Thursday, January 18, 2018

जो साथ चलें...वो सपना



कौशलेंद्र प्रपन्न
जीवन में कई स्तरों और कई सीमा पर लड़ना होता है। इनमें से एक अहम सीमा है अपनी सीमाओं को पहचानना। हम अकसर अपनी सीमाओं की पहचान किए बगैर सपने देखने, बुनने लगते हैं। दूसरी सीमा हमारी इच्छाओं और क्षमता की होती है। हम सपने तो पाल लेते हैं लेकिन उसे पूरा करने के लिए जिस प्रकार की मेहनत और क्षमता की आवश्यकता पड़ती है वह हम नहीं कर पाते।
आज का सबसे बड़ा संघर्ष यही है कि हम अपनी सीमाओं और क्षमताओं का आंकलन किए बिना सपनां को संजोने लगते हैं। हालांकि सपनों को बुनने में कोई सीमा नहीं होती और न ही कोई बंधन लेकिन उन सपनों को कैसे पूरा करेंगे इसकी रणनीति अहम हो जाती है। यदि हमने सपनों के मकूल रणनीति बना कर आगे बढ़ते हैं तब हमारे सपने पूरे भी होते हैं और संतुष्टि भी होती है कि हमने अपने सपने पूरे किए।
मसलन मेरा सपना था कि मैं एक सफल और कुशल पत्रकार बनूं। लेकिन इस सपने को पूरा करने के लिए समय पर सही कदम नहीं उठाया। जब समय था तब कुछ और कोर्स किया। कहीं और वक्त लगाए। लेकिन मन में कहीं न कहीं यह टीस बनी रही कि पत्रकार बनता। और यह सपना पूरा हुआ। लेकिन उसकी खुशी नहीं हुई। क्यांकि वह वक्त पर नहीं मिला।
यह तो व्यक्तिगत तज़र्बा रखा शायद ऐसे हज़ारां युवा हैं जिन्हें जाना कहीं और था लेकिन अगर मगर की वजह से ग़लत प्रोफेशन में खम गए। बल्कि उनसे पूछिए तो बताएंगे कई सारी कहानी कि क्यों वो वो नहीं बन पाए जिसकी चाह थी। मसला बस इतना ही हैकि हम समय और सपनों के अनुसार रणनीति नहीं बना पाते।
हम छोटी छोटी उपलब्धियों में खुद को खुश कर लेते हैं। उन्हें छोटी उपलब्धियों को जीवन का लक्ष्य मान बैठते हैं। दिक्कत यहीं आती हैं। कहते हैं उडान और सपने असीम होते हैं। उन्हें बांधना वास्तव में खुद को सीमित करने जैसा है।पाश की एक कविता हैकि आग खतरनाक नहीं होता, सांप भी खतरनाक नहीं, बल्कि सुबह दफतर से स्कूल जाना और शाम घर लौट कर टीवी देखना, आंखों में सपनों का मर जाना खतरनाक होता है।

Tuesday, January 16, 2018

कहने को बहुत है मगर...




कौशलेंद्र प्रपन्न
सबके पास कहने को बहुत है मगर किससे कहें और कैसे कहें यह मसला है। मसला तो यह भी है कि कब अपनी बात को कही जाए। हर व्यक्ति के पास हज़ारों दास्तां है मगर वक़्त और व्यक्ति के अनुरूप नहीं कह पाते। कहना था कि हज़ारां बातें कई बार अनकही ही रह जाती हैं। और न कहने वाली बात ज़बां पर आ जाती है।
सीधी सी बात है कि जब हम कहते हैं तो कहना क्या चाहते हैं पहले उसी को तय कर लें। और जब कहना क्या है तय हो चुका उसके बाद कैसे कहना है वह फॉम हमें चुनना पड़ता है। कहन के अनुसार फॉरमेट का चुनाव बेहद ज़रूरी हो जाता है।
कहन में शैली यानी स्टाइल काफी मानीख़ेज़ है। यदि सही तरीके से सही शब्दों के माध्यम से नहीं कहा गया तो पूरा का पूरा कंटेंट ख़राब हो जाता है। कई बार बेहतर कंटेंट की भी हम हत्या कर बैठते हैं। यदि हमने सही शब्दों और फॉम का चुनाव नहीं किया तो। इसलिए कम से कम भाषा और शब्दां से खेलने वालों को अपनी शैली और कहन पर तो काम करने ही पड़ते हैं।
हमारे सामने कई लेखक,कवि, कथाकार आदि हैं जो बेहतर कहानी, कविता लिखते हैं। वो लोग अपनी शैली और भाषा पर बड़ी ही शिद््दत से काम करते हैं। वरना दूसरी तीसरी रचना के बाद वे पाठकों की दुनिया से उतर से जाते हैं। क्योंकि कब तक कोई पुरानी फसलों पर ज़िंदा रह सकता है।
यदि भाषाकर्मियों को जिं़दा रहना है तो उन्हें अपनी भाषा, कहन और शैली पर तो ठहर कर काम करना ही होगा। जैसे हमारे समय में कई लेखक हैं जो अपनी भाषा को लेकर ख़ासा गंभीर होते हैं। उन्हें पढ़ना एक तरह से अपनी भाषा को गढ़ने जैसा होता है।

Monday, January 15, 2018

बिसुरते हुए रिश्तों को बचाया जाए

अन्यथा न लेंगे...साझा कर रहा हूं
कौशलेंद्र प्रपन्न
इन दिनों एक बात मुझे परेशान रही है। बल्कि समझने के लिए आपके सामने यह मसला रख रहा हूं। मसला सामान्य और पेचीदा दोनों ही है। हमने अपने बचपन से देखा है कि हम और हमारे बच्चे मामा, मामीख् नाना नानी, मौसा मौसी के घर जाना चाहते हैं। उन्हें वहीं ज़्यादा मजा आया करता है।
चाचा चाची, बुआ फुफा के घर बच्चे कम ही जाते हैं। ताउ जी भी हुआ करते थे। उनका घर भी अब सूना रहता है। कुछ से बात की कि क्या मामला है। तो जवाब दिया कि कई बार पैसे और आर्थिकी प़ा भी काम करता है। यदि मामा-मामी का पक्ष पैसे वाला है तो वहां बच्चों को गिफ्टख् मजा मस्ती ज़्यादा होती है। ख्ुल कर उन पर पैसे किए जाते हैं। यदि चाचा चाची, दादा दादीख् ताउ कमतर हुए तो बच्चे वहां जाना कम पसंद करते हैं।
इन रिश्तों का एक डोर यह भी है कि यदि पापा को लगता है कि भाइयों के पास जाने पर और भी मुश्किलें आ जाएंगी। कोई पूछ बैठेगा और कैसा चल रहा है। फलां जगह घूमने गए थे। बहुत पैसे हैं कुछ हमारी भी मदद कर दे। आदि इन सवालों से बचते हुए पापा भाइयों बहनों के पास जाने से बचते हैं।
कहीं पढ़ा था पाकिस्तान की लेखिका हैं सबूहा ख़ान उन्होंने लिखा है कि कई बार हमें अपनी कामयाबी को खुद ही छुपाना पड़ता है। कहीं कोई और उसमें हिस्सा मांगने न आ जाए। शायद यह भी डर है कि भाई लोग बहनों के यहां जाने की बजाए सालियों के यहां जाना ज़्यादा पसंद करते हैं।
मुझे अपने पिताजी याद आते हैं वो स्वयं अपनी बहनों के यहां जाया करते थे और हमें भी छुट्टियों में लेजाया करते थे। गरमियों की छुट्टियों में बुआ खुद भी कई बार हमारे घर आ जाया करती थीं। मामी भी आती थीं। मजा हमें दोनों के ही आने में आता था। मामी जब जाया करती थीं या हम जब मामी के यहां से बिदा होते थे तो पांच रुपए हाथ में पकड़ाया करती थीं। वैसे बुआ भी पांच रुपए और दस रुपए हाथ में थमा देती थीं। आज भी मामी बिदाई पर दस रुपए और पचास रुपए पड़काती हैं। मना करने पर कहती हैं रख लीजिए। मालूम है आप अब कमाने लगे हैं। ये तो मामी का प्यार है।
मामी और बुआ के बच्चे बड़े हो गए। सब के सब अपनी अपनी दुनिया में व्यस्त हैं। कौन कहां हैं अब तो वर्षों मुलाकात नहीं होती। मां-पिताजी जिं़दा हैं और वे रिश्ते अभी भी सांसें ले रही हैं। लेकिन साफ दिखाई देता है कि इनके जाने के बाद हमारी पीढ़ी न तो मिलने जा रही है और न न्योता पेहानी ही होने वाला है। काश कि हम इन बिसुरते हुए रिश्तों को बचा पाएं। 

Thursday, January 11, 2018

लब पे आती है बन तमन्ना मेरी मत गाना लड्डो



कौशलेंद्र प्रपन्न
‘‘दया कर दान विद्या का हमें परमात्मा देना, हमारा धर्म हो सेवा हमारा कर्म हो सेवा। वतन के वास्ते जीना, वतन के वास्ते मरना। बहा दो प्रेम की गंगा, दिलों में प्रेम का सागर। सदा ईमान हो सेवा’’ आदि। इन पंक्तियों पर कुछ लोगों का एतराज़ है कि इन पंक्तियों से ख़ास लोगों, धर्म, संप्रदाय आदि का बढ़ाया जा रहा है और नास्तिक व अन्य धर्मां की भावना आहत हो रही है इसलिए इस प्रार्थना को हटा देना चाहिए। हाल ही में मध्य प्रदेश के एक व्यक्ति ने सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका दाख़िल की थी। इस जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने सरकार से चार हप्ते में जवाब देने को कहा गया है।इस विवाद के केंद्र में हैकेंद्रीय विद्यालय संगठन के तमाम स्कूल जहां यह प्रार्थना गाई जाती है।इस प्रार्थना को आज से नहीं बल्कि पिछले पचास वर्षों से केंद्रीय विद्यालयों के स्कूलों में सुबह की प्रार्थना सभा में शामिल की गई है।पहली नज़र में इन पंक्तियों में कोई विवाद या मतविभिन्नता नज़र नहीं आती। बल्कि पूरी प्रार्थना में ऐसी कोई पंक्ति व भावनाएं ऐसी नहीं हैंजिन्हें सुन व बोल कर किसी और धर्म व संप्रदाय की भावना आहत होती हो। देश सेवा व देश की रक्षा में हर नागरिक की जिम्मेदारी और भूमिका सुनिश्चित है।कोई भी इस बात से इंकार नहीं कर सकता कि देश की रक्षा करना व रक्षा करने के भावना को प्रकट करना ग़लत है।इस प्रार्थना में प्रभू व अल्ला से इसी भावना को मज़बूत करने कि इच्छा प्रकट की गई हैकि मेरे अंदर देश प्रेम और देश की रक्षा के लिए हम पीछे न हटे। अब सोचने की बात यह हो सकती हैकि यह भावना किसी भी धर्म,संप्रदाय के मानने वाले हों यदि वे भारत में रह रहे हैंतो उस देश की रक्षा हो। उसपर किसी भी प्रकार की विपदा या असुरक्षा न हो क्या यह कामना करना ग़लत नहीं है।वह चाहे किसी भी संप्रदाय व जाति, धर्म के हों यदि भारत में हैं तो उसकी रक्षा प्रथम है।देश सुरक्षित नहीं तो उसके नागरिक क्या सुरक्षित रह पाएंगे?
प्रार्थना के अंत में वेद की पंक्तियों का प्रयोग किया गया हैजो शांतिपाठ के रूप में प्रयोग किया गया है।यदि हमें वेद की ऋचाओं से गुरेज़ हैतो परमवीर चक्र में लिखित दधीच की रीढ़ की हड्डी के प्रतीक को भी निकाल बाहर करना होगा। हमें तो अशोक चक्र में उल्लिखित सत्यमेव जयते वाक्य पर भी एतराज़ जतलाना होगा। हमें एक और पीआइएल डालने होंगे कि इन पंक्तियों को हटा देना चाहिए। क्योंकि इनमें वेद व उपनिषद् से मंत्रों के अंश लिए गए हैं। क्योंकि इससे किसी और धर्म, संप्रदाय के लोगों की उपस्थिति नहीं है।दूसरा गंभीर मसला यह भी हैकि क्या हम महज विरोध और विवाद को हवा देने के लिए तर्कों का सहारा ले रहे हैं या हमारा मकसद वृहद फलक को ठीक करना है।आज न केवल यह प्रार्थना विवाद में आया हैबल्कि हाल ही में राष्ट्रगान पर भी न्यायालय ने आदेश दिए हैंकि सरकार तय करे कि नागरिक सिनेमा हॉल में राष्ट्रगान के वक्त खडे हों या नहीं।

Wednesday, January 10, 2018

1947-48 के बाद का मंज़र



1947-48 के बाद का मंज़र
कौशलेंद्र प्रपन्न
सन् 1947-48 इतिहास का वह का वह कालखंड़ है जब न केवल ज़मीन का बंटवारा हुआ बल्कि कई ज़िंदगियां भी तक़्सीम हुईं। इधर और उधर के लाखों लोगों के सपने बिखरे और टूटे भी। यह ऐसी घटना थी जिसमें न केवल भारत बल्कि पाकिस्तान भी तबाह हुआ। आज जब हम उन वर्षों को याद करते हैं तो आज भी आंखें नम हो जाती हैं। आंखें सूनी सूनी हो जाती हैं।
इस तक़्सीम को सामाजिकों ने अपने अपने तरीके से महसूस किया। उसे याद किया और कहानी कहने की कोशिश की कि वह कहानी नहीं थी। वह उपन्यास नहीं था। न ह ीवह नाटक था। बल्कि लोगों के ख़ून से लिखी जा रही स्मृतियां थीं जिन्हें भूलाए नहीं भूल सकते। जिन्ने लौहार नई वेख्या ते जनमिया नई, कितने पाकिस्तान, ट्रेन टू पाकिस्तान, टोबा टेक सिंह, खोल दो, आजादी की छांव में आदि कहानी, उपन्यास और नाटक लिखे गए। यह एक साहित्यकार भी अभिव्यक्ति थी। यह एक संवेदनशील नागर समाज की तड़प थी जो पन्नों पर उतरती चली गई।
हाल ही में शिवना प्रकाशन ने एक नहीं बल्कि दो किताबें ऐसी छापी हैं जिन्हें पढ़ना मतलब 1947 के मंज़र को जीना है। उन घटनाओं से रू ब रू होना है जिसे तब के परिवारों ने सहा और जीया। एक 1947 दिल्ली से कराची वाया पिंडी सबूहा ख़ान की लिखी है। यह कविता या कहानी नहीं बल्कि एक संस्मरण है। जब सबूहा को महज इतना भर याद रह जाता है कि दिल्ली में उनके घर में काले और सफेद रंग की टाइल्स लगी हुई थीं। अम्मी बड़ी ख़ानदान की बेटी थीं और पापा रोहतक के पास के गांव से आते थे। अम्मी की ज़िद्द के आगे दिल्ली बस गए थे। 1947 में तबाह और मजबूर हो कर सबूहा का परिवार कराची कूच कर जाता है। रास्ते में रेलगाड़ी में खचाखच भीड़ उसमें एक महिला प्रशव पीड़ा से परेशान होती है जिसकी हिफाज़त उसकी मां करती हैं।
पाकिस्तान में दूसरे के घर पर कबजा किया जाता है। वहीं रहती हैं। अम्मी इतनी मज़बूती से पेश आती हैं कि कलक्टर से भी लड़ पड़ती हैं और वह हवेली उनकी हो जाती है। फिर भी सबूहा को भारत और कभी कभार याद आता है। पाकिस्तान तो उनका बचपन और युवावस्था का देश रहा। इस किताब में सबूहा कहती हैं कि कहानी कई बार हमें जीवन की सच्चाई से दूर करती है। और यह कहानी नहीं बल्कि मेरा भोगा हुआ यथार्थ है।
यदि यह किताब मिले तो पढ़ें ज़रूर। 

Tuesday, January 9, 2018

हॉल 12 के सिवा मेला और भी है





कौशलेंद्र प्रपन्न
हॉल 12 की अपनी दस्तां है। हर कोने, मोड़ पर कहानी पसरी हुई है। जिससे मिलिए वही कहानी सुनाता है। वही कवि मिलते हैं। तमाम भारतीय भाषा में साहित्य उपलब्ध हैं। न केवल साहित्य बल्कि और भी चीजें मिलेंगी। ध्यान,धर्म,नौकरी सब कुछ तो इस हॉल में है।फिर कौन जाए हॉल 13 को छोड़कर किसी और हॉल में।
जनाब मेला हॉल 12 के अलावा और हॉल में भी हैं। मगर बेचारे और हॉल दुर्भागे हैं। शायद उन्हें श्रोता, पाठक और भीड़ वैसी नहीं मिल पाता जितना 12 को मिला करता है।हॉल 7 और आठ भी इसे मेले के अंग हैंलेकिन दक्षिण भर टोले की तरह।
हॉल 7 में बच्चों को लेकर नहीं गए तो बच्चों की रोचक दुनिया से परिचय पाने से महरूम रह जाएंगे। साथ ही पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए हॉल 7 को सजाया गया है। उसे नहीं देखा तो कुछ भी नहीं देखा। हॉल आठ में साहित्य मंच है और अन्य प्रकाशक हैं। लेकिन इन्हें भी श्रोता और पाठकों की राह तकनी पड़ती है। जबकि हॉल 7 और 8 में देखने,सुनने और महसूस करने को बहुत कुछ हैं।
पर्यावरण के साथ ही पानी के संरक्षण को लेकर कुमार प्रशांत और मनोज मिश्र की बातचीत बेहद ख़ास मानी जाएगी। इसी हॉल में उपभोक्ता, र्प्यावरण और साहित्यकार भी भूमिका पर संपन्न विमर्श में सुनने वालां की निहायतज ही कमी थी। वहीं हॉल 12 में उसी वक्त हो रहे कवि सम्मेलन में भीड़ थी कि खड़ी थी। शायद यह विधा के साथ ही रूचि का भी मसला है। मगर मेला किसी एक विधा व हॉल के आधार पर नहीं आंकी जा सकती। बाकी खुद जा कर देखें।

Saturday, January 6, 2018

पुस्तक-मेला, लेखकीय झोला और हामिद



कौशलेंद्र प्रपन्न
पूरे सालभर के बाद मेला आया है। मेला वो भी किताबों का। हामिद एक साल से इंतज़ार में था। उसे भी मेले में बोलने का मौका मिलेगा। उससे भी किताबों के लोकार्पण के निमंत्रण मिलेंगे। वो भी लंबा और चमकदार कुर्ता और बंडी पहन कर मेले में जाएगा। हासिद के दोस्त नए नए कपड़ां, किताबों, कवर पेज के साथ मेले में जाने के लिए हुलस रहे थे। लेकिन हामिद की किताब शाम तक उसके हाथ में नहीं आई। परेशान हामिद इधर उधर फोन करने में लगा था। प्रकाशक बार बार समझा रहे थे कोई बात नहीं। यहां कौन लोकार्पणकर्ता पढ़कर आता है। कवर पेज दिखा दीजिए बोलने वाले उसी पर बोलते रहेंगे। हामिद की अम्मी ने कहा अपने साथ झोला लेते जाना। और कुछ हो न हो कम से कम किताबें बटोरने में आसानी होगी। हामिद नहा धोकर मेले के लिए निकल गया। आखि़र उसकी भी तो किताबें आनी थीं। बड़ी मुश्किल से सिंह और वर्मा जी तैयार हुए थे।
किताबों का मेला हर साल की भांति इस वर्ष भी पाठकों को बुला रहा है। न केवल पाठक बल्कि लेखक, प्रकाशक, वितरक आदिके लिए एक ऐसा उत्सव होता है जहां ये तीनों चारों घटक एक ही छत के नीचे मिला करते हैं। लाखों किताबें मेले आती हैं। उनकी ढुलाई,बिक्री, साजो सज्जा आदि में भी लाखों रुपए खर्च होते हैं। उम्मीद इस बात की होती है कि पाठक और खरीद्दार आएंगे। कम से कम पाठक आएं न आएं संस्थाएं आएंगी तो उनकी एक मुश्त बिक्री संभ्राव हो जाएगी। पिछले साल के मेले पर नोट बंधी का असर साफ देखा और महसूसा गया था। लोगों के पास पंड़ाल में बिक रहे पिज्जा, कॉफी महंगी चीजों को खरीदने के पैसे थे किन्तु जब किताबों की बारी आती है तब हमारी जे़ब हल्की हो जाती है। वजह प्राथमिकता का है। हमारे जीवन में पढ़ना, किताबें, शिक्षा आदि की जगह धीरे धीरे नहीं बल्कि बहुत तेज़ी से सिमट रही हैं। हम किताबें भी वैसी खरीदने से नहीं हिचकते जो बताती हो कि सफल वक्ता कैसे बनें। हम कहां अपने पैसे लगाएं कि कम समय में ज़्यादा रिटर्न मिल सके। बिज़नेस, मैनेजमेंट आदि की किताबें जिस तदाद में बिक रही हैं। उस अनुपात में साहित्य की किताबें कम बिकती हैं। उसमें भी जो मनोरंजन, उमंग, हास्य प्रधान किताबों होती हैं उसको हाथों हाथ पाठक उठा लेते हैं। मसलन कोई किताब विवादास्पद मुद्दे को केंद्र में रखकर लिखी गई है।तब भी किताब की बिक्री बढ़ जाती है।समझने की आवश्यकता हैकि क्या किताबें महज विवाद पैदा करने, सनसनी फैलने व बिक्री के लिहाज़ से लिखी जाती हैं। माना जाता हैकि साहित्य की भूमिका समाज व पाठक को संवेदनशील बनाना भी होता है।प्रो. कृष्ण कुमार बड़ी शिद्दत से मानते और कई जगहों पर जिक्र भी कर चुके हैं कि साहित्य और ख़ासकर हिन्दी कविता, कहानी का शिक्षण स्कूली स्तर पर जिस लचर तरीके से हो रहा है उसे देख कर बहुत क्षोभ होता है। साथ ही एक पीड़ा भी होती है कि हिन्दी साहित्य के विभिन्न विधाओं में इतने विद्वान लेखक हुए हैं किन्तु उनके पाठों का शिक्षण उतनी ही गैर जिम्मेदाराना तरीके से स्कूलों में शिक्षक पढ़ाते हैं। प्रो. कुमार मानते हैं कि यदि कहानी कविता को बेहतर तरीके से पढ़ा-पढ़ाया जाए तो काफी हद तक हम हिन्दी को बचाने में सफल हो सकेंगे।
आज की तारीख में जिस संख्या में साहित्य की विभिन्न विधाओं में लिखी जा रही हैं उनमें कविता,कहानी, उपन्यास ही प्रमुखता पाती हैं। वहीं दूसरी विधाएं लगभग उपेक्षित रह जाती हैं। उसमें भी ख़ासकर बाल साहित्य तो हाशिए पर ही जा चुका है। बाल साहित्य के नाम पर जिस प्रकार की कहानियां पढ़ने को मिलती हैं। उसे देखकर लगता है कि हिन्दी और गैर हिन्दी भाषायी साहित्य जगत् में बाल साहित्य को लेकर गंभीरता छिजती जा रही है। बाल साहित्य के साथ ही कथेत्तर साहित्य की स्थिति भी शोचनीय है। डायरी, यात्रावृतांत, रिपोतार्ज़, संस्मरणण आदि में जिस प्रकार की रचनाएं हो रही हैं या तो वे रोशनी में नहीं आतीं या फिर उन्हें समीक्षा की परिधि से ही बेदख़ल कर दिया जाता है। मेले में न केवल इस मेले में बल्कि पिछले कई मेलां का विश्लेषण करें तो पाएंगे ि कवे ही किताबें ज़्यादा बिकी जिन्हें समीक्षक मिले, जिन्हें रोशनी में लाने वाली चर्चाएं मिलीं या फिर बाज़ार में जिनके नामों को खूब बजाया गया। ऐसे में अच्छी से अच्छी किताबें बिना पढ़ी कहीं पड़ी रह जाती हैं। जिन किताबों को समीक्षक मिले, जिन्हें लोकार्पण का अवसर मिला वो कुछ देर के लिए कवर से बाहर झांक पाईं बाकी वहीं कार्टून में बंद रह गईं।
हामिद को मेले में किसिम किसिम के लोग मिलेंगे। हामिद की अम्मी ने ताकीद किया था कि बचना ऐसे वैसे लेखकों से जो सब्जबाग दिखाएंगे किन्तु मार्गदर्शन करने के नाम पर तुमसे कुछ चाह रखेंगे। कुछ मदद की मांग करेंगे। किन्तु हामिद न माना। वो उन झोला बटोरू लेखकों की गिरफ्त में आ ही गया। उसकी किताब का लोकार्पण होना था। सो समय पर कोई न आ सका। न वो लेखक जिन्होंने वायदे किए थे। थे तो वे वहीं उसी मेले में किन्तु मंच पर हामिद को साथ होने की पहचान से बचना चाहते थे। सो हामिद मंच पर प्रकाशक और घर एक एक दो सदस्यों के साथ नज़र आया। अम्मी भी नहीं आई। क्योंकि उन्हें सिलाई, बुनाई करनी थी। वो तो हामिद का मन रखने के लिए किताब छपवाने को कह दिया था। पैसे भी दे दिए थे। हामिद आज बहुत उदास था। दूसरी ओर दूसरे कुर्ताधारी लेखक,कवि महोदय दूसरे स्टॉल पर हंसते, दांत निपोरते नज़र आए। आएंगे ही क्योंकि उस प्रकाशक ने उनकी कविता की किताब जो छापी थी।
पिछले उन्नीस सौ चौरान्बे से पुस्तक मेले के आयोजन का तजर्बा रखने वाले राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के संपादक का कहना है कि उन्होंने जिस तरह की लेखकीय झिझलापन, रीढ़विहीन बरताव भारतीय पुस्तक मेले में देखा है वैसी स्थिति दूसरे देशों में नहीं देखी। वो अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि अन्य देशों में लेखकों को सुनने के लिए श्रोता-पाठक डालर कर देते हैं। लेखकीय वक्तव्य को सुनने के लिए श्रोता-पाठक जब पैसे देता है तब लेखक और पाठक के संवाद कहीं न कहीं सार्थक दिशा में भी जाती है। यहां तक कि लेखक से बातचीत करने, उसकी रचनाओं और रचना प्रक्रिया पर चर्चा करने के लिए श्रोता-पाठक टिकट खरीदते हैं। वहीं भारतीय पुस्तक मेले में लेखक ऐसे जनसुलभ होते हैं जैसे शौचायलयों की दीवारों पर लगे पोस्टर। कोई भी कहीं भी पढ़ ले और आग बढ़ जाए। सच पूछा जाए तो आज की तारीख में लेखकों ने अपनी कीमत और सम्मान खु़द ही कम किया है। कई ऐसे लेखक कवि, व्यंग्यकार हैं जो मेले में सुबह से शाम और रात तक यहां वहां जहां तहां बिछते,पसरते और रिरियाते नज़र आते हैं। हो भी क्यों न साल भर कमरे में कैद लिखते-पढ़ते एकांत जीवी लेखक साल में एक बार ही सही अपना गला साफ करते हैं। कुछ लेखकों के चेहरे इतने रिकार्ड हो चुके होते हैं कि वही चेहरे तकरीबन हर एक दो दुकानें (बुक स्टॉल, मंच) पर बोलते, खखारते नज़र आएंगे। सुबह ख़ाली झोला लेकर आते हैं और शाम तक उनके पास कई झोले, किताबें हो जाती हैं।

Friday, January 5, 2018

कहानी पढ़ना-पढ़ाना और लिखना





कौशलेंद्र प्रपन्न
कहानी लिखना और सुनना जितना आसान है उससे ज़्यादा शायद कहानी कैसे पढ़ाएं यह समझाना है। कहानियां हम खूब लिखते-पढ़ते और सुनाते हैं लेकिन जब कहानी बच्चों को कैसे पढ़ाएं यह उतनी ही चुनौतिपूर्ण होती है।
कहानी कहना और कहानी पढ़ाना भी एक कौशल माना जाता है। इस कौशल को भी हम अभ्यास से सीख सकते हैं।
हमने डॉ विभास वर्मा, कथाकार, संपादक, आलोचक और शिक्षक को कार्यशाला में आमंत्रित किया। इन्होंने जिस शिद्दत और बारीक तरीके से कहानी की बुनावट के बारे में बात की वह सचमुच अनुकरणीय रहा। शिक्षकों को इस सत्र में काफी कुछ सीखने को मिला।
हां शुरुआत में शिक्षकों को यह सत्र थोड़ा शुष्क और एकालाप सा लगा किन्तु आगे चल कर इससे जुड़ते चले गए। बीच बीच में मुझे कहना और समझाना पडा कि हर व्यक्ति की अपनी ख़ामियतें होती हैं। हर किसी की अपनी ख़ास प्रकृति होती हैऔर उसकी शैली भी। इसलिए किसी और से तुलना करना ठीक नहीं।
धीरे धीरे व्यक्ति अपने स्तर और गांठों को खोला करता है।इसलिए थोड़ा इंतज़ार कीजिए। व्यक्ति तुरंत नहीं अपनी विशेषताएं खोला करता है।इंतज़ार करें और देखें कि सामने वाला व्यक्ति क्या और कैसे अपनी बात को रखने की कोशिश कर रहा है।जैसे जैसे हम प्रतीक्षा करते हैं वैसे वैसे और और कंटेंट आकार लेते हैं।
कुछ ने कहा बोलने में ज़रा अधिक समय ले रहे हैं। शब्दों और वाक्यों के चुनाव में इन्हें ज़्यादा समय लग रहा है। जबकि भाषा और कहानी के व्यक्ति को इतना समय तो नहीं लगना चाहिए सर।
मान कर चलें कि हर कोई वक्ता ही हो यहह ज़रूरी नहीं। हर लेखक एक बेहतर वक्ता हो संभव नहीं। उसकी विधा लेखन की है। वक्ता की विधा बोलने में है। संभव है वह लेखन उतना बेहतर न कर पाए जितना अच्छा वह बोलता है।
बहरहाल अपना तज़र्बा तो यह कहता है कि ज़रूरी नहीं कि हर व्यक्ति बहुत अच्छा वक्ता ही हो। अच्छे अच्छे लेखक मंच पर उतनी धारदार तरीके से अपनी बात नहीं रख पाते। शायद इसमें नाटकीय कला की मांग हो, किन्तु वे औरों से बेहतर लिखते हैं।


Thursday, January 4, 2018

बुध्या मान कोनी



कौशलेंद्र प्रपन्न
कार्यशाला में तरह तरह के लोग होते हैं। कुछ इसी सोच से आते हैंं कि पढ़ाकर दिखाओ तो जानें। आप ही ज्ञानी हो हम क्या निरी ख़ाली हैं?
ऐसे लोगों से रू ब रू होना बड़ा ही दिलचस्प होता है। इन दिनों चल रही हिन्दी की कार्यशाला में ऐसे ही एक बुधना से मुलाकात हो रही है। हर बात पर अड़ जाते हैं। हर शब्द पर सवाल और तर्क करते हैं कि यही क्यों है? ऐसे ही क्यों लिखें। त्यौहार ही लिखते और पढ़ते आए हैं। इसमें क्या ग़लती है आदि। अपने तर्कों से सत्र को चलने नहीं देते। गोया संसद हो। अड़ गए तो अड़ गए। हम सत्र को चलने नहीं देंगे।
शब्दों के साथ तो एक पूरी कहानी और विकास यात्रा भी हुआ करती है। कभी विद्या लिखा करते थे। कभी दौर था जब शुद्व लिखा करते थे। लेकिन समय बदला और लेखन के स्तर पर विद््वानों से राय दी कि हम अब हिन्दी के लेखन स्तर पर अब कुछ इस तरह से लिखा करेंगे। केंद्रीय हिन्दी निदेशालय ने समिति बनाई और कुछ मानक शब्दों की लेखन रूपों को स्थाई किया। इसमें काफी पैसे और मैनपावर खर्च हुए होंगे। लेकिन बुधना मानने को तैयार नहीं कि हम क्यों मानें कि यही प्रमाणिक है।
मैंने उन्हें बताया कि आप जब भी दुविधा में हों तो कायदे से स्थापित और सर्वमान्य ग्रंथों में जवाब तलाशें। मसलन अरविंद कुमार समानांतर कोश, हरदेव बाहरी, फादर कामिल बुल्के जैसे कोशों में देखना चाहिए। इस पर जनाब ने फिर तर्क पेश किया इन्हें हम कैसे मानक मान लें। इन्हें ही क्यों मानें।
बुध््ना मान कोनी। नहीं मानें तो नहीं मानें। अपने अपने तर्क पेश करते रहे। अंत में मुझे कहना पड़ा कुतर्कों का अंत नहीं। सो यदि आपको नहीं मानना तो नहीं मानें। कम से कम बच्चों का ख़्याल करें। वे बच्चे आपको मानक मानकर चलते हैं।
ख़ुद साहब के खे गे उच्चारण कर रहे थे। जब कहा गया कि क ख ग बोलें तो फिर उन्हें अड़ना था सो अड़े। यह तो मेरी मात्री भाषा है। इससे कैसे अलग हो सकते हैं। अब ऐसे प्रतिभागियों से कई बार पूरी कक्षा परेशान तो होती ही है साथ पढ़ाने वाला बार बार उन्हें संतुष्ट करे या फिर उन्हें नज़रअंदाज़ कर आगे बढ़ जाए।
सेचना तो बनता है !!!

Wednesday, January 3, 2018

अतीतीय टटका रस और जोख़िम


कौशलेंद्र प्रपन्न
सामान्यतौर पर कहा जाता है कि कवि, साहित्यकार अतीतजीवी हुआ करते हैं। अपनी रचनाओं में अतीत को जीने की दुबारा कोशिश करते हैं। काफी हद तक सही भी है। लेकिन सच तो यह भी है कि कवि, साहित्यकार न केवल अतीत की यात्रा करता है बल्कि वहां से वर्तमान की रोशनी भी लेकर आते हैं। उसी रोशनी में वर्तमान को समझने और सुझाव भी प्रस्तुत करता है।
कहानियां, उपन्यास कविता आदि से अतीत को निकाल बाहर किया जाए तो शायद कहानियां थेड़ी कमजोर हो जाएं। कविताएं थोड़ी बुझी बुझी सी हो जाएं। किन्तु जब कथाकार अतीत का इस्तमाल करता है तो उन तत्वों को वर्तमान में रख कर समझता है। यही अंतर है इतिहासकार और कथाकार में। कथाकार काल-खंड़ को पुरर्सृजित करता है। जबकि इतिहासकार महज अतीत का मूल्यांकन करता है। इस मूल्यांकन की प्रक्रिया में इतिहासकार भी अतीत की यात्रा करता है।
प्रो. कृष्ण कुमार इसे अतीत में अटक जाने के ख़तरे भी मानते हैं। एक सामान्य व्यक्ति अतीत में जाता है तो इसकी भरपूर संभावनाएं होती हैं कि वह वहीं रह जाए। वहीं की संवेदना और भावजगत में अटक कर रह जाए। उसे जाना तो आता है लेकिन लौटने की विधि नहीं आती।
हमारे जीवन में भी ऐसे ऐसे अतीत हैं जहां हम कई बार जाना क्या सोचना तक नहीं चाहते। लेकिन क्या वज़ह कि फिर भी बार बार हमारा अतीत हमें याद आता है। हम अतीत की संवेदना को ज़िंदा रखना चाहते हैं। फलां ने मेरे साथ अच्छा नहीं किया। इसे कैसे भूल जाएं। कैसे कोई भूल जाए कि किसी की वज़ह से आपको अपनी ही नज़रों में गिरने की घड़ी भी सहनी पड़ी थी।
अतीत से लौटने के औज़ार सामान्यतौर पर कोई नहीं देता। हालांकि कहने वाले कहते हैं। कहते हैं कि भूल जाओ जो हुआ। नई जिं़दगी की शुरुआत करो। मगर एक मन है कि मानता ही नहीं। एक दिमाग है कि बार बार पुराने व्यवहार की मांग करता है। वह चाहता है कि फलां व्यक्ति के साथ जैसे संबंध अतीत में थे वे वैसे ही रहें। क्या यह संभव है?
नदी बहती रहती है। दुबारा उसी जलधार को हम नहीं स्पर्श कर सकते। हमें यह मानना और समझना होगा कि रिश्ते और शब्द दोनों ही संदर्भ बदलते ही मायने बदल लिया करते हैं। रिश्ते शायद हमेशा स्थाई भी तो नहीं होते। इसमें भी बाज़ार की तरह भाव चढ़ते और उतरते रहते हैं।

Monday, January 1, 2018

नए साल के काम...




कौशलेंद्र प्रपन्न

उगो हे कर्मयोगी उगो...

नए साल में हम सबने कुछ न कुछ ज़रूर सोच रखा है। सोचा नहीं तो सोचना तो होगा। हमें अपने साल की योजना तो बनानी ही चाहिए।
आज मेरी शुरुआत एक लेखन से हुई। इस साल का पहला लेख लिख कर सुखद एहसास हुआ। विषय बाल साहित्य समीक्षा से बाहर। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में वयस्कों के साहित्य की चर्चा तो होती है किन्तु बाल साहित्य उपेक्षित रह जाता है।
इस साल मेरी कोशिश होगी कि एक नई किताब को पूरा कर सकूं। इतनी ताकत और आत्मबल बना रहे कि इस किताब को पिछली किताबों से बेहतर बना सकूं।
हम सब के पास सीमित समय हैं। सीमित ही क्षमताएं होती हैं। कुछ लोग हैं जो प्रयास से अपनी क्षमता और दक्षता को विकसित कर पाते हैं। यदि हम योजनाबद््ध तरीके से कार्ययोजना बनाएं और उसपर अमल करें तो क्या मजाल कोई सफल होने से रोक सके।
बच्चे परीक्षा के भय से बाहर आ सकें। अपनी क्षमता और कौशल के आधार पर जीवन की राह चुनें। इससे बेहतर कुछ और नहीं हो सकता। लेकिन ऐसा ही नहीं हो पाता। बच्चे वयस्कों की इच्छाएं जीया करते हैं। कई बार यह जीना इतना भारी हो जाता है कि बच्चे जीवन ही छोड़ जाते हैं।
बच्चे हैं तो शिक्षा होगी। शिक्षा होगी तो बच्चों को बेहतर जीवन की तमीज़ दे सकेंगे।


Sunday, December 31, 2017

साल का अंतिम दिन




कौशलेंद्र प्रपन्न
कोई नई बात नहीं। हर साल ही यह आया करता है। लोग धड़ल्ले से जगह जगह जा कर सूचना फेंके जा रहे हैं। कोई फलां रिसॉर्ट में, कोई गोवा, तो कोई न्यूयार्क में नए साल में टहल रहे हैं। जो बच गए वो अपने घर, गांव, शहर में अपने काम में लगे हैं।
किसान खेतों में आलू, गाजर, गन्ने काट, उखड़ रहा है। महिलाएं बुग्गी हांकती हुई बाज़ार जा रही हैं गन्ने बेचने। नज़र नज़र और जरूरत की बात है। स्थान और जीवन की प्राथमिकताओं की बात है।
फर्ज़ कीजिए आप गांव में हैं तो वहां नए साल के लिए क्या करेंगे। क्या आप मॉल्स में जाएंगे? क्या आप मोमोज खाएंगे या घर में बैठे घर के बने खाना खा कर कल फिर खेत पर जाने की तैयारी करेंगे। अपनी अपनी जीवन की चुनौतियां हैं और जीवन के रंग हैं।
महज कैलेंडर की तारीखें नहीं बदलतीं बल्कि हमारी एक आदत और अगले साल फिसल जाती है। हमारी रूचियां और प्रौढ़ हो जाती हैं। हम ज़रा और वयस्क हो जाते हैं। हमारी दृष्टि और साफ हो जाती है।
कई बार हम अतीत के पन्नों को पलटने में ही नए साल यानी वर्तमान को बोझिल करते रहते हैं। जबकि पिछले पन्ने को फाड़ कर आगे नई इबादत लिखनी चाहिए। जो शब्द पिछले साल खोखले रहे गए थे उन्हें अर्थ से लबालब करने की ललक हो तो नए साल की किताब को और रोचक बनाया जा सकता है।
 

Friday, December 29, 2017

बाल साहित्य कोई न ख़बर लेवनहार



कौशलेंद्र प्रपन्न
वर्ष अपने अंतिम चरण में है। वयस्कों के साहित्य की समीक्षा की जा रही है। इस वर्ष कविता,कहानी, उपन्यास आदि विधाओं में कौन कौन सी किताबें प्रमुख रहीं।
हाल ही में पत्रकार व लेखक पंकज चतुर्वेदी जी ने पूछा कि बाल किताबों के नाम, कवर पेज और प्रकाशक लेखक सहित सूचित करें। यह एक बड़ा सवाल और उलझन पैदा करने वाला था। मैंने इस वर्ष की प्रमुख बाल किताबों की सूची बनाने में सफल नहीं रहा। थक हार कर कुछ बाल पत्रिकाओं के नाम तो गिना सका लेकिन किताबों के नाम नहीं बता सका।
क्या यह मेरी व्यक्तिगत हार है? क्या यह मेरी निजी असफलता है कि मैं बाल किताबों की पहचान व सूची नहीं बना सका? मुझे लगता है कि पूरे वर्ष हम वयस्कों की किताबों पर तो भरपूर बल्कि कुछ ज़्यादा ही वक़्त दिया करते हैं। लेकिन जब बाल साहित्य की बात आती है वैसे ही वयस्क नदारत हो जाते हैं।
पिछले दिनों जब अख़बार और पत्रिका तलाश रहा था तब बाल साहित्य के नाम पर पारंपरिक कहानियां मिलीं। पिछले पांच - छह सालों से अख़बारों के साल के अंतिम हप्तों में साहित्य विश्लेषण देखता रहा हूं जिनमें कहानी,उपन्यास, कविता आदि की चर्चा खूब होती रही है। बस उपेक्षित तो बाल साहित्य रहा करता है।

Thursday, December 28, 2017

जाल समेटा करने का समय...


कौशलेंद्र प्रपन्न
पता नहीं कहां कहां, कब, कैसे किसी को ठेस पहुंचा किया हमने। कहां न जाने हम गिरे। कहीं अपनी नज़रों में। तो भी दूसरों की नज़र में। अब गिरता तो गिरना है। वह जहां भी हुआ हो। उन उन लोगों से उन स्थानों पर पूरी संजीदगी के साथ और शिद्दत से मॉफी मांग लेने में कोई हर्ज़ नहीं है।
हम अपने तमाम कर्मां, गुण-अवगुणों के स्वयं मूल्यांकनकर्ता होते हैं। हमें कभी न कभी। किसी ने किसी के सामने अपनी ग़लतियों को कबूल कर लेना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि वक़्त निकल जाए और आप ग्लानि में सांसें लेते रहें।
हर साल, हर पल अपने साथ कई किस्म के तज़र्बे ले कर आया करता है। कुछ सुखद होते हैं तो कुछ टीस देने वाली। चेहरे तो हंसते रहते हैं लेकिन अंदर की नदी कहीं सूख रही होती है। आत्मबल कमजोर हो रहा होता है।
कितना बेहतर हो कि हम अपनी कमियों, ग़लतियों को स्वीकार कर लें और आत्मग्लानि से बच जाएं। सो यह काम हमें कर ही लेना चाहिए।
सुखद बातों को हम अक्सर याद रख लिया करते हैं। लेकिन जो छूट जाती है वह किसी कोने में पड़ी सुबकती रहती है। वह दुखद या कष्ट देने वाली घटनाएं हुआ करती हैं। मगर गौर से देखें तो वह पल भी तो हमारा ही हिस्सा हुआ करता था।
बस इतनी सी बात है जब भी हम अपनी बात, एहसास को स्वीकार कर और सही व्यक्ति तक पहुंचा देते हैं तब हमारी ख़्वाहिश पूरी हो जाती है। 

Tuesday, December 26, 2017

भीड़ में मैं या कि तुम


कौशलेंद्र प्रपन्न
जब से छुट्टियों को मौसम आया है तब से लोग दिल्ली छोड़ उड़ने में लगे हैं। जो उड़ नहीं सकते वो रेंग रहे हैं। जो रेंग नहीं सकते वे घिसट कर चलने लगे हैं।
दिल्ली को कोना कोना भीड़ में तब्दील हो चुका है। हर सड़क हर मॉल्स सजे हुए हैं। सड़कें कराह रही हैं। जिधर देखो उधर भीड़ ही भीड़ गाड़ियां ही गाड़ियां।
शायद हम कितने थक जाते हैं। पूरे साल काम करते करते। काम न भी करें तो छुट्टियों का इंतज़ार कुछ इस तरह होता है गोया इसके बगैर हम कितने अधूरे हैं।
आज कल ऑफिस में साथी कम हैं। शोर कम है। सभी कहीं न कहीं भीड़ का हिस्स बने हुए हैं। जहां होटल 500, 2000 में मिला करते हैं। वहीं उनके रेट आसमान छू रहे हैं।
होटल वाले, गाड़ी वाले। टै्रवल एजेंट सब के सब बिजी हैं। सर अभी बहुत महंगे हैं। आफ मौसम तो अब होता कहां है।
देश विदेश हर जगह लोग उड़ने को बेताब हैं। जिन्हें विदेश नहीं लिखा व मिला वो देश में ही अंतरदेशीय उड़ान भर रहे हैं।
हम इतना खाली पहले कभी नहीं थे। जितने अब होते जा रहे हैं। नाते रिश्तेदार कहीं खो गए। किसी से मिलने की न तो ललक बची और न वक्त। चाव तो कब की जाती रही।
बाहरी शोर से हमने अपने आप को भरना शुरू कर दिया है।

Monday, December 25, 2017

13,०० सरकारी स्कूल महाराष्ट्र में बंद 
खबर है कि महाराष्ट्र के पुणे के आस पास तक़रीबन 13,00 सरकारी स्कूल बंद हो गए .
शिक्षामंत्री का कहना है कि शिक्षा की गुणवत्ता काम होना मुख्या वजह है स्कूल में बच्चे नहीं हैं.
तर्क पर हँसा जाए या दुखी .

Wednesday, December 20, 2017

परीक्षा से डरी बच्चियां




कौशलेंद्र प्रपन्न
मेट्रो में सुबह का समय। सीट पर खचाखच भीड़। लेकिन सीट मिल गई। मैं अपनी किताब 100 संपादकीय 1978 से 2016 तक द हिदू पढ़ने लगा। मेरे पास बैठी लड़की और उसके दोस्त आपस में बात कर रहे थे। मैं सुनना भी नहीं चाह रहा था। लेकिन कुछ पंक्तियां कोनों से टकरा रही थीं।
‘‘यार! सुबह तीन बजे से जगी हूं। नींद नहीं आ रही थी। मम्मी बार बार कह रही थी पढ़े ले।’’
‘‘नींद गहरी आ रही थी।’’ ‘‘कल रात से सिर में बहुत दर्द हो रहा है।’’
आपसी बातें और तेज होने लगीं। बीच बीच में मैं नज़रे उठा कर उन्हें देखता तो ‘‘शॉरी अंकल’’
‘‘अंकल डिस्टब हो रहे हैं।’’
‘‘मैंने कहा कोई बात नहीं। कहां पढ़ती हैं? क्या कर रही हैं?’’
वे बच्चे इंटिरियर डिजाइनिंग का कोर्स महारानी बाग से कर रहे हैं। आज उनका पेपर डिजाइनिंग का था। सिद्धांत और प्रैक्टिल दोनों।
मैंने बातचीत का सिलसिला जारी रखा। क्यों डर लग रहा है।कितनी पढ़ाई हुई आदि।
मैंने बस उनके डर को हल्का करने के मकसद से कहा कि जब परीक्षा में प्रश्न पत्र आए तो पहले सवालों को पढ़ने और उसकी भाषा को समझने की कोशिश करना कि क्या पूछा जा रहा है।उसके अनुसार अपनी पढ़ाई को इस्तमाल करना। मॉल्स गए हो, शोरूम में जाते हो, वहां देखा होगा इंटिरियर डिजाइनिंग कैसी होती है।उन्हें एक बार ध्यान से याद करना। काफी हद तक तुम्हारे सवालां के जवाब निकलने शुरू हो जाएंगे। आदि
बातचीत में उन्हें परीक्षा के डर से बाहर निकालना था। उन्हें परीक्षा की प्रकृति और चरित्र पर बात कर उनके मन को हल्का करना था। मैंने उन्हें कहा कि परीक्षा क्या जांचना चाहती है।परीक्षा में हम क्या मूल्यांकन करना चाहते हैं?आदि उद्देश्य स्पष्ट हों तो परीक्षा डराती नहीं।
बातचीत में मालूम ही नहीं चला कि कब कशमीरी गेट आ गया।लेकिन जाते जाते बच्चों ने जो स्माइल दी और कहा, ‘‘ अंकल जी आपने आज हमारा दिन बना दिया’’हम से कोई इस तरह परीक्षा पर बात ही नहीं करता। हर कोई डराते हैं।
मुझे लगता हैअपने बच्चों से परीक्षा और शिक्षा के मायने पर रूक कर बात करनी चाहिए। संभव हैहम बच्चों को डिप्रेशन और तनाव से बाहर निकाल सकें।

Tuesday, December 19, 2017

किताब लोकार्पण के दिन दूर नहीं



कौशलेंद्र प्रपन्न
विश्व पुस्तक मेला आने वाला है। बल्कि तारीख भी तय है। 6 से 14 जनवरी। मेल, व्टास्एप, मेसेज आदि से नई नई किताबों की सूचनाएं आने लगी हैं।
कोई अपनी कविता संग्रह, कोई कहानी संग्रह,उपन्यास, निबंध आदि लेकर आ रहे हैं। एक सुखद घटना है। कम से कम लोग साल भर लग कर किताब लिख रहे हैं।
किताबें लिखी जा रही हैं। किताबें छप भी रही हैं। पाठक भी तो आस-पास ही हैं। कुछ खरीद कर पढ़ने वाले हैं तो कुछ उपहार में मिली किताब को अपनी आलमारी में रखने के लिए उतावले हैं। सबके अपने अपने पसंद और रूचियां हैं। वे उस किताब को जरूर खरीद कर पढ़ने वाले हैं।
आलोचक, समीक्षक, वाचक भी तैयार हैं। जैसे ही उन्हें किताब मिलेगी वो शुरू हो जाएंगे। पढ़ना, लिखना और बोलना तीनों कौशल की शुरुआत हो जाएगी।
कुछ की किताबें पत्रिका,अख़बार आदि में दो कॉलम, तीन कॉलम या फिर तीन पेज की जगह पा जाएंगी। जो समीक्षा से बाहर रह जाएंगी वो अपनों के बीच पढ़ी और चर्चा में शामिल होंगी।
से तैयार हो जाइए। पुस्तक मेला और किताबों के लोकार्पण समारोह में। आइएगा जरूर। क्या पता आपको अपने पसंद की किताब हाथ लग जाए।

Monday, December 18, 2017

800 से ज्यादा बंद कर दिए गए सरकारी स्कूल



कौशलेंद्र प्रपन्न
राज्य उड़िया। गांव,जिला मुख्यमंत्री नवीन पटनायक जी का चुनावी क्षेत्र। गांव भी आदिवासियों का। उसमें भी सरकारी स्कूल। कौन आवाज उठाए। बच्चे किसके आदिवासियों के। उन्हें पढ़ने-लिखने से क्या हासिल होगा। क्या वे पढ़-लिखकर कलक्टर बनेंगे?क्या वे राजनेता बनेंगे? मालूम नहीं। लेकिन उनके चुनानी क्षेत्र में पिछले शुक्रवार की ख़बर के अनुसार 800 से ज्यादा सरकारी स्कूलों में ताला लगा दिया गया।
सरकारी स्कूलों में ताला लगने की यह कोई नहीं ख़बर नहीं है। वैसे में जब एक प्रचारमंत्री वोट डाल कर रोड शो करते हों। ऐसे में जहां आम लोगों से उनकी सरकारी शिक्षा के रास्ते बंद किए जाते हों। क्या फर्क पड़ता है? किसे फर्क पड़ेगा?
सरकारी आती जाती हैं। लेकिन शिक्षा, बच्चे, समाज वहीं का वहीं रह जाता है। उसपर आदिवासी समाज से हमने वन संपदा तो हसोत ही ली। उनसे शिक्षा के अधिकार को भी अपने कब्जे में कर रहे हैं। कौन उठाएगा उनकी आवाज़।
आरटीई फोरम देश भर में शिक्षा के अधिकार आधिनियम की रक्षा और सरकारी स्कूलों को बचाने की वकालत करता है। हाल ही में दिल्ली में नेशनल सम्मेलन भी हुआ। उसमें देश भर से शिक्षाकर्मी, नीति निर्माता और शिक्षा-अधिकार की आवाज को बलंद करने वाले जुटे। यह संस्था राजस्थान, म.प्र, यूके आदि राज्यों में सरकारी स्कूलों के बंद होने पर पूरजोर आवाज उठाई थी।
एक ओर सस्टनेबल डेवलप्मेंट यानी सतत् विकास लक्ष्य को पाने के लिए 2030 तक की रणनीति बनाने में देश लगा है वहीं दूसरी ओर हमारे बच्चों से सरकारी स्कूल भी दूर किए जा रहे हैं।
मलूम चला कि जिन स्कूलों को बंद किया गया। उनमें पढ़ने वाले बच्चों को विकल्प के तौर पर दूसरे स्कूलां में दाखिला दे दिया जाएगा।
यही तर्क दूसरे राज्यों में भी सरकार की ओर से दिए गए थे। लेकिन वहां कोई पूछने वाला नहीं कि जिन बच्चां के स्कूल बंद हुए क्या वे बच्चे दूसरे स्कूलों में जा रहे हैं।
स्रकारी स्कूलांं को बंद होने हमें बचाने की आवश्यकता है।

Thursday, December 14, 2017

पढाना चाहें, पर वक्त नहीं


कौशलेंद्र प्रपन्न
पिछले दिनों तकरीबन बीस शिक्षकों के साथ उनकी कक्षा में बातचीत और मुलाकात का अवसर मिला। इस मुलाकात में कई सारी बातें, शिक्षण समस्याएं और चुनौतियों से रू ब रू होने का मौका मिला।
बच्चों को किस प्रकार हिन्दी पढ़ने में दिक्कतें आती हैं। शिक्षक किस प्रकार उन्हें पढ़ने के प्रति प्रेरित किया जाए आदि पर विस्तार बातचीत हुई।
अधिकांश शिक्षकों से जो बात सुनने को मिली उसका लब्बोलुआब यही था कि उन्हें पढ़ाने का मौका बहुत कम मिलता है।
डाइस की रिपोर्ट, बैंक के साथ बच्चों के आधार कार्ड जोड़ना, वर्दी के पैसे बांटना,आदि कामों में ऐसे उलझे होते हैं कि पढ़ाना पीछे छूट जाता है।
बच्चों को पढ़ाने के लिए बेचैन शिक्षक अंत में भारी मन से अपने घर जाते हैं। कहते हैं सर हमें कई बार बहुत खराब लगता है जिस दिन हम बच्चों को नहीं पढ़ाते।
यह दर्द यह एहसास न जानें कितनों को होता होगा मालूम नहीं लेकिन जितने भी ऐसे शिक्षक हैं उन्हीं की वजह से शिक्षा में जो भी गुणवत्ता बची है उन्हें इसका श्रेय जाता है।

Tuesday, December 12, 2017

मास्टर जी की आदतें



कौशलेंद्र प्रपन्न
बात उन दिनों की है जब मैं स्कूल में पढ़ा करता था। शायद क्लास छठी या सातवीं या फिर आठवीं में। मुझे लिखना बिल्कुल पसंद नहीं था। मास्टर नगीना बाबू जो कुछ भी लिखा करते। मैं उसे अपनी कापी में नहीं लिखा करता। एक बार चक्कर काटते हुए मेरी कॉपी पर नजर गई।
‘‘पंडित!!! तुम्हारी कॉपी ख़ाली क्यों है? तुम लिख नहीं रहे हो।’’
‘‘मैंने कहा, मिट जा रहा है।’’
उन्होंने पूरी क्लास के सामने दुबारा ब्लैक बोर्ड पर लिखा लेकिन मिटा नहीं। तब वापस आए। और पूछा पंडित कहां मिटा। और कॉपी उठाई। कहा, ‘‘अपनी पिताजी का नाक कटवाओगे?’’
‘‘शाम में पिताजी मिलेंगे। समझे।’’
दूसरा वाकया गोरख बाबू के साथ का रहा। वो मुझे नौवीं कक्षा में हिन्दी में मिले। उनकी लेखनी और लिखने की शैली लाजवाब थी। वो जो भी लिखा करते सिरोरेखा नहीं डालते थे। गोरख बाबू का प्रभाव यूं चढ़ा कि आज तलक मैंने हिन्दी लिखते वक्त सिरोरेखा नहीं डाला। कई बार लोगों ने टोका। पिताजी ने टोका डांटा आदि। लेकिन आदत जो पड़ चुकी थी।
हिन्दी लिखने की शैली और तौर तरीका पर गोरख बाबू का असर रहा। उनसे पूछा कि वो क्यों ऐसे लिखते हैं?
तब उन्होंने कहा, ऐसे जल्दी जल्दी लिख लेता हूं। रफ्तार में लिख पाता हूं। पता नहीं कब हमारे बच्चे अपने शिक्षकों के हर चीज को करीब से नकल करते हैं। कब मास्टर जी की आदतें हमारी हो जाती हैं। इसका पता ही नहीं चलता।

Monday, December 11, 2017

ढाई साला बच्ची की आंखों में मोबाइल



कौशलेंद्र प्रपन्न
ढाई साला बच्ची ताबड़तोड़ मोबाइल में आंखें फोड़ रही थी। मां बगल में बैठी टीवी देख रही थी। स्थान डॉक्टर की क्लिनिक। टीवी पर कुछ ख़बर तैर रही थी। ख़बर अस्पताल की थी। मां अपना ज्ञान और जीके दुरूस्त कर रही थी। बच्ची अपनी इंटरनेटी गेम को।
बच्ची बिना सिर उठाए लगातार छोटे से स्क्रीन में आंखें धसाए आनंद ले रही थी। बीच बीच में आंखें उठाकर मां को देख लेती। मां टीवी में।
बच्ची काफी देर तक मोबाइल में व्यस्त रही। इसी बीच फोन आ गया तो मां को पकड़ा दी। लेकिन जैसे ही कॉल खत्म हुआ फिर मोबाइल में।
मैं इस पूरी घटना को देख और समझने की कोशिश कर रहा था। कि बच्ची क्या देख रही हैं? किस चीज में उसे आनंद आ रहा है। आदि
रहा नहीं गया। सो पूछ ही लिया उसकी मां से। वैसे अपरिचितों से बात न करें। ऐसी घोषणाएं ताकीद करती हैं। लेकिन मैंने वह जोखिम उठाई।
मां ने कहा, ‘‘यू ट्यूब पर गाने देख रही है।’’
‘‘देख लेती है। अपने पसंद की गीत और खेल खुद यू ट्यूब पर सर्च कर लेती है।’’
जिज्ञासा यहीं शांत नहीं हुई। पूछा, ‘‘यू ट्यूब तक कैसे पहुंचती है?’’
‘‘क्या आपके फोन में ही सर्च कर लेती है या किसी भी फोन में?’’
‘‘सर्च तो ये वाइस माइक से करती है। अभी लिख नहीं पाती न।’’
‘‘मेरी जिज्ञासा और बढ़ती गई। मैंने उनसे अनुमति मांगी क्या मैं अपना फोन उसे देकर सर्च करने को कह सकता हूं?’’
वो तैयार हो गईं। मैंने उस बच्ची को फोन दिया। उसने स्क्रीन को गौर देखा। फिर अंगुली से सरकाना शुरू किया। कुछ देर में यू ट्यूब के आइकन को डबल टच कर ओपन किया और माइक को टच कर बोला लकड़ी की काथी... तुतली आवाज में बोली और उसके सामने वह गीत हाज़िर।
ठीक इसी तरह की एक और घटना याद करूं तो दो साल का रहा होगा बच्चा। उसे मैंने पिछले एक घंटे से मोबाइल में आंखें फोड़ते देख दंग रह गया।उस पर तुर्रा यह कि मां-बाप यह बताते हुए अघाते नहीं कि उनका बच्चा मोबाइल ऑपरेट कर लेता है।हंसिए जनाब या रोइए। समझ नहीं आता।
एक मां ने जब अपनी बेटी को पापा के मोबाइल में अचानक अश्लील विडियो देखते हुए पाया तो उसका गुस्सा बाहर निकल ही पडा। चांटा और डांट दोनां एक साथ। लेकिन क्या गलती उस बच्ची की थी? वह तो तर्क करने लगी।
‘‘क्यों मारा ममॉ? उसमें छांप जैसा कुछ चल रहा था।’’ ‘‘एक दूसरे की बॉडी पर चढ़कर खेल रहे थे।’’
मां जवाब क्या दे?

Friday, December 8, 2017

शिक्षक का कबूलनामा




कौशलेंद्र प्रपन्न
शिक्षकों पर कई तरह के तोहमत लगाए जाते रहे हैं। शिक्षक पढ़ाते नहीं। शिक्षकों में पढ़ाने की चाह नहीं रही। इस प्रोफेशन में आराम करने और जीवन से निराश हो चुके लोग होते हैं आदि। यदि यह तर्क हैतो पूर्वग्रह के करीब है।दरअसल शिक्षक पढ़ाते हैं। पढ़ाने की छटपटाहट भी होती है। लेकिन बीच कक्षा में उन्हें आंकड़ों के पेट भरने का काम दे दिया जाता है।शिक्षक पढ़ाना छोड़कर वर्दी,वजिफे आदि के पैसे बांटने, आधार नंबर को बैंक में लिंक कराने में जुट जाता है।उससे कोई नहीं पूछता पढ़ाई के दौरान आई अडचनों को कैसे दूर करोगे।
एक शिक्षक ने खुले दिल से कबूल किया कि एक बार यही कोई दस साल पहले जब वो नई नई नौकरी में आई थीं उन्होंने एक बच्चे को इस लिया पीटा था,बल्कि रोका भी करतीं करती थींक्योंकि वह दीवारां और फर्शपर चित्रकारी किया करता।
घटना घटे लंबा समय हुआ एक दिन एक वयस्क उनके सामने खडा हो गया और कहा, पहचाना!!! मैं कृष्णा। शिक्षिका को न नाम याद थे और न उसका चेहरा। लेकिन जब उसने घटना बयां किया कि वही बच्चा हूं जिसे आप रोज पीटा और डांटा करती थीं। कृष्णा। अब मेरी पेंटिंग की दुकान है। चित्र बनाता हूं। पोस्टर डिजाइन करता हैं। और स्कूलों के बैनर आदि बनाता हूं।
शिक्षिका ने बताया उस दिन मेरे पास कहने को कोई शब्द नहीं था। मैं अपनी ही नजरों में डूबती जा रही थी। उन्होंने कहा उस दिन एहसास हुआ कि मैं कितनी गलत थी।
इस तरह के शिक्षक एक नहीं बल्कि कई हैं जिन्हें अपने शिक्षण के दौरान हुए अनुभवों से ऐसी सीख भी मिली जिन्हें वो कभी भूल नहीं पाते।

Thursday, December 7, 2017

इतिहास की किताब और हमारी नज़र



कौशलेंद्र प्रपन्न
हाल ही में यूनेस्को की ओर से हर साल जारी होने वाली रिपोर्ट 2017-18 ग्लोबल एजूकेशन मोनिंटरिंग रिपोर्ट जीइएमआर 2017-18 जारी की गई। इस रिपोर्ट में ख़ासकर भारत और पाकिस्तान में स्कूली पाठ्यपुस्तकों की राजनीति की ओर चिंता जारी रेखांकित की गई है।इस रिपोर्ट में बताया गया हैकि पाकिस्तान में इतिहास की किताबों में आतंकवाद, विभाजन और भारत के प्रति ख़ास दृष्टिकोण को तवज्जो दी गई है।बताया गया हैकि भारत में गोधरा कांड की प्रस्तुति और अयोध्या विवाद को रोमांचक तरीके से पेश करने की कोशिश की गई है।भारत औ पाकिस्तान में 1947 के बाद तारीखें बेशक बदलीं हैंलेकिन दोनों ही देशों में इतिहास को पढ़ने पढ़ाने की नज़र स्पष्ट नहीं है।गौरतलब हैकि प्रो. कृष्ण कुमार ने इसी मसले को प्रिजुडिश ए।प्राइड पुस्तक में बडी ही शिद्दत से पाठ्यपुस्तकों का विश्लेषण किया है।
शिक्षा में पाठ्यपुस्तकों को एक ऐसे औजार के तौर पर प्रयोग करने का चलन है जहां शिक्षकीय सत्ता को कमतर किया जाता है। शिक्षक चाह कर भी पाठ्यपुस्तकों को पढ़ाने के दौरान अपनी दक्षता का इस्तमाल नहीं कर पाता। शिक्षकों के सामने एक सवाल यह खडा होता है कि समय सीमा में पाठ्यपुस्तकों को पूरा कराए। और आज शिक्षा का अंतिम लक्ष्य सा बना चुका परीक्षा में अच्छे अंक हासिल कर सके। स्पष्टतः शिक्षक महज पाठ्यपुस्तकों को हस्तांतरित करने वाला मशीन नहीं है बल्कि वह बच्चों में अपने परिवेश को समझने में सक्षम हो सके, इस प्रक्रिया में मददगार साबित होना है।

Wednesday, December 6, 2017

बनाते अख़बार और पत्रिका...






कौशलेंद्र प्रपन्न
श्री पंकज चतुर्वेदी जी के सानिध्य में तकरीबन चालीस शिक्षकों ने आधे घंटे में अख़बार और पत्रिकाओं का बनाकर अपनी कल्पनपाशीलता का परिचय दिया।
हमारा मकसद था कि शिक्षकों को बाल साहित्य के बारे में जानकारी देने के बाद उनसे बच्चों के लिए चित्रात्मक पुस्तक/पत्रिका और अख़बार बनवाया जाए। इसमें एक बात जो ख़ास थी वो यह था कि शिक्षकों ने इससे पहले कभी भी इस प्रकार का काम नहीं किया था।
आयु, स्तर और बाल मन को टटोलते हुए पत्रिका को जन्म देना था। साथ ही पत्रिका और अख़बार निर्माण की प्रक्रिया में किन किन मोड़ों,अड़चनों और चुनौतियों से गुजरना होता है उसे भी साझा किया जाए।
चालीस शिक्षकों की टीम को बीस बीस में बांट दिए गए। उन्हें यह जिम्मेदारी दी गई कि आपस में ही संपादकीय मंडल, चित्र निर्माता और कंटेंट लेखक की टीम बनाएं।
लगभग आधे घंटे में एक मुकम्मल पत्रिका सब के सामने आई। वहीं अख़बार भी बन कर तैयार था। श्री पंकज जी ने अनुरोध किया कि शिक्षक इस काम को अपनी कक्षाओं में लेकर जाएं। बच्चों को दिखाएं और कोशिश करें कि बच्चे खुद यह कर सकें।

Tuesday, December 5, 2017

कहानी पढ़ते-पढ़ाते..



कौशलेंद्र प्रपन्न
कहानियां हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा हुआ करती हैं। कहानी सुनते,सुनाते, पढ़ते-पढ़ाते लंबा अर्सा हुआ। फिर भी कहानी कैसे पढ़ाएं जैसे सवाल बार बार सामने खडे होते हैं।कहानियों को पढ़ाने के तौर तरीकों और विधियों को लेकर कई सारे लेख, सामग्री बाजार में उपलब्ध हैं। लेकिन इन सब के बावजूद कहानियां कैसे पढ़ाई जाएं एक मसला आज भी है।कहानियों को पढ़ते-पढ़ाते वक्त किस प्रकार की सावधानियां रखी जाएं इसको लेकर किताबें भी हमारी मदद करती हैं।
श्री पंकज चतुर्वेदी के संपादन में नेशनल बुक ट्रस्ट से एक किताब छपी हैकहानी कहने की कला। इस किताब में प्रो. कृष्ण कुमार, पंकज चतुर्वेदी, बालकृष्ण देवसरे आदि के लेख पठनीय हैं। इस किताब में बडी शिद्दत से कहानी के विभिन्न तत्वों और पहलुओं पर चर्चा की गई है।लेकिन फिर क्या वजह हैकि कहानियां क्यों लचर तरीके से पढ़ी पढ़ाई जाती हैं।
मैंने कुछ प्रयोग स्कूली शिक्षकों के साथ किए। वे कैसे कहानी को पढ़ें, कैसे कहानी का पाठ करें और अंत में कहानी नाट्यरूपांतरण कैसे हो।
पहले तो कहानी कैसे बनती है। कहानी किन किन चीजों से मिलकर आकार लेती है। इस पर विस्तार चर्चा की। चर्चा के दौरान वे तमाम तत्व निकल कर आए जिन्हें चाहता तो सीधे सीधे लिख देता और वे अपनी कॉपी में उतार लेते। किन्तु ऐसा नहीं किया। जो तत्व उन्हें याद आते गए उन्हें हमने लिख दिया। जिसमें कथानक, जिज्ञासा, घटना, परिवेश, बाल सुलभ चंचलता, बच्चे की दुनिया, भाषा आदि। हमने इन तत्वों के गांठ को खोलने शुरू किए। कि यही वो तत्वों क्यों आपको याद आए।
अब बारी थी कहानी क्यों जरूरी है? कहानियों से क्या होता है? बच्चे या बड़ों के लिए कहानियों का क्या मायने है आदि।
कहानियां मनोरंजन के लिए, उत्सुकता के लिए, भाषा क संस्कार सीखने के लिए, कुछ भी सीखने के लिए, शिक्षा, सीख, मूल्य, नैतिकता आदि से परिचय कराने के लिए कहानियां पढ़ी और पढ़ाई जानी चाहिए।
अब हमने पाठ्यपुस्तक की कहानियों के चुनाव करने के लिए कहा। सभी ने एक एक कहानियां चुन लीं। काम यह था कि उस चुनी हुई कहानी में उक्त कौन कौन से तत्व आपको दिखाई देते हैं। क्या आप उस कहानी में कुछ भी किसी भी स्तर पर कोई फेर बदल करना चाहेंगे।
दूसरा खंड़ दिलचस्प था। बड़ी ही शिद्दत से शिक्षकों ने इस काम को अंजाम दिया। सब ने कहानी के तत्वों की पहचान अब सैद्धांतिक स्तर से नीचे उतर कर जमीनी हकीकत को जी रहे थे। इस गतिविधि का एक और स्तर था कहानी का पाठ। कहानी को कैसे पढ़ें। कहानी पाठ के अभ्यास के दौरान पाया कि कई शिक्षकों की भाषा और उच्चारण में काफी भिन्नताएं थीं। उस भिन्नता को प्रयोग हमने कहानी के पात्रों के संवादों में इस्तमाल किया। कि माना आपका पात्र फलां परिवेश से आता है तो उसकी भाषा-बोली ऐसी ही होगी।
कुल मिला कर कहानी पढ़ने-पढ़ाने के साथ यह अभ्यास और स्वयं के साथ प्रयोग आनंदपूर्ण रहा।
आप कैसे सुनते हैं कहानी? 

Monday, December 4, 2017

तमाशा कुछ यूं हुआ...





कौशलेंद्र प्रपन्न
तमाशा करने वाले बनिए जनाब भीड़ तो इकट्ठी हो ही जाएगी। भीड़ के पास वक्त ही वक्त है। भीड़ को तमाशा चाहिए। आप तमाशा बनना चाहेंगे?
आज की तारीख में हर चीज तमाशा है। वह आपकी कला हो, बोलना हो, उठना-बैठना ही क्यों न हो। एक बार तय करने की जरूरत है कि आप क्या करना चाहते हैं।
हमारे आस-पास तमाशा ही तमाशा हो रहा है। क्या आप भीड़ का हिस्स बनना चाहते है? क्या आप मज़मा जुटाने वाले बनना चाहते हैं यह हमें तय करना है।
हमने भी यही किया। खुले में अपना तमाशा बनवाया। बल्कि कहिए मैं तो अपना स्केच बनवा रहा था। लेकिन बाकी क्या कर रहे थे। क्या उनके पास वक्त था दूसरे के लिए? वक्त था, रूचि थी। और था उनके आस पास क्या अलग हो रहा है। क्या नया हो रहा है। जो भी जहां भी नया होगा तमाशा वहीं लगा करेगा।
शर्त है आप तमाश लगाना चाहते हैं। उन स्केच के दौरान कई से बातचीत भी होती रही। वे खुश थे कि उनके बीच कोई ख्ुलकर, बिना संकोच के तमाशा बनवा रहा है।
देखते ही देखते वहां तकरीबन पचास तो दर्शक जुट ही चुके थे। इसमें बच्चे, बड़े और बुढ़े भी शामिल थे। धीरे धीरे स्केच अपना रूप लेता रहा और दर्शकों की ओर से कमेंट भी आ रहे थे। कमेंट सुनकर उनको जवाब भी देता रहा।
आनंद इसमें नहीं था कि स्केच बना रहा था। बल्कि मजा इसमें भी कि लोग भागदौड़ की जिंदगी में कुछ देर ठहर कर अपने आस पास घटने वाली घटना के प्रति जिज्ञासु थे।
कभी तमाशा कभी मजमा यूं भी लगाया जाए,
भीड़ में अकेले खड़े से बतियाया जाए।

Friday, December 1, 2017

कुत्ते का खर खर




कौशलेंद्र प्रपन्न
सुबह एक दरवाजे के बाहर कुत्ते को देखा। वो कॉल बेल नहीं बजा सकता था। उसकी पहुंच में डोर बेल नहीं था। सो बेचारा क्या करता।
संभव है रोज उसे उस दरवाजे पर खाने और पीने को दूध मिला करता होगा। सो आज सुबह के नौ बज रहे होंगे। शायद दरवाजा न खुला हो। उसे भूख लगी हो। कुत्ता लगातार दरवाजे पर खर खर कर रहा था। इंसान और जानवर में बहुत ज्यादा अंतर दिखाई नहीं देता। यदि कोई अंतर हो सकता है कि तो वह भूख में चिल्लाने, लड़ने झगड़ने और मूक निवेदन करना है।
हमारे आस-पास कई जानवर ऐसे हैं जो बिन कुछ बोले अपने मन की बात और दिल की धड़कने साझा किया करते हैं। हम में से कई ऐसे हांगे जिनके लिए वह कुत्ता भर नहीं होता। वह एक जीता जागता इंसान हुआ करता है।
हमारे आस-पास कई ऐसे जानवर हैं जो एकदम से गायब होते जा रहे हैं। वह चाहे प़क्षी हो, जानवर हो, गोर-डंगर हों लेकिन उसकी चिंता हमें नहीं सताती। हमें सताती है पद्मावती क्यों रूक रही है या क्यों दर्शकों तक आ रही है। हमें चिंता इस बात की होती है कि हमारी एसी क्यों काम नहीं कर रहा। हमें चिंता नहीं सताती कि पास में गरवैया हुआ करती थी वो अब नहीं बैठा करती। कौए बहुत तेजी से हमारे बीच नदारतहो रहे हैं। वो कहां चले गए। अब हमारे पुरखों के पिंड कौन खाएगा।
कहते हैं जानवर हमारी संवेदना को समझते हैं और हमारे करीब ही रहने की कोशिश करते हैं। धीरे धरे वे हमारे परिवार के सदस्य हो जाते हैं। महादेवी वर्मा, जानकी बल्लभ शास्त्री आदि के घर में जानवरों को परिवार का अंग माना जाता था। वह साहित्यिक यात्रा में सहयात्री भर नहीं थे बल्कि उनके जीवन का भी हिस्सा हो चुके थे।

Thursday, November 30, 2017

यात्राएं...





कौशलेंद्र प्रपन्न
कई बार सोचता हूं कि हम अपने जीवन में कितनी यात्राएं करते हैं। कहां कहां जाते हैं, किन किन से मिलते हैं। कभी पहाड़ की यात्रा करते हैं तो कभी समंदर की। कभी किसी कछार की। कहां नहीं जाते हम?
यात्राओं से होता क्या है? क्या मिलता है इन यात्राओं से ? और कुछ मिले न मिले हमारी समझ और अनुभव तो व्यापक होते ही हैं। तरह तरह के भाषा-भाषी हमें मिलते हैं। कहीं खान-पान में विविधता दिखाई देती है। कहीं का पहनावा हमें अपनी ओर लुभाता है। कहीं की प्रकृति हमें आकर्षित करती है।
हमारे आस-पास ऐसे भी लोग हैं जिन्होंने अपने गांव की दहलीज तक नहीं लांघी है। उनके लिए वहीं गांव की चौहद्दी दुनिया है। उनके लिए दुनिया वहीं पोखर,पीपल के पेड़ और हरी भरी ख्ेती तक महदूद है।
वहीं लोग तो रातों रात सात समंदर पार कर पूरी संस्कृति को लांघ आते हैं। रात बिती और नई जमीन और नए लोगों के बीच खुद को पाते हैं। अपने तजर्बे साझा करते हैं।
रूदयाड किपलिंग लिखित उपन्यास ऑन द टै्रक ऑफ किम पढ़ने लायक है। इसमे बनारस से अमृतसर तक की रेल यात्रा का दिलचस्प वर्णन मिलता है।
वहीं साहित्य में यात्रा संस्मरण भी खूब लिखे गए हैं। जिन्हें पढ़ने से देश दुनिया की समझ विकसित होती है।
मेरे ख़्याल से जितनी अपनी चादर हो उसके अनुसार हमें यात्राएं कर लेनी चाहिए। क्योंकि जिंदगी में पैसे कमाने के काम से भी ज्यादा और भी जरूरी काम हुआ करते हैं।

Wednesday, November 29, 2017

उनकी वजह से....



कौशलेंद्र प्रपन्न
कंपनियों में कई बार कुछ ख़ास व्यक्ति की वजह से लोग कंपनी छोड़ देते हैं। वह व्यक्ति इस कदर परेशान कर देता है कि दूसरों के लिए नौकरी छोड़ना ही विकल्प बचता है।
जब एक व्यक्ति उसमें भी सक्षम और तज़र्बेकार स्टॉफ कंपनी छोड़ता है तब वह केवल उस व्यक्ति की हानि भर नहीं होती बल्कि उस संस्था और कंपनी को भी इसका ख़ामियाजा भुगतना पड़ता है। एक व्यक्ति की वजह से एक कंपनी को एक बेहतर मानव संसाधन से हाथ धोना पड़ता है।
कहते हैं कंपनी व संस्था किसी व्यक्ति से नहीं चलती। सच है कि लेकिन संस्था को बनाने और स्थापित होने में कई लोगों का हाथ होता है। कई बार एक व्यक्ति ही संस्था बन जाता है। इसकी दो संभावनाएं होती हैं। पहला या तो वह तानाशाही हो जाता है या फिर कई संस्थानों को जन्म दे सकता है। जब एक व्यक्ति यह समझने लगे कि संस्था उसी की वजह से चल रही है तब दिक्कत आती है।
लेकिन इतिहास, भूगोल, राजनीतिशास्त्र, शिक्षा आदि क्षेत्र में एक व्यक्ति को संस्था बनते हुए भी देखा गया है। लेकिन उसके बावजूद उन्हें संस्था से बाहर किया गया है।
संस्था व्यक्ति के जाने के बाद भी बतौर जारी रहता है। व्यक्ति चले जाते हैं लेकिन अपनी छाप छोड़ जाते हैं। उनके नाम और काम से संस्थाएं याद की जाती हैं।
संस्थान से किसी का जाना और किसी का आना तो लगा ही रहता है। संस्थाएं न तो रूकती हैं। और न रूक सकती हैं। लेकिन एक व्यक्ति के जाने से संस्था को कुछ तो असर पड़ता ही है। लेकिन एचआर और ऊपर बैठे लोगों को महसूस तक नहीं होता कि उन्होंने क्या खोया और क्या पाया। जिस सैलरी पर पहला व्यक्ति था संभव है उसके स्थान पर आने वाला उन्हें उससे कम लागत में मिल जाए किन्तु पहले वाले को स्थानांतरित नहीं कर सकता। उसकी शैली की कापी नहीं कर सकता। वैसे भी गुणवत्ता से आज किसी भी कोई ख़ास लेना देना नहीं होता। आप कितना काम करते हैं इससे अंतर नहीं पड़ता बल्कि आप कितना अपने काम को दिखा पाते हैं, यह ज्यादा जरूरी होता है।
कंपनियों में काम करने से ज्यादा दिखाने का चलन होता है। काम कम दिखावा ज्यादा। एक बॉस की वजह से यदि कोई संस्था छोड़ता है तो यह एक बड़ी घटना मानी जा सकती है।

Tuesday, November 28, 2017

लिट्रेचर फेस्ट यानी साहित्य की नई मुंह दिखाई



कौशलेंद्र प्रपन्न
हम साहित्य उत्सव का विकेंद्रीकरण भी कह सकते हैं। इन दिनों बाज़ार में साहित्य फेस्ट के आयोजन का चलन तेजी से बढ़ा है। कभी विश्व पुस्तक मेले में पुस्तक चर्च, पुस्तक लोकार्पण, लेखक-संवाद, ऑथर टाक्स हुआ करते थे। इनमें देश के जाने माने लेखक, संपादक, कवि आदि शामिल हुआ करते थे।
पिछले दिनों आजतक ने भी लिट्रेचर फेस्ट का आयोजन किया। इसमें देश के नामीगिरामी हस्तियों ने हिस्सा लिया। गीतकार, कवि, शायर, लेखक आदि ने अपनी रचनाओं का पाठ किया। इस उत्सव में नए लेखक भी मंच में दिखाई दिए।
पिछले हप्ते टाइम्स आफ इंडिया ने भी लिट् फेस्ट किया। इसमें शशि थरूर, जावेद अख्तर, शबाना आजमी, बाबा रामदेव आदि को बुलाया। सब ने राष्ट्रवाद, संस्कृति, पद्मावती आदि से लेकर संस्कृति पर हो रहे हमले पर बात की। वहीं पाकिस्तान के साथ हमारे रिश्ते पर भी सत्र में चर्चा हुई।
मैं उस उत्सव में हिन्दी वाली लेखक, कवि, साहित्यकार तलाशता रहा मगर एक भी नजर नहीं आए। वहां जो भी नजर आए वे अंग्रेजीदां किस्म के लोग थे। क्या श्रोता क्या वक्ता सब के सब एक रंग में रंगे। महंगी महंगी किताबें, बंडी, लंबे बाल वाले लोग और फैशन में डबी फेस्ट नजर आई।
हमें विचार इस पर भी करना होगा कि क्या इन फेस्टों से साहित्य की कुछ भी स्थिति सुधरने वाली है। क्या इस फेस्ट से कुछ ख़ास मीडिया घराने महज अपनी दुकान चमकाने की जुगत तो नहीं कर रहे हैं। बाकी आप समझदार हैं!!!

Friday, November 24, 2017

भाषा टोला




कौशलेंद्र प्रपन्न
भाषा टोला सुन कर थोड़ी देर के लिए हैरान हो सकते हैं। होना ही चाहिए। क्योंकि आज हमारे बीच के बहुत सारी भाषाएं, बोलियां, शब्द ग़ायब हो चुकी हैं या बहुत तेजी से खो रही हैं।
हालही में एक कार्यशाला में मैंने प्रयास किया कि जिस तरह से समाज में बहुभाषा भाषी लोग होते हैं उसी तरह से कक्षा में भी बहुभाषी बच्चे होते हैं। ऐसे में भाषा बोली को कैसे बचाएं और उन्हें कैसे बच्चों में जिंदा रखें।
हमने पहले एक घंटे में सभी शिक्षक/शिक्षिकाओं से आग्रह किया कि वो अपनी मातृभाषा के शब्दों कों आमंत्रित करें। उन शब्दों, भाषाओं को बुलाएं जिन्हें कभी बचपन में इस्तमाल किया करते थे।
शुरू में थोड़ी दिक्कत आई किन्तु देखते देखते ही हमारे सामने तरह तरह के शब्द झांकने लगे। बल्कि वे शब्द हमारे आस-पास तैयारे लगीं।
उन फुदकती बोलियों, शब्दों में गढ़वाली, पंजाबी, भोजपुरी, ब्रज, हरियाणवी, खड़ी बोली हिन्दी, राजस्थानी आदि के शब्द एक के बाद एक आने लगीं। शुरू में बोलने में शिक्षक/शिक्षिकाओं को बोलने में थोड़ी शर्म सी महसूस हो रही थी।
लेकिन एक बार जब हमने अपनी भाषा-बोली को याद करना शुरू किया तो अब नजारा ही बदला हुआ था।
धिनाई पाणि, चोपल, मौडी-मौडा, बोतो, गोर डांगर, सौंझ बैणी, दाज्यू, पनारा, बुआरी, भेड दे, सुधरी घणा, वा चला ग्यो, गांझ, रोल्ला,  पाइन सेर तड़कै, भकार , गदैड़ा, बुझाया कि नहीं, केरवा के पत्ता आइल कि ना, शेरवा, बघवा आदि। इन शब्दों की सूची देना लक्ष्य नहीं था। बल्कि हमें यह भी समझना था कि इनमें कितने शब्द अब हमारे आस-पास गुम हो चुकी हैं।
तमाम रिपोर्ट इस ओर इशारा करते हैं कि रेज दिन न सही लेकिन बड़ी तेजी से भाषाएं और बोलियां हमसे दूर होती जा रही हैं। इन्हें बचाने के लिए हमें सजग होने की जरूरत है। यह शुरूआत स्कूली कक्षा से तो कर ही सकते हैं साथ ही आपस में भी बरतने से उन्हें बचा सकते हैं।

Thursday, November 23, 2017

पढ़ाने के सिवा

कौशलेंद्र प्रपन्न
‘‘सुबह के आठ बजने वाले हैं। बच्चे अपनी अपनी नाक पोंछते हुए धकीयाते, मुकीयाते पंक्ति में खड़े हो रहे हैं। साथ में लगभग चिल्लाती, डाटती मैडम उन बच्चों के साथ खड़ी हैं। प्रार्थना संपन्न होता है। कुछ आदर्श वाचन होते हैं। अब बारी आती है अभिभावकों के लिए कि आधार कार्ड अब तक नहीं दिए जल्द जमा करा दें। बच्चो को समय पर स्कूल साफ सुथरे रूप में भेजें आदि। और अंत राष्ट्र गान से होता है।’’
‘‘कहानी अब शुरू होती है। शिक्षक/शिक्षिका एक एक कर बच्चों के नाम उपस्थिति रजिस्टर पर दर्ज करती जाती हैं। बीच बीच में कॉपी फाड़ने, चिकोटी काटने, मारने, गाली देने जैसे आम शिकायतों को निपटारा भी करती हैं। अब बारी है स्कूल के एक कमरे में लगे चेहरादर्ज मशीन के आगे सभी बच्चों को खड़ा करना और उपस्थिति दर्ज कराना।’’
हाल ही में बिहार के भागलपुर और औरंगाबाद में शिक्षा विभाग ने आदेश जारी किए कि स्कूल आने से पूर्वी और जाने के उपरांत अपने आस-पास यदि कोई खुले शौच करता मिले तो उसकी तसवीर खींच कर उन्हें भेंजें और उन्हें समझाने की कोशिश करें। पहली बात तो यही कि जिसकी तसवीर खींची जाएगी वह क्या सहजता से चुपचाप बैठा रहेगा या फिर मारने दौड़ेगा। दूसरी बात शिक्षक मैदान मैदान घूम घूम कर पता करे कि कौन खुले में शौच करता है। उसपर तुर्रा यह कि राज्य के शिक्षामंत्री मानते हैं कि इसमें हर्ज ही क्या है। शिक्षक समाज पढ़ा लिखा है। जनगणना आदि काम तो करते ही हैं। इसे भी अंजाम दे सकते हैं।
और कहानी ऐसे अंतिम मकाम पर पहुंचती है कि मिड डे के बाद 10.40 में बच्चे वापस कक्षा में आते हैं। अब शिक्षक के पास 10.45 से 12 बजे तक का समय होता है। इस समय में वह कितना पढ़ा पाता है। इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है। 

Wednesday, November 22, 2017

मोबाइल जी का साथ...



कौशलेंद्र प्रपन्न
काश! तुम लौट आते इक बार/ कितनी बातें/कितने चैट बिछ जाते बन पराग/जो तुम आ जाते इक बार महादेवी वर्मा जी की कविता से प्रभावित हो कर। मोबाइल जी क्या चले गए गोया पूरी दुनिया ही बरबाद हो गई। बार बार पॉकेट में हाथ जाए। कभी कहीं कभी कहीं मोबाइल जी को तलाशता रहा। लेकिन उन्हें नहीं मिलना था सो नहीं मिले। कुछ पल के लिए लगा सारी की सारी दुनिया बदरंग हो गई। कहीं कुछ भी नहीं हो रहा। न संगीत है। व आवाज है। और न यार दोस्त हैं।
वाकया क्या बताएं। बताते हुए रोना आता है। रे रो कर आंखें देखिए सूज गई हैं। अब तो आंखें अश्रुविहीन हो गईं। कहानी ही है मोबाइल की। कल ही तो मेटो्र में मोबाइल को चोर जी ने अपना बना लिया। उनके हाथ में खेलता इठलाता अपने पुराने दोस्त को पता नहीं याद करता होगा या नहीं। यह भी तो तब पता चले जब उनके मुलाकात और संपर्क हो सके। मैंने तो अपनी तरफ से खूब कोशिश की। कोशिश भी इतनी कि अपरिचितों से फोन मांगे।
कल का पूरा दिन खाली खाली बरतन का सा रहा। गुलज़ार के शब्दों में। मगर एक चीज हुई। पूरे दिन बिन टुनटूने के रहना का अपना सुख था तो अपनी कैफ़ियत भी थी। आस पास अब टेलिफोन बूथ भी तो नहीं रहे। सो किसी से भी फोन मांगना भीख मांगने जैसा है। दस बार अलग अलग नज़रों से देखते हैं। उनकी नज़रें आप पर टंगी होती हैं। किस को कर रहे हैं? कितनी देर बात कर रहे हैं आदि। उन्हें यह भी डर होता है कि इसके चले जाने के बाद कॉल बैक आए इन्हें कहां देखने जाउंगा।
शाम हुई तो फिर याद आए मोबाइल जी। अब अपनी सहयात्री को कैसे बताउं कि आफिस से निकल चुका हूं। कैसे बताउं कि कहां पहुंच गया आदि। कदम कदम पर टै्रकिंग होने बच गया। गूगल से ज्याद तेज़ अपनी सहयात्री होती हैं। जो स्टेशन स्टेशन आपको टै्रक करती हैं। कहीं बीच में तो नहीं उतर गए। कल इससे भी मुक्ति मिली।
कल तमाम सोशल अड्डा से बाहर रहा। सोच रहा था क्या क्या कहां कहां क्या हुआ होगा। इस चिंता और उत्सुकता से ऊपर उठ चुका था। न टी टी न लाइक्य, न कमेंट्स सब से बेख़बर।
आख़िर आप सोच रहे होंगे कि यह भी कोई कहानी है? क्या बेकार सी बात में आपका समय जाया किया। मगर बाबूजी कहानी तो कहानी होती हैं। वह मोबाइल की हो या इंसान की। उसकी कहानी हम सब की जिंदगी से जुड़ती चली जाती हैं।
चिंता न करें। आज मेरे पास मोबाइल है। नेटवर्क है। बातें हैं। और मोबाइल की तमाम पेचिंदगिंया हैं।

Monday, November 20, 2017

नदी जो गंदी रही



कौशलेंद्र प्रपन्न
नदी गंदी सिर्फ बाहरी तत्वों से नहीं होती। कई बार नदी को हम अपने हित में गंदी ही रखते हैं। यदि नदी साफ हो गई तो करोड़ों रुपए का व्यापार कैसे होगा। गंगा, यमुना, झेलम, चिराब आदि नदियां तो हैं ही जिन्हें बचाना है।
मगर एक नदी हमारे भीतर बहा करती है। इस नदी को साफ करने के लिए बाहरी अनुदान की जरूरत नहीं होती। हम चाहें तो अंतर नदी को साफ और निर्मल रख सकते हैं। लेकिन अफ्सोस कि हम अपनी अंतर नदी को गंदली ही रखना चाहते हैं। ताकि कोई तल की गहराई न जान सके।
यह नहीं कहता कि लोगों के चेहरे पर कई चेहरे होते हैं। यह तो बात पुरानी है। चलिए नए बिंब से देखते हैं। नद ीवह बिंब मुझे आई कि नदी केवल बाहर ही नहीं बहा करती। बल्कि एक नदी हमारे भीतर भी बहा करती है। निरंतर।
कई मोड़-भाव, मनोदशाओं के किनारों से टकराती बहती रहती है। हम इस नदी को बड़ी होशियारी से साफ नहीं रखते। यदि साफ हो गई तो लोगों को मालूम चल जाएगा कि फलां की नदी ख़ासा गंदली है। वह कभी भी अपनी नदी का प्रच्छालन नहीं करते।
हमारे भीतर बहने वाली नदी बेहद जरूरी है कि वो साफ सुथरी रहे। लेकिन साफ नहीं रख पाते। जबकि यम,नियम, प्रणायाम, धारणा, ध्यान आदि के जरिए हम चाहें तो अपनी अंतर नदी को निर्मल कर सकते हैं।
आध्यात्म में इस नदी को साफ करने के लिए साधनों का जिक्र है। लेकिन भौतिक सफाई की बात करें तो हमें अपनी अंदर और अपने व्यवहार को हमेशा जांचते रहना चाहिए। इससे हमें मालूम होता है कि हमने कहां और कब गलती की। इसलिए कहां गया है कि हमें मनसा,वाचा कर्मण किसी भी स्तर पर हत्या नहीं करनी चाहिए। लेकिन हम यह जानते हुए भी अनजाने में न जाने किस किस को मानसिक, भावनात्मक स्तर पर चोट पहुंचाते हैं।
दूसरे शब्दों में हमें न केवल अपनी भौतिक नदी को बचाने का प्रयास करना है बल्कि अंदर की नदी को भी निर्मल और स्वच्छ रखने का प्रयास करना है।

Friday, November 17, 2017

हवा में भेदभाव




कौशलेंद्र प्रपन्न
लगभग फ्लाइट टेक ऑफ करने वाली थी। कैबिन बंद हो चुके थे। बत्तियां बुझा दी गई थीं। घोषणा भी हो चुकी थी कि कृपया कमर बेल्ट बांध लें आदि। कि तभी आवाज़ आई ‘‘ आपको सुनाई नहीं देता कैप्टन ने अपनी सीट पर बैठने की घोषणा की है।’’
साधारण से कपड़े में खड़ा व्यक्ति सहम गया। शॉरी मैडम। और अपनी सीट पर जाकर बैठ गया।
तकरीबन चालीस हजार फीट की ऊंचाई पर लोग उड़ रहे थे। फिर आवाज़ आई ‘‘ आपको समझ नहीं आती, ऐसे खड़े होते हैं? सट के मत खड़ें हों। दूर जाइए।’’
दूसरी सवारी को बोली गई। वह भी सहम गया। ‘‘मैडम सट नहीं रहा था। आग जाने की जगह नहीं थी सो...’’
‘‘पता नहीं कहां कहां से आ जाते हैं। तमीज़ भी नहीं हैं।’’ बुदबुदाती हुई मैडम आगे बढ़ गईं। लेकिन मेरा मन थोड़ा ख़राब हो गया। इन्हीं की वजह से उनकी नौकरी है। ये हैं तो इनकी फ्लाइट उ़ड़ती है। और अपनी सवारी पर ऐसे बुदबुदाना...।
मगर उस साधारण से कपड़े में ट्रैवल करने वाला एक साधारण कामगर लगा। जो दो साल बाद अपने घर लौट रहा था। चेकिंग के दौरान उस पर नजर पड़ी थी। बड़े बड़े और भारी बैग उसके साथ खड़े थे। जब वे आपस में बात कर रहे थे तो उनकी भाषा भोजपुरी, अवधी और ब्रज मिश्रित सी महसूस हुई। एकबारगी ऐसा लगा किसी रेलवे फलेटफॉम पर हम खड़े हैं। लेकिन यहां अंतर था। लोगों के कपड़े,भाषा, हाव-भाव, बॉड़ी लैंग्पवेज एलीट किस्म के थे। उनके सब के बीच ये मजदूर किस्म की सवारी सभी को खटक रही थी। मेरे साथ बैठा सवारी सवारी ही कह रहा हूं क्योंकि अभी तक नाम नहीं जानता था। बातचीत शुरू हुई तो पता चला अफगानिस्तान में ऑर्मी विंग्स में गाड़ी चलाते हैं। छह माह के बाद आंख के ऑपरेशन के लिए भारत भेजा गया है। बातों ही बातों में कई बातें मालूम चलीं। फैलो यात्री हरियाणा के सोनीपत का रहने वाला था। अपनी वहां की कई ऐसी बातें साझा की कि आंखें ख्ुली रह गईं। उसकी ख़बरें किसी भी मीडिया में दिखाई नहीं देती। सौभाग्य था मेरा कि मुझे उसके वास्तविक तजर्बे को सुनने और जानने का मौका मिला।
बहरहाल जब दिल्ली एयरपोर्ट पर बिदा हुए तो महसूस हुआ आज ग्लोबल गांव में रहने वाले सब पहले इनसान हैं। जहां भी हैं जैसे भी हैं।

Thursday, November 16, 2017

उबाऊ प्रार्थना



कौशलेंद्र प्रपन्न
स्कूलों में आज भी उबाऊ प्रार्थना जारी है। तकरीबन बीस साल पहले प्रो. कृष्ण कुमार जी ने स्कूली प्रार्थना का विश्लेषण शिक्षा समाज को दिया था। जो पढ़ना चाहें वे बच्चों की भाषाः अध्यापक निर्देशिका में पढ़ सकते हैं।
स्कूलों में प्रार्थना जिस बेरूखी और उबाऊ तरीके से होती है कि जिसे सुनकर लगता है इससे अच्छा न हो। यह बरताव न केवल प्रार्थना के साथ किया जाता है बल्कि राष्ट्र गान भी उसमें शामिल है। कभी कभी स्कूलों में होने वाले प्रार्थना और राष्ट्र गान को सुनता हूं तजो लगता है हमारे बच्चे और शिक्षक किस स्तर तक उच्चारण के जरिए अर्थ का अनर्थ करते हैं।
शिक्षक की भूमिका में भी इसमें साफ झलकती है। शिक्षक सामान्यतौर पर हाथ बांधे अनुशासनात्मक व्यवस्था संभालने में लगे होते हैं। उनका काम बच्चों पर निगरानी रखना होता है कि वे ठीक से खड़ें हैं या नहीं। प्रार्थना व राष्ट्र गान गा रहे हैं या नहीं।
राष्ट्र गान में आए शब्दों को यदि कभी बच्चों के मुख से सुनने का अवसर मिले तो जरूर समय निकाल कर सुनें। जो लोग सिनेमा हॉल जो कि शुद्ध मनोरंजन स्थल है वहां भी राष्ट्र गान में खड़े होने, गाने की पैरवी करते हैं उनसे पूछा जाना चाहिए कि क्या वे स्वयं शुद्ध राष्ट्र गान करने में सक्षम हैं।
स्कूल जिम्मेदार नागरिक बनाने की पहली पाठशाला के तौर जानी जाती है। लेकिन वहां राष्ट्र गान और अन्य प्रार्थनाओं के साथ बच्चे रू ब रू होते हैं यह एक चिंतनीय विषय है। कायदे से प्रार्थना और राष्ट्र गान को शुद्ध उच्चारण के साथ गाया जाना चाहिए। हालांकि कुछ लोग यह तर्क दे सकते हैं कि शुद्धतावादियों ने ही हिन्दी व अन्य भाषाओं को सबसे ज़्यादा हानि पहुंचाई है। लेकिन फिर भी कम से कम राष्ट्र गान को सही तरीके से गाने की वकालत को नकारा नहीं जा सकता। यह भी देखना दिलचस्प होगा कि क्या स्कूलों में सभी बच्चों को राष्ट्र गान की तालीम दी जाती है? थोड़ी देर के लिए मान लें विद्यालय के पास सभी बच्चों पर ध्यान देने का समय नहीं है तो क्या घर-परिवार के सदस्यों ने कभी राष्ट्र गान को शुद्ध उच्चारण के साथ बच्चों को सुनाया या अभ्यास करने की कोशिश की है।
स्कूलों में बच्चे जो सुनते, पढ़ते,लिखते और बोलते हैं वो उनके साथ ताउम्र रहती है। यदि राष्ट्र गान व प्रार्थना ग़लत शैली व तर्ज़ पर बच्चों को मिली है तो उन्हें अतिरिक्त अभ्यास और प्रयास से ठीक करना पड़ता है।

प्रेस की आज़ादी संग जिम्मेदारी भी



कौशलेंद्र प्रपन्न
प्रेस की आज़ादी से हमारा क्या मतलब है? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता शायद यही अर्थ बेहद करीब बैठता है। सवाल यह उठ सकता है कि प्रेस को किससे, किस स्तर पर किस मकसद के लिए आज़ादी चाहिए आदि। प्रेस स्वत्रंत हो इसमें किसी को भी कोई गुरेज नहीं हो सकता। लेकिन प्रेस जब स्वयं निरंकुश हो जाए तो? प्रेस को भी नियंत्रण में रखने की आवश्यकता है?
प्रेस की आज़ादी और जिम्मेदारी दोनों को एक साथ एक मंच पर रखकर विचार करने की आवश्यकता है। प्रेस अपनी आज़ादी को क्या जिम्मेदारीपूर्वक निभा रहा है या नहीं इसकी भी जांच करने की प्रक्रिया और तंत्र हो तो बेहतर है। हालांकि समितियां और आयोगों का गठन किया जा चुका है। लेकिन दंतविहीन से क्या उम्मीद रखी जा सकती है।
किस ख़बर व किस घटना के साथ प्रेस को कैसे बरताव करना चाहिए यह प्रेस के लोकतांत्रिक विवेक पर ख़ासा निर्भर करता है। प्रेस का स्वविवेक क्या कहता है? किसी भी घटना व ख़बर में किसी की निजता का ख़्याल नहीं रखा जाना चाहिए। किसी ख़ास घटना पर कई बार प्रेस निर्णायक की भूमिका में होता है। यह शायद लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के लिए नहीं है। यह कार्यक्षेत्र किसी और का है। यह जिम्मेदारी किसी पहले,दूसरे या तीसे खंभे की है तो यह काम उसे ही क्यों न करने दिया जाए।
अतिउत्साह के शिकार प्रेसकर्मी कभी कभी बल्कि अब तो कोई भी ख़बर मिल जाए उसकी मार्केटिंग में पूरी रिसर्च विंग्स झोंक देती है। बजाए उस घटना के दूरगामी मारक क्षमता का ख़्याल किए।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हर व्यक्ति, समाज और लोकतंत्र के चारों स्तम्भों को चाहिए। यह अनुचित भी नहीं लेकिन हमें विचार करना होगा कि क्या हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इस्तमाल जिम्मेदारी के साथ कर पा रहे हैं।
हाल के तीन चार सालों में नागर समाज के लेखक,साहित्यकारों और पत्रकारों को उनकी अभिव्यक्ति की आज़ादी को जिस बेरहमी से कुचला गया जिसे देखते हुए लगता है कि पहला स्तम्भ इतना मजबूत हो गया है कि तमाम अभिव्यक्ति के मायने को अपने तरीके से व्याख्यायित करने पर आमादा है। ऐसे में प्रेस को आगे आना ही होगा किन्तु जिम्मेदारी को नज़रअंदाज़ करते हुए नहीं बल्कि अपनी जिम्मेदारी को निभाते हुए।
कलमुर्गी, दाभोलकर, पंसारे, गौरी लंकेश आदि की हत्या बताती है कि सत्ता को विरोध, आलोचना कत्तई पसंद नहीं। जो भी सत्ता के ख़िलाफ आवाज़ बुलंद करेगा उसे मौन कर दिया जाएगा।

Wednesday, November 15, 2017

चिड़ियों की बैठक






कौशलेंद्र प्रपन्न

शहर में ऐसी घटना पहली बार घट रही थी। चारों दिशाओं से तरह तरह की चिडियों की झुंड़ आ चुकी थीं। उसमें गिलहरी, बाज़, गिद्ध, सोनजूही, गरवैया,कौआ सब आज साथ थे। किसी ने भी उड़ान भरने से मना नहीं किया।
सोनजूही ने कहा ‘‘ आज तक, आज तक ऐसा नहीं हुआ।’’
‘‘इन लोगों ने पेड़ काटे हमने चूं तक नहीं किया।’’ हमारा बैठने का ठिकाना काट डाला।’’
गिद्ध और बाज़ चुपचाप सब सुन रहे थे। बीच में गिलहरी बोल पड़ी,
‘‘ इनकी चले तो हमें शहर से निकाल बाहर करें।’’
‘‘ख़ुद तो छोटे छोटे कोठरों में सिफ्ट हो गए।’’
‘‘हमारे लिए छोड़ा ही क्या है?’’
‘‘बिजली के खंभों पर बैठना भी महफूज़ न रहा अब तो। वहां भी कंटीले तार बिछा दिए इन इनसानों ने।’’
बाज़ कुछ बोलने को अपनी चोंच बाहर निकाली और कहा,
‘‘शुक्र है, तुम तो अभी भी शहरों में उड़ान भर पाते हो। बच्चे तुम्हें देख कर खुश हो लेते हैं। और गिलहरी तुम्हें क्या चिंता है पार्क में बच्चे, बड़े कुछ न कुछ खाने को डाल देते हैं।’’ ‘‘हम तो अब दूर की कौड़ी हो गए। एक दो हमारे परिवार के बचे हैं जिन्हें इनसानों को दिखाने के लिए चिड़ियाघरों में कैद कर रखा है।’’
‘‘लेकिन आज समय आ गया है अपनी भी आवाज़ बुलंद करने की। आख़िर ये इनसान हमें क्या समझते हैं?’’
बहुत ही बौखलाहट में कौआ बोले जा रहा था। उसके परिवार के चचा मेटो्र की चपेट में आ गए थे। शहर भर में धुआं ही धुआं। दो हाथ की दूरी तक कुछ भी लौका नहीं रहा था।
‘‘तार के ऊपर बैठे थे कि तभी मेटो्र दंदनाती हुई गुज़री और चचा उड नहीं पाए बेचारे।’’
हमसब पहले दो मिनट का मौन रखते हैं और फिर अपना आंदोलन शुरू करेंगे। 
देखते ही देखते कॉव कॉव करते हुए भारी संख्या में कौए आ गए। किसी ने इत्तला कर दी कि आज ट्रैक पर हजारों की संख्या में चिड़ियों ने धावा बोल दिया है। यात्री परेशान थे। दफ्तर के लिए देरी हो रही थी। सब के सब चिल्लाने लगे। चीखने लगे। उधर चिड़ियों ने ठांन रखी थी जब तब ऊंचे अधिकारी बात करने नहीं आएंगे कोई भी यहां से उड़ान नहीं भरेगा।
इस ट्रैक पर प्रवासी प़क्षियों की झुड़ भी उतर चुकी थी। आख़िर उन्हीं की प्रजाति के उड़ान भरने, जीने मरने का सवाल जो था।
वैसे एक प्रवासी कलगी वाली चिड़िया ने कहा,
‘‘ ठीक है कि हम साल में कुछ दिन यहां गुजारते हैं, लेकिन हैं तो हम ग्लोबल सिटिजन ही। ये लोग प्रवासी सम्मेलन करते हैं। उन्हें सम्मानित करते हैं। वहीं दूसरी ओर हमारे उ़ड़ान भरने, बैठने तक की मौलिक अधिकारों का तार तार करते हैं। ऐसा अब नहीं चलेगा।’’
लंबी पूंछ को हिलाती, लहराती हुई दूसरी चिड़िया ने कहा,
‘‘ हम इस मामले को यूएन और अंतरराष्ट्रीय कोर्ट में उठाएंगे।’’
सब ने हां हां, हम एक हैं। खुले गगन के हम वासी एक ईंट से ईंट बजा के रहेंगे।


शिक्षकीय दुनिया की कहानी के पात्र

कौशलेंद्र प्रपन्न ‘‘ इक्कीस साल के बाद पहली बार किसी कार्यशाला में बैठा हूं। बहुत अच्छा लग रहा है। वरना तो जी ...