Thursday, April 30, 2015

तुम्हारे समंदर को मीठा बना दूं


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तुम्हारे समंदर को मीठा बना दूं
घोल कर प्रीत की ढली
उलीच डालूं तुम्हारे खारेपन,
भर दूं आकंठ
मुहब्बत की तासीर
तुम्हारे खालीपन में बो दूं दूब संगी की
रात रात भर परेशां घूमने वाले परिंदों को
दिखा दूं राह
मुकम्मल कोई
चाहता हूं
कई बार
भर दूं तुम्हारे सूनपन में गीत प्रीत की।
पर कैसे
गा सकता हूं
कोई गीत सोहर के
या फिर मानर
कोई हल्दी के गीत
या फिर परिछन के राग।
कंठ में ही घूं घूं करते
दब जाते हैं
जब भी मुंह खोलता हूं
हजारों हजार चीखें
मक्खी की तरह भिन भिनाने लगती हैं
मुंह बंद कर कुंभक करने लगता हूं
चाहता तो हूं
तुम्हारे जिंदगी के खारेपन को मीठी डली में सान कर थाप दूं उपले।
जब सूख जाएं
लगा दूं आग
तुम्हारे खारेपन में
ताप लूं
तुम्हारी सारी नीरवता।
रात बिरात जो तुम तटों पर करवटें बदल कर परेशां होती हो
चाहता हूं,
कूल विहीन कर दूं
पर कहां संभव है
समंदर को मीठा कर पाना
लहरों को
समझाना कि इतना भी परेशां करना ठीक नहीं।
मैं लगा हूं
समंदर से बात करने में
फुसला रहा हूं उसे
कभी सीखे नदियों से कल कल बहना
मंथर गति से आगे निकल जाना
कूलों से टकराना
अंत में तुम्हीं में मिल जाना
सीखे तेरा खारा समंदर।

Thursday, April 23, 2015

teachers training on Varnmala and Poem teaching




Its a Hindi Varnmala and Poem teaching teachers training for EDMC teachers. 

तेरे शहर से


उम्मीदों भरे तेरे शहर से
नाउम्मीदों की पेाटली बांधे
निकल पड़ा उस पार
खेत यहीं रह गए
रह गई तेरी उम्मीदों के स्वर
बस मैं चलता हूं तेरे उम्मीदों के शहर से।
अगर मेरी बेटी पूछे
कहां गए बाबा
तो समय हो तो कह देना
खोजने गए हैं नई उम्मीद की खेती
जहां सूखा
बाढ़
हारी बीमारी
नहीं उजाड़ती जवान फसल
जहां कर्जदारी नहीं होती,
बस एक चीर शांति होती हो
लेकिन तेरे पिता वहां भी चलाना चाहते थे हाल
उगाना चाहते थे धान
चना,
बाजरा
बिदा करना चाहते थे
इस लगन में तुम्हें
लेकिन यह भी मौसम के मानिंद
उजड़ गया
कि ज्यों उजड़ जाती ही आंधी में मड़ैया।
उम्मीदों के तेरे शहर में
आया था लेने कुछ बीज
उम्मीदों की
घोषणाओं की
लेकर बीज क्या करता
कहां किस खेत में डालता,
यही सोच सोचकर
 तेरे साफ सफ्फाक शहरियों के बीच से जा रहा हूं
निराश नहीं हूं
किसान हूं
जेठ बैशाख हो या भादो
हमारा मन भर भरा ही रहता सदा
इस बार न सही
अगली बार उगा लूंगा
कुछ अनाज
बेच कर
कर दूंगा तेरे हाथ पीले।
देखते ही देखते
इस गगन में छा गयी काली बदराया
दूर कहीं बोलने लगे थे कौए
चील, गिद्धों को लग गई थी भनक
आज का भेजना हुआ मयस्सर
इस उजाड़ में।
तेरे शहर से उम्मीदों की पोटली लिए जा रहा हूं
तुम परेशां मत होना
वहां भी बोउंगा
गोड़ूंगा,
फसल तैयार होते ही काटूंगा,
वहां रहते हैं इंद्रा
बरसाएंगे रिमझिम बुंदकिया
तर हो जाएगा मन
उम्मीदों की फसल वहां नहीं उगती
नहीं मिलता लोन किसी भी बैंक से
न होंगे वहां तगादाकार
न होगी घोषणाओं की बौछार
जो बोउंगा वही काटूंगा।

Thursday, April 9, 2015

उनके देवता


मुर्दहिया पढ़ते वक्त देवताओं और देवालयों का विभाजित समाज आंखों के आगे नाचने लगता है। उनके देवता और हमारे देवता के वर्गीकरण को ध्यान से देखें तो पाएंगे कि समाज के शक्तिशाली और सत्ताधीशों के देवता और देवालयों के चरित्र स्पष्ट होते हैं। डाॅ तुलसी राम ने चमरिया माई और डीह बाबा का जिक्र करते हैं। चमरियां माई और डीह बाबा निम्न और दलित जाति के लोगों के देवता हैं। उनके देवता और देवालय गांव से बाहर मुर्दहिया के पास निरा वीराने मंे है। उनपर चढ़ने वाले प्रसाद और भक्तजन भी अगड़े लोगों से कई मायने में अलग हैं। जहां चमरिया माई और डीह बाबा पर शराब, डांगरों के मांस आदि चढ़ाएं जाते हैं वहीं अगड़ों के यहां इन चीजों को अछूत माना गया है। मुर्दहिया एक उदाहरण भर है जिसमें उनके देवता और देवालयों के चरित्र और सामाजिक बुनिवाट की बानगी मिलती है। यदि देश के अन्य दलित देवताओं और देवालयों की ओर नजर डालें तो वर्ग चरित्र और उनके और अगड़ों के देवताओं के खान-पान, वेश भूषा आदि में काफी अंतर देखने को मिलेगा।
सन् 2008 के अगस्त माह में एक बिजनेस अखबार ने एक खबर लगाई थी कि देश के सबसे अमीर और धनाढ्य मंदिर कौन से हैं। उन मंदिरों में रोज दिन कितने चढ़ावे चढ़ा करती हैं। रिपोर्ट के अनुसार एक दिन में 80 लाख से लेकर एक करोड़ तक के जेवर, सोना, चांदी और नकद आदि शिरिडिह के साई मंदिर पहले स्थान पर था और दूसरे नंबर पर मुंबई के सिद्धी विनायक मंदिर था। देश के इन दो मंदिरों में जितने चढ़ावे और कमाई होती है उस अनुपात में उनके देवताओं और देवालयों की गिनती कहीं भी भी नहीं होती। समय समय पर मंदिरों में चढ़ाने वाले चढ़ावे और उनकी कमाई को लेकर खबरें आती रही हैं लेकिन उनके देवताओं की खोज खबर तक नहीं ली जाती। यह जानना बड़ा ही दिलचस्प और आंख खोलने वाला हो सकता है कि देश भर में उनके देवताओं पर कितने चढ़ावे चढ़ते हैं और उनके देवता कितने महंगे वस्त्राभूषण पहनते हैं। हिन्दु देवी देवताओं के घर हर गली मुहल्ले में हैं। उनके आभूषण, वस्त्रसज्जा, चढ़ावे पर नजर दौड़ाएं तो पाएंगे कि एक दिन कम से कम इनती कमाई तो मंदिर के मालिक एवं पुजारी की हो जाती है कि जिससे अपने घर परिवार को अच्छे तरीके से चला पाते हैं। लेकिन गौरतलब यह भी है कि अमूमन मंदिरों में पुजारी भी ठेके पर रखे जाते हैं। मंदिर के प्रबंधक एवं मालिक मासिक वेतन पर काम करने वाले पंडि़त जी के साथ ठीक वैसे ही बर्ताव करते हैं जैसे अन्य कर्मचारियों के साथ मालिक व्यवहार करता है। यदि चढ़ावे, दान आदि से कुछ भी छुपा लेते हैं तब उनपर अनुशासनात्मक कार्यवाई की जाती है। मंदिर से तो निकाला ही जाता है साथ ही उनकी मार कुटाई भी होती है।
भारतीय मिथ शास्त्र पर नजर डालें तो पाएंगे कि अगड़ों और उनके देवताओं के भक्त भी अलग अलग हुआ करते थे। मंदिर में देवी देवताओं के पत्थर, वस्त्र, पहनावे सब के सब एक खास वर्ग की छवि पैदा करती है। यदि दिल्ली में ही मंदिरों के व्यापार व कहें व्यवसाय को देखें तो आंखें फटी की फटी रह जाएंगी। क्षमा चाहता हूं मैं मंदिर और इससे जुड़े तमाम ताम -झाम को व्यवसाय व व्यापार कह रहा हूं लेकिन यही सच है कि जो लोग मंदिरों को व्यापारी हैं उनके लिए धर्म व आस्था नाम की कोर्ठ चीज नहीं होती। उनकी नजरों में यदि कुछ होता है तो वह है मुनाफा। क्योंकि जिस तरह से दुकानों, मालों, व मंडियों में बोली लगा करती है उसी तरह मंदिरों की भी बोली लगा करती हैं। हरिद्वार के हरकी पौड़ी पर तमाम मंदिरों की एक साल की बोली लगती है। वहां मंदिर मालिकों से बात हुई तो बताया कि एक साल की कीमत 5 करोड़ है। हमें यह पैसे भक्तों से ही तो निकालने हैं। यही वजह है कि वहां पर हर मंदिर खुद को प्राचीन, अत्यंत प्राचीन गंगा मां का मंदिर होने के दावे किया करते हैं। लेकिन ध्यान हो कि 1990 के आस पास वहां सिर्फ तीन ही मंदिर हुआ करते थे। जो अब बढ़कर पांच से भी ज्यादा हो चुके हैं।
उनके डीह बाबा, चमरिया माई और उनके भक्तों में वह शक्ति शायद नहीं है कि जो आम चलते रास्ते, चैराहों आदि पर रातों रात मंदिर पैदा कर लें। उसके लिए काफी समीकरण बैठाने पड़ते हैं। हर शहर और गांवों में किस तरह और किनके द्वारा मंदिर रातों रात बन जाते हैं उनमें कितने मंदिर उनके होते हैं और कितने अगड़ों के यह जानना भी रोचक हो सकता है। उनके देवता टूटी ढहती हुई दीवारों और छत के नीचे रहा करते हैं वहीं दूसरे देवता चमचमाती रोशनी में नहाती दीवारों और छत के नीचे विश्राम किया करते हैं। एक ओर जहां दूध के जलढार करते भक्त जन हुआ करते हैं वहीं दूसरी ओर कुत्ते जहां पनढार किया करते हैं या देसी शराब चढ़ाए जाते हैं। गोरू डांगर, ताश पत्ती खेलने वालों के अड्डे उनके देवालयों होते हैं वही दूसरों के देवालयों में छप्पन भोग लगा करता है।

Tuesday, April 7, 2015

स्कूली शैक्षिक गुणवत्ता का दारोमदार




शिक्षा में गुणवत्ता की प्रकृति और सवाल को ठहर कर विचार करने की आवश्यकता है। गोया होता यूं है कि आनन फानन में हम शिक्षा और गुणवत्ता जैसे अहम सवालों को बड़ी ही जल्दबाजी में देखते और निर्णायक फरमान जारी कर देते हैं। जबकि यह मुद्दा जितना देखने में सहज और सरल लगता है वह दरअसल इतना भी एक रेखीए नहीं है। शिक्षा अपने आप में काफी गहन और विमर्शकारी है। पहली बात तो यही कि हमारा आज का समाज इस शिक्षा से क्या हासिल करना चाहता है। हमारी खुद की शिक्षा से क्या उम्मीदें हैं? जब तक इन्हें स्पष्ट नहीं कर लेते तब तक शिक्षा में गुणवत्ता जैसे खासे अहम सवाल को ऐसे ही गैर जिम्मेदाराना तरीके से व्याख्यायित करते रहेंगे और इसका ठिकरा सीधे सीधे शिक्षकों के मत्थे फोड़ते रहेंगे। जबकि ठहर कर विमर्श करें तो पाएंगे कि शिक्षक तो महज एक सिर है जिसका सिर बहुत आसानी से कूंचा जा सकता है। उसके बचाव में खड़े होने वाले बहुत कम लोग होंगे। शिक्षक संगठनों की अपनी चिंताएं होती हैं। जिसमें शिक्षक के मुद्दे महज नारों के लिए काम आते हैं। गौरतलब है कि नारे पूरे साल एक स्वर में नहीं लगाए जा सकते। उसके भी एक खास मौसम और वक्त हुआ करता है।
शिक्षा में गुणवत्ता का प्रश्न बार बार कई रूपों में उठते रहे हैं। सरकार से लेकर नागर समाज भी खासे गंभीर से लगते हैं। सरकार भी हर साल रस्म अदायगी की तरह अपनी रिपोर्ट जारी कर देती है कि फलां फलां कक्षा में बच्चों के दाखिले में बढ़ोत्तरी हुई। अमुक राज्यों में शौचालय, पीने का पानी, शिक्षकों के खाली पदों आदि से राहत मिल गई। आरटीई के पूरे ना सही कुछ ढ़ांचागत सुविधाएं स्कूलों में उपलब्ध करा दी गई हैं आदि। यहां सवाल उठता है कि क्या शिक्षा में महज चंदेक ढ़ांचागत सुविधाएं मुहैया करा देने से ही शिक्षा में गुणवत्ता का मसला हल हो जाता है। क्या गुणवत्ता का सरोकार सिर्फ शौचालय, पीने के पानी की सुविधाएं उपलब्ध करा देने से है? या कि शिक्षा के क्षेत्र में जब हम गुणवत्ता की बात करते हैं तो उसका अर्थ और व्यापक हो जाता है। इस पर हमें विचार करने की आवश्यकता है।
हाल ही में जारी मानव संसाधन विकास मंत्रालय की रिपोर्ट और नूपा की फ्लैस डैटा पर नजर डालें तो पाएंगे कि 2013 में जहां 81 लाख बच्चे स्कूल से बाहर थे 2014 में यह संख्या घट कर 60 लाख हो चुकी है। उसमें भी लड़कियों की संख्या में बढ़ोत्तरी देखी गई है। गौरतलब हो कि यह संख्या 2014-15 में भी अस्सी लाख बताए गए थे। संख्याओं से जिस तरह सरकारी और गैर सरकारी संस्थाएं खेलती हैं उसपर गौर करें तो पाएंगे कि इनकी चिंता महज संख्याओं में गिरावट दिखाना है। शिक्षा का स्तर और गुणवत्ता की क्या स्थिति है उससे ज्यादा साबका नहीं है। क्योंकि आंकड़ों का पहाड़ जितना खड़ा और गिराया जाता रहा है उसे देखकर एक छवि तो स्पष्ट हो जाती है कि हमारी ंिचंता आंकड़ों को दुरूस्त करना है न कि हकीकत को ठीक करना। इसी साल जनवरी में यूनिसेफ और यूनेस्को की रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी उस रिपोर्ट के अनुसार भारत में महज 14 लाख बच्चे ही स्कूल से बाहर रह गए थे। यह आंकड़ों का खेल कैसा है? क्या यह समझना बहुत कठिन है कि एक ओर भारत सरकार 60 लाख बच्चों को स्कूल से बाहर बताती है वहीं दूसरी संस्थाएं 14 लाख किस आधार पर दावे करती हैं? आखिर सच क्या है इसे जानने के लिए विभिन्न गैर सरकारी संस्थाओं की रिपोर्ट भी हमारी मदद करती हैं। मसलन असर, प्रथम, आरटीई फोरम या फिर नेशनल कोईलिएशन फार एजूकेशन आदि। इन संस्थानों की रिपोर्ट की बात करें तो अभी भी देश के तकरीबन 60 लाख बच्चे स्कूले से बाहर हैं। वहीं सरकारी दस्तावेजों की मानें तो यह संख्या 14 लाख है।
इन संख्याओं और और आंकड़ों के पहाड़ पर चढ़कर हकीकत नहीं जान सकते। हमें कुछ बुनियादी तथ्यों पर गौर करना होगा। क्या बच्चे कक्षा में अपनी उम्र और कक्षायी स्तर के अनुसार भाषा, गणित, विज्ञान आदि विषयों में दक्षता हासिल कर पा रहे हैं या नहीं। क्योंकि शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 हरेक उन बच्चों को जो 6 से 14 आयु वर्ग के हैं, को बुनियादी शिक्षा का संवैधानिक अधिकार प्रदान करता है। लेकिन यह कौन सुनिश्चित करेगा कि जो शिक्षा मिल रही है वह किस स्तर और गुणवत्ता वाली है। इस ओर यदि नजर दौड़ाएं तो पाएंगे कि स्कूल की शैक्षिक गुणवत्ता का दारोमदार सिर्फ शिक्षक के कंधे पर ही नहीं होता बल्कि हमें इसके लिए शिक्षक से हट कर उन संस्थानों की ओर भी देखना होगा जहां शिक्षकों को शिक्षण-प्रशिक्षण की तालीम दी जाती है। डाईट, एससीइआरटी जैसी प्रतिष्ठित संस्थानों में चलने वाली सेवा पूर्व शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रमों पर भी विमर्श करने की आवश्यकता है। अमूमन शिक्षण-प्रशिक्षण संस्थानों में जिस किस्म की प्रतिबद्धता और सीखने-सिखाने की प्रक्रिया चल रही है उसे भी दुरुस्त करने की आवश्यकता है। एक किस्म से इन संस्थानों में अकादमिक तालीम तो दी जाती है। लेकिन उन ज्ञान के संक्रमण की प्रक्रिया को कैसे रूचिकर बनाया जाए इस ओर भी गंभीरता से योजना बनाने और अमल में लाने की आवश्यकता है।
विभिन्न सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं की ओर से कराए गए सर्वे की रिपोर्ट पर नजर डालें तो पाएंगे कि उनका आकलन का औजार बच्चों में यह जांचना था कि बच्चा शब्दों को पढ़ पाता है या नहीं। उनका ध्यान इस बात पर था कि बच्चा लिख पाता है या नहीं? आकलन के चेक लिस्ट में शामिल यह होना चाहिए था कि बच्चा ध्वनियों को सुनकर पहचान और अंतर कर पाता है या नहीं। बच्चा चित्रों को देखकर उस पर कुछ वाक्य बोल पाता है या नहीं। आकलन के पैमाने पर हमारे सरकारी स्कूलों के बच्चे फिसलते हुए दिखाए गए। यह तो होना ही था क्योंकि इन बच्चों को जिन अध्यापकों से भाषा की तालीम मिलती है वो भी ऐसे ही स्कूलों से निकल कर आए हैं जहां भाषायी कौशल में वर्णों को पढ़ना और उन्हें लिखने के कौशल तक महदूद रखा गया।
यदि बच्चों में भाषा दक्षता की बात करते हैं तो सबसे पहले खुद में यह स्पष्ट होना चाहिए कि वर्णों की पहचान क्या पढ़ना है? या वर्णों को बोल लेना पढ़ना है? यदि गहराई से सोचें तो शायद हम इसे पढ़ना नहीं मानेंगे। यह वर्णों की पहचान व आकृतियों को देखने की आदत तो हो सकती है, लेकिन पढ़ने एवं समझने की श्रेणी में नहीं गिन सकते। अफसोस की बात है कि जब हम बच्चों की भाषायी समझ का आकलन करते हैं तब हमारा ध्यान इन्हीं कौशलों पर होता है। बच्चे किन किन शब्दों को ठीक से बोल, लिख और पढ़ लेते हैं। किन शब्दों को लिखने बोलने और पढ़ने में गलतियां कीं आदि आकलन के मुख्य बिंदु होते हैं। जबकि भाषा के कौशल व भाषायी समझ कहती है कि बच्चे की भाषायी दक्षता की परीक्षा कुछ वर्णों को रट कर सुना देने व पढ़ देने से नहीं की जा सकती। भाषा शिक्षण में बुनियादी खामियों पर नजर डालें तो यह समझना आसान हो जाएगा कि बच्चे क्यों नहीं पढ़ पाते? बच्चे इसलिए नहीं पढ़ पाते, क्योंकि उन्हें हम सबसे पहले लिखने और पढ़ने पर ज्यादा जोर देते हैं। जबकि होना यह चाहिए कि पहले ध्वनियों को सुनने की आदत उनमें विकसित करें। जब बच्चे ध्वनियों को सुनने में सक्षम हो जाएंगे तब वो उन ध्वनियों की नकल करना शुरू करेंगे और फिर बोलना शुरू करते हैं। लेकिन हमारी कोशिश और जोर लिखने पर ज्यादा होती है। इसलिए बच्चे सुनने से पहले लिखने के चक्कर में बाकी के भाषायी कौशल में पिछड़ते चले जाते हैं।
पढ़ना और समझना दोनों ही दो अलग अलग कौशल और अभ्यास की मांग करते हैं। बच्चों में पढ़ने के कौशल विकसित करने के लिए नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क 2005 बड़ी शिद्दत से रूपरेखा प्रस्तुत करती है। इसी के आधार पर रिमझिम किताब को तैयार किया गया। इसमें भाषा शिक्षण के तौर तरीकों पर तो काम किया ही गया है साथ ही भाषा शिक्षण को प्राथमिक स्तर पर कैसे रोचक और आनंदपूर्ण बनाया जाए इस पर भी जोर देता है। यदि रिमझिम किताब को देखें तो इसमें भाषा की कक्षा को रोचक और प्रभावी बनाने के लिए विभिन्न कक्षायी गतिविधियों को शामिल किया गया। इन गतिविधियों के मार्फत शिक्षक बच्चों को बड़ी सहजता से आनंद पूर्वक भाषा शिक्षण कर सकता है। बच्चों को भी उन गतिविधियों में मजा आएगा और भाषा के विभिन्न कौशलों को हासिल भी कर सकेंगे। बच्चों में लिखे हुए शब्द और वाक्यों को पढ़ने और समझने के कौशलों को बढ़ाने के लिए जिन गतिविधियों को शामिल किया गया है यदि उनका इस्तेमाल कक्षा में किया जाए तो परिणाम सकारात्मक निकल कर आएंगे। फिर यह शिकायत जाती रहेगी कि बच्चे को पढ़ना-लिखना नहीं आता।
गौरतलब है कि शैक्षिक गुणवत्ता के दावेदारों से यह पूछा जाना चाहिए कि क्या उन्होंने पाठ्यचर्याओं और पाठ्यपुस्तकों के वाचक की भूमिका से शिक्षकों को मुक्त कर देख सकने की कोशिश की है? क्या उनकी समझ में कक्षा में मौजूद बच्चों को वर्णों की पहचान करा देने भर की जिम्मेदारी है या फिर शिक्षक एक जीवन भर साथ चलने वाली वह छवि है जिससे कभी कभार हमें रोशनी मिलती है।

Thursday, April 2, 2015

भारतीय अर्थव्यवस्था में महिलाएं



भारतीय अर्थव्यवस्था में हम महिलाओं की उपस्थिति व योगादान पर गंभीरता से विमर्श करते हैं तो स्थितियां बहुत साफ और सकारात्मक नजर नहीं आतीं। क्योंकि हमारे पितृसतात्मक समाज में स्त्रियों को शिक्षा, ज्ञान और वर्चस्व में जगह देने की प्राथमिकता हाशिए पर रही हैं। यदि भारतीय इतिहास को इस दृष्टि से देखेें तो एक दो महिलाएं ही ध्यान में आती हैं जिन्हें शिक्षा और वेद- वेदांग पठन-पाठन में देख सकते हैैं। वहीं रामायण कालीन स्त्रियों की स्थिति पर नजर डालें तो पाएंगे कि उसी समाज में एक ओर महिलाएं अपभ्रंश और अन्य क्षेत्रिय भाषाओं का इस्तमाल करती थीं वहीं राजदरबार में पुरुष संस्कृत बोला करते थे। इससे भी एक छवि स्पष्ट होती है कि महिलाओं को हमने भाषा, राज-समाज और अर्थ में कितना और किस स्तर पर रखते थे। उत्तररामचरित संस्कृत की कृति में इसकी झलकियां खूब मिलती हैं।
भारत के अर्थव्यवस्था में महिलाओं को किस तरह से जोड़ने का प्रयास आजादी के बाद हुआ है इसपर नजर डालने की आवश्यकता है। हमने आज तक राज-सत्ता में महिलाओं को विभिन्न पदों पर तो स्थापित किया है लेकिन अर्थव्यवस्था यानी की वित्त-मंत्रालय अभी भी महिला मंत्री से वंचित रहा है। विदेश-मंत्रालाय, शिक्षा मंत्रालय एवं अन्य विभागों में तो महिलाओं को हमने मुख्यधारा में शामिल किया है लेकिन अफसोस की बात है कि हमने कभी इस अहम मंत्रालय में महिला को स्थान नहीं दिया।
जहां तक महिलाओं की अर्थ-जगत में उपस्थिति का मुद्दा है हमने अंतरराष्टीय फलक पर भी देखा है कि महिलाओं के श्रम को कमतर आंका गया है। माना जाता है कि महिलाओं को गृह कार्य बिन पेड कार्य र्है। एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं के दिन के 8 से 9 घंटे से भी ज्यादा घर के कामों को गंभीरता से नहीं लिया जाता और न ही उनके इस कार्य की कहीं संज्ञान में ही ली जाती है।
विभिन्न क्षेत्रों और पदों पर आज महिलाएं कार्यरत हैं। वे प्रकारांतर से अर्थव्यवस्था में विकास को लेकर अपना योगदान दे रही हैं। वे चाहे बैंक सेक्टर में हो या आॅटो मोबाइल क्षेत्र में, शिक्षा का क्षेत्र हो या फिर लघु उद्योग हर क्षेत्र में आज महिलाएं अपनी क्षमता और कौशल के जरिए भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत ही कर रही हैं। लेकिन उनके इस योगदान को वह तवज्जो नहीं मिलता जो एक पुरुष को मिलता है। यहां हम लिंगाधारित भेदभाव और भारतीय संविधान की मौलिक अधिकार एवं 19 ए की स्थापनाओं को छिन्न-भिन्न करते हैं।
सच पूछा जाए तो भारतीस जनमानस को इस तथ्य को स्वीकारने में ही बड़ी समस्या रही है कि महिलाएं ज्ञान-विज्ञान और अर्थ के क्षेत्र में कुशल घटक भी हो सकती हैं। सबसे पहले हमारे समाज को इस तरह की पूर्वग्रहों से उबरना होगा। तभी हम समाज में समतामूलक और सभी के लिए विकास के समान अवसर मुहैया करा सकते हैं। वरना यह अन्य मूल्यपरक स्थापनाओं और मान्यताओं की तरह ही महज आदर्श वचन और राम राज्य की अवधारणा बन कर रह जाएगी। स्त्रियां आज जहां हैं वहां से कुछ दूर तो जा सकती हैं, अपना देह तो तोड़ सकती हैं लेकिन फिर भी उनके काम और योगदान को मुकम्मल पहचान और मान्यता नहीं मिल पाएगी।

Thursday, March 26, 2015

पांच साल का वक्त कम है आरटीई को आंकने के लिए


कौशलेंद्र प्रपन्न
शिक्षा का अधिकार अधिनियम कितना सफल हुआ और हमारे समाज पर क्या असर हुआ इससे टटोलने के लिए पांच साल का समय ज्यादा नहीं है। हम कुछ ज्यादा ही उत्साह से भर गए हैं और न्याय करने के दहलीज पर खड़े हैं। जरा कल्पना करें कि जिस कानून को बनने में तकरीबन 100 साल का वक्त लगा। जिसे मुकम्मल करने के लिए लगभग 1911 से संघर्ष किया जारी थी उसके परिणाम को लेकर हम कुछ ज्यादा ही जल्दबाजी कर रहे हैं। यूं तो 31 मार्च 2015 अंतिम तारीख है कि हम सभी 6 से 14 साल तक के बच्चों को बुनियादी शिक्षा हासिल करा देंगे।
भारत के विभिन्न राज्यों की स्कूल की बुनियादी हालत पर नजर डालें तो पता चलेगा कि आरटीई को पूरी तरह से कार्यान्वित होने में कम से कम दस साल का समय भी कम पड़ेगा। यदि नेशनल कोईलिएशन फाॅर एजूकेशन की रिपोर्ट की मानें तो देश के विभिन्न राज्यों में वर्तमान में चलने वाले सरकारी स्कूलों को बंद किया जा रहा है। राजस्थान में 17,129, गुजरात में 13,450, महाराष्ट में 13,905, कर्नाटक में 12,000, आंध्र प्रदेश में 5,503 स्कूल बंद कर दिए गए। इतना ही नहीं बल्कि कई राज्यों में शिक्षकों के पद खाली पड़े हैं। कल्पना करना कठिन नहीं है कि जिन राज्यों में पर्याप्त शिक्षक, स्कूल आदि ही नहीं हैं वहां आरटीई किस आधार पर काम करेगी। पांच लाख से भी ज्यादा शिक्षकों के पद रिक्त हैं। जहां स्कूल हैं वहां शिक्षक नहीं और जहां शिक्षक हैं वहां बच्चे नदारत हैं। दूसरी बड़ी समस्या यह भी है कि जहां शिक्षक नहीं हैं वहां पैरा टीचर, शिक्षा मित्र एवं अन्य संज्ञाओं से काम चलाए जा रहे हैं। शिक्षा की गुणवत्ता पर असर डालने वाले और भी मुख्य घटक हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं कर सकते।
असर, प्रथम, डाइस आदि सरकारी और गैर सरकारी संस्थाआंे की चिंता शिक्षा में गुणवत्ता को लेकर रही है। इन संस्थाओं के रिपोर्ट पर नजर दौड़़ाएं तो पाएंगे कि बच्चों को अपनी कक्षा व आयु के अनुसार जिस स्तर की भाषायी और विषय की समझ होनी चाहिए वह नहीं है। असर, प्रथम और डाइस की रिपोर्ट चीख चीख कर बताती हैं कि कक्षा छठीं में पढ़ने वाले बच्चों को कक्षा एक और दो के स्तर की भाषायी कौशल एवं गणित की समझ नहीं है। इसका अर्थ यही निकलता है कि ओर हमारा ध्यान महज कक्षाओं में भीड़ इकत्र करना है और संख्या बल पर यह घोषणा करनी है कि हमने फलां फलां राज्य में सभी बच्चों को स्कूल में प्रवेश करा चुके हैं। वहीं हमारा ध्यान किस स्तर की शिक्षा बच्चे हासिल कर रहे हैं वह हमारी चिंता का विषय नहीं है।
बुनियादी शिक्षा की गुणवत्ता को सीधे सीधे प्रभावित करने वाले जिन तत्वों को हम मोटे तौर पर देख और समझ पाते हैं उनमें शिक्षक, पाठ्यक्रम, पाठ्यपुस्तक और स्कूली परिवेश शामिल हैं। जब जिम्मेदारी का ठीकरा फोड़ने की बारी आती है तब सबसे माकूल सिर हमें शिक्षक का नजर आता है। कुछ गलत हुआ या स्कूल में नहीं हो रहा है तो उसकी जिम्मेदारी शिक्षक की है। जबकि ठहर कर देखने और समझने की कोशिश करें तो शिक्षक तो एक अंग मात्र है जिसके कंधे पर इसकी जिम्मेदारी दी गई है। बुनियादी शिक्षा की गुणवत्ता न केवल एक कंधे पर है बल्कि और भी कंधे हैं जिन्हें पहचान कर मजबूत करने होंगे। हमारे स्कूलो में प्रािक्षित शिक्षकों की खासा कमी है। यदि आंकड़ों की बात करें तो डाईस की 2013-14 के अनुसार अस्सी फीसदी शिक्षक व्यावसायिक तौर पर प्रशिक्षित हैं। डाईस की ही 2013-14 की रिपोर्ट पर नजर डालें तो पाएंगे कि सरकारी स्कूलों के महज 46 फीसदी शिक्षक जो कि संविदा पर काम कर रहे हैं वे प्रशिक्षित हैं। वहीं स्थिाई शिक्षकों में से 17 फीसदी शिक्षक सिर्फ प्रशिक्षित हैं। अब अनुमान लगाया जा सकता है कि जिन स्कूलों में प्रशिक्षित शिक्षक नहीं हैं वहां किस स्तर की गुणवत्तापूर्ण सीखना-सिखाना हो रहा होगा। आरटीई फोरम की रिपोर्ट के अनुसार बिहार में 51.51, छत्तीसगढ़ में 29.98, असम में 11.43, हिमाचल में 9.01, उत्तर प्रदेश में 27.99, पश्चिम बंगाल में 40.50 फीसदी आदि राज्यों में शिक्षक प्रशिक्षित नहीं हैं।
माना जा रहा है कि आरटीई के पांच साल तो पूरे हो गए लेकिन यह अभी पूरी तरह से सफल नहीं हुआ। यहां सवाल उठना जायज है कि क्या पांच वर्ष किसी भी, उस पर भी शिक्षा कानून के असर को देखना और कोई पूर्वग्रह बनाना कुछ जल्दबाजी ही होगी। अभी हमें कुछ और समय और सुविधाएं देने की आवश्यकता है। इतना ही नहीं बल्कि अवसर के साथ ही सुविधाएं एवं प्रशिक्षण की ओर भी ध्यान देने की आवश्यकता है।

Tuesday, March 24, 2015

अपने शहर को पीठ पर लादे हुए


अपने शहर से अब भी पीछा नहीं छूटा,
न छूटा था तब
जब छोटे थे
जब शहर की चैहद्दी को नाप लेते थे साइकिल से,
पिताजी के संग टहल आते थे सोन।
शहर के मिज़ाज से परिचय था शायद पुराना,
जहां भी जाता रात होते न होते लौट आता था अपने शहर
मामी कहा भी करतीं
का रखल है तुम्हरे शहर में?
है कोई कचहरी
है तुम्हरा शहर जिला?
का है तोहर शहर में?
एक कारखाना हुआ करता था तेरे शहर के बीचो बीच
अब तो उसकी चिमनी भी उदास मंुह उठाए खड़ी है।
बचपन का वह शहर
थाना चैक पर हरी ताजी सब्जियों,फलों का शहर,
माॅल, चकाचक बाजारों से दूर मेरा शहर
दो नदियों की गोद में लेटा मेरा शहर
छूटता नहीं
कि जैसे कोई बच्चा नहीं छोड़ता मां का अचरा
कि जैसे नहीं छूटता बचपन की लड़ाई के बाद मिलान।
शहर को लादे लादे यहां तक चला गया
और कितना दूर लेकर जा सकूंगा अपने शहर को
पीठ भी जख़्मों से भरा है
सांसें भी उखड़ सी रही हैं
फिर भी कुछ है मेरे शहर में
जो नहीं छूटता छोड़ने के बाद भी।
झाबर मल गली की लस्सी,
कचैरी गली की मिठाई,
कुछ भी नहीं छूटा अब तलक,
बसा है जेहन में अइनी काट का बांध,
और छठ में सुबह सुबर बालू पर दौड़,
भइया के साथ छुट्टियों में सोन में नहाना,
सोन तो गोया
दौड़ता ही रहता है जब तब।
कहते हैं इसी शहर में ठहरे थे बंकिम चंद,
लिखा था कुछ अंश उपन्यास का,
हां वही शहर जो अब रोता है दिन के उजाले में
रात बहाता है आंसू अपनी बेहाली पर,
न रोजगार है,
न कारखाना,
फिर भी न जाने क्यूं बसा है शहर कहीं गहरे कील की तरह।






बाल साहित्य और शिक्षा समीक्षा से बाहर


कौशलेंद्र प्रपन्न

कविता, कहानी, उपन्यास, यात्रा वृत्तांत आदि साहित्य की विधाओं में खूब लिखी और छापी जा रही हैं। किताबें की सूची बनाई जाए तो वह हजारों की संख्या सहजता से पार कर जाएंगी। लेकिन यदि बच्चों के लिए लिखी गई किताबों की सूची देखने चलें तो वहां हम 10-20 के बाद हांफने लगते हैं। यही हाल शिक्षा का भी है। बाल और शिक्षा गोया साहित्य का हिस्सा ही नहीं माना जाता। शायद यही वजह है कि जब पूरे साल का लेखा जोखा लिखा जाता है तब बाल और शिक्षा उन आकलनों से नदारत होती हैं। यदि आप यही जानना चाहें कि इस वर्ष बच्चों के लिए कौन सी किताब आई तो आपके हाथ निराशा ही लगेगी। कविता, कहानी, उपन्यास विधा की किताबों से कोई गुरेज नहीं है लेकिन क्या बाल और शिक्षा विधा को हाशिए पर ढकेल कर एक मुकम्मल तस्वीर की कल्पना की जा सकती है? क्या भविष्य के पाठक के लिए ऐसी जमीन की उपतजाउ है? कुछ और भी सवाल हैं जिनसे मुंह नहीं मोड़ सकते। दरअसल बाल और शिक्षा शास्त्र विधा में कम लिखे जाने के कारणों पर विचार करें तो पाएंगे कि यहां बाजार और आथर््िाक पहलू ज्यादा हावी है। यदि बाल एवं शिक्षा साहित्य के खरीद्दार न के बराबर हैं तो ऐसे में प्रकाशक इस दुखते रग पर हाथ नहीं धरना चाहता। इसका अर्थ यह भी नहीं कि कविता, कहानी, उपन्यास के बाजार गरम हैं। हां इन किताबों के लोर्कापण तो होते हैं लेकिन उन्हें भी पाठकों के राह जोहने पड़ते हैं। संभव है कविता, कहानी के पाठक ज्यादातर वे होते हैं जिन्हें भेंट स्वरूप किताबें मिलती हैं। जिन्हें पढ़कर मित्रों को एहसास करना होता है कि हां हमने तुम्हारी किताब पढ़ी बहुत अच्छी है। इस अच्छी की परिभाषा पर न जाएं। क्योंकि उन्हें महज एक दो कहानी व कविता पढ़कर अपनी राय बना लेते हैं। दरअसल अभी कविता,कहानी आदि की किताबों की समालोचना होना बाकी है। विभिन्न प्रकाशकों के सूची पत्रों से गुजरने के बाद जो हाथ लगता है वह बेहद निराशाजनक ही कहा जाएगा।
हिन्दी के प्रकाशक जिस तरह की बाल किताबें छापते हैं उनमें ज्यादातर बाल कहानियां, बाल गीत होती हैं। दूसरे स्तर की वे किताबें मिलेंगी जो सिर्फ नसीहतें देती मिलेंगी। जैसे बच्चे कैसे सीखते हैं, बाल मन के गीत, बाल नाटक, मंदबुद्धी बच्चे आदि। इन किताबों की विषयी समझ और फैलाव पर नजर डालें तो ये किताबें बड़ों कह नजर से बच्चों की दुनिया को देखने की कवायदें ज्यादा लगेंगी। बच्चों के लिए उपयागी किताबें की संख्या बेहद कम हैं। जो बाजार में उपलब्घ हैं वे अंगे्रजी की किताबें हैं या फिर बाल गीत हैं। क्या बाल साहित्य सिर्फ बाल गीत, बाल कहानियां भर ही हैं। इस पर विमर्श करने की आवश्यकता है।
बच्चे कैसे सीखते हैं, भाषा शिक्षण के तौर तरीके क्या हों, कहानी कैसे कही जाए, कक्षा में भाषा और बोली, बच्चों की कहानियां कैसी हों आदि ऐसे विषय हैं जिन पर लेख, किताबें लिखी जानी चाहिए। यदि 2014 में प्रकाशित कुछ किताबों पर नजर डालें तो विभिन्न प्रकाशकों की सूची में बाल साहित्य और शिक्षा की किताबें 50 से ज्यादा नहीं हैं। वहीं अन्य कविता, कहानी की किताबें हजार की संख्या आसानी से पार कर जाएंगी।  भाषा और शिक्षा से संबंधित ‘समाज, बच्चे-बच्चियां और शिक्षा’, ‘सवालों की शिक्षा’ वीरेंद्र रावत की लिखी इन दो किताबों से गुजरना गणित शिक्षण, कक्षा अवलोकन, भाषा की बुनियादी शैक्षिक समझ की विस्तार से विमर्श करती चलती है। वहीं कई प्रासंगिक दस्तावेजों की रोशनी में यह किताब नेशनल करिकूलम फ्रेमवर्क की परिभाषित भी करती है। भाषा, बच्चे और शिक्षा, कौशलेंद्र प्रपन्न की किताब सड़क पर भटकने वाले लाखों बच्चों को समर्पित है। इस किताब में भाषा से संबंधित शिक्षण विधि, भाषा की प्रकृति-भूगोल की जानकारी तो देती ही है साथ ही बच्चों के अधिकारों के लिए 1989 में संपन्न संयुक्त राष्ट बाल अधिकार सम्मेलन की पांच बाल अधिकारों की रोशनी में भारत के बच्चों को देखती और विमर्श करती है। प्रेमपाल शर्मा की किताब ‘शिक्षा भाषा और प्रशासन’, शिक्षा के सरोकार 2014, पढ़ने का आनंद 2013, भाषा का भविष्य 2012। यदि 2014 में प्रकाशित ‘शिक्षा के सरोकार’ के कथ्य पर नजर डालें तो पाएंगे कि हिन्दी माध्यम और भाषा शिक्षण को लेकर उठे यूपीएससी की विवाद बवंड़र को ठहर कर विचारने की ओर प्रेरित करता है।
यदि बड़े प्रकाशकों की प्रकाशित किताबों की सूची देखें तो प्रेमचंद की कहानियां प्रमुखता से छापी जा रही हैं। वहीं दूसरे ज्यादा छपने वाले लेखक रवींद्र नाथ टैगोर हैं जिनकी कहानियां भी पेपर बैक में छपी हैं। राजकमल प्रकाशन की बच्चों की किताबों में प्रेमचंद, टैगोर, रवि शंकर आदि की किताबें ज्यादा हैं। जो विभिन्न मुद्दों पर लिखी गई हैं। एक ओर कृष्ण कुमार किताब मैं नहीं नहीं पढ़ूंगा है वहीं दूसरे ओर बड़े भाई साहब, सवा सेर गेहूं, गिल्ली डंड़ा और रवि शंकर की नालंदा, राममनोहर लोहिया,प्रवासी पक्षियों का बसेरा आदि टाईटिल मिलती हैं। वहीं प्रभात प्रकाशन की ओर शिक्षा पर बारह टाइटिल छापे गए हैं। लेकिन उन किताबों का प्रकाशन वर्ष स्पष्ट नहीं है कि कितनी किताबें 2014 में छपीं। लेखकों में शामिल हैं दीनानाथ बत्रा, देवेंद्र स्वरूप, जगमोहन सिंह राजपूत, जे एस अग्रवाल जो एक खास विचारधारा से संबंधित हैं। इनमें दीनानाथ बत्र की ‘‘ भारतीय शिक्षा का स्वरूप’’, जे एस राजपूत की किताब ‘‘ शैक्षिक परिवत्र्तन का यथार्थ’’, देवेंद्र स्वरूप किताब ‘‘ राष्टीय शिक्षा आंदोलन का इतिहास’’ शामिल है। बाल कथाओं में विष्णु प्रभाकर, श्रीरामवृक्ष बेनीपुरी, प्रकाश मनु, हरीश शर्मा आदि की रोचक बाल कहानियों की किताबें मिलेंगी। हितोपदेश की कहानियां, उपनिषद की कहानियां, चुनी हुई बाल कहानियां, सात बहनों की लोक कथाएं आदि बच्चों के लिए टाइटिल हैं। पंचतंत्र की कहानियां, पूर्वोंत्तर की लोकगाथाएं आदि बाल किताबों पर नजर डालें तो एकबारगी बच्चों पर नैतिक शिक्षा, मूल्य, प्राचीन कथाओं पर पढ़ाने पर जोर दिया गया है।
आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा और बाल साहित्य को नजरअंदाज किया जाए बल्कि उन साहित्यों को भी मुख्यधारा की समीक्षा और सूची में मकूल स्थान दिया जाए। क्योंकि बाल साहित्य और शिक्षायी किताबों को हाशिए पर रख कर साहित्य के वृहद् परिदृश्य की कल्पना करना मुश्किल है। संभव है इस लेख में कुछ किताबें यहां छूट गईं हों लेकिन उसके पीछे कोई सोची समझी रणनीति नहीं है।

Wednesday, March 18, 2015

बजट में शिक्षा पर चली कैंची


कौशलेंद्र प्रपन्न
शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए हमारा सालाना बजट और केंद्र सरकार किस नजर से देखती है इसका अंदाजा लगाना हो तो हमें इस साल के 2015-16 के बजट को देखना दिलचस्प होगा। हमें यह भी याद रखना होगा कि 1964-66 में कोठारी आयोग ने प्रारम्भिक शिक्षा की बेहतरी के लिए जितनी राशि की आवश्यकता की मांग की थी हम उसे देने में काफी पीछे हैं। कोठारी आयोग ने तब सकल घरेलु उत्पाद के 6 फीसदी शिक्षा को देने की सिफारिश की थी। लेकिन यह हम पिछले दो तीन सालों के बजट को देखें तो शिक्षा में सुधार और गुणवत्ता को ध्यान में रखते हुए हर साल बजट में बढ़ोत्तरी देखी जा सकती हैं। लेकिन 2015-16 के बजट में ऐसा क्या हुआ कि शिक्षा के मद में मिलने वाले आर्थिक राशि में इतनी बड़ी कटौती की गई। गौरतलब हो कि 1990 में जिस ‘सभी के लिए शिक्षा’ यानी ‘एजूकेशन फार आॅल’ में के लक्ष्यों में यह भी शामिल किया गया था कि 2010 फिर 2015 तक सभी के लिए शिक्षा मुहैया करा देंगे। वहीं यह भी घोषित किया गया था कि बुनियादी शिक्षा में लड़की/लड़के के अंतर को पाट सकेंगे। सभी बच्चे यानी 6-14 आयुवर्ग के बच्चे बुनियादी शिक्षा हासिल कर लेंगे। इन्हीं अंतरराष्टीय प्रतिबद्धताओं के मद्दे नजर हमने शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 को पूरे देश में 1 अप्रैल 2010 को लागू किया। इसी तारीख को इसकी अंतिम तारीख भी तय की गई थी जो 31 मार्च 2015 है। ध्यान हो कि यह अंतिम तारीख भी हमसे महज पंद्रह दिन दूर है।
यदि आम बजट पर नजर डालें तो शहरी विकास, आईटी, आर्थिक बाजार आदि को खासे तवज्जो दिया गया है। लेकिन शिक्षा हमारी चिंता से कोसों दूर है। सर्व शिक्षा अभियान जिसके तहत बुनियादी स्कूल एवं बच्चों की शैक्षिक गतिविधियों को शामिल किया गया। इस मद में हर साल पैसे करोड़ों में दिए जाते थे ताकि कोई भी कार्यक्रम पैसे की कमी की वजह से न रूके। लेकिन 2015-16 के बजट पर एसएसए के मद में मिलने वाले 27,758 रुपए को घटाकर 22,000 करोड़ कर दिया गया। वहीं मिड डे मिल जिसकी वजह से देश भर में बच्चे कम से कम दोपहर के भोजन की ओर स्कूल में आए इसके वर्तमान बजट 13,215 करोड़ रुपए को घटाकर 9,236 करोड़ कर दिया गया। यह अलग विमर्श का मुद्दा है कि स्कूलों में इस दोपहर भोजन में क्या और किस स्तर के भोजन बच्चों को दिए गए और कितने बच्चे बीमार पड़े और कितने बच्चें हमारे बीच से उठ गए। वहीं उच्च माध्यमिक और माध्यमिक शिक्षा की गुणवत्ता को बेहतर बनाने के लिए राष्टीय माध्यमिक शिक्षा अभियान ‘रमसा’ को मिलने वाले 5,000 रुपए को भी कम कर 3,565 करोड़ रुपए कर किया गया। कुल मिल कर आम बजट में शिक्षा को मिलने वाली राशि की कटौती प्रतिशत में बात करें तो यह 17 फीसदी की कटौती बनती है।
गौरतलब है कि एक ओर सरकार और सरकारी दस्तावेज वहीं दूसरी ओर गैर सरकारी संस्थाएं स्कूलों और बच्चों के जो आंकड़े पेश कर रहे हैं उसे देखते हुए यह अंदाज लगाना जरा भी कठिन नहीं है कि सरकार की नजर में शिक्षा कितनी अहम है। सरकार तमाम विकास-यात्रा की बात करती हो लेकिन शिक्षा उसकी चिंता से बाहर है। बल्कि कहना चाहिए कि महज तरह के तरह अभियान और योजनाएं तो सरकार चला देती है लेकिन उसकी निगारनी का कोई सुनिश्चित रणनीति और मैकेनिज्म नहीं है। यदि वजह है कि एक ओर सरकारी दस्तावेज पिछले साल अगस्त में जहां 80 लाख बच्चों के स्कूल से बाहर होने की बात करती है वहीं छः माह बात यूनेस्को और यूनिसेफ की जनवरी 2015 की रिपोर्ट मानती है कि भारत में 14 लाख बच्चे स्कूल से बाहर हैं। यह आंकड़ों की उलटबासी समझी जा सकती है। हाल ही में राज्य सभा न्यूज चैनल पर टेलिकास्ट सरोकार कार्यक्रम में असर, आरटीइ फारम एवं अन्य विद्वानों से स्वीकारा कि अभी भी हमारी पहंुच स्कूलों और बच्चों से काफी दूर है। आरटीई फोरम की हालिया रिपोर्ट पर नजर डालें तो पाएंगे कि अभी भी अस्सी लाख बच्चे स्कूल से बाहर है। वहीं 5 लाख से ज्यादा प्रशिक्षित शिक्षकों के पद खाली पड़े हैं।
शिक्षा में गुणवत्ता और बच्चों तक पहंुचने वाली शिक्षा किस स्तर की है उसका जायजा लें तो असर की रिपोर्ट इस बाबत हमारी मदद करता है। असर के रिपोर्ट की मानें तो हमारे बच्चे कक्षा पांच व छः में पढ़ने वाले बच्चे न तो एक गद्यांश पढ़ सकते हैं और न पढ़े हुए टैक्स्ट को समझ सकते हैं। न केवल भाषा में बल्कि गणित और विज्ञान में भी यही हाल है। सामान्य जोड़ घटाव करने में भी हमारे बच्चे पीछे हैं। जिस देश की भविष्यनिधि ऐसी होगी उसका भविष्य कितना उज्ज्वल होगा इसका अनुमान लगाया जा सकता है।
समाज में यह धारणा मजबूती से पैठ चुकी है कि हमारे सरकारी स्कूल न इस लायक नहीं रहे कि हम अपने बच्चों को वहां भेज सकें। हमारे पास विकल्प के तौर पर निजी स्कूली ‘गुणवत्ता का सवाल न करें’ ही बचते हैं। जबकि ध्सान देने की बात है कि हमारा सरकारी स्कूलों का तंत्र और शिक्षक वर्ग जिस गुणवत्ता के हैं हम उनकी दक्षता का सही सदुपयोग नहीं कर पा रहे हैं। उस तुर्रा यह कि हम अपने सरकारी स्कूलों को निजी संस्थानों को सौंपने का मन बना चुके हैं।

Wednesday, February 25, 2015

छपी हुई किताबें



कौशलेंद्र प्रपन्न
पुस्तकें होती ही हैं पाठकों के लिए। और लेखक भी पाठकों के लिए ही लिखता है। यह अलग बात है कि आज जिस रफ्तार से किताबंे लिखी और छापी जा रही हैं उसका एक उद्देश्य ख़ास पुरस्कार, सम्मान पाना भी प्रकारांतर से लेखकीय मनसा होता है। मनसा तो यह भी होता है कि किस तरह अपनी किताब का प्रमोशन करूं कि ज्यादा से ज्यादा प्रतियां बिकें और अखबारों में उसकी समीक्षा की झड़ी लग जाए। लेकिन लेखक भूल जाता है कि किताबें अपनी कंटेंट और शिल्प की वजह से ख़्याति हासिल करता है न कि हथकंड़े अपनाने से। हथकंड़ों से कुछ प्रतियां तो लाइब्रेरी में खरीदवाई जा सकती हैं, लेकिन वह पाठकों के पहंुच से दूर ही होती हैं। महज विश्व पुस्तक मेले में बहुतायत मात्रा में पुस्तकों के लोकार्पण का भी मामला नहीं है बल्कि हर पुस्तक मेले में इस तरह की कवायदें हुआ करती हैं। लेकिन इस हकीकत से भी मुंह नहीं फेर सकते कि जिस रफ्तार से किताबों का लोकार्पण पुस्तक मेले में हुआ करते हैं वे उसी तेजी के साथ काल के गाल में भी समा जाती हैं।
कोई भी किताब अपनी गुणवत्ता और कंटेट के बदौलत वर्षांे वर्षों तक पढ़ी और पुनव्र्याख्यायित होती रही हैं। ईदगाह, उसने कहा था, दो बैलों की कथा, सूखा, चित्रलेखा, स्मृति की रेखाएं, चीफ की दावत, दोपहर का भोजन, जिंदगी और जांेक आदि हमारे सामने उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत हैं। इनके लेखकों ने तथाकथित कोई चलताउ प्रयास अपनी रचना को लेकर नहीं की। बल्कि उनकी रचना खुद अपनी पठनीयता की पैरवी करती हैं। लेखक के प्रयास किताब की कथानक के आगे कम पड़ जाती हैं। लेखक का वास्ता महज लिखने तक होता है। लिख लिए जाने के बाद किताब पर हक और दावेदारी लेखक से ज्यादा पाठक-समाज की हो जाती है। पाठक - और प्रबुद्ध समाज उस लिखे हुए शब्द-विचार समाज को ही सच्चाई मान कर चलता है। लेखक लिख लिए जाने के बाद दूसरी किताब पर काम शुरू कर देता है। निर्मल वर्मा के साथ इन पंक्तियों के लेखक ने सरस्वती सम्मान मिलने पर बातचीत की थी तो उन्होंने कहा था कि लेखक के तौर पर मुझे जो कहना था वह मैंने अपनी किताबों में लिख चुका हूं। एक बार पुस्तक लिख लेने के बाद मैं अपनी अगली किताब की परिकल्पना में जुट जाता हूं। एक लेखक के तौर पर क्योंकि पूर्व किताब में उसे जो और जितना कहना था वह कह चुका। अब उसके हाथ से वह किताब निकल चुकी। हां यह अलग विमर्श का मुद्दा हो सकता है कि लेखक अपनी पूर्व स्थापनाओं को पुनर्परिभाषित करना चाहता है तब वह पूरक किताब लिखता है।
आज लेखन भी बाजार का हिस्सा बन चुका है। जो जितना और जिस गंभीरता के साथ बाजार के अर्थशास्त्र को समझते हुए लेखन करता है उसकी लिखी किताब उसी अनुपात में लेखक को अर्थ एवं ख्याति को लौटाता है। यहां बाजार को ध्यान में रखकर लेखन का अर्थ यह है कि पाठक जिस तरह के लेखन को पढ़ना चाहता है लेखक उसी तरह का लेखन करता है। ऐसे लेखक अब हिन्दी में भी तेजी से बढ़ रहे हैं। ऐसे लेखकों को बाजार भी हाथों हाथ लेती है। ऐसे लेखन का मूल्यांकन होना अभी शेष है। जब इतिहास ऐसे लेखन का मूल्यांकन करेगा तब पता चलेगा कि अमुक लेखक की कृति कितना सार्थक है व समय के प्रवाह में लिखी गई तात्कालिक रचना है।
कविता, कहानी, उपन्यास, व्यंग्य आदि ऐसी खुली जगह और संभावनाएं हैं जिस क्षेत्र में अमूूमन लेखक हाथ आजमाता है। कविता की भूमि इस दृष्टि से ज्यादा उर्वरा है। इस क्षेत्र में लेखनी तेजी से चल रही है। जैसा कि कहा जा चुका है कि रचना किस स्तर की है और उसकी प्रासंगिकता कितनी है इसका विश्लेषण करने पर ही मालूम चल सकता है। लेकिन एक प्रवृत्ति व जल्दबाजी देखी जाती है कि किसी भी पुस्तक मेले में जब कोई पुस्तक लोकार्पित होती है मंचासीन लेखक, अतिथि, वक्ता बड़ी ही विकल होकर किताब और लेखक की तुलना या तो पूर्व के बड़े लेखकों से कर लेखक को खुश करने की कोशिश करते हैं या फिर पहली ही किताब पर लानत मलानत देने लग जाते हैं। निराशा, कुंठा, अकेलापन आदि भावदशाओं के दबावों में लिखने से बचने के टोटके और मंत्र भी बतलाने से नहीं हिचकते। पहली बात तो यही कि फलां ने लिखने की कोशिश तो की। उसकी इस कोशिश की सराहना करने की बजाए उसके उत्साह पर मट्ठा डालना उचित नहीं है। आज की तारीख में लेखक के पास छपने और प्रकाशन के कई सारे विकल्प उपलब्ध हैं। एक ओर लेखक या तो अपनी जेब से खर्च कर 10,000 से 15,000 में किताब छपा लेता है और उसका लोकार्पण खर्च भी वहन करता है। इस तरह से उसकी किताब और लेखन तो रोशनी में आ गई। लेकिन अपनी लिखी हुई संपदा पर ठहर कर सोचना का वक्त नहीं मिल पाता। ऐसी किताबें अमूमन परिचितों, स्वजनों को उपहार देने की काम आया करती हैं।
एक स्थिति तो स्पष्ट है कि लेखक को जैसे ही प्रकाशन के विकल्प सोशल मीडिया एवं अन्य प्रकाशक का मिला प्रकाशन जगत के एकछत्र राज्य से मुक्ति महसूस किया। क्योंकि जैसे ही प्रकाशन का विकेंद्रीकरण हुआ एक लाभ तो यह हुआ ही कि छोटे-मोटे प्रकाशकों की दुकानें भी चल पड़ीं। लेखकों को भी छपने की संभावनाएं खुलीं। एक अलग बात है कि बड़े प्रकाशकों की संपादकीय टीम की लंबी लाईन से मुक्ति तो  मिली। लेकिन इसका असर किताबों की गुणवत्ता पर दिखायी देने लगा। ऐसी ऐसी किताबें कविता, कहानी, आलोचना व उपन्यास की भी छपने लगीं जिन्हें देख,पढ़कर लगता है कि यह विधा के साथ न्याय नहीं हुआ।
लिखना अपने आप में एक श्रमसाध्य कर्म है। इसके साथ ही लिखना एक गंभीर चुनौती भी है। हमारे समाज और समय में जो भी लेखन कर रहे हैं और जिन्हें गंभीर माना जाता है वो छपवाने से ज्यादा लेखन पर ध्यान देते हैं। यूं तो माना जाता है कि यदि कोई चीज लिखी जा रही है तो वह छपे भी ताकि पाठकों तक लेखन पहुंचे। जो लिखेगा वो छपेगा। जो छपेगा वो लिखेगा इससे किसे गुरेज हो सकता है कि लिखा वही जाए जिसकी पाठनीयता हो और लिखे हुए शब्द की सार्थकता एंव लेखन बयां करे।
लिखने के लिए लेखक के पास खुला आसमान है। वह कागज पर लिखे और छपवाए या आभासीय मंच पर लिखे। लिखना ज्यादा महत्वपूर्ण है। आज हजारों हजार गेगा बाइट में रोज दिन लिखे हुए शब्द प्रकाशित और प्रसारत हो रही हैं। पाठकों के सामने मुश्किल घड़ी यह है कि कौन सी चीज पढ़े और किसी न पढ़े। देखा जो यह भी गया है कि लेखक अपने क्षेत्र के अलावा दूसरी चीजें नहीं पढ़ते। उसपर तुर्रा यह वजह बताई जाती हैं कि पढ़ने का वक्त नहीं मिलता व आज कल बहुत स्तरहीन लेखन हो रहा है। यदि थोड़ा पीेछे जाएं और पुराने लेखकों की बातचीत पर गौर करें तो वे लोग जितना ध्यान लिखने पर दिया करते थे उतना ही ध्यान पढ़ने पर भी देते थे। अपने क्षेत्र और विधा में क्या चीजें लिखी जा रही हैं यदि इसका इल्म नहीं है तो उसकी आलोचना और दशा-दिशा की जानकारी नहीं मिल पाती।

Monday, February 16, 2015

मेले में पुस्तक- विमोचन



कौशलेंद्र प्रपन्न
इन दिनों पुस्तक मेला चल रहा है। हर दिन कम से कम 50 पुस्तकों का विमोचन तो हो ही रहा है ऐसा मान कर चलते हैं। कुछ किताबों का लोकार्पण पूर्व तयशुदा कार्यक्रमों में दर्ज है। उन विमोचन कार्यक्रम में विमोचनकर्ता का नाम भी दिया गया है। उन से उम्मींद की जाती है कि विमोचनकर्ता तथाकथित पुस्तक को पढ़कर आएंगे। लेकिन निराशा तब होती है जब वे भी यूं ही किताब के फ्लैप पढ़कर बोलते हैं। यहां तक भी चलता है। लेकिन जब वे लेखक के बारे में बोलते हैं तब उनकी अनभिज्ञता सामने आती है। लेखक के साथ ही लेखन पर बोलते वक्त उनके होमवर्क की झलक मिलती है।
यदि पुस्तक मेले में पुस्तक विमोचन के चरित्र को देखें तो दो तस्वीरें दिखाई देंगी। पहला, पुस्तक विमोचनकर्ता और पुस्तक पूर्व निर्धारित होती हैं। वक्ता भी पहले से तय होते हैं। जैसा कि नेशनल बुक टस्ट के कार्यक्रमों में साहित्य मंच और लेखक मंच, आॅथर काॅनर आदि में पहले से पुस्तक विमोचन, वक्ता, संचालक, मुख्य अतिथि आदि तय हैं। लेकिन उनमें से भी अंतिम समय में या तो संचालक नहीं होता, या फिर किन्हीं कारणों से मुख्य अतिथि नहीं आते। ऐसे में आनन फानन में जो तथाकथित नामी लेखक, कवि नजर आता है उसे पकड़ कर बैठा दिया जाता है। ऐसे में वक्ता, संचालक, मुख्य अतिथि की परेशानी और तैयार की कमी दिखाई देती है। लेकिन ऐसे में वे अचानक मंच पर बैठा दिए गए अतिथि की मनोदशा को समझा जा सकता है। ताज्जुब तो तब होता है कि जब पूर्व निर्धारित वक्ता, मुख्य अतिथि किताब पढ़कर नहीं आते। वजह जो भी हो लेकिन लेखक के साथ न्याय नहीं हो पाता।
पूरे मेले में कुछ लेखक,कवि, पत्रकार यूं ही पूरे दिन टहलते हुए मिल जाएंगे। इनकी संख्या तीस से पचास की होगी। जो कभी किसी स्टाॅल पर तो कभी किसी और स्टाॅल पर नजर आते हैं। दरअसल अवकाश प्राप्त हमारे लेखक, कवि, आलोचक अपनी दिनचर्या में नौ दिन शामिल कर लेते हैं। दो फायदे होते हैं, एक लोगों से मुलाकात हो जाती है। दूसरी पूरे दिन नई नई किताबों के घूंघट उठाने का मौका भी हाथ लग जाता है। कहीं किताबें मिल जाती हैं तो कहीं शाॅल, मानदेय आदि।
दूसरा, ऐसे पुस्तक विमोचन होते हैं जिन्हें ने.बी.टी के मंच नहीं मिल पाए। वे प्रकाशक, लेखक अपने स्टाॅल पर ही खड़े होकर पुस्तक विमोचन कर देते हैं। इनके लेखक तो तय होते हैं लेकिन विमोचनकर्ता तय नहीं होते। जहां कोई कवि, लेखक, पत्रकार नजर आ गए उन्हें वहीं से पकड़कर स्टाॅल तक खींच लिया जाता है। हाथों में किताब की प्रति पकड़ा दिया जाता है। फोटो खींच कर तुरंत सोशल मीडिया, फेसबुक पर चेप दिया जाता है फलां फलां के हाथों पुस्तक का लोकार्पण पुस्तक मेले में। और देखते ही देखते चंद लाइक और कमेंट भी मिल जाते हैं। ऐसे माहौल में पुस्तक विमोचनकर्ता को कई बार लेखक का नाम भी नहीं जानता हालांकि उसकी भी मजबूरी समझी जा सकती है। जब ऐसे समय में पकड़कर पुस्तक विमोचन के लिए खड़ा कर दिया जाए।
पुस्तक प्रकाशन जगत में विकेंद्रीकरण का यह लाभ हुआ कि बड़े बड़े प्रकाशकों की एकछत्रता टूटी वहीं छोटे छोटे प्रकाशकों की दुकान चल पड़ी। एक किताब दस हजार से पंद्रह हजार में छप जाती है। इन प्रकाशकों को काम मिलना शुरू हो गया। साथ ही लेखकों को भी लंबे इंतजार से निजात मिल गया। लेकिन इस प्रक्रिया में कहीं न कहीं गुणवत्ता प्रभावित हुई। किताबें छपें इससे किसी को गुरेज नहीं लेकिन किताब वाकई किताब की गुणवत्ता भी पूरी करे। आज जिस रफ्तार से किताबें छप रही हैं उससे एक चीज से स्पष्ट है कि किताबों की दुनिया अभी सूखी नहीं है। यह अलग विमर्श का मसला कि रोज दिन छपने वाली किताबों का पाठक वर्ग कौन है? क्या इन किताबों को संज्ञान में ली भी जाती हैं या नहीं?
अमूमन किताबें विमोचन के बाद गुमनामी में खो जाती हैं। कहीं उनकी समीक्षा, आलोचना नहीं होती। बस अपने करीबी दोस्तों, रिश्तेदारों को भेंट करने में काम आती हैं। यदि कहीं पहंुच है तो उसकी पुस्तक परिचय छप जाती है। वरना जिस तरह से इन किताबों का प्रकाशन,विमोचन होता है उसी तरह से कहीं सेल्फ में पड़ी रहती हैं।
एकबारगी यह आरोप भी जाता रहा है कि सोशल मीडिया और इंटरनेट की दुनिया में किताबों पर खतरा मंड़रा रहा है। किताबें खूब अच्छी तदाद में छापी और पढ़ी जा रही हैं। किताबें के प्रकाशकों में भी बढ़ोत्तरी हुई है। दूसरे शब्दों में कहें तो प्रकाशन जगत में विकेंद्रीकरण का लाभ लेखकों को मिला है। यह अलग बात है कि उसके लिए लेखक को अपनी जेब से खर्च करने पड़ते हैं। पाठक और किताबों का रिश्ता गहरा रहा है। वह कहीं से भी छपे यदि किताब में दम है तो वह पाठकों तक पहुंच ही जाती है। यदि लेखक-प्रकाशक मिल कर साझा प्रयास करें तो किताबों की महत्ता और पहुंच और ज्यादा हो सकती है। वह इस तरह कि किताबों का भी प्रचार किया जाए। आज की तारीख में सोशल मीडिया सूचना के प्रसारण और विस्तार में अच्छी खासी भूमिका निभा रहा है। सही समय पर सही किताब का प्रमोशन जरूरी है वरना अच्छी से अच्छी किताबें पाठकों तक नहीं पहुंच पातीं।


Thursday, February 12, 2015

जेंडर विमर्श और मूल्यपरक शिक्षा पर संवाद


कक्षा में साठ के आस-पास शिक्षक और शिक्षिकाएं थीं। इस शिक्षकों और शिक्षिकाओं के बीच जेंडर सेंसेटाइजेशन पर संवाद करना था। जिन मूल बहानों से मई में रू ब रू हुआ था वही बहाने यहां भी खडत्रे हुए। मसलन बहुत सर्दी है। ठिठुर रहे हैं। सर क्या पढ़ाओंगे। छोड़ो भी क्या पढ़ाओंगे। जेंडर वेडर बस यूं ही है। आप भी मजे करो हमें भी छोड़े धूप सेकने दो। मई में गर्मी का बहाना था। दिसम्बर में सर्दी आ खड़ी हुई थी। मगर संवाद तो करना ही था। लेकिन कक्षा में उपस्थित शिक्षक/शिक्षिकाओं को संवाद के लिए उकसाना एक बड़ी चुनौती थी।
संवाद के लिए उन्हें कुरेदना पड़ा। आपमें से कितने ऐसे हैं जो मानते हैं कि पत्नियां कोई भी निर्णय लेने में स्वतंत्र होती हैं। पति की उनके निर्णय में कितनी भूमिका होती है। अपने पति को अपने निर्णय प्रक्रिया में कितना स्थान देती हैं। बस क्या था कई हाथ खड़े ही गए। नाम रहने देते हैं। उनकी बातें यहां रखते हैं। ‘ मैं तो निर्णय लेने में उनका तब मदद लेती हूं जब निर्णय को टालता होता है।’ ‘हमें निर्णय लेने में अपनी भूमिका व जिम्मेदारी को छुपाना होता है तब हम उन पर डाल देते हैं।’
‘निर्णय तो उनका ही होता है। हम तो बस उनके निर्णय को फाॅलो करते हैं।’ ‘ सर आप भी जानते हो। एक ही छत के नीचे रहना है। कौन चिक चिक सहना चाहेगा सो जो निर्णय पति लेते हैं हम उसे स्वीकार लेते हैं।’
इसी तरह की बातें कक्षा में उभर कर आईं। जब मैंने कहा महिलाएं भी सदियों से गुलाम रही हैं। उन्हें इस गुलामी से मुक्ति के लिए अपनी आवाज़ बुलंद करनी पड़ेगी। पाॅलो फ्रेरा की पंक्ति रखीं ‘ चुप्पी की संस्कृति ही गुलामी को अग्रसारित करती है’ यदि गुलामी को तोड़ना है तो चुप्पी तोड़नी पड़ेगी। पाॅलो फ्रेरा ने उत्पीडि़तों का शिक्षा शास्त्र पुस्तक लिखा उसे पढ़ कर जिस तरह की चेतना जागती है वही अपनी मुक्ति की राह बना पाते हैं। साथ ही उन्हें जाॅन स्टुआॅर्ट मिल की पुस्तक स्त्री और पराधीनता को साइट किया। कुछ स्त्रियों की आंखें विस्फारित हुईं। मगर वहीं शिक्षकों के तेवर बदल चूके थे। ये सब बेकार की बातें हैं। पुरूष प्रधान समाज है। लुगाइयां घर में ही अच्छी लगती हैं। इसी तरह के तर्क कक्षा में तैर रहे थे।
जेंड़र संवेदनशीलता पर लंबी बातचीत हुई मगर शिक्षकों की सोच गोया अभी भी 19 वीं सदी में डोल रही थीं। कक्षा में कैसे इस तरह के विमर्श को वे लोग हैंडल करते होंगे इसका अनुमान लगाया जा सकता है। दरअसल वो नई सोच और शिक्षा के नए विमर्श को अपने दिमाग में उतरने की इज़ाजत ही नहीं देना चाहते थे। बहरहाल यदि शिक्षिकाओं में इसके प्रति थोड़ी भी चेतना जागती है तो उम्मींद की किरण बनी रहेगी।
जेंडर विमर्श और मूल्यपरक शिक्षा पर संवाद
कक्षा में साठ के आस-पास शिक्षक और शिक्षिकाएं थीं। इस शिक्षकों और शिक्षिकाओं के बीच जेंडर सेंसेटाइजेशन पर संवाद करना था। जिन मूल बहानों से मई में रू ब रू हुआ था वही बहाने यहां भी खडत्रे हुए। मसलन बहुत सर्दी है। ठिठुर रहे हैं। सर क्या पढ़ाओंगे। छोड़ो भी क्या पढ़ाओंगे। जेंडर वेडर बस यूं ही है। आप भी मजे करो हमें भी छोड़े धूप सेकने दो। मई में गर्मी का बहाना था। दिसम्बर में सर्दी आ खड़ी हुई थी। मगर संवाद तो करना ही था। लेकिन कक्षा में उपस्थित शिक्षक/शिक्षिकाओं को संवाद के लिए उकसाना एक बड़ी चुनौती थी।
संवाद के लिए उन्हें कुरेदना पड़ा। आपमें से कितने ऐसे हैं जो मानते हैं कि पत्नियां कोई भी निर्णय लेने में स्वतंत्र होती हैं। पति की उनके निर्णय में कितनी भूमिका होती है। अपने पति को अपने निर्णय प्रक्रिया में कितना स्थान देती हैं। बस क्या था कई हाथ खड़े ही गए। नाम रहने देते हैं। उनकी बातें यहां रखते हैं। ‘ मैं तो निर्णय लेने में उनका तब मदद लेती हूं जब निर्णय को टालता होता है।’ ‘हमें निर्णय लेने में अपनी भूमिका व जिम्मेदारी को छुपाना होता है तब हम उन पर डाल देते हैं।’
‘निर्णय तो उनका ही होता है। हम तो बस उनके निर्णय को फाॅलो करते हैं।’ ‘ सर आप भी जानते हो। एक ही छत के नीचे रहना है। कौन चिक चिक सहना चाहेगा सो जो निर्णय पति लेते हैं हम उसे स्वीकार लेते हैं।’
इसी तरह की बातें कक्षा में उभर कर आईं। जब मैंने कहा महिलाएं भी सदियों से गुलाम रही हैं। उन्हें इस गुलामी से मुक्ति के लिए अपनी आवाज़ बुलंद करनी पड़ेगी। पाॅलो फ्रेरा की पंक्ति रखीं ‘ चुप्पी की संस्कृति ही गुलामी को अग्रसारित करती है’ यदि गुलामी को तोड़ना है तो चुप्पी तोड़नी पड़ेगी। पाॅलो फ्रेरा ने उत्पीडि़तों का शिक्षा शास्त्र पुस्तक लिखा उसे पढ़ कर जिस तरह की चेतना जागती है वही अपनी मुक्ति की राह बना पाते हैं। साथ ही उन्हें जाॅन स्टुआॅर्ट मिल की पुस्तक स्त्री और पराधीनता को साइट किया। कुछ स्त्रियों की आंखें विस्फारित हुईं। मगर वहीं शिक्षकों के तेवर बदल चूके थे। ये सब बेकार की बातें हैं। पुरूष प्रधान समाज है। लुगाइयां घर में ही अच्छी लगती हैं। इसी तरह के तर्क कक्षा में तैर रहे थे।
जेंड़र संवेदनशीलता पर लंबी बातचीत हुई मगर शिक्षकों की सोच गोया अभी भी 19 वीं सदी में डोल रही थीं। कक्षा में कैसे इस तरह के विमर्श को वे लोग हैंडल करते होंगे इसका अनुमान लगाया जा सकता है। दरअसल वो नई सोच और शिक्षा के नए विमर्श को अपने दिमाग में उतरने की इज़ाजत ही नहीं देना चाहते थे। बहरहाल यदि शिक्षिकाओं में इसके प्रति थोड़ी भी चेतना जागती है तो उम्मींद की किरण बनी रहेगी।

बहार ए बाहर


कभी सोचा भी नहीं होगा कि कल जब वो आॅफिस आएंगे तो उनका एसेस राइट छीन ली जाएगी। वो कम्प्यूटर नहीं खोल सकते। गेट से अंदर आने के बाद सब कुछ बदला बदला होगा। साथ काम करने वाले भी उनसे मंुह चुराएंगे। उनकी गलती क्या थी इस पर कोई खुल कर बोलेगा भी नहीं। सब तरफ ख़ामोशी और शांति पसरी होगी। सब को इसका डर सता रहा होगा कि कहीं बात करते कोई नोटिस न कर ले। 
दुनिया भर में 2008 में मंदी के दौरान इस तरह की घटनाएं आम देखी जा रही थीं। रातों रात लोगों के हाथ से नौकरी यूं फिसल रही थी जैसे रेत हो मुट्ठी में। रात काम कर के गए सुबह बे नौकरी हो गए। किसको क्या बताएं। कि घर जल्दी क्यों आ गया वो। 
2008 ही नहीं बल्कि कई कंपनियों में आज भी यह मंजर देखा जा सकता है। कोई कैसे रोतों रात सड़क पर आ जाता है इसका उसे इल्म तक नहीं होता। घर बाहर हर जगह उससे कई सवाल करती आंखें घूरने लगती हैं। न घर में चैन से रह पाता है औ...

आंकड़ों से बाहर बच्चे और यूनेस्को-यूनिसेफ रिपोर्ट



कौशलेंद्र प्रपन्न
इस सच्चायी से कोई भी इंकार नहीं कर सकता कि आज भी हमारे लाखों बच्चे स्कूली शिक्षा हासिल करने से महरूम हैं। इसकी संख्या हजारों में नहीं बल्कि लाखों में है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय पिछले साल स्वीकार कर चुकी है कि देश में तकरीबन 80 लाख बच्चे स्कूल से बाहर हैं। लेकिन यूनेस्कों और यूनिसेफ की हालिया साझा रिपोर्ट ‘फिक्सिंग द ब्रोकेन प्राॅमिस आॅफ एजुकेशन फाॅर आॅलः फाइंंिडग्स द ग्लोबल इनीशिएटिव आॅन आउट आॅफ स्कूल चिल्डेन’ में बताया गया है कि 2000 से 2012 के बीच स्कूलों से बाहर बच्चों की संख्या में कमी आई है। रिपोर्ट की मानें तो भारत में 2000 से 2012 से बीच स्कूल न जाने वाले बच्चों की संख्या 1.6 करोड़ की कमी आई है। आंकड़ों के पहाड़ पर खड़े हो कर सच्चाई नहीं दिखाई देती। पिछले साल 2014 में जब एमएचआरडी ने 80 लाख बच्चों की स्कूल से बाहर होने का आंकड़ा प्रस्तुत किया था तब देश के अन्य गैर सरकारी संस्थाओं के कान खड़े हो गए थे। उन्होंने इन आंकड़ों की जमीनी हकीकत का पता लगाया जिसमें मालूम हुआ कि अकेले भारत में 7 करोड़ 80 लाख बच्चे स्कूल से बाहर हैं।
सहस्राब्दि विकास लक्ष्य एमडीजी और सबके लिए शिक्षा इएफए 1990 और 2000 में तय किया गया था कि आगामी 2015 तक सभी बच्चों ‘6 से 14 साल तक के’ बुनियादी शिक्षा हासिल करा चुकेंगे। लेकिन वत्र्तमान सच्चाई यह है कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के लागू होने के बाद भी हमारे 7 करोड़ से ज्यादा बच्चे बुनियादी शिक्षा से वंचित हैं। दरअसल 1990 में ‘सब के लिए शिक्षा’ एवं ‘सहस्राब्दि विकास लक्ष्य 2000’ में तय किया गया था कि हम अपने तमाम बच्चों को 2015 तक प्राथमिक शिक्षा मुहैया करा देंगे। लेकिन हकीकत यह है कि अभी भी प्राथमिक शिक्षायी तालीम से बच्चे महरूम हैं।
गौरतलब है कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 और इएफए 1990 एवं एमडीजी गोल 2000 का लक्ष्य था कि हम सभी बच्चों को कम से कम बुनियादी शिक्षा यानी कक्षा एक से आठवीं तक की तालीम प्रदान करेंगे। लेकिन बुनियादी शिक्षा को बीच में छोड़ देने वाले बच्चों की ओर देखें तो पाएंगे कि सबसे बड़ा कारण उन स्कूलों में शौचालय का न होना है। स्कूलों में शौचालय का न होना खासकर बच्चियों के लिए ज्यादा परेशानी का सबब बनता है। ‘असर’ या ‘डाईस’ की फ्लैश रिपोर्ट पर नजर डालें तो पाएंगे कि इन्हीं कारणों से बच्चियां स्कूल नहीं जा पातीं। सत्र के बीच में स्कूल छोड़ जाने के पीछे कई कारणों में से एक शौचालय का न होना है। वहीं आर्थिक कारण भी प्रमुखता से रेखांकित किए गए हैं। बच्चे स्कूल नहीं जा पाते या स्कूल बीच में छोड़ देते हैं तो इसमें जितना दोषी सरकार है उससे कहीं ज्यादा नागर समाज भी है। जब हम एक शहर के सुंदरीकरण की योजना बनाते हैं तब स्वीमिंग पुल, जीम खाना, माॅल की योजना तो बनाते हैं लेकिन स्कूल और बच्चे हमारी चिंता से बाहर होते हैं। उसपर तुर्रा यह कि निजी स्कूलों को जितना तवज्जो दिया जाता है क्या हम सरकारी स्कूलों के प्रयासों की सराहना करते हैं? सच पूछा जाए तो हम सरकारी स्कूलों की बेहतरी के लिए नागर समाज न तो जागरूक है और न ही प्रयासरत।
यूनिसेफ और यूनेस्को की इस साझा रिपोर्ट की मानें तो भारत में 5.881 करोड़ लड़कियां और 6.371 करोड़ लड़के प्राथमिक कक्षाओं के छात्र-छात्रा हैं। रिपोर्ट के अनुसार 2011 तक प्राथमिक कक्षाओं के उम्र के 14 लाख बच्चे भारत में स्कूल नहीं जाते। जिनमें 18 फीसदी लड़कियां और 14 फीसदी लड़कों की संख्या है। गौरतलब है कि इन आंकड़ों की सच्चाई आंकें तो इन संख्याओं से ज्यादा बच्चे स्कूल से बाहर मिलेंगे। यदि सरकारी और गैर सरकारी आंकड़ों की रोशनी में देखें तो एमएचआरडी की 2012-13 और 2013-14 की रिपोर्ट देखें तो पाएंगे कि अभी भी 80 लाख बच्चे स्कूल बाहर हैं। हैरानी की बात यह है कि पिछले साल तक जो संख्या 80 लाख थी वह छः माह के भीतर इतनी तेजी से कम कैसे हो गई। इन आंकड़ों से शेष बच्चे बाहर हाशिए पर धकेल दिए गए हैं। हां नामांकन की संख्या तो बढ़ी तो बढ़ी हैं लेकिन बीच में ही स्कूल छोड़ देने वाले बच्चों की संख्या भी कोई कम नहीं है।
स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता और बुनियादी शिक्षा मुहैया करा पाएं यह हमारी प्रमुख चिंता रही है। यही वजह है कि हमने शिक्षा के अधिकार अधिनियम बनाया। हमने 1990 में इएफए का लक्ष्य निर्धारित किया और 2000 में सहस्राब्दि लक्ष्य में बच्चों की बुनियादी शिक्षा की प्रमुखता से वकालत की। लेकिन आंकड़ों से बाहर बच्चों को कैसे स्कूली शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ें इसके लिए हमें रणनीति बनाने की आवश्यकता है। मालूम हो कि 31 मार्च 2015 तक सब के लिए शिक्षा और आरटीई के लक्ष्यों को हासिल करने की अंतिम तारीख है।


शिक्षक सम्मान एवार्ड 2014-15



टेक महिन्द्रा फाउंडोशन की ओर हर साल 25 शिक्षकों को यह सम्मान दिया जाता है। इस वर्ष भी यह कार्यक्रम 28 जनवरी को इंडिया हैबिटेट सेंटर में संपन्न हुआ। कार्यक्रम का संचालन कौशलेंद्र प्रपन्न और हरदीप का था। इस कार्यक्रम को आयुक्त पूर्वी दिल्ली, दक्षिणी दिल्ली, एवं शिक्षा निदेशक का हासिल हुआ। 








Thursday, January 29, 2015

स्कूली शिक्षा में गुणवत्त की बुनियाद



कौशलेंद्र प्रपन्न
गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की मांग और अपेक्षा समाज के हर तबकों को है। सामाजिक मंचों और अकादमिक बहसों में भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को केंद्र में रख कर राष्टीय स्तर पर विमर्श जारी है। यह मंथन इसलिए भी जरूरी है , क्योंकि शिक्षा का अधिकार अधिनियम और सब के लिए शिक्षा का लक्ष्य वर्ष 31 मार्च 2015 अब ज्यादा दूर नहीं है। गौरतलब है कि इएफए और मिलेनियम डेवलप्मेंट लक्ष्य में भी प्राथमिक शिक्षा में गुणवत्ता की बात गंभीरता से रखी गई थी। यदि जमीनी हकीकत का जायजा लें तो जिस किस्म की तस्वीरें उभरती हैं वह चिंता बढ़ाने वाली हैं। निश्चित ही हमारे सरकारी स्कूलों में जिस स्तर की शिक्षा बच्चों को दी जा रही है वह मकूल नहीं है। वह शिक्षा नहीं, बल्कि साक्षरता दर में बढ़ोत्तरी ही करने वाला है। यहां दो तरह की स्थितियों पर ध्यान दिया जाएगा जिसे नजरअंदाज कर स्कूली शिक्षा में गुणवत्ता की प्रकृति का नहीं समझा जा सकता। पहला, पूरे देश में एक उस किस्म के सरकारी स्कूल हैं जिनके पास बच्चे, शिक्षक, लैब, लाइब्रेरी आदि सुविधाएं उपलब्ध हैं। हर साल इनके परीक्षा परिणाम भी बेहतर होते हैं। स्कूल की चाहरदीवारी से लेकर पीने का पानी, शौचालय आदि बुनियादी ढांचा हासिल है। दूसरा, वैसे सरकारी स्कूल हैं जहां न तो पर्याप्त कमरे, पीने का पानी, शौचालय, खेल के मैदान, खिड़कियों में शीशी, दरवाजों में किवाड़ हैं और न बच्चों के अनुपात में शिक्षक। ऐसे माहौल में यदि कहीं किसी स्कूल में कुछ अच्छा हो रहा है तो उसे समाज में लाने की आवश्यकता है। आवश्यकता इस बात की भी है कि सकारात्मक सोच को बढ़ावा दिया जाए। उनकी कोशिशों को सराहा जाए। बजाए कि सिर्फ उनकी बुराई ही समाज के सामने रखें।
स्कूल की शैक्षिक गुणवत्ता का दारोमदार सिर्फ शिक्षक के कंधे पर ही नहीं होता बल्कि हमें इसके लिए शिक्षक से हट कर उन संस्थानों की ओर भी देखना होगा जहां शिक्षकों को शिक्षण-प्रशिक्षण की तालीम दी जाती है। डाईट, एससीइआरटी जैसी प्रतिष्ठित संस्थानों में चलने वाली सेवा पूर्व शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रमों पर भी विमर्श करने की आवश्यकता है। अमूमन शिक्षण-प्रशिक्षण संस्थानों में जिस किस्म की प्रतिबद्धता और सीखने-सिखाने की प्रक्रिया चल रही है उसे भी दुरुस्त करने की आवश्यकता है। एक किस्म से इन संस्थानों में अकादमिक तालीम तो दी जाती है। लेकिन उन ज्ञान के संक्रमण की प्रक्रिया को कैसे रूचिकर बनाया जाए इस ओर भी गंभीरता से योजना बनाने और अमल में लाने की आवश्यकता है।
दिल्ली में ही नगर निगम और राज्य सरकार की ओर से चलने वाले स्कूलों में झांक कर देखें तो दो छवियां एक साथ दिखाई देती हैं। एक ओर वे स्कूल हैं जिसमें बड़ी ही शिद्दत से शिक्षक/शिक्षिकाएं अपने बच्चों को पढ़ाती हैं। उन स्कूलों में नामांकन के लिए लंबी लाइन लगती है। सिफारिशें आती हैं। हर साल बच्चे विभिन्न प्रतियोगिताओं में पुरस्कार जीतते हैं। ऐसा ही एक स्कूल है शालीमार बाग का बी बी ब्लाॅक का नगर निगम प्रतिभा विद्यालय यहां पर जिस तरह से स्कूल को संवारा गया है और बच्चों की शैक्षणिक गति है उसे देखते हुए लगता है कि इन स्कूलों मंे रिपोर्ट तैयार करने वाली टीम क्यों नहीं जाती। जहां कुछ तो अच्छा हो रहा है लेकिन रिपोर्ट में एकबारगी सरकारी स्कूलों को नकारा साबित करने के लिए ऐसे ही साधनविहीन और खस्ताहाल स्कूलों को चुना जाता है। दूसरे स्कूल वैसे हैं जैसे वजीरपुर जे जे काॅलानी में नगर निगम प्रतिभा विद्यालय जहां स्थानीय असामाजिक तत्वों की आवजाही है। खिड़कियां हैं पर उनमें शीशे नहीं। कक्षों में दरवाजे तक नहीं हैं। पलस्तर न जाने कब हुए होंगे। कक्षाओं में गड्ढ़े हैं। लेकिन उन हालात में भी शिक्षिकाएं पढ़ा रही हैं।
पूर्वी दिल्ली नगर निगम के अंतर्गत आने वाले स्कूलों में भी अमूमन एक सी कहानी है। एक ओर ए ब्लाॅक दिलशाद गार्डेन में जहां अच्छे भवन हैं। शिक्षक हैं लेकिन बच्चे कम हैं। वहीं ओल्ड सीमापुरा के उर्दू स्कूल में बच्चों के पास बैठने के लिए टाट पट्टी तक मयस्सर नहीं है। एक एक कमरे में दो तीन सेक्शन के बच्चे बैठते हैं। जहां न रोशनी है और न धूप। यदि कुछ है तो महज अंधेरा। सरकारी स्कूलों में शिक्षा के स्तर यानी गुणवत्ता को बेहतर बनाने की प्रतिबद्धता एक ओर शिक्षकों के कंधों पर है तो वहीं दूसरी ओर प्रशासन को भी अपने गिरेबां में झांकने की आवश्यकता है।
बेहतर प्रशिक्षक के शिक्षकों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की ओर मोड़ना मुश्किल है। प्रशिक्षक का काम शिक्षा और शिक्षण प्रक्रिया से जोड़ना है। यदि सिर्फ शैक्षिक पौडागोगी यानी प्रविधि पर जोर दिया जाएगा तो वह प्रशिक्षण कार्यशाला भी ज्यादा कारगार नहीं हो सकती। शिक्षक कार्यशालाओं में प्रशिक्षक का चुनाव भी बेहद चुनौतिपूर्ण काम है। यदि एक ही कार्यशाला में दो अलग अलग विचारों और शिक्षण तकनीक बताया जा रहा है तो वह शिक्षकों के लिए भ्रम पैदा कर सकता है। इसलिए इस बात को भी ध्यान में रखन की आवश्यकता है।

Wednesday, January 14, 2015

बाजार 11 बजे की



कौशलेंद्र प्रपन्न
सोम- बाजार,वीर- बाजार,मंगल- बाजार, बुध-बाजार आदि इस तरह से हर दिन का बाजार दिल्ली के विभिन्न इलाकों मंे लगा करती हैं। इन बाजारों की ख़ासीयत यह है कि इस बाजार में लोग 9-10 बजे के बाद जाना चाहते हैं। जब दिल्ली के बाहर लोग आधी नींद ले चुके होते हैं तब दिल्ली वाले सब्जी-फल आदि लेने निकलते हैं। इतनी देर रात बाजार जाने के कारण स्पष्ट है सब्जियां-फल सस्ती मिला करती हैं। यही कारण है कि बड़ी बड़ी गाडि़यों से उतर कर झोले भर कर पूरे हप्ते की खरीद्दारी करते लोग मिल जाएंगे। इस बाजार का अर्थशास्त्र यह भी है कि जितना देर से जाओ चीजें उतनी ही सस्ती मिलती हैं। दुकानदार को दुकान बढ़ाकर घर जाना होता है इसलिए जो सब्जी 8-9 बजे 40 रुपये की मिलती है वह 11 बजे 15 और 20 रुपये की मिलने गलती है।
गांव देहात में आज भी हप्ते में एक दिन बाजार लगा करता है। नाम बेशक हाट, पीठ हो सकते हैं। उन बाजारों में महिलाएं,बच्चे, बड़े सभी जाते हैं। कपड़े, खाना-पीना, श्रंगार की चीजें भी बिका करती हैं। उत्तराखंड़ में ऐसे बाजारों को पीठ कहा जाता है। याद है जब मैं गुरुकुल कांगड़ी में पढ़ा करता था तब हरिद्वार से पांच किलो मीटर पहले ज्वालापुर और बीएचईएल में पीठ लगा करता था। पहली बार यह शब्द सुना था। जब बाजार गया तो अपने पुराने बाजार की छवि उभरने लगी। बाजार में सारी चीजें इतनी सस्ती थीं कि आम बाजार में उन्हीं चीजों की कीमत कम से कम दुगनी जरूर थीं।
इन बाजारों की आर्थिकी प़़क्ष पर नजर डालें तो पाएंगे कि सामान इसलिए सस्ती मिला करती हैं क्योंकि दुकानदार माल सीधे मंड़ी से उठाया करते हैं। इसमें कोई बिचैलीए भूमिका नहीं होती। हप्ते में एक दिन लगने वाले इस बाजार में क्या नहीं होता। हर वो जरूरत की चीजें मिल जाएंगी जिनके लिए हम लोग माॅल या बड़ी बड़ी दुकानों में जाया करते हैं। खाने- पीने से लेकर पहनने- ओढ़ने, साज-सज्जा, किचन, अचार,बर्तन-बासन सब कुछ। एक ओर छोले भटूरे वालेे की दुकान होती है तो उसी से लगे जलेबी वाला भी खड़ा होता है। किसी की भी दुकान खाली नहीं होती है। सब्जियां सस्ती तो मिलती हैं साथ ही ताजी भी होती हैं।
बाजार तो बाजार ही होती है। यदि बाजार में चाक चिक्य ना हो तो बाजार क्या है। गीत गाने की सीडी,डीवीडी जो अन्य जगह 50-80 रुपये में मिलती हैं यहां पर 10 और 20 रुपये में उपलब्ध होती हैं। चार-पांच फिल्में एक सीडी में मिलती हैं। समग्रता में देखें तो यह बाजार गाड़ी वालों के लिए पैसे बचाने की जगह होती हैं। लेकिन वहीं दूसरी ओर कम आमदनी वाले परिवारों के लिए यह बाजार वरदान के रूप में होती हैं। यह वही बाजार है जिसमें हमारे घरों में काम करने वाली रूबी, अनीता, रानी जाती हैं वहीं उन्हें घरों के मालिक भी जाया करते हैं। जब दोनों आमने सामने पड़ते हैं तो स्थिति अजीब हो जाती है। रूबी बोलती है आप भी यहीं से चीजें खरीदती हैं? यानी उस वर्ग के लिए तो यह बाजार सहज है लेकिन दूसरे वर्ग बाबुओं के लिए उनके स्तर और नाक की दृष्टि से उनकी नजरों में नहीं जंचता।
अमीर हो या गरीब हर व्यक्ति चीजें सस्ती में ही खरीदना चाहता है। पैसे बचाना कौन नहीं चाहता। यही वजह है कि दिल्लीवासी सोने के समय में कटौती कर साप्ताहिक बाजार में जाया करते हैं। लंबी लंबी महंगी गाडि़यों से उतर कर सब्जी-फल की दुकान में मोल भाव करते लोग नजर आए जाएंगे। कभी प्रोफेसर, बैक मैनेजर, पत्रकार,बिजनेसमैन सभी इस बाजार में नियमित खरीद्दार होते हैं। कुछ ऐसे भी अवसर आते हैं जब हम अपने पड़ोसी से भी इसी बाजार में मिला करते हैं। यह बाजार वही स्थान है जहां लड़के-लड़कियां भी नजरे बचा कर मिलती हैं। माॅल में मिलना जिनकी पहंुच से बाहर है वो लोग इस बाजार में मिलते हैं। यह बाजार अपनी पूरी उमंग पर तब होती है जब रात 10 बजते हैं।
हप्ते के हप्ते के लगने वाले इस बाजार में गरीबों के घर अच्छे से चलते हैं। साथ ही दूसरे वर्ग के लोगों के लिए चीजें सस्ती हो लगती हैं। बाजार का अपना चरित्र और प्रकृति होती है। बाजार में हर वर्ग के लिए चीजें उपलब्ध होती हैं। हर व्यक्ति की जरूरत की चीजें उसकी जेब के हिसाब के उपलब्ध होती हैं। यही बाजार दर्शन यहां इन बाजारों में भी देखने को मिलता है। जब इस बाजार में हर चीजें उपलब्ध हैं तो क्यों एक समाज के एक बड़ा तबका माॅलों, महंगी दुकानों में खरीद्दारी किया करता है। क्योंकि उन्हें अपनी हैसीयत, रूतबा बड़े- बड़े नामी- गिरामी ब्रांड के कपड़ों, जूतों,पहनावे आदि से दिखानी होती है। वह इन बाजारों में खरीद्दारी करना अपनी तौहीन समझते हैं। उन्हें लगता है इस तरह के बाजार में मजदूर एवं मध्यम वर्ग के लोग आया करते हैं।
मार्केट ऐट 11 दरअसल समाज के बड़े वर्गों के लिए लाभप्रद है। जहां कम से कम मौसमी सब्जियां-फल आदि खरीद सकते हैं। अपने बच्चों के शौक भी इस बाजार में पूरे होते हैं। नए नए पहनावे, चश्में,खाना-पीना,प्रसाधन के अन्य सामान जेब की सीमा में मिल जाते हैं। जिस तरह से गली-मुहल्लों, काॅलोनियों में जेनरल स्टोर खुल रहे हैं वहां की भीड़ बिल्कुल अलग है। यह बाजार कभी बंद नहीं होने वाले क्योंकि यह बाजार आम जनता के लिए, आम जनता के द्वारा संचालित होता है।


Monday, January 12, 2015

नई राष्टीय शिक्षा नीतिः एक और प्रहार



कौशलेंद्र प्रपन्न
शिक्षा समितिओं और आयोगों की सिफारिशों और नीतियों को समय समय पर पुनरीक्षा से गुजारा गया है। वह 1964-66 का कोठारी आयोग हो, 1968 की राष्टीय शिक्षा आयोग हो या 1986 की राष्टीय शिक्षा नीति। सन् 1990-1992 में आचार्य राममूर्ति पुनरीक्षा समिति बनाई गई थी जिसका मकसद था 1986 की नीतियों को आज के संदर्भ में पुनर्मूल्यांकन किया जाए और आवश्यकतानुसार सुझाव दिए जाएं। एक बार फिर राष्टीय शिक्षा नीति को पुनरीक्षा और पुनर्गठन के दौर से गुजरने का मौका आया है। मानव संसाधन विकास मंत्री ने पिछले साल ही घोषणा की थी कि 2015 में नई राष्टीय शिक्षा नीति देश भर में लागू की जाएगी। इस बाबत राज्य के शिक्षा मंत्रियों और शिक्षाविद्ों, समाज के विभिन्न धड़ों से बातचीत की जाएगी। गौरतलब हो कि जब जब सत्ता में हिन्दूत्वहावी सरकार आई है उसने अपने तरीके से शिक्षा को बदलने का प्रयास किया है। न केवल एक दल बल्कि अन्य वैचारिक दलों की सरकारों ने भी शिक्षा को अपने वैचारिक प्रसार प्रचार के लिए इस्तमाल किया है। 2000 में राष्टीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2000 तैयार हो कर देश भर में लागू हुआ तो जिस तरह से पाठ्यचर्या को बुना गया था उसी तर्ज पर पाठ्यपुस्तकें बनाई गईं। प्रेमचंद की कहानी को मृदुला सिन्हा की कहानी से पुनस्र्थापित किया गया। इतना नहीं बल्कि भाषा, इतिहास, विज्ञान की धार को तेज करने की बजाए कुंद ही किया गया। शिक्षा नई सोच और सृजनात्मकता को बढ़ावा देने का काम करती है। शिक्षा दरअसल इतिहास को पढ़ने और अतीत की गलतियों को सुधारने की समझ भी पैदा करती है। लेकिन दुर्भाग्यवश आज जिस नई राष्टीय शिक्षा नीति निर्माण की बात की जा रही है। उसके उद्देश्यों से हमें असहमति का अधिकार है। क्योंकि इस नई नीति के जड़ में आरएसएस की विचारधारा और पूर्वग्रह स्पष्ट दिखाई देते हैं। जहां माना जा रहा है कि भारतीयों को भारतीयता से हटा कर पश्चिमवादी विचारधारा पढ़ाई जा रही है, जिससे उनमें पाश्चात्य जीवन मूल्य का प्रसार हो रहा है। इसलिए आवश्यक है कि नई पीढ़ी को भारतीय शिक्षा दी जाए, उंची कक्षाओं में भी उन्हें अंग्रेजी के बाजए हिन्दी माध्यम से पढ़ाया जाए और संस्कृत को अनिवार्य बना दिया जाए।
योग गुरु रामदेव नई सरकार के सलाहकार भी हैं उन्होंने शिक्षा पाठ्यक्रम का एक दस्तावेज सरकार को सौंपा है। इसमें प्रमुखता से संघ और हिन्दुत्व विचारधारा को पोषित किया गया है। वहीं दीनानाथ बत्रा की लिखी किताब ‘ तेजोमय भारत’ गुजरात के तकरीबन 42 हजार सरकारी स्कूलों में पढ़ाए जा रहे हैं। उस किताब के कुछ अंशों से ही अनुमान लगाया जा सकता है कि वे किस तरह की शिक्षा देने पर उतारू हैं-
‘‘अमेरिका स्टेम सेल अनुसंधान का के आविष्कार का श्रेय लेना चाहता है, पर सच यह है कि भारत के डाॅ बालकृष्ण गणपत मातापुरकर को पहले ही शरीर के अंगों का फिर से निर्माण करने के पेटेंट मिल चुका है...तुम्हें यह जानकर आश्चर्य होगा कि यह अनुसंधान नया नहीं है और डाॅ मातापुरकर को इसकी प्रेरणा महाभारत से मिली थी। कंुती का सूर्य के समान तेजस्वी एक पुत्र था।’’ अजेय कुमार, 12.12.2014 जनसत्ता
पाठ्यपुस्तकों में इस्तमाल किए गए शब्दों को निकाल बाहर करने के बाबत दीनानाथ बत्रा ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय को ज्ञापन सौंपा है जिसमें उर्दू, फारसी,अंगे्रजी के शब्दों को पाठ्यपुस्तकों से बाहर निकालने की वकालत की गई है। इन शब्दों में दोस्त, शरारत, खबरदार, गायब, गुस्सा,मौका आदि शामिल हैं। इन शब्दों को बाहर करने के पीछे तर्क दिया गया कि इन शब्दों से हिन्दी खराब होती है। जरा शैक्षिक दर्शन और शिक्षा शास्त्र की दृष्टि से इन तर्कों पर विचार करें तो यह हास्यास्पद से ज्यादा नहीं लगता। जबकि भाषाविदों और शिक्षा शास्त्रियों की मानें तो हिन्दी व अन्य भाषााओं को उर्दू, फारसी, बोलियां खराब करने की बजाए समृद्ध ही करती है। यदि हिन्दी से उक्त शब्दों व बोली भाषाओं को निकाल बाहर किया जाए तो वह र्हिन्दी कैसी होगी इसके अनुमान मात्र से ही डर लगता है।
नई राष्टीय शिक्षा नीति किन किन बिंदुओं पर प्रहार करने वाली है इसका अंदाजा लगाना कठिन नहीं है। शिक्षा की बुनियाद मानी जाने वाली भाषा नीतियों, इतिहास, विज्ञान और समाज शास्त्र आदि पर इन बदलावों के तलवार चलने वाले हैं। संभव है आगामी शिक्षा नीति में हिन्दी उर्दू विहीन, अंग्रेजी के कटी, बोलियों से बेदखल होगी जहां हिन्दी के संस्कृतनिष्ठ शब्दावलियां होंगी। और उस हिन्दी में प्रेमचंद का कोई स्थान नहीं होगा। क्योंकि प्रेमचंद को काफी समय तक हिन्दी में नहीं लिख रहे थे। वे तो उर्दू में लिखा करते थे। सो प्रेमचंद हिन्दी के लेखक न रहें। साथ ही गंगा-जमुनी संस्कृति यानी हिन्दी उर्दू की साझा जबान को घातक साबित कर उर्दू को हाशिए पर धकेेल दिया जाए।
संस्कृत शिक्षण को लेकर पिछले साल विवाद का जन्म हो चुका है। जर्मन की जगह केंद्रीय विद्यालयों में आगामी शैक्षिक सत्र में संस्कृत को पढ़ाने का निर्णय लिया जा चुका है। इसके साथ ही हिन्दी की शुद्धता के तर्क तले भाषा दर्शन का गला दबा दिया जाए इसकी भी पूरी संभावना नजर आती है। नई शिक्षा नीतियों में जिन मूल्यों, नैतिकता और जीवन मूल्यों को शामिल किया जाएगा उसमें नहीं लगता है वैज्ञानिक सोच के लिए कोई स्थान होगा। ऐसा भी नहीं लगता है कि तैयार होने वाली नई शिक्षा नीति त्रिभाषा सूत्र की आत्मा को बचा पाए।
इसकी एक बानगी देख सकते हैं- जिन लोगों ने खास विचार धारा के प्रसार में अपना हाथ खींेच लिया उन्हें उनके पद से ही हटा दिया गया। मसलन एनसीइआरटी ने निदेशक प्रवीण सिनक्लेयर को इसलिए हटा दिया गया क्योंकि वे 2005 के राष्टीय पाठ्यचर्या को जारी रखना चाहते थे। वहीं राजस्थान विश्वविद्यालय के उपकुलपति को भी पद से हाथ धोना पड़ा। इतना ही नहीं अपने एजेंडे को लागू कराने के लिए बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में ऐसा कुलपति नियुक्त किया गया जो हिन्दुआइजेशन आॅफ एजूकेशन में भाग ले सके।


Saturday, January 10, 2015

पूर्वी दिल्ली नगर निगम स्कूल निरीक्षक और शिक्षा निदेशक


पूर्वी दिल्ली नगर निगम के शिक्षा निदेशक श्री के विजयन ने कहा ‘‘ यह एक ऐसा संयोग है जहां एक मंच पर स्कूली निरीक्षक, शिक्षा निदेशक, उप शिक्षा निदेशक एवं शिक्षा विभाग के अन्य अधिकारी एक साथ मिल रहे हैं और अपनी अकादमिक और प्रशासनिक अड़चनों पर विमर्श कर रहे हैं।’’ संभवतः पहली बार स्कूल निरीक्षक के लिए प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन टेक महिन्द्रा फाउंडेशन एवं पूर्वी दिल्ली नगर निगम के साझा प्रयास से 6 से 8 जनवरी के बीच संपन्न हुआ। लंबे अरसे से स्कूल निरीक्षक के लिए प्रशिक्षण कार्यशाला की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। अंततः दक्षिणी एवं उत्तरी शहादरा के विभिन्न स्कूल निरीक्षकों से उनकी आवश्यकता एवं प्रमुख परेशानियों को रेखांकित करते हुए कार्यशाला का आयोजन किया गया।
इस कार्यशाला में पहले दिन 14 स्कूल निरीक्षक उपस्थिति थे। वहीं स्कूल निरीक्षक के अलावा शिक्षा उप निदेशक, सहायक शिक्षा निदेशक, आदि उपस्थित थे। वहीं कैवल्या गैर सरकारी संस्था के श्री विपुल कुमार और शौकत भी उपस्थित थे। कौशलेंद्र प्रपन्न ने पहले दिन शिक्षा के अधिकार अधिनियम 2009 के राजनीतिक, सामाजिक और रणनीतिक दबावों और वैचारिक प्रतिबद्धताओं पर विमर्श किया।

Friday, January 9, 2015

भाषा और बोली के मरने की ख़बर


भाषा और बोली के मरने की ख़बर हर किसी को है। हर कोई भाषा बोली को मरते अपने सामने देख रहा है। देख रहा है कि किस तरह से मातृभाषा को शिक्षा-शिक्षण की मुख्य धारा से काट कर बच्चों को एक दूसरी भाषा सीखने पर जोर बनाया जा रहा है। हर अभिभावक चाहते हैं कि उसका बच्चा अपनी मातृभाषा के अलावा अंग्रेजी जरूर बोलना, लिखना और पढ़ना सीख लें। अंग्रेजी के बगैर उसके लाल का भविष्य गोया अंधकारमय है। यदि अंग्रेजी नहीं सीखी तो उसकी जिंदगी बेकार है। ऐसी धारणाएं आम हैं। साथ यह भी आम है कि विदेशी भाषा के नाम पर हमारे जेहन में यदि किसी ताकतवर भाषा की छवि उभरती है तो वह अंग्रेजी ही है। हम अपने बच्चों पर इस गैर मातृभाषा सीखने के लिए कितना और किस कदर दबाव बनाते हैं इसका अंदाजा लगाना कठिन नहीं है। बच्चे की सहज अभिव्यक्ति-क्षमता, सृजनशीलता और कुछ नया सोचने की बीज बचपन में ही जल जाती है। मौलिक चिंतन और भाषीय छटा के बीज को अभिभावक, समाज और अंत में शिक्षा व्यवस्था ही मट्ठा देती है। तुर्रा यह कि हमारे बच्चे मातृभाषा नहीं बोलते। हमारे बच्चे अपनी भाषा से कट रहे हैं। यह कितना बड़ा अन्याय है कि पहले हम बच्चों से उनकी स्वभाविक भाषा-बोली अलग करते हैं और फिर दोष का ठीकरा भी उन्हीं पर फोड़ते हैं। दरअसल हमें भाषा-बोली के मरने और शिक्षा की मुख्यधारा में उसकी हैसीयत को पहचानना होगा।

Thursday, January 8, 2015

नई राष्टीय शिक्षा नीति निर्माण- काम जारी है


सुनने में आया है कि नई राष्टीय शिक्षा नीति बनाने की तैयारी शुरू हो चुकी है। संभव है जिस तरह से उर्दू, फारसी, एवं गैर हिन्दी शब्दों को पाठ्यपुस्तकों से बाहर करने की वकालत की जा रही है उसी तर्ज पर यह एनपीई भी तैयार होने वाला है?

Wednesday, December 31, 2014

कैसे कह दूं कि इस साल रहा अच्छा


बच्चों का दफना कर
बहिन को रूला कर
प्लेन को गायब कर
कैसे याद करूं इस साल।
क्या क्या हुआ
कहां कहां रोया भारत
कहां हो गई चूक
हमीं ने मारे हैं पांव पर कुल्हाडी।
जिन बच्चों के पांव में बजने थे रूनझुन पायल
वे नन्हें पांव दफन हैं मिट्टी में
निर्भया की और बहनें रो रही हैं
कैसे कह दूं
साल रहा अच्छा।
अबकी बरस न रोये बहन
घर में हो दीया जोरने वाला कोई
चूल्हा न रहे उदास
कलाई पर बंधी हो आस।
नववर्श मंगलमय हो आप सभी का।

Tuesday, December 30, 2014

साहित्य की दुनिया और विभेदीकर


साहित्य शब्द सुनते ही हमारे जेहन में जिस तरह की छवि बनती है वह कविता, कहानी और उपन्यास की ही होती है। क्या साहित्य महज यही है या साहित्य की सीमा में और भी विधाएं शामिल होती हैं। साहित्य का अपना क्या चरित्र है और साहित्य व्यापक स्तर पर क्या करती है? इन सवालों पर विचार करें तो पाएंगे कि साहित्य का मतलब महज पाठ्यपुस्तकों में शामिल कविता और कहानी पढ़ाना भर नहीं हैं, बल्कि पाठकों को जीवन दृष्टि प्रदान करना भी है। जीवन मूल्यों और संवेदनशीलता पैदा करना भी है। साथ समाज में खास वर्गों के प्रति समानता का भाव जागृत हो इसकी भी गुंजाईश साहित्य में हो।
साहित्य का शिक्षा शास्त्रीय विमर्श करें तो पाएंगे कि साहित्य हमारी पूर्वग्रहों को भी अग्रसारित करने का काम करती है। यादि कहानी व कविता विधा को लें तो वहां भी कहानियां कुछ यूं शुरू होती हैं- एक समय की बात है। किसी गांव में एक ब्राम्हण होता था। उनके दो बेटे थे। बड़ा बहुत ज्ञानवान और छोटा नकारा। इन शुरूआती पंक्तियों में देख सकते हैं कि गांव में क्या ब्राम्हण ही होते थे। क्या उनकी बेटियां नहीं थीं। क्या उस गांव में अनुसूचित जाति व जनजाति के लोग नहीं रहते थे। इस तरह से कहानियों में लिंग, जाति, वर्ण आदि को लेकर एक खास विभेद स्पष्ट देखे जा सकते हैं। शिक्षा शास्त्र और शिक्षा दर्शन इस तरह की विभेदी शिक्षा के पक्षधर नहीं हैं लेकिन पाठ्यक्रम और पाठ्यपुस्तक निर्माताओं ने इस तरह की कहानी और कविताओं को पाठ्यपुस्तकों में शामिल किया है जिसे पढ़ कर बच्चों में एक खास किस्म के वर्गांे के साथ स्वस्थ धारणा का निर्माण नहीं होता। अपने से कमतर मानने की प्रवृत्ति का जन्म पहले पहल कक्षा में पैदा होता है। एक बुदेलखंड़ी, मालवा, भोजपुरी, डोगरी बोलने वाले बच्चों से सवाल हिन्दी में पूछे जाते हैं तब वे बच्चे जवाब जानते हुए भी भाषायी मुश्किलों की वजह से चुप रहते हैं। यदि उन बच्चों को कक्षा में उनकी भाषा और भाषायी दक्षता को लेकर मजाक बनाया जाता है तब साहित्य कहीं पीछे छूट जाता है। स्थानीय भाषा पर मानक भाषा सवार हो जाती है। यहां बच्चों की मातृभाषायी समझ को धत्ता बताते हुए मानक भाषा को अपनाने की वकालत की जाती है।
यदि राष्टीय पाठ्यचर्या 1977, 1990 व उसके बाद 2000 पर नजर डालें तो पाएंगे कि वहां चित्रों, लिंग, भाषा को लेकर संतुलित छवि नहीं मिलती। यही वजह था कि 1990 में मध्य प्रदेश में एक सर्वे किया गया कि जनजाति और महिलाओं को किस प्रकार पाठ्यपुस्तकों में दिखाया गया है। उस रिपोर्ट में पाया गया कि महज 0.1 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति की भागिदारी दिखाई गई थी। वहीं महिलाओं की उपस्थिति सिर्फ 0.2 प्रतिशत थी। एक और सर्वे और शोध पर नजर डालना जरूरी होगा जो 1994-95 में हुई। यह शोध दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षा विभाग में हुई थी। इस शोध में पांच हिन्दी भाषी राज्यों की कक्षा 5 से 8 वीं के पाठ्यपुस्तकों का अध्ययन किया गया था। इस शोध का उद्देश्य था कि इन पाठ्यपुस्तकों में महिलाओं और जनजातियों को शामिल किया गया है। रिपोर्ट की मानें तो स्थिति बेहद चिंताजनक है। महज 0.00 और 0.1 फीसदी उपस्थिति दर्ज देखी गई थी।
सन् 1990 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 की रोशनी में बने पाठ्यपुस्तकों पर भेदभाव-जाति, वर्ग, लिंग का आरोप लगा था। इन आरोपों से उबरने के लिए 1990 में आचार्य राममूर्ति समिति का गठन किया गया। उन्हें सुझाव देना था कि कहां कहां इस तरह की गलतियां हुईं हैं और उन्हें कैसे सुधारा जा सकता है। उस सुझाव के बाद बने पाठ्यपुस्तकों पर नजर डालें तो स्थिति और भी हास्यास्पद नजर आती है। महिलाओं की उपस्थिति तो बढ़ी लेकिन उनमें काम और पूर्वाग्रह पूर्ववत् बनी रहीं। महिलाएं बाल बनाती हुईं महिलाएं खाना बनाती हुई पारंपरिक कामों लीन दिखाई गईं।
सच पूछा जाए तो साहित्य की दुनिया इस प्रकार के विभेदीकरण का स्थान नहीं देती। लेकिन न तोसाहित्य और न साहित्यकार अपने पूर्वग्रहों से बच पाता है। कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में निजी मान्यताओं, धारणाओं और मूल्यों को साहित्य तो जीवित रखता है। यदि हमें कहें तो किताबें निर्दोष नहीं होतीं तो गलत नहीं होगा। साहित्य का मकसद पाठकों को एक बेहतर मनुष्य बनाने और अपने अनुभवों को व्यापक करने में मदद करना है।
साहित्य की दुनिया पर एक नजर दौड़ाएं तो पाएंगे कि साहित्य भी कक्षा कक्षा होने वाले विभेद के फांक को बढ़ाने वाला ही होता है। इसमें शिक्षक की भूमिका अहम हो जाती है। यदि शिक्षक इस तरह की स्थिति में स्वविवेक का इस्तमाल नहीं करता तब बच्चों में स्वस्थ विचार नहीं पहुंच पाते।

अच्छा ही हुआ तुम मर गए


अच्छा हुआ
अच्छा ही हुआ तुम मर गए
समय रहते,
तुम वैसे भी जिंदा रह कर जी न पाते।
जब देखना पड़ता हजारों बच्चों की मौत,
इन्हीं आंखों से
जिन आंखों में सपने पीरोए थे,
जिन पांवों में जूते पहनाए थे
जिन पांवों से आंगन,
छत गुलजार थे
अब वे पांव,
कहीं मिट्टी में दफ़न हैं।
अच्छा ही हुआ
तुम मर गए समय रहते
वरना तुम सह नहीं पाते
और मरना पड़ता हर रोज
हर दिन देखना पड़ता महिलाओं की चीख,
आंसू के धार
तार तार
आबरू।
कितना अच्छा होता तुम आज होते
देखते अपने इन्हीं आंखों से
उन्हें जो पल पल
मर रही हैं मौत की डर से
जीने के भय से
मौन रह जाती हैं घरों की दहलीज़ पर
शहर के मुहाने पर।
तुम तो चले गए अच्छा ही हुआ
वरना तुम्हीं पर मढ़ा जाता सारा आरोप,
सारी गलतियां,
कितना अच्छा होता,
कर पाते हम विरोध,
उठा पाते आवाज,
उन के खिलाफ
जिन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता,
लाश किसकी थी,
कौन था दबा,
स्नेह के भार से
किसकी थी मंगनी,
किसके आंगन में उतरनी थी डोली।

Wednesday, December 24, 2014

दरख़्त


वो जो सामने दरख़्त है
बचपन लपेटे खड़े है
कहते हैं
दो तीन सौ साल से यूं ही आशीष दे रहा है
अब जटाएं भी जमीन दोस्त हो चुकी हैं।
धागों की मोटी चादर में लिपटा यह दरख़्त
उम्मीदों, आशाओं की डोर से बंधा
सदियों से खड़ा
देख रहा है
पीढि़यां कहां की कहां गुजर चुकीं
कहीं जो होंगे
किसी वीतान में।
जब भी गुजता हूं पास से दरख़्त के
मुझे पास बुलाता है
कानों को पास लाने को कहता है
कहता है,
तू अभी बच्चा है
नहीं समझेगा कहां चले गए तेरे बुढ़ पुरनिए,
बस यूं समझ ले,
कहीं तो हैं जो देख रहे हैं।
सुनने की कोशिश में ज़रा और पास आता हूं
उनकी जटाएं छूती हैं गालों को
सहलाती उनकी जटाएं
पुचकारती हैं
कहती हैं
मेरा बच्चा मैं हूं यहीं के यहीं
तुम्हारा दादू हूं
रहूंगा यहीं,
रक्षा करूंगा तुम्हारी
क्योंकि रहूंगा सदियों सदियों तलक।
आज भी आंखें मूंदता हूं
दादू की बलंद आवाज़ कानों में मिसरी के मानिंद घूलती हैं
बच्चों को बताता हूं
कभी चलना
मेरे गांव मिलाउंगा
अपने पुरखे दादू दरख़्त से
बच्चे कुछ मजाकिए अंदाज़ में सुनते
फिर गुम हो जाते हैं आभासीय दुनिया में।

Monday, December 22, 2014

शब्द अगर बोलते


अगर कभी शब्द बोल पाते तो जरूर अपने मन की बात बताते। अपने साथ होने वाले अत्याचार से भी हमें रू ब रू कराते। किस कदर हम सभ्य समाज के लोग इन शब्दों की दुनिया को ख़राब करने में जुटे हैं उसकी भी एक टीस हमारे कानों तक बजती। लकिन बेचारे बेजुबान शब्द कुछ नहीं कह पाते।
दरअसल शब्दों की दुनिया बड़ी निर्दोष और निरपेक्ष होती है। लेकिन जब वो बरतने वालों के हाथों में आती है तब उसकी प्रकृति प्रभावित होती है। शब्दों के जरिए ही हम हजारों हजार श्रोताओं और पाठकों तक पहंुच पाते हैं। पाठकों और श्रोताओं को अपने मुरीद बना पाते हैं। वहीं इन्हीं शब्दों के माध्यम से लाखों लाख श्रोताओं और पाठकों को अपने स्वार्थ के लिए भड़काते भी हैं।
शब्द अगर बोल पाते तो हमें बताते कि उनकी दुनिया कितनी नरम और नसीम की तरह फाहें वाली है।

Thursday, December 18, 2014

कविता कहानी से क्या होगा हासिल


रोज दिन हर पल नई नई कविताएं लिखी जा रही हैं। विश्व की तमाम भाषाओं में कविता लिखी जा रही है। जिस रफ्तार से कविताएं लिखी जा रही हैं क्या पाठक उसी तेजी से बढ़ रहे हैं। सवाल यह भी है कि क्या पाठकों को रोज लिखी जा रही कविताओं से कोई जीवन दृष्टि मिलती है? क्या कविता पढ़ने से कोई मूल्यपरक बदलाव घटित होता है? आदि ऐसे सवाल हैं जिन पर सोचने की आवश्यकता है।
कुछ भी लिखना कविता नहीं मानी जा सकती। कुछ माने गद्यपरक कविता या तुकमुक्त पंक्तियां कविता की श्रेणी में रखी जाएं। क्या कविता से जीवन-दर्शन प्रभावित होता है? क्या कविता हमें एक संवेदनशील मनुष्य बनने में मदद करती है? यदि ऐसा नहीं करती तो उस कविता का क्या लाभ।
कविता हो या लेख या फिर उपन्याय यदि कोई कलम चलाता है तो उससे पहले लिखने की आवश्यकता या उद्देश्य पर विचार करना चाहिए। वरना लिखे हुए शब्द की सत्ता एवं ताकत कमजोर होती है। अनावश्यक शब्द खरचना दरअसल शब्दों के साथ अन्याय है। अन्याय से कहीं बढ़कर शब्दों को जाया करना है।
लिखने से पहले लेखक को कई बार सोचना चाहिए कि क्रूा उनके लेखन से समाज पर कोई असर पढ़ने वाला है? क्या उस लेखन से किसी की जिंदगी बच सकती है? या उनके लेखन को किसी की अंधकारमय जीवन में थोड़ी सी रोशनी आ सकती है? यदि इन सवालों का उत्तर मिलता है तो जरूर लिखना चाहिए।
आज की तारीख में हजारों लाखों की तदाद में कविता, कहानी उपन्यास आदि साहित्य की तमाम विधाओं में लिखी जा रही हैं। इतनी लिखी जा रही हैं कि जिन्हें देख कर लगता है कि यह कहना कितना गलत है कि आज पाठक नहीं रहे। यदि पाठक नहीं हैं तो इतनी किताबें क्यों और कौन छाप रहा है। उससे बड़ा सवाल यह कि कोई लिख क्यों रहा है।
साइबर स्पेस और आभासीय दुनिया में इतनी सारी चीजें हैं कि उनमें से पढ़ने के लिए वक्त निकालना एक बहुत बड़ी समस्या है। यदि हमने समय निकाल भी लिया तो कैसे तय करें कि कौन सी किताब पढ़ने योग्य है। कविता पढ़ें या कहानी या फिर लंबी काया वाले किसी उपन्यास को हाथ लगाएं।

Wednesday, December 17, 2014

जब हमी नहीं होंगे तो किससे लड़ोगे


जब हमी नहीं होंगे
जब हमी नहीं होंगे तो किससे लड़ोगे,
हर सुबह,
चाय से लेकर नहाने तक,
आॅफिस पहंुच कर
किससे करोगे शिकायत,
कि दुध क्यों नहीं पीया
रोटी क्यों नहीं ले गए।
कल हमी नहीं हांेगे
बोलो किससे मुहब्बत करोगे
कौन तुम्हें सुबह उठाएगा,
करेगा तैयार आज की चुनौतियों से सामना करने के लिए।
जब हूं पास तो करते हो बेइंतहां नफरत
जब कल नहीं रहूंगा
तो बहाओगे न आंसू
ढर ढर,
जब कभी याद आउंगा किसी काम पर या बातों ही बातों में
क्रोगे याद
कित्ता परेशां करता था जब था।
आॅफिस के दोस्त
होंगे खुश चलो कुर्सी खाली हुई
फलां को बैठाएंगे,
अपन की जमेगी,
दो मिनट का मौन रख
फिर लग जाएंगे काम में,
कभी किसी फाईल में मिलूंगा दस्तख़त के मानिंद,
शायद कागजों में जिंदा मिलूंगा।
जब हूं तो
इत्ती नफरत
नजरें नहीं मिलाते
काटने को दौड़ते हो
मुहब्बत के नाम पर फरमान जारी करते हो
कल नहीं हुंगा तो
हिचकी के संग याद करोगे।

Tuesday, December 16, 2014

बहुभाषी कक्षा का चरित्र


कक्षा में विविध भाषा-भाषी समुदाय से बच्चे आते हैं। एक कक्षा में पूरा का पूरा समाज उपस्थिति होता है। भाषा की विविध छटाओं का निदर्शन हमें एक कक्षा मिलता है। यदि एक शिक्षक इस अवसर का लाभ भाषा शिक्षण में बतौर औजार का इस्तमाल करे तो वह कक्षा जीवंत हो सकती है।
अलग अलग भाषायी समुदाय से आने वाले बच्चों को स्थानीय मुहावरों, लोकोक्तियों से कक्षा की शुरुआत की जाए तो भाषा की छटाएं बड़ी सहजता से बच्चों तक पहुंच सकती हैं। भाषा शिक्षण की बुिनयादी चुनौतियों को कक्षा में उन्हीं के जरिए सुलझा सकते हैं।
अगर एक कक्षा में बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, बंगाल आदि राज्यों के बच्चे हैं तो उस कक्षा में भाषा की बहुछटाओं के साथ होते हैं। यदि ऐसी कक्षा में शिक्षक बच्चों की भाषा के जरिए शिक्षण करे तो वह कक्षा बच्चों को लुभाने वाली होंगी।

Friday, December 5, 2014

निर्दोष नहीं होती किताबें


किताबें भावनाओं और विचारों को संप्रेषित करने के लिए औजार के तौर पर इस्तमाल की जाती रही हैं। किताबें खुद में विचारों और वादों को समोकर जीती हैं। क्योंकि किताबों की अपनी कोई पहचान नहीं होती। इसलिए उसकी पहचान लेखक के विचार-संसार से ही हो पाती है। विचार और वादों को संप्रेषित करने में किताबें महज माध्यम का काम करती हैं। लेखक किताब का इस्तमाल अपनी साध्य को हासिल करने के लिए करता है। वह किताब गद्य-पद्य की किसी भी विधा की हो सकती है। वैचारिक संवाद और विवाद भी पैदा करती है किताबें। लेकिन इन तमाम विवादों से किताबें निरपेक्ष होती हैं। क्योंकि किताबें स्वयं कुछ नहीं करातीं बल्कि लेखक के इशारे पर नाचने वाली कठपुतली होती है। पिछले दिनों दीनानाथ बत्रा के बयान पर विवाद उठा। दीनानाथ बत्रा ने अपनी किताब में जिस तरह से विवेकानंद, गांधी, रामकृष्ण को कोट किया है वे कोट एकबारगी स्वयं के लिखे लगती हैं। क्योंकि कहीं भी स्पष्ट और प्रमाणिक संदर्भ नहीं दिए गए हैं ताकि उसकी जांच की जा सके। किताबें, पाठ्यपुस्तक और पाठ्यक्रम दरअसल लंबे समय से राजनीतिक धड़ों की गलियारों में चहलकदमी मचाती रही हैं। जिस भी वैचारिक प्रतिबद्धता वाली सरकार सत्ता में आई है उसने किताब और पाठ्यक्रम एवं पाठ्यचर्या के साथ अपनी मनमानी की है। स्कूली पाठ्यपुस्तकों में धर्म, सूर्यनमस्कार, आदि खास वैचारिक कथ्यों को बच्चों के बस्तों तक पहंुचाया गया है। पाठ्यपुस्तकों में लालू प्रसाद, मायावती, वसुंधरा राजे सिंधिया, नरेंद्र मोदी आदि की जीवनियों को शामिल की गई हैं। प्रेमचंद की कहानी को हाशिए पर डाल कर ज्यों मंेहंदी के रंग को स्थान दिया गया था। शिक्षा और शिक्षण से जुड़े व्यक्तियों के लिए इस तरह के बदलाव याद होंगे। यह भी याद होगा कि किस तरह से 1977, 1986, 2000 और 2005 में पाठ्यपुस्तकें तैयार की गईं। जब जब जिस जिस विचारधारा और राजनीतिक दल सत्ता में आए हैं उन्होंने मानव संसाधन मंत्रालय का इस्तमाल अपने वैचारिक हित साधने में किया है। ऐसे में को बड़ कहत छोट अपराधु कहना ज्यादा प्रासंगिक होगा।

Friday, November 28, 2014

सरकारी स्कूलों को भी गोद लीजिए


कौशलेंद्र प्रपन्न
माहौल बन चुका है। प्रधानमंत्री जी के पहल पर मंत्रियों और सांसदों से अनुरोध है कि जिस तरह से आदर्श गांव निर्माण के लिए गांवों को गोद लिए जा रहे हैं उसी तर्ज पर यदि सरकारी स्कूलों को भी गोद लिया जाए तो हमारे सरकारी स्कूलों की भी कायापलट हो सकती है। यह तथ्य किसी से भी छूपा नहीं है कि हमारे सरकारी स्कूलों को एक सिरे से नकारा साबित करने में तमाम कोशिशें की जा रही हैं। सच यही है कि आज भी गांव देहात में बच्चे सरकारी स्कूलों पर ही निर्भर हैं। यह अलग बात है कि जो सरकारी स्कूल गांव- कस्बों में चल रही हैं वो किस हालात में जिंदा हैं इस ओर हमारा ध्यान कम ही जाता है। सिर्फ और सिर्फ सरकारी स्कूलों के हिस्सा घृणा और उपेक्षा ही मिलती है। यह कितना बेहतर हो कि हमारे स्थानीय निकाय के लोग और सिविल सोसायटी के लोग अपने आस-पास के सरकारी प्राथमिक स्कूलों को बेहतर बनाने के लिए आगे आएं।
दिल्ली के वेस्ट पटेल नगर में 22 ब्लाॅक में टीन और अल्बेस्टर के नीचे नगर निगम प्रतिभा विद्यालय चल रहा है। इस स्कूल में कई बार हादशे हो चुके हैं। यहां की प्रधानाचार्या ने बताया कि कई बार प्रार्थना के वक्त तो कई बार कक्षा में भी पेड़ और भवन की दीवार गिरने जैसी घटना हो चुकी है। प्रधानाचार्या ने बताया कि इस स्कूल के भवन ‘‘झोपड़ी’’ को खतरनाक घोषित किया जा चुका है। लेकिन अभी तक हम इसी में पढ़ाने के लिए विवश हैं। गौरतलब है कि इस स्कूल में दो स्कूलों के बच्चे/बच्चियां भी पढ़ती हैं। वेस्ट पटेल नगर के 28 एस ब्लाॅक के नगर निगम प्रतिभा विद्यालय के बच्चे भी इसी स्कूल में इसलिए पढ़ते हैं क्योंकि उनके नए बने भवन में दरारें आने की शिकायत आई थी। उसे दुरूस्त करने के नाम पर पिछले दो सालों से उस स्कूल के बच्चे भी इसी स्कूल में सीमित कक्षाओं में बैठते हैं। हालात यह है कि एक कक्षा में दो और तीन कक्षाओं के बच्चे एक साथ बैठते हैं।
वेस्ट पटेल नगर के एस ब्लाॅक की प्रधानाचार्या से बातचीत में पता चला कि इन्होंने जब से भवन में खराबी की शिकायत की है तब से समस्याएं कम होने की बजाए बढ़ी हैं। कई बार शिकायत दर्ज कराने के बावजूद भी कोई देखने वाला नहीं है। नए बने स्कूल भवन में न तो पानी की व्यवस्था है और शौचालय में पानी की भी पूरी आपूर्ति होती है। भवन तो बन गए लेकिन बुनियादी चीजें महज बना दी गईं वो इस्तमाल में नहीं लाई जा सकतीं। स्कूल की दीवार इतनी नीची है कि आस पास के लड़के/ स्थानीय लोग कूद कर अंदर आ जाते हैं और स्कूल की गतिविधियों में व्यवधान पैदा करते हैं। ऐसे में हमारे सरकारी स्कूलों को कौन संभालेगा यह एक गंभीर मसला है।
गंगा को स्वच्छ बनाने के अभियान में जितना पैसा खर्च किया गया और किया जा रहा है काश कि उसका एक अंश भी हमारे सरकारी स्कूलों को बेहतर बनाने के लिया मिल पाता तो आज इनकी स्थिति यह नहीं होती। यहां दिल्ली के कुछ स्कूलों की दास्तां बयां की गई है। हम कल्पना कर सकते हैं कि अन्य राज्यों में सरकारी स्कूलों की क्या स्थिति होगी। आरटीई के लागू होने के बाद भी हमारे सरकारी स्कूल तमाम बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। माॅलों के निर्माण में हम पैसे खर्चने से ज़रा भी पीेछे नहीं हटते लेकिन सरकारी स्कूलों को बेहतर बनाने की बात आती है तब हमारा दम फुलने लगता है। तब हम निजी कंपनियों और बाहरी मदद के लिए मुंह ताकने लगते हैं। यदि गंगा को स्वच्छ बनाने और गांव को आदर्श ग्राम के लिए गोद लिए जा सकते हैं तो सरकारी स्कूलों को गोद लेने में हम क्यों हिचकिचा रहे हैं। क्या हमारी प्राथमिका की सूची में स्कूल और प्राथमिक शिक्षा शामिल नहीं हो सकती?
यूं तो निगमित सामाजिक जिम्मेदारी यानी काॅर्पोरेट सोशल रिस्पांसब्लिटी जिसे सीएसआर के नाम से जानते हैं इसके तहत कई सीएसआर गतिविधियां चलाई जा रही हैं। उनमें से टेक महिन्द्रा फाउंडेशन की पहलकदमी को भी नजरअंदाज नहीं कर सकते। टीएमएफ ने पूर्वी दिल्ली नगर निगम के स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा बहाल हो सके इसके लिए अप्रैल 2013 में इडीएमसी के साथ एक समझौता पत्र पर दस्तखत किया था। इस बाबत दिलशाद गार्डेन के ए ब्लाॅक में अंतःसेवाकालीन शिक्षक शिक्षा संस्थान की स्थापना की गई। तब से यह संस्थान शिक्षकों की दक्षता विकास को लेकर प्रतिबद्ध है। अब तक इस संस्थान में तकरीबन 1000 शिक्षक और 250 प्रधानाचार्यों की विभिन्न विषयों पर कार्यशालाओं का आयोजन किया जा चुका है। उसी प्रकार अन्य निजी प्रयास भी सरकारी स्कूलों को बेहतर बनाने के लिए चल रही हैं। एक बारगी सरकार के माथे पर ठिकरा फोड़ना तो आसान है लेकिन हमें हमारे निजी और सार्वजनिक प्रयासों पर भी नजर डालना होगा। हमारे माननीय सांसादों, विधायकों की कार्य सूची में सरकारी स्कूलों को कैसे बेहतर बनाया जाए और वो अपने स्तर पर स्कूल को सुचारू बनाने में क्या योगदान कर सकते हैं इसकी योजना बनानी होगी।
स्रकारी स्कूलों में हालात यह हैं कि एक तरफ आरटीई के वकालत और सिफारिशों के बावजूद स्कूलों में पीने का पानी, शौचालय, कक्षा में ब्लैक बोर्ड, खेल के मैदान मयस्सर नहीं हैं। उस तुर्रा यह कि जिसे देखो बिना जमीनी हकीकत को जाने सीधे सीधे सरकारी स्कूलों में शिक्षा के स्तर में लगातार गिरावट आ रही है इस घडि़याली आंसू बहाने में लगे हैं। कितना बेहतर हो कि स्थानीय नागर समाज अपने पड़ोस के स्कूल को अपनी दक्षता का लाभ मुहैया कराने के लिए आगे आएं। मसलन यदि कोई व्यक्ति एकाउंट, गणित, भाषा, आर्ट एंड का्रफ्ट आदि विषय में अच्छी गति रखता है तो वह सप्ताह या माह में जिस भी दिन उसके पास वक्त हो वह सरकारी स्कूल में बच्चों के साथ अपने अनुभव साझा करंे। स्थानीय नागर समाज अपने सरकारी स्कूलों को गोद लें। सरकार की ओर से जिस तरह की कोशिशें की जा रही हैं उससे ज्यादा उम्मीद भी नहीं कर सकते।

शिक्षकीय दुनिया की कहानी के पात्र

कौशलेंद्र प्रपन्न ‘‘ इक्कीस साल के बाद पहली बार किसी कार्यशाला में बैठा हूं। बहुत अच्छा लग रहा है। वरना तो जी ...