Wednesday, May 23, 2018

घरों में हो एक रोआन घर...




कौशलेंद्र प्रपन्न 
नागार्जुन ने कभी लिखा था, ‘‘कालिदास सच सच बतलाना तुम रोए थे या अज रोया था?’’ वहीं प्रसिद्ध उपन्यासकार,कवि और लेखक अज्ञेय ने अपनी कालजयी कृति शेखर एक जीवनी में लिखा है, पुरूष कितना दुर्भागा है कि वह रो भी नहीं सकता। मनोविज्ञान और व्यवहारवादी मानते हैं कि रोने से न केवल मन हल्का होता है बल्कि मस्तिष्क की तंतुएं खुलती हैं। वहीं कथा सम्राट प्रेमंचद ने भी रोने को पाक माना है और लिखते हैं कि रोने से मन प्रच्छालित हो जाता है। वह प्रायश्चित का महज साधन भी है। मनोविज्ञान ख़ासकर रोने की प्रक्रिया को मनुष्य के सहज प्रवृति में शामिल करता है। लेकिन व्यवहार में देखें तो पाएंगे कि जब भी किसी को रोते हुए देखते हैं तो कहीं न कहीं हमारा मन भी द्रवित हो जाता है। हम नहीं चाहते कि कोई रोए। यदि हम गैर करें तो हमारा समाजिकरण ऐसा होता है कि किसी भी लड़के या पुरूष को रोते हुए देखते हैं तो छूटते कह देते हैं क्या लड़कियों की तरह या स्त्री की तरह रो रहे हो। मर्द हो मर्द रोते नहीं। यह समाजिकरण कम से कम पुरूषों के साथ ताउम्र साथ रहता है। पुरूष चाहकर भी या कितना भी दुखी हो वह खुल कर रो नहीं सकता। वह कभी फफक फफक कर या फूट फूट कर रो नहीं पाता। यही कारण है कि पुरूष अंदर ही अंदर टूटने लगता है। वहीं महिलाएं रो कर अपना मन शांत कर लेती हैं और पुरूष शांत होकर भी अंदर से बेइंतेहां रो रहा होता है। पुरूष हमेशा ही अपने लोर को छुपाता है। कहीं भीतर से ढह रहा होता है लेकिन समाजिकरण उसे रोने नहीं देती। 
यदि आप रो नहीं सकते तो अंदर से टूटने लगते हैं। मनोविज्ञान तो यहां तक मानता है कि मनोचिकित्सा में रोने, बिलखने जैसे प्रक्रियाएं आम होती हैं। व्यक्ति लंबे समय से कोई दर्द, कोई टीस दबा कर जी रहा होता है। जब सही वक़्त मिलता है तो वह खुलकर और बेझिझक रोने लगता है। आज की तारीख़ में कोई भी ऐसा नहीं है जो तनाव में नहीं है। किसी भी लाइफ ऐसी नहीं है तो दर्द और कंफ्लिक्ट से परे है। ऐसे में व्यक्ति रोता है। रोता तब है कि वह अंदर से बिल्कुल टूट जाता है। लेकिन रोने को इतना कमतर या नीची नज़र से क्यों देखा जाता है। इसके पीछे बच्चों का सामाजिकरण मूल कारण है। बच्चे बचपन से ही घर और स्कूल, दोस्तों और परिवार में यही सुनते हुए बड़े होते हैं कि रोते नहीं। रोने वाले कमजोर होते हैं आदि। 
यदि हम इतिहास में झांकें तो बड़े-बड़े महलों में रानियों के लिए एक कोपभवन होता था। उस कोपभवन का प्रयोग रानियां तब इस्तमाल करती थीं जब दुखी होती थीं। जब उदास होती थीं। या जब राजा से रूस जाती थीं। उस कोप भवन में रानियां उदास या तो रोती रहती थीं या फिर ग़मज़दा पड़ी रहती थीं। मेरा तो मानना है कि जब घर बनाया जाए तो जैसे देवता घर बनाया जाता है। जैसे रसोई घर बनाया जाता है। जैसे नहान घर बनाया जाता है। कितना अच्छा हो कि घर में एक रोआन घर भी बनाया जाए। जिसे जब रोने की ज़रूरत महसूस हो तो वहां जाकर रो आए। हल्का हो जाए। रोना और रूठना, उदास होना मानवीय स्वभाव का हिस्सा है। रोने का मन करे या दुखी हों तो रो लेने में हर्ज़ नहीं है। लेकिन यह दिक्कतें तब पैदा करता है जब आप रोने को आदत में शामिल कर लेते हैं। रेने को आदत न बनाएं बल्कि मन हल्का करने के लिए प्रयोग करें। रोएं तब जब नितांत ज़रूरी हो। हर वक़्त रोना अच्छा नहीं होता। क्योंकि इसी समाज ऐसे रायबहादुर भी हैं जो आपके रोने का सबब जानकर आपका इस्तमाल करने से पीछे नहीं रहेंगे। सहानुभूति के बोल और स्पर्श के चक्कर में आप अपना सब कुछ लुटा देते हैं। 
इतिहास और मानवीय विकास की कहानी बताती है कि आंसूओं को हथियार भी बनाया गया है। इस कर्म में महिलाएं शायद एक कदम आगे हैं। माफी के साथ कहना पड़ रहा है कि कई बार महिलाएं आंसू और रूलाई का इस्तमाल घर में कलह और फसाद पैदा कराने में भी करती हैं। पत्नी का रोना या लोर से भर जाना घर की सुख शांति को खत्म भी कर देती है। इसलिए इस आंसू और रूदन का प्रयोग ग़लत दिशा में ले जाने से बचना प्रकारांतर से रोते हुए के प्रति सहानुभूति बरकरार रखने मे ंहम मदद ही करते हैं। 
जब किसी आदमी को रोते देखते हैं तो वह कम से कम मेरे लिए एक विदारक स्थिति होती है। उसमें भी जब आप किसी आदमी को वो भी उम्रदराज़ को रोते हुए देखना बहुत कष्टदायी होता है। मनोविश्लेषण में माना जाता है कि जब व्यक्ति अपनी पुरानी घटनाओं और अतीत में जाता है तब उसे बहुत सी ऐसी बातें छूने लगती हैं, याद आती हैं जहां तब तो वह रो नहीं सका लेकिन आज जब मौका मिला तो रोकर मन हल्का कर लेता है। रोते सिर्फ कहानी, उपन्यास, कविता के पात्र ही नहीं हैं बल्कि आम मनुष्य रोते हैं जिसकी सुबकी हमें साहित्य में सुनाई देती है। रोने और आंसू को हथियार बनाने से बचना और खुल कर रोना दोनों ही बातें हमारी लाइफ का हिस्सा हैं। 

Tuesday, May 22, 2018

मुलाकातें जो याद रह जाती हैं




मुलाकातें अक्सर वही याद रह जाती हैं जो सुखद होती हैं। कई बार दुखद मुलाकातें भी भूली नहीं जातीं। दूसरें शब्दों में कहें तो हम सामाजिक होने के नाते अपने जीवन में बल्कि रेज़ भी कई लोगों से मिला करते हैंं। उनमें से कुछ नाम और चेहरे यादगार बन जाते हैं। पिछले दिनों प्रसिद्ध कवि और संपादक अरूण शेतांश से मिलना हुआ। वजह तो कुछ और रही होगी लेकिन दिल्ली में इनसे मिलना पहली दफ़ा हुआ। दिल्ली में ही क्या शायद लाइफ में पहली बार मिले। हालांकि इनसे बातचीत फोन पर तो कई बार हुआ। इनकी रचनाओं से गुजरना भी कई बार रहा। जो कहीं न कहीं मिलने की तड़प को हवा देती रहीं। आख़िरकार अरूण जी की कविताओं से रू ब रू हो सका जो कहीं न कहीं स्मृतियों में दर्ज़ हो गईं। ‘‘वैसी नदी बची है देश में? सिका साफ जल पी सकूं भर पेट अंजूरी से उठा कर...’’ जिस तरह के बिंबों और प्रतीकों का प्रयोग इस कविता में है वह बेहद मौजू और प्रासंगिक है। इस मुलाकात में न केवल कविता पर चर्चा हुई बल्कि साहित्य और साहित्यकारों के रवैया, हिन्दी और साहित्यकारों की जिम्मेदारी पर भी विमर्श हुआ। 
ऐसे ही चलते फिरते भी हम कई लोगों से मिला करते हैं। किसी का चेहरा ही काफी होता है मुलाकात के वक़्त को कम करने के लिए। तो कुछ के बात करने के अंदाज़ और शैली बेहद ऊब पैदा करती हैं। इच्छा तो यहां तक होती है कि कैसे यह पल और जल्द सिमट जाए। कब इनसे छुटकारा मिले आदि। जब एक मुलाकाती व्यक्ति महज अपनी प्रसिद्धी, उपलब्धियों का गिनाने लगता है तब शायद घोर निराशा होती है कि क्या यह मुलाकात सच में मिलने के लिए है या उपलब्धियों को दर्ज़ कराने और अपनी उपस्थिति का एहसास कराने के लिए है। ऐसे में आत्मप्रशंसा के तत्व मुलाकात को कमतर कर देता है। यदि प्रसिद्धी है तो, उपलब्धि है तो वह ख़दु बोला करती है। उसी ख़ुद ही बोलने दीजिए बजाए कि आपको बोलना पड़े। कई बार आप भी ऐसे लोगों से मिले होंगे जिनसे दुबारा मिलने से पहले हज़ार बार सोचा करते हैं कि उफ!!! दुबारा उनकी सारी कहानी सुननी पड़ेगी। दुबारा जनाब बताएंगे कि कैसे फलां सम्मेलन, पुरस्कार में उन्हें तालियां मिली थीं। कैसे किसने उनके लिए शब्दों की लड़ियां लगाई थीं आदि। ऐसे में सुनने वाला बचता है। 
मुलाकातें कई बार इतनी गहरी होती हैं कि जिन्हें बार बार याद कर सुखद एहसास से भर जाते हैं। पिछले दिनों ऐसी ही मुलाकात बुर्ज़ ख़लिफा में शालीग्राम से मिलकर हुआ। लाइन में खड़ खड़े यूं ही बातचीत का सिलसिला निकल पड़ा और उन्होंने बताया कि किस प्रकार वे आज भी हिन्दी और भोजपुरी को बचाए हुए हैं। उनके साथ खड़ा उनका पंद्रह वर्षीय लड़का न तो हिन्दी बोल-समझ सकता था और अंग्रेजी। वह सिर्फ फ्रैच बोल-समझ सकता था। उन्होंने बताया कि उनकी तीसरी पीढ़ी भारत से माइग्रेट कर गई थी। लेकिन आज भी उन्हें भारत से लगाव है। हिन्दी और भोजपुरी से जुड़ाव महसूस किया करते हैं। उस मुलाकात में देश दुनिया की बात हुई। बात हुई भारतीय संस्कृति की। वो तो चाहते हैं उनका बच्चा भारतीय संस्कृति को जाने समझे लेकिन वो लाचार हैं। ऐसी ही एक और मुलाकात लेह में हुई। जगह भी सार्वजनिक कॉफी शॉप। बातों बातों में मालूम चला वो जनाब स्टेनजिन नेशनल स्कील इंडिया के नेशनल निदेशक हैं। बातों से ही तो हम किसी के बारे में जान पाते हैं। पहचान की एक कड़ी कभी तो खोलनी ही पड़ती है। हालांकि सार्वजनिक स्थानों, रेल, मेट्रो आदि में घोषणा की जाती है कि अपरिचितों से बात न करें। उनका दिया खाना न खाएं आदि। हालांकि सच है यह भी कि ऐसी कई घटनाएं हुईं हैं जिसमें हमें नुकसान भी उठाने पड़े हैं। लेकिन इस हक़ीकत से मुंह नहीं फेर सकते कि इन्हीं अपरिचितों में कुछ रिश्ते भी गहरे बन जाते हैं। 
कहने को तो पूरा विश्व ही परिवार हो चुका है। हर घर, हर देश हमारा घर है। लेकिन सच्चाई इससे बिल्कुल उलट है। हम अपने ही बनाए औरे में रहा करते हैं। हम खुलेंगे नही ंतो जुड़ेंगे कैसे। जब जुड़ेंगे नहीं तो वैश्विक परिवार में शामिल कैसे होंगे। आज हम ग्लोबल गांव के नागरिक हो चुके हैं। हमें वैसे ही बरतने भी हांेगे। एक दूसरे की संस्कृति, भाषा, बोली, संगीत आदि के साथ ही व्यक्ति को भी स्वीकार करने होंगे। यह तज़र्बा भी मजेदार रहा कि कुछ पाकिस्तानी परिवारों से भी मुलाकात हुई। वे रावलपिंड़ी के रहने वाले थे। जावेद की पत्नी ने पूछा भारत में आपका क्या रूटीन होता है? आपकी पत्नी ऑफिस जाती है? घर में कौन कौन हैं आदि। उनके सवालों में कई गिरहें थीं। जिन्हें वे समझना चाहती थीं। हमारे बारे में मीडिया और राजनेता से हटकर समझने की ललक थी। 
अरूण जी से ही यह मुलाकाती कहानी शुरू हुई थी। क्यों न उन्हीं पर खत्म की जाए। उनसे यदि कोई रिश्ता था तो वह मानवीय मूल्यों, साहित्य के दरकार और क्योंकि वे भी संवेदनशील रचनाकार हैं जिनकी बदौलत हम मिले। पहली बार मिले लेकिन एक पल के लिए भी यह एहसास नहीं हुआ कि यह हमारी पहली मुलाकात थी। आप भी कई लोगों से मिलते हैं। बल्कि मिलेंगे। मिलिए और मुलाकात यादगार ज़रूर बनाएं।   

Monday, May 21, 2018

हांजीमल और नाजीमल




कहानी कोई नई नहीं है। हम सब इस कहानी के पात्र, घटना, परिवेश में शामिल हो सकते हैं। ये कहानी ही ऐसी है। आज ज़िंदगी में हमने ऐसे कई पात्रों को देखा और सुना है। जो हमेशा ही हां जी हां जी किया करते हैं। बेशक वो आगे जाकर पीछे हट जाएं। लेकिन मुंह पर हरदम उनके हां जी ही हुआ करता है। कुछ समय के लिए यह शब्द सुनना बहुत अच्छा लगता है। लेकिन जब उनके हां जी और व्यवहार में दिखाई नहीं देता तब दुख होता है। तब हैरानी होती है। हमें महसूस होता है कि बेहतर था कि वह पहले ही ना कह देता। लेकिन ऐसे लोगों की आदत हो जाती है हर किसी के सामने और हर परिस्थिति में महज खुश करने के लिए उनके जबान पर हां ही होता है। ऐसे लोग बहुत जल्द पहचान भी लिए जाते हैं कि यह हां तो कह रहा है लेकिन अपनी जबान पर कायम रहेगा इसमें शक है। ऐसे लोगों पर हमेशा ही शंका के बादल बने रहते हैं। क्या नाते रिश्तेदार और क्या दोस्त या दफ्तर हर जगह ऐसे लोग बेहद चर्चित होते हैं। वहीं दूसरे किस्म के वे लोग हैं जिनके जबान पर हमेशा ही ना होता है। इन्हें आप ना जी कह सकते हैं। इससे पहले की प्रयास किया जाए। इससे पहले कि प्रयत्न किया जाए। वे छूटते ही कहते हैं ना जी यह तो न हो पाएगा। इनमें तो बहुत दिक्कत है। बहुत मुश्किल है। ऐसे लोग प्रयास करने से डरते हैं। बल्कि आप कह सकते हैं ऐसे लोग हर चीज, हर कोशिश और हर पहलकदमी को पहले पहल नकारात्मक नज़रे से देखने के आदि हो चुके होते हैं। ऐसे लोगों के साथ काम करना, योजना बनाना बहुत मुश्किल होता है। क्योंकि ये लोग थोड़ी देर के लिए ठहर कर सोचने और संभावनाओं की तलाश करने की बजाए रिटेलिएट करने में विश्वास करते हैं। इस किस्म के लोग भी घर-परिवार, दफ्तर, यार-दोस्तों की मंडली में मिल जाएंगे। ना जी मल ऐसे मनोदशा के होते हैं जिन्हें समझाना बेहद कठिन होता है। उन्हें सकारात्मक कदम उठाने में डर लगता हैं। बल्कि कह सकते हैं कि ऐसे लोगों में चुनौतियां स्वीकार करने में डर लगता है। ये लेग एक बने बनाए कंफर्ट जोन में रहना पसंद करते हैं। 
आपके आस-पास उक्त दोनों ही तरह के यार-दोस्त, सहकर्मी, रिश्तेदार ज़रूर होंगे। जिनके साथ रिश्ता निभाना बेहद कठिन होता है। यह तो बात हुई रिश्तेदारी की। दोस्ती निभाने की। लेकिन फ़र्ज कीजिए नाजी माल और हांजी मल आपके दफ्तर में भी हैं तो उनके साथ काम करना कितना कठिन होता है। इसके भुक्तभोगी होंगे आप। हांजी मल और नाजी मल दोनों की दो स्टी्रम स्थितियों में जीने वाले जीव है। इन्हें बीच का रास्ता दिखाई नहीं देता। इन्हें नई सोच, नए बदलाव, नई जिम्मेदारियों के बीच समायोजन स्थापित करने में डर लगता है। दूसरे शब्दों में कहें तो दोनों ही किस्म के लोग अपनी जिम्मेदारियों से पीछा छुड़ाने में तेज होते हैं। उन्हें मालूम है उनके इस बरताव की वजह से उन्हें कोई नए प्रोजेक्ट का हिस्सा नहीं बनाया जाता। उन्हें कोई नई जिम्मेदारी सौंपने से पहले मैनेजमेंट हज़ार बार सोचती है। क्योंकि उनकी आदतों से मैनेजर और संस्थान का हेड भी बखूबी वाकिफ होता है। उन्हें पता हेता है कि उसके हां में कहीं न कहीं न छुपा है जो स्पष्ट नहीं है। 
अगर ठहर कर विचार करें तो पाएंगे कि हांजी मल और नाजी मल जैसे मनोदशा व प्रवृत्तियों वाले लोगों से न केवल कंपनी, प्रोजेक्ट , संस्थान आदि को भारी नुकसारन उठाना पड़ता है। बल्कि कई बार रिश्तेदारी और दोस्तों में भी एक फांक पैदा करने में ऐसे लोग अहम भूमिका निभाते हैं। इनकी मनोरचना को बदलने के लिए यदि मैनेजमेंट प्रयास करे तो एक सूखे बांस की तरह तन जाते हैं। टूटना कबूल होता है। मगर झुकने में इन्हें परेशानी होती है। क्योंकि इन्होंने झुकना शायद सीखा ही नहीं। शायद यह मसला अपब्रिंगिं की भी है। इसे आप समाजीकरण कह सकते हैं। यदि किसी व्यक्ति की पूरी स्कूलिंग ऐसे ही नकारात्मक व जिम्मेदारी से परे रहने में हुई है तो वह उसके स्थाई स्वभाव का अंग हो जाता है। वह उसे चाह कर भी जल्दी ठीक नहीं कर पाता। वह चाहता तो है कि समायोजन स्थापित करे। लेकिन उसकी लंबे समय की ना कहने की आदत भारी पड़ती है। यह कुछ कुछ ऐसा ही है कि जिसे झूठ बोलने की आदत है वह कई बार बल्कि जानते हुए भी कि इस झूठ की आवश्यकता नहीं है मगर आदतन बोलता है। उसे मालूम होता है कि इस झूठ से उसका कोई ख़ास फायदा तो नहीं होगा मगर बोलने से रूका नहीं पाता। सो नाजी मल और हांजी मल जैसे लोगों के साथ भी कई बार ऐसी ही स्थितियां होती हैं। जो भी हो यदि कोई चीज, व्यवहार पसंद नहीं तो हां या ना स्पष्टता और दृढ़ता के साथ कहने का माद्दा होना चाहिए। क्योंकि इस ना से शुरू में तो किसी की नज़रों में खटक सकते हैं लेकिन दूरगामी प्रभाव देनों के लिए बेहतर होता है। हां या ना कहना महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि किन हालातों और किनके बीच हां जी और ना जी कह रहे हैं यह ख़ास मायने रखता है। 

Thursday, May 17, 2018

यूं चले जाना




मैथिली शरण गुप्त अपनी प्रसिद्ध काव्य रचना में यशोधरा की मन की बात लिखते हैं, जब गौतम बुद्ध बिना बताए रातों रात अपने बच्चे और पत्नी को छोड़ कर प्रस्थान कर जाते हैं। यशोधरा कहती है, सखी वे मुझसे कह कर जाते....जो तुम एक बार कहते हैं मैं क्षत्राणी स्वयं आरती उतार कर तुम्हें विदा करती। लेकिन तुम बिन बताए, बिना कहे, चोरों की तरह चले गए। यदि इस काव्य रचना को पढ़ें तो जीवन और व्यहार की कई सारी मानवीय संवेदना की परते खुलती चली जाती हैं। यदि हम अपने आस-पास नज़र डालें तो पाएंगे कि कई सारे लोग ऐसे होते हैं जो बिना बताए रातों रात शहर, कस्बे, कंपनी, दफ्तर आदि से दूर चले जाते हैं। वजहें कई हो सकती हैंं। उन्होंने क्यों नहीं बताया, मन में क्या था? आदि ऐसी गांठें हैं जिन्हें वे स्वयं ही खोल सकते थे। मगर अब वो हमारे बीच नहीं रहा करते। लेकिन कंपनी के एचआर और अधिकारी को सब मालूम होता है। क्यों कोई व्यक्ति रातों रात चला गया। या जाने को कहा गया। यह जाने और कहने पर जाने में बहुत बारीक अंतर है। जिसे ठहर कर समझने और महसूसने पर जाने के पीछे की कहानी समझ में आती है। जो भी हो जाने वाले के लिए हमेशा ही एक साफ्ट कॉरनर होता है। होना भी चाहिए। क्योंकि कौन, किस पस्थिति में गया। इसका सही सही भूगोल और निहितार्थ की परतें वही खोल सकता था। 
यदि समाज में देखें तो रेज़दिन हज़ारों की नौकरियां लगा करती हैं और हज़ारों के लिए रिटायरमेंट का दिन भी होता है। अवकाश प्राप्ति के दिन सरकारी नौकरियों में तो नियुक्ति के दिन ही तय कर दिए जाते हैं। व्यक्ति को मालूम होता है कि किस दिन, किस तारीख को उसे नौकरी से मुक्ति मिलेगी। लेकिन निजी कंपनियों की नौकरी में ज्वाइंनिंग और रिटायरमेंट की कोई तारीख़ पहले से मुकरर्र नहीं होती। निजी कंपनियों,संस्थानों आदि में सरकारी रिटायरमेंट की आयु सीमा से बाहर जाकर लोगों को हायर और फायर भी किया जाता है। हायर और फायर की प्रक्रिया में डिग्री, अनुभव उम्र से ज़्यादा यह देखी जाती है कि किस व्यक्ति में नई चुनौतियों को स्वीकार करने, उसे दुरूस्त करने, टीम को सही दिशा में मार्गदर्शन प्रदान करने और कंपनी या संस्था को नई ऊंचाई तक ले जाने की क्षमता और दक्षता है या नहीं। वह व्यक्ति उम्र में छोटा या बड़ा भी हो सकता है। सिर्फ इस बात को तवज्जो दी जाती है कि किसमें दूर दृष्टि, रणनीति बनाने, एक्जीक्यूट करने और प्रोजेक्ट को सफल बनाने की क्षमता और प्रवीणता है। 
हमारे बीच से कई बार ऐसे लोग, ऐसी रिश्ते नदारत हो जाते हैं जैसे वे कभी हमारे कंसर्न एरिया में थे ही नहीं। गोया वो रिश्ता हमारे लिए एक सिरे से गायब हो गया। जैसे वो कभी हमारे बीच था ही नहीं। लेकिन कोई भी व्यक्ति या रिश्ते अचानक यूं ही हमारे बीच से खत्म नहीं हो जाते। बल्कि दूर जाने, भूल जाने की प्रक्रिया दो स्तरों पर चल रही होती हैं। एक अंतर और दूसरा बाह्य। अंतर जगत में क्या चल रहा है इसका अनुमान लगाना ज़रा कठिन है। क्योंकि हर किसी की अपनी अंतर दुनिया हैं जहां वो निपट अकेला होता है। कोई रिश्तेदार, भाई-बहन, दोस्त कोई भी साथ नहीं होता। उसे ख़ ुद ही निर्णय लेने होते हैं। उन निर्णयों के लिए खुद ही जिम्मेदार होना होता है। बस रिश्तेदार या भाई-बहन महज राय दे सकते हैं किन्तु उसका ख़मियाज़ा व्यक्ति को स्वयं ही भुगतना पड़ता है। वहीं दूसरी ओर बाह्य स्तर पर जिस प्रकार की गतिविधियां चलती हैं उसका तो कभी कभी अनुमान लगाना कठिन नहीं है। लेकिन बाह्य परिस्थितियां कई बार हमारी ही भूलों, चूकों, ख़ामियों से भी संचालित होती हैं। जिसे नियंत्रण में लाया तो जा सकता है लेकिन ज़रा कठिन है। क्योंकि हम अपने कंफर्ट जोन से बाहर नहीं आना चाहते। हम अपनी पूर्वग्रह को बरकरार ही रखना चाहते हैं। दूसरे शब्दों में, हम अपनी कार्य शैली, सोच, विजन में रद्दो बदल के लिए तैयार नहीं होते। 
कंपनी व्यक्ति से नहीं बल्कि मिशन और विज़न से चला करती है। कई बार कंपनी व्यक्ति से और व्यक्ति कंपनी से पहचाना जाता है। वह इसलिए क्योंकि नेता (मैनेजर, निदेशक आदि) हमेशा अपनी स्पष्टता और चिंतन की व्यापकता के आधार पर व्यक्तिगत जीवन और कर्म क्षेत्र में सफल हो पाता है। महज़ फ़र्ज कीजिए यदि नेता स्वयं ही उलझा हो, विचार और दिशा की स्पष्टता ही नहीं है तो वह हमेशा ही दिग्भ्रमित दिखाई देगा और औरों को भी भ्रम में रखेगा। इसका ख़मियाजा कंपनी या फिर कई बार परिवार, दोस्तों आदि को भुगतना होता है। 

Tuesday, May 15, 2018

नाम गुम जाएगा...चेहरा ये बदल जाएगा...




कौशलेंद्र प्रपन्न 
वाट इज़ देयर इन द नेम...हिन्दी में कहें तो नाम में क्या रखा है? इन्हीं भावदशाओं और दर्शनों की करीब से पहचानते इस गीत की पंक्तियों को सुनें तो कई कहानियां एक के बाद उभरती चली जाएंगी। उन कहानियों के मज़मून बेशक अगल होंगे लेकिन कथ्य तकरीबन एक सा मिलेगा। कई बार हम व्यक्ति के नाम भूल जाते हैं लेकिन चेहरा देखते ही उसके साथ बिताए पल याद आने लगती हैं। वहीं कुछ के चेहरे सामने भी आए जाएं तो उस व्यक्ति का नाम याद नहीं कर पाते। दरअसल हम उन्हीं चेहरों, नामों को भूल जाते हैं याद याद रखते हैं जिनके साथ या तो सुखद पल गुजारे हैं या फिर जिन्हें याद कर आज को भी खट्टा कर लेते हैं। एक बाद के लिए आज पर अतीत चढ़ने लगता है। ऐसे में हम उन्हें ही याद रखना व मिलने की चाह रखते हैं जिनके साथ हमें सच में खुशी व प्रसन्नता मिलती। वह पल बेशक बेहद अल्पायु वाला ही क्यों न हो। नाम बार बार याद करने के बावजूद भी इस लिए भूल जाते हैं क्योंकि हमारी स्मृतियां उन्हीं सूचनाओं, नामों स्थानों आदि का याद रख पाने में सक्षम होती हैं जिनके साथ हमारी स्मृतियों मजबूत हुआ करती हैं।
नाम बदलने, स्थान बदलने और तस्वीरें बदल देने से कोई व्यक्ति व संस्था अपनी मूल प्रकृति नहीं बदल पाती। बल्कि आम जन की स्मृतियों में बसी यादों, एहसासातों और सपनों को हम नहीं धो सकते। कोई शहर अपना नाम हज़ार बार बदल ले। कोई व्यक्ति अपना नाम कोर्ट के द्वारा अपना नाम बदल ले लेकिन वह अपनों के लिए वही पप्पु, संजय, बबुआ और न जाने क्या क्या ही रहता है। ठीक वैसे ही आप या कि हम किसी भी ख़ास मकसद से किसी शहर, नगर,डगर का नाम बदल दें लेकिन पुरानी स्मृतियों में दर्ज़ नाम ही जबान पर आते हैं। 
हाल में कहें या फिर पहले भी डगरों, नगरों के नाम बदलें का फैशन चला था। वह फैशन था या कि दलगत हित लेकिन डगरों, नगरां, स्थानों के नाम धड़ाधड़ बदले गए। कनॉट प्लेस का राजीव चौक हो जाना, मुगलशराय का दीनदयाल उपाध्याय नगर हो जाना, अकबर रोड़ रातों रात महाराणा प्रताप में तब्दील हो जाना कई बार हैरान करती हैं। हम एक सड़क, पुल, गली, दफ्तर तो रातों रात नहीं बदल पाते। इसमें कई अड़चनें आती हैं लेकिन कैसे तुरत फुरत में हम डगरों, नगरों, चौराहों के नामों की तख़्तीयां बदल दिया करते हैं। कहीं कोई सुगबुगाहट नहीं होती। पिछले माह रामनवमी के ठीक आस-पास कई बड़े बड़े और प्रमुख स्थानों के साइन बोर्ड पर ‘‘राम राम’’ चस्पा कर दिए गए। किसने किया? कौन इसका जिम्मेदार है? कैसे इतनी ऊंचाई पर रातों रात राम राम नाम को चिपकाया गया? आदि। ये सवाल हमें पूछना चाहिए नगर निगम के अधिकारियों से कि जब संज्ञान में आया, किसी ने याद दिलाया तब तो उन साइन बोर्ड को साफ करने, राम राम के नाम को मिटाने की कम से कम कवायद ही सही किन्तु सक्रियाता तो दिखानी ही चाहिए थी। दिल्ली के तकरीबन बड़े और प्रमुख चौराहों, रेड लाइट्स के आस-पास के स्थान, दिशा प्रदर्शक बोर्ड पर राम राम के स्टीकर लगाए गए हैं। उन्हें कब और कौन उतारेगा? कौन इस पर एक्शन लेगा यह तो नहीं मालूम लेकिन इस प्रकार की प्रवृत्तियां शुभ नहीं मानी जा सकतीं। 
नामों और तस्वीरों के बदल जाने से तारीख़ें नहीं बदला करतीं। महज किसी ख़ास व्यक्ति की तस्वीर बदल दी तो क्या उम्मीद करते हैं उस व्यक्ति के अतीत को भी बदल देने का दावा करते हैं? शायद नहीं। शायद हम सिर्फ आज अपने ख़ाम अहम की तुष्टि भर ही करने की कोशिश कर रहे हैं। यही प्रवृत्ति इन दिनों नामों के बदलने और तस्वीरों को बदलकर हम साबित कर रहे हैं। क्यों हमें बार बार इतिहास में जाना चाहिए? क्यों हमें बार बार अतीत से दुखद और चुभन भरी और ठीस देने वाली घटनाएं ही चुन कर आज में लाना चाहिए। क्यों न हम अतीत व इतिहास से सुखद पल चुन कर लाएं। क्यों न अपनी भूलों को वहीं छोड़कर वहां से आगे की दिशाएं तय करने वाली सीखों को अपने साथ ज़ि़ंदा रखें ताकि भविष्य और वर्तमान के बेहतर बना सकें। 
मानवीय स्वभाव है कि हम बार बार सबसे पहले दुखते और चुभते पलों को याद किया करते हैं हमारे साथ ऐसा नहीं हुआ। वैसा नहीं हो सका। उसके मेरे साथ अच्छा नहीं किया। वह कभी मिलता और फोन नहीं करता आदि आदि। शिकायतों से शुरू होने वाले संवाद ज़्यादा सुखद और दीर्घजीवी नहीं हो पाते। नामों को बदलने की बजाए कामों से नामों को मर्ज कर दें तो कितना बेहतर हो। 

Friday, May 11, 2018

विकसने में संघर्ष बहुत है






कौशलेंद्र प्रपन्न 
सच हम नहीं, सच तुम नहीं, सच है हमज संघर्ष ही...संघर्ष से बच कर जीए तो क्या जीए तुम या कि हम...कवित की इन पंक्तियों को जगदीश गुप्त से उधार ली है। इन पंक्तियों में जिस प्रकार की चिरगारी है वह हमें जीवन में आगे बढ़ने में मदद करती है। बगैर संघर्ष में दुनिया का कोई भी व्यक्ति, संस्था, कंपनी आगे नहीं बढ़ी होगी। एक बात तो तय हो गई कि यदि जीवन में आगे बढ़ना है, विकसना है तो हमें किसी न किसी स्तर पर किसी न किसी रूप में संघर्ष करना ही पड़ता है। हर व्यक्ति और समाज के अनुसार उसके संघर्षों की प्रकृति निर्धारित होती है। किसी का संघर्ष चौदह वर्ष का होता है तो किसी का अल्पायु। लेकिन हरके जीवन की यह कहानी बड़ी पुरानी और सच्ची है कि संघर्ष तो करना ही पड़ा है। यदि हम अपने परिवेश पर नज़र डालें तो एसे कई व्यक्ति मिलेंगे जिन्होंने अपने जीवन में काफी संघर्ष किया। तब जाकर आज वो जीवन की सफलता के झंड़े लहरा रहे हैं। वहीं कुछ ऐसे भी लेगे मिलेंगे जिन्होंने मेहनत तो बहुत की लेकिन उसके अनुरूप उन्हें सफलता व सुख नहीं मिला। यदि ऐसे संघर्षां की कहानियों के तानाबाना करीब से देखें तो संभव है हमें ऐसी कोशिशें भी दिखाई देंगी जो महज दूसरों को दिखाने और प्रभावित करने के लिए किए जा रहे थे। वे अपनी संतुष्टि के लिए प्रयास नहीं कर रहे थे। यहां यह हक़ीकत समझ लेनी चाहिए कि हमें अपनी नज़रों और कोशिशों में सच्चे और ईमानदार होने की आवश्यकता है न कि औरों की नज़रों में। यह भी दिलचस्प है कि हम अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा दूसरों से अच्छे, लायक, आज्ञाकारी आदि के प्रमाण पत्र बटोरने में ज़ाया कर दिया करते हैं। जबकि हमें इस ओर ध्यान देना लाजमी होगा कि हम अपनी निगाहों में ईमानदार और प्रयास करने वाले हैं या नहीं। 
जब केई व्यक्ति, समाज, कस्बा, नगर विकसने की राह पर होता है तब कई तरह के संघर्षां, आलोचनाओं, निंदाओं और प्रोत्साहनों से गुज़रना होता है। इसे सहज मानवीय और विकास की प्रवृति के रूप में समझना चाहिए। जब कोई कस्बा व गांव विकास करता है तो पुरातन मान्यताओं वाले इसका विरोध परंपरा, मान्यताओं आदि के हवाले से उस विकसने की प्रक्रिया को नकारते हैं। जब कोई व्यक्ति विकसने और संघर्ष के पथ पर आगे बढ़ता दिखाई देता है तब हमारे ही आस-पास के लोग, सहयात्री हमारे प्रयासों की प्रशंसा करने, प्रोत्साहित करने की बज़ाए आपके सपनों, कोशिशों को नकारने और हतोत्साहित करने का प्रयास करते हैं। ऐसे वे क्यों करते हैं इनके वज़हों मानवीय स्वभावों में से एक है। इसे हम मानवीय विकसने की प्रक्रिया में बाहरी संघर्ष के रूप में पहचान सकते हैं। इस किस्म के बाहरी संघर्षों में साथ के लोगों की संवेदनात्मक, भावनात्मक, मनोवैज्ञानिक आदि दबावों को रख सकते हैं। वे कई बार स्वभावतः ऐसे करते हैं। उन्हें यह कबूल नहीं हो पाता कि उनके सामने का व्यक्ति विकसने की कोशिश कर रहा है। उन्हीं की नज़रों के आगे फलां व्यक्ति कैसे अपनी कॉम्यूनिकेशन, मैनेजमेंट,प्रेजेंटेशन आदि स्कील कैसे डेवलप कर सकता है। आदि कुछ बाह्य भय भी हमारे विकसने के राह में संघर्ष के रूप में मिला करते हैं। हमें इस प्रकार के संघर्षां से भी लड़ना और ख़ुद को बाहर निकालना होता है। 
कभी हमने बीज को जमीन से बाहर निकलते शायद न देखा हो। कभी देखने की कोशिश करें तो समझना आसान हो जाएगा कि एक बीज को जमीन से बाहर आने में कितनी मेहनत करनी पड़ती है। दूसरे शब्दों में एक नवजात बच्चे में जनमने में कितने संघर्षां का सामना करना पड़ता है। तब जाकर बच्चा इस दुनिया में आंखों खोलता है ऐसी दुनिया जो व्यक्ति के विकसने को संहर्ष स्वीकारने की बजाए इसबात में सुख की तलाश करता है कि वह अभी तक संघर्षशील है। । अभी तक प्रयासरत है। हालांकि इस हक़ीकत से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि हमारे फैलों ट्रेवलर में ऐसे भी चाहने वाले होते हैं जो हमारी विकसने की यात्रा में प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से शामिल होते हैं। उन्हें देखने और महसूसना अच्छा लगता है कि उनके बीच का कोई व्यक्ति प्रयास कर रहा है। उन्हें आपके विकसने में मदद करने में प्रसन्नता होती है। 
हमें यदि विकसना है तो बाहरी और आंतरिक संघर्षों से लड़ना और जीतना ही होगा। अभी हमने बाहरी संघर्षां की तो बात की लेकिन आंतरिक संघर्षं की चर्चा रह गई। इसे भी वलते चलते समझते चलें तो बेहतर होगा। आंतरिक संघर्षां मे ंहम अपनी क्षमताओं, कमजोरियों, अपनी सीमाओं, अपने कम्फर्ट जोन से बाहर निकलने आदि से डरते हैं। हमें अपनी सीमाओं और उड़ान का एहसास नहीं होता कि मेरी ख़ुद की क्षमता व सामर्थ्य कितनी है। जब हम अपनी क्षमताओं को पहचान लेते हैं तब रिस्क और संघर्षोंं से जल्दी और समुचिततौर पर बाहर निकल पाते हैं। नहीं तो हमारी अधिकांश ऊर्जा आंतरिक और बाह्य संघर्षां से लड़ने और उबरने में खत्म हो जाती है। जब हमें संघर्षां के उपरांत मिली सफलता का आनंद लेना होता है उस वक़्त भी जीवन संघर्षों में ही बसर करना हमारी मजबूरी हो जाती है। 

Wednesday, May 9, 2018

ये कैसी इबादत है लला!!!




कौशलेंद्र प्रपन्न 


ये कौन सी पाठ पढ़े हो लला मन लेत हौ देत छटाक नहीं...। कुछ ऐसी ही स्थिति कई बार राजनीतिक लोगों की ओर से आने वाले बयानों में लगता है। हाल ही में हरयाण के मुख्यमंत्री ने कहा और बाद में अपने वक्तव्य से में काफी ऑल्टर भी किया जैसा कि अकसर राजनीतिक लोग किया करते हैं। मसलन मेरा यह मतलब नहीं था। मेरे बयान को तोड़मरोड़ कर पेश किया गया आदि। तो बात हो रही थी इबादत की। फरमाया गया कि खुले में इबादत यानी नमाज़ की इज़ाजत नहीं होगी। तर्कोंं से पुल भी बांधे गए। अपनी बात व फरमान को सही ठहराने के लिए विभिन्न किन्तु परंतु का भी सहारा लिया गया। इबादत किसी की भी की जाए। पूर्जा अर्चना कोई भी करे। रत जग्गा किसी भी समुदाय की ओर से आयोजित की जा रही हो। रात भर जागरण कोई भी गाए। इसमें किसी को क्यों और कब आपत्ति हो सकती है? कब कोई अपनी आवाज़ कोर्ट व थाने में उठाता है? यह तब विरोध और बंद करने की मांग उठती है जब समाज के बुढ़े, बच्चे, बीमार, परीक्षार्थी प्रभावित होते हैं। कायदे से समय और स्थान को ध्यान में रखा जाना चाहिए इसमें किसी को भी कोई गुरेज़ नहीं होना चाहिए। 
इस बयान से पहले भी कई बार कोर्ट की ओर से आदेश आ चुके हैं कि रात ग्यारह के बाद कहीं कहीं दस बजे के बाद, म्यूजिकख् इबादत की अनुमति नहीं होगी। लेकिन हम जिस समाज में रहते हैं वहां यह भी देखते हैं कि खुलआम रात की पार्टियां, पूजा अर्चना, नाच गाने आदि धड़ल्ले होते हैं। कई लोग समय सीमा तोड़ने में अपनी शान समझते हैं। जबकि उन्हें यह भी सोचना चाहिए कि आस-पास रहने वाले बीमार, बुढ़े व बच्चे को कितनी दिक्कत होती होगी। आज आप कर रहे हैं कल आपको ही देखकर आपका पड़ोसी करेगा। उसके पास कौन से पैसे की कमी है। 
पूजा-अर्चना, नमाज़ आदि अत्यंत व्यक्तिगत और एकांत की साधना एवं कर्म है। एक बात समझनी होगी कि जो हमारा ऐकांतिक कर्म है उसे इतने खुले और प्रदर्शन के तर्ज़ पर करने से क्यां गौरव और अपनी मान्यताओं को मनवाने की ज़िद रखते हैं। हमें हमारी निजी मान्यताओं, सांप्रदायिक उत्सवों एवं आयोजनों में वैश्विक और समष्टि की सोच रखनी चाहिए। हालांकि यह कहना और करना बेहद मुश्किल है। किन्तु शुरू के कुछ मुश्किलातों को यदि पार कर गए तो नई पीढ़ी के लिए आदर्श हो सकते हैं। हज़ारों बच्चों, बुढ़े की दुआएं भी साथ होती हैं। जिन्हें आपने अपनी रात भर की चीखों, फिल्मी तर्ज पर पूजा-अर्चना, नाच-गान के शोर से निज़ात दिला दी। 
दरअसल शुरू कौन करे। कौन आगे आए और कह सके हमें मंदिर व मस्जिद में ही इबादत करनी है। यदि जगह है तो तमाम उत्सवों को तय परिसर में ही संपन्न किया जाएगा। इसके लिए किसी न किसी को तो लीड लेनी पड़ेगी। जो चुप्प हैं, ख़ामोश तामाशे में शामिल हैं उनसे बदलाव की उम्मीद करना बेईमानी होगी। यदि समाज में इस प्रकार की साम्प्रदायिक आयोजनों, सार्वजनिक उत्सवों, पूजा-अर्चना, इबादतों आदि कम करना है तो किसी ने किसी को तो आगे आना होगा। कब तक हम हमज सरकार, न्यायपालिका, कार्यपालिका आदि से ही उम्मीद करते रहें कि अब लोकतंत्र के चारों खम्भों के ज़रिए ही बदलाव घटित हो सकता है। ऐसे स्थिति पर नज़र डालें तो पाएंगे कि समय समय पर सरकार बेशक आंखें मूंद ले लेकिन न्यायपालिक बड़ी ही शिद्द से अपनी जिम्मेदारी निभाती है। इसी का परिणाम है कि साम्प्रदायिक पूजा स्थलों के नाम पर जिस प्रकार से अवैध सरकारी भूमि को हथियाया जाता है इस बाबत कोर्ट कई बार निर्देश जारी कर चुकी है। मंदिर व मज़ारों के नाम पर कई राज्यों, शहरों में महत्वपूर्ण स्थलों पर अवैध निर्माण कर साम्प्रदायिक पूजा-अर्चना स्थल में तब्दील किया जा चुका है। 
इबादत तो बिना किसी शोर और प्रपंच के किए जाते हैं। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने की एक कविता की पंक्ति उधार लेकर कहूं तो ‘‘प्रभू जी जब हारा हूं तब न आइए...’’ यहां तो मंज़र यह है कि जब भी उत्सव करने का मन करता है। मनोरंजन का माहौल बनाना होता है तो रत जग्गा का आयोजन खुले में सड़क और गली को घेर कर किया करते हैं। 

Tuesday, May 8, 2018

बच्चों को परीक्षा शुरू








कौशलेंद्र प्रपन्न 



बच्चों को परीक्षा शुरू होने से तकरीबन ढाई घंटे पहले परीक्षा केंद्र में प्रवेश कराया गया। परीक्षा दस बजे शुरू होनी थी और बच्चों को 7.30 से 8.30 के बीच ही प्रवेश करना था। प्रवेश भी कोई मामूली नहीं कहा जाएगा। बच्चे सुबह सुबह बिना खाए पीए परीक्षा देने पहुंच गए। गेट पर ही चप्पल, जूते, शर्ट, पैंट, बालों तक की तलाशी ली गई। बच्चियों को तो कान की बाली भी निकालनी पड़ी। बालों के स्टॉइल की भी तलाशी हुई। 
अगर आपको याद हो तो पिछले माह विभिन्न अख़बारों में विज्ञापन आए थे कि परीक्षा केंद्र पर बच्चियां पोनी टेल भी बना कर नहीं जा सकतीं। खुले बाल होंगी। कानों में बालियां नहीं होगी आदि। इससे पहले भी विभिन्न राज्यों से आने वाली ख़बरों पर नज़र डालें तो पाएंगे कि लड़कों की पैंट तक उतरवा दी गई थी। बच्चे कच्छे में बैठकर पेपर दे रहे थे। सोचने वाली बात यह भी है कि आख़िर इस कदर अविश्वास की स्थिति ही क्यों पैदा हुई। क्यों हमें अपने ही बच्चों पर विश्वास नहीं रहा। गोया बच्चे परीक्षा देने नहीं बल्कि नहाने धोने जा रहे हैं। 
परीक्षा में पेपर का लीक होना, परीक्षा के दौरान अनियमितताएं होना आदि हमारी परीक्षा की प्रकृति और पूरी परीक्षा प्रणाली को संदेह के घेरे में ला खड़ी की है। पिछले दिनों तमाम परीक्षाओं के प्रश्न पत्र लीक हुए। इसके जद में बड़ी से बड़ी संस्थाएं शक के घेरे में आईं। परीक्षा आयोजित करने वाली संस्थाओं को जांच एजेंसियों के हवाले किया गया। यह कहीं न कहीं हमारी स्वयं की शिक्षा और परीक्षा को लेकर जिम्मेदारी पर सवाल खड़े करती है। 
परीक्षा तो शिक्षा के साथ चलने वाली समानांतर प्रक्रिया हो चुकी है। हां यह अगल मसला है कि समय के साथ परीक्षा और परीक्षार्थीं के मायने और प्राथमिकताएं बदल गई हैं। परीक्षा तो महाभारत काल में भी होता था। बस अंतर इस बात की है कि तब पात्रों की परीक्षा होती थी। तब शायद अंक नहीं, ग्रेड नहीं बल्कि दक्षता की पड़ताल होती थी। धीरे धीरे दक्षता और कौशल जांचने की बजाए हम अंकों पर सिफ्ट हो गए। आज की तारीख में बच्चों को शिक्षा के स्तर और गुणवत्ता की चिंता से ज़्यादा अंकों और ग्रेडों की चिंता होती है। बिना अंकों के उन्हें तथाकथित अच्छे नामी कॉलेजों में दाखिला नहीं मिल पाता। जब उन्हें इसकी चिंता होती है कि कैसे अच्छे अंक आएंगे तब वे या उनके अभिभावक दूसरे रास्तों की ओर मुड़ते हैं। 
कई बार महसूस होता है कि उच्च शिक्षा का केंद्रीकरण हो चुका है। दिल्ली ही वह केंद्र है जहां उच्च शिक्षा बेहतर चल रही है। यही वजह है कि देशभर के तमाम युवाओं का सपना दिल्ली के किसी भी कॉलेज में दाखिला लेना होता है। जबकि यदि राज्य स्तरीय कॉलेज बेहतर होते तो वे युवा क्योंकर दिल्ली में धक्के खा रहे होते। हमें अपनी उच्च शिक्षा की गुणवत्त को विकेंद्रीकृत करने की आवश्यकता है। हालांकि पहले पटना, इलाहाबाद, हैदराबाद आदि भी उच्च शिक्षा के केंद्र हुआ करते थे। लेकिन समय के साथ इन संस्थानों को बढ़ाने की बजाए हमने इन्हें हाशिए पर धकेलने का काम किया। इसी का परिणाम है कि आज अपने समय के स्थापित शिक्षा केंद्र ध्वस्त होते चले गए। जो बचे हैं वे बुनियादी संसाधनों, समुचित प्राध्यापकों की बदहाली से त्रस्त हैं। 
परीक्षा तो तब ली जाए जब कॉलेज में शिक्षण विधिवत हुआ। पिछले दिनों एडीटीवी पर प्राइम टाइम में रवीश कुमार ने तकरीबन 28 कड़ियों में उच्च शिक्षा की दशा दिशा का एक विकास यात्रा किया। उन तमाम स्टोरी से गुजरते हुए यही महसूस हुआ कि हम दिल्ल में बैठ कर उच्च शिक्षा यानी कालेज और विश्वविद्यालयों की शैक्षिक स्थिति का अनुमान नहीं लगा सकते। जहां राज्यों में नियमित रूप से कक्षाएं नहीं चलतीं। जहां परीक्षा और शिक्षा तीन और चार साल पीछे चल रही हो। वहां किस प्रकार की शैक्षिक गुणवत्ता की उम्मीद की जा सकती है। 
ऐसे में हमारे लाखों युवा छात्र/छात्राएं बस हर साल परीक्षा पास कर अगली सीढ़ी पर बढ़ रहे हैं। उन्हें किस ओर जाना है? किस कोर्स में दाखिला लेना है आदि के बारे में कोई मार्गदर्शन करने वाला नहीं। हम शिक्षा बेशक गंभीरता से उन्हें मुहैया न कराएं लेकिन परीक्षा के वक़्त उन्हें कच्छा में बैठाने से नहीं हिचकते। और यही कारण है कि आज परीक्षा शिक्षा पर दबाए बनाती जा रही है। परीक्षा पास करना ही शिक्षा का मकसद हो चुका है। फिर ऐसे में क्यों न किसी भी तरह अंक हासिल की जाए। इसके लिए कुछ भी करना पड़े। इन्हें ही रोकने के लिए सरकार को इस प्रकार के कदम उठाने पड़े। लेकिन परीक्षा में चोरी चकारी न हो इसके लिए शायद और भी तरीके अपनाए जा सकते हैं। हमें इसकी योजना बनाने की आवश्यकता है। न कि बच्चों को कच्छा और शर्ट में परीक्षा में बैठने पर मजबूर किया जाए। इन अविश्वास का ख़मियाज़ा बच्चों को क्यों भुगतना चाहिए। 

Friday, May 4, 2018

लिखते कैसे हैं वो




कौशलेंद्र प्रपन्न
यह सवाल बेहद दिलचस्प और दरपेश है। बल्कि कहना चाहिए यह सवाल अकसर लेखकों, पत्रकारो कवियों आदि से पूछा जाता रहा है। इस सवाल के जवाब में मेरे ख़्याल से काफी कुछ कहा और लिखा जा चुका है। पिछले दिनों इन्हीं सवालों से रू ब रू होना पड़ा। साथ काम करने वालों ने बड़ी हैरानी से पूछा कि आप इतने और रोज़ कैसे लिख लिया करते हैं। क्या कोई मशीन है? वो कौन सी ताकत है जो रोज़ लिखा ले जाती है आदि। इन सवालों से बड़े-बड़े लेखक, पत्रकारों एवं कवियों आदि को अपने समय में सामना करना पड़ा है। सबने अपने अनुभवां के आधार पर जवाब भी देने की कोशिश की है।
पहले पहल तो लेखक,कवि,पत्रकार आदि कोई दूसरी दुनिया का जीव नहीं होता। वह भी इसी समाज में हम सब के साथ रहा करता है। जैसे अन्य लोगों को जीवन में तरह तरह के अनुभवों से गुजरना होता है वैसे ही एक लेखक भी उन अनुभवों को जीता, पकता, बेचैन होता है। अंतर बस इतना है कि सामान्य व्यक्ति अपने अनुभवों, निजी एहसासातों को अपने में ज़ज्ब कर जीता है। किसी से कहता भी है तो वह आत्म पीड़ा के तौर पर रो गा कर चुप हो जाता है। लेकिन एक लेखक, कवि जिन हालातों से गुजरता है। उन्हें बड़ी शिद्दत से महसूसकर शब्दों में बांधने की कोशिश करता है। वह प्रयास करता है कि जो मेरे साथ गुजरा है, वह दुनिया के किसी न किसी कोने में किसी की भी निजी टीस हो सकता है। मैं जैसा महसूस कर रहा हूं। मैं जैसे इन हालातों से निकलने की कोशिश कर रहा हूं। उन औजारों से क्यों न औरों को भी वाकिफ कराउं। क्या पता औरों को मेरे अनुभव व कहानी से कुछ रोशनी मिले। क्या मालूम मेरा लिखना किसी की ज़िंदगी को बेहतर राह पर ला पाएं। लेखकों, कवियां आदि का मकसद लेखन से हमज आत्मतुष्टी, आत्मसंतोष और प्रसिद्धी हासिल करना ही नहीं होता बल्कि वह वैश्विक स्तर पर अपने तजर्बों को बांटने में विश्वास करने लगता है। इन्हीं ताकतों के आधार पर वह कुछ लिख पाने की कोशिश करता है।
विचारों, भावनाओं को बांध पाना, रोक सकना या फिर दुबारा जीना कोई आसान काम नहीं होता। बल्कि इस शब्द साधना में समय, श्रम, धैर्य, अभ्यास आदि बहुत काम करते हैं। बिना अभ्यास, प्रयास, चिंतन, पुनर्चिंतन, विचारों को शब्दों में ढालने के धर्यपूर्ण साधना के कोई लेखक नहीं लिख सकता। लिखने के लिए जिन चरणों के बारे में स्थापित और प्रसिद्ध लेखकों ने अपनी राय रखी है यदि उन पर नज़र डालें तो वे कुछ इस प्रकार की हो सकती हैं-
विचार, अनुभव, घटना, कोई वाकया आदि को देखना, अनुभव करना, उन अनुभवों की गहराई को महसूस करना, उन्हें तटस्थ होकर निरीक्षण करना, जहां भावनाओं की आवश्यकता हो वहां भावनाएं, संवेदना को प्रयोग करना, टाइम मैनेजमेंट, थॉट मैनेजमेंट, आकार प्रकार, शैली, फारमेट को चुनाव और अंत में भाषा, शब्दों आदि का चयन। इन्हीं सोपानों के ज़रिए कोई भी लेखक,कवि, पत्रकार आदि लिखा करते हैं।
हमें अपने विचारों को वो भी इतने चंचल होते हैं जिन्हें रेक पाना, बांध पाना बेहद श्रम साध्य और अभ्यास की मांग करता है आदि को ठहकर देखना,महसूसना तो एक प्रक्रिया है। लेकिन अब लेखक को महसूसे हुए अनुभव को कैसे, कब, कहां, क्यों प्रसारित करना है, क्यों लिखे कवि,लेखक, पत्रकार इन सवालों का जवाब ख़ुद को पहले देना होता है। तब तलाश की जाती है कहां, किसके लिए लिखना है।
क्योंकि कई बार नए लेखकों की शिकायत होती है कि उनके लेख छपते नहीं। संपादक लौटा दिया करते हैं। आदि इन सवालों का हल यही है कि लिखने से पहले किनके लिए, कब,कहां लिखना चाहते हैं उसके फारमेट को ध्यान में रखना होगा। उस पत्र-पत्रिका की प्रकृति और पन्नों के स्वरूप और स्थान को भी लिखने से पहले ध्यान में रखना होगा तब आपकी रचना अस्वीकृत नहीं हो सकेगी। इस काम के लिए अभ्यास, अध्ययन, पैनी नज़र और समय की दिशा पर पकड़ बनाना बेहद ज़रूरी होता है। इन्हें नकार कर या नज़रअंदाज़ कर कोई लिख नहीं पाएगा।
लिखने से पहले हज़ार बार सोचना भी मानिख़ेज होता है कि क्यों लिखना है, किसके लिए लिखना है आदि। इससे क्या हासिल होगा। इसलिए समाज में ऐसे भी लेखक और कवि आदि हैं जो निरंतर लिख रहे हैं लेकिन कहीं छपने की चाह उन्हें नहीं होती। मेरा ऐसा मानना है कि यदि लेखक कवि, पत्रकार आदि लिख रहे हैं तो उस पर नागर समाज का हक है। हक़ यह भी है कि लेखक, कवि आदि जिस समाज में रह रहे हैं वे भी नागरीय जिम्मेदारी के तहत लिखें और समाज में अपने शब्दों के ज़रिए अपनी राय रखें। क्या पता एक प्रतिशत भी असर आपके लिखने के होता है तो लेखकीय प्रतिबद्धता का एक अंश पूरा हो जाता है।
लिखने से पहले, लिखने के बाद अपने विचार, अनुभव,शब्दों के चुनाव, प्रस्तुती आदि पर काफी काम करने की आवश्यकता होती है। यदि कोई लेखक इनसे बच बचाकर लिखता है तो वह कहीं न कहीं लेखकीय जवाबदेही से न्याय नहीं करता।

Thursday, May 3, 2018

वायदे का तारीख़ बना जाना



कौशलेंद्र प्रपन्न
वायदे कई स्तरों पर कई लोगों, संस्थानों, सरकारों की ओर किए जाते हैं। कुछ वायदे पूरे होते हैं। कुछ बीच राह में ही दम तोड़ देते हैं। कुछ तो ऐसे भुला दिए जाते हैं गोया कभी किए ही न गए हों। जो वायदे याद रह जाती हैं उसका फॉलोअम किया जाता है। जो भूल जाते हैं वे तारीख़ों में दर्ज़ हो जाते हैं। वायदों का भी अपना इतिहास हुआ करता है। उन इतिहासों में जाना इस लेख का मकसद नहीं है। लेकिन इतनी अपेक्षा तो ज़रूर की ता सकती है कि हम किन वायदों को भूल जाते हैं और किन्हें हमेशा हमेशा याद रखते हैं।
सरकारी वायदे व घोषणा कह लें सबसे ज़्यादा की और भुलाई जाती हैं। ही सरकार सत्ता में आने से पहले नागरिकों से किया करती है। सत्ता में आने के बाद उनमें से कुछ को भी मुकम्मल अंजाम तक पहुंचा पाते हैं। बाकी के वायदे इतिहास के पन्नों में दर्ज हो जाते हैं। जिन्हें गाहे ब गाहे जनता याद कराया करती है तब हम तरह तरह के बहानों, परिस्थितियों का हवाला देकर नागरिक को बरगलाते रहते हैं। घोषणा और वायदे में न तो सरकार पीछे रहती है और न हम। हम भी कई बार अपने वर्कस्टेशन पर, आफिस में, आफिस के लोगों को वायदे करते हैं। हम यह कर देंगे। वह कर देंगे। यह काम पूरा कर लेंगे। कुछ वायदे जॉब में आने से पहले इन्टरव्यू में किया करते हैं। जब जॉब में आ जाते हैं तब काफी वायदे इतिहास हो जाया करती हैं। बार बार याद दिलाने पर उन वायदों में से कुछ को पूरा कर देते हैं।
रिश्तों में भी तो हम वायदे किया करते हैं। दूसरे शब्दां में घोषणाएं किया करते हैं। शादी से पहले कुछ वायदे होते हैं और शादी के बाद जब चेक लिस्ट बनती है किन किन वायदों को पूरा किया गया तब रिजल्ट कुछ और ही निकलता है। इसे ऐसे भी समझें कि कुछ वायदे शादी के पहले मनुभावन, लोकलुभावन ही होते हैं। यह कहने वाले और सुनने वाले दोनों ही समझते हैं लेकिन मन है कि मानने से इंकार नहीं करता। दूसरे वायदे शादी के बाद की होती हैं। ये घोषणाएं जांची और समय समय पर इत्तला की कराई जाती हैं कि तुमने तो यह कहा था। तुमने तो यह भी कहा था लेकिन तुमने तो पूरा नहीं किया। अब आप यह तो नहीं कह सकते कि वह तो यूं ही कह या था। ठीक उसी तरह किसी भी रिश्ते में इसे जांचा और परखा जा सकता है। दोस्त ही कम हैं क्या जांचने के लिए। हम अपने दोस्तों के बीच भी वायदे किया करते हैं। लेकिन वे वायदे कितने पूरे होते हैं यह तो वास्तविकता की जांच में मालूम होता है कि काफी वायदे खाली के खाली अब भी वहीं पड़े हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो वायदे उन्हीं चीजों, मदद की करनी चाहिए जो हम पूरा करने के सामर्थ्य रखते हों। जिन्हें हम पूरा नहीं कर सकते उसके बारे में इंकार करना ज़्यादा बेहतर है बजाए कि किसी भी अपेक्षा को बढ़ा दिया जाए। जब अपेक्षाएं व उम्मीद टूटती है तब इसकी आवाज़ बाहर तो सुनाई देती लेकिन व्यक्ति अंदर टूट जाता है।
हम अपनी जिं़दगी में झांक कर देखें कितने की वायदे किया करते हैं। कई बार ख़ुदी से वायदे करते हैं और कई बार औरों से। ख़ुद से किए गए वायदे का हालांकि कोई पूछनहार नहीं होता। ऐसे में सावधानियों का घटना, भूल जाना आदि की संभावनाएं ज़्यादा होती हैं। वायदे पूरे न होने पर हम भिन्न तरह के बहानों से ख्ुद को बहला लेते हैं। लेकिन कभी हम अकेले में ख़ुद से पूछते हैं कि जो वायदे हमने पूरे नहीं किए उसका ख़मियाज़ा कौन भुगतता है। हमें ही अपने वायदों के परिणाम भी भुगतने पड़ते हैं। इसलिए यदि हम ख़ुद से भी वायदे कर रहे हैं जो चौकन्ना रहना चाहिए। वायदे पूरे होंगे या फेल होंगे यह निर्भर करता है कि हम उन्हें पूरी करने के लिए कितने सजग और जागरूक हैं। वरना वायदे तो होते ही हैं फेल होने के लिए। फिल्म का गाना भी तो है- ‘‘वायदे हैं वायदे का क्या...’’ दूसरा एक और मौजू गाना प्रासंगिक है-‘‘मिलने की तुम कोशिश करना वादा कभी न करना, वादा तो टूट जाता है।’’सो ख़ुद से भी झूठे वायदे करने से बचें। जो वायदें करें उसके प्रति जवाबदेही तो रखनी बनती है।

Wednesday, May 2, 2018

प्राथमिकता, प्रयास और सफलता



कौशलेंद्र प्रपन्न
यह कोई नई बात नहीं की जा रही है बल्कि लंबे समय पर इसपर कई तरह बात की जा चुकी है फिर क्या वजह है आज इस पुराने मुद्दे पर लिखने की आवश्यकता महसूस की गई। वज़ह है मनोविज्ञान में कहा जाता है जब हम किसी भी चीज व आदतें हों, काम हो, विचार हो उसे बार बार दुहराते हैं तब वह हमारी लॉग टर्म मेमोरी का हिस्सा हो जाती हैं। यानी जिस भी विचार, आदत को हम अपने जीवन में जितनी बार दोहराते हैं वह हमारी स्थायी स्मृति का हिस्सा हो जाती हैं। उसे भूलना तकरीबन मुश्किल होता है। यह दोहराव तय करता है कि कौन सा कंटेंट, कौन सा वाकया हम अपने लिए चुनते हैं। कौन सी घटना, कौन सी परिस्थितियों को हम भूलना नहीं चाहते। यह तय करता है हमारे जीवन की प्राथमिकता। प्राथमिकता तय हो जाने के बाद हम उसे सफलता तक पहुंचाने के लिए प्रयास किया करते हैं। जब हम प्राथमिकता तय कर चुके होते हैं तब हमारी कोशिशें, हमारे बरताव, हमारी जीवनचर्या भी उसी के अनुसार निर्धारित होने लगती है। जहां भी जाते हैं, जो कुछ भी सुनते-पढ़ते, देखते हैं उसमें हमारी प्राथमिकता एक अहम भूमिका निभाती है। दूसरे शब्दों में कहें तो हमारी जीवन की प्राथमिकताएं ही जीवन की दिशा भी तय किया करती हैं।
सबसे पहले हमें अपने जीवन से क्या चाहिए यह तय करना होता है। हम जीवन को बने बनाए रास्ते, बनी बनानी मान्यताओं पर ही हांक देना चाहते हैं या कोई और रास्ते का इज़ाद करना चाहते हैं। जब हम यह तय कर लेते हैं तब हम अपने जीवन में प्राथमिकताएं तय किया करते हैं। जो एक सुनियोजित रणनीति और प्लानिंग की मांग करता है। क्योंकि जीवन में करने और खोने को बहुत कुछ है। यदि उन्हीं खाने पाने में उलझे रहे। कौन क्यों आपसे रूस गया? क्यों फलां आपसे अब ठीक से बात नहीं करता। अब वह आपके साथ घूमता नहीं आदि आदि। यह आपकी प्राथमिकता है तो आपकी दूसरी ज़रूरी चीजें जिसे आपने चाहा है। जिसे आप शिद्दत से पाना या होना चाहते हैं वह बाधित होती है। कई बार अर्जुन की दृष्टि हासिल करना बेहतर होता है जिसमें हमें हमारे जीवन में जो पाना चाहते हैं वही दिखाई दे। आस-पास की लुभावनी चीजें बहुत हैं जो बार बार आपको भटकाएंगी। यदि बीच में ही भटक गए। ठहर गए तो आपने जो सपना देखा था वह चकनाचूर तो होना ही है।
उपनिषद् की एक कहानी यहां कहना बेहद मौजू होगा। नचिकेता ने यमराज से कुछ सवाल किए। उन सवालों ने तय किया। उन सवालों की संरचना पर नज़र डालें तो पाएंगे कि वह नचिकेता अपनी प्राथमिकता में कितना स्पष्ट था। उसे मालूम था कि उसे क्या चाहिए। उसने यह भी तय कर रखा था कि उसे यमराज से कितना क्या और कैसे पाना है आदि। बीच बीच में यमराज किसिम किसिम के प्रलोभन देते हैं। राजपाट, आभूषण, धन आदि। यदि नचिकेता अपनी प्राथमिकता से समझौता कर लेता तो उसे जीवन, आत्म आदि के रहस्य जानने की प्राथमिकता पीछे रह जाती। ठीक उसी प्रकार जीवन में भी कई प्रकार के यमराज आया करते हैं। कई तरह के प्रलोभन-पद, पैसे, स्त्री सुख आदि दिया करते हैं। यदि आप अपनी प्राथमिकता से समझौता कर लेते हैं तब आप अपने जीवन के लक्ष्य को पाने में पिछड़ जाते हैं।
इसे इस तरह भी समझ सकते हैं कि जब हम अपने जीवन के लिए प्राथमिकताएं तय करते हैं तब बहुत सी चीजें हमारी प्राथमिकताओं के निर्धारण में भूमिका निभाती हैं। अभिभावक, दोस्त, परिवेश, संस्कृति आदि। रास्ते, सुझाव हमें कई ओरों से सुनने को मिलती हैं। अंत में हमें ख़ुद तय करना होता है कि हमें इनमें से क्या और कितना चाहिए। हम कैसे अपने लक्ष्य को पा सकते हैं इसके लिए अब प्रयास जिसे एर्फ्ट कहते हैं। एक्शन कहते हैं करना होता है। जब तक एर्फ्ट यानी प्रयास नहीं करेंगे तब तक सफलता की उम्मीद करना बेकार है। जब सफलता नहीं मिलती तो हम अपने प्रयास को जांचने की बजाए परिस्थितियों को कोसने लगते हैं। बजाए कि हमने अपने लक्ष्य को पाने के लिए किस प्रकार के और कितनी शिद्दत से प्रयास किए इसे जांचने, पुनः जांचने, समझने के हम अपने लक्ष्य और प्राथमिकताएं बदलने लगते हैं। हम अपने लक्ष्य और प्राथमिकताओं से समझौता करने लगते हैं।
यदि प्राथमिकता तय की है तो हमें प्रयास और प्रयास के स्तर क्या होंगे इसे भी निर्धारित करना बेहद ज़रूरी है। जब हम प्रयास और दिशा भी तय कर चुके होते हैं तब हमें उस लक्ष्य को पाने के लिए क्या क्या और कौन कौन से एप्रोच हो सकते हैं उसे स्पष्टतौर पर तय करने होते हैं। इन्हीं स्पष्ट रणनीतियों, एप्रोचों, प्लांनंग और एक्जीक्यूशन पर हमारा जीवन प्रोजेक्ट, या कोई भी प्रोजेक्ट चला करता है। उक्त तत्वों की स्पष्टता और मानवीय इच्छा शक्ति पर निर्भर करता है हमने जो शुरू में अपने लिए प्राथमिकताएं तय की थीं क्या वह सफल हो पाईं। वरना तो पूरी उमग्र पड़ी है कोसने की उसने, इसने, ऐसे, परिस्थितियों आदि ने साथ नहीं दिया वरना हम भी काम के ही थे।

Tuesday, May 1, 2018

इमोशनली यूज़ होने से बचें



कौशलेंद्र प्रपन्न
हम कई स्तर पर लाइफ में यूज़ हो रहे होते हैं। कई बार हमें एहसास होता है कि हम यूज़ किए जा रहे हैं या यूज़ हो रहे हैं। लेकिन हमें इस यूज़ होने में मजा आ रहा होता है। हम अपने आप को यूज़ होने से मना नहीं कर पाते। क्योंकि उस यूज़ होने में हमें आनंद आता है। उदाहरण क्या बताना आप तो समझते ही हैं जैसे बच्चों द्वारा मा-बाप को यूज़ करना। मां-बाप के द्वारा बच्चों का यूज़ करना। देस्तों के बीच भी यूज़ करने की परिपाटी खूब है। इससे कोई मुंह नहीं मोड़ सकता। वहीं कई रिश्ते ऐसे भी हुआ करते हैं जिसमें हमें मालूम होता है कि हम यूज़ किए जा रहे हैं लेकिन मना करने की हिम्मत नहीं होती। वैसे ही कई बार हम अपने दफ्तर में यूज़ किए जा रहे होते हैं लेकिन इतनी ताकत नहीं होती कि आप यूज़ होने से ख्ु़ाद को बचा लें या पीछे खींच लें। क्योंकि यह आपको भी मालूम है कि यदि आपने यूज़ होने से इंकार किया तो उसका असर दूरगामी हो सकता है। फिर शिकायत मत करना कि हमें क्यों यूज़ नहीं किया। आज तो दफ्तर हो या घर, दोस्त हों या देश हर जगह लोग यूज़ होने के लिए तैयार बैठे हैं। कोई तो यूज़ करे और सफलता, सुख, उपलब्धि की ओर धकेले। ऐसे यूज़ एंड थ्रो के जमाने में स्थायी कुछ भी नहीं होता। यदि आप यूज़ होने के लिए कब से रेडी तैयार बैठे हैं तो फिर क्या कहने। आपही का सिक्का चलेगा। बल्कि बजेगा। इतना बजेगा कि कोई सुनने वाला आपसे जलने लगेगा।
यूज़ एंड थ्रो का बजरीया चलन अब हमारे रिश्तों में भी आ चुका है। जब जिसकी ज़रूरत होती है हम उसके पास उससे चिपक लेते हैं। काम निकाल लेते हैं। जैसे ही काम निकल चुका होता है फिर अपने अपने रास्ते हो लेते हैं। आप कौन और मैं कौन की स्थिति आ जाती है। जब आप अपने ही घर में यूज़ किए गए या हो रहे हों तो इसकी शिकायत किससे करेंगे। कौन नहीं हंसना चाहेगा। हर किसी के लिए आपका यूज़ होना एक रोमांच और मनोरंजन का विषय बनता है। ऐसे में आप किसी से भी अपनी बात, एहसासात साझा नहीं करते। क्योंकि आप इस कदर यूज़ हुए हैं कि किसी को बता नहीं सकते। मन ही मन ख़ुद को कोसते हैं कि काश समय रहते ख़ुद को यूज़ होने से बचा लेता। काश इमोशनल न होता। काश ! समझ पाता कि अचानक रिश्तों में यह गरमाहट क्यां आ रही है। कभी तो वक़्त था कि न चिट्ठी, न फोन, न आना न जाना कुछ भी तो नहीं था। फिर अचानक ऐसा क्या हो गया कि प्यार के सोते निकल पड़े आदि आदि।
सच पूछिए तो हम पहले पहल घर में कई स्तरों पर यूज़ हो रहे होते हैं। उसे अगल अलग नामों से जानते हैं। बबुआ है। अपना बच्चा है। भाई है न! मेरी बात नहीं मानेगा? अरे अरे!! अपने बड़ों से ऐसे जवाब लड़ाते हैं आदि आदि। लेकिन यह भी सच है कि कई बार हम इन इमोशनल परिवेश में ठग लिए जाते हैं। छल लिए जाते हैं। बल्कि यूज़ कर लिए जाते हैं। हमें इसका एहसास बहुत बाद में होता है। वो भी तब जब खेत की लिखा पढ़ी हो चुकी होती है। जब पिता के एकाउंट से पैसे निकाल लिए जाते हैं। दूसरा स्तर घर में जो किसी भी स्तर पर यदि कमजोर है तो उसे कौन यूज़ नहीं करता। हर कोई अपने अपने तरीके से कोई खखार कर, कोई दबे पांव, तो कोई प्यार से आपको यूज़ करते हैं। हम जानते समझते हुए भी ख़ुद यूज़ होने से नहीं बचा पाते।
बात सिर्फ घर की नहीं है। बल्कि यह हक़ीकत तो दफ्तर की भी है। इस दफ्तर की कहानी में बस पात्र बदले होते हैं। स्थान बदला होता है। लोगों के स्वार्थ के मायने बदले होते हैं। और कोई बड़ा अंतर आप नहीं देख सकेंगे। कोई आपके स्वभाव का फायदा उठाता है (इसे यूज़ पढ़ें), कोई आपके इतिहास का लाभ उठाते हुए आपको यूज़ करता है। तो कई ऐसे भी मिलेंगे जो आपसे चिकनी चुपड़ी बातें कर आपको आसमान में चढ़ाकर धीरे से अपनी बात, ज़रूरत सरका देते हैं और आप यूज़ होने से रोक नहीं पाते। वहीं आप बॉस से तो हंसते हंसते यूज़ हो जाया करते हैं। बॉस से यूज़ होने में एक अगल किस्म का सुख मिलता है। हमें लगता है काश! और यूज़ हो पाता? कितना अच्छा होता कि हमें यूज़ होने का और मौका मिलता। लेकिन हम कहीं न कहीं अपनी जमीर को धोखा दे रहे होते हैं।
सावधान रहें। चौकन्ने रहें। यूज़ हों लेकिन अपनी शर्तों पर। जानते समझते हुए यूज़ हों। आपको मालूम हो कि आप यूज़ किए जा रहे हैं। लेकिन उसके लिए आपके मन में या कभी भी यह एहसास न हो कि आप ग़लत यूज़ किए गए। आप इमोशनली यूज़ न हों।

Monday, April 30, 2018

नदी सी थी तुम-



याद है मुझे,
धीरे धीरे किनारों से टकराती,
बहती रही न जाने किन किन कंदराओं,उपत्यकाओं से गुज़रती रही,
बिन कुछ कहे।
धार में तेरे,
निमग्न होती रही पीढ़ी,
बहती रही हमारी उम्र से आगे,
निकल गई।
हम तुम्हें छोड़ बस गए नगर नगर,
शहर दर शहर,
ल्ेकिन तुम संग रही,
हमेशा ही रगों में दौड़ती रही।
त्ुम नदी थी तुम्हें समंदर में जाना ही था,
मिलना ही था सागर में,
तुम्हें ख़ुद को खोना नहीं था।

Friday, April 27, 2018

भूल गया, भूल कैसे जाते हैं हम



कौशलेंद्र प्रपन्न
हमें अकसर सुनने को मिलता है कि यार भूल गया बताना। कैसे भूल सकता है कोई? क्यों हम भूल जाते हैं? भूलने के बाद डांट खाते हैं। लेकिन जो नुकसान होना था वह हो गया। यदि आपको बजट बनाकर अपने बॉस को भेजना था जिसे आपका बॉस किसी और के सामने पेश करने वाला था, अब उसकी स्थिति का अंदाजा लगा सकते हैं। वह डांट कर भी क्या कर लेगा। आनन फानन में उसे बजट व प्लांनिंग शीट प्रेजेंट करनी पड़ेगी। आपने तो सहजता से कह दिया शॅारी फाईल अटैव करना भूल गया। दरअसल आपने तो अपनी जिम्मदारी का प्रमाण दे दिया कि आपके अपने काम के प्रति कितने चौकन्न और जिम्मेदार हैं। आगे से आप पर विश्वास करने से पहले या काम देने से पहले कोई हज़ार बार सोचेगा। यानी आपने अपने लिए एक संभावना के दरवाजे बंद कर दिए। दूसरी बात हम भूलते तब हैं जब हमें उस काम या सूचना में कोई दिलचस्पी नहीं होती। हम उस काम में रूचि ही नहीं लेते। क्योंकि यदि हमारी रूचि होती। यदि हम अपनी जिम्मदारी व लावबदेही समझते तो भूलते ही नहीं। यह कोई मैनेजमेंंट का फंडा नहीं बल्कि आम जीवन की कहानी है। लेकिन जब सिस्टम में काम करते हैं तो सूचना, ख़बर आदि को तत्काल या सही समय परख् सही व्यक्ति तक पहुंचाना बेहद ज़रूरी होता है। इसलिए भूलें नहीं बल्कि जो बात, ख़बर जिसे देनी हैं उसे उसी समय पर, उसकी आवश्यकता के अनुरूप दे देनी चाहिए।
कोई ख़बर है तो उसे सही तरीके से बिना किसी पूर्वग्रह के पाठकों तक पहुंचाना सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती है। पत्रकार अपने इस काम में बेहद चौकन्ना और जिम्मेदार होता है। मान लीजिए पत्रकार के पास कोई ख़बर आई, किसी प्रकार की सूचना उसे मिली जिससे बेहतर ख़बर बन सकती है वह उस ख़बर को अपने पास रख ले। या फिर तय समय सीमा में स्टोरी में तब्दील न कर देर से दे तो वह ख़बर मर जाएगी। वह ख़बर पुरानी हो जाएगी। अगले दिन हो सकता है उस ख़बर को फॉलोअप करना पड़े। लेकिन पत्रकार ने अपनी लापरवाही या गै़रजिम्मेदाराना रवैए से एक ख़बर की हत्या कर दी। उसी प्रकार हम सबके पास कहने और सुनाने को बहुत सी ख़बरें होती हैं। यदि हम उन्हें सही समय पर और सही तरीके से पाठक या श्रोता तक नहीं पहुंचाएं तो यह प्रकारांतर से ख़बर के साथ न्याय नहीं होगा।
यह तो बात पत्रकारिता की हुई। उसी प्रकार यदि किसी प्रोजेक्ट की बात करें तो कई सारी सूचनाएं, ख़बर, जानकारी ऐसी होती हैं जिसपर तत्काल कदम उठाने होते हैं वरना प्रोजेक्ट की डेड लाइन प्रभावित हो सकती है। ऐसे में प्रोजेक्ट मैनेजर अपने रिपोटिंग व्यक्ति पर काफी हद तक निर्भर रहता है। जैसे ही कोई ऐसी सूचना आई जिसे बिना देरी किए प्रोजेक्ट मैनेजर या प्रोग्राम मैनेजर को मालूम होनी चाहिए उसे उस खबर से अपडेट होना होगा। ऐसे में मानवीय भूलें या भूल भी काफी मायने रखती हैं। कई बार व्यक्ति अनुमान लगा लेता है कि उन्हें तो पता ही होगा। उन्हें कल बता दूंगा। कल नहीं तो मिल कर बता दूंगा आदि। उस व्यक्ति को उस सूचना की गंभीरता नहीं मालूम कि उस ख़बर से प्रोजेक्ट पर ख़राब असर पड़ सकता है। इसलिए कई बार प्रोजेक्ट मैनेजर को आने तई फॉलोअप करना होता है। बार बार पूछना होता है उस प्रोजेक्ट का क्या हुआ? कल की प्लानिंग के अनुसार सार चीजों की तैयारी हो गई या कोई अड़चने आ रही है? आदि। कायदे यह काम रिपोटिंग व्यक्ति की है। क्यों प्रोजेक्ट मैनेजर को फॉलोअप करना पड़ रहा है। यदि व्यक्ति अपडेट लगातार देता रहे तो फॉलोअप करने की आवश्यकता ही नहीं होगी।
मैनेजमेंट में या कहे लें कॉम्यूनिकेशन के क्षेत्र में ख़बर, सूचना को लेकर कुछ महत्वपूर्ण बातें कहीं जाती हैं। संप्रेषण सही समय पर, समुचित व्यक्ति को, सही तरीके से दी जानी चाहिए। किसी कितनी सूचना की आवश्यकता है, कब ज़रूरत है, क्यों ज़रूरत है? क्या वह सूचना उसी के लिए है या किसी और को भी दी जात सकती है आदि को ध्यान रखना होता है। क्योंकि कई बार हम अपनी जिम्मदारी से बचते हुए सही व्यक्ति को ख़बर करने की बजाए किसी और को सूचित कर अपनी जिम्मेदारी बच जाते हैं। जबकि हर ख़बर, सूचना का एक अधिकारी होता है। उसे किसी भी सूरत में वह ख़बर मिलनी ही चाहिए।
एक्टिव कम्यूनिकेशन, प्रो एक्टिव कम्यूनिकेशन, जिसे सक्रिय, निष्क्रिय, तत्पर, आदि के नाम से पुकार सकते हैं। यानी कुछ ऐसे व्यक्ति होते हैं जो ख़बर व सूचना को तत्परता और तत्काल सही व्यक्ति तक सूचना पहुंचा देता है। वहीं कुछ ऐसे भी होते हैं जो थोड़ी सुस्ती बरतते हुए ख़बर पहुंचाया करते हैं। वहीं ऐसे भी लोग होते हैं जिन्हें ख़बर को दबाकर बैठने में आनंद आता है। कई बार ऐसे भी व्यक्ति मिलेंगे जिन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनकी लापरवाही ख़मियाज़ा कई बार पूरी कंपनी, मीडिया हाउस को भुगतना पड़े।
आम जीवन में ही देखें। हमारे पास रोज़दिन विभिन्न सेशल मीडिया के ज़रिए हज़ारों की संख्या में सूचनाएं, जानकारियां हमारे हाथख् आंखों में ठूंसा जाता है। उन खबरों, सूचनाओं के साथ हमारा क्या बरताव होता है? हम किस तरह से पेश आते हैं ख़ासकर फोन पर मिलने सूचनाओं के साथ? कुछ ख़बरें, नज़रअंदाज़ की जाती हैं, कुछ से बेहद परेशान हो चुके होते हैं, कुछ को तो ओपन भी नहीं करते। वहीं कुछ ऐसी ख़बरें होती हैं जिन्हें पढ़कर आपको एहसास होता है कि अच्छा! तो यह हो रहा है आदि। इस प्लेटफाम पर दो किस्म के लोग मिलेंगे। पहला, आपकी सूचनाओं, संदेशों का आनंद तो लेते हैं किन्तु कभी अपनी राय, इच्छा अनिच्छा, पसंदी नापसंदगी आदि से वाकिफ नहीं कराते। उनके लिए सूचना का आना न आना कोई मायने नहीं रखता। इसे ही निष्क्रिय संदेश प्राप्त कर्ता कह सकते हैं। जो पढ़ तो लेते हैं लेकिन कोई राय नहीं देते। अपनी पंसदगी से परिचित नहीं कराते। ऐसे में व्यक्ति एक समय के बाद संदेश भेजना बंद कर देता है। यहीं से शुरू होती है कम्यूनिकेशन गैप, संवाद हीनता।

Thursday, April 26, 2018

इतिहास की यात्रा में सावधानियां


कौशलेंद्र प्रपन्न
इतिहास केवल समाज, देश,काल का ही नहीं होता बल्कि इंसानों का भी होता है। हम अपने इतिहास से कितना भी दूर भाग लें या फिर भागने की कोशिश करें इतिहास हमारा पीछा किया करता है। इतिहास भी तो एक कहानी सी ही है। इसमें तारीख़ें होती हैं। तारीख़ के साथ कुछ घटनाएं होती हैं। उन घटनाओं में कोई पात्र भी तो होता है। हमें उस पात्र से मुहब्बत हो जाती है ज बवह पात्र हंसता है तो हंसते हैं। जब वह रोता है तो देखने वाला रोता है। इंसानों के साथ भी ऐसे पात्र हमेशा ही चला करते हैं। कई बार कुछ पात्र इतने वाचाल हो जाते हैं कि हमारे लिए ही मुश्किलें पैदा हो जाती हैं।
हमारे साथ यही तो एक ख़ास बात है कि हमें इतिहास और अतीत बेहद प्यारा होता है। जब देखो तब हम अपने अतीत को लेकर बैठ जाते हैं। आज की चुनौतियों को कल के औजार से ठीक करने की कोशिश करते हैं। जबकि ऐसा संभव नहीं है। अतीत की घटनाएं, भूलें आज के संदर्भ में एकदम नए आयाम में आती हैं। उनसे उलझने व बाहर आने के औजार भी नए होने चाहिए। लेकिन अफ्सोस कि हम पुराने औजारां से आज की चुनौतियों का समाधान करना चाहते हैं।
इतिहास ख़ासकर इंसानों के साथ हमेशा ही दो तरीके से साथ रहा है। पहला जिसमें हम गौरवान्वित महसूस करते हैं। उसी अतीतीय संवेदना में जीना चाहते हैं। उसे बाहर निकालना ही नहीं चाहते। इसी का परिणाम होता है कि हमारे जीवन के मुहावरे, घटनाएं, कहानियां भी एक ही होने लगती हैं। सुनने वाला कहता है कि फलां कहानी तो आपने तब सुनाई थी। अगर कोई और कहानी हो तो सुनाओ। पक चुके हैं आपकी एक ही कहानी सुन सुन कर। यह अकसर बच्चे अपने मां-बाप या दादा दादी को बोल दिया करते हैं। क्योंकि उनके पास कहने का नया कुछ बचा नहीं होता। अपने ही अतीत को बार बार कुरेद कर आनंद लिया करते हैं।
जब तब कहानी में रोचकता और नयापन न हो तब तक कोई भी सुनने वाला आपमें दिलचस्पी नहीं लेगा। इतिहास भी कुछ कुछ ऐसा ही है। यदि इतिहास का आज की तारीख़ में बता रहे हैं तो पुरानी घटनाओं को आज किस रूप में हमें देखने और सीखने की आवश्यकता है इसपर सोचना होगा। लेकिन हम ऐसा ही नहीं करते। जब हम युवा थे। कॉलेज में पढ़ा करते थे तब कह कहानियां हम अपने बच्चों को साझा किया करते हैं। अपने संघर्षों की कहानी से हमें तो रागात्मक संबंध हो सकता है कि लेकिन सुनने वाले को वही दिलचस्पी हो ऐसी उम्मीद नहीं कर सकते।
इतिहास दरसअल हमें तत्कालीन चुनौतियों,समाजो-सांस्कृतिक हलचलों, परिवर्तनों के बारे में न केवल जानकारी मुहैया कराया करती है। बल्कि हमें आज कैसे वैसी घटनाओं व परिस्थितियों से सामना करना चाहिए इसकी समझ प्रदान करता है। इतिहास व अतीत गमन कोई बुरा नहीं है बल्कि हम कैसे इतिहास में जाकर वहां से सकुशल लौटते हैं यह कुशलता हमें सीखने की ज़रूरत है। इतिहास व अतीतीय यात्रा जितना आसान माना जाता है वह उतना ही कठिन काम भी है। क्योंकि अतीती यात्रा के साथ एक दिक्कत यह है कि हमें अतीत बेहद रोचक लगने लगता है और हम वहीं रहना चाहते हैं। जबकि कायदे से देखा जाए तो जिस प्रकार एक यात्रा अपनी यात्रा से लौट आने के लिए करता है। यदि राहगीर या यात्री रास्ते में या फिर यात्रा में अटक जाएगा तो वह आगे की यात्राएं नहीं कर पाएगा। इतिहास में भी यही होता है हम चले तो आसानी से जाते हैं लेकिन वापसी के लिए चौकन्ने रहना पड़ता है। हमें हमेशा यह याद रखना होता है कि यात्रा के बाद हमें वर्तमान में लौटना भी है। आज की तारीख़ी हक़ीकत को नज़रअंदाज़ करना इतिहास हमें नहीं सीखाता बल्कि इतिहास वह रोशनी प्रदान करता है जिससे हम आज और आने वाले समय का बेहतर बना सकते हैं।

अपने दायरे और सीमा की पहचान



कौशलेंद्र प्रपन्न
हमें हमारे दायरे की पहचान नहीं होती। हमें यह भी नहीं मालूम होता कि हमारी सीमाएं क्या हैं? हमारी क्षमताएं क्या हैं आदि। हम क्या कर सकते हैं और किस हद तक कर सकते हैं इसकी समझ हो तो हमें अपने जीवन में अपने लिए योजना बनाने, सपने देखने में  आसानी होती है। लेकिन अफ्सोसनाक बात यही है कि अधिकांश लोगों का अपनी सीमाओं, क्षमताओं, ताकत एवं दायरे के बारे जानकारी नहीं होती। यह अलग बात है कि क्षमताएं और दायरे बढ़ाई भी जा सकती हैं। लेकिन उसके लिए हमें अतिरिक्त समय, क्षमता, प्रयास और इच्छा शक्ति को बढ़ाने की आवश्यकता पड़ती है। अपनी क्षमता, सीमा और दायरे की चौहद्दी को चौड़ी भी की जा सकती है बशर्ते की हम अपनी कार्यशैली और कार्य दक्षता को समय समय पर मांजा करें और सीखने के लिए तैयार रहें।
हमें कई बार जीवन में अपने दायरे से बाहर भी निकलना होता है। बल्कि निकल कर औरों की ज़िंदगी, कार्य, कार्यशैली को देखने, समझने की आवश्यकता पड़ती है। क्योंकि कोई भी पूर्ण नहीं होता। हमें इसी जीवन में इसी समाज में सीखने का अवसर मिला हुआ है। यह हम पर निर्भर करता है कि हम नई सोच, नए योजनाओं, परिवर्तनों को कितनी उदारता के साथ स्वीकार कर रहे हैं और अपने दायरे से बाहर निकल कर समझने के लिए ख़ुद को तैयार कर रहे हैं।
पिछले दिनों अपने दफ्तर में कार्यरत फाइनांस और एडमिन दे रहे व्यक्ति से बातचीत का मौका मिला। बल्कि दूसरे शब्दों में कहें तो मैंने पहल की कि ज़रा दूसरों के काम को भी समझा जाए। क्योंकि अपने काम के दायरे से बाहर निकल कर दूसरों के कार्य क्षेत्र के बार में अपनी समझ बनाई जाए। वह व्यक्ति भगत हो सकता है, मदन हो सकता है या फिर नाम तो बदलते ही रहेंगे जो चीज नहीं बदलेगी वह है काम और काम की प्रकृति। सो बातचीत में कई सारी बारीकियों सा साबका पड़ा। मालूम चला व्यक्ति बेशक व्यवस्थित तौर पर प्रबंधन का कोर्स न किया हो लेकिन काम करने के दौरान कई सारी दक्षताएं स्वतः ही काम करने की शैली में शुमार हो जाती हैं। जिसे सिद्धांत के तौर पर बाद में पढ़ सकते हैं। हमें में से कई सारे लोग हैं जो निश्चित ही प्रबंधन के कोर्स से नहीं गुजरे होते हैं। लेकिन जिस शिद्दत और दक्षता से काम करते हैं उससे लगता है काश! इनके साथ कुछ देर बैठ कर बात ही कर लें। एक घरेलू महिलाएं व व्यक्ति जिस प्रकार से माह के खर्चों, ख़रीद फरोख़्त आदि की प्लानिंग करता है ताकि ज़रूरत की चीजों भी न घटें और बीच बीच में आने वाली अनप्लान्ड प्रोग्राम भी मैनेज हो जाएं ऐसी प्लानिंग एक एडमिन और फाइनांस के व्यक्ति को करना होता है।
उन्होंने वह शीट भी दिखाई जो वो पूरे साल की बजटीय प्रावधान कर रखा था। साथ ही किस प्रकार से अनप्लान्ड बजट व खर्चे को मैनेज करना है किन मदों में आबंटित करना आदि की प्लानिंग देखकर लगा यह व्यक्ति कितने कामों के बीच रहा करता है लेकिन कभी शिकायत नहीं करता। कभी ऊबा नहीं करता। दरअसल हम अपने काम में तभी उलझे रहते हैं, तभी शिकायत करते हैं जब हम अपने काम को रोज़ाना और हप्ते, माह और साल में समुचित और योजनाबद्ध तरीके से व्यवस्थित नहीं करते। यदि हम अपने काम को सही प्लानिंग करें और बीच बीच में उसका मूल्यांकन भी करते रहें कि कितनी दूरी तय हो गई। कितना और चलना है? बची हुई दूरी को कैसे कम समय में व तय समय सीमा में पूरा करना आदि की पड़ताल करते हुए चलेंगे तो कभी भी काम को बोझ हम पर सवार नहीं हो सकता। दिक्कत यहीं आती है कि जब एक कामगर व छात्र अपने लिए दिन, सप्ताह, माह और साल की योजना बनाता है तब वह रास्ते में आने वाली अड़चनों, रिस्कों का अनुमान नहीं कर पाता। अनुमान कर भी लेता है तो उसके प्रति लापरवाह हो जाता है।
यदि हमें अपनी सीमाओं और दायरे का अनुमान हो और अपनी क्षमताओं का एहसास हो तो हम उसी के अनुसार अपने लिए मिशन और विज़न तय करेंगे। लेकिन हम अपने आप में इतने स्पष्ट नहीं होते कि अपनी क्षमताओं और दायरे की पहचान में समय लगाएं। बस दूसरे क्या कह रहे हैं? उनके सपने व दायरे क्या हैं? आदि को जानने और आलोचना करने में वक़्त ज़ाया किया करते हैं। कितना बेहतर हो कि हमें हमारे दायरे और सीमाओं का एहसास हो और उसके अनुसार हम अपने और कंपनी के लिए कार्ययेजना बनाएं तो कभी भी जीवन और कार्य में विफल नहीं हो सकते।


Wednesday, April 18, 2018

अभिमन्यू हो गया उदास



कौशलेंद्र प्रपन्न
आप सब की यादाश्त बहुत तेज है। अभिमन्यू की पूरी जन्मकुंडली जानते हैं। कब पैदा हुआ। किसका बेटा था। क्यांकर मारा गया आदि आदि। वह कोई और अभिमन्यू था। जो गर्भ में ही ज्ञान और समझ पा चुका था। आपको तो यह भी याद होगा कि उसे चक्रव्यूह से निकलने का रास्ता नहीं मिल सका तो उसके पीछे क्या वजह थी। शायद यही वज़ह है कि अभिमन्यू की मृत्यू होती है। बल्कि आज के शब्दों में कहें तो हत्या की गई।
आपको क्या लगता है वह सिर्फ और सिर्फ एक ही अभिमन्यू रहा जिसकी हत्या की गई? ज़रा विचार कीजिए। यदि आपके पास सोशल मीडिया से वक़्त मिल जाए तो। यदि समय हो तो विचार कीजिएगा। हमारा अभिमन्यू आज भी जूझ रहा है। कई सारे कौरवों की फौज उसे रेजदिन घेर कर मार रही हैं। वह निहत्था असहाय मरने को मजबूर है।
कश्मीर में क्या हुआ? बिहार में क्या हुआ? उत्तर प्रदेश में ही देख लीजिए सिर्फ भूगोल अलग हैं। जगहें अलग हैं। वारदात तो एक है। मारा तो अभिमन्यू ही गया। वह लड़की थी। जो ख़ुद को कौरवों से बचा न सकी। बचना तो वह भी चाहती थी। उसे भी अपनी जिं़दगी प्यारी थी। वह भी हौवानों से बचकर अपने घर पाप के पास जाना तो चाही होगी। मां की याद तो उसे भी आई होगी। अभिमन्यू की मां की तरह उसकी मां सोई नहीं होगी बल्कि इंतज़ार कर रही होगी कि उसकी बुधिया वापस आएंगी।
वह बुधिया लौट कर नहीं आई। वह आज की अभिमन्यू बन गई। बनना उसकी चाहत या चुनाव नहीं था बल्कि मजबूरी थी। न चाहते हुए भी उसे शिकार होना ही था। लेकिन कौरवों को कोई भी रोक न सका। आप ही देखें कश्मीर की घटना से पहले दिल्ली दहल गई थी। उस घटना की थरथराहट वैश्विक स्तर पर महसूस की गई। लेकिन अभी भी कौरवां की सेना यूं ही अभिमन्यू को शिकार बना रहे हैं। कभी चाकलेट के प्रलोभन पर कभी घूमाने के नाम पर किन्तु गुमराह तो हमारी बेटियां ही हो रही हैं।
हमने बच्चों की सुरक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा प्रदान करने की घोषणा वैश्विक स्तर पर 1989 में यूएन में की थी। लेकिन आज भी हमारे बच्चे न तो सुरक्षित हैं और न ही स्वस्थ्य। हां हमने इन तीस सालों और कुछ किया हो या नहीं लेकिन विकास ज़रूर किया। फ्लाईओवर से शहर को पार कर दिया। पूरे शहर को सोशल मीडिया पर अपलोड कर दिया। जब शहर सोशल मीडिया पर लाइक और शेयर करेगा तो भावनाएं भी भी शेयर होंगी। भावनाओं का क्या है यह तो समय और व्यक्ति के अनुसार बदला करती हैं। हमारी नज़र में तो अस्सी साला महिला और आठ साला बच्ची दोनां ही बस हवस, सेक्स और यूज की वस्तु भर हैं।
काश! हम सोशल मीडिया पर भावनाओं को उडेलने की बजाए हक़ीकत में कुछ सोच और कर पाते। हालांकि आप कहेंगे मैं क्या कर रहा हूं। मैं भी तो उसी मंच का प्रयोग का कर रहा हूं। लेकिन दोनों में एक बुनियादी अंतर है। वह यह कि यहां लाइक और कमेंट की उम्मीद नहीं है। बल्कि आपसे महज इतनी सी गुजारिश है कि यदि आज भी हम ठान लें कि कम से कम मैं अपनी आंखों के सामने किसी भी अभिमन्यू की हत्या नहीं होने दूंगा। कोशिश करूंगा कि अपनी नागरीय जिम्मदारी निभाउंगा। तो काफी हद तक हम अपने अभिमन्यू को बचा सकें। वरना अभिमन्यू उदास सा सोचता रहेगा कि काश मैं बाहर ही नहीं आता। 

Monday, April 16, 2018

कॉपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व और शिक्षा



कौशलेंद्र प्रपन्न
शिक्षा के क्षेत्र में सरकार की मदद के लिए नागर समाज आगे आ चुका है। इनमें सरकारी और गैर सरकारी संस्थाएं बढ़ चढ़ कर हिस्सा ले रही हैं। क्योंकि सरकार शिक्षा में बेहतर स्थिति पैदा करने के लिए तत्पर है। लेकिन अफ्सोस कि सरकारी तंत्र एक सीमा के बाद असहाय हो जाती है। इसे ऐसे समझ सकते हैं कि सरकार ही है जिसने 1990, 2000 में विभिन्न वैश्विक मंचों पर स्वीकार कर चुकी हैं कि हम प्राथमिक शिक्षा में विश्व बैंक और नागर समाज की मदद चाहते हैं। इसी का परिणाम है कि आज हमारे देश में सर्व शिक्षा अभियान, राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान आदि अन्य संस्थानां की मदद से सरकारी स्कूलों में अपना योगदान दे रहे हैं। किन्तु जमीनी हक़ीकत यह है कि ये तमाम योजनाएं स्कूली शिक्षा में गुणवत्ता लाने में काफी नहीं हैं। यही कारण है सरकार को कॉपोरेट व कंपनी जो मुनाफा कमाती हैं। उनके लिए सामाजिक उत्तरदायित्व में काम करने के लिए कानून बना कर आमंत्रित किया गया। यही वज़हें हैं कि आज की तारीख़ में देश में विभिन्न कंपनियां कॉपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के तहत स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार आदि के क्षेत्र में काम कर रहे हैं।
टेक महिन्द्रा फाउंडेशन पिछले तकरीबन दस सालों से देश के विभिन्न राज्यों में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के क्षेत्र में काम कर रहा है। चेन्नई,मुंबई, हैदराबाद, दिल्ली, भुवनेश्वर, कोलकोता आदि जगहों पर इन सर्विस टीचर एजूकेशन इंस्टीट्यूट चला रही है। दिल्ली में पूर्वी दिल्ली नगर निगम के साथ मिलकर इन सर्विस टीचर एजूकेशन इंस्टीट्यूट की स्थापना 2013 में की गई। इस संस्थान ने पिछले पांच वर्षों में तकरीबन 6888 शिक्षकों की विभिन्न विषयों में प्रशिक्षण दे चुकी है। साथ ही निगम के स्कूलां में कार्यरत प्रधानाचार्यां की भी ट्रेनिंग संस्थान कर में संपन्न हुआ है। इसी दिल्ली में स्मार्ट हेल्थ केयर एकेडमी भी टेक महिन्द्रा फाउंडेशन के द्वारा स्थापित किया जा चुका है। जहां से बच्चे अस्पतालां में सहायक, डेटा रिकार्ड, ऑपरेशन थिएटर सहायक आदि के कोर्स करने के बाद विभिन्न अस्पतालों में रोजगार पा चुके हैं।

दरअसल शिक्षा की बेहतरी के लिए देशभर में भरपूर काम हो रहे हैं। कमी यही रह जा रही है कि जो लोग व संस्थान प्राथमिक शिक्षा में शिक्षकों के साथ मिल कर काम कर रहे हैं उन्हें न तो कोई पहचान पाते हैं और न ही उनकी मेहनत को रेखांकित किया जाता है। टेक महिन्द्रा फाउंडेशन के साथ मिल पुणे में ग्राममंगल, हैदराबाद में साहित्या ट्रस्ट, टीस आर ध्वनि बंगलुरू में, नवनिर्मिति और सेव द चिल्ड्रेन इंडिया मुंबई आदि स्थानीय प्रशासन से मिल कर सरकारी स्कूलों में शिक्षकों, बच्चों के साथ स्कूलां में काम कर रहे हैं।
वर्तमान सरकार लगातार कौशल विकास पर जोर दे रही है। वह कौशल विकास न केवल बच्चों और  युवाओं भर के लिए है। बल्कि टीचर की भी दक्षता विकास करना बेहतर ज़रूरी है। यही कारण है कि दिल्ली में मिशन बुनियाद, बच्चों में पढ़ने की दक्षता विकास, टीचर की प्रोफेशन डेवलप्मेंट को लेकर गंभीरता से काम हो रहा है। हो भी क्यों न तमाम रिपोर्ट, नेशनल एचिवमेंट रिपोर्ट, डाइस, जीईएमआर आदि बताती हैं कि हमारे बच्चे साधारण से वाक्य तक नहीं पढ़ पाते। गणित के सामान्य के जोड़ घटाव नहीं कर पाते। ऐसी स्थिति में टीचर के साथ कंटेंट पर काम करने की बज़ाए कैसे पढ़ाएं पर काम करने की आवश्यकता है।

Saturday, April 14, 2018

उत्सव पैसे और मजा



कौशलेंद्र प्रपन्न
हम सब अपनी जिं़दगी के एकरसता को तोड़ना चाहते हैं। सब के अपने अपने तरीके होते हैं। कोई दोस्तों के साथ टहल आता हैं। कोई फिल्म,नाटक देखकर मन को बहला लेता है। खेल तो ख़ैर धीरे धीरे कम ही होते जा रहे हैं। यदि कोई खेलते दिखाई दे जाए तो सुनना पड़ता है यार यह भी कोई उम्र है खेलने की। अब तो मैच्योर हो जाओ। और किसी और के कहने पर हम खेलना छोड़ देते हैं। हमारे जीवन से कुछ ख़ास चीजें बड़ी ही तेजी से ग़ायब हो रही हैं। खेल, मनोरंजन, मिलजोल की चाह आदि। हम जैसे जैसे नागर समाज का हिस्सा होते जा रहे हैं वैसे वैसे अकेला भी होते जा रहे हैं। हम अपनी शामें घर में टीवी के सामने गुजारते हैं। या फिर सप्ताहांत में किसी मॉल में टहलते, बिन ज़रूरतों की शॉपिंग करते गुजार देते हैं। शामें और सप्ताहांत हमारा लोगों, रिश्तेदारों से मिलने में नहीं अकेले गुज़रा करता है। पैसे की तो चिंता ही नहीं। हम बड़ी सहजता से एक बैठक में पांच सौ हज़ार या दो हज़ार खर्च कर देते हैं।
उत्सव हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा रहा है। बस माध्यम और स्वरूप अलग अलग रहे हैं। समय प्रमाण है कि हमें अपने जीवन की मनोभाविक, समाजोसांस्कृतिक एकरूपता को तोड़ने के लिए विभिन्न अवसरां पर विशेष आयोजन किया करते थे। यह एक बहाना था स्व और परिजनों से मिलने का। लेकिन जैसे जैसे हम नागर समाज का हिस्सा होते गए हैं वैसे वैसे मॉल या घूमने में आनंद तलाशा करते हैं। आपने भी अनुभव किया होगा कि आज हम दिखावे में ज़्यादा जीया करते हैं। जिन चहजों के बगैर भी काम चल सकता है लेकिन हम सामानों से घर भरना सीख चुके हैं। जैसे जैसे हमने घर भरा है वैसे वैसे हम अंदर से ख़ाली होते जा रहे हैं।
किसी के भी जीवन में बच्चे की किलकारी बहुत रोमांचक अनुभव से कम नहीं हेता। हर किसी को इस पल का इंतज़ार रहा करता है। और यदि ऐसे नहीं हुआ तो उनका जीवन एकरेखीय एकांगी सा हो जाता है। ऐसा कहते हैं। लड़कियों का सामाजिकरण ऐसा ही होता है कि यदि वे मातृत्व सुख से वंचित हैं तो उनका जीवन बेकार और ठूंठ है। जबकि इस अवधारणा से उबरने की आवश्यकता है। ज़रूरत तो इस बात की भी है कि हमें बच्चों के न होने की स्थिति में ग़मज़द होने की बजाए जीवन में उत्सव और आनंद के अन्य रास्तों के राही बनना चाहिए।

Tuesday, April 10, 2018

उनके आने से पहले...


कौशलेंद्र प्रपन्न
घर में कोई आने वाला हो तो मंज़र देखने लायक होता है। घर का कोना कोना साफ हो जाता है। घर के सभी लोग सफाई अभियान में लग जाते हैं। घर का कोना कोना वाह से आह!!! करने लगता है। बच्चे तो बच्चे बड़े भी साफ सफाई करते नज़र आते हैं। डाइनिंग टेबल पर लंबे समय से लेटे किताबें, दवाई की डिबिया, अख़बार सब के दिन बिहुर जाते हैं। सब अपनी अपनी जगहों पर शोभने लगते हैं।
कई तरह की ऐसी भी चीजें हाथ लग जाती हैं जो कई बार की ढूंढीया पसारने के बाद भी गुम थे। वो भी आंखें फाड़े नजर आने लगते हैंं। सफाई का एक लाभ तो यह होता ही है कि ऐसी फाइलें, किताबें, कागज पतर सब मिल जाया करते हैं। काश कि हर हप्ते कोई न कोई आए।
लेकिन कहां संभव है रोज़ और हर हप्ते किसी की ख़ातिरदारी करने की। ख़ातिरदारी से ज़्यादा सामानों की लिस्ट बनाने दस बार बाज़ार जाने के बाद भी कुछ सामान रह ही जाते हैं उनके लिए डांट खाओं और डांट से पेट भर जाए तो उसपर कॉफी के रूप में यह मिलता है कि कितना अच्छा लगा रहा है। तुम्हें तो ऐसे ही गंध कबाड़े में रहने की आदत सी हो गई है।
कभी तो कहा करते थे मुझे गंदे में रहा नहीं जाता और अब यह आलम है कि जब तक कोई घर में आने वाला न हो तो जो चीजे दस दिन पहले जहां थी वहीं पड़ी रहती है। कितनी बार कहा फला बैग कई दिनों से तुम्हारी राइटिंग टेबल के नीचे सुस्ता नहीं है उसे उपरी आलमारी में रख दो मगर सुनना कहां है। हां अख़बार पूछो, पत्रिका पूछो या पूछ लो किताब तो इनकी सारी जगहें पूरी शिद्दत से बता दोगो। बोलो याद है कि नहीं।
ठीक इसी तर्ज़ पर जब किसी संस्थान में या फिर आफिस में कोई अधिकारी आने वाले होते हैं तब भी घर जैसा ही अफरा तफरी मच जाया करती है। इसे सजाओ, इस बोर्ड को उेकोरेट करो, फला फाईल वहां होनी चाहिए। इस चेयर का एंगल चेंज करे आदि आदि। देखते ही देखते पूरा संस्थान चमक जाया करता है।
साहब के आने से पहले पूरे संस्थान पर सब एक टांग पर खड़े भाग रहे होते हैं। बॉस की सांसें भी टंगी रहती हैं। पता नहीं कौन सा कोना संस्थान की हक़ीकत बता दे। किस बात पर सुनना पड़ जाए। जैसे ही उनका जाना होता है सब की सांसें सामान्य चलने लगती हैं। यह तो दस्तूर है प्यारे किसी के आने से पहले और जाने बाद स्थितियां सामान्य ढर्रे पर आने लगती हैं।
कितना अच्छा हो कि किसी के आने पर ही हमारी प्रेजेटेबल स्थिति को क्यां ठीक की जाए। क्यां न इसे हम अपनी आदतों शामिल कर लें। फिर चाहे कोई भी आए चाहे मोहतरमा हों या फिर मोहतरम। चीजें अपनी जगहों पर ही फबा करती हैं। अब आप ही बताएं किताबें, अख़बार, चाय की प्याली यूंह र जगह पर पड़ी, बिखरी अच्छी लगती हैं भला? एक बार व्यवहार में शामिल हो जाए तो फिर संस्थान में कोई आए या घर में अफरा तफरी नहीं मचती।

Monday, April 9, 2018

जब आप नहीं होंगे दफ्तर में तो...



कौशलेंद्र प्रपन्न
कुछ भी नहीं होगा। होना क्या है? कुछ लोगों के लिए आपका न होना होने से ज़्यादा मायने नहीं होगा। कुछ के लिए शायद सुबह की सांसों जैसी होगी। संभव है कुछ के लिए कल शाम की फाईल और सिस्टम की तरह होंगे आप। जिसे कल सटडाउन कर दिया गया। रोज़ दिन की नई चुनौतियां और कामों के बीच शायद ही कोई याद करे। करे भी तो शायद अच्छे के लिए कम आपकी कमियां और कुछ ख़राब आदतों के लिए याद किए जाएंगे। अगर विश्वास नहीं तो कभी कुछ दिनों के लिए आफिस के दूर होकर तो देखिए।
वैसे भी किसी के होने या न होने से दफ्तर जैसे जगहों को कोई ख़ास फ़र्क नहीं पड़ता। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि आप न होंगे तो कोई काम रूक जाएगा। या कुछ प्रोजेक्ट थम जाना है। हां बस अंतर इतना ही पड़ेगा कि आपकी सीट पर कोई और हुआ करेगा। होते ही आपकी तमाम चीजों को पहले ख़ारिज करेगा। आपने डिसिजन को ग़लत बताकर अपनी बात और राय को स्थापित करना चाहेगा। यदि ऐसा नहीं करेगा तो उसे कौन पूछेगा। हर बात पर सुनना होगा कि फला जी ऐसे करते थे। ऐसे कहा करते थे। क्या काम किया करते थे आदि। सो सबसे पहले आपकी सीट पर आने वाले/वाली आपके कामों को ख़ारिज़ करने में लगेंगे।
सच पूछिए तो आपही तो नहीं होंगे। आपकी आदतें कहीं न कहीं किसी न किसी कोने में या फिर किसी की स्मृतियां का हिस्स हुआ करेंगी। आप होंगे लेकिन कुछ ऐसे वाकयों पर जब आपही छा जाया करते थे। तब आवाज़ किसी और की होगी तब आप याद किए जाएंगे। तब याद किए जाएंगे जब आपकी आवाज़ को कोई और रिप्लेस किया करेगा। फिर कोई कहानी नहीं सुनेगा। क्योंकि उसे कहानी नहीं बल्कि लोगों को क्या सुनाना है इस कला में दक्ष हैं।
फ़र्ज कीजिए आपको अपने होते तरह तरह के व्यंग्य सुनने को मिले और हर वक़्त टांग खींचाई की जाती हो। तो आप खुश भी हो सकते हैं कि कम से कम आपकी चर्चा तो होती है। आप हैं ही ऐसे जिसपर चर्चाएं हुआ करती हैं। चर्चाएं उन्हीं की तो हुआ करती हैं या तो वे अच्छी होती हैं या फिर...।
कुछ है हमारे आप-पास जो कभी नहीं बदला करता। न तो किसी की आदतें अचानक बदल जाती हैं और न किसी की आवज़ इतनी जल्दी बदल जाया करती है। कहते हैं कुछ आवाज़ें बहुत ख़ास हुआ करती हैं। उन आवाज़ को सुन कर ही आपकी पूरी स्मृतियां एक बार चक्कर काट लिया करती हैं। वहीं कौन कहां कैसे बैठा करता है। किस बात पर कैसे रिएक्ट किया करता है। आदि ही आपके जाने के बाद आपका पीछा किया करती हैं।
कोई न तो दफ्तर में ज़िंदगी के दस्तावेज़ लिखा कर आता है। और न सच की जिं़दगी में। यह तो सच ही है कि जो आज ज्वाइन किया है उसे या तो रिटायर होना होगा या फिर एक समय के बाद कुछ इतिहास को कंधे पर लटकाए कहीं और किसी दफ्तर में सेट हो जाना होता है।
वैसे एक बात कहना चाहता हूं। हम जहां भी रहें। जिनके साथ भी रहें। कुछ ऐसी चीजें ज़रूर छोड़ जाएं जिसमें आपकी उपस्थिति मौजूद हो। हालांकि वक़्त हर दर्द और टीस को भर दिया करता है। लेकिन फिर भी कुछ बातें और एहसास ऐसी रह जाती हैं जिन्हें आप कभी पीछे नहीं छोड़ पाते। वह हमेशा आपके साथ रहा करती हैं।

Friday, April 6, 2018

इमोशन को मैनेज करो साहब


कौशलेंद्र प्रपन्न
आज की तारीख़ी हक़ीकत है कि लोग अपने इमोशन को मैनेज नहीं कर पाते। आप भी तो नहीं कर पाते होंगे। और परिणाम यह होता है कि कोई न कोई मुंह फुला लेता है। वह चाहे घर के लोग हों या फिर ऑफिस या फिर यार दोस्त। रूठे हुए को मनाना भी मैनेजमेंट का एक हिस्सा है। लेकिन अफ्सोस कि इमोशन को हम मैनेज करने के लायक ही नहीं मानते।
मार्केट मैनेज होते हैं। वोट मैनेज होते हैं। लेग मैनेज होते हैं और प्रोजेक्ट भी। ख़ास बात यह है कि हम अपने इमोशन को कई बार समझ ही नहीं पाते कि हम क्या चाहते हैं। क्या चाहते हैं अपनी ज़िंदगी से और क्या अपेक्षा रखते हैं रिश्तों से। जब हम यह समझ लेंगे कि फलां की आपसे क्या उम्मीद है और आप उसे कैसे पूरा कर सकते हैं तब हमें औरों की अपेक्षाएं भी पूरी करने में दिक्कतें नहीं आएंगे।
दरअसल हम लोगों की अपेक्षाओं में खुद को ऑल्टर करना चाहते हैं। हम चाहते हैं कि सभी की नज़रों में अच्छा अच्छा बने रहें। जो संभव नहीं है। एक मैनेजर कभी भी सभी के लिए अच्छा नहीं हो पाता। यदि वह मैनेजमेंट की बेहतरी चाहता है। यदि कंपनी या प्रोजेक्ट की बेहतरी चाहता है और समय पर पूरा करना चाहता है तो उसे कई बार कठोर कदम उठाने ही पड़ते हैं। संभव है उसके निर्णय से कुछ लोगों के सपने बिखर जाएं। लेकिन वह बड़े लक्ष्य और सफलता की ओर दृष्टि रखता है। इसलिए कई बार प्रोजेक्ट को सफल करने के लिए कठोर और बने बनाने रास्ते से हट कर भी निर्णय लेता है। ठीक उसी तरह हमें अपने कई इमोशन पर कठोरता से निर्णय लेने की आवश्यकता पड़ती है। यदि हम अपने इमोशन की प्रकृति को समझ लें तो उसे मैनेज करना आसान हो जाता है।
फ़र्ज कीजिए आपको किसी से इमोशनली अटैच्मेंट हो गया है। व हो गया था। यदि अतीत में ही अटके रहेंगे तो आगे नहीं बढ़ सकते। दरअसल इमोशनल कंफ्लिक्ट यहीं शुरू होता है। आप चाहते हैं कि दोनों ही रिश्ते को खुश खुश रखें। मगर बीच में मूल्य, नैतिकता, धार्मिक आस्था आदि आ जाती हैं जो आपके मूल्य और रिश्तों को सुलझाने की बजाए और पेचिंदा कर देती हैं।
पहली बात तो यही कि आप रिश्ते से क्या चाहते हैं? क्या अपेक्षा है? और किस हद तक अपनी ज़िंदगी को सहज जीना चाहते हैं। यदि आपने रिश्तों की मांगों और उष्मा को संभालना सीख गए तो कभी भी जीवन में तनाव और द्वंद्व पैदा नहीं होगा। कहेंगे कहना कितना आसान है और जीना कितना मुश्किल। लेकिन कठिन नहीं है। इमोशन को मैनेज कर पाए तो लाइफ में आप या कि हम काफी सहज रह सकेंगे।

Thursday, April 5, 2018

मैनेजर का चुनावः सावधान रहें चौकन्ने रहें


कौशलेंद्र प्रपन्न
मैनेजमेंट में प्रोजेक्ट को चलाने के लिए कई प्रोजेक्ट मैनेजर की ज़रूरत पड़ती है। कोई भी प्रोजेक्ट हो चाहे वह सरकारी हो या फिर गैर सरकारी। प्रोजेक्ट मैनेजर के चुनाव में यदि प्रोग्राम मैनेजर चैकन्ना न हो या फिर यदि पूर्वग्रह में मैनेजर नियुक्त करता है तो उसका असर प्रोजेक्ट के पूरे होने, सफल और विफल होने में बड़ी भूमिका निभाता है। अपनी ही टीम में से यदि किसी को चुनना होता है तब कई सावधानियां रखनी पड़ती है। क्या जिसे हम नई भूमिका के लिए चुन रहे हैं वह कैपेबल है? क्या उसके अंदर क्षमता और दक्षता है? क्या उसकी कार्यशैली टीम को लीड करने, टीम को गाइड करने आदि की रणनीति बनाने और विज़न बनाने आदि बनाने की क्षमता है आदि।
हमारे प्रोजेक्ट इसलिए भी समय पर पूरे नहीं होते क्योंकि प्रोजेक्ट मैनेजर सही तरीके से रणनीति नहीं बना पाता। समय पर सही व्यक्ति को कम्युनिकेट नहीं कर पाता। प्रोजेक्ट के विज़न और मिशन को हर टीम तक संप्रेषित नहीं कर पाता। यदि टीम में गोल ही स्पष्ट नहीं है तो टीम आख़िर किस दिशा में बढ़गी। दिशा और लक्ष्य की अस्पष्टता की स्थिति में समय, पैसे, मैनपावर आदि लगते हैं।
हालांकि हर व्यक्ति अपनी दिनचर्या को मैनेज तो करता ही है। लेकिन प्रोजेक्ट को मैनेज करना थोड़ा अलग है। वह इस मायने में कि जब आप अपनी ज़िंदगी मैनेज करते हैं तो ज़्यादा लोग नहीं होते। वहीं प्रोजेक्ट में चार से अधिक भी व्यक्ति शामिल होते हैं। जब व्यक्ति हैं तो उनके साथ कुछ व्यवहार, कुछ संवेग, कुछ इमोशन भी साथ होती हैं। इमोशन को मैनेज करना भी एक कौशल है।
मैनेजर को अपनी और अपने अंदर काम करने वाले कर्मियों के इमोशन को भी बैलेंस करना होता है। काम का दबाव तो होता है। इससे किसी को भी गुरेज़ नहीं हो सकता। लेकिन काम के दबाव में आप किसी और के इमोशन और काम करने की टेम्पो को कुचल नहीं सकते। शायद यहां मैनेजर ग़लती कर बैठता और अपना आपा खो बैठता है। गुस्सा या खीझ किसी और की थी लेकिन वह अपने से नीचे व्यक्ति पर उतार देता है। ऐसे में वह टीम के अन्य सदस्यों के बीच अपनी प्रतिष्ठा और सम्मान खो देता है। मैनेजर का रोल दूधारी तलवार पर चलने जैसा है। एक ओर अपने से उच्च अधिकारियों क निर्दशों, इगो, दबाव को सहता है वहीं अपने अंदर काम करने वाले व्यक्तियों की अपेक्षाओं और इगो को भी संतुलित करना पड़ता है।
यदि एक ग़लत मैनेजर का चुनाव करते हैं तो कुछ समय के लिए ही सही हमारा प्रोजेक्ट व प्रोग्राम पर उसका असर तो पड़ता ही है।
कुछ बेहतर मैनेजर की सूत्र-
सही समय पर, सही तरीके से, सही व्यक्ति तक संवाद का सक्रिय एवं सकारात्मक और निरंतर संप्रेषण नितांत ज़रूरी होता है।

Tuesday, April 3, 2018

आज नदी खुश थी...



कौशलेंद्र प्रपन्न
खुश थी नदी कि उसके साथ पूरा गांव है। गांव के लोग उसके लिए लड़ने के लिए आग आ रहे हैं। लेकिन नदी की खुशी ज़्यादा समय पर बरकरार न रह सकी। कुछ लोग थे जो गांव के बाहर के थे। जिन्होंने गांव के लोगों को सपने दिखाने लगे कि यदि नदी पर बांध बनेगा तो लोगों को रोजगार मिलेगा। गांव के बच्चे शहर और महानगर नहीं जाएंगे। और भी थे वायदे जिसपर गाव के लोग लुठित हो रहे थे। वही पास खड़ी एक बुढ़ा पेड़ ग़मज़दा था। उसे मालूम था नदी अब वही नहीं रहेगी। नहीं रहेगी उसकी धार। पहले भी इस गांव और पेड़ ने ऐसे मंज़र देखे हैं। जब गांव को कहीं और बसाया गया था। कुछ उजड़ गए तो कुछ कहीं और चले गए।
नदी का क्या था। उसके अपने तो गांव ही था। गांव के लोग थे। जंगल और पहाड़ों के बीच से बहना ही उसका जीवन था। मगर अब उस पर भी दूसरां की नज़र लग गई थी। आख़िर नदी अपने मन की बात किससे कहती। कोई सुनने वाला नहीं बचा था।
क्या शहर और क्या गांव वैश्विक स्तर पर नदी को मोड़ने और बांध बनाने की चर्चा गर्म थी। जो खिलाफ में थे वे मुट्ठी भर बच गए थे। उन्हें कहा जाने लगा यह तो विकास ही नहीं चाहता। इसे बिजली नहीं चाहिए। इसे रेजगार नहीं चाहिए। पानी के धार पर स्टीमर चलते नहीं देख सकता। जलता है।
ऐसे में राजतंत्र से लेकर लोकतंत्र के चारों खंभों में चर्चा चल रही थी। दूसरी ओर नदी की उदासी देखी नहीं जाती थी। दिन प्रतिदिन नदी सूखने सी लगी। देखते ही देखते नदी की धार गांव छोड़कर दूर होती चली गई। कभी वक़्त था कि बच्चे खूब मजे में नहाया करते थे। पर्वतीनें इसी नदी में नहा कर खरना करती थीं। सूर्य देवता के पर्व रखा करती थीं। वो भी नदी के साथ उदास तो थीं पर उनकी सुनने वाला कौन था।
ऐसे ही हमारी नदी हमारे बीच से गायब हो जाएंगी। हो भी रही हैं। मगर किस पर और क्यांकर अंतर पड़ेगा। सभी को विकास चाहिए। विकास के नाम पर नदी और जंगल, पहाड़ और पर्वतों की बली चढ़ाई जा रही है।
नदी आज खुश कम उदास ज़्यादा थी।

Monday, April 2, 2018

टीचर रिटायर नहीं होते



कौशलेंद्र प्रपन्न
टीचिंग और टीचर ऐसे प्रोफेशन से जुड़े कर्मी होते हैं जो कभी रिटायर नहीं होते। उनके लिए कभी भी 31 मार्च या किसी भी माह की अंतिम तारीख अवकाश के लिए मुकरर्र नहीं होती। यूं तो सरकारी दस्तावेज़ में उनके लिए अवकाश प्राप्ति के दिन तय होते हैं। और बतौर दस्तावेज़ वे स्कूल से सेवामुक्त हो जाते हैं लेकिन सचपूछें तो शिक्षक कभी भी कार्यमुक्त नहीं होता। शर्त इतनी सी है कि यदि वह शिक्षक अपने जीवन में महज नौकरी के तौर पर अध्यापन न किया हो। ऐसे शिक्षक बेशक संख्या में कम हों लेकिन जिन्होंने शिक्षण में आनंद लिया हो। बच्चों से संवाद किया हो। जिनके लिए शिक्षण महज़ पाठ्यपुस्तक, पाठ्यक्रम पूरा कराने भर तक महदूद नहीं रहा वे कभी भी शिक्षण से मुक्त न होते हैं और न ही हो पाते हैं। वे वास्तव में दिल से शिक्षक होते हैं। उनके लिए स्कूल घर सा होता है जहां वे समय से पहले आते हैं और समय के बाद ही घर जाया करते हैं। पूरी जिं़दगी ऐसे शिक्षक पूरी शिद्दत से बच्चों से संवाद करने में विश्वास करते हैं। शिक्षा के मूल दर्शन संवाद और प्रतिवाद से बच्चों में चिंतन दक्षता और वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने में कभी भी चूक नहीं करते। बेशक श्ज्ञिखा व्यवस्था में ऐसे शिक्षकों को उतना मान-सम्मान न मिलता हो। लेकिन शिक्षा विभाग के बाहर बच्चों और अभिभावकों में उन्हें भरपूर सम्मान और मुहब्बत मिला करता है। शायद इन्हीं शक्तियां के बदौलत ऐसे शिक्षा पूरी ऊर्जा और ताकत के साथ शिक्षण किया करते हैं। ऐेसे शिक्षक न तो कभी मरा करते हैं और न ही स्वयं मरते हैं। इस प्रकार के शिक्षक शिक्षण को न केवल इन्ज्वाय किया करते हैं बल्कि बच्चों को किताबें पढ़ाने की बज़ाए जीवन के संघर्षां और वास्तविक समझ दिया करते हैं। बच्चों को जीवन में किस ओर और दिशा में बढ़ना चाहिए उस ओर भी राय दिखाया करते हैं। इस तरह के शिक्षक पढ़ाने की बज़ाए संवाद करने, कहने और सवाल करने की कला और माद्दा विकसित किया करते हैं।

शिक्षकीय दुनिया की कहानी के पात्र

कौशलेंद्र प्रपन्न ‘‘ इक्कीस साल के बाद पहली बार किसी कार्यशाला में बैठा हूं। बहुत अच्छा लग रहा है। वरना तो जी ...