Saturday, September 3, 2016

शिक्षक की गुणवता और बदलता परिवेश



कौशलेंद्र प्रपन्न
सितंबर आ गया है। हम एक एक कर शिक्षक फिर हिन्दी को याद करेंगे। मास्टर जी मांफ कीजिए आप तो पूरे साल याद आते हैं लेकिन कुछ और कारणों से। कहीं आप कक्षा में सोते हुए पाए जाते हैं तब याद आते हैं। तब भी याद आते हैं जब कक्षा में बैठे बैठे ब्ल्यू फिल्में वाली विडियो अपने स्मॉर्ट में देखते पाए जाते हैं। और तो और जब आपकी छवि नकारा साबित करती रिपोर्ट आती है तब आप याद आते हैं। सबसे ज्यादा आपकी याद आती है 5 सितंबर को। क्योंकि इस दिन समाज को बड़ी ही श्रद्धा से आपको याद करता है। बच्चे आपको पावं छू कर आशीष लेते हैं। आपका स्नेह तब ज्यादा याद आता है जब कोई किसी चीज को प्यार से बिना झुझलाए दो तीन बार समझाने की बजाए गो टू हेल कह देता है। जब कभी कहीं किसी शब्द, वाक्यों के मायने में उलझ जाता हूं तब भी आपकी बहुत याद आती है। आपका चेहरा याद आता है आप किस तरह धैर्य से बातें सुनते और फिर विस्तार से समझाया करते थे। लेकिन समय के साथ आप भी तो बदल गए। बदलते क्यों न आप भी तो इसी समाज में रहते हैं। इन्हीं लोगों से आपका वास्ता जो पड़ता है। मेरे पापा बता रहे थे एक मास्टर जी आए थे कह रहे थे तुम्हें उन्होंने पढ़ाया है। उनकी पेंशन रूकी हुई थी। क्योंकि कुछ लेने देने के खिलाफ थे। मगर टूट गए। मुझे मालूम है आप टूटने वालों में से नहीं थे। लेकिन आपको भी इसी समाज में रहना है तो इसकी रवायतों को न चाहते हुए भी कई बार कबूलना पड़ता है। आप जहां भी स्वस्थ रहें। आपकी बहुत याद आती है। आज भी नए नए शिक्षकों/शिक्षिकओं में आपको देखता हूं।
समाज के समुचित विकास और संवर्द्धन में शिक्षा,सुरक्षा, स्वास्थ्य आदि को शामिल किया जाता है। इनमें से कोई भी कड़ी यदि कमजोर पड़ती है तो यह समझना चाहिए कि समाज व देश का विकास सही और समुचित दिशा में नहीं हो रहा है। यदि उपरोक्त किसी भी एक के विकास पर ध्यान दिया जा रहा है तो इसका सीधा अर्थ यही निकलता है कि उस समाज का सर्वांगीण विकास नहीं हो रहा है। सरकारें आती जाती हैं लेकिन प्रतिबद्धताएं, समस्याएं, चिंताएं यथावत् समाधान के इंतज़ार में अपनी जगह बरकरार रहती हैं। हमने आजादी के बाद भी यह दुहराना नहीं भूले कि समाज का विकास करना है तो शिक्षा को दुरुस्त करना होगा। वह 1952 की समिति हो, 1964-66 की कोठारी आयोग की संस्तुतियां हों, 1968 की राष्टीय शिक्षा नीति हो, 1986 की राष्टीय शिक्षा नीति हो, 1990-92 की आचार्य राममूर्ति पुनरीक्षा समिति हो, 2002 की संविधान के 86 वें संशोधन के पश्चात् प्राथमिक शिक्षा को मौलिक अधिकारों में 21 ए को शामिल करना हो आदि। इन उपरोक्त समितियों, आयोगों और घोषणाओं की रोशनी में हमें यह देखने की आवश्यकता है कि क्या हमने इन संस्तुतियों को प्राथमिक शिक्षा को बेहतर करने क लिए किस प्रतिबद्धता के साथ काम किया। सरकारें आती और जाती रहीं। हर सरकार ने घोषणाएं खूब कीं किन्तु प्राथमिक शिक्षा की दशा दिशा अभी भी हमारे तय लक्ष्य से दूर है। यहां यह भी बताते चलें कि 1968 में यह बात कही और स्वीकारी गई थी कि 1986 तक सभी बच्चों को प्राथमिक शिक्षा प्रदान कर दी जाएगी। समय और लक्ष्य को बढ़ाया ही गया यह शिक्षा के विकास क्रम पर नजर डालें तो साफतौर पर दिखाई देता है। सन् 1986 भी हमारे हाथ से निकल गया। सन् 1990 में सेनेगल में संपन्न अंतरराष्टीय शिक्षा सम्मेलन में विश्व के तमाम देशां से स्वीकारा और हस्ताक्षर कर कबूल किया कि 2000 तक हम देश के सभी बच्चों को ;6 से 14 आयुवर्ग केद्ध बुनियादी शिक्षा प्रदान कर देंगे। इस दस्तावेज पर भारत ने भी दस्तख़त किए थे। भारत में इस घोषणा को लागू करने में दो वर्ष का अतिरिक्त समय लगा यानी 1992 में भारत इस दस्तावेज को अमलीजामा पहनाता है। यहां दिखाई देती है कि हमारे राजनीतिक धड़ों को शिक्षा की चिंता कितनी थी। हमें राजनीतिक इच्छा शक्ति का भी परिचय मिलता है कि हमने अब तक शिक्षा का मौलिक अधिकार तक नहीं माना था। हालांकि प्रो. कृष्ण कुमार अपनी किताब गुलामी की शिक्षा और राष्टवाद में इस मसले को उठाते हैं और कहते हैं कि ‘शिक्षा का अधिकार कानून को बनने में सौ वर्ष का समय लगा।
गौरतलब है कि 2002 में संविधान में 86 वां संशोधन के बाद मौलिक अधिकारों में धारा 21 में ए जोड़ा गया और कहा गया ‘निःशुल्क एवं अनिवार्य बुनियादी शिक्षा का अधिकार’ सभी बच्चों ;6 से 14 आयुवर्ग केद्ध को प्रदान किया जाएगा। जैसा की सभी को मालूम है कि यह संशोधन कानून 2009 में बना। यानी भारत के तमाम बच्चों को मौलिक शिक्षा का अधिकार 2009 में मिला। इसी तारीख को तय किया गया कि सभी राज्यों में यह 31 मार्च 2013 तक लागू हो जाएगा। यह तय समय सीमा गुजरे भी आज लगभग तीस वर्ष हो चुके हैं। हकीकत यह है कि हमारे देश के लगभग जैसा कि भारत सरकार के मानव संसाधन मंत्रालय की रिपोर्ट बताती है कि आज भी अस्सी लाख बच्चे स्कूलों से बाहर हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो भारत के कुल बच्चों की जनसंख्या में से अस्सी लाख बच्चों प्राथमिक शिक्षा हासिल करने से महरूम हैं। जब इस आंकड़े को गैर सरकारी संस्थानों, प्रथम, आरटीई फोरम, ग्लोबल मोनिटरिंग रिपोर्ट आदि ने जांचा तो पाया गया कि यह संख्या 5 करोड़ के आस पास बैठती है। आंकड़ों में बात करने वाली सरकार यह तो जरूर पेश करती है कि आरटीई के लागू होने से स्कूलों में बच्चों के नामांकन दर में खासा उछाल आया है। लेकिन बीच में स्कूल छोड़ देने वाले बच्चों की संख्या भी बढ़ी है। आरटीई फोरम की वार्षिक सम्मेलन में जारी रिपोर्ट बताती है कि ग्रामीण इलाकों की बच्चियों में स्कूल बीच में छोड़ने की संख्या बढ़ी है। इसके पीछे वजह स्वच्छ और शौचालय का न होना प्रमुख है। ;27,28 मार्च 2015, राष्टीय शिक्षा अधिकार सम्मेलन,रिपोर्ट द्ध वहीं सरकारी शैक्षिक संस्था नीपा की ओर जारी डाइस की रिपोर्ट कभी इस ओर हमारा ध्यान खीचती है कि गांवों और शहरों में स्कूल छोड़ने वाले बच्चों में लड़कियां की संख्या अधिक है। वजह स्कूल का गांव से दूर होना, स्कूल में पीने का पानी और शौचालय का न होना, टीचर की कमी है। ; 2013-14,2014-15 की डाइस की रिपोर्ट द्ध गौरतलब है कि यह रिपोर्ट स्कूली शिक्षकों द्वारा ही भरवाई जाती हैं। देश भर में सरकारी स्कूलों में यह कवायद हर साल होती है और यह दस्तावेज किसी की नजर में नहीं चढ़ती। न ही इसपर कोई ख़ास गंभीर कदम ही उठाए जाते हैं। डाइस की रिपोर्ट सरकारी स्कूलों के शिक्षक और प्रधानाचार्य के द्वारा ही तैयार की जाती है इसलिए इस दस्तावेज को खास तवज्जो दी जानी चाहिए।
शिक्षा को सुचारूरूप से चलाने के लिए आर्थिक मदद की जरूरत पड़ती है। गौरतलब है कि 1964-66 में कोठारी आयोग ने तब सकल घरेलू उत्पाद के 6 फीसदी दिए जाने की सिफारिश की गई थी। यदि आज भी 2012-13,213-14 और 2015-16 के बजट को देखें तो हम बामुश्किलन 3 फीसदी ही शिक्षा की बेहतरी के लिए खर्च कर रहे हैं। वर्तमान सरकार ने शिक्षा के मद में दी जाने वाली आर्थिक सहायता राशि में ऐतिहासिक कटौती की गई। इसमें सर्व शिक्षा अभियान, राष्टीय माध्यमिक शिक्षा अभियान, मध्याह्न भोजन आदि में भारी कटौती की गई। इस पहल की आलोचना शैक्षिक क्षेत्र की हुई। तमाम शिक्षाविद्ों, अर्थशास्त्र के जानकार मानते हैं कि शिक्षा में गुणवता और बच्चों की भविष्य को बेहतर बनाना है तो सरकार को शिक्षा के मद में कैंची नहीं चलानी चाहिए थी। यहां याद दिला दें तो 2000 में जब डकार में सम्मेलन हुआ जहां 1990 में घोषित सभी के लिए शिक्षा की पुनरीक्षा हो रही थी तब भारत सरकार ने कहा था कि हमें आर्थिक मदद चाहिए ताकि हम तय समय सीमा के भीतर शिक्षा के आधिकार को पूरा कर पाएं। यही वह वर्ष है जब वैश्विक स्तर पर भारत को तमाम स्रोतों से आर्थिक मदद मिलने शुरू हो गए। सर्व शिक्षा अभियान के तकत करोड़ों रुपए सरकार को हर वर्ष मिले। यदि इस लिहाज से देखें तो शिक्षा को उस अनुपात में सुधार नहीं हुए। आर्थिक मार झेल रही प्राथमिक शिक्षा को कैसे बेहतर बनाया जाए इसके लिए कई स्तरों पर योजनाएं बनाई गईं। कोठारी आयोग ने कहा था कि यदि प्राथमिक शिक्षा में गुणवता सुनिश्चित करना है तो कक्षा में 25/1 यानी बच्चे और शिक्षक के अनुपात होने चाहिए। लेकिन यह अनुपात सरकारी स्कूलों में अभी भी दूर की कौड़ी है। इसके पीछे के कारणों को सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों इस रूप में पहचान की कि हमारे स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक नहीं हैं। शिक्षकों कमी कमी को पूरा करने का एक वैकल्पिक रास्ता यह 1990 के आस पास यह निकाला गया कि हम कम प्रशिक्षित पैरा टीचर, शिक्षा मित्र, अनुबंधित शिक्षकों से कक्षा में शिक्षण का काम लेंगे। यह एक ऐतिहासिक कदम था। प्राथमिक कक्षाओं में शिक्षा मित्रों के हवाले शिक्षा को छोड़ दिया गया। प्रो अनिल सद्गोपाल की नजर में यह उदारीकरण और प्राथमिक शिक्षा में विश्व बैंक का प्रवेश काल था। प्रो सदगोपाल आगे कहते हैं कि यह एक सरकारी तंत्र को भारत की हाथों से झीन का बाजार को सौंपने से कम नहीं था। हमने अपनी शैक्षिक नीति और दिशा तय करने के लिए विश्व बैंकों को आमंत्रित किया। आज भी प्राथमिक स्कूलों में देश भर में लाखों पद खाली हैं जिन पर शिक्षा मित्र और अनुबंधित शिक्षक खट रहे हैं। प्राथमिक शिक्षा में इस तदर्थवादी पहल ने प्राथमिक शिक्षा की गुणवता को खासा प्रभावित किया। शिक्षाविद् प्रेमपाल शर्मा शिक्षा-कुशिक्षा किताब में लिखते हैं कि आज प्राथमिक शिक्षा में सबसे भयावह स्थिति और बोझ समझ का तो है ही साथ ही भाषा के तौर पर अंग्रेजी की ज्यादा है। हमारे अधिकांश बच्चे अंग्रेजी के डर में जीवन जीते हैं। प्रेमपाल शर्मा इस किताब में चर्चा करते हैं कि आज प्राथमिक शिक्षा यदि किसी बड़े संक्रमण काल से गुजर नहीं है तो वह भाषायी विस्थापन है। भाषायी समझ और विषयी शिक्षण में शिक्षक की अपनी तालीम काफी मायने रखता है। क्योंकि जिस तरह आज हमारे शिक्षक प्रशिक्षण पा रहे हैं वे खुद शंका के घेर में हैं।
प्राथमिक शिक्षा में गुणवता के सवाल को अपने समय के प्रसिद्ध हस्ताक्षरों ने दर्ज किया है। प्रो कृष्ण कुमार ने विभिन्न पत्रों में इस मसले को उठाया है। प्राथमिक स्कूल के शिक्षकों की प्रशिक्षणीय कौशलों और पाठ्यक्रमों पर भी विमर्श करते हैं। अपनी किताब स्कूली हिन्दी में चर्चा करते हैं कि शिक्षकों की हैसियत और सामाजिक पहचान भी प्रकारांतर से उसके व्यवसाय को प्रभावित करता है। वहीं शिक्षा के नए क्षितिज किताब में रमेश दवे लिखते हैं कि प्राथमिक शिक्षा में शिक्षकों की कमी का असर कहीं न कहीं गुणवता पर दिखा जा सकता है। इतना ही नहीं बल्कि शिक्षकों को मिलने वाली पूर्व सेवाकालीन प्रशिक्षण उस स्तर के नहीं हैं जिसकी अपेक्षा शिक्षा शास्त्र में की जाती है। जब प्राथमिक शिक्षा में गुणवता की बात होती है कि तब सबसे पहले हमारा हाथ शिक्षक की गर्दन की ओर जाता है। अंधेर नगरी चौपट राजा से बिंब उधार ले कर कहूं तो क्योंकि शिक्षक की गर्दन कमजोर होती है। क्यांकि यह गर्दन सरलता से पकड़ी जा सकती है। यही वजह है कि शिक्षा में जो भी गिरावट बताई जा रही है उसका जिम्मेदार सिर्फ और सिर्फ शिक्षक ही है। जबकि इस गिरावट में शिक्षक एक मोहरे के तौर पर इस्तमाल होता है। यदि हमारी योजना, पाठ्यपुस्तकों,पाठ्यक्रमों और रणनीतियों में शिक्षक की कोई अहम भूमिका नहीं होती तो वह कैसे अपनी हैसियत और हस्तक्षेप को सुनिश्चित कर सकता है। प्रो कृष्ण कुमार गुलामी की शिक्षा और राष्टवाद मेंं विमर्श करते हैं कि शिक्षक शिक्षा विभाग में सबसे छोटी इकाई होता है जिसकी कोई नहीं सुनता। वह सिर्फ अपनी कक्षा में निर्माता और सर्वेसर्वा होता है। लेकिन समाज में उसकी हैसियत कमतर ही आंकी जाती है।
शिक्षक की गुणवता और कौशल काफी हद तक कक्षायी शिक्षण को प्रभावित करता है। यदि हम इस दृष्टि से देखें तो प्रो कृष्ण कुमार अपनी किताब ‘गुलामी शिक्षा और राष्टवाद’ में चर्चा करते हैं कि जिन कारकों ने शिक्षकों को एक कमजोर पेशागत पहचान और हैसियत बख्शी है, उनमें एक पाठ्यचर्या के मामले में उसका कोई हाथ न होना भी था। औपनिवेशिक व्यवस्था द्वारा लाए गए नौकरशाही में यह बात निहित थी कि पाठ्यचर्या और पाठ्यपुस्तकों से संबंधित सारे फैसले वरिष्ठ प्रशासकों द्वारा ही लिया जाता था। पाठ्यचर्या और पाठ्यपुस्तकों के निर्माण में शिक्षक की भूमिका पर नजर डालें तो पाएंगे कि शिक्षकीय भूमिका न के बराबर है। कहने को हर दस्तावेज यह तो दावा करता है कि शिक्षकों से राय ली गई। लेकिन सूक्ष्मता से देखें तो पाएंगे कि वह नक्कारखाने में तूती की तरह होती है। शिक्षक की आवाज शैक्षिक विमर्शों में नजरअंदाज ही किया गया है। वरना शिक्षकीय समूह से उठने वाली शिकायतों पर ध्यान दिया जाता।


Friday, August 26, 2016

वेब पत्रिकाओं मंे बच्चे


कौशलेंद्र प्रपन्न
तकनीक के बदवाल के साथ ही प्रकाशन और मुद्रण के स्वरूप में कए बड़ा बदलाव यह आया कि कागज की बजाए वेब पर साहित्य का प्रकाशन होने लगा। भोजपत्र, पेपाइरस, ताड़पत्रों, क्ले टेब्लेट्स, भीति पत्रों, स्तम्भों आदि का इस्तमाल हम पहले लिखने,प्रकाशन आदि के लिए करते थे। प्रकाशन और लेखन को संरक्षित करने के प्राचीन तौर तरीकों से आगे निकल चुका हमारा समाज आज गेगा बाइट्स, टेरा बाइट्स में अपने साहित्य को संरक्षित कर रहा है। एक ओर साहित्य मुद्रित रूप में उपलब्ध हैं तो वहीं दूसरी ओर हजारों लाखों पन्ने आभासीय दुनिया में तैर रही हैं। नब्बे के दशक के अंत में वेब साहित्य व वेब पत्रिकाओं की शुरुआत हो चुकी थी। धीरे धीरे लेखक,प्रकाशक भी इस ओर मुड़ने लगे। जहां पन्नों को पलटते थे और पत्रिकाओं को पढ़ाने का आनंद लेते थे अब बटन दबाते, एक क्लिक पर एक नई दुनिया के दरवाजे खुल जाते हैं। गुलजार साहब की एक कविता से पंक्ति उधार लेकर कहूं तो किताबें झांकती हैं बंद अलमारी के शीशों से/जो शामें उनकी सोहबत में कटा करती थीं/ अब अक्सर गुजर जाती हैं कम्प्यूटर के परदों पर/ अब उंगली क्लिक करने से बस झपकी गुजर जाती हैं/ किताबें मांगने गिरने उठाने के बहाने रिश्ते बनते थे/उनका क्या होगा/वो शायद अब नहीं होंगे। इन पंक्तियों मंे गुलजार साहब ने किताबों की बदलती दुनिया की ओर बड़ी ही बेचैनी से अपनी चिंता जाहिर की है। और काफी हद तक सच के करीब भी है कि जिस देश में अभी भी स्कूलों से सात करोड़ बच्चे स्कूल न जाते हों। स्कूल में बैठने, पीने का पानी, शौच की व्यवस्था तक नहीं है ऐसे में कितने बच्चे/बड़े हैं जो कैंेडल पर किताबें पढ़ते हैं। कैंडल्स व आॅन लाइन किताबें/पत्रिकाएं/अखबार पढ़ने वाले एक खास वर्ग ही हैं। अभी भी हमारा बच्चा और बाल समाज इस स्थिति में नहीं है कि वो इंटरनेट पर साहित्य का आनंद ले सके। देश के व्यापक बच्चों को आज भी छपी हुई सामग्री ज्यादा लुभाती हैं।
बाल मनोविज्ञान और बाल शिक्षा दर्शन इसे स्वीकार कर चुका है कि बच्चों को मुद्रित सामग्री के साथ ही दृश्य और श्रव्य सामग्रियां ज्यादा स्थायी तौर पर पसंद आती हैं। जहां तक स्मृतियों में दर्ज होने का मसला है कि मनोविज्ञान कहता है कि बच्चों को दिखाई और सुनाई गई सामग्री लाॅंग टर्म मेमेारी में दर्ज हो जाती हैं। यानी दीर्घ कालीन स्मृतियों का हिस्सा हो जाती हैं। इसलिए बच्चों का साहित्य व शिक्षण श्रव्य और दृश्य सामग्रियों से भरपूर होना चाहिए। यही कारण है कि बाल पत्रिकाएं और बाल साहित्य भरपूर रंगों, चित्रों, रेखाचित्रों, कार्टून का इस्तमाल करती हैं। ताकि बच्चा ज्यादा से ज्यादा कंटेंट को चित्रों के मार्फत ग्रहण करे।
आज की तारीख में कई हजार पन्नों वालों वेब पत्रिकाएं उपलब्ध हैं। उनमें से बच्चों के लिए कितना उपयोगी सामग्री उपलब्ध है इसका एक जायजा लेना अनुचित न होगा। इस लिहाज से चार बड़े वेब साइटों जो साहित्य, संस्कृति,कला आदि पर केंद्रीत है उसके कंटेंट यानी कथ्य सामग्रियों की एक पड़ताल बाल साहित्य के नजरिए की। इसमें हिन्दी समय डाॅट ओरजी जो वर्धा गांधी हिन्दी विश्वविद्यालय के तत्वाधान मंे प्रसारित और वेबकास्ट होता है। दूसरा कविताकोश डाॅट ओरजी, तीसरा गद्यकोश डाॅट ओरजी और चैथा हिन्दी नेस्ट डाॅट काॅम। इन वेब पत्रिकाओं के चुनाव के पीछे हमारी मनसा स्पष्ट थी कि क्या इन वेब पत्रिकओं, व प्लेटफार्म पर बच्चों के साहित्य को स्थान दिया गया है। यदि बाल साहित्य है तसे उसकी गुणवता और चयनित सामग्री की कितना प्रासंगिकता है। अब उक्त वेब साइटों पर उपलब्ध बाल साहित्य की चर्चा विस्तार से नीचे दी जा रही है।
हिन्दी समय डाॅट काॅम पर मुख्य पृष्ठ पर है विषयों के विभाजन में एक काॅलम शीर्षक बाल साहित्य का है। इस काॅलम को खोलने के बाद बाल साहित्य के प्रसिद्ध कथाकार,लेखक,कवियों,नाटककारों की रचनाएं नामानुसार प्रस्तुत की गई हैं। इन लेखकांे में सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, प्रकाश मनु, विनोद कुमार शुक्ल, सुभद्रा कुमारी चैहान, अलका सरावगी, जय शंकर प्रसाद, अशोक सेकसरिया, श्री लाल शुक्ल, रमेश तैलंग, हरिशंकर परसाई, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला आदि की बाल रचनाएं कहानियां, नाटक दी गई हैं। इनमें निराल जी की गधा और मेढ़क, हरिशंकर परसाई जी की चूहा और मैं, प्रकाश मनु की एक टमाटर का दाना आदि पढ़ना वास्वत में मौजू है। वहीं दूसरी ओर हमें हिन्दी समय के बाल साहित्य खंड़ में पद्म लाल पुन्ना लाल बख्सी की कहानी बुढ़िया भी शामिल है। वहीं हरकिृष्ण देवसरे की कविता कवितर तेंदूराम पढ़ना आनंददायी है। लगभग पचास लेखकों की बाल कहानियां,नाटक,कविताएं निश्चित ही संतोष देता है।
कविताकोश डाॅट ओरजी में विभिन्न विषयों अनुक्रमों मंे एक विषय बाल कविताओं का है। इसकी खासियत यह है कि इसमें कोशानुसार वर्णानुक्रम से रचनाकारों की बालरचनाएं सर्च कर पढ़ी जा सकती हैं। जहां पर हमंे बाल कथाकारों,कवियों की रचनाओं से गुजरने का मौका मिलता है। इसमें लक्ष्मी शंकर वाजपेयी, विजय किशोर मानव, रमेश तैलंग, दिविक रमेश, वीरेंद्र मिश्र, देवेंद्र कुमार आदि की प्रसिद्ध बाल कविताएं मिलेंगी। मसलन दिविक रमेश की कविता-उल्लू क्यों बनाते हो जी भी शामिल हैं। सूर्यकुमार पांडेय की कविता एक पान का पत्ता भी मिलेगा। इस कविताकोश में बाल कविताओं की प्रचूरता को देखते-पढ़ते हुए अनुमान लगाना कठिन नहीं है कि इस कोशकार ने काफी मेहनत की है बाल कविताओं और बालकवियांे को एक स्थान पर मुहैया कराने में।
गद्यकोश डाॅट ओरजी जैसा कि नाम से मालूम होता है कि इसमें सिर्फ और सिर्फ कहानियों ही मिलेंगी। यथानाम तथा गुणः यह कोश है। इसमें बाल कहानी के नाम से उप शीर्षक मंे हमें विभिन्न बाल कथाकारों की बाल कहानियों मिलती हैं। इस वेब साइट के मुख्य विषयों मंे हमें दो शीर्षक बच्चों के लिए मिलता है। पहला बाल कथाएं और दूसरा बाल उपन्यास। बाल कहानियों के आंगन में हमें 139 पृष्ठों में फैला बाल कथा संसार नजर आता है। इसमें मनोहर चमोली ‘मनु’, बलराम अग्रवाल, गिजूभाई बधेका आदि की बाल कहानियां समग्रता में पढ़ सकते हैं। वहीं बाल उपन्यासों में पन्ने थोड़े कम हैं कुल् तीन पन्नों का यह बाल उपन्यास खंड़ सिर्फ तीन उपन्यासों का समेटे हुए है। जिसमें हिमांशु जोशी की तीन तारें जो कि 2005 में किताब घर प्रकाशित है और यशपाल जैन की राजकुमारी की प्रतिज्ञा जतो 2005 में प्रकाशित हुई थी उपलब्ध है। इसके अलावा अभी यह खंड़ सूखा पड़ा है।
अब बात करते हैं बाल साहित्य को भी साथ लेकर चलने वाला वेबसाइट हिन्दी नेस्ट डाॅटकाॅम की। इस वेब साइट पर हमंे बच्चों की दुनिया शीर्षक से बच्चों की वास्तव में दुनिया का नजारा मिलता हैं। इसे वेबसाइट में बच्चों के साहित्य कहें या बाल दुनिया बड़ी ही व्यवस्थित तरीके से विभिन्न उपखंड़ों में परोसा गया है। मसलन- बच्चों की दुनिया में चीता कैसे बना सबसे तेज, जिराफ की गर्दन लंबी कैसे हुई? शेर फल क्यों नहीं खाता जैसे विषयों पर आलेख हैं वहीं कहानियों के खंडत्र में हमें अमर ज्येाति, बेबी माने अप्पी, छोटा सा रहस्य, नन्हीं नीतू आदि कहानियां संकलित हैं। वैसे ही कविताओं का अलग से एक ख्ंाड़ मिलता है जिसमें अगर पेड़ भी चलते होते, आओ मिल कर पेड़ लगाएं, गधा जानवर आदि कविताएं संग्रहीत की गई हैं। साथ ही साथ बाल निबंधों को भी ध्यान मंे रखते हुए स्थान दिया जाना वास्तव में सुखकरी है। इस खंड़ में अपने देश को जानो, दिल्ली का गुडियाघर, समुद्र में स्वरलहरियां आदि दी गई हैं। और तो और नन्हें बच्चों की रचनाओं को भी तवज्जो दी गई है। नन्हें बच्चों की रचनाएं उप शीर्षक से एक नन्ही सी बच्ची की दीवाली, निराले रंग, नया साल आया आदि बच्चों की रचनाओं से रू ब रू होने का अवसर मिलता है। बच्चों की चित्रकारी काॅलम में छोटे बच्चों की बनाई चित्रकारियों को शामिल किया गया है। इसमें हमें चित्र के साथ ही बच्चों की कविताओं से भी गुजरने का मौका मिलता है। बच्चे अपने देश,गांव, खेत खलिहान को कैसे और किस नजर सेक देखभाल रहे हैं इसका जायका हमें इस काॅलम के तहत मिलता है। एक और दिलचस्प बात यह है कि हमारे आस-पास के पक्षी काॅलम में विभिन्न पक्षियों के बारे में जानकारी दी गई है। जैसे कठफोड़वा, किगफिशर,बया, शकरखोरा, शाह बुलबुल आदि पक्षियों की आवाजों, परिवार से बच्चों को परिचित कराने का बेहतर काॅलम पढ़ने को मिलता है।
इस तरह से हमने लाखों हजारों पन्नांे और गेगा बाइट की दुनिया से तीन हिन्दी के सशक्त वेब पत्रिकाओं के कंटेंट यानी कथ्य की चर्चा की जिसे नजरअंदाज नहीं कर सकते। यदि किसी भी शिक्षक, विद्यार्थी को बाल कहानियां,कविताएं पढ़नी हो तो यहां विजिट कर सकते हैं। संभव है इंटरनेट की इस पयोधि में काफी उपयोगी और सार्थक वेब पत्रिकाएं रह गई हों।
आज की तारीख में हमारा साहित्य भी चोला बदल चुका है या फिर बदलने की प्रक्रिया मंे है। पुराने से पुराने अखबार, पत्रिकाएं, पुस्तकों आदि को डिजिटल रूप में तब्दील किया जा रहा है। ऐसे में बाल कहानियों, कविताओं, बाल पत्रिकाओं को आॅन लाइन करना, डिजिटल रूप में बदलना एक आवश्यक कार्य है। यही वजह है कि राष्टीय संग्रहालय ने विभिन्न पुरानी पांडुलिपियों को डिजिटल फार्म में तब्दील किया जा रहा है। साथ ही पत्रिकाओं के पुराने और नए संस्करणों को आॅन लाइन निकालने की कोशिश रही है।


Wednesday, August 24, 2016

स्कूली रिपोर्ट के आगे की हककीत



विद्यालयी शिक्षा को लेकर सरकारी और गैर सरकारी रिपोर्ट को झुठलाती जमीनी तल्ख़ हकीकत कुछ और ही मंजर बयां करती हैं। हाल ही में दिल्ली सरकार ने एक सर्वे रिपोर्ट साझा किया जिसमंे गंभीरतौर पर चिंता जतलाई गई थी कि सरकारी स्कूल के बच्चे हिन्दी पढ़ने लिखने में बहुत कमजोर हैं। बच्चों को हिन्दी के सामान्य वाक्य तक लिखना-पढ़ना नहीं आता। इसी किस्म की रिपोर्ट प्रथम की भी आ चुकी है जो लगातार पिछले 2005 से इस बाबत रिपोर्ट प्रस्तुत कर रहा है। इसी के साथ ही सरककारी संस्था डाईस भी रिपोर्ट जारी कर चुकी है। इन तमाम रिपोर्ट से गुजरते हुए एक ही छवि बनती है कि सकराी स्कूलों मंे न तो ठीक से शिक्षण हो रहा है और न ही शिक्षक मेहनत कर रहे हैं। शिक्षक ख़ासकर शक के घेरे में लिए जाते हैं कि इन्हें मोटी रकम बैठे बिठाए मिलती है। पढ़ाते-वढ़ाते नहीं हैं। यह छवि कैसे बनी होगी और वे कौन से आधार हैं जिनपर इस तरह की धारणाएं बनती हैं उन्हें समझने की आवश्यकता है। जरूरत तो इस बात की भी है कि हिन्दी को पढ़ाने के तौर तरीके कैसे अपनाएं जाए रहे हैं और कक्षा तक शिक्षक किस रूप में लेकर जा पाता है। यानी कहीं न कहीं न पढ़ पाने व न लिख पाने की स्थिति का जिम्मेदार बच्चा है,शिक्षक है या फिर सरकारी की नीतियां जहां सब कुछ एकमेक हुआ पड़ा है। दरअसल यदि बच्चे हिन्दी नहीं पढ़ पा रहे हैं तो इसका अर्थ यह कत्तई नहीं है कि वे अन्य विषयों में दक्षता हासिल कर चुके हैं। अध्ययन तो यह भी बताते हैं कि न केवल भाषा बल्कि गणित, विज्ञान आदि विषयों मंे भी बच्चों की दखलंदाजी कम ही है। दूसरे शब्दों मंे यदि बच्चे विभिन्न विषयों मंे अपेक्षित दक्षता हासिल नहीं कर पा रहे हैं तो इसमें शिक्षण पद्धति, पाठ्यपुस्तकें और अध्यापकीय सत्ता भी काम करती है।
पूर्वी दिल्ली नगर निगम में टेक महिन्द्रा फाउंडेशन और पूर्व दिल्ली नगर निगम के साझा प्रयास से अंतःसेवाकालीन शिक्षण शिक्षा संस्थान की शुरुआत 2013 में हई। इसके पीेछे मकसल यह रहा कि सरकारी प्राथमिक विद्यालयों के शिक्षकों, प्रधानाचार्यों की आदि शिक्षण दक्षता को और तराशा जाए। पूर्वी दिल्ली नगर निगम के तकरीबन 380 प्राथमिक स्कूल हैं जिनमें तकरीबन 6000 शिक्षक हैं। टेक महिन्द्रा फाउंडेशन ने अब तक कम से कम 3500 शिक्षकांे को विभिन्न विषयों की शिक्षण कार्यशाला मंे प्रशिक्षण प्रदान कर चुका है। हिन्दी,गणित,अंग्रेजी, विज्ञान और समाज विज्ञान के साथ ही आर्ट एंड क्राफ्त, म्युजिक आदि की कार्यशालाओं मंे शिक्षक/शिक्षिकाओं को लगातार प्रशिक्षण दिया जा रहा है। यदि शिक्षकों के अनुभव की बात करें तो वे स्वीकारते हैं कि उन्हें इन कार्यशालाओं मंे रोचक तरीके से कैसे पढ़ाएं इसकी समझ मिली। यहां आने वाले विषय विशेषज्ञों ने काफी मदद मिलती है। प्रतिमा कुमारी भजनपुरा डी ब्लाॅक प्रथम पाली की शिक्षिका हैं उनका कहना है कि हमने आज तक कई सेमिनार किए लेकिन जो तत्परता, कौशल और मनोयोग से इन कार्यशालाओं में सिखाया जाता है वैसी गुणवत्ता हमें पिछले बीस साल की नौकरी में नहीं मिली। ऐसे ही उद्गारों से रू ब रू होना पड़ता है शैल्जा चैधरी को जो कि अंतःसेवाकालीन शिक्षक शिक्षा संस्थान में हिन्दी विभाग में सहायक के तौर काम करे रही हैं इनका मानना है कि उन्हें कई शिक्षकों ने बताया कि उनके शिक्षण विधि में एक बड़ा अंतर आया। पहले वे वैसे ही पढ़ाते थे जैसे वे पढ़कर आए थे। लेकिन कार्यशाला के बाद उन लोगों ने अपनी शैली में बदलाव किया। वे अब गतिविधियों को शामिल करने लगे हैं जो उन्हें इन कार्यशालाओं मंे सिखाया जाता है। अब बच्चे ज्यादा आनंद लेते हैं।
पूर्व दिल्ली के विभिन्न क्षेत्रों के सरकारी स्कूलों जिसमें भजनपुरा,यमुना विहार, सीमापुरी,दिलशाद गार्डेन, गोकुल पुरी, मयूर विहार आदि  शामिल थे। हमने कक्षा अवलोकन में पाया कि न सिर्फ बच्चे लिखे हुए को पढ़ने मंे सक्षम हैं बल्कि स्वतंत्ररूप से वाक्यों को लिखने में भी दक्ष हैं। हमने कोशिश की कि बच्चे पाठ्यपुस्तकों से ऐत्तर क्या वे लिख और पढ़ सकते हैं इसके लिए हमने चार से पांच पंक्तियां हिन्दी मंे लिखीं जिसे बच्चों ने अच्छे से पढ़ा। कुछ वाक्यों में व्याकरणिक स्तर वर्तनी की अशुद्धियां भी की थीं जिसे बच्चों ने पकड़ा और दुरुस्त भी किया। विभिन्न स्कूलों के अवलोकन के आधार पर कह सकता हूं कि जिन लोगों,संस्थानों की रिपोर्ट यह कहती है कि सरकारी स्कूल के बच्चे पढ़ना-लिखना नहीं जानते उन्हें दुबारा कुछ और स्कूलांे मंे जाना और देखना चाहिए। एनसीइआरटी द्वारा तय रिडिंग के मानक बिंदुओं पर भी हमने इन बच्चों को समझने की कोशिश की और एक शुभ संकेत मिला कि बच्चे उन पैरामीटर पर भी बच्चे/बच्चियां खरे उतर रहे हैं।
स्कूल की किताबें,दीवारें, छत, सीढ़ियों आदि को शिक्षकों ने टीएलएम के तौर पर विकसित किया है। अकसर प्रथम पाली के शिक्षकों, प्रधानाचार्यों की शिकायत रहती है कि दूसरी पाली के बच्चे चित्र, पोस्टर,टीएलएम को बरबाद कर देते हैं। सुबह लगाव और दोपहर तक वो फट कर नीचे गिरे मिलते हैं। लेकिन शिक्षकों के प्रयास की सराहना करनी चाहिए कि इन सब स्थितियों के बावजूद भी वे अपने प्रयास से पीछे नहीं हटते। कक्षाओं मंे भी शिक्षकों ने बच्चों की मदद से वर्णमालाएं , कविताएं, कहानियां आदि सचित्र तैयार किया है। इसका नजारा तो तभी मिल सकता है जब हम कक्षाओं मंे पूर्वग्रह को झांड़ कर जाएं। यहां एकपक्षीए विमर्श करना मकसद नहीं है बल्कि जो देखा, सुना, पाया और महसूस किया उसे सामने लाना है। अपने कक्षायी अवलोकन में पाया कि बच्चे हिन्दी में वाक्य को पढ़ने,लिखने में सहज थे। वे न केवल रिमझिम की किताब को पढ़ पा रहे थे बल्कि वे लिख भी रहे थे। भाषा के चारों कौशलों मंे दक्ष नजर आए। वे पूरी मजबूती और आत्मविश्वास के साथ अपनी कविता,कहानी का वाचन भी कर रहे थे।
दिल्ली और दिल्ली के बाहर सरकारी स्कूलों मंे हिन्दी कैसे पढ़ी- पढ़ाई जा रही है इसका जायजा लेने के लिए इन पंक्तियों के लेखक ने बिहार,राजस्थान,हरियाणा,पंजाब, हिमाचल प्रदेश आदि के सरकारी स्कूलों मंे कक्षाओं का अवलोकन किया। अलग अलग कक्षाओं में पढ़ाइ जा रही हिन्दी में आने वाली दिक्कतों में मात्रा, वर्णमालाओं की समझ को लेकर था। हालांकि बच्चों का मात्राओं वाले शब्द पढ़ने में परेशानी हो रही थी लेकिन वे समय लगा कर पढ़ तो रहे थे। बच्चों से आगे निकल कर बात करूं तो शिक्षकों मंे भी हिन्दी की वर्तनी और उच्चारण दोष पाए गए। स,श,ष के साथ ही ड,ड़, च वर्ग के पाचवें वर्ण के उच्चारण में दिक्कतें आती हैं। यदि बच्चे नहीं पढ़ पाते तो इसमें कहीं न कहीं शिक्षकीय भूमिका भी जद मंे होती है। हमें समग्रता में हिन्दी पढ़ने पढ़ाने के मसले को देखना और समझना होगा। जब तक पुस्तकीय वाचन,पुनप्र्रस्तुतिकरण तक शिक्षण को महदूद रखेंगे तब तक ऐसी समस्याएं आती रहेंगी।


Monday, August 22, 2016

डिजिटल इंडिया में बच्चों की दुनिया


कौशलेंद्र प्रपन्न
यदि डिजिटल इंडिया में कक्षायी चरित्र को देखें तो एक व्यापक परिवर्तन दिखाई देता है। पुराने पड़ चुके ब्लैक बोर्ड के स्थान पर डिजिटल बोर्ड लग चुके हैं। ई पेन, ई बोर्ड, ई चार्ट के शोभायमान कक्षा में बच्चे भी ई लर्निंग कर रह हैं। लेकिन कुछ हजार निजी स्कूली कक्षाओं के अवलोकन पर यह धारणा बनाना गलत होगा कि हमारे सरकारी स्कूलों मंे पढ़ने वाले बच्चों को भी इसी किस्म की सुविधा मिल रही है। क्योंकि तमाम सरकारी और गैर सरकारी अध्ययन रिपोर्ट इस ओर इशारा करते हैं कि अभी भी देश में एकल शिक्षकीय विद्यालय चल रही हैं। इन एकलीय स्कूलांे मंे किस किस्म की तकनीक और शैक्षिक माहौल होगा इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है। यहां तक कि दिल्ली के पूर्वी दिल्ली नगर निगम के तहत चलने वाले प्राथमिक स्कूलांे में अगस्त माह तक किताबें, काॅपियां, पेंसिल आदि तक नहीं मिल पाई हैं। यह हालात दिल्ली भर की ही नहीं है बल्कि देश के विभिन्न राज्यों मंे भी झांके तो कमोबेश स्थितियां एक सी मिलेंगी।
यह तो एक उदाहरण है यदि हम सरकारी स्कूलों की कक्षायी हालत को देखें तो केंद्रीय विद्यालयों, सैनिक स्कूलों, नवोदय विद्यालयों, सर्वोदय विद्यालयों आदि को छोड़ दें तो राजकीय विद्यालयों की कक्षाएं घोर उपेक्षा की शिकार नजर आएंगी। यह तो स्थिति है कक्षा की। इसके एत्तर यदि शिक्षण कालांशों, पठन सामग्रियों आदि पर नजर डालें तो एकबारगी महसूस होगा कि क्या एक ही राज्य में किस प्रकार से समान स्कूल प्रणाली के साथ मजाक चल रहा है। आरटीई लागू होने के छह साल बाद भी राज्य स्तरीय शिक्षकों की कमी तकरीबन चार से पांच लाख है। दुख तो तब होता है जब अभी भी अद्र्ध प्रशिक्षित शिक्षकों के कंधे पर प्राथमिक शिक्षा को ढोने का काम चल रहा है।
आज बच्चे जितना पुस्तकों से नहीं सीखते उससे कहीं ज्यादा डिजिटल दुनिया में रहते हुए सीख रहे हैं। वह चाहे गेम्स हांे, या फिर सोशल मीडिया। सरकारी स्कूल के बच्चे हों या फिर निजी स्कूल के। दो ही बच्चे अपनी अपनी सुविधा और संसाधनों के मार्फत लगातार सीख रहे हैं और अपनी जिंदगी में इस्तमाल  भी कर रहे हैं। बच्चे अपने मां-बाप के फोन से ही सही किन्तु सूचनाएं और अपने शिक्षक/शिक्षिकाओं के बारे में फेसबुक पर जानकारियां हासिल कर रहे हैं। और तो और बच्चे शिक्षकों द्वारा पढ़ाए गए पाठों और जानकारियों का कई बार विभिनन ई स्रोतों पर सत्यापित भी करने लगे हैं। बच्चों की कक्षायी और काहर की दुनिया बहुत तेजी से बदल रही है। इसके साथ हमारा बरताव कैसा हो इसपर विमर्श करने की आवश्यकता है। हमारे शिक्षक वर्ग भी इस तकनीक और डिजिटल दुनिया से वाकिफ हो रहे हैं ताकि बच्चों को इससे महरूम न रहना पड़े।
डिजिटल इंडिया में जितनी तेजी से सूचनाएं विस्तारित और दुनिया भर में फैलती हैं यदि इसकी अहमियत को बच्चे समझें अपनी जानकारी और अनुभवों को वैश्विक कर सकते हैं। लेकिन अफ्सोसनाक बात यह भी है कि बच्चे सामान्यतौर पर बिना समुचित मार्गदर्शन के इस माध्यम का इस्तमाल गलत सूचनाओं और जानकारियों के लिए भी कर रहे हैं। यानी बच्चे क्या देख-पढ़ रहे हैं इसपर हमारी नजर होनी निहायत ही जरूरी है। वरना ऐसी भी घटनाएं देखने और सुनने को मिल रही हैं कि बच्चे ने अपनी मैडम की निजी पलों के विडियों को इंटरनेट पर डाल दिया। यह विवेक और अपनी समझ का सही इस्तमाल न करने का परिणाम है। हमंे अपने बच्चों को डिजिटल वल्र्ड की पहुंच और उसकी खामियों को भी बताना होगा। क्यांेकि पूर्व कथित वाक्य है विज्ञान दो धारी तलवार है। ठीक उसी तर्ज पर हम इसे भी समझने की कोशिश करें कि इंटरनेट व डिजिटल दुनिया बच्चों को जहां एक ओर व्यापक दुनिया से जोड़ता है वहीं दूसरी और एक कुंठा निराशा से भी भर देता है।
हमें डिजिटल वल्र्ड में रहने और बच्चों को वाकिफ कराने से एतराज नहीं है बल्कि हमें सचेत रहने में कोई हानि नहीं है। आज की तारीख में ज्ञान और शिक्षा की दुनिया डिजिटल दुनिया मंे ज्यादा वैश्विक होने की संभावनाएं लिए हुए है। वैयक्तिक अनुभव शोध को पलक झपकते ही वैश्विक फलक पर भेजने की सुविधा आज ही हमारे पास आई है तो क्या वजह है कि हम उस अवसर का प्रयोग सकारात्मक न करें। यही वजह है कि हमारे शिक्षक भी अब गृहकार्य, एसाइंमेंट आदि तकनीक आधारित सूचना संसाधनों के इस्तमाल करने पर जोर दे रहे हैं। प्रकारांतर से बच्चों को आज की बदलती डिजिटल दुनिया से रू ब रू कराना गलत नहीं है बशर्ते हम उन्हें बेहतर तरीके से मार्गदर्शन भी प्रदान करें।
बच्चों की किताबें, काॅपियां, पेन पेंसिल आदि भी बहुत तेजी से बदल चुकी हैं। हमारे समय में नटराज की पेंसिलें आया करती थीं। लाल रंग वाली। अब पेंसिलें और पेन आदि के रंग-रूप, देह ढांचा आदि बदल चुके हैं। देखने,इस्तमाल करने में भी रोचक होते हैं। किताबें की जहां तक बात है कि तो जितनी रंगीन और टाइपिंग फांट्स आदि भी मनमोहक की जा चुकी हैं। यह अलग बात है कि एनसीइआरटी द्वारा तैयार पाठ्यपुस्तकों में छपे चित्र कई बार बच्चों में तो अरूचि पैदा करता ही है साथ ही बड़ों को भी कम ही लुभाता है। यदि हम 3 री कक्षा से 5 वीें कक्षा तक चलने समाज विज्ञान वाली किताब-आस-पास, मेरी दिल्ली व हमारा भारत पर नजर डालें तो लाल किला, कुतुब मीनार आदि की छपी तस्वीर बदरंग और बेरोनक सी ही लगती हैं। जब बड़ों को ये किताबें अपनी ओर आकर्षित नहीं कर पातीं तो बच्चों को इन किताबों में कितना मन लगता होगा। वहीं निजी प्रकाशकों की ओर प्रकाशित पाठ्यपुस्तकों को देखें तो जी करता है एक बार नहीं कई बार पन्ने पलट कर कम से कम चित्र ही देख लें। वैसे भी बाल मनोविज्ञान और प्रकाशकीय दर्शन मानता है कि बच्चों की किताबों मंे टेक्स्ट सामग्री से ज्यादा चित्रित सामग्री होनी चाहिए। बच्चों की किताबें जितनी चटक रंगों, फाॅन्ट्य बड़े होंगे बच्चे उतना ही किताबें की ओर आकर्षित होते हैं।
बच्चों की किताबी दुनिया को डिजिटल दुनिया और विज्ञापनांे ने भी खूब प्रभावित किया है। बच्चों की पसंदीदा धारावाहिकों के मात्र उनकी काॅपियों,किताबों,पेंसिलों, बैग,कपड़ों तक पर धावा बोल चुके हैं। हमारे बच्चे इस डिजिटल दुनिया मंे एक उत्पाद की तरह भी पेश किए जा रहे हैं। इसे इस तरह समझा जा सकता है कि बाजार प्रायेाजित विभिन्न तरह की प्रतियोगिताओं में बच्चों को बड़ों की तरह व्यवहार करने, गाने,नाचने, स्टंट करने के लिए प्रेरित किया जाता है। हमारे बच्चे सेलेक्ट न होने, हार जाने, पिछड़ जाने पर स्वभाविक बालसुलभ व्यवहार छोड़ कर बड़ों की तरह अवसाद, निराशा आदि जैसी भावदशाओं से गुजरने लगते हैं। कई बार ऐसा भी महसूस होता है कि हमने अपने बच्चों से उनका बचपन समय से पहले झपट चुके हैं या फिर बाजार छीन ले इसके लिए उतावले नजर आते हैं। जो किसी भी स्तर पर उचित नहीं है।


Friday, August 19, 2016

ई ना पढ़ि


कौशलेंद्र प्रपन्न
सामान्य अवधारणा कह लीजिए या बोलचाल में अक्सर यह वाक्या सुनने में मिल जाता है कि ई ना पढ़ि यानी यह नहीं पढ़ेगा। इस वाक्य मंे ही छुपा एक पूर्वग्रह साफ दिखाई देता है। हम पूर्व मंे ही मान कर चल रहे हैं कि फलां बच्चा नहीं पढ़ेगा। बिना इसकी कोई गुंजाइश तलाशे कि यदि प्रयत्य किया जाए तो यह बच्चा भी पढ़ सकता है। अमूमन इस वाक्य में न केवल लिंग बल्कि जाति, वर्ग, धर्म आदि के प्रति हमारे दृष्टिकोण को भी सामने लाता है। शिक्षक,अभिभावक, प्रशासक भी इसी पूर्वग्रह को आधार बनाकर हजारों नहीं बल्कि लाखों प्रतिभावान बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा से छिनगा देते हैं। पहली नजर मंे दिखाई देने वाला हकीकत दरअसल हमारी नागर समाज की सोच को भी प्रकट करता है। यदि डाॅ तुलसी के उपन्यास मुर्दहिया को पढ़ें या फिर ओम प्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथात्मक उपन्यास जूठन तो एक खास वर्ग, दलित बच्चे को कैसे स्कूल में पहले ही दिन हाथ कलम छुआने की बजाए झाडू पकड़ा दिया जाता है। उस पर तर्रा यह कहा जाता है कि यह तो तेरा पुश्तैनी काम है। इसके साथ ही जातिसूचक गाली नत्थी करते हुए लगातार एक उन्हें शिक्षा की पगडंडी से खदेड़ा जाता रहा है।
हमारा नागर समाज द्वारा ही तैयार पाठ्यपुस्तकें भी कई बार प्रत्यक्ष और कई अप्रत्यक्षतौर पर ई ना पढ़ि की अवधारणा को ही आगे बढ़ाते हैं। इस रोशनी मंे हम सरकार की नीतियों को दिखने-समझने की कोशिश करें तो यह फांक साफ दिखाई देता है। कमतर बच्चों, कमजोर बच्चों, प्रतिभाशाली बच्चों आदि की रेणी में बांट कर हमने शिक्षा देने की वकालत भी शुरू कर दी है। साथ ही बाल मजदूरी कानून को शिक्षा के अधिकार कानून के बरक्स खड़ा कर हमने बच्चों से महज शिक्षा के रूझान को छिछला किया है। एक ओर आरटीई 2009 देश के सभी बच्चों को पढ़ने का हक देता है वहीं बाल मजदूरी कानून उसे कुचलने के लिए आमादा है।
सरकारी आंकड़े गवाह हैं कि आजादी के सत्तर साल बाद भी हमारे अस्सी लाख बच्चे स्कूलों से बाहर हैं। वहीं जीएमआर और यूनिसेफ की रिपोर्ट और ही हकीकत बयंा करती है। भारत में अभी पांच करोड़ से भी ज्यादा बच्चों स्कूलों से बाहर हैं। ताज्जुब तो तब होता है जब स्कूल जाने वाले बच्चे महज रजिस्ट में दर्ज होते हैं कैसी शिक्षा उन्हें मिल रही है इस पर हमारा कोई खास ध्यान नहीं होता। यही कारण है कि हमारे बच्चे पढ़ने को तो छह कक्षा मंे होते हैं लेकिन उन्हें कक्षा दूसरी, चैथी की हिन्दी , गणित, विज्ञान की समझ नहीं होती। हिन्दी की जहां तक बात है तो बच्चे सामान्य लिखे हुए वाक्यों को पढ़ नहीं पाते। जो बच्चे पढ़ लेते हैं उसका मायने नहीं समझ पाते। यह स्थिति खासा चिंताजनक है। इसमें कहीं न कहीं हिन्दी शिक्षण की विधियां भी कठघरे में खड़ी होती हैं। साथ ही शिक्षक भी संदेह के घेरे में आता है कि वह किस प्रकार हिन्दी पढ़ा रहा है।
यदि सरकारी स्कूलों मंे पढ़ाई जा रही हिन्दी पर नजर डालें तो पाएंगे कि शिक्षक सामान्यतः पाठों का वाचन भर कर आगे बढ़ जाते हैं। या फिर पाठ के अंत मंे दिए गए सवालों के उत्तर लिखवा कर हिन्दी शिक्षण कर देते हैं। कायदे से हिन्दी की कविता, कहानी आदि कैसे रोचक तरीके से पढ़ाई जाए इसओर उनका ध्यान कम जाता है। हिन्दी की जमीन यहीं से कमजोर होनी शुरू हो जाती है। जो आगे चलकर काॅलेज और विश्वविद्यालय मंे एकबारगी छिछली पड़ जाती है। बच्चों को अंकों के पहाड़ तो मिल जाते हैं लेकिन अभिव्यक्ति के स्तर पर पिछड़ने लगते हैं। एक गद्यांश लिखने में कई त्रुटियां करते हैं। न तो वे लिख,बोल और पढ़ने के कौशलों में दक्ष हो पाते हैं और न ही वे अपने विचारों को प्रकट करने में सक्षम हो पाते हैं। जो किसी भी भाषा कौशलों के चार स्तम्भ माने गए हैं। यदि शिक्षक पाठ्यपुस्तकों के साथ अपनी सृजनात्मक चिंतन और कल्पनाशीलता का इस्तमाल करें तो संभव है हिन्दी शिक्षण ज्यादा रूचिपूर्ण और लाभकरी हो सकेगी।
अमूमन शिक्षकों से सुनने में आता है कि उनकी कक्षा के बच्चे सामान्य वाक्य लिख और पढ़ नहीं पाते। उन्हें कैसे पढ़ना लिखना सीखाया जाए। भाषाविदों और प्रशिक्षकों का मानना है कि हिन्दी व किसी भी भाषा शिक्षण मंे व्याख्यान के साथ गतिविधियों के मार्फत शिक्षण किया जाए तो वह ज्यादा कारगर होता है। बच्चे जितना दृश्य-श्रव्य सामग्री देखते और सुनते हैं वह उनकी स्मृति में स्थायी हो जाती है। लेकिन दिक्कत यह है कि सरकारी स्कूलों मंे ब्लैकबोर्ड को छोड़कर अन्य सामग्री मुश्किल से मिलती हैं। अनुभव तो यह भी बताते हैं कि जो ब्लैकबोर्ड होते हैं वे भी प्रयोग की स्थिति में कम ही होते हैं। ब्लैकबोर्ड में इतने गड़्ढे होते हैं कि शिक्षकों को लिखने के लिए जगह तलाश करनी पड़ती है।
इन तमाम स्थितियों मंे यदि बच्चा स्कूल आ रहा है तो उसे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले इसके लिए विभिन्न आयोगों और समितियों ने संस्तुतियां दी हैं लेकिन वे फाइलों मंे ही मिला करती हैं। एक ओर अभिभावक वहीं दूसरी ओर शिक्षक वर्ग भी है जो मानकर चलता है कि ये बच्चे नहीं पढ़ सकते। इन्हें तो अंत में रेड़ी ही लगाने हैं। ये पढ़कर क्या करेगा। गोया ई ना पढ़ि पढ़िहैं संसार। सारा संसार पढ़ेगा बस कुछ खास बच्चे ही शिक्षा के स्वाद से अछूते रह जाएंगे। एक ओर समाज में पढ़ने लिखने पर सरकारी स्तर पर काफी जोर दिया जा रहा है। वहीं समाज में बच्चों का एक बड़ा वर्ग वह भी है जो स्कूल और शिक्षा की देहारी पर अपनी पारी का इंतजार कर रहा है। यदि डिजिटल इंडिया में बच्चे अनपढ़ रहते हैं तो यह एक करारा तमाचा उन बच्चों के गालों पर नहीं बल्कि नागर समाज के गाल पर होगा।  


Monday, August 1, 2016

सरकारी नौकरी से मोह भंग


आज ऐसे युवाओं की संख्या बढ़ती जा रही है जिनका सरकारी नौकरी से मोह भंग हो रहा है। हमारे आप पास ही ऐसे युवा/युवतियां हैं जिन्हें निजी कंपनियों में अच्छी सैलरी मिल रही है लेकिन कई बार घर परिवार के दबाव में आकर अपनी नौकरी छोड़ सरकारी नौकरी के लिए प्रतियोगिता परीक्षा में बैठते हैं और मेहनत से उसे पा भी लेते हैं। लेकिन काम करने की आजादी और काम की प्रकृति जिस तरह की उन्हें निजी कंपनियों में मिलती हैं वह उन्हें सरकारी महकमों में नहीं मिल पाती। यहीं से उनके मन में सरकारी नौकरी के प्रति मोहभंग होना शुरू हो जाता है।
दुबारा ऐसे युवा/युवतियां निजी कंपनियों की ओर रूख करते हैं। यह एक विचारणीय सवाल है।

Monday, July 25, 2016

कहां हो भाषा?


मैं तो तुम्हें पूरी दुनिया में देख आया। कहीं नहीं मिली। सब के सब अपनी भाषा तो बोलते हैं मगर अपनी भाषा को भूलते जा रहे हैं। इसे क्या नाम दें।
जिसे देखो वही भाषा की दुकान खोल कर बैठा है। हर कोई भाषा के सामान बेचने में लगा है। कोई कविता बेचता है। कोई कहानी तो कोई उपन्यास बेचता है। सब के सब बेचने में लगे हैं।
कहानी कोई बेचता है तो कोई कविता। जिसके हाथ जो बेचने को लग जाता है वेा वही बेचने में व्यस्त है। भाषा क्या सिर्फ कविता कहानी बेचने से बचाई जा सकती है। क्या सिर्फ सेमिनारों, सम्मेलनों के कंधे पर डाल कर लंबी नींद सोई जा सकती है। 

Thursday, July 21, 2016

स्कूल से बाहर बच्चे और बाल मजदूरी बिल


कौशलेंद्र प्रपन्न
सन् 1986 के बाल मजूदरी संरक्षण अधिनियम में संशोधन कर कानून बनाने के रास्ते साफ हो गए हैं। हाल ही में राज्य सभा में ध्वनि मत से इस मसौदे को पास कर दिया गया। यह महज ख़बर नहीं है बल्कि इसके परिणाम घातक होंगे शायद इसका अनुमान नहीं है। न केवल भारत में बल्कि विश्व भर में लाखों बच्चे स्कूल से बाहर हैं। वे बच्चे स्कूल में नहीं हैं तो कहां हैं? क्या वे बच्चे काम पर जा रहे हैं? क्या वचे बच्चे अंतरिक्ष मंे गायब हो गए? कहां हैं वे बच्चे जो स्कूल में नहीं हैं?
एक ओर सौ वर्षों के लंबे संघर्ष के बाद पारित शिक्षा अधिकार अधिनियम बना और 2010 में देशभर में लागू हुआ। वहीं दूसरी ओर यदि यह कानून बन जाता है तो बच्चे स्कूल की बजाए काम पर जाते नजर आएंगे। गौर से विमर्श करें तो पाएंगे कि यह एक पूर्व कानून को धत्ता बताते हुए दूसरे कानून को जन्म देना है। पहला कानून बच्चों को 6 से 14 वर्ष के आयुवर्ग, से मजदूरी कराना अपराध है वहीं दूसरी ओर 6 से 14 आयु वर्ग के बच्चों को यह बिल काम करने की अनुमति देती है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम जहां 6 से 14 आयु वर्ग के बच्चों को शिक्षा प्रदान करने की प्रतिबद्धता दुहराता है वही वहीं बाल मजदूरी मसौदा उन्हें काम करने की छूट देता है।
2001 की जनगणना के अनुसार भारत में 12.5 मिलियन बच्चे मजदूरी में लगे थे। आंकड़ों की मानें तो 2009-10 और 2011 में इस संख्या में गिरावट दर्ज की गई और यह भारी संख्या घट कर 5.4 मिलियिन पर अटक गई। यह एक आंकड़ा है इसकी कितनी सच्चाई है एक सत्यापित करने और खोज खबर लेना एक अलग विमर्श की मांग करता है लेकिन इतना तो तय है कि बच्चे काम पर जा रहे हैं। मौजू है कि 1986 में बाल मजदूरी अधिनियम जहां बच्चों को विभिन्न खतरनाक कामों में लगाने से संरक्षित करने की सिफारिश करती है। वही 1989 में संयुक्त राष्ट में संपन्न बाल अधिकार संरक्षण अधिनियम में विश्व के तमाम बच्चों को मुख्यतौर पर पांच अधिकार दिए गए। इस दस्तावेज पर भारत ने भी दस्तखत किया था। इस ऐतिहासिक दस्तावेज में बच्चे को जीने, सहभागिता,विकास,भूख और शिक्षा का अधिकार देने की बात की गई है। लेकिन अफसोसनाक हकीकत है कि न केवल भारत में बल्कि वैश्विक स्तर पर लाखों बच्चे युद्ध में शिकार होते हैं और बतौर हथियार प्रयोग में लाए जा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर लाखों बच्चे खतरनाक कामों में अपना बचपन खत्म कर रहे हैं। प्रो कृष्ण कुमार की किताब चूड़ी बाजार में लड़की बड़ी ही शिद्दत से फरूखाबाद में चूड़ी निर्माण मंे बचपन से हाथ धोने वाली बच्चियों और बच्चों की चर्चा करते हैं। कैसे बच्चे कम उम्र में वृद्ध हो जाते हैं। विभिन्न उद्योगों में बच्चों के कौशलों का इस्तमाल किया जाता है। बनारस हो या भदोही जहां भी बारीक काम होते हैं चाहे वो कालीन बनाना हो, च्ूाड़ी बनानी हो वहां बच्चों को लगाया जाता है। आज की तारीख मंे बच्चे बेहद सस्ते और सुलभ मानव संसाधन हैं जिन्हें काम मंे जोत दिया जाता है। लेकिन 1986 के कानून और बाल मजदूरी संरक्षण अधिनियम के अनुसार यदि कोई व्यक्ति बच्चे को काम पर लगाता है तो पहली बार में 20,000 रुपए का जुर्माना भरना पड़ेगा। साथ ही जेल का प्रावधान भी है। हकीकत इससे काफी दूर है। कभी कभार मीडिया में ऐसी ख़बरें आती हैं बाकी तो बच्चे अपने काम में तल्लीन ही रहते हैं। अपनी आंखें फोड़ते, कमर तोड़ते काम में लगे रहते हैं। क्या बच्चे दोषी हैं या उनके अभिभावक भी जिम्मेदारी के घेरे में आते हैं जो बच्चों को स्कूल भेजने की बजाए अपनी आर्थिक स्थिति को सुधारते रहते हैं।
हाल ही में यूनेस्को द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट पर नजर डालें तो पाएंगे कि विश्व भर मंे 26.30 करोड़ बच्चे स्कूल नहीं जाते। वहीं भारत पर नजर दौड़ाएं तो यह संख्या 1.1 करोड़ है जो स्कूल से बाहर हैं। हालांकि भारत सरकार के मानव संसाधन मंत्रालय मानता है कि 80 लाख बच्चे स्कूलों से बाहर हैं। यदि बच्चे स्कूल से हैं तो उन्हें तो उन्हें स्कूल तक लाने के लिए क्या प्रयास किए जा रहे हैं व क्या योजना बनाई गई है। सरकार तो अब उन बच्चों को स्कूल की बजाए काम पर भेजने की कानूनन तैयार कर चुकी है। कहने को तमाम कौशल विकास योजनाएं चलाई जा रही हैं। उसका मूल लक्ष्य क्या है? क्या हम बच्चों को शिक्षित करना चाहते हैं या काम में दक्ष बनाना चाहते हैं। कौशल विकास योजना में जिन कौशलों को शामिल किया गया है उसे देखकर यही लगता है कि बच्चे लकड़ी का काम, बिजली के काम, यानी आइटीआई की दक्षताएं पा कर बाजार में अपनी रेाटी का इंतजाम करने वाले हैं। हालांकि रोटी व रोजगार पाने का लक्ष्य कोई गलत नहीं है क्योंकि अंत मंे तो हम शिक्षा से रोजगार ही पाना चाहते हैं। अब सवाल यहां उठता है कि आठवीं, पास व नौवीं फेल बच्चा किस प्रकार के काम में लगेगा। हाल की एक रिपोर्ट की मानें तो दिल्ली में नौंवी में पढ़ने वाले बच्चों मंे से एक लाख बच्चे फेल हो गए। क्या हम उम्मीद कर सकते हैं कि वे उच्च शिक्षा में जाएंगे या काम के कौशल की ओर मुडेंगे। यूनेस्को की ही रिपोर्ट में बताई गई है कि भारत में उच्च माघ्यमिक स्तर पर 4.7 करोड़ बच्चे स्कूल नहीं जाते।
भारत में स्कूल से बाहर बच्चों की स्थिति की तुलना पाकिस्तान में स्कूल न जाने वाले बच्चों से करें तो यह संख्या दोगुनी है वहीं बांग्ला देश से पांच गुणी है। सवाल उठना स्वभाविक है कि इस तदाद में बच्चे स्कूल से बाहर हैं फिर भी हमारी नींद नहीं खुलती। तुर्रा यह कि हम 17 साल तक के बच्चों को मजदूरी व कमा करने की इजाजत दे रहे हैं। हम प्रकारांतर से सस्ते मजदूर पैदा करने की योजना बना रहे हैं जिसकी एक झांकी कौशल विकास योजना में मिलती है। पूछने वाले यहां पूछ सकते हैं कि भूखे पेट कौन पढ़ना चाहेगा? कौन अपने बच्चे को खाली पेट पढ़ने के लिए स्कूल भेजने को तैयार होगा। हर केाई पहले अपनी आर्थिक स्थिति ठीक करना चाहेगा। इसलिए बच्चे काम पर जा रहे हैं तो इसमें हर्ज ही क्या है। प्रश्न यह नहीं है कि बच्चे काम पर जा रहे हैं प्रश्न है हमारी मनसा क्या है। क्या हम बच्चों को स्कूल से बाहर रखकर सस्ते मजदूर पैदा करना चाह रहे हैं या फिर उन्हें अच्छी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हासिल करने के लिए प्रेरित और प्रयास कर रहे हैं।


Friday, July 15, 2016

साहित्य की शिक्षा


कौशलेंद्र प्रपन्न

साहित्य से हमारा वास्ता प्राथमिक कक्षाओं से ही शुरू हो जाता हैं। बल्कि कहना चाहिए नानी-दादी की बचपन की कहानियों से ही साहित्य से हमारा जुड़ाव हो जाता है। जब हम कक्षायी व पाठ्यपुस्तकीय साहित्य और पाठ््यपुस्तकेत्तर साहित्य के बीच के संबंध को देखने की कोशिश करते हैं तब एक बड़ा अंतर हमें दिखाई देता है। वह साहित्य जो पाठ्यपुस्तकों का हिस्सा नहीं हैं व नहीं बने हैं वे ज्यादा लुभाते हैं। लेकिन जब वही कविता, कहानी पाठ्यपुस्तकों मंे पढ़ाई जाती हैं तब हमारी पढ़ने की दृष्टि भी बदल जाती है। यही कारण है कि पाठ्यक्रमीय साहित्य और पाठ्यक्रम से बाहर के साहित्य के पाठकों में भी अंतर दिखाई देता है। प्राथमिक कक्षाओं मंे पढ़ाई जाने वाली कहानियां, कविताएं एवं साहित्य की अन्य विधाएं महज परीक्षा में सवालों के जवाब तक ही महदूद रहती हैं। कक्षायी कविता व कहानी के अंत में पूछे जाने वाले सवाल कई बार उस विधा के रसास्वादन में बाधा बनती हैं। बच्चे कविता, कहानी को महज परीक्षा में अंक हासिल करने के मकसद से पढ़ते हैं, आनंद कहीं पीछे छूटता जाता है।
अगर यह कहें कि साहित्य की शिक्षा अभी पूरी तरह से स्थापित नहीं हुई है। साहित्य तो खूब लिखी जा रही हैं। पाठ्यपुस्तकों में भी शामिल की जा रही हैं, लेकिन क्या उसके शिक्षण और शिक्षा शास्त्र पर भी ध्यान दिए जा रहे हैं? साथ ही साहित्य का शिक्षा-शिक्षण शास्त्र को समृद्ध करने की कोशिश की जा रही है? आदि सवालों पर हमें विस्तार से और ठहर कर विमर्श करने की आवश्यकता है। साहित्य की विधाओं को पाठ्यक्रमों में शामिल कर देना और उनके शिक्षण शास्त्र को मजबूत करना दो अलग कार्य हैं। एक लेखक व कवि लिखने के बाद आगे बढ़ जाता है। उसकी कविता व रचना को कैसे पढ़ाई जाए, यह कार्य उसके हिस्से नहीं आता। वह यह नहीं बताता कि उसकी रचना को कैसे और किस उद्देश्य से पढ़ाई जाए। यह जिम्मेदारी शिक्षकों पर आती है कि साहित्यिक रचनाओं को किस तरह पढ़ाएं। अभी तक हमारा साहित्य शिक्षा-शिक्षण शास्त्र कोई ख़ास मदद नहीं करता। सिर्फ पाठ के अंत में कुछ मशीनीकृत सवालों की शृंखला बनाने की। हमें कविता, कहानी, यात्रा वृत्तांत, संस्मरण, डायरी आदि को कैसे रोचक तरीके से बच्चों को पढ़ाएं इस ओर बहुत कम काम हुए हैं। हालांकि राष्टीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 भाषा शिक्षण पर तो विमर्श पेश करती है किन्तु साहित्य के शिक्षा-शिक्षण शास्त्र पर कोई खास मदद नहीं करती।
जब प्राथमिक कक्षाओं मंे साहित्य के विभिन्न विधाओं को बतौर पाठ के तौर पर शामिल करते हैं तो यहां यह भी जरूरत है कि उस विधा को कैसे पढ़ाएं इस पर भी रोशनी डाली जाए। मसलन कविता, कहानी,नाटक आदि का वाचन,उच्चारण, सस्वर वाचन कैसे करें, बच्चे कैसे उसे पढ़ें इस पर भी लिखा जाना चाहिए। देश के विभिन्न राज्यों के हिन्दी शिक्षकों के साथ कार्यशालाओं में अनुभव साझा करते सुनते महसूस हुआ कि उन्हें साहित्य शिक्षण के तौर तरीकों और साहित्य शिक्षण शास्त्र में हाथ थामने की आवश्यकता है। कक्षा 5 वीं की हिन्दी की किताब रिमझिम में श्री कुंवर नारायण एक कविता है ‘एक मां की बेबसी’ इस कविता को कैसे पढ़ाएं इसको लेकर शिक्षकों की शिकायत होती है कि इसे कैसे रोचक तरीके से पढ़ाएं। इस कविता को गाकर नहीं पढ़ाई जा सकती। न ही इसका लयबद्ध वाचन ही कर सकते हैं। इसी तरह प्राथमिक कक्षाओं की हिन्दी की पाठ्यपुस्तकों में कुछ और भी पाठ हैं जिन्हें पढ़ाने में दिक्कतें आती हैं। किताब व किताब का लेखक कैसे पढ़ाएं यानी शिक्षण शास्त्रीय मसले पर मौन हो जाता है। यहां शिक्षक पढ़ाने के दौरान असहाय हो जाता है। साहित्य शिक्षण की दिक्कतें नप केवल प्राथमिक स्तर पर बल्कि उच्च स्तर पर भी महसूस की जाती हैं। लेकिन उच्च स्तर पर इसकी छूट मिल सी जाती है। ख़ासकर बी ए व एम ए की कक्षाओं में तो सूर तुलसी, मुक्तिबोध की कविताओं की व्याख्याएं की जाती हैं लेकिन अफ्सोस की कविता की परतें कैसे और किस औजार से खोली जाए इसकी तालीम नहीं मिल पाती।
साहित्य के शिक्षण शास्त्र पर शिक्षा के विद्वानों को रोशनी डालनी चाहिए। क्योंकि बतौर साहित्यकार जो लिखना था वो तो लिखा जा चुका लेकिन जब कक्षाओं में उन्हें पढ़ाएं तो क्या और किस तरह से पढ़ाएं इसकी समझ हमें अपने शिक्षकों को देनी होगी। यह शिक्षा शास्त्र के हिस्से आता है कि विविध विधाओं की रचनाओं को पढ़ाते वक्त किस प्रकार की तकनीक व विधि अपनाई जाए। मसलन झांसी की रानी, पुष्प की अभिलाषा, बसंती हवा, सतपुड़ा के घने जंगल, ईदगाह, खिलौनेवाला, राख की रस्सी आदि कविता, कहानी या फिर डाकिए की कहानी कंवर सिंह की जबानी को कैसे रोचक तरीके से पढ़ाई जाए इसके शिक्षण शास्त्र पर भी काम करने की आवश्यकता है।
शिक्षकों की मानें तो हम कोई अभिनेता नहीं हैं कि हर कहानी कविता को अभिनय के माध्यम से पढ़ाएं। हमें यह बताया जाए कि कक्षा में कहानी व कविता को कैसे गतिविधियों के द्वारा पढ़ाई जाए। हालांकि कविता के जानकार मानते हैं कि हर कविता के भाव और अर्थ प्राथमिक कक्षाओं में बच्चे समझें ही। उन्हें बस कविता आनंद के लिए पढ़ाई जाए। आगे चल कर बच्चे स्वयं कविता का अर्थ समझ लेंगे। लेकिन यहां सवाल यह उठता है कि क्या आठवीं के बाद उन्हें हिन्दी व अन्य भाषायी कविताओं से रू बरू होने का मौका मिलता है? क्या उनके अंदर कविता को समझने व आनंद लेने की चाह बची रहती है। क्योंकि अमूमन कक्षा आठवीं तक आते आते बच्चों के सामने विषयों के चुनाव और छोड़ने की छूट होती है। बच्चे हिन्दी की जगह पर अन्य भाषाओं को चुन लेते हैं। तब क्या संभव है कि वे दुबारा पुष्य की अभिलाषा कविता को पढ़ें।
साहित्य शिक्षण के पीछे जो तर्क दिए जाते हैं उनमें वो ताकत नहीं होती जिसके आधार पर माना जाए कि साहित्य से संवेदना, मानवीय मूल्य बची रहती हैं। क्योंकि आज की तारीख में साहित्य के विद्यार्थियों में खासे कमी दर्ज की जा रही है। देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में बी ए, एम ए ;साहित्यद्ध के विभागों में पर्याप्त विद्यार्थी नहीं हैं। हिन्दी, संस्कृत, उर्दू विभागों में बच्चे दाखिला नहीं लेना चाहते। शायद इस कमी के पीछे साहित्य का बाजार और रोजगार बहुत बड़ी भूमिका अदा करती है। सोशल मीडिया पर बेशक घूम घूम कर शार मचा लिया जाए कि हिन्दी व अन्य भाषाएं फल फूल रही हैं। रोजगार के अवसर बढ़ें हैं आदि नारों से ज्यादा नहीं लगते। हकीकत यह है कि संस्कृत, उर्दू, हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं केे विद्यार्थिकों को रोजगार पाने के लिए अन्य कोर्स करने पड़ते हैं। तब जाकर इन भाषाओं से रोटी मिलती है। दूसरा मसला यह भी है कि बाजार ने काफी हद तक भाषा शिक्षण की हदें तय करनी शुरू की दी हैं। कौन सी भाषा कितनी महंगी है और कौन सी भाषा चलन से कट चुकी है इसका अंदाजा लगाना कठिन नहीं है।

Thursday, July 14, 2016

जब तुम्हारे पर कतर दिए जाएंगे


कहे जाएंगे
उड़
और
उड़।
कहे जाएंगे
उड़ना ही नहीं आता
नए नए पांख मिले हैं
उड़ने की ख़्वाहिश पाले हैं।
जब हर पल पांख
कतरे जाते हों
कहे जाते हों
उड़ तो ज़रा।
पंख कतर कर
कहते हैं
उड़ तो ज़रा
दिखा अपनी उड़ान।
जब तुम्हारे पर कतर दिए जाएंगे
और कहा जाएगा
उड़ान तो भर
असफल होकर
गिरेंगे जमीं पर
हंसेंगे
नाचेंगे
उड़ना नहीं आता।

Wednesday, July 13, 2016

एक मुहल्ला हुआ करता था


कहानी थोड़ी लंबी है आशा है पढ़ने का जोखिम उठाएंगे
उस मुहल्ले में कई व्यवसाय के लोग गांव से आकर बसने लगे। औरतें धीरे धीरे मांए बनीं। घर घर में बच्चों की किलकारियां उभरीं। एक कमरे से दो कमरे और मकान बने। सुबह काम पर पति के चले जाने के बाद औरतें आपस में बतकही किया करतीं। जब मुहल्ले में लोग बसने शुरू हुए तो एक परिवार से होते चले गए। किसी साथ सास होतीं तो किसी के साथ ननदें। बिन ब्याही बहनें भी साथ होंती। हर किसी को हर किसी के बारे में जानकारी होती। कौन किस गांव का है। किसके घर में कौन कौन हैं। सब मतलब सब कुछ सब को पता होता।
धीरे धीरे बच्चे गलियों में खेलने लगे। पांडे जी का बच्चा, बेचन का लड़का, बेचुवा की बेटी, गुप्ता जी का इकलौता लड़का ओम, शिवजग बाबू का अरूण सब साथ ही बड़े हो रहे थे। स्कूल भी साथ जाते। कई कई बार तो पता ही नहीं चलता किस घर का बच्चा किस घर मंे खाना खा रहा है और कहां दुपहरी में खेलते खेलते सो गया। इस कदर का विश्वास था। स्कूल पास किए किसी के हिस्से में बनारस तो किसी के हिस्से में हजारीबाग आया। कुछ बच्चे ऐसे भी थे जिन्हें उस शहर से बाहर निकलने का मौका नहीं मिला। यो वे वहीं के हो कर रह गए।
बच्चे बड़े हो ही रहे थे। अब काॅलेज भी पास कर गए। शादियां का दौर शुरू हुआ। शादी किसी भी घर में हो न्योता पूरे मुहल्ले को मिलता। बच्चे तो बिन न्योते के ही आमंत्रित होते। सुबह से लेकर रात तक शादी के घर के चक्कर काटा करते। रजाई, गद्दे, चैकी सब घरों में आवा जाही किया करतीं। बरतन तो जाहिरानातौर पर घरों में घुमा करते थे।
अब इस मुहल्ले को वह दौर भी देखना था जब बरतन बजने शुरू हुए। अब वह अपनापा कम सा होने लगा। बातें छुपाई जाने लगीं। बहु खुल्ले बाल में घूमती है। फलां का बेटा वापस घर देर से आता है। काम भी छूट गया है। जैसी बातें मिर्च मसाले के साथ मुहल्ले की गलियों मंे तैरने लगीं।
जिस मुहल्ले से जवानी देखी थी। जच्चगी से गुजरा था अब उसे बुढ़ापे की ओर भी जाना था। वही मुहल्ला है जहां अब या तो घर बिक गए। कोई और रहने लगा। बेटा दूसरे शहर में बस गया। शरीर साथ नहीं देता। घर ढन्नढना रहा है। ऐसे में ताले लगने शुरू हुए। साल मंे एक दो बाद कुछ हप्तों के लिए लोग लौटते। जवान सखियां बुढ़ी हो चुली थीं। सालों गुजरने लगे एक दूसरे से न मिले। जब दिल्ली जैसे महानगर में बेटों के घर सखियां रहने लगीं तो मिलने की चाह होने के बावजूद भी मिल नहीं पातीं। बेटों के अपने दरकार थे।
...और इस तरह से गुलजार मुहल्ला वृद्ध ग्राम,गली में तब्दील होता गया। वह मुहल्ला अब भी याद आता है।

Friday, July 8, 2016

रचना का भूगोल


कौशलेंद्र प्रपन्न
जब भी कोई कवि कविता व कहानी लिखता है तब उसकी रचना में भूगोल साफ नजर आती हैं। यदि कवि अपनी रचना का भूगोल नहीं बना पाया तो एक अर्थ में वह कविता शायद पाठकों को अपनी ओर न लुभा पाए। बड़े से बड़े कवियों की रचनाओं में एक ख़ास भूगोल तो हुआ ही करता है। यदि राजेश जोशी जी की कविता पढ़ें या मंगलेश डबराल या फिर विष्णु नागर की इन कवियों की खासियत ही यही है कि जब ये कविता लिख रहे होते हैं तब उसमें एक भूगोल भी रचा जा रहा होता है। कहीं किसी की कविता मंे पहाड़,जंगल, जमीन,परती जमीन वंचितों की आवाज केा जगह मिलती है तो कहीं दंगे के बाद के मंजर को भूगोल में जगह मिलती है। इतना ही नहीं, बल्कि इनकी कविताएं भूगोल के साथ ही वर्तमान चुनौतियों और राजनीतिक चैहद्दी भी बनाया करती हैं। यही वजह है कि जब हम राजेश जोशी की कविता दंगे के बाद को पढ़ते हैं तो लगता है यह आज की ही किसी दंगे के बाद की बात की जा रही है। ‘बच्चे काम पर जा रहे हैं’ पढ़ते वक्त लगता है कि यह बात भी इसी सदी, इसी समाज की तो की जा रही हैं। वहीं जब हम अज्ञेय की कविता संाप को पढ़ते हैं तो आज का समाज और नागर समाज के दोमुंहेपन से भी हम रू ब रू होते हैं। सच्चे अर्थाें में कवि अपनी रचनाओं में वत्र्तमान को तो जिंदा रखता ही है साथ ही आने वाले उजले दिनों के लिए एक रोशनदान भी छोड़ जाता है। आज की कविताएं और कविताओं का भूगोल बहुत तेजी से बदला है, बल्कि बदल रहा है। जिस तेजी से कविताओं के परिदृश्य बदले हैं उसी रफ्तार से कविताओं के सरोकार भी बदले हैं। हालांकि हर काल मंे रस रंग, प्रेम, शृंगार की कविताएं लिखी गईं हैं। तो साथ ही जायसी,कबीर जैसे विरोध के स्वर को बुलंद करने वाले गैर चारणीय कवियों ने बड़ी ही मजबूती से कविता के सार्वकालिक और सार्वदेशिक दरकारों को आगे बढ़ाया है। एक ओर चांद का मुंह टेढ़ा है, असाध्य वीणा, राम की शक्ति पूजा आदि लिखी जा रही थी तो उसी के समानांतर सरोकारी कविताओं की सृजना भी हो रही थी।
जैसे जैसे तकनीक का विकास हुआ है वैसे वैसे हमारी कविता भी सोशल मीडिया पर रची जाने लगीं। गैर जमीनी यानी वर्चुवल स्पेस में लिखी जाने वाली कविताएं व रचनाएं संभव है आज लिखी गईं, उन्हें पसंद करने वालों ने पंसद के बटन भी दबाए और आगे बढ़ गए। लेकिन अगले दिन उसे भूल जाते हैं। यहां पाठकों की भी कोई ख़ास गलती इसलिए नहीं है, क्योंकि उन्हें हर पल, हर घड़ी दसियों पंक्तियां पढ़ने को मिल रही हैं। पिंट रिच वातावरण तो बना ही है जहां हजारों की संख्या में हिन्दी व गैर हिन्दी भाषा में साहित्य लिखे जा रहे हैं। यह एक सुखद बात है कि कम से कम लोग चुप नहीं बैठ गए हैं। बल्कि जिसके पास जो साधन है उसी के मार्फत लिखने और प्रसारित करने से परहेज नहीं करते। यह अगल विमर्श का मुद्दा है कि क्या हम देखने को पढ़ना मानें? क्या हथेलियों पर स्क्रीन को सरकाते हम वास्तव में पढ़ते हैं या बस कंटेंट देखकर लाइक बटन दबा कर आगे निकल जाते हैं। विभिन्न तरह के सोशल स्पेस में लिखी जाने वाली कविताएं और कहानियों की बात करें तो कविताओं की बढ़त साफ दिखाई देती है। इन सोशल स्पेस में रची जाने वाली कविताओं की दुनिया भी बड़ी ही एक रेखीय ही है। जिन्हें उस स्पेस के बारे में जानकारी है वो तो देख-पढ़ पाते हैं बाकी सब शून्य।
कई बार यह सवाल उठाया जा चुका है कि कविता और कहानी के पाठक कम हो रहे हैं। दूसरे शब्दांे मंे कहें तो पाठकों की कमी का रूदन अक्सर सुनने मंे आता है। लेकिन फिर एक सवाल बड़ा ही दिलचस्प उठता है कि जब पाठक ही नहीं हैं तो कवि या लेखक किसके लिए लिख रहे हैं। कौन है जो किताबें खरीद रहा है? कोई है समाज में जिसे किताबों से आज भी मुहब्बत है। वरना प्रकाशक हजारों की संख्या में किताबें क्यों छाप रहे हैं। इस ओर जब नजर दौड़ाते हैं तो पाते हैं कि लेखक,कवि, कथाकार लगातार विभिन्न विधाओं में लिख पढ़ रहे हैं और उनके पाठक भी हैं। यह एक उत्साह का विषय होना चाहिए। पिछले दिनों जिन प्रमुख किताबों पर देश भर में विमर्शकारों ने चर्चाएं कीं और उनकी नजर से किताबें पढ़ने योग्य लगीं उनपर नजर दौड़ाएं तो उनमें कथा, कविता एवं गैर कथा विधायी किताबें अपनी कथानक की वजह से पाठकों को लुभाने मंे सफल रहीं।
कहानी कविता लेखन की कार्यशालाएं देश भर में विभिन्न साहित्यिक संस्थाएं समय समय पर आयोजित करती हैं जिसमें युवा कथाकारों व कवियों को दो या तीन दिन तक विभिन्न सत्रों में इस विधा में कैसे लिखी जाए इसकी बारीक प्रकृति से रू ब रू कराया जाता है। इस तर्ज पर यदि आलोचना व समीक्षा की बात करें तो आलोचना व समीक्षा विधा को लेकर बेहद कम कार्यशालाएं होती हैं। जबकि कायदे से इस विधा को बचाए रखने के लिए अकादमी, साहित्यिक संस्थाओं को योजना बनानी चाहिए।यदि रणनीति व योजना नहीं बनाई तो वह दिन दूर नहीं जब समीक्षा व आलोचना का भूगोल लगभग खाली हो जाएगा या फिर बेहद दलदली जमीन हो जाएगी। हमें तथाकथित समीक्षकों आलोचकों से वर्तमान समीक्षा को बचाने की भी आवश्यकता है। कथा- कहानी और कविता की भूमि बेहद सक्रिय है। जिस तदाद में कविताएं, कहानियां लिखी और छप रही हैं उसके अनुपात में गद्य की अन्य विधाओं मंे गति थोड़ी धीमी है। जब हम रिपोतार्ज, यात्रा वृत्तांत, रेखाचित्र आदि किताबें तलाशते हैं तब हमें निराशा होती है। संभव है इस विधा में लेखकों की रूचि कम हो गई हो। हालांकि प्रताप सहगल की लेखनी कम से कम यात्रा वृत्तांत में सक्रिय है। यदि रेखाचित्र और रिपोतार्ज के भूगोल पर नजर डालें तो सूखा नजर आता है। जबकि गद्य की हर विधा का अपना आस्वाद है। यहां एक सवाल यह भी उठता है कि जो किताबें छप रही हैं उसका सामाजिक सरोकार कितना है? उस किताब की पठनीयता और उपादेयता कितनी है आदि भी परखना होगा। किताबें भी जिस आनन फानन में छपती और बाजार से नदारत हो जाती हैं यह एक अलग अंधेरे की ओर इशारा करता है। सौ, पचास प्रति छपने वाली किताबें अमूमन लेखक की प्रति भर ही होती हैं जिसे लेखक अपने दोस्तों, परिचितों और कुछ परिचित अखबारी,पत्रिकाओं के संपादकों को भेज दिया करते हैं। यदि कहीं छोटी सी भी परिचयात्मक समीक्षा छप गई तो लेखक अपने आपको धन्य मानता है। यहां तो रातों रात लेखक बनाए और बेचे जाते हैं। लेखकीय बाजार बनाने में कई बार प्रकाशकों की भी अहम भूमिका होती है। प्रकाशक अपनी किताब यानी उत्पाद को खपाने के लिए कई तरह के रास्ते अपनाता है। यदि हम आलोचना की बात करते हैं तो यह अतिश्योक्ति ही कही जाएगी। क्योंकि आलोचना व समीक्षा की परंपरा काफी हद तक परिचय में सिमट गई है। इन दिनों जिस तरह की आलोचना,समीक्षा, समालोचना आदि दिखाई दे रही हैं उसे देख कर लगता है कि समीक्षा कम बस खानापूर्ति ही हो रही है। हम जानते हैं कि अंतोत्गत्वा पुस्तकीय सामग्री समालोचना कर्म से गहरे संबंध रखती है। आज की तारीख में पुस्तकीय आलोचना व समीक्षा अख़बारों मंे परिचयनुमा ही छपा करती हैं।





Wednesday, July 6, 2016

स्कूल खुल गए, पर बच्चे नदारत


कौशलेंद्र प्रपन्न
स्कूल खुल गए। शिक्षक स्कूलों को लौट गए। मगर बच्चे! बच्चे अभी भी घरों में हैं। उनके लिए शायद छुट्टियां खत्म नहीं हुईं। शायद स्कूल उन्हें नहीं लुभा रहे हैं। शायद बच्चों को स्कूलों में ऐसी कोई चीज नहीं दिखाई दे रही हैं जिसके लिए वे स्कूलों की ओर भागंे। इन दिनों सरकारी स्कूलों के शिक्षकों से बातचीत हुई। उनका कहना था कि दो तीन बच्चे उनकी क्लास मंे हैं। पूरे स्कूल में मुश्किल से पंद्रह और बीस बच्चे ही आए हैं। अब सवाल यह उठना स्वभाविक है कि क्या यही स्थिति निजी स्कूलों मंे भी है? क्या वहां भी बच्चे स्कूल से नदारत हैं। क्या अभिभावक बच्चों को स्कूल नहीं भेज रहे हैं आदि। मगर हकीकत यह है कि निजी स्कूलों में स्कूल खुलने से पहले ही बच्चों ने तैयारियां कर लीं। स्कूल खुले नहीं कि बच्चों को उनके अभिभावकों ने भेजना शुरू कर दिया। इसके पीछे कारण कई हैं। पहला तो यही कि वहां ली जाने वाली फीस,प्रबंधन,अनुशासन ऐसा है कि क्या बच्चे और क्या अभिभावक सभी तत्परता से बच्चों को स्कूल भेजते हैं। यदि इस नजर से सरकारी स्कूलों और अभिभावकों को देखें तो एक आलस्य,गैर जिम्मेदाराना बरताव नजर आएगा। अभिभावकों को अपने काम से समय नहीं मिलता दूसरा उन्हें मालूम है स्कूल में पहले दूसरे तीसरे दिन पढ़ाई नहीं होगी। बच्चे गांव गए हांेगे आदि। और काफी हद तक यह सच्चाई भी है कि बच्चों गर्मी की छुट्टियों मंे अपने गांव चले जाते हैं। कुछ बच्चे अपने मां-बाप के साथ खेतों मंे काम पर लग जाते हैं।
शिक्षा की हालत को सुधारने के लिए सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर कई सारे कदम उठाए जा रहे हैं। सरकारी स्तर पर बात की जाए तो तमाम योजनाएं, नीतियां, आयोगों का गठन किया गया। मकसद यही रहा कि शिक्षा में गुणवत्ता और बच्चे स्कूली शिक्षा हासिल कर सकें। लेकिन फिर क्या वजह है कि बच्चे स्कूल से बाहर हैं? क्या कारण है कि जो बच्चे स्कूल आते हैं उन्हें अपनी आयु और कक्षानुरूप भाषा एवं अन्य विषयों की दक्षता नहीं मिल पाती। कारणों की तह में जाएं तो कुछ शैक्षिक चुनौतियां हैं तो कुछ प्रशासनिक। शैक्षिक स्तर पर हम पाते हैं कि नीतियां तो बना ली जाती हैं लेकिन उसके क्रियान्वयन में अड़चनें आती हैं। मसलन आरटीई 2009 के अनुसार किसी भी बच्चे को फेल नहीं किया जाना। हर बच्चे को अगली कक्षा में धकेल दिया जाना। शिक्षकों के अनुभव बताते हैं कि इस वजह से बच्चों में पढ़ने के प्रति ललक और गंभीरता कम हो गई। बच्चे स्पष्ट कहते हैं मास्टर जी फेल नहीं कर सकते। यह डर क्या शिक्षा का था या फिर फेल होने का? हमें तो शिक्षा तमाम किस्म के डर से मुक्त करने वाली होती है। वह जीवन के किसी भी हिस्से का डर क्यों न हो। मगर गौर से विमर्श करें तो शिक्षा अपनी उस प्रकृति को छोड़ चुकी है। यह अलग विमर्श का मुद्दा है कि शिक्षा की प्रकृति को किस किस स्तर पर खरोचों का सामना करना पड़ा है। शैक्षिक इतिहास पर नजर डालें तो हर आयोग, समितियों ने अपने अपने तरीके से शिक्षा को गढ़ने और ढाहने के प्रयास किए हैं।
नई शिक्षा नीति का प्रारूप तैयार है। इससे पूर्व राष्टीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2000 पर भगवाकरण का आरोप मुखर था। वह बिलावजह भी नहीं था। उसको 2005 में ठीक करने की कोशिश की गई। अब सवाल यह उठने लगा कि 1986 में बनी शिक्षा नीति को पुनर्निर्मित करने की आवश्यकता है। राजनीति और रणनीतिकारों ने हमेशा ही शिक्षा नीति, पाठ्यचर्या,पाठ्यपुस्तकों में अपनी वैचारिक प्रतिबद्धताओं को शामिल करते रहे हैं। यही वजह है कि पाठ्यपुस्तकें वैचारिक डोली को ढोनी वाली बना दी गई। वह राजस्थान हो, मध्य प्रदेश हो या फिर उत्तर प्रदेश आदि इन राज्यों के पाठ्यपुस्तकों में वैचारिक सेंधमारी देखी जा सकती है।
शिक्षा दरअसल किसके लिए है? इसे पाने वाला कौन है? इसपर विचार करने की आवश्यकता है। यदि बच्चों तक शिक्षा नहीं पहुंच पा रही है तो इसका अर्थ यह भी निकलता है कि हम या तो पहुंचाना नहीं चाहते या फिर समिति वर्ग को ही शिक्षा के घेरे में खड़ा करना चाहते हैं। दूसरे शब्दों में शिक्षा सार्वजनिक मूल अधिकार न होकर ख़ास के लिए है। ख़ास लोगों, वर्गों तक यदि शिक्षा सिमट जाएगी तब समाज का विकास भी एकरेखीए ही माना जाएगा।
जो बच्चे स्कूल जा रहे हैं क्या उन्हें उनके स्तर के अनुसार सीखने का प्रतिशत भी बढ़ा है या वह फिसलन भर है इसपर भी विचार करने की आवश्यकता है। सरकारी और गैर सरकारी शोध रिपोर्ट मसलन डाईस फ्लैस रिपोर्ट, नूपा और प्रथम की रिपोर्ट कई सालों ने आगाह कर रही हैं कि बच्चों में भाषा, गणित, विज्ञान आदि की समझ और कौशल उनके कक्षा के स्तर के अनुरूप नहीं है। कक्षा पांचवीं व छह में पढ़ने वाले बच्चे सामान्य वाक्य नहीं पढ़ पाते। पढ़कर समझने वाले बच्चों का प्रतिशत तो और भी कम है। यहां सवाल उठता है कि क्या हम सिर्फ दाखलों के आंकड़ों में उछाल दिखाना चाहते हैं या फिर बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा भी देना चाहते हैं। हाल में शिक्षकों की शैक्षिक समझ और कौशलों को विकसित करने के लिए केंद्र और दिल्ली राज्य शिक्षा मंत्रालय ने प्रयास किए हैं ताकि शैक्षिक स्तर को सुधारा जा सके। कंद्र सरकार की ओर शुरू की गई मंडलीय शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थानों के शिक्षकों की स्कील विकास किया जाए। ठीक उसी तरह शिक्षकों की शैक्षिक दक्षता विकास के लिए प्रशिक्षण कार्यशालाओं का आयोजन किया जा रहा है। इस योजना के तहत दिल्ली के टीजीटी और प्रधानाचार्यों का चयन किया गया है जिन्हें अन्य शिक्षकों को प्रशिक्षण प्रदान करना है। उन्हें कैंब्रिज, आॅक्सफोर्ड आदि विश्वविद्यालयों मंे भेजा जाएगा ताकि वे अपनी दक्षता को मांज सकें। आरटीई भी इस ओर हमारा ध्यान खींचती है कि स्कूलों मंे शिक्षक प्रशिक्षित हों। लेकिन अफसोनाक हकीकत यह है कि आज भी देश के विभिन्न राज्यों मंे शिक्षा जैसे अहम प्रोफेशन में गैर शिक्षित स्नातकों से काम चलाया जा रहा है।

Thursday, June 16, 2016

स्कूल जाने से यदि डरें बच्चे


-कौशलेंद्र प्रपन्न
कुछ ही दिनों के बाद स्कूल दुबारा खुलने वाले हैं। बच्चों को मिले गृहकार्य को पूरा कराने की जिम्मेदारी मां-बाप पर आने वाली है। यह एक माह बच्चों के लिए आनंद के दिन होते हैं। लेकिन अभिभावकों की दृष्टि से देखा जाए तो उनके लिए आफत के दिन होते हैं। इन बच्चों को कहां किस में व्यस्त रखा जाए यह एक चुनौती होती है। लेकिन बाजार यहां पीछे नहीं रहती। स्कूल की छुट्टियां होने से पहले ही विज्ञापन आने लगते हैं। पंद्रह दिन में या एक माह थिएटर वर्कशाॅप, व्यक्तित्व विकास,अंग्रेजी बोलने सीखें, गायन वादन की कक्षाएं पाएं और बच्चों को उनके व्यक्तित्व विकास करें आदि। मां-बाप भी इन बाजारी अवसरों को हाथ से जाने नहीं देना चाहते। सरकारी और गैर सरकारी संस्थाएं सब इन दिनों आपके बच्चों के लिए योजनाएं बनाती हैं। बस हमें अपने बच्चे को वहां भेजने की व्यवस्था करनी होती है। लेकिन एक बड़ा मसला यहां खड़ा होता है कि क्या हमारा बच्च्चा इन जगहों पर सुरक्षित है। क्या हमारा बच्च सुरक्षित हाथों मंे है आदि।
किसी दिन आपका बच्चा या बच्ची स्कूल जाने से मना करे तो इसे गंभीरता से लेने की जरूरत है। उसके स्कूल जाने से कतराने के पीछे ठोस कारण को जानना बेहद आवश्यक है। क्योंकि, संभव है उसे स्कूल परिसर में अत्यंत विश्वसनीय अध्यापक की गंदी नजर पीछा करती हो। हो सकता है उसे क्लास में अकेले बैठने से डर लगता हो। हर वक्त एक भय, डर का माहौल उस मासूस बच्ची या बच्चे का सामना करता हो जिसे कई बार बच्चे प्रकट नहीं कर पाते। उस छूपे डर को हमें समझना होगा। हाल ही में दिल्ली के एक सरकारी स्कूल में चैथी कक्षा की बच्ची के साथ 70 वर्षीय रिटाॅयड अध्यापक ने कक्षा में ही अश्लील बर्ताव किया। अध्यापक ने धमकी भी दी थी कि किसी को बताया तो जान से मार दूंगा, लेकिन बाल मन उस हादसे को पचा पाने में कामयाब नहीं रही और अगले दिन स्कूल न जाने की ज़िद ठान ली। जब पूरे मामले को समझा गया तो वह एक घिनौना कृत्य निकला जो गुरु की ओर से हुआ था। हालांकि यह घटना अकेला या पहली नहीं है और भी इसी तरह की बल्कि इससे भी ज्यादा संवेदनशील घटनाएं स्कूल परिसर में घटती रही हैं। सवाल यह उठ सकता है कि इस तरह की घटनाओं के बाद स्कूल प्रशासन, स्थानीय निकाय एवं शिक्षा- विभाग क्या कदम उठाती है। आनन-फानन में जांच के आदेश दिया जाना ही पर्याप्त नहीं माना जा सकता, बल्कि जांच आयोग व कमिटि की सिफारिशों पर अमल भी किया जाना चाहिए। क्या महज अमुक अभियुक्त को बर्खास्त कर देना ही इस तरह की घटनाओं को रोकने का समुचित तरीका माना जा सकता?
बच्चियां वैसे भी क्या स्कूल और क्या घर हर जगह उपेक्षिता रहती हैं। शिक्षा से उन्हें दूर रखने वाले अभिभावक यदि उन्हें स्कूल भेजता है तो वह एक तरीके से जोखिम ही उठाता है। वह सामाजिक, सांस्कृतिक एवं देशकाल की चुनौतियों को आमंत्रित करता है। स्कूल बीच में छोड़ जाने वाले बच्चों, बच्चियों को किस तरह दुबारा शिक्षा, स्कूल की मुख्य धारा से जोड़ा जाए। स्कूल बीच में छोड़ जाने के वाले बच्चों के पीछे बहुतेरे कारण होते हैं। उसमें समाजो-सांस्कृतिक, आर्थिक एवं इस तरह की अप्रत्याशित घटनाएं भी मुख्य भूमिका निभाती हैं। जिस गांव-शहर, स्कूल में ऐसी घटना जिस व्यक्ति के घर घटती है वह परिवार सबसे पहले अपने बच्चे व बच्ची का स्कूल से नाम कटा लेता है। और इस तरह से पुरुष की लपलपाती चीभ बच्ची की शिक्षा तो खा ही जाता है साथ ही उसके बाल मन पर एक अमिट छाप भी छोड़ जाता है। दुहराने की आवश्यकता नहीं कि गुरु को समाज में क्या स्थान प्राप्त है या शास्त्रों में गुरु की तुलना किन किन से श्रेष्ठ बताया गया है। यहां तुलना ही करना है तो आज के संदर्भ में गुरु की बदलती भूमिका, उसका अपने व्यवसाय के प्रति प्रतिबद्धता और निष्ठा को जांचा जाना चाहिए।
शिक्षक वर्ग की छवि भंजक ऐसे अध्यापकों की कमी हमारे समाज में नहीं है। तकरीबन हर स्कूल, काॅलेज एवं विश्वविद्यालय में इनकी प्रजाति मिल जाएंगी। जरूरत इस बात की है कि इनसे कैसे निपटा जाए। क्योंकि यही एक दो मनोविदलित अध्यापकों की वजह से समस्त शिक्षक समूह की विश्वसनीयता को शक के घेरे में खड़ी हो जाती हैं। यदि ऐसे अध्यापकों की उम्र देखी जाए तो ज्यादातर घटनाओं में उम्रदराज पके बाल, नाती- पोता वाले ही मिलेंगे। कम उम्र वालों की संख्या ज्यादा नहीं है। इसलिए यह और गंभीर मामला है। पिछले कुछ सालों में घटी ऐसी घटनाओं पर नजर डालें तो पाएंगे कि घटना की जांच रिपोर्ट पर कोई खास कारवाई नहीं की गई। समय के साथ रिपोर्ट कहीं किसी विभाग व फाईल में दबी हुई है। जबकि होना तो यह चाहिए था कि उस रिपोर्ट पर शख्ती से कारवाई होती ताकि ऐसी मानसिकता वाले अध्यापकों को कुछ सबक मिलता।
शिक्षा- शास्त्र, शिक्षा-दर्शन व शिक्षा मनोविज्ञान किसी भी प्रशिक्षु शिक्षक को इस बात की छूट नहीं देता कि वह अपने आचरण, व्यवहार व भूमिका से समझौता करे। कक्षा में उपस्थित शिक्षक प्रकारांतर से मौजूद छात्रों के लिए किसी रोल माॅडल से कम नहीं होता। बच्चे अध्यापक के जितने करीब होते हैं उतना तो वो कई दृष्टि से अपने मां-बाप से नहीं होते। कक्षा के अंदर या बाहर एक शिक्षक बच्चों के लिए रोल माॅडल तो होता ही है साथ ही एक दोस्त, अभिभावक भी होता है। यदि सर्जक ही बच्चों को खाने पर उतारू हो जाएं तो यह चिंता का विषय बनता है। आखिर क्या वजह है इन घटनाओं के पीछे? जवाब हो सकता है कि बच्चे क्योंकि सुरक्षित एवं सुलभ वस्तु होते हैं जिसपर इस तरह की मनोवृत्ति वाले अध्यापक की नजर होती है। कुछ बच्चे तो अपने साथ हुई इस तरह की घटना को समझ भी नहीं पाते कि कुछ गलत हुआ है। इन अबोध बच्चों के मनोजगत् को धैर्य से समझने की आवश्यकता है। बाल मन में बैठे इस तरह के डर को एक बच्चा ताउम्र ढोता रहता है।
जब देश की राजधानी में, जहां तमाम तंत्र सक्रिय हैं वहां ऐसी घटनाएं हर दो तीन महीने में घटती हों तो बाकी के राज्यों में क्या होता होगा इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है। कुछ अध्यापक ऐसे भी रसूख वाले हैं कि वो घटना को इस तरह मोड़ देते हैं कि प्रशासन, विभाग उनके खिलाफ चंद कवायदें भर कर पाती हैं। यदि पीड़ित बच्चा गरीब परिवार से ताल्लुक रखता है तब तो घटना को सहजता से दबा दिया जाता है। लेकिन आज मीडिया जिस तरह मुद्दे को पकड़ती है उससे एक भय समाज में ऐसे लोगों पर भी दिखाई देता है।


Tuesday, June 14, 2016

परीक्षा जिंदगी से बड़ी नहीं होती


कौशलेंद्र प्रपन्न
‘‘वो पांचवीं की परीक्षा के बाद रिजल्ट लेने नहीं आई। उसकी मां आई तो मैंने पूछा पूजा कहां है? वो नहीं आई। मां का जवाब था उसकी शादी कर दी। लड़का अच्छा है। पढ़ा लिखा है। पुलिस की नौकरी के लिए फार्म भरा है। इससे अच्छा लड़का नहीं मिल सकता।’’ यह कोई कहानी का हिस्सा नहीं है। बल्कि दिल्ली के एक नगर निगम स्कूल में पढ़ाने वाली शिक्षिका द्वारा बयां हकीकत है। इससे ही मिलती जुलती घटनाएं और भी हैं जिस ओर हमारा ध्यान नहीं जाता। उस पर तुर्रा यह कि पिछले दिनों परीक्षाओं के परिणाम घोषित हुए। लड़कियां इस बार भी लड़कों को पीछे छोड़ आगे निकल गईं। क्या समाज एवं शिक्षा का सच यही है? क्या शिक्षा वास्तव में लड़कियों को आगे लेकर जा रही है? क्या यही स्थिति उच्च शिक्षा में भी है आदि सवाल उठना लगे हैं। हकीकत तो यह है कि बच्चियांे की शादी स्कूल पूरे करते व बीच मंे भी हो जाती है। एक शिक्षिका ने बताया कि महज बारहवीं की परीक्षा के बाद उनके पिताजी का देहांत हो गया। तब भाइयों की शादी करने की बजाए रिश्तेदारों,मां ने उनकी शादी कर दी। शादी के आगे शिक्षा ठिगनी हो गई । लेकिन उन्होंने आगे की जो कहानी बताई उससे जज्बे का अंदाजा लगता है। उन्होंने बताया कि ससुराल वालों को काफी मिन्नतें कर आगे की पढ़ाई के लिए तैयार किया और समय के साथ उन्होंने एम ए और बी एड भी किया। यह एक कहानी है जो जीवन के बीच से निकल कर समाज तक का सफर करती है। लेकिन वे लड़कियां जिनकी पढ़ाई शादी की वजह से बीच में छूट गईं और दुबारा पटरी पर नहीं लौटीं उनके लिए हमारा क्या प्रयास है इसपर विचार करना चाहिए।
आंकड़े तो बताते हैं कि पिछले दस सालों से लड़कियां दसवीं और बारहवीं में अव्वल आ रही हैं। लेकिन उनमें से कितना प्रतिशत लड़कियों की संख्या उच्चा शिक्षा तक पहुंच पाती हैं। देश के विभिन्न कोनों से परीक्षाओं के निहितार्थ भी आ रहे हैं। परीक्षा के समानांतर परीक्षा और शिक्षा के  द्वंद्व भी सामने आ रहे हैं। जिन बच्चों के अंक व ग्रेड कम आए उन्होंने आत्महत्या का रास्ता अपनाया। इसमें मध्यम प्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों मंे आत्महत्याओं की घटनाओं मंे बढ़ोत्तरी हुई। यहां शिक्षा परीक्षा के समाने पतली दुबली नजर आती है। वरना कोई वजह नहीं कि अंक कम आने व ग्रेड मन मुताबिक न आने पर बच्चे आत्महत्या करें। दरअसल शिक्षा के मायने में काफी तेजी से बदलाव देखे जा सकते हैं। यदि नब्बे के दशक में नजर दौड़ाएं तो पाएंगे कि तब अंक साठ के पार कम ही जाया करते थे। प्रथम श्रेणी में पास होने वाले बच्चों की संख्या कम होती थी। लेकिन द्वितीय श्रेणी में पास होने वाले बच्चे आत्महत्या का रास्ता नहीं अपनाते थे।
यदि 2005 के बाद परीक्षा और शिक्षा के बीच के द्वंद्व को समझने की कोशिश करें तो एक झीनी सी ही सही लेकिन एक फांक दिखाई देगी। वह है परीक्षा के प्रश्न पत्रों का स्वरूप। 2000 व 2005 के पूर्व प्रश्न पत्रों मंे बहुवैकल्पि सवालों की कमी थी। ज्यादा से ज्यादा विषयनिष्ठ सवाल हुआ करते थे। यानी लेखन कौशल को परखने पर जोर था। तब भाषा के कम से कम पढ़ने और लिखने के कौशल का विकास हो जाता था। अंक बेहश कम आते थे लेकिन उनकी अभिव्यक्ति क्षमता मजबूत होती थी। भाषायी स्तर पर बच्चों की दक्षता विकास एक लक्ष्य हुआ करता था। 2005 आते आते सीबीएससी पर दबाव पढ़ने लगा कि बच्चे परीक्षा में कम आने की वजह से आत्महत्याएं कर रहे हैं सो कोई विकल्प देखा जाए। परीक्षा की मूल प्रकृति में बदलाव लाया गया। तब माना गया था कि परीक्षा यानी मूल्यांकन के बेहतर विकल्प की तलाश की जाए। लेकिन शोधों, रिपोर्ट आदि को दरकिनार करते हुए सहज और सरल के तर्क पर प्रश्न पत्रों को बहुवैकल्पिकताके राह पर हांक दिया गया। इसी का परिणाम है कि बच्चों को भाषा के विषय में नब्बे, पंचानबे अंक तो आने लगे लेकिन भाषायी कौशलों, अभिव्यक्ति के स्तर पर पिछड़ते चले गए। एक पैराग्राफ लिखने में मुश्किलें आने लगीं। इसके पीछे हम उस जमीन को देख सकते हैं जो बहुवैकल्पिक प्रश्नों पर तैयार की गई थी।
सीबीएससी और एनसीइआरटी को तब कहा गया था कि ऐसा रास्ता निकालें तो सर्व मान्य और स्वीकार किया जा सके। विभिन्न शिक्षाविदों की दृष्टि में यह शिक्षा का वह बदलाव था जिसका असर आने वाले पंद्रह बीस सालों मंे दिखाई देंगे। वह अब दिखाई भी देने लगा है। बच्चों को निन्यानबे प्रतिशत अंक हासिल करने के बाद भी संतुष्टि नहीं है। उन्हें तथाकथित अच्छे काॅलेज में नामांकन भी नहीं मिल पाते। क्यांेकि अंकों के बाजार मंे हर कोई अपना रिजल्ट लेकर खड़ा है। को बड़ कहत छोट अपराधू।
परीक्षा जिंदगी से बड़ी नहीं होती यह मूल्य हमारे समाज और बच्चों के बीच से कूच कर चुका है। यदि ऐस बच्चों की खोज में निकलें जिन्हें परीक्षा ने नकार दिया किन्तु जीवन में उन्होंने वे काम किए जिसे नंबरदारों ने नहीं किया। यह ताकत और समझ कौन विकसित करेगा। यह मूल्य और शिक्षा के मकसद कौन पैदा करेगा। निश्चित ही अभिभावक और शिक्ष कवे घटक हैं जिन्हें कायदे से बच्चों में परीक्षा से बड़ी जिंदगी के फल्सफे को सीखाना चाहिए। यदि बच्चे परीक्षा और उसके परिणाम से डरते हैं तो इसमें उनका दोष कम हम ज्यादा जिम्मेदार हैं क्योंकि हमने शिक्षा की महत्ता और जीवन मूल्य जो परीक्षा के पैमाने पर नहीं तय होती, सीखाने की कोशिश ही नहीं की। परीक्षा और परिणाम के मध्य झूलने वाले बच्चों को संभालना और परीक्षा के विकल्प की ओर मोड़ने की तालीम भी देनी होगी। अंकों के समानांतर जीवन को कैसे प्रबंधित और जीया जाए इसकी कला भी हमें अपने बच्चों को सीखाने की आवश्यकता है।


Saturday, June 11, 2016

शिक्षा तो पीछे जानी ही थी



प्रो कृष्ण कुमार का लेख ‘अशोक के फूल’ और ‘परीक्षा और पैगाम’ जनसत्ता के संपादकीय को हिन्दी शिक्षक प्रशिक्षण कार्यशाला में पढ़ने का दिया। बच्चे क्यों स्कूल से बाहर हो जाते हैं। क्यों अशोक बीच में स्कूल छोड़ जाते हैं और इस साल भी लड़कियां लड़कों को पीछे छोड़कर दसवीं और बारहवीं में अव्वल रहीं। लेकिन क्या वजह है कि वही लड़कियां उच्च शि़क्षा में नजर नहीं आतीं।
एक टीचर ने अपनी घटना से रू ब रू कराया। उन्होंने बताया कि जब वो महज बारहवीं पास कीं तभी उनके पिताजी का देहांत हो गया। भाइयों की शादी करने की बजाए उनकी शादी कर दी गई। लाख मना किया मगर हुआ वही जो मां और परिवार की इच्छा थी। शिक्षा तो पीछे जानी ही थी। सो गई। लेकिन उनकी इच्छा शक्ति और ससुराल की मदद से उन्होंने एम ए और बी एड भी किया।
एक अन्य शिक्षिका ने बताया ‘ उसकी शादी पांचवीं के रिजल्ट आने से पहले ही शादी कर दी गई। वो मेरी कक्षा की सबसे तेज लड़की थी।’ जब उसकी मां उसका रिजल्ट लेनेे आई तो पूछा ‘‘ कहां गई? तो जवाब दिया उसकी शादी कर दी। लड़का अच्छा था। उम्र में बड़ा है लेकिन पुलिस की नौकरी के लिए फार्म भरा है। इससे अच्छा लड़का नहीं मिल सकता।’’
और इस तरह से हमारी लड़कियां आगे चल कर भी पिछड़ जाती हैं।


Thursday, May 19, 2016

बिन पेंदी के चलेंगे



कौशलेंद्र प्रपन्न
उनका कहना था हमारे पास एक लोटा हुआ करता था। वे भी बिन पेंदी के। जहां भी रखो वही ढुलमुलाकर गिर जाया करता था। उसके कई सारे फायदे थे। उन्होंने एक एक कर बिन पेंदी के लोटे के गुण गिनाए। ठहरिए इतनी जल्दी भी क्या है। बताते हैं। और फिर उन्होंने गला खखारकर साफ करते हुए कहा- पहला तो यही कि पेंदी होने पर आप स्थिर हो जाते हैं। पेंदी की कीमत भी चुकानी पड़ती है। इसलिए बिना पेंदी के लोटे को कही भी रख छोड़ो वह अपनी तरह से जगह बना लेता है। दूसरा, बिन पेंदी के लोटे के माफिक रहने पर कोई आपपर आरेप नहीं लगा सकता कि एक ही जगह पड़े रहते हो। इसमें पूरी सुविधा होती है कि आप जब चाहें, जहां चाहे स्थान परिवर्तन कर सकते हैं। तीसरा लाभ, पेंदी होने पर आप पर शक भी किया जाता है लेकिन बिन पेंदी के होने में जाता कुछ भी नहीं है मिलने को पूरी दुनिया तैयार रहती है। उन्होंने आगे और भी मौजूं लाभ बताए।
मेरे एक बाबा हुआ करते थे जिन्हें पूरे गांव जेवार में बिन पेंदी के लोटा कहा जाता था। स्टेशन पर उतरे नहीं कि उनका नाम ले लें बच्चा बच्चा उन्हें जानते थे अच्छा तो आपको बिन पेंदी वाले बाबा के घर जाना है और बच्चे घर तक छोड़ आते थे। मुहल्ले में भी उनकी चर्चा जारों पर रहती। उन्हें हर चुनाव,सभा,नेता, मंत्री सब बिन पेंदी के नाम से जानते थे। यही तो उनकी खासियतें थीं जिन्हें उन्होंने पूरी जिंदगी शिद्दत से जीया। जितना भी जीया पूरे ठसके साथ जीया। इसके लिए उन्हें कोई मलाल किस्म के भाव ने परेशान नहीं किया। किसी ने उनसे उनके उम्र साठवें पायदान पर पूछा,‘ आपको सभी बिन पेंदी के कहा करते हैं आपको कैसा लगता है?’ इस सवाल पर वो दार्शनिक मूड में जवाब दिया आज मेरे पास जो कुछ भी है वो इसी बिन पेंदी का दिया हुआ है। मैंने अपनी नौकरी और जीवन में यही पाया है कि पेंदी के रह कर ज्यादा कुछ हासिल नहीं हुआ। इसलिए मैंने तय किया कि अब मैं पूरी जिंदगी बिन पेंदी के रहूंगा। उसके बाद एक वो दिन थे और एक आज का दिन है मैंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा।’
बाबा जी किसी सरकारी नौकरी में होते थे। कहते हैं कि उनका बॉस उनसे बेहद खुश रहा करता। उसकी हर बात में नाड़ डोलाना उसे बेहद पसंद था। किसी की बुराई हो या प्रशंसा बाबाजी मूड देख कर वाक्यों के निर्माण में बेहद कुशल थे। कहते तो यह भी हैं कि उन्होंने बोलने के कौशल में महारत हासिल कर रखी थी। दादाजी बताती हैं कि बाबाजी बोलने की ही खाते थे। शादी भी उनके बोलने की कला पर ही संभव हो सकी। उन्हें पता चल चुका था कि पेंदी के होकर चलना मुश्किल है। इसलिए एक दिन शाम को जबवो घर लौटे तो बड़े उदास थे। दादाजी ने पूछा क्या हुआ? आज मन भर का चेहरा बना कर क्यों बैठे हो? तब बाबाजी का जवाब दादी जी को चौका दिया। आज तक मैं पेंदी को होकर ठोकर ही खाता रहा। आज से मैं आकाश, जमीन,गंगा, हिमालय,अपने पुरखों और दसों दिशाओं को साक्षी मान कर एलान करता हूं कि आज के बाद मैं ताउम्र बिन पेंदी के चलूंगा। इस राह में जो भी जैसी भी दिक्कतें आएंगे मैं उसका सामना डट कर करूंगा। किसी भी पेंदी वाले से वास्ता नहीं रखूंगा।
पेंदी और बिन पेंदी में उन्होंने एक बड़ी स्पष्ट विभाजन रेखा खींच रखी थी। उस रेखा को आज तक किसी ने भी पार नहीं किया। यही उनकी उपलब्धि थी कि पूरी जिंदगी उन्होंने अपने उस वचन की लाज रखी। उस वचन के लिए उन्हें कई सारे तमगे, शॉल, प्रशस्ति पत्र आदि मिले। मरने से पहले उन्होंने अपने बच्चों,मुहल्ले के लोगों को बुलावा भेजा कहा ‘‘ मुझे लगता है मेरे दिन पूरे हो गए। मैंने जो कुछ जिंदगी में किया,पाया उसे आप सभी को सौंप कर चैन की नींद सो लूं। बेटे तो नालायक निकले। मेरी बात नहीं मानते।’’
प्रोफेसर, टीचर, पलंबर वाला, मास्टर सलून वाले सब जुट गए। अब उन्होंने अपने मन की बात की कि ‘‘ जीवन में ख्ुश रहना है तो बिन पेंदी के रहो। अपनी की कोई पहचान, अस्मिता के चक्कर में जीवन बरबाद मत करो। जीवन दर्शन तो यही कहता है कि जितना जीयो ख्ुल कर जीयो। क्या पेंदी और क्या बिन पेंदी। बेलने वालों को बहाना चाहिए। वो बोलेंगे ही कि यही भी कोई जीना है मर्दे। जीना है तो बाबाजी की तरह जीयो। मुंह पर बेशक न बोलें लेकिन आपलोग मेरे पीछे यही बोलोगे मुझे मालूम है। लेकिन मैं अपना फर्ज समझता हूं कि जिंदगी के फल्सफे आप सभी को सौंप कर जा सकूं।’’
सभी ध्यान सुन और गुन रहे थे। लेकिन कथा सुनाने वाले बाबाजी कहीं और अपनी बिन पेंदी के लोटा को लेकर जा चुके थे। सब की आंखें नम थीं। लेकिन दादीजी ने सब को थावस बंधाया और कहा यदि कोई रोएगा तो मेरे बिन पेंदी की आत्मा को कष्ट होगा। इसलिए यदि किसी को रोना है तो अपने भाग्य और पेंदी वाले लोटे पर रोए। मैंने उन्हें बहुत खुश देखा है पूरी जिंदगी।
आज ग्यारहवां दिन हैं। चारों ओर बिन पेंदी के लोटे ही लोटे लुढक रहे हैं। आंगन, बैठकखाना, दुआर सभी जगह लोटे ही लोटे थे। इस गांव के सभी निवासियों ने बाबाजी के वचन और सत्य के साथ प्रयोग को स्वीकार कर लिया था। कहते हैं उस गांव के क्या बुढे क्या जवान और क्या बच्चे सब की जिंदगी बदल चुकी थी। किसी के पास अपनी कोई पहचान नहीं थी। सभी अपनी अपनी जिंदगी में बाबाजी को जी रहे थे। कहते हैं उस गांव के निवासी जहां भी गए ख्ुश और प्रसन्न थे। क्योंकि उन्होंने अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता, मान्यताओं, मूल्यों और पूर्वग्रह को बाय बाय टाटा टाटा कर दिया था।
बाबाजी की छोटी सी जिंदगी का एक वाकया यह भी है जो शायद आपने देखा न हो। मेरा तो फर्ज है कि उसे भी आपके सामने रखूं। उन्होंने कभी भी किसी पार्टी, विचार, धारा के लेकर कट्टर नहीं हुए। उन्होंने उसे ही अपनी विचारधारा बना ली जिसकी मांग थी। अपनी पहचान को लेकर कभी किसी से लड़े भी नहीं। जो पहचान कुर्सी चाहती थी वैसा ही ताना बाना,पहनावा भी अपनाया। उनकी सफलता इसी बात में छूपी थी कि कुर्सी ने जैसा चाहा, जैसी मांग की उन्होंने बड़ी ही शिद्दत से पूरा किया। बल्कि कहना चाहिए उन्होंने अपने बिन पेंदी के सिद्धांत को पहन ओढ़ रखा था। उन्हें चाहने वाले, मानने वालों की यूं तो बड़ी लंबी लाइन नहीं थी लेकिन जो थे उन्हें अपना ही मानते थे। यही वजह रहा कि जब वे गए पीछे खड़े होने वालों की एक कतार थी।  


Wednesday, May 18, 2016

कलमकारों का दम तोड़ना


कौशलेंद्र प्रपन्न
लेखकीय समीक्षा और आलोचना को सहने की क्षमता जिस भी व्यक्ति,समाज,सत्ता में नहीं होती उसी समाज में लेखकीय हत्या होती है। लेखकीय हत्या दरअसल हमारी अहिष्णुता की ओर ही इशारा करती है। कहां तो निंदक नियरे रखने की बात एक कवि कहता है वहीं एक यह समाज है जिसमें हम अपनी आलोचना,समीक्षा नहीं सह पाते और लेखक की हत्या तक करने से गुरेज नहीं करते। लेखक से यहां मतलब उन तमाम लोगों से है जिनके हाथ में कलम है। जिनका रोजगार ही कलम है। वे चाहे पत्रकार,लेखक,कवि,कथाकार कोई भी हों हैं तो कलमकार ही।
पिछले दिनों बिहार में पत्रकार को गोली मार दी गई। वहीं उत्तर प्रदेश भी इसमें कोई पीछे नहीं है। जरा पीछे झांक कर देखें तो ज्यादा दिन नहीं हुए जब वहां पत्रकार को सरेआम आग लगा कर मार दिया गया। देश के तमाम राज्यों में विभिन्न तरह से पत्रकारों और लेखकों को या तो मौत के घाट उतार दिया जाता है या फिर उनकी कलम की ताकत को ऐसे कमजोर किया जाता है कि दुबारा वे उठ नहीं पाते। दूसरे शब्दों में कहें तो कलमकारों को शाम,दाम,दंड़ और भेद के जरिए तोड़ने का प्रयास किया जाता रहा है। देश के विभिन्न कोनों से आने वाली ख़बरों पर नजर डालें तो पाएंगे कि जिन कलमों ने विरोध के स्वर मुखर किए उनकी कलम की ताकत को कमजोर करने प्रयास किया गया। या तो कलमें चारण करने लगती हैं या फिर कलम की धार को कुंद कर दिया जाता है।
हमारे इसी समाज में ऐसे भी कलमकार हुए हैं जिन्होंने कलम को सत्ता तक पहुंचने का एक माध्यम भी बनाया। उनके लिए कलम की प्रतिबद्धता के मायने कुछ और थे। कई पत्रकारों की लेखनी एक ख़ास मकसद को लेकर चलीं। उन्होंने अपनी प्रतिबद्धता को प्रमुखता से निभाया जिसका परिणाम यह हुआ कि उन्हें सत्ता, लोक सभा, राज्य सभा में बैठाया गया। इस बात से किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि पत्रकार की लेखनी पत्रकारिता के लिए होती है न कि किसी खास खेमे के विचारधारा, दल को लाभ पहुंचाने के लिए। जिन लोगों ने भी पत्रकार की राह छोड़ी उन्हें पत्रकारिता में वो स्थान नहीं मिला जो प्रतिबद्ध पत्रकार को मिलना चाहिए या मिला करता है। यहां विमर्श का मुद्दा यह भी हो सकता है कि क्या पत्रकार समाज का हिस्सा नहीं है? क्या पत्रकार के घर-परिवार नहीं होते? यदि होते हैं तो उसे भी अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियां को निभाना होता है। एक आम पत्रकार की सैलरी जितनी होती है उसमें दो जून की रोटी ही खाई जा सकती है। बच्चों को बड़े निजी स्कूलों में पढ़ाने का खर्च वह नहीं उठा सकता। आज भी हकीकत है कि एक अखबार में काम करने वाला पत्रकार उतनी ही सैलरी पाता है जिसमें वह अपनी जिंदगी बस बसर कर पाए। ऐसे में उसके कदम भटकते हैं तो इसमें ज्यादा परेशान न हुआ जाए। लेकिन एक प्रोफेशन की मांग के अनुसार संभव है उचित न माना जाए। मंजिठीया आयोग की सिफारिशें आज भी अमलीजामा पहनने के लिए मुंह जोह रही हैं। विभिन्न मीडिया घरानों ने जिस चतुराई के साथ आयोग की सिफारिशों के धार को कुंद किया उन घरानों में पत्रकार जिन हालात में काम कर रहे हैं यह एक नागर समाज के लिए चिंता की बात होनी चाहिए।
खासकर पत्रकारिता एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें पत्रकार शोषण के खिलाफ आवाज तो उठाता है, स्टोरी भी करता है लेकिन स्वयं की हालत शोषित की होती है। वह अपनी आवाज कहां और किसके सामने उठाए यह उसके लिए बड़ी चुनौती होती है। यदि पत्रकार ने मैनेजमेंट की बात नहीं मानी या फिर सैलरी, अधिकार आदि की बात की तो तुरंत बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। उसी घराने में अन्य कामों के लिए अराफात पैसे खर्च किए जाते हैं लेकिन मंदी की आड़ में हजारों हजार पत्रकारों को रातों रात बाहर कर दिया जाता है। इसकी खबर भी कहीं कोई नहीं लेता। खबर बनाने वाले की खुद की खबर नहीं लगती।
लेखक,पत्रकार,कवि,चित्रकार,व्यंग्यकार, कथाकार आदि अपनी लेखनी से समाज को एक दिन में न सही किन्तु समाज को कहीं गहरे प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। उनकी लेखनी में ताकत और क्षमता होती है कि क्रांति ला सकें। यूं तो समाज में यह एक दिन, एक साल में बेशक संभव नहीं है लेकिन इनकी लेखनी के प्रतिरोध के स्वर बड़े मुखर होते हैं। कवियों की भाषा और कंटेंट इसी समाज में कई बार रातों रात एक आंदोलन को भी जन्म देन की क्षमता रखते हैं। यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि उसकी लेखनी कितनी शिद्दत से अपनी कलम की ताकत का इस्तमाल करता है। कलमुर्गी, गोंड्वी जैसे कवि,लेखक ने अपनी कलम की ताकत को पहचाना और उसका प्रयोग भी किया। 16 मई 2014 के बाद की कविताओं का एक सिलसिला चला जिसके काफिले में हजारों हजार श्रोता और लेखक जुड़े। आज भी प्रतिरोध के स्वर मुखर हो रहे हैं। याद हो कि बाबा नागार्जुन ने भी ‘इंदू जी इंदू जी क्या हुआ आप’ को जैसी कविताएं सत्ता के खिलाफ न केवल लिखीं बल्कि उसका वाचन और मंचन भी किया। वहीं सफ्दरी हाशमी जैसे कलाकार ने भी प्रतिरोध के स्वर को दबाने की बजाए मुखर किया।
जब समाज में आलोचना,प्रतिरोध,समीक्षा आदि को सहने की क्षमता पतली हो जाती है तब चारण काल की सुगबुगाहट मानी जा सकती है। माना जाता है कि यदि हमारे पास सही और पात्र समालोचक हों तो हमारे जीवन और कार्य में काफी निखार आता है। इसलिए लोक सभा हो या फिर अन्य कोई भी सभा वहां विपक्ष मजबूत होने की मांग की गई है कि ताकि सत्ता प़क्ष निरंकुश न हो जाए। विपक्ष व समालोचन का काम ही होता है सामने वाले के काम पर कड़ी नजर रखना। जब समीक्षक व आलोचक बिना किसी निजी पूर्वग्रह के आलोचन कर्म करता है तब उसके स्वर में याचना नहीं होती बल्कि वह पूरी ताकत के साथ अपनी बात रखता है। अफसोस की बात है कि आज आलोचक/समीक्षक,समालोचक की धारा पतली होकर पनीली हो चुकी है। कहां कहां किसे पुरस्कार मिलना व मिलाना ह्रै यह समीकरण जब वाचाल हो जाता है तब तय है कि लेखनी मिमियाने लगेगी।
लेखक का ही एक वर्ग ऐसा है जो मुखर विरोध के स्वर को दबाकर अपनी चारणीय स्वयं को सत्ता तक पहुंचाना चाहता है। अपने इस कर्म में काफी हद तक सफल भी हो जाता है। लेकिन लेखकीय बिरादगी में उसकी साख गिरनी शुरू हो जाती है। वह लेखक, पत्रकार फिर लेखनी के बल पर नहीं बल्कि अन्य जुगाड़ों के जिंदा रहा करता है। उसकी लेखनी की मौत हो चुकी होती है। वह जो भी लिखता है उसे वह तवज्जो व प्राथमिकता नहीं दी जाती क्योंकि वह फिर खास खेमे का होकर रह जाता है। हमारे इसी समाज में इस किस्म के कई लेखक,पत्रकार हैं जिन्होंने अपनी रीढ़ को इतना नरम किया कि अब उनमें ताकत ही जाती रही।


Tuesday, May 17, 2016

तृतीयपंथी यानी किन्नरों की शिक्षा


कौशलेद्र प्रपन्न
मध्य प्रदेश में चल रहे महाकुंभ में नागा,साधुओं के महास्नान और मठों के तर्ज पर किन्नरों के मठ का भी निर्माण हुआ। इस किन्नर समाज के मठ के मुखिया के तौर पर श्री लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी को चुना गया है। गौरतलब हो कि लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ने पूर्व में यूएन के जेनरल एसेम्बली में तृतीय लिंगी समाज की व्यथा कथा के लिए वकालत कर चुकी हैं। यह एक ऐतिहासिक कदम ही माना जाएगा। क्योंकि अभी तक विभिन्न मठों के मुखिया ही महास्नान किया करते थे। लेकिन इस बार तृतीयपंथी की भी सहभागिता हुई। इससे एक संदेश मुख्यधारा के समाज और नागर समाज को जाता है कि अब तक हाशिए पर जीवन बसर करने वाले तृतीयपंथी भी इसी समजा के हिस्सा हैं और इस लिहाज से समाज के तमाम स्वीकृत कर्मां में उनकी भी सहभागिता तय की जानी चाहिए। प्रकारांतर से तृतीयपंथी समाज को शिक्षा,विकास,स्वास्थ्य आदि स्तरों पर मुख्यधारा में जुड़ने की आवश्यकता है। वास्तव में शिक्षा भी सामाजिक को ताकत और क्षमता प्रदान करती है इससे किसी को भी गुरेज नहीं होना चाहिए। यदि तृतीयपंथी समाज को भी शिक्षा का औजार मिल जाए तो उन्हें और उनके समाज को रोशनी में नहाने से कोई नहीं रोक सकता। यह अलग विमर्श का मुद्दा है कि अब के शैक्षिक दस्तावेजों और नीतियों में उनके लिए कोई खास कदम नहीं उठाए गए। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि कभी न उठाए जाएं। इस आलेख में प्रमुखता से तृतीयपंथी समाज को कैसे और किन स्तरों पर शिक्षा की मुख्यधारा से विलगा कर रखा गया उस पर तो विमर्श किया ही जाएगा साथ ही समाजो सांस्कृतिक स्तर भी कैसे इन्हें छिनगाया गया है उस ओर भी झांकना और वहां से एक मार्गदर्शिका लेकर वर्तमान को दुरुस्त करना मकसद है।
तृतीयपंथी,उभयलिंगी,हिजड़ा,यूनक,किन्नर,खोजवा,मौगा,छक्का, पावैया, खुस्रा, जनखा, शिरूरनान गाई, अनरावनी आदि नामों से समाज में प्रचलित इस वर्ग को हमने भय,डर, उपेक्षा की दृष्टि से ही देखा है। हिजड़ा शब्द उर्दू के हिजर से बना है। वह भी अरबी ये आया हुआ इसका अर्थ ही होता है समाज से बेदख़ल किया गया। समाज से बहार निकाला हुआ। यह अलग बात है कि वे हमारे इसी समाज के मुख्यधारा के सहयात्री हैं। बस फर्क उनके लिंगानुसार व्यवहार और भावनाओं में अंतर का है। प्रकृति से ही उन्हें समाज ने एक अलग हिस्से के तौर पर जाना पहचाना है। यह अगल बात है कि उनकी चर्चा महाभारत,रामायण, कामसूत्र आदि में होती है। लेकिन कितनी अफसोसनाक बात है कि हमारी शिक्षा और शैक्षिक नीतियों में इनके लिए कोई प्रावधान नहीं है। यूं तो न्यायपालिका ने समय समय पर हस्तक्षेप किए हैं। तमिलनाडू राज्य में केर्ट ने इन्हें राशन कार्ड,वोटर कार्ड में नामाकन के आदेश 1998 में दिए थे जिसका परिणाम यह हुआ कि इस राज्य में हिजड़ों की स्थिति काननन तौर पर अन्य राज्यों से बेहतर है। वहीं दिल्ली उच्च न्यायालय ने अप्रैल 2014 में आदेश दिया था कि सरकारी फार्म में स्त्री पुरुष के साथ ही तृतीय लिंग व अन्य नाम से कॉलम बनाएं। इन्हें शिक्षा,रोजगार आदि में स्थान दिए जाएं। याद हो कि यह वही वर्ष है जब मध्य प्रदेश में शबनम मौसी ने चुनाव जीता था। आगे चल कर कमला जान और उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में भी हिजडे ने अपनी उपस्थिति दर्ज की थी, लेकिन क्योंकि जिस सीट पर जीत हुई थी वह सीट महिलाओं के लिए आरक्षित होने कही वजह से हिजड़ों को वह सीट छोड़नी पड़ी। आज की तारीख में लोकतंत्र के चारों स्तम्भों में से पत्रकारिता, न्यायपालिका आदि में तो काफी सक्रियता से इनकी आवाज को स्थान दी जा रही हैं। लेकिन कार्यपालिका में अभी संतोषजनक प्रयास नहीं हुए हैं। हालांकि महाराष्ट, बिहार, मध्य प्रदेश, तमिलनाडू आदि राज्यों में इन्हें वोट देने से लेकर इनकी पहचान सुनिश्चित करने के कई कदम उठाए गए हैं।
आज यह तृतीयपंथी यानी किन्नरों की शिक्षा को लेकर देश की तमाम समितियां, सिफारिशें, नीतियां मौन हैं। यदि आजादी के बाद के आयोगों, समितियों और राष्टीय शिक्षा नीति पर नजर डालें तो इन दस्तावेजों और सिफारिशों में किन्नरों व ऐसे बच्चों की शिक्षा के विशेष प्रावधान,परामर्श एवं मार्गदर्शन की कोई बात नहीं की गई है। संभव है आयोगों और नीति के स्तर पर मान लिया गया हो कि उनकी नजर में तृतीयपंथी बच्चे कोई अलग व विशेष नहीं हैं। इन्हें भी सामान्य बच्चों के साथ शिक्षा हासिल करने का पूर्ण अधिकार है। यह एक मूल्यपरक जवाब तो हो सकते हैं। लेंकिन हकीकत है कि यदि ख़ास रूचि और लिंगीय बरताव वाले बच्चों को सामान्य बच्चों के साथ स्कूलों में पढ़ना कितना मुश्किल होता है। बच्चे चिढ़ाते हैं। उनके साथ सामान्य व्यवहार नहीं करते। समाज उन्हें छेड़ता है। समाज में वे खुल कर नहीं खेल पाते। मां-बाप ऐसे विशेष बच्चों के साथ खेलने से रोकते हैं। और यह अलगाव के बरताव उनकी सामाजिक पहचान और अस्मिता को आकार देने लगती हैं। अंतरराष्टीय स्तर पर संपन्न संयुक्त राष्ट बाल अधिकार सम्मेलन 1989 में दर्ज बाल अधिकारों में इन्हें कोई स्थान नहीं दिया गया है। यूं तो शिक्षा, जीवन आदि का अधिकार सभी बच्चों को है, लेकिन समाज में उपेक्षापूर्ण जीवन जी रहे ऐसे बच्चों के लिए कोई विशेष प्रावधान इस यूएनसीआरसी 89 में भी नहीं है। इसका एक सरल जवाब यही दिया जा सकता है कि इन्हें हम अलग व विशेष नहीं मानते। इसलिए अलग से व्यवस्था की जरूरत नहीं है। लेकिन हकीकतन ऐसा नहीं है। समाज और घर में उन्हें असमान ही बरताव सहना पड़ता है। किन्नरों में कुछ की कहानी अगल है जिसमें लक्षमी नारायण त्रिपाठी आती हैं जिन्हें आज भी परिवार का प्यार,मान सम्मान मिलता है। ऐसे किन्नरां की संख्या बेहद कम है जिन्हें हिजड़ा बनने के बाद भी परिवार में वही इज्जत और प्यार मिलता रहा हो। अव्वल तो उन्हें उपेक्षित अपने हाल पर ही छोड़ दिया जाता है। और देखते ही देखते वे भीख मांगने पर मजबूर हो जाती हैं। हमारे ही आस पास कितने ऐसे किन्नर नजर आते हैं जिनकी स्थिति बेहतर है। गुरुओं की बात छोड़ दी जाए तो सड़क पर भीख मांगते या फिर बच्चों के जन्म और शादी ब्याह के अवसर पर तालियां बजा कर अपना जीवन काटती हैं।
कई बार शिक्षा की ओर बहुत उम्मीद से ताकता हूं कि क्या कहीं किसी नीति व समिति या फिर पाठ्यक्रम,पाठ्यपुस्तक में इनके भूगोल,इतिहास,संस्कृति,समाज के बारे में कोई मुकम्मल परिचय दिया जाता है। लेकिन बेहद निराशा ही मिलती है। कोई भी पाठ्यपुस्तक कोई भी पाठ्यक्रम इनके भूगोल और मानचित्र से हमारी पहचान नहीं कराते। यही वजह है कि बच्चे समाज के तमाम वर्गों के लेगों, हमारे मददगार नाई, मोची, डाक्टर, मास्टर आदि के बारे में प्राथमिक कक्षाओं में परिचित हो जाते हैं, लेकिन हमारे ही समाज में जीने वाले किन्नरों के बारे में न तो कोई बात बताई जाती है और न ही जानकारी के तौर पर एक दो वाक्य खर्च किए जाते हैं। यह किस मानसिकता की ओर इशारा करता है इसे भी समझने की आवश्यकता है। दरअसल हमारा पूरा सामाजिकरण लड़का और लड़की, स्त्री और पुरुष के तौर पर ही होता है। यहां किन्नरों यानी तृतीयपंथी के लिए कोई स्थान नहीं दिया गया। समाज में विभिन्न नामों से इन्हें पुकारते जरूर हैं छक्का, मौगा, हिजड़ा, खोजवा आदि। लेकिन इनकी प्रकृति और समाज हमारे मुख्य समाज से कैसे अलग पहचान रखने लगा इसके बारे में हमारा इतिहास, भूगोल, शिक्षा शास्त्र सब के सब ख़ामोश ही रहते हैं।
साहित्य की बात करें तो इस विषय पर बहुत ही कम शोध मिलते हैं। कहानी उपन्यास, आत्मसंस्मरण, रेखाचित्रादि भी न के बराबर है। यदि कुछ मिलता है तो वह दंतकथाएं, कही सुनी बातें जिसपर हम धारणाएं बना लेते हैं। हम दरअसल एक पूर्वग्रह के शिकार हो जाते हैं। हम वैसी ही स्थितियां मान भी लेते हैं कि हिजड़ों में मरने बाद रात में लाश को नंगा कर ले जाया जाता है। इनके लिंगछेद हुए होते हैं। वे बच्चों को उठाकर उन्हें जबरन लिंग काट कर हिजड़ा समुदाय में शामिल कर लेते हैं आदि। किन्तु यह पूरा सच नहीं है। जहां तक साहित्य के मौन की बात है तो वास्तव में हिन्दी में अबतक शायद पांच छह से ज्यादा कहानी,उपन्यास व अन्य पुस्तक लिखी गई हैं जिन्हें पढ़कर किन्नर समुदाय को समझा जा सके। साहित्य और समाज के हाशिए पर जीवन बसर करने वाली लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी की आत्मकथा मैं हिजड़ा मैं लक्ष्मी किताब इसी वर्ष छप कर आई है। यह किताब बड़ी ही शिद्दत से हिजड़ा समुदाय के भूगोल को तथ्यपरक और साक्ष्य सहित जानकारियां भर ही नहीं देती, बल्कि एक किन्नर को किस किस तरह के सामाजिक, मानसिक और शारीरिक भेद-शोषण के दौर से गुजरना पड़ता है इसकी भी झलक इस किताब में मिलती है। इस किताब से पूर्व अंग्रेजी में लिखी किताब निदर मैंन नौर विमेन इन इंडिया। यह किताब जिस गंभीरता से किन्नरां के समाज, भूगोल और मनोविज्ञान की ओर पाठकों का ध्यान खींचती है वैसी किताब हिन्दी में अब तक कोई नहीं है। यह जिस ओर संकेत करती है वह निराशाजनक है। साहित्य आदि भी इन्हें अपना विषय नहीं बनाना चाहते। या कह लें इनके पास भी पर्याप्त जानकारी नहीं है कि इनकी दुनिया आखिर है कैसी और कैसे चलती है। दिलचस्पी का न होना और रूचि भी न लेना दोनों में ख़ासा अंतर है। वास्तव में न तो हमारी रूचि होती है और न हम जानना ही चाहते हैं। यही कारण है कि ये हमारे आस पास होते हुए भी हमसे कोसों दूर होते हैं।
हिजड़ों को लेकर फिल्मों में कई भूमिकाएं निभाई गईं। फिल्मों में दो तरह की किन्नरों की कथा गाथा मिलती है। पहला वे जो महज साड़ी पहन कर नाच गाने करती हैं। जिनकी आवाज स्त्रैण होती है। दूसरी वैसी फिल्में हैं जिसमें किन्नरों को मुख्य भूमिका में रखते हुए उनकी दुनिया की कुछ जानकारियां और संवेदनाओं को समाज के सामने लाया गया है। सदाशिव आम्रपुरकर ने सड़क में, आशुतोष राणा ने संघर्ष  में सशक्त भूमिका निभाई है। वहीं परेश रावल ने भी किन्नरों की भावनात्मक पक्ष को उभारने की तमन्ना फिल्म में कोशिश की है। सबसे दिलचस्प और सामाजिक राजनीतिक हस्तक्षेप करने वाली शबनम मौसी की कहानी से मिलती जुलती हु ब हु समान तो नहीं किनतु वेलकम टू सज्जनपुर फिल्म है। इसमें एक हिजड़ा चुनाव में खड़ा होता है। काफी जद्दो जहद के बाद चुनाव जीत भी जाती है किन्तु उस गांव के वर्चस्वशाली परिवार को यह जीत नागवार गुजरी। एक दिन सुबह उस हिजड़े की लाश नहर किनारे मिलती है। यह फिल्म वास्तव में समाज और समाज के नीति निर्माताओं के लिए एक आईना है।
मैं हिजड़ा मैं लक्ष्मी किताब में लक्ष्मी नारायण बड़ी ही साफगोई से अपनी आपबीती कहानी, व्यथा-कथा कहती हैं। कहती हैं कि हम हिजड़ों को समाज के मुख्य अंग बन कर ही जीना चाहिए। हम क्यों समाज से विमुख रहें। हम तभी समाज का हिस्सा बन सकते हैं जब हम ज्यादा से ज्यादा दिखाई देंगे यानी विजबल हांगे। लक्ष्मी जी ने न केवल भारत में बल्कि यूएन के जनरल एसेम्बली में हिजड़ों की आवाज उठा चुकी हैं। इतना ही नहीं विश्व भर में टांस्जेंडर के मसले की वकालत कर रही हैं। आज की तारीख में एक लक्ष्मी नहीं हैं जो किन्नरों की स्थिति सुधरे। बल्कि कई सारी संस्थाएं जिसे किन्नर समाज ने स्थापित किया इन्हें जागरूक करने का काम कर रही हैं। स्वास्थ्य, शिक्षा, वोट आदि अधिकार मिले इसके लिए लगातार देश भर में विभिन्न संस्थाएं काम कर रही हैं। दरअसल इसी समाज में उन्हें दोयमदर्जे की जिंदगी इसलिए बसर करनी पड़ रही है क्योंकि हमारी नीतियां स्पष्ट नहीं है। शिक्षा की मुख्यधारा में उन्हें समावेशित करने की ताकत कमजोर हो चुकी है। हालांकि लक्ष्मी ने अपनी पढ़ाई बी काम तक कैसे और किन मानसिक,सामाजिक और सांस्कृतिक दबाओं के तहत पूरी की इसकी बानगी हमें मैं हिजड़ा मैं लक्ष्मी में मिलती है। ऐसे ही बारहवीं और बी ए तक पढ़े किन्नर मिलते हैं लेकिन स्कूल से कॉलेज तक के सफर में कितना और किस स्तर तक इन्हें छीला गया, खखोरा गया यह वे ही बेहतर जानते और बताते हैं। हालांकि लक्ष्मी को अच्छे गुरु मिले जिन्होंने स्कूली स्तर पर इनकी डांस कौशल को काफी सराहा और प्रोत्साहित किया। उसी तरह से इन्हें अपने घर में भी मां-पिता और भाई,बहनों से भी भरपूर प्यार मिला। लेकिन समाज ने इन्हें बचपन में ही तृतीयपंथी के कुछ लक्षण देखते हुए बड़े लड़कों ने इनका शारीरिक शोषण भी किया। आमतौर पर किन्नरां में एच आई बी होने की आशंका बनी रहती है ख़ासकर जो उस काम में लगे हैं। लक्ष्मी स्वयं स्वीकारती हैं कि उनके समुदाय में इस किस्म की मौत बहुत होती हैं। इसे रोकने के लिए इनकी संस्था अस्तित्व ने ठाणे में काफी काम किया। देश भर में जागरूकता अभियान भी चलाया। एच आई बी न हो इसके लिए सेक्स बिना कंडोम के न करें आदि जानकारियां देने का काम अस्तित्व करती है। यदि पुलिस व प्रशासन की ओर से हिजड़ों को बेवजह परेशान किया जाता है तब भी विभिन्न संस्थाएं उनके बचाव में खड़ी हो जाती हैं।
शिक्षा और संवेदनशीलता इन दो औजारों से तृतीयपंथी समाज को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने में मदद मिलेगी। हमें लोकतंत्र के दो कार्यपालिका और न्यायपालिका से भी काफी उम्मीद है। साथ ही साथ पत्रकारिता तो समय समय पर इस समाज को उठाने और इनकी दुनिया पर स्टोरी कर आम लोगों के बीच जागरूकता पैदा करने की कोशिश करती है। हाल ही में एक मीडिया घराने से निकलने वाली डेली अंग्रेजी अख्.ाबार के संडे मैग्जीन में टांस्जेंडर किन्नरों की बदलती भूमिका और उनकी म्यूजिक बैंड पर स्टोरी छापी। इसे देख पढ़कर लगता है कि मीडिया भी इन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने और करीब लाने में बड़ी भूमिका निभा सकती है। इसी किस्म का काम लक्ष्मी ने कुछ साल पहले हिजड़ों में ब्यूटी क्वीन कांटेस्ट करा कर समाज और मीडिया का ध्यान इस समाज की ओर खींचने की कोशिश की थी।


Monday, May 16, 2016

कोना फटा पोस्टकार्ड


कौशलेंद्र प्रपन्न
हम न मरब उपन्यास में डॉ ज्ञान चतुर्वेदी बड़ी शिद्दत से जीवन मृत्यु के दर्शन और लोक संवाद,व्यवहार की चर्चा करते हैं। इसमें भाषायी स्वाद बेहद रोचक और परिवेशीय अस्मिता को बरकरार रखने वाली है। बब्बा के मरने के बाद घर में नाते रिश्तेदारों का आना जाना लगा हुआ है। तमाम रिश्तेदार जो बब्बा से कहीं न कहीं जुड़े हुए थे वे इस ख़बर को सुन और पढ़कर घर पर आते हैं। कोना फटा पोस्टकारड पढ़कर लोगों को अंदाजा लग गया कि किसी न किसी के जाने की ख़बर होगी। लेकिन इसका अनुमान नहीं था कि बब्बा चले गए। कोना फटा पोस्टकार्ड देखकर ही गांव-घर में एक सन्नाटा पसर जाता था। पोस्टकार्ड लेने वाला और देने वाला दोनों ही ग़मज़दा से होते थे कि पता नहीं किसके प्रयाण की ख़बर है। लोग कार्ड पढ़कर फाड़ कर फेंक दिया करते थे। घर में रोना कानी मच जाया करता था। तब गांव घर को पता चलता था कि फलां के घर कुछ अनहोनी की ख़बर आई है। उस वक्त की बात है जब पोस्टकार्ड का आना और लोगों को हरेक के रिश्तेदारों की भी ख़बर हुआ करती थी कि किसका कौन रिश्तेदार कहां रहता है, क्या करता है, कितने बाल बच्चे हैं आदि। इसलिए सब की उम्र और जाने आने की भी ख़बर रहती थी। जैसे जैसे हम तकनीकतौर पर जवान हुए वह कोना फटा पोस्टकार्ड शायद गुम हो गया।
किसी के गुजरने की ख़बर अब सोशल मीडिया में डाल दी जाती है। साथ ही मोबाइल पर विभिन्न एप्स पर लोग तमाम ख़बरों को प्रसारित कर देते हैं। शादी ब्याह,जीनी मरनी,सैर सपाटा सब तरह की ख़बरों का आदान प्रदान मोबाइल और सोशल मीडिया में धड़ल्ले से होने लगा है। सोशल मीडिया के दौर में पारंपरिक माध्यम चिट्ठी पतरी,मिलना जुलना कम होते होते तकरीबन चलन से ही बाहर होता जा रहा है। लेकिन हम बात कर रहे थे कोना फटा पोस्टकार्ड की कहानी का। मुझे अपना बचपन याद है जब दादी मरी तो हम घर के तमाम बच्चों को इससे कोई लेना देना नहीं था कि दादी मर गईं। हमने सबसे पहले दादी का संदूक खोला और उसमें रखे काजू, बादाम और मिठाइयां खाने लगे। देखने वाले कुछ बोल भी रहे थे कि देखों इन्हें कोई फर्क ही नहीं पड़ता। लेकिन हमारे लिए दादी से लगाव तो था ही साथ ही उनकी चीजें भी हमें लुभाती थीं। दादी के मरने बाद मैं काफी समय तक सोन किनारे गेमन पुल पर खड़े होकर आवाज देता था दादी आ जाओ। अब हम आपका संदूक नहीं खोलेंगे। लेकिन दादी को नहीं आना था नहीं आईं। आ भी कैसे सकती थीं यह बाद में समझ पाया। घर में तब किसी के विदा होने की ख़बर इन्हीं माध्यमों से हुआ करती थी। घर में एक अलगनी के कोने में तार में पोस्टकार्ड, चिट्ठियों को टांक दिया जाता था। कोना फटा पोस्टकार्ड को तो पढ़कर फेंक दिया जाता था लेकिन बाकी अंतरदेशीय पत्रों को उसी तार में टांक दिया जाता था।
जब घर में कोना फटा पोस्टकार्ड मिलता था उसके बाद पिताजी और मां तय करते थे कि कब उनके घर जाना है। अमूमन किसी के इंत्काल के बाद तब चिट्ठी मिलते कम से कम तीन से चार दिन तो लग ही जाते थे। क्रियाकर्म में लोग पहुंचते थे। पूरे तेरह दिन घर में मातम का माहौल ही छाया रहता था। बच्चे स्कूल से महरूम हो जाते थे। यदि बेहद जरूरी नहीं हो तो घर के बड़े काम पर भी नहीं जाते थे। घर में एक ही भाव होता था। घर का कोना कोना बयां करता था कि कुछ था जो अब नहीं है। कोई हंसी थी जो यहीं कहीं गूंजा करती थी। कोई तो था जो बात बात में टोका करता था लेकिन अब वो जबान नहीं रही। मिलने जुलने वाले बार बार रो रो कर या बातों बातों में एहसास दिलाते रहते हैं कि वो होते तो ऐसा नहीं होता। वो ऐसी ही तो बोला करते थे। छोटका एकदम उन्हीं की तरह चलता है। और लोग एक बार फिर उनकी याद में डूब जाया करते हैं। कई बार दुखद पल भूलना भी चाहें तो मिलने जुलने वाले ऐसा नहीं होने देते।
हम न मरब से शब्द उधार लूं तो विमान तैयारी से लेकर यात्रा की शुरुआत और अंत बेहद दारूण हुआ करता है। एक एक क्रिया, कार्य व्यापार उस गए हुए व्यक्ति की उपस्थिति और अनुपस्थिति को कुरेदता है। घर की देहारी पर खड़ी तमाम महिलाएं सिर्फ अश्रुविगलित आंखों से अपने प्रिये को जाते देख भर पाती हैं। चाह कर भी जाते हुए के साथ दो कदम नहीं चल पातीं। उसके जाने के बाद चलना सिर्फ उसकी यादों और स्मृतियों में ही हुआ करता है। कुछ परिवारों में महिलाएं मरघट पर भी जाती हैं। लेकिन कुछ परिवार की महिलाएं कितनी दुर्भागी हैं कि उन्हें जाते हुए के साथ अंतिम यात्रा में शामिल होने का संयोग नहीं मिल पाता। यह भी ऐसी चलनें हैं कि जिंदा रहते तो हर दम लड़ते-झगड़ते, हंसते रहे लेकिन जाने के बाद उसके अंतिम पहचान को देख भी नहीं पाते। जब विमान अंतिम पड़ाव पर रूकता है। चारों ओर आंसू ,सूनी आंखें, उतरे चेहरे,भावविहीन मेल- जोल देखकर सचमुच महसूस होता है कि जीवन के अंतिम क्षण में व्यक्ति कहां आता है। जहां सिर्फ सूनापन होता है। तमाम छल-प्रपंच ताख पर धरे रह जाते हैं।
यदि निगम बोध घट गए हों तो देखें होंगे कि एक साथ छह, आठ और बारह लोगों के जलने की व्यवस्था है। वहीं ओहदे और प्रतिष्ठित हुए तो अगल बने स्थान पर जलते हैं। यदि आमजन हुए तो यमुना किनारे जला करते हैं। एक दाह संस्कार में जितनी लकड़ी लगती है और पर्यावरण प्रदूषित होता है उसे ओर न्यायालय का सुझाव था कि क्यों न विकल्प तलाशा जाए। जब हमारे पास सीएनजी और विद्युत दाह संयंत्र मौजूद हैं तो उसका इस्ताल क्यों न किया जाए। लेकिन मसला यहां परंपरा और रिवाज पर अटक जाता है। बहुत कम लोग हैं जो अपने परिजन को विद्युत या सीएनजी के द्वारा अंतिम संस्कार के लिए तैयार होते हैं। जबकि इससे लकड़ियों की बचत तो होगी ही साथ ही वातावरण में फैलने वाले विषाक्त धुआं से भी निजात मिलेगा। कभी निगम बोध से उठने वाले धुएं की ओर नजर डालें तो वहां एक कृत्रित धुआंकाश तैरता नजर आता है। हम जितने की लकड़ी और अन्य सामग्री खरीदते हैं उसके अनुपात में सीएनजी और विद्युत दाह में एक हजार का खर्च आता है। लेकिन अभी हमारी मनोदशा उसके लिए तैयार नहीं है। जब तक सारी चीजें हमारी आंखों के सामने न घटे।


शिक्षकीय दुनिया की कहानी के पात्र

कौशलेंद्र प्रपन्न ‘‘ इक्कीस साल के बाद पहली बार किसी कार्यशाला में बैठा हूं। बहुत अच्छा लग रहा है। वरना तो जी ...