वो जा कर भी कहाँ पहुच पाया-
उससे भी दूर जाना चाह कर भी जा न सका,
चाहता तो उसके पीछे लग जाता,
लेकिन लगा नहीं...
इक उसी में घुल गया-
बन कर धुल हवा,
लोगों ने कितना समझाया,
ज़िन्दगी लम्बी है,
सफ़र में दोस्त और भी मिल जायेंगे,
कुछ सपने बिखर भी जाये तो आखें नाम नहीं करते...
पर न वो उसका ही हो सका और न खुद का-
घर से दूर निकल जाना,
दिन भर उसके राह पर नज़र टाँगे,
बैठा ही रहता,
हर उस और से आने वाले को पकड़ कर,
पूछता कहीं मिली?
यह एक ऐसा मंच है जहां आप उपेक्षित शिक्षा, बच्चे और शिक्षा को केंद्र में देख-पढ़ सकते हैं। अपनी राय बेधड़ यहां साझा कर सकते हैं। बेहिचक, बेधड़क।
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