Sunday, September 22, 2013

वो बेचारी हमेशा रहती घर से बाहर,
धुप पानी ,
सर्दी गर्मी ,
हर मौसम में सदा बिना उफ़ किये। 
उसकी कहाँ किस्मत की रहे गैराज में 
हाँ कुछ को मिल जाती हैं गैराज ,
लेकिन कई हैं कारें जो हमेश रहती हैं ,
घर के बाहर ,
इंतज़ार में की साहेब,
हमें भी नहला दो ,
की जैसे नहाते हैं बच्चे ,
बेचारी कार ,
नहीं आ पाती घर में,
की जैसे नहीं आती घर में धुप ,
रौशनी ,
 कई कारो के भाग्य में नहीं होता नहाना ,
घर.

Thursday, September 19, 2013




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राष्ट्रीय बाल अधिकार एवं संरक्षण आयोग की पहल पर कश्मीर में राज्य आयोग बनाने की पहलकदमी

श्रीनगर में कुछ स्कूल के बचों से मुलाकात हुई. उनसे शिक्षा स्कूल और विभिन्य मुद्दों पर भी चर्चा हुई. शालीमार बाघ में बचों ने लोकल गीत भी सुनाये  जो गहरे उतर गया.
इक ६ साल की अमिन वाणी जो की १ ली कक्षा में पढ़ती है वो अपने घर से २० किलो मीटर दूर स्कूल में जाती है. सरकारी स्कूल की बदहाली से मजबूर उसके घर वाले महंगे निजी स्कूल में भेजते हैं. हलाकि शिक्षा का कानून श्रीनगर जम्मे पर लागु नहीं होता लेकिन सरकारी स्कूल की स्थिथि कुछ अची नहीं है.
पहलगाम , गुलमर्ग , अनंतनाग जिलों में भी स्कूल तो हैं पर न टीचर प्राप्यत हैं और न बच्चे ही जाते हैं. यूँ तो रोड पर सरकारी किस्म के ड्रेस में बच्चे दिखाई दिए मगर अधिकांस लोग बच्चों को निजी स्कूल में भेजते हैं.
राष्ट्रीय  बाल अधिकार एवं संरक्षण आयोग की पहल पर कश्मीर में राज्य आयोग बनाने की पहलकदमी चल रही है. यहाँ भी आयोग बन जाये तो बेहतर हो.

Wednesday, September 4, 2013

सावधान रहो, गलत इरादे से कोई छूने की कोशिश करे तो



कौशलेंद्र प्रपन्न
स्कूल हो या घर-परिवार तुम्हें हर जगह सावधान रहने की आवश्यकता है। सावधान इसलिए क्योंकि कई लोग प्यार-दुलार के बहाने तुम्हें गलत इरादे से छूने की कोशिश करते हैं। ऐसे लोगों में कोई भी हो सकता है। वह भाई,पापा, चाचा व अन्य रिश्तेदार के साथ ही स्कूल के टीचर भी हो सकते हैं। ऐसे लोगों की नजर न केवल लड़कियों पर होती है बल्कि लड़कियां भी इनकी गिद्ध नजर में होती हैं। कई बार हो सकता है तुम्हें समझ ही न आए कि वे तुम्हारे साथ क्या कर रहे हैं। लेकिन निश्चित मानो धीरे-धीरे ऐसे लोग तुम्हारे साथ गलत करने की शुरुआत कर रहे होते हैं।
जब भी तुम्हें ऐसे महसूस हो कि कोई तुम्हारे प्राईवेट पार्ट को छूने व प्यार से ही सही लेकिन तुम्हें सहला रहा हो तो पहली बार ही तुरंत विरोध करो। तुम स्कूल में प्रिसिपल को बता सकते हो। घर में मम्मी-पापा व किसी भी बड़े सदस्य को जरूर बताओ।
दुनिया में ऐसी बच्चियों की संख्या काफी है जिन्हें स्कूल में इस तरह के हरक्कतों का सामना करना पड़ा है। जिन्होंने विरोध किया तभी ऐसे लोगों के खिलाफ कार्यवाई हो पाई। जो चुप रह गए वे बच्चे शिकार होते रहे। इसलिए तुम्हें शिकार नहीं होना बल्कि इनलोगों के खिलाफ अपने से बड़ों को बताना है।
बच्चों तुम्हें पता होगा कि ऐसे लोगों से न केवल तुम्हें बल्कि बच्चियों को भी संभल कर रहने की जरूरत है। क्योंकि कई ऐसे रिसर्च हो चुके हैं जिनके आंकड़ों के अनुसार लड़कों के साथ भी ऐसे लोग गलत करते हैं। जो बच्चे बोल नहीं पाते वे जिंदगी भी इंटोवर्ट या अंतर्मुखी नेचर के हो जाते हैं। उनका आॅल राउड डेवलप्मेंट नहीं हो पाता।
लड़कियां व लड़के दोनों को ही अपने आस-पास के ऐसे लोगों से न केवल बच के रहना रहना है, बल्कि यदि तुम्हारे किसी दोस्त के साथ ऐसा हो रहा है तो उसकी मदद भी करनी चाहिए। मदद तभी कर सकते हो जब तुम खुद सजग और चैकन्ने रहोगे।

गिजूभाई अब भी हैं हमारे स्कूलों मे


मास्टर जनगणना में, मास्टर पोलियो पिलाने के अभियान में, मास्टर चुनाव ड्यूटी में, मास्टर भोजन पकाने, परोसने में, मास्टर स्कूल के दफ्तरी कामों में आदि आदि खूब सुनते  और पाते भी हैं। लेकिन मास्टर का एक दूसरा पहलू भी है और यह कि मास्टर पढ़ाने के लिए बेचैन भी होते हैं। मास्टर पढ़ाने से पीछे नहीं हटते लेकिन कई बार दूसरे अन्य काम इतने हावी हो जाते हैं कि मुख्य काम दूसरे पायदान पर आ जाता है।
मास्टर शोषण करता है। बलात्कार करता है। बच्चियों को बरबाद करता है। लेकिन ऐसे मास्टरों की भी कमी नहीं है जो सचिन तेंदुल्कर, अमिताभ बच्चन, राजेंद्र प्रसाद, अब्दुल कलाम जैसे बच्चों को गढ़ता और संवारता भी है। उन्हें सही राह भी दिखाता है। इतना ही नहीं मुझे याद आता है मेरे पिताजी अपने स्कूल के गरीब बच्चों जिनमें भी उन्हें उकसने और विकसने की संभावनाएं दिखती थीं उसकी फीस, कापी किताब आदि के पैसे घर में विरोध होने पर चुपके से मदद किया करते थे।
उन्हीं की मदद से आज कई बैंक में मैनेजर हैं, कोई रेलवे में उच्च पद पर हैं, कई मास्टर बन और कुछ अन्य नौकरियों में। आज भी उनमें से कई पिताजी के संपर्क में हैं। वे हमारे घर के सदस्यों में शामिल हैं। ऐसे कई मास्टर हैं जो बच्चों के विकास के लिए घर और स्कूल में अंतर नहीं करते।
आज के गिजूभाई के कंधे पर कई जिम्मेदारियां हैं जिनको पूरा करना है। समाज की अपेक्षाएं, हिकारतें आदि को सहते हुए ये गिजूभाई अपने काम में लगे हुए हैं। ऐसे गिजूभाई किसी पुरस्कार से सम्मानित भी नहीं होते। इससे भी इनके मनोबल कम नहीं पड़ते। लगातार जुटे हुए हैं।
एचएमडीएवी स्कूल दरियागंज जो लगभग सौ साल का हो चुका हैं। इसके विकास और संवर्द्धन में लगे वहां के प्रधानाचार्य रमा कान्म तिवारी भी गजब के उत्साह से भरे हैं। उन्होंने तो इस स्कूल की काया पलट ही कर दी है। लगातार वहां के बच्चे कई विभिन्न अंतर विद्यालयी प्रतियोगिताऔ में जीत हासिल कर रहे हैं। पूरा का पूरा दारोमदार निश्चित ही वहां मुखिया और मास्टरों, अध्यापिकाओं के मेहनत का ही तो फल है। इस तरह कई सरकारी स्कूल हैं जहां के मास्टर गिजूभाई की तरह लगे हैं।

Thursday, August 29, 2013

वहां का मैप

वहां का मैप
वहां का मैप न गुगल देता है,
और न जाने वाले रिपोटिंग ही करते हैं,
जो जाता है उस देस वहीं का हो जाता है,
कैसा है न वह देस।
कोई भी सर्च इंजन-
या कि किताब,
नहीं बताता पता,
न ईमेल आडी,
कुछ भी तो मालूम नहीं उस देस के बारे में।
जो जाते हैं-
वे कब लौट कर आएंगे,
यह भी तयशुदा नहीं,
आएंगे तो किस रूप में यह भी अज्ञात।
जो जाते हैं उस देस-
अपने साथ लैपटाप,
फोन महंगे वाले ले जाएं,
भेजें कोई तस्वीर तो हम भी लाइक करें या शेयर करें,
मगर वहां शायद आईएसडी भी नहीं लगता,
कोई नहीं ले जाता कोई भी उपकरण सब यहीं छूअ जाते हैं,
बस जाते हैं तो अकेले निरा निपट।

Thursday, August 8, 2013

ममनून हुसैन से लगी उम्मीद


पाकिस्तान और भारत का रिश्ता तत्कालीन घटनाओं के उठा-पटक पर उतरता चढता रहता है। हाल ही में फिर पांच भारतीय सैनिकों को मार डाला गया इससे एक बार फिर पाकिस्तानी रवैए का मनसा का पता चला। इस तरह से एक ओर सरकार की घोषणों, पहलकदमियों सद्इच्छाओं पर से भरोसा उठता है तो वहीं भवष्यि के रिश्ते की नई डोर कमजोर होती दिखाई देने लगती है। सन् 1947 में यदि देश महज आज़ाद हुआ होता और विभाजन टल जाता तो आज एक संपूर्ण भारत होता। यदि जिन्ना का हठ न होता तो आज पकिस्तान न होता। भारत एक अविभाजित राष्ट के तौर पर दुनिया के सामने होता। लेकिन यह सब अब निरा निरर्थक बातें हैं। क्योंकि इतिहास को पलटा नहीं जा सकता। जो हुआ उसे उसी रूप में कबूल करना ही होगा। देश किन शर्तों, बलिदानों और क्षत् विक्षत हालत में विभाजित हुआ यह आज इतिहास का हिस्सा है। लेकिन इससे मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि जो हुआ उस राजनैतिक खेल में आम जनता को बहुत कुछ खोना पड़ा। किस तरफ लोगों ने क्या और कितना खोया इसका अनुमान और प्रमाण दोनों ही आज इतिहास के पन्नों में कैद हैं। जिन्हें पलटना एक दुखद अनुभव से गुजरने सा है। जब भी विभाजन की बात उठती है तो एक असहनीय पीड़ा दिलो दिमाग को झकझोर देती है। 1930 से लेकर 1940 तक का ऐसा काल खंड़ है जिसमें पाकिस्तान की लालसा जिन्ना में प्रबल आकार ले रहा था। जिन्ना को लाख समझाने की कोशिश की गई, लेकिन उनका व्यक्तित्व उन सभी सुझावों को दरकिनार कर रहा था। अंततः भारत का विभाजन हुआ। इस विभाजन के दंश पर हर दशक में फिल्में, उपन्यास, कहानियां, कविताएं एवं नाटक की रचनाएं हुई। जिनमें जिन्ने लाहौर नई वेख्या ते जन्मया नई, अमृतमर आने वाला है, टेन टू पाकिस्तान, सिक्का बदल गया, और मंटो की कहानियां प्रसिद्ध हैं। इन कहानियों, उपन्यासों और फिल्मों से गुजरते हुआ एहसास होता है कि विभाजन के एक दो साल पहले और बाद में दोनों ही देशों की क्या स्थिति थी। लोग किस कदर मार काट मचा रहे थे। इसको रूपहले पर्दे पर देख कर रूह कांप जाते हैं। वहीं कहानियों- उपन्यासों के पन्नों पर एक बार फिर से 1947 की घटनाएं नाचने लगती हैं।
भारत में जिस तरह से पाकिस्तान को लेकर भावनाएं प्रबल हुईं उससे ज़रा भी कम पाकिस्तान में भारत को लेकर भावनाएं नहीं गढ़ी गईं। एक ओर आज भी पाकिस्तान भारत के जनमानस में एक शुत्र, आतंकी मुल्क के तौर पर ही छवि बनाए हुए है। वहीं पाकिस्तान में भी भारत को लेकर कोई साकारात्मक छवि नहीं गढ़ी गई। पाकिस्तान के स्कूली समाजशास्त्र की किताबों में आज भी भारत का जिक्र एक ऐसे मुल्क के तौर पर मिलता है जैसा हम अपने भारत में पाकिस्तान को लेकर पढ़ाते हैं। प्रो कृष्ण कुमार ने बड़ी ही शिद्दत से पाकिस्तान के स्कूली पाठ्य पुस्तकों का विश्लेषण मेरा देश तुम्हारा देश किताब में किया है। इस किताब को पढ़ते हुए महसूस होता है कि वहां आज भी समाजशास्त्र की पाठ्यपुस्तकें 1947 में ही अटकी हुई हैं। बेगम अनिशा किदवई की किताब हो या कमलेश्वर की कितने पाकिस्तान आज भी प्रासंगिक हैं। जिन्हें खुले मनोदशा के साथ पढ़े जाने की आवश्यकता है।
भारत का विभाजन अनिता इंदर सिंह की किताब जो नेशनल बुक टस्ट से छपी है इसे आज की तारीख में पढ़ते हुए मालूम होता है कि इतिहास में हमने यानी दोनों ही मुल्कों के राजनैतिक हस्तियों, रणनीतिकारों ने कहां कहां भूलें कीं। वह चाहे जिन्ना हों या नेहरू। कांग्रेस पार्टी हो या मुस्लिम लींग दोनों ही ओर से कई भयानक चूकें हुईं जिसका खामियाज़ा हमें विभाजन के तौर से भुगतना पड़ा है। अनिता इंदर सिंह बड़ी ही तफ्सील से विभाजन के परत को खोलती और विश्लेषित करती हैं। वहीं बलराम नंदा लिखित गांधी और उनके आलोचक जो कि सारांश प्रकाशन से प्रकाशित है इसमें भी गांधी और भारत विभाजन, अमृतसर 1919 और विभाजन पर नरसंहार आदि लेख बेहद सारगर्भित हैं। गांधी जी का अहिंसावादी रूख वास्तव में बंगाल, बिहार में आग की तरह फैल रही हिंसा, नरसंहार को रोकने में सफल रही, लेकिन भारत को विभाजित होने से बचा नहीं पाई।
आज की तारीख में विभाजन और पाकिस्तान को एक स्वतंत्र लोकतंत्रिक देश स्वीकार करना चाहिए न कि इस रूप में स्वीकार करना कि वह हमारा अविभाजित हिस्सा है। क्योंकि हम अभी भी अतीत मंे अटके हुए हैं। हमें अतीत से निकल कर आज की चुनौतियों और हालात को कबूल करना होगा। शिक्षा शास्त्र और समाजशास्त्र की आम समझ यह बताती है कि ईष्या- द्वेष की भावनाओं को कम से कम बच्चों के दिमाग में भरने की बजाय उन्हें स्वस्थ चिंतन और मानवीय बर्ताव सीखें। जिस देश में अभी भी स्कूली पाठ्य पुस्तकों में विभाजन एवं इससे जुड़े व्यक्तियों के बारे में गलत तालीम दी जा रही हो तो ऐसे में किस तरह के नागरिक पैदा होंगे इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है।
पाकिस्तान में पांच साल तक जनता की चुनी सरकार अपना कार्यकाल पूरी कर चुकी है। साथ ही उसे निर्वाचित नए राष्टपति भी मिल चुके हैं जो सितम्बर में जरदारी के बाद कार्य भार संभालेंगे ममनून हुसैन। आशा की जा रही है कि नवाज़ शरीफ सरकार भारत के साथ मैत्रीपूर्ण रिश्ते को आगे बढ़ाने में सकारात्मक कदम उठाएंगे। साथ ही ममनून हुसैर जो कि आगरा में 1940 में जन्मे हैं उनसे भारत खासकर आगरे के लोगों को काफी उम्मीद बंधी है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि ममनून हुसैन और शरीफ साहब क्या सचमुच भारत के साथ सहज रिश्ता बनाने में रूचि लेते हैं या कि यह भी आम घोषणाओं की तरह महज राजनैतिक बयान तक सीमित रह जाएगा।

Friday, August 2, 2013

बोलने की करो प्रैक्टिस



कौशलेंद्र प्रपन्न
बोलना भी एक कला है। दोस्तों के बीच बोलना और किसी प्रतियोगिता या सभा में बोलना बिल्कुल अलग बात है। जब हम दोस्तों से बातचीत कर रहे होते हैं तब हमें डर नहीं लगता। क्योंकि वहां कोई आपको जज नहीं करता। लेकिन जब बच्चे पोडियम पर खड़े होते हैं तब उन्हें हाॅल में बैठे मैडम, जज, बच्चे और बाहर के स्कूलों से आए दूसरे बच्चे भी सुन रहे होते हैं। ऐसे में कई बच्चे ठीक से नहीं बोल पाते। कुछ तो हकलाने लगते हैं तो कुछ बोलते बोलते चुप हो जाते हैं। उन्हें याद किया हुआ भाषण, कविता याद ही नहीं आती। ऐसे में बच्चे रूआंसा सा चेहरा लेकर वापस आ जाते हैं। और दूसरा बच्चा जो बेधड़क बोल कर जाता है उसे एवाड मिल जाता है।
बोलने से डरना नहीं है। बल्कि कैसे बोलना है? क्या बोलना है? किस तरह से बोलना है इसकी तैयारी तुम्हें करनी चाहिए। जो भी विषय यानी टाॅपिक मिला है उसपर मैडम, पापा, भईया या दीदी से विचार-विमर्श यानी जानकारी हासिल कर अच्छे से तैयारी करनी चाहिए।
पोडियम पर सीधे खड़ा होना ही अच्छा रहता है। दूसरी जरूरी बात यह कि तुम्हारे सामने जो बैठे या खड़े हैं उनकी आंखों में आंखें डाल कर बोलना चाहिए। इससे पता चलता रहता है कि सुनने वाले तुम्हारी बात ध्यान से सुन भी रहे हैं या नहीं। हां पता है कि जब तुम बच्चों को देखते हो तो वो तुम्हें मुंह चिढ़ाते हैं। हंसाने की कोशिश करते हैं। लेकिन तुम्हें उन लोगों को ऐसे देखना है जैसे वो कुछ नहीं कर रहे हैं। अगर एक बच्चे पर देखोगे तब मुश्किल है। इसलिए किसी भी एक पर नजरें मत टिकाना। सभी की नजरों में देखने की कोशिश करना।
जिस भी विषय पर बोलना है उसकी प्रैक्टिस घर पर, ग्राउंड में, मिरर के सामने कई बार बोल कर करना चाहिए। इससे पता चलता है कि कहां गलती हो रही है। कई बार बच्चे पाॅकेट में हाथ डालकर खड़े होते हैं तो कई अपने कपड़े, बाल ही संवारते रहते हैं। ऐसे में आपके माक्र्स कटते हैं और दूसरा जीत जाता है।
बोलते समय आपका उच्चारण बिल्कुल साफ, शुद्ध और धाराप्रवाह होनी चाहिए। आपकी प्रस्तुती कैसी है इसपर भी ध्यान दिया जाता है। इसलिए हाथों, चेहरे, बाॅडी के हाव-भाव भी जीत दिलाने में मदद करते हैं।

फोड़कर ठीकरा तुम्हारे सिर


भगवन हम फोड़कर ठीकरा तुम्हारे सिर-
कोसते रहते हैं हर पल,
तुमने अच्छा नहीं किया,
मैं क्या बिगाड़ा था किसी का,
भगवन हम हैं ऐसे ही,
कोसना और रोना अपने भाग्य पर।
जब जब हुई अनहोनी-
हमने आरोपित किया तुम्हें,
मंदिर या मस्ज़द में लड़ आते हैं हम,
गंगा में डुबकी लगा धोने को समस्त पाप,
लगाते हैं दौड़ कांवड़ लेकर,
मगर तुम तुम ठहरे।
किसी भी किस्म का रिश्वत नहीं तुम्हें कबूल-
तुम वही देते हो जो किया हमने कर्म,
ख़ामख़ा तुम करते हैं बदनाम,
हे ! प्रभू सुन रहे हो तुमत्र
मैं कोई रिश्वत नहीं दूंगा,
कोसूंगा भी नहीं,
नहीं करूंगा दर्शन तेरात्र
किसी कैलाश या अमरनाथ की यात्रा से तौबा,
करूंगा अपना कर्म तन-मन लगाकर,
तुम क्रुद्ध मत होना।
ग़र मेरे हाथ में न हो आचमन-
या कि नमाज़ भी न करूं अदा तो,
नाराज़ न होना,
अगर न किया हवन तो भी,
मेरी समिधा पहुंचा देना,
उन्हें जिन्हें दरकार है।

Friday, July 26, 2013

प्राथमिक शिक्षा की चुनौतियां
प्राथमिक शिक्षा जिन अहम चुनौतियों से गुजर रही है उन्हें मोटे तौर पर इन वर्गों में देख सकते हैं-
शिक्षकों को गैर शैक्षणिक कार्यों में लगाया, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, शिक्षकों की रिक्त पदें, दोपहर का भोजन और शिक्षक की मनः स्थिति आदि।
जहां तक गैर शैक्षणिक कार्योंं में लगाए जाने की बात है तो नूपा की रिपोर्ट की मानें तो असम में 32 फीसदी, पश्चिम बंगाल में 30 फीसदी, बिहार में 22 फीसदी, राजस्थान में 17 फीसदी आदि शिक्षकों को पूरे साल में गैर शैक्षणिक कार्यों में लगाया गया। डाईस की रिपोर्ट जो नूपा ही हर साल छापती है इस रिपोर्ट के अनुसार भी साल भर में किसी राज्य में 17 दिन, 22 दिन और 30 दिन से ज्यादा गैर शैक्षणिक कार्यों में नहीं लगाए गए।
गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तो बेचारी कहीं पिछड़ ही गई है। कुछ गैर सरकारी संस्थाओं की ओर से कराए सर्वे में पाया गया कि कक्षा 6 या 8 में पढ़ने वाले बच्चे कक्षा 1 या 2 री के स्तर के भी गणित व भाषा पढ़ने में असमर्थ हैं।
शिक्षकों के पदों सालों साल से खाली हुईं तो वो खाली ही पड़ी हैं। बिहार में तकरीबन 3 लाख, उत्तर प्रदेश में 2 लाख, झारखंड़ में 78 हजार, दिल्ली में 8 हजार पद रिक्त हैं। ऐसे में तदर्थ शिक्षकों जिसमें शिक्षा मित्र, पैरा टीचर, अनुबंध आदि पर तैनात शिक्षक पढ़ाने का काम कर रहे हैं। दिल्ली मंे ही कई प्राथमिक स्कूल ऐसे हैं जहां दो स्थाई और बाकी के सात आठ अध्यापक अनुबंध पर हैं।
दोपहर का भोजन। इसके बारे में कुछ कहना बेईमानी है। क्योंकि बिहार की घटना तो एक झलक मात्र है। ऐसी स्थिति अमूमन हर राज्य में ही है। कहीं मेढक मिलते हैं तो कहीं छिपकली। हालांकि भोजन के लोभ में काफी बच्चे स्कूल में दाखिल हुए। दाखिले की कहानी तो और भी हैं ममसलन वजीफा मिलने वाले दिन पूरी उपस्थिति होती है। बाकी दिन स्कूल ढनढन बजता है।
मनः स्थिति तो यह है कि पढ़ाने के प्रति अरूचि के शिकार शिक्षक बस एक एक दिन काट रहे हैं। ऐसी स्थिति दिल्ली सहित कई राज्यों की है। जहां पर शिक्षक पढ़ाने की बजाए शिकायतों की पोटली लिए बैठा है। बस आप सवाल करें और वे फूट पड़ते हैं। माना की स्थितियां खराब हैं लेकिन जितने दिन आप स्कूल में होते हैं क्या अपना 100 फीसदी बच्चों के देते हैं यह महत्वपूर्ण है।

Thursday, July 25, 2013


घर सा बनाओ स्कूल
स्कूल खुले तकरीबन एक महीना दिन हो चुके हैं। कैसा लगा छुट्टियों के बाद स्कूल आना। हां छुट्टियों के बाद ज़रा पढ़ाई में मन नहीं लग रहा होगा। लेकिन पढ़ाई तो करनी है। स्कूल तो जाना है। वैसे भी देश के हर बच्चे को शिक्षा पाने का हक जो मिल चुका है। तो अब 6 से 14 साल तक के सभी बच्चे स्कूल जाएं और शिक्षा हासिल करें, इसके लिए सरकार ने आपके लिए कानून जो पास कर दिया है। जिसे शिक्षा का अधिकार कानून 2009 के नाम से जानते हैं।
मगर स्कूल हैं कि आपको अपनी ओर खींचते ही नहीं। स्कूल के नाम पर तरह तरह के बहाने बनाते हैं। ताकि स्कूल न जाना पड़े। लेकिन ज़रा सोचो अगर स्कूल नहीं जाओगे तो तालीस कैसे पाओगे। स्कूल जाना तुम्हें अच्छा लगे। स्कूल तुम्हें डरावने न लगें इसलिए शिक्षा का अधिकार कानून में बताया गया है कि स्कूल को कैसे बच्चों की रूचि के अनुसार बनाया जाए।
स्कूल में खेलने के मैदान हों। लाईब्रेरी हो। आपके क्लास रूम सुंदर सजे- धजे मन मोहक हों इसके लिए भी इस कानून में निर्देश और राय दी गई है। स्कूल की दीवारें, क्लास रूम की दीवारें, पंखे, छत रंगीले हों। दीवारों पर तुम चाहो तो खुद कलाकारी कर सको। जहां बैठते हो वह जगह भी आरामदायक और मजेदार हो इसके लिए आम आगे आ सकते हो।
स्कूल हो घर जैसा कैसे बना सकते हो। हां वैसे ही जैसे घर में आप डाईंग रूम, बेड रूमको सजाते हो वैसे ही अपने स्कूल कके हर कोने, क्लास को अपनी रूचि से सजा सकते हो। आप अपनी बनाई पेंटिंग, माॅडल, चित्र आदि को क्लास रूम में लगा सकते हो।
इतना ही नहीं अगर आप कविता लिखते हो, कोई कहानी या घटना अपने दोस्तों के साथ शेयर करना चाहते हो तो उसे साफ-संुदर हैंडराईटिंग में लिख कर अपने क्लास रूम या नोटिस बोर्ड पर सजा कर चिपका सकते हो। ऐसे करोगे तो खुद को भी अच्छा लगेगा। ज़रा कर के देखो तब तुम्हे अपना स्कूल अपने घर सा लगने लगेगा।
कौशलेंद्र प्रपन्न

Thursday, July 18, 2013

अब लाश उठाएं
जिन बच्चों की जानें गईं वो तो चले गए। आंसुओं से तरबतर आंखों में न खत्म होने वाली उदासी रह गई। मां-बाप बिलबिलाते रहेंगे। राजनीति बतौर जारी रहेगी। आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला भी चलता रहेगा। कुछ सालों बाद रिपोर्ट आ भी गई तो क्या होना कुछ अन्य लोगों पर कार्यवाई होगी बाकी बेफ्रिक बाहर घूम रहे होंगे।
वैसे देखा जाए तो कितनी भी पंक्तियां लिख दी जाएं उसका न तो सरकार पर असर पड़ने वाला है और न जिन्होंने अपनी औलादें खोई हैं उन्हें सान्त्वना मिलने वाली है। बस इतना जरूर है कि हमें एक आत्मतोष मिलेगा कि हमने अपने स्तर पर कुछ तो किया।
ठीक ही तो है बिल्कुल चुप बैठ जाने से तो बेहतर है रिरियाती आवाज ही सही विरोध के स्वर उठेंगे तो किसी न किसी के कानों में टकराएगी ही। सो मौन की संस्कृति को तोड़ते हुए अपने अपने स्तर पर विरोध और लड़ाई लड़नी ही चाहिए ताकि उन बच्चों के साथ साथ उनके मां-बाप को भी महसूस हो कि वो अकेले नहीं हैं।

मिड डे भोजन ने ली फिर बच्चों की जान
एक निजी न्यूज चैनल के अनुसार बिहार में 11 बच्चों की मौत हो गई। माना जा रहा है कि 40 से ज्यादा बच्चे अस्पताल में हैं। यह पहली और आखिरी घटना नहीं है। मिड डे भोजन खाकर देश के विभिन्न राज्यों में बच्चे मौत के शिकार हो चुके हैं। सरकार है कि जागती नहीं। 
शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 और बच्चों के जुड़े मिड डे भोजन दोनों का एक सा हाल है। कहीं खीचड़ी खाकर तो कहीं रोटी और सब्जी खाकर मौत के घट तो बच्चे ही उतरते हैं। वो बच्चे जो निजी स्कूलों में नहीं जा पाते। वे बच्चे जिनके मां-बाप गैर सरकारी स्कूलांे के नखरे नहीं उठा सकते गोवा उनके बच्चे बच्चे नहीं हैं। 
सरकारी स्तर पर कितनी ही स्तर पर कमियां दिखाई देने के बावजूद यदि दुरुस्त नहीं किया जाएगा तो ऐसे बच्चों की संख्या कम होने की बजाए बढ़ेंगे ही। मिड डे भोजन परोसने वाली निजी संगठनों और भोजन मुहैया कराने वाली संस्थाएं इस जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकतीं। उन्हीं इन मौतों का जिम्मा लेना ही होगा।
गौरतलब बात है कि देश भर में मिड डे भोजन के नाम पर जिस तरह के खाद्यपदार्थ परोसे जाते हैं वो किसी भी कोण से पौष्टिकता के निकष पर खरे नहीं उतरते। इन पंक्तियों के लेखक ने उत्तर प्रदेश, अंध्र प्रदेश, बिहार आदि राज्यों के दौरे के दरमियान पाया कि रोटी अधपकी, सब्जी के नाम पर चने या न्यूटीनेगेट के पनीली सब्जियां परोसी जताती हैं। यू ंतो स्कूल के प्रांगण में कई जगह हप्ते भर के भोजन की सारणी दिखाई देगी कि फलां दिन पूरी-खीर, खीचड़ी, रोटी दाल, आदि मिलेंगी। लेकिन हकीकत बच्चे बताते हैं कि उन्हें क्या मिलता है। जिस जगह पर कुत्ते गस्त मार रहे हों वहीं पास में रोटी भी पक रही हो तो ऐसे में स्वच्छता का अंदाजा लगाया जा सकता है।
बेहतर हो कि या तो मिड डे भोजन पकना बंद हो या उसकी गुणवत्ता एवं पकने की प्रक्रिया पर खास नजर रखा जाए।

Friday, July 12, 2013



फेसबुक का काव्य संसार

कौन कहता है साहित्य मर रहा है। साहित्य लेखक व पाठक नहीं रहे। ग़लत आरोप है। यह अलग बात है कि जिस तरह के साहित्य की अपेक्षा एक मंजे हुए लेखक समूह से की जाती है वह नदारत है। नदारत इसलिए क्योंकि आज जिस तरह की साहित्य देखने पढ़ने को मिलता है वह आत्ममुग्धता से ग्रस्त है। स्वप्रकटकरण के व्यामोह से लबरेज़ है। काव्य सृजन जितना कठिन कर्म है उतना ही आसान भी। मन के भावों को प्रकट करने में अब महज लय का ध्यान रखना काफी माना जाता है। जिसे नामवर सिंह जैसे आलोचक मानते हैं कि छनद मुक्ति का आशय लय मुक्ति नहीं है। कोई भी कविता छनद मुक्त तो हो सकती है लय मुक्त नहीं। तो इसकी बानगी फेसबंक पर बहुतायत मात्रा में मिलती है। देश के कोने कोने से हिन्दी भाषा, अहिन्दी भाषी सब कविता लिखने में लगे हैं।
कविता व काव्य साहित्य का एक अंग है। संपूर्ण साहित्य कहना अनुचित होगा। पद्य और गद्य। कविता पद्य के पाले मंे बैठती है। कविता के प्राचीन और आधुनिक दोनों ही रूपों से हम बचपन से वाकिफ हैं। बचपन में पाठ्यपुस्तकों में शामिल भवानी प्रसाद मिश्र, सुभद्रा कुमारी चैहान, महादेवी वर्मा, निराला, नागार्जुन आदि से लेकर बच्चन जी की कविताओं का आस्वाद लिया है। तब से काव्य के प्रति एक अनुराग हम सब को रहा है। यह अलग बात है कि पाठ्य पुस्तकों में शामिल कविताओं को पढ़ने की मजबूरीवश पढ़ना पड़ता था। उसकी व्याख्या करनी पड़ती थी। लेकिन, तब बोझ लगने वाली कविताएं बड़े होने पर अपने व्यापक अर्थ गाम्भीर्यता से खुलने लगीं। तुलसी या सूर या फिर कबीर को पढ़ते वक्त लगता था क्या कठिन कविता है। कैसी भाषा है। अब नाहि रहिहों इसि देस गोंसाईं। जैसी भाषा को पढ़ते वक्त कोफ्त होती थी। लेकिन अब उन्हीं भाषिक छटाओं को देख देख, पढ़ पढ़ कर गौरव महसूस होता है कि उन्हीं भाषाओं में ब्रज, मागधी, अवधी, भोजपुरी की व्यापक छटाएं खुल कर खिलती थीं।
सूर तुलसी, कबीर या घनानंद, जायसी को पढ़ना ठीक वैसी ही अनुभूति से भर जाना है जैसे कोई कालीदास, भवभूति, दंड़ी को पढ़ने में मिलता है। जहां संस्कृत के इन विद्धान कवियांे, नाटककारों ने अपनी प्रतिभा का निदर्शन कराया वहीं हिन्दी में भी रीति काल भक्ति काल से होते हुए आधुनिक काल की कविताएं पढ़ते सुनते हुए महसूस की जा सकती हैं। जहां न केवल सांैदर्य वर्णन मिलते हैं बल्कि अन्य रसों का का स्वाद भी चखने को मिलता है। जहां घनानंद, जायसी प्रेम पूर्ण कविताएं लिखते हैं वहीं प्रकारांतर से राजनीति, प्रकृति, धर्म, समाज एवं अर्थ की भी स्थिति भी हमारे सामने खुलती है।
फेसबुक पर कविताओं की रचनाएं खूब देखी जा सकती हैं। रोज दिन सृजित कविताओं को फेसबुक पर पाठकों ‘‘ फ्रैंड लिस्ट में शामिल’’ के बीच परोस कर एक खुशी से भर उठना कि देखिए, पढि़ए और सराहिए कैसे कविता है। दरअसल वे कविताएं प्रेम रस में पगी होती हैं। तुकबंदी प्रधान ये कविताएं क्षणिक आवेश में लिखी चार पांच लाइन की कविताएं बहुत दूरगामी नहीं होतीं। दूरगामी से मतलब है लंबी आयु वाली। कितना अच्छा हो कि जिस तरह फेसबुक पर कविताओं की नदी बहा करती है उस अनुपात में कम ही सही कुछ अच्छी आलोचनाएं, समीक्षाएं लिखी जाए तो अच्छा हो।

Tuesday, July 9, 2013


परीक्षा बड़ ठगनी हम जानी
-कौशलेंद्र प्रपन्न
यूं तो ‘माया बड़ ठगनी हम जानी’ माया के बारे में कहा गया है, लेकिन शिक्षा की दुनिया में परीक्षा किसी माया से किसी भी कोण से कमतर नहीं है। परीक्षा लुभाती है। परीक्षा डराती है। और परीक्षा ही है जो किशोरों और युवाओं की जान भी लेती है। बल्कि कहना चाहिए कि पिछले दस सालों में हमारे  नवनिहालों की जान ले चुकी है। जिन जानों की एफआईआर हुईं वो आंकड़े चीख-चीखकर बताती हैं कि आज की तारीख में परीक्षा मौत के समकक्ष खड़ी हो चुकी है। परीक्षा के चरित्र पर नजर डालें तो नचिकेता को भी परीक्षा की घड़ी को पार करना पड़ा था। वैदिक काल हो या महाकाव्य काल इस समय में भी परीक्षा वजूद में मिलती है। लेकिन आज की परीक्षा और तब की परीक्षा की प्रकृति में बुनियादी अंतर यह था कि उस समय की परीक्षा छात्रों की ज्ञान, समझ, कौशल और सर्वांगीण विकास को परीक्षित करती थीं। साथ ही श्रुति परंपरा में शास्त्रार्थ के जरिए ज्ञान की परीक्षा होती थी। द्रोणाचार्य का पांड़वों की परीक्षा लेना हो या राम की परीक्षा भी समझ और अर्जित ज्ञान का इस्तेमाल व्यवहार की कसौटी पर करने में लिया जाता था। उस समय की परीक्षाएं अंकों, ग्रेड़ों पर आधारित नहीं थीं बल्कि वे परीक्षाएं छात्रों की पठित और स्मृत ज्ञान का व्यावहारिक जीवन में इस्तेमाल पर केंद्रीत हुआ करता था।
समय और समाज की चुनौतियों के आगे परीक्षा की प्रकृति अपना स्वरूप बदलती चली गई। साल का फरवरी-मार्च ख़ासकर 10 वीं और 12 वीं क्लास में पढ़ने वालों की जिंदगी को जीवन-मृत्यु तुल्य दो पाटों में बांट देती है। परीक्षा में बैठने वालों के दिमाग में अभिभावकों और अध्यापकों की ओर से बड़ी चतुराई और ढीठता से ठूंसी जाती है कि यही वो देहरी है जहां से जिंदगी के व्यापक रास्ते खुलते हैं। यदि विफल हुए तो जीवन भर खुद को मांफ नहीं कर पाओगे। न केवल खुद की, बल्कि मां-बाप की आशाओं, उम्मीदों को मटियामेट कर दोगो। परीक्षा देने वाले इन्हीं उम्मीदों, आशाओं और हिदायतों की परतों के साथ विषय की पेचिंदगियों को सहते हुए परीक्षा में बैठते हैं।
परीक्षा को भयावह और मार्केटेबल भी बनाने का चलन देखने में आता है। तकरीबन जनवरी और फरवरी के महिनों में विभिन्न संचार माध्यमों में परीक्षा के बरक्स एक युद्ध सा माहौल बनाया जाता है। परीक्षा न हुआ गोया युद्ध की आशंका से अस्त्र-शस्त्र, तीर-कमान आदि की सफाई संजाई शुरू हो जाती है। उसी तरह से परीक्षा से पहले इतना सोएं, इतना पढ़ें, यह न करें, वह न करें। कोई- कहीं ज्योतिषी तो कहीं मनोचिकित्सक, कहीं डाॅक्टर या फिर विषय विशेषज्ञों के पाचक बांटने तेज हो जाते हैं। बड़ी ही चिंताजनक बात है कि पहले तो अभिभावकों और अध्यापकों की तरफ से पेट में दर्द पैदा की जाती है फिर मर्ज बढ़ाकर चुरनें बांटीं जाती हैं। कितना बेहतर होता कि दर्द ही न पैदा हो इसकी कोशिश की जाती।
कुछ नवाचारी स्कूल हैं मसलन बोध शिक्षा समिति और अरविंद आश्रम में स्थित मिरांबिका जहां किसी भी कक्षा में परीक्षाएं नहीं होतीं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं निकालना चाहिए कि वहां बच्चे कैसे अलगी कक्षा में जाते हैं? तथाकथित सालाना व मासिक परीक्षाएं नहीं होतीं। वहां सतत् मूल्यांकन को अपनाया जाता है। बच्चों की समझ, बौद्धिक स्तर, रूचि आदि के अनुसार विषय पढ़ाए जाते हैं। जिस विषय में बच्चे की जिस स्तर की समझ और क्षमता है उसे उसी स्तर की शिक्षा दी जाती है। दूसरे शब्दों में कहें तो इन स्थानों पर पुस्तकीय ज्ञान को रोचक और गतिविधि से जोड़कर बच्चों के साथ साझा किया जाता है।  
नेशनल करिकूलम फे्रमवर्क 2005 बच्चों को रटे रटाए तथ्यों को यथावत् उत्तर पुस्तिका पर उगलने के खिलाफ अपनी सिफारिशे दे चुकी है। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए एनसीइआरटी की किताबें बनाई गईं। उन किताबों में सवालों की प्रकृति को बदला गया। यहां तक कि अध्यापकों की ओर से गतिविधियां कराने की भी गुंजाईश पैदा की गई। लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि आज भी बच्चे परीक्षा से उतने ही डरते और मरते हैं जितने 2000 के आस-पास अपनी जान दिया करते थे। बल्कि आंकड़े तो घटने की बजाए बढ़े ही हैं। स्कूल स्तर से लेकर काॅलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर दाखिले के लिए छात्रों को परीक्षा के द्वार को पार करने पड़ते हैं। लेकिन जिस संख्या में रिजल्ट से हताश होकर आत्महतया करने की प्रवृत्ति 10 वीं और 12 वीं कक्षाओं में देखी जाती हैं। उतनी अन्य स्तर की परीक्षाओं में नहीं। शिक्षा से संबद्ध विभिन्न निकायों को इस मुहाने को दुरुस्त करना होगा जहां पर हमारे भविष्य के पौध दम तोड़ देते हैं। परीक्षा को डरावनी छवि से निजात दिलाना होगा।

एकांत में नहाते हुए
वो जब नहा रही थी उसी वक्त जीजा झांक रहा  था। कुछ उसके गिले बदन को देख देख कर अपने भाग्य को कोसता जीजा सोच रहा था कि मुझे क्यों नहीं मिली ऐसी संुदर बदना। कि तभी दीवार से कुछ खिसका और उसके आभास हुआ कि कोई है जो झांक रहा है।
झांक रहा है उसे एकांत में नहाते हुए। कोई कौन हो सकता है? घर में केवल दीदी और जीजा ही तो हैं। दीदी देख नहीं सकती। फिर वह दूसरा कौन है। सहज ही था दूसरा कोई और नहीं उसका जीजा ही था। उसने इस वाक्या को दबा दिया कि कहीं दीदी के घर में बवाल न हो जाए। कहीं इसका खामियाजा दीदी को न भुगतना पड़े।
बात आई गई हो गई। लेकिन बात तो बात थी नहीं। वह एक घटना बिन सोचे नहीं घटित नहीं हुई थी। सो एक बार फिर घटित हुई। लेकिन इस बार घर भी उसी का था और बार्थरूम भी। बस झांकने वाला व्यक्ति एक ही था। इस बार उसने विरोध का जोखि़म उठाना ही बेहतर समझा।
वैसे उसका पति कब का दूसरी लड़की के प्रेम में जा चुका था। ले देकर एक अपंग लड़का साथ था। शायद यही वो सहजता और सकून था उसके जीजा की नजर में। सो बाज नहीं आता। जबकि उसके भी जवान बेटी थी और बेटा भी। इस बार उसने सब के सामने यह बात रखने की हिम्मत जुटाई।


बहार ए बाहर
कभी सोचा भी नहीं होगा कि कल जब वो आॅफिस आएंगे तो उनका एसेस राइट छीन ली जाएगी। वो कम्प्यूटर नहीं खोल सकते। गेट से अंदर आने के बाद सब कुछ बदला बदला होगा। साथ काम करने वाले भी उनसे मंुह चुराएंगे। उनकी गलती क्या थी इस पर कोई खुल कर बोलेगा भी नहीं। सब तरफ ख़ामोशी और शांति पसरी होगी। सब को इसका डर सता रहा होगा कि कहीं बात करते कोई नोटिस न कर ले। 
दुनिया भर में 2008 में मंदी के दौरान इस तरह की घटनाएं आम देखी जा रही थीं। रातों रात लोगों के हाथ से नौकरी यूं फिसल रही थी जैसे रेत हो मुट्ठी में। रात काम कर के गए सुबह बे नौकरी हो गए। किसको क्या बताएं। कि घर जल्दी क्यों आ गया वो। 
2008 ही नहीं बल्कि कई कंपनियों में आज भी यह मंजर देखा जा सकता है। कोई कैसे रोतों रात सड़क पर आ जाता है इसका उसे इल्म तक नहीं होता। घर बाहर हर जगह उससे कई सवाल करती आंखें घूरने लगती हैं। न घर में चैन से रह पाता है और न बाहर।
ऐसे में कई लोगों के मधुर प्रणय संबंध खटाई में मिल गए। जो जोड़े शादी के लिए तैयार थे उसपर स्थगन के ग्रहण लग गए। होस्पिटल में किसिम किसिम के बीमार लोग आने लगे। दांत का दर्द। सिर में दर्द। खीझ, चिड़चिड़ापन। गुस्सा आदि इससे सेहद तो खराब हुई ही साथ ही कई रिश्ते दूर चले गए। छः छः माह या साल भर तक लोग तमाम नेटवर्क तलाशते रहे नौकरी के लिए। लेकिन एक टीस एक भूत कि आपको तो निकाला गया था उनका पीछे नहीं छोड़ते थे।
निकाले गए लोगों पर म्ंादी के व्यापक प्रभाव एवं दुष्परिणामों पर सही मायने में न विश्लेषण हुआ और न ही विमर्श ही। अखबारों, मीडिया एवं आम मंचों पर इस मुद्दे पर चर्चा भी गोया सेंसर के शिकार हो गए थे। अखबारों में तो खास कर चेतावनी दी गई थी कि मंदी और इससे जुड़े मामले अखबारों में नहीं दिखने चाहिए। सो नहीं दिखा। दृश्य माध्यमों पर भी इससे जुड़ी ख़बरें नदारत रहीं।
विभिन्न कंपनियों ने मंदी की आड में जम कर कत्ल ए आम मचाया। जिसमें कई निर्दोष जानें भी स्वाहा हो गईं। उन्हें संभलने में साल लग गए। किन्तु यह खेल अभी थमा नहीं है। कंपनी को घाटे से बचाने के तर्क पर यह खेल बतौर जारी है। ऐसे में जान तो कमजोर, असहायों की ही जाती है। जो ‘करीब’ होते हैं उन्हें एक खरोच तक नहीं आती।
ऐसे लाखों कामगरों के लिए सहानुभूत रखना कहां का गुनाह है। और यदि हमसे बन पड़े तो उनकी मदद करना किसी आपदा से प्रभावित पीडि़त की जान बचाने से कम नहीं है।
बोध गया और लाहौरः दर्द एक सा
इधर बोध गया में धमाका उधर लाहौर में भी। इधर मरने वालों की संख्या कम उधर 20 से भी ज्यादा। ख़ून दोनों ही जगह। दोनों ही जमीन पर आतंकी हमला। न वो सुरक्षित और न हम। 
सच है। लाहौर में बाजार था उनके निशाने पर और यहां मंदिर। एक शांति स्थल तो दूसरा भोजन स्थल। शाम में लोग घरों से निकल कर विभिन्न तरह के व्यंजन खाने आए थे। वहीं वहां मन की शांति की तलाश मंे। एक ओर क्षुधा तृप्ति थी तो दूसरी ओर मानसिक। 
उनके लिए दोनांे ही जगह एक समान। सिर्फ और सिर्फ लोग। जिनके बीच दहशत खौफ पैदा करना और खून बहाना मकसद था। जो उन्होंने किया। कत्ल, खून, आतंक न बौद्ध को स्वीकार है और न इस्लाम को। लेकिन ऐसे लोग तमाम धर्माें, संप्रदायों और वादों ने परे अपने ही दर्शन पर चलते हैं। जो चीख, हत्या, ख़ून आदि की ही भाषा बोलता, समझता है। 
या ख़ूदा उन्हें सही इल्म दे।

Sunday, June 16, 2013

पिता मेरे गुरु भी रहे
स्कूल में मेरे पिता क्लास टीचर भी थे। उन्होंने एक अध्यापक और पिता दोनों की भूमिका एक साथ निभाई। क्लास में पिटाई भी खाया और घर पर भी। घर से स्कूल के दरमियान रास्ते भर मुझे वाक्य संरचना, शब्दों और भाषा की दुनिया से परिचय कराते चलते।
भाषा के प्रति रूझान, साहित्य एवं जीवन दर्शन से रू ब रू कराया। उनसे सीखने को बहुत था मगर काफी कुछ छूट गया। जब मैं छोटा था तब अक्सर वो कहा करते थे, मेरी लंगोटी पर तो मेरे बच्चों का अधिकार है लेकिन मेरी ज्ञान संपदा पर नहीं। कितना मुझ से ले सकते हैं, यह उनकी क्षमता पर निर्भर करता है।
पिताजी से भाषा की शुद्धता, जीवन दर्शन और पढ़ाई की महत्ता की तालीम मिली। कई बार उनकी कविता को गुनगुनाते हुए पिताजी को याद कर लिया करता हूं। जब कभी उन्हीं की कविता जो उन्हें अब याद नहीं, गा कर सुनाता हूं तो अंदर तक गदगद हो जाते हैं। उनकी खुशी देख मन आनंदित हो जाता है।  

Wednesday, June 12, 2013

मार्केट @11
नाम बेशक अलग मिल सकते हैं लेकिन आशय, उद्देश्य एक ही है वो यह कि कम दाम में सब्जियां मिल जाएं। जाते जाते दुकानदार अपनी सब्जियां कम दामों में बेच कर घर जाना चाहता है और इसी का फायदा ख़रीद्दार उठाता है।
दिल्ली में विभिन्न इलाकों में अलग-अलग दिन के नाम पर ही बाजार के नाम है। मसलन सोम बाजार, वीर बाजार, रवि बाजार, शुक्र बजार आदि। हर हप्ते के नाम पर बाजार। दिल्ली के बाहर भी ऐसे बाजारों को देख सकते हैं।
हरिद्वार में पीठ नाम है ऐसे बाजारों का। कहीं हाट तो कहीं मीना बाजार। हर बाजार में भीड़ वही, दुकानदारों के साथ मोल भाव करते ग्राहक और ताम-झाम।
दिल्ली में अमूमन अब लोग ऐसे बाजार में रात 11 बजे ज्यादा जाना पसंद करते हैं। क्योंकि इस समय दुकानदार अपनी दुकान बढ़ाकर घर जाना चाहता है। तो जाहिर है जैसे-तैसे सामानांे को बेच कर फारिक होना चाहता है। और इसी का फायदा उठाने वाले रात 11 बजे के आस पास बाजार आया करते हैं। हालत यह होती है कि इस समय भीड़ टकरा रही होती हैं।

Thursday, June 6, 2013

जि़या के ग़म में 12 साला लड़का भी उसी के राह पर
कौन कहता है कि बच्चों में संवेदना नहीं होती। बच्चे खाली स्लेट होते हैं। जो चाहो लिख दो। पढ़ा दो। जि़या ख़ान की आत्महत्या की घटना से हताहत एक 12 वर्षीय बच्चा जो 5 वीं कक्षा में पढ़ता था उसने आत्महत्या कर ली। यह घटना राजस्थान की है।
एक कहानी हरिसुमन विष्ट जी की है जिसमें जो जिक्र करते हैं कि किस तरह विज्ञापनों के होडिंग्स बच्चों के लिए मौत के रास्ते बन कर आते हैं। सच भी है विज्ञापनों, फिल्मी चक्कर में तो अच्छे-अच्छे दिमागदार लोग पड़ जाते हैं तो वह तो महज 12 साला बच्चा ठहरा।
क्या उसे जि़या से प्रेम था? क्या वह उससे शादी करना चाहता था? क्या वह जि़या को सपने में रोज देखा करता था? ये सवाल अब तो उसी के संग चले गए। तमाम सवाल अनुत्तरित। लेकिन हम नागर समाज के सामने वह बच्चा एक बड़ा सवाल जरूर छोड़ गया कि हम नागर समाज में बच्चे किस तरह पल-बढ़ रहे हैं। पर्दे की दुनिया और हकीकत की दुनिया में हम बुनियादी अंतर समझा पाने में कहीं न कहीं विफल हो रहे हैं।

Wednesday, June 5, 2013

पढ़ाने की छटपटाहट

-कौशलेद्र प्रपन्न
शिक्षक जाति में सभी निराश एवं हताश ही हैं ऐसा कहना एक तरह से शिक्षकीय प्रजाति के साथ सरलीकरण होगा और ग़लत भी। यह तो हर व्यवसाय में होता है। सभी अपने धंधे से संतुष्ट हों ऐसा न तो संभव है और न ही हकीकत ही। असंतोष की भावना हर व्यवसाय में देखी जाती है। लेकिन उन्हीं के बीच कुछ फीसदी ऐसे भी कर्मी होते हैं जिन्हें अपने व्यवसाय की निष्ठा, जिम्मेदारी का भरपूर ख़्याल रहता है। लेकिन अनुभव बताते हैं कि उदास मना शिक्षकों की संख्या ज्यादा है। अध्यापक वर्ग की निराशा के पीछे कई बार गैर शैक्षणिक कार्यों, नीतिगत एकरूपता एवं व्यावहारिक न होना भी पाया जाता है। यह कहना उचित नहीं होगा कि पूरा का पूरा शिक्षक समुदाय निराश एवं अरूचि के शिकार हो चुके हैं। इन दिनों छुट्टियों में दिल्ली सरकार के शिक्षा विभाग ‘इन सर्विस’ प्रशिक्षण कार्यशालाएं आयोजित कर रही हैं। इन कार्यशालाओं में जीवन कौशल, संप्रेषणीयता, पाठ्यक्रम, सुरूचिपूर्ण कक्षा अध्यापन, सृजनात्मक लेखन, शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 आदि पर विशेष प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इसके पीछे उद्देश्य यही है कि अध्यापक/अध्यापिकाएं अपनी दक्षता में वृद्धि कर सकें और स्कूल खुलने पर कक्षा में इस्तेमाल कर सकें। इसका लाभ सीधे-सीधे बच्चों को मिल सके। इन पंक्तियों के लेखक को इस कार्यशाला में शिक्षा का अधिकार अधिनियम, जीवन कौशल और सृजनात्मक लेखन पर बातचीत करने का अवसर मिला। तकरीबन 2000 से भी अधिक अध्यापक/अध्यापिकाओं से रू ब रू होने के बाद जो हकीकत सामने आई वह यह कि अध्यापक वर्ग बेहद निराश एवं उदास हैं। उनकी उदासी, निराशा का कारण प्रशासनिक एवं नीतिगत स्तर पर थीं। मसलन शिक्षा के अधिकार अधिनियम बनाते वक्त अध्यापकों की राय क्यों नहीं ली गई। नीति-निर्माताओं को भी कभी कक्षा में पढ़ाने आना चाहिए ताकि वो देख सकें कि कैसे  एक कक्षा में 60, 80 से भी ज्यादा बच्चों को एक अध्यापक पढ़ाता है व पढ़ा सकता है।
इस तरह की शिकायतें, रोष, असंतोष से तकरीबन हर क्लास में दो चार होना पड़ा। लेकिन इन्हीं निराशाओं के बीच कुछ ऐसे अध्यापक/अध्यापिकाएं भी मिलीं जिन्हें कक्षा में न पढ़ा पाने का मलाल भी साल रहा था। उनका कहना था मैं पढ़ाना चाहती हूं। लेकिन पिछले एक साल से क़ागजी कामों में उलझी हुई हूं। कई बार लगता है आई तो पढ़ाने थी, लेकिन यह क्या कर रही हूं। वहीं एक मास्टर जी ने भी अपनी व्यथा बयां की कि मैं कक्षा में पढ़ाने डूब जाता हूं। बच्चे आनंद लेकर पढ़ाता हूं। लेकिन अक्सर हेटमास्टर साहब की बुलालट आ जाती है और मेरा अध्यापन बीच में ही ठहर जाता है।
संवाद के दौरान एक पूर्व कथित वाक्य ‘तो क्या निराश हुआ जाए’ का सहारा लिया और कोशिश की कि बात सकारात्मक राह पर आ जाए। इस वाक्य को सुन कर तकरीबन बीस एक अध्यापकों ने एक स्वर में कहा, नहीं। निराश होने की आवश्यकता नहीं। हां यही वाक्य उस वक्त सहारा बना जब कक्षा में संवाद कर रहा था। उनके सवाल, उनकी चिंता, उनकी खीझ, उनकी बेचैनी को सुनते वक्त कुछ पल के लिए लगा मैंने उनके दुखते रगों पर हाथ धर दिया। उनकी पीर थोड़ी और दर्दीली हो गई। लेकिन अपनी पीड़ा कह चुकने के बाद सभी बड़े खुश और राहत महसूस रहे थे। बल्कि एक महिला ने कहा भी कि आपसे अपना दर्द साझा कर बहुत अच्छा लग रहा है। वरना हमारी बात सुनता ही कौन है। दो दो घंटे के सत्र में कई बार ऐसा भी वक्त आया जब मैंने ख़ुद को असहाय अनुभव किया। क्योंकि कई बार उनकी बात सोलहो आने सच थीं, मगर मैं भी कुछ दिलासों, राहत एवं उम्मीद की रोशनी बांटने के सिवा कुछ और नहीं कर सकता था। सच मायने में यदि यह वर्ग निराश या हताश है तो इसे गंभीरता से लेने की आवश्यकता है। क्योंकि इन्हीं के कंधों पर हमारे बच्चे बैठे हैं। ये जैसी दुनिया दिखाएंगे बच्चे संभवतः वैसी ही दुनिया देखेंगे। सरकार गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की बात करती है लेकिन हमारा अधिकांश वक्त कागजी कामों को अंजाम देने में बीत जाता है आदि।
अध्यापकों के बीच इस तरह की निराशा के माहौल को हमें सहजता से नहीं लेनी चाहिए। क्योंकि यदि अध्यापक वर्ग इतना निराश एवं हताश होगा तो इसका प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष असर बच्चों पर पड़ेगा इससे इंकार नहीं कर सकते। यूं तो बतौर दस्तावेज आरटीई एक्ट 2009 बेहद संभावनाओं को संजोए हुए है, लेकिन जमीनी हकीकत पर यह फेल होती दिखाई दे रही है। एक ओर बेहतर स्कूली ढ़ांचा, पेयजल, बच्चों के नामांकन, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की सिफारिश करता है वहीं सरकारी स्कूलों में इन मापदंड़ों पर अधिकांश फिसलन दिखाई दे रही है। जहां तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की बात करें तो गैर सरकारी संस्थाओं की ओर से जारी रिपोर्ट दूसरी ही तस्वीर पेश करते हैं। इस तस्वीर में कक्षा 6,7 में पढ़ने वाला बच्चा कक्षा 1 ली के जोड़ घटाव, लिखित वाक्य पढ़ने में असमर्थ हैं। इसके पीछे अध्यापक वर्ग का अपना तर्क है कि जब से किसी भी बच्चे को फेल नहीं कर सकते। कक्षा 8 वीं तक हर बच्चे को अगली कक्षा में भेजना ही है, किसी भी बच्चे का नाम नहीं काट सकते आदि कुछ ऐसे पहलू हैं जहां बच्चों में पढ़ने की ललक और उत्साह कम ही हुआ है। तर्क तो यह भी दिए जा रहे हैं कि मां-बाप कई बार खुद अनुरोध करते हैं कि बच्चे को वर्तमान कक्षा में ही रोक लो। क्योंकि इसे अभी इस स्तर की तालीम ही नहीं मिली है कि वो अगली कक्षा में जाए। लेकिन अध्यापकों का मानना है कि वो नियमतः मजबूर हैं। किसी भी बच्चे को कक्षा में नहीं रोक सकते। लेकिन इन्हीं कक्षाओं में पढ़ाने की लालसा छटपटाते शिक्षक/शिक्षिकाएं भी मिलीं जिससे महसूस हुआ कि उम्मीद की रोशनी और सांस लेने की छटपटाहट अभी इनमें शेष है। इसीलिए जि़ंदा हैं। जब तक ऐसे अध्यापक समाज में हैं तब तक उम्मीद पूरी तरह से ख़त्म नहीं मानी जा सकती।

Wednesday, May 22, 2013

तो क्या निराश हुआ जाए
इस वाक्य को सुन कर तकरीबन बीस एक अध्यापकों ने एक स्वर में कहा नहीं। निराश होने की आवश्यकता नहीं। हां यही वाक्य उस वक्त सहारा बना जब कक्षा में संवाद कर रहा था। उनके सवाल, उनकी चिंता, उनकी खीझ, उनकी बेचैनी को सुनते वक्त कुछ पल के लिए लगा मैं उनके दुखते रगों पर हाथ धर दिया। उनकी पीर थोड़ी और दर्दीली हो गई। लेकिन अपनी पीड़ा कह चुकने के बाद सभी बड़े खुश और राहत महसूस रहे थे। बल्कि एक महिला ने कहा भी कि आपसे अपना दर्द साझा कर बहुत अच्छा लग रहा है। वरना हमारी बात सुनता ही कौन है।
दो दो घंटे के सत्र में कई बार ऐसा भी वक्त आया जब मैं ख़ुद को असहाय अनुभव किया। क्योंकि कई बार उनकी बात सोलहो आने सच थे मगर मैं भी कुछ दिलासों, राहत एवं उम्मीद की रोशनी बांटने के सिवा कुछ और नहीं कर सकता था।
सच मायने में यदि यह वर्ग निराश या हताश है तो इसे गंभीरता से लेने की आवश्यकता है। क्योंकि इन्हीं के कंधों पर हमारे बच्चे बैठे हैं। ये जैसी दुनिया दिखाएंगे बच्चे संभवतः वैसी ही दुनिया देखेंगे।
फिल्म और बच्चों की दुनिया

‘लकड़ी की काठी काठी पे घोड़ा घोड़े के दुम पे जो मारा हथैाड़ा दौड़ा दौड़ा....’खिलखिलाती अपनी धुन में गाती गुनगुनाती लड़की आज भी इस गाने को सुनते आंखों के आगे घूमने लगती है। वहीं एक दूसरे गाने के बोल उधार लेकर कहूं ‘मां मां मां सुनाओ मुझे वो कहानी जिसमें राजा न हो ना हो रानी...जहां परियां हों आसमानी...’इन गानों की मदद से आगे बढ़ता हूं। इन गानों में समय के साथ साथ बच्चों की मांगों, भूमिकाओं में बदलाव तो आए ही हैं साथ ही बच्चे ज्यादा मुखरता से अपनी दुनिया की झलक देते हैं। वहीं एक ऐसा बच्चा हमारा ध्यान अपनी ओर कुछ इस तरह खींचता है-‘बादल आवारा था वो कहां गया उसे ढूढ़ोंकृहर इक पल का जश्न मनता..’ यह गाना और फिल्म तारे जमीं पर बच्चों की बदहाल स्थिति से रू ब रू कराती है। हर बच्चा खास होता है और बच्चे की अपनी दुनिया। बच्चे की इस दुनिया को हम वयस्क कितनी गंभीरता से लेते हैं इसकी झांकी समय समय पर फिल्मों में मिलती हैं। लेकिन अफसोस की ज्यादा तर फिल्मों में बच्चों का इस्तेमाल महज खाली स्पेस को हलका करने व तलाक जैसे दर्दीले वक्त में लड़ाई के सूत्र के रूप में किए जाते हैं। बहरहाल बच्चों को फिल्मों में किन किन छवियों में कैद किए जाते हैं इसकी पड़ताल जरूरी है। क्योंकि इस तथ्य से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि कुछ फिल्मों ने बच्चों को लेकर अच्छा और धारदार बहस की शुरुआत की। बच्चों की समस्याओं को लेकर सरकार, न्यायपालिका, जनसमुदाय में एक जागरूकता भी आई।
फिल्मों से समाज का रिश्ता लंबा और काफी करीब का रहा है। कहते हैं कि फिल्मों में वही प्रतिबिंबित किया जाता है जो समाज में घटता है व घट रहा है। इसीलिए फिल्म को समाज का दपर्ण भी कहा गया है। इसमें ज़रा भी अतिशयोक्ति नहीं है। उदाहरण देखने निकलें तो कई फिल्मों की एक लंबी सूची बन सकती है जिसमें समाज, इतिहास, संस्कृति, भाषा आदि की तत्कालीन करवटें, दर्द-पीर साफ सुने-देखे जा सकते हैं। सचपूछें तो हिन्दी सिनेमा में कई फिल्में बड़े प्रसिद्ध उपन्यास, कहानी पर आधृत रहे हैं और उनका महत्व आज भी कम नहीं हुआ है। पथेर पांचाली, हजार चैरासी की मां, पींजर, पीली छतरी वाली लड़की आदि। जैसा कि पहले भी निवेदन किया जा चुका कि फिल्मों की सूची लंबी हो सकती है। इसलिए यहां सूची बनाने की बजाए उन फिल्मों व दूसरे शब्दों में कहें तो फिल्मों की बुनावट में बच्चा-समाज कहां ज़ज्ब है, उसकी पहचान की जाए। किन्तु यहां स्पष्ट कर देना प्रासंगिक होगा कि आलेख में हम फिल्म और बच्चे के द्वैत की गुत्थी को सुलझाने की कोशिश करेंगे। क्योंकि बच्चे हमारे समाज के वो दलित, उपेक्षित वर्ग हैं , बल्कि हैं भी, की पहचान फिल्मों में की जाए। इसी मनसा से हिन्दी फिल्मों में बच्चे किस रूप, व्यक्तित्व, रंग एवं भूमिका के साथ इस्तेमाल किए जाते रहे हैं, इसपर विमर्श करना है। यहां यह भी स्पष्ट कर देना अप्रासंगिक नहीं होगा कि दुनिया के हर बच्चे को 0 से 18 आयु वर्ग को वो तमाम अधिकार प्राप्त हैं जो एक आम नागरिक को संविधान प्रदान करता है। किन्तु अफसोस की बात यही है कि इन सांवैधानिक प्रावधानों के बावजूद बच्चे हमारे समाज की मुख्यधारा से अलग-थलग नजर आते हैं। उस पर तुर्रा यह कि फिल्म निर्माताओं, निर्देशकों के तर्क यह होते हैं कि दर्शक यही देखना चाहता है। यह पूरा सच नहीं है। समाज की धड़कनों, करवटों, छटपटाहटों को एक व्यापक फलक पर लाना और एक वृहद् विमर्श खड़ा करना भी फिल्म का सरोकार है।
अपना शहर और वो नदी
हां सही कह रहा हूं अपना शहर छूट कर भी नहीं छूटता। वो नदी सूखकर भी नहीं सूखती जिसकी कभी लबालब पानी भरा रहता था। पानी के सूखने के बाद भी रेत पर दौड़ते कुछ दूर तक जाना और पानी की आस में घूटने भर पानी में छप छप करना कहां छूट पाता है। न शहर छूटता है और न नदी।
एक नदी हम सब के अंदर बहा करती है। जिसका पानी साफ निर्मल और पारदर्शी होता है। मगर समय के साथ हमने उसको गंदला कर दिया। ताकि कोई हमारी तलहट्टी न देख पाए। सच कहूं तो वो नदी, वो शहर जहां बचपन गुजरे वो कभी पीछे नहीं छूटता। ताउम्र हमारी स्मृतियों में छलकती रहती है।
उदास मना शिक्षक
गर्मी की छुटिटयों में दिल्ली सरकार के शिक्षा विभाग 'इन सर्विस प्रशिक्षण कार्यशालाएं आयोजित कर रही हैं। इन कार्यशालाओं में जीवन कौशल, संप्रेषणीयता, पाठयक्रम, सुरूचिपूर्ण कक्षा अध्यापन, सृजनात्मक लेखन, शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 आदि पर विशेष प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इसके पीछे उददेश्य यही है कि अध्यापकअध्यापिकाएं अपनी दक्षता में वृद्धि कर सकें और स्कूल खुलने पर कक्षा में इस्तेमाल कर सकें। इसका लाभ सीधे-सीधे बच्चों को मिल सके। इन पंकितयों के लेखक को इस कार्यशाला में शिक्षा का अधिकार अधिनियम, जीवन कौशल और सृजनात्मक लेखन पर बातचीत करने का अवसर मिला। तकरीबन 900 अध्यापकअध्यापिकाओं से रू ब रू होने के बाद जो हकीकत सामने आर्इ वह यह कि अध्यापक वर्ग बेहद निराश एवं उदास हैं। उनकी उदासी, निराशा का कारण प्रशासनिक एवं नीतिगत स्तर पर थीं। मसलन शिक्षा के अधिकार अधिनियम बनाते वक्त अध्यापकों की राय क्यों नहीं ली गर्इ। वास्तव में एक कक्षा में 60 से लेकर 80 और 100 बच्चों की उपसिथति और अध्यापक एक। इतने बच्चों को एक अध्यापक कैसे पढ़ा सकता है। सरकार गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की बात करती है लेकिन हमारा अधिकांश वक्त कागजी कामों को अंजाम देने में बीत जाता है आदि। इसी तरह की प्रतिकि्रयाएं इन कक्षाओं में सुनने को मिलीं।
सांस लेने की छटपटाहट
शिक्षक जाति में सभी निराश एवं हताश ही हैं ऐसा कहना एक तरह से पूरी प्रजाति के साथ सरलीकरण होगा और ग़लत भी। यह तो हर व्यवसाय में होता है। सभी अपने धंधे से संतुष्ट हों। असंतोष की भावना हर व्यवसाय में देखी जाती है। लेकिन उन्हीं के बीच कुछ फीसदी ऐसे भी कर्मी होते हैं जिन्हें अपने व्यवसाय की निष्ठा, जिम्मेदारी का भरपूर ख़्याल रहता है। ऐसे ही जैसे कि पहले आलेख में उदास मना शिक्षक में लिख कि अध्यापक वर्ग में निराशा ज्यादा है। वहीं 10 फीसदी ऐसे उत्साही शिक्षक भी हैं जो पूरी ईमानदारी के साथ अपना शिक्षक धर्म निभा रहे हैं। यह अलग बात है कि इनकी संख्या कम है। ऐसे ही तकरीबन हर क्लास में दो चार अध्यापक/अध्यापिकाएं मिलीं जिन्हें कक्षा में न पढ़ा पाने का मलाल भी साल रहा था। उनका कहना था मैं पढ़ाना चाहती हूं। लेकिन पिछले एक साल से क़ागजी कामों में उलझी हुई हूं। कई बार लगता है आई तो पढ़ाने थी लेकिन यह क्या कर रही हूं। वहीं एक मास्टर जी ने भी अपनी व्यथा बयां की कि मैं कक्षा में पढ़ाने डूब जाता हूं। बच्चे आनंद लेते हैं लेकिन तभी अक्सर हेटमास्टर साहब की बुलालट आ जाती है और मेरा अध्यापन बीच में ही ठहर जाता है।
उम्मीद की रोशनी और सांस लेने की छटपटाहट ही व्यक्ति को जि़ंदा रखता है। जब तक ऐसे अध्यापक समाज में हैं तब तक उम्मीद पूरी तरह से ख़त्म नहीं मानी जा सकती।

शिक्षकीय दुनिया की कहानी के पात्र

कौशलेंद्र प्रपन्न ‘‘ इक्कीस साल के बाद पहली बार किसी कार्यशाला में बैठा हूं। बहुत अच्छा लग रहा है। वरना तो जी ...