड़ पर उसने घोसला बनाना चाहा। इसके लिए उसे कुछ सामान की ज़रूरत थी। वो उड़कर पास के खेत और मैदान में गई वहां से तिनके, घास, पेड़ की टहनी आदि लेकर आई। और उसने अपने छोटे छोटे बच्चों के लिए एक घोसला बनाया।’’
बच्चे इस कहानी को बुनने में अपनी पूरी कल्पना शक्ति का प्रयोग कर रहे थे। बीच बीच में मैं उन्हें सिर्फ सोचने में मदद कर रहा था। बाकी पूरी कहानी उन्हीं की थी। मेरी एक और कोशिश यह थी कि बच्चे जो बोल रहे हैं उसे लिखने और पढ़ने की भी कोशिश करें। इस कहानी में आए नदी, पेड़, तिनाक, घर आदि शब्दों में कहां कहां छोटी और बड़ी मात्राएं लगी हैं उन्हें कैसे बोलेंगे और उन्हें कैसे लिखेंगे इसका अभ्यास भी कराता जा रहा था। बच्चों ज़रा भी यह एहसास नहीं हुआ कि कोई उनके बीच आया और मात्राएं सीखा गया। बच्चों मुंह की आकृति बनाने बिगाड़ने में खूब आनंद उठा रहे थे। कैसे छोटी मात्रा लगाने पर मुंह थोड़ खुलेगा और कम समय लगेगा और बड़ी मात्रा में मुंह ज्यादा खुलेगा और समय भी अधिक लगेगा इस प्रक्रिया के दौरान बच्चों को ख़ासा मजा आया।
शायद इसे ही बड़े बड़े शिक्षाविदों ने खेल खेल में शिक्षा का नाम दिया होगा। इस भाषायी शिक्षण में पता ही नहीं चला कि कब आधा घंटा गुज़र गया और बच्चों को छह मात्राएं यूं ही कहानी के ज़रिए सीखाने का प्रयास किया। लेकिन बच्चे तो बच्चे होते हैं उन्हें एक जुड़ाव सा हो गया। उन्होंने आग्रह किया बल्कि दुबारा आने के लिए जोर दिया कि कल भी आईए। यह तो मालूम नहीं कि कल जा सकूंगा कि नहीं किन्तु आज को जीया और जीने का भरपूर आनंद बच्चों को दिया। एक पारंपरिक कक्षा में भाषा शिक्षण से हट कर उन्हें भी मजा आया और जिन मात्राओं ने उन्हें परेशान कर रखा था वो भी दूर हो गया।
जब भी कोई बच्ची या बच्चा बहुत तेज बोलता या मैं मैं बोलूंगी की आवाज़ बहुत तेज रखता तो मेरा बस इतना कहना था ‘‘ मात्रा रूठ जाएगी’’ मात्रा को तेज आवाज और बहुत सी आवाज पसंद नहीं है। यदि आपको कुछ कहना है तो मात्रा बहन को धीरे से कहो। प्यार से कहो। जब मैंने कहा मात्रा जी या मात्रा बहन जी तो बच्चों की आंखें चमक उठीं। उन्होंने कहा मात्रा जीम ात्रा बहन जी!!! ये क्या? तब मैंने कहा हर मात्रा और हर आवाज़। बल्कि हर शब्द और हर व्यक्ति अपने लिए सम्मान चाहता है इसलिए मात्रा को भी जी लगा कर बोलोगे तो उसे अच्छा लगेगा। जैसे आपलोग मैडम जी बोलते हैं। तब उनकी भी इस बात में सहमति बन गई।

Tuesday, May 28, 2019

बच्चों के सवालः बड़े बेहाल


कौशलेंद्र प्रपन्न
पांच या छह वर्षीय बच्चे सवाल नहीं बल्कि अपने मन की बात किया करते हैं। उनके मन में जो उलझनें हैं उसका समाधान हम वयस्कों की दुनिया से मांगते हैं। हम उनके सवालों के साथ कैसा बरताव करते हैं यह हम पर निर्भर करता है कि हम उन्हें उनके सवालों के साथ एक गुत्थी के साथ छोड़ देते हैं या फिर समाधान की ओर ले जाते हैं। छोटे से छोटा बच्चा भी अपने परिवेश से प्रभावित होता है। इस परिवेश में वे वयस्क भी हैं जो भेदभाव, पूर्वग्रह, जाति-धर्म आदि जैसे वयस्कों की राजनीति भी शामिल है। इन राजनीति से बच्चे कैसे अलग रह सकते हैं। क्योंकि बच्चे किसी आकाश में पल-बढ़ नहीं रहे होते हैं। बल्कि इस क्रूर और कठोर समाज में जीया करते हैं। वह चाहे स्कूल जाते वक़्त बच्चों का समाज हो या फिर पार्क में खेलते हुए अंकल से मिला करता है। हमारा बच्चा समाज में जिन जिन से मिलता है, बातें करता है, वे तमाम लोग हमारे बच्चे की वैचारिक, भौगालिक, सांस्कृतिक समझ को कहीं न कहीं गढ़ने का काम करते हैं। यह सवाल ही लीजिए पुलवामा घटना के बाद मेरे के मित्र के छह वर्षीय बच्चे से बच्चों ने पूछा ‘‘तू मुसलमान है?’’ ’’तूझे तो पाकिस्तान चले जाना चाहिए।’’ वह बच्चा न तो ऐसे सवालों से कभी पूर्व में रू ब रू हो चुका है और न ही ऐसे सवालों के क्या जवाब देने हैं इसके लिए तैयार होता है। जब हम बड़े ऐसे सवालों के लिए तैयार नहीं होते तो वे तो आख़िर बच्चे हैं। लेकिन जो बड़ां की दुनिया में घट रही होती हैं उसकी छोटी ही सही किन्तु एक छटा व छाया बच्चों की दुनिया पर भी पड़ती है। इससे हमें बड़ी सावधानी से निपटना होता है। उस बच्चे के पिता के लिए यह सवाल से ज्यादा अपने और अपनी कौम के अस्तित्व पर सवाल था। जिसने पूरी जिं़दगी, पूरी पीढ़ी इसी जमीन पर गुजारी। पूरी शिद्दत से जिनकी पीढ़ियों ने लोकतंत्र में अपनी भूमिका निभाई। अचानक उनसे या उनके बच्चों को कोई कहें कि तू पाकिस्तान क्यों नहीं चला जाता तो उस बच्चे या वयस्क के लिए कितनी पीड़ादायक होती होगी इसका महज अनुमान भर लगाया जा सकता है।
पुलवामा की घटना हो या फिर बाबरी मस्जिद की घटना, या फिर जब भी दो देशों के बीच तनाव के माहौल पैदा हुए हैं तब तब ऐसे सवालों बार बार विभिन्न कोनों से उठने लगते हैं। यह सवाल नहीं बल्कि हमारी मनोजगत् और हमारी समाजो-मनोविज्ञान के भूगोल का परिचय देता है। साथ ही हमारी स्कूलिंग और सोशलाइजेशन कहां और किस स्कूल में हुआ है उसका सवाल खड़े करते हैं। हमारी स्वयं की प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्कूलिंग कहां और किस प्रकार हुए हैं यह ख़ासा अहम हैं। यह जीवन भी हमारे विचारों को आकार दिया करते हैं। वापस उस बच्चे के सवाल पर लौटते हैं। पापा हम क्या मुसलमान हैं? हमें पाकिस्तान क्यों जाना चाहिए। हमारी तो दादी, नानी सब यहीं हैं। बच्चे ऐसा क्यों बोलते हैं? आदि आदि। ये कौन लोग हैं या कौन सी विचारधारा है जो कोमल मनों में इस प्रकार की फांक पैदा करन पर आमादा हैं। हमें अपने बच्चों के इन सवालों से काफी संभल कर जवाब देने होंगे। बल्कि यही बच्चे जब बड़े होंगे तो संभव है इस किस्म के सवालों की कड़ी तब भी अटूट इन तक आ जाए। फिर वे अपने बच्चों के सवालों के साथ कैसे न्याय कर पाएं।
ऐसा क्या है इन सवालों में? वो क्या चीज है जो बार बार कुछ अंतराल के बाद अपना सिर उठाया करते हैं? हमें इन सवालों के मनोविज्ञान और समाज विज्ञान को समझना होगा। इन सवालों के पीछे हमारा खु़द का डर झलकता है। हम इन सवालों के ज़रिए कहीं न कहीं अपने मन में गहरे पैठे भय को ही निकाला करते हैं। साथ इस भय के मनोविज्ञान को समझकर दूर करने की बजाए उसे पालने में विश्वास करते हैं। दूसरी बात यह भी सच है कि हम यदि विवेकवान होते तो ऐसे सवालों की प्रकृति को समझते हुए अपने स्तर पर ही इनके समाधान तलाश कर खत्म कर चुके होते। किन्तु होता इससे उलट है। हम अपना विवेक नहीं लगाते बल्कि लगाना नहीं चाहते या फिर जो मंज़र दिखाए गए उसे ही सच मान कर एक पूर्वग्रह बना लेते हैं। बिना इतिहास, मनोविज्ञान का इस्तमाल किए जो भी छवि दिखाई या पेश की गई उसे ही अंतिम सच के तौर पर स्वीकार कर लेते हैं। बल्कि इससे एक कदम आगे बढ़कर अपनी ही पूर्वग्रहों को आगे सरका दिया करते हैं। और इस तरह से कड़ी टूटने की बजाए और मजबूत होती जाती है। इतिहास तो प्रत्यक्ष है ही कि हमने एक ख़ास कौ़म को आज़ाद के वक़्त जिम्मेदार ठहराया। जो सच्चाई एक दल या पार्टी ने हमारे सामने पेश किया उसे मान कर दूसरे पहलू को देखने और समझने की भी कोशिश नहीं की। जबकि विश्व का मानव विकास इतिहास हमारे सामने है कि कोई भी राष्ट्र किसी ख़ास कौ़म या जाति को किसी भी एक घटना का पूरा दारोमदार नहीं मान सकता।
हमने शुरू की थी उस बच्चे के सवाल से जिसने अपने पापा से पूछा था ‘‘क्या हम मुसलमान हैं? ये मुसलमान क्या होता है?’’
उसके पिता ने बताया कि इस बच्चे का बचपन लुधियाना में बीता जहां यह स्कूल जाया करता था वहां वह अरदास में भी शामिल होता था। स्वर्ण मंदिर में भी मत्था टेका। जहां अब रहा करता है दूसरे माले पर गणेश पूजा में शामिल हेता है। वहीं जब पास में जागरण होता है तो पूरी शिद्दत से पूरी रात जगा रहता है। कभी इसे इसका इल्म तक नहीं हुआ कि हम मुसलमान हैं। मुसलमान कोई अनोखी या अगल कौ़म होती है इसकी जानकारी तक नहीं है। इसे क्या बताएं कि मुसलमान क्या है और कौन होते हैं? कितना कठिन दौर जब तीन चार और इससे भी ज्यादा पीढ़ियां जहां रही हों अचानक रातों रात पाकिस्तान भेजने की ज़िद्द के आगे स्वयं शर्मिदा हो रहे हों। आख़िर क्यों जाएं पाकिस्तान या अपने मुसलमान होने पर उन्हें क्योंकर अफ्सोस या छुपाने की नौबत आए। सोचना तो उन्हें चाहिए जो इस प्रकार के सवालों को पैदा किया करते हैं।

Monday, May 27, 2019

पढ़ने का धैर्य




कौशलेंद्र प्रपन्न
शायद दुनिया में यदि कोई कठिन और श्रमसाध्य कार्य है तो वह पढ़ना ही है। कोई भी पढ़ना नहीं चाहता। हर कोई पढ़ाना चाहता है। हर कोई लिखना चाहता है। और हर कोई कहना भरपूर चाहता है लेकिन पढ़ना नहीं चाहता। वह चाहे किसी भी पेशे में क्यों न हो। उस पर यदि कोई शिक्षण पेशे से आता है तो उसे भी इस बात की ज्यादा होती है कि वह बच्चों को पढ़ाना सीखा दे। बच्चे लिखना शुरू करें। शिक्षकों की बड़ी गंभीर चिंता यह होती है कि उसके बच्चे लिखना और पढ़ना नहीं जानते और न ही चाहते हैं। कभी इन सवालों का चेहरा शिक्षकों की ओर मोड़ दें। क्या देखेंगेघ् देखेंगे कि शिक्षक स्वयं पढ़ने की प्रक्रिया से दूर रहना चाहता है। वह स्वयं पढ़ात हुआ कम ही दिखाई देता है। बच्चे अपने समाज में किसे पढ़ते हुए देखते हैं। हमारे बच्चे अपने दादा जीए कभी कभार पापा या मम्मी को किताबें उलटते पलटते देख पाते हैं। वो भी तब जब उनके घर में मम्मी पापा पढ़ने.पढ़ाने से जुड़े हों। वरना घर में हर आधुनिक सामान होता हैं यदि नहीं होतीं तो किताबें ही हमारे घरां में नहीं होतीं। ऐसे में हमारे बच्चे तो बच्चे बड़ों में भी पढ़ने का धैर्य कम होता है।
किसी से भी यह सवाल पूछ लीजिए क्या आप पढ़ते हैंघ् पढ़ते हैं तो क्या पढ़ते हैंघ् जैसे जैसे इस सवाल की गहराई में उतरेंगे वैसे वैसे ऐसे ऐसे उत्तर मिलेंगे जिसे सुनकर ताज्जुब होना लाजमी है कि हम पढ़ते ही नहीं हैं। अपने पास के स्मार्ट फोन पर सिर्फ सूचनाओं और ख़बरों को सरका कर देख लिया करते हैं। कई बार देखकर आगे खिसका देते हैं। कुछ लोग इसे ही पढ़ना मान लेते हैं। कुछ यह भी कहते हुए मिलेंगे कि मैं तो अपने फोन पर ही पूरा की पूरी किताबए ख़बरेंए डॉक्यूमेंट पढ़ता हूं। हालांकि यह भी पढ़ना ही है। इससे इंकार नहीं कर सकते। क्योंकि जैसे जैसे पेपर लेस सोसायटी की बुनियाद रखी है वैसे वैसे किताबें छप तो रही हैं साथ ही उनका डिजिटल रूप भी वेबकास्ट किया जाता है। यानी जो किताबें कागजों पर छपी हैं वैसे ही उस किताब को सॉफ्ट वेयर के ज़रिए डिजिटल फॉम में छापते हैं। यही कारण है कि आज देश भर में ऐसे पाठकों की संख्या लाखों में है जो डिजिटल कंटेंट यानी अख़बारए पत्रिकाएंए किताबें एवं रिपोर्ट आदि पढ़ते हैं। डिजिटल फॉम में छपने वेबकास्ट होनी वाली किताबें मुद्रित किताबों के लिए चुनौतियां पैदा करती हैं। लेकिन फिर भी डिजिटल फॉम के बरक्स मुद्रित किताबें भी खूब पढ़ी और लिखी जा रही हैं। लिखने के पेशे में आने वाले युवा लेखक दरअसल प्राचीन लेखकीय स्कूलों के एक कदम आगे से सीख कर आ रहे हैं। युवा लेखक कागजों पर नोट्स बनाने की बजाए सीधे सीधे लॉपटॉप पर काम किया करते हैं। अपने लैपटॉप पर ही पूरी किताब लिख दिया करते हैं। वही कॉपी व फाइल जितनी बार एडिट करना चाहे कर सकते हैं। फाइनल कॉपी किसी दूसरे व्यक्ति को समीक्षा के लिए भेज देते हैं। रीव्यू करने वाले के कमेंट को देख कर अपनी फाइल को दुरुस्त कर देते हैं। किताब लिखनेए अख़बार छापने के काम को इस डिजिटल तकनीक ने आसान कर दिया। हालांकि एक सवाल यहां यह उठा सकते हैं कि क्या डिजिटल किताबों ने पढ़ने की संख्या को भी क्या आसान किया। संभव है कि जिस रफ्तार से लिखी जा रही हैं उस रफ्तार से पढ़ने वालों की दिलचस्पी नहीं बढ़ी।
पढ़ने की तालीम हमारी मुख्य शिक्षा से हाशिए पर जा चुकी हैं। यही वज़ह है कि तकरीबन तिरपन फीसदी बच्चे दूसरी कक्षा के पाठ को पढ़ने में सक्षम नहीं हैं। यह आंकड़े मानव संसाधन विकास मंत्रालय के हालिया रिपोर्ट में दर्ज़ की गई हैं। इस रिपोर्ट के एत्तर भी अन्य अध्ययन की रिपोर्ट भी हमें बताती हैं कि हमारे बच्चे कक्षा पांचवीं या छह में पढ़ने वाले भी अपनी कक्षानुसार हिन्दी नहीं पढ़ पाते। क्यों नहीं पढ़ पाते यह सवाल हमें नहीं कोचते। इसलिए यह स्थिति बनी हुई है। हमारी शिक्षा और सीखने.सिखाने की प्रक्रिया में पढ़ने पर ज्यादा जोर नहीं देते बल्कि बच्चों को लिखना आ जाए यह अपेक्षा ज्यादा मजबूत होती है। बच्चे पढ़ें कैसेघ् क्या पढ़ें और क्यां पढ़ें इन सवालों को चिंता की परिधि में लाना होगा। पढ़ना एक कला है तो इसे सीख और सिखा भी सकते हैं। लेकिन दुर्भाग्य है कि हमारे शिक्षक भी पढ़ने की बारीकि से वाकिफ नहीं हैंं। पढ़ा कैसे जाए और पढ़ने के विभिन्न चरण क्या हों आदि। बच्चे क्या और कैसे पढ़ते हैं इस पैटर्न को भी समझना होगा। यदि आयु और कक्षा स्तरानुसार कंटेंट मुहैया नहीं कराएंगे तो शायद बच्चा पढ़ने से दूर जाने लगे। यदि बच्चे को वर्णए शब्द आदि की पहचान है यदि वह वाक्य तक की यात्रा का आनंद ले सकता है तो वह किसी भी किस्म के टेक्स्ट पढ़ सकता है। यहां तक कि बच्चा अपने पाठ्यपुस्तक के अलावा भी मांग और तलाश कर पढ़ने लगता है। यदि अपना बचपन याद करें तो हम आसानी से पढ़ने के धैर्य और उतावलेपन को समझ और महसूस कर सकते हैं। गर्मी की छृट्टियों में चाचा चौधरीए शॉबूए डॉयमंड कॉमिक्स बुक्स आदि छीन झपट कर एक दिन में दो तीन किताबें पढ़ जाया करते थे। शायद यहां पढ़ने पर पाबंदी नहीं थी। बल्कि कई बार घरों में बड़ों से प्रोत्साहन भी मिला करता था कि जो जितनी ज्यादा किताबें पढ़ेगा उसे उतनी चवन्नी मिलेगी। और हम चवन्नियों की लालच में भर भर गरमी पत्रिकाएं पढ़ जाते थे। मुख्य बात यही है कि यदि हम अपने बच्चों में पढ़ने के प्रति ललक और उत्साह पैदा कर सके तो पढ़ने का धैर्य भी समय के साथ पैदा हो जाएगा।
न शिक्षा में और न पढ़ने में धैर्य जैसी बात रह गई है। हम हमेशा रफ्तार में होते हैं। हमें बहुत जल्द परिणाम चाहिए होता है जिसे लर्निंग आउट कम के नाम से जानते हैं। लर्निंग आउटकम के अनुसार स्तरानुसार बच्चों में भाषाए गणितए विज्ञान आदि विषयों में बच्चे किस कक्षा में किस स्तर की भाषा कौशल सीख ले इसकी मैपिंग और इंडिकेटर एनसीईआरटी की ओर बनाई जा चुकी है। इसके किस चरण में हमारा बच्चा कहां है यह तय करता है कि हमारे बच्चे भाषा के किस कौशल में कहां ठहरते हैं। हम सभी को इस प्रकार के इंडिकेटर हमें ताकीद करती हैं कि हम भाषा के किस कौशल पर और कितना धैर्यपूर्वक काम करने की आवश्यकता है।
पढ़ने की धारणा पर जब गंभीरता से मंथन करते हैं तो पाते हैं कि हम देखने को भी पढ़ना मान बैठते हैं। मसलन देखा नहीं। यहां यह स्पष्ट है कि वो कहना चाह रहे हैं कि जो भी आपने भेजा व किताब थी उसे उन्होंने अभी पढ़ा नहीं है। बल्कि महज देखा भर है। ठीक उसी प्रकार पढ़ना और अध्ययन में भी बुनियादी अंतर है। इस अंतर को समझना होगा। जब हम पढ़ना कहते हैं तो संभव है उसमें अध्ययन की ख़ासियत कम हो। सिर्फ हम लिखने हुए शब्दों, वाक्यों भर का पढ़कर समझने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन जब हम कहते हैं अध्ययन कर रहा हूं तब उसमें सिर्फ पढ़ना भर ही शामिल नहीं होता बल्कि पढ़ने से एक कदम आगे बढ़कर चिंतन-मनन और बहुआयामी अर्थों का गहन िंचत शामिल होता है। आज की तारीख में पढ़ने की कला शायद उन तमाम लोगों के पास हैं जिन्होंने दसवीं बारहवीं की है। किन्त यह कहना सरलीकरण होगा कि उन्हें अध्ययन भी करना आता है। सामान्य बोलचाल में भी हम कह देते हैं मैं इनदिनों फलां पुस्तक का अध्ययन कर रहा हूं। यानी वो सामान्य पढ़ भर नहीं रहे हैं।
पढ़ना और अध्ययन दोनों ही क्रियाएं गंभीरता और धैर्य की मांग की करती हैं। अफ्सोस कि आज हमारे पास धैर्य की कमी है। न हम पढ़ना चाहते हैं और न अध्ययन। यही दो क्रियाएं शिक्षा में इन दिनों कम होती जा रही हैं। पढ़ने और अध्ययन करने वाले कम होते जा रहे हैं। यदि हमारा शिक्षक स्वयं पढ़ता हुआ या अध्ययन से जुड़ा नहीं है तो वह शिक्षा जगत में होने वाले नावचारों और अध्ययनों से परिचित नहीं हो पाएगा। एक बार जब वह अध्ययन से दूर चला जाता है तब वह अपनी पूर्व की पठित सामग्रियों के आधार पर ही शिक्षण करता है। पढ़ाने के लिए पढ़ना भी उतना ही ज़रूरी है जितना खाना पकाने से पूर्व की तैयारी।

Tuesday, May 14, 2019

शिक्षा को गढ़ती राजनीति


कौशलेंद्र प्रपन्न

राजनीति आकाश में न तो निर्मित होती है और न ही समाजेत्तर इसका अनुकरण होता है। राजनीति दरअसल समाज और राष्ट्र का नई दिशा प्रदान करने की ताकत से लबरेज़ होती है। मानव विकास के इतिहास और भूगोल को देखें या फिर अर्थशास्त्र या फिर समाज-संस्कृति को उक्त महत्वपूर्ण आयामों को आकार देने में राजनीति की भूमिका निर्विवादतौर पर अहम रही है। राजनीति ने ही समाज के विकास और विस्थापन की स्थितियां भी पैदा की हैं। क्या इस तथ्य से मुंह मोड़ सकते हैं कि राजनीति ही थी जिसने 1947 के विश्व के इतिहास में दर्ज़ सबसे बड़ी तकसीम का अंजाम दिया। कई बार लगता है राजनीति ने शिक्षा को भी कहीं न कहीं प्रभावित करती रही है। आज़ादी से पूर्व और आज़ादी के बाद की शिक्षा नीतियों और राजनीति ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति और दिशा को तय करने में ख़ासा अहम भूमिका अदा की हैं। वह चाहे माध्यमिक शिक्षा समिति हो, कोठारी कमिशन हो, राष्ट्रीय शिक्षा नीति हो, या फिर 1977, 1985,1988, 2000 या फिर 2005 की राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा ही क्यों न हो इन तमाम समितियों, नीतियों के निर्धारण में राजनीति ने अपने छाप छोड़े हैं। दूसरे शब्दां कहें तो शिक्षा में राजनीतिक हस्तक्षेप को नजरअंदाज नहीं कर सकते। प्रकारांतर से राजनीति की दिशा तय करने में व्यक्ति की प्रमुखता भी रेखांकित की जाती रही है। जो भी व्यक्ति सत्ता में आया वह अपने राजनीतिक स्थापनाओं, मान्याओं को शिक्षा की काया में समाहित करने की पुरजोर कोशिश है। इसी का परिणाम है कि शिक्षा में जाने अनजाने वैसे कंटेंट भी शामिल किए गए जो अपने आप में विवादां को जन्म देने वाले थे। किन्तु क्योंकि सत्ता चाहती थी इसलिए उन्हें पाठ्यपुस्तकों का हिस्सा बनाया गया। मिसाल के तौर पर शंगूर आंदोलन को वर्तमान सरकार पाठ्यपुस्तकों में शामिल कर चुकी है। वहीं दूसरी राजनेता ने अपनी आत्मकथा बच्चों के बस्ते में ठूंस दिया। वह दीगर बात है कि वह आत्मकथा क्या कंटेंट के लिहाज से समीक्षित की गई। किस विद्वत् मंडल ने समीक्षा कर अपनी रिपोर्ट सौंपी की यह आत्मकथा पढ़ने-पढ़ाने योग्य है आदि। इस प्रकार राजनीति व्यक्तियों की आत्मकथाएं पाठ्यपुस्तकों में पहले भी शामिल की जाती रही हैं किन्तु उसका अपना ऐतिहासिक और राजनैतिक विकास यात्रा को समझने के औजार के तौर पर जांचा परखा गया और तब शामिल किया गया। यदि पत्रों की बात बात करें तो नेहरू के ख़तों को बतौर पाठ्य सामग्री में शामिल किया गया है इसे पढ़ते-पढ़ाते हुए कई पीढ़ी बड़ी हुई है। राजनैतिक व्यक्तियों की जीवनियां भी शामिल की गईं जिनमें राजेंद्र प्रसाद, लाल बहादुर शास्त्री, गांधीजी, नेहरू, अब्दुल कलाम आदि। इनकी जीवनियों, संघर्षां से गुजरते हुए कहीं न कहीं हमारे बच्चों को जीवन-संघर्षों की एक झांकी तो मिलती ही है साथ ही भविष्य की रणनीति बनाने में भी मदद मिलती है।
शिक्षा न केवल समाज, बल्कि समाज से जुड़ी हर चीज को आकार दिया करती है। इसे स्वीकारने में ज़़रा भी गुरेज़ नहीं होनी चाहिए कि इस शिक्षा को गढ़ने, आकार देने में राजनीतिक इच्छा शक्ति और पार्टी की बड़ी भूमिका होती है। बल्कि राजनीति शिक्षा की पूरी कुंडली लिखती है। जब जब जो भी सत्ता में आया उसने अपने तई शिक्षा के वर्तमान और भविष्य की रूपरेखा लिखने में पीछे नहीं रहा। एक लंबा इतिहास है जब राजनीति ने शिक्षा की दिशा और दशा को ही मोड़ दिया। ज़्यादा पीछे इतिहास में न भी जाएं तो एक बड़ी राजनीतिक इच्छा शक्ति और राजनीतिक हस्तक्षेप को यहां उदाहरण के तौर पर पेश कर सकते हैं। सन् 2014 में सत्ता में आते ही वर्तमान केंद्र सरकार ने घोषणा की थी कि आगामी एक या दो साल भी अंदर नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति लाएगी। हालांकि यह भी राजनैतिक सच है कि हम हर पांच साल बाद लोकसभा चुनाव में व्यस्त होते हैं। इस व्यस्तता में हम भूल जाते हैं कि हमने पिछली बार क्या क्या घोषणाएं की थीं। उन घोषणाओं के साथ क्या किया यह किसी से भी छूपी नहीं है। सरकार आई और अब नई सरकार गठन का वक़्त भी सिर पर है, लेकिन शिक्षा नीति मालूम नहीं कहां है। जो भी नई सरकार आएगी वह फिर शुरू से इस नीति पर काम करेगी। इस पांच वर्ष में जितने लाभ हासिल करने वाले बच्चे थे वे पांचवीं पास कर छठी कक्षा में और बारहवीं पास कर कॉलेज में चले जाएंगे। कॉलेज से निकल कर जॉब की तलाश में जुट जाएंगे। सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ा कि जो नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति आनी थी उसके न आने से किन किन को किस प्रकार की क्षति हुई होगी। यह तो एक ताजा तरीन राजनीतिक घटना है। इसके अलावा समय समय पर इससे भी बड़ी घटनाएं शिक्षा जगत में घटती रहती हैं। इस ओर न तो सरकार, न राजनीतिक दलों और न नागर समाज के पेशानी पर बल पड़ता है। अपने अपने कार्यकाल संपन्न कर वे तो चले जाते हैं किन्तु पीछे एक बड़ा सवाल ज़रूर छोड़ जाते हैं कि शिक्षा की दशा और दिशा तय करने वाले किस कदर अगंभीर हैं।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति निर्माण का मसला हो या फिर राष्ट्रीय पाठ्यचर्या निर्माण, पाठ्यपुस्तक निर्माण आदि के साथ भी जिस प्रकार की गंभीरता की मांग होती है उसके साथ राजनीतिक शक्तियां अपना दल बल इस्तमाल किया करतीं हैं। वह चाहे 2000 से पूर्व की राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा हो या फिर उसके बाद की इस दस्तावेजों में भी सत्तारूढ़ पार्टियों ने अपनी दूरगामी वैचारिक पूर्वग्रहों को पीरोने में कोई भी कसर नहीं छोड़ी। यही हालत पाठ्यपुस्तक निर्माण में भी देख सकते हैं। समय समय पर वर्तमान राजनीतिक व्यक्ति को पाठ्यपुस्तकों को शामिल करना, पूर्व के पाठों को हटाने का खेल भी खूब खेला गया है। गौरतलब है कि 2000-2002 में  फलां पृष्ठ को हटाया गया ढिमका पृष्ठ को न पढ़ाने के फरमान जारी किए गए। इन विवादों में कई बार उच्च न्यायालय को हस्तक्षेप करने पड़े यह दौर है 2002 का। वर्तमान सरकारें चाहे वो केंद्र की हो या फिर राज्य की अपनी अपनी राजनीति उपलब्धि को बच्चों की पाठ्यपुस्तकों ठूंस दिया गया। इसमें बंगाल, राजस्थान, बिहार आदि राज्य सरकारें शामिल हैं। सरकारें कैसे भूल जाती हैं कि सरकारें आती जाती हैं किन्तु पाठ्यपुस्तकें कम से कम पांच दस और पंद्रह साल तक चला करती हैं। इन्हें पढ़कर लाखों बच्चे युवा और प्रौढ़ बन कर समाज में विभिन्न सेवाओं में आते हैं। वे उन्हीं वैचारिक पूर्वग्रहों को अग्रसारित करने में जुट जाते हैं। जबकि शिक्षा वैज्ञानिक सोच और विवेक निर्माण की वकालत करती है। बच्चों में वैचारिक और बौद्धिक विकास में शिक्षा की अहम भूमिका को कदापि नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते।
आज़ादी पूर्व के इतिहास में झांकें तो पाएंगे कि शिक्षा और शिक्षकों की भूमिका और ताकत को हमेशा ही राजनीतिक धड़ों ने अपने हाथों में रखा और उसे अपने स्वार्थ साधक के तौर पर इस्तमाल किया। शिक्षकों की अस्मिता को कमतर करने में भी तत्कालीन सत्ताधारियों ने कोई उठा नहीं रखी। शिक्षकों को नौकरी और वेतनभोगी बनाने के लेकर उन्हें समाज के उस वर्ग में शामिल करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जहां शिक्षक वेतनभोगी होते ही समाज के अन्य वर्गां के विश्वास खोता रहा। विभिन्न शैक्षणिक समितियों ने शिक्षा की दिशा तय की हो या न की हो लेकिन यदि उनकी सिफारिशों पर नजर दौड़ाएं तो पाएंगे कि नीति, मूल्य, आदर्श की जमीन पर बहुत पुख्ता थीं। यह दीगर बात है कि उन्हें कभी भी अमल में नहीं लाया गया। कोठारी कमिटी की सिफारिशों को ही ले लें। हम आज भी कोठारी आयोग की सिफारिशों की दुहाई दिया करते हैं। वह चाहे बजट को लेकर हो, निकट स्कूल व्यवस्था की हो या फिर शिक्षकःबच्चे अनुपात से संबंधित। हमारी सरकारें सिर्फ इन सिफारिशों के साथ मजाक ही करती रहीं। वहीं 1985-88 पुनरीक्षित राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा बड़ी ही शिद्दत से पूर्व प्राथमिक से लेकर प्राथमिक और उच्च प्राथमिक, माध्यमिक आदि शिक्षा में कला शिक्षा को शामिल करती है। यह दस्तावेज़ मानती है और सिफारिश करती है कि कला की शिक्षा के द्वारा अन्य विषयों को पढ़ाया जाए। दूसरे शब्दों में कहें तो कला की शिक्षा को अन्य विषयों में पीरोया जाए ताकि कला अलग से पढ़ाने की आवश्यकता ही न पड़े। किन्तु हमने इसे कभी तवज्जो ही नहीं दिया। इसके पीछे के कारणों की परतें खोलें तो पाएंगे कि वह कहीं न कहीं राजनीतिक इच्छा शक्ति की कमी रही है।
तब की वर्तमान सरकार ही हैं जिसने वैश्विक उदारीकरण और वैश्विक बाजार के लिए शिक्षा के दरवाजे खोले गए थे। तब के शिक्षाविदों, शिक्षाकर्मियों ने कोई ख़ास और सशक्त विरोध नहीं किए। पूरा का पूरा विश्वविद्यालय, शिक्षायी नागर समाज मौन था। यही वो प्रस्थान बिंदु हैं जहां से 1986-88 के आस-पास भारतीय शिक्षा में बाजार और वैश्विक बैंकों के लिए ख़ासकर शिक्षा की दहलीज़ सौंपी गई थी। इस ऐतिहासिक घटना पर तत्कालीन अकादमिक महकमा, कॉलेज, विश्वविद्यालय आदि मौन साधे बैठे थे। तब क्या अनुमान लगा सकते थे कि हमारी सरकारी शिक्षा के समक्ष एक समानांतर शिक्षा संस्थानों की दुकानें खुल जाएंगी जहां आम परिवार का बच्चा प्रवेश करने की सोच भी नहीं सकता। जहां एक ओर बी एड सरकारी संस्थानों में बामुश्किलन 5 से दस हजार में हो किए जा सकते हैं वहीं निजी संस्थानों में छात्रों को अस्सी से नब्बे हजार खर्च करने पड़ते हैं। यह तो एक कोर्स का उदाहरण है पूरे भारतवर्ष के विभिन्न शैक्षणिक कोर्स की फीस पर नजर डालें तो स्थितियां एक के बाद बदत्तर ही मिलेंगी। जहां सामान्य बीए करने के लिए केंद्रीय विश्वविद्यालयों में हजारों में फीस है वहीं निजी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में लाख के पार फीस चली जाती है। ऐसे में जो समर्थ अभिभावक हैं वो तो अपने बच्चों को तथाकथित गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान कर पाते हैं बाकी सब इत्यादि में शामिल हो जाते हैं।
नब्बे के आस- पास ही तदर्थ और अतिथि शिक्षकों के द्वारा प्राथमिक उच्च प्राथमिक आदि स्कूलों में सेवाएं लेने की शुरुआत हुई। यह एक तय समय सीम के लिए विकल्प सुझाए गए थे। लेकिन हमने तो विकल्प को ही प्रमुख मान लिया। आज की तारीख में कोई राज्य छूटा नहीं है जहां तदर्थ और अतिथि शिक्षक नहीं हैं। इन अतिथियों शिक्षकों को हर साल नौ या दस माह के लिए अनुबंध में रखा जाता है और अगले साल इनकी सेवाएं जारी रहेंगी या नहीं इसके प्रति कोई तय नियम या आश्वासन नहीं होता। इस प्रकार अतिथि एवं तदर्थ शिक्षक सालों साल यानी दस पंद्रह साल तक खट रहे हैं। वह प्राथमिक स्कूलों से लेकर कॉलेज और विश्वविद्यालय आदि सब जगह हैं। अकेले दिल्ली में तकरीबन 22,000 अतिथि शिक्षक हैं। इन अतिथि और तदर्थ शिक्षकों की दशा और दिशा सुधारने के प्रति कोई गंभीर और सार्थक कदम उठाने से बचती रही है। यह अगल विमर्श का मुद्दा है कि चुनावी माहौल में इन्हें वोट बैंक ज़रूर दिखाई देते हैं इसलिए इन्हें स्थाई करने का चबेना ज़रूर बांटे जाते हैं।
न केवल एक राज्य में बल्कि हर राज्य से सूचनाएं आ रही हैं कि कितने सरकारी स्कूल या तो बंद कर दिए गए या फिर वर्तमान स्कूलों के दूसरे स्कूलों में विलय कर दिया गया। दिल्ली की ही बात करें तो अप्रैल में पूर्वी दिल्ली नगर निगम के तकरीबन पंद्रह स्कूलों को विलयन से गुजरना पड़ा। वहीं पिछले साल अक्टूबर में दिल्ली में दस सरकारी स्कूल बंद कर दिए गए। सरकारी स्कूलों को बचाने एवं मर्ज करने से बचाने के लिए किसी भी राजनीतिक दलों व सरकारों ने कोई ठोस कदम नहीं उठाए। मर्जिंग और बंद होते सरकारी स्कूलों को कैसे बचाई जाए इस बाबत कोई योजना न तो लाई गई और न नीति निर्माता धड़ों में इसके प्रति को सुगबुगाहट नहीं नजर आती है। विभिन्न नागर समाज बंद होते सरकारी स्कूलों को बचाने और मर्ज होते स्कूलों को कैसे अस्तित्व में रख सकें इसके लिए आवाज उठा रही हैं। एक अलग विमर्श का मुद्दा है कि सरकारें इसे जिस हल्के तरीके से ले रही हैं इससे एक बात तो स्पष्ट हो जाती है कि उनकी इच्छा शक्ति इन स्कूलों को बचाने से ज्यादा बंद करने की है। उसपर तर्रा तर्क यह दिया जाता है कि बच्चे नहीं हैं। शिक्षकों की कमी है आदि आदि। वर्तमान स्कूलों को गिरा या बंद कर वहां पर पार्किंग की व्यवस्था की जा रही है। इन तर्कां पर नागर समाज सचेत है।
राजनीतिक दलों को कायदे से शिक्षा की व्यवस्था और दिशा निर्माण के लिए ठोस योजना बनाने और उन्हें लागू करने की रणनीति की आवश्यकता है। वरना सरकारें चुनी जाएंगी सत्ता में रहेंगी भी और पांच वर्ष पूरा कर चली भी जाएंगी। शिक्षा ही है जो सरकारों के बनने और जाने से न तो आती है और न जाती है बल्कि शिक्षा हमेशा रहती है। यदि हमने शिक्षा को अपनी चिंता के केंद्र में नहीं रखा तो शायद हमें नहीं मालूम कि हम अपने भविष्य के साथ कैसे बरताव कर रहे हैं।
राजनैतिक -ऐतिहासिक शैक्षिक घोषणाओं की यात्राएं कई बार हमारी समझ और काल-बोध को स्पष्ट करती हैं। शैक्षणिक ऐतिहासिक घोषणाओं में 1990 का जोमेटियन का एजूकेशल फोर ऑल, ईएफए, 2000 का डकार घोषणा पत्र, 2000 का सहस्राब्दि विकास लक्ष्य, 2009 का शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2015 जब हमने सहस्राब्दि विकास लक्ष्य पूरा नहीं कर पाए और नागर समाज ने तय किया कि सतत् विकास लक्ष्य 2030 तक हम शिक्षा में गुणवत्ता, समानता और लैंगिक समतामूलक परिवेश मुहैया करा पाएंगे। उक्त घोषणाएं राजनैतिक ज्यादा थीं शैक्षिक कम। क्योंकि शिक्षा में जो लक्ष्य हासिल करने के लिए समय सीमा तक की गई थी वह हर बार अधूरी और अछूती रह गई। इसके पीछे राजनैतिक इच्छा शक्ति की कमी और रणनीति एवं योजना के स्तर पर कमियों देखी जा सकती हैं। वरना वैश्विक स्तर पर स्वीकृत घोषणाएं क्यों विफल हो गईं। क्यों आज भी भारत में करोड़ें बच्चे बुनियादी शिक्षा से महरूम हैं? क्यों भारत के बच्चे स्कूलों से बाहर हैं? कहां तो हम शिक्षा में समानता, समतामूलक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने की बातें करते हैं किन्तु वहीं हक़ीकत यह है कि हमारे लाखों बच्चे अभी भी स्कूलों तक पहुंच नहीं पाए हैं। जो बच्चे स्कूलों में हैं उन्हें ऐसी शिक्षा क्यों नहीं दे पा रहे हैं कि वे भाषा, गणित आदि विषय की बुनियादी दक्षता ग्रहण कर पाएं। तमाम सरकारी और गैर सरकारी रिपोर्ट हमें लगातार आईना दिखाती हैं कि बच्चे अपनी कक्षा के अनुरूप पढ़ने-लिखने आदि में पीछे हैं। यदि हमें सतत् विकास लक्ष्य 2030 के लक्ष्य को हासिल करने हैं तो राजनैतिक और नागर समाज की प्रतिबद्धता की आवश्यकता पड़ेगी। हमें पूरी इच्छा शक्ति और कार्ययोजना के साथ प्रबंधन की समझ का इस्तमाल करना होगा।


Monday, May 13, 2019

शिक्षक के कंधे पर लोकतंत्र का महापर्व संपन्न



कौशलेंद्र प्रपन्न
लेकतंत्र का महापर्व व कहें त्यौहार (निर्वाचन आयोग से द्वारा प्रदत्त विज्ञापनों के अनुसार) त्योहार संपन्न हुआ। तकरीबन दो माह चले इस त्योहार में विभिन्न राज्यों में विभिन्न राजनीतिक दलों ने न जाने किसको क्या नहीं कहा। इतिहास के मरे मुर्दें उखाड़े। तोर मोर छोर किया। किसी ने चड्ढी के रंग तक देखकर बता दिए। वहीं कई तो राजनेता ऐसे भी रहे जिन्हें शायद चुनाव खत्म होने के बाद अपने बयानों पर शर्म आए। किन्तु शर्म मगर उन्हें नहीं आती। हर पांच साल का तजर्बा है उनके पास। चुनाव खत्म, सारी रंजीशें खत्म। वही राजनेता शाम में किसी होटल या पार्टी में गलबहियां करते भी मिलेंगे। शायद अनुमान लगा सकते हैं वे आपस में शाम में क्या बात करते होंगे।
‘‘छोड़ यार वो मंच था। मंच पर बहुत सारी बातें बोली जाती हैं। और बता बेटा क्या कर रहा हैं आज कल?’’
‘‘लेकिन आपने तो इस बार मुझे क्या क्या नहीं कह दिया।’’
शायद इसी किस्म की बातें होती होंगी। या फिर जो कमजोर राजनेता होंगे वे मुंह सुजा लेते होंगे। मुझे ऐसा बोला वैसा बोला। ऐसे में मंजे हुए कलाकार कहते होंगे यार तुम्हें अभी और सीखने की ज़रूरत है। देखा नहीं फलां राजनेता ने कैसे अपनी जिंदगी बचाने का पूरा माला उन्हें पहना दिया। क्या उन लोगों ने कभी मंच पर किसी को सुनाने से छोड़ा या पीछे रहे। तुम हो कि मुंह फुला कर बैठे हो। ऐसे तो हो गई राजनीति।
 इस त्योहार में कई सारे हजारों नहीं बल्कि लाखों लोगों के श्रम शामिल हैं। उनमें भी हमारे प्राथमिक स्कूली शिक्षक/शिक्षिकाएं। इन्हें तो मार्च से ही चुनावी ड्यूटी में स्कूलों से बाहर निकाल दिया गया था। कुछ अप्रैल से चुनावी प्रक्रिया से जुड़ गए थे। तीन चार कार्यशालाएं कराई गईं। कैसे मतदान कराएं। क्या तरीका अपनाएं। किस प्रकार की दक्षता आपमें हो आदि आदि। आपने सोचा न होगा कि जब एक स्कूल से कोई दो चार शिक्षक चुनावी ड्यूटी पर काम कर रहे थे तब उनकी कक्षाओं के बच्चे क्या करते होंगे? यह भी कोई सवाल है? बच्चे तो बच्चे हैं। कोई भी हांक सकता है। अंजु, मंजु, राकेश महेश, आरिफ कोई भी। लेकिन यह कोई भी बस बच्चों को बांध कर रख सकता है। उन्हें पढ़ाना ज़रा कठिन है। एक तो उनकी खुद की कक्षा उस पर दूसरे शिक्षक की कक्षा अनुमान लगाएं एक कमरे में कम से कम साठ सत्तर बच्चे हो गए। उन्हें पढ़ाएंगे या फिर घेर कर रखेंगे। इन बच्चों को कम से कम डेढ़ माह तक अपने शिक्षक नियमित नहीं मिल पाए। और दस मई से स्कूल की छुट्टियां हो गईं। अब बच्चे इन्हें जुलाई में मिलेंगे। जुलाई के दूसरे हप्ते से बच्चों की परीक्षा यूनिट टेस्ट शुरू हो जाएंगी। उन यूनिट टेस्ट में बच्चों का प्रदर्शन कैसा होगा इसका अनुमान आप लगाएं। सब हमीं नहीं बताएंगे।
हर पांच साल पर या फिर बीच बीच में भी चुनावी ड्यूटी में शिक्षकों को लगा दिया जाता है। इन्हें सम्मानित करते हुए कि आप शिक्षक हैं। पढ़े-लिखे हैं। समझदार किस्म के इंसान हैं। आप ही इस काम के लिए उपयुक्त हैं। चलिए चढ़ जाएं शूली पर। आप मना नहीं कर सकते। यह राष्ट्रीय पर्व है। आएं मिल कर उत्सव मनाएं। हर पर बीमार मां हो या पिता। बच्चा दूधमुंहा हो तो हो। आपको छुट्टी नहीं मिल सकती। अवकाश की तो सोचना भी मत।
हमारे शिक्षक हाल में संपन्न चुनाव के दौरान एक दिन पहले आधी रात तड़के उठकर सुबह चार या पांच बजे वोटिंग सेंटर पर पहुंच गए। उफ्! कहानी थोड़ी पीछे लेकर चलते हैं। एक दिन पूर्व इन शिक्षकों को मुख्य केंद्र पर मशीन, कागजात आदि लेने थे। जहां लंबी लंबी कतारें थीं। कतारों में खड़े खड़े पैर दुखने भी लगे थे। लेकिन बिना उफ् तक किए चुनाव के त्योहार के लिए पंक्ति में लगे थे। किसी तरह सारा समान ढोकर देर रात लौटे। सुबह वोट डालने जहां आप जाते हैं। इस बार में दिल्ली सोती रही। तकरीबन साठ फीसदी वोट ही डाले गए। बाकी के वोट कहां गए? हालांकि सरकार ने बड़े बड़े विज्ञापन लगाए थे ‘‘ वोट डालना है जरूरी, फिर शिमला मसूरी’’ लेकिन बिना शिमला मसूरी गए लोग घरों में बीस डिग्री एसी कर सोते रहे। रंगीन अख़बारी पन्ने पलटते सोशल मीडिया पर रूझान चाटते, खिसकाते रहे। लेकिन वोट डालने नहीं गए। वहीं हमारे शिक्षक अह्ले सुबह उठ कर तड़के वोट मशीन आदि चेक कर बैठ गए।
बदइंतज़ामी की जहां तक बात है तो देर मध्य रात्रि घर लौटे शिक्षक बताते हैं कि तेरह मई को तीन बजे, दो बजे, एक बजे रात लौटे। क्यों भाई वोटिंग तो शाम छह बजे संपन्न हो गए थे। फिर यह रात के एक या दो क्यों बजे घर लौटने में? उनका कहना था। हम मशीन आदि लेकर वापस सेंटर पर गए जहां कोई इंतजाम नहीं था। कोई व्यवस्था नहीं थी। न कोई पंक्ति और न कोई सुनने वाला। हम मशीन को शोनू की तरह गले लगाए बैठे रहे। कोई तो हो जो हमारा नंबर पुकारे और हम शोनू को सौंप कर घर लौटें। रात में घर वापसी का कोई भी इंतजाम नहीं किया गया। अकेली महिलाएं अपने परिचित सहमित्रों के साथ घर लौटीं। मशीन की खराबी तो एक कहानी है ही। साथ ही जहां नर्सरी की आयाएं नियुक्त की गई थीं वहां उनके खाने पीने का भी कोई मुकम्मल इंतजाम नहीं था।
जो भी हो शिक्षक न हों तो यह पर्व अधूरा सा है। आप इसे फीका भी कह सकते हैं। लोकतंत्र के इस महापर्व को मुकम्मल अंजाम तक पहुंचाने में लाखों शिक्षकों ने अपनी ऊर्जा, ताकत, समय लगाया। पता नहीं इन्हें कोई धन्यवाद कहेंगा या नहीं। इसका शुक्रिया अदा कौन निज़ाम करता है। वैसे भी ये प्राथमिक स्कूल के शिक्षक ठहरे। कहां जाएंगे मुंह फेर कर। अगली बार फिर फरमान जारी कर बुला लेंगे। इन फुफाओं, ताउओं को। 

Friday, May 10, 2019

अंकों के पहाड़ पर बौनी परीक्षा



कौशलेंद्र प्रपन्न
केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के पूर्व चेयरमैंन अशोक गांगुली का मानना है कि अंकों के बाढ़ को देखते हुए हमें अपने मूल्यांकन पद्धति का पुनर्मूल्यांकन करना होगा। बच्चों के मूल्यांकन की परीक्षा प्रणाली को विश्वसनीय और वैद्धयता प्रदान करने के लिए हमें प्रयास करने होंगे। वहीं प्रसिद्ध शिक्षाविद् प्रो. कृष्ण कुमार का मानना है सौ फीसदी अंक हासिल करने की प्रवृत्ति को समझने की कोशिश करें तो यही निकल कर आती है कि हम कैसे प्रश्न पत्र बनाते हैं? और किस प्रकार के उत्तरों का मॉडल हमने तैयार किए हैं। इस मॉडल में बच्चे शत प्रतिशत शत ऐसे हासिल करते हैं कि वे रटे हुए तथ्यों को याद कर पुनर्प्रस्तुत कर देते हैं और उन्हें परीक्षा में सौ फीसदी अंक मिल जाते हैं। इस प्रक्रिया में सृजनशीलता और मौलिक चिंतन कहीं पिछड़ जाता है। जीत उसकी होती है जिसकी रटने की क्षमता और कुशलता ज्यादा है। कृष्ण कुमार का मानन है कि इस समस्या से निपटने का एक रास्ता यह हो सकता है कि हम प्रश्नपत्रों के निर्माण और उत्तर के मॉडल को नए सिरे से गढ़ा जाए। यदि कृष्ण कुमार जी के सुझाए प्रस्ताव की परतें खोलने की कोशिश करें तो पाएंगे कि 2008-9 के आस-पास सीबीएससी के प्रश्न पत्रों का स्वरूप बदला गया। इससे पूर्व सवालों की प्रकृति विश्लेषणात्मक होती थीं। यानी वे प्रश्न पत्र लेखन, चिंतन, सृजनशील मना बच्चों की दक्षता और कौशल का भी मूल्यांकन किया करता था। दीगर बात है कि तब इस प्रकार के प्रश्न पत्र पर देश भर में चर्चा हुई कि बच्चे प्रश्न पत्रों और परीक्षा में फेल होने की वजह से आत्महत्याएं कर रहे हैंं। शिक्षाविद्ों और सीबीएससी को इस गंभरी मसले पर विचार करना चाहिए। बच्चों को परीक्षा और अंक के भय से मुक्ति दिलानी ही होगी। इस बाबात सीबीएससी ने राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 को आधार बिंदु बनाकर प्रश्नपत्रों की प्रकृति में परिवर्तन किया। बहुवैकल्पिक प्रश्नों के चलन के साथ ही बच्चों के अंकों में उछाल आते सभी ने देखा। देखते ही देखते दसवीं और बारहवीं में बच्चों के प्रदर्शन और अंकां की बाढ़ सी आ गई। तब भी बच्चों में आत्महत्या की घटनाएं रूकी नहीं। फिर भी बच्चे अवसाद और कुंठा में जीने लगे। उनकी निराशा इस बात की थी कि अस्सी, नब्बे तो आए किन्तु पांच या दस अंक कम क्यों रह गए। इस बार तो 400 में 400 और 500 में 500 अंक भी बच्चों ने हासिल किए हैं। उन बच्चों से पूछिए जिनके एक या दो अंक से शत प्रति शत अंक आने से चूक गए। वे बच्चे बड़े निराशा में जी रहे हैं। बच्चे तो बच्चे मां-बाप भी मुंह फुलाकर इधर उधर टहल रहे हैं।
याद कीजिए अस्सी और नब्बे का दशक जब पूरे जिले और राज्य में मुश्किल से दस बीस बच्चों को साठ या सत्तर प्रतिशत अंक आया करते थे। उन बच्चों की तस्वीरें अख़बारों में छपा करती थीं। इन बच्चों को हीरों की तरह लोग जानने लगते थे। वहीं 2000 और 2010 के बाद तो नब्बे पार के बच्चों को भी कोई नहीं पूछता। न आईआईटी, न डीयू और न अन्य प्रोफेशनल संस्थान। इन्हें अपने मनमुताबिक कोर्स के साथ संतोष करना पड़ता है। नीट में भी इन्हें लगता है इनका भविष्य अधर में है। नब्बे पार और अस्सी के इस पार अटके हुए बच्चों से पूछिए और उनके मां-बाप से पूछें तो इनसे ज्यादा कोई और दुखी जन नहीं मिलेंगे। परीक्षा के रिजल्ट आने और एक दो माह तक ऐसे बच्चे चर्चा में रहते हैं उसके बाद ये बच्चे भी गुमनामी में चले जाते हैं। जब मामला गर्म होता है तब तमाम मीडिया वाले इनका साक्षात्कार लेते हैं। इनकी सफलता के मंत्र पूछते हैं। ये अपना भविष्य किस दिशा में बनाना चाहते हैं आदि सवालों के जरिए पूरे पन्ने और बॉक्स में छापा करते हैं। इनके आप्त वचन को प्रेरणा स्रोत की तरह पेश किया जाता है। कैसे इन्होंने ख्ुद को सोशल मीडिया से दूर रखा, कहां से कोचिंग लीं, किस स्कूल में किस टीचर ने ज्यादा मदद की आदि आदि सवाल पूछ कर उसे रेखांकित कर छपने के बाद ये कहां जाते हैं इसकी फॉलो अप स्टोरी कम नहीं देखी और पढ़ी जाती है।
परीक्षा की प्रकृति और उसके चरित्र को तो समझने की आवश्यकता है ही साथ ही हमें परीक्षा के उद्देश्य को भी रेखांकित करने की ज़रूरत है। हम क्यों बच्चों का मूल्यांकन करते हैं? क्यों हमें परीक्षा लेने की आवश्यकता पड़ती है आदि। इसका सीधा जवाब है बिना कारण के कार्य नहीं होते। शिक्षा दी जा रही है तो उसका क्या असर हुआ? बच्चे कितना सीख रहे हैं इसे जांचा भी जाना चाहिए। हमें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि बच्चों को विषयवार तालीम दी जा रही है उसमें से बच्चे कितना ग्रहण कर पा रहे हैं। क्या बच्चों के सीखने-सिखाने में कोई बाधा तो नहीं है किन्हीं वजहों से बच्चे सामान्यतौर पर सीख नहीं पा रहे हों। ऐसे में शिक्षा की मूल प्रकृति पर भी विमर्श करने की आवश्यकता पड़ेगी। क्या हम शिक्षा के माध्यम से सिर्फ विषयों की समझ विकसित करना चाहते हैं या फिर उन विषयों का हमारे आम जीवन में कोई उपयोगिता भी है? क्या हम इतिहास, समाज विज्ञान, विज्ञान व भाषा, गणित को अपनी जिंदगी में शामिल कर और बेहतर बना सकते हैं। शायद सत्तर या अस्सी के दशक में हमारा ध्यान विषयों के साथ ही बच्चों के सर्वांगीण विकास पर केंदीत था। जबकि 1985 के राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा पुनरीक्षा 1988 के दस्तावेज को देखें तो यह एनसीएफ मानता है कि बच्चों को प्राथमिक स्तर पर भाषा, गणित आदि की समझ विकसित करनी चाहिए। ख़ासकर कक्षा एक से पांचवीं तक में भाषा, गणित, विज्ञान और समाज विज्ञान की शिक्षा दी जाए। वहीं यह दस्तावेज छह कक्षा से आगे अन्य विषयों को भी शामिल किया जाए। 1988 की पुनरीक्षा एनसीएफ मानता है कि कला के जरिए प्राथमिक और उच्च कक्षाओं में बच्चों को शिक्षा दी जाए। देश के ऐतिहासिक धरोहरों के बारे में भी बच्चों को जानकारी दी जाए। इस मसले पर एनसीएफ 1988 का विशेष जोर है। इन्हीं चिंताओं को 2005 के एनसीएफ में भी स्थान दिया गया है। गौरतलब है कि 2008-9 में सीबीएसई ने उक्त एनसीएफ का आधार बनाकर परीक्षा के प्रश्न-पत्रों के निर्माण संबंधी संस्तुतियों को आधार बनाया था। एनसीएफ 2005 के जुड़े नेशनल फोकस ग्रुप ऑन एक्जामिनेशन की संस्तुतियों को आधार बनाकर सीबीएससी ने परिवर्तन किए किन्तु वह किस स्तर तक कारगर हुआ इसका विश्लेषण किया जाना चाहिए।
शिक्षाविद्ां को मानना है कि बहुवैकल्पिक प्रश्न पत्रों में रटने और स्मृतिआाधारित कौशल की ज्यादा आवश्यकता पड़ती है। जिनकी स्मरण शक्ति अच्छी है वे बच्चे इन प्रश्न पत्रों में अधिकाधिक अंक हासिल कर लेते हैं। इन प्रश्न पत्रों में सृजनात्मकता, स्वतंत्र चिंतन और मौलिक चिंतन की संभावना को कम करती है। यही वजह है कि भाषा के पर्चे में भी बच्चे नब्बे पार अंक तो प्राप्त कर लेते हैं किन्तु स्वंतंत्र रूप से भाषा के अन्य कौशलों लेखन,पठन-समझ आदि के स्तर पर पिछड़ते नजर आते हैं। क्योंकि जब हमने भाषा के प्रश्न पत्र को वैकल्पिक बनाया तो वहां चार उत्तरों में से एक सही उत्तर को छांटना होता है। लेकिन जब मौलिक चिंतन और लेखन अभिव्यक्ति की क्षमता का विकास नहीं के बराबर हो पाता है। नेशनल एचिवमेंट सर्वे, पीसा, डाइस फ्लैस रिपोर्ट, असर आदि की रिर्पोट बताती हैं कि हमारे बच्चे भाषा में लिखना-पढ़ाने कौशल में पीछे रह जाते हैं। जहां एक ओर भाषा स्वंत्रत और मौलिक चिंतन को बढ़ावर देती हैं वहीं गणित तर्कपूर्ण चिंतन और मंथन दक्षता का विकास करते हैं।
वर्तमान अंकीय प्रकृति को बढ़ावा देने वाली परीक्षा प्रणाली कहीं न कहीं बच्चां के स्वतंत्र और मौलिक चिंतन के संवर्द्धन में मददगार साबित होने की बजाए हानिकारक ही हो रही हैं। सिर्फ अंकों के पहाड़ खड़ा करना हमारा मकसद न हो बल्कि अंकों के साथ ही उसी के अनुपात में बच्चों को अपने विषयों की समझ स्तर भी विकसित हो। मूलतः परीक्षा हमारी समझ और अवबोधन के स्तर की जांच भी करती है ऐसा माना गया है। यदि यह मकसद है तो हमें उसी के अनुसार प्रश्न पत्रों के निर्माण की रणनीति भी तैयार करनी होगी। हम परीक्षा और मूल्यांकन से क्या हासिल करना चाहते हैं इसमें भी स्पष्टता लाने की आवश्यकता है। एक ओर विषयी समझ और कौशल की आवश्यकता हक़ीकत है तो दूसरी ओर अंकों की दुनिया भी उतनी साफ और कठोर है। यदि बच्चा कम अंक जिसे अस्सी से नीचे भी मान सकते हैं उन बच्चों को तथाकथित प्रसिद्ध कॉलेज में दाखिला नहीं मिल पाता। ऐसे बच्चे सरकारी कॉलेजों के समानांतर चल रही निजी कॉलेजों की ओर शिक्षा पाने के लिए भागते हैं। दोनों ही कॉलेजों में फीस एक बड़ी चुनौती नजर आती है। जो बच्चे मोटभ् फीस दे सकते हैं वे वहां दाखिल हो जाते हैं। बाकी बच्चे कहां जाते हैं, किन अंधेरे में रह जाते हैं इस ओर भी हमें सोचने की आवश्यकता पड़ेगी।

Wednesday, May 8, 2019

जहां रोशन है दिव्यांग बच्चों की दुनियाः


कौशलेंद्र प्रपन्न
हाई वे, मुख्य सड़क, महानगरीय सड़क, राजमार्ग, साठ फुट्टा रोड़, गली, चौपड़ आदि। इन नामों से कैसी तस्वीर बनती है? यही कि उक्त सारे नाम यातायात के प्रमुख साधनों में से एक हैं। सड़क उनमें से ऐसा मार्ग है जो जमीन पर रेलवे के अतिरिक्त बना करती है। क्या ऐसी भी गली की कल्पना कर सकते हैं जहां आप इंटर करें तो आपके साथ दूसरा कोई भी कंधे से कंधा मिला कर न चल सके। यानी ऐसी गली जहां धूप को भी आने के लिए इंजाजत मांगनी पड़े। जिस गली से बाहर निकलते ही बड़ी, चौड़ी सड़कें शुरू होती हों। जहां से झांकने पर एक चमचमाती नगरी, दुकानें, मॉल्स की दुनिया शुरू हो जाती है। इशारा ऐसी झुग्गी झोपड़ी से हैं जो दोआब में बसे हैं। जहां ज़िंदगी रोशन है। जहां टीवी है, फ्रीज है, साउंड सिस्टम है। बिजली पानी है। और राशन कार्ड भी। जहां गलियों में नालियां ऐसे पसरी हैं गोया सांप की नई प्रजाति पैदा हो गई हों। न केवल दिल्ली बल्कि मुंबई, चैन्नई, कोलकाता आदि तमाम महानगरों में बसी हैं। जहां से रोज काम पर जाने वाले भीड़ में कहां खो जाते हैं इसका अनुमान लगाना ज़रा कठिन होता है। इन्हीं घरों से कई बार हमारे घर चौका बरतन करने वाली आती हैं। कभी सोचा है इनके बच्चे कहां, किन स्कूलों में दाखिल होते हैं। कहां इन्हें नई तालीम मिलती है। आदि। ऐसे ही कुछ सवाल हैं जिनका उत्तर शायद हमें देना होगा।
मोतीलाल नेहरू कैंप, संजय बस्ती, ओखला फेज 1 व 2, नेहरू प्लेस, कालका जी, गोविंदपुरी आदि जगहों पर दो फैक्ट्री के दोआब में गुलजार इन बस्तियों से मजदूर मिला करते हैं। जिनके बदौलत हमारा बड़ा काम हुआ करता है। जब ये वर्ग एक या दो माह के लिए भी गांव-घर चला जाता है तो हमारी आम जिंदगी कहीं न कहीं प्रभावित होती है। हमारे सरकारी स्कूल पर भी विपरीत असर साफ देखे जा सकते हैं। ख़ासकर पर्व त्योहारों पर, गर्मी की छुट्टियों में। जाते एक माह के लिए हैं लेकिन लौटत दो तीन माह बाद हैं। स्कूल टीचर मानते हैं कि हमारी मेहनत खराब हो जाती है। हमें दुबारा से शुरुआत करनी पड़ती है। इन बच्चों के साथ पढ़ने-पढ़ाने की दिक्कत बराबर बनी रहती है। जाने के बाद कब लौटेंगे किसी को भी नहीं पता।
इन कॉलोनियों, कैंप में बसने वाले बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य आदि का रख रखाव और मुहैया कराने में कुछ स्वयं सेवी संस्थाएं लगी हैं। जो बच्चों की शिक्षा और देखभाल करते हैं। एनजीओ के अलावा कुछ सीएसआर की गतिविधियां भी यहां बहुत ही शिद्दत से काम कर रही हैं। ये बिना आवाज़ किए अपने काम में विश्वास करती हैं। टेक महिन्द्रा फाउंडेशन उनमें से एक है। टेक महिन्द्रा फाउंडेशन ओखला में आस्था संस्था के मार्फत दिव्यांग बच्चों की बुनियादी तालीम पर काम करती है। आस्था सस्था पिछले तकरीबन पचीस सालों से दिव्यांग बच्चों के विभिन्न मुद्दों और समस्याओं को ध्यान में रख कर गर्दन झुकाए काम में जुटी है। इस संस्था में तकरीबन सौ से ज्यादा बच्चे आते हैं। सेंटर पर आने वाले बच्चों को महज पाठ्यपुस्तकीय शिक्षा मुहैया कराने की बजाए जीवन कौशल की समझ भी दी जाती है। इन दिव्यांग बच्चों को अंधेरी गलियों और आम जीवन की उपेक्षा से निकाल कर समाज और समुदाय से जोड़ा जाता है। इन बच्चों से बात करके तो देखिए जनाब इनके आत्मविश्वास में कमाल का उछाल और जीने की चाहत, उमंग की लहरें देखने-सुनने को मिलेंगी। ऐसे ही बच्चों की छोटी छोटी आंखों में बड़े बड़े सपने भरने और देखने का माद्दा पैदा करने में टेक महिन्द्रा फाउंडेशन पिछले लगभग दस साल से जुड़ा है। यह दीगर बात है कि यह फाउंडेशन काम बोलता है में विश्वास करता है न कि प्रचारित करने में।
नाम बेशक हमारे बच्चों जैसे ही हैं इन बच्चों के। कमल, ज्योति, सानिया आदि आदि। लेकिन ये बच्चे हमारे सामान्य बच्चों से ज़रा अलग हैं। इनकी भी आंखें दो ही हैं लेकिन इन आंखों में देख सकने की रोशनी नहीं है। ऋग्वेद में एक मंत्र में कहा गया है, ‘‘चक्षोरमे चक्षु अस्तु’’ यानी नेत्र में देखने की क्षमता हो। वहीं कुछ बच्चे ऐसे हैं जो अंदर से बेचैन हैं जिन्हें ठहर कर समझने और प्यार करने की आवश्यकता है। ऐसा ही एक बच्चा है ओखला कैंप में। उसने ठहर कर विश्वास के साथ मेरे गाल को अपने कोमल हाथों, अंगुलियों से छुआ, सहलाया और गले लगा। बोल भर बस नहीं फुटे। ऐसे बच्चों के बीच जाकर लगता है हम कितने गुमान और तोर मोर छोर से भरे हैं। हम जिस जहां में रहते हैं वह कोई और दिनया है। एक दुनिया समानांतर भी बसा करती है। इस दुनिया से हम बेखबर न जाने कितनी ही रंजीशें पाले हुए रेज़ डोल रहे हैं। ऐसी दुनिया से बहुत दूर हमने अपने लिए एक अगल आप्राकृतिक दुनिया बसा ली है जहां हम दो चार के बीच हंस बोल लेते हैं। एक दूसरे को लाइक, इग्नोर कर खुश हो लेते हैं। काश कभी इन बच्चों के बीच जा पाते। खुद ब खुद हमारी अंदर की दुनिया साफ हो जाएगी।
पहली बात तो यही कि इन दिव्यांग बच्चों को उनके घरों से निकालना अपने आप में बड़ी समस्या है। और यदि बार अभिभावक विश्वास कर कर संस्था में भेज भी देती है जो कम से कम संवाद की कड़ी जुड़नी शुरू हो जाती है। दूसरे स्तर पर चुनौती तब आती है जब ये बच्चे सामान्य बच्चों के बीच जाते हैं। स्कूल परिसर कितना भी मूल्यपरक बातें कर ले। लेकिन वास्तविक स्थिति यह है कि एक ओर समावेशनी शिक्षा और दिव्यांग बच्चों के लिए स्कूल और शिक्षा एकीकरण करने वाली हो ऐसी घोषणाएं हने कई बार कई दशक पूर्व भी की है। लेकिन जमीनी हक़ीकत बिल्कुल अगल है।

Monday, April 29, 2019

सैर पर खोया व्यक्ति



कौशलेंद्र प्रपन्न
सुबह की सैर पर मेरे पिताजी जाएं या आपके चाचाजी। क्या फर्क पड़ता है। फर्क सिर्फ उम्र का हो सकता है। वह या तो साठ के पार होंगे या फिर सत्तर अस्सी पार। जब अस्सी पार का कोई व्यक्ति सुबह की सैर पर निकलता है तो ज़रूरी नहीं कि वो सकुशल घर वापस भी आ जाए। जब सुबह का गया व्यक्ति दोपहर तलक नहीं लौटता तब चिंताएं बढ़ने लगती हैं। उसपर यदि उस व्यक्ति के पास  कोई अता पता हो, न फोन हो और न ही इतनी स्मृति की याद रह सके कि किस गली से निकले थे और किस गली में वापस आना है। कहानी तब गहराने और पेचिदा होने लगती है। तमाम तरह की आशंकाएं और अघटित दुर्घटनाओं की चिंताएं हमें परेशान करने लगती हैं।
वैसे देखा जाए तो इसमें नया क्या है। होता ही रहता है। उसपर यदि आप किसी पुलिस स्टेशन में गुम हुए व्यक्ति की सूचना देने जाते हैं तब उनके व्यवहार में साफ झलकता है। आपके लिए महत्वपूर्ण व्यक्ति हो सकते हैं लेकिन उनके लिए वह एक केस भर है। केस मतलब कई तरह की व्यावहारिक और व्यावसायिक ज़रूरी कागजी कार्यवायी। आप कितना भी परेशान हों, उन्हें तो ऐसे केसेज से रोज़ रू ब रू होना होता है इसलिए कितने केसे के साथ वे संवेदनशीलता दिखाएंगे और कब तक। आप लगातार अपना धैर्य खोने लगते हैं। आप और हम उन्हें खरी खोटी भी सुनने लगते हैं कि आप ध्यान नहीं दे रहे हैं। आप दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं आदि आदि। लेकिन वह अपने तई काम कर रहा होता है। खोया हुआ व्यक्ति किस मनोदशा और किस पस्थिति से गुजर रहा है इसका महज अनुमान ही लगा सकते हैं। शायद जी नहीं सकते।
जब हम खोए हुए बाबुजी, चाचाजी आदि आदि की तस्वीर निकलवाने स्टूडियो में जाते हैं तो हमारे पास या तो पासपोर्ट साइज की फोटो होती है या फिर कई बार वो भी नहीं। ऐसे में हम अपने मोबाइल को घंघालते हैं कोई सेल्फी हो, कोई फोटो ली हो जिसे इनलाज कराई जाए। और तब महसूस होता  कि कई बार फोन की उपयोगिता और फोटो खीचे जाने की सार्थकता। इस स्टूडियो में जहां एक ओर शादी ब्याह की तस्वीरें डेवलप हो रही होती हैं वहीं दूसरी तरफ आप खोए हुए व्यक्ति की तस्वीर निकलवा रहे होते हैं। वक़्त की ही बात है कहीं शादी के जश्न मनाए जा रहे होते हैं वहीं एक खोया हुआ व्यक्ति अपने परिचितों से मिलने के लिए तड़प रहा होता है।
रास्ते तो वहीं होते हैं। सड़के भी वहीं रहती हैं। गलियां भी वहीं पड़ी रहती हैं। बस उसपर चलने वाला, टहलने वाला खो जाता है। अपना पता भूल जाता है। उसमें गली का क्या दोष? उस सड़का की भी कोई गलती नहीं जिससे होकर वो खोया हुआ व्यक्ति किसी वक़्त गुजरा हो।
कस्बा हो, गांव हो, छोटा शहर हो तो लोगों को आसानी से पहचान पाते हैं। हमें एक दूसरे का पेशा, घर मकान सब याद रहता है। कोई कहीं खोना भी चाहे तो खो नहीं सकता। कोई न कोई मिल ही जाएगा जो आपके भटके कदम को घर की ओर मोड़ दे। मगर महानगर ऐसा संजाल है गलियों का। सड़कें इतनी एक दूसरे काटती, भागती रहती हैं कि उस गाड़ियां ही भाग सकती हैं। सड़कों को क्या पता उसे किस रफ्तार में भागना है या भगाना है। बस वो व्यक्ति नहीं पहचान पाती।
शहर हो या कस्बा शायद अभी भी कुछ लोग बचे हैं जो भूले हुए या खोए हुए को घर तक छोड़ आते हैं। शायद उनके पास वक़्त है या फिर वक़्त निकाल लेते हैं अपने ज़रूरी कामों में से ऐसे कामों के लिए। हम जिस दौर और रफ्तार से गुज़र रहे हैं इसमें ठहर कर चेहरे पहचानने की गुंजाइश नहीं छोड़ता। शायद हम दफ्तर पहुंचने और पंच करने की भय में इतने डरे होते हैं कि आम और साधारण संवेदना को भी भूल चुके हैं। लेकिन ऐसे ही माहौल में ऐसे भी कुछ लोग बचे हुए हैं जिन्हें किसी खोए हुए को थाने तक पहुंचाने में सकून मिला करता है। शायद ऐसे ही लोगों के कंधे पर संवेदनाएं खत्म होने से बची हैं। जब भी जहां भी कोई सत्तर या अस्सी पार मेरे या आपके पिताजी या चाचाजी सुबह की सैर पर जाएं तो एक पता लिखा पुर्चा उनकी जे़ब में ज़रूर रख दें। कोई तो होगा जो खोए हुए की जे़ब से पुर्चा निकाल कर घर छोड़ देगा।
एक खोया हुआ व्यक्ति किन मनोदशाओं में जीता होगा? एक तो जो स्वेच्छा से खोया करते हैं और दूसरे मजबूरन खो जाते हैं। दो तरह का खोना है। मजबूरन खोए हुए के तार जुड़े होते हैं। वो अपने तार जोड़ने के लिए बेचैन और परेशान हो रहा होता है।

Tuesday, April 23, 2019

अतीत में अटक जाना नहीं



कौशलेंद्र प्रपन्न
विनोद कुमार शुक्ल की एक कविता है ‘‘मैं उन सब से मिलने जाउंगा’’। इस कविता में क्या खूब अंदाज में विनोद जी लिखते हैं कि नदी मेरे घर नहीं आ सकती मैं उससे वहीं मिलने जाउंगा। जो लोग मेरे घर नहीं आते मैं उनके उन्हीं के घर मिलने जाउंगा। जो जो नहीं मिल पाते उनसे मिलने जाउंगा। एक जरूरी काम की तरह मिलूंगा। आदि आदि। एक हम हैं जो साथ है, जिसके साथ रहते हैंं उन्हीं से नहीं मिल पाते। उन्हीं से नज़रे चुराते हैं। उन्हीं से रास्ते मिल जाने पर बचकर निकलने की कोशिश करते हैं। रिश्ते को किस मोड़ पर हम छोड़ देते हैं जहां से शायद हम लौटना ही नहीं चाहते। कहां तो कवि, शायर, लेखक आदि तमाम कोशिश करते पाए जाते हैं कि रिश्ते को कैसे बचाया जाए। कैसे बीच के फासले को कम करने की कोशिश की जाए ताकि रिश्ते के बीच की गरमाहट बची रहे।
आज की तल्ख़ हक़ीकत यही है कि नए नए ऑन लाइन और सोशल प्लेटफॉम पर दोस्त और फॉलोवर की संख्या तो बढ़ाते हैं। लेकिन जो पास है। जिससे हम कभी भी कहीं भी लड़ सकते हैं। अपनी रंजीशें साझा कर सकते हैं। अपने दुख और सुख का साथी बना सकते हैं। इन्हें नजरअंदाज कर देते हैं। पास बैठे हुए को पुचकारने की बजाए अन्यान्य मंचों पर आकाशीय दोस्तों पर समय लगाया करते हैं। हालांकि वह भी गलत और नाजायज नहीं है। दोस्ती तो दोस्ती होती है। हां जरूरी यह है कि क्या हम इन रिश्तों को निभाने संजीदा हैं। हमारे आस-पास इतने लोग हैं जिनमें कुछ को दोस्त मान और स्वीकार सकते हैं उन्हें भी हम कई बार बेहतर तरीके से पेश नहीं आते। वजह यही है कि पास होते हुए भी हमारी पहुंच और एरिया ऑफ कंसर्न से बाहर होते हैं। हम एक ऐसे भीड़ में तब्दील हो चुके हैं जहां कंधे से कंधा टकराते तो हैं लेकिन उनसे बात करने, मिलने जुलने का वक़्त हमारे पास नहीं है। हम नजरें चुरा कर आगे बढ़ जाते हैं या फिर उन्हें नोटिस भी नहीं करते।
दूसरे शब्दों में कहें तो हम उन्हीं से वास्ता रखना अपनी प्राथमिकता रखते हैं जिनसे कहीं न कहीं, कभी न कभी कोई ज़रूरत पड़ सकती है। इस अनुमान और येजना निर्माण में यह बात स्पष्ट होती है कि उन्हीं से रिश्ता रखना है या रखना चाहिए जिनसे भविष्य में कोई काम बनता हो आदि आदि। यही वो प्रस्थान बिंदु है जहां से रिश्तों के समीकरण तय होते हैं। किनसे किस स्तर का वास्ता रखना है या रखना भी है या नहीं। सिर्फ दोस्ती शायद आज की तारीख़ में न के बराबर सी रह गई है।
रिश्तों में गरमाहट व ऊष्मा तभी तक बची रहती है जब तक कोई हमारी आम जिंदगी में शामिल हो। व कह लें जिन्हें रोज दिन अपनी बातें साझा किया करते हैं। वो लोग कभी भूलाए नहीं भूलते जिनसे हमारा साबका रोज का होता है। व्यक्ति कटता भी तभी चला जाता है जब वह हमारी रोजमर्रे की जिंदगी से अलग हो जाता है। वैसे भी व्यक्ति कब तक पुरानी यादों और स्मृतियों के साथ जिंदा रह सकता है। बच्चन साहब ने क्या खूब लिखा है, ‘‘ जो बीत गई सो बात गई माना वह बेहद प्यार था...’’ हमारे बीच से कई सारे लोग हैं जो बहुत प्यारे थे जब थे। अब वो नहीं है। कई बार भौतिक तौर पर तो कई बार संवेदना के स्तर पर दूर जा चुके हैं। लेकिन भूपेंद्र सिंह का गया एक गाना भी याद कर सकते हैं ‘‘करोगे याद तो हर बात याद आएगी, गुजरते वक़्त की हर बात याद आएगी’’। जो वर्तमान को जीने वाले होते हैं वो अतीतजीवी को पिछड़ा और अतीत में रहने वाले मान बैठते हैं। कहते हैं जो बीत गई उसपर रोना क्यों? जो पास नहीं उसके लिए पछाड़ें मार कर जीना क्यों? आगे की राह आसान हो और पुराने यादें परेशान न करें इसके लिए जरूरी है कि अतीत की स्मृतियों की पोटली बांध कर दूर किसी संदूक में बंद कर दिया जाए।
हमारा पूरा का पूरा इतिहास, साहित्य, दर्शन आदि अतीत की स्मृतियों पर ही आधारित हैं। यदि अतीत को निकाल दें तो इतिहास पूरा खाली हो जाएगा। इतिहास अधूरा होगा तो हमारी संस्कृति, सभ्यता की काफी सारी थाती हमसे दूर चली जाएगी। हम किसी भी सूरत में सिर्फ और सिर्फ वर्तमान में जिंदा नहीं रह सकते। हमें कई बार अतीत का सहारा और संबल लेना ही पड़ता है। यह भी दीगर बात है कि हम अतीत की यात्रा क्यों करते हैं? क्यों हमें अतीत की कहानियों, बातों, यादों और घटनाओं में आनंद आया करता है? शायद इसलिए कि हमें अपने अतीत और स्मृतियों से एक ताकत और रोशनी भी मिलती है। हम पुरानी घटनाओं और इतिहास से एक सीख लेते हैं कि जब वह पूरी घटना गुजर गई तो यह तो बहुत छोटी है। इससे भी निपटा जा सकता है। मैंनेजमेंट के छात्रों को केस स्टडी के द्वारा किसी कंपनी के उतार-चढ़ाव के बारे में पढ़ाया जाता है कि फलां कंपनी कभी अपने प्रोडक्शन और सफलता की ऊंचाई पर क्यों था और क्यों उस कंपनी में डाउन फॉल आने शुरू हुए। इसकी समझ केस स्टडी के द्वारा समझाया जाता है। ठीक उसी प्रकार इतिहास में या फिर राजनीति में भी इसका अध्ययन किया जाता है कि फलां साल या चुनाव में क्यों फलां पार्टी की जीत हुई और क्यों दूसरी पार्टी पिछड़ गई थी इसके कार्य कारण संबंधों के विश्लेषण के लिए अतीत का मंथन और विमर्श जरूरी होता है। ऐसे में अतीत की यात्रा हमारे लिए नई दृष्टि भी प्रदान करती है। वहीं अतीत की यात्रा में एक कठिनाई यह भी महसूस की जाती है कि हम अतीत में प्रवेश तो कर जाते हैं किन्तु वहां से सकुशल और कुछ ग्रहण कर कैसे वापस आना है इसकी कला हमारी पास नहीं होती। हम अतीत में अटक जाते हैं। जबकि अतीत में अटकना ख़तरनाक माना जाता है। हमें उस अतीत और स्मृतियों से, अपने पुराने रिश्तों से वो ऊष्मा लानी होती है जिससे हम वर्तमान को बेहतर बना सकें।

Friday, April 19, 2019

यादें कैसी कैसी ऐसी वैसी...



कौशलेंद्र प्रपन्न
यादों का क्या है। कोई भी घटना, कोई भी बात, कोई भी स्थान जिससे हमारी यादें जुड़ी हैं वो भूले नहीं भूल पातीं। वह चाहे अच्छी यादें हों या फिर खराब। यादें तो यादें हुआ करती हैं। हम सबके पास न जाने कैसी कैसी यादें हैं। हम शायद पूरी जिंदगी यादों को स्मृतियों में संजोया करते हैं। कई बार यादों की भी छंटनी करते हैं। जो अच्छी होती हैं उसे औरों से भी साझा किया करते हैं। साझा के दौरान कई बार चूक भी हो जाती है हम सही पहचान नहीं कर पाते कि जिसके साथ साझा कर रहे हैं कहीं वह आगे चलकर मजाक तो नहीं बनाएगा आदि। लेकिन इस सब से बेख़बर हम बस एक रवानगी में अपनी पुरानी यादें साझा किया करते हैं।
यादें तो जलियावालाबाब का भी है जिसके सौ साल पूरे हुए। यादें तो 1947 की भी है जब न केवल भौगोलिक तक़्सीम हुई थी बल्कि आंसुओं को भी हमने दो फांक किया था। उस विभाजन की याद आज भी तब की कहानियों, उपन्यासों, नाटकों में गूंजती हैं। उन्हें याद कर मन गहरे अवसाद में डूबने लगता है। वहीं यादें तो तक्षशीला, नालंद विश्वविद्यालय की भी है जिन्हें सोच सोच कर माथा दमके लगता है।
यादों का हम करते क्या हैं? कभी सोचा न होगा। बस यूं ही यादों की पोटली खोलना और उनमें से कुछ यादों को झाड़ पोछ कर देखना सुनना, सुनाना बेहद लुभाती हैं। कुछ देर उन यादों में तैरने के बाद वापस किनारे आ जाते हैं। इस किनारे पर कई बार दुखद यादें इतनी गहन हो जाती हैं कि नींद उड़ जाती है। निराशा और आत्म ग्लानि से भर उठते हैं।
उसका अचानक से चले जाना भी तो यादें ही हैं। उसके साथ बीताई बातें, मुलाकातें याद आती हैं। वह ऐसे हंसता था। वह वैसे पुकारा करता था। गले लगता तो पूरर शिद्दत से मिलता था। शहर का नहीं था। जहां से आता था वहां दिखावा न के बराबर था। वहां कुछ यदि था तो अपनापा।
हर मुलाकातें, हर किसी के साथ बातें करना हर बार सुखद नहीं होता। आप तो खुलेमन से किसी से बातें कर रहे हैं। लेकिन आपको मालूम ही नहीं होता कि आपकी कौन सी बात कौन सी गतिविधि कौन कैसे रिकॉर्ड कर रहा है। मौका आते ही वह बमन करने देगा। आपका अनुमान भी नहीं होगा कि जिस बात को आपने बेहद सहज और सरल मन से कहा था उसे किसी ने किस गहरे और ग्रंथी के साथ ग्रहण किया। आपकी बातें अभी तलक खदबदा रही थीं।
कहते हैं कि समय और परिवेश बदलते ही रिश्तों के मायने बदल जाते हैं। जो कभी इतने गहरे दोस्त हुआ करते थे वही एक दिन, एक रात या फिर अचानक बदल जाते हैं। महसूस ही नहीं होता कि कभी दोनों इतने गहरे दोस्त रहे होंगे। लेकिन मूर्ख वह व्यक्ति बनता जाता है कि जो आज की तारीख़ में भी रिश्ते को उन बीते पलों में ही देखता और स्वीकारता है। जबकि परिस्थितियां बदल चुकी हैं इसका इल्म उसे होना चाहिए। हर शब्द निकष पर कस कर बोलने की ज़रूरत होती है। वरना न जाने कौन सा शब्द आपके ख़िलाफ खड़ा हो जाए।

Wednesday, April 17, 2019

हमारी भाषा कैसी हो...नेताओं जैसी कभी न हो


कौशलेंद्र प्रपन्न
किताबों में नहीं मिलेगी। किसी गं्रथ में भी नहीं मिलेगी। यदि कहीं मिलेगी तो वह है नेताओं की जुबान में। नेताओं की भाषा की छटाएं हमें चुनावी रैलियों, घोषणाओं, मंचों पर मिला करती हैं। ख़ासकर नेताओं की भाषाओं की विविध छटाएं कई बार अंदर तक खखोरती हैं। चुभन पैदा करती हैं। कई बार अफ्सोस भी होता है कि हमारे चुने हुए नेता किस प्रकार की भाषा का प्रयोग आम चुनावी रैलियों में किया करते हैं। इन भाषाओं को सुनकर मालूम नहीं उनके बच्चे, पत्नी, बहु, परपोती आदि क्या कहती होंगी? क्या और कैसा महसूस करती होंगी? यह तो पता नहीं लेकिन उनकी बच्चियां या फिर नाती पोती कभी पूछते भी हैं या नहीं कि दादा जी आपने ऐसी भाषा कहां से सीखी? किस स्कूल में या किस मास्टर जी ने ऐसी भाषा बोलना सीखाया? यदि ऐसे सवाल हमारे नेताओं से बच्चे पूछें तो शायद उन्हें कुछ शर्मिंदगी महसूस हो। शायद तब किसी भी दूसरी संस्था निर्वाचन आयोग को उनके बोलने पर पाबंदी लगाने की ज़रूरत ही न पड़े। लेकिन आत्म विश्लेषण और आत्म भाषायी बोध हमारे नेताओं की जिंदगी से दूर होती जा रही हैं।
जब कभी भी नेताओं की भाषाओं का समाज शास्त्रीय विश्लेषण व अध्ययन किया जाएगा तो लगता है बड़बोली किस्म के नेताओं को अपने ही इतिहास से मुंह छुपाने की बारी आए। लेकिन चुनाव खत्म। उधर तमाम भाषायी आरोप प्रत्यारोप पर पानी और मिट्टी डाल दी जाएगी। किसी को भी याद नहीं रहेगा कि किस नेता ने किसे क्या क्या कहा। कहां क्या बोला। किसी ने किसी की चड्डी के रंग बताए तो किसी ने किसी को चोर बताया। नचनिया बोला। बोला तो बोला मंच पर बेशर्म की तरह ख्ुद भी हंसे और जनता का भी मनोरंजन किया।
हम कैसी भाषायी माहौल में जी रहे हैं। कई बार सोच कर लगता है कि सबसे पहले हम आक्रोश में अपनी भाषायी नियंत्रण खो देते हैं। जब कभी हम क्रोध में, ईर्ष्या या फिर घृणा भाव में डूबे होते हैं तब हमारी भाषायी नियंत्रण बेहद कमजोर हो जाती हैं। गुस्से में हमें मालूम नहीं पड़ता कि हम किसे क्या बोल रहे हैं। किसपर हमारी भाषा का क्या और कितना असर पड़ सकता है इसका अनुमान तक हम नहीं लगा पाते। बस एक प्रवाह में गुस्से में बोलते चले जाते हैं। जब गुस्से का भाव शांत होता है और अपनी भाषा पर चिंतन करते हैं तब महसूस होता है हमने क्या बोल दिया। क्या इस शब्द की आवश्यकता थी? क्या इस बात को और दूसरे तरीके से भी बोली जा सकती थी? आदि आदि।
हाल ही में मैट्रो में यात्रा के दौरान ऐसी ही भाषा बोलचाल में कानों में लगातार पड़ रहे थे। सोच रहा था कैसी भाषा का प्रयोग कॉलेज जाने वाली लड़कियां कर रही हैं? जो वो बोल रही हैं उसका गहरा क्या अर्थ है इससे बेख़बर को कई बार उस शब्द का इस्तमाल कर रही थीं। शब्द था ‘‘फट गई’’
दो लड़कियों ने एक केवल एक बार बल्कि तकरीबन दस से ज्यादा बार प्रयोग कीं कि मेरी तो फट गई। क्लास में गई और देखा मैडम आ चुकी हैं देखते ही मेरी तो फट गई। पहली नजर में इस शब्द में कोई खामी नजर नहीं आएगी। लेकिन ठहर कर सोचें तो फटना यहां ख़ास अर्थ में महदूद नजर आता है। आंखें फटना कहना उनका आशय नहीं था। यह तो तय है। क्या फट गई इसका ख्ुलाया करना मेरा प्रयास नहीं है, बल्कि कॉलेज में पढ़ने वाली बच्चियों को इसके बहुअर्थी मायने से परिचय न होना होगा ऐसा नहीं है। वे बख्ूबी जानती हैं। लेकिन गैर इरादतन और लापरवाही में बोल रही थीं। इसी तरह की भाषा का प्रयोग हम न जानें कब और किसके सामने बिना विचार किए करते हैं।
हमें अपनी भाषा और भाषायी मर्यादा का ख़्याल तो रखना ही चाहिए। जब हम किसी से ख़ासकर श्क्षित व अशिक्षित भी समाज में नागर व ग्रामीण समाज के साथ बोल रहे हैं तो अपनी भाषायी तमीज़ का परिचय देना कहीं न कहीं अपनी पीढ़ी को भाषा के प्रति सजग करना भी है।

Thursday, April 11, 2019

सात पूंछ का मैं





कौशलेंद्र प्रपन्न 
एक कहानी है सात पूंछों का वाला चूहा। इस चूहे को मां बहुत प्यार करती है। वैसे हर मां को अपना बच्चा बहुत प्यारा होता है। वह चाहे जानवर हो या मनुष्य। बच्चा चाहे दिव्यांग हो या साधारण। विशेष हो या फिर सामान्य। बच्चा बच्चा होता है। उस कहानी में चूहे को समाज यानी उसके दोस्त। खेल खेल में काफी परेशान करते हैं। सात पूंछ का चूहा सात पूंछ का चूहा आदि आदि। चूहा इन कमेंट्स से बहुत परेशान होता है। मां से बिना साझा किए पास के नाई के पास जाता है और कहता नाई नाई मेरी एक पूंछ काट दो। श्नै श्नै एक एक कर सारी पूंछें कट जाती हैं। फिर भी कहने वाले नहीं रूकते। कहने वाले फिर चिढ़ाते हैं कि बिना पूंछ का चूहा बिना पूंछ का चूहा आदि आदि। बिना पूंछ का चूहा फिर भी परेशान है। 
यह कहानी हमारी जिं़दगी के बेहद करीब बैठती नज़र आती है। हमारे भी आस-पास ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो हमें किसी भी सूरत में सुखी और स्वीकार नहीं कर पाते। वो अपने तई हमें बदलना चाहते हैं। उनके जैसे हों तो ठीक यदि नहीं तो उन्हें परेशानी होती है। वे चाहते हैं कि यह विशेष क्यों है? क्यों इसके सात पूंछ या आस-पास फलां की ज्यादा मांग है। सभी उसे ही पूछा करते हैं। यही चीज उन्हें पसंद नहीं आती। तभी तमाम तरह की नसीहतें देने लगते हैं। बिना मांगे राय देना और अपने आप को रायबहादुर साबित करने में ज़रा भी मौका नहीं चूकते। इधर हम हैं कि उनकी बातें और आ जाते हैं। उन्हीं के जैसे बनने में अपनी स्वभावित प्रकृति भूल जाते हैं। हम अपनी पहचान और प्रकृति को ताख़ पर रखकर औरों के जैसे बनने में जुट जाते हैं। होता यह है कि जो हम थे वह तो रह नहीं पाते और जो होने के लिए अपनी पूंछ कटा बैठे उन जैसे भी न हो सके। ऐसी स्थिति में हमारी गति सांप छुछुदर की हो जाती है। 
हमारा परिवेश कुछ कुछ ऐसी भी भूमिका निभाया करता है। कई बार हम परिवेश के अनुसार ढल जाते हैं तो कई बार परिवेश को अपने अनुरूप ढालने में सफल हो जाते हैं। इस संघर्ष में काफी संभावना इस बात की भी होती है कि हम अपने अस्तित्व को परिवेश के अनुसार ओढ़ लें। बहुत कम लोग होते हैं जो परिवेश को अपने अनुसार ढाल पाएं। शायद इस किस्म के लोगों को लीडर या मैंनेजर के नाम से जानते हैं। जो अपना परिवेश स्वयं गढ़ा करता है। इस प्रकार के लोगों की संख्या दिन प्रति दिन कम होती जा रही है। 
प्रेमचंद ने किसी कहानी में लिखा है कि यदि गर्दन किसी के पांव के नीचे हो तो उस पांव को सहलाने में ही गनीमत है। वरना...। और हम एक ऐसे डर और निराशा में जीने लगते हैं जिसको पार कर पाने की क्षमता पर ही विश्वास खोने लगते हैं। ठीक उसी तरह हमारी पूंछ यदि किसी के पांव के नीचे दबी हो तो बेहतर पर धीरे से अपनी पूंछ खींच लें। वरना हमारी पूंछ कट जाएगी या टूट जाएगी। 
हमारे आस-पास ऐसी कहानियां खूब हैं जो हमें जीने के लिए रोशनी देती हैं। यदि हम जग गए तो अपनी पूंछ भी बचा पाएंगे और अपने परिवेश को भी सुरक्षित कर पाएंगे। हमारे अपने बच्चे किन हालात से गुजरते होंगे ख़ासकर यदि वे विशेष हैं तो। हम बहुत कम ही ऐसे बच्चों के बारे में सोच पाते हैं कि फलां बच्चे के साथ परिवेश कैसे पेश आता है।  

शिक्षकीय दुनिया की कहानी के पात्र

कौशलेंद्र प्रपन्न ‘‘ इक्कीस साल के बाद पहली बार किसी कार्यशाला में बैठा हूं। बहुत अच्छा लग रहा है। वरना तो जी ...