Thursday, November 23, 2017

पढ़ाने के सिवा

कौशलेंद्र प्रपन्न
‘‘सुबह के आठ बजने वाले हैं। बच्चे अपनी अपनी नाक पोंछते हुए धकीयाते, मुकीयाते पंक्ति में खड़े हो रहे हैं। साथ में लगभग चिल्लाती, डाटती मैडम उन बच्चों के साथ खड़ी हैं। प्रार्थना संपन्न होता है। कुछ आदर्श वाचन होते हैं। अब बारी आती है अभिभावकों के लिए कि आधार कार्ड अब तक नहीं दिए जल्द जमा करा दें। बच्चो को समय पर स्कूल साफ सुथरे रूप में भेजें आदि। और अंत राष्ट्र गान से होता है।’’
‘‘कहानी अब शुरू होती है। शिक्षक/शिक्षिका एक एक कर बच्चों के नाम उपस्थिति रजिस्टर पर दर्ज करती जाती हैं। बीच बीच में कॉपी फाड़ने, चिकोटी काटने, मारने, गाली देने जैसे आम शिकायतों को निपटारा भी करती हैं। अब बारी है स्कूल के एक कमरे में लगे चेहरादर्ज मशीन के आगे सभी बच्चों को खड़ा करना और उपस्थिति दर्ज कराना।’’
हाल ही में बिहार के भागलपुर और औरंगाबाद में शिक्षा विभाग ने आदेश जारी किए कि स्कूल आने से पूर्वी और जाने के उपरांत अपने आस-पास यदि कोई खुले शौच करता मिले तो उसकी तसवीर खींच कर उन्हें भेंजें और उन्हें समझाने की कोशिश करें। पहली बात तो यही कि जिसकी तसवीर खींची जाएगी वह क्या सहजता से चुपचाप बैठा रहेगा या फिर मारने दौड़ेगा। दूसरी बात शिक्षक मैदान मैदान घूम घूम कर पता करे कि कौन खुले में शौच करता है। उसपर तुर्रा यह कि राज्य के शिक्षामंत्री मानते हैं कि इसमें हर्ज ही क्या है। शिक्षक समाज पढ़ा लिखा है। जनगणना आदि काम तो करते ही हैं। इसे भी अंजाम दे सकते हैं।
और कहानी ऐसे अंतिम मकाम पर पहुंचती है कि मिड डे के बाद 10.40 में बच्चे वापस कक्षा में आते हैं। अब शिक्षक के पास 10.45 से 12 बजे तक का समय होता है। इस समय में वह कितना पढ़ा पाता है। इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है। 

Wednesday, November 22, 2017

मोबाइल जी का साथ...



कौशलेंद्र प्रपन्न
काश! तुम लौट आते इक बार/ कितनी बातें/कितने चैट बिछ जाते बन पराग/जो तुम आ जाते इक बार महादेवी वर्मा जी की कविता से प्रभावित हो कर। मोबाइल जी क्या चले गए गोया पूरी दुनिया ही बरबाद हो गई। बार बार पॉकेट में हाथ जाए। कभी कहीं कभी कहीं मोबाइल जी को तलाशता रहा। लेकिन उन्हें नहीं मिलना था सो नहीं मिले। कुछ पल के लिए लगा सारी की सारी दुनिया बदरंग हो गई। कहीं कुछ भी नहीं हो रहा। न संगीत है। व आवाज है। और न यार दोस्त हैं।
वाकया क्या बताएं। बताते हुए रोना आता है। रे रो कर आंखें देखिए सूज गई हैं। अब तो आंखें अश्रुविहीन हो गईं। कहानी ही है मोबाइल की। कल ही तो मेटो्र में मोबाइल को चोर जी ने अपना बना लिया। उनके हाथ में खेलता इठलाता अपने पुराने दोस्त को पता नहीं याद करता होगा या नहीं। यह भी तो तब पता चले जब उनके मुलाकात और संपर्क हो सके। मैंने तो अपनी तरफ से खूब कोशिश की। कोशिश भी इतनी कि अपरिचितों से फोन मांगे।
कल का पूरा दिन खाली खाली बरतन का सा रहा। गुलज़ार के शब्दों में। मगर एक चीज हुई। पूरे दिन बिन टुनटूने के रहना का अपना सुख था तो अपनी कैफ़ियत भी थी। आस पास अब टेलिफोन बूथ भी तो नहीं रहे। सो किसी से भी फोन मांगना भीख मांगने जैसा है। दस बार अलग अलग नज़रों से देखते हैं। उनकी नज़रें आप पर टंगी होती हैं। किस को कर रहे हैं? कितनी देर बात कर रहे हैं आदि। उन्हें यह भी डर होता है कि इसके चले जाने के बाद कॉल बैक आए इन्हें कहां देखने जाउंगा।
शाम हुई तो फिर याद आए मोबाइल जी। अब अपनी सहयात्री को कैसे बताउं कि आफिस से निकल चुका हूं। कैसे बताउं कि कहां पहुंच गया आदि। कदम कदम पर टै्रकिंग होने बच गया। गूगल से ज्याद तेज़ अपनी सहयात्री होती हैं। जो स्टेशन स्टेशन आपको टै्रक करती हैं। कहीं बीच में तो नहीं उतर गए। कल इससे भी मुक्ति मिली।
कल तमाम सोशल अड्डा से बाहर रहा। सोच रहा था क्या क्या कहां कहां क्या हुआ होगा। इस चिंता और उत्सुकता से ऊपर उठ चुका था। न टी टी न लाइक्य, न कमेंट्स सब से बेख़बर।
आख़िर आप सोच रहे होंगे कि यह भी कोई कहानी है? क्या बेकार सी बात में आपका समय जाया किया। मगर बाबूजी कहानी तो कहानी होती हैं। वह मोबाइल की हो या इंसान की। उसकी कहानी हम सब की जिंदगी से जुड़ती चली जाती हैं।
चिंता न करें। आज मेरे पास मोबाइल है। नेटवर्क है। बातें हैं। और मोबाइल की तमाम पेचिंदगिंया हैं।

Monday, November 20, 2017

नदी जो गंदी रही



कौशलेंद्र प्रपन्न
नदी गंदी सिर्फ बाहरी तत्वों से नहीं होती। कई बार नदी को हम अपने हित में गंदी ही रखते हैं। यदि नदी साफ हो गई तो करोड़ों रुपए का व्यापार कैसे होगा। गंगा, यमुना, झेलम, चिराब आदि नदियां तो हैं ही जिन्हें बचाना है।
मगर एक नदी हमारे भीतर बहा करती है। इस नदी को साफ करने के लिए बाहरी अनुदान की जरूरत नहीं होती। हम चाहें तो अंतर नदी को साफ और निर्मल रख सकते हैं। लेकिन अफ्सोस कि हम अपनी अंतर नदी को गंदली ही रखना चाहते हैं। ताकि कोई तल की गहराई न जान सके।
यह नहीं कहता कि लोगों के चेहरे पर कई चेहरे होते हैं। यह तो बात पुरानी है। चलिए नए बिंब से देखते हैं। नद ीवह बिंब मुझे आई कि नदी केवल बाहर ही नहीं बहा करती। बल्कि एक नदी हमारे भीतर भी बहा करती है। निरंतर।
कई मोड़-भाव, मनोदशाओं के किनारों से टकराती बहती रहती है। हम इस नदी को बड़ी होशियारी से साफ नहीं रखते। यदि साफ हो गई तो लोगों को मालूम चल जाएगा कि फलां की नदी ख़ासा गंदली है। वह कभी भी अपनी नदी का प्रच्छालन नहीं करते।
हमारे भीतर बहने वाली नदी बेहद जरूरी है कि वो साफ सुथरी रहे। लेकिन साफ नहीं रख पाते। जबकि यम,नियम, प्रणायाम, धारणा, ध्यान आदि के जरिए हम चाहें तो अपनी अंतर नदी को निर्मल कर सकते हैं।
आध्यात्म में इस नदी को साफ करने के लिए साधनों का जिक्र है। लेकिन भौतिक सफाई की बात करें तो हमें अपनी अंदर और अपने व्यवहार को हमेशा जांचते रहना चाहिए। इससे हमें मालूम होता है कि हमने कहां और कब गलती की। इसलिए कहां गया है कि हमें मनसा,वाचा कर्मण किसी भी स्तर पर हत्या नहीं करनी चाहिए। लेकिन हम यह जानते हुए भी अनजाने में न जाने किस किस को मानसिक, भावनात्मक स्तर पर चोट पहुंचाते हैं।
दूसरे शब्दों में हमें न केवल अपनी भौतिक नदी को बचाने का प्रयास करना है बल्कि अंदर की नदी को भी निर्मल और स्वच्छ रखने का प्रयास करना है।

Friday, November 17, 2017

हवा में भेदभाव




कौशलेंद्र प्रपन्न
लगभग फ्लाइट टेक ऑफ करने वाली थी। कैबिन बंद हो चुके थे। बत्तियां बुझा दी गई थीं। घोषणा भी हो चुकी थी कि कृपया कमर बेल्ट बांध लें आदि। कि तभी आवाज़ आई ‘‘ आपको सुनाई नहीं देता कैप्टन ने अपनी सीट पर बैठने की घोषणा की है।’’
साधारण से कपड़े में खड़ा व्यक्ति सहम गया। शॉरी मैडम। और अपनी सीट पर जाकर बैठ गया।
तकरीबन चालीस हजार फीट की ऊंचाई पर लोग उड़ रहे थे। फिर आवाज़ आई ‘‘ आपको समझ नहीं आती, ऐसे खड़े होते हैं? सट के मत खड़ें हों। दूर जाइए।’’
दूसरी सवारी को बोली गई। वह भी सहम गया। ‘‘मैडम सट नहीं रहा था। आग जाने की जगह नहीं थी सो...’’
‘‘पता नहीं कहां कहां से आ जाते हैं। तमीज़ भी नहीं हैं।’’ बुदबुदाती हुई मैडम आगे बढ़ गईं। लेकिन मेरा मन थोड़ा ख़राब हो गया। इन्हीं की वजह से उनकी नौकरी है। ये हैं तो इनकी फ्लाइट उ़ड़ती है। और अपनी सवारी पर ऐसे बुदबुदाना...।
मगर उस साधारण से कपड़े में ट्रैवल करने वाला एक साधारण कामगर लगा। जो दो साल बाद अपने घर लौट रहा था। चेकिंग के दौरान उस पर नजर पड़ी थी। बड़े बड़े और भारी बैग उसके साथ खड़े थे। जब वे आपस में बात कर रहे थे तो उनकी भाषा भोजपुरी, अवधी और ब्रज मिश्रित सी महसूस हुई। एकबारगी ऐसा लगा किसी रेलवे फलेटफॉम पर हम खड़े हैं। लेकिन यहां अंतर था। लोगों के कपड़े,भाषा, हाव-भाव, बॉड़ी लैंग्पवेज एलीट किस्म के थे। उनके सब के बीच ये मजदूर किस्म की सवारी सभी को खटक रही थी। मेरे साथ बैठा सवारी सवारी ही कह रहा हूं क्योंकि अभी तक नाम नहीं जानता था। बातचीत शुरू हुई तो पता चला अफगानिस्तान में ऑर्मी विंग्स में गाड़ी चलाते हैं। छह माह के बाद आंख के ऑपरेशन के लिए भारत भेजा गया है। बातों ही बातों में कई बातें मालूम चलीं। फैलो यात्री हरियाणा के सोनीपत का रहने वाला था। अपनी वहां की कई ऐसी बातें साझा की कि आंखें ख्ुली रह गईं। उसकी ख़बरें किसी भी मीडिया में दिखाई नहीं देती। सौभाग्य था मेरा कि मुझे उसके वास्तविक तजर्बे को सुनने और जानने का मौका मिला।
बहरहाल जब दिल्ली एयरपोर्ट पर बिदा हुए तो महसूस हुआ आज ग्लोबल गांव में रहने वाले सब पहले इनसान हैं। जहां भी हैं जैसे भी हैं।

Thursday, November 16, 2017

उबाऊ प्रार्थना



कौशलेंद्र प्रपन्न
स्कूलों में आज भी उबाऊ प्रार्थना जारी है। तकरीबन बीस साल पहले प्रो. कृष्ण कुमार जी ने स्कूली प्रार्थना का विश्लेषण शिक्षा समाज को दिया था। जो पढ़ना चाहें वे बच्चों की भाषाः अध्यापक निर्देशिका में पढ़ सकते हैं।
स्कूलों में प्रार्थना जिस बेरूखी और उबाऊ तरीके से होती है कि जिसे सुनकर लगता है इससे अच्छा न हो। यह बरताव न केवल प्रार्थना के साथ किया जाता है बल्कि राष्ट्र गान भी उसमें शामिल है। कभी कभी स्कूलों में होने वाले प्रार्थना और राष्ट्र गान को सुनता हूं तजो लगता है हमारे बच्चे और शिक्षक किस स्तर तक उच्चारण के जरिए अर्थ का अनर्थ करते हैं।
शिक्षक की भूमिका में भी इसमें साफ झलकती है। शिक्षक सामान्यतौर पर हाथ बांधे अनुशासनात्मक व्यवस्था संभालने में लगे होते हैं। उनका काम बच्चों पर निगरानी रखना होता है कि वे ठीक से खड़ें हैं या नहीं। प्रार्थना व राष्ट्र गान गा रहे हैं या नहीं।
राष्ट्र गान में आए शब्दों को यदि कभी बच्चों के मुख से सुनने का अवसर मिले तो जरूर समय निकाल कर सुनें। जो लोग सिनेमा हॉल जो कि शुद्ध मनोरंजन स्थल है वहां भी राष्ट्र गान में खड़े होने, गाने की पैरवी करते हैं उनसे पूछा जाना चाहिए कि क्या वे स्वयं शुद्ध राष्ट्र गान करने में सक्षम हैं।
स्कूल जिम्मेदार नागरिक बनाने की पहली पाठशाला के तौर जानी जाती है। लेकिन वहां राष्ट्र गान और अन्य प्रार्थनाओं के साथ बच्चे रू ब रू होते हैं यह एक चिंतनीय विषय है। कायदे से प्रार्थना और राष्ट्र गान को शुद्ध उच्चारण के साथ गाया जाना चाहिए। हालांकि कुछ लोग यह तर्क दे सकते हैं कि शुद्धतावादियों ने ही हिन्दी व अन्य भाषाओं को सबसे ज़्यादा हानि पहुंचाई है। लेकिन फिर भी कम से कम राष्ट्र गान को सही तरीके से गाने की वकालत को नकारा नहीं जा सकता। यह भी देखना दिलचस्प होगा कि क्या स्कूलों में सभी बच्चों को राष्ट्र गान की तालीम दी जाती है? थोड़ी देर के लिए मान लें विद्यालय के पास सभी बच्चों पर ध्यान देने का समय नहीं है तो क्या घर-परिवार के सदस्यों ने कभी राष्ट्र गान को शुद्ध उच्चारण के साथ बच्चों को सुनाया या अभ्यास करने की कोशिश की है।
स्कूलों में बच्चे जो सुनते, पढ़ते,लिखते और बोलते हैं वो उनके साथ ताउम्र रहती है। यदि राष्ट्र गान व प्रार्थना ग़लत शैली व तर्ज़ पर बच्चों को मिली है तो उन्हें अतिरिक्त अभ्यास और प्रयास से ठीक करना पड़ता है।

प्रेस की आज़ादी संग जिम्मेदारी भी



कौशलेंद्र प्रपन्न
प्रेस की आज़ादी से हमारा क्या मतलब है? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता शायद यही अर्थ बेहद करीब बैठता है। सवाल यह उठ सकता है कि प्रेस को किससे, किस स्तर पर किस मकसद के लिए आज़ादी चाहिए आदि। प्रेस स्वत्रंत हो इसमें किसी को भी कोई गुरेज नहीं हो सकता। लेकिन प्रेस जब स्वयं निरंकुश हो जाए तो? प्रेस को भी नियंत्रण में रखने की आवश्यकता है?
प्रेस की आज़ादी और जिम्मेदारी दोनों को एक साथ एक मंच पर रखकर विचार करने की आवश्यकता है। प्रेस अपनी आज़ादी को क्या जिम्मेदारीपूर्वक निभा रहा है या नहीं इसकी भी जांच करने की प्रक्रिया और तंत्र हो तो बेहतर है। हालांकि समितियां और आयोगों का गठन किया जा चुका है। लेकिन दंतविहीन से क्या उम्मीद रखी जा सकती है।
किस ख़बर व किस घटना के साथ प्रेस को कैसे बरताव करना चाहिए यह प्रेस के लोकतांत्रिक विवेक पर ख़ासा निर्भर करता है। प्रेस का स्वविवेक क्या कहता है? किसी भी घटना व ख़बर में किसी की निजता का ख़्याल नहीं रखा जाना चाहिए। किसी ख़ास घटना पर कई बार प्रेस निर्णायक की भूमिका में होता है। यह शायद लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के लिए नहीं है। यह कार्यक्षेत्र किसी और का है। यह जिम्मेदारी किसी पहले,दूसरे या तीसे खंभे की है तो यह काम उसे ही क्यों न करने दिया जाए।
अतिउत्साह के शिकार प्रेसकर्मी कभी कभी बल्कि अब तो कोई भी ख़बर मिल जाए उसकी मार्केटिंग में पूरी रिसर्च विंग्स झोंक देती है। बजाए उस घटना के दूरगामी मारक क्षमता का ख़्याल किए।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हर व्यक्ति, समाज और लोकतंत्र के चारों स्तम्भों को चाहिए। यह अनुचित भी नहीं लेकिन हमें विचार करना होगा कि क्या हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इस्तमाल जिम्मेदारी के साथ कर पा रहे हैं।
हाल के तीन चार सालों में नागर समाज के लेखक,साहित्यकारों और पत्रकारों को उनकी अभिव्यक्ति की आज़ादी को जिस बेरहमी से कुचला गया जिसे देखते हुए लगता है कि पहला स्तम्भ इतना मजबूत हो गया है कि तमाम अभिव्यक्ति के मायने को अपने तरीके से व्याख्यायित करने पर आमादा है। ऐसे में प्रेस को आगे आना ही होगा किन्तु जिम्मेदारी को नज़रअंदाज़ करते हुए नहीं बल्कि अपनी जिम्मेदारी को निभाते हुए।
कलमुर्गी, दाभोलकर, पंसारे, गौरी लंकेश आदि की हत्या बताती है कि सत्ता को विरोध, आलोचना कत्तई पसंद नहीं। जो भी सत्ता के ख़िलाफ आवाज़ बुलंद करेगा उसे मौन कर दिया जाएगा।

Wednesday, November 15, 2017

चिड़ियों की बैठक






कौशलेंद्र प्रपन्न

शहर में ऐसी घटना पहली बार घट रही थी। चारों दिशाओं से तरह तरह की चिडियों की झुंड़ आ चुकी थीं। उसमें गिलहरी, बाज़, गिद्ध, सोनजूही, गरवैया,कौआ सब आज साथ थे। किसी ने भी उड़ान भरने से मना नहीं किया।
सोनजूही ने कहा ‘‘ आज तक, आज तक ऐसा नहीं हुआ।’’
‘‘इन लोगों ने पेड़ काटे हमने चूं तक नहीं किया।’’ हमारा बैठने का ठिकाना काट डाला।’’
गिद्ध और बाज़ चुपचाप सब सुन रहे थे। बीच में गिलहरी बोल पड़ी,
‘‘ इनकी चले तो हमें शहर से निकाल बाहर करें।’’
‘‘ख़ुद तो छोटे छोटे कोठरों में सिफ्ट हो गए।’’
‘‘हमारे लिए छोड़ा ही क्या है?’’
‘‘बिजली के खंभों पर बैठना भी महफूज़ न रहा अब तो। वहां भी कंटीले तार बिछा दिए इन इनसानों ने।’’
बाज़ कुछ बोलने को अपनी चोंच बाहर निकाली और कहा,
‘‘शुक्र है, तुम तो अभी भी शहरों में उड़ान भर पाते हो। बच्चे तुम्हें देख कर खुश हो लेते हैं। और गिलहरी तुम्हें क्या चिंता है पार्क में बच्चे, बड़े कुछ न कुछ खाने को डाल देते हैं।’’ ‘‘हम तो अब दूर की कौड़ी हो गए। एक दो हमारे परिवार के बचे हैं जिन्हें इनसानों को दिखाने के लिए चिड़ियाघरों में कैद कर रखा है।’’
‘‘लेकिन आज समय आ गया है अपनी भी आवाज़ बुलंद करने की। आख़िर ये इनसान हमें क्या समझते हैं?’’
बहुत ही बौखलाहट में कौआ बोले जा रहा था। उसके परिवार के चचा मेटो्र की चपेट में आ गए थे। शहर भर में धुआं ही धुआं। दो हाथ की दूरी तक कुछ भी लौका नहीं रहा था।
‘‘तार के ऊपर बैठे थे कि तभी मेटो्र दंदनाती हुई गुज़री और चचा उड नहीं पाए बेचारे।’’
हमसब पहले दो मिनट का मौन रखते हैं और फिर अपना आंदोलन शुरू करेंगे। 
देखते ही देखते कॉव कॉव करते हुए भारी संख्या में कौए आ गए। किसी ने इत्तला कर दी कि आज ट्रैक पर हजारों की संख्या में चिड़ियों ने धावा बोल दिया है। यात्री परेशान थे। दफ्तर के लिए देरी हो रही थी। सब के सब चिल्लाने लगे। चीखने लगे। उधर चिड़ियों ने ठांन रखी थी जब तब ऊंचे अधिकारी बात करने नहीं आएंगे कोई भी यहां से उड़ान नहीं भरेगा।
इस ट्रैक पर प्रवासी प़क्षियों की झुड़ भी उतर चुकी थी। आख़िर उन्हीं की प्रजाति के उड़ान भरने, जीने मरने का सवाल जो था।
वैसे एक प्रवासी कलगी वाली चिड़िया ने कहा,
‘‘ ठीक है कि हम साल में कुछ दिन यहां गुजारते हैं, लेकिन हैं तो हम ग्लोबल सिटिजन ही। ये लोग प्रवासी सम्मेलन करते हैं। उन्हें सम्मानित करते हैं। वहीं दूसरी ओर हमारे उ़ड़ान भरने, बैठने तक की मौलिक अधिकारों का तार तार करते हैं। ऐसा अब नहीं चलेगा।’’
लंबी पूंछ को हिलाती, लहराती हुई दूसरी चिड़िया ने कहा,
‘‘ हम इस मामले को यूएन और अंतरराष्ट्रीय कोर्ट में उठाएंगे।’’
सब ने हां हां, हम एक हैं। खुले गगन के हम वासी एक ईंट से ईंट बजा के रहेंगे।


Tuesday, November 14, 2017

बाल दिवस पर हांकें बच्चे




कौशलेंद्र प्रपन्न
खिलखिलाते फूल हैं हम इस जहां में, कौन जाने शाम तक कैसे रहेंगे...
मसला जितना आसान और सहज दिखाई देता है दरअसल है उतना ही कठिन। बच्चे बच्चे नहीं रहे। अपनी उम्र से दस कदम आगे बढ़ कर व्यस्क हो चुके हैं। उम्र से पहले पक से गए हैं। कोई भी रियाल्टी शो देख लें जो बच्चों के लिए, बच्चो के द्वारा बनाए जाते हैं उनमें बच्चे नहीं बड़े बचपन वाले होते हैं।
वह शो गायकी का हो, हंसी ठिठोली का या फिर डांस का। इन तमाम कार्यक्रमों में बच्चे नहीं बल्कि बड़े हिस्सा ले रहे होते हैं। बच्चियां व्यस्क महिला की तरह दिखने के तमाम संसाधन, पहनावा,साज-सज्जा आदि करती है। वहीं लड़के भी बड़ो के बोनसाई लगते हैं। यदि उनके चेहरे और कद ढक दिए जाएं तो अंतर कर पाना मुश्किल हो।
यह प्रतियागिता किनके लिए किनके द्वारा, किस उद्देश्य से निर्मित होती हैं इसे समझने की आवश्यकता है। बाजार के द्वारा बाजार को बढ़ाने के लिए ऐसे कार्यक्रमों को बच्चों के सर्वांगीण विकास के तर्कां के पीछे खेल रचा जाता है।
जो जीता वे भी रोता है और जो हारा उसके आंसू तो दिखाने ही हैं। एक पल में बच्चों को आसमान में उड़ान भरने के पंख लगाए जाते हैं तो दूसरे ही पल अन्य हजारों बच्चों में कुंठा ठूंस दिए जाते हैं। निर्णायक मंडल ठहाके मार कर अपने पैसे बनाते हैं। बीच बीच में अपने अनुभवों के छौंक मारते हुए अपनी उपस्थिति दर्ज कराते रहते हैं। इतना ही समय उनके पास है तो अपने काम पर ध्यान क्यों नहीं देते।
अधिकांश निर्णायक चूके हुए, छूटे हुए, फुरसतीए किस्म के नजर आते हैं। जिनके पास अपनी कहानी सुनाने और प्रतिक्रिया देने के नाम पर बेहद सतही शब्द होते हैं।
बचाना है हमें अपने बच्चों को। बचाना उस भीड़ और मेले से भी है जहां हमारे बच्चे बचपन में ही खो जाते हैं। फैशन और मीडिया का भूत कुछ ऐसा सिर चढ़ता है कि पढ़ाई -लिखाई पीछे कसमसा रही होती है। मां-बाप कचोटते, गरियाते मन मार कर शाम के शो में बिजी बच्चों को देख रहे होते हैं। कुछ कंप्रोमाइज करते हैं तो कुछ मोगैंम्बो की भूमिका में आ जाते हैं।

Monday, November 13, 2017

शिक्षा और परीक्षा पाटन के बीच



कौशलेंद्र प्रपन्न
शिक्षा और परीक्षा दो पाटन के बीच में बच्चे साबूत नहीं बचे। यह सिलसिला जमाने से बतौर जारी है। लेकिन हालिया घटनाएं बताती हैं कि शिक्षा अब डराने लगी है। परीक्षा तो उससे भी एक कदम आगे बढ़ चुकी है।
शिक्षा के बारे में माना जाता है कि यह इनसान को बेहतर बनाती है। लेकिन हक़कीतन ऐसा नहीं है। बच्चे आत्महत्या करते हैं तो इसमें शिक्षा भी कहीं बदनाम होती है। क्योंकि शिक्षा मृत्यु नहीं बल्कि जीना सीखाती है। बेहतर जीने की कला देती है ऐसा माना गया है।
परीक्षा का भय हमारे बच्चों में इस कदर धंस बैठ चुकी है कि निकाले नहीं निकलती। परीक्षा के भय को दूर करने के लिए कभी परीक्षा को ही खत्म किया गया। कभी बहुवैकल्पिक सवालों का युग आया। बच्चों को फेल न करने की पहलकदमी की गई। लेकिन परिणाम वहीं ढाक के तीन पात। बच्चे मरते रहे और मारते भी रहे।
इन घटनाओं में कहीं न कहीं हमारे शिक्षा के नीति निर्माता की भूमिका को नजरअंदाज नहीं कर सकते। समय समय पर शिक्षा की बेहतरी के लिए कई कदम उठाए गए। लेकिन क्या वजह है कि परीक्षा और शिक्षा का भय बच्चों से दूर नहीं हुआ।
परीक्षा जब शिक्षा पर भारी पड़ने लगती है तब शिक्षा के उद्देश्य पीछे रह जाते हैं। हमें यह तय करना होगा कि हम बच्चों को शिक्षित करना चाह रहे हैं या परीक्षा में पास करने के कौशल प्रदान कर रहे हैं। यदि महज परीक्षा पास करना और अंक हासिल करना मकसद है तो वह कई अन्य तरीकों से भी यह पूरा किया जा सकता है। लेकिन शिक्षा से मुहब्बत करना हमारा उद्देश्य है तो हमें अपने तरीकों पर ठहर पर सोचना होगा।
परीक्षा के मौसम आने वाले हैं। बच्चों पर इसका दबाव अभी से महसूसा जा सकता है।बल्कि अभिभावकों के तनाव स्तर को भी सहज ही देखा-सुना जा सकता है।कई अभिभावक अपनी गहरी कमाई ट्यूशन, कोचिंग आदि में दे रहे हैं।उम्मीद तो उनकी यही हैकि उनका बच्चा मेडिकल आदि में निकल ही जाएगा। लेकिन बच्चे से भी पूछने की जरूरत है।

Monday, November 6, 2017

विश्वविद्यालयः कहां गए वे दिनः शुक्रिया रवीश जी



कौशलेंद्र प्रपन्न
रवीश कुमार पिछले एक माह से विश्वविद्यालयी हक़ीक़तों से आम जन को झकझोरने की कोशिश कर रहे हैं। हाल ही में उनका यह उन्नीसवी कड़ी थी जिसमें झारखंड़ के महाविद्यालय की जर्जर हालत से रू ब रू कराया। पूरे माह विभिन्न विश्वविद्यालयों और कॉलेजों की पड़ताल की गई। उन स्टोरिज को देखते हुए महसूस हुआ कि हमारी उच्च शिक्षा व्यवस्था किस स्थिति से गुजर रही है।
ये कैसे विश्वगुरु बनने का सपना पूरा होगा यह पंच लाइन नहीं बल्कि नागर समाज के चेहरे पर जोरदार तमाचा से कम नहीं है। रवीश जी का मानना है कि इस एक माह में किसी भी शिक्षा मंत्री, मंत्री, समाज चेत्त्ता की ओर संज्ञान नहीं लिया गया। यही कोई और मसला होता तो बोलने वाले हजारों आ जाते। मगर क्योंकि यह मुद्दा शिक्षा का है इसलिए खामोशी सी छा गई।
इन कॉलेजों में पढ़ने वाले बच्चों के भविष्य के साथ हम किस प्रकार का मजाक कर रहे हैं इसका अंदाजा अभी शायद नहीं है। आने वाले बीस सालों में इसके परिणाम दिखेंगे।
गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय में तकरीबन पांच साल गुजारा। वह स्मृतियां आज भी ताज़ा हैं। ताज़ा इसलिए क्यांकि वहां की शैक्षिक व्यवस्था और शिक्षकों ने शिद्दत से पढ़ाया। न केवल विषय पढ़ाए बल्कि कई बार विषयेत्तर भी जाकर जीवन के मूल्य सीखाएं। जिनमें मैं बहुत सम्मान के साथ प्रो. सेंगर जो कि प्राचीन इतिहास के विद्वान थे, प्रो. एस एस भगत इंग्लिश के विद्वान थे जिन्होंने बच्चन जी से अंग्रेजी सीखी थीं। वहीं मनोविज्ञान में प्रो. ओ पी मिश्रा, प्रख्यात मनोवैज्ञानिक और मनोचिकित्सक, हिन्दी में प्रो. विष्णुदत्त राकेश, प्रो. कमल कांत बुद्धकर आदि के साथ ही वेद के जानकार प्रो. राम प्रकाश वेदालंकार, प्रो. महावीर अग्रवाल आदि थे। इन सब ने अपने विषय को पढ़ाने में ज़रा भी कंजूसी नहीं की।

Wednesday, November 1, 2017

इतिहास क्यों पढ़ें


कौशलेंद्र प्रपन्न
सुबह की मुलकात में एक सज्जन ने पूछा कि क्या आपको इतिहास पढ़ना अच्छा लगता है? क्यों इतिहास पढ़ना ही चाहिए? आदि।
सवाल जैसा भी था। लेकिन इसमें उत्तर से पहले मुझे स्वयं में झांकने की जरूरत पड़ी। यह एक आम धारणा और कहने का चलन है कि बाबर, गजनी, शिवाजी गांधी ने जो भी किया हमें उन तारीखों, उनके कामों को रटना क्यां पड़ता है। क्यां हम उनकी भाषा-बोली, समाज व्यवस्था आदि को याद करें। कि हड़प्पा की संस्कृति क्यों ख़त्म हो गई? आदि।
मेरा भी जवाब यही था कि बचपन से बीए तक की पढ़ाई के दौरान मैंने भी इतिहास को इसी नजर से पढ़ी जैसे और बच्चे पढ़ते हैं। यानी नंबर हासिल करना और परीक्षा पास करना।
लेकिन अब जब विचार करता हूं तो इतिहास का दर्शन बेहद लुभावना और दिलचस्प लगता है।इतिहास अपनी ओर खींचता है।दरअसल जैसे इतिहास को पढ़ाया जाता हैवह तरीका खराब है।परीक्षाओं में पूछने जाने वाले सवालों की प्रकृति से अनुमान लगाना कठिन नहीं होता कि इतिहास को शुष्क बनाने में सवालकर्ता की भी बडी भूमिका होती है।वरना यह जानना कितना दिलचस्प होता हैकि फलां राजा या फलां राज्य में कितनी अच्छी नागर व्यवस्था थी। भवन निर्माण से लेकर स्थापत्य कला कितनी विकसित थी।
इतिहास की यात्रा निश्चित ही जोखि़म भरा है।इतिहास में प्रवेश तो आसान हैलेकिन वहां से लौटना चुनौती भरा है।जब हम पूर्वग्रहों के साथ इतिहास को पढ़ते हैंतब का इतिहास वही नहीं रहजाता जैसा वास्तव में रहा होगा। दरअसल हमें इतिहास को अपनी नजर से पढ़ते और समझने की कोशिश करते हैं।
इतिहास यानी अतीत में अटकने की ज्यादा संभावनाएं होती हैं। इसलिए इतिहास को पठन-पाठन ज़रा कठिन है।अतीतीय यात्रा को समझ के लिए इस्तमाल करना हमेशा ही बेहतर रहा है।जब हम इतिहास को पढ़ते हैंतो एक बार पुनः उस कालखंड़, संस्कृति को जी रहे होते हैं।
अतीत में अटकी हुई चेतना श्रेष्ठ नहीं मानी जाती। बल्कि अतीत से वर्तमान को सुधारने की समझ लेकर कर लौटना गोया किसी लंबी यात्रा के बाद थकन उतारने जैसा है।

Tuesday, October 31, 2017

इंदिरा गईं मगर लोगों के घर भर गए



कौशलेंद्र प्रपन्न
सन् 1984। स्थान हरिद्वार। अक्टूबर का महीना। एकतीस तारीख। सच में इतिहास में दर्ज हो गया। इंदिरा गांधी की हत्या इसी तारीख को हुई थी। उसके बाद का मंजर सभी को मालूम है।
पूरे देश भर में लूटपाट, आगजनी, हत्या का खेल बड़े पैमाने में खेला गया। तब मैं शायद कक्षा पांचवीं में पढ़ा करता था।
हरिद्वार के गुरुद्वारे से सिखों को खींच खींच कर बाहर निकाल कर जलाएं जा रहे थे। जो भी हाथ लगता उसकी गर्दन में टायर डाल कर जलाया जा रहा था।
गंगा में सिखों की दुकानें लूट और जला कर सामान फेंके जा रहे थे। यह सारी लूट पाट मेरी भी आंखों के सामने घट रही थी।
रेलगाड़ियां सिखों की लाशों से पटी हुई थीं। दुकानें तो ऐसे लूटी जा रही थीं गोया उन्हीं ने इंदिरा जी की हत्या की हो।
मगर एकबात तो साबित हुआ कि इंदिरा जी की हत्या से ज्यादा लोगों ने अपनी घरें सामनों से भर लीं। क्या टीवी क्या फ्रीज घरों में सामान रखनी की जगह कम पड़ गई। बच्चा तो बच्चा बुढ़े भी घर भरने में लगे थे।

Monday, October 30, 2017

पापा टीचर ही तो हैं!!!


कौशलेंद्र प्रपन्न
हमारा मूल्यांकन समाज बाद में करता है पहले हमारे बच्चे ही मूल्यांकन करते हैं। शिक्षा उन्हें तर्क करना,मूल्यांकन करने, चिंतन करने के योग्य बनाती है तो हमें उनके मूल्यांकन के लिए मानसिकतौर पर तैयार भी होना होगा। यह अलग विमर्श का मुद्दा हो सकता है कि उनके मूल्यांकन के स्तर और सूचक क्या थे। उन्होंने अपने मूल्यांकन में किन बिंदुओं और मान्यताओं को तवज्जो दिया। कहीं बाजार द्वारा स्थापित मूल्यबोध उनके चिंतन शक्ति को तो तय नहीं कर रहा है? यह भी समझने की आवश्यकता है।
क्या टीचर प्रोफेशन इतनी निष्क्रियता भरी और हेय है कि जिनकी कमाई पर बच्चे पले बड़े हुए, अब तक शिक्षा हासिल की उन्हें अपने पिता की कमियों, नाकामियों, जीवन में असफल कहने की हिम्मत देती है। यदि ऐसी ही शिक्षा हमारे बच्चे पा रहे हैं तो हमें अपनी शैक्षिक उद्देश्यों, प्रारूपों पर विचार करने की आवश्यकता है। यदि शिक्षक के बच्चे स्वयं अपने पिता या मां को शिक्षक के रूप स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं तो यह बड़ी िंचंता की बात है। जब अपने ही बच्चों की नजर में टीचर असफल व्यक्ति के तौर पर देखा और कहा जा रहा है तो वह इस प्रोफेशन में आने की तो सोच भी नहीं सकता।
एक शिक्षक क्यां और किन परिस्थितियों में शिक्षण प्रोफेशन में आया इसकी तहकीकात बच्चे नहीं करते। बच्चे बन चुके शिक्षक पिता को देखते हैं। वे यह नहीं देखते कि शिक्षण प्रोफेशन में आने से पूर्व उनके पिता सिविल सेवा परीक्षा में मेन्य तक पहुंच चुके थे। घर के दबाव, जल्दी नौकरी करने के पारिवारिक दबाव की वजह से अपने सपने को पीछे छोड़ अध्यापन को चुनता है। बच्चे उन दबावों को न तो समझना चाहते हैं और न ही उन्हें उससे कोई वास्ता होता है।
सच बात तो यह है कि आज हमारे बच्चे अपने भविष्य की शिक्षा और जीवन के लिए या तो बहुत ज्यादा सचेत हैं या फिर औरों के कंधे पर सवार। उन्हें मालूम ही नहीं है कि उन्हें किस क्षेत्र में जाना है। किस क्षेत्र में वे जा सकते हैं। एक अंधकार की स्थिति उनके सामने हमेशा बनी रहती है। यदि अभिभावक उन्हें रास्ता दिखाने की कोशिश करते हैं तो उन्हें वे बातें नसीहतें और उपदेश लगा करती हैं। कई बार तो साफ कह देते हैं अपनी कहानी रहने ही दो। तब की बात है। आपके समय में सुविधाएं नहीं थीं तो उसमें हमारा क्या कसूर। आपने अपना जीवन जी लिया। हमें तो हमारी जिंदगी अपने तरीके से जीने दो। दरअसल आज के बच्चों ने अपने स्वास्थ्य को जिस कदर ख़राब किया है उसके देखते हुए कई बार महसूस होता है कि उन्हें स्वयं को आकर्षण रखने में दिलचस्पी ही नहीं रही। उनकी इस हालात में लाने में बाजार ने बड़ी गंभीर भूमिका निभाई है। फास्ट फूड, पैकेट फूड ने तो ताजा सब्जियों, फलों और खानों को हाशिए पर धकेला दिया है।

Friday, October 27, 2017

सबके पास एक कहानी


कौशलेंद्र प्रपन्न
साहब वे बड़़े ही ग़जब के इंसान थे। हंसते तो ऐसे थे गोया पूरा आसमान उन्हीं का है। और तो और ऐसे भी रहे हांगे वे पल जब हम रोत पूरी रात आंखों में ही काट दिया करते थे। और अब यह आलम है कि घर आने के बाद दस बजते बजते कुर्सी पर ही लुढ़क जाते हैं। कहानियां होती ही दिलचस्प हैं। वह चाहे किसी की भी क्यों न हो। किसी भी देश,समाज, व्यक्ति की हो कहानी में रस, संवाद, पात्रों की बतकही पढ़ने-सुनने वाले को बंधे रखती है।
लेकिन एक कहानी हम सबके पास होती है। बल्कि एक से ज्यादा कहानियां जीवन में होती हैं जिसे हम किसी से भी साझा नहीं करते। उस कहानी रचैता हमीं होती हैं। हमारी आदतें, बातें, घटनाएं उस कहानी को बुनती हैं। लेकिन उसे कहानी को किसी से कहने से डरते हैं। शर्माते हैं। शर्माते क्यों हैं? क्यांकि लगता है कहीं हमारी हककीत न पकड़ी जाए।
यही वे डर है कि हम अपनी कहानी को कई बार खुद से भी साझा नहीं करते। दूसरे की बात तो दूर की रही। शायद वे कहानियां हमारे स्वयं की गिरावट की होती है। शर्मिंदगी वाली होती है। या फिर न चाहते हुए कोई घटना घट गई जिसका हिस्सा होना एक संयोग रहा हो।
कहते हैं दोस्त, भाई, पत्नी अच्छे साथी होते हैं। लेकिन फिर क्या वजह है कि हम उनसे भी अपनी कहानी सुनने से बचते हैं। कोई तो वजह होती होगी जो हमें कहानी कहने से रेकती है।। हमें अपने अंदर की दुनिया में झांकना होगा कि वे कहानियों क्योंकर साझा करने से बचते हैं
वैसे कहा जाता है कि कहानी, अपनी बात बांट लेनी चाहिए इससे मन हल्का होता हैं। फिर क्या कारण है कि हम अपना मन हल्का नहीं करना चाहते।

Thursday, October 26, 2017

स्थानीय पर्व का राष्टीय हो जाना



कौशलेंद्र प्रपन्न
जल्दी जल्दी उग न सूरज देव भइले अरग के बेर...
छठ पर्व वास्तव में बिहार और उत्तर प्रदेश में मनाया जाता रहा है। आज से बीस साल पीछे मुड़कर देखें तो दिल्ली वेथ्ट उत्तर प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट आदि में छठ पर्व कम ही लोग करते थे।
ख़ुद दिल्ली में 1994 से 2000 तक छठ पर्व करने वालों को फटी नजरों से देखा करते थे। लेकिन आज स्थिति बिल्कुल उलट है। पूरा बाजार और सरकार इस पर्व को मना रही है। इसमें मीडिया की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं कर सकते। क्या हिन्दी और क्या अंग्रेजी के प्रतिष्ठित अखबार सभी इस पर्व को प्रमुखता से कवर कर रहे हैं। द हिन्दू, टाइम्स आफ इंडिया, आदि ने भी इस पर्व को हप्ते दिन पहले से कवर और फालो अप स्टोरी कर रहे हैं।
स्रकारी नीतियों में भी बदलाव देखे गए। इस पर्व पर छुट्टी की घोषणा बताती है कि इसके पीछे वोट बैंक काम कर रहा है।
लोकजन के पर्व छठ को देश के अन्य राज्यों में पहुंचाने में विस्थापित लोगों का भी बड़ा हाथ है। जैसे जैसे लोग राज्यों से विस्थापित होते गए वैसे वैसे यह पर्व भी उन उन राज्यों में मनाया जाने लगा।

Wednesday, October 25, 2017

पिताजी का अकेलापन




कौशलेंद्र प्रपन्न
जब कभी उन्हें देखता हूं  कि वो अकेले में क्या सोचते होंगे? क्या उन्हें अपने बच्चो की चिंता सताती होगी या उन्हें अपने छोटे भाई, छोटी बहनें याद आती होंगी?
पिताजी दो भाई और दो बहनें के परिवार से आते हैं। मेरी ही आंखों के सामने चाचा, बुआ सब एक एक कर चले गए। फूफा भी चले गए। उनके बच्चे हैं लेकिन उनसे बीस साल से भी ज्यादा समय बह चुका मुलाकात नहीं है। सब अपनी अपनी दुनिया में हैं।
पिताजी रह गए निपट अकेले। हालांकि इनके बच्चे हैं। नाती पोते, बहु,दामाद सभी हैं। लेकिन फिर क्या कारण है कि उनकी कविताओं में एक अकेलापन, एक कमी के भाव मिलते हैं। जैसे महादेवी वर्मा की कविताओं मे एक अप्रत्यक्ष की प्रतीक्षा और पुकार साफ सुनाई देती है वैसी ही कोई आवाज मुझे पिताजी की कविताओं में सुनाई देती है। ‘‘जीवन के इस मेले में मैंने अपने सारे सौदे बेचे/ मान-प्रतिष्ठा के सारे सौदे बेचे। बच रहा एक सौद जिसे बेचने आया हूं। आंसू का मोल नहींं होता।’’
‘‘मांगते हो तुम विदा पर दें विदा कैसे तुझे हम? नेह कैसे भूल जाएं बस यही केवल सीखाना’’ ये कुछ पंक्तियां हैं जो पिताजी की दुनिया की परतें खोलती हैं। कविताएं शायद कई अनकही बातें, टीस को बयां कर देने में मददगार साबित होती हैं। कई बार देखता हूं कि पिताजी की कविताओं में कई जगह अकेलापन मिलता है। लेकिन उसकी वजहें समझ नहीं पाता।
एक दफ्ा उन्हांने कहा अच्छा तो काशी बाबू भी चले गए? उस वाक्य में कहीं एक गहरी टीस या अकेलेपन का एहसास सुनाई दिया। वैसे ही सोचता हूं कि जब पिछले साल चाचा गुजरे तो उन्हें कैसा महसूस हुआ होगा? या फिर छोटी बहन के जाने के बाद उन्हें कैसे लगा होगा। अकसर पिताजी मौन में बैठा करते हैं। यह उनकी आदत में छुटपन से देख रहा हूं। आज भी दो से तीन घंटे मौन में बैठते हैं। उस मौन में किसे याद करते होंगे? कौन उनके ध्यान में आता होगा?
कुछ जिज्ञासाएं हैं जो इन दिनों काफी मुखर हैं।

Monday, October 23, 2017

हम विस्थापितों की कहानी


कौशलेंद्र प्रपन्न
कहानी बहुत पुरानी और दिलचस्प है। दिलचस्प इस तरह से कि हमारे पुरखे वर्षों पहले अपने गांव, जेवार छोड़कर कहीं और रोजी रोटी के लिए बसते चले गए। और हम इस तरह से वैश्विक नागरिक बनते चले गए। हमारी वैश्विकता तब अखरने लगती है जब आपके साथ अपनी भाषा और संस्कृति के साथ मजाक करता है। यह मजाक खूब होता है। बल्कि कई बार आपके अपने भी करते हैं।
देश के बाहर बसे हमारे दोस्त, संगी जन जब भारत की ओर उम्मीद भरी नजरों से देखते हैं तो वे इस आशा से देखते हैं कि उनके पुरखे जिस भारत से गए थे वहां क्या बचा है। उन्हें क्या ऐसा मिल जाए जो वे अपने बच्चों को दे पाएं।
सूरीनाम, हॉलैंड, मॉरीशस, फीजी, अफ्गानिस्तान, कतर आदि में बसे भारतीय व विस्थापित मजदूरों की कहानी भी बड़ी अजीब है। जब कभी कोई पर्व त्योहार का मौसम आता है तब वे वहां भारत की याद में रात गुजार देते हैं। साल में छह माह या दो साल पर भारत लौटते वक्त वे अपने परिवार के लिए सामान की खरीदारी नहीं करते बल्कि अपने वहां होने और आधुनिक होने के प्रमाण गोया बटोर रहे होते हैं। ताकि वे और उनके बच्चे यह बता सकें कि फलां के अब्बू, फलां के भाई बाहर रहते हैं। चंद पैसों में बसर करने वाले भारतीय जब भारत लौट रहे होते हैं तब उनके बैग भरे होते हैं वहां के दोयमदर्ज के सामानों से।
विस्थापन में भाषा भी तो साल दस साल में बदल जाती है। धीरे धीरे अपनी भाषा की तमीज़ से दूर होने लगते हैं। जहां जिस भाषा में रोटी मिलती है वे उसी भाषा में जीने लगते हैं। विस्थापन में देश दुनिया, भाषा, जीवन दर्शन सब कुछ ही विस्थापित हो जाता है। रह जाती है तो बस भदेसपन, अपने यहां की बची खुची कुछ एहसास जो सिर्फ आपकी अपनी होती है।

Friday, October 13, 2017

घर ही था वो


घर ही था वो जो संवारा करते थे,
अब वो कबाड़ हो गए,
कुर्सियां लकड़ी की चुन कर बनी थीं,
लायी गयी थी घर में,
बैठकर पिताजी ने पढ़ाया था,
मिल्टन,कालिदास और कबीर,
अब वो कुर्सी कहां गई।
कभी घरों में रहा करते थे,
चार छह लोग,
बायन भी बंटा करता
खटिए पर,
जैसे जैसे भईया बड़ी क्लास में जाते गए,
घर खाली होता रहा।
नौकरी में छूट गई
घर की बात,
आंगन के कोने में बने घरौंदे,
कालका रेल,
आती तो है हर रोज,
सुबह तीन पैंतालीस पर,
अब नहीं उतरते,
घर आने वाले।
दीवाली की रात-
पूरी रात रेते हैं कुल देवता,
धूल में सनी घरों की बातें,
ढुलकती पांवों से टकराती हैं
जब कभी वर्षों बाद जाना होता है।
अब तो पडा़ेस भी बदल गए-
कहते हैं आते नहीं हर साल
बच्चों के लिए हो गए बाहरी,
ओलेक्स पर बेचने को देते हैं राय,
कुर्सी बाबुजी की,
सोफे पर नजर है कमल की।

Friday, October 6, 2017

बाज़ार में गुम हम



कौशलेंद्र प्रपन्न
पिछले दिनों महासेल में खरीदारी करने चला गया। वैसे खरीदना कुछ था लेकिन वहां से 500, 500 के दो कूपन भी जे़ब में मिला। जो खरीदना था उसकी कुल कीमत पंद्रह सौ की थी। लेकिन टहलते टलहते हमने तकरीबन तीन हजार की शॉपिंग कर ली। जब काउंटर पर गए तो साहब ने कहा, ‘‘सर! ये देखिए ऑफर है पांच हजार से ज्यादा की खरीदारी पर पांच सौ और उससे ज्यादा पर एक हजार के कूपन हैं। क्यों इस मौके को हाथ से जाने देते हैं।’’
चेहरे पर ना नुकुर के भाव देख कुछ देर हमारा चेहरा ताकता रहा। फिर कोशिश की कि ‘‘सर यही देखिए! सिर्फ पांच सौ में कहीं नहीं मिलने वाला। ये तो महासेल है तब...’’
अंत में हमने पांच हजार एक सौ की शॉपिंग कर 500 के कूपन साथ लेते आए। जब पूछा कब तक खरीदारी कर सकते हैं? जवाब दिलचस्प था ‘‘ सर जब मर्जी आ जाएं। लेकिन यह अगले हप्ते जब शॉपिंग करेंगे तब उसमें से पांच से सौ कम कर दिए जाएंगे।’’
है न दिलचस्प!!! यानी बिलावजह एक तो पांच हजार की शॉपिंग की उसपर पांच सौ का लाभ उठाने के लिए फिर शॉपिंग के जाल फेक दिए गए।
दरअसल बाजार में हम ऐसे गुम हो जाते हैं कि हमारी तर्कशक्ति कहीं घास चरने चली जाती है। और तो और क्या बच्चे और क्या बुढ़े और क्या जवान सब इस मॉल संस्कृति में डूबे हैं। कई बार आंखें फटी रह जाती हैं जब किसी के हाथ में पांच छह पैंट्स, शर्ट आदि की बिलिंग कराते देखता हूं सवाल खुदी से करता हूं कि क्या साहब के पास एक भी पैंट व शर्ट नहीं हैं? हालांकि जो उन्होंने पहन रखी है वह भी नई से कम नहीं है। फिर यह प्रवृत्ति क्या है?
सेल में गुम हुए हमारे विवेक और तर्क का परिणाम है कि हम घर को गोदाम बना डालते हैं। कई कपड़ों की तो साल में भी एक के बाद दूसरी बारी नहीं आती। फिर वो ऐसे भूला दिए जाते हैं गोया हमारी है ही नहीं। जब नजर पड़ती है तब तक भूगोल उसके काबिल नहीं रहता। मन मसोस कर हाथ से सहला कर दुबारा किसी कोने में ठूंस देते हैं इस आश में कि कभी इसमें समा पाया तो जरूर पहनूंगा।

Thursday, October 5, 2017

रिक्शावाल


कौशलेंद्र प्रपन्न
शाम हो ही चुकी थी। सर्दी दहलीज पर खड़ी थी। सोच रही थी गरमी जाए तो वो आ धमके। अंधेरा बस सड़क के लैंप पर उतर रहे थे। रिक्शा वाला अपनी लाइन में खड़ा था। अपनी बारी आए तो सवारी लेकर आज की रोटी बना सके। मेटो स्टेशन के आगे रिक्शे वालों की लंबी लाइन लगा करती थी। वो ज्यादा भाग दौड़ नहीं किया करते थे। वैसे जब उनकी बारी आती तो सवारी उनकी उम्र देखकर दूसरे जवान रिक्शेवाले के साथ चले जाते। वो वहीं के वहीं पैंडल पर पैर रखे दुबारा पीछे सरक जाते।
आवाज भी तो नहीं लगाते थे। चुपचाप खडे रहते और सवारी के इंतजार में कई बार सुबह से शाम हो जाती और मुश्किल से चार या पांच सवारी खींच पाते। यानी जो कमाते उसका बड़ा हिस्सा मालिक की जेब में चला जाता।
‘‘राम खेलावन तुम रिक्शा क्यों खींचते हो? तुम से तो देह चलता नहीं सवारी कैसे खींचोगे?’’
‘‘ले पचास रुपए रख लो आटा खरीद लेना और प्याज के साथ रोटी खा लेना।’’
आवाज में थोड़ी हमदर्दी सी आ गई थी। मालिक तो था लेकिन शायद उसके पास इंसानियत अभी पूरी तरह से मरी नहीं थी।
मालिक के पास सौ रिक्शे थे। सब के सब किराए पर चलते थे। हर राज्य के रिक्शेवाले थे उसके पास। क्या एमपी, क्या यूपी और क्या राजस्थान और बिहार इन्हीं लोगों के बीच रहते रहते मालिक को भी इनकी जबान काफी हद तक आ चुकी थी। जिस राज्य का रिक्शावाला होता उससे उसी की जबान में बात करता।
रामखेलावन अकेला हो गया। न आगे नाथ न पीछे पगहा। बस एक लड़की रह गई जो दूसरे गांव ब्याही थी। उसके बच्चे थे। उन्हीं के लिए जी रहा था।
दिल्ली आए रामखेलावन को तकरीबन बीस साल हो चुके थे। पहले पहल जब दिल्ली आया तो रिक्शा नहीं खींचता था। तब वह स्कूल में चपरासी लगा था। वहां से खाने-पीने भर की कमाई हो जाती थी। दो बेटे और एक बेटी थी। पड़ोस में ही स्कूल में पढ़े और बड़े हुए। एक दिन पता चला बड़ा बेटा रेलगाडी के नीचे आ गया। तब तो जैसे इसकी कमर ही टूट गई। पूरा परिवार अनाथ सा हो गया। लेकिन उस दौर में भी रामखेलावन अपने और अपने परिवार को बांधे रखा। कहानी यही नहीं रूकी बल्कि छोटका जब बड़ा हुआ उसे प्रेम हो गया। वह भी दो घर छोड़ कर। एक रात तो लोगों ने जमकर उसकी कुटाई भी की। मगर आदत इश्क की थी सो आगे बढ़ी और दो भाग गए। कहां गए कुछ पता नहीं चला। आज भी कई बार रामखेलावन अकेला होता है तो छोटका को बहुत याद करता है। क्या तेज दिमाग पाया था। तभी उसके ऑटो खरीद ली थी।
जब से नोटबंदी हुई रामखेलावन के तो जैसे दुनिया ही अंधेरे में चली गई। पहले कुछ सवारी कम से कम उम्र की लिहाज कर बैठ जाया करते थे। आस पास रिक्शे से जाने वाली सवारी पैसे बचाने के लिए पैदल ही चलने लगे। मेटो के पास ही खड़ा हुआ करता था। सो कुछ लोगों को मालूम हो चला था कि रामखेलावन पेशेवर रिक्शावाला नहीं है। जब उसे कोई ऐ बाबा या रिक्शा कह कर बुलाता तो बहुत बुरा लगता। इसलिए उसने आपने रिक्शें के आगे हैंडिल पर एक तख्ती टांग रखी थी। उसपर उसका नाम, गांव का नाम और डिग्री लिखा होता। कुछ लोग नाम पढ़कर आवाज लगाते तो उसे बहुत अच्छा लगता। वैसी सवारी से मोल भाव भी नहीं करता। उस सवारी से देश दुनिया, आस पड़ोस सब तरह की बाते करते हुए रिक्शा चलाता।
‘‘बाबू जी आप लोग बड़े बड़े ऑफिस में काम करते हैं। हमरे लिए कोई नौकरी हो तो बताइए।’’ ...लेकिन उसे कहीं नौकरी नहीं मिली। और रिक्शा चलाने लगा।
आज पूरी रात उसका माथा और देह बुखार में तवे की तरह गरम था। बुखार भी ऐसा कि चलने में घुटने दर्द कर रहे थे। शाम होते होते उसका शरीर खड़े होने लायक भी नहीं रहे। वहीं सड़क के किनारे लेट गया। सवारी उसके आगे से जवान रिक्शेवालों के साथ जाती रहीं।

Wednesday, October 4, 2017

कवियों की मांग और कीमत



कौशलेंद्र प्रपन्न
अजित कुमार जी ने एक संस्मरण में लिखा है कि हरिवंश राय बच्चन जी ने कवि के तौर पर पहली बार कीमत की मांग की। बच्चन जी ने तब कहा था कि जो मुझे टैक्सी और सौ रुपए देगा मैं उसी कवि सम्मेलन में जाउंगा। इसकी आलोचना तब के कवियों ने जम कर की। लेकिन बच्चन जी ने बाजार को समझा और कवियों की कीमत, मांग, मूल्य तय किया।
आज कवियों की मांग और कीमत काफी है। एक कार्यक्रम के लिए कवियों की कीमत 500 से लेकर पांच हजार और पांच लाख तक की है। किसी कार्यक्रम के लिए कवियों की तलाश थी। सोचा क्यों न आज की तारीख में मंच के सिरमौर और ख्यातिप्राप्त कवि को संपर्क किया जाए। सो पीए से बात हुई जब उन्होंने कहा कि क्या बजट है आपका? हमने भी तपाक से पूछ लिया, कितने में बात बनेगी?
जवाब मिला पांच लाख एक कार्यक्रम का है। आपके बजट हैं तो आगे बात करें। हमने फोन मांफी के साथ काट दी। कोई दीवाना कहता है या फिर चार लाइन सब की कीमत आसमान छूने को है। आम आदमी तो कवियों को बुलाने की सोच भी नहीं सकता। इसलिए मंचीय कवि अब सरकारी और निजी संस्थानों और बाजार की ओर से ही बुलाए जाते हैं। छोटी मोटी गोष्ठियों में इनके दर्शन दुर्लभ हैं।
ऐसे दौर में कुछ कवि तो ऐसे भी हैं जिन्हें सिर्फ शाम की दावत पर भी बुला सकते हैं। कुछ को खाने-पीने पर। जैसे कवि वैसे दाम। और तो और ऐसे भी कवि समाज में हैं जो बिन पैसे एक बुलावे पर आ जाते हैं।
एक और कैटेगरी है जो बिन पैसे, बिन समय कविता सुनाने पर उतारू होते हैं। उन्हें बस मौका मिलने की जरूरत है बस शुरू हो जाते हैं। कोई सुन रहा है या मजाक उड़ा रहा है इसकी भी समझ नहीं होती। बस अपने धुन में कविता पाठ करते जाते हैं। ऐसे कवियों से पीछा छुड़ाना कई बार भारी पड़ता है।

Tuesday, October 3, 2017

पढ़ने का कैंपेन



कौशलेंद्र प्रपन्न
किताबें किस के लिए होती हैं? प्रकाशक के लिए? लेखक के लिए? पाठक के लिए? किस के लिए लेखक लिखता है। यह तय होना जरूर है। निश्चित ही किताबें पाठकों के लिए ही होती हैं। लेकिन किताबों से मुहब्बत पैदा करना भी लेखक का ही का ही काम होता है। यह काम लेखक का कंटेंट कराता है। देवकी नंदन खत्री ने चंद्रकांता लिख कर पाठकों को हिन्दी सीखने पर विवश किया। यह एक लेखक का जादू था। जो अपनी लेखनी के बल पर पाठकों को जन्म दिया।
आज हजारों लाखों किताबें हर साल लिखी और छप रही हैं। लेकिन पाठक कुछ ख़ास किताबों तक ही पहुंच पाते हैं। बाकी किताबें प्रकाशकों की जानकारी में कहीं सांस ले रही होती हैं। लेकिन वे पाठकां से दूर होती हैं।
पिछले दिनो बेस्ट सेलर किताबों और लेखकों की सूची जारी हुई। उसमें कई लोगों को एतराज़ हुआ कि यह कैसे तैयार किया गया। इनमें किन लोगों को शामिल किया गया आदि। इस पर आरोप तो यह भी लगा कि यह सूची बाजार आधारित और बाजार द्वारा तैयार की गई है।
जो हो लेकिन किताबें तो हर साल लिखी और छप रही हैं। लेकिन पाठकों के पसंद की किताबें उनकी पहुंच से काफी दूर हैं। कभी गांधी जी ने कहा था कि हर हाथ को काम हर हाथ को शिक्षा। वैसे ही क्यों न हर हाथ को किताब का कैंपेन चलाया जा सकता है। कम से कम जो किताबें अब आपके काम की नहीं रहीं वो किसी और के हाथ सौंप दी जाए।

Thursday, September 28, 2017

शिक्षा की चिंता में घुलती घुरनी


कौशलेंद्र प्रपन्न
पूर्वी दिल्ली नगर निगम की शिक्षा समिति की अध्यक्ष सुश्री हिमांशी पांडे ने वाजिब सवाल उठाया है कि सरकार शिक्षा पर करोड़ों रुपए खर्च कर रही है फिर क्या वजह है कि बच्चों को पढ़ना भी नहीं आ रहा है। इन्होंने तमाम अधिकारियों की बैठक में यह चिंता साझा की। वहीं विश्व बैंक ने हाल ही में एक रिपोर्ट जारी की  है। इसमें रिपोर्ट की मानें तो हमारा भारत उन बारह देशों में दूसरे स्थान पर है जहां बच्चे सामान्य वाक्य नहीं पढ़ पाते। सामान्य से जोड़ घटाव नहीं कर पाते।
विश्व बैंक की िंचंता भी गंभीर है कि करोड़ों रुपए खर्च करने के बावजूद क्या कारण है कि बच्चों को शिक्षा की बुनियादी समझ और कौशल नहीं मिल पा रहे हैं।
यह चिंता आज की नहीं हैं बल्कि समय समय पर विभिन्न रिपोर्ट में भी दिखाई देती हैं। लेकिन एक हम हैं कि हमारी नींद नहीं खुलती। घुरनी तो इस बात को लेकर चिंतित है कि आने वाली पीढ़ी कैसी शिक्षा लेकर जीवन के मैदान में उतरने वाली है।
विश्व बैंक ने कहा है कि जहां दूसरी कक्षा के छात्र छोटे से पाठ का एक शब्द भी नहीं पढ़ पाते। यह एक रेखीए व्याख्या है। क्योंकि घुरनी का तजर्बा कहता है कि बच्चे स्कूलां में न केवल वाक्य पढ़ पाते हैं बल्कि उसके अर्थ तक की यात्रा करते हैं। घुरनी का अनुभव तो यह भी है कि बच्चों को शिद्दत से पढ़ाया जाए तो कोई वजह नहीं है कि वे पढ़ न पाएं।
विश्व बैंक ने कहा है कि बिना ज्ञान के शिक्षा देना ना केवल विकास के अवसर को बर्बाद करना है बल्कि दुनिया भर में बच्चों और युवा लोगों के साथ बड़ा अन्याय भी है। रिपोर्ट इस ओर भी हमारा ध्यान दिलाती है कि इन देशों में लाखों युवा छात्र बाद के जीवन में कम अवसर और कम वेतन की आशंका का सामना करते हैं। क्यांकि स्कूल उन्हें ज्ञानपरक शिक्षा देने में विफल है।

Tuesday, September 26, 2017

तकनीक का डर



कौशलेंद्र प्रपन्न
हां याद होगा आप को भी कि जब पहली बार आपके हाथ में कम्प्यूटर आया लगा होगा। छून से भी डर लगा करता था। न जाने वह डर कैसे और कहां से हममें समाया होगा। क्या पता कुछ ख़राब हो गया तो? कुछ ग़लत हो गया तो?
यह डर हम सभी में है। किसी में कम तो किसी में ज्यादा। डर का ही असर है कि एक दशक पहले जब विभिन्न विश्वविद्यालयों और स्कूलों में कम्प्यूटर दिए गए तो वो रैपर में ही बंधे मिले। धूल फांकते कम्प्यूटर आज भी स्कूलों में हैं। उन्हें कोई इसलिए नहीं छूता कि कहीं खराब हो गया तो?
उम्रदराज़ लोगों में इसका डर कुछ ज्यादा ही होता है। वे इसलिए कम्प्यूटर नहीं छूते कि कहीं कुछ ख़राब हो गया तो और आलम यह हुआ कि विभागों को मिले कम्प्यूटर चलाने के लिए एक अलग से पद सृजित किया गया।
डर महज कम्प्यूटर का ही नहीं होता बल्कि मोबाइल और अन्य डिवाइसेज के भी होते हैं। जबकि इलेक्टॉनिक सामानां की मूल प्रकृति ही सहज इस्तमाल होती है। यदि सामानों को चलाने में दिमाग लगाना पड़े या डर पैदा हो करे तो वह प्रोडक्ट यूजर फ्रैंडली नहीं माना जा सकता।
देखा तो यह भी गया है कि एक कम पढ़ा लिखा व्यक्ति भी स्वविवेक का प्रयोग कर बड़ी से बड़ी मशीनें चला लेता है। लेकिन एक अकादमिक व्यक्ति सहज और आसान मोबाइल को भी हैंडल करने से डरता है। इन दिनों पूर्वी दिल्ली नगर निगम के अध्यापकों को आईसीटी की टेनिंगे दी जा रही है। है बहुत आसान लेकिन कुछ के लिए वह पहाड़ से ज़रा भी कम नहीं है। लेकिन क्योंकि सरकारी फरमान जारी हो चुके हैं कि सभी को आईसीटी प्रशिक्षण लेने हैं तो रिटायर होने वाले भी इनमें शामिल हैं।

Monday, September 25, 2017

पाठ्यपुस्तक और शिक्षक




कौशलेंद्र प्रपन्न
कृष्ण कुमार के शब्दों में कहें तो ‘‘पाठ्यपुस्तकें शिक्षकों की सत्ता और ताकत को कमजोर करती है। दूसरे शब्दों में कहें तो पाठ्यपुस्तक शिक्षकों को गुलाम बनाते हैं।’’ ‘गुलामी की शिक्षा और राष्टवाद’ पुस्तक में कृष्ण कुमार जी पाठ्यपुस्तक और शिक्षकीय सत्ता पर विमर्श करते हैं। शिक्षकों के लिए पाठ्यपुस्तक ख़ासा अहम औजार होता है। इससे शिक्षक डरते भी हैं और कक्षा में अंतिम विकल्प के तौर पर भी इस्तमाल करते हैं। शिक्षक प्रशिक्षण कार्यशालाओं में पाया कि शिक्षकों को हिन्दी की पाठ्यपुस्तकों को लेकर काफी शिकायतें हैं। मसलन यह किताब समझ में नहीं आती। इस किताब में बिना वर्णमाला के सीधे कविताओं से बच्चों का सामना होता है आदि। जबकि यदि शिक्षक किताब में दी गई शिक्षकां के लिए तीन चार पेज की भूमिका पढ़ लें तो शिकायतें दूर हो जाएंगी। बल्कि हुईं भी हैं।
पाठ्यपुस्तकों को अंतिम न माना जाए। यही आग्रह शिक्षकों को सृजनशील और गतिशील बनाए रख सकती है। पाठ्यपुस्तकों की जहां सीमा खत्म होती है वहां से शिक्षकों की भूमिका का आरम्भ माना जाता है। शिक्षक महज पाठ्यपुस्तकों का व्याख्याता, टॉस्सफर्मर नहीं होता और न ही शिक्षक पाठ्यपुस्तकों का लाउडस्पीकर होता है। बल्कि शिक्षक शब्द और वाक्यों के मध्य की रिक्तता में अर्थ पीरोता है। ताज्जुब तो तब होता है जब शिक्षकां को अपनी पाठ्यपुस्तकों की कविताएं, कहानी आदि भी याद नहीं होतीं। कार्यशालाओं में ऐसे भी शिक्षकों से रू ब रू होने का मौका मिला जिन्हें पाठ्यपुस्तकों में शिमल कविताएं और कहानियां तक याद नहीं रही हैं।
पाठ्यपुस्तकें शिक्षकों को पढ़ाने के लिए एक राह दिखाने का काम करती हैं। जरूरत इस बात की है कि हम पाठ्यपुस्तकों को एक औजार के तौर पर प्रयोग करें न कि उसे ही शिक्षा प्रदाता की भूमिका में स्थापित कर दें। जब हम स्वविवेक को पाठ्यपुस्तकों के हवाले कर देते हैं तब शिक्षा में गड़बड़ी शुरू होती है।

रेस्तरा में पिताजी





वो कोई हो भी हो सकता है। उम्र के साथ हमारे व्यहार भी प्रभावित होते हैं। वाकया ताज़ा है। हम यानी मां-पिताजी और साथिन साथ में रेस्तरां में खाना खा रहे थे।
पिताजी के कुर्ते का बाजू सांभर में डूब रहा था। बाजू चढ़ा दी गई। अब वो आराम में खाना खा रहे थे। लेकिन कभी मुंह पर कभी कुर्ते पर खाने की चीजें लग और टपक रही थीं। वो आराम से खाना खा रहे थे।
जब उन्हें वाशरूम में हाथ मुंह धुला रहा था तो पिताजी का चेहरा थोड़ा पेशो पश में नजर आया। पूछा ‘‘ क्या हुआ खाना पसंद नहीं आया क्या?’’
‘‘ रेस्तरां में खाने की आदत नहीं हैं।’’
‘‘खाना कुर्ते पर और मुंह के बाहर लग गया।’’
चेहरे पर संकोच साफ देख सका।
मैंने कहा क्या हुआ।
‘‘ उनके मुंह पर लग आए खाने को अपने रूमाल से साफ किया।’’
तब एक सहज बच्चे के मानिंद वो मुंह साफ करा रहे थे। कोई विरोध नहीं। कोई प्रतिवाद नहीं।
खाना गिरा और साफ भी हो गया।
किसी दिन हम भी तो आपकी उम्र में होंगे।
तब उनके चेहरे पर एक ऐसा भाव दिखा जिसे शायद मैं शब्दों में बयां कर सकूं।
हम सब के साथ वह उम्र भी आनी है। हम भी शायद लाख रेस्तरां में जाने के अनुभव से लबरेज़ हों लेकिन संभव है हमसे भी खाना मुंह और कपड़े पर गिर जाए। तब शायद हम भी ऐसे भाव से भर जाएं।

Thursday, September 21, 2017

घुरनी चली महासेल में


कौशलेंद्र प्रपन्न
कहती है घुरनी कि जब महासेल लगा ही चुका है। हर सामान लोकलुभावन सेल में सजे हैं तो देरी किस बात की। बाजार जा कर खरीदने का सुख तो उठाया ही जाए। घुरनी बाजार बाजार, माल्स माल्स घूम आई।
जहां देखो वहीं भीड़। चारों तरफ अफरा तफरी। उबासी लेते, आइस्क्रीम चाटते बच्चे, बड़े। घुरनी थोड़ी परेशान होती है। बेचैन भी।
बाहर बैठी घुरनी सोचने लगी। क्यों न वो सामान ले ली जाए जो अभी छूट में है। उस पर भी जहां भीड़ नहीं है।
घुरनी बहुत सोच विचार कर कफ़न खरीदने का मन बनाती है। अभी सेल में शायद उस पर भी छूट हो। छूट है तो दो चार लेकर रख लेने में क्या हर्ज है। बच्चे लें न लें। आज कुछ भी तो तय नहीं है। कहीं उनके आते आते दो तीन साल हो गए तो क्या तब तक मैं बिना कफ़न की रहूंगी। बिल्कुल नहीं। अपना इंतज़ाम आज कर लेने में कोई बुराई नहीं है।
दुकानदार भी हैरान। क्या करोगी अम्मा इतने कफ़न ले कर। यह कोई ओढ़ने बिछाने के काम ना आने के। के करोगी। सनक तो नहीं गई हो। पगला गई हो का?
हमरे माथा एक दमे ठीक है। हम पगलाए नहीं हैं। सोचे रहे कि मरना तो हैबे करी। का पता बचवन सब कफ़न ओढ़ाने तक पहुंचेंगे कि नहीं। खरीद कर रख लेने में का जात है। कफ़न साथ रहे तो कोई भी ओढ़ा तो सकता है।
हैरान दुकानदार, हैरान उसकी बेचुआ की माई उसे टुकुर टुकुर देखे जा रहे थे। लेकिन मजाल कि घुरनी को हंसी आ रही हो। लेकिन वो भी कैसा कठकरेजा थी कि मानी नहीं। आज तो कफ़न लेकर ही जाउंगी। सो दुकानदार ने कफ़न दे दी।
सोचने को तो वो यह भी सोच रही थी कि पीड़ दान का इंतज़ाम भी आज ही कर ले। कल को बचे या न बचे। वैसे अभी उसकी उम्र मरने की नहीं थी। मगर फिर भी वो सब इंतज़ाम कर जाना चाहती थी।
घुरनी ने शाम में ही मिसराइन जी से कहा था आज हमर खाना रउआ घर होई। मिसराइन जी ने हां हां काहे ना हीं।
... मिसराइन जी को दिल्ली आना था सो सामान बांध कर तैयार थीं। मुहल्ले में तीन दिन बाद शोर मचा कि घुरनी.... पीठ के बल लेटी है और एक पांव भी गायब है।
मिसराइन जी भारी मन से रेलगाड़ी में बैठ तो गईं। लेकिन एक मन था जो वहीं उसी घुरनी में अटका रहा।

Wednesday, September 20, 2017

आरम्भिक पठन विकास में बाल साहित्य की भूमिका : श्री पंकज चतुर्वेदी





शिक्षांतर व्याख्यान माला

कौशलेंद्र प्रपन्न
श्री पंकज जी ने कहा कि बाल साहित्य के जरिए हम बच्चों में न केवल भाषायी दक्षता का विकास कर सकते हैं बल्कि बच्चों में खत्म होती संवेदना को भी बचा सकते हैं।
किताबों की व्यापक भूमिका को रेखांकित करते हुए पंकज जी ने कहा कि किताबें दरअसल बच्चों में कल्पनाशीलता और सृजनात्मकता को बढ़ावा देने वाली होती हैं।
विभिन्न भाषाओं में उपलब्ध कथा कहानियों और लोक कथाओं में जिंदा रखने में कहानियां अहम भूमिका निभाती हैं।
एनबीटी से प्रकाशित बाल किताबों के जरिए श्री पंकज जी ने बच्चों में कैसे कहानी सुनाइ्र्र जाए और कहानी सुनने और पढ़ने के प्रति रूचि विकसित की जाए इसपर भी जोर दिया।

Tuesday, September 19, 2017

जब मैं मरूंगा


तब मैं मरूंगा,
मरूंगा ही,
बचपन में अमर पीठा खाया तो था,
खाए तो दादा भी थे,
मगर वो भी नहीं बचे।
बचे तो कलमुर्गी भी नहीं,
बचा तो प्रद्युम्न भी नहीं,
गौरी भी नहीं बची,
मरते अगर समय से,
तो अख़रती नहीं मौत।
जब मैं मरूंगा-
जो कि मरना ही है,
अमर पीठा भी बचा नहीं पाएगा,
तय है मरना तो,
सोचता हूं दिन कौन सा हो,
कौन सी तिथि रहेगी ठीक,
सोमवार मरा तो,
मंगल को मरा तो,
शनि को मरा तो लोगों को
रविवार मिलेगा,
सुस्ताने को।
रविवार तय रहा मेरा मरना,
आइएगा जरूर,
कुछ मंत्री संत्री भी होंगे,
कुछेक लेखक,
पत्रकार भी होंगे,
ऐसे सोचता हूं,
सोचने में क्या हर्ज़ है।
आएंगे नहीं,
यह भी मालूम है,
कोई बड़ा नाम नहीं रहा,
काम भी कोई ख़ास नहीं।
कम से कम मरने की तिथि,
दिन तो चुन लेने दो भगवन,
कौन मारेगा,
कैसे मारेगा,
मारेगा या कि
मर जाउंगा,
आपके ग्रूप से,
एक्जीट कर जाउंगा,
मेरे तमाम एकाउंट्स,
बिन अपडेट रहेंगे जब,
जान लेना
कि नहीं रहा कोई।
पर मन बना लिया है,
मरूंगा तो रविवार का दिन होगा।

Wednesday, September 13, 2017

7 पूंछ वाला चूहा



कौशलेंद्र प्रपन्न
कहानी है। कहानी है तो पात्र भी होंगे। पात्र हांगे तो संवाद भी होगा। संवाद हैं तो कहानी आगे भी बढ़ेगी। कहानी कुछ यूं है कि एक चूहा था। उसके 7 पूंछ थे। वह परेशान था कि उसे सभी चिढ़ाते कि सात पूंछ का चूहा 7 पूंछ का चूहा। इससे वह बेहद दुखी भी रहने लगा।
सोचा क्यों न इस फसाद की जड़ को ही खत्म कर दिया जाए। और पहुंच गया नाई के पास। बोला, ‘‘ नाई नाई मेरी एक पूंछ काट दो।’’
और नाई ने एक पूंछ काट दी।
अब चूहा तो सोच रहा था जिंदगी आसान हो गई। लेकिन उसकी परेशानी बनी रही। लोगों ने पूछना और बोलना नहीं छोड़ा। अब कहने लगे छह पूंछ का चूहा छह पूंछ का चूहा। फिर परेशान चूहा नाई के पास गया और अपनी एक और पूंछ कटा ली।
यह सिलसिला तब तक चलता रहा जब तक कि उसने अपनी सारी पूंछें न कटा लीं। जब बिना पूंछ के चूहे को लोगों ने देखा फिर शुरू हो गए ‘‘ बिन पूंछ का चूहा’’
उस चूहे की सोचिए क्या स्थिति हुई होगी। जब सात पूंछें थीं तब भी लोगों ने उसे जीने नहीं दिया। और जब बिन पूंछ का होगा तब भी उसका जीना दुभर हो गया।
शायद हमारी भी स्थिति इससे ज्यादा बेहतर नहीं दिखाई देती। जब आप कुछ करते हैं तब सुनने को मिलता है कुछ नहीं करता। जब करते हैं तब सुनते हैं ऐसे करते हैं? करना भी नहीं आता। आदि।

Tuesday, September 12, 2017

याद न हो कोई कविता तो...



कौशलेंद्र प्रपन्न
पिछले दिनों कुछ यही कोई बीस प्राथमिक शिक्षकों से बातचीत करने का अवसर मिला। अवसर था हिन्दी शिक्षण की कार्यशाला। इसमें बीस में से तकरीबन सतरह शिक्षक ऐसे थे जिन्हें कोई भी कविता याद नहीं थी।
सवाल था क्या आपको कोई कविता याद है? जो पाठ्यपुस्तक में हो या बाहर की कोई कविता याद हो तो सुनाएं। इस सवाल पर पहले तो वे भड़क गए। हमें कविता क्यां याद हों? किताब में तो है ही। हम किताब से देख कर कविता पढ़ाते हैं।
तज्जुब तो तब हुआ जब पाठ को पढ़ने के लिए दिया गया। उनके पठन को देखकर निराशा हुई। उन्हें ठीक से पढ़ना भी नहीं आ रहा था। ऐसे अटक अटक कर पढ़ रहे थे गोया वे चौथी व तीसरी के बच्चे हों। अनुमान लगा रहा था कि ये अपनी कक्षाओं में कैसे पढ़ाते होंगे। मगर आगे तो बात करनी थी।
पहले स्वयं कविता का वाचन और पठन कर के उन्हें सुनाया। सुन तो बड़े ही गौर से रहे थे। उनकी प्रतिक्रिया सुन कर अफ्सोस हुआ जब उन्होंने कहा ‘‘ समा बांध दी आपने।’
गोया कोई कवि सम्मेलन हो रहा हो। उन्हें क्यों पढ़ना चाहिए इस पर बातचीत अंतिम पखवाड़े में किया। यदि आप पेशे से शिक्षक हैं तो आपको कविता गाने, पढ़ने और वाचन करने की कला तो आनी ही चाहिए। क्योंकि पेशेगत पहचान की मांग है कि आपको कविताएं, कहानियां आती हों। अब उनमें इसकी टीस जगी। फिर उन्होंने स्वीकार किया हां हम लोग ऐसे नहीं पढ़ाते थे। पढ़ते तो थे लेकिन यहां जैसे बताया गया वैसे नहीं पढ़ाते थे।
यह एहसास होना ही काफी नहीं था। उनसे कबूल कराया कि अब जब वे कक्षा में वापस पढ़ाने लौटें तो कोशिश करें कुछ कविताएं पढ़कर जाएं। कहानी सुनाने से पहले उसकी तैयार कर के स्कूल में जाएं।

Monday, September 11, 2017

शिक्षा मित्र और सरकारी नीति




कौशलेंद्र प्रपन्न
सन् 1989 के आस पास शिक्षा मित्र, पैरा टीचर शिक्षा सहायक आदि नामों से परिचित यह समुदाय बहुत तेजी से सरकार की आंखों में भा गए। मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार आदि राज्यों में तब इन्हीं के कंधों पर प्राथमिक शिक्षा की जिम्मेदारी डाल दी गई। सरकार लंबी नींद में चली गई। सस्ते और टिकाउ कर्मचारी किसको नहीं पसंद है। सरकार के लिए शिक्षा मित्र तीन हजार से लेकर पांच दस हजार में उपलब्ध होने लगे। सरकार की नियति बदल गई। इन्हीं के मार्फत प्राथमिक शिक्षा की गाड़ी हांक दी गई। स्थाई शिक्षक एक एक रिटायर होते गए और शिक्षा मित्र धीरे धीरे मुख्य भूमिका में आते चले गए। लेकिन खुश होने वाली बात नहीं क्योंकि इन्हें वेतन के नाम पर कोई ख़ास अंतर नहीं आया।
शिक्षा मित्र जनसुलभ श्रमकर्मी मिल जाते हैं। सरकार ऐसे श्रमजीवी को स्कूलों में झोंक देती है। कम लागत में उपलब्ध श्रमजीवी को प्रशिक्षित करने के लिए सरकार समय समय पर निर्णय देती रही है। आरटीई के अनुसार पैरा टीचर को दो साल के भीतर प्रशिक्षित करने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की है।
सरकार शिक्षा मित्र के आत्मबल को बनाए रखने के लिए समय समय पर उन्हें स्थाई करने की घोषणा की जाती रही हैं। लेकिन परिणाम वही ढाक के तीन पात। लाखों शिक्षा मित्र अभी भी सड़कों पर हैं। हजारों ऐसे शिक्षक हैं जिनकी उम्र अब सरकारी नौकरी के नियमानुसार खत्म हो चुकी है। अब उनके सामने रोजगार बचाए रखने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। इन शिक्षा मित्रों में से काफी ऐसे हैं जिन्होंने सीसैट, राज्य परीक्षा, नेट आदि पास हैं। अफ्सोस कि वे अभी भी अस्थाई शिक्षा मित्र के तौर पर खट रहे हैं। हमें ऐसी प्रतिभाओं का सही और सकारात्मक इस्तमाल करने की मुकम्मल योजना बनानी चाहिए।

Saturday, September 9, 2017


घुरनी!!! जीवन सस्ती, शिक्षा महंगी
कौशलेंद्र प्रपन्न
घुरनी अच्छा ही हुआ तुम किसी स्कूल में नहीं गई। स्कूल जाती तो मालूम नहीं जिंदा बचती या नहीं। कम से कम स्कूल नहीं गई तो जिंदा तो हो। वैसे क्या स्कूल और क्या घर? कहीं भी तो तुम सुरक्षित नहीं रही।
हमने तो सोचा था कि स्कूल में तुम महफूज होगी। वहां तुम्हें जिंदगी से रू ब रू कराया जाएगा। जीवन में आने वाली परेशानियों और चुनौतियों से लड़ने की ताकत दी जाएगी। लेकिन ग़लत था शायद। क्योंकि वह जगह भी विश्वास के घेरे से बाहर हो चुकी है।
जब स्कूल के कर्मचारी, शिक्षक आदि स्टॉफ के भरोसे हमारे बच्चों की जिंदगी सुरक्षित नहीं तो इससे अच्छी बात है हमारे बच्चे स्कूल न जाएं। क्या शिक्षा जीवन से बड़ी होती है? और अगर शिक्षा से जीवन से बड़ी है और महंगी भी तो बेहतर है जीवन बचाया जाए।
घुरनी तुम जिस दौर में जी रही हो वह समय कुछ ज्यादा ही क्रूर हो चुका है। तुम्हारी बहनें और भाई अस्पताल में ही दम तोड़ गए। उस पर तुर्रा यह है कि अगस्त में ऐसा होता है। जब हमारी शिक्षा और नागर समाज तुम्हारी रखवाली ही नहीं कर सकती तो ऐसे में क्या स्कूल और क्या शिक्षा।
ल्ेकिन घुरनी चिंता तो तब होती है जब किसी दिन तुम कहती हो कि स्कूल जाने का मन नहीं है। नहीं जाना स्कूल। तब मन धकधक करने लगता है। घुरनी जब भी तुम्हें स्कूल से डर लगे। कुछ महसूस हो तो बेफ्रिक हो बताना।

 

Thursday, September 7, 2017

तुम याद आते हो

सिर के उपर कोई हवाई जहाज गुजरता है
तो तुम याद आते हो,
जब कभी मुंह में खुजली होती है
तब तुम याद आते हो।
जहां कहीं भी जन सैलाब दिखाई देता है
तब हाथ फैलाए,
तुम याद आते हो,
तुम्हारी याद खूब सताती है,
जब कभी देखता हूं किसी को माईक पकड़े
कह रहा होता है....।
न जानें क्यों तुम्हारी याद आती है,
जब कभी कोई आईजीआई की ओर भाग रहा होता है,
तुम्हारी तो याद तब भी आती है,
जब चुडीदार पाजामा,
रंगबिरंगी कुर्ता पहन पग बांधे
मुसकी मार रही होता है।
कभी कभी सोचकर हैरान होता
कि तुम रात में सोते भी हो या नहीं,
कहीं रात बिरात उठ कर,
माईक तो नहीं पकड़ने लगते हो।

Friday, September 1, 2017

शिक्षक दिवस पर विमर्श




कौशलेंद्र प्रपन्न
शिक्षक दिवस का हप्ता आ चुका है। सोचता हूं कि इस पूरे हप्ते शिक्षक के विभिन्न आयामों को लेकर बातचीत हो। इसी संदर्भ में आज प्रस्तुत है-
कक्षा में शिक्षक के तेवर बरताव
जब एक शिक्षक कक्षा में होते हैं तब उन पर कई तरह के दबाव और असर काम करते हैं। इन्हीं दबावों के मार्फत शिक्षक का व्यवहार निर्धारित होता है। यूं ही कोई शिक्षक गुस्सा नहीं करता। न ही तमाचे जड़ना चाहता है। कोई तो वजह रही होगी और हाथ उठ गए होंगे।
एक सैनिक पर दबाव बढ़ता है तब वह या तो आत्महत्या करता है या फिर अपने ऑफिसर को गोली मारता है। लेकिन शिक्षक के कंधे पर नैतिकता और मूल्य संवाहक की भार इतना ज्यादा होता है कि वह न तो गोली मार सकता है और न आत्महत्या।
एक शिक्षक को जब लगातार चार पांच माह बिना सैलरी काम करना पड़ता है तो उनकी मनोदशा को समझने की आवश्यकता है। यह समझने की बात है कि उसे किस प्रकार कक्षा में पढ़ाना है। सवाल का जवाब हमें ही देना होगा कि एक शिक्षक को जब बैंक, आधार, सर्वे आदि के काम के साथ पढ़ने की ललक को कैसे बचा कर रखा जाए।
देश के जिस भी राज्य पर हाथ रखें हम पाएंगे कि वहां हजारों शिक्षकों के पद वर्षों से खाली हैं। कॉटेक्ट पर काम कर रहे शिक्षक हर दिन अनिश्चितता में काम करते हैं।
एक शिक्षक को कक्षा में बाल मनोविज्ञान, समाज विज्ञान, खुद की मनोदशा, आर्थिकी दबाव आदि को सहना पड़ता है। जो भी कक्षा में आता है वह शिक्षक को नसीहतें ही दे कर जाता है। तमाम शैक्षिक खामियों का कसूरवार गोया शिक्षक नामक प्राणि ही है। हमें तोहमत मढ़ने से पहले शिक्षक के कार्य स्थल और कार्य की पेचिंदगियों को भी समझना होगा

Thursday, August 31, 2017

घुरनी चली साहित्य डगर



कौशलेंद्र प्रपन्न
घुरनी को अच्छे से मालूम था कि साहित्य में वो गंभीर नहीं हो सकती। शब्दों की उसकी ताकत उससे छुपी नहीं थी। जानती थी कि साहित्य में घाघ से घाघ लोग दौड़ रहे हैं। रेग रहे ह्रैं। उसे रेंगना पसंद नहीं था। उसे तो यह भी पसंद नहीं था कि वो जो लिखे उसे लोग चटकारे लेकर चर्चा न करें। वो जो लिखे उसपर बखेड़ा खड़ा हो जाए।
किया भी वही जो उसे भाया। उसने वही लिखा जिसे युवा और अधेड़ लोग पढ़ना पसंद करते। पसंद भी किया। तब क्या था उसका मिज़ाज ! उसकी तो पूछिए मत सातवां आसमान भी छोटा सा लगने लगा। शहरां के चौराहों पर बड़ी सी अंगूठी डाले कानों में झूमका और टेस लाल लिपिस्टिक लगाए छा गई।
शहर शहर उसके प्रकाशक ने खूब शोर मचाया। लिखने वाले लिखते हैं कि आह से उह तक का मज़ा है। शायद घुरनी का मकसद पूरा हुआ। सुना है छोटी छोटी कहानियों में भी हाथ आजमाने लगी है। अपनी जिंदगी जी रही है। घुरनी देह को परचम बनाने पर आमादा है।
कभी बीच सड़क पर तो कभी पहाड़ को ठेंगा दिखाती तस्वीरें लगा कर लड़कों को रात में परेशान करती है। परेशान हो भी क्यों न साहित्य में अदा जो पैदा की है।
उसके लिए साहित्य के मायने अलग हैं। साहित्य मतलब जो जी न सकी उसे जीना। जो सौंदर्य का इस्तमाल न हो सका तो वह सौंदर्य क्या। किताब की ओट में खूब करतब दिखा रही है घुरनी। सुना है वो साहित्य की डगर पर तेज भागने लगी है। गलबहियां तो उसके लिए कोई मसला ही नहीं है।
घुरनी एक बात कहूं, बुरा तो न मानोगी! ज़रा संभल कर चलना साहित्य की डगर पर। चारों ओर लोग ही लोग भीड़ ही भीड़ है। ख्ुद को बचाना घुरनी। वैसे तुम्हें लगेगा कि यह क्या पुराने जमाने के बुढ़े की तरह ताकीद कर रहा हूं। रेल में अपना कोई भी अंग बाहर मत निकालना। स्टेशन पर मत उतरना। किसी से दिया हुआ खाना मत खाना। समझता हूं तुम समझदार हो गई हो। दुनिया तुमने भी तो अपनी आंखों से देखी है। पर फिर भी रायबहादुर बन रहा हूं। ज़रा संभल कर घुरनी।

Wednesday, August 30, 2017

विश्वविद्यालय की छटपटाती अकादमिक आत्माएं यानी ताबूत की पहली कील




कौशलेंद्र प्रपन्न
विश्वविद्यालय है या मॉल्स, पांच सितारा होटल? कहां से कहां तक का सफ़र तय किया है हमने? इन पांच सितारानुमा संस्थानों में कौन पढ़ते हैं?
डॉ प्रज्ञा की कहानियों के पाठक जानते हैं कि प्रज्ञा अपनी कहानियों में यथार्थ को इस कदर पीरोती हैं कि वो इतिहास का दस्तावेज़ बन जाता है। इसी कड़ी में विश्वविद्यालयी उच्च शिक्षा के आंगन में किस प्रकार प्राइवेट पब्लिक इंटरवेंशन हो रहे हैं उसे करीबी से महसूसा और कलमबद्ध किया है। यह कहानी दरअसल अकादमिक की छटपटाहट को ज़बान देने की कोशिश है। ताबूत की पहली कील कहानी वास्तव में विश्वविद्यालय में बाज़ार और वैश्विक गैर शैक्षिक ताकतों का प्रवेश काल की चालों का कागज पर उतारा गया है। प्रो अनिल सद्गोपाल 1989-90 के दौर को याद करते हुए कहते हैं कि 1989-90 में विश्वविद्यालय के तमाम अकादमिक दल ने बिना किसी विरोध के खामोश होकर स्वीकार किया। इसी का परिणाम है कि आज हमारे विश्वविद्यालय वैश्विक बाजार के तय मापदंड़ों पर खुद को बदलने के लिए विवश हैं। लेकिन इस कहानी में डॉ रमन बड़ी शिद्दत से इस बदलाव और पीपीपी का विरोध करते हैं।
द्वंद्व में जीने वाला डॉ रमन अंत में वही रास्ता चुनता है जो उसके लिए अभिष्ट है। साथ प्रो. साथी उस रमन को जानते थे जो खुल कर शिक्षा-शिक्षण को तवज्जो दिया करता था। लेकिन जब डॉ रमन पर प्रशासन व प्रबंधन समिति दबाव बनाती है कि वो शिक्षक,बच्चां के पक्ष में सोचने की बजाए प्रबंधन के हिस्से की सोचें। डॉ रमन का आत्म संघर्ष जीतता है और अह्ले सुबह अपना इस्तीफा फेज देते हैं। लेकिन इस पत्र की व्याख्या और रूप में की जाती है।
डॉ रमन का जाना दरअसल एक अकादमिक का प्रबंधन से दूर होना है। प्रबंधक हमेशा प्रबंधन की भाषा बोलते और समझा करते हैं। आनन फानन में एक ऐसे विश्वास पात्र धड़ को चुनता है जो प्रबंधन के आगे बिछने में गुरेज नहीं करता। अकादमिक समूह कॉलेज के सौदर्यीकरण में जुट जाते हैं। अपने कॉलेज को बेहतर ग्रेड मिले इस लालसा में हॉस्टल के मलबे को ढक दिया जाता है।
और अंत में कॉलेज को ए ग्रेड मयस्सर होता है। चारों ओर खुशियां ही खुशियां। लेकिन डॉ रमन अपनी आंखों के सामने तमाम मंजर को देख रहे हैं और एक ख़त लिखते हैं जो डॉ प्रज्ञा की सृजनशील मना का परिचय देता है। पठनीय तो है ही यह कहानी साथ ही जो शोध छात्र विश्वविद्यालय के आंगन में पीपीपी के प्रवेश और परिणामों का अध्ययन करना चाहते हैं उनके लिए एक अच्छा सुगठित दस्तावेज़ साबित होगा।

Tuesday, August 29, 2017

बहुभाषिकता और प्राथमिक कक्षा में शिक्षण




कौशलेंद्र प्रपन्न
प्रो. निरंजन सहाय, हिन्दी विभाग काशी विद्या पीठ में प्राध्यापक, ने बहुभाषिकता पर बोलते इस ओर इशारा किया कि भारत विविध भाषा-भाषी देश है। यहां एक भाषा की मांग करना और मानक भाषा के नाम पर अन्य भाषाओं को मरने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता। राष्टीय भाषा की मांग और स्थानीय भाषा की उपेक्षा हमारी कक्षाओं और स्कूलों में होती हैं।
स्थानीय भाषा और मानक भाषा कहीं न कहीं गंभीर मसला है इसे संविधान की नजर से भी देखने की आवश्यकता है। संविधान में शामिल और मानित 22 भाषाओं के एत्तर भी तो भाषाएं हैं जिन्हें स्कूली पाठ्यक्रमों और पढ़ने पढ़ाने दूर किया जाता है। यही कारण है कि सूची से बाहर खड़ी भाषाएं कभी भी स्कूली शिक्षा के अंग नहीं बन पातीं।
प्रतिभागियों के सवालों के जवाब प्रो. सहाय ने बड़ी शिद्दत से दिया। उन्होंने कहा कि मानक भाषा और स्थानीय भाषा में अंतर होना लाजमी है। जैसे प्रेमचंद और प्रसाद की भाषा में। हालांकि दोनों ही एक समय के लेखक रहे हैं। वैसे ही तुलसी और सूर की, जायसी की आदि की भाषा अवधि होते हुए भी स्थानीयता को लिए हुए है।
हमें कक्षा में बहुभाषिकता का सम्मान करना होगा। साथ बहुभाषिकता को बढ़ावा देने की आवश्यकता है।
इस व्याख्यान माला में केंद्रीय शिक्षा संस्थान के डॉ. वंदना सक्सेना, पीएचडीत्र एम फिल के छात्रों के साथ ही पूर्वी दिल्ली नगर निगम के अध्यापक उपस्थित थे।

Monday, August 28, 2017

बाबा रे बाबा!!!!


ऐसो बाबा देखो रे देखो ऐसो बाबा कैसे उधम मचायो रे रे। अब कैसे ऐसे बाबाओं पर विश्वास किया जाए। जब कभी हमारे घर, गांव देहात में कोई बाबा देखे जाएं तो हम उन्हें एकबारगी अपने घर में न आने दें।
एक बाबा मेरे घर में आया करते थे। वो घर में सब के साथ प्रवचन दिया करते थे। हमें तब बहुत समझ में नहीं आता था। लेकिन यह समझते थे कि वो जब भी आते थे अपने साथ हमारे लिए टाफी लेकर आते थे। हमारे चेहरे पर खुशी दौड़ जाती थी।
अब तो लगता है कि हाल के सालों में बाबाओं के रंग रूप उभर कर सामने आए हैं सच्चे बाबाओं को शंका और शक का सामना करना होगा।
न्याय और कानून की गति बेशक धीमी हो सकती है लेकिन बाबाओं के संबंध में जिस प्रकार से कार्यवाही की गई है उससे आशा की किरण दिखाई देती है।

Friday, August 25, 2017

कोर्स कुछ, जॉब कुछ और किया जिंदगी यूं ही जीया



कौशलेंद्र प्रपन्न
उन्होंने पीएचडी की। की भी तो अच्छे संस्थान से। पीएचडी के बाद उन्होंने बी.एड भी कर डाली। सोचा कम से कम स्कूल मास्टर तो बनना तय है। लेकिन स्कूल ने लेने से मना कर दिया। आप पीएचडी जो थे। प्रिंसिपल दबाव में आ गई। हमें इतने पढ़े लिखे की जरूरत नहीं। ऐेसे लोग सवाल ज्यादा करते हैं।
बी ए के बाद वो दुकान पर बैठा करते हैं। नून तेल, क्रीम बेचा करते हैं। सोचा था कि जिंदगी में वैज्ञानिक बनेंगे। लेकिन बन गए दुकानदार। वैसे दुकानदार बनने में भी कोई हर्ज नहीं। फिर कॉलेज में समय क्यों जाया किया।
एम एस सी की। फस्ट क्लास से पास किया। सोचा लाइब्रेरी साइंस का कोर्स कर लें। कम से कम स्कूल, कॉलेज में किताबों के बीच रहा करेंगे। क्योंकि आंखों से देख रखा था उन्होंने कि पीएचडी किया हुआ उनके कॉलेज में लाइब्रेरी प्रोफेशनल काम कर रहा था। कई कॉलेज में पढ़ा चुकने के बाद भी कॉलेज ने उन्हें नहीं अपनाया। आखिर में रोटी किताब घर दे रही थी।
हमारे आस पास कई रायबहादुर हुआ करते हैं एक राय मांगों उनके पास हजारां रायें मिल जाएंगी। खुद तो कुछ कर नहीं पाए लेकिन राय देने का काम बखूबी करते हैं। राय देने की लत जो कहिए कुछ भी कोर्स बता देंगे। और मानने वाले पहले से ही कन्फ्यूज होते हैं कि अंत में झक मार कर बताए गए कोर्स में दाखिल हो जाते हैं। बेशक उनका मन लगे न लगे। उनपर हुआ सरकार का खर्च तब बेकार हो जाता हैजब वे अपने कोर्स के अनुरूप उसी क्षेत्र में काम नहीं करते। एक प्रोफेशनल को बनाने में सरकार और अपने बाप की भी अच्छी लागत आती है।आज यह कहावत सही लगती हैकि पढ़े फारसी बेचे तेल।यानी पढ़ाई के अनुसार जॉब न करना व नहीं मिलना।
आज ऐसे युवा और प्रौढ़ खूब मिलेंगे जिनकी रूचि कुछ पढ़ने की थी किन्तु कुछ कारणों से वे पढ़ नहीं पाए। जो पढ़ाई की उसमें नौकरी का अवसर नहीं मिला। बस जिंदगी में रोटी मिल रही है।जिंदगी इन ख्यालों में कटरहीहै कि हम भी तो तुरम्मखां थे। आज हम भी वहां होते जहां फलां दोस्त है।



Thursday, August 24, 2017



स्कूल की दीवार
कौशलेंद्र प्रपन्न
सीमा पर दीवारें, कांटे, तार दिखें तो अचरज नहीं होता। एक डर वहां पर काम करता है। सुरक्षा हमारी प्राथमिकता होती है। अनधिकार प्रवेश की िंचंता और असामाजिक व्यक्तियों की आवाजाही न हो यह हमारी प्राथमिकता होती है।
स्कूल में उंची उंची दीवारों, कटिले तारों का मुरेठा बांधे खड़ी दीवारें हमें डराती हैं। गोया बच्चे न हुए किसी कैदी के साथ हम बरताव कर रहे हैं। कहीं वे भाग न जाएं। कहीं बाहर से कोई आ न जाए।
देश के तमाम स्कूलों में यह नजारा देखा जा सकता है। सरकारी हो या निजी हर स्कूल की दीवार उंची हुआ करती है केवल उंची हो तो समझी जा सकती है लेकिन उन दीवारों के मुरेठे कटिले तारों से बंधे होते हैं।
गांव व शहर के स्कूलों में जिनके पास दीवारें एवं गेट नहीं हैं वहां बडे आराम से आस पास के लोग अपना ऐशगाह बना लेते हैं। साथ ही गाय,भैंस वहीं चरती विचरती हैं। ताश के खेल नशाकेंद्र में तब्दील होते देर नहीं लगती।
स्कूल और बच्चों की सुरक्षा के लिए दीवार और गेट लाजमी हैं। हो भी क्यों न कई सरकारी स्कूलों की दीवार फांदते बच्चे शहर और महानगरों में देखे जाते हैं। कंटिले तार इसी लिए लगाए जाते हैं ताकि बच्चे आसानी से दीवार लांघकर बाहर न जाने पाएं।
सवाल यह उठता है कि स्कूल क्यों ऐसा माहौल मुहैया नहीं करा पाता कि बच्चे स्कूली की दीवार ही न फांदें। क्यों बच्चों को स्कूल अपनी ओर नहीं खींच पाते? यदि स्कूल रोचक और आनंददायी हो जाएं तो संभव है हमारे स्कूल बिना दीवार के हो जाएं। तभी शायद बच्चे स्कूल से बाहर नहीं बल्कि स्कूलों में अपनी कक्षाओं में मिलेंगे।

Wednesday, August 23, 2017

कि टेरेनवा बैरी ना



कौशलेंद्र प्रपन्न
भिखारी ठाकुर ने भोजपुरी में जिस शिद्दत से नाटक और गीत लिखे उसका तोड़ सच में नहीं है। टिरेनवा बैरी ना यह गीत भी बहुत दिलचस्प है। पिया को लिए जाए रे... टिकसवा पानी बुनी में बिला जाए रे, टिरेनवा न आए आदि की प्रार्थना नायिका करती है। नायिका की नजर में पति को टिरेनवा चुरा कर ले जा रही है। कलकता जा कर काली जादूगरनी के फेर में पति फंस जाएगा। कुछ ऐसे भावों को भिखारी ठाकुर ने गूंथा है।
कैफियत एक्सप्रेस भी बेचारी पटरी से उतर गई। पिछले हप्ते मुज़फ्फरनगर के पास टिरेनवा जमीन पर लेट गई। दोनां ही घटनाओं में लोगों की जानें गईं। अब आप ही बताएं एक विरहिनी क्यों न टिरेनवा को बैरी बताए। न जानें कितनी ही सांसें सदा सदा के लिए थम गईं। अब वे नहीं उठेंगे।
केई अपने बच्चों से मिलने परदेस से घर जा रहा होगा। किसी के बैग में खिलौने, चूड़ी, लहटा,उम्मीदें, ठिकोलियां रही होंगी। जो अब नहीं गूंजेंगी। कभी नहीं गूंजेंगी। कोई नौकरी के लिए निकला होगा गावं देहात छोड़कर। उसका का जग ही छूट गया।
उन टिरेनों में कितनी ही यादें, सपनें, उम्मींदें, सिसकियां और खेल-खिलौने खामोश हो गए। अब वे आंकड़ां और मुआवजों की गुहार में जिंदा होंगे।
टिरेनवा बैरी ही तो ठहरी। वैसे आती होगी खुशियों के संग लहराती हुई भी। कई के लिए पिया को लेकर आती है। और कई बार पिया को सदा के लिए चली भी जाती है।

Tuesday, August 22, 2017

वो मैंनेजर नहीं थे


कौशलेंद्र प्रपन्न
वो मैंनेजर नहीं थे। वो शुद्ध अकादमिक थे। पढ़ने पढ़ाने में डूबे रहने वाले जीव थे। अचानक उन्हें आफर आया कि क्या वो मैंनेजर बनेंगे? मैंनेजमेंट चाहती थी कि कोई संस्थान का ही हो। विश्वासपात्र ते हो ही पहली शर्त थी।
विश्वास पात्र का मतलब समझ गए हांगे। कुछ दिन माह तो वो अकादमिक कामों से छूटे रहे। लेकिन कब तक खुद को रोक पाते। सो कभी कभार पढ़ाने भी लगते। लेकिन यह काम मैंनेजमेंट को पसंद नहीं आई। उन्हें कहा गया आप संस्थान को इस तरह तैयार करें कि बाहर वाले जांच में आएं तो ए ग्रेड दे कर जाएं।
... हालांकि वो दिखावे के खिलाफ थे। वो बच्चों, शिक्षकों का सम्मान करते थे। दिक्कत यहीं हुई। पुराने वालों को समझने में परेशानी हुई कि वो ऐसा क्यों कर रहे हैं। लेकिन हाइहैं वहि जो राम रचि राखा। उनपर रोज दिन दबाव बढ़ने लगे। जब कभी कुछ लिखने पढ़ने बैठते तभी टुन टुना बज जाता। बच भी कैसे सकते थे।
दबाव सहने की आदत जो नहीं थी। जो काम उन्हें मिला था। उसमें मैंनेजमेंट का पार्ट नहीं था। रात तकरीबन आधी हो चुकी थी। वो उठे और एक चिट्ठी लिख डाली। सुबह देर से उठे। फोन घन घनाते रहे। चिट्ठी भेज दी गई।
...कहा गया नए साहिब आए हैं। उनका मानना है कि लोग अपनी मेल हमेशा चेक किया करें। कभी भी कामों की मेल व वाट्सएप पर थ्रो हो सकती है। कई लोगों को परेशानी तो हुई। लेकिन मरता क्या नहीं करता। सो आनन फानन में बच्चों की मदद लेकर स्मार्ट फोन चलाना बड़ों के लिए एक पहाड़ सा था। लेकिन पहाड़ पार करना भी जरूरी हो गया था।

Monday, August 21, 2017

जो लिखेगा वो छपेगा



कौशलेंद्र प्रपन्न
श्रीकान्त वर्मा की कविता की पंक्ति उधार ले कर कहूं तो जो रचेगा वो कैसे बचेगा। जो बचेगा वो कैसे रचेगा।
जे लिखेगा वो छपेगा। जो लिखेगा ही नहीं तो छपेगा कैसे? छपने के लिए लिखना पड़ता है। और लिखने के लिए छपना भी जरूरी है। छपने से लेखक का मनोबल बढ़ता है। जैसे जैसे लेखक लिखने लगता है वैसे वैसे वह छपने भी लगता है। छपते भी वही हैं जो अपने लेखन में स्तर और गुणवत्ता को बनाए रखते हैं। हालांकि कई बार बड़े बड़े लेखक की रचनाएं भी कई बार निराश करती हैं।
लिखने के लिए कंटेंट की आवश्यकता होती है। कई बार कंटेंट बेशक खराब हो लेकिन लेखक अपनी दक्षता, कौशल और शैली की बदौलत खराब से खराब कंटेंट को भी पठनीय बना देता है। हजारी प्रसाद द्विदी ने तो कुटज, नाखून क्यों बढ़ते हैं जैसे निबंध लिख डाले।
छोटी छोटी चीजों पर भी लेखकों ने अपनी शैली और अभ्यास से पठनीय बना दिया। दरअसल लेखन भी एथलीट और खिलाड़ियों की तरह होता है। रोज दिन लेखन के अभ्यास से लेखनी निखरती है। बिना अभ्यास के खिलाड़ी मैदान में ज्यादा दिन नहीं ठहर सकता।
लेखक भी रोज लिखता-पढ़ता रहता है तो उससे उसकी लेखनी और वर्तमान लेखनी से वाकिफ रहता है। वह अपनी शैली को अभ्यास और अध्ययन से पैना करता रहता है। मजे मजे में और केवल आनंद के लिए लिखने वाले एक ख़ास समूह तक ही पहुंच पाते हैं। सर्वजनीन बनने के लिए शैली और कंटेंट के साथ बरताव अहम हो जाता है।

Sunday, August 20, 2017

वे पूछते हैं मॉरल कहां है...


प्ांचतंत्र, जातक कथा, कथा सरितसागर आदि में शामिल कहानियां ने हमारे दिलो दिमाग को कंडिशन्ड कर दिया है। हम हर कहानी में कोई न कोई मूल्य, नैतिकता के पाठ ढूंढ़ते हैं। फलां कहानी में क्या नैतिक शिक्षा मिलती है आदि सवालों के जवाब की तलाश में कहानी की आत्मा की हत्या कर देते हैं।
दिल्ली या दिल्ली के बाहर रहने वाली शिक्षिका साथी सवाल करती हैं कि इस कहानी में क्या नैतिक शिक्षा बताएं तब उन पर कम सबसे ज्यादा खुद पर सवाल खड़ा करने का मन करता है कि हमने भावी शिक्षक/शिक्षिकाओं को इस तरह से अकादमिक और शैक्षिक सवालों, उलझनों से जूझने के लिए क्यों तैयार नहीं किया। यदि एक शिक्षिका/शिक्षक तकरीबन पंद्रह बीस सालों के शिक्षण तजर्बे के बाद इस सवालों से परेशान है तो इसका अर्थ हुआ हमारी शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों ने हमारे शिक्षकों को मजबूती से तैयार नहीं किया।
कई बार लगता है शिक्षकों को एक एथलीट और खिलाड़ी की तरह खुद को रोज प्रैक्टिस में लगाना चाहिए। यदि खिलाड़ी अभ्यास न करे तो मैदान में वह प्रदर्शन नहीं कर पाएंगे। शिक्षकों को भी अपनी दक्षता, हूनर को रोज दिन मांजना अपने प्रोफेशन के साथ न्याय करना होता है।
इस तरह के सवालों पर बाल कृष्ण देवसरे, प्रकाश मनु, क्षमा शर्मा, शेरजंग गर्ग, पंकज चतुर्वेदी आदि ने गंभीरता से विमर्श किया है। इन लेखकों की रचनाएं और किताबें हमारी दृष्टि को साफ ही करती हैं।

Thursday, August 17, 2017

प्याले मोदी चाचा


नमस्ते।
हम तो जा लहे हैं। कुछ तो चले गए, बचे हुए भी जल्द चले जाएंगे। आपकी दुनिया से। इक बात कहना चाहता हूं चाचा कि मेरे जाने के बाद हमरे माई बापू को पलेसान मती कीजिएगा। उन्होंने तो हमें अस्पताल पहुंचाया। प्याल कलते थे हमसे। उन्होंने नहीं माला। हमरे छोटे योगी चाचू को कहिएगा कि वो हमारे जाने के बाद हमारे घर में रोने मत जाएं। क्या है चाचा कि बढ़की आई उनको देख कर औरे रेने लगेगी।
मोदी चाचा! आपको भी नेहरू चाचा की तरह हमसे प्याल हैं न। जहां भी जाते हैं वहां बच्चों से जलूल मिलते हैं। हमको तो आप चचा ही लगते हैं। पकल बार दाढ़ी आपकी भी है और हमरे दादू के भी बार सन्न सफेद हो चुके हैं। तो मोदी चाचा हमरे जाने पर दो मिनट की चुप्पी मत रखिएगा स्कूलों में। क्योंकि न तो मेरा चेहरा आपको बंद आंखों में आएगा और न योगी चाचा ही हमरी माई के लोर पोछ पाएंगे।
अच्छा ही हुआ चचा कि हम अपनी उम्र जीने से पहिले आपके स्वच्छ भारत से चले गए। जीते तो जाने क्या से क्या और होते। शायद किसी भट्ठे पर या दुकान में काम कर कर के अपनी रीढ़ तोड़ रहा होता। कोई कैलाश अंकल को नोबल मिल भी मिल गया। हमरी कौन सुने चचा। जिंदा रहता तो स्कूल भी जाता। आपकी स्कील इंडिया प्लान को थोड़ा गंदला ही करता। हमरी तरह के और भी तो बच्चे हैं चचा जो स्कूल भी नहीं जाते। आप कहते हैं सात करोड़ से भी जियादा हैं। तो चचा हम मर के उस संख्या को थोड़ा कम ही तो किए।
चचा एक बात बोलूं सुनेंगे न? हमरी जिबह हुआ है। हम तो रहे नहीं जे बदला ले पाते। अब आप हमरी चचा हैं। योगी चचा भी हैं। उन्हें मत छोड़िएगा जिन्होंने हमरी जान से खिलवाड़ की है।
आपकी
कारूसाव
गांव बेल
ग्राम ओबरा

शिक्षकीय दुनिया की कहानी के पात्र

कौशलेंद्र प्रपन्न ‘‘ इक्कीस साल के बाद पहली बार किसी कार्यशाला में बैठा हूं। बहुत अच्छा लग रहा है। वरना तो जी ...