Friday, April 22, 2016

बंदियों की जिंदगी


कौशलेंद्र प्रपन्न
कैदियों की जिंदगी कैसी होती है? क्या करते हैं हमारे कैदी दिन भर? जिन्हें ताउम्र कैद की सज़ा मिली हुई है वे जिंदगी को कैसे और किस नजरिए से देखते हैं आदि कुछ ऐसे सवाल जेहन मंे लगातार परेशान कर रहे थे। जब से दिल्ली से चला और हल्द्वानी पहुंचा रास्ते इसी उधेड़ बुन मंे कटे। कैसे और किस मुद्दे पर उनसे बातचीत की जाए। अवसर संपूर्णनंद केंद्रीय शिविर जेल, सितारगंज, उधम सिंह नगर में कैदियों के बीच कविता पाठ और उनसे बातचीत का था। इस अवसर पर एसडीएम श्री बाजपेयी जी, जेल प्रभारी श्री टीपी जोशी और स्थानीय पत्रकार दोस्त भी मौजूद थे। दिल्ली से तकरीबन पंद्रह कवि,व्यंग्यकार,कथाकार आदि थे। जिन्हें उन कौदियों के बीच कविताएं,लघुकथा आदि सुनाने थे। सब के सब उत्सुक और जिज्ञासु थे कि कैदी कैसे होंगे? उन्हें कविताएं पंसद आएंगी या नहीं। लेकिन जैसे जैसे कैदियों से हाॅल भरता गया उत्साह की कोई सीमा नहीं थी। तय समय चार बजे से कार्यक्रम की शुरुआत हुई। कैदियों के चेहरे पर उतरते चढ़ते भाव देखते बनते थे। उन्हीं में से एक बुजूर्ग कैदी के हाथों डाॅ प्रेम जनमेजय की सद्यः प्रकाशित किताब का लोकार्पण भी किया गया। उन्होंने बड़ी शिद्दत से किताब को पढ़ने के लिए मांगा और कहा कि आप लोग आते रहा कीजिए हमें बहुत उत्साह और प्यार मिला। केंद्रीय जेल में इस तरह का पहला कार्यक्रम था। एसडीएम साहब ने विशेष आदेश जारी कर टीपी जोशी को इस कार्यक्रम को अमलीजामा पहनाने का कार्यभार सौंपा था। काफी हद तक सफल भी रहा।
व्यंग्य के छिंटे इन कैदियों को गहरे झकझोर रही थीं वहीं कविताओं के झरोखों से ये लोग भी अपनी पुरानी जिंदगी और घर परिवार को महसूस रहे थे। कुछ की आंखें पनीली भी दिखाई दे रही थीं। पता नहीं कविता, व्यंग्य की कौन सी पंक्ति, कौन सा वाक्य, कौन से शब्द उनकी जिंदगी के कौन से तार छेड़ रहे थे पता नहीं, लेकिन हमें एक सुखद अनुभूति यह हुई कि हमने अपनी रचनाओं से इनकी बेरंग जिंदगी में थोड़ी देर के लिए ही सही किन्तु एक उमंग और आनंद के भाव जरूर प्रवाहित किया। इनकी जिंदगी को छूने वालों मंे प्रेमजनमेजय, लालित्य ललित, हरीश नवल, दिलीप तेतरवे, दीपक सरीन जैसे गीतकार तो थे ही साथ ही व्यंग्य के हस्ताक्षरों ने भी अपनी रचनाओं से इन्हें जोड़़ने मंे काफी सफल रहे।
अमूमन हम फिल्मों में कैदियों की जिंदगी जैसी देखते और ख़बरों में पढ़ते हैं ठीक वैसी नहीं होती। फिल्मी पर्दे के कैदियों की जिंदगी और हकीकतन जिंदगी मंे काफी अंतर होता है। इस जेल में बीस साल के  आयु वाले से लेकर तकरीबन अस्सी साल के आयु वाले कैदी मिले। हर कैदी की अपनी कहानी थी। हर कैदी यहां अपनी कहानी के साथ बची हुई जिंदगी बसर कर रहे थे। ऐसे ही एक एकहत्तर साल के मो. हक़ साहब से मुलाकात हुई। उन्होंने बताया कि राजनीतिक बदले की वजह से आज बीस साल से जेल में हैं। कब तक बाहर निकल पाएंगे यह कोई नहीं जानता। वहीं बलबीर सिंह की अपनी कहानी है। कैदियों से अब वे बंदी हो गए हैं। यानी शिविरवासी। संपूर्णनंद केंद्रीय जेल की ख़ासियत यह भी है कि यह शिविर जेल है। कैदियों के चाल चलन और व्यवहारादि को देखते हुए शिविर में भेज दिया जाता है। जहां वे बंदी होते हैं। इन्हें खुल में शिविर यानी झोपड़ी मंे रहने की आजादी होती है। इनकी दिनचर्या भी कैदियों से अलग होती हैं। ये अपने घर,परिवार की शादियों में भी जाते हैं और वापस जेल आ जाते हैं। बाजार से सामान आदि खरीदने भी जाने की छूट होती है। इस मामले में कैदियों पर एक अंकुश जरूर है। वे चाहरदीवारी के बाहर नहीं जा सकते। शाम पंाच बजे के बाद अपने अपने कमरों में चले जाते हैं। गिनती होती है आदि।
बाईस साल के मंजीत ने बताया कि उसे यहां पढ़ने को पेपर, टीवी आदि सब उपलब्ध है। बस हम बाहर नहीं जा सकते। दिनभर जिन्हें जो काम दिया जाता है उसे पूरा करना होता है। कोई लकड़ी का काम करता है तो कोई फूलों के रस निकाल कर बोतल में बंद करने का काम करता हैं। इनके द्वारा बनाए सामान बाजार मंे बिक्री के लिए जाते हैं। कुछ कैदी खेती करते हैं। बलजीत ने बताया कि मौसमी फसल हम लोग करते हैं अपने काम भर अनाज रखकर बाकी अनाज, सब्जियां आदि दूसरे जेलों में भेज दिया करते हैं।
बस यहां बंदियों की जिंदगी कट सी रही है। न बाहर आने का इंतज़ार है और न उम्मीद ही। एक बंदी ने बताया कि मेरा दोष इतना भर था कि जहां मर्डर हुआ वहां मैं खड़ा था। एक दूसरे बंदी ने बताया कि मैं मारना तो नहीं चाहता था लेकिन गुस्से में ज्यादा चोट लग गई और वो मर गया। अफ़्सोस तो है लेकिन अब क्या कर सकते हैं? उसे जिंदा तो नहीं कर सकते। किसी की शादी के एक साल हुए थे। उसकी पत्नी ने साल भर के भीतर ही आत्महत्या कर ली। पत्नी के भाई, चाचा पुलिस और वकील थे। कई सारी धाराएं लगाकर कर दिया अंदर। कभी कभी मां और भाई मिलने आते हैं। अच्छास लगता है। लेकिन बाहर आने की कोई उम्मीद नजर नहीं आती। सुना है कि रात दिन मिलाकर उम्र कैद पंद्रह सालों मंे पूरा मान लिया जाता है लेकिन हमें तो यहां बीस बीस साल हो गए।
एक वृद्ध बंदी जिनकी उम्र यही कोई 65 की रही होगी। उन्होंने बताया कि अब हम बेहद दुखी हैं क्योंकि हमारे बंदी भाइयों को उनके गृह राज्य के जेलों मंे भेजा जा रहा है। हम लोग यहां धर्म,जाति, प्रांत को भूलकर बस कैदी भाई की तरह रहते हैं। अब हम बिछुड़ जाएंगे। पता नहीं फिर जीवन में कब मिलेंगे।


@पटेल चेस्ट



वो जब दिल्ली आया तो सीधे रेलवे स्टेशन से 901 नंबर की बस में ठूंस कर कैंप उतर गया। दोस्तों ने बताया था कि क्रिश्चिय काॅलोनी मंे सस्ते में कमरे मिल जाते हैं। खाने पीने की भी दिक्कत नहीं होती। बस एक एयर बैग, कुछ किताबें और एक पानी बोतल लेकर मामू चाय दुकान पर बैठा नरेंद्र का इंतजार कर रहा था। आंखें मिचते हुए सुबह के आठ बजे मामू की चाय दुकान पर दोनों मिले। हाथ मंे सिगरेट और चाय के साथ आगे कहां रहना है, कहां दाखिला लेना है की योजनाएं बनीं और प्रकाश नरंेद्र के साथ उसके कमरे पर चला गया। यार! इस कमरे मंे रहतो हो? कैसे रह लेते हो? इतना अंधेरा, दम घोटू हवा। नरेंद्र चुपचाप सुन रहा था। उसने कहा, पास में हडसन लेन है वहां रह लो। कमरे खुले खुले हैं। किराया यही कोई दस से पंद्रह हजार। अब प्रकाश की आंखें चैंधिया गईं। इतना तो नहीं दे हो पाएगा।
क्रिश्चियन काॅलोनी के गेट के अंदर एक नई दुनिया मंे प्रकाश का प्रवेश हुआ। जहां हर घर में हर मकान में एक छोटा ढाबा और एक छोटी चाय की दुकान चला करती हैं। गेट के अंदर ढुकते ही एक आंख भी रहा करती है जिसकी दुकान पर अकसर भीड़ रहती है। दूध,चाय,सिगरेट आदि मिल जाया करती हैं। नए नए आने वाले लड़के अकसर उसी की दुकान पर भिन्न भिनाया करते हैं। उसे भी मालूम है लड़के क्यों उसकी दुकान मंे आते हैं। इसे बहाने बिक्री भी हो ही जाया करती है। प्रकाश उसी दुकान मंे आने जाने लगा। काॅलेज मंे दाखिला हो चुका। रात से लेकर सुबह आंख ख्ुालते ही उसकी दुकान पर मिला करता। धीरे धीरे उसकी दोस्ती सी हो गई। उस आंख से। हालांकि उस आंख मंे दोस्ती का कोई खास मायने तो था नहीं। इसलिए उसके लिए कोई नई बात नहीं थी। नरेंद्र को लगा प्रकाश कुछ ठीक नहीं चल रहा। इसलिए समझाने की कोशिश। मगर प्रकाश को उसका प्रवचन बहुत खला। तुम तो कुछ कर नहीं पाए। इस उम्र मंे भी तैयार में लगे हो। न परीक्षा पास की और न किसी की आंख मंे बस पाए। सीधे क्यों नहीं कहते जल रहे हो।
...और प्रकाश ने काॅलोनी ही छोड़ दी। आ गए साहब ए 5 में। किराया दो सौ ज्यादा था लेकिन एक खुलापन था। मेन रोड़, चारों ओर चहलपहल। नरेंद्र की चैकीदारी से भी निजात मिल गई। साल ही गुजरे हांेगे कि उन आंखों में प्यार तो क्या होना था हां रजामंदी जरूर हो गई थी। अब वो उसके कमरे मंे आने लगी थी। कमरे में आने लगी थी मतलब काॅलेज जाने लगी थी। समझ रहे होंगे। सुबह से शाम तक। सड़ी गरमी में भी दोनांे कमरे मंे बंद रहते। दूसरे कमरे वाले आंखों ही आंखों में मजे लेते। कमरा क्या था बस यूं समझ लें कि अपने कमरे मंे करवट लें तो उसकी अंगड़ाई दूसरे कमरें में सुनी जा सकती थी। तो उसके कमरे से भी आवाजें आने लगीं। जैसा कि दूसरे कमरों से आया करता था। दिन मंे तो लड़के कमरों की दीवार मंे कान लगा कर कमरे की कहानी देखा करते। अमूमन हर कमरे ही अपनी कहानी थी। हर कमरा गुलजार था।
एक कमरे की कहानी कुछ और ही थी। रात रात भर तो कभी कभी दिन मंे भी रोने की आवाजें आया करती थीं। कभी लड़के की तो कभी लड़की की। सब के सब हैरान। यह क्या इस आवाज की कहानी तो कुछ और ही इशारा कर रही है। लड़के बताते हैं कि लड़का कोई और नहीं प्रकाश था। यह दूसरा साल था। उस आंख के साथ अब कमरे में बंद होना और मौसमों से बेख़बर शाम बाहर आना सभी के लिए अब आम बात थी। बस यदि आम घटना नहीं थी तो वह उस शाम कमरे से रोने और लगतारा रोने की आवाज।
शर्मा जी बताते हैं कि वह अपने घर का इकलौता लड़का था। लड़की को शादी वादी से कोई लेना देना नहीं था। लेकिन प्रकाश को शादी पर अड़ा रहा। अंतिम दिनों मंे रोना कानी ही मचा करता। कमरे के बाहर कान लगाने वाले बताते हैं कि आनंद वाली आवाज खत्म हो गई थी। काफी समय से रोने की सुबकने की ही आवाज आया करती थी। अब यह भी कोई सुनना है? सुनते तो तब थे जब मस्ती वाली आवाजें आया करती थीं। जैसे और कमरों से आया करते थे। गर्मी की छूट्टी के बाद प्रकाश आया ही था कि एक पत्रिका में ख़बर फोटो के साथ पढ़ा वो आंख देहरादून में हाई प्रोफाइल रोकेट में रंगे हाथ पकड़ी गई। अब उसे काटो तो खून नहीं।
ममू की चाय दुकान वैसे ही लगी। उस सुबह भी मामू ने आपलेट बनाया चाय बनाई। वो रात दो बजे आमलेट और चाय के पैसे उधार कर कमरे में वापस चला गया। मामू बताता है कि सुबह उसके कमरे के बाहर मजमा लगा था। हालांकि एक गलियारा ही था। जहां लोग ठूसे हुए थे। किसी को भी भनक नहीं लगी कि उनके बगल के कमरे मंे आधी रात में कैसे आवाज आई। तकरीबन नौ दस का समय रहा होगा। कमरे का दरवाजा सटा था। कई आवाज देने के बाद भी जब कोई जवाब नहीं आया तब रूम नंबर 11 वाले ने अंदर जाने की हिम्मत की।
आंखंे बंद। घड़ी बस चल रही थी। नब्ज का पता नहीं चल पाया। आनन फानन मंे बड़ा हिन्दूराव ले जाया गया जहां उसे डाॅक्टरों ने ठप्पा लगा दिया। मौनेचरी में रख दें। घर वाले आए। मां आई। बाप आया। बस नहीं मिला उन्हें उनका प्रकाश। पीछे एक अंधेरा छोड़ कर जा चुका था उस आंख के पीछे।
सपने तो थे ही प्रकाश के। कहता था लाल बत्ती लिए बिना वापस नहीं जाना। एक कोना था उसके पास भी जहां एक पनीलापन था। जहां वो आंख गड़ गई। जहां उसके सपने में एक पंख सा लगा। उड़ाने तो उसने भरी। लेकिन शायद उस सफर मंे अकेला था। उस आंख के लिए यह सब कोई नई चीज नहीं थी। सब कुछ जैसे पूर्व घटित घटना सी उसकी जिंदगी मंे घट सी रही थी। लेकिन प्रकाश! वो तो उसकी मुसकान मंे ही अपने सपने को बेंच आया। मामू बताता है कि कैसे वह चाय दुकान मंे लड़कों के बीच बहसें किया करता। सब के सब उसकी बात ध्यान से सुनते रहते। लगता कितना पढ़ा लिखा और समझदार है। लेकिन उसने यह कदम उठाकर सब को सन्न कर दिया।
जब प्रकाश आया तब नरेंद्र बताता है कि दोनों एक ही गांव के हैं। वह जरा अच्छे खानदान और पैसे वाला है। तब कंधे से कंध नहीं टकराया करता था। क्रिश्चियन काॅलोनी मंे घर भी कम थे और रहने वाले सपने भी। खाना देना वाला पूरन और जोगेंदर के अलावा तीसरा कोई नहीं था। दो ही टेलिफोन बूथ  हुआ करते थे। जहां शाम में भीड़ लग जाया करती थी। नरेंद्र और प्रकाश तभी से दूर होते चले गए जब से वो प्रकाश के करीब आई। नरेंद्र ने कई बार उससे बात करनी चाही। मगर प्रकाश झिड़क देता।
‘नरेंद्र माना कि तुम मेरे से पहले दिल्ली आए। लेकिन इसका अर्थ यह तो नहीं कि तुम्हारी आंखों से दुनिया देखूं।’
‘मेरी अपनी आंखें हैं। तर्जबा है।’  
‘तुम इतने ही काबिल थे तो अब तक स्टेट भी क्यों नहीं निकला?’
‘अपनी बबंगई आपने पास ही रखो।’
‘चूके हुए इंसान से मिल कर हताशा और निराशा ही होती है।’
नरेंद्र ने आपनी ओर से बातचीत का रास्ता हमेशा ही खुला रखा। लेकिन उसकी आंखो मंे बस एक ही आंख थी। और उसी आंख में डूब भी गया।
लोग बताते हैं वो आज कल नए के साथ घूमा करती है। अचम्भा हुआ नरेंद्र को कि वो अंतिम समय मंे भी देखने नहीं आई। कहने वाले तो खूब बातें बना रहे थे। अब आ कर क्या करेगी? अब क्या मिलने वाला है। जो था सो चला गया।
सपनों का आना नहीं रूका। क्रिश्चियन गेट वहीं हैं। बजबजाती गलियां वहीं हैं। चाय की दुकानें वहीं हैं। फर्क सिर्फ यह आया है कि सपने खरीदने और बेचने का व्यापार बदल गया। कभी वे भी दिन हुआ करते थे कि काॅलोनी में एक लड़की दिखी नहीं कि लड़कों की आंखें पूरी ख़्वाब देख लिया करती थी। अब तो हर घर मंे पराठे, हर कमरे में लड़कियां आया जाया करती हैं। कंधे से कंधा टकराना मुहावरा इस काॅलोनी में सच साबित होता है।

Tuesday, April 12, 2016

तृतीयपंथी यानी किन्नरों की शिक्षा


कौशलेद्र प्रपन्न
तृतीयपंथी,उभयलिंगी,हिजड़ा,यूनक,किन्नर,खोजवा,मौगा, छक्का,पावैया,खुस्रा,जनखा,शिरूरनान गाई, अनरावनी आदि नामों से समाज में प्रचलित इस वर्ग को हमने भय,डर, उपेक्षा की दृष्टि से ही देखा है। हिजड़ा शब्द उर्दू के हिजर से बना है। वह भी अरबी ये आया हुआ इसका अर्थ ही होता है समाज से बेदख़ल किया गया। समाज से बहार निकाला हुआ। यह अलग बात है कि वे हमारे इसी समाज के मुख्यधारा के सहयात्री हैं। बस फर्क उनके लिंगानुसार व्यवहार और भावनाओं में अंतर का है। प्रकृति से ही उन्हें समाज ने एक अलग हिस्से के तौर पर जाना पहचाना है। यह अगल बात है कि उनकी चर्चा महाभारत,रामायण, कामसूत्र आदि में होती है। लेकिन कितनी अफसोसनाक बात है कि हमारी शिक्षा और शैक्षिक नीतियों में इनके लिए कोई प्रावधान नहीं है। यूं तो न्यायपालिका ने समय समय पर हस्तक्षेप किए हैं। तमिलनाडू राज्य में केार्ट ने इन्हें राशन कार्ड,वोटर कार्ड में नामाकन के आदेश 1998 मंे दिए थे जिसका परिणाम यह हुआ कि इस राज्य में हिजड़ों की स्थिति काूननन तौर पर अन्य राज्यों से बेहतर है। वहीं दिल्ली उच्च न्यायालय ने अप्रैल 2014 में आदेश दिया था कि सरकारी फार्म में स्त्री पुरुष के साथ ही तृतीय लिंग व अन्य नाम से काॅलम बनाएं। इन्हें शिक्षा,रोजगार आदि में स्थान दिए जाएं। याद हो कि यह वही वर्ष है जब मध्य प्रदेश मंे शबनम मौसी ने चुनाव जीता था। आगे चल कर कमला जान और उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में भी हिजडे ने अपनी उपस्थिति दर्ज की थी, लेकिन क्योंकि जिस सीट पर जीत हुई थी वह सीट महिलाओं के लिए आरक्षित होने कही वजह से हिजड़ों को वह सीट छोड़नी पड़ी। आज की तारीख में लोकतंत्र के चारों स्तम्भों मंे से पत्रकारिता, न्यायपालिका आदि में तो काफी सक्रियता से इनकी आवाज को स्थान दी जा रही हैं। लेकिन कार्यपालिका मंे अभी संतोषजनक प्रयास नहीं हुए हैं। हालांकि महाराष्ट, बिहार, मध्य प्रदेश, तमिलनाडू आदि राज्यों में इन्हें वोट देने से लेकर इनकी पहचान सुनिश्चित करने के कई कदम उठाए गए हैं।
आज यह तृतीयपंथी यानी किन्नरों की शिक्षा को लेकर देश की तमाम समितियां, सिफारिशें, नीतियां मौन हैं। यदि आजादी के बाद के आयोगों, समितियों और राष्टीय शिक्षा नीति पर नजर डालें तो इन दस्तावेजों और सिफारिशों मंे किन्नरों व ऐसे बच्चों की शिक्षा के विशेष प्रावधान,परामर्श एवं मार्गदर्शन की कोई बात नहीं की गई है। संभव है आयोगों और नीति के स्तर पर मान लिया गया हो कि उनकी नजर में तृतीयपंथी बच्चे कोई अलग व विशेष नहीं हैं। इन्हें भी सामान्य बच्चों के साथ शिक्षा हासिल करने का पूर्ण अधिकार है। यह एक मूल्यपरक जवाब तो हो सकते हैं। लेंकिन हकीकत है कि यदि ख़ास रूचि और लिंगीय बरताव वाले बच्चों को सामान्य बच्चों के साथ स्कूलों मंे पढ़ना कितना मुश्किल होता है। बच्चे चिढ़ाते हैं। उनके साथ सामान्य व्यवहार नहीं करते। समाज उन्हें छेड़ता है। समाज में वे खुल कर नहीं खेल पाते। मां-बाप ऐसे विशेष बच्चों के साथ खेलने से रोकते हैं। और यह अलगाव के बरताव उनकी सामाजिक पहचान और अस्मिता को आकार देने लगती हैं। अंतरराष्टीय स्तर पर संपन्न संयुक्त राष्ट बाल अधिकार सम्मेलन 1989 मंे दर्ज बाल अधिकारों मंे इन्हें कोई स्थान नहीं दिया गया है। यूं तो शिक्षा, जीवन आदि का अधिकार सभी बच्चों को है, लेकिन समाज में उपेक्षापूर्ण जीवन जी रहे ऐसे बच्चों के लिए कोई विशेष प्रावधान इस यूएनसीआरसी 89 में भी नहीं है। इसका एक सरल जवाब यही दिया जा सकता है कि इन्हें हम अलग व विशेष नहीं मानते। इसलिए अलग से व्यवस्था की जरूरत नहीं है। लेकिन हकीकतन ऐसा नहीं है। समाज और घर में उन्हें असमान ही बरताव सहना पड़ता है। किन्नरों में कुछ की कहानी अगल है जिसमें लक्षमी नारायण त्रिपाठी आती हैं जिन्हें आज भी परिवार का प्यार,मान सम्मान मिलता है। ऐसे किन्नरांे की संख्या बेहद कम है जिन्हें हिजड़ा बनने के बाद भी परिवार में वही इज्जत और प्यार मिलता रहा हो। अव्वल तो उन्हें उपेक्षित अपने हाल पर ही छोड़ दिया जाता है। और देखते ही देखते वे भीख मांगने पर मजबूर हो जाती हैं। हमारे ही आस पास कितने ऐसे किन्नर नजर आते हैं जिनकी स्थिति बेहतर है। गुरुओं की बात छोड़ दी जाए तो सड़क पर भीख मांगते या फिर बच्चों के जन्म और शादी ब्याह के अवसर पर तालियां बजा कर अपना जीवन काटती हैं।
कई बार शिक्षा की ओर बहुत उम्मीद से ताकता हूं कि क्या कहीं किसी नीति व समिति या फिर पाठ्यक्रम,पाठ्यपुस्तक में इनके भूगोल,इतिहास,संस्कृति,समाज के बारे में कोई मुकम्मल परिचय दिया जाता है। लेकिन बेहद निराशा ही मिलती है। कोई भी पाठ्यपुस्तक कोई भी पाठ्यक्रम इनके भूगोल और मानचित्र से हमारी पहचान नहीं कराते। यही वजह है कि बच्चे समाज के तमाम वर्गों के लेागों, हमारे मददगार नाई, मोची, डाक्टर, मास्टर आदि के बारे में प्राथमिक कक्षाओं में परिचित हो जाते हैं, लेकिन हमारे ही समाज में जीने वाले किन्नरों के बारे में न तो कोई बात बताई जाती है और न ही जानकारी के तौर पर एक दो वाक्य खर्च किए जाते हैं। यह किस मानसिकता की ओर इशारा करता है इसे भी समझने की आवश्यकता है। दरअसल हमारा पूरा सामाजिकरण लड़का और लड़की, स्त्री और पुरुष के तौर पर ही होता है। यहां किन्नरों यानी तृतीयपंथी के लिए कोई स्थान नहीं दिया गया। समाज में विभिन्न नामों से इन्हें पुकारते जरूर हैं छक्का, मौगा, हिजड़ा, खोजवा आदि। लेकिन इनकी प्रकृति और समाज हमारे मुख्य समाज से कैसे अलग पहचान रखने लगा इसके बारे में हमारा इतिहास, भूगोल, शिक्षा शास्त्र सब के सब ख़ामोश ही रहते हैं।
साहित्य की बात करें तो इस विषय पर बहुत ही कम शोध मिलते हैं। कहानी उपन्यास, आत्मसंस्मरण, रेखाचित्रादि भी न के बराबर है। यदि कुछ मिलता है तो वह दंतकथाएं, कही सुनी बातें जिसपर हम धारणाएं बना लेते हैं। हम दरअसल एक पूर्वग्रह के शिकार हो जाते हैं। हम वैसी ही स्थितियां मान भी लेते हैं कि हिजड़ों मंे मरने बाद रात में लाश को नंगा कर ले जाया जाता है। इनके लिंगछेद हुए होते हैं। वे बच्चों को उठाकर उन्हें जबरन लिंग काट कर हिजड़ा समुदाय में शामिल कर लेते हैं आदि। किन्तु यह पूरा सच नहीं है। जहां तक साहित्य के मौन की बात है तो वास्तव में हिन्दी में अबतक शायद पांच छह से ज्यादा कहानी,उपन्यास व अन्य पुस्तक लिखी गई हैं जिन्हें पढ़कर किन्नर समुदाय को समझा जा सके। साहित्य और समाज के हाशिए पर जीवन बसर करने वाली लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी की आत्मकथा मैं हिजड़ा मैं लक्ष्मी किताब इसी वर्ष छप कर आई है। यह किताब बड़ी ही शिद्दत से हिजड़ा समुदाय के भूगोल को तथ्यपरक और साक्ष्य सहित जानकारियां भर ही नहीं देती, बल्कि एक किन्नर को किस किस तरह के सामाजिक, मानसिक और शारीरिक भेद-शोषण के दौर से गुजरना पड़ता है इसकी भी झलक इस किताब में मिलती है। इस किताब से पूर्व अंग्रेजी मंे लिखी किताब निदर मैंन नौर विमेन इन इंडिया। यह किताब जिस गंभीरता से किन्नरांे के समाज, भूगोल और मनोविज्ञान की ओर पाठकों का ध्यान खींचती है वैसी किताब हिन्दी में अब तक कोई नहीं है। यह जिस ओर संकेत करती है वह निराशाजनक है। साहित्य आदि भी इन्हें अपना विषय नहीं बनाना चाहते। या कह लें इनके पास भी पर्याप्त जानकारी नहीं है कि इनकी दुनिया आखिर है कैसी और कैसे चलती है। दिलचस्पी का न होना और रूचि भी न लेना दोनों में ख़ासा अंतर है। वास्तव में न तो हमारी रूचि होती है और न हम जानना ही चाहते हैं। यही कारण है कि ये हमारे आस पास होते हुए भी हमसे कोसों दूर होते हैं।
हिजड़ों को लेकर फिल्मों में कई भूमिकाएं निभाई गईं। फिल्मों में दो तरह की किन्नरों की कथा गाथा मिलती है। पहला वे जो महज साड़ी पहन कर नाच गाने करती हैं। जिनकी आवाज स्त्रैण होती है। दूसरी वैसी फिल्में हैं जिसमें किन्नरों को मुख्य भूमिका में रखते हुए उनकी दुनिया की कुछ जानकारियां और संवेदनाओं को समाज के सामने लाया गया है। सदाशिव आम्रपुरकर ने सड़क में, आशुतोष राणा ने संघर्ष  में सशक्त भूमिका निभाई है। वहीं परेश रावल ने भी किन्नरों की भावनात्मक पक्ष को उभारने की तमन्ना फिल्म में कोशिश की है। सबसे दिलचस्प और सामाजिक राजनीतिक हस्तक्षेप करने वाली शबनम मौसी की कहानी से मिलती जुलती हु ब हु समान तो नहीं किनतु वेलकम टू सज्जनपुर फिल्म है। इसमें एक हिजड़ा चुनाव मंे खड़ा होता है। काफी जद्दो जहद के बाद चुनाव जीत भी जाती है किन्तु उस गांव के वर्चस्वशाली परिवार को यह जीत नागवार गुजरी। एक दिन सुबह उस हिजड़े की लाश नहर किनारे मिलती है। यह फिल्म वास्तव में समाज और समाज के नीति निर्माताओं के लिए एक आईना है।
मैं हिजड़ा मैं लक्ष्मी किताब में लक्ष्मी नारायण बड़ी ही साफगोई से अपनी आपबीती कहानी, व्यथा-कथा कहती हैं। कहती हैं कि हम हिजड़ों को समाज के मुख्य अंग बन कर ही जीना चाहिए। हम क्यों समाज से विमुख रहें। हम तभी समाज का हिस्सा बन सकते हैं जब हम ज्यादा से ज्यादा दिखाई देंगे यानी विजबल हांेगे। लक्ष्मी जी ने न केवल भारत में बल्कि यूएन के जनरल एसेम्बली में हिजड़ों की आवाज उठा चुकी हैं। इतना ही नहीं विश्व भर में टांस्जेंडर के मसले की वकालत कर रही हैं। आज की तारीख मंे एक लक्ष्मी नहीं हैं जो किन्नरों की स्थिति सुधरे। बल्कि कई सारी संस्थाएं जिसे किन्नर समाज ने स्थापित किया इन्हें जागरूक करने का काम कर रही हैं। स्वास्थ्य, शिक्षा, वोट आदि अधिकार मिले इसके लिए लगातार देश भर में विभिन्न संस्थाएं काम कर रही हैं। दरअसल इसी समाज में उन्हें दोयमदर्जे की जिंदगी इसलिए बसर करनी पड़ रही है क्योंकि हमारी नीतियां स्पष्ट नहीं है। शिक्षा की मुख्यधारा में उन्हें समावेशित करने की ताकत कमजोर हो चुकी है। हालांकि लक्ष्मी ने अपनी पढ़ाई बी काम तक कैसे और किन मानसिक,सामाजिक और सांस्कृतिक दबाओं के तहत पूरी की इसकी बानगी हमें मैं हिजड़ा मैं लक्ष्मी में मिलती है। ऐसे ही बारहवीं और बी ए तक पढ़े किन्नर मिलते हैं लेकिन स्कूल से काॅलेज तक के सफर में कितना और किस स्तर तक इन्हें छीला गया, खखोरा गया यह वे ही बेहतर जानते और बताते हैं। हालांकि लक्ष्मी को अच्छे गुरु मिले जिन्होंने स्कूली स्तर पर इनकी डांस कौशल को काफी सराहा और प्रोत्साहित किया। उसी तरह से इन्हें अपने घर में भी मां-पिता और भाई,बहनों से भी भरपूर प्यार मिला। लेकिन समाज ने इन्हें बचपन में ही तृतीयपंथी के कुछ लक्षण देखते हुए बड़े लड़कों ने इनका शारीरिक शोषण भी किया। आमतौर पर किन्नरांे में एच आई बी होने की आशंका बनी रहती है ख़ासकर जो उस काम में लगे हैं। लक्ष्मी स्वयं स्वीकारती हैं कि उनके समुदाय मंे इस किस्म की मौत बहुत होती हैं। इसे रोकने के लिए इनकी संस्था अस्तित्व ने ठाणे मंे काफी काम किया। देश भर में जागरूकता अभियान भी चलाया। एच आई बी न हो इसके लिए सेक्स बिना कंडोम के न करें आदि जानकारियां देने का काम अस्तित्व करती है। यदि पुलिस व प्रशासन की ओर से हिजड़ों को बेवजह परेशान किया जाता है तब भी विभिन्न संस्थाएं उनके बचाव में खड़ी हो जाती हैं।
शिक्षा और संवेदनशीलता इन दो औजारों से तृतीयपंथी समाज को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने में मदद मिलेगी। हमें लोकतंत्र के दो कार्यपालिका और न्यायपालिका से भी काफी उम्मीद है। साथ ही साथ पत्रकारिता तो समय समय पर इस समाज को उठाने और इनकी दुनिया पर स्टोरी कर आम लोगों के बीच जागरूकता पैदा करने की कोशिश करती है। हाल ही में एक मीडिया घराने से निकलने वाली डेली अंग्रेजी अख्.ाबार के संडे मैग्जीन में टांस्जेंडर किन्नरों की बदलती भूमिका और उनकी म्यूजिक बैंड पर स्टोरी छापी। इसे देख पढ़कर लगता है कि मीडिया भी इन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने और करीब लाने में बड़ी भूमिका निभा सकती है। इसी किस्म का काम लक्ष्मी ने कुछ साल पहले हिजड़ों मंे ब्यूटी क्वीन कांटेस्ट करा कर समाज और मीडिया का ध्यान इस समाज की ओर खींचने की कोशिश की थी।

Tuesday, April 5, 2016

शिक्षकों की प्रशिक्षण पर विशेष बल


दिल्ली सरकार बड़ी तेजी और गंभीरता से स्कूली शिक्षा के स्तर को सुधारने में लगी है। कई बार मान लेने का मन करता है कि यह शायद महज राजनीतिक घोषण भर नहीं है। बल्कि शिक्षा मंत्री वास्तव में शिक्षा में बदलाव को शिद्दत से महसूस कर रहे हैं। संभव है यही वजह है कि इस बार के बजट में उन्होंने 10,690 करोड़ रुपए का प्रावधान किया है। उसमें भी शिक्षकों के प्रशिक्षण और कौशल विकास को ख़ास तवज्जो दिया है। बजट अभिभाषण में उन्होंने कहा था कि सरकारी शिक्षकों और प्रधानाचार्य को कैंब्रिज, हाॅवर्ड आदि विश्वविद्यालयों में प्रशिक्षण के लिए भेजा जाएगा। इस घोषणा को अमलीजामा पहनाया जा रहा है।
नब्बे प्रधानाचार्याें को कैंब्रिज भेजा जाएगा जहां वो दस दिन प्रशिक्षण कार्यशाला और वहां के स्थानीय सरकारी स्कूलों में विजिट करेंगे। वहां कैसे शिक्षण होता इसका अवलोकन करेंगे। तीस तीस की संख्या मंे इन्हें भेजा जाएगा। वे वापस आकर अपने स्कूलों में कार्य करेंगे। इसमें मैनेजमेंट और लीडरशीप कौशलों पर भी जोर दिया जाएगा।
दूसरे महत्वपूर्ण बात यह कि पिछले शुक्रवार से विषयवार छह से 9 वीं कक्षा के प्रशिक्षकों का प्रशिक्षण शुरू हुआ है। पहले खेम में हिन्दी के 43,00 टीजीटी टीचर का प्रशिक्षण त्यागराज स्टेडियम में शुरू हुआ। अब सवाल यहां उठना लाजमी है कि क्या इतनी बड़ी संख्या में प्रशिक्षण संभव है? क्या यह सम्मेलन का रूप नहीं ले लेगा।
माना जाता है कि प्रशिक्षण कार्यशाला में तीस से ज्यादा प्रतिभागी नहीं होने चाहिए। जो भी हो प्रयास की सराहना की जानी चाहिए।
अनुरोध इसे सरकार की जय जयकार करना करना नहीं है बल्कि सच को कबूल करना है

Monday, April 4, 2016

हर बंदी की अपनी कहानी


कौशलेंद्र प्रपन्न
उधमसिंह नगर के सितारगंज में संपूर्णानंद केंद्रीय शिविर कारावास जो कि हल्द्वानी से तकरीबन पचपन किलोमीटर दूर खेतों और जंगलनुमा प्रकृति की गोद में बसा है। आसपास सिर्फ खेत खलिहान और कुछ नहीं। कुछ गोरू डांगर दिखे चारा खाते हुए। इस जेल के द्वार पर सन्नाटा और उदासी जैसी स्थायी घर बना चुकी सी लगी। जेल के अधीक्षक श्री टीपी जोशी ने बड़ी ही गर्मजोशी से स्वागत किया और जेल का बड़ा सा गेट खोला गया। गेट पर रखी रजिस्टर पर नाम पता,समय आदि दर्ज कर अंदर प्रवेश किया। कई सारी जिज्ञासाएं, सवाल,उलझनें साथ ही हो लीं। इन कैदियों/बंदियों से कैसे बात करनी है? क्या बात करनी है? आदि।
यहां रहने वाले कैदियों/बंदियों को दो वर्गों में बंाटा गया है। पहले वे बंदी हैं जिन्हें शिविरवासी कहा जाता है। ये शिविर मंे खुले रहते हैं। बाहर आना-जाना,जेल की खेती बारी करना इनके जिम्मे होता है। यह छूट, ऐसी आजादी यूं ही नहीं मिली इन्हें। बलबीर सिंह से जब बातचीत हुई तो उन्होंने बताया वो पिछले बीस साल से उम्र कैद की सज़ा काट रहे हैं। उनके व्यवहार आदि को देखते हुए उन्हें शिविर में रहने की इजाजत दी गई। उन्होंने बताया कि वे बाजार,शादी ब्याह आदि में भी जाते हैं। वहीं दूसरे किस्म के वे बंदी हैं जिन्हें चाहरदीवारी के अंदर रहना होता है। इन्हंे शिविरवासियों की तरह स्वतंत्रता नहीं है।
मो. हक़ साहब की उम्र यही कोई सत्तर साल है। इनकी भी अपनी कहानी है। यहां सब के साथ अपनी -अपनी कहानी चला करती है। इन्हें इस जेल में तकरीबन पंद्रह साल हो गए। क्या कोई उम्मींद है बाहर जाने की? तब बड़ी डबडबाई आंखों से कहते हैं संभव है अब आत्मा ही आजाद हो पाए। इन्हें किस जुर्म में यहां लाया गया? हक साहब बताते हैं इन्हें राजनीतिक आंदोलन में कैद किया गया अब तक कोई सुनवाई नहीं हुई। वहीं बलजीत सिंह की अपनी कहानी है। शादी के एक साल बाद ही उनकी पत्नी ने आत्महत्या कर ली। उनके भाई वकील और पुलिस मंे थे ऐसी धाराएं लगाई कि अब तक जेल में उन्हें बीस साल से ज्यादा हो गए। पूछने पर की घर में कौन कौन हैं बताया कि मां है और भाई है। कभी कभी मिलने आ जाते हैं।
एक बिल्कुल किशोर आयु का लड़का मिला जिसकी उम्र यही कोई बीस की रही होगी। उसकी गर्ल फ्रैंड अचानक इसके कमरे आ गई और शादी के लिए दबाव बनाने लगी। इसके मना करने पर उसने पुलिस बुला ली। भगाने के आरोप लगा कर उसे जेल भेज दिया गया। ऐसे ही और भी बंदी हैं यहां। कुछ को देख कर एहसास तक नहीं होगा कि इन्होंने कोई जर्म भी की होगी। एक ओर बीच बाईस साल के तो दूसरी ओर पचास,पचपन साठ और सस्सी साल के बंदी भी मिले। उनके चेहरे पर अब कोई ख़ास भाव नहीं आते। बस ख्ुाली आंखों से देखते रहते हैं। मुसकान तो गोया उनकी जिंदगी से दूर बहुत दूर जा चुकी हो।
दरअसल यह आम जेलों जैसा नहीं है। चारों ओर खेती होती है। बंदी ही किसानी करते हैं। बलजीत बताते हैं कि पैदा हुए अनाज अपने भर रखने के बाद हम लोग बाकी अनाज दूसरे जेलों मंे भेज देते हैं। संपूर्णनंद केद्रीय शिविर कारावास इस रूप मंे अलग है कि यहां बंदी को काफी छूट है। अब यहां बंदियों को उनके गृह राज्यों मंे हस्तांतरित किया जा रहा है। इसे लेकर बंदियों मंे आपस मंे काफी उदासी है। जीवन सिंह ने बताया कि हमलोग यहां भाई की तरह रहते हैं। हर पर्व त्योहार मिल जुल कर मनाते हैं। लेकिन ख़ुदा जाने कब यहां से बाहर आएंगे और आसमान में ताकने लगते हैं। जोशी जी ने बताया कि इस जेल की जमीन पर सरकार की नजर है। एक एक कर इसपर कब्जा  किया जा रहा है। सिडकुल बसा कर इसकी आधी जमीन सरकार ले चुकी है।


Wednesday, March 30, 2016

लेंस की नजर में होंगी स्कूली कक्षाएं



कौशलेंद्र प्रपन्न

दिल्ली के शिक्षा मंत्री ने अपने बजट भाषण में शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर अपनी और अपने मंत्रालय की चिंता एवं पहलकदमियों से अवगत कराया। उनका कहना था कि दिल्ली मंे शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए दिल्ली के सरकारी स्कूली कक्षाओं में सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएंगे। साथ ही शिक्षकों की व्यवसायिक दक्षता को बढ़ाने के लिए उन्हें बेहतरीन प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा। मंत्री जी ने यह भी कहा कि शिक्षकों को प्रशिक्षण के लिए हाॅर्वर्ड, कैंब्रिज, आॅक्सफोर्ड जैसे विश्वविद्यालयों मंे  भेजा जाएगा। साधुवाद मंत्री जी, कम से कम किसी ने तो शिक्षकों की व्यावसायिक दक्षता विकास की ओर ध्यान ही नहीं दिया बल्कि उसके लिए बजट भी मुहैया कराया। प्रशिक्षण कौशल और उसकी गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए सरकार ने 9.4 फीसदी से बढ़ाकर राशि को 102 करोड़ कर दिया है। स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता को बेहतर करने के लिए 9,623 शिक्षकों की नियुक्ति की घोषणा भी की गई है। यह भी मौजू है कि दिल्ली में स्कूली स्तर पर वोकेशनल यानी व्यावसायिक प्रशिक्षण शिक्षण को ध्यान में रखते हुए रोहिणी और धीरपुर मंे संस्थान खोले जाएंगे। यह कार्य अंबेडकर विश्वविद्यालय के परिसरों का विस्तार देकर भी किया जाएगा। पिछले साल भी दिल्ली सरकार ने शिक्षा को ख़ासा महत्व देते हुए बजट में काफी उत्साहजनक बढ़ोत्तरी की थी। संकेत अच्छे हैं।
 इस बजट मंे शिक्षा की हालत सुधारने के लिए 10,690 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं। अब हमंे विस्तार इस बजट के धागों,बुनावटों को ,खोलने-समझने की जरूरत हैं। सरकार शिक्षा मंत्रालय दिल्ली सरकार की घोषणा है कि दिल्ली के तमाम सरकारी स्कूली कक्षाओं मंे सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएंगे। इस काम के लिए बजट मंे अलग से सौ करोड़ रुपए का प्रावधान है। स्कूली कक्षाओं मंे सीसीटीवी कैमरे लगाए जाने को लेकर प्रसिद्ध शिक्षाविद् प्रो अनिता रामपाल ने अपनी प्रतिक्रिया मंे कहा कि क्या आपकों शिक्षकों की प्रतिबद्धता पर विश्वास नहीं है? क्या आप मान कर चलते हैं कि शिक्षक नहीं पढ़ाते,नकारे हैं आदि। इस परिघटना को प्रकारांतर से देखने और शैक्षिक विमर्श को समझने की आवश्यकता है। क्या शिक्षा विमर्श और शिक्षण एक तकनीकी प्रक्रिया है? क्या शिक्षा किसी बनी बनाई इनपुट आउट सिद्धांत पर चला करती है? क्या शिक्षकों के श्रम को आंकड़ों और चंद छवियों में कैद कर समझा जाए सकता है। वैसे भी पहले क्या कम शिक्षकों की छवि को ख़राब करने और गैर जिम्मदार, नकारा आदि साबित करने की कोशिश होती रही है जो अब कक्षाओं मंे सीसीटीवी लगाने की कवायद की जा रही है। शिक्षण एक सृजनात्मक और कौशलों भरा कार्य है। इसमें पल पल की ख़बर लेते तर्ज पर जब शिक्षकों की हर गतिविधि को बतौर फुटेज तैयार किया जाएगा तब संभव है वह शिक्षक बाहर नहीं आ पाएगा जिसका सपना गिजू भाई, गांधी जी, टैगोर आदि ने देखी थी। कक्षा मंे कई बार पूर्व निर्धारित, पूर्व नियोजित तय पाठ्यचर्याओं से बाहर भी निकलना पड़ता है। कई बार अपनी पूरी तैयारी भी एक सिरे से ख़रिज कर नई चुनौतियांे और उत्सुकता को लेकर आगे बढ़ना होता है। वो शिक्षक जो अपनी पूर्व निर्धारित पाठ्ययोजनाओं पर शिक्षण करते हैं और वे जो पूर्व निर्धारित मंे भी समयानुसार एवं संदर्भानुसार रद्दो बदल के लिए तैयार होते हैं वह कक्षा-कक्षा ज्यादा जीवंत और प्रभावकारी मानी गई है। तर्क तो यह भी दिया जा सकता है कि यदि शिक्षक अपने कर्म के प्रति ईमानदार है तो उसे डरने की क्या आवश्यकता है। जैसे वो अभी पढ़ाता है वैसे ही तब भी पढ़ाए। लेकिन इस तर्क मंे वह शैक्षिक विमर्श और दर्शन शामिल है जहां स्वीकारा गया है कि कक्षा में बच्चा और शिक्षक सहज और स्वीकार्य स्वभाव से हों। क्या जब हर वक्त एक लेंस आपको घूरती रहेगी तब एक बच्चा या शिक्षक सहज तरीके से शिक्षण व बातचीत कर पाएंगे। अपने शिक्षण के तजर्बे के आधार पर कह सकता हूं कि दसवीं व 11 वीं में पढ़ने वाले बच्चे/बच्चियों के पास काफी उत्सुकताएं और सवाल होते हैं जिसका जवाब उन्हें घर में नहीं मिलता। समाज उसके उत्तर देने में दिलचस्पी नहीं दिखाता। यदि दिखाता भी है तो वहां एक बाजार है। बाजार की अपनी प्रकृति होती है। वो पीले जिल्दों वाली किताबों से ज्ञान बढ़ाता है। ऐसे में बच्चों की जिज्ञासाओं को शंात करने वाला यदि कोई साधन है तो वह शिक्षक है। मेरे पास कई बार बच्चे अपनी निजी बेचैनीयत को लेकर बात करने और राय लेने आया करते थे। जब उनकी उत्सुकता शांत हो जाती वे मन लगा कर पढ़ते थे। लेकिन क्या वह अनौपचारिक बताचीत की संभावना लेंस की मौजूदगी मंे बचती है? शिक्षा मंत्रायल की मनसा भी साफ है कि इंटरनेट के जरिए अधिकरियों,शिक्षामंत्री और अभिभावकों को उपलब्ध कराया जाएगा। इन फुटेज का भविष्य मंे किस किस कोणों से विश्लेषण और रिपोर्ट तैयार की जाएंगी इसका अनुमान मात्र लगाया जा सकता है।
यह तो ठीक है कि शिक्षकों को एक बार सेवापूर्व प्रशिक्षण प्रदान कर लगभग उन्हें छोड़ ही दिया जाता है। जबकि शिक्षा मंे कुछ न कुछ नए नए शोध,विधियों, प्रविधियों पर होते रहते हैं जिनसे शिक्षक अपने शिक्षण कौशल को मांज सकते हैं। लेकिन इसकी उम्मीद बहुत क्षीण नजर आती है। यूं तो अंतःसेवाकालीन शिक्षा प्रशिक्षण संस्थान भी हैं जहां विभिन्न बैनरांे के तहत प्रशिक्षण कार्यशालाएं होती रहती हैं। मसलन सर्व शिक्षा अभियान, राष्टीय माध्यमिक शिक्षा अभियान आदि। यदि गौर से देखें और कार्यशाला की योजना बनाने वालों और इनमें हिस्सा लेने वालों से पूछें तो बेहद निराशा होती है। क्योंकि मार्च से पहले कई सारे सेमिनार करा लेने हैं। आंकड़े दुरुस्त रखने हैं तो कार्यशालाएं मई जून और दिसंबर, जनवरी की छुट्टियों मंे आयोजित होती हैं। वहां प्रशिक्षण देने वाले को एक दिन पूर्व तक नहंी मालूम होता कि किस विषय पर उसे बोलना है। कहने को तो इसकी पूरी योजना तैयार होती है लेकिन समुचित तरीके से उसका संप्रेषण नहीं हो पाता। उस कार्यशाला से विभाग और शिक्षकों की क्या अपेक्षा है इसपर गौर नहीं होता बल्कि कार्यशालाएं हुईं यह दिखाने की जल्दबाजी ज्यादा होती है। स्वयं का अनुभव भी यही बताता है कि जब ऐसे कार्यशालाओं मंे जाने का अवसर मिला तो एक मोटेतौर पर विषय बता दिया जाता है। प्रतिभागी भी तैयार होकर आते हैं कि सिर्फ समय काटना है। आदेश का पालन होना चाहिए। कई प्रतिभागियों ने तो स्वीकारा भी कि आप ही हो जो खून पसीना बहा कर पढ़ा रहे हैं वरना तो लोग अपनी कथा कहानी सुना कर चले जाते हैं। हमें भी कोई उम्मीद नहीं रहती। लेकिन अनुभव बताते हंै कि यदि आपका कंटेंट रोचक और उनकी अपेक्षाओं के अनुकूल हैं तो वे रूचि लेकर सहभागी भी बनते हैं। उनकी आंखों में आंसू भी होते हैं कि हमंे ऐसे शिक्षक नहीं मिले जो इतनी बारीक और रूचिपूर्ण तरीके से पढ़ाए। ऐसे शिक्षकों की संख्या बेशक कम हो लेकिन अभी है ऐसे शिक्षकों की कमी नहीं है जो पूरे मनोयोग से पढ़ते और पढ़ाने में विश्वास रखते हैं। जिला मंडलीय प्रशिक्षण संस्थानों मंे शिक्षण प्रशिक्षण कार्य हो रहे हैं। जरूरत इस बात की है कि उन्हें और कैसे सार्थक बनाया जाए और बच्चे सीखे हुए कौशलों मंे कक्षा तक ले जा सकें।
शिक्षा मंत्री जी ने बजट में शिक्षकों के प्रशिक्षण के लिए अलग से बजट का प्रावधान किया है। देखना यह है कि जिन शिक्षकों को हाॅर्वर्ड, कैंब्रिज आदि विश्वविद्यालयों मंे भेजा जाएगा उसके मापदंड़ क्या होंगे? यानी चयन प्रक्रिया क्या होगी? क्या वहां सीखी गई तालीम को शिक्षक अपने कक्षाओं में संप्रेषित कर पा रहा है या नहीं इसे जांचने के लिए क्या सरकार ने कोई ऐसी संरचना बनाने की योजना बनाई है। यदि नहीं तो शिक्षा मंत्री जी को इस पर भी काम करने की आवश्यकता है। चयन समिति की बिंदुओं पर शिक्षकों का चयन करेगी आदि सवालों पर शिक्षा विभाग को रणनीति बनाने की आवश्यकता पड़ेगी। क्योंकि शिक्षा मंत्री जी ने बजटीय भाषण में अपनी ंिचंता शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर प्रकट की है। आज की तारीख मंे बच्चे शिक्षा तो हासिल कर रहे हैं लेकिन वह दरअसल शिक्षा नहीं बल्कि कुछ कौशलों को प्राप्त कर रहे हैं। जीवन और शिक्षा के बीच की खाई को कैसे पाटें इसकी समझ कम से कम हमारी आज की शिक्षा प्रदान नहीं करती। इसी खाई को पाटने के लिए संभव है व्यावसायिक शिक्षा को बढ़ावा दिया गया है। बजट में ख़ासकर 152 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। व्यावसायिक शिक्षा की कक्षाएं स्कूली स्तर पर ही दी जाएंगी। दूसरे शब्दों मंे यह मान लिया गया कि सभी बच्चे उच्च शिक्षा तक न तो जाएंगे और न ही उनकी परिस्थितियां इसकी इजाजत ही देती हैं। इसलिए उन्हें बीच राह में ही रोजगार के औजार दे दिए जाएं ताकि अपने जीवन का भरण पोषण कर सकें। प्रसिद्ध शिक्षाविद् अनिल सद्गोपाल का मानना है कि सरकार दरअसल अपनी जिम्मेदारियों से बचना चाहती है। वह सभी बच्चों को बुनियादी शिक्षा हासिल ही नहीं कराना चाहती। वह चाहती है कि जो पांचवीं के बाद काम पर लग जाएं। और इस दिशा में सरकार तेजी से आगे बढ़ रही है। प्रो सद्गोपाल ने हाल ही मंे एक गोष्ठी में कहा था कि अस्सी और नब्बे के दशक में जब सरकारें लगातार शिक्षा और सरकारी स्कूलों, विश्वविद्यालयों को नकारा और बेकार साबित करने में लगी थीं तब यही संस्थान, शिक्षक खामोश बैठे थे जिसका खामियाजा आज भुगतना पड़ रहा है। दूसरे शब्दों मंे कहंे तो शिक्षा का आधिकार अधिनियम लागू हुए आज तकरीबन पांच वर्ष पूरे हो गए। क्या वजह है कि अभी भी सरकारी आंकड़ों मंे महज अस्सी लाख बच्चे स्कूल से बाहर हैं और अन्य रिपोर्ट के अनुसार यह संख्या तकरीबन पांच करोड़ तक जाता है। व्यावसायिक शिक्षा दी जाए इससे किसे गुरेज हो सकता है। गांधी जी ने भी 1932 में वर्धा शिक्षा सम्मेलन में इसकी वकालत की थी कि हर हाथ को काम और हर हाथ को शिक्षा मिले। वहां हर हाथ का काम से प्रकारांतर से व्यावसायिक शिक्षा ही थी।



Saturday, March 26, 2016

सेमिनारांे और गोष्ठियों का महीना मार्च



कौशलेंद्र प्रपन्न
फरवरी और मार्च ख़ासकर सेमिनारांे और गोष्ठियों का महीना होता है। यूं तो आप बजट का भी कह सकते हैं। कहने को तो बसंत और होली की भी कहा जा सकता है। लेकिन अकादमिक क्षेत्र मंे बात की जाए तो यह एक अकादमिक सत्र का अंतिम माह होता है। जो भी आपको बजट मिले थे उसे 31 मार्च से पहले खत्म करने होते हैं। यदि आपने खर्च नहीं किए तो वो पैसे वापस लौटाने होते हैं यह तो आप सभी जानते हैं। केंद्र को राज्य सरकारें भी मोटी राशि लौटाती रही हैं और उसे सुनने को मिलता है कि आप लोग काम नहीं करते। काम करते तो पैसे कैसे बचते। यह एक अजीब सा खेल है। जो लोग संस्थानों व दफ्तरांे में काम करते हैं वो इसे बेहतर समझ सकते हैं। वर्तमान में आपने कितना खर्च किया इसपर आगामी सत्र का बजट निर्भर करता है।
यह जानना भी बड़ा मौजू है कि आपको पैसे कब और कितने मिलते हैं। कल्पना कर सकते हैं कि जब आपको पैसे जनवरी के अंत व फरवरी के आखि़र में मिलेंगे तो उसे खर्च करना एक अगल सिर दर्द है। यदि आपके पास योजना नहीं है। कार्यक्रम की रूपरेखा नहीं है तो आप क्या करेंगे। आपको न चाहते हुए भी पैसे वापस करने होते हैं। उसपर आप पर आरोप लगता है कि आप तो मिले हुए पैसे ही खर्च नहीं कर पाते। आप काम ही करना नहीं चाहते आदि आदि। क्या यही सच है इन बजटों का? क्या वास्तव में हम इतने नकारे हो गए हैं कि कार्यक्रम की रूपरेखा और येाजनाएं नहंी बनाते। बनाते हैं पूरा बनाते हैं इस तोहमत से बचने के लिए विभागाध्यक्ष, संस्था प्रमुख आनन फानन में कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार कर उसे अमलीजामा भी पहनाते हैं। कई तो ऐसे घाघ होते हैं कि देखते ही देखते पैसे किन किन प्रोग्रामों में खर्चा दिखा देते हैं जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।
बहरहाल काॅलेज, विश्वविद्यालयों मंे फरवरी से मार्च के बीच लगातार, एक के बाद एक सेमिनार आयोजित होते हैं। विभिन्न माध्यमों का इस्तमाल कर आमंत्रण भी भेज देते हैं। और वैसे ही शोध पत्रों की बारिश भी होने लगती है। नाम रखा जाता है नेशनल सेमिनार। इन सेमिनारों में शोध पत्रों के पाठ भी धड़ा धड़ होते हैं। साथ ही साथ पर्चा पाठकों को एक प्रमाण पत्र भी थमा दिया जाता है जिसे वो यूजीसी के नियमानुसार अंक भी हासिल कर लेता है। सच पूछा जाए तो पर्चे अंकीय बढ़ोत्तरी के मकसद से ज्यादा पढ़े हैं।
पिछले दिनों दिल्ली विश्वविद्यालय के केंद्रीय शिक्षा संस्थान, शिक्षा विभाग में आयोजित टीचर एजुकेशन एंड चैलेंजेज पर नेशनल सेमिनार था। उसमें पर्चा पढ़ने वालों की पठनीय कौशल का प्रदर्शन भी देखने को मिला। कुछ ने तो सिर्फ पीपीटी जो उन्होंने बनाया था उसका वाचन कर दिया। यदि पीपीटी का मकसद महज वाचन है तो यहां हमें सोचने की आवश्यकता है। दरअसल पीपीटी आदि सहायक सामग्री तो हो सकती हैं मुख्य नहीं हो सकतीं। मुख्य तो वक्ता ही होता है। एक प्रस्तोता की भूमिका और वाचक की भूमिका में बुनियादी अंतर है। लेकिन शोधकर्ताओं ने जिस शिद्दत से पीपीटी बनाने मंे अपनी शक्ति लगाई यदि उसका एक हिस्सा भी प्रस्तुतिकरण पर दिए होते तो ज्यादा प्रभावशाली हो जाता। वहीं हिन्दी वर्तनी की मानकता और देवनागरी लिपि विषय पर श्रीराम काॅलेज आफ काॅमर्स, दिल्ली विश्वविद्यालय में तीन दिवसीय सेमिनार में हिन्दी शिक्षा और शिक्षण की प्राथमिक कक्षायी चुनौतियां विषय पर बोलने का अवसर मिला। इस तरह की बेहद शुष्क और व्याकरणिक विषय पर कम ही सेमिनार होते हैं। वहां मालूम चला कि इस विषय पर 1986 में सेमिनार हुआ था और 2016 में हो रहा है।
विषय के चुनाव और विषय के वक्ताओं से भी अंदाजा लगाया जा सकता है कि विषय पर विभाग व संस्था प्रमुख का खुद का क्या रूख़ है। निश्चित ही विभागाध्यक्ष अपने सहयोगियों से विमर्श करने के बाद ही विषय तय किया करते हैं। कइ बार विषय सुन और पढ़कर सोचने पर विवश हुआ जा सकता है कि विषय के चयन पर पर्याप्त मंथन नहीं किया गया। इन दिनों सेमिनार के कुछ प्रचलित विषय हैं मसलन मीडिया और समाज, मीडिया का समाज पर प्रभाव, छायावादी कविता और वर्तमान कविता, आज की कहानियों मंे स्त्री विमर्श आदि। क्या हम इन विषयों के साथ ही वर्तमान चुनौतियांे से रू ब रू होते समाज को नहीं जोड़ सकते। यदि हिन्दी व अन्य विषयों के विमर्श विषय पर नजर डालें तो लगता है इनपर पूर्व में भी कइ्र्र गोष्ठियां और पर्चे लिखे और पढ़े जा चुके हैं। हालांकि यह कोई कसौटी नहीं है विषय के चयन के दौरान। लेकिन इस ओर भी ध्यान देने की आवश्यकता है कि जिस विषय को सेमिनार के लिए चुना जा रहा है उसमंे देश में कितने आधिकारिक विद्वान हैं जो उसपर रोशनी डाल सकते हैं। क्योंकि शोध पत्र के साथ ही उस सत्र की अध्यक्षता भी तो करने वाला चाहिए। यह अलग बात है कि आज हर तथाकथित अध्यक्ष साहब हर विषय के सत्र की अध्यक्षता करने की पात्रता रखते हैं।
वर्तमान स्थिति में शिक्षा व साहित्य किस प्रकार हमारे समाज और युवाओं को रास्ता दिखा सकती है किस स्तर तक साहित्य एवं शिक्षा समाज का मार्गदर्शन कर सकती है इसपर भी विचार करने की आवश्यकता है। विषय के चुनाव के दौरान विषय से समाज यानी कम से कम पाठक वर्ग को किस स्तर तक सृजनशील बनाने मंे मदद कर सकता है आदि पर भी चिंतन की आवश्यकता है। सवाल उठाया जा सकता है कि क्या साहित्य मंे महज प्रयोगवाद,छायावाद, स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, उत्तर आधुनिकतावाद आदि पर भी विमर्श करने से साहित्य के उद्देश्यों की पूर्ति हो जाएगी। क्या साहित्य महज कविता,कहानी,उपन्यास आदि के इर्द गिर्द ही सिमट जाता है? या साहित्य इससे आगे की यात्रा भी तय करता है।
वापस अपने विषय पर लौटें तो यही कहा जा सकता है कि जनवरी और फरवरी और मार्च माह में विभिन्न विषयों पर सेमिनार आयोजित होते हैं। हमें यह भी देखना और समझना होगा कि इन सेमिनारों का कितना इस्तमाल अकादमिक गुणवत्ता के लिए होता है। क्या महज आयोजन तक ही सीमित रहे या उससे आयोजक विभाग और संस्था भी लाभान्वित हुई। क्योंकि, अकादमिक विभागों की स्वयं की सृजनात्मकता और दक्षता वृद्धि के अवसर मिलने चाहिए। इस लिहाज से विचार करें तो हर सेमिनार के बाद विभाग की क्या समझ विकसति हुइ्र्र और उन प्रस्तुत पर्चों का इस्तमाल भविष्य में कैसे होने वाला है, इसकी भी योजना बनानी चाहिए। ऐसा न हो कि अन्य आयोजनों की तरह ही यह भी सिर्फ उत्सव और मिलन बन कर रह जाए।


Tuesday, March 15, 2016

हिन्दी शिक्षा और शिक्षण की प्राथमिक कक्षायी चुनौतियां


हिन्दी शिक्षा और शिक्षण की वर्तमान स्थिति को बिना समझे हम हिन्दी शिक्षा कैसी दे रहे है इसका इल्म नहीं होगा। हमें इस बात की भी तहकीकात करनी होगी कि हिन्दी के विकास और संवर्धन में हिन्दी शिक्षा और शिक्षण की क्या स्थिति है। अमूमन हम यह मान लेते हैं कि कविता,कहानी,उपन्यास आदि लेखन से हिन्दी शिक्षा-शिक्षण के उद्देश्यों को हासिल किया जा सकता है यदि ऐसा है तो संभव है कि हम एक बड़ी भूल कर रहे हैं। क्योंकि उक्त विधाओं में गति और प्रसिद्धी लेखकीय क्षमता और अभ्यास से अख़्तीयार की जा सकती है किन्तु बच्चे को हिन्दी पढ़ने-लिखने में यदि परेशानी का सामना करना पड़ता है तो वहां कविता,कहानी आदि उसकी मदद नहीं करतीं। व्याकरण और मानकीकृत वर्तनियों की कसौटी पर बच्चे की हिन्दी की समझ जांची परखी जाती है। यहां समझने की आवश्यकता यह है कि कक्षा में हिन्दी की शिक्षा कैसी दी जा रही है। उदाहरण के तौर पर 2006 से पूर्व 10 वीं और 12 वीं की हिन्दी के प्रश्न पत्रों के सवालों की प्रकृकि को समझने की कोशिश करें तो एक चीज मिलेगी कि तब हमारा ध्यान भाषायी कौशलों का विकास करना था। बच्चे अपठित गद्यांश को पढ़कर जवाब दिया करते थे प्रकारांतर से हम पढ़ने और समझने की दक्षता को परखते थे। दूसरे शब्दों मंे अभिव्यक्ति की क्षमता का विकास हुआ या नहीं इसकी भी तस्दीक किया करते थे। लेकिन 2006 के बाद सीबीएससी ने प्रश्नों के स्वरूप में आमूल चूल परिवर्तन किया। उसके पीछे तर्क यह दिया गया कि बच्चे काफी संख्या में आत्महत्या कर रहे हैं। बच्चों के बोझ को कम करेन के लिए सवालों की प्रकृति में बदलाव जरूरी है। .....दसवीं और 12 वीं स्तर पर न केवल हिन्दी की बल्कि तमाम भाषाओं और विषयों को बहुवैकल्पिक सवालों के नए क्लेवर में प्रस्तुत किया गया। शिक्षाविद्यों और भाषाविद्ों की राय में यह प्रकारांतर से हिन्दी और अन्य भाषाओं के साथ अन्याय था। वह इस रूप में कि पहले जिस स्तर की भाषायी पाठ्यपुस्तकें बनाईं गई और कथानक चुने गए उससे हमारे अपेक्षा थी कि इसे पढ़ने के बाद बच्चों मंे कम से कम भाषायी चार दक्षता आ जाएगी। इसी को ध्यान में रखते हुए पाठ्यपुस्तकों में पाठों की सृजना होती थीं। पाठों के निर्माण में ख़ासतौर से ध्यान रखा जाता था कि बच्चों को पाठ पढ़ने में आनंद आए न कि वह बोझ के मानिंद लगे। इसी के मद्देनजर कविता,कहानी,यात्रा संस्मरण आदि विधाओं की रचनाओं को शामिल किया जाता था। उन्हीं पाठों के आधार पर सवालों की रचना की जाती थी। बच्चों से अपने शब्दों में व्याख्यायित करने की मांग भी की जाती थी। बच्चे हर संभव अपने भाव संसार को प्रकट भी कर पाते थे। निबंध,लेख आदि याद करने और उन्हें सुनाने और लिखने का अभ्यास भी किया करते थे उससे उन्हें अपनी तत् भाषा की लेखन,वाचन,पठन आदि कौशलों से रू ब रू होने का मौका मिलता था। यह आस्वाद बच्चों से बहुवैकल्पिक प्रश्न पत्रों से जरिए छीन लिया गया। अफसोस तो इस बात की है कि तमाम शिक्षण संस्थान,विश्वविद्यालय इस बड़े बदलाव पर मौन थे। इसका ख़ामियाज़ा तो हमारे युवा वर्ग को ही भुगतना होगा।
हिन्दी की वर्तनियों और शिक्षण में शिक्षकों को काफी दिक्कतें आती हैं। मैं यहां प्राथमिक कक्षाओं में हिन्दी शि़क्षा और शिक्षण की बात करूंगा और शिक्षकों को आने वाली परेशानियों से निकालने के लिए क्या तरीके या विधि हो इस ओर आप सभी से रोशनी की अपेक्षा करता हूं। पहले तो सरकारी स्कूलों मंे आने वाले बच्चों के पास भाषा के नाम पर मातृभाषा और स्थानीय भाषाएं होती हैं जिसे थोड़ी देर के लिए अनगढ़ मान लें तो बात स्पष्ट करने में आसानी होगी। एक ही शब्द को विभिन्न बोलियों,वाणियों मंे कई तरह से बोले जाते हैं। बच्चे वही भाषा लेकर कक्षा की दुनिया में प्रवेश करते हैं। मसलन-

मानक भाषायी शब्द स्थानीय बोली व भाषायी शब्द
कुछ कछु कुछो, कछुओ
सिर माथा, कपार,मुड़ी,
पीड़ा व दर्द पेराना, बथना, ऐठाना
नजदीक व पास नियरे, फटले बा
यहां वहां इहां, उहां इहैं उहैं
पांव व पैर गोड़, टांग, टंगरी
अच्छा निमन,नीके,बढ़ीमा आदि

अब सवाल यह उठता है कि भाषाविज्ञान की दृष्टि से देखें तो इन शब्दों को नकारा तो नहीं जा सकता लेकिन हिन्दी की मानकीकृत पैमाने पर तो हमें बच्चों की इस शब्दावली को सुधारने पड़ेंगे। लेकिन दिक्कत यह है कि शिक्षाविद् कहेंगे कि बच्चे की मातृभाषा को दबाने की बजाए उसे जिंदा रखने और उसका सम्मान करना चाहिए। संघर्ष यहां पैदा होता है कि यदि कक्षा में शिक्षक मानक हिन्दी और वर्तनी पर जोर दे तो मातृभाषा और बोलियों के साथ शैक्षिक दर्शन की दृष्टि से न्याय नहीं होगा। ऐसी स्थिति में प्राथमिक शिक्षक क्या करे ? किस निर्देश का पालन करे आदि शैक्षिक सवाल हैं जिनपर हमें विमर्श करना होगा। हमें इस ओर भी विचार करना होगा कि हिन्दी शिक्षण के दौरान हमारी शैक्षिक नजरिया क्या हो।
प्राथमिक कक्षाओं में हिन्दी शिक्षा और शिक्षण की चुनौतियां उच्च स्तरीय कक्षायी स्थिति से काफी भिन्न है। वह इस रूप में कि प्राथमिक कक्षाओं मंे स्वयं शिक्षकों को वर्तनी, वर्णमालाओं और मानकीकरण की समस्या से गुजरना पड़ता है। गौरतलब है कि हमारी वर्तमान शिक्षा पद्धति में हिन्दी का शिक्षण जिस गैर जिम्मेदाराना तरीके से हो रहा है उसका परिणाम हमें उच्च शिक्षा में भी दिखाई देता है। जिस किस्म की वर्तनी संबंधी अशुद्धियां शिक्षक लिखने में बोलने में करते हैं वह यह साबित करने के लिए काफी है कि उन्हें प्राथमिक कक्षाओं मंे शिक्षकों ने दुरुस्त नहीं किया। इस तरह के उदाहरण मुझे पिछले पंद्रह सालों में शिक्षक प्रशिक्षण कार्यशालाओ में देखने को मिला। लेखन के स्तर पर वर्तनी की गड़बडि़यां तो थी ही साथ ही बोलने के स्तर पर भी शिक्षकों में हिन्दी की समझ से वास्ता पड़ा।
जहां बच्चे लिखने मंे नहीं को नही, मैं को मै, हैं को है आदि लिखते हैं वहीं किया को करा आदि भी लिखते बोलते पाया है। इस तरह की अशुद्धियों से मेरा साबका न केवल प्राथमिक कक्षाओं के शिक्षकों की लेखनी से हुआ बल्कि बी एड, एम ए आदि की काॅपियां जांचते वक्त भी रू ब रू हुआ। यह इस बात की ओर इशारा करता है कि इन तरह की गलतियों की ओर शिक्षकों ने कभी ध्या नही नहीं दिया। यही वजह है कि आज छात्र एम ए करने के बाद भी बारीक सी दिखाई देने वाली वर्तनी की गलतियां करते हैं। कायदे से इस ओर प्राथमिक कक्षाओं मंे ध्यान दिया गया होता तो संभव है भावी जीवन में इस प्रकार की गलती नहीं होती। किन्तु यहां दिक्कत यह भी है कि शिक्षा में एक बड़ा धड़ा सक्रियता से स्वीकारता है कि इस प्रकार की गलतियों को नजरअंदाज कर दिया जाए। क्यांेकि यह बहुत बड़ी गलती नहीं है। उत्तर पुस्तिकाओं में भाव और अभिव्यक्ति को देखा जांचा जाए। यह किस ओर संकेत करता है।
जब हम मानक वर्तनी और देवनागरी लिपि की वकालत करते हैं तब हमें इस बात का इल्म भी होना चाहिए कि क्या हम केवल मानकता की बात कर रहे हैं या मातृभाषा को दबाने की परोक्षतः प्रयास कर रहे हैं। क्यांेकि कई बार शिक्षक प्रशिक्षण कार्यशालाओं में इस प्रकार के सवाल व शिक्षकीय दिक्कतों का सामना करना पड़ा है कि यदि बच्चा भोजपुरी,मागधी,बझिका, अंगिका,बंगाली, हरियाणवी आदि से प्रभावित भाषा का इस्तमाल करता है तो हम उसे टोकें और उसे मानक हिन्दी की ओर प्रेरित करें। तो क्या हम उन बच्चों की मातृभाषा से उन्हें विलगा नहीं रहे हैं? और यदि उसे सही मान कर उनके लिखे व बोले शब्दों को स्व्ीकार कर लें तो एक दूसरा सवाल उठता है बच्चे को मानक भाषा आनी चाहिए। ऐसी स्थिति में शिक्षक कौन सा रास्ता अपनाए।  यहां शिक्षा शास्त्र हमंे जो रोशनी दिखाता है उसे हो सकता है हिन्दी के गैर शैक्षिक धारा के लोग स्वीकार न करें। एनसीईआरटी आदि संस्थाएं 2005 के बाद राष्टीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 के बाद बनी पाठ्यपुस्तकों में बड़ी शिद्दत से अभिव्यक्ति पर जोर देती नजर आती है। साथ ही साथ बच्चों के भाषायी मूल्यांकन में वर्तनी आदि की गलतियों को नजरअंदाज कर कंटेंट और उसकी प्रस्तुति को आंकने की सिफारिश करता है।

विस्थापन की जिंदगी


कौशलेंद्र प्रपन्न
पिछले दिनों बिहार के कुछ गांवों में जाने का मौका मिला। मैं तकरीबन बीस साल के बाद उस गांव में गया था। मेरे मन मस्तिष्क में उसी गांव की छवि बैठी थी जब मैं नब्बे के दशक में गया था। तब गांव में प्रवेश के पहले दो बड़े बड़े तालाब होते थे। वहीं गांव के दक्षिण भर तीन तालाब थे। उनमें पानी भी खूब रहता था। जब जाया करता था तब नहाना और खेल भी हुआ करता था। हां इस बरस तो गांव गया तो पहले दो तालाब नजर नहीं आए। तालाब की जगह पर एक पंक्ति में दुकानें नजर आईं। जब पूरा गांव चक्कर काट आया तो उन तीन तालाबों में से दो सूखकर समतल हो चुके थे। उस जमीन पर मजार की दीवार खड़ी थी और पास मंे ही मंदिर के चबूतरे नजर आए। एक जो तालाब सा दिखाई दे रहा था उसमें कूड़े, गांव के गंदे पानी और तमाम गंदगियों के अंबार में बजबजा रहा था।
हमारे गांव न केवल बदल गए, बल्कि डिजिटल भी हो गए। यह वहां पर खुली दुकानों को देख कर अनुमान लगाना कठिन नहीं था। लैपटाॅप लेकर बैठे गांव के बच्चे गाने- फिल्में मोबाइल में डाउन लोड करने के काम में जुटे मिले। यहां भी तो एक किस्म का बदलाव ही था। जहां कभी गांव में ढिबरी में पिताजी और चाचा ने पढ़ाई की। उसी गांव में इंवटर पर फ्रीज,पंखे,एलसीडी बड़ी स्क्रीन वाली टीवी लोगों के घरों मंे मिलीं। बदलाव तो था ही। बदलाव यह भी था कि खेतों की जगहें सिमट गई थीं। खेत काट कर प्लाट में तब्दील हो चुके थे। खेती की जगह पर दुकानें शोभा बढ़ा रही थीं।
कौन कहता है गांव पीछे हैं। गांव के लोगों के पास सुविधा और सुख के साधन नहीं हैं। अब के गांव कई शहरों और कस्बों को पीछे छोड़ने की होड़ में हैं। वहां के बच्चों के पास आज क्या नहीं है। महंगी गाड़ी,स्मार्ट फोन,सुंदर सुसज्जित कमरों वालं घर सब कुछ तो है। लेकिन यहां यह देखना जरूरी है कि उनके पास महंगी गाडि़यां, मोबाइल आदि कहां से आईं। गाडि़यों की अपनी कहानी है। गांव से यदि हाईवे निकल रही है, आधुनिकीकरण हो रहा है आदि तो सरकार ने उनकी जमीनें लेकर उन्हें मुआवजा दिया। बच्चों ने उन पैसों से गाडि़यां खरीदीं। शहर में मकान खरीदे। और तो और अमीरी के राह के अनवेशी हमारी युवा पीढ़ी ने अपने ही गांवों व शहरों में आ कर प्रोपर्टी डिलर के काम में लग गए। बजाए कि उन पैसों को बेहतर जगह लगाते उन्होंने अपने मां-बाप की भी अनसुनी की और आज महंगी गाडि़यों मंे फर्र फर्र दौड़ रहे हैं।
मेरे गांव में भी बोलेरो, इनोवा, फोरचूनर, डस्टर जैसी महंगी गाडि़यां सड़कों पर भागती नजर आईं। पूछने पर पता चला कि इतनी महंगी गाड़ी कहां से आई। तो जवाब था खेत सरकार ने ले लिए और मोटी रकम दी जिससे गाडि़यां आई हैं। मुझे समझने और इसे स्वीकारने मंे थोड़़ा समय लगा कि लोगों ने पैसों का इस्तमाल किस रूप में किया। हालांकि सुख भोगने और गाडि़यों पर घूमने का शौक सिर्फ शहरातियों का ही नहीं है बल्कि उस पर गांवों का भी पूरा हक है। लेकिन यह कैसा आनंद व सुख जो खेतों को बेच व पैत्रिक जायदाद को बेच कर मिली रकम को इस तरह से प्रयोग किया जाए।
गांवों से पलायन भी खूब हुए हैं। उस गांव के बेटे लुधियाना, पंजाब, दिल्ली,कोलकाता, बंग्लुरू आदि महानगरों में खपने की कोशिश में हाड़ गला रहे हैं। कोई कारखाने में काम कर रहा है तो कोई फल-सब्जियों की रेड़ी लगा रहा है। लेकिन शहर में रहने की जिद्द कह लें या गांव की सुविधाहीन जिंदगी से अजीज आकर गांव छोड़ने का निर्णय जो भी हो लेकिन यह निर्णय की घड़ी आसान नहीं रही होगी। विस्थापन के दौर से गुजरना एक बड़ी पीड़ा होती है। घर में किसी की मृत्यु भी हो जाए तो आप टिकट लेकर तुरंत शामिल नहीं हो सकते। यदि पैसे हैं तो कई सुविधाएं हैं किन्तु फल की रेड़ी लगा रहे  हैं तो रेलगाड़ी ही माध्यम है। कुछ राज्यों में जाने वाली रेलगाडि़यों की प्रतिक्षा सूची को देख लें तो अंदाजा लगा सकते हैं कि उस राज्य से कितनी भारी संख्या में पलायन हुआ है। इसका अंदाज तब भी लगाया जा सकता है जब होली दिवाली का मौसम आता है। महानगरों से लगातार भीड़ गांवों की ओर भागने लगती है। गोया यह शहर उनका नहीं है। गोया गांव से बिछुड़कर खुश नहीं हैं। मगर हकीकत यही है कि गांव,देहात कोई यूं ही नहीं छोड़ता। कोई यूं ही विस्थापन की जिंदगी नहीं चुनता।


Friday, March 4, 2016

फिल्मांे की महिलाएं




फिल्में हर समाज और काल में आम जन को प्रभावित करती रही हैं। फिल्मों के सामाजिक दरकार भी समय और संदर्भ सापेक्ष बदलती रही हैं। राजा हरिश्चंद्र मूक फिल्मों से लेकर सवाक फिल्मों तक, ब्लैक एंड वाइट के लेकर डिजिटल फिल्मों तक के सफ़र में ठहर कर देखें तो पाएंगे कि समाज का प्रतिबिंब तत्कालीन फिल्मों में दिखाई देती हैं। आजादी पूर्व की फिल्मों के कथानक, परिवेश,संवाद आदि तत् संबंधी होती थीं। आजादी के बाद की फिल्मों के विषय, बोल, परिधान आदि भी बदले यह परिवर्तन भी लाजमी थी। महिलाओं की दृष्टि से फिल्मी जगत को समझने की कोशिश करें तो फिल्मों का एक बड़ा कालख्ंाड़ और भूमिका महिलाओं की स्थिति बदलाती हैं। एक दौर था जब फिल्मों में तथाकथित बड़े परिवार की लड़कियां नहीं आती थीं। बड़ी क्या आम घरों की महिलाओं को फिल्मों में अभिनय करने की आजादी नहीं थी। तब पुरुष ही महिलाओं की भूमिका किया करते थे। समय ने करवट ली और धीरे धीरे लड़कियों का आना फिल्मों शुरू हुआ। महिलाएं किस रूप में दाखि़ल हुईं यह भी एक दिलचस्प कहानी है। महज गाना गाने,ठुमका लगाने,मां या पत्नी की भूमिकाओं ने इन्हें चुना। सत्तर के दशक तक कथानकों में एक बड़ा परिवत्र्तन घटता है। महिलाएं आभूषण,वस्त्र आदि के आकर्षण से बाहर निकल अभिनय के समानांतर चुनौतियां देने लगीं।
अस्सी के दशक में अस्मिता पाटिल,शबाना आज़मी ने निश्चित ही यादगार अभिनय से अपनी पहचान बनाई। इन्होंने फिल्मों में महिलाओं की भूमिकाओं को तो रेखांकित किया ही साथ ही समाज में बढ़ रहे वर्चस्व को भी पर्दे पर उतारा। यदि फिल्मों के सामाजिक सरोकारों की ओर नजर डालें तो नाच गाने,मार-धाड़ से आगे निकल कर सामाजिक स्थितियों को भी पर्दे पर जी रही थीं। फिल्मों ने चाहते हुए भी हमारे समाज की चेतना को झकझोरना का काम किया है। समाज का एक बड़ी तबका जो जवान हो रहा था व कहें किशोर से युवा हो उन्हें ख़ासे प्रभावित किया। एक्शन हीरो से लेकर एग्री यंग मैन की छवि भी समाज में खूब चली। साथी दुखांत भूमिकाओं के लिए दिलीप कुमार,साधना,गुरुदत्त को आज भी हम भूल नहीं पाएं हैं। कहानियां और कहानियों को पर्दे पर जीवंत करने वाले कलाकारों की निजी जिंदगी जैसी भी रही हो किन्तु पर्दे पर उन्हें देखना दिलचस्प था। ठीक उसी तरह से महिलाओं की भूमिकाएं भी दिन प्रति दिन बदल रही थी जैसे आम जिंदगी में बदलाव घट रहे थे। परिवर्तन की सुगबुगाहटें महिला कलाकारों में भी दिखाई देने लगी थी।  
स्त्री विमर्श की एक दुनिया समानांतर रची जा रही थी। सावित्री बा फुले महिला शिक्षा के लिए संघर्ष कर रही थीं। वहीं समाज में शिक्षा और महिलाओं की जागरूकता में तेजी आ रही थी। बच्चियां घरों से निकल कर स्कूल जाना शुरू कर चुकी थीं। धीरे धीरे ही सही लेकिन शिक्षा और स्व अधिकार की ललक भी महिलाओं में जगने लगी थी। यह एक संक्रमण काल था जिसमें महिलाएं अपने चैका बर्तन से बाहर दुआर पर निकलने की कोशिश कर रही थीं। यह दृश्य फिल्मों से ओझल नहीं था। क्योंकि फिल्मों की नजर से सामाजिक बदलाव छुपे नहीं रहे। एक ओर प्रेमचंद के उपन्यासों,कहानियों पर फिल्में बन रही थीं वहीं टैगोर की रचनाओं को भी फिल्मों में चुना जा रहा था। गैर भारतीय भाषाओं मे लिखी जा रही रचनाओं और कथानकों पर फिल्में बनीं। लेकिन गौरतलब है कि आजादी पूर्व की कथानकों और फिल्मों में महिलाओं को रूढ छवियों में बंधी नजर आती हैं।
नब्बे के दशक के अंत अंत तक फिल्मों के कथानक और महिलाओं की प्रस्तुतिकरण में काफी बदलाव हुए। नाच गाने और ठुमके लगाने से आग बढ़ कर बैंडेड क्वीन,एलओसी,डोर,पिंजर,लज्जा आदि फिल्में आईं जिसमें समाज में महिलाओं की स्थिति को प्रकारांतर चित्रित करती हैं। वहीं 2000 और 2010 के बाद स्त्री विमर्श को आगे बढ़ाती फिल्में भी आईं जो बाजार और महिलाओं के अंतर्संबंध को उदघाटित करती हैं। कार्पोरेट, पेज थ्री, चांदनी बार, एनएच 8,मेरीकाॅम,नीरजा आदि ऐसी फिल्में हैं जिसमें हमारे समाज की महिलाओं की उलझनों को भी पकड़ने की कोशिश करती हैं। बाजार किस तरह से महिलाओं को महज वस्तु व विज्ञापन की तरह देखती है इसका भी उदघाटन हमें कई फिल्मों में मिलता है। समाज में जैसे जैसे महिलाओं की भूमिकाएं बदली


बजट बहस से बाहर शिक्षा


किसने कहा था इतनी उम्मीद लगा कर बैठो। बजट है इससे क्या आशा और क्या अपेक्षा। काहे पगलाए घूम रहे हो इत्ते-उत्ते मुंह फुलाए। कब तक सर्व शिक्षा अभियान,माध्यमिक शिक्षा और भोजन की चिंता में गलते रहोगे। वक्त बदल चुका। समय की मांग बदल चुकी है। काहे नहीं बुझाता है तुमको। एनजाओ,सीएसओ वाले तो ख़ामख़ा चिल्लाते ही रहते हैं। तुमी बोले ई लोगन को कभी बजट से खुश होते देखे हो जो ईब होएंगे। अभी भी शिक्षा,बुनियादी शिक्षा, आरटीई को ओढ़ बिछा कर बैठे हो। दुनिया कहां की कहां पहुंच चुकी। चांद को भी चुन फटक कर रहने लायक बनाने में लगे हैं और एक तुम हो कि शिक्षा पर ही रूसे बैठे हो। पिछले साल कौन सा हमने बुनियादी शिक्षा का ख़्याल रखा जो इस बरस बड़ी उम्मीद लगाए रहे। हमने भारत के इतिहास पहली दफा ही सही लेकिन शिक्षा को औकात तो दिखाई ही। सो इस बार भी हमने अपनी परंपरा को बनाए रखा। हम तुमें स्कील वाले मानें हुनरमंद बनाने पर तुले हैं और तुम हो कि वही पुराने तरीके से दौड़ना चाहते हो। तुम भी इन लोगन के कुकुर कांव में आ गए। हम तो तुमें और तुम्हारी बेरोजगार कुल दीपकों को रोजगार के लिए तेल मल रहे हैं लेकिन तुमरी माथा में जे बात काए ठहरे। लो न हमने दक्ष भारत अभियान को तेल पिला कर तगड़ा करने के लिए 17,000 करोड़ रुपए देने का प्रस्ताव किया है। सब कुछ ठीक ठाक चला तो पूरे देश में राष्टीय दक्षता प्रशिक्षण संस्थान पसर ही जाएंगे। पूरे देश भर में 1500 राष्टीय दक्षता प्रशिक्षण संस्थानों स्थापना की जाएगी। फिर तुम्हारे चेहरे पर खुशी नहीं आएगी यह पता है। क्योंकि तुम अभी भी स्कूल,काॅलेज के पीछे पड़े हैं। हमने तो जिस राज्यों और जिलों में नवोदय विद्यालय नहीं हैं वहां स्कूल भी तो खोल रहे हैं। तुम्हारे बच्चे वहां पढ़ेंगे। जो स्कूल से बाहर रहेंगे या पढ़ नहीं पाए तो उन्हें स्कील इंडिया की दौड़ में हांक देंगे।
गौरतलब है कि सरकार की मनसा वर्तमान शिक्षा की दशा दिशा तय करने में कोई गहरी दिलचस्पी नजर नहीं आती। पिछले साल भी सरकार की बजट में प्राथमिक शिक्षा और माध्यमिक शिक्षा विमर्श से बाहर ही रही। यदि पिछले सालों के बजट 2013-14,2014-15 पर नजर डालें तो पाएंगे कि तब सर्व शिक्षा अभियान को तकरीबन 31 हजार करोड़ रुपए मुहैया कराए गए थे जिसे लगातार वर्तमान सरकार घटाती चली गई। चालू वित वर्ष के बजट में 22,500 करोड़ रुपए प्रदान किए गए हैं। विद्यालयों के लिए मध्याह्न भोजन के लिए 9700 करोड़ रुपए का प्रस्ताव किया गया है। शिक्षा को जनसुलभ कराने के लिए सरकार ने इस बजट में अतिरिक्त 62 नए नवोदय विद्यालय खुलने की योजना बनाई है। गौरतलब है पिछले वित वर्ष में माडल स्कूल खोलने की घोषणा भी की गई थी। उनमें से कितने स्कूल खुले यह कौन पूछने वाला है। ठीक उसी तर्ज पर अब नवोदय विद्यालय खोलने की घोषणा की परतों को खोल कर समझने की आवश्यकता है।
पीछे की बजट में कम से कम बुनियादी शिक्षा को लेकर एक चिंता नजर आती थी लेकिन वत्र्तमान सरकार लगातार शिक्षा को महज रोजगार के साथ सरपट हांकने पर आमादा है। इसका प्रमाण यह है कि बच्चे बेशक कक्षा 1 से 5 वीं तक न पढ़ें उन्हें स्कील प्रदान कर रोजगार की राह पर चला दिया जाए। रोजगार मिले इससे किसी को गुरेज नहीं हो सकता। लेकिन शिक्षा की महत्ता का विकल्प के तौर पर रोजगार को नहीं माना जा सकता। हालांकि शिक्षा हासिल कर हर किसी को नौकरी चाहिए लेकिन क्या शिक्षा का लक्ष्य सिर्फ और सिर्फ नौकरी के लायक बनाना भर है। संभव है इस सवाल पर आज की पीढ़ी सहमत हो क्योंकि उन्हें बाजार में रहना और बाजार पर ही निर्भर रहना है। लेकिन बाजार में खुद को बनाए रखने के लिए जिस प्रकार की दक्षता और क्षमता की आवश्यकता होती है उसके लिए सरकार और बजट तैयार नजर नहीं आती है। बच्चे प्राथमिक शिक्षा के बाद उच्च और उच्चतर शिक्षा हासिल करें इसकी योजना कम बच्चे 5 वीं के बाद ही नौकरी करने लगें के प्रति ज्यादा चिंतातुर है। यही वजह है कि स्कील इंडिया को अमली जामा पहनाने के लिए देशभर में 1500 संस्थानों की स्थापना की जानी है। इससे एक राह तो साफ नजर आती है कि हमारे बच्चों को रोजगारपरक यानी हस्तकौशल प्रदान करने की योजना है। गांधी जी ने 1932 वर्धा शिक्षा सम्मेलन में हर हाथ को काम और हाथ को शिक्षा की वकालत की थी। लेकिन उस सिफारिफ में बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा से काटना नहीं बल्कि हुनरमंद बनाना था। स्कूल से छूट से बच्चों की चिंता इतनी भर है कि उन्हें काम सीखा कर जीवन के मैदान में उतार दिया जाए।
सरकार का दावा है कि देशभर में दक्षता विकास योजना के तहत अभी तक 76 लाख बच्चों को प्रशिक्षित किया जा चुका है। आने वाले दिनों में बजट की नजर से देखें तो एक करोड़ युवाओं को हुनरमंद बनाया जाएगा। गौरतलब है कि हुनरमंदी की झोली में बिजली, बड़ही,मोटर दुरुस्त करने, कम्प्यूटर ठीक करने, डेटा आॅपरेटर जैसे कौशल शामिल हैं। राजेश जोशी की कविता बच्चे काम पर जा रहे हैं अब ज्यादा प्रासंगिक हो जाएगा। बच्चे अपनी उम्र से पहले ही काम पर जाने लगंेगे। उन्हें घर परिवार चलाने की जिम्मेदारी के लिए तैयारी चल रही है। एक तो पहले से ही उच्च शिक्षा में प्रतिभागियों की कमी है आने वाले पांच दस सालों में स्थिति और भी बद से बत्तर हो सकती है। देश के तमाम प्रौद्योगिकी,तकनीकी,मानविकी संस्थाएं प्रोफेसर,शोधछात्रों की कमी का सामना कर रहे हैं। यदि प्राथमिक स्कूलों में शिक्षकों की कमी की बात करें तो स्वयं सरकारी आंकड़े बताते हैं कि हर राज्य में कम से कम अस्सी हजार से लेकर 5 लाख तक के पद खाली हैं। जिन्हें भरा जाना आरटीई के अनुसार बेहद जरूरी है। लेकिन इन सब के बावजूद विभिन्न राज्यों में अनुबंधित शिक्षकों से स्कूलों को खींचा जा रहा है। स्थायी शिक्षकों की नियुक्ति को लेकर सरकार का ढुलमुल रवैया भी किसी से छूपा नहीं है। शिक्षा मित्र,पैरा टीचर आदि नामों से प्रसिद्ध हमारे अद्र्ध प्रशिक्षित शिक्षकों के मार्फत शिक्षा दी जा रही है।
प्रो अनिल सद्गोपाल इस प्रक्रिया को गंभीरता से देखते और व्याख्यायित करते हैं उनकी नजर में बुनियादी शिक्षा को नजरअंदाज कर सिर्फ बच्चों को कामगर बनाने की योजना है। शिक्षा को अस्से के दशक से ही बेचने और बदनाम करने की सरकारी पहलकदमियां चल रही हैं। दुखद बात यह है कि जब देशज स्तर पर सरकारी स्कूलों को बदनाम कर बेचने की प्रक्रिया चल रही थी तब तमाम शैक्षिक संस्थान के शिक्षाविद् और शिक्षाकर्मी मौन साधे बैठे थे। उनकी चुप्पी का ही परिणाम है देश के अधिकांश सरकारी संस्थान इस हाल में आ चुके हैं। शिक्षा जो कि हक़ की आवाज उठाने और शोषण के खिलाफ बोलने का जज़्बा पैदा करती है वही शैक्षिक संस्थानों में नकारखाने में तूती की तरह हो गई।
शिक्षा का अधिकार अधिनियम बने भी आज तकरीबन छह साल हो चुके लेकिन स्थिति कोई ख़ास बदली हो ऐसा नहीं है। सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों की रिपोर्ट बताती हैं कि आज भी हमारे अस्सी लाख बच्चे स्कूलों से बाहर हैं। तो क्या उम्मीद की जाए कि वे अस्सी लाख बच्चे स्कील हासिल कर काम पर लग जाएंगे। क्या वे आत्महत्या या फिर गैर उत्पादक कामों में नहीं लगंेगे। सरकार की नजर में शिक्षा के मायने और दरकार बदल चुके हैं। उसकी नजर में कामगरी शिक्षा ही प्राथमिकता है। हर बच्चे पढ़ें और आगे बढ़ें यह नारा तो है लेकिन वहीं दूसरी ओर काम का विकल्प प्रदान करना कहीं न कहीं शिक्षा की धार को कुंद करना भी है।
सब पढ़ेंगे सब बढ़ेंगे यह सुनने में कर्णप्रिय है। लेकिन इसके निहितार्थ को समझने की आवश्यकता है। सब कैसे पढ़ेंगे जब स्कूल ही नहीं होंगे। जब स्कूल तो होंगे लेकिन वहां शिक्षक ही पांच होंगे उसमें भी दो जनगणना, बाल गणना,कार्यालयी कामों में झांेक दिए जाएंगे। तीन स्थायी शिक्षक और तीन अनुबंधित शिक्षकों के कंधे पर किस प्रकार की पढ़ने और आगे बढ़ने के सपने देखे जा रहे हैं। यह भी कितना मौजू है कि विभिन्न राज्यों में शिक्षकों को एक तो पूरा वेतन नहीं मिलता दूसरा तीन और छह माह पर वेतन मिलता हो तो ऐसे में किस प्रकार की शिक्षण प्रतिबद्धता की उम्मीद की जानी चाहिए। शिक्षक दरअसल वो नरम कड़ी होता है जिसे जब चाहा तबा दिया तब चाहा गैर शैक्षिक कामों में हांक दिया। शिक्षक ही है जो अपनी ही हक और आवाज को ताउम्र दबाए जिंदगी काट देता है और उससे पढ़े बच्चे आग चल कर उन्हीं पर शासन और हुक्म जारी किया करते हैं। कितना ही अफसोसनाक स्थिति है कि जिसे शिक्षक जीवन में कुछ बनने की तालीम देता है जब वह कुर्सी पर बैठता तब उन्हीं पर तोहमत मढ़ने से गुरेज नहीं करता।  

Wednesday, February 17, 2016

कविता व रचना का भूगोल


जब भी कोई कवि कविता व कहानी लिखता है तब उसकी रचना में भूगोल साफ नजर आती हैं। यदि कवि अपनी रचना का भूगोल नहीं बना पाया तो एक अर्थ में वह कविता शायद पाठकों को अपनी ओर न लुभा पाए। बड़े से बड़ा कवियों की रचनाओं में एक ख़ास भूगोल तो हुआ ही करता है। यदि राजेश जोशी जी की कविता पढ़ें या मंगलेश डबराल या फिर विष्णु नागर की इन कवियों की खासियत ही यही है कि जब ये कविता लिख रहे होते हैं तब एक भूगोल भी रचा जा रहा होता है। इतना ही नहीं बल्कि इनकी कविताएं भूगोल के साथ ही वर्तमान चुनौतियों और राजनीतिक चैहद्दी भी बनाया करते हैं। यही वजह है कि जब हम राजेश जोशी की कविता दंगे के बाद को पढ़ते हैं तो लगता है यह आज की ही किसी दंगे के बाद की बात की जा रही है। बच्चे काम पर जा रहे हैं पढ़ते वक्त लगता है यह बात भी इसी सदी इसी समाज की तो की जा रही हैं। वहीं जब हम अज्ञेय की कविता संाप को पढ़ते हैं तो आज का समाज और नागर समाज के दोमुंहेपन से भी हम रू ब रू होते हैं। सच्चे अर्थाें में कवि अपनी रचनाओं में वत्र्तमान को तो जिंदा रखता ही है साथ ही आने वाले उजले दिनों के लिए एक रोशनदान भी छोड़ जाता है।
आज की कविताएं और कविताओं का भूगोल बहुत तेजी से बदला है बल्कि बदल रहा है। जिस तेजी से कविताओं के परिदृश्य बदले हैं उसी रफ्तार से कविताओं के सरोकार भी बदले हैं। हालांकि हर काल मंे रस रंग, प्रेम, शृंगार की कविताएं लिखी गईं हैं। तो साथ ही जायसी,कबीर जैसे विरोध के स्वर को बुलंद करने वाले गैर चारणीय कवियों ने बड़ी ही मजबूती से कविता के सार्वकालिक और सार्वदेशिक दरकारों को आगे बढ़ाया है। एक ओर चांद का मुंह टेढ़ा है, असाध्य वीणा, राम की शक्ति पूजा लिखी जा रही थी तो उसी के समानांतर सरोकारी कविताओं की सृजना भी हो रही थी।
जैसे जैसे तकनीक का विकास हुआ है वैसे वैसे हमारी कविता भी सोशल मीडिया पर रची जाने लगी। गैर जमीनी यानी वर्चुवल स्पेस में लिखी जाने वाली कविताएं संभव है आज लिखी गईं उन्हें पसंद करने वालों ने पंसद के बटन भी दबाया और आगे बढ़ गए। लेकिन अगले दिन उसे भूल जाते हैं। यहां पाठकों की भी कोई ख़ास गलती इसलिए नहीं है, क्योंकि उन्हें हर पल हर घड़ी दसियों पंक्तियां पढ़ने को मिल रही हैं। यह अगल विमर्श का मुद्दा है कि क्या हम देखने को पढ़ना मानें? क्या हथेलियों पर स्क्रीन को सरकाते हम वास्तव में पढ़ते हैं या बस कंटेंट देखकर लाइक बटन दबा कर आगे निकल जाते हैं। विभिन्न तरह के सोशल स्पेस में लिखी जाने वाली कविताएं और कहानियों की बात करें तो कविताओं की बढ़त साफ दिखाई देती है। इन सोशल स्पेस में रची जाने वाली कविताओं की दुनिया भी बड़ी ही एक रेखीय ही है। जिन्हें उस स्पेस के बारे में जानकारी है वो तो देख-पढ़ पाते हैं बाकी सब शून्य।
कई बार यह सवाल उठाया जा चुका है कि कविता और कहानी के पाठक कम हो रहे हैं। दूसरे शब्दांे मंे कहें तो पाठकों की कमी का रूदन अक्सर सुनने मंे आता है। लेकिन फिर एक सवाल बड़ा ही दिलचस्प उठता है कि जब पाठक ही नहीं हैं तो कवि या लेखक किसके लिए लिख रहा है। कौन है जो किताबें खरीद रहा है? कोई है समाज में जिसे किताबों से आज भी मुहब्बत है। वरना प्रकाशक हजारों की संख्या में किताबें क्यों छाप रहे हैं। इस ओर जब नजर दौड़ाते हैं तो पाते हैं कि लेखक,कवि, कथाकार लगातार विभिन्न विधाओं में लिख पढ़ रहे हैं और उनके पाठक भी हैं। यह एक उत्साह का विषय होना चाहिए। पिछले दिनों जिन प्रमुख किताबों पर देश भर में विमर्शकारों ने चर्चाएं कीं और उनकी नजर से किताबें पढ़ने योग्य लगीं उनपर नजर दौड़ाएं तो उनमें कथा, कविता एवं गैर कथा विधायी किताबें अपनी कथानक की वजह से पाठकों को लुभाने मंे सफल रहीं। एक ओर प्रभात रंजन की रचना कोठागोई की चर्चा की जाए तो जिस शैली और भाषायी चोले में एक काल खंड़ को जिंदा करने की कोशिश की गई उसे महसूसा ही जा सकता है और तारीफ ही की जा सकती है। प्रभात रंजन ने बड़ी ही साफगोई से अतीत मंे जाना,ठहरना और वहां से सकुशल वापस आने जैसे व्यापार को कुशलता से निभाया है। प्रभात रंजन ने वहां से अपने साथ लाए वहां की बोली-भाषा, भाषायी परिवेश को वत्र्तमान में खड़ा करने की कोशिश भी की है जिसे पाठकों ने हाथों हाथ सम्मान दिया है।

कोना फटा पोस्टकार्ड


कौशलेंद्र प्रपन्न
हम न मरब उपन्यास में डाॅ ज्ञान चतुर्वेदी बड़ी शिद्दत से जीवन मृत्यु के दर्शन और लोक संवाद,व्यवहार की चर्चा करते हैं। इसमें भाषायी स्वाद बेहद रोचक और परिवेशीय अस्मिता को बरकरार रखने वाली है। बब्बा के मरने के बाद घर में नाते रिश्तेदारों का आना जाना लगा हुआ है। तमाम रिश्तेदार जो बब्बा से कहीं न कहीं जुड़े हुए थे वे इस ख़बर को सुन और पढ़कर घर पर आते हैं। कोना फटा पोस्टकारड पढ़कर लोगों को अंदाजा लग गया कि किसी न किसी के जाने की ख़बर होगी। लेकिन इसका अनुमान नहीं था कि बब्बा चले गए। कोना फटा पोस्टकार्ड देखकर ही गांव-घर में एक सन्नाटा पसर जाता था। पोस्टकार्ड लेने वाला और देने वाला दोनों ही ग़मज़दा से होते थे कि पता नहीं किसके प्रयाण की ख़बर है। लोग कार्ड पढ़कर फाड़ कर फेंक दिया करते थे। घर में रोना कानी मच जाया करता था। तब गांव घर को पता चलता था कि फलां के घर कुछ अनहोनी की ख़बर आई है। उस वक्त की बात है जब पोस्टकार्ड का आना और लोगों को हरेक के रिश्तेदारों की भी ख़बर हुआ करती थी कि किसका कौन रिश्तेदार कहां रहता है, क्या करता है, कितने बाल बच्चे हैं आदि। इसलिए सब की उम्र और जाने आने की भी ख़बर रहती थी। जैसे जैसे हम तकनीकतौर पर जवान हुए वह कोना फटा पोस्टकार्ड शायद गुम हो गया।
किसी के गुजरने की ख़बर अब सोशल मीडिया मंे डाल दी जाती है। साथ ही मोबाइल पर विभिन्न एप्स पर लोग तमाम ख़बरों को प्रसारित कर देते हैं। शादी ब्याह,जीनी मरनी,सैर सपाटा सब तरह की ख़बरों का आदान प्रदान मोबाइल और सोशल मीडिया मंे धड़ल्ले से होने लगा है। सोशल मीडिया के दौर में पारंपरिक माध्यम चिट्ठी पतरी,मिलना जुलना कम होते होते तकरीबन चलन से ही बाहर होता जा रहा है। लेकिन हम बात कर रहे थे कोना फटा पोस्टकार्ड की कहानी का। मुझे अपना बचपन याद है जब दादी मरी तो हम घर के तमाम बच्चों को इससे कोई लेना देना नहीं था कि दादी मर गईं। हमने सबसे पहले दादी का संदूक खोला और उसमंे रखे काजू, बादाम और मिठाइयां खाने लगे। देखने वाले कुछ बोल भी रहे थे कि देखों इन्हें कोई फर्क ही नहीं पड़ता। लेकिन हमारे लिए दादी से लगाव तो था ही साथ ही उनकी चीजें भी हमें लुभाती थीं। दादी के मरने बाद मैं काफी समय तक सोन किनारे गेमन पुल पर खड़े होकर आवाज देता था दादी आ जाओ। अब हम आपका संदूक नहीं खोलेंगे। लेकिन दादी को नहीं आना था नहीं आईं। आ भी कैसे सकती थीं यह बाद में समझ पाया। घर मंे तब किसी के विदा होने की ख़बर इन्हीं माध्यमों से हुआ करती थी। घर में एक अलगनी के कोने में तार में पोस्टकार्ड, चिट्ठियों को टांक दिया जाता था। कोना फटा पोस्टकार्ड को तो पढ़कर फेंक दिया जाता था लेकिन बाकी अंतरदेशीय पत्रों को उसी तार में टांक दिया जाता था।
जब घर में कोना फटा पोस्टकार्ड मिलता था उसके बाद पिताजी और मां तय करते थे कि कब उनके घर जाना है। अमूमन किसी के इंत्काल के बाद तब चिट्ठी मिलते कम से कम तीन से चार दिन तो लग ही जाते थे। क्रियाकर्म मंे लोग पहुंचते थे। पूरे तेरह दिन घर मंे मातम का माहौल ही छाया रहता था। बच्चे स्कूल से महरूम हो जाते थे। यदि बेहद जरूरी नहीं हो तो घर के बड़े काम पर भी नहीं जाते थे। घर में एक ही भाव होता था। घर का कोना कोना बयां करता था कि कुछ था जो अब नहीं है। कोई हंसी थी जो यहीं कहीं गूंजा करती थी। कोई तो था जो बात बात में टोका करता था लेकिन अब वो जबान नहीं रही। मिलने जुलने वाले बार बार रो रो कर या बातों बातों मंे एहसास दिलाते रहते हैं कि वो होते तो ऐसा नहीं होता। वो ऐसी ही तो बोला करते थे। छोटका एकदम उन्हीं की तरह चलता है। और लोग एक बार फिर उनकी याद मंे डूब जाया करते हैं। कई बार दुखद पल भूलना भी चाहें तो मिलने जुलने वाले ऐसा नहीं होने देते।
हम न मरब से शब्द उधार लूं तो विमान तैयारी से लेकर यात्रा की शुरुआत और अंत बेहद दारूण हुआ करता है। एक एक क्रिया, कार्य व्यापार उस गए हुए व्यक्ति की उपस्थिति और अनुपस्थिति को कुरेदता है। घर की देहारी पर खड़ी तमाम महिलाएं सिर्फ अश्रुविगलित आंखों से अपने प्रिये को जाते देख भर पाती हैं। चाह कर भी जाते हुए के साथ दो कदम नहीं चल पातीं। उसके जाने के बाद चलना सिर्फ उसकी यादों और स्मृतियों में ही हुआ करता है। कुछ परिवारों मंे महिलाएं मरघट पर भी जाती हैं। लेकिन कुछ परिवार की महिलाएं कितनी दुर्भागी हैं कि उन्हें जाते हुए के साथ अंतिम यात्रा में शामिल होने का संयोग नहीं मिल पाता। यह भी ऐसी चलनें हैं कि जिंदा रहते तो हर दम लड़ते-झगड़ते, हंसते रहे लेकिन जाने के बाद उसके अंतिम पहचान को देख भी नहीं पाते। जब विमान अंतिम पड़ाव पर रूकता है। चारों ओर आंसू ,सूनी आंखें, उतरे चेहरे,भावविहीन मेल- जोल देखकर सचमुच महसूस होता है कि जीवन के अंतिम क्षण में व्यक्ति कहां आता है। जहां सिर्फ सूनापन होता है। तमाम छल-प्रपंच ताख पर धरे रह जाते हैं।
यदि निगम बोध घट गए हों तो देखें होंगे कि एक साथ छह, आठ और बारह लोगों के जलने की व्यवस्था है। वहीं ओहदे और प्रतिष्ठित हुए तो अगल बने स्थान पर जलते हैं। यदि आमजन हुए तो यमुना किनारे जला करते हैं। एक दाह संस्कार में जितनी लकड़ी लगती है और पर्यावरण प्रदूषित होता है उसे ओर न्यायालय का सुझाव था कि क्यों न विकल्प तलाशा जाए। जब हमारे पास सीएनजी और विद्युत दाह संयंत्र मौजूद हैं तो उसका इस्ताल क्यों न किया जाए। लेकिन मसला यहां परंपरा और रिवाज पर अटक जाता है। बहुत कम लोग हैं जो अपने परिजन को विद्युत या सीएनजी के द्वारा अंतिम संस्कार के लिए तैयार होते हैं। जबकि इससे लकडि़यों की बचत तो होगी ही साथ ही वातावरण में फैलने वाले विषाक्त धुआं से भी निजात मिलेगा। कभी निगम बोध से उठने वाले धुएं की ओर नजर डालें तो वहां एक कृत्रित धुआंकाश तैरता नजर आता है। हम जितने की लकड़ी और अन्य सामग्री खरीदते हैं उसके अनुपात में सीएनजी और विद्युत दाह में एक हजार का खर्च आता है। लेकिन अभी हमारी मनोदशा उसके लिए तैयार नहीं है। जब तक सारी चीजें हमारी आंखों के सामने न घटे।


Friday, February 12, 2016

वक्ता की चुनौतिया





कौशलेंद्र प्रपन्न
पिछले दिनों मुझे केंद्रीय शिक्षा संस्थाना, दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षा विभाग में राष्टीय सेमिनार में पर्चा पढ़ने और अध्यक्षता करने का मौका मिला। विषय था शिक्षक शिक्षा समस्याएं और चुनौतियां। देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों के शिक्षा से संबंधित प्रतिभागियों ने पर्चें पढ़े। मसलन शिक्षक शिक्षा और नीतियां, शिक्षक शिक्षा और प्रबंधन, शिक्षक शिक्षा और स्वायत्तता आदि। मेरा विषय था आजादी के बाद शिक्षक शिक्षा संस्थान और शैक्षिक गुणवत्ता की जमीनी हकीकत। इस सत्र को प्रो अनिल सद्गोपाल चेयर कर रहे थे। मैंने पर्चा पढ़ने के दौरान पाया कि सवाल-जवाब के सत्र में जिस किस्म के सवाल पूछे जा रहे थे वे बेहद ही सैद्धांतिक तरह के थे। दूसरे शब्दों में कहें तो उनका जमीनी हकीकत से ज्यादा वास्ता नहीं था। उन्होंने तमाम शैक्षिक किताबों को पढ़कर समझ बनाई थी उसकी वर्तमान चुनौतियों के बरक्स जांचने की कोशिश नहीं थी। कोई एरिक फाम को कोट कर रहा था तो कोई आज भी जाॅन डिवी, पालो फ्रेरे आदि चिंतकों से आगे झांकने का प्रयास नहीं किया था। 
अमूमन पर्चा पढ़ने वाले या तो रिसर्चकर्ता था या फिर एम एड के छात्र थे। उनकी समझ और गैरतजर्बा उनके पर्चों में भी वाचल होकर बोल रहे थे। यहां तक कि कई प्रतिभागियों ने महज पीपीटी चला कर अपनी लिखी बातें और स्थापनाओं को ही पढ़कर सुना रहे थे। बीच बीच मंे प्रो अनिल सद्गोपाल ने टोका भी लेकिन कोई ख़ास अंतर नहीं पड़ा। इससे किसी को गुरेज नहीं हो सकता कि पर्चा लिखने अपने आप मंे एक श्रमसाध्य काम है। काफी शोध और रिडिंग की मांग होती है तब जाकर एक शोध पत्र तैयार हुआ करता है। लेकिन उसका वाचन कैसे किया जाए इस दक्षता व कौशल में प्रतिभागी कमतर दिखाई दिए। 
साहित्य एवं शिक्षा मंे माना हुआ सत्य है कि आप अपनी बात और विचार को कैसे रोचक और प्रभावशाली तरीके से पेश करते हैं। वाचन और प्रस्तुतिकरण एक कौशल है इसे हासिल की जाती है। अपने श्रोता वर्ग को ध्यान में रखते हुए कैसे कंटेंट के साथ न्याय किया जाए यह काफी कुछ वक्ता के कौशल पर निर्भर करता है। अधिकांश शोध छात्र व पेपर प्रेजेंटर में एक आम कमी यह दिखाई दी कि अपने पेपर को कैस प्रभावशाली तरीके से वचान किया जाए। शायद पेपर वाचन की कला से नवाकिफ प्रतिभागियों को अभी और तैयारी और वाचन कौशल को सीखने की आवश्यकता है। 
जब समय अत्यंत कम हो यानी तय समय सीमा को भी तत्कालीन समय की चुनौतियों को देखते हुए सीमित कर दिया जाए तो ऐसे मे वक्ता के लिए निश्चित ही एक कठिन चुनौति होती है। लेकिन एक कुशल वक्ता अपने कंटेंट को और प्रस्तुति को समय और श्रोता के अनुसार घटा और बढ़ा सकता है। यह घटाना और बढ़ाना वक्ता के कौशल की झांकी भी देता है। यदि वक्ता अपने श्रोता के मनोदशा और रूचि को भांपने में कमजोर होता है तब वह श्रोता के लिए बोझ ही बना जाया करता है। 
देश के तमाम विश्वविद्यालयी अकादमिक अध्ययन में ऐसा लगता है कि एक रेखीय चलने और दौड़ने की दक्षता तो प्रदान की जाती है लेकिन उनकी वक्तृत्व कला कमजोर रही जाती है। बोलने के वक्त किस तरह की भाषा, शब्दों का चयन किया जाए इस स्तर पर यदि लापरवाही बरती जाती है तब वह सत्र और वक्ता अपने पाठक और श्रोता वर्ग से एक साहचर्य संबंध नहीं स्थापित कर पाता। 


Monday, February 8, 2016

किताबें नहीं पढ़ना बीमारी नहीं आदत है ज़नाब


यदि समाज में किताबें पढ़ने की आदत में कमी दर्ज की जा रही है तो यह कोई बीमारी नहीं बल्कि आदत का मामला है। आदत के साथ ही किताबों की गुणवत्ता और किताबीय कंटेट का भी मसला बनता है। यदि शिक्षक किताबें नहीं पढ़ते तो एकबारगी हम सवाल उन्हीं के कंधे पर लाद देते हैं। मास्टर होकर नहीं पढ़ते। पढ़ने की कमी तो लेखक,पत्रकार,वकील आदि में भी पाए जाते हैं लेकिन यही सवाल का बोझा हम उनके कंधे पर नहीं डालते जबकि पढ़ने जैसी आदत और प्रोफेशनल जरूरत तो वहां भी अपेक्षित है। क्योंकि शिक्षक का कंधा सबसे माकूल मिलता है इसलिए इन्हीं के कंधे पर सवालों को थोप कर आगे बढ़ जाते हैं।
यदि सवाल को इस तरह पूछें कि समाज मंे कौन कौन सा वर्ग है जिससे किताबें पढ़ने की उम्मीद की जा सकती है। निश्चित ही डाॅक्टर,वकील,टीचर,शोधकर्ता आदि से तो अधुनातन रहने के लिए अपने क्षेत्र से जुड़ी किताबों को पढ़ने की उम्मीद की जाती है। पढ़ने को और स्पष्ट करें तो महज किताबें पढ़ना ही इसमंे शामिल नहीं है बल्कि अपने क्षेत्र के साहित्य गैर साहित्यिक दस्तावेज पढ़ना भी तो पढ़ने की श्रेणी में ही आता है। इस लिहाज से देखें तो डाॅक्टर, वकील अपने केस को मजबूत करने एवं बीमारी को ठीक से समझने के लिए दस्तावेज तो पढ़ते ही हैं। पूरी केस स्टडी करना वकील की व्यवसायिक प्रतिबद्धता है।

Friday, February 5, 2016

बुनियादी कमी उनकी या शिक्षा की



आप कहेंगे कि फिर वही मसला ले कर बैठ गया। लेकिन करूं आज फिर ऐसे ही कुछ और प्रतिभागियों से बातचीत करने का मौका मिला। उन्होंने एम ए, बी एड की डिग्री हासिल कर रखी थी। उनके पास स्कूल में पढ़ाने का तजुर्बा भी था। लेकिन जब पढ़ने की बात आई तो उत्तर था हां पढ़ा तो था एम ए और बी एड करने के दौरान। उसके बाद पढ़ने का मौका नहीं मिला।
माना कि जिंदगी ने पढ़ने का अवसर नहीं दिया। लेकिन अपने विषय की समझ और पकड़ को लेकर क्या कहा जाए। कई बार लगता है कि वत्र्तमान शिक्षा प्रणाली हमारे छात्रों को इस लायक बनाने में असफल रही है कि डिग्री को सिद्ध करने के लिए उनमें समझ और बोध भी पैदा कर पाए। प्रोजेक्ट्स और एसाइन्मेंट्स के कंधों पर टिकी प्रोफेशनल डिग्रियां दरअसल हकीकतन विफल हो जाया करती हैं। हमें सोचना तो होगा कि क्या हम सिर्फ डिग्रीधारी भीड़ निर्माण करना चाहते हैं कि समझदार और कौशलपूर्ण युवा पीढ़ी।

Monday, February 1, 2016

हिन्दी शिक्षण में गतिविधियां






शिक्षकों को हिन्दी मंे गतिविधियों के मार्फत कैसे रेाचकता पैदा की जाए इस बाबत कुछ प्रयासों के चित्रों पर नजर डाल सकते हैं।
स्वातंत्रोत्तर शैक्षिक विकास और उसकी चुनौतियों पर नजर डालें तो पाएंगे कि ठीक आजादी के बाद और उससे पूर्व कई सारी समितियों और आयोगों का गठन इस मकसद से हुआ कि आजादी के पश्चात् हमारी शिक्षा की दिशा और दिशा क्या होगी? क्या शिक्षक शिक्षा संस्थान की कुछ भूमिका इस में हो सकती है जिसके मार्फत हम प्राथमिक और उच्च प्राथमिक शिक्षा को बेहतर बना सकते हैं। सेवापूर्व और अंतःसेवाकालीन शिक्षक शिक्षा को मजबूत करने के उद्देश्य से देश भर में जिला स्तरीय शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों यानी डाईट की स्थापना की गई। इन संस्थानों में शुरुआती दौर में बारहवीं पास बच्चों को दो वर्षीय प्राथमिक कक्षाओं में शिक्षण के लिए तैयार किए जाते थे। बाद में पत्राचार के मार्फत भी बी एड पाठ्यक्रम चलाया गया जिसके तहत काफी बड़ी संख्या में शिक्षक प्रशिक्षित होकर बाजार में उतरे। बाजार इसलिए क्योंकि निजी स्कूलों मंे कम दामों में खपने वाले उत्पादों की तरह भी थे। यह वह दौर था जब उदारीकरण की तेज हवा चल रही थी। सरकारी स्कूलों के बरक्स निजी स्कूलों के जन्म हो रहे थे। उन स्कूलों में बेहद ही कम वेतन पर खटने वाले शिक्षक मिल रहे थे। इससे शिक्षा का स्तर खासा प्रभावित हुआ। क्योंकि इनकी व्यवसायिक डिग्री और पढ़ाई उन्हें वास्तविक चुनौतियों से रू ब  रू होने मंे ज्यादा मददगार साबित नहीं हो रहे थे।

Thursday, January 28, 2016

टाॅक @ कथा-कथानक



आज हिन्दी के जाने माने कथाकार और संपादक श्री महेश दर्पण जी के साथ कहानी और कथा-जगत के बारे में विस्तार से चर्चा हुई। चर्चा में इस बिंदु पर भी विमर्श हुआ कि बच्चों के लिए कहानियंा लिखते वक्त किस तरह की सावधानियों की आवश्यकता पड़ती है। बात तो इस पर भी हुई कि पंचतंत्र आदि की कहानियों को कैसे आज संदर्भ में पुनर्रचना की जाए। क्योंकि समाज,काल,संस्कृति सापेक्ष कहानियों के कथ्य और संदर्भ भी बदले हैं। ऐसे में शिक्षकों को किस तरह के प्रशिक्षण प्रदान किए जाने चाहिए। शुक्रिया श्री महेश दर्पण जी।

Friday, January 22, 2016

मुर्दे संवाद कर सकते हैं वाया मुर्दे इतिहास नहीं लिखते



कौशलेंद्र प्रपन्न
अलका अग्रवाल सिग्तिया जी की कहानी संग्रह का शीर्षक सुन-पढ़कर कुछ देर के लिए ताज्जुब हो सकता है कि यह भी काई नाम है ‘मुर्दे इतिहास नहीं लिखते...’। लेकिन सच है जब हम इसी नाम से लिखी कहानी पढ़ते हैं तब महसूस होता है कि सच ही तो है मुर्दे इतिहास कैसे लिखा सकते हैं? बतौर कहानी के अंत में पात्र द्वारा लिखी कविता मौजूं है कि
मुर्दे कभी इतिहास नहीं लिखते
इतिहास वो लिखते हैं
जो अपने कदमों से, अपने रास्ते,
खुद बनाते हैं।
जो भीड़ के साथ न चल कर
अकेले चलने की जोखिम उठाते हैं।
इतिहास वो लिखते हैं,
जो जिंदगी और मौत से
बराबर मोहब्बत करते हैं।
उक्त पंक्ति मुर्दे इतिहास नहीं लिखते कहानी की है। जिसमें मुंबई की चकाचक भरी रोशनी वाले शहर में उम्मीदों वाली, नगरी में हर कोई अपने भाग्य आजमाने आते हैं। लेकिन सफलता और प्रसिद्धी किसी किसी को ही मिला करती है। इस कहानी की ख़ासियत यह है कि एक कस्बे व शहर से आए दो कबीर और आदित्य युवक अपने भाग्य को सिनेमा की दुनिया में स्थापित करने आए हैं। उनकी आंखें भी सपनों से भरी हैं। उनके पास भी एक गठरी है जिसमें तमाम फिल्मी सपने ठूंसे हुए हैं। लेकिन अफसोसनाक बात है कि छोटे मोटे रोल तो मिल पाए लेकिन उसके लिए जिस तरह की भाषा, व्यवहार उन्हें सहने पड़े वे खटकते हैं। प्रोड्यूसर किस तरह से पूछता है ‘कोई गर्ल फ्रेंड है तुम्हारी...? गर्ल फ्रेंड नहीं तो... यह नहीं तो आगे कहानी में प्याज की तरह परते खुलती बताती हैं कि तो बहन को ही लेकर आ जाओ। जिस दिन गर्ल फ्रेंड हो...आ जाना...’
इन वाक्यों को सुनता सहता कबीर और आदित्य की कहानी तो बताती ही है साथ ही लेखिका ऐसे हजारों घटनाओं की ओर संकेत कर कथाकार अलका जी आगे बढ़ जाती हंै। इस कहानी में संवाद बेहद मारक और परिवेश से मेल खाते हैं। मुंबईया हिन्दी की पूरी छौंक इस कहानी मंे अनुगूंजित होती है। ‘अपुन को। टपोरी। जास्ती सवाल नहीं बस तू चल अपुन के साथ।’ हालात व्यक्ति से क्या नहीं करने पर मजबूर किया करती हैं यह भी परिस्थितिजन्य घटनाओं की ओर इशारा करती है। आखिरकार एक प्रोड्यूसरनुमा आदमी मिलता है जो कहता है कि जिगोलो बन कर मेरी बीवी और वैसी ही अन्यों के साथ कमाई कर, क्योंकि मेरी बीवी को रेाज एक नए नए लड़के चाहिए आदि। वह इस तोल मोल के बोल में अभी पगा नहीं था। लेकिन आदित्य और कबीर तो बस कथाकारा अलका की नजर में वह व्यवस्थागत और प्रोफेशन की गंदगी के कंधे पर सवार हैं जिस पर तथाकथित फिल्मी दुनिया की ऐसी कहानियां सुनी और लिखी जाती हैं। कितना सच है यह तो इस दुनिया के निवासी ही जानें। लेकिन एक नायिका ने हाल ही में कबूल किया है कि फिल्मी करियर की शुरुआती सयम में उसके साथ बाप की उम्र का व्यक्ति इस्तमाल करना चाहता था, प्रसिद्धी दिला देता। मालूम नहीं यह बयां कितनी सच्ची और हकीकत के करीब है लेकिन लोगों के तजार्बा तो इस कहानी के ख़ासा करीब बैठती है।
वहीं इस कहानी संग्रह की दूसरी कहानी ‘नदी अभी सूखी नहीं’ इस कहानी को पढ़ते हुए यकायक हम 1992 और 1984 के काल खंड़ में जा पहुंचते हैं। शायद कहानियां और साहित्य की अन्य विधाओं की यही विशेषता होती हैं कि वे अपने साथ काल की दीवार गिरा कर अतीत में पहुंचा देती हैं। तत्कालीन दर्द, पीड़ा, प्रेम, राजनीतिक, सामाजिक परिघटनाएं पाठकों की आंखों के आगे घिरनी की तरह नाचने लगती हैं। अलका जी की कहानी नदी अभी सूखी नहीं दरअसल एक ऐतिहासिक घटना के बाद के मंजर की ओर पाठकों को खींचकर ले जाती है। किस तरह से 1992 के पूर्व मुंबई के किसी काॅलोनी के सातवें माले पर रहनी वाली रचना, नाजि़मा, लांबा आंटी तीन परिवारों में मिलजुल है। एक दूसरे घर में ही पले बढ़े हैं। लेकिन कुछ तो हुआ कि नाजि़मा के विश्वास में दरार आई 1992 के बाद। क्या वजह रही कि दिल्ली में लांबी आंटी की बेटी काव्या और उसके दूधमुंहे काका को कुछ लोग ंिजंदा मार डालते हैं। कहीं न कहीं मानवता हारी। कहीं न कहीं विश्वासों का कत्ल हुआ। यही वजह है कि सिख और हिन्दू के तौर पर फिर सातवें माले के तीन परिवारों में बीच फांक पड़ जाता है। एक दूराव तो तब भी आता है जब रचना की सास आती हैं। साथ रहती हैं। उन्हें नहीं पसंद कि नाजि़मा के घर से इतनी गहरी दोस्ती रहे। आखि़रकार मुसलमान हैं। हम हिन्दू। ईद से पहले परिवारों में मनमुटाव हो जाता है। लेकिन कथाकारा बड़ी ही चतुराई से सास को रिश्तेदार के घर भेज कर आपसी खटरास को स्नेहीलता में तब्दील कर देती हैं। लेकिन कहानी यहीं नहीं रूकती। अचानक सास का आना पूरे माहौल में एक तनातनी पसर जाती है। लेकिन इस बार सास का मन परिवर्तित हो चुका है। स्वयं ईद की सेवइयां खाती हैं और मुबारकवाद देती हैं। लेकिन कथाकारा जिस ओर पाठक को लेकर चलना चाहती हैं वो इसमें सफल होती हैं। एक हिन्दू परिवार कैसे सिख और मुसलमान परिवार की हिफाज़त करता है इसे बड़ी शिद्दत से अलका इस कहानी में उभारती हैं संवाद लेखन मंे तो अलका जी बाजी मार ले जाती हैं। इनकी कहानियों की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक संवाद सृजन है। बड़ी ही साफगोई से और स्पष्टता के साथ परिवेश और सांस्कृतिक बुनावटों को ध्यान में रखते हुए संवाद की सृजना करती हैं। यह कहानी संतति को आगे बढ़ाते हुए बल्कि कहें समाज में बहुभाषी बहुधर्मी परिवारों के बीच स्नेह का संचार करती हुई एक उजले पक्ष को आगे बढ़ाती है।
यदि पाठक अमसा कहानी पढ़ेंगे तो निश्चित ही उन्हें प्रो कृष्ण कुमार की किताब चूड़ी बाजार में लड़की की कहानी से जोड़ देगी। एक ओर जहां शिक्षाविद् कथाकार प्रो कृष्ण कुुमार चूड़़ी बाजार में लड़की किताब में फिरोजाबाद की चूड़ी बाजार में काम करने वाली लड़कियों, लड़कों की दर्दनाक रोज़नामचा लिखते हुए आंसूपूरित कहानी बयां करते हैं। वहीं अलका जी की कहानी अमसा भी उसी भाव भूमि पर खड़ी दिखाई देती है। यह वही अमसा है जो किसी भी शहर, नगर और महानगर के चैराहों पर गुलाब, जामुन, फूल और कलम बेचते मिल जाएंगी। यह कहते हुए भी मिलेंगी कि बाबू जी एक कलम ले लो सुबह से कुछ भी नहीं खाया। रेाटी खा लूंगा या खा लूंगी। लेकिन अमसा एक ख़ास ठसक के साथ मना करती है कि हम भीख नहीं लेते जिज्जी...। हां, यहिंन रहते हैं और नाम है अमसा। जब कथाकारा अपने पात्र से पूछवाती है कि यह भी कोई नाम हुआ तो अमसा के संवाद उसी के परिवेश के हैं। मसलन
‘ अरे! हमका खुदई नईं मालूम हुआ कि जहां दद्दा भट्टे में पहले काम करत रहे, वहीं के कोई बाबूजी बताए रहे अन्सा, बन्सा कुछ। कथाकारा इस कहानी मंे दो ऐसे पात्रों को लेकर आती है जिसमें से अमसा की जिंदगी को देख कर द्रवित हो जाती है और कहानी लिखना चाहती है। वहीं दूसरी हैं जिन्हें अपने डिजर्टेशन के लिए कच्चा माल नजर आती है अमसा। अंततः अमसा को भी टीबी की बीमारी घेर लेती है। प्रो कृष्ण कुमार जिस ओर बड़ी शिद्दत से चूड़ी बाजार में लड़की में चचा करते हैं कि यहां बच्चे बड़े ही नहीं होते। सीधे बढ़े हो जाते हैं। उन्हें टीबी की बीमारी तो गोया पुश्तैनी मिला करती है। उसी तर्ज पर अमसा को भी यह बीमारी घेर लेती है। अमसा की एक बहन भी भी जो ठेकेदारों की नजर में संुदर पतुरिया है। हर वक्त वहां अपनी अस्मिता और शरीर को बचाए रखने के लिए एक युद्ध लड़ना पड़ता है। लिखने वाले ने अपनी डिजर्टेशन भी कर ली। और कहानी भी लिखी गई लेकिन अमसा की हालत बिगड़ती चली गई। कहानी का अंत दिलचस्प है कि पहली वाली पात्र मां के संवाद में आ जाती है कि तू अपना करियर देख और घूमने जा रही है जा। विनी अमसा को घर बुलाती है कि वो डाक्टर के पास लेकर जाएगी। मां कहती है कौन  विनी तूने किसी बुलाया है? कौन है ये विनी लड़की, कितनी गंदी और बीमार लग रही है, मुझे ऐसे लोगों से मेलजोल पसंद नहीं...।
और अमसा इस दरवाजे से दूर चली जाती है। एक अंतहीन यात्रा की ओर बस कथाकारा ने लिख दिया ...दूर एक पतली सी काया धीरे धीरे गुम होती दिखाई दे रही थी। कहानी को जहां जिस मुहाने पर छोड़ना था इसकी बेहद बारीक समझ अलका जी के पास है। जैसा कि पहले भी ध्यान खींचने की कोशिश की गई है कथोपकथन यानी संवादों का घातबलाघात कहानी को न केवल रोचक बनाती है बल्कि कहानी की कई सारी परते कई सारी गांठें भी खुलती चली जाती हैं।
मुर्दे इतिहास नहीं लिखते कहानी की जान कहें तो इसका संवाद और संवादों के जरिए कहानी संसार की रचना है। संवादों की बहुलता कभी भी पाठकों को परेशान नहीं करती बल्कि पाठकों की रूचि कहानी पढ़ने में जगती है। ऐसी ही एक और कहानी की चर्चा करना अप्रासंगिक नहीं होगा वह है सिलवटें जिंदगी की। इस कहानी के संवाद भी दिलचस्प हैं एक गैर हिन्दी भाषा बंगाली पात्र की हिन्दी कैसी होगी इसकी झलक इस कहानी की शुरुआती पंक्तियों में मिलती है। जैसे घड़ी कैसे चलता है। अगर दीन ही दीन रहेगा तो सब कुछ डिस्टर्ब हो जाएगा। दिन पढ़ा जाए। वैसे ही मूझिक, म्यूजिक सूर सुर रीदम रिदम आदि शब्द ऐसे हैं जो सीधे सीधे पाठकों को पात्रों की भाषायी संसार को समझने में मदद करती है। अलका जी की विशेषता यह भी है कि इनकी कहानियों में पात्र और परिवेश जहां से आते हैं वहीं से अपनी भाषायी गठरी भी साथ ही लेकर आते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो मुर्दे इतिहास नहीं लिखते अपने संवादों के लिए भी जाना जाएगा।
यदि कहानियों की बुनावट पर नजर डालें तो पाएंगे कि हमारे इसी समाज और परिवार की कहानियंा हैं। एक ओर संभव है इस संग्रह की छोटी कहानी बुलबुला! है जो अतीतजीवी कथा भूमि पर खड़ी है। वहीं जब अरिूष कहेंगीकृकहानी है जिसमें लड़की दो स्तरों पर संघर्ष करती है। पहला अपने ही घर मंे बेटा बेटी के बीच भेद के दंश को सहती है। सुनती है कि पराई अमानत है। ज्यादा पढ़ लिख कर क्या करेगी। उसे काॅलेज की नौकरी नहीं करने दी जाती। एक मासलदार ऐसे परिवार में बिजनेस करने वाले लड़के से कर दी जाती है। जो अपनी मां का मन रखने के लिए शादी करता है। जबकि उसकी अपन जिंदगी कोई और है। स्पष्ट कहता है वो मेरी जिंदगी है। तुम से शादी महज मां के कहने पर की है। उधर मां को भी सारा माजरा मालूम है। बस टूटती तो लड़की है। टूटते उसके सपने हैं। गरीब परिवार की बेटी लाने के पीछे लड़के वालों की मनसा मुंह बंद करोन का था। और होता भी यही है। लेकिन जैसा कि अमूमन घरों की कहानी होती है। शादी के बाद घर पर भाभियों की चला करती हैं। वही मंजर इस कहानी में देखी जा सकती है।
इस संग्रह की पहली कहानी बेटी कई कोणों से पढ़ने जाने की मांग करती है। यह कहानी हालांकि कोई नई जमीन पर तो नहीं खड़ी है लेकिन कहानी कहने का कौशल दिलचस्प है। बेटी के होने और उसे बड़ा करते करते कैसे मां बाप अपने सपनों को बड़ा किया करत हैं इसकी झांकी इस कहानी में मिलती है। साथ ही बेटी की शादी और विदाई के बाद स्थितियां अमूमन हर घर सी हो जाती है। बेटी को ससुराल से पीहर नहीं भेजा जाता। बार बार चिट्ठी, फोन के बावजूद भी ससुराल वाले बहु को घर नहीं भेजते। ऐसे मां की हालत और पिता पर क्या गुजरती होगी। अंत में जब बेटी घर आती है और गले लग कर रोती है तब हां तब मां को महसूस होता है कि कुछ है जो मेरी बेटी के साथ ठीक नहीं हो रहा है। बेटी वापस ससुराल नहीं जाना चाहती। लेकिन यहां समाज और लोक लाज सामने खड़ा हो जाता है। अंततः बेटी को दुबारा उसी घर में वापस जाना ही पड़ता है।
समग्रता में कहें तो अलका जी के पास न केवल कहानी कहने की भाषा है बल्कि उनके पास कहानी सुनने की शैली भी है। उन्होंने हर कहानी में बेहतरीन संवाद रचे हैं। संवाद को लेकर पहले भी कहा जा चुका है कि कथाकारा अलका जी ज़रा सी भी लापरवाही नहीं बरततीं। अलका जी ने कहानियों निश्चित ही विभिन्न भाव- दशाओं, मनो भाविक और समाजो सांस्कृतिक पहलुओं को बांधने और बयां करने की कोशिश की हैं। इसमें दरमियां उन्होंने ऐतिहासिक घटनाओं को भी टटोलती और उसके असर को पाठकों के मध्य विमर्श के लिए रखती हैं।
उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले दिनों में हमें अलका अग्रवाल और भी बेहतरीन कहानियों से रू ब रू कराएंगी।


Monday, January 18, 2016

हाॅल नबंर 12


कौशलेंद्र प्रपन्न
हाॅल नबंर 12। स्थान विश्वपुस्तक मेला। अपार भीड़। पाठक। दर्शक। प्रकाशक। हाॅल नंबर 12 के बाहर लंबी कतार। धक्का मुक्की। कौन पहले हाॅल में जाए। जो पहले गया समझा जाएगा विशेष है। हाॅल के बाहर तरह तरह के और विभिन्न वर्गो, भाषाओं,प्रांतों के लेखक,मंच संचालक,आलोचक,समीक्षक बैठे हैं। उन सब के आगे उनकी रेट लिस्ट लगी है। घंटे और दिन के अनुसार कितना चार्ज है इसकी जानकारी दी गई है। लेखक स्वयं नहीं बोलते उन्होंने भी काॅपोरेट कल्चर को अपनाया और उसी राह पर चल पडे। उन्होंने एक एजेंसी हायर कर रखी है। वही बोली लगाता है। वही बुकिंग करता है। आवाज लगाने के लिए उसके स्टाॅफ भी हैं। दूर दूर से आए लेखकों,प्रकाशकों और श्रोताओं की बोलियां लगा रहा है।
सौ रुपए से लेकर पचास हजार तक के लेखक मंच संचालक समीक्षक उपलब्ध हैं। ले जाईए। अपनी किताब का लोकार्पण कराएं। समीक्षाएं कराएं। अपने मंच की शोभा बढ़ाएं। मंच संचालक श्रोताओं का दिल जीतने में माहिर हैं। क्रूा कहा? श्रेाताओं की कमी है? फलां भी नहीं आए। उन्होंने वायदा किया था लेकिन नहीं आ पाए। तो भी ंिचंता मत करें। हमारे स्टाॅल पर श्रोता भी उपलब्ध हैं। किस तरह के श्रोता चाहिए आप बताएं। सािहत्यिक चाहिए। कलावादी चाहिए। उत्तर आधुनिक कविता की समझ रखने वाले अनुरागी चाहिए। श्रृंगार मंच प्रिय कविता पर दाद देने वाला चाहिए। साहब आप मुंह तो खोलें। आपकी जेब जिस तरह के श्रोता,लेखक,समीक्षक,मंच संचालक आदि को मैनेंज कर सकता है आप बोलिए तो सही। हमारे पास सारी सुविधाएं हैं। क्या कहा आप गैर हिन्दी भाषी प्रांत के हैं? कोई बात नहीं आपकी किताब दिल्ली से छप जाएगी। जैसी भी हो यहां प्रकाशक भी आपकी जेबानुसार मिलेंगे। आप बस मन बना लें तो संपर्क करें। ओह ! आप लिखना भी नहीं चाहते। क्या बला है। लेखक बनने की तमन्ना पाल सकते हैं लेकिन लिख नहीं सकते। आप रातों रात पाॅुपलर होने की ख्वाहिशें भी रखते हैं। चलिए आपको मना तो नहीं कर सकता। लेकिन साफ बता दूं ज्यादा खर्च करने पड़ेंगे। लेखक भी इन दिनों बिजी हैं। उनके भी नखरे अपने अपने हैं। कहते हैं पहले बेरोजगार था तो रेट कम थे अब काम करने लगा हूं। एक नाम भी है बाजार में तो रेट भी उसी के अनुसार बढ़ेंगे ही।
किताबें छप गईं। मेला भी अपने पूरे उभार पर है। नाते रिश्तेदारों की मंडल भी आ चुकी है। यार दोस्तों को भी बुला लिया। मगर अब क्या हुआ? किताब भी छप गई। आपके हाथ में भी आन वाली है। अब क्या परेशानी है लेखक महोदय? कुछ नहीं किताब अभी मेरे हाथ मंे नहंी है। एक घंटे में मेरी किताब का लोकार्पण होना है लेकिन किताब कहां हैं? प्रकाशक गंभीर खड़ा है। समझना और समझने की कोशिश कर रहा है। किताब चल चुकी है। रास्ते मंे है। प्रेस से निकले हुए उसे दो घंटे हो चुके हैं। किसी भी वक्त हाजिर हो जाएगा। आप तो जानते हैं इन दिनों शहर में कितना भयंकर जाम लगा करता है। गोया कारें न हुईं बहनें हों जो गलबहियां करने लगती हैं। अब क्या कहा जाए। स्याले को बोला था रात में ही किताबें लेकर आ जाना। लेकिन आप तो जानते हैं लो इनके अपने नखरे होते हैं। रात में गला तर कराया तो जल्दी जल्दी बाइंडिंग हुई। वरना.....। वराना क्या किताबें बिना कवर और बाइंडिंग की अच्छी लगतीं क्या। भोंड़ी बिन कपड़े की खड़ी कोई....। अब चुप भी रहिए। किताबें नहंी आईं तो लोकार्पण किसका होगा स्टेज पर। मंच संचालक को भी पे कर चुका हूं। लेखक,आलोचक भी आ चुके हैं। श्रोता भी कब से कोंचे जा रहे हैं चाय नहीं आई। आप चाहते क्या हैं? क्यों ऐसा हो रहा है। लेखक साहब की सांसे टूट रही थीं। लगता है सारा मिट्टी होने वाला है। प्रेस वालों को भी बुला लिया है। अब उन्हें क्या घंटा तस्वीरें दूंगा। प्रकाशक चिंतित लेकिन संभला हुआ था। सर आप चिंता मत करें। मैं कुछ करता हुूं। आप अपनी तबीयत न खराब करें। सब रख राक्खा। सब चंगा होएगा।
दस मिनट शेष रह गए। अब कब आएगी मेरी किताब? लेखक बेचैन चारों ओर घिरनी की तरह नाच रहे हैं। प्रेस वाले सर आप कवर ही दिखा दो यदि किताब नहीं लिखी तो? सवाल खरोचने वाला था। लेकिन लेखक महोदय क्या जवाब देते। सो चुप हो गए। चिरौरी करते हुए कहा बस आने वाली है। रास्ते में जाम में फंसी है। कहीं ऐसा न हो सर की अंतिम दिन हांफती हुई आए आए। तब तक सारा मजमा उठ चुका हो। बार बार पश्मीने के शाॅल और सिल्क के कुर्ते को ठीक करते फिफरी की तरह नाक फुलाए घूम रहे थे। प्रकाशक बचता बचाता फोन पर बाहर निकल गया। जब पांच मिनट बचा तो गिरते पड़ते हाजिर हुआ। सर! चिंता ना करें। मैंने किताब की पांच कवर और जैकेट मंगा ली है। किताब न सही जैकेट को ही लांच कर दिया जाए। वैसे भी पूरी किताब कौन देखता है? आपने ही कौन सा पेज दर पेज पढ़ा व लिखा है? जब आप अपनी लेखनी नहीं पहचान सकते तो स्याले पाठक और लोकार्पणकर्मियों को क्या मालूम चलेगा।
...और लोकार्पणकर्मियों के हाथों में जैकेट रैप कर थमा दिया गया। मंत्रोच्चारण होने लगे। तालियों की गड़गड़ाहट से हाॅल गुंजायमान हो उठा। होता भी क्यांे न श्रोताओं ने चाय भी गटक ली थी। बजाते भी क्येां न। तारीफों के फ्लाई ओवर और अंड़र पास बनाए जा रहे थे।

शिक्षकीय दुनिया की कहानी के पात्र

कौशलेंद्र प्रपन्न ‘‘ इक्कीस साल के बाद पहली बार किसी कार्यशाला में बैठा हूं। बहुत अच्छा लग रहा है। वरना तो जी ...