Tuesday, February 27, 2018

लिखने से पहले....



कौशलेंद्र प्रपन्न
लिखना कौन नहीं चाहता। हर कोई जिसके पास कहने को कुछ है वह लिख लेना चाहता है। इधर के कुछ सालों में लिखने वालों की एक बाढ़ सी आ गई है। बैंक, कंपनी की नौकरी छोड़ पूरी तरह से लिखने के क्षेत्र में भी उतर चुके हैं। जिन्हें कंपनी में अच्छी सैलरी मिल रही थी उन्हें नौकरी छोड़ लेखन क्षेत्र में  आने की क्या पड़ी थी? सोचिए तो कई कहानी निकल कर आएंगी। उन्हीं कहानियों में लिखने की छटपटाहटें सुनाई देंगी। इसलिए लेखन क्षेत्र में आए क्योंकि कभी वे स्कूल या कॉलेज के दिनों में लिखा करते थे लेकिन नौकरी में आने के बाद लिखने का वक़्त नहीं मिलता। आदि
जो भी लिखने का अपना कार्य क्षेत्र चुना वे यूं ही अचानक नहीं उठ कर नहीं आ गए। बल्कि इस क्षेत्र में उतरने से पहले एक ग्राउंड रिसर्च किया। रिसर्च के साथ ज़रूरतों की पहचान की। साथ यह भी रिसर्च किया कि किस प्रकार की ऑडिएंस यानी पाठक वर्ग है जो वास्तव में पढ़ना चाहता है। पाठक वर्ग किस प्रकार की राईटिंग पढ़ने में दिलचस्पी लेगी आदि। यदि कहानी उपन्यास आदि में रूचि है तो किस प्रकार की कहानी या उपन्यास पाठक पढ़ना चाहता है इसपर उन लेखकों ने अच्छे से रिसर्च किया और फिर कंटेट का चुनाव किया। उदाहरण मांगेंगे तो चेतन भगत, अमीश त्रिवेदी आदि ऐसे नाम हैं जिन्हें बेशक गंभीर साहित्यकार साहित्यकार न मानते हों लेकिन उनकी किताबें लाखों में पढ़ी और खरीदी जाती हैं। एक प्रकाशक और लेखक देनां को ही मुद्रा और प्रसिद्धी हासिल हो रही है।
अंग्रेजी में इस प्रकार के लेखन और लेखकों की राइटिंग 2000 के आस पास शुरू होती है। और देखते ही देखते इनके नाम और किताबें पाठकों को खूब भाने लगीं। देखते ही देखते हिन्दी साहित्य में भी कुछ लेखक जो पहले से लिख तो रहे थे किन्तु बिना मार्केट रिसर्च किए लिखा करते थे। जिसका परिणाम यह हुआ कि सीमित पाठक वर्ग तक उनकी पहुंच रही। इश्क में शहर होना, प्यार कोई ब्रेकिंग न्यूज नहीं, पतनशील पत्नीयों के नोट्य आदि किताबें 2015 के बाद आई और पाठकों को खूब भाने लगीं। अब के नए लेखक नए नए कथानक और प्रस्तुती के आधार पर ख़ासा चर्चा में हैं।
लेखन से पूर्व रिसर्च और अध्ययन बेहद ज़रूरी चीजों में से एक है। अभ्यास कई बार आपको लेखक बना देता है। लेकिन अभ्यास भर से आप लेखन में ज़्यादा देर तक नहीं रह सकते। आपको खड़े रहने के लिए कंटेंट और कंटेंट की प्रस्तुती पर भी ठहर कर काम करना होता है। तब आपको बाजार हाथों हाथ उठाता है।
आप किसके लिए लिख रहे हैं? क्यों लिख रहे हैं? अपने लेखन से क्या हासिल करना चाहते हैं इन बिंदुओं पर रिसर्च करना बेहद ज़रूरी है वरना लिख कर अपने लैपटॉप या काग़ज़ का पेट ही भरेंगे और एक मुगालता ज़रूर पाल लेंगे कि आप लिखते हैं। यदि आप लिख रहे हैं तो उसका एक पाठक वर्ग भी जहां उस लेखन को पहुंचाना है। लिखना जितना आसान है उतना ही कठिन भी राह है। क्योंकि कुछ भी लिख देने से वे न तो छपती हैं और न ही पढ़ी जाती हैं। बल्कि पठनीय लिखने के लिए लेखकीय प्रतिबद्धता की भी मांग की जाती है।
यदि अख़बार, पत्रिका, जर्नल के लिए लिखना चाहते हैं तो पहले अपने उस टार्गेट अख़बार व पत्रिका को बारीकी से रिसर्च करें कि उसकी प्रकृति कैसी है? किस प्रकार की सामग्री छपती हैं? कहां आप लिख सकते हैं आदि। यदि आप पत्रिका या अख़बार की प्रकृति के अनुरूप लिखते हैं तब छपने की भी संभावनाएं ज़्यादा हो जाती हैं।
बाकी छपने के लिए लिखना ज़रूरी है और लिखने के लिए छपना दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।

Monday, February 26, 2018

प्रिये बच्चों (अकाल मौत के शिकार) !!!


प्रिये बच्चों (अकाल मौत के शिकार) !!!
नमन।
क्षमा के साथ यह फोटो साझा कर रहा हूं।
ग़मज़दा हूं। दुखी भी। दोनों ही मौतें हैरान और दुखी करने वाली हैं। एक ओर फिल्मी अदाकारा श्रीदेवी की असामयिक मृत्यु और दूसरी तरफ तुम बच्चों की अकाल मृत्यु। ग़लत समय में मरे तुम। समय का चुनाव सही नहीं था। जब श्रीदेवी की मौत हुई तब तुम्हें नहीं मरना था। समय सही चुनते तो शायद तुम्हारी मौत पर भी कुछ लोग, लोकतंत्र के पहरूएं कुछ संवेदना बयां करते। समाज के राजनीतिक हस्तिष्यां कुछ लिखतीं और बोलतीं। मगर तुम एक साधारण परिवार में जन्मे। साधारण से राज्य के एक शहर मुज़फ्फरपुर के सरकारी स्कूल में पढ़ते थे। मरना ही था तुम्हें। ट्रक या कोई भी वाहन आसानी से कुचल कर भाग सकती है। जो भाग गई। जिस राज्य में तुमने सांसें लीं। जन्म लिए। पढ़ने का हौसला रखा उस राज्य के मुखिया ने एक शब्द भी तुम्हारी मौत पर नहीं कहा। लेकिन अदाकारा की मौत पर मरसिया ज़रूर पढ़ आए।
तुम्हारी मौत भी असामयिक ही थी। बल्कि ज़्यादा दर्दनाक। सड़क पर तुम छटपटाते रहे होगे। लेकिन मालूम नहीं तुम्हारी सहायता के लिए कितने लोग आए होंगे। लेकिन उधर उनकी मौत पर लोकतंत्र के तीनों प्रमुखों ने अपनी गहरी संवेदना अभिव्यक्त की। उन्हें शायद यह ख़बर भी न मिली हो। क्यांकि तुम्हारी मौत से ठीक बाद उनकी मौत की ख़बर आ गई। निश्चत ही दूसरी वाली ख़बर बडी और वजनी थी। उस ख़बर की रफ््तार में तुम्हारी मौत की ख़बर पिछड़ गई। मुझे अब तक नहीं मालूम कि उस राज्य के शिक्षामंत्री, गृह राज्यमंत्री या किसी अधिकारी ने अपनी संवेदना प्रकट की है। बच्चों तुम्हें तो मरना ही था। या तो अकाल मृत्यु के शिकार होते या फिर भूख से मरते। यदि इन सब से बच भी जाते तो तुम्हें हम जीवन भर मारते रहते। तरीके कुछ भी हो सकते थे।
अब तो लगता है मरना और मौत भी फैशनेबल होनी चाहिए। जब आप मरें तो वह वक़्त भी माकूल हो। कोई बड़ा व्यक्ति न मरा हो। बजट का मौसम न हो। कोई बड़ी घटना न घटी हो। तब तो मरना फलेगा वरना मरे भी और चर्चा भी न हो। यह भी मरना कोई मरना है। बच्चों तुम तो तभी चर्चा में रहते हो जब या तो स्कूल में मरते हो, खाकर मरते हो, शौचालय में हत्या हो जाती है, या फिर मास्टर की मार से मरते हो। पूरी मीडिया तुम्हारी मौत पर मातम मनाती है। नागर समाज भी मोमबत्तियां लेकर कर शहर शहर, नगर नगर घूमते हैं।

Friday, February 23, 2018

टीचर बहनों के नाम खुली चिट्ठी



कौशलेंद्र प्रपन्न
हालांकि मेरी कलाई पर कई बहनों ने राखी न बांधी हो। साथ में बचपन न गुजारी हों। साथ लड़ी-झगड़ी भी न हों। लेकिन उन हज़ारां बहनों के साथ मेरी रिश्ता तभी जुड़ गया जब उन्होंने शिक्षा और शिक्षण में कदम रखा। जब वे डाइट से या फिर बीएड कर रही थीं तब से हमारा रिश्ता बन गया था।
मेरी बहन पिछले कई दिनों परेशान थी। बल्कि है। वैसी ही मैं समझता हूं कई बहने परेशान होती होंगी जब उन्हें क्लास में पढ़ाने जाना होता होगा। जब उनकी क्लास ऑब्जर्ब की जाती होंगी। जब उन्हें कहा जाता होगा कि फलां तारीख को तैयार रहें आपकी क्लास ऑब्जर्ब की जाएगी।
हालांकि क्लास ऑब्जर्ब हो इसमें किसी को भी कोई एतराज़ नहीं हो सकती। लेकिन इस फरमान से उपजे तनाव और चिंता को हम कभी भी नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते। मेरी बहन तनाव में थी। उसकी िंचंता थी कि क्लास रूम ऑब्जर्ब होने हैं उसके लिए पाठ योजना कैसे बनाएं। कैसे क्लास में शिक्षण करें ताकि ऑब्जर्बर खुश हो जाए और अच्छे कमेंट दे कर जाए।
चिंता तो कुछ और होनी चाहिए थी कि मैं अपनी कक्षा को कैसे रोचक तरीके से पढ़ाउं कि बच्चे आनंदविभोर हो जाएं। बच्चां की सहभागिता इस तरह की हो कि बच्चे तो बच्चे मैम भी उसमें शामिल हो जाएं। लेकिन इसके लिए प्लानिंग की ज़रूरत पड़ती है। और प्लानिंग के लिए सोचना होता है। यही सोचने की आदत व चस्का हमारी टीचर बहनां और भाइयों को नहीं दी जाती।
बातचीत में बहने ने बताया कि उसकी कक्षा में बच्चे बहुत शोर करते हैं। उसकी कक्षा के बच्चे उसकी बात नहीं मानते। शांत नहीं बैठते आदि। बहन ने फोन पर अपनी कहानी सुनाई। मैं सुनता रहा। जब रहा नहीं गया तो एक वाक्य कहा ‘‘ तुम क्यों चाहती हो कि बच्चे सुनें? क्यों सोचती हो कि बच्चे कक्षा में चुप्प बैठे रहें। क्यों चाहती हो कि बच्चे तुम्हारी बात मानें?’’ इसपर बहन रूंआंसी हो गई। कहने लगी आप नहीं समझते। प्रिंसिपल डांटती है। एकेडमिक हेट गुस्सा होती है। यदि क्लास में शोर हो रहा होता है।
मुझे मेरी बहन की बातों में सच्चाई तो लगी लेकिन कमी भी मिली। जब वो मान कर चल रही है कि बच्चे शरारती हैं। बच्चे नहीं सुनते यानी कहीं न कहीं वो एक नकारात्मक सोच की गिरफ्त में है। जबकि उसे बच्चों को कैसे मैनेज किया जाए और क्लास में कैसे सकारात्मक माहौल बनाएं इसकी समझ और योजना प्रशिक्षण के दौरान दी जानी चाहिए थी। मुझे बहनों से ज़्यादा प्रशिक्षण संस्थानों की कमी नज़र आती है। हमारे शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान महज शिक्षक बनने की पात्रता तो दे देते हैं। उन्हें दक्षता और शिक्षकीय कौशल प्रदान करने में पिछड़ जाते हैं। यही कारण है कि हज़ारों लाखों टीचर डिग्री तो हासिल कर लेते हैं लेकिन जब क्लास में प्रवेश करते हैं तब उन्हें ख़ासा मुश्किलें आती हैं।
मेरी हज़ारों बहनें याद रखो- क्लास की तुम मालकीन हो। तुम जैसे अपने कीचन को सजा संवार कर रखती हो वैसे ही क्लास को भी सजाना होता है। उन्हें हमेशा डस्टिंग भी करते रहना होता है। तब जा कर आपकी क्लास चमकती है। और आपको अपने कीचन में जाने में तब डर नहीं लगता तब सब साफ सुधरा और आपके मनोनकूल हो। आपको अपनी कक्षा भी अनुकूलित करनी होती है। जो पढ़ाओ पूरी शिद्दत से पढ़ावा। यह चिंता किए बगैर कि कोई ऑब्जर्ब कर रहा है। आप ख्ुद ऑब्जर्बर बनोगी तब आपको किसी से भी डर नहीं लगेगा।
अगर फिर भी डरती हो तो लिखो न यहां पढ़ाने में क्यां डरती हो? क्यों ऑब्जर्ब होने भय खाती हो? मिल कर संवाद करते हैं।

Wednesday, February 21, 2018

कभी देखिएगा शाम




कौशलेंद्र प्रपन्न
किसी शाम आप यूं ही बैठे हैं। कभी मायने कभी। जब से जॉब करने लगे हैं। जब से कॉलेज पूरे हो गए। जब से शादी हो गई आदि आदि। अव्वल तो कई कई दफ़ा आफिस में ही शाम हो जाया करती है। आते तो सुबह हैं जब सूरज उग चुका होता है। दोपहर भी कभी कभी देख लिया करते हैं यदि दफतर से बाहर निकले तो। लेकिन अरसे हो जाते हैं शाम न देखे। शाम देखने का मतलब बिना कुछ करते हुए बस यूं ही एक टक सूरज को ढलते देखना। देखना उसकी कम होती लालिमा को। धीरे धीरे आसमान का रंग बदलना। वैसे यह भी कोई देखना हुआ। आप कह सकते हैं? देखना ही है तो शाम की रौनक देखिए। देखिए बाजार कैसे जगमग जगमग हो रहे हैं। देखिए सड़के कैसे गाड़ियां की लाइट से झिलमिलाने लगती हैं।
शाम भी कोई देखने की चीज होती है। उदास और बेलौस। मगर नहीं कभी देखनी ही हो शाम को तो कन्याकुमारी में देखें। पटाया में देखें। मुंबई या किसी भी समंदर किनारे देखें। या फिर मनाली, कुल्लू या फिर खजियार में देखें कैसे देखते ही देखते पहाड़ी में गुम हो जाता है दिन और कैसे अचानक शाम उतर आती है घाटियों में। देखते ही देखते पहाड़ के घरों में रोशनी जलने लगती है।
ये सब कल्पना नहीं हैं। न ही यह कहानी का कोई प्लॉट है। बल्कि हक़ीकत है। यदि आपने शिद्दत से शाम होती देख ली तो सच में उस शाम को अपनी डायरी या फिर स्मृतियों में संजो लेंगे। लेकिन अफ्सोस कि हमारे पास संजोने को शाम नहीं है। कब सुबह होती है और कब देखते ही देखते शाम हो जाती है इसका एहसास तक नहीं होता।
बड़े बड़े शहरों में तो रात भी कहां होती हैं। कहां होती है अंधेरी रात। अंधेरा देखने के लिए आपको सीमांत में जाना होगा। हर तरफ रोशनी ही रोशनी। कई बार इतनी ज़्यादा रोशनी से आगे मिचमिचाने लगती हैं। कई बार जी चाहता है कुचकुच अंधेरी रात देखें। देखें अंधेरे में आसमान से ताकते तारों को। मगर दिल्ली क आसमान में तारे गोया आते ही नहीं।
कभी गुलमर्ग तो कभी कन्नाताल में शाम और रात दोनों देखी है। रात में इतने सारे तारे कि आंखें कम पड़ जाएं। कितने तारों को आंखें में जगह दी जाए। कहते हैं रात वो भी काली रात डरावनी होती है। मगर मेरी मानें रात कभी भी डरावनी नहीं होती। बल्कि रात जितनी खूबसूरत कोई और नहीं होती।
कभी देखिएगा शाम को। शाम वही जो आपके गांव में मिला करती थी। मिलती थी दूर ख्ेतों में चहलकदमी करती हुई। मैंने भी कभी शाम देखी है। मगर हज़ारों ऐसे लोग हैं जिनका काम इसकी इज़ाजत नहीं देता कि वो शाम देखें। मीडिया हाउस हो या रिसर्च या फिर डॉक्टरी पेशा इसमें हर वक़्त लाइट और लाइअ में काम करने पड़ते हैं। जब अचानक बाहर आते हैं तो आंखें प्राकृतिक रोशनी में चौंधिया जाती हैं।

Tuesday, February 20, 2018

कहानी बुनों तो सही




 कौशलेंद्र प्रपन्न
चित्र में आप दो टीम को पीछे देख रहे हैं। यही वो टीम है जिन्हें निर्णायक मंडल ने आम सहमति से विजेता चुना है। विजेता वे भी कहानी बुनने में। कहानी के बुनकरों को बधाई। संभव है आज के समय में हम कहानी बुनना तो दूर कहानी सुनना और सुनाना जैसे गैर उत्पादक कामों को तवज्जो न दें। लेकिन आने वाली पीढ़ी जब कहानी की मांग करेगी तो क्या देगें हम? सोचिए और पढ़ें आज की बात-
वैसे हमसब कहानी बुनने में तेज हैं। तेजी से कहानियां बुन लिया करते हैं। परिस्थिति जो भी हो। यही कारण है कि हम अपनी बात और कई बार अपनी पीड़ा भी कहानी के ज़रिए कह दिया करते हैं। लेकिन कल्पना कीजिए आपको चार मिनट का मौका मिले और कहा जाए चलिए साहब इस मसले पर कहानी बुनें। तब चुनौती बड़ी हो जाती है।
श्री राम कॉलेज ऑ कॉमर्स के हिन्दी विभाग में स्पंदन कार्यक्रम में सुनने और गुनने को मिला। विभिन्न कॉलेजों से आए छात्रों ने कहानी बुनने में अपनी दक्षता दिखाई। उन तमाम छात्रों ने अपनी काबिलीयत का परिचय दिया जिन्होंने कहानियां बुनीं। कहानी बुनने की प्रक्रिया और उस कालखंड़ का चस्मदीद गवाह बनने का अवसर मिला। कैसे बच्चे कहानियां बुन रहे थे। बल्कि कहानी कह रहे थे।
कहानी बुनने और उसके बाद कहानी कहने में अंतराल इसलिए दिया गया ताकि आपसी तालमेल बैठाया जा सके। गौरतलब है कि कहानी बुनने वाला अकेला कत्तई नहीं था। बल्कि दो लोगों को एक साथ कहानी बुननी थी। है न दिलचस्प !!!
कहा हम साथ साथ चल नहीं पाते। चलते हैं तो लड़खड़ाते हैं। उसपर तुर्रा यह कि दो लोगों को एक साथ कहानी की घटना, संवाद, कथानक और प्रवाह सब खुद ही आपस में तय करना था। इसमें आपसी मंथन, एकीकृत सोच और संवाद को जीवंत बनाने के लिए वाक्यों, संवेदनाओं को होना नितांत ज़रूरी है।
कहानी बुनने की पूरी प्रक्रिया का गवाह रहा तो यह भी जिम्मेदारी बनती है कि मैं आपको बताउं कि कुछ छात्रों ने अच्छी कहानियां बुनीं। कुछ बच्चों के कंटेंट अच्छे थे। तो कुछ ज़्यादा ही जल्छबाज़ी में थे। जल्दबाज़ी बुनने में नहीं थी बल्कि कहानी कहने में थी। यहां अंतर समझते चलें कि कहानी बुनना और कहानी कहना दो अलग अलग कौशलों की मांग करती हैं।
न जाने हमारे छात्र क्यों रफ्तार में थे ज बवे कहानी सुना रहे थे। बहुत तेजी से आगे बढ़ जाना चाहते थे। शायद यहीं पर कहानी सुनने और कहने का आनंद जाता रहता है। हालांकि वक़्त की पाबंदी थी। तय समय में ही कहानी कह देनी थी। सवाल है क्या कहानियां कही जाती हैं? या कहानियां सुनाई जाती हैं। यदि यह अंतर छात्रों में बता दिया जाता तो शायद पवे कहानी बुनने और सुनाने के कौशल से महज दो टीम ही नहीं बलिक और टीम भी पुरस्कृत हो पाती।
बहरहाल जो हो कहानी बुनी गई। कहानी सुनाई गई। सुनने वाले भी अघाए। कहानी सुनकर जिन्हें निर्णय देना था वे भी आनंदित हुए। साधुवाद डॉ रवि शर्मा का जिन्होंने हमेशा ही हिन्दी साहित्य सभा, श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में नवाचार करते रहते हैं।

Thursday, February 15, 2018

कैसे रखें अपनी बातें



कौशलेंद्र प्रपन्न
कहना एक कला है तो इसे विकसित भी कर सकते हैं। आज काफी वक्ता और प्रोफेशनल इस फील्ड में उतर चुके हैं जो ज्ञान और अनुभव साझा किया करते हैं कि जीवन में कैसे आगे बढ़े। कैसे ऑफिस और घर को मैनेज करें आदि। उसी प्रकार से बाज़ार ऐसे वक्ताओं और प्रोफेशनल से भरे हुए हैं। पैसे दीजिए और गुण सीखिए। कहते हैं यदि आपके पास कहने का हुनर है तो ख़राब से ख़राब कंटेंट को सुना सकते हैं। ज्ञोताओं की भीड भी मिल जाएंगी।
दो बातें प्रमुख हैं बोलने से पहले शब्दां का चयन बेहद ज़रूरी है।उसके बाद अपनी बात को किसी कहानी या कथन से शुरू की जाए तब भी श्रोता सुनते हैं। हां यदि कहानी लंबी हो गई तो बारीयत की स्थिति पैदा हो सकती है। इससे बचने के लिए श्रोताओं को हमेशा नज़रों में रखना होता है।
ज़रूरत इस बात की है कि क्या आपको श्रोताओं के अनुसार बोलना और बतियाना आता है। क्या आप मनोदशा और मनोस्थिति के साथ परिवेश को ध्यान में रखक रबात कर सकते हैं। आज की तारीख़ी हक़ीकत है कि हर कोई बोलना और सुनाना चाहता है। लेकिन कैसे सुनाएं व कैसे बोलें कि हर केई सुनने में दिलचस्पी ले इसके लिए सावधानियां बरतनी पड़ती हैं। साथ ही कहने के कौशल को मांजना होता है। बिना अभ्यास और कौशल के अच्छे कंटेंट बरबाद हो जाते हैं।


Wednesday, February 14, 2018

किताबें रिश्ते बुनती हैं मानें या न मानें



कौशलेंद्र प्रपन्न
आज की ही बात है। मेट्रो में सुबह बैठा किताब पढ़ रहा था। किताब थी ‘‘इमेजिनेशनः नो चाइल्ड लेफ्ट इंभिजिबल’’ एक सज्जन अपने तकरीबन चौदह साला बेटे के साथ मेरी सीट के बगल में बैठे। अपने बेटे से लगातार बात कर रहे थे और मेरी किताब पर भी उनकी नज़र थी।
हालांकि मेट्रो में लगातार हमें ताकीद किया जाता है कि अपरिचितों से बात न करें। आदि लेकिन ऐसे कई मर्तबा हुआ है कि मैंने भी कई बार साथ बैठे वाले ने भी बातचीत का सिलसिला शुरू किया है। कई बार इतनी अच्छी बात और व्यक्ति मिला करते हैं लगता है इनसे तो रोज़ ही मुलाकात होती रही है।
ऐसे ही रफ्ता रफ्ता तीस हज़ारी स्टेशन पर उन्होंने कहा कितनी अच्छी बात लिखी है इस किताब में। कैसे बच्चों से बात करें। नकारात्मक बात न करें। हमेशा प्रोत्साहन वाले अंदाज़ में बच्चों से बात करें। बात करें। भाषा कैसी हो। सचमुच किताबें एक अच्छी दोस्त होती हैं। वो जनाब लगातार बोले जा रहे थे। मुझे भी बुरा नहीं लगा। क्योंकि एक किताब का प्रेमी जो मिला था।
दूसरा वाकया कोलकाता से दिल्ली लौटने के दौरान साथ बैठे फ्लाइट सहयात्री काफी देर के बाद बोल पड़े। कौन सी किताब पढ़ रहे हैं? क्या लिखा है? पाकिस्तान तो हमें बरबाद करने पर तुला है और आप एक पाकिस्तानी लेखिका की किताब पढ़ रहे हैं आदि।
जब उस किताब का मजमून बताया तब थोड़े झेप गए। क्यांकि वह किताब ‘‘1947 दिल्ली से पाकिस्तान भाया पिंड’’ सबूहा ख़ान की आटोबायोग्राफी थी। जिसमें उन्होंने बड़ी ही संजीदगी से तकसीम के मंज़र को भोगा और जीया हुआ यथार्थ लिखा था।
लेकिन अच्छा लगा उनके हाथ में भी एक किताब थी जो हडसन लेन, कैंप, आदि को आधार बनाकर प्रेम आधारित अंग्रेजी की किताब थी। जब मैंने उसे उलट पुलट कर देखा तो बड़ी घोर निराशा हुई। किस प्रकार नवोदित लेखक ने प्रेम और दोस्ती को इन जगहों पर फैला कर बीच बीच में सेक्स का छौंक मार कर लिखा था।
जो भी हो। मैंने तो यही पाया है कि जब भी आप अच्छी किताब पढ़ते हैं तो न केवल आपको बल्कि कई बार सामने वाले की नज़र भी बदल देती है। दोस्ती तो आपको घलुआ में मिल जाया करती है।
अच्छी किताबें और अच्छे दोस्त इस भीड़ में बहुत मुश्किल से मिला करते हैं। उन्हें बचा कर रखना भी ज़रा कठिन होता है। लेकिन चाह लें तो दोनों ही चीजें बचाई जा सकती हैं।

Tuesday, February 13, 2018

प्रेम पहला या दूसरा



कौशलेंद्र प्रपन्न
प्रेम पहली दफ़ा या दूसरी बार। लेकिन कहते हैं कि प्रेम तो प्रेम होता है। वह न पहला होता है और न दूसरा या फिर आख़िरी। करने वाला प्रेम किस मनसा से कर रहा है। यह भी काफी कुछ तय करता है कि प्रेम का स्वरूप और बारंबारता क्या होगी।
कभी इन पंक्तियों के लेखक से बात करते हुए निर्मल वर्मा जी ने कहा था कि मैंने तो जीवन में दूसरी बार प्यार किया। यह जवाब ज़रा हजम नहीं हुआ। सो आग्रह किया कि कृपया इस वाक्य का खुलासा करें। तब उन्होंने कहा पहली दफ़ा हम अपने मन और चिंतन में प्यार करते हैं। किससे करने वाले हैं। प्रकृति है या मनुष्य। जीव है या जीवन। लेखन है या भ्रमण। दूसरी बार हम सोचे हुए प्यार को एक्जीक्यूट किया करते हैं। तो इस तरह से हम कभी भी पहली बार प्यार नहीं करते।
आज देखें तो व्यक्ति जीवन भर प्यार के लिए तड़पता रहता है। लेकिन सच्चे प्रेम की तलाश में जीवन और जगत रीत जाता है। दरअसल सच्चा और झूठा प्रेम का तय कौन करे। मसला यह भी है। जो हमारे समाज में अश्लील है। वह संभव है दूसरे समाज में एक सामान्य और सहज व्यवहार माना जाए। इसलिए यह तय करना ज़रा मुश्किल है कि कौन सा प्रेम और कौन सी प्रेमाभिव्यक्ति सहज और कौन सी अस्वीकार्य।
समाज और और समय बदलते ही मान्यताएं भी बदल जाती हैं। यह इतनी तेजी से घटित होता है कि हम खुद को संभाल भी नहीं पाते। दो से तीन घंटे में या फिर रातों रात हम वैश्विक नागरिक हो जाते हैं। हमारे खान पान, रहने सहन, पहनावा आदि सबकुछ बदल जाता है। जहां हम भारत में पूरे तन के कपड़े पहने होते हैं और जैसे ही एयरपोर्ट पर उतरते हैं वैसे ही कपड़े कम और कमतर होते जाते हैं। यह देखे बगैर कि जो कपड़ा पहन रहे हैं क्या हमारी बॉडी उसमें अट भी रही है या नहीं। क्योंकि वहां की दुनिया वही पहन रही है इसलिए हमें भी पहनना है। ठीक वैसे ही प्रेम का मसला भी है।
क्योंकि किसी देश व समाज में प्रेम बंधन नहीं है। वस्त्र किसी के चरित्र प्रमाण पत्र नहीं है। वहां हम अपनी सोच और चिंतन छोड़ वहीं की संस्कृति अपनाने लगते हैं। हालांकि इसमें किसी को कोई एतराज़ भी नहीं होगा कि वैश्विक संस्कृति और नागरिकता हमें विश्व बंधुत्व की ओर ले जाती है। ऐसे में दूसरे की संस्कृति भी स्वीकार करने और मान्यता देने का माद््दा हो।

Monday, February 12, 2018

छुपाने को क्या है?


कौशलेंद्र प्रपन्न
हमारे शरीर में छुपाने को क्या है? शायद जैन धर्म के दिगंबर संप्रदाय की मूल स्थापना ही यही है। इस शरीर में कोई भी और कोई भी अंग ढकने छुपाने के लिए नहीं है। लेकिन हम ही हैं कि शरीर के ख़ास अंग को ढक कर रखते हैं। मनोविज्ञान बताता है कि परहेज करने वाली चीजों व मनाही वाली चीजों की ओर हमारा ध्यान ज़्यादा जाया करता है।
अजंता एलोरा, खजुराहो की मूर्तियां इस दर्शन मजबूती प्रदान करती हैं कि नग्नता व निवस्त्र हमेशा अश्लील नहीं होता बल्कि अश्लीलता और श्लीलता देखने वालों की नज़रों में होती हैं। यही कारण है कि सदियों से खजुराहों की मूर्तियां हमारी संस्कृति का हिस्सा रही हैं।
यदि इंडोनेशिया, थाईलैंड आदि जगहों पर जाएं तो वहां काष्ठ-लिंग सरेआम बाजार में मिला करती हैं। शायद वहां उन संस्कृतियों में यह त्याज्य नहीं, अश्लील नहीं बल्कि सामान्य वस्तु के रूप में देखने और स्वीकारने का आग्रह हो। वैसे भारतीय संस्कृति में शिवलिंग की स्थापना और उसका पूजन तो श्रेयस्कर माना गया है। यदि लिंग में कुछ भी छुपाने का होता तो उसकी पूजा न होती।
समाज में समरसता और उच्छृंखलता न व्याप्त हो जाए इसलिए वस्त्रों और ख़ास अंगों को छुपाने और ढकने का चलन व्यवहार में आया हो। वरना हमारे आस पास जीवन जंतु, पशु पक्षी सब के सब दिगंबर अवस्था में ही रहा करते हैं। लेकिन शायद इसलिए भी मनुष्य और पशु में अंतर बताते हुए हमें बताया गया है कि मनुष्य महज मैथुन,भोजन और जीवन नहीं जीया करता बल्कि एक मकसद के लिए जिं़दा रहता है। वह सिर्फ मैथुन नहीं करता बल्कि मानव और समाज कल्याण के लिए परिवार विस्तार के लिए मैथुन कार्य में रत होता है।
ओशा ने अपनी किताब सम्भोग से समाधी में लिखा है कि यदि साधक की जंघा पर नग्न स्त्री बैठ जाए और व्यक्ति विचलित न हो। तब समझना चाहिए वह साधना के लिए तैयार है। वैसे यह कठिन है किन्तु जतो सच्चे साधन होते हैं उन्हें अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण करना आ चुका होता है। उनके लिए क्या वस्त्र और क्या निर्वस्त्रावस्थ्या। सब समान होता है।
 

Friday, February 2, 2018

जब बात हो कहना तो...



कौशलेंद्र प्रपन्न
कहने को हम दिन भर कुछ न कुछ कहते ही रहते हैं। लेकिन कभी नहीं सोचा क्या वह सुन रहा है या फिर सिर्फ नज़रें ही हमारे पास हैं। कान तो उसके कुछ और ही सुन रहे होते हैं। आज की तारीख़ी हक़ीकत यही है कि हमें सुनना ही नहीं आता। बल्कि कहना तो यह चाहिए कि हम सुनना ही नहीं चाहते। या फिर हमें कहना नहीं आता। हमें तो यह भी समझना होगा कि क्या हम वास्तव में सुनना चाहते हैं? क्या हमारे पास सुनने की कला या दक्षता जिसे आज कल स्कील कहा करते हैं, हैं? यदि नहीं तो हमें सोचने की आवश्यकता है।
यदि बड़े नहीं सुनते या बच्चे नहीं सुनते तो उसके पीछे कई वज़हें हुआ करती हैं। मसलन कंटेंट की डिलिवरी ठीक नहीं है। केंटेंट का चुनाव ठीक नहीं है। या फिर कहने की शैली प्रभावशाली नहीं है। सुनने का बाह्य एवं अंतर वातावरण नहीं है आदि।
यदि मेरा मनोजगत् अस्थिर है तो शायद मैं अच्छ से अच्छे कंटेंट का सुनना चाह कर भी न सुन सकूं। कहने वाले की शैली भी बेहतरीन है किन्तु मैं सुन नहीं पा रहा हूं। वक़्ता को श्रोता के बहुआयामी घटकों को समझते हुए अपने कंटेंट के चुनाव और डिलिवरी करनी पड़ती है तब कोई श्रोता सुनने में दिलचस्पी ले सकता है।
अक्सर हमारी शिकायत होती है कि फलां सुनता नहीं। सुन नहीं रहा हैआदि। जबकि हम इसके पीछे के मनोविज्ञान को नहीं समझ पाते कि क्योंकर वह सुनने में रूचि नहीं ले रहा है।आज सुनाने वाले हज़ारों हैं।विभिन्न माध्यमों से हमें सुनाना चाहते हैं बल्कि सुना रहे हैं।लेकिन हम जिसे और जितना सुनना चाहते हैंउतना ही सुनते हैं।घर से लेकर स्कूल तक। कॉलेज से लेकर विश्वविद्याल तक। आफिस से लेकर दोस्तों तक सभी लगातार सुनाने में लगे हैं।पिता की चिंता हैकि उनका बच्चा उनका नहीं सुनता। बच्चों की चिंता कि मां-बाप उनकी नहीं सुनते। शिक्षक का मसला कि छात्र नहीं सुनते आदि। यही हाल आफिस में किसी की कोई नहीं सुनता।
नहीं सुनने और कहने बीच एक बरीक सी लाइन होती है।उसे यदि हमने हल कर ली तो मज़ाल हैकि आप कहें तो सामने वाला न सुने।सुनाने वाले के पास वह समझ और कौशल होनी चाहिए कि श्रोता की मनोदशा और बाह्य परिवेश को समझते हुए सुनाए।
हम फिल्मों से लेकर आूम जिं़दगी में ऐसे लोगों की ज़रूर सुनते हैंजिससे हमारी रोज़ मर्रे की जिं़दगी प्रभावित होती हो। जिससे हमें कुछ सीख पाते हैं।वह चाहे खेल खेल में या फिर डॉयलग में सुना जाए। ज़रूरत इस बात की हैकि कहने वाला कितनी शिद्दत से कह रहा हैऔर अपने कंटेंट के साथ किस प्रकार न्याय कर पाता है।

Thursday, February 1, 2018

किससे मिलूं, बात किससे करूं



कौशलेंद्र प्रपन्न
किससे मिलें और किससे बात करूं यह तो हमारी अपनी इच्छा और पसंदगी और नापसंदगी पर निर्भर करता है। इसे कोई और तय नहीं कर सकता। हालांकि कई मर्तबा कोई और तय करने लगता है कि हमें किससे और कितना मिलना है। किससे बात करनी है आदि।
कम से कम हम सब इस बात में आज़ाद हैं कि हमें किससे वास्ता रखना है और किस हद तक किससे मिलना है। यह कोई और नहीं तय कर सकता। लेकिन अफ्सोस कि कई बार यह भी कोई और निर्धारित करने लगता है। कई बार दोस्त, कभी रिश्तेदार आदि। हम बिना जांचें परखें अपनी इच्छा और पसंदगी को मचांन पर रख देते हैं।
मुझे याद आता है हमारे मुहल्ले में एक परिवार रहा करता था। उसे परिवार के यहां कोई मिलने जुलने नहीं जाता था। क्या होली और क्या दशहरा। क्या न्योता क्या पेहानी। सब कुछ बड़ों ने तय कर दिया था।
उस घर में तीन बेटियां और दो बेटे रहा करते थे। बेटियां काबिल और स्कूल जाया करतीं जैसे और लड़कियां जाती थीं। बेटा स्कूल के बाद कॉलेज गया और जॉब करने की उम्र में उसने भी मेहनत की और आज रेलवे में लगा हुआ है। लेकिन उस परिवार से मिलना जुलना न रहा। यह तय किसने किया। एक परिवार ने या कि एक ख़ास मानसिकता ने।
सुना है। उस घर की मालकिन जो तीन बेटियों और एक बेटे की मां थी। पिछले साल अपने ही घर में मृत पाई गई। लोगों को तब पता चला जब घर में से बदबू आने लगी। यह तय करने वाले कौन होते हैं कि किनसे मिला जाए और किनसे मुझे बात करनी है।
यह चुनाव हमारा होता है कि हम किनसे और किनसे नहीं मिलेंगे और किनसे जीवन में साबका रखना है। दोस्तों के चुनाव में सावधानी ज़रूर रखनी चाहिए। कई बार यही दोस्त हमें सच्चे और स्पष्ट छवि देखने में बाधा भी बनते हैं।
जिससे बात करने, मिलने में मुझे या आपको खुशी मिलती हो तो क्यां न मिलें। क्यों न बात करें। क्या इसलिए बात करना बंद कर दें। या फिर मिलना छोड़ दें कि फलां ने ताकीद का था कि वह अच्छा नहीं है। मुझे देख सुन लेनें दें। बाकी आपके हिस्से का सच और छांव हैं। किस पेड़ को चुनते हैं?

Wednesday, January 31, 2018

लाल बत्ती की मौजू बात...




कौशलेंद्र प्रपन्न
रोज़ आप लोगों को अपनी कहानी या और की कहानी या फिर लेख पढ़ाकर तंग ही किया करता हूं। सोचा आज आपसे कहूं कि आप ही तो हैं जिनसे अपनी पूरे दिन की बात कहा करता हूं। आप भी नहीं सुनेंगे तो फिर मुझे मौन होना होगा।
सो आज एक कहानी सुनाता हूं। यह कहानी है लाल बत्ती की। हम सब रोज़ ही इस बत्ती को देखा करते हैं और आगे बढ़ जाते हैं। या फिर कुछ पल रूकते हैं।
एक दिन लाल बत्ती सोचने लगी रोज़ मैं यही खड़ी रहा करती हूं। मेरे आगे सभी रूकते और चले जाते हैं। मैं कहीं नहीं जाती। मैं भी घूमने जाउंगी।
और सुबह लाल बत्ती अपनी जगह से उठ कर पहले समंदर के किनारे गई। समंदर बत्ती की ख़ैरमखदम करने के बाद पूछा ‘‘ तुम यहां कैसे?’’ ‘‘तुम तो वहां सड़क पर हुआ करती हो।’’ तब लाल बत्ती ने जवाब दिया ‘‘रोज़ दिन एक ही काम करते करते और खड़े खड़े थक गई सोचा घूम कर आउं। रोज़ एक ही काम।’’
लाल बत्ती समंदर किनारे खड़े लाइट हाउस को देखा जो हमेशा वहीं खड़ा हुआ करता है। उसने भी पूछा ‘‘अरे तुम यहां?’’ लाल बत्ती का जवाब वही था। उसने समझाया ‘‘बहन अगर मैं अपना रोज़ का काम नहीं करूंगा तो जहाज अपने रास्ते भूल जाएंगे?’’ सो मैं रोज़ अपना काम करता हूं।
फिर लाल बत्ती लेटर बॉक्स को देखती है।लेटर बॉक्स ने भी वही सवाल किया।जवाब भी लाल बत्ती की वही थी। लेटर बॉक्स ने कहा ‘‘ बहन मैं रोज़ हज़ारों लोगों की ख़्वाहिशें पहुंचाया करता हूं। कल को मैं चला जाउं तो लोग चिट्ठयां कहां डालेंगे?’’ मुझे तो अपने काम में मज़ा आता है।’’
अब लाल बत्ती एक पुराने दरख़्त को देखती है।दरख़्त ने भी उससे वही सवाल किया।लाल बत्ती का जवाब भी पुराना ही था। ‘‘मैं थक चुकी हूं। रोज़ रोज़ एक काम करके।’’
बूढ़े दरख़्त ने कहा ‘‘बहन मैं तो सदियों से यहीं खडा हूं। बटोहियों, राहगिरों को छाया देता हूं। मुझे बहुत सकून मिलता है।जब कोई राही मेरी छाया में बैठकर सुस्ताता है।’’
लाल बत्ती ने सभी की कहानी सुनी। बातें सुनीं और उसे महसूस हुआ कि रोज़ अपने जिम्मेदारी और काम करने में कोई हर्ज़ नहीं। सब तो कर रहे हैं। पेड़, लेटर बॉक्स, समंदर का किनारा, लाइट हाउस सभी तो रोज़ अपना तय काम करते हैं। और लाल बत्ती लौट आई। देखती हैकि सडक पर अफरा तफरी है।चारों ओर भीड़ ही भीड़। बच्चे रोड़ नहीं पार कर पा रहे हैं।गाड़ियां टस से मस नहीं हो रही हैं। आज सुबह से शहर परेशान है।और लाल बत्ती चुपचाप जाकर अपनी जगह पर खडी हो गई।
मैं भी रोज़ लिखकर आप लोगों को पढ़ाया करता हूं। लेकिन लाल बत्ती की तरह भागूंगा नहीं। आप पढ़ें न पढ़ें। कम से कम आपके मोबाइल में दिखता तो रहूंगा रोज़ हर रोज़।

Tuesday, January 30, 2018

यमुना से एक शाम मुलाकात



कौशलेंद्र प्रपन्न
कल आफिस से लौटत वक़्त शाम हो गई। मेट्रे से गुज़रते हुए पहली बार शाम में यमुना को देखा। ऐसी यमुना शायद पहले नहीं देखी थी। शांत, धीर गंभीर अपने कालेपन के साथ लेटी थी। उसपार का नज़ारा भी दिलचस्प था। रोशनी से झिलमिलाती यमुना और यमुना पार कुदसिया किनारा। निगम बोध से उठते धुएं भी दिखाई दिए। जो लोग अब कभी शाम और सुबह से गवाह नहीं होंगे। जिन्हें अब नौकरी पर जाना नहीं होगा। पता नहीं क्यों जब जब निगम बोध घाट को यमुना के इस पार यानी शास्त्री पार्क की ओर आते वक़्त देखता हूं तो ऐ अज़ीब सी बेचैनी और सूनापन महसूस होता है। गोया कोई मुन्तज़िर है। कोई धीमी आवाज़ में पुकारने की कोशिश कर रहा है। इसी निगम बोध पर मैंने भी अपने तीन बुज़ूर्ग को सुलाया है। हमेशा हमेशा के लिए।
यमुना तो शांत थी ही मन किया हिला कर, टोटलकर पूछूं कि कैसी रही शाम और दिन कैसे कटा। कितने लोग अंतिम यात्रा में तुमसे मिलने आए। आदि लेकिन यमुना भी क्या जवाब देती सो पूछना रह गया।
व्यास और झेलम से भी मुलाकात हो चुकी है। साथ ही हिन्द नदी से भी लेह में मिल चुका हूं। जब हिन्द नदी और मिलते देखा तो वहां वो कितने तेज़ रफ्तार में थी। जहां मिल रही थी वहां हरे और मटमैले रंगों की चादर ओढ़े मिल रही थी। कि जैसे दोनों बहने न जाने कितने मुद्दत बाद मिल रही हों। आपस में बतिया रही हों कि किन किन मोड़ और मुहानों से गुज़र कर आ रही हैं।
नदीयां भी कितनी निर्वासन की जिं़दगी बसर करती हैं। अकेले जंगल,पहाड़, पत्थरों से टकराती बिन कुछ कहे बहती रहती हैं। कई बार मन में एक हूक सी उठी और पूछने को आगे झुका व्यास बोलो तो कितनी निर्लिप्त रहती हो। कैसे रह पाती हो। चुपचाप कैसे बह लेती हो। लेकिन म नही मन सुन भी लेता हूं उसके जवाब को कि यही तो नियति है।
सोन जहां मैं जन्मा। देश की ऐसी नदी नहीं बल्कि नद है। जिसकी पूजा नहीं होती। नद माने पुरुष। और ताज्जुब कि उस नद को तथाकथित अभिशाप मिला हुआ है। उसका पूजा कोई नहीं करता। अमरकंटक मध्य प्रदेश से निकल कर हमारे यहां आता है। और आगे चल कर आरा के पास मिल जाता है। यह मिलना और फिर मिलना किसी और नदी में। अपने आपको समृद्ध करना ही तो है। अपने अस्तित्व और पहचान को दूसरे में मिला लेना कोई आसान काम नहीं है।
सो कल शाम जिस यमुना से मिला वो शांत और अकेली थी। बस थीं तो किनारे। गाड़ियों की रोशनी और स्टी्रट लाइट से मुनव्वर होती यमुना थी। कल ही तो मिला। जहां अलग अलग प्रांतों से आए और यमुनावासी हो गए। शायद यहां गहरी नींद लेंगे।

Monday, January 29, 2018

शिक्षा के चेहरे पर 168 तमाचा है



कौशलेंद्र प्रपन्न
हाल ही में मध्य प्रदेश के नवोदय विद्यालय में होमवर्क नहीं करने पर शिक्षक के आदेश पर सहपाठी ने बच्ची को 168 बार तमाचा मारा। यह तमाचा एक बार नहीं मारा गया। बल्कि इस अदायगी को एक सप्ताह में पूरा दिया जाना था।
कभी तमाचा कभी छड़ी, कभी उठा बैठक, कभी छड़ी से बच्चे को इतना मारना कि हाथ ही टूट जाए, बत्तख की चांच में सही रंग न भर पाने में कान क पास तमाचा इस कदर रशीद करना कि बहरा हो जाए आदि ऐसी घटनाएं हैं जो देखने में मामूली सी हों। लेकिन यह तमाचा दरअसल शिक्षा के चेहरे पर है।
आखि़र क्योंकर कोई शिक्षक ऐसे बरताव करना है? कब करता है? और किन हालात में हाथ उठाता है इस गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है। क्या हमारी शिक्षक-प्रशिक्षण में कहीं कमी रह गई? क्या हमसे कहीं शिक्षक के चुनाव में चूक हो गए। आख़िर कहां हमने भूल कर रहे हैं।
यह तथ्य कई बार सामने आ चुका है। बल्कि कृष्ण कुमार ने हाल ही में आउटलुक और इंडियन एक्सप्रेस में लेख के ज़रिए अपनी बात रखी है कि शिक्षक शिक्षण को अंतिम विकल्प के तौर पर चुनते हैं। ऐसे में वो प्रतिबद्धत नहीं आ पाती जो शिक्षकों से अपेक्षा की जाती है।
शिक्षक की सामाजिक स्थिति, पहचान और प्रतिष्ठा तो दांव पर लगा ही है साथ ही इन्होंने अपनी विश्वसनीयता भी खोई है। कितना अच्छा होता कि शिक्षक संवेदनशीलता और जिम्मेदारी से कक्षा में बरताव करते। हालांकि इस हक़ीकत से भी नहीं भाग सकते कि इसी दिल्ली में प्राथमिक शिक्षकों को तीन तीन माह पर सैलरी मिला करती है। कैसे चलते होंगे उनके खर्चे। कभी नहीं सोचा। एक शिक्षक किन मानसिक दबावों में स्कूल में शिक्षण कर रहा है यदि इसे भी ध्यान में रखें तो शिक्षक हिंसक और खतरनाक नहीं बल्कि एक निरीह सा दिखाई देगा। हालांकि कई शिक्षक मित्रों को इस शब्द पर एतराज़ हो सकता है क्योंकि मैंने निरीह कहा। जबकि सच्चाई यही है। जब से सैलरी बेस्ट टीचर हुए हमारे शिक्षकों की पहचान कम होती चली गई।
लेकिन आज भी हम ऐसे शिक्षकों की तारीफ करते हैं। सम्मान करते हैं जो अपनी कक्षाओं में शिद्दत से पढ़ाते हैं। जो कहीं भी मिल जाएं हम उन्हें नमस्कार करते हैं। नमस्कार से ज़्यादा मन सम्मान में ठहर जाता है।

Thursday, January 25, 2018

तक़सीम, फिल्म विवाद और बच्चे



कौशलेंद्र प्रपन्न
देश के साथ तक़सीम की कहानी सत्तर साल से भी ज़्यादा पुरानी हो चुकी। लेकिन आज भी लगता है कि हम रोज़दिन एक तक़सीम, एक टीस और एक पीड़ा से गुज़र रहे हैं। हाल ही में एक फिल्म को लेकर देश भर में कई सारी महत्वपूर्ण घटनाओं को पीछे धकीया कर एक फिल्म पर सारा देश उबल रहा है या उबाला जा रहा है।
बच्चों से भरी बस को निर्ममता से तोड़ फोड़कर आग लगाई गई। बच्चों की पुकार, रूलाई साफ़ सुनाई दे रही थी। बस जिसे सुनाई नहीं दे रही थी। वही उस घटना को अंज़ाम देने में लगे थे। देश के विभिन्न कोनों, शहरां, राजधानियों से ख़बरें लगातार आ रही हैं। कमाल की बात यह है कि न्यायपालिका सक्रियता के साथ अपनी भूमिका निभा चुकी। किन्तु कार्यपालिका और लोकतंत्र के पहरूओं की नींद नहीं खुल रही है।
एक ओर हमारा समाज अत्याधुनिक संसाधनों से लैस हो रहा है वहीं हम उसी रफ़्तार से पीछे की ओर भी जा रहे हैं। जिस तेज़ी से अहिष्णुता हमारे बीच पसर रही है उसे देखते हुए लगता है कि हम किस समय में जी रहे हैं। विरोध और समवैचारिक बात को हमस ह नहीं पा रहे हैं। क्यों हम चाहते हैं कि सभी मेरी ही ज़बान बोलें। क्यों सभी आपकी हां में हां मिलाएं। लेकिन यही ज़िद्द है कि तमाम फ़सादों को जन्म दे रही है।
तक़सीम पर बात शुरू हुई थी। इसके पीछे मकसद यही था कि वह बेशक 1947 में घटित हुई। किन्तु रोज़दिन व्यक्ति अलग अलग नामों से तक़सीम की पीड़ा को सह रहा है। कई सारी ट्रेनें वाघा बॉडर पार कर चुकीं। कई सारी बसें हमारे बीच चलीं और रूकीं किन्तु दोनां मुल्कों के बीच की हवाएं आज भी आपसी रवादारी को भूली नहीं है। न ही उम्मीद छोड़ी है कि कभी तो ऐसा मंज़र आएगा जब दोनों के बीच सहज और सुगम आवा जाही हो सकेगी। 
विवाद किस पर और क्यों किसके द्वारा अमलीजामा पहनाया जा रहा है इसकी पहचान ज़रूरी है। तब विवाद और संवाद की संभावनाओं की तलाश की जा सकती है।

Wednesday, January 24, 2018

मैनेजमेंट से भावना निकाल दो



कौशलेंद्र प्रपन्न
एक इल्मगार ने राय दी कि मैनेजमेंट में भावना के लिए कोई जगह नहीं होती। जो व्यक्ति भावुक होता है वो एक बेहतर मैनेजर नहीं हो सकता। यदि आप मैनेजर बनना चाहते हैं तो भावना को दूर रखिए। वरना दिल,भावना, संवेदना से लोग और कंपनी मैनेज नहीं होती। इसके लिए कठोर और वस्तुपरक होना होता हैकारण यही हैकि एण्क मैनेजर को कई सारे कठोर कदम उठाने होते हैंसंभव हैउसके कदम से किसी की जिं़दगी बदल सकती है।संभव हैकि कोई सडक पर आ जाए।
तथाकथित एक सफल मैनेजर वही माना जाता है जो लोगों से ज़्यादा कंपनी की हित की सोचे। बेशक किसी की नौकरी लेनी पड़े तो भी वह उसे फायर कर देता है। जबकि मैनेजमेंट का सिद्धांत मानता है कि यदि एक व्यक्ति की वजह से दस की टीम प्रभावित हो रही है। काम नहीं कर पा रही है तो उस एक व्यक्ति को मैनेज करना चाहिए न कि पूरी टीम ही बदल दी जाए। ऐसे में कंपनी को मानव संसाधन की हानि होती है।
ऐसी स्थिति ख़ास कर जब दो कंपनियों की मर्जन हो रही होती है या फिर एक्यूजिशन चल रहा हो तो कंपनी की पॉलिशी कई बार मानव संसाधनों पर ही पहला प्रहार करती है। लोगों की छटनी और फायर शुरू हो जाती है। जबकि कंपनी को अपने बेहतर कर्मी को बचाना चाहिए। क्योंकि अंत में काम मैनेंजर की बजाए उनकी टीम किया करती है। हां यह अलग मसला है कि चालाक मैनेजर दूसरे के काम और एवार्ड को भी हाईजेक करने में ज़रा भी नहीं हिचकते।
स्ांवेदनशील होना शायद मैनेजर के लिए उचित नहीं माना जाता। यदि एचआर संवेदनशील हो जाए तो किसी ऐसे व्यक्ति को फायर ही न कर पाए जो पर्फाम ही नहीं कर रहा है। कई मर्तबा एचआर को भी कठोर कदम उठाने पड़ते हैं। लेकिन सवाल यह उठ सकता है कि क्रू मैंनेजर को संवेदनशील होना चाहिए या प्रैक्टिकल? यदि कंपनी को हानि हो रही है तो व्यक्ति को फायर करते वक़्त किस तरह का रूख़ अपनाना चाहिए।
2008-09 की मंदी के दौर में हज़ारों लाखों लोगों की नौकरियां चली गईं। ऐसे में एचआर और कंपनी को बड़ी मुश्किल दौर से गुजरना पड़ा। एचआर के सामने एक चुनौती यह आई होगी कि कैसे किसी पुराने व अन्य कर्मचारियों को बुलाकर कहा जाए कल से आपको नहीं आना। आप तीन माह की सैलरी ले लें और कल से आपका सिस्टम लॉग आउट हो जाएगा आदि। समझना होगा कि एक मैंनेजर ऐसे फैसले कैसे लेता होगा। 
एक बेहतर मैनेजर से उम्मीद की जाती है कि वह एक कुशल नेता भी हो। कुशल नेता के साथ ही भविष्य द्रष्टा के गुण भी उसमें हो। यदि कभी उसकी टीम पर कोई जवाबदेही आती है तो उसके लिए वह हमेशा साथ खड़ा हो। बजाए की पीछे हटने के। जो पीछे चला जाता है वह ना तो मैंनेजर हो सकता है और न नेता ही।

Tuesday, January 23, 2018

रवीश अकेला क्या करेगा जब कूप में ही भंग पढ़्यो हैं...



कौशलेंद्र प्रपन्न
रवीश जी की रिपोर्टिंग और स्टोरी का चुनाव सच मायने में पत्रकारिता को मानीख़ेज़ है। इन्होंने गए साल के आख़िर के दो महा तक लगातार टीचर, विश्वविद्यालय आदि की ज़मीनी हक़ीकत को उजागर किया। उस पर सरकार की नींद नहीं खुलनी थी सो नहीं खुली। पिछले दिनों रवीश जी ने सरकारी नौकरियों के मकड़जाल को साफ करते हुए स्टोरी कर रहे हैं। इन्हें ज़रूर देखा जाना चाहिए। बल्कि नागार समाज को अपनी आवाज़ भी बलंद करने की आवश्यकता है।
रवीश जी ने बिहार, झारखंड़, राजस्थान आदि राज्य कर्मचारी आयोगों की कलई खोली। कहां तो नौकरियों के विज्ञापन 2015त्र 2016 आदि में प्रकाशित हुए। परीक्षाएं हुईं। मगर पास करने वालों को अब तक नौकरी नहीं मिली।
युवाओं की आंखों में सरकारी नौकरी के सपने तो खूब भरे बल्कि ठूंसे गए लेकिन वे सपने आज तक पूरे नहीं हुए। किसी की आयु निकल गई। कोई घर के खर्च चलाने में सपनों को झोंक दिया। शादी हो गई तो वे सपने भी अधूरे ही रहे। कुछ के आंसू अब तक नहीं सूखे। बल्कि सपने संजोने वाली आंखों में एक जलन है। टीस है और ज़िंदगी में पिछड़ जाने की डभकन है।
रवीश जी अक्सर बताते हैं कि संसाधन की कमी है इसलिए ज़्यादा से ज़्यादा लोगों से स्टोरी नहीं ले पाते। लेकिन जितनी भी स्टोरी की हैं वो हमारी आंखें खेलने वाली हैं। इनका एक वाक्य है- जनवरी में आम खिलाउंगा। दो पूरी और खा लीजिए। आदि कितनी सहजता से व्यंग्य में बड़ी टीस की बात को कही जाए यह कौशल रवीश के पास है।
माफी चाहता हूं। यहां मैं रवीशीय गाथा गान नहीं कर रहा हूं। बल्कि वर्तमान की टीस को कोई पत्रकार कैसे और कब उठाए इसकी ओर इशारा करना मेरा मकसद है। जब तमाम मीडिया घराने उनकी बाइट्स दिखाने, और अन्य मसलों में अपना वक़्त ज़ाया करते हैं। ऐसे समय में कोई तो है जो सरोकारी मुद्दे को ज़िंदा रखता है। पूरी शिद्दत से उठाने का माद्दा रखता है। 

Monday, January 22, 2018

बसंत कहां हो भाई...



कौशलेंद्र प्रपन्न
बसंत कहां हो भाई नज़र नहीं आते। तब तो तुम पीले पीले सरसों के संग खेत खलिहान में दिखाई दे दिया करते थे। अब तुम्हारे आस-पास से हाइवे निकला करती हैं। तुम तो सिमटते जा रहे हो। हां सड़कों की चौड़ाई बताती हैं कि खेत जहां तुम लहराया करते हो वह सिकुड़ती जा रही है। बल्कि एक मुट्ठी में समा गए हो।
कभी तुम्हीं पर निराला ने कविताएं लिखीं। तुम्हीं पर गीत लिखे गए। अब न खेतों में तुम हो, न मन में मयूर की तरह थिरकते हो। न लहराते हो फिर काहे का बसंत और किस बात के मौसमों के आने पर खुश हों।
जब तुम आया करते थे। जब सर्दियां हुआ करती थीं। गरमी भी। हेमंत भी। अब तो गोया सारी ऋतुएं जाने कहां किस अंतरिक्ष में बिला गई हैं। और एक ही मौसम हमेशा सवारी करता है वह है गरमी।
देखा ही है तुमने कि किस प्रकार ग्लेशियर पिघल रही हैं। कैसे जंगल कट कट कर कंक्रीटों के शहर में तब्दील हो रहे हैं। जमीन और मिट्टी तो बस शायद खेत-गांव के हिस्से ही महदूद हो गए।
हां कभी तुम आया करते थे। केदारनाथ सिंह की कविता में ठिगना चना मुरेठा बांधे आया करता था। हम अब उसे छोलिया के तौर पर ही जानते हैं।
आज बसंत पंचमी है। यानी ज्ञान-विद्या की मातृशक्ति सरस्वती का दिन। इस दिन मुझे राजेंद्र मिश्र जी ने खरी छुआई थी। यानी पहली दफ़ा स्लेट पर चॉक से लिखवाया था। तब से जो शब्द हाथों से चिपके आज तक नहीं छूटे। हां राजेंद्र बाबू जो हमारे संस्कृत के गुरु थे वो भी संसार से छूट गए। मगर उनकी वाणी और शब्द आज भी मुझे में जीया करते हैं।
शब्द शायद ऐसे ही गमन किया करते हैं। भाषा भी इसी तरह कई मोड़ मुहानों से होती हुई हमारी जिं़़दगी में घर बना लेती है।
सभी शब्द, ज्ञान श्रमिकों को बसंत पंचमी की बधाई।

Friday, January 19, 2018

प्रद्युम्न के बाद...यानी मारा गया बच्चा




कौशलेंद्र प्रपन्न
प्रद्युम्न के बाद एक और बच्चे की जान चली गई। स्थान भी स्कूल और हत्या करने वाला भी बच्चा। दोनां ही घटनाओं में एक साम्यता है। वो है स्कूल,शिक्षा और बच्चे। दोनों की मनोदशा को पढ़ने की आवश्कता है। क्यों आख़िर बच्चे इतने हिंसक और आक्रामक होते जा रहे हैं। क्यों बच्चों में भी धैर्य और सहनशक्ति की कमी होती जा रही है। वो कौन सी स्थितियां हैं जब बच्चे हिंसक हो जाते हैं। कब बच्चे अपना धैर्य खो बैठते हैं।
पिछले साल मैचेस्ट विश्वविद्यालय में एक रिसर्च पेपर पढ़ा गया जिसमें इन्हीं मसलों का ज़िक्र है। बच्चे जब स्क्रीन पर ज़्यादा वक़्त ज़ाया करते हैं तब उनके अंदर हिंसा, अकेलापन, तनाव, चिंता और अनिद्रा जैसी बीमारियां पैदा होने लगती हैं। इस बीमारी को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने गेमिंग िउस्ऑडर का नाम दिया है।
स्क्रीन एडिक्शन यानी लत। लगातार फोन, टीवी, टेबलेट्स, आई पैड आदि के स्क्रीन पर बच्चे वक़्त गुज़ारते हैं। ऐसे बच्चों में आक्रामक व्यवहार, अनिद्रा के शिकार, ध्यान की कमी, आत्मकेंद्रीकरण आदि पनपने लगती हैं। दूसरे शब्दों में इस बीमारी को इंशोमेनिया कहा गया है।
हाल की दो घटनाएं यहां साझा करूंगा। पहला एयरपोर्ट पर सुरक्षा जांच के दौरान एक दो साल की बच्ची को लगातार आइपैउ में आंखें गड़ाए देखा जो तकरीबन एक से डेढ घंटे का वक़्त रहा होगा। कइ्र बार लगा बच्ची सो रही है। लेकिन ऐसा नहीं था। उसकी मां ने बताया ये जगी हुई है। और यदि इससे आईपैड लेने की कोशिश करूं तो रेने लगती है। चिल्लाने लगती है। यह तो लक्षण बता रही थीं जिसका ज़िक्र मैंने उक्त पैरा में किया। दूसरी घटना एक अस्पताल में साथ बैठी महिला कही बच्ची को देखा। वो फोन में लगातार गाने, गेम्स खेल रही थी। जैसे ही कोई फोन आया उसने उसे काट दिया और अपना खेल ज़ारी रखी। उसकी मां ने बताया ये स्वयं यू ट्यूब पर गाने, कविता, कॉटून आदि देख और खोल लेती है। इस बताने में एक गर्व का दर्प उनके चेहरे पर तारी हो रहा था।
उन्हें नहीं मालूम कि ऐसे बच्चों में भाषा और गणित सीखने की क्षमता धीरे धीरे कम होने लगती है। यह भी उस रिपोर्ट में लिखा गया है जो मैनचेस्ट विश्वविद्यालय में पढ़ी गई थी।
अब तय हमें करना है कि हम बच्चोंं को खुद की आजादी के लिए उन्हें गेम्स और स्क्रीन डिजिज दे रहे हैं या उनका बचपन और आयु ख़राब करने की ठान ली है।

Thursday, January 18, 2018

जो साथ चलें...वो सपना



कौशलेंद्र प्रपन्न
जीवन में कई स्तरों और कई सीमा पर लड़ना होता है। इनमें से एक अहम सीमा है अपनी सीमाओं को पहचानना। हम अकसर अपनी सीमाओं की पहचान किए बगैर सपने देखने, बुनने लगते हैं। दूसरी सीमा हमारी इच्छाओं और क्षमता की होती है। हम सपने तो पाल लेते हैं लेकिन उसे पूरा करने के लिए जिस प्रकार की मेहनत और क्षमता की आवश्यकता पड़ती है वह हम नहीं कर पाते।
आज का सबसे बड़ा संघर्ष यही है कि हम अपनी सीमाओं और क्षमताओं का आंकलन किए बिना सपनां को संजोने लगते हैं। हालांकि सपनों को बुनने में कोई सीमा नहीं होती और न ही कोई बंधन लेकिन उन सपनों को कैसे पूरा करेंगे इसकी रणनीति अहम हो जाती है। यदि हमने सपनों के मकूल रणनीति बना कर आगे बढ़ते हैं तब हमारे सपने पूरे भी होते हैं और संतुष्टि भी होती है कि हमने अपने सपने पूरे किए।
मसलन मेरा सपना था कि मैं एक सफल और कुशल पत्रकार बनूं। लेकिन इस सपने को पूरा करने के लिए समय पर सही कदम नहीं उठाया। जब समय था तब कुछ और कोर्स किया। कहीं और वक्त लगाए। लेकिन मन में कहीं न कहीं यह टीस बनी रही कि पत्रकार बनता। और यह सपना पूरा हुआ। लेकिन उसकी खुशी नहीं हुई। क्यांकि वह वक्त पर नहीं मिला।
यह तो व्यक्तिगत तज़र्बा रखा शायद ऐसे हज़ारां युवा हैं जिन्हें जाना कहीं और था लेकिन अगर मगर की वजह से ग़लत प्रोफेशन में खम गए। बल्कि उनसे पूछिए तो बताएंगे कई सारी कहानी कि क्यों वो वो नहीं बन पाए जिसकी चाह थी। मसला बस इतना ही हैकि हम समय और सपनों के अनुसार रणनीति नहीं बना पाते।
हम छोटी छोटी उपलब्धियों में खुद को खुश कर लेते हैं। उन्हें छोटी उपलब्धियों को जीवन का लक्ष्य मान बैठते हैं। दिक्कत यहीं आती हैं। कहते हैं उडान और सपने असीम होते हैं। उन्हें बांधना वास्तव में खुद को सीमित करने जैसा है।पाश की एक कविता हैकि आग खतरनाक नहीं होता, सांप भी खतरनाक नहीं, बल्कि सुबह दफतर से स्कूल जाना और शाम घर लौट कर टीवी देखना, आंखों में सपनों का मर जाना खतरनाक होता है।

Tuesday, January 16, 2018

कहने को बहुत है मगर...




कौशलेंद्र प्रपन्न
सबके पास कहने को बहुत है मगर किससे कहें और कैसे कहें यह मसला है। मसला तो यह भी है कि कब अपनी बात को कही जाए। हर व्यक्ति के पास हज़ारों दास्तां है मगर वक़्त और व्यक्ति के अनुरूप नहीं कह पाते। कहना था कि हज़ारां बातें कई बार अनकही ही रह जाती हैं। और न कहने वाली बात ज़बां पर आ जाती है।
सीधी सी बात है कि जब हम कहते हैं तो कहना क्या चाहते हैं पहले उसी को तय कर लें। और जब कहना क्या है तय हो चुका उसके बाद कैसे कहना है वह फॉम हमें चुनना पड़ता है। कहन के अनुसार फॉरमेट का चुनाव बेहद ज़रूरी हो जाता है।
कहन में शैली यानी स्टाइल काफी मानीख़ेज़ है। यदि सही तरीके से सही शब्दों के माध्यम से नहीं कहा गया तो पूरा का पूरा कंटेंट ख़राब हो जाता है। कई बार बेहतर कंटेंट की भी हम हत्या कर बैठते हैं। यदि हमने सही शब्दों और फॉम का चुनाव नहीं किया तो। इसलिए कम से कम भाषा और शब्दां से खेलने वालों को अपनी शैली और कहन पर तो काम करने ही पड़ते हैं।
हमारे सामने कई लेखक,कवि, कथाकार आदि हैं जो बेहतर कहानी, कविता लिखते हैं। वो लोग अपनी शैली और भाषा पर बड़ी ही शिद््दत से काम करते हैं। वरना दूसरी तीसरी रचना के बाद वे पाठकों की दुनिया से उतर से जाते हैं। क्योंकि कब तक कोई पुरानी फसलों पर ज़िंदा रह सकता है।
यदि भाषाकर्मियों को जिं़दा रहना है तो उन्हें अपनी भाषा, कहन और शैली पर तो ठहर कर काम करना ही होगा। जैसे हमारे समय में कई लेखक हैं जो अपनी भाषा को लेकर ख़ासा गंभीर होते हैं। उन्हें पढ़ना एक तरह से अपनी भाषा को गढ़ने जैसा होता है।

Monday, January 15, 2018

बिसुरते हुए रिश्तों को बचाया जाए

अन्यथा न लेंगे...साझा कर रहा हूं
कौशलेंद्र प्रपन्न
इन दिनों एक बात मुझे परेशान रही है। बल्कि समझने के लिए आपके सामने यह मसला रख रहा हूं। मसला सामान्य और पेचीदा दोनों ही है। हमने अपने बचपन से देखा है कि हम और हमारे बच्चे मामा, मामीख् नाना नानी, मौसा मौसी के घर जाना चाहते हैं। उन्हें वहीं ज़्यादा मजा आया करता है।
चाचा चाची, बुआ फुफा के घर बच्चे कम ही जाते हैं। ताउ जी भी हुआ करते थे। उनका घर भी अब सूना रहता है। कुछ से बात की कि क्या मामला है। तो जवाब दिया कि कई बार पैसे और आर्थिकी प़ा भी काम करता है। यदि मामा-मामी का पक्ष पैसे वाला है तो वहां बच्चों को गिफ्टख् मजा मस्ती ज़्यादा होती है। ख्ुल कर उन पर पैसे किए जाते हैं। यदि चाचा चाची, दादा दादीख् ताउ कमतर हुए तो बच्चे वहां जाना कम पसंद करते हैं।
इन रिश्तों का एक डोर यह भी है कि यदि पापा को लगता है कि भाइयों के पास जाने पर और भी मुश्किलें आ जाएंगी। कोई पूछ बैठेगा और कैसा चल रहा है। फलां जगह घूमने गए थे। बहुत पैसे हैं कुछ हमारी भी मदद कर दे। आदि इन सवालों से बचते हुए पापा भाइयों बहनों के पास जाने से बचते हैं।
कहीं पढ़ा था पाकिस्तान की लेखिका हैं सबूहा ख़ान उन्होंने लिखा है कि कई बार हमें अपनी कामयाबी को खुद ही छुपाना पड़ता है। कहीं कोई और उसमें हिस्सा मांगने न आ जाए। शायद यह भी डर है कि भाई लोग बहनों के यहां जाने की बजाए सालियों के यहां जाना ज़्यादा पसंद करते हैं।
मुझे अपने पिताजी याद आते हैं वो स्वयं अपनी बहनों के यहां जाया करते थे और हमें भी छुट्टियों में लेजाया करते थे। गरमियों की छुट्टियों में बुआ खुद भी कई बार हमारे घर आ जाया करती थीं। मामी भी आती थीं। मजा हमें दोनों के ही आने में आता था। मामी जब जाया करती थीं या हम जब मामी के यहां से बिदा होते थे तो पांच रुपए हाथ में पकड़ाया करती थीं। वैसे बुआ भी पांच रुपए और दस रुपए हाथ में थमा देती थीं। आज भी मामी बिदाई पर दस रुपए और पचास रुपए पड़काती हैं। मना करने पर कहती हैं रख लीजिए। मालूम है आप अब कमाने लगे हैं। ये तो मामी का प्यार है।
मामी और बुआ के बच्चे बड़े हो गए। सब के सब अपनी अपनी दुनिया में व्यस्त हैं। कौन कहां हैं अब तो वर्षों मुलाकात नहीं होती। मां-पिताजी जिं़दा हैं और वे रिश्ते अभी भी सांसें ले रही हैं। लेकिन साफ दिखाई देता है कि इनके जाने के बाद हमारी पीढ़ी न तो मिलने जा रही है और न न्योता पेहानी ही होने वाला है। काश कि हम इन बिसुरते हुए रिश्तों को बचा पाएं। 

Thursday, January 11, 2018

लब पे आती है बन तमन्ना मेरी मत गाना लड्डो



कौशलेंद्र प्रपन्न
‘‘दया कर दान विद्या का हमें परमात्मा देना, हमारा धर्म हो सेवा हमारा कर्म हो सेवा। वतन के वास्ते जीना, वतन के वास्ते मरना। बहा दो प्रेम की गंगा, दिलों में प्रेम का सागर। सदा ईमान हो सेवा’’ आदि। इन पंक्तियों पर कुछ लोगों का एतराज़ है कि इन पंक्तियों से ख़ास लोगों, धर्म, संप्रदाय आदि का बढ़ाया जा रहा है और नास्तिक व अन्य धर्मां की भावना आहत हो रही है इसलिए इस प्रार्थना को हटा देना चाहिए। हाल ही में मध्य प्रदेश के एक व्यक्ति ने सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका दाख़िल की थी। इस जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने सरकार से चार हप्ते में जवाब देने को कहा गया है।इस विवाद के केंद्र में हैकेंद्रीय विद्यालय संगठन के तमाम स्कूल जहां यह प्रार्थना गाई जाती है।इस प्रार्थना को आज से नहीं बल्कि पिछले पचास वर्षों से केंद्रीय विद्यालयों के स्कूलों में सुबह की प्रार्थना सभा में शामिल की गई है।पहली नज़र में इन पंक्तियों में कोई विवाद या मतविभिन्नता नज़र नहीं आती। बल्कि पूरी प्रार्थना में ऐसी कोई पंक्ति व भावनाएं ऐसी नहीं हैंजिन्हें सुन व बोल कर किसी और धर्म व संप्रदाय की भावना आहत होती हो। देश सेवा व देश की रक्षा में हर नागरिक की जिम्मेदारी और भूमिका सुनिश्चित है।कोई भी इस बात से इंकार नहीं कर सकता कि देश की रक्षा करना व रक्षा करने के भावना को प्रकट करना ग़लत है।इस प्रार्थना में प्रभू व अल्ला से इसी भावना को मज़बूत करने कि इच्छा प्रकट की गई हैकि मेरे अंदर देश प्रेम और देश की रक्षा के लिए हम पीछे न हटे। अब सोचने की बात यह हो सकती हैकि यह भावना किसी भी धर्म,संप्रदाय के मानने वाले हों यदि वे भारत में रह रहे हैंतो उस देश की रक्षा हो। उसपर किसी भी प्रकार की विपदा या असुरक्षा न हो क्या यह कामना करना ग़लत नहीं है।वह चाहे किसी भी संप्रदाय व जाति, धर्म के हों यदि भारत में हैं तो उसकी रक्षा प्रथम है।देश सुरक्षित नहीं तो उसके नागरिक क्या सुरक्षित रह पाएंगे?
प्रार्थना के अंत में वेद की पंक्तियों का प्रयोग किया गया हैजो शांतिपाठ के रूप में प्रयोग किया गया है।यदि हमें वेद की ऋचाओं से गुरेज़ हैतो परमवीर चक्र में लिखित दधीच की रीढ़ की हड्डी के प्रतीक को भी निकाल बाहर करना होगा। हमें तो अशोक चक्र में उल्लिखित सत्यमेव जयते वाक्य पर भी एतराज़ जतलाना होगा। हमें एक और पीआइएल डालने होंगे कि इन पंक्तियों को हटा देना चाहिए। क्योंकि इनमें वेद व उपनिषद् से मंत्रों के अंश लिए गए हैं। क्योंकि इससे किसी और धर्म, संप्रदाय के लोगों की उपस्थिति नहीं है।दूसरा गंभीर मसला यह भी हैकि क्या हम महज विरोध और विवाद को हवा देने के लिए तर्कों का सहारा ले रहे हैं या हमारा मकसद वृहद फलक को ठीक करना है।आज न केवल यह प्रार्थना विवाद में आया हैबल्कि हाल ही में राष्ट्रगान पर भी न्यायालय ने आदेश दिए हैंकि सरकार तय करे कि नागरिक सिनेमा हॉल में राष्ट्रगान के वक्त खडे हों या नहीं।

Wednesday, January 10, 2018

1947-48 के बाद का मंज़र



1947-48 के बाद का मंज़र
कौशलेंद्र प्रपन्न
सन् 1947-48 इतिहास का वह का वह कालखंड़ है जब न केवल ज़मीन का बंटवारा हुआ बल्कि कई ज़िंदगियां भी तक़्सीम हुईं। इधर और उधर के लाखों लोगों के सपने बिखरे और टूटे भी। यह ऐसी घटना थी जिसमें न केवल भारत बल्कि पाकिस्तान भी तबाह हुआ। आज जब हम उन वर्षों को याद करते हैं तो आज भी आंखें नम हो जाती हैं। आंखें सूनी सूनी हो जाती हैं।
इस तक़्सीम को सामाजिकों ने अपने अपने तरीके से महसूस किया। उसे याद किया और कहानी कहने की कोशिश की कि वह कहानी नहीं थी। वह उपन्यास नहीं था। न ह ीवह नाटक था। बल्कि लोगों के ख़ून से लिखी जा रही स्मृतियां थीं जिन्हें भूलाए नहीं भूल सकते। जिन्ने लौहार नई वेख्या ते जनमिया नई, कितने पाकिस्तान, ट्रेन टू पाकिस्तान, टोबा टेक सिंह, खोल दो, आजादी की छांव में आदि कहानी, उपन्यास और नाटक लिखे गए। यह एक साहित्यकार भी अभिव्यक्ति थी। यह एक संवेदनशील नागर समाज की तड़प थी जो पन्नों पर उतरती चली गई।
हाल ही में शिवना प्रकाशन ने एक नहीं बल्कि दो किताबें ऐसी छापी हैं जिन्हें पढ़ना मतलब 1947 के मंज़र को जीना है। उन घटनाओं से रू ब रू होना है जिसे तब के परिवारों ने सहा और जीया। एक 1947 दिल्ली से कराची वाया पिंडी सबूहा ख़ान की लिखी है। यह कविता या कहानी नहीं बल्कि एक संस्मरण है। जब सबूहा को महज इतना भर याद रह जाता है कि दिल्ली में उनके घर में काले और सफेद रंग की टाइल्स लगी हुई थीं। अम्मी बड़ी ख़ानदान की बेटी थीं और पापा रोहतक के पास के गांव से आते थे। अम्मी की ज़िद्द के आगे दिल्ली बस गए थे। 1947 में तबाह और मजबूर हो कर सबूहा का परिवार कराची कूच कर जाता है। रास्ते में रेलगाड़ी में खचाखच भीड़ उसमें एक महिला प्रशव पीड़ा से परेशान होती है जिसकी हिफाज़त उसकी मां करती हैं।
पाकिस्तान में दूसरे के घर पर कबजा किया जाता है। वहीं रहती हैं। अम्मी इतनी मज़बूती से पेश आती हैं कि कलक्टर से भी लड़ पड़ती हैं और वह हवेली उनकी हो जाती है। फिर भी सबूहा को भारत और कभी कभार याद आता है। पाकिस्तान तो उनका बचपन और युवावस्था का देश रहा। इस किताब में सबूहा कहती हैं कि कहानी कई बार हमें जीवन की सच्चाई से दूर करती है। और यह कहानी नहीं बल्कि मेरा भोगा हुआ यथार्थ है।
यदि यह किताब मिले तो पढ़ें ज़रूर। 

Tuesday, January 9, 2018

हॉल 12 के सिवा मेला और भी है





कौशलेंद्र प्रपन्न
हॉल 12 की अपनी दस्तां है। हर कोने, मोड़ पर कहानी पसरी हुई है। जिससे मिलिए वही कहानी सुनाता है। वही कवि मिलते हैं। तमाम भारतीय भाषा में साहित्य उपलब्ध हैं। न केवल साहित्य बल्कि और भी चीजें मिलेंगी। ध्यान,धर्म,नौकरी सब कुछ तो इस हॉल में है।फिर कौन जाए हॉल 13 को छोड़कर किसी और हॉल में।
जनाब मेला हॉल 12 के अलावा और हॉल में भी हैं। मगर बेचारे और हॉल दुर्भागे हैं। शायद उन्हें श्रोता, पाठक और भीड़ वैसी नहीं मिल पाता जितना 12 को मिला करता है।हॉल 7 और आठ भी इसे मेले के अंग हैंलेकिन दक्षिण भर टोले की तरह।
हॉल 7 में बच्चों को लेकर नहीं गए तो बच्चों की रोचक दुनिया से परिचय पाने से महरूम रह जाएंगे। साथ ही पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए हॉल 7 को सजाया गया है। उसे नहीं देखा तो कुछ भी नहीं देखा। हॉल आठ में साहित्य मंच है और अन्य प्रकाशक हैं। लेकिन इन्हें भी श्रोता और पाठकों की राह तकनी पड़ती है। जबकि हॉल 7 और 8 में देखने,सुनने और महसूस करने को बहुत कुछ हैं।
पर्यावरण के साथ ही पानी के संरक्षण को लेकर कुमार प्रशांत और मनोज मिश्र की बातचीत बेहद ख़ास मानी जाएगी। इसी हॉल में उपभोक्ता, र्प्यावरण और साहित्यकार भी भूमिका पर संपन्न विमर्श में सुनने वालां की निहायतज ही कमी थी। वहीं हॉल 12 में उसी वक्त हो रहे कवि सम्मेलन में भीड़ थी कि खड़ी थी। शायद यह विधा के साथ ही रूचि का भी मसला है। मगर मेला किसी एक विधा व हॉल के आधार पर नहीं आंकी जा सकती। बाकी खुद जा कर देखें।

Saturday, January 6, 2018

पुस्तक-मेला, लेखकीय झोला और हामिद



कौशलेंद्र प्रपन्न
पूरे सालभर के बाद मेला आया है। मेला वो भी किताबों का। हामिद एक साल से इंतज़ार में था। उसे भी मेले में बोलने का मौका मिलेगा। उससे भी किताबों के लोकार्पण के निमंत्रण मिलेंगे। वो भी लंबा और चमकदार कुर्ता और बंडी पहन कर मेले में जाएगा। हासिद के दोस्त नए नए कपड़ां, किताबों, कवर पेज के साथ मेले में जाने के लिए हुलस रहे थे। लेकिन हामिद की किताब शाम तक उसके हाथ में नहीं आई। परेशान हामिद इधर उधर फोन करने में लगा था। प्रकाशक बार बार समझा रहे थे कोई बात नहीं। यहां कौन लोकार्पणकर्ता पढ़कर आता है। कवर पेज दिखा दीजिए बोलने वाले उसी पर बोलते रहेंगे। हामिद की अम्मी ने कहा अपने साथ झोला लेते जाना। और कुछ हो न हो कम से कम किताबें बटोरने में आसानी होगी। हामिद नहा धोकर मेले के लिए निकल गया। आखि़र उसकी भी तो किताबें आनी थीं। बड़ी मुश्किल से सिंह और वर्मा जी तैयार हुए थे।
किताबों का मेला हर साल की भांति इस वर्ष भी पाठकों को बुला रहा है। न केवल पाठक बल्कि लेखक, प्रकाशक, वितरक आदिके लिए एक ऐसा उत्सव होता है जहां ये तीनों चारों घटक एक ही छत के नीचे मिला करते हैं। लाखों किताबें मेले आती हैं। उनकी ढुलाई,बिक्री, साजो सज्जा आदि में भी लाखों रुपए खर्च होते हैं। उम्मीद इस बात की होती है कि पाठक और खरीद्दार आएंगे। कम से कम पाठक आएं न आएं संस्थाएं आएंगी तो उनकी एक मुश्त बिक्री संभ्राव हो जाएगी। पिछले साल के मेले पर नोट बंधी का असर साफ देखा और महसूसा गया था। लोगों के पास पंड़ाल में बिक रहे पिज्जा, कॉफी महंगी चीजों को खरीदने के पैसे थे किन्तु जब किताबों की बारी आती है तब हमारी जे़ब हल्की हो जाती है। वजह प्राथमिकता का है। हमारे जीवन में पढ़ना, किताबें, शिक्षा आदि की जगह धीरे धीरे नहीं बल्कि बहुत तेज़ी से सिमट रही हैं। हम किताबें भी वैसी खरीदने से नहीं हिचकते जो बताती हो कि सफल वक्ता कैसे बनें। हम कहां अपने पैसे लगाएं कि कम समय में ज़्यादा रिटर्न मिल सके। बिज़नेस, मैनेजमेंट आदि की किताबें जिस तदाद में बिक रही हैं। उस अनुपात में साहित्य की किताबें कम बिकती हैं। उसमें भी जो मनोरंजन, उमंग, हास्य प्रधान किताबों होती हैं उसको हाथों हाथ पाठक उठा लेते हैं। मसलन कोई किताब विवादास्पद मुद्दे को केंद्र में रखकर लिखी गई है।तब भी किताब की बिक्री बढ़ जाती है।समझने की आवश्यकता हैकि क्या किताबें महज विवाद पैदा करने, सनसनी फैलने व बिक्री के लिहाज़ से लिखी जाती हैं। माना जाता हैकि साहित्य की भूमिका समाज व पाठक को संवेदनशील बनाना भी होता है।प्रो. कृष्ण कुमार बड़ी शिद्दत से मानते और कई जगहों पर जिक्र भी कर चुके हैं कि साहित्य और ख़ासकर हिन्दी कविता, कहानी का शिक्षण स्कूली स्तर पर जिस लचर तरीके से हो रहा है उसे देख कर बहुत क्षोभ होता है। साथ ही एक पीड़ा भी होती है कि हिन्दी साहित्य के विभिन्न विधाओं में इतने विद्वान लेखक हुए हैं किन्तु उनके पाठों का शिक्षण उतनी ही गैर जिम्मेदाराना तरीके से स्कूलों में शिक्षक पढ़ाते हैं। प्रो. कुमार मानते हैं कि यदि कहानी कविता को बेहतर तरीके से पढ़ा-पढ़ाया जाए तो काफी हद तक हम हिन्दी को बचाने में सफल हो सकेंगे।
आज की तारीख में जिस संख्या में साहित्य की विभिन्न विधाओं में लिखी जा रही हैं उनमें कविता,कहानी, उपन्यास ही प्रमुखता पाती हैं। वहीं दूसरी विधाएं लगभग उपेक्षित रह जाती हैं। उसमें भी ख़ासकर बाल साहित्य तो हाशिए पर ही जा चुका है। बाल साहित्य के नाम पर जिस प्रकार की कहानियां पढ़ने को मिलती हैं। उसे देखकर लगता है कि हिन्दी और गैर हिन्दी भाषायी साहित्य जगत् में बाल साहित्य को लेकर गंभीरता छिजती जा रही है। बाल साहित्य के साथ ही कथेत्तर साहित्य की स्थिति भी शोचनीय है। डायरी, यात्रावृतांत, रिपोतार्ज़, संस्मरणण आदि में जिस प्रकार की रचनाएं हो रही हैं या तो वे रोशनी में नहीं आतीं या फिर उन्हें समीक्षा की परिधि से ही बेदख़ल कर दिया जाता है। मेले में न केवल इस मेले में बल्कि पिछले कई मेलां का विश्लेषण करें तो पाएंगे ि कवे ही किताबें ज़्यादा बिकी जिन्हें समीक्षक मिले, जिन्हें रोशनी में लाने वाली चर्चाएं मिलीं या फिर बाज़ार में जिनके नामों को खूब बजाया गया। ऐसे में अच्छी से अच्छी किताबें बिना पढ़ी कहीं पड़ी रह जाती हैं। जिन किताबों को समीक्षक मिले, जिन्हें लोकार्पण का अवसर मिला वो कुछ देर के लिए कवर से बाहर झांक पाईं बाकी वहीं कार्टून में बंद रह गईं।
हामिद को मेले में किसिम किसिम के लोग मिलेंगे। हामिद की अम्मी ने ताकीद किया था कि बचना ऐसे वैसे लेखकों से जो सब्जबाग दिखाएंगे किन्तु मार्गदर्शन करने के नाम पर तुमसे कुछ चाह रखेंगे। कुछ मदद की मांग करेंगे। किन्तु हामिद न माना। वो उन झोला बटोरू लेखकों की गिरफ्त में आ ही गया। उसकी किताब का लोकार्पण होना था। सो समय पर कोई न आ सका। न वो लेखक जिन्होंने वायदे किए थे। थे तो वे वहीं उसी मेले में किन्तु मंच पर हामिद को साथ होने की पहचान से बचना चाहते थे। सो हामिद मंच पर प्रकाशक और घर एक एक दो सदस्यों के साथ नज़र आया। अम्मी भी नहीं आई। क्योंकि उन्हें सिलाई, बुनाई करनी थी। वो तो हामिद का मन रखने के लिए किताब छपवाने को कह दिया था। पैसे भी दे दिए थे। हामिद आज बहुत उदास था। दूसरी ओर दूसरे कुर्ताधारी लेखक,कवि महोदय दूसरे स्टॉल पर हंसते, दांत निपोरते नज़र आए। आएंगे ही क्योंकि उस प्रकाशक ने उनकी कविता की किताब जो छापी थी।
पिछले उन्नीस सौ चौरान्बे से पुस्तक मेले के आयोजन का तजर्बा रखने वाले राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के संपादक का कहना है कि उन्होंने जिस तरह की लेखकीय झिझलापन, रीढ़विहीन बरताव भारतीय पुस्तक मेले में देखा है वैसी स्थिति दूसरे देशों में नहीं देखी। वो अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि अन्य देशों में लेखकों को सुनने के लिए श्रोता-पाठक डालर कर देते हैं। लेखकीय वक्तव्य को सुनने के लिए श्रोता-पाठक जब पैसे देता है तब लेखक और पाठक के संवाद कहीं न कहीं सार्थक दिशा में भी जाती है। यहां तक कि लेखक से बातचीत करने, उसकी रचनाओं और रचना प्रक्रिया पर चर्चा करने के लिए श्रोता-पाठक टिकट खरीदते हैं। वहीं भारतीय पुस्तक मेले में लेखक ऐसे जनसुलभ होते हैं जैसे शौचायलयों की दीवारों पर लगे पोस्टर। कोई भी कहीं भी पढ़ ले और आग बढ़ जाए। सच पूछा जाए तो आज की तारीख में लेखकों ने अपनी कीमत और सम्मान खु़द ही कम किया है। कई ऐसे लेखक कवि, व्यंग्यकार हैं जो मेले में सुबह से शाम और रात तक यहां वहां जहां तहां बिछते,पसरते और रिरियाते नज़र आते हैं। हो भी क्यों न साल भर कमरे में कैद लिखते-पढ़ते एकांत जीवी लेखक साल में एक बार ही सही अपना गला साफ करते हैं। कुछ लेखकों के चेहरे इतने रिकार्ड हो चुके होते हैं कि वही चेहरे तकरीबन हर एक दो दुकानें (बुक स्टॉल, मंच) पर बोलते, खखारते नज़र आएंगे। सुबह ख़ाली झोला लेकर आते हैं और शाम तक उनके पास कई झोले, किताबें हो जाती हैं।

Friday, January 5, 2018

कहानी पढ़ना-पढ़ाना और लिखना





कौशलेंद्र प्रपन्न
कहानी लिखना और सुनना जितना आसान है उससे ज़्यादा शायद कहानी कैसे पढ़ाएं यह समझाना है। कहानियां हम खूब लिखते-पढ़ते और सुनाते हैं लेकिन जब कहानी बच्चों को कैसे पढ़ाएं यह उतनी ही चुनौतिपूर्ण होती है।
कहानी कहना और कहानी पढ़ाना भी एक कौशल माना जाता है। इस कौशल को भी हम अभ्यास से सीख सकते हैं।
हमने डॉ विभास वर्मा, कथाकार, संपादक, आलोचक और शिक्षक को कार्यशाला में आमंत्रित किया। इन्होंने जिस शिद्दत और बारीक तरीके से कहानी की बुनावट के बारे में बात की वह सचमुच अनुकरणीय रहा। शिक्षकों को इस सत्र में काफी कुछ सीखने को मिला।
हां शुरुआत में शिक्षकों को यह सत्र थोड़ा शुष्क और एकालाप सा लगा किन्तु आगे चल कर इससे जुड़ते चले गए। बीच बीच में मुझे कहना और समझाना पडा कि हर व्यक्ति की अपनी ख़ामियतें होती हैं। हर किसी की अपनी ख़ास प्रकृति होती हैऔर उसकी शैली भी। इसलिए किसी और से तुलना करना ठीक नहीं।
धीरे धीरे व्यक्ति अपने स्तर और गांठों को खोला करता है।इसलिए थोड़ा इंतज़ार कीजिए। व्यक्ति तुरंत नहीं अपनी विशेषताएं खोला करता है।इंतज़ार करें और देखें कि सामने वाला व्यक्ति क्या और कैसे अपनी बात को रखने की कोशिश कर रहा है।जैसे जैसे हम प्रतीक्षा करते हैं वैसे वैसे और और कंटेंट आकार लेते हैं।
कुछ ने कहा बोलने में ज़रा अधिक समय ले रहे हैं। शब्दों और वाक्यों के चुनाव में इन्हें ज़्यादा समय लग रहा है। जबकि भाषा और कहानी के व्यक्ति को इतना समय तो नहीं लगना चाहिए सर।
मान कर चलें कि हर कोई वक्ता ही हो यहह ज़रूरी नहीं। हर लेखक एक बेहतर वक्ता हो संभव नहीं। उसकी विधा लेखन की है। वक्ता की विधा बोलने में है। संभव है वह लेखन उतना बेहतर न कर पाए जितना अच्छा वह बोलता है।
बहरहाल अपना तज़र्बा तो यह कहता है कि ज़रूरी नहीं कि हर व्यक्ति बहुत अच्छा वक्ता ही हो। अच्छे अच्छे लेखक मंच पर उतनी धारदार तरीके से अपनी बात नहीं रख पाते। शायद इसमें नाटकीय कला की मांग हो, किन्तु वे औरों से बेहतर लिखते हैं।


Thursday, January 4, 2018

बुध्या मान कोनी



कौशलेंद्र प्रपन्न
कार्यशाला में तरह तरह के लोग होते हैं। कुछ इसी सोच से आते हैंं कि पढ़ाकर दिखाओ तो जानें। आप ही ज्ञानी हो हम क्या निरी ख़ाली हैं?
ऐसे लोगों से रू ब रू होना बड़ा ही दिलचस्प होता है। इन दिनों चल रही हिन्दी की कार्यशाला में ऐसे ही एक बुधना से मुलाकात हो रही है। हर बात पर अड़ जाते हैं। हर शब्द पर सवाल और तर्क करते हैं कि यही क्यों है? ऐसे ही क्यों लिखें। त्यौहार ही लिखते और पढ़ते आए हैं। इसमें क्या ग़लती है आदि। अपने तर्कों से सत्र को चलने नहीं देते। गोया संसद हो। अड़ गए तो अड़ गए। हम सत्र को चलने नहीं देंगे।
शब्दों के साथ तो एक पूरी कहानी और विकास यात्रा भी हुआ करती है। कभी विद्या लिखा करते थे। कभी दौर था जब शुद्व लिखा करते थे। लेकिन समय बदला और लेखन के स्तर पर विद््वानों से राय दी कि हम अब हिन्दी के लेखन स्तर पर अब कुछ इस तरह से लिखा करेंगे। केंद्रीय हिन्दी निदेशालय ने समिति बनाई और कुछ मानक शब्दों की लेखन रूपों को स्थाई किया। इसमें काफी पैसे और मैनपावर खर्च हुए होंगे। लेकिन बुधना मानने को तैयार नहीं कि हम क्यों मानें कि यही प्रमाणिक है।
मैंने उन्हें बताया कि आप जब भी दुविधा में हों तो कायदे से स्थापित और सर्वमान्य ग्रंथों में जवाब तलाशें। मसलन अरविंद कुमार समानांतर कोश, हरदेव बाहरी, फादर कामिल बुल्के जैसे कोशों में देखना चाहिए। इस पर जनाब ने फिर तर्क पेश किया इन्हें हम कैसे मानक मान लें। इन्हें ही क्यों मानें।
बुध््ना मान कोनी। नहीं मानें तो नहीं मानें। अपने अपने तर्क पेश करते रहे। अंत में मुझे कहना पड़ा कुतर्कों का अंत नहीं। सो यदि आपको नहीं मानना तो नहीं मानें। कम से कम बच्चों का ख़्याल करें। वे बच्चे आपको मानक मानकर चलते हैं।
ख़ुद साहब के खे गे उच्चारण कर रहे थे। जब कहा गया कि क ख ग बोलें तो फिर उन्हें अड़ना था सो अड़े। यह तो मेरी मात्री भाषा है। इससे कैसे अलग हो सकते हैं। अब ऐसे प्रतिभागियों से कई बार पूरी कक्षा परेशान तो होती ही है साथ पढ़ाने वाला बार बार उन्हें संतुष्ट करे या फिर उन्हें नज़रअंदाज़ कर आगे बढ़ जाए।
सेचना तो बनता है !!!

Wednesday, January 3, 2018

अतीतीय टटका रस और जोख़िम


कौशलेंद्र प्रपन्न
सामान्यतौर पर कहा जाता है कि कवि, साहित्यकार अतीतजीवी हुआ करते हैं। अपनी रचनाओं में अतीत को जीने की दुबारा कोशिश करते हैं। काफी हद तक सही भी है। लेकिन सच तो यह भी है कि कवि, साहित्यकार न केवल अतीत की यात्रा करता है बल्कि वहां से वर्तमान की रोशनी भी लेकर आते हैं। उसी रोशनी में वर्तमान को समझने और सुझाव भी प्रस्तुत करता है।
कहानियां, उपन्यास कविता आदि से अतीत को निकाल बाहर किया जाए तो शायद कहानियां थेड़ी कमजोर हो जाएं। कविताएं थोड़ी बुझी बुझी सी हो जाएं। किन्तु जब कथाकार अतीत का इस्तमाल करता है तो उन तत्वों को वर्तमान में रख कर समझता है। यही अंतर है इतिहासकार और कथाकार में। कथाकार काल-खंड़ को पुरर्सृजित करता है। जबकि इतिहासकार महज अतीत का मूल्यांकन करता है। इस मूल्यांकन की प्रक्रिया में इतिहासकार भी अतीत की यात्रा करता है।
प्रो. कृष्ण कुमार इसे अतीत में अटक जाने के ख़तरे भी मानते हैं। एक सामान्य व्यक्ति अतीत में जाता है तो इसकी भरपूर संभावनाएं होती हैं कि वह वहीं रह जाए। वहीं की संवेदना और भावजगत में अटक कर रह जाए। उसे जाना तो आता है लेकिन लौटने की विधि नहीं आती।
हमारे जीवन में भी ऐसे ऐसे अतीत हैं जहां हम कई बार जाना क्या सोचना तक नहीं चाहते। लेकिन क्या वज़ह कि फिर भी बार बार हमारा अतीत हमें याद आता है। हम अतीत की संवेदना को ज़िंदा रखना चाहते हैं। फलां ने मेरे साथ अच्छा नहीं किया। इसे कैसे भूल जाएं। कैसे कोई भूल जाए कि किसी की वज़ह से आपको अपनी ही नज़रों में गिरने की घड़ी भी सहनी पड़ी थी।
अतीत से लौटने के औज़ार सामान्यतौर पर कोई नहीं देता। हालांकि कहने वाले कहते हैं। कहते हैं कि भूल जाओ जो हुआ। नई जिं़दगी की शुरुआत करो। मगर एक मन है कि मानता ही नहीं। एक दिमाग है कि बार बार पुराने व्यवहार की मांग करता है। वह चाहता है कि फलां व्यक्ति के साथ जैसे संबंध अतीत में थे वे वैसे ही रहें। क्या यह संभव है?
नदी बहती रहती है। दुबारा उसी जलधार को हम नहीं स्पर्श कर सकते। हमें यह मानना और समझना होगा कि रिश्ते और शब्द दोनों ही संदर्भ बदलते ही मायने बदल लिया करते हैं। रिश्ते शायद हमेशा स्थाई भी तो नहीं होते। इसमें भी बाज़ार की तरह भाव चढ़ते और उतरते रहते हैं।

Monday, January 1, 2018

नए साल के काम...




कौशलेंद्र प्रपन्न

उगो हे कर्मयोगी उगो...

नए साल में हम सबने कुछ न कुछ ज़रूर सोच रखा है। सोचा नहीं तो सोचना तो होगा। हमें अपने साल की योजना तो बनानी ही चाहिए।
आज मेरी शुरुआत एक लेखन से हुई। इस साल का पहला लेख लिख कर सुखद एहसास हुआ। विषय बाल साहित्य समीक्षा से बाहर। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में वयस्कों के साहित्य की चर्चा तो होती है किन्तु बाल साहित्य उपेक्षित रह जाता है।
इस साल मेरी कोशिश होगी कि एक नई किताब को पूरा कर सकूं। इतनी ताकत और आत्मबल बना रहे कि इस किताब को पिछली किताबों से बेहतर बना सकूं।
हम सब के पास सीमित समय हैं। सीमित ही क्षमताएं होती हैं। कुछ लोग हैं जो प्रयास से अपनी क्षमता और दक्षता को विकसित कर पाते हैं। यदि हम योजनाबद््ध तरीके से कार्ययोजना बनाएं और उसपर अमल करें तो क्या मजाल कोई सफल होने से रोक सके।
बच्चे परीक्षा के भय से बाहर आ सकें। अपनी क्षमता और कौशल के आधार पर जीवन की राह चुनें। इससे बेहतर कुछ और नहीं हो सकता। लेकिन ऐसा ही नहीं हो पाता। बच्चे वयस्कों की इच्छाएं जीया करते हैं। कई बार यह जीना इतना भारी हो जाता है कि बच्चे जीवन ही छोड़ जाते हैं।
बच्चे हैं तो शिक्षा होगी। शिक्षा होगी तो बच्चों को बेहतर जीवन की तमीज़ दे सकेंगे।


Sunday, December 31, 2017

साल का अंतिम दिन




कौशलेंद्र प्रपन्न
कोई नई बात नहीं। हर साल ही यह आया करता है। लोग धड़ल्ले से जगह जगह जा कर सूचना फेंके जा रहे हैं। कोई फलां रिसॉर्ट में, कोई गोवा, तो कोई न्यूयार्क में नए साल में टहल रहे हैं। जो बच गए वो अपने घर, गांव, शहर में अपने काम में लगे हैं।
किसान खेतों में आलू, गाजर, गन्ने काट, उखड़ रहा है। महिलाएं बुग्गी हांकती हुई बाज़ार जा रही हैं गन्ने बेचने। नज़र नज़र और जरूरत की बात है। स्थान और जीवन की प्राथमिकताओं की बात है।
फर्ज़ कीजिए आप गांव में हैं तो वहां नए साल के लिए क्या करेंगे। क्या आप मॉल्स में जाएंगे? क्या आप मोमोज खाएंगे या घर में बैठे घर के बने खाना खा कर कल फिर खेत पर जाने की तैयारी करेंगे। अपनी अपनी जीवन की चुनौतियां हैं और जीवन के रंग हैं।
महज कैलेंडर की तारीखें नहीं बदलतीं बल्कि हमारी एक आदत और अगले साल फिसल जाती है। हमारी रूचियां और प्रौढ़ हो जाती हैं। हम ज़रा और वयस्क हो जाते हैं। हमारी दृष्टि और साफ हो जाती है।
कई बार हम अतीत के पन्नों को पलटने में ही नए साल यानी वर्तमान को बोझिल करते रहते हैं। जबकि पिछले पन्ने को फाड़ कर आगे नई इबादत लिखनी चाहिए। जो शब्द पिछले साल खोखले रहे गए थे उन्हें अर्थ से लबालब करने की ललक हो तो नए साल की किताब को और रोचक बनाया जा सकता है।
 

Friday, December 29, 2017

बाल साहित्य कोई न ख़बर लेवनहार



कौशलेंद्र प्रपन्न
वर्ष अपने अंतिम चरण में है। वयस्कों के साहित्य की समीक्षा की जा रही है। इस वर्ष कविता,कहानी, उपन्यास आदि विधाओं में कौन कौन सी किताबें प्रमुख रहीं।
हाल ही में पत्रकार व लेखक पंकज चतुर्वेदी जी ने पूछा कि बाल किताबों के नाम, कवर पेज और प्रकाशक लेखक सहित सूचित करें। यह एक बड़ा सवाल और उलझन पैदा करने वाला था। मैंने इस वर्ष की प्रमुख बाल किताबों की सूची बनाने में सफल नहीं रहा। थक हार कर कुछ बाल पत्रिकाओं के नाम तो गिना सका लेकिन किताबों के नाम नहीं बता सका।
क्या यह मेरी व्यक्तिगत हार है? क्या यह मेरी निजी असफलता है कि मैं बाल किताबों की पहचान व सूची नहीं बना सका? मुझे लगता है कि पूरे वर्ष हम वयस्कों की किताबों पर तो भरपूर बल्कि कुछ ज़्यादा ही वक़्त दिया करते हैं। लेकिन जब बाल साहित्य की बात आती है वैसे ही वयस्क नदारत हो जाते हैं।
पिछले दिनों जब अख़बार और पत्रिका तलाश रहा था तब बाल साहित्य के नाम पर पारंपरिक कहानियां मिलीं। पिछले पांच - छह सालों से अख़बारों के साल के अंतिम हप्तों में साहित्य विश्लेषण देखता रहा हूं जिनमें कहानी,उपन्यास, कविता आदि की चर्चा खूब होती रही है। बस उपेक्षित तो बाल साहित्य रहा करता है।

Thursday, December 28, 2017

जाल समेटा करने का समय...


कौशलेंद्र प्रपन्न
पता नहीं कहां कहां, कब, कैसे किसी को ठेस पहुंचा किया हमने। कहां न जाने हम गिरे। कहीं अपनी नज़रों में। तो भी दूसरों की नज़र में। अब गिरता तो गिरना है। वह जहां भी हुआ हो। उन उन लोगों से उन स्थानों पर पूरी संजीदगी के साथ और शिद्दत से मॉफी मांग लेने में कोई हर्ज़ नहीं है।
हम अपने तमाम कर्मां, गुण-अवगुणों के स्वयं मूल्यांकनकर्ता होते हैं। हमें कभी न कभी। किसी ने किसी के सामने अपनी ग़लतियों को कबूल कर लेना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि वक़्त निकल जाए और आप ग्लानि में सांसें लेते रहें।
हर साल, हर पल अपने साथ कई किस्म के तज़र्बे ले कर आया करता है। कुछ सुखद होते हैं तो कुछ टीस देने वाली। चेहरे तो हंसते रहते हैं लेकिन अंदर की नदी कहीं सूख रही होती है। आत्मबल कमजोर हो रहा होता है।
कितना बेहतर हो कि हम अपनी कमियों, ग़लतियों को स्वीकार कर लें और आत्मग्लानि से बच जाएं। सो यह काम हमें कर ही लेना चाहिए।
सुखद बातों को हम अक्सर याद रख लिया करते हैं। लेकिन जो छूट जाती है वह किसी कोने में पड़ी सुबकती रहती है। वह दुखद या कष्ट देने वाली घटनाएं हुआ करती हैं। मगर गौर से देखें तो वह पल भी तो हमारा ही हिस्सा हुआ करता था।
बस इतनी सी बात है जब भी हम अपनी बात, एहसास को स्वीकार कर और सही व्यक्ति तक पहुंचा देते हैं तब हमारी ख़्वाहिश पूरी हो जाती है। 

Tuesday, December 26, 2017

भीड़ में मैं या कि तुम


कौशलेंद्र प्रपन्न
जब से छुट्टियों को मौसम आया है तब से लोग दिल्ली छोड़ उड़ने में लगे हैं। जो उड़ नहीं सकते वो रेंग रहे हैं। जो रेंग नहीं सकते वे घिसट कर चलने लगे हैं।
दिल्ली को कोना कोना भीड़ में तब्दील हो चुका है। हर सड़क हर मॉल्स सजे हुए हैं। सड़कें कराह रही हैं। जिधर देखो उधर भीड़ ही भीड़ गाड़ियां ही गाड़ियां।
शायद हम कितने थक जाते हैं। पूरे साल काम करते करते। काम न भी करें तो छुट्टियों का इंतज़ार कुछ इस तरह होता है गोया इसके बगैर हम कितने अधूरे हैं।
आज कल ऑफिस में साथी कम हैं। शोर कम है। सभी कहीं न कहीं भीड़ का हिस्स बने हुए हैं। जहां होटल 500, 2000 में मिला करते हैं। वहीं उनके रेट आसमान छू रहे हैं।
होटल वाले, गाड़ी वाले। टै्रवल एजेंट सब के सब बिजी हैं। सर अभी बहुत महंगे हैं। आफ मौसम तो अब होता कहां है।
देश विदेश हर जगह लोग उड़ने को बेताब हैं। जिन्हें विदेश नहीं लिखा व मिला वो देश में ही अंतरदेशीय उड़ान भर रहे हैं।
हम इतना खाली पहले कभी नहीं थे। जितने अब होते जा रहे हैं। नाते रिश्तेदार कहीं खो गए। किसी से मिलने की न तो ललक बची और न वक्त। चाव तो कब की जाती रही।
बाहरी शोर से हमने अपने आप को भरना शुरू कर दिया है।

Monday, December 25, 2017

13,०० सरकारी स्कूल महाराष्ट्र में बंद 
खबर है कि महाराष्ट्र के पुणे के आस पास तक़रीबन 13,00 सरकारी स्कूल बंद हो गए .
शिक्षामंत्री का कहना है कि शिक्षा की गुणवत्ता काम होना मुख्या वजह है स्कूल में बच्चे नहीं हैं.
तर्क पर हँसा जाए या दुखी .

Wednesday, December 20, 2017

परीक्षा से डरी बच्चियां




कौशलेंद्र प्रपन्न
मेट्रो में सुबह का समय। सीट पर खचाखच भीड़। लेकिन सीट मिल गई। मैं अपनी किताब 100 संपादकीय 1978 से 2016 तक द हिदू पढ़ने लगा। मेरे पास बैठी लड़की और उसके दोस्त आपस में बात कर रहे थे। मैं सुनना भी नहीं चाह रहा था। लेकिन कुछ पंक्तियां कोनों से टकरा रही थीं।
‘‘यार! सुबह तीन बजे से जगी हूं। नींद नहीं आ रही थी। मम्मी बार बार कह रही थी पढ़े ले।’’
‘‘नींद गहरी आ रही थी।’’ ‘‘कल रात से सिर में बहुत दर्द हो रहा है।’’
आपसी बातें और तेज होने लगीं। बीच बीच में मैं नज़रे उठा कर उन्हें देखता तो ‘‘शॉरी अंकल’’
‘‘अंकल डिस्टब हो रहे हैं।’’
‘‘मैंने कहा कोई बात नहीं। कहां पढ़ती हैं? क्या कर रही हैं?’’
वे बच्चे इंटिरियर डिजाइनिंग का कोर्स महारानी बाग से कर रहे हैं। आज उनका पेपर डिजाइनिंग का था। सिद्धांत और प्रैक्टिल दोनों।
मैंने बातचीत का सिलसिला जारी रखा। क्यों डर लग रहा है।कितनी पढ़ाई हुई आदि।
मैंने बस उनके डर को हल्का करने के मकसद से कहा कि जब परीक्षा में प्रश्न पत्र आए तो पहले सवालों को पढ़ने और उसकी भाषा को समझने की कोशिश करना कि क्या पूछा जा रहा है।उसके अनुसार अपनी पढ़ाई को इस्तमाल करना। मॉल्स गए हो, शोरूम में जाते हो, वहां देखा होगा इंटिरियर डिजाइनिंग कैसी होती है।उन्हें एक बार ध्यान से याद करना। काफी हद तक तुम्हारे सवालां के जवाब निकलने शुरू हो जाएंगे। आदि
बातचीत में उन्हें परीक्षा के डर से बाहर निकालना था। उन्हें परीक्षा की प्रकृति और चरित्र पर बात कर उनके मन को हल्का करना था। मैंने उन्हें कहा कि परीक्षा क्या जांचना चाहती है।परीक्षा में हम क्या मूल्यांकन करना चाहते हैं?आदि उद्देश्य स्पष्ट हों तो परीक्षा डराती नहीं।
बातचीत में मालूम ही नहीं चला कि कब कशमीरी गेट आ गया।लेकिन जाते जाते बच्चों ने जो स्माइल दी और कहा, ‘‘ अंकल जी आपने आज हमारा दिन बना दिया’’हम से कोई इस तरह परीक्षा पर बात ही नहीं करता। हर कोई डराते हैं।
मुझे लगता हैअपने बच्चों से परीक्षा और शिक्षा के मायने पर रूक कर बात करनी चाहिए। संभव हैहम बच्चों को डिप्रेशन और तनाव से बाहर निकाल सकें।

शिक्षकीय दुनिया की कहानी के पात्र

कौशलेंद्र प्रपन्न ‘‘ इक्कीस साल के बाद पहली बार किसी कार्यशाला में बैठा हूं। बहुत अच्छा लग रहा है। वरना तो जी ...