Thursday, September 18, 2014

पढ़ने की तैयारी तो करो


कौशलेंद्र प्रपन्न
First Published:17-09-14 09:59 AM
Last Updated:17-09-14 10:00 AM
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पढ़ने की तैयारी, यह नई चीज क्या है? क्या पढ़ने की भी तैयारी करनी पड़ती है? क्या पढ़ें और कितना पढ़ें? इसको भी तय करना होता है। जब तुम यह निश्चित कर लोगे, फिर पढ़ना आनंददायक हो जाएगा।
तुम्हारे आस-पास क्या और कौन सी चीजें लिखी हैं, उस पर एक नजर डालो। स्कूल की दीवारों, नोटिस बोर्ड, क्लास रूम की दीवारों पर अकसर कुछ न कुछ लिखा होता है।
क्या लिखा होता है? कभी पढ़ने की कोशिश की है? लिखा होता है- ‘बड़ों का आदर करना चाहिए’, ‘समय बहुत बलवान होता है’, ‘स्वास्थ्य ही जीवन की कुंजी है’ आदि।
सिर्फ अपने आस-पास लिखे वाक्यों को पढ़ लेना ही हमारा मकसद नहीं होना चाहिए, बल्कि उन पढ़े हुए वाक्यों के मतलब भी समझ में आने चाहिए। इसके लिए हमें किस प्रकार की तैयारी करनी चाहिए, इसको भी समझते हैं। हमें ज्यादा से ज्यादा लिखे हुए मैटर को पढ़ना और उन्हें समझने के लिए बड़ों की मदद लेनी पड़ती है। इसमें शर्माने की आवश्यकता नहीं है। यदि कोई तुम्हारी परेशानी को सुन नहीं रहा है तो ऐसे में तुम्हारे पास शब्दकोश होता है। एक बार शब्दकोश देखने का चस्का लग जाएगा, फिर तुम्हें कोई भी शब्द डराएगा नहीं, बल्कि शब्दों की चमकीली दुनिया तुम्हें अपनी ओर लुभाने लगेगी।
तुम्हारे क्लास-रूम में अधिक से अधिक लिखे हुए शब्द और वाक्य होने चाहिए। क्लास में चार्ट पेपर, चित्रावली, स्टोरी चार्ट आदि हों तो तुम्हें पढ़ने के लिए बहुत सारी सामग्री मिल जाएगी। कक्षा की दीवार ही नहीं, बल्कि कक्षा का कोना भी बच्चों का अपना आनंद का कोना बन सकता है। रंग-बिरंगे चित्रों से सजी किताबों को जितना पढ़ोगे, उतनी ही तुम्हारी भाषा मजबूत होगी। अगर भाषा मजबूत हो जाएगी तो हर तरह का टॉपिक आसान लगने लगेगा तुम्हें।

Tuesday, September 9, 2014

कौशलेंद्र प्रपन्न » चांद परेशां क्यों

कौशलेंद्र प्रपन्न » चांद परेशां क्यों

चांद परेशां क्यों
क्यों हो चांद परेशां,
तन्हा भी हो क्यों,
रात रात भर अकेले
आंसू बहते हो।
सुबह दिखती हैं ओसों में,
निशा बुलाती है
बड़ी दीदी सुनाती है
तेरी धरती की बातें जो,
वही हमें याद आती है।
कल रात तुम अकेले थे-
सोचा तुम से बातें हों
मगर तुम तो खुदी में थे
क्या बातें भला होती।
सेाचा तुम को लिखूं ख़त
पता मुझको नहीं मालूम,
डाकिया ख़़्ात कहां देता,
लिखा ख़त मैं आज दे आया,
गांव के उस बुढ़े को,
जो आता ही होगा,
आज या कल में,
वही बांचेगा मेरा ख़त,
ज़रा ध्यान से सुनना।

स्कूल में शौचालय


स्कूल में शौचालय


ाल ही में मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने देश के सभी सरकारी स्कूलों में जुलाई 2015 तक लड़कियों के लिए अलग से शौचालय का निर्माण कराने का निर्णय लिया है। गौरतलब है कि अभी देश के 20 फीसदी स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग से कोई शौचलय नहीं है। वर्ष 2012-13 में देश के 69 फीसदी और 2013-14 में तकरीबन 80 फीसदी स्कूलों में ही लड़कियों के लिए अलग से शौचालय की व्यवस्था थी। जबकि 2009-10 में 59 फीसदी थी। शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 स्कूल के बुनियादी ढांचे में जिन दस चीजों को शामिल किया है उनमें शौचालय, पीने का पानी,खेल का मैदान आदि हैं। कई गैर सरकारी और सरकारी रिपोर्टों जिनमें डाइस की फ्लैश रिपोर्ट भी शामिल है, पर नजर डालें तो पाते हैं कि अधिकांश राज्यों में सरकारी स्कूलों में शौचालय, पीना पानी, खेलने के मैदान आदि नहीं हैं। गांव और कस्बों में चलने वाले स्कूलों में शौचालय नहीं होने की वजह से बच्चियां स्कूल नहीं जा पातीं। एमएचआरडी की रिपोर्ट की मानें तो बच्चियों का बीच में स्कूल छोड़ जाने के पीछे एक बड़ा कारण स्कूल में लड़कियों के लिए शौचालय का न होना है।
मानव संसाधन मंत्रालय ने शौचालय बनाने का जिम्मा काॅपोरेट सामाजिक जिम्मेदारी यानी सीएसआर को सौंपा है। इसके तहत स्कूलों में शौचालय का निर्माण किया जाएगा। आज देश के अधिकांश स्कूलों में या तो शौचालय हैं ही नहीं। और यदि हैं तो वो इस्तमाल में नहीं हैं। राजस्थान, बिहार, पंजाब, उत्त्तर प्रदेश आदि राज्यों के गांवों में चलने वाले स्कूलों में देखें तो वहां टीन से ढक कर शौचालय का रूप तो दिया है, लेकिन उसके दरवाजे पर पुराना जंग लगा ताला मिलेगा। उसमें न पानी है और न बैठने की व्यवस्था। ऐसे में बच्चों को खेत या खुले में शौच के लिए जाना पड़ता है। लड़कों के लिए थोड़ी सुविधा हो सकती है, लेकिन लड़कियों के लिए यह महफुज नहीं माना जा सकता। पंजाब एवं राजस्थान में माता पिता अपनी बच्चियों को इसलिए स्कूल नहीं भेजते क्योंकि स्कूल में लड़कियों के लिए अगल से शौचालय नहीं है।
निजी स्कूलों को छोड़ दें तो सरकारी स्कूलों की स्थिति अमूमन एक सी है। जबकि आरटीई एक्ट 2009 में स्पष्ट लिखा हुआ है कि स्कूल में कम से कम दस बुनियादी सुविधाएं होनी ही चाहिए जिसमें कक्षा-कक्ष, चाहरदीवारी, पीना का पानी, शौचालय, भाषा शिक्षक, शिक्षक के लिए कक्ष आदि। लेकिन जब इन बिंदुओं पर नजर दौड़ाते हैं तो पाते हैं कि अधिकांश स्कूल इस पैमाने पर खरे नहीं उतरते।
आरटीई के लक्ष्यों को पाने का अंतिम समय सीमा भी खत्म हो चुका है। वहीं सबके लिए शिक्षा यानी इएफए का लक्ष्य सीमा भी 2015 में खत्म होने वाला है। लेकिन जब हम वस्तुस्थिति का जायजा लेते हैं तो हमें हमारी दूरी नजर आती है। इसमें कमी कहां रह गई इसकी जांच करनी पड़ेगी और यह देखना होगा कि जिन वायदों और घोषणाओं को हमने अंतरराष्टीय स्तर पर किया था उन्हें पाने के लिए हमें किन रणनीतियों को अपनाना चाहिए। क्या जिन रास्तों को हमने अब तक मकूल समझा था वह पर्याप्त हैं या उनमें रद्दो बदल करने की जरूरत है। हमने सर्व शिक्षा अभियान, राष्टीय माध्यमिक शिक्षा अभियान, शिक्षा का अधिकार अधिनियम आदि तो चलाए किन्तु हमसे कहां चूक हो गई कि करोड़ों रुपए खर्च करने के बावजुद भी हमारे तकरीबन 80 लाख बच्चे/बच्चियां स्कूली तालीम से महरूम हैं। हमें गंभीरता से सोचना होगा कि हम आने वाले भविष्य को किस प्रकार की तालीम दे रहे हैं और ऐसी बुनियाद पर कैसी इमारत बनेगी।
देश की सरकारी स्कूलों में बुनियादी जरूरतों का बेहद टोटा है। टीचर हैं तो कक्षा नहीं। कक्षा है तो बच्चे उससे भी कहीं ज्यादा हैं। अभी भी देश भर में 5 लाख से भी ज्यादा प्रशिक्षित शिक्षकों के पद रिक्त हैं। अध्यापकों की कमी को दूर करने का जो तरीका अनुंबध पर रखने का अपनाया गया वह आरटीई के अनुसार उचित नहीं है। क्योंकि आरटीई कहती है कि अप्रशिक्षित शिक्षकों को तीन माह के भीतर प्रशिक्षण देने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की होगा। लेकिन दिल्ली, बिहार, उत्त्र प्रदेश आदि राज्यों में अनुबंधित शिक्षकों की भर्ती पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है। उनको प्रशिक्षण देने की जिम्मेदारी कौन वहन करेगा यह हकीकतन दिखाई नहीं देता। बच्चों को बैठने के लिए समुचित व्यवस्था नहंीं है। एक एक शिक्षक को 100 से भी ज्यादा बच्चों को कक्षा में पढ़ाना ही नहीं पड़ता बल्कि उनकी देखभाल भी करनी पड़ती है। एक शिक्षक चाह कर भी शिक्षण नहीं कर पाता। कई ऐसे शिक्षक/शिक्षिकाएं हैं जिन्हें पढ़ाना अच्छा लगता है। वे पढ़ाना भी चाहते हैं लेकिन वे मजबूरन पढ़ा नहीं पाते जिसका उन्हें कहीं न कहीं मलाल है। क्या हम यह कह सकते हैं कि अभी भी हमारे समाज में ऐसे शिक्षकों की कमी नहीं है जो सचमुच पढ़ाना चाहते हैं लेकिन व्यवस्थागत और प्रबंधकीय कार्यों की वजह से अपने कार्य से वंचित हो जाते हैं।
यह अलग बात है कि आज हजारों स्कूल शिक्षकों की कमी के शिकार हैं। जहां दो तीन या छह शिक्षक हैं जो पूरे स्कूल को संभाल रहे हैं। शिक्षण से लेकर प्रशासकीय तमाम कार्यांे को अंजाम दे रहे हैं। लेकिन उनके इस कार्य भार को कोई भी नहीं सराहता। बल्कि उल्टे उनकी अक्षमता को ही उजागर किया जाता है। सिर्फ लानत मलानते ही दी जाती हैं। ऐसे में शिक्षक को प्रेरित करने वाला कौन होगा। कौन होगा जो जिनके कामों को पहचान सके। समाज में हर तरफ इनकी आलोचना और उपेक्षा ही होती है कि शिक्षक पढ़ाना नहीं चाहते। इन्हें मुफ्त में आधे दिन की नौकरी करनी होती है आदि। जबकि गंभीरता से देखें तो इनकी जिम्मेदारी कहीं ज्यादा गंभीर और जिम्मेदारी वाली होती है। जरा कल्पना करें यदि एक बच्चा गलत तालीम पाता है तो वह समाज के लिए कितना बड़ा खतरा साबित हो सकता है। हर बच्चा शिक्षक की नजर में समान होता है।
सरकारी स्तर पर स्कूलों को सुधारने और बेहतर शिक्षा हर बच्चे को मिले इसके लिए प्रयास होते रहे हैं। लेकिन अब आवश्यकता और समय आ चुका है कि समाज के अन्य वर्गों को भी स्कूल की स्थिति सुधारने के लिए हिस्सेदार बनाना होगा। सरकार की अपनी कुछ सीमाएं और वह उसी सीम में रहते हुए कार्य करती है। सरकार नियम और बजट तो दे सकती लेकिन व्यक्ति में कार्य के प्रति समर्पण और निष्ठा पैदा नहीं कर सकती। स्कूल में कार्य सुचारू चल रहे हैं या नहीं इसकी निगरानी प्रशासनिक स्तर पर तो होता ही है यदि स्थानीय निकायों को भी इसमें शामिल किया जाए तो शिक्षकों की गैर शैक्षणिक  कार्यों से निजात दिलाई जा सकती है।


Friday, September 5, 2014

गानों से भी सीख सकते हो हिन्दी


कौशलेंद्र प्रपन्न
First Published:03-09-14 09:55 AM
Last Updated:03-09-14 09:55 AM
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आज गाने कौन नहीं सुनता? छोटे से लेकर बड़ों तक और गांव से लेकर शहर तक। चाय की दुकान पर, रिक्शेवाले, कार वाले, स्कूल वाले, कॉलेज वाले सभी गानों को सुनने में मगन दिखाई देते हैं। गाने सुनने के भी कई फायदे हैं। जो चीजें किताबों में पढ़ने में रुचिकर नहीं लगतीं, वही गाने सुनने के दौरान उन चीजों को भी दुहराने लगते हैं जिसे कभी किताबों में पढ़ा था। हर गाने में कोई न कोई स्टोरी भी होती है। वैसे हर गाने में न केवल बोल होते हैं, बल्कि शब्द होते हैं और उस गाने को गुनगुनाने लायक बनाने के लिए उसे संगीतबद्ध भी करना पड़ता है।
हिन्दी की किताबों में छोटे -छोटे शब्द, वाक्य, पूरा का पूरा एक पैराग्राफ लिखा जाता है। उसे याद करना और सही तरीके से लिखना भी बड़ी समस्या है। तुम्हें व्याकरण की नजर में हिन्दी के वाक्य कठिन लगते होंगे। कौन सी पंक्ति स्त्रीलिंग होगी? कौन सा शब्द पुल्लिंग है और कौन सा शब्द स्त्रीलिंग, इसके चक्कर में कई बार फंसे होगे। जैसे बस आती है या आता है? दुकान खुली है या खुला है? दही खट्टा है या खट्टी है? ऐसे कई सारे शब्द हैं, जिनमें अमूमन कठिनाई होती है।
अगर तुम हिन्दी के गानों को ध्यान से सुनोगे और उन गानों में इस्तेमाल किए गए शब्दों, वाक्यों को गौर से सुनोगे तो व्याकरण की इस तरह की कठिनाइयों का समाधान मिलेगा। यूं तो कई गाने महज पार्टी, डांस आदि को ध्यान में रखते हुए लिखे जाते हैं। उसमें बोल से ज्यादा धुन, म्यूजिक आदि प्रमुख होते हैं। लेकिन कुछ गानों में बोल यानी शब्द बहुत सोच-समझकर प्रयोग किए जाते हैं।
गानों में शब्द, वाक्य, भाव को बड़ी सावधानी से पिरोया जाता है। यही वजह है कि ‘डोले रे डोले डोले डोले रे। अगर मगर डोले नैया भंवर भंवर जाए रे पानी..डूबे न डूबे न मेरा जहाजी..’ गाना बच्चों को खूब पसंद है। अब से गानों को सुनो तो उसकी हिन्दी व्याकरण पर भी ध्यान देना। सुनते-सुनते हिन्दी भी ठीक हो जाएगी।

नदी और हम




दी हमारे आने से पहले थी और यही सच है कि हमारे जाने के बाद भी यूं ही अनवरत बहती रहेगी। धार में न तो कोई मंथरपन आएगा और न ही ठहराव। बल्कि सदियों सदियों तलक बिना आंसू बहाए हमारी जीवनधार बहती ही रहेगी। कभी देखें इन्हें रूक कर अपने रफ्तार भरी जिंदगी से तो ये कितनी शंात धीर-गंभीर लगती हैं। दरअसल इनकी शांति दिखाई नहीं देती। हमें तो इनके कलकल हर हर की आवाज में भी एक संगीत सुनाई देती है। व्यास है यह। कहते हैं बहुत चंचला प्रकृति की है व्यास। जैसा उपर से है वैसे ही नीचे से। गहराई है तो उछलापन भी है। तेज प्रवाह है तो कहीं एकदम चुपके से दबे पांव चलने वाली व्यास भी मिलती है। हिमाचल की तलछट्टियों में लोटने वाली व्यास अपने साथ हिमालय को भी लेकर चलती है।
बिलासपुर से कुछ पहले ही व्यास संग संग चलने लगती है। जैसे जैसे घूमावदार पहाड़ी चढ़ते जाते हैं वैसे वैसे व्यास नीचे और नीचे बहती है। लुका छिपी करती व्यास काफी दूर तक साथ होती है। लेकिन कब यह खुद को छुपा ले यह पता ही नहीं चलता। कई बार नदियों को देखकर लगता है ये कितनी सौभाग्यशाली हैं कि इन्हीं के सामने हमारे पुरखे आए नहाए और अंत में इन्हीं में समा गए। कितने कितनों की जिंदगी को खुद मंे समो कर भी व्यथित नहीं होती। कहीं कोई तड़प नहीं होती। लेकिन वहीं जब झेलम चनाब या घाघर,बुढ़ी गंड़क, कोसी को देखते हैं तो महसूस होता है कि नदी भी कितनी बेचैन है। यह भी कितनी परेशां होती है अकेले में। रात भी निरा शांत सो जाती है।
नदियां हमारी धरती की मांग के मानिंद प्रतीत होती हैं। जैसे धरती नहा धो कर अपनी मांग बना रही हो। वैसे ही नदियां धरती की माथे की मांग सी सजी नदियां बेहद लुभावन लगती हैं। छोटी बड़ी तमाम तरह की नदी वास्तव में पूरी धरती पर मचलते हुए अंत में अपने अंतिम लक्ष्य तक पहुंचती हैं।
नदी को खुद भी पता नहीं होता कि कब कौन उसमें आप्लावित हो रहा है। कौन उसके साथ खिलंदड़ी कर रहा है। वह बच्चा है या जवान, बूढ़ा है या कोई और यदि सवाधानी नहीं बरती तो नदी उसे मांफ नहंी करती। यूं तो नदी मां की तरह मुहब्बत करती है लेकिन मर्यादा लांघते ही सबक सीखाने मंे पीछे नहीं रहती। अ

दी के द्वीप कविता में अज्ञेय जी ने नदी को कुछ इस रूप में याद किया है कि तुम संस्कारित करते रहना। नदी हम हैं द्वीप। एक जगह ही खड़े रहेंगे। नदी ही दरअसल बहती है। हम तो बस कुछ समय के लिए प्रवहमान रहते हैं फिर अपने पीछे एक दुनिया छोड़कर चल पड़ते हैं। कोई लाख गुहार लगा ले। कोई आंसुओं की नदी क्यों न बहा दे लेकिन हम चले जाते हैं तो बस चली ही जाते हैं। लेकिन नदी तो कहीं नहीं जाती। वहीं के वहीं बहती रहती है। हां इतिहास बताता है कि कई सारी नदियां समय समय पर अपने रास्ते भी बदली हैं। शहर को छोड़कर दूर भी गई है। और कई बार तो सीमांत को छोड़कर बीच शहर-गांव में भी बहने के रास्ते निकाले हैं।

भी ऋषिकेश में गंगा के किनारे रात में खड़े हों लगेगा गंगा परेशान है। कुछ कहना चाहती है। पर कहना चाहती है यही तो स्पष्ट नहीं है। पर इतना तो साफ है कि हर नदी हमसे कुछ नहीं बहुत कुछ कहना चाहती है। यदि ठहर कर सोचेें तो मालूम चलेगा कि आखिर नदी सदियों से क्या कहना चाहती है? किस बात को लेकर नदी कसक रही है। वही पुकार हर नदी की होती है। वह कहती है मैं तुमसे पहले से हूं। और तुम्हारे जाने के बाद भी मैं यथापत् रहूंगी। मेरे ही किनारे दुनिया के तमाम शहर,नगर, देश बसे हैंै।

दी के अकेलेपन को दूर करने के लिए पहाड़ साथ होता है। पहाड़ भी तो अकेला कब तक खड़ा रहेगा। उसे भी तो साथ चाहिए। नदी और पहाड़ साथ साथ अपने दुख सुख बांटते एक साथ चला करते हैं। लेकिन कई बार पहाड़ नदी से मिलने के लिए इतना आतुर हो जाता है कि भरभरा कर नदी में जा मिलता है। और इस तरह से लंबे समय से साथ चलते हुए दो साथियों में मुलाकात संभव हो पाता है।
न जाने किन कोनों, मुहानों से होती हुई ये नदियां हम तक पहुंचती हैं। कहीं खाई में गिरती हैं तो कहीं चट्टानों से सिर फोड़ती हैं। कहीं शहर के बीच से होती हुई मचलती सैलानियों को लुभाती हैं। तो कहीं अपनी घहराती ध्वनियों से आकर्षित करती हंै।

Saturday, August 30, 2014

कमरे की दुनिया


कौशलेंद्र प्रपन्न
हर कमरे की अपनी दुनिया होती है। कमरे भी इंसान की तरह ही अपनी कहानी कहते हैं। हम इस तरह से देख सकते हैं कि एक कमरा जहां हमारा बचपन,किशोरावस्था गुजरा होता है उस कमरे में हमारी यादें, भाई-बहनों के साथ की लड़ाइयां और दुलार भी ज़ब्ज होती हैं। जब हम बड़े हो जाते हैं तब वही घर के कमरे एकबारगी उदास और अकेले हो जाते हैं कि जैसे हम अचानक किसी नए शहर में अकेले और उदास हो जाते हैं। कभी अपने पुराने कमरों में लौटना हुआ हो तो एक अजीब सा अनुभव घेर लेता है। ऐसे ही अनुभव पिछले दिनों हुए। मैं तकरीबन दस साल के बाद उस कमरे में गया जिसमें होश संभाला था और जहां 8 वीं और 10 वीं की परीक्षाओं के लिए बैठकर पढ़ा करता था। अब उस कमरे की दीवारों पर पुरानी तस्वीरें, कैलेंडर और बहनों की बनाई पेंटिंग्स भर हैं। उन पंेटिंग्स और कैलेंडरों पर धूल का साम्राज्य है। अब मां पिताजी से उन्हें झाड़ना पोछना नहीं बनता। जिन आलमारियों पर किताब और अपने सामान रखने के लिए हम भाई- बहन लड़ा करते थे वही आलमारियां अब उदास और धूल से सनी हैं। जाले और पन्नी में लिपटे खड़े हैं। हम लोग बैठक घर को देवता घर कहा करते थे। उस देवता घर को देख कर लगा कई सालों से उसमें पूजा-पाठ नहीं हुआ है। इतना ही नहीं सोफे पर घड़ा, प्लास्टि की बाल्टी, टीन टप्पर रखे हैं। शायद रखना शब्द गलत होगा क्यांेकि सामान रखे हुए नहीं थे वे ठूंसे गए थे। सोफा और टेबल की भी अपनी कहानी है। इसे खरीदने के पीछे मां ने कितना जद्दो जहद किया था और आज उसकी यह स्थिति देख कर मन उचट रहा था। लेकिन शायद समय के साथ सामानों, स्थानों, व्यक्तियों आदि सभी की भूमिकाएं और मायने भी बदल जाती हैं। बड़े भाई ने 9 वीं कक्षा में एक संतोष रेडिया बड़ी शौक से खरीदा था। आज वह रेडियो भी एक कोने में उदास और मौन था। आडियो कैसेट्स भी यूं ही उपेक्षित लुढके हुए मिले।
कमरे की जीवंतता इंसानों के रहने से होती है। कमरा अपने आप में न तो जीवंत होता है और न उदास। यह इस पर निर्भर करता है कि कमरे में रहने वाला व्यक्ति कैसा है। किस तरह से इन कमरों में स्वयं को रख रहा है। ये वहीं कमरे होते हैं जहां हम जीवन के कई सारे निर्णय, जिद्द, बहस,प्यार के बीज बोते हैं। उन्हीं कमरों में हमारे वंशबेल की बुनियाद होती है। लेकिन जब हम कमरों से बाहर चल जाते हैं तब वही घटनाएं, बातें और स्मृतियों के हिस्सा हो जाया करती हैं। वैसे यह बात भी सच है कि हम पूरी जिंदगी एक कमरे में नहंी काट सकते। इस नाते हर कमरे की अपनी सीमा भी होती है। लेकिन क्या इस तथ्य से मुंह मोड़ सकते हैं कि कमरों में जिंदा दुनिया को हम कभी अपनी जिंदगी से अलगा सकते हैं?
जो कमरा अपने आगोश में मां-बाप भाई बहन को पनाह दिया करते थे वही कमरे अब इन्हीं सदस्यों की अनुपस्थिति में भंाए भाएं करते नजर आते हैं। इन कमरों में घुसना कई बार बड़ा भयानक और डरावना लगता है। वहीं दूसरी ओर एक बार फिर से पुरानी बातों और घटनाओं को याद करने का जरिया बन जाता है। अतीत में जाना और यादों को टटोलना हर किसी को अच्छा लगता है लेकिन उस अतीत से सही सलामत लौट आना एक चुनौती होती है।
जब हम किसी पुराने महलों किलों या स्मारकों के कमरों में घूम रहे होते हैं तब उस समय की सारी चीजें हमारी आंखों के सामने घूमने लगती हैं। अकथ्यतौर पर कमरा अपने जमाने की बातें सुनता है। वह सुनता है कि कैसे,किन हालातों में कोई इतना लंबा समय यहां पर गुजारा है। शांति निकेतन हो या गांधी आश्रम। इन कमरों को देखते घूमते हुए पूरा इतिहास आंखों के सामने जीवंत हो उठता है।
होस्टल के कमरे की अपनी अलग संस्कृति होती है। इन कमरों का अपना कोई निजी चरित्र नहीं होता। रात गुजार कर सुबह किसी और ठिकाने की ओर चल पड़ने वाले इन कमरों को यूं ही अकेला छोड़ जाते हैं। कमरा एक बार फिर से सज धज कर नए कस्टमर के लिए तैयार हो जाता है। यहां की हर चीज अपना रूप रंग बदल लेती है। आईना भी नए मेहमान के लिए तैयार हो जाता है। इन आईनों में कोई भी तस्वीर स्थान नहीं बन पातीं। यही इसकी त्रासदी भी है और नियति भी। जहां हर दिन नए चेहरे आते हैं वहां किसी खास चेहरे को बसाना संभव भी नहीं।
कमरे की अपनी निजी जिंदगी नहीं होती। उसकी जिंदगी तो कमरे में रहने वालों से तय हुआ करती हैं। जिस तरह का रहने वाला आया उसी रंग रूप में कमरे को ढलना होता है। कमरे की हर दीवार और रंग अपनी कहानी बयां करते हैं। बस हम ही हैं कि कमरों से कई बार बेआबरू हो कर निकलते हैं।


Thursday, August 28, 2014

हर बात को ध्यान से सुनो

हर बात को ध्यान से सुनो
कौशलेंद्र प्रपन्न
First Published:27-08-14 10:17 AM
Last Updated:27-08-14 10:17 AM
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कई बार तुम्हें कक्षा में सुनने का मिलता है कि तुम ध्यान से सुन नहीं रहे हो। ध्यान से सुनो। सुनोगे नहीं तो बात समझ में नहीं आएगी।
कभी तुमने सोचा है कि समझने के लिए सुनना क्यों जरूरी है? क्यों अक्‍सर हम कहते हैं कि ध्यान से सुनना चाहिए। अगर अच्छे वक्ता बनना चाहते हो तो सुनने की आदत डालनी चाहिए। इससे हमारे बोलने के तौर-तरीके भी सुधरते हैं। हमें मालूम पड़ता है कि इस बात को और कैसे सुंदर तरीके से बोला जा सकता है।
सुनने की आदत डालने से बोलने की कला भी विकसित होती है। जब भी कक्षा में या कहीं भी कोई वक्ता बोल रहा होता है तो ध्यान से उसे सुनना भी एक कला है।
अगर तुम चाहते हो कि बोलने वाले की बात को काटना है या तर्क करना है तो उसके लिए बोलने वाले की हर बात को ध्यान से सुनना बेहद जरूरी है, वरना बोलने वाला कह सकता है कि मैंने तो ऐसा कहा ही नहीं। आपने ठीक से मेरी बात नहीं सुनी। इस आरोप से तभी बचा जा सकता है, जब तुम कहने वाले की बात को गौर से सुनोगे। सुनने से दूसरों के विचारों को जाना जा सकता है। इससे तुम्हारे ज्ञान में वृद्धि होती है।
कैसे और कितना सुनो? सुनने के लिए जरूरी है कि एक बोलने वाला भी हो। वह किस विषय पर किस गंभीरता से बोल रहा है, यह भी जरूरी है। सुनने वाले की रुचि की बात की जाए तो सुनने वाले का ध्यान खुद ब खुद बोलने वाले की ओर चला जाता है। कई बार बोलने वाले की सुस्तता की वजह से भी सुनने वाले को अच्छा नहीं लगता।
जब तुम कक्षा में बैठे हो तो कक्षा में बताई जाने वाली बातों को ध्यान से सुनने की आदत डालो। इससे तुम्हारी काफी सारी समस्याएं हल हो जाएंगी। कक्षा में विषय को पढ़ाते वक्त मैडम बातों ही बातों में कई ऐसी बातें कह जाती हैं, जो न केवल तुम्हारे विषय की समझ के लिए जरूरी होती हैं, बल्कि जीवन में भी काम आती है। सुनते वक्त इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि बोलने वाला क्या बोल रहा है और क्यों बोल रहा है। कक्षा में पढ़ाए गए विषय को दूसरे को सुनाना और दूसरे से उस विषय को सुनने से ज्यादा याद होता है। 

कब मरेंगे पिताजी

कब मरेंगे पिताजी

कब मरेंगे पिताजी
मां तुम कब मरोगी
मां कब मरेंगे पिताजी,
जब भी मां मरोगी
पिताजी की मिट्टी
होगी जब ठंढ़ी,
वह शाम होगी,
या रात काली,
सोचता हूं जब भी,
ज़बां है थरथराती,
सुझता नहीं है कुछ भी।
मां जब मरोगी
या मरेंगे पिताजी,
हम मिलेंगे खुशी खुशी,
होंगे इकट्ठे सभी,
जो बहन नहीं मिली,
वो भी आएंगी।
तड़पता हूं सोचकर,
तुम न होगी,
न होंगे पिताजी,
बस बची होंगी,
बातें तुम्हारी।

Monday, July 28, 2014

प्रभावी निबंध ऐसे लिखो


कौशलेंद्र प्रपन्न
तुम सभी तो निबंध लिखते ही होगे। परीक्षा या कक्षा में मैडम या सर आपको निबंध लिखने के लिए बोलते होंगे। कैसे और क्या लिखते हो निबंध में? कितने अंक आते हैं निबंध लेखन में? अगर चाहते हो कि अच्छा निबंध लिखो और अच्छे अंक आएं तो आओ हम यहां ऐसे कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर नजर डालते हैं। अगर तुम इन बातों का ख़्याल रखोगे तो अच्छे नंबर आएंगे।
एक अच्छे निबंध में क्या चीजें होती हैं? एक अच्छे निबंध में कौन, क्या, कैसे, कब, कहां और क्यों के जवाब शामिल होते हैं। यदि इन क के उत्तर अपने निबंध में देते हो तो निबंध तो सुंदर और सार्थक होगा ही साथ ही वह निबंध एक बेहतर निबंध माना जाएगा। कैसे निबंध लिखोगे? निबंध में कैसे इन क का जवाब लिखोगे आओ अभ्यास करते हैं।
स्वतंत्रता दिवस पर निबंध लिखना है तो इस निबंध के साथ हम इस तरह से बर्ताव करेंगे। स्वतंत्रता दिवस क्या है? क्यों मनाते हैं स्वतंत्रता दिवस? कैसे मनाते हैं स्वतंत्रता दिवस? कब मनाते हैं? कहां मनाते हैं? कौन मनाता है? निश्चित मानो यदि तुमने इन छह क का जवाब पांच पंक्तियेां में देते हो तो कल्पना कर सकते हो कि तुमने छह गुणा पांच यानी तीस पंक्ति का निबंध तुमने लिख दिया।
एक अच्छे निबंध में यदि इन क का जवाब देते हो तो तुम्हारे टीचर को वह निबंध पसंद आएगा। इतना ही नहीं बल्कि तुम्हारे निबंध से टीचर प्रभावित भी होंगे। तुम्हारी तरह निबंध लिखने के लिए और को प्रेरित किया जाएगा। अब यदि कक्षा में या परीक्षा में निबंध लिखने को आए तो इस तरह लिख सकते हो।
घर पर इस तरह से और अन्य विषय पर भी निबंध लिखकर अभ्यास कर सकते हो। इससे तुम्हारा अभ्यास बढ़ेगा और तुम अच्छे निबंध लेखक बन सकते तो। एक अच्छा और सफल निबंध लेखक बनने के लिए बड़े बड़े लोग सपने तो देखते हैं लेकिन वो अभ्यास नहीं करते और एक अच्छा निबंध कैसे लिखें इसकी समझ नहंी होती।  

Wednesday, July 23, 2014

लड़की के आंगन में शिक्षा का उजाला



कौशलेंद्र प्रपन्न
शिक्षा का चरित्र है कि वो जेंडर को लेकर किसी भी किस्म का भेदभाव नहीं करती। शिक्षा की नजर में हर कोई शिक्षार्थी है। वह चाहे लड़की हो या लड़का। फिर क्या वजह है कि शिक्षा हासिल करने व प्राप्त करने में लड़कियों की संख्या लड़कों से कम है। वैश्विक स्तर पर लड़कियों की संख्या लड़कों से कमतर है। इसके पीछे के कारणों पर रोशनी डालें तो पाएंगे कि अभी भी हमारा समाज स्टीरियो टाइप के सोच से बाहर नहीं निकल सका है। यदि ईएफए ग्लोबल मोनिटरिंग रिपोर्ट 2013-14 पर नजर डालें तो बड़ी गंभीर निराशा होती है। लड़कियां तो लड़कियां यहां तक कि लड़के भी शिक्षा ये महरूम हैं। ऐसे बच्चों की संख्या तकरीबन 7 करोड़ के आस पास है। यूं तो शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 सभी बच्चों ;6 से 14 वर्षद्ध को बिना किसी भेदभाव के शिक्षा मुहैया कराने का अधिकार प्रदान करता है। लेकिन आरटीई एक्ट के लागू होने के बावजूद भी विभिन्न राज्यों की स्कूली शिक्षा से लड़कियां बाहर हैं। इसके पीछे दो महत्वपूर्ण कारण पहचाने गए हैं। पहला, स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग से शौचालय का न होना। दूसरा, समाज एवं परिवार की नजर में लड़कियां शिक्षा हासिल करें इसकी आवश्यकता ही महसूस नहीं की जाती। सब के लिए शिक्षा 1990 यानी ईएफए के लक्ष्यों में ल़ड़कियों और लड़कों के बीच के फांक को कम करने और जेडर समानता लाना, शामिल किया गया था। लेकिन 2000 में डकार में हुए सम्मेलन में देखा गया कि अभी भी हमारा ईएफए का लक्ष्य बहुत दूर है। यही वो आधार भूमि है जिसने सर्व शिक्षा अभियान, राष्टीय माध्यमिक शिक्षा अभियान, शिक्षा का अधिकार अधिनियम को जन्म दिया। ताकि हम 2015 तक ईएफए के लक्ष्यों को प्राप्त कर सकें। लेकिन वस्तुस्थिति को देखते हुए बेहद निराशा होती है। हालांकि आंकड़ों को देखते हुए यह जरूर कहा जाता है कि लड़कियां हर साल दसवीं और बारहवीं की कक्षाओं में लड़कों को पछाड़ कर आगे निकल रही हैं। यह इसका एक पहलू है। दूसरा पहलू यह भी सामने है कि फिर क्या वजह है कि इन लड़कियों की उपस्थिति उच्च शिक्षा में नदारत है।
इल्म की रोशनी निश्चित ही लड़कियों की जिं़दगी को ही रोशन नहीं करती बल्कि समाज और परिवार के अन्य सदस्यों को भी प्रभावित करती हैं। यहां भी विचार किया जाना चाहिए कि क्या शिक्षा का मायने जो लड़कों के लिए है वही अर्थ लड़कियों के लिए भी है? समाज और परिवार में घटने वाली घटनाओं के अनुभव इससे बिल्कुल उलट हैं। माना जाता है कि लड़कियां पढ़ लिख कर क्या करेंगी। इन्हें तो आखिर में चूल्हा ही फूंकना है व घर गृहस्थी में ही लगना है। हमारी एकल मानसिकता एक किस्म से लड़कियों के लिए शिक्षा के दरकार को सीमित ही करती है। जबकि लड़की व लड़का पहले एक इंसान है। उसके बाद वह लड़का व लड़की है। जेडर के लिहाज से हमें उन्हें शिक्षित करना और इस किस्म की तालीम मुहैया कराना आवश्यक है कि वो जीवन को बेहतर तरीके से जी सकें। परिवार और समाज में सकारात्मक भूमिका निभा सकें।
शिक्षा लड़कियों को एक औजार प्रदान करती है जिसके जरिए वह समाज और समाजिकरण की प्रवृत्ति को बेहतर ढंग से समझ सकें। वह अपनी भूमिका और क्षमता का इस्तमाल कर सकें। लेकिन व्यवहारिक स्तर पर देखें तो एक गहरी खाई दिखाई देती है। वह खाई हम नागर समाज ने बनाए हैं। हम नहीं चाहते कि लड़कियां यानी स्त्री शिक्षित हो। हम नहीं चाहते कि वर्ग पढ़ लिख कर हमारी समझ और सत्ता को चुनौती दे। एक एक तरह से पुरुष का डर है जो लड़कियों को शिक्षा की मुख्य धारा से अलग रखना चाहता है। वह चाहता है कि यह वर्ग हम पर ही निर्भर रहे। और यह तभी संभव है जब इनकी जिं़दगी से शिक्षा बाहर रहेंगी।
जेंडर समानता और सब के लिए शिक्षा को लक्ष्य बनाने के पीछे नागर समाज का दरकार यह था कि आजादी के इतने वर्षां के बाद भी इनकी जिंदगी में इल्म की रोशनी पूरी तरह से नहीं फैल पाई है। इनका एक बड़ा हिस्सा अभी भी काला स्याह है। इसको दूर करने के लिए हमने अंतरराष्टीय स्तर पर कुछ घोषणाएं की। उन घोषणाओं में एजूकेशन फाॅर आॅल 1990, डकार घोषणा पत्र 2000, सहस्राब्दि विकास लक्ष्य आदि में हमने लड़कियों की शिक्षा एवं विकास को रखा। इसके पीछे वजह इतनी सी थी कि विश्व एक ओर तो विकास के राजपथ पर सरपट भाग रहा था वहीं हमारे गांव देहात, शहर कस्बे की लड़कियां अभी भी इल्म की दौड़ में पिछड़ रही थीं। अंतरराष्टीय स्तर पर हमारी साख पर बट्टा लग रहा था। हमने स्वेच्छा से शिक्षा के अधिकार कानून नहीं बनाए बल्कि वह अंतरराष्टीय दबाव काम कर रहा था।
ईएफए के छह लक्ष्यों में जेड़र समानता यानी लड़के लड़कियों के बीच के अंतर को पाटना भी शामिल किया गया था। यहां यह स्पष्ट करते हुए चलना उचित है कि ईएफए और सहस्राब्दि विकास लक्ष्य में हमारी कोशिश यह है कि हम लड़कियों को न केवल साक्षर बनाएं बल्कि उन्हें शिक्षित करें। वो शिक्षा के मायने को समझें और शिक्षा की कड़ी को बढ़ान में अपनी रचनात्मक सहभागिता दें। पाॅलो फ्रेरे ने अपनी किताब उत्पीडि़तों कि शिक्षा शास्त्र में जिक्र करते हैं कि सदियों से विकास की मुख्य धारा से कटे इस वर्ग में गुलामी को लेकर एक किस्म का मोह और जड़ता की स्थिति बन जाती है। यथास्थितिमवाद को बरकरार रखने में इन्हें सहजता महसूूस होती है। यही वजह है कि जब बदलाव और शिक्षा की बात की जाती है तो एक अप्रत्याशित भय इन्हें घेर लेता है।  

Tuesday, July 22, 2014

विद्यालय या कूटालय



कौशलेंद्र प्रपन्न
कई बार ताज्जुब होता है कि क्या हमारे बच्चे विद्यालय में जा रहे हैं या कूटालाय में। जहां हर दिन कोई न कोई बच्चे कूटे जाते हैं। हाल ही में स्कूल के प्रांगण से इस तरह की ख़बर बंग्लूरू और हैदराबाद, आंध्र प्रदेश से आई है। एक ओर प्रधानाचार्य बच्चे को डंडे से लगातार पीट रहा था। इस बाबत न्यूज चैनल पर दिखाई गई तस्वीर एवं वीडियो एकबारगी शिक्षक की क्रूरता को सामने ला रहा था। जिसने भी देखा और सुना उसके रोगटे खड़े हो गए होंगे। इतना ही नहीं शिक्षक और स्कूल अभिभावकों को लुभाने की बजाए डरा रहे होंगे। दूसरी घटना स्कूल परिसर में बच्ची के साथ व्यायाम शिक्षक ने बलात्कार किया। इस तरह की घटनाएं शिक्षा और स्कूल के प्रति आक्रोश और अविश्वास पैदा करते हैं।
जुबिनाइल जस्टिस एक्ट ;जेजे एक्टद्ध और राष्टीय बाल अधिकार एवं संरक्षण आयोग ;एनसीपीसीआरद्ध एवं राज्य स्तर पर ;एससीपीसीआरद्ध हर बच्चे के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। इन घटनाओं को देखते हुए एनसीपीसीआर की अध्यक्ष ने तत्काल स्थानीय शिक्षा अधिकारी से जवाब तलब किया है। जेजे एक्ट और एनसीपीसीआर देश के हर बच्चे को सुरक्षा और प्रताड़ना से निजात दिलाने के लिए गठित की गई है। याद हो कि इस बाबत उच्च न्यायालय ने आदेश भी जारी किया था कि किसी भी स्कूल में शारीरिक दंड़ वर्जित है। लेकिन इस आदेश का माख़ौल तो समय समय पर उड़ाया ही जाता है साथ ही जेजे एक्ट की अवहेलना भी स्कूलों में खूब होती है।
गौरतलब है कि 1989 में यूनाइटेड नेशन्स कन्वेशन आॅन चाईल्ड राईट, यूएनसीआरसी89 ने विश्व के सभी बच्चों को जीने, सुरक्षा, सहभागिता आदि का अधिकार देता है। जो भारत में भी लागू है। लेकिन इन सब के बादजूद हमारे यहां निठारी जैसी घटनाएं होती है। न केवल निठारी बल्कि आज तो तकरीबन हर राज्य में ंस्कूलों और स्कूल के बाहर बच्चों को कूटा-पीसा जा रहा है। हमारे पास बाल आयाग से लेकर जेजे एक्ट आदि का कानूनन प्रवाधान भी है। फिर क्या वजह है कि बच्चों का शोषण एवं शारीरिक प्रताड़ना रूकने की बजाए बढ़ रहे हैं।
स्कूल की बुनावट व चरित्र पर नजर डालें तो स्थितियां कुछ स्पष्ट होंगी। एक क्लास में पचास, साठ, अस्सी बच्चे बैठते हैं। उन्हें पढ़ाने से लेकर खाना बांटने, वर्दी देने आदि का काम भी करना पड़ता है। ऐसे में शिक्षक व शिक्षिका मानसिक रूप से इतने खिन्न होते हैं कि कई बार उनकी व्यवस्थागत शिकायतें उनकी मानसिक शांति को तोड़ देती हैं। हमारे पास स्कूल पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 शिक्षकों के लिए शांति की शिक्षा की भी सिफारिश करती है। लेकिन गौर किया जाए तो शिक्षकों के लिए सरकार की ओर से आयोजित प्रशिक्षण कार्यशालाओं में किस तरह से शिक्षकों को सीखाया जाता है और शिक्षक किस मनोदशा से आते हैं यह एक चिंता का विषय है।
शिक्षा का अधिकार कानून बेशक पूरे देश में लागू हो चुका है। इसकी सिफारिशों पर गोष्ठियां, सेमिनार हो चुके हैं लेकिन वस्तुस्थिति यह है कि आज भी दिल्ली और दिल्ली के बाहर राज्यों में सरकारी स्कूलों में एक कक्षा में पचास से ज्यादा बच्चे हैं। यूं तो 30ः1 का अनुपात की वकालत आरटीई करती है लेकिन अमूमन स्कूलों में कक्षाओं की स्थिति इससे बिल्कुल उलट है।
हैदराबाद एवं बंग्लूरू की घटना पर सरकारी स्कूलों के तकरीबन 120 बीस शिक्षक/शिक्षिकाओं से कार्य
शाला में बातचीत का अवसर मिला। उन्होंने तो सीधे कहा वह हैवान है। दरिंदा है शिक्षक नहीं है। इससे एक बात तो साफ हो जाती है कि न तो सारे शिक्षक एक समान होते हैं और न उनकी मान्यता एवं मूल्य। हमें शिक्षकों की कार्यशालाओं का आयोजन योजनाबद्ध तरीके से करने की आवश्यकता है। साथ ही शिक्षकों का इन कार्यशालाओं में सकारात्मक मिल सके इसके लिए विशेषज्ञों की मदद ली जानी चाहिए।
समग्रता में देखें तो बच्चो की मार पिटाई आज कोई नई घटना नहीं है। यह स्कूलों में घटने वाली आम घटना है। इसे कैसे कम किया जाए व खत्म किया जाए इसके लिए शिक्षक वर्ग में गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है। वरना इस तरह के वारदात समस्त शिक्षक जाति पर प्रश्नचिंह्न लगाते हैं।

अभिनय से सीखो भाषा


कौशलेंद्र प्रपन्न
तुम सभी ने कभी न कभी अभिनय किया होगा। मैम ने तुम्हें कक्षा में रोल प्ले कराया होगा। याद आया! हां वही रोल माॅडल प्ले के जरिए हम आज भाषा सीखेंगे। वह इस तरह से होगा कि हिन्दी स्वर और व्यंजन वर्णों को साथ लेकर एक नाटक खेलेंगे। स्वर वर्ण यानी अ, आ, इ, ई वे वर्ण हैं जो बिना किसी दूसरे वर्ण की सहायता से बोली जाती हैं। वहीं व्यंजन वर्ण को स्वर वर्णों की मदद की आवश्यकता होती है।
इसका अर्थ यह हुआ कि अ या आ को बोलने के लिए दूसरे किसी वर्ण की जरूरत नहीं होती। वहीं क, ख, ग, घ, च आदि को बोलने के लिए अ, आ, इ, ई आवश्यकता होती है। जब हमें आम बोलना है तो पहले आ, फिर म को मिलाना पड़ता है तभी आम शब्द बनता है।
एक ग्रुप स्वर का है। दूसरा ग्रुप व्यंजन का। अब हम लोग एक शब्द बोलेंगे और तुम लोग उस शब्द के अनुसार जोड़ी में खड़े होंगे। जैसे मान, दान, कान, कमल, जाल, ताल ये दो वर्णां वाले शब्द हैं। आम सभी स्वर और व्यंजन वाले एक बच्चा स्वर का अ, आ है और दूसरे ग्रुप का बच्चा क, ज, ल हैं। जब दोनों बच्चे साथ मिलेंगे जैसे क और ल यानी कल। म, अ, आ, ल, अ मिल कर माल बना। बच्चे इसी तरह शब्द बनाने के क्रम में जोड़ी बनाएंगे।
तुम इस तरह शब्द बनाने और शब्दों की दुनिया से रू ब रू हो सकोगे। शब्द ऐसे ही मिल जुल कर बनते हैं। जैसे तुम लोग आपस में मिल कर खेलते हो उसी तरह शब्द बनाने में जोड़ने का काम करना पड़ता है। तुम देखोगे कि अभिनय के जरिए शब्दों की प्रकृति को समझ पाओगे।
नाक, कान, आंख जैसे शब्दों को साथ मिल कर बनाने के बाद उस शब्द के स्वभाव को प्ले कर के दिखाओ। जैसे उपर शब्द लिखे गए हैं। नाक कहां हैं, कान कहां है उसे दिखाते हुए ग्रुप में उसके नेचर को अभिव्यक्त करेंगे। तुम देखोगे कि इस तरह से अभिनय के जरिए तुम्हारे पास बहुत सारे शब्द बिना याद किए आ गए।


Friday, July 18, 2014

बच्चों को कहानी कैसे सुनाई व पढ़ाई जाए


प्रारंम्भिक कक्षाओं में बच्चों को कहानी कैसे सुनाई व पढ़ाई जाए इसको लेकर कई बार शिक्षक मित्र उलझन में रहते हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए यह प्रयास किया गया है। 

Tuesday, July 15, 2014

प्रदर्शनी की तैयारी ऐसे करो


कौशलेंद्र प्रपन्न
तुम सभी चाहते हो न कि जो तुम लिखो, पेंटिंग बनाओ या कोई नई चीज बनाओ उसे सभी बच्चे देखें। जो आपकी क्लास रूप में न हो। ऐसी जगह पर हो जहां हर कोई देख सके। वह जगह तुम्हारे क्लास रूम के बाहर की दीवार हो सकती है। मगर सवाल यह उठता है कि आखिर वह क्या है?
वह है प्रदर्शनी। एक्जीब्यूशन का नाम तो सुना ही होगा। बड़े बड़े कलाकार, लेखक, पेंटर आदि अपनी पेंटिंग, चित्रों, व अन्य चीजों को सुंदर ढंग से सजा कर किसी कैन्वस या डिशप्ले बोर्ड पर चिपका या टैग कर लगाते हैं।
बड़े बड़े कलाकार अपनी कलाकृतियों को एक जगह चिपका कर उसे बोर्ड पर प्रदर्शित करते हैं। जिसे देखने वाले उनके कामों को एक जगह पर देख पाते हैं। तुम्हारे स्कूल में भी इस तरह की प्रदर्शनी लगती होंगी। कभी स्कूल में तुम्हारे आर्ट के टीचर अपनी व दूसरे बच्चों की बनाई पेंटिंग की प्रदर्शनी लगाते होंगे।
तुम भी अपनी कक्षा के दूसरे बच्चों की बनाई पेंटिंग, कविता, कहानी या जानकारी व सूचनापरक लेखों वाली प्रदर्शनी लगा सकते हो। इसके लिए तुम्हें अपनी कक्षा के टीचर से अनुमति लेनी होगी कि तुम लोग इस तरह की प्रदर्शनी लगा सकते हो। एक बार आदेश मिल जाने के बाद तुम अपने क्लास के बाकी बच्चों के बनाए चित्रों, कविताओं, आदि को मिलाकर एक प्रदर्शनी लगा सकते हो।
इस प्रदर्शनी को लगाने के लिए तुम्हें जो जरूरी चीजें चाहिए वह यही हैं कि आर्ट पेपर, मारकर, मोटे लिखने वाले पेन, रंगीन पेंसिलें आदि। ताकि इनकी मदद से तुम अपने चित्रों, कविताओं आदि को सुंदर ढंग से लिखकर चटकीलें रंगों से सजा कर अलग अलग रंगों के चार्ट पेपर पर लिख सको।
यह काम अकेले करने की बजाए अपनी कक्षा के दूसरे बच्चों की मदद लेनी चाहिए। अकेले क्या क्या करोगे। इसलिए दूसरे बच्चों को भी इसमें शामिल करो। उन्हें भी मजा आएगा और तुम्हें मदद भी मिल जाएगी। तो चलो एक प्रदर्शनी तुम्हारी तैयार हो गई।

Thursday, July 10, 2014

प्राथमिक कक्षा में भाषा शिक्षण की चुनौतियां


 प्राथमिक स्तर पर जिन चुनौतियों से शिक्षक दो चार होते हैं वे न केवल भाषायी छटाओं, बरतने और व्याकरणिक कोटियों की होती हैं बल्कि भाषा को बच्चे में कैसे सुरूचिपूर्ण ढंग से पढ़ाएं बड़ी और कठिन होती हैं। काॅलेज या विश्वविद्यालय स्तर पर छात्रों के पास भाषा की एक लंबी थाती होती है जिसके साथ वे एक लंबा सफर तय कर के आते हैं। इसलिए उनके साथ भाषा की कठिन और सृजनात्मक स्तर पर न केवल संवाद स्थापित करना सहज होता है बल्कि उनसे उम्मींद की जाती है कि वे स्वयं स्वतंत्र रूप से लेखन-सृजन कर सकें। सवाल यह उठाता है कि बच्चों में भाषा के प्रति कैसे रूझान पैदा करें। प्राथमिक कक्षाओं में पढ़ने वाले बच्चों के लिए भाषा शिक्षण की कौन सी विधि अपनाई जाए, इसपर विस्तार से विमर्श करने की आवश्यता है। साथ ही भाषा शिक्षण को रूचिकर बनाने के लिए कक्षा व कक्षा के बाहर किस प्रकार की गतिविधियों को शामिल किया जाए ताकि बच्चे आनंद लेते हुए भाषा सीख पाएं। इस दृष्टि के शिक्षा शास्त्र एवं शिक्षा शिक्षण कार्यक्रमों पर ध्यान देना होगा। इतना ही नहीं बल्कि पाठ्यचर्या एवं पाठ्यक्रम निर्माण के दौरान ही ऐसी गुंजाइश पैदा करनी होगी कि अध्यापक कक्षा में भाषा शिक्षण करते वक्त उनका इस्तेमाल कर सके। इस लिहाज से नेशनल करिकूलम फ्रेमवर्क 2005 पर नजर डालना गलत न होगा। एनसीएफ 2005 भाषा शिक्षण को लेकर ख़ासे संजीदा है। भाषा शिक्षण उसकी नजर में महज वर्णमालाएं याद करा देना व व्याकरण की विभिन्न कोटियों से परिचय करा देना नहीं है। बल्कि एनसीएफ 2005 की कोशिश है कि भाषा शिक्षण व भाषा की कक्षा में बच्चों को सृजनशीलता और कल्पना की पूरी छूट मिले। छूट इस बात की भी मिले कि वो यदि गलत उच्चारण करते हैं तो भी उन्हें न तो पीटा जाए और न ही कक्षा में उनका मजाक बनाया जाए। लेकिन अमूमन होता बिल्कुल उलट है। क्योंकि भाषा के शिक्षक जिस तरह की भाषायी शिक्षण की तालीम लेकर आते हैं वह उन्हें इसकी इज़ाजत नहीं देती कि जब बच्चा गलती करे या गलत उच्चारण करे तो उसे टोकने की बजाए अभिव्यक्ति के सहज प्रकटीकरण के तौर पर ले। गौरतलब है कि भाषा को बरतने से लेकर शिक्षण की प्रक्रिया तक उदार और नए प्रविधियों को अपनाने की मानसिक स्तर पर छूट मिलनी चाहिए। इसके साथ ही प्रशासनिक स्तर पर ज्यादा टोका टाकी से यदि निजात मिल सके तो निश्चित ही भाषा की कक्षा जीवंत हो उठेगी।
पिछले सालों में सरकारी प्राथमिक स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की भाषा और गणित की गुणवत्ता को लेकर काफी रिपोर्ट और सर्वे सामने आ चुकी हैं। उन तमाम रिपोर्ट पर नजर डालें तो पाएंगे कि उन रिपोर्टांे में यह तो दिखाया गया है कि 6 ठी व 8 वीं कक्षा में पढ़ने वाले बच्चों को एक पंक्ति भी लिखने पढ़ने की क्षमता नहीं है। वे बच्चे सिर्फ कक्षा तो पार कर गए लेकिन भाषा, गणित आदि विषयों में वह गुणवत्ता नहीं हासिल कर सके। इसके पीछे की वजहों में हमने सीधे-सीधे अध्यापकों की क्षमता और व्यवस्था की कमी का ठिकरा फोड़ दिया। इस प्रक्रिया में हमने सिविल सोसायटी की जिम्मेदारी को एक सिरे से नकार दिया। हमने वयैक्तिक प्रयास को भी तवज्जो न देना प्रकारांतर से शिक्षण एवं भाषा को लेकर सरलीकरण ही कह सकते हैं। जबकि होना यह चाहिए था कि वर्तमान स्थितियों और संसाधनों के बीच कैसे वह कोना और अवसर मुहैया कर सकें जहां सरकारी स्कूलों में भाषा और अन्य विषय पढ़ाने की परिस्थिति पैदा हो सकें। इस दृष्टि से हमें सरकार के साथ ही समाज के सभ्य और शिक्षित समाज की सहभागिता भी सुनिश्चत की जाए। सरकार व व्यवस्था की अपनी सीमाएं हैं लेकिन क्या इन तर्कांे और कारणों को मान कर सरकारी स्कूलों में शिक्षण की स्थिति को भगवान भरोसे छोड़ दिया जाए।
सरकार की हंैड होल्डिंग के लिए सिविल सोसायटी संस्थाएं आगे आ रही हैं। इसे जनसहभागिता कह सकते हैं। इस पीपीपी को एक बारगी कोसने की बजाए उसकी पहलकदमियों और व्यापक प्रभावों पर भी ठहर कर विमर्श करने की आवश्यकता है। प्राथमिक शिक्षा की बेहतरी के लिए आज विभिन्न गैर सरकारी संस्थाएं हाथ बढ़ा रही हैं। कंपोरेट सामाजिक जिम्मेदारी यानी सीएसआर के तहत कई कंपनियां प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता को सुधारने के लिए सरकारी स्कूलों को सहभागिता के तहत अपना रही हैं। टेक महिंद्रा फाउंडेशन की ओर से पूर्व दिल्ली नगर निगम के सभी 400 स्कूलों में सरकार के साथ साझा कार्यक्रम चल रहा है। इन स्कूलों में शिक्षक की भाषा क्षमता, गणित शिक्षण, अंगरेजी शिक्षण को लेकर उनकी दक्षता और क्षमता विकास के लिए प्रशिक्षण कार्यशालाओं का आयोजन कर रहा है। पिछले एक सालों में ऐसे 150 स्कूलों के शिक्षकों को प्रशिक्षित किया जा चुका है। वहीं आने वाले दिनों में कम से कम 5000 शिक्षकों की व्यावसायिक विकास और शिक्षण कौशल विकास का जिम्मा उठाया है। इसी तरह कई अन्य गैर सरकारी संस्थाएं प्राथमिक शिक्षा में गुणवत्ता को लेकर हैड होल्डिंग कर रहे हैं। सरकारी स्कूलों के शिक्षकों की अवधारणात्मक और विषय के साथ शिक्षण कौशल में दक्षता मुहैया कराने के प्रयास कई स्तरों पर एक साथ चल रहे हैं। उन्हें एकबारगी आलोचना करने की बजाए उसकी सकारात्मक पक्ष को स्वीकारना चाहिए। टेक महिंद्रा के इन सर्विस टीचर एजूकेशन संस्था के प्रोजेक्ट मैनेजर साजि़द अली कहते हैं कि हम अगले दो सालों में पहले तो इन शिक्षकों में शैक्षिक जिम्मेदारी का एहसास पैदा करेंगे। उसके बाद उनकी बुनियादी जरूरतों शैक्षणिक संदर्भ में को पूरा कर सकें। उसके बाद हमारा ध्यान शिक्षकों के बीच गहरे पैठ चुकी इस धारणा को तोड़ना कि तमाम प्रशिक्षण कार्यशालाएं महज समय काटने के जरिए हैं। यहां ऐसे कोई भी कौशल विकसित नहीं कराया जाता। जब इनमें इस पूर्वग्रह को तोड़ पाएंगे तब हम उन्हें विषय और शिक्षण को बेहतर कैसे बनाया जाए को लेकर विषय विशेषज्ञों के द्वारा प्रशिक्षण कार्यशालाएं प्रदान करेंगे। उसके बाद यह आकलन करना हमारे लिए चुनौती है कि क्या वे शिक्षक कार्यशाला में सीखे हुए कौशलों का इस्तेाल अपनी कक्षा में कर रहे हैं? यदि नहीं तो उसके लिए हम और कैसे उनकी प्रवृत्ति में बदलाव ला सकते हैं।
हम वापस अपने विषय पर लौटते हैं कि प्राथमिक कक्षा में भाषा शिक्षण कैसे करें ताकि बच्चे न केवल भाषा की तमीज सीखें बल्कि भाषा के बहुआयामों से भी परिचित हो सकें। भाषा शिक्षण में बच्चों की सहभागिता कैसे सुनिश्चित की जाए इस पर भी शैक्षणिक विमर्श की आवश्यकता है। प्राथमिक कक्षा में भाषा शिक्षण में गतिविधियों को शामिल कर भाषा की कक्षा रोचक बना सकते हैं। पहले तो हमें भाषा शिक्षण की बुनियादी संरचना पर भी चर्चा करना अपेक्षित है। हमें इस पर भी ध्यान देना होगा कि विभिन्न गतिविधियों और शिक्षा प्रशिक्षण संस्थाओं में किस तरह की विधियां प्रयोग में लाई जा रही हैं। प्राथमिक स्तर पर ध्वनियों को सुनने, बोलने, लिखने आदि के अभ्यासों के जरिए बच्चों में भाषा शिक्षण किया जाए। यह तरीका खासे प्रयोग में लाया जाता है। पहले बच्चों को ध्वनियों को सुनने का अभ्यास कराना होगा फिर बच्चे उन सुने हुए स्वरों का नकल करें उनसे बोलने का अभ्यास कराया जाए। कक्षा में बोलने और सुनने की गतिविधियों का बारंबार अभ्यास कराने से बच्चों में ध्वनियां जब स्थान बना लेती हैं तब बच्चों से चित्र देख कर ध्वनियों और चित्रों के बीच संबंध स्थापित कराने में बच्चों की मदद करना भाषा शिक्षण में मददगार साबित होेते हैं।
बोलने और सुनने की दक्षता जब बच्चों में आए जाए तब उनसे चित्र देख कर व्याख्या करने यानी भाषा के इस्तेमाल करने में शब्दों की संपदा को प्रयोग करना सीखाना चाहिए। शिक्षा शास्त्र भाषा शिक्षण में हमारी मदद इस रूप में करती है कि भाषा को लिखने का कौशल बहुत बाद में कराना चाहिए। यानी 3-6 आयु वर्ग के बच्चों में घिसना, रगड़ना, कलाई पर नियंत्रण पैदा करना शिक्षक का लक्ष्य होता है। जब बच्चे की कलाई में मजबूती आ जाती है तब कलाई और आंखों के बीच समायोजन बनाना सिखाया जाता है। भाषा शिक्षण में अव्वल तो लिखने के कौशल पर ज्यादा जोर होता है। जबकि यह शिक्षा शास्त्र की दृष्टि से उचित नहीं है। हालांकि इस कौशल के विकास को लेकर अभिभावकों की ओर से भी शिक्षकों पर दबाव होता है। अभिभावकों के साथ ही शिक्षकों में भी यही धारणा गहरे बैठी होती है कि बच्चे को लिखना आना चाहिए। जबकि लिखने के लिए छोटे बच्चे में इससे पूर्व अपने स्थूल अंगों पर नियंत्रण आना जरूरी है।
समग्रता में देखें तो प्राथमिक कक्षाओं में भाषा शिक्षण को लेकर कई स्तरों पर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। जिसमें स्वयं शिक्षक की पूर्वधारणाएं, अभिभावकों की ओर से लेखन पर जोर एवं भाषा शिक्षण की पारंपरिक तरीकों के साथ कैसे समायोजन स्थापित किया जाए। इन्हीं परिस्थितियों में हम शिक्षकों और बच्चों की भाषायी कौशलों, दक्षता का अवलोकन और मूल्यांकन भी जिस आनन फानन में करते हैं उसमें कमियों का छूट जाना मानवीय भूल है। लेकिन यहां ध्यान देने की बात यह है कि बजाए शिक्षकों पर आरोप लगाने के हम क्यों न शिक्षकों की दक्षता और कौशल विकास पर उनकी मदद करें।

Monday, June 30, 2014

आओ किताब बनाएं


कौशलेंद्र प्रपन्न
क्यों न हम आज एक किताब बनाएं। कैसे बनाएंगे किताब? यह सवाल तुम्हारे मन में उठ रहा होगा। बहुत आसान है किताब बनाना। अलग अलग पन्नों को गूंथ कर या चिपका कर अपने लिए एक किताब बनाएंगे। पहले कई सारे पन्ने ले लो। उन पन्नों को बीच से मोड़ दो। इस तरह से आमने सामने खुलने वाली एक किताब तैयार होगी।
पुस्तक,किताब,ग्रंथ,बुक और भी कई नामों से हम लोग किताब को जानते हैं। पुस्तक का पुस्त यानी चमड़ा से बना है। पहले हम लोग चमड़े को सूखा कर उसपर लिखा करते थे। अलग अलग जैसे कागज पर लिखते थे उसी तरह से चमड़े पर लिखते थे। खुले होने की वजह से बिखरने का डर होता था। इसलिए इन्हें धागे, रस्सी आदि से बांध देते थे। वे तब आज जैसी किताबें देखते हैं उसी तरह पहले चमड़े की किताब बन जाती थी। उसी तरह ग्रंथ का मतलब हुआ गूंथना। अलग अलग कागजों, चमड़ों, ताड़ के पत्तों को एक धागे में गूंथ लिया करते थे। इस तरह से एक मुकम्मल किताब बन जाती थी। तुमने किताब तो देखी ही है।
किताब मंे क्या लिखेंगे या होगा। इसे तो तुम लोग खुद तय कर सकते हो। चलो आज हम एक कहानी की किताब बनाते हैं। इस किताब में दादी,नानी या मम्मी से सुनी कहानियों को सुंदर अक्षरों में लिखेंगे। जैसे प्रेमचंद की कहानी ईदगाह। तुम सबों ने पढ़ी होगी। इस कहानी में एक हासिद होता है। उसके कुछ दोस्त होते हैं। एक दादी होती है। बच्चे बाजार जाते हैं। वहां मेले में सभी कुछ न कुछ खिलौने खरीदते हैं। यह एक दृश्य हुआ मेले का। हम लो इस कहानी में चित्र भी देंगे। चित्र मेले की होगी। जहां जलेबी, गोल गप्पे, मिट्टी के खिलौने, मिठाइयां बेचने वाले होंगे। तुम्हीं में से कोई एक चित्र बनाएंगा। अब जब चित्र बन जाए तो हम कहानी के बीच में उस चित्र को चिपका देंगे।
तुम कोई और भी कहानी ले सकते हो। या कविता,चुटकुले की भी किताब बना सकते हो। इस किताब में तुमलोगों को जो कविता, चुटकुले याद हों उसे अपनी सुंदर लिखाई में लिख लो। हर पन्ने को सजाने का जिम्मा भी तुम्ही लोगों का होगा। देखा बन गई न एक सुंदर सी किताब। अब इसे अपनी क्लास में दूसरे दोस्तों को भी बांटो उन्हें भी पढ़ने में मजा आएगा।

Friday, June 13, 2014

पढ़ना और समझना


कौशलेंद्र प्रपन्न
वर्णों की पहचान क्या पढ़ना है? या वर्णों को बोल लेना पढ़ना है? यदि गहराई से सोचें तो शायद हम इसे पढ़ना नहीं मानेंगे। यह वर्णों की पहचान व आकृतियों को देखने की आदत तो हो सकती है, लेकिन पढ़ने एवं समझने की श्रेणी में नहीं गिन सकते। अफसोस की बात है कि जब हम बच्चों की भाषायी समझ का आकलन करते हैं तब हमारा ध्यान इन्हीं कौशलों पर होता है। बच्चे किन किन शब्दों को ठीक से बोल, लिख और पढ़ लेते हैं। किन शब्दों को लिखने बोलने और पढ़ने में गलतियां कीं आदि आकलन के मुख्य बिंदु होते हैं। जबकि भाषा के कौशल व भाषायी समझ कहती है कि बच्चे की भाषायी दक्षता की परीक्षा कुछ वर्णों को रट कर सुना देने व पढ़ देने से नहीं की जा सकती। भाषा शिक्षण में बुनियादी खामियों पर नजर डालें तो यह समझना आसान हो जाएगा कि बच्चे क्यों नहीं पढ़ पाते? बच्चे इसलिए नहीं पढ़ पाते, क्योंकि उन्हें हम सबसे पहले लिखने और पढ़ने पर ज्यादा जोर देते हैं। जबकि होना यह चाहिए कि पहले ध्वनियों को सुनने की आदत उनमें विकसित करें। जब बच्चे ध्वनियों को सुनने में सक्षम हो जाएंगे तब वो उन ध्वनियों की नकल करना शुरू करेंगे और फिर बोलना शुरू करते हैं। लेकिन हमारी कोशिश और जोर लिखने पर ज्यादा होती है। इसलिए बच्चे सुनने से पहले लिखने के चक्कर में बाकी के भाषायी कौशल में पिछड़ते चले जाते हैं।
विभिन्न सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं की ओर से कराए गए सर्वे की रिपोर्ट पर नजर डालें तो पाएंगे कि उनका आकलन का औजार बच्चों में यह जांचना था कि बच्चा शब्दों को पढ़ पाता है या नहीं। उनका ध्यान इस बात पर था कि बच्चा लिख पाता है या नहीं? आकलन के चेक लिस्ट में शामिल यह होना चाहिए था कि बच्चा ध्वनियों को सुनकर पहचान और अंतर कर पाता है या नहीं। बच्चा चित्रों को देखकर उस पर कुछ वाक्य बोल पाता है या नहीं। आकलन के पैमाने पर हमारे सरकारी स्कूलों के बच्चे फिसलते हुए दिखाए गए। यह तो होना ही था क्योंकि इन बच्चों को जिन अध्यापकों से भाषा की तालीम मिलती है वो भी ऐसे ही स्कूलों से निकल कर आए हैं जहां भाषायी कौशल में वर्णों को पढ़ना और उन्हें लिखने के कौशल तक महदूद रखा गया।
यदि बच्चे लिखे हुए वर्ण व वाक्य नहीं पढ़ पाते तो इसमें उनकी कमी नहीं बल्कि दोष हमारा है कि हम उन्हें भाषा सीखने-सिखाने का माहौल और सही तरीके से सीखा पाने में पिछड़े हुए हैं। भाषा शिक्षण में यदि वर्ण मालाओं को रट लेने पर जोर दिया जाता है तो यह भाषा कौशल तो विकसित नहीं कर सकता बल्कि रटने की परंपरा विकसित करना है। अब सवाल यह उठता है कि वर्णों की पहचान कराया कैसे जाए। जब वर्णों की पहचान हो जाए फिर दूसरा चरण क्या हो।
वर्णों को पढ़ाने से पहले ध्वनियों की पहचान और सुनकर विभिन्न उन ध्वनियों में अंतर करने की क्षमता विकसित की जाए। मसलन इ और ई, उ और बड़ा उ, ए और ऐ की ध्वनियों में अंतर करना बच्चों को सीखाया जाए फिर हमें शब्द निर्माण और वाक्य संरचना में बहुत मेहनत नहंी करनी पड़ेगी। लेकिन हमें सीखाने की इतनी जल्दबाजी होती है कि हम चाहते हैं कि बच्चा जितना जल्द हो सके वह लिखना-बोलना और पढ़ना सीख जाए। जबकि पढ़ना एक व्यापक प्रक्रिया है जिसके लिए पूर्व तैयारी की आवश्यकता पड़ती है। दो पदों, शब्दों में क्या कहने की कोशिश की गई है इसे पढ़ने और पढ़कर समझने की समझ विकसित करना सच्चे अर्थाें में पढ़ना और समझना है। वरना हर वर्ण हर शब्द लिख देना क्या भाषायी तमीज दे सकती है? संभवतः महज शब्दों को उच्चरित कर देना भी भाषा दक्षता की एक छटा है।
पढ़ना और समझना दोनों ही दो अलग अलग कौशल और अभ्यास की मांग करते हैं। बच्चों में पढ़ने के कौशल विकसित करने के लिए नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क 2005 बड़ी शिद्दत से रूपरेखा प्रस्तुत करती है। इसी के आधार पर रिमझिम किताब को तैयार किया गया। इसमें भाषा शिक्षण के तौर तरीकों पर तो काम किया ही गया है साथ ही भाषा शिक्षण को प्राथमिक स्तर पर कैसे रोचक और आनंदपूर्ण बनाया जाए इस पर भी जोर देता है। यदि रिमझिम किताब को देखें तो इसमें भाषा की कक्षा को रोचक और प्रभावी बनाने के लिए विभिन्न कक्षायी गतिविधियों को शामिल किया गया। इन गतिविधियों के मार्फत शिक्षक बच्चों को बड़ी सहजता से आनंद पूर्वक भाषा शिक्षण कर सकता है। बच्चों को भी उन गतिविधियों में मजा आएगा और भाषा के विभिन्न कौशलों को हासिल भी कर सकेंगे। बच्चों में लिखे हुए शब्द और वाक्यों को पढ़ने और समझने के कौशलों को बढ़ाने के लिए जिन गतिविधियों को शामिल किया गया है यदि उनका इस्तेमाल कक्षा में किया जाए तो परिणाम सकारात्मक निकल कर आएंगे। फिर यह शिकायत जाती रहेगी कि बच्चे को पढ़ना-लिखना नहीं आता।
पढ़ने-लिखने से यह अपेक्षा करना कि बच्चा बोर्ड पर लिखे शब्दों को पढ़ कर सुना दे यह ज्यादती होगी। क्योंकि यदि बच्चा चित्र बनाकर या रेखाएं खींचकर अपने भावों को अभिव्यक्त कर रहा है तो उसे भी स्वीकारना हमें आना होगा। बच्चों की प्रकृति होती है कि वो छोटे में लिखने के नाम पर आड़ी तिरछी रेखाओं और आकृतियों से दिवारों को रंग देते हैं। वो अपने परिवेश को भी बरीकि से निरीक्षण करते हैं यही वजह है कि उनकी अभिव्यक्ति में बस, पेड़, रेल, पहाड़, चिडि़यां आदि जिंदा रहती है। हमें बस यह करना चाहिए कि हम उन्हें उनकी कलाई पर नियंत्रण करना सीखाएं। हम उन्हें कलाई,आंखों और पेंसिल के बीच सामंजस्य स्थापित करना सिखाएं। यह आरंम्भिक तैयारियां हैं जब बच्चा लिखना और पढ़ना शुरू करता है।


Tuesday, May 13, 2014

बाॅस की प्रकृति


कौशलेंद्र प्रपन्न
मैं ही क्या दुनिया के हज़ारों- हज़ार लोग अपने बाॅस की प्रकृति से न केवल प्रभावित होते हैं बल्कि त्रस्त भी होते हैं। कुछ के बाॅस जीवन में प्रेरक बन कर आते हैं तो कुछ की जिं़दगी में सुनामी बन कर। बाॅस राय, वर्मा, शर्मा, जुनेजा, तनेजा, तिवारी, कपूर और भी अन्य उपनाम के रूप में हो सकते हैं। तत्वत: बाॅस की प्रकृति में कोई ख़ास अंतर नहीं होता। क्योंकि स्वभावतः बाॅस अपने नीचे काम करने वाले को गोया इंसान ही नहीं मानते। यदि बाॅस रात के 1 बजे काॅल करे तो भी काम होना चाहिए। उनके घर के काम भी हंस हंस के जो करे वो सबसे ज्यादा करीब होता है। स्वभाविक भी है जो हर वक्त बाॅस के आस-पास टघरता है वो बाॅस को कैसे नहीं याद रहेगा। वैसे कहा जाता है कि घोड़े के पिछाड़ी और बाॅस के अगाड़ी कभी नहीं आना चाहिए, लेकिन आज की तारीख में कई ऐसे महारथी हैं जो बाॅस की कृपा से कहां से कहां पहुंच चुके हैं। कुछ करिअर में उछाल का आनंद ले रहे हैं जो कुछ जाॅब से भी हाथ धो चुके हैं। कई के बाॅस अपनी आॅख की किरकिरी को कहीं और भी टिकने नहीं देते।
बाॅस दरअसल नेता होता है। नेता माने नयति इति नेता। जो सदा सर्वदा आगे ले जाने वाला हो। यानी नेता व बाॅस वो होता है जो समाज को रास्ता दिखाए और आगे ले जाए। यदि नेता की दृष्टि स्पष्ट न हो या पूर्वग्रह का शिकार हो जाए तो उस कंपनी व संस्था के साथ ही वहां काम करने वाले अन्य कर्मचारियों के लिए लाभकरी नहीं माना जा सकता। मैनेजमेंट के छात्र व वेत्ता बेहतर बता सकते हैं कि एक बाॅस की प्रकृति यानी उसका स्वभाव किस तरह से न केवल बाॅस के लिए बल्कि संस्था के लिए भी हानिकारक साबित होता है। बतौर बाॅस की अपनी कुछ सनकें भी होती हैं। वो अपने ज्ञान, समझ, कौशल के आगे अपने अंदर काम करने वालों को ज़रा भी तवज्जो नहीं देता। बल्कि कई बार अपनी गलती को न वो स्वीकारता है और न वह नवज्ञान से खुद को ताज़ा करता है। क्योंकि ऐसा करने से उसका अहम उसे रोकता है। और इस तरह से ख़ुद को सही साबित करने के उपक्रम में अपने अंदर काम करने वाले को गलत साबित करने के तमाम हथकंड़े अपनाता है।
बाॅस की प्रकृति कैसी हो, एक बाॅस के अंदर किस किस तरह के गुण होने चाहिए आदि सवालों का जवाब तो मैनेजमेंट के जानकार दे सकते हैं, लेकिन एक आम धारणा की दृष्टि से देखें तो बाॅस की क्लालिटी कंपनी को बेहतर ढंग से चलाने की होनी चाहिए। प्रबंधन के तमाम गुर उसे आना चाहिए कब किसी की भावना को सहलाना है, कब किस के साथ सख्ती बरतनी है? किस के साथ कब कैसे बर्ताव करना है आदि ऐसी बुनियादी मांगें होती हैं जिनपर बाॅस को खरा उतरना चाहिए। लेकिन आज की तारीख में अधिकतर प्रोन्नति, उछाल किन गुणों के आधार पर होते हंै यह किसी से भी छुपा नहीं है। जब कोई बाॅस की नजरों में चढ़ जाता है या पसंद आ जाता है तब बाॅस जो कुछ भी करता है वही नियम बन जाते हैं। वही सही होता है।
हां समाज में देखा जाता है कि बाॅस कई बार आत्महत्या करने पर भी मजबूर कर देता है। व्यक्ति मानसिक रूप से इतना परेशान हो जाता है कि वह आत्महत्या तक सोचने लगता है। यह किसी भी नजर से न तो मानवीय है और न उचित ही। लेकिन आम जीवन में बाॅस ऐसे भी आते हैं कि आप न तो आॅफिस में चैन से काम कर सकते हैं और न घर में सुस्ता सकते हैं। नींद में भी बाॅस की बातें, ताने और चेहरे आपको सोन नहीं देते। एक बार बाॅस की नजर में आप नकारे हो गए तो लाख कोशिश कर लें वह आपको उसी चश्में देखता है। दरअसल बाॅस वह कुर्सी होती है जिसपर सबकी आशा भरी निगाह लगी होती है। वह चाहे सकारात्मक हो या नकारात्मक। कब बाॅस बदले की हम अपनी तरह से काम करें। अपनी फाइल आगे बढ़ाएं आदि उम्मींदें कितनों की पूरी होती हैं यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि आने वाला बाॅस किस पाले है।
सचपूछा जाए तो बाॅस की कुर्सी पर बैठना कोई आसान काम नहीं होता। पहले तो बाॅस की कुर्सी के लायक खुद को साबित करना पड़ता है और फिर सब को खुश रखने की चुनौती से भी सामना करना पड़ता है। सच तो यह भी है कि कुर्सी कभी भी सभी को खुश नहीं रख सकती। लेकिन इन्हीं चुनौतयों के बीच एक मकूल रास्ता भी निकलता है कि कैसे आप मानवीय रहते हुए अपनी बाॅसीय प्रकृति को जीते रहें। यानी कंपनी, आफिस काम भी चलता रहे और आप किसी की जिंदगी को नर्क बनाने से बचें। क्योंकि एक खराब बाॅस न केवल एक की जिंदगी को प्रभावित करता है कि बल्कि प्रकारांतर से उसके साथ परिवार, मित्र और समाज को भी खासे चपेट में लेता है। एक बार यदि बाॅस इन बिंदुओं पर सोचों तो शायद उनकी आंखें खुलें।

तो यूं होती है कविता


तो यूं होती है कविता
 कहती है कोई कहानी
आपकी हमारी,
उस जहान की,
इस दुनिया की।
उस कविता में होती है एक कहानी-
एक उपन्यास सा वितान,
या कि भावों की एक लंबी चादर,
जिसमें गूंथते जाते हैं चांद तारों को बेहिसाब,
कविता यूं आगे बढ़ती है।
कविता में जीती है एक लड़की-
उसकी बातें,
उसकी हंसी,
उसके बैठने,
बोलने की आदतें
सब कुछ शामिल होती है उस कविता में।
उस कविता में होती है एक शाम-
शाम में मिले एहसासों की उष्मा,
शाम की हवा जिसमें उसकी बातें तैरती हैं
होती हैं वो तमाम बातें जो अभी अभी कानों से दिल में उतर गई हैं।
हां कविता में लेती है सांस-
हमारी हर जीए हुए पलों की,
जिसमें शामिल होती मां की डांट,
पिताजी के लाए तरबूज की लाली,
भाई का तमाचा या फिर बहन की लड़ाई,
सब कुछ तो होती हैं एक कविता में।
भावों के उतर चढ़ के साथ और क्या होती है कविता में भाई साहब-
कविता में अतीत की सुगबुगाहट,
वर्तमान की चुनौतियां,
भविष्य की ओर तकती आशाएं,
सभी तो जीते हैं अपनी उम्र,
फिर क्या छूटता जाता है एक कविता में?
हां छूट जाती हैं
चंद मनुहार की बातें,
उससे सुनी झाड़कियां,
या फिर सुबकती उस रात की बातें,
या फिर रह जाती हैं,
कुछ किए वायदे,
कुछ तारीखें।


Friday, April 18, 2014

संविधान की नजर में इंसान हैं किन्नर



कौशलेंद्र प्रपन्न
‘वेलकम टू सज्जनपुर’ फिल्म बड़ी ही शिद्दत से किन्नरों की सामाजिक स्थिति पर विमर्श करती है। इस फिल्म का किन्नर चुनाव में खड़ा होता है, लेकिन समाज के बाहुबली वर्ग के आगे उसकी एक नहीं चलती। अंत में हार थक कर जिलाधीकारी से अपने संरक्षण की गुहार लगाती है, लेकिन अंत दर्दनाक ही होता है। चुनाव में कई किन्नरों का आगमन हुआ किन्तु वह गिनती में बेहद कम हैं। हाल ही मंे न्यायपालिका के उच्च संस्था ने किन्नरांे को अन्य इंसानों की तरह ही मौलिक अधिकार की ओर सभ्य समाज का ध्यान खींचा। न्यायालय ने आदेश दिया कि केंद्र एवं राज्य सरकारें अपने यहां इनके स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार के अवसर मुहैया कराएं। ध्यान हो कि समाज के तृतीय लिंगी किस तरह से सामजा के विकास के केंद्र से हाशिए पर जीवन बसर करते हैं। किसी से भी छूपा नहीं है कि समाज में कुछ विशेष अवसरों पर इन्हें घर की देहारी पार करने की इजाजत दी जाती है। और उसके बाद उनसे सभ्य समाज का वास्ता किस कदर उपेक्षा, डर और तिरस्कार का होता है। पूरे देश में किन्नरों की संख्या और उनकी माली हालत का जायजा लिया जाए तो आंखों में आंसू उतर पड़ेंगी। किन्नर हमारे समाज के वो अंग हैं जो रहते तो हमारे बीच में ही हैं लेकिन उन्हें समाज और सरकार की कल्याणकारी किसी भी योजना का लाभ न के बराबर मिलता है। यूं तो किन्नर यानी तृतीय लिंगी समाज से हमारा रिश्ता महज बलैया लेने वाले वर्ग का रहा है। लेकिन सभ्य समाज ने उनके कल्याण के लिए ठोस कदम नहीं उठाए। यही वजह है कि ये समाज में तो रहते हैं लेकिन समाज की धड़कन बन कर नहीं बल्कि एक बजबजाते कोने में सिमट कर रहते हैं। इनके प्रति जिस तरह का समाजिकरण हमारे बच्चों में पैदा किया जाता है यही उन्हें देखने-समझने के लिए आजौर के रूप में काम करता है। बचपन से ही इस वर्ग को भय और डर की दृष्टि से देखने का पाठ न केवल स्कूलों बल्कि घर में भी पढ़ाया जाता है। यहां तक कि पाठ्यपुस्तकों, पाठ्यक्रमों व पाठ्यचर्या को उठा कर देख लें कहीं भी इनके बारे में न तो जानकारी दी जाती है और न उन्हें समझने के लिए कोई पाठ का निर्माण ही किया जाता है। हमारी शिक्षा-विमर्श इन्हें गोया इन्हें समझने के योग्य ही नहीं मानती। यही कारण है कि तृतीय लिंगी समाज हमारे शिक्षा-दर्शन, शिक्षा विमर्श से एक सिरे के गायब है। यहां तक कि कहानियों, कविताओं, उपन्यासों की दुनिया भी इन्हें बेहद कम जगह देती है।
तृतीय लिंगी समाज के बारे में यदि कोई जानना या समझ बनाना चाहे भी तो हमारे पास कोई पुख्ता और प्रमाणिक किताब का न होना यह साबित करता है कि यह वर्ग कलमकारों की नजर से भी दूर ही छिटके रहे हैं। यदि पुराऐतिहासिक काल खंड़ों में इनके योगादान व भूमिकाओं को नजर अंदाज कर भी चलें तो आज की तारीख में इन्हें समझने के लिए हमारे पास कोई औजार नहीं है। यदि कोई स्रोत इन्हें समझने के लिए हो सकता है तो ये स्वयं हैं। लेकिन इनके समाज में अंधेरा और रहस्य इस कदर कायम रखा जाता है कि कोइ्र बाहरी इनकी दुनिया में सहज रूप से प्रवेश नहीं कर सकता। इनके गुरुओं की सख्त हियादत रहती है कि अपनी दुनिया के बारे में बाहरी लोगों से कोई बातचीत न की जाए। यदि कोई इस नियम का पालन नहीं करता उसे कठोर दंड़ भुगतना पड़ता है।
  पूरे देश में प्राकृतिक तृतीय लिंगी की संख्या बेहद कम है। जो बहुसंख्य दिखाई देते हैं उनमें से अधिकांश आॅपरेशन के द्वारा बनाए जाते हैं। इसकी भी अपनी कहानी है। यह कहानी बेहद दर्दीली और भयावह होती है। आधी रात में गुरु के संरक्षण में लिंग काटा जाता है। इससे पहले एक जलसे का आयोजन भी किया जाता है जिसमें इस समुदाय के समकक्ष और वयोवृद्ध तृतीय लिंग के लोग शामिल होते हैं। इनका लिंग काट कर एक घड़े में डाल कर पेड़ पर टांग दिया जाता है जब तक कि घाव पूरी तरह से भर न जाए। लिंग छेदन से पूर्व विवाह की तरह ही संस्कार भी किए जाते हैं जिसमें हल्दी लेपन, केले का भोजन आदि। एक प्रकार से उपवास एवं रीति रिवाज के साथ यह कार्य सम्पन्न होता है। यह प्रक्रिया खतरनाक और जोखिम भरा भी होता है। लेकिन इस काम को अंजाम बड़े अनुभवी हाथों से दिए जाते हैं। तृतीय लिंगों की एक ही माता व देवता हैं पूरे देश में जिसे बुचरा माता के नाम से जानते हैं। इनकी माता मुर्गे पर सवार रहती हैं।
हमारे संविधान के धारा 21 और वैश्विक मानवाधिकार घोषणा 1948 के अनुसार इन्हें भी सम्मान से जीने, शिक्षा हासिल करने आदि का हक प्राप्त है। लेकिन वस्तुस्थिति जैसी है उसे देखते हुए बेहद चिंता होती है। जिस प्रकार जीते हैं उसी तरह गुमनामी में मौत भी मयस्सर होता है। मरने के बाद इन्हें खड़कर जूते चप्पलों से पिटते हुए शमशान घाट तक ले जाया जाता है। इन तृतय लिंगी को उनके धर्मानुसार अंतिम विदाई दी जाती है। चप्पलों व जूतों से पीटते हुए ले जाने के पीछे इनका मानना होता है कि अगले जन्म इस रूप में न आना।
संविधान और समाज की बुनावट को एक साथ रख कर देखें तो तृतीय लिंगी समाज में अशिक्षा, बेरोजगारी, स्वास्थ्य आदि कुछ ऐसी बुनियादी समानता है जहां हर नागरिक को मिलना चाहिए। यदि केंद्र व राज्य सरकार इस काम में विफल होती है तो ऐसी स्थिति में न्यायपालिका को कठोर कदम उठाने पड़ते हैं। यही कारण है कि न्यायपालिका ने केंद्र व राज्य सरकारों को आदेश दिया है अपने यहां तृतीय लिंगी को शिक्षा, रोजगार का अधिकार सुनिश्चित करें। यदि इस समाज को शिक्षा के अवसर मिलते हैं तो इस वर्ग में भी विकास और बदलाव संभव हो सकते हैं। वरना जिस तरह से हजारों सालों से जिस पेशे में खुद को गला रहे हैं वह निरंतर चलता रहेगा।
तृतीय लिंगी सभी अशिक्षित हैं ऐसा कहना गलत है। क्योंकि काफी समय पहले दिल्ली के तृतीय लिंगी  पर एक शोध किया था। जिसके दौरान जिस तरह की जानकारी व समझ बनी थी उसे साझा करना अप्रासंगिक न होगा कि दिल्ली के संजय गांधी स्मारके पीछे, जहांगीरपुरी, उत्तम नगर आदि इलाकों में रहने वाले हजारों किन्नरों मंे कई तो ग्रेजूएट, 12 वीं एवं 10 वीं पास थे। लेकिन महज सामाजिक दबाव एवं पारिवारिक उपेक्षा की वजह से इस समाज में शामिल हो गए। आज वो गा-बजा कर और सड़कों पर भीख मांग कर अपना जीवन काट रहे हैं। उनमें भी पढ़ने और शिक्षा के प्रति ललक थी लेकिन समाज के कठोर नियमों और विवश परिवार के सामने इनकी एक न चली। गुरु कटोरी देवी बताती हैं कि मेरे पास आज एक हजार चेले हैं जिनमें अधिकांश ग्रेजूएट हैं वो मेरे पास इस लिए रह रहे हैं क्योंकि उनके अपने परिवार ने उन्हें अस्वीकार कर दिया। आंध्र प्रदेश, बिहार, उड़ीसा आदि राज्यों से आए मेरी बहने और भाई आज एक छत के नीचे सम्मान से जीते हैं। जिन्हें परिवार और समाज दुत्कार देता है उन्हें हम लोग शरण देते हैं। वहीं कनाॅट प्लेस के हनुमान मंदिर के पीछे रहने वाली पूजा बताती/बताता है कि वो बंगाल का रहने वाला है जब स्कूल में मास्टर जी ने उसकी प्रकृति को समझा और उसके बाद उसके साथ गलत आचरण किया तब से वो स्कूल और घर छोड़ कर दिल्ली में अपने समाज में रहने लगा। जहांगीर पुरी के तृतीय लिंगी समाज में पिछले बीस सालों से कमला गुरु हैं उनसे बातचीत अव्वल तो बेहद थकाने वाला था। कई बार उन्होंने बात करने से मना कर दिया लेकिन अंत में हार कर उन्होंने समय दिया। उनकी नाराजगी का बड़ा कारण था मीडिया और इस समाज के लेखक वर्ग। उनका कहना था लोग फोटो खींचते हैं, लेख लिखते हैं और अपनी कमाई तो करते हैं लेकिन हमारी स्थिति सुधरे इसके लिए वो कुछ नहीं करते। हमें नुमाईश का साधन मानते हैं इसलिए मैं बातचीत नहीं करती। मेरे पास बहुत काम है। मुझे चेलों को तैयार करना है।
तृतीय लिंगी का एक बड़ा समाज है और ये लोग संगठित भी हैं। इनका पिछले साल दिल्ली में महासम्मेलन भी हुआ था। जिसमें इस समाज के उत्थान के लिए घोषणा पत्र भी जारी हुआ था। लेकिन वह महज घोषणाएं ही रह गई। याद हो कि दिल्ली में ही दो साल पहले विश्व सुंदरी प्रतियोगिता भी आयोजित की गई थी जिसमें देश भर से किन्नरों ने शिरकत की थी। भला हो मीडिया का कि इसने उस प्रतियोगिता का कवर भी किया था। यदि मीडिया और सभ्य समाज इनके प्रति ज़रा भी संवेदनशील हो जाए तो न्यायपालिका को हाथ लगाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी।

Wednesday, April 16, 2014

हम तृतीय लिंगी



-कौशलेंद्र प्रपन्न
सड़क, डैडी,वेल्कम टू सज्जनपुर जैसी फिल्मों में तृतीय पुरुष की जिस संवेदना और सामाजिक दरकार को चित्रित किया है आज वहां से आगे बढ़कर सांवैधानिक पहल और आदेश से थोड़ी ही सही किन्तु उम्मींद की किरण फुटती है। तृतीय लिंगी इस समुदाय को किन- किन और कैसे- कैसे बर्ताव समाज में सहने और झेलने पड़ते हैं यह किसी से भी छुपा नहीं है। कुछ साल पहले अभिमुख सभागार में नामवर सिंह के साथ एक नाटक ‘जानेमन’ नाटक देखा था। उस नाटक को देखने के बाद नामवर सिंह के आंखों से आंसू टपक पड़े थे। वास्तव में इस नाटक को देखना दरअसल तृतीय लिंगी समाज से रू ब रू होना है। किस प्रकार से इस समाज में भी मठाधीशों का बोलबाला है। इसे भी नकार नहीं सकते। जो जितना प्रभावशाली और चेलों का गुरू है उसकी इस समाज में उतनी ही ज्यादा प्रतिष्ठा और मान-सम्मान है। इनके समाज में भी चेलों की खरीद- फरोख़्त होती है। सवा रुपए से लेकर हजारों और लाखों में नए तृतीय लिंगी को अपना चेला बनाया जाता है।
काफी समय पहले दिल्ली के तृतीय पुरुष पर एक शोध किया था। जिसके दौरान जिस तरह की जानकारी व समझ बनी थी उसे साझा करना अप्रासंगिक न होगा कि इस समाज में जिस तरह के अंधकार और घटाटोप की संस्कृति बरकरार रखी जाती है उसके पीछे मकसद यही होता है कि बाहरी समाज को हमारी संरचनाओं और बुनावट का इल्म न हो सके। कोई भी तृतीय लिंगी अपने समाज की हकीकत बयां नहीं करना चाहता। इसके पीछे डर काम कर रहा होता है। गुरू किसी भी कीमत पर यह इज़ाजत नहीं देता कि उसके चेले बाहरी समाज में यहां की वास्तविकता को साझा करें। लेकिन कुछ अत्यंत प्रताडि़त तृतीय पुरुष मंुह खोल ही देते हैं जिसका ख़ामियाजा उन्हें अपने समाज में भुगतना पड़ता है।
आज देश भर में इस समाज के कल्याण और अधिकार के लिए कुछ स्वयं सेवी संस्थाएं सक्रिय हैं, लेकिन इनकी संख्या बेहद कम है और इस समाज की समस्याएं कहीं ज्यादा। दिल्ली के संजय काॅलोनी, जहांगीरपुरी के क्षेत्र, लक्ष्मी नगर, उत्तम नगर आदि क्षेत्रों में रहने वाले तृतीय लिंगी इसी दिल्ली में रहते हुए कई तरह की जोखि़मों का सामना करते हैं। बहुत कम तृतीय लिंगी हैं जिनकी स्थिति अच्छी है। जिनके पास गाड़ी, पैसे, चेले और जिंदगी के तमाम सुख-साधन हैं। बाकी तो किसी तरह भिखारी के मानिंद ही जिंदगी बसर करते हैं। कोई रेड लाइट पर तो कोई काॅलोनी में मांग कर ही जीवन काटते हैं। जो जवान हैं उनके आय के कई अन्य साधन हैं, लेकिन जो बुढ़े हो चुके हैं उनकी स्थिति शायद कुछ कुछ वैसी ही हो गई जैसे वृद्ध वैश्याओं की। जिन्हें जवान तृतीय लिंगी की कमाई और दया पर जीवन व्यतीत करना पड़ता है।
पूरे देश में प्राकृतिक तृतीय लिंगी की संख्या बेहद कम है। जो बहुसंख्य दिखाई देते हैं उनमें से अधिकांश आॅपरेशन के द्वारा बनाए जाते हैं। इसकी भी अपनी कहानी है। यह कहानी बेहद दर्दीली और भयावह होती है। आधी रात में गुरु के संरक्षण में लिंग काटा जाता है। इससे पहले एक जलसे का आयोजन भी किया जाता है जिसमें इस समुदाय के समकक्ष और वयोवृद्ध तृतीय लिंग के लोग शामिल होते हैं। इनका लिंग काट कर एक घड़े में डाल कर पेड़ पर टांग दिया जाता है जब तक कि घाव पूरी तरह से भर न जाए। लिंग छेदन से पूर्व विवाह की तरह ही संस्कार भी किए जाते हैं जिसमें हल्दी लेपन, केले का भोजन आदि। एक प्रकार से उपवास एवं रीति रिवाज के साथ यह कार्य सम्पन्न होता है। यह प्रक्रिया खतरनाक और जोखिम भरा भी होता है। लेकिन इस काम को अंजाम बड़े अनुभवी हाथों से दिए जाते हैं। तृतीय लिंगों की एक ही माता व देवता हैं पूरे देश में जिसे बुचरा माता के नाम से जानते हैं। इनकी माता मुर्गे पर सवार रहती हैं।
अफसोस की बात है कि हमारे इसी समाज के हिस्सा होने के बावजूद इनकी दुनिया हमारी दुनिया से एकदम कटी और डरावनी बना दी गई है। ताज्जुब की बात तो यह भी है कि कवि, लेखक, कथाकार आदि विभिन्न विषयों पर तो खूब लिखते हैं, लेकिन इनकी दुनिया को कलमबद्ध करने वाले बहुत कम हैं। यदि तृतीय लिंगीय समाज के बारे में प्रमाणिक जानकारी हासिल करनी हो तो आज हमारे पास कोई भी ऐसी किताब नहीं हैं।
हमारे संविधान और वैश्विक मानवाधिकार घोषणा 1948 के अनुसार इन्हें भी सम्मान से जीने, शिक्षा हासिल करने आदि का हक प्राप्त है। लेकिन वस्तुस्थिति जैसी है उसे देखते हुए बेहद चिंता होती है। जिस प्रकार जीते हैं उसी तरह गुमनामी में मौत भी मयस्सर होता है। मरने के बाद इन्हें खड़कर जूते चप्पलों से पिटते हुए शमशान घाट तक ले जाया जाता है। इन तृतय लिंगी को उनके धर्मानुसार अंतिम विदाई दी जाती है। चप्पलों व जूतों से पीटते हुए ले जाने के पीछे इनका मानना होता है कि अगले जन्म इस रूप में न आना।

Monday, April 14, 2014

सोन तुम हो


सोन तुम रहते सदा-
निकल अमरकंटक से सुदूर,
बहते मुझी में हो।
चाहता हूं-
पोंछ दूं,
रगड़कर निशान तेरे,
बदन से मेरे,
मगर तेरी धार,
रहती सदा,
बहती मुझी में।
सोन तुम कहां हो-
देश या विदेश में,
जहां भी रहता,
तेरी धार की शांत शोर,
बजती मुझी में है।
खेलने तेरी ही धार में-
तब तलक,
बसा है मेरी रगों में,
सोचता हूं,
अंतिम यात्रा भी हो खत्म तुम्हीं में।
देखता हूं-
निर्निमेश,
तुम हो ख़ामोश,
शांत और सिकुड़े हुए भी,
मुझे देना बिछौना राख को,
जब मैं आउं तुम्हारे ठौर।

Monday, April 7, 2014

टाइटेनिक डूबने से पहले का मंज़र


रैनबक्शी आज सन फार्मा के हाथों 3.2 मिलियन डाॅलर में बिक गई। इससे पहले मंदी के आस-पास 2008 में रैनबक्शी जापान की कंपनी दाइची के हाथों बिक चुकी है। ज़रा कल्पना कीजिए यहां काम करने वाले कर्मियों की मानसिक स्थिति कैसी होगी। हर कुछ सालों में नए ख़रीददार। कौन कैसे बर्ताव करेगा? कौन रहेगा और कौन बाहर होगा जैसी स्थिति में कोई कैसे पल पल जी रहा होगा।
सभी ने देखा और न केवल तीन घंटे बल्कि फिल्म खत्म होने के बाद भी अश्रुपूरित यादों से निकल नहीं पाता। चारों-तरफ हहाकार, चीखपुकार भागदौड़ सब का एक ही प्रयास अपनी जान कैसे बचा सकें। औरत-मर्द, बच्चे, जीव जंतु सब के सब अपनी जान को बचाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं।
जब कोई कंपनी,उद्योग, संस्था दूसरे के हाथ बिक जाती हैं या बंद होने वाली होती हैं तब कैसी मानसिक स्थिति होती होगी? सब के मालूम हो कि अब हमारे नए आका हैं। कब, किसे, कैसे बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है आदि सवाल सभी कर्मी की पहली प्राथमिकता होती है।
जब बड़ी कंपनी छोटी कंपनी को एक्वायर करती है या फिर मंर्जर होता है तब छोटी कंपनी के कर्मीयों की स्थिति, निर्णय, योजनाओं पर एकबारगी सुनामी सी आ जाती है।

Friday, April 4, 2014

उन्होंने कहा-

उन्होंने कहा-
मेरे लिए लिखो कविता,
लिखा।
उन्होंने कहा-
मेरे लिए लिखो गीत,
लिखा।
जो मांगा-
वो लिखा,
जो लिखा,
वो बिका।
जो नहीं बिका-
उनको इंतज़ार है।
इंतज़ार है-
आएंगे तो,
देंगे कोई....।

Thursday, April 3, 2014

कहने का कौशल


कौशलेन्द्र प्रपन्न
पिछले कुछेक हप्तों व सालों के अनुभव के बरक्स यह कहने की हिमाकत कर सकता हूं कि कहने का कौशल हो तो ख़राब से ख़राब कथ्य भी श्रोताओं को बांधे रख सकता है। वहीं कहने की शैली और कला नहीं है तो अच्छी से अच्छी बातें व कथ्य श्रोताओं को लुभाने और सुनने का आनंद नहीं दे पातीं। वाकया हाल ही का है। पिछले कुछ हप्तों से जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान दिल्ली के आर के पुरम, दरियागंज आदि की ओर से प्रधानाध्यापकों, अध्यापकों एवं स्कूल मैंनेजमेंट समिति के सदस्यों की कैपेसिटी बिल्डिंग प्रशिक्षण कार्यशालाओं में आरटीई एक्ट, एसएमसी और स्कूल डेवलप्मेंट प्लान पर प्रशिक्षण देने को बुलाया गया। जहां उन लोगों से बातचीत करनी थी जो शिक्षा में सालों से काम कर रहे हैं। जिनकी शिक्षा के प्रति एक मजबूत समझ बन चुकी है। उनके बीच शिक्षा की स्थिति, उनकी अपनी जिम्मेदारी, नैतिक बोध आदि पर बातचीत करना कोई आसान काम नहीं था। ख़ासकर उन्हें सुनाना व सुनने के लिए तैयार करना भी एक चुनौति ही थी। एक कक्षा अनुभव को साझा करूं तो माज़रा और साफ हो जाएगा। एक दिन पूर्व एनसीइआरटी से सेवा मुक्त प्रोफेसर साहब ने आरटीई पर कक्षा में बातचीत की थी। दूसरे दिन मुझे उसी कक्षा में एसएमसी और एसडीपी पर बात करनी थी। मैंने कक्षा में पूछा आगे बढ़ने से पहले ज़रा टटोल लिया जाए कि आरटीई के दानें आपकी हांड़ी में कितने पके हैं। मैंने उनसे दस मिनट का समय मांगा कि दस मिनट आप मुझें दें फिर हम आगे की बातचीत शुरू करेंगे। उस दस मिनट में जो समझ सामने निकल कर आई वह निराश ही करने वाली थी। कक्षा में उपस्थित तकरीबन 60 सदस्यों ने एक स्वर में कहा आपने जो दस मिनट में आरटीई पर हमें बताया वह कल के ढाई घंटे पर भारी है। इसी दौरान कल वाले प्रोफेसर साहब आ गए और कक्षा में कहा कि वो कुछ बातें उनकी कल रह गई थी जिसे आज पूरा करना चाहते हैं। पूरी कक्षा एक स्वर में मना करने लगी। आज हम इनसे पढ़ना चाहता हैं। बात किसी तरह निपटी। वो तो चले गए लेकिन मेरे सामने एक बड़ा सवाल और जिज्ञासा छोड़ गए।
यह अनुभव मेरे लिए चुनौती भी थी और पुरस्कार भी। मैंने अपनी जिज्ञासा कक्षा में उछाल दी। आप सभी ने ऐसा क्यों किया? जवाब स्पष्ट था-कल पूरी कक्षा सो रही थी। हमें कुछ भी समझ नहीं आया। लगा हमने अपना समय जाया किया। सिर्फ इधर-उधर की बातों में समय काटा। हम भी शिक्षक हैं हमें पता चल गया कि वो समय पास कर रहे थे। न तो उनकी तैयारी थी और न ही विषय की समझ। उसपर उनका पढ़ाने का तरीका भी बेहद बोरीयत वाला था। आपने जो हमें दस मिनट में जिस शैली और अंदाज़ में बताया हमें लगा कि आपके पास कथ्य भी है और कथ्य को पढ़ाने व कहने का कौशल भी। अब मेरा दूसरा सवाल था-ज़रा कल्पना कीजिए जब आप कक्षा में बतौर अध्यापन कर रहे होते हैं तब यदि ऐसी स्थिति होती होगी तो बच्चे कैसा महसूस करते होंगे? क्या हमें अपनी शैली और कथ्य को जांचने-परखने की आवश्यकता नहीं है? इस संवाद में कक्षा सचमुच जीवंत हो उठी थी। मेरे लिए अब अपने विषय पर लौटना आसान हो गया था।
लब्बोलुआब यह है कि कथानक व कथ्य तो महत्वपूर्ण होते ही हैं। लेकिन यदि उनके साथ बरताव ठीक से न किया जाए जो वह संप्रेषित नहीं हो पातीं। यदि संप्रेषित हो भी जाएं तो श्रोताओं के अंग नहीं पातीं। विषय की समझ और जानकारी होना एक बात है और उसको श्रोताओं तक रोचक तरीके से पहुंचाना दूसरी बात। कहा जाता है कि जरूरी नहीं कि अच्छा लेखक अच्छा वक्ता भी हो। या अच्छा वक्ता अच्छा लेखक भी हो। लेकिन कमाल तो यही है कि यदि इन दोनों कौशलों का संजोग यदि शिक्षक में हो जाए तो वह कक्षा जीवंत हो उठती है। सुनने वाले व सीखने की ललक लिए बैठे श्रोता वर्ग को भी ऐसा नहीं लगता कि उनका समय बेकार गया।
इससे किसी को गुरेज नहीं होगा कि आज की तारीख में किसी को कुछ सुनना कितना कठिन है। सुनने वाले से ज्यादा कहने वाले को चुस्त, चैकन्ना और अपनी शैली मंे दक्ष होना होता है। तभी किसी को सुनने के प्रति मजबूर किया जा सकता है। सुनने के नाम पर हम गाने सुन लेते हैं। वहां हमारे पास चुनाव करने की आज़ादी होती है। नहीं पसंद आया तो गाने बदल सकते हैं। ठीक उसी तरह सुनने वाले के पास इस की भी गुंजाईश हो कि वह वक्ता बदल दे। मगर शिक्षण- प्रशिक्षण के दौरान इस बात की उम्मींद बहुत कमजोर होती है। ख़ासकर कक्षाओं में। किसी अध्यापक को दूसरी कक्षा में तो भेजा जा सकता है। लेकिन स्थानांतरण इसका स्थाई समाधान नहीं हो सकता। एक शिक्षक को यदि एक कक्षा में बच्चों ने सुनने व पढ़ने से मना कर दिया तो क्या दूसरी कक्षा के लिए वो उपयुक्त हो सकते हैं? संभव है श्रोता व कक्षा के स्तर में रद्दो बदल से थोड़ा तो अंतर पड़े लेकिन शिक्षक की पढ़ाने की शैली में बदलाव किया जाए तो यह स्थिति ही न पैदा हो।
तमाम रिपोर्ट और शिक्षा में हो रहे नवाचारों पर नजर डालें तो पाएंगे कि शिक्षा को ख़ासकर प्राथमिक कक्षाओं मंे रोचक और आनंददायी प्रक्रिया बनाने पर जोर है। शिक्षा वह जो बच्चों को आनंद दे सके। शिक्षक अपने कथ्य व कहने की शैली में परिवर्तन करे। तभी कक्षा जीवंत हो सकती है। वरना एक ओर शिक्षक पढ़ाते हैं और दूसरी ओर बच्चे उनका मजाक बनाने से भी पीछे नहीं रहते। यही वजह है कि कक्षा में शिक्षण रोचक बनने की बजाए वह बोझ बन जाती है। लेकिन अफसोस कि बच्चों के पास इसका अधिकार नहीं होता कि वह शिक्षक बदल दे। यदि ऐसा होता भी है तो बच्चों को शिक्षक के कोपभाजक भी बनना पड़ जाता है। आरटीई से लेकर एजूकेशन फोर आॅल का लक्ष्य यही है कि शिक्षा आनंद पैदा करे। पढ़ने के प्रति बच्चों में जिज्ञासा का संचार हो। श्रोता-वक्ता एक दूसरे का समय न जाया करें। यह तभी संभव है जब हम अपने कथ्य और कथ्य की शैली पर भी काम करें। कहने का कौशल नहीं, तो श्रोताओं पर दोषारोपण कहां तक उचित है।

Wednesday, April 2, 2014

आज फिर आंखें बरस पड़ी


तुम उस तरफ चले गए-
इधर तुम्हें तलाशती हैं आंखें,
छोड़ गए,
अपने मकान,
अपने लोग,
अपने खेत,
अपनी पहचान।
उधर से भी आए-
वही दर्द,
वही चीख,
अपना बचपन,
जब भी छिड़ती है कोई बात,
आज भी आंखें बरसने लगती है।
तुम्हें याद हो न हो-
मगर आज भी वहां,
गाए जाते हैं यहां के गीत,
इधर भी वही मंज़र है,
बार बार,
याद कर,
डस सैलाब को,
झरने लगती हैं गंग-जमुन।
नहीं बदल सकते-
भूगोल,
न ही खींच सकते और विभाजन की रेखाएं मोटी,
ग़र कुछ कर सकते हैं,
आओ एक बार फिर से गुफ्तगू करें।

Tuesday, April 1, 2014

घड़ा जो टूटा सा


अभी अभी-
जो घड़ा टूटा,
कौन सी मिट्टी थी,
पहचान सको तो पहचान लो,
किस धरती से उठाई गई थी मिट्टी,
किस खेत से लाए गए थे,
पका कर।
टूटा हुआ-
बेडौल सा घड़ा,
आपके पास ही हो,
ज़रा टटोल कर बताएं,
मेरी मदद कर सकते हैं
मैं लगा हूं,
उस मिट्टी की तलाश में।
एक बार जो फूटा-
घड़ा मेरा या कि आपका,
पहचानने में लग जाएं शताब्दियों,
टूटा हुआ घड़ा,
टूटा हुआ आईना,
घर में कहां रखते हैं,
सुना है बचपन से,
मगर जि़द है,
उन्हें ताउम्र रखूं अपने ही करीब।
सदियों से ध्यानस्त
तुम तो सदियों सदियों से यूं ही खड़े हो-
या कि ध्यानमग्न,
एक ही स्थान पर,
जटा- जूट बिखेरे,
जब भी पास आता हूं,
तुम सरसराने लगते हो,
कुछ बुदबुदाते हुए से,
ज्यो कहना चाहते हो,
कान में फूंकने को कोई रहस्य मंत्र।
जब भी टूटा है ध्यान-
त्राहि त्राहि मचा दी है तुमने,
भला ऐसा क्यों किया तुमने,
हां हम कबूलते हैं अपनी ग़लती,
हमने ही खोदी है,
तुम्हारी छाती,
गाड़ दी है फीटों गहरी पाइप।
संभव है-
तुम्हें चुभा हो हमारी घरघरती औजार,
खलबलाकर उठाया होगा तुमने अपना सिर,
मगर मगर सोचा तो होता दादू,
लाखों लाखों तेरी ही संतान,
जमीनदोस्त हो गए,
फिर भी तुम रहे मौन।
तुम्हारी संगिनी-
हां वही सागर,
बार बार पछाड़े खाता,
अपनी ही उत्ताल तरंगों से टकराता,
याद दिलाता,
कितना ग़मज़दा है सागर,
सदियों सदियों से।
तुमने देखा-
पीढि़यां आती रहीं,
और चली भी गईं,
बस बचे रहे तो तुम,
क्या कोई अता पता दोगे,
क्या केाई तस्वीर,
जिससे मिलान कर सकूं।

एक आवाज़


एक आवाज़-
देहारी पर,
हर वक्त देता रहता है।
जब भी-
दरवाजे़ पर आता हूं,
आवाज़ गुम हो जाती है,
न आवाज़ और न ही चेहरा।
चेहरे की पहचान में-
आवाज़ भूल जाता हूं,
बार-बार,
दहलीज़ तक जाता,
बैरन लौट आता हूं।
चैखट पर-
न आवाज़ होती और न चेहरा ही मुकम्मल,
थक कर,
वपस लौटता हूं,
तभी फिर आवाज़ आती है,
उठता हूं,
शिद्दत से बुलाती उस आवाज़ को पहचाने को बेताब,
चल पड़ता हूं,
आवाज़ को मनाने,
प्यार से दुलराने को।

 

शिक्षकीय दुनिया की कहानी के पात्र

कौशलेंद्र प्रपन्न ‘‘ इक्कीस साल के बाद पहली बार किसी कार्यशाला में बैठा हूं। बहुत अच्छा लग रहा है। वरना तो जी ...