Tuesday, March 7, 2017

फिल्मांे में आजाद महिलाएं


                                                                                                                                                                 कौशलेंद्र प्रपन्न
फिल्में हर समाज और काल में आम जन को प्रभावित करती रही हैं। फिल्मों के सामाजिक दरकार भी समय और संदर्भ सापेक्ष बदलती रही हैं। राजा हरिश्चंद्र मूक फिल्मों से लेकर सवाक फिल्मों तक, ब्लैक एंड वाइट के लेकर डिजिटल फिल्मों तक के सफ़र में ठहर कर देखें तो पाएंगे कि समाज का प्रतिबिंब तत्कालीन फिल्मों में दिखाई देती हैं। आजादी पूर्व की फिल्मों के कथानक, परिवेश,संवाद आदि तत् संबंधी होती थीं। आजादी के बाद की फिल्मों के विषय, बोल, परिधान आदि भी बदले यह परिवर्तन भी लाजमी थी। महिलाओं की दृष्टि से फिल्मी जगत को समझने की कोशिश करें तो फिल्मों का एक बड़ा कालख्ंाड़ और भूमिका महिलाओं की स्थिति बदलाती हैं। एक दौर था जब फिल्मों में तथाकथित बड़े परिवार की लड़कियां नहीं आती थीं। बड़ी क्या आम घरों की महिलाओं को फिल्मों में अभिनय करने की आजादी नहीं थी। तब पुरुष ही महिलाओं की भूमिका किया करते थे। समय ने करवट ली और धीरे धीरे लड़कियों का आना फिल्मों शुरू हुआ। महिलाएं किस रूप में दाखि़ल हुईं यह भी एक दिलचस्प कहानी है। महज गाना गाने,ठुमका लगाने,मां या पत्नी की भूमिकाओं ने इन्हें चुना। सत्तर के दशक तक कथानकों में एक बड़ा परिवत्र्तन घटता है। महिलाएं आभूषण,वस्त्र आदि के आकर्षण से बाहर निकल अभिनय के समानांतर चुनौतियां देने लगीं।
अस्सी के दशक में अस्मिता पाटिल,शबाना आज़मी ने निश्चित ही यादगार अभिनय से अपनी पहचान बनाई। इन्होंने फिल्मों में महिलाओं की भूमिकाओं को तो रेखांकित किया ही साथ ही समाज में बढ़ रहे वर्चस्व को भी पर्दे पर उतारा। यदि फिल्मों के सामाजिक सरोकारों की ओर नजर डालें तो नाच गाने,मार-धाड़ से आगे निकल कर सामाजिक स्थितियों को भी पर्दे पर जी रही थीं। फिल्मों ने चाहते हुए भी हमारे समाज की चेतना को झकझोरना का काम किया है। समाज का एक बड़ी तबका जो जवान हो रहा था व कहें किशोर से युवा हो उन्हें ख़ासे प्रभावित किया। एक्शन हीरो से लेकर एग्री यंग मैन की छवि भी समाज में खूब चली। साथी दुखांत भूमिकाओं के लिए दिलीप कुमार,साधना,गुरुदत्त को आज भी हम भूल नहीं पाएं हैं। कहानियां और कहानियों को पर्दे पर जीवंत करने वाले कलाकारों की निजी जिंदगी जैसी भी रही हो किन्तु पर्दे पर उन्हें देखना दिलचस्प था। ठीक उसी तरह से महिलाओं की भूमिकाएं भी दिन प्रति दिन बदल रही थी जैसे आम जिंदगी में बदलाव घट रहे थे। परिवर्तन की सुगबुगाहटें महिला कलाकारों में भी दिखाई देने लगी थी।  
स्त्री विमर्श की एक दुनिया समानांतर रची जा रही थी। सावित्री बा फुले महिला शिक्षा के लिए संघर्ष कर रही थीं। वहीं समाज में शिक्षा और महिलाओं की जागरूकता में तेजी आ रही थी। बच्चियां घरों से निकल कर स्कूल जाना शुरू कर चुकी थीं। धीरे धीरे ही सही लेकिन शिक्षा और स्व अधिकार की ललक भी महिलाओं में जगने लगी थी। यह एक संक्रमण काल था जिसमें महिलाएं अपने चैका बर्तन से बाहर दुआर पर निकलने की कोशिश कर रही थीं। यह दृश्य फिल्मों से ओझल नहीं था। क्योंकि फिल्मों की नजर से सामाजिक बदलाव छुपे नहीं रहे। एक ओर प्रेमचंद के उपन्यासों,कहानियों पर फिल्में बन रही थीं वहीं टैगोर की रचनाओं को भी फिल्मों में चुना जा रहा था। गैर भारतीय भाषाओं मे लिखी जा रही रचनाओं और कथानकों पर फिल्में बनीं। लेकिन गौरतलब है कि आजादी पूर्व की कथानकों और फिल्मों में महिलाओं को रूढ छवियों में बंधी नजर आती हैं।
नब्बे के दशक के अंत अंत तक फिल्मों के कथानक और महिलाओं की प्रस्तुतिकरण में काफी बदलाव हुए। नाच गाने और ठुमके लगाने से आग बढ़ कर बैंडेड क्वीन,एलओसी,डोर,पिंजर,लज्जा आदि फिल्में आईं जिसमें समाज में महिलाओं की स्थिति को प्रकारांतर चित्रित करती हैं। वहीं 2000 और 2010 के बाद स्त्री विमर्श को आगे बढ़ाती फिल्में भी आईं जो बाजार और महिलाओं के अंतर्संबंध को उदघाटित करती हैं। कार्पोरेट, पेज थ्री, चांदनी बार, एनएच 8,मेरीकाॅम,नीरजा आदि ऐसी फिल्में हैं जिसमें हमारे समाज की महिलाओं की उलझनों को भी पकड़ने की कोशिश करती हैं। बाजार किस तरह से महिलाओं को महज वस्तु व विज्ञापन की तरह देखती है इसका भी उदघाटन हमें कई फिल्मों में मिलता है। समाज में जैसे जैसे महिलाओं की भूमिकाएं बदली सवाक फिल्मों में अछूत कन्या, पाकीज़ा दोनों ही फिल्मों में महिलाएं रूढ़ वैचारिक समाज की प्रतिबद्धताओं से लड़ती हैं। एक ओर अछूत कन्या होने की वजह से ब्राह्मण लड़के से शादी नहीं कर पाती वहीं विवाहेत्तर विवाह की धारणा पर बनी फिल्मों का सिलसिला भी एक नई जमीन तैयार करती है। जख़्म, जिस्म, क्वीन काॅपोरेट जैसी फिल्में महिलाओं के प्रगतिशील सोच और समाज के बदलते मूल्यों को पकड़ने की कोशिश करती हैं। क्वीन अपनी इच्छा और स्त्री की सोच और निर्णय की आजादी की कहानी कहती है। वहीं डेढ इश्किायां, कहानी, राजनीति,मर्दानी,उर्टी पिक्चर,रिवाल्वर रानी, तनु वेड्स मनु रिटर्न्स आदि फिल्में हैं जिसमें महिलाएं अपनी जमीन पर खड़ी नजर आती हैं।
सन् 1985 और 2000 के बाद बनी फिल्में मंे रूढ़ कथानकों में काफी तेजी से बदलाव नजर आता है। जहां अछूत, बाल विवाह, समाज के मुख्य धारा से कटी महिलाएं समाज के झंझावातों में अपनी भूमिका निभाती दिखाई देती हैं। मेरी काॅम, पीकू, एनएच 8, कहानी फिल्मों की नायिकाएं अपपी उपस्थिति को मजबूती के साथ स्थापित करती हैं। यह समाज में महिलाओं के साथ हो रहे बड़े बदलाव और सोच को आईना दिखाने वाली फिल्मों में साफ तौर से स्त्री अधिकार और वर्चस्व की कहानी पढ़ी और देखी जा सकती है। यदि पीकू और मेरी काॅम के कथानक को देखें तो एक लड़की अपने घर में पिता,पति को संभालते हुए दफ्तर भी जाती है। दो समानांतर चलने वाली भूमिकाओं और जिम्मेदारियों को निभाती लड़कियां नजर आती हैं। यह साबित करता है कि फिल्मों में कई बार समाज में घटने वाली हकीकतों को स्थान तो मिलता ही है और कई बार फिल्मों में चित्रित कथानक को देख समाज में युवा पीढ़ी कदम उठाती है। हाल ही में नोएडा से लापता दूसरे शब्दों में अपहृत लड़की ने कबूल किया क्राइम पेटोल देख कर उसने अपनी अपहरण की कहानी रच डाली। यह बताता है कि समाज और फिल्मों के संबंध बड़ी करीब के रहे हैं। दोनों ही एक दूसरे को गहरे प्रभावित करते रहे हैं। कई बार नागर समाज जब फिल्मों पर आरोप लगाता है कि फिल्मांे की वजह से समाज में अपराध,विवाहेत्तर संबंध, हत्याएं आदि बढ़ रह हैं। बच्चे फिल्मों को देखकर बिगड़ रहे हैं आदि। इस पर निर्देशकों को अपना तर्कशास्त्र है कि समाज यानी दर्शक जो देखना पसंद करता है हम उसे ही दिखाते हैं। अब सवाल उठ सकता है कि वो किन वर्गों के दर्शकों को इसमें शामिल कर रहे हैं। क्या सचमुच समाज और दर्शक हिंसा, बालात्कार देखना चाहता है या फिर आरोपित तर्कजाल हैं?
 फिल्मों का समाजशास्त्र तो यह कहता है कि फिल्में मनोरंजन और विचारों को परिमार्जन में एक साधन बनें। लेकिन परेशानी यही है कि मनोरंजन के पैमाने और परिमार्जन के आधार तत्व कौन तय करेगा। क्या समाज के कुछ वर्ग और विचार के कुनबे इसे तय करेंगे कि कौन सी फिल्म समाज में दिखाई जाए और कौन सी फिल्म समाज की समरसता को तोड़ने वाले हैं। यहां यह सवाधानी बरतनी पड़ेगी कि वो कौन सा धड़ा है जो फिल्मों पर प्रतिबंध की मांग करता है? वो कौन सा वर्ग है जो मूल्यांे और नैतिकताओं की दुहाई देकर तोड़ फोड़ करता है। उसकी पहचान भी नितांत आवश्यक है। यही वजह है कि कई फिल्में कानूनी जालों में उलझकर आज तक दर्शकों के बीच नहीं आईं। या आईं भी तो विवादों का दरिया पार कर आईं। वाटर, फायर आदि फिल्मों पर हो हल्ला मचा यह सभी को याद होगा लेकिन प्रश्न उठता है कि यदि समाज का दपर्ण फिल्मों को मानते हैं तो समाज में घटने वाली घटनाओं को चित्रित करने मंे यदि ज़रा सी मर्यादा रखकर दिखाई जा रही है तो उसे स्वीकारें मंे क्या हर्ज है।
आंधी फिल्म की नायिका का राजनीति में वर्चस्व स्थापित करना क्या प्रकारांतर से समाज में बदलते राजनीति समीकरणों को उद्घाटित नहीं करता? क्या राजनीति, सरकार, गंगाजल नई वाली में स्त्री के उस स्वरूप को दिखाने की कोशिश नहीं है जहां महिलाएं चैके से बाहर निकल राजनीति में अपना हाथ आजमा रही हैं। एनएच 8 की गांव की महिला स्वयं अपनी बेटी को मरवा देती है तो यह क्या आकाशीय कथानक है या हमारे ही राज्यों में ऐसी घटनाओं को अंजाम नहीं दिया जा रहा है। यदि रांझना की नायिका की ओर नजर डालें तो वह एक क्रांतिचेत्ता और अपनी निजी खुन्नस निकालने के लिए नायक को नस्तनाबूत कर देती है। वहीं बाजीराव मस्तानी में भी एक महिला किस तरह से मुस्लिम बहु को मरवाने में पूरी ताकत लगा देती है इसकी झलकी मिलती है।
समग्रता में देखें और फिल्मों में चित्रित महिलाओं की भूमिका को समझने की कोशिश करें तो पाएंगे कि समय और कालखंड़ के अनुसार कथानक और प्रस्तुतिकरण में काफी बदलाव आया है। यहां तक की समाज की घटनाएं किस तरह से रूपहले पर्दे पर स्थान लेती हैं वह भी देखना दिलचस्प है। अछूत कन्या से लेकर वाटर, फायर, कहानी, एनएच 8 और क्वीन तक का सफ़र करती महिलाओं की छवियां रूढ़ भूमिकाओं को धत्ता बताती हुई नई सोच और वैचारिक बदलाव को ओढ़ चुकी हैं। 


Monday, February 27, 2017

रात बिरात उठ जाते


उन्हें रात बिरात उठने की आदत जो थी,
उठ जाते
लोटा पानी नहीं
रात में भी उनका हाथ
माइक ढूंढ़ा करता।
भोर भिनसार उठ कर कहीं नहीं जाते
बस माइक चाहिए होता था उन्हें
शुरू हो जाते।
आदत से
कौन परेशान नहीं था?
उन्हें देखते
हो हो करने वाले भी खड़े ही हो जाते
उन्हें देखकर उनका पाव भर खून बढ़ जाता।
सुबह सबेरे
नहा धोकर
बबरी झार कर
खड़े हो जाते
कुछ तो ऐसे भी थे
जिन्हें माइक के बिना
खाना पचता न था।
सो अपने घर में भी
मंच लगा रखा था
जब भी उबकाई सी आती
माइक पकड़ लिया करते थे।

Thursday, February 23, 2017

शिक्षक का व्यावसायिक विकास और शिक्षण रूचि


कौशलेंद्र प्रपन्न
शिक्षक का व्यावसायिक विकास सुनकर आपको किस प्रकार की दक्षता के अंदाज लगते हैं जो शिक्षकों में होने चाहिए। शिक्षण एक व्यवसाय है इसे मानने में कोई परहेज नहीं होनी चाहिए। क्योंकि अन्य व्यवसायों की तरह ही शिक्षण एक व्यवसाय है। यदि व्यवसाय है तो कुछ व्यावसायिक कौशल की अपेक्षा भी होगी। वे कौन सी दक्षताएं हैं जो हम शिक्षक में होने की अपेक्षा करते हैं। पहली बात तो यही कि शिक्षण को उसने स्वेच्छा से चुना हो। उसके चुनाव किसी प्रकार के दबाव व परिस्थितिवश लिए गए मजबूरी के निर्णय न हों। क्योंकि आज हकीकत यही है कि इस पेशे में बिना पहली प्राथमिकता के शिक्षक दबाववश ज्यादा हैं। कहीं किसी को कोई नौकरी मिलती नजर नहीं आती तो वह इस पेशे में भाग्य आजमाता है। किसी तरह से कोर्स पूरा करने के बाद पढ़ाना भी शुरू कर देते हैं। लेकिन मन में एक कसक के साथ की भाग्य ने साथ नहीं दिया वरना वो किसी कॉलेज, बड़े ओहदे, लाल बत्तीधारी होते। लेकिन कहीं न कहीं संभव है उनके प्रयास में कमी रही होगी। या कोई और वजह जिसकी वजह से वो आज स्कूल में हैं। इस कठोर सच को स्वीकारने में उन्हें सालों लग जाते हैं। शिक्षविदों को मानना है कि ऐसे लोगों की संख्या शिक्षण कर्म में ज्यादा है जिनसे शिक्षा और शिक्षण को संघर्ष करना पड़ता है।
शिक्षण को पढ़ना-पढ़ाना रूचिकर लगे यह एक प्रकारांतर से दक्षता कह सकते हैं। अनुभव बताते हैं कि शिक्षक एक बार शिक्षण में आने के बाद पढ़ना छोड़ देते हैं। इसके पीछे उनके अपने तर्क शास्त्र होते हैं। समय नहीं मिलता। क्या पढ़ें आदि। संभव है उनके सामने पीआरटी से टीजीटी, पीजीटी, उप प्रधानाचार्य, प्रधानाचार्य तक के सफ़र के अलावा कोई और विकास की संभवानाएं खत्म नजर आती हों। काफी हद तक सच्चाई भी है। लेकिन हकीकत तो यह भी है कि जो शिक्षण पढ़ने-पढ़ाने, शोध प्रवृत्ति को होते हैं उनके लिए स्कूल से बाहर काम के खुल आमंत्रण भी होते हैं। जहां वे अपनी शोधपरक रूझान को आकार दे सकते हैं। पाठ्यक्रम, पाठ्यपुस्तक लेखन, निर्माण की प्रक्रिया से भी जुड़ सकते हैं। कई ऐसे प्राथमिक और माध्यमिक स्कूल के शिक्षक हैं जिनका योगदान एनसीइआरटी की पाठ्यपुस्तक निर्माण में सहभागिता है। अवसर की तलाश करना हर व्यक्ति का अधिकार है। और उस अवसर को सकार करने के लिए प्रयास भी जरूरी है। केवल स्कूल तक खुद को महदूद रखने वाले शिक्षक ही संभव है समय से पहले मृतप्राय से हो जाते हैं।
शिक्षक स्वयं भाषायी कौशल, तकनीक इस्तमाल, सृजनात्मक सोच को स्वीकारने और बढ़ावा देने वाला हो। ऐसे में शिक्षकीय जीवंतता तो बचाई ही जा सकती है साथ ही बच्चों में सृजनात्मकता का प्रवाह भी सहजता के साथ किया जा सकता है। लेकिन अमूमन देखा यही जाता है कि जब किसी दक्षता विकास कार्यशाला में शिक्षकों को आमंत्रित किया जाता है तो उसमें उनकी रूचि न के बराबर होती है। अरूचिपूर्ण सहभागिता की प्रवृत्ति से आए शिक्षकों की उस मनस्थिति को तोड़ने, निर्माण करने की प्रक्रिया काफी चुनौतिपूर्ण होती है। अनुभव बताते हैं कि शिक्षकों के लिए आयोजित होने वाले कार्यशालाओं में शिक्षकों को धकेल कर भेजा जाता है। वे भी आदेश के पालक के तौर पर हिस्सा भी ले लेते हैं। यह देखना भी दिलचस्प होता है कि उनमें से कितने कार्यशाला के पश्चात उन कौशलों का इस्तमाल अपनी कक्षाओं में करते हैं। मुश्किलन बीस फीसदी शिक्षक ही कार्यशालाओं में अपनी रूचि के साथ आते हैं। यही शिक्षक पूरे कार्यशाला में सकारात्मक सोच के साथ सहभागी भी होते हैं। वरना अधिकांश शिक्षक महज समय कैसे कट जाए या ज़रा टटोलें कि जो उन्हें पढ़ाने आया है वह कैसे उन्हें पढ़ाता है। इस प्रवृत्ति के शिक्षक हमेशा कार्यशाला में व्यवधान पैदा करते हैं।
एक बड़ा फांक वहां भी नजर आता है जब एक शिक्षक टटका प्रशिक्षण हासिल कर कक्षाओं में कुछ करना चाहते हैं। लेकिन उन्हें अपने ही सह शिक्षक मित्रों से सुनने को मिलता है कि हम भी पहले ऐसे ही लगन से पढ़ाया करते थे। कुछ दिन की बात है फिर यह भी हमारी तरह हो जाएगा। इस किस्म के नकारात्मक सोच और मानसिक प्रहार में खुद की शिक्षण ललक को बचाए रखना कठिन होता है। जो भी शिक्षक इस माहौल को हावी नहीं होने देते वे बड़ी शिद्दत से आज भी शिक्षण कर रहे हैं। उन्हें कुछ शिक्षकों की वजह से ही शिक्षण पेशे की नाक बची हुई है।
प्रो कृष्ण कुमार अपनी पुस्तक गुलामी शिक्षा और राष्टवाद में इस मसले पर बड़ी गंभीरता से विमर्श करते हैं कि एक शिक्षक की हैसीयत समय के अनुसार घटती रही है। आज वह शिक्षक एक कर्मचारी की तरह हो चुका है जिसपर अधिकारियों के आदेश थोपे जाते हैं। वह महज आदेश पालक बन कर रह गया है। इसके पीछे एक कारण यह है कि वह अपने पेशे को ही हीन दृष्टि से देखता है। ज बवह स्वयं अपने पेशे से उदासीन होगा तो समाज में शिक्षक के मान सम्मान तो घटेंगे ही। शिक्षक बेसहारा और दीनहीन की स्थिति में तब ज्यादा पाता है जब अपने ही सामने और को आगे बढ़ते हुए देखता है। हमें अपने पेशे की पहचान बनाने और बिगाड़ने की पूरी छूट है। हम कैसी पहचान निर्मित कर रहे हैं उसपर ठहर कर सोचना होगा। कृष्ण कुमार उक्त किताब में लिखते हैं कि अधिकांश शिक्षक पेशे में आने के बाद पढ़ने-लिखने से दूर हो जाते हैं जिसकी वजह से आंतरिक परीक्षाओं में पास नहीं हो पाते। आज के संदर्भ में इसे इस तरह से समझ सकते हैं कि जब राष्टीय व राज्यकीय शिक्षक पात्रता परीक्षाओं में एक या दो फीसदी शिक्षक ही पास हो पाए। इन परिणामों को देखते हुए शिक्षकों के संगठनों से इस किस्म की परीक्षाओं का विरोध करना शुरू किया। जबकि यह एक हकीकत है कि शिक्षक एक बार शिक्षण कर्म में आने के बाद पढ़ना-लिखना छोड़ देता है। यह स्थिति न केवल स्कूली स्तर पर देखे जा सकते हैं बल्कि कॉलेज और विश्वविद्याल स्तर पर लगभग यही स्थिति है। स्कूल स्तर पर तो कोई ऐसा प्रावधान नहीं है कि आपने कितने सेमिनार किए, कहां कहां पेपर पढ़ा, कितने घंटे कक्षाएं लीं। कितनी किताबें लिखीं अिद जिन पर आपकी ग्रोथ निर्भर करती है। यह स्थिति विश्वविद्यालयी स्तर पर शुरू हो चुकी हैं। शिक्षकों की प्रोन्नति उनके पर्चे, सेमिनार,, जर्नल आदि में छपे आलेखों पर निर्भर करते हैं। यदि इस तरह के प्रावधान स्कूलों में भी किया जाए तो संभव है शिक्षक पढ़ने-लिखने में मजबूरन ही सही रूचि लेने लगें।

Wednesday, February 22, 2017

शैक्षिक बजट में उछाल गुणवत्ता बेहाल


कौशलेंद्र प्रपन्न
‘‘सरकार और उसके पीछे खड़ा विश्व बैंक और उसके पीछे खड़ा वैश्विक पूंजीपति वर्ग लोगों को गुणवत्तापूर्ण  शिक्षा न देकर उन्हें केवल साक्षर बनाना, कुछ कौशल सिखाना औश्र इस प्रकार उन्हें एक संसाधन बनाकर अपनी पूंजी को बढ़ाना तथा वैश्विक बाजार पर अपना कब्जा बनाए रखना चाहता है।’’ प्रो अनिल सद्गोपाल ने कहीं लिखा है जिसे आज के संदर्भ में व्याख्यायित करने की आवश्यकता है। यदि हम इसे सरकारी दस्तावेज में देखने की कोशिश करें तो यह 11 वीं पंचवर्षीय योजना के दृष्टिपत्र में स्पष्ट दिया गया है कि माध्यमिक शिक्षा का उद्देश्य अंतरराष्टीय बाजार के लिए कुशल मजदूर पैदा करना है। इस बार के बजट में कौशल विकास का ख़ासा ध्यान दिया गया है। यह कौशल किस क्षेत्र में किनके लिए विकसति करने की बात की जा रही है इसे भी समझने की आवश्यकता है। शिक्षा को इस बार समग्रता में देखें तो पिछले बजटीय वर्ष 2016-17 की तुलना में ज्यादा राशि आबंटित की गई है। लेकिन गहराई देखने पर तथ्य कुछ और ही मिलता है। पिछले साल सकल घरेलु उत्पाद के 0.48 से घटकर 0.47 मिला है। यूं तो शिक्षा के विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए 79,686 करोड़ का प्रावधान किया गया है। एक सवाल शिद्दत से उठती रही है कि हर साल शिक्षा के क्षेत्र में सरकार करोड़ों रुपए  खर्च करती है फिर क्या वजह है कि बच्चों को फिर भी लिखने पढ़ने में दिक्कतें आ रही हैं। क्या वजह है कि सरकारी और गैर सरकारी संगठन की ओर किए गए अध्ययन बार बार हमें ताकीद करते हैं कि हम खर्च तो करोड़ों रुपए कर रहे हैं लेकिन गुणवत्ता की दृष्टि से हमें निराशा ही हाथ आ रही है। शिक्षा में गुणवत्ता के मसले को भी समझने की आवश्यकता है क्योंकि यदि सरकार पैसे खर्च कर रही है फिर क्या कारण है कि 7 करोड़ से भी ज्यादा बच्चे प्राथमिक स्कूलों से बाहर हैं। सरकारी आंकड़ों की बात करें तो 80 लाभ बच्चे स्कूलों से बाहर हैं। जो बच्चे स्कूलों में दाखिल हैं और स्कूल की पढ़ाई प्राप्त कर रहे हैं उन्हें किस प्रकार की शिक्षा मिल रही है। इस पर हम नागर समाज को गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।
पिछले वित वर्ष 2016-17 में जहां स्कूली एवं साक्षरता, शिक्षा विभाग को 43896 करोड़ रुपए मुहैया कराए गए थे वहीं 2017-18 वित्त वर्ष में बढ़ाकर 46356 करोड़ रुपए कर दिए गए। इन्हीं वित्त वर्षों में उच्च शिक्षा के मद में भी बढ़ोत्तरी दर्ज की गई जहां 2016-17 में 29703 करोड़ रुपए प्रदान किए गए वहीं 2017-18 में 33330 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। राश्अीय शिक्षा मिशन सर्व शिक्षा अभियान में 2016-17 में 22500 करोड़ रुपए दिए गए वहीं वर्ष 2017-18 में 23500 करोड़ रुपए प्रदान किए गए हैं। वहीं राश्अीय माध्यमिक शिक्षा अभियान को 2016-17 में 3700 करोड़ रुपए मिले थे वहीं 2017-18 में 3830 करोड़ रुपए दिए गए हैं। इन अभियानों में देखा जाए तो हर साल वित्त आवंटन में बढ़ोत्तरी ही दिखाई देती है। यहां एक मौजू सवाल यह उठ सकता है कि इतनी बड़ी राशि का इस्तमाल किस तरीके से हो रहा है? क्या जो राशि राज्य सरकारों तक जा रही हैं वो पूरा सार्थक मदों में खर्च हो रही हैं? हकीकत तो यह है कि हर साल केंद्र सरकार राज्य सरकारों पर आरोप लगाती है कि उन्होंने दिए गए पैसों का इस्तमाल नहीं किया और मार्च के बाद साठ से अस्सी फीसदी पैसे केंद्र को वापस कर दी जाती हैं। बजटीय प्रावधान को देखते हुए यह आरोप भी नहीं लगा सकते कि इसमें शिक्षक प्रशिक्षण जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर खर्च नहीं किए जा रहे हैं। क्योंकि शिक्षण प्रशिक्षण एवं साक्षर भारत जैसे कामों के लिए 2016-17 में जहां 751 करोड़ रुपए प्रदान किए गए वहीं 2017-18 में इस राशि को बढ़ाकर 926 करोड़ रुपए किया गया। संभव है इन्हीं पैसों पर डाइट्स, एससीइआरटी द्वारा शिक्षकों के प्रशिक्षण कार्यशालाओं को अंजाम दिया जाता है। अब यहां एक प्रश्न उठता है कि जब शिक्षक प्रशिक्षण पर भी करोड़ों रुपए खर्च हो रहे हैं फिर क्योंकर स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा शिक्षण हो रही है। संभव है कार्यशाला योजना, कार्यशाला की कंटेंट रूपरेखा पर गंभीरता से काम नहीं किया जाता।
केंद्रीय विद्यालय और नवोदय विद्यालय संगठनों के स्कूलों पर सरकार का ध्यान ज्यादा है बजाय कि राज्य स्तरीय स्कूलों की स्थिति को सुधारी जाए। क्योंकि हर साल केंद्रीय विद्यालयों और नवोदय विद्यालयों की संख्या बढ़ाई जा रही है। पिछले साल 2016-17 में जहां 3987 स्कूल खोले गए वहीं 2017-18 में 4300 स्कूल खोले गए। गौरतलब है कि इन स्कूलों को सरकारी स्तर पर तमाम सुविधाएं पहले से ही मिली हुई हैं। उन्हें ही और मजबूती प्रदान की जा रही है। जबकि राज्य सरकारों द्वारा चलाई जा रही स्कूलों को नजरअंदाज किया जा रहा है। यही कारण है कि विभिन्न राज्यों में सरकार स्कूलों को या तो बंद कर रही है या फिर निजी कंपनियों के हाथों सौंप रही है। राजस्थान में तकरीबन 1800 से ज्यादा स्कूल बंद हो चुके हैं। वहीं उत्तराखंड़ और छत्तीसगढ़ में भी 4000 से ज्यादा सरकारी स्कूलों में या तो ताले लग गए या फिर निजी कंपनियों को दे दिए गए। कितना अच्छा होता कि सरकार इन्हें भी बेहतर बनाने की योजना बनाती। यदि दिल्ली की ही बात करें तो दक्षिणी दिल्ली के हौज़ख़ास इलाके में लक्षमण पब्लिक स्कूल के बगल में चल रही प्राथमिक स्कूल बंद करने की नौबत आ गई थी। अंत में उसे एक निजी संस्था को दे दिया गया और आज वहां चालीस बच्चे हैं। कई बार निजी संस्थाएं मृतप्राय घोषित स्कूलों को जीवित भी की हैं।
गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की जहां तक बात है तो इसे प्रभावित करने वाले अन्य कई घटक हैं जिसे ठीक करने की आवश्यकता है। शिक्षा के अधिकार अधिनियम 2009 के अनुसार 25ः1 और 30ः1 शिक्षकःबच्चा अनुपात की वकालत की गई है। लेकिन हकीकतन यह नहीं है। दिल्ली के सरकारी स्कूलों में अवलोकन के बाद इन पंक्तियों के लेखक के तौर कह सकता हूं कि कक्षा में पच्चास साठ बच्चे तो आम होते हैं। कई स्कूलों में तो यह भी पाया कि एक ही कमरेनुमा हॉल में दो तीन कक्षाएं एक साथ लग रही हैं। एक ही हॉल में एक कोने मे हिन्दी तो दूसरे कोने में गणित पढ़ाई जा रही है। कमरे की कमी और शिक्षकों की कमी दिल्ली के कई स्कूलों में देखने को मिला। किसी स्कूल में चार पांच शिक्षक हैं जिनमें से एक कार्यालयी कामों को अंजाम देने में लगे होते हैं बाकि के शिक्षक शिक्षण कर रहे होते हैं उनमें से भी बचे हुए शिक्षकों पर बैंक एकाउंट खुलवाने, आधार कार्ड से जोड़ने का काम मिला होता है। कई शिक्षकों से बातचीत हुई जिन्होंने बताया कि कई बार पढ़ाने की तैयार कर कक्षा में आते हैं लेकिन अचाकन बीच में ही बुला लिख जाता है और हमें अन्य कामों में झोंक दिया जाता है। पढ़ाने का तमाम उत्साह धरा का धरा रहा जाता है।
शिक्षकीय प्रशिक्षण की गुणवत्ता पर बार बार सवाल खड़े किए जाते हैं। शिक्षाविदों को मानना है कि हमें अपने शिक्षक शिक्षा प्रशिक्षण संस्थानों को भी बेहतर बनाने की आवश्यकता है। यदि दिल्ली के विभिन्न नौ मंडलीय शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थानों डाइट्स की बात करें तो नौ में से सात में गणित, भाषा के स्थाई शिक्षक नहीं हैं। कल्पना की जा सकती है कि अस्थाई शिक्षकों व तदर्थ शिक्षकों के कंधे पर शिक्षण प्रशिक्षण प्रक्रिया को क्या छोड़ा जा सकता है। ठीक इसी तर्ज पर स्कूलों में भी तदर्थ शिक्षकों के भरोसे हम गुणवता की उम्मीद कर रहे हैं।

Monday, February 20, 2017

रचना प्रतिबद्धता के साथ न्याय


लेखक जब अपनी आनुभविक भूमि से बाहर खड़े होकर लिखता है तो संभव है शब्दों की तिलस्मी जाले तो बुन सकता है किन्तु पाठकों को ज्यादा समय तक बांध कर नहीं रख सकता। पाठकों तक पहुंचने के लिए पाठकीय परिवेश, उसकी भाषायीजगत को रचनाओं में बोना पड़ता है ताकि पाठक रचना से गहरे जुड़ सके। यहां कई बार लेखक चूक जाता है। वह जो लिखना चाहता है, जिस भावभूमि से आता है उसकी सृजना करता है। अपनी पसंदगी नापसंदगी को तवज्जो देने वाला लेखक कहीं न कहीं पाठकीय सत्ता और रूच्यालोक को दरकिनार करता है। तात्कालिक प्रसद्धि और क्षणिक प्रचार के लोभ का संवरण करना है तो ज़रा कठिन लेकिन इसका लाभ हमें बाद में मिलता है। अक्सर लेखक तात्कालिक दो कॉलम की प्रसिद्ध पाने की ललक में अपनी रचना प्रक्रिया और रचना प्रतिबद्धता के साथ न्याय नहीं कर पाता।

शिक्षकीय दुनिया की कहानी के पात्र

कौशलेंद्र प्रपन्न ‘‘ इक्कीस साल के बाद पहली बार किसी कार्यशाला में बैठा हूं। बहुत अच्छा लग रहा है। वरना तो जी ...