भाषा का पेड़ जब लगाया तब बाबा बोहुत खुश हुवे लेकिन उनके सामने सारे के सारे आपस में लड़ने लगेने यह सोचा नही था। आज वो बेहद गमगीन थे। भाषा कि सभी पेड़ आपस में झगड़ रही थीं मैं सुंदर नही मैं बेहतर, मुझे जयादा लोग पसंद करते हैं, न न मुझे ज्यादा लोग लिखते पढ़ते हैं। तो मैं हुई न तुम सब से बेहतर। बोल बोल चुप हो गई न लगता है तुम लोगों ने अपनी हार मान ली है। बिना रुके उन भाषावो में से इक बोले जा रही थी,। बाद में पता चला वो इंग्लिश थी।
पर बाबा को यह सब देखा नही जा रहा था। उन्होंने सब को बुला कर कहा तुम सब मेरी बगिया के फूल हो आपस में झडो मत। प्यार से रहना सीखो। साडी भाष्यें अची हैं।
भाषायें समझ गईं। साथ साथ रहने लगीं।
यह एक ऐसा मंच है जहां आप उपेक्षित शिक्षा, बच्चे और शिक्षा को केंद्र में देख-पढ़ सकते हैं। अपनी राय बेधड़ यहां साझा कर सकते हैं। बेहिचक, बेधड़क।
Tuesday, May 19, 2009
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शिक्षकीय दुनिया की कहानी के पात्र
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