अंजुरी में तुम हो
जब भी इबादत
के लिए हाथ बढती हैं
बस तुम ही आती हो
खुदा पूछता है बता तेरी
रजा क्या है
कुछ भी तो मुह से नही निकलता है
बस एक नाम जो मेरे संग डोलता है
वही अंजुली में झाकती है
जब कभी इबादत में होता हूँ
बस एक नही दो आखें सवालों भरी पूछती हैं
कहाँ रहे
कब से अजान में हूँ
पर
यह एक ऐसा मंच है जहां आप उपेक्षित शिक्षा, बच्चे और शिक्षा को केंद्र में देख-पढ़ सकते हैं। अपनी राय बेधड़ यहां साझा कर सकते हैं। बेहिचक, बेधड़क।
Monday, June 30, 2008
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शिक्षकीय दुनिया की कहानी के पात्र
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