Thursday, July 5, 2018

आनंदपूर्ण पढ़ना-पढ़ाना पर किसके कंधे पर



कौशलेंद्र प्रपन्न
तकरीबन पांच व छह दशक पहले प्रो. यशपाल ने ‘शिक्षा बिना बोझ के’ वकालत की थी। उनका तर्क था कि शिक्षा-शिक्षण, पढ़ना-पढ़ाना आदि कोई बोझ न हो। सीखना-सिखाना प्रक्रिया सहज और आनंदपूर्ण प्रक्रिया हो। बजाए कि स्कूल और स्कूली परिवेश बच्चों को आकर्षित करने के उन्हें डराएं आदि। बड़ी ही शिद्दत से प्रो. यशपाल ने अपनी इन सिफारिशों को सरकार को सौंपी थी। सरकार तो सरकार होती है। उसकी अपनी प्राथमिकताएं होती हैं। कन्हें कब और कितना उछालना है, किसे तवज्जो देनी है आदि सरकार और सत्ता तय किया करती है। क्यर हम इसे सरकार और सरकारी सत्ता कह इच्छा शक्ति की कमी न मानें कि छह दशक के बाद भी हम ज्वायफुल लर्निंग की ही बात कर रहे हैं। सिर्फ नाम बदले हैं। रैपर बदले हैं अंदर का कंटेंट, कंसेप्ट तकरीबन समान है। यदि दिल्ली सरकार हैप्पी करिकुलम की बात करती है। साथ ही कई महीनों की मेहनत से कंटेंट तैयार करवाया गया। अब उसे स्कूलों में लागू का जाएगा। कहा तो यह भी जा रहा है कि कक्षा में स्कूल की शुरुआत में तीस मिनट बच्चे ध्यान से किया करेंगे। इसमें कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन गैर हिन्दू संप्रदाय के बच्चों को भी हमें विमर्श के केंद्र में रखने होंगे। क्योंकि स्कूल किसी एक ख़ास संप्रदाय व मान्यताओं का परिसर नहीं है बल्कि यहां एक ऐसा समाज बसता और आकार लेता है जो भविष्य में व्यापक समाज का दिशा देते हैं।
दूसरा उदाहरण मानव संसाधन मंत्रायल के निर्णय को लिया जाए। हाल ही में एमएचआरडी मंत्री ने घोषणा की कि हमारे बच्चों का करिकुलम बहुत भारी है। उस भार को कम करना होगा। कम किया जाना चाहिए। यह पहली सरकार है जो शिक्षा के इस भार को पहचान कर कम करने की इच्छा शक्ति रखती है। अब उन्हें कौन समझाए कि कभी कभी शिक्षा और मंत्रालय के निर्णयों, दस्तावेज़ों को पढ़ लेने में कोई हर्ज़ नहीं है। जैसा कि पहले ही कहा जा चुका कि प्रो. यशपाल से लेकर जस्टिस जे एस वर्मा की कमिटि ने भी शिक्षा की बेहतरी और ज्वायफुल लर्निंग के लिए पहले सिफारिशें दे चुकी हैं। यह अलग बात है कि हमने उसे नज़रअंदाज़ कर दिया। उस पर तर्रा यह कहना कि पहली बार उनकी सरकार इस ओर ध्यान दे रही है।। यह अफ्सोसनाक बात नहीं तो और क्या नाम दे सकते हैं।

Friday, June 29, 2018

हिन्दी मातृभाषी पैंतालीस फीसदी फिर हिन्दी बेगानी




कौशलेंद्र प्रपन्न

हिन्दी को बोलने-बतियाने वालों की संख्या फीसदी में बात की जाए तो पैंतालीस 45 है। कुल जनसंख्या का 45 फीसदी जनता हिन्दी को अपनी मातृभाषा के रूप में बरतती है। बाकी बची भाषाएं, बोलियां भी प्रचलन में हैं। जो खड़ी हिन्दी 45 फीसदी के आगे कमतर सी महसूस करती हैं। गै़र हिन्दी भाषी समाज की बात की जाए तो उन्हें लगता है कि खड़ी हिन्दी उनकी बघेली, भोजपुरी, हरियाणवी, राजस्थानी, गढ़वाली को निगल जाएगी। ऐसा डर आख़िर उन्हें क्यों लगता है? शायद इसलिए क्योंकि हिन्दी कई बार अन्य भारतीय भाषाओं को शुद्धता के तर्क पर स्वीकार नहीं कर पाती। शुद्ध हिन्दी के पैरोकारां को यह कत्तई स्वीकार नहीं कि हिन्दी में गै़र हिन्दी भाषा के शब्द, शैली शामिल हो। उन्हें यह डर रहता है कि इससे शुद्ध खड़ी हिन्दी ख़राब हो जाएगी। जबकि बहुत पहले बहुभाषा और हिन्दी को बरतने वालों ने कहा भी कि हिन्दी और उर्दू गंगा-जमुनी संस्कृति की साझा विरासत की पहचान है। यदि ऐसा है तो हिन्दी को अन्य भारतीय भाषाओं और बोलियों को दूरी बनाकर चलने का क्या औचित्य है? साझा संस्कृति में हिन्दी भी कहीं न कहीं बनती, सजती और संवरती रही है। हिन्दी भाषा की सबसे बड़ी ताक़त ही यही रही है कि इसके अपने दामन में उर्दू, संस्कृत, फारसी, भोजपुरी, ब्रज, अवधी आदि भाषाओं को उदारता के साथ स्वीकार किया है। यदि इतिहास में झांक कर देंखें तो पाएंगे कि प्रसिद्ध कथासम्राट प्रेमचंद शुरू में हिन्दी में नहीं लिखा करते थे। वो सोज़े वतन पर पाबंदी लगी और प्रेमचंद हिन्दी में लिखना शुरू करते हैं। हिन्दल्वी, हिन्दुस्तानी भाषा का प्रयोग गांधी से लेकर ऋषि दयानंद तक ने की है। यही कारण है कि हिन्दी समय के अनुसार समृद्ध होती गई है।
हिन्दी को बोलने-बरतने वालों की संख्या आज की तारीख़ में लाखों और करोड़ों में हैं। वह देशज दहलीज़ को लांघ कर वैश्विक स्तर पर लोग मिलेंगे जो हिन्दी बोलते-समझते हैं। क्यो वो दुबई हो, बाली हो, थाईलैंड हो, श्रीलंका,मॉरिशस हो इन तमाम जगहों पर हिन्दी भाषा-भाषी लोग सहजता से मिलेंगे। जिन्हीं हिन्दी से रागात्मक संबंध है। उनके लिए हिन्दी मां से कहीं ज़्यादा बढ़कर है। वे जब भी हिन्दी में कहीं उलझते हैं तब वे भारत की ओर उम्मीद भरी नज़रों से देखते हैं और अपेक्षा करते हैं कि उन्हें हिन्दी भाषाई मुश्किल दौर से निकलने में भारत के भाषा-भाषी मदद करेंगे। लेकिन यहां हालत यह है कि हिन्दी को या तो बाज़ार में बैठाने के लिए हम आमादा हैं या फिर शुद्ध शाकाहारी किस्म की कोई वस्तु बनाने पर तुले हुए हैं। ऐसे में हानि किसी और की नहीं होती बल्कि हिन्दी का ही नुकसान हम कर रहे होते हैं। हमें आपसी राय और सुझावों के ज़रिए हिन्दी की आंतरिक द्वंद्वों को निपटा कर वैश्विक स्तर पर स्वीकार्य बनाने के प्रयास करने होंगे। हालांकि कहने वाले कह सकते हैं जनाब हमने कब कसर छोड़ी है। हर साल अंतरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन करते हो हैं। कभी दिल्ली कभी मॉरिशस, कभी लंदन आदि। लेकिन इस हक़ीकत से भी हम मुंह नहीं फेर सकते कि इन सम्मेलनों में होता क्या है? क्या उन सम्मेलनों में शामिल लोगों की सच में इच्छा होती है कि हिन्दी बेहतर बनें? क्या उनका अपना निजी एजेंड़ा नहीं होता कि नई जगह घूम आएं। कुछ निजी रिश्ते बुन आएं ताकि उस देश में दुबारा हिन्दी के कंधे पर सवार होकर टहलने का मौका मिले। इन सम्मेलनों में कुछ रटे रटाए, स्टीरियो टाइप के विषय रखे जाते हैं जिसपर पर्चां की प्रस्तुती होती है। फिर कविता, कहानी, व्यंग्य का दौर चलता है। कविता सुन-सुना कर वाह वाह की अनुगूंज के साथ अगले सम्मेलन की तारीख़ तय हो जाती है। जिनसे इस बार नहीं मिल सके उनके अगले मेले में मुलाकात का वायदा कर आते हैं। हिन्दी वहीं की वहीं खड़ी रह जाती है।

Thursday, June 28, 2018

आग में जलें मगर...




कौशलेंद्र प्रपन्न
जलना अच्छा है। जलन न तो हो हम शायद ठहर जाते हैं। शायद कुछ समय के बाद मरने से लगते हैं। भौतिक मौत नहीं होती बल्कि हमारी गति, विकास, प्रगति ठहर सी जाती है। मनुष्य हैं जो स्वभावतः जलन आ ही जाती है। हम जलते हैं किसी की प्रगति से। किसी की संपदा से। हम जलते हैं किसी की दो गज़ जमीन से। यदि हम कम जलते हैं तो किसी की ज्ञान संपदा से। ज्ञान के लिए जलना, ज्ञान व समझ हासिल करने के लिए जलना कहीं न कहीं हमें आगे बढ़ने में मदद करता है। मगर हमें जिन चीजों से जलना चाहिए उससे नहीं जलते। जलते हैं तो उन चीजों से जो अस्थिई होती हैं। किसी की नई कार से जलने लगते हैं। दूसरे की कार को देखकर अपने आपे से बाहर जाकर लोन लेकर भी समानांतर कार ख़रीद लेते हैं। दूसरे के प्रतिभावान बच्चे से जलने लगते हैं और अपने बच्चे को कोचने लगते हैं। बच्चा का जीना दुभर कर देते हैं। जलन यदि न हो तो हमारी जिं़दगी में एक ठहर सी आ सकती है।
कभी हमारे ऋषि-मुनि दूसरों के तप, योग,साधना आदि से जलते थे। ईर्ष्या उनमें भी होती थी। मगर वह जलन उन्हें और और तपस्या करने, ज्ञान, साधना हासिल करने के लिए प्रेरित करती थीं। वहीं दूसरी ओर असुर शक्तियां ़ऋषियों की तपस्या से जलते थे। क्योंकि वे उस स्तर की साधना नहीं कर पाते थे इसलिए उनकी तपस्या में बाधा पैदा किया करते थे। पूरा का पूरा आर्ष ग्रंर्थ ऐसे उदाहरणों से भरे हुए हैं।
आम जिं़दगी में झांक कर देखें तो हमारी अधिकांश ऊर्जा, ताकत, श्रम आदि दूसरों से प्रतिस्पर्धा में गुज़र जाती है। हालांकि स्वस्थ प्रतिस्पर्धा ग़लत नहीं है इससे कहीं न कहीं हमें आगे बढ़ने, विकसने में मदद करती है। मगर जब प्रतिस्पर्धा सिर्फ और सिर्फ जलन में तब्दील हो जाए तो वह हमारी ही ऊर्जा, और इच्छा शक्ति को खत्म करने लगती है। हम अंदर से खोखले होने लगते हैं। कई बार हमें ख़ुद महसूस नहीं हो पाता कि हम अंदर से कितने जल भुन कर राख हो चुके हैं। जिन वज़हों व जिनकी वजह से जल रहे थे उसकी गति और प्रगति में कोई अंतर नहीं आया बल्कि हम उस जलन में धीरे धीरे बुझते जा रहे हैं। ज्ञान और सूचना आज की तारीख में सबसे बड़ी ताकत है। यदि किसी ने ज्ञान और  सूचना-तकनीक को साध लिया तो मानना चाहिए कि उसके पास हज़ारों हज़ारा हॉर्स पावर की ताकत है।
मानवीय स्वभाव में प्रेम, ईर्ष्या, डाह,क्रोध आदि तो मिले हैं लेकिन ये भाव स्थायी नहीं हैं। इन्हें सश्रम व प्रयास के ज़रिए साधा भी जा सकता है। यह इतना भी कठिन नहीं है कि इसपर जीत न हासिल की जा सके। कई बार हमारा स्वभाव परआलोचना जिसे दूसरों की निंदा के नाम से भी पुकार सकते हैं, उसमें इतना रस मिलने लगता है कि हम अपनी गति, अपना स्वभाव उससे संचालित करने लगते हैं। आप जिससे जल रहे हैं उसे कई बार इसबारे में जानकारी तक नहीं होती और आप हैं कि उनकी चिंता, जलन में न रात सोते हैं और न दिन में चैन की नींद ले पाते हैं।
यदि जलन सात्विक हो तो इससे आर्ष ग्रंर्थों में भी साराहा गया है। सात्विक जलन मनुष्य को आगे बढ़ने और जीवन में आगे बढ़ने के लिए उत्प्रेरित करता है। लेकिन जब वही जलन हमारी आंतरिक दुनिया को संचालित करने लगे। हमारे स्वभाव को निर्धारक बन बैठे तब हमारी वास्तविक गति, प्रगति और विकास बाधित होने लगती है। किसी की प्रगति या प्रोन्नति से जलना कैसे और क्यों? क्या इसलिए कि कभी वह हमारी ही स्थिति में हुआ करता था। क्या इसलिए कि आज वह अपने श्रम और ज्ञान की वजह से अब हमारे बीच का नहीं रहा आदि। जलना ही है तो उसकी प्रगति और विकास की प्रक्रिया को अपनाने के लिए होनी चाहिए। जलन इसबात के लिए महसूस हो कि मैं कैसे उसकी गति को हासिल कर सकता हूं। जलन इस बात की हो और आगे की रणनीति बनाने के लिए हो कि हम कैसे बेहतर हो सकते हैं।
आज की तारीख में हमारा अधिकांश श्रम और समय सिर्फ तुलना कर जलन में जाया हो जाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो दूसरों के विकास से तो हमें खुश होना चाहिए कि फलां ने आज वह मकाम हासिल की है। हम कैसे वहां तक पहुंच सकते हैं व कैसे अपनी जिं़दगी को और बेहतर बना सकते हैं। आग का बुझ जाना गति का शांत होना ही तो है। जब हमारे अंदर की आग धीमी होने लगती है तब हम धीरे धीरे मरने से लगते हैं। यदि हमें जिं़दा रहना है तो आग को जिं़दा रखना है। जलन को बचाकर रखना है। बस ज़रूरत इस बात को ध्यान में रखने की है कि उस जलन की प्रकृति दूसरों के विकास से डाह के रूप में न हो बल्कि आत्म विकास के लिए हो भी हो। 


Friday, June 22, 2018

सूरज नहीं आता




कौशलेंद्र प्रपन्न 
अब हमारे दरवाज़े और आंगन में सूरज नहीं आता। न तो आंगन में और न ही मुंडेर पर सूरज चढ़ा करता है। कभी वक़्त था जब गर्मियों में सुबह सुबह आंगन और खिड़कियों से कमरों में झांका करता था। नींद ख़ुद ब ख़ुद खुल जाया करती थीं। नींद का क्या है, रात में छत पर सोया करते थे। सुबह चिड़ियों की आवाज़ से या फिर थोड़ी देर चादर तान कर सोते तो अह्ले सुबह सूरज अपनी सेना के साथ छत पर आ धमकते थे। सुबह के साढ़े पांच या छह बजते बजते छत से नीचे उतरना पड़ता। तब सूरज हमारे बेहद करीब हुआ करते थे। सूरज हां वही सूरज जो गर्मियों में निकले की जल्दबाजी होती और शाम देर तक ठहरा करते। कम से कम साढ़े छह और सात बजे तक तो हमारे साथ ही हुआ करते थे। हां तभी गोधूली भी हुआ करती थी। अब न गोधूली रही और न सूरज का इंतज़ार सा रहा। क्योंकि सूरज हमारे आंगन, छत, दहलीज़ से दूर जा चुके हैं। 
हम जहां हैं जहां हमारा घर हुआ करता है। ठीक उसके सामने ऊंची इमारत बन चुकी है। इतनी ऊंची की सूरज को भी ढल लिया है। न तो सुबह सूरज नज़र आता है और न धूप ही आया करती है। कभी मां होती थी तो वो सुबह नहा धोकर जलार्पण किया करती थी। रसोई में जाने से पहले नहा लेती और एक लोटनी पानी सूरज बाबा को चढ़ाकर फिर रसोई का काम करती। अब न सूरज हमारे घर के पास रहे और न उनकी रोशनी हमें मयस्सर है। जब से हमारे घर के सामने हमारे घर के समानांतर ऊंची इमारत बन चुकी है तब से सूरज का बेधड़क आना-जाना रूक सा गया है। बस घर ने निकलने के बाद गली में या फिर सड़क पर आने के बाद सूरज से रू ब रू होता है। कोई और वज़ह नहीं बस यूं ही सूरज को देखकर आंखें मूंद लिया करता हूं। आंखें बंद कर मांफी भी मांग लिया करता हूं कि हमारी ही गलती की वज़ह से अब आपसे हमारी सुबह का प्रणामपाती नहीं हो पाता। आपके और मेरे बीच ऊंची -ऊंची इमारतें खड़ी हो गई हैं। जिनकी वज़ह से हमारे सीधे मुलाकात टल सी गई है। 
यह सिर्फ मेरी या आपकी स्थिति नहीं बल्कि कम से कम महानगरों में रहने वाले हज़ारों लोगों की दास्तां है जिसमें सूरज देखते ही देखते गायब होते जा रहे हैं। उसपर तुर्रा यह कि जैसे जैसे हमारी कॉलोनी, मुहल्ले में पुराने मकान टूट कर बिल्डर के हाथों सौंपे जा रहे हैं उसमें छोटे घरों पर संकट से आ गए हैं। जो घर बीस तीस साल पुराने हो चुके हैं और घरवालों के पास पैसे हैं तो वे घर ख़तरे में हैं। अब छोटे घरों का चलन खत्म होता जा रहा है। घर हो तो पांचख् छह मंजिल का तो होना ही चाहिए। बिल्डर बनाकर अपने लिए एक फ्लारे ले लेता है और आपके सिर पर एक किरायदार बैठा देता है। आप न चाहते हुए भी एक पराए परिवार को अपने सिर पर पनाह देते हैं। यदि खरीदने की ताकत है तो आप ऐसा होने से रोक सकते हैं। लेकिन अमूमन होता नहीं है। 
अभी सूरज को पीछे धकेलने का काम महानगरों, सेकेंड और थर्ड टियर वाले शहरों में बिल्डर कल्चर शुरू हो चुका है। जहां पुराने घरों को तोड़कर नई नई ऊंची- ऊंची इमारतों को जनमा जा रहा है। ऐसे में कई बार लगता है कि लोगां को अपने पुराने मकान कोई लगाव ही न रहा। कभी मां-बाप जिस मुश्किल हालात में घर में कमरे, दुछत्ती, सीढ़ियां जोड़करते थे। उसमें वे स्वयं कई बार ईट तोड़ने, रेत लाने का काम भी कर लिया करते थे। एक एक दीवार में घर के हर सदस्य का योगदान हुआ करता था। ऐसे में यदि एक भी ईट तोड़ने की या बेचने की बात आती तो मां-बाप पहले खड़े हो जाते कि यह मैंने ख़ून पसीने की कमाई से बनाई है कम से कम मेरे जीते जी तो इसे न तो बेच सकते हैं और न तोड़ सकते हैं। लेकिन पुराने लोग जैसे जैसे हमारे बीच से खिसकते गए वैसे वैसे पुराने मकानों को तोड़कर ऊंची इमारतों को तवज्जो दिया जाने लगा। कभी वक़्त तो यह भी था कि एक घर में जिसमें दो से तीन कमरे हुआ करते थे लेकिन उसमें रहने वाले पांच-छह सदस्य होते थे। सब के सब ख्ुश और प्रसन्न। किसी को भी अगल से कमरे का दरकार नहीं होता। वक्त़ ने करवट ली और आज ऊंची इमारतों में पांच-छह कमरे होते हैं लेकिन रहने वाले वही दो या तीन। यदि उदार हुए तो जब तक ज़िंदा हैं मां-बाप रह लिया करते हैं। उसके बाद बच जाते हैं बस मां-बाप। बच्चे बड़े होते ही अपनी राह ले लेते हैं। ऐसे में पांच-छह कमरे यूं ही ढन ढन तवाते रहते हैं। रहने वालों के इंतज़ार में कमरे की साफ सफाई भी कठिन लगने लगता है। 

Wednesday, June 20, 2018

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2018 में श्री अरविंद की शारीरिक शिक्षा हुई शामिल



कौशलेंद्र प्रपन्न
शिक्षा के उद्देश्य समय और काल की मांग के अनुसार ज़माने से तय होते रहे हैं। आज़ादी पूर्व शिक्षा के मायने और मकसद अलग थे। तब हमें गुलामी की जंजीरों से छुटकारा पाना था। इसलिए तब की शिक्षा और उसके मकसद तत्कालीन ज़रूरतों के अनुसार तय हुए। आज़ादी के पश्चात् हमें देश की नवनिर्मिति के लिए दिशा और दशा तय करने थे। सो हमने कई सारे आयोग बनाए, नीतियां बनाई ताकि देश की शिक्षा राष्ट्रनिर्माण में मददगार हो सकें। ठीक इसी तर्ज़ पर समय समय पर देश के विभिन्न चेत्ताओं ने शिक्षा की दिशा और दशा निर्धारित की। इनमें महर्षि अरविंद, टैगोर, गांधी,जे कृष्णमूर्ति आदि के नाम बड़े सम्मान और एहतराम से लिए जाते हैं। इन्होंने नई शिक्षा नीति और दिशा को ही तय करने में अपनी भूमिका नहीं निभाई बल्कि शिक्षा के स्वरूप तय करने में भी अपने अविस्मरणीय योगदान के लिए जाने जाते हैं।
महर्षि अरविंद शिक्षा के जिन पांच प्रमुख घटकों पर जोर देते हैं उन्हें सरकार और शिक्षा नीति निर्माताओं ने अहमियत दी। श्री अरविंद ख़ासकर आत्मिक, शारीरिक, मानसिक आध्यात्मिक आदि शिक्षा को प्रमुखता विमर्श करते हैं। इनमें भी शारीरिक शिक्षा पर श्री अरविंद इसलिए भी वकालत करते नज़र आते हैं क्योंकि यदि शरीर ही स्वस्थ नहीं रहेंगे तो शिक्षा कैसे और किस सूरत में हासिल की जा सकती हैं। श्री अरविंद की इस वकालत को नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2018 शिद्दत से स्वीकारती है। हालांकि कोठारी आयोग से लेकर राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1968, 1986 आदि ने भी शारीरिक शिक्षा को शिक्षा की मुख्यधारा में शामिल करने की सिफारिश कर चुकी है।
श्री अरविंद के शारीरिक शिक्षा की सिफारिश को इस रूप में भी समझने की आवश्यकता है कि यदि वर्तमान सरकार शारीरिक शिक्षा को शिक्षा नीति में शामिल करने का नीतिगत मन बना चुकी है तो यह कहीं न कहीं श्री अरविंद की शैक्षिक स्थापनाओं को संस्थागत पहचान और स्वीकृति मिल रही है।
गौरतलब है कि शारीरिक शिक्षा को लंबे समय से हाशिए पर रखा गया है। वह नीतिगत कमियां ही मानी जाएंगी। लेकिन देर से ही सही किन्तु श्री अरविंद की प्रमुख शैक्षिक स्थापनाओं को शिक्षा नीति में प्रमुखता से स्थान दिया जा रहा है।

Tuesday, June 19, 2018

फाईल की गति, अधिकारी ही जानें




 कौशलेंद्र प्रपन्न
कभी हरिशंकर परसाई ने एक कहानी लिखी थी ‘‘ भोलाराम का जीव’’ यह कहानी बड़ी शिद्दत से सरकारी दफ्तर में फाईलों की गति, दशा-दिशा का चित्रण करती है। एक भोलाराम की फाईल कहीं किसी बंड़ल में दब जाती है। उस फाईल की तलाश में यमराज भी धरा धरती पर आते हैं भोलाराम की आत्मा ले जाने। जो भी हो यमराज को भी सरकारी दफ्तर में हज़ारों चक्कर काटने पड़ते हैं। वहीं फाईल पर वोट होना चाहिए जैसे शब्दों और वाक्यों सुनकर वो अपना वाद्ययंत्र रख देते हैं। दफ्तर के बाबू कहते हैं वेट होना चाहिए वोट समझे। इस कहानी को जब भी पढ़ें लगता है आज की ही कहानी कही जा रही है। फाईलों की भी अपनी अपनी किस्मत होती है। कोई कोई फाईल तो समय से चला करती हैं। उनमें कोई दिक्कत नहीं आती। मुकम्म्ल टिप्पणी के साथ फरियादी तक पहुंच जाती हैं। लेकिन ऐसी भी दुर्भागी फाईलें होती हैं जिन्हें इस टेबल से उस टेबल तक सुस्ताना पड़ता है।
हर फाईल को एक नाम यानी नंबर दिया जाता है। जिसे नंबर या डिपाटमेंट्स के नाम से पुकारा जाता है। किस विभाग की फाईल है। कौन इसका अधिकारी है, कौन इसपर एक्शन लेगा यह सब तय होता है। लेकिन कई बार वोट कम होने। सही व्यक्ति की पहचान के बगैर वे फाईलें कहीं किसी टेबल पर हज़ारों फाईलों में दब जाती हैं। जब कोई सुध लेने वाला आता है तब से काफी माथा पच्ची करनी पड़ती है कि फलां फाईल की मूवमेंट क्या है, कहां है? कौन तलाश करेगा। वो भी जब उस फाईल का क्रिएटर लंबी छुट्टी पर चला जाए तो यह एक अगल कहानी बन जाती है।
भला हो डिजिटल युग का कि धीरे धीरे हमारे काग़जात डिजिटल फार्म में तब्दील हो रहे हैं। ऐसे में फाईलों के लोकेशन पता करना ज़्यादा कठिन नहीं है। तकनीक भाषा में आप इसे रिट्रीवल सिस्टम के नाम से पुकार सकते हैं। अगर फाईलों को सही लोकेशन पर रखी जाए तो वे पाथ वे स्टोरेज की तलाश की जा सकती है। लेकिन यदि फाईलों को बेतरतीब से रखी गई हो तो मजाल है आप निकाल पाएं।
डिजिटलाइजेशन ने कम से कम पुराने दस्तावेज़ों, किताबों, पांडुलिपियों आदि को संरक्षित करने, सुरक्षित रखने और करने में मददगार साबित हो रही हैं। लेकिन दो दुनिया समानांतर चल रही हैं। ख़ासकर सरकारी ऑफिस में। यहा अभी भी नीले रंग के हाशिए वाले पन्नों पर टिप्पणियां लिखी जाती हैं। टिप्पणियां तय करती हैं कि फाईल समय पर सही व्यक्ति तक पहुंच जाएगी। टिप्पणियों के लेखक यानी अधिकारियों की भाषा भी नायाब होती है। जानकार बताते हैं कि अधिकारी ऐसी भाषा का प्रयोग करते हैं जिनके बहुआयामी अर्थ होते हैं। इतने अस्पष्ट की कितनी भी बुद्धि लगा ली जाए आम व्यक्ति उसके मायने नहीं समझ सकता। जब फाईल को पास नहीं करना हो तो ऐसी ही घुमावदार भाषा का इस्तमाल अधिकारी करते हैं। ऐसे ऐसे कमेंट लिख देंगे कि उसकी भाषा बाबूजन भी समझ पाते हैं। उस भाषा को डिकोड करने के लिए बाबुओं की मदद लेनी पड़ती है।
ऐसे ही एक फाईल की गति और दिशा-दशा जानने के लिए पिछले दिनों पूर्वी दिल्ली नगर निगम और दक्षिणी दिल्ली नगर निगम के दफ्तर का चक्कर काटना हुआ। फाईल की मूवमेंट ही पता नहीं चल पा रहा है। फाईल आख़िरकार हैं कहां? कौन उस फाईल को बपौती मान कर दबाए बैठा है? आदि। उस फाईल के पेट पर कई सारी आधिकारिक भाषा में कमेंट लिखे गए थे। जिस हम आमबुद्धि वाला व्यक्ति शायद समझ न पाए। बाद में वहीं के एक अधिकारी ने समझने में मदद की कि आपकी फाईल फलां साहब के पास है। वे जैसी टिप्पणियां लिखा करते हैं उसे सिर्फ वही समझते हैं। फिर भी कोशिश कर लें शायद अब उनका मूड अच्छा हो। वैसे फाईल निकलवानी हो या काम कराना हो तो दो हज़ार उन्नीस दिसंबर का इंतज़ार करें। मतलब समझाया वो दिसंबर में रिटायर हो रहे हैं।
फाईलों की गति, भाग्य को बांचना इतना भी आसान नहीं होता। बड़े बड़े गुणीजन भी चक्कर खा जाते हैं। हलांकि हरिशंकर परसाई जी ने बड़ी बारीक नज़र से फाईलों के भाग्य को बांचने की कोशिश की है ‘‘ भोलाराम का जीव’’ में। इसे पढ़ना दरअसल फाईलों की गति और सरकारी दफ्तर की कार्यप्रणाली का समझ विकसित करना ही है।

Monday, June 18, 2018

टीम की ताकत...


कौशलेंद्र प्रपन्न
बहुत प्रसिद्ध वाक्य ‘‘अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता’’ हमसब ने सुना है। इसके अर्थ भी बचपन में ज़रूर रटे व समझे होंगे। जब इस वाक्य के व्यापक मायने की ओर मुड़कर देखते हैं तो कई सारे निहितार्थ समझ में आते हैं। अकेला चना यानी वह व्यक्ति जो समर्थवान तो है लेकिन अपनी ताकत और क्षमता का सही तरीके से इस्तमाल नहीं कर पा रहा है। हालांकि कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो अकेला बहुत सही प्रदर्शन करते हैं। लेकिन उन्हें टीम में डाल दिया जाए व टीम में काम दिया जाए तो वे टीम-भावना से व टीम में सबके साथ बेहतर कॉडिनेशन से प्रदर्शन नहीं कर पाते। शायद अकेले अकेला अच्छा करते हैं। क्योंकि उसमें किसी और से समायोजन बैठने, कम्यूनिकेशन के दरकार नहीं होते। जितना कि टीम में कॉडिनेशन, कम्यूनिकेशन की आवश्यकता पड़ती है। वे एकला काम करने में विश्वास करते हैं। इस तरह सिंगल पर्फारमर तो होते हैं लेकिन उनमें टीम में काम करने की दक्षता व रूझान की कमी नज़र आती है। ऐसे में टीम लीडर की जिम्मेदारी होती है कि ऐसे इंडिविजूवल पर्फारमर को उसके नेचर और स्कील के अनुरूप काम सौंपे। धीरे धीरे उस व्यक्ति को टीम भावना और टीम वर्क की ओर मोल्ड किया जा सकता है।
वहीं दूसरी ओर कुछ ऐसे व्यक्ति होते हैं जो अकेले में काम करने की बजाए समूह जिसे टीम वर्क कहा जाता है उसमें विश्वास करते हैं। उनमें टीम के अन्य सदस्यों के साथ कैसे इमोशनल और प्रोफेशनल व्यवहार करने हैं इसकी समझ होती है और उसी के अनुरूप व्यवहार भी करते हैं। समूह में काम करने वालों में समायोजन, कम्यूनिकेशन, विज़न और रणनीति बनाने की क्षमता कुछ ज़्यादा विकसित होती है। इन्हीं बुनियादी स्कील के आधार पर ऐसे पर्फारमर बेहतर प्रदर्शन करते हैं। इसमें टीम लीडर की सूझ बुझ की पहचान भी हो जाती है कि क्या उसकी नज़र में सभी सदस्यों की क्षमता और दक्षता की पहचान है या नहीं। क्या लीडर की नज़र में सिर्फ बेहतर प्रदर्शन करने वाले सदस्य ही हैं या वे टीम मेंबर भी हैं जो थोड़े कमतर प्रदर्शन कर पा रहे हैं। जो थोड़े कम प्रदर्शन कर पा रहे हैं क्या उनके लिए लीडर के पास कोई विशेष कार्य नीति, रणनीति है या उन्हें वह नज़रअंदाज़ तो नहीं कर रहा है। आदि ऐसे टीम लीडर की विशेषताएं होती हैं जो टीम में काम करने की भावना को हमेशा हवा दिया करता है। टीम में कैसे कम्यूनिकेट करना है, कैसे कॉडिनेट करना है और ज़रूरत के अनुसार इंफर्मेंशन कब और कैसे देना है आदि की समझ टीम लीडर की विशेषता होती है।
एक बेहतर टीम लीडर कमतर पर्फारमर से भी अच्छा काम ले सकता है। उसके पास हर किस्म के और हर स्तर के मानव संसाधन से काम लेने और व्यक्ति को मोटिवेट करने की दक्षता होती है व लीडर की इसकी अपेक्षा की जा सकती है। एक बेहतर टीम लीडर किसी भी सदस्य को पीछे नहीं छोड़ सकता। वह हर व्यक्ति की वैयक्तिक ख़ासियत को ध्यान में रखता है और समय और स्थान के अनुसार उसे समुचित इस्तमाल करता हे। यदि टीम लीडर में इस प्रकार की विशेषता नहीं है तो कई बार वह व्यक्ति की वैयक्तिक ख़ामियत को जाया कर देता है। इसका परिणाम यह होता है कि उसका एक सदस्य जो अच्छा पर्फारमर था वह धीरे धीरे डाउन होने लगता है। दूसरे शब्दों में वह डिमोटिवेशन का शिकार होना शुरू हो जाता है। इससे न केवल टीम के प्रदर्शन पर असर पड़ता है बल्कि कंपनी और टीम के अन्य सदस्यों पर भी विपरीत प्रभाव छोड़ता है। यदि टीम के मोटिवेशन स्तर को बरकरार रखने हैं कि समय समय पर टीम बिल्डिंग के कुछ एक्सर्साइज कराने चाहिए। कुछ कंपनियां के टीम लीडर व मैनेजर अपनी टीम को दफ्तर के बाहर या भीतर ही कुछ वर्कशॉप या एक्सकर्शन टूर प्लान करते हैं ताकि वर्क से बाहर निकल कर टीम आपस में संवाद कर सकें। इस एक्टीविटी का परिणाम यह होता है कि आफिस के वर्क कल्चर के बाहर निकल कर हर सदस्य एक दूसरे के वैयक्तिक ख़ासियतों से वाकिफ हो पाता है। एक दूसरे को बेहतर तरीके से जान पाता है साथ ही टीम भी भावना विकसित हो पाती है।

Monday, June 11, 2018

लिखते रहे,सुनते रहे और गुनते रहे बच्चे


कौशलेंद्र प्रपन्न
रिपोर्टों की मानें तो भारत में स्कूली स्तर पर बच्चों की लर्निंग स्थिति चिंताजनक है। लेकिन कई बार वास्तविकता इन रिपोर्ट से भिन्न मिलती है। हाल ही में पटना स्थिति बाल भवन में तकरीबन पैंतीस बच्चों की कार्यशाला में बातचीत करने का अवसर मिला। वह भी कुछ घंटे नहीं बल्कि पूरे तीन दिन। पूरे दिन सुबह दस से शाम पांच और छह बच्चे तक बच्चे कार्यशाला से जाने का नाम नहीं ले रहे थे। इस बाल भवन का किलकारी के नाम से जानते हैं। जहां विभिन्न आयु के बच्चे आते हैं। कुछ समर कैंप में तो कुछ पूरे साल। इन बच्चों के सर्वांगीण विकास को ध्यान में रखते हुए विभिन्न गतिविधियों को अंज़ाम दिया जाता है। इनमें थिएटर, नृत्य, संगीत, नुक्कड़ नाटक, सृजनात्मक लेखन आदि। इन तमाम गतिविधियों से परिसर गुलजार रहा करता है। बच्चों से बातचीत के दौरान यह भी मालूम चला कि इन बच्चों के सुझाव, राय आदि को प्रमुखता से परिसर में स्थान दिया जाता है।
सृजनात्मक लेखन के इन तीन दिनों में विभिन्न आयु वर्ग के बच्चों के जिन मुद्दों पर बातचीत और काम हुए वह वास्तव में उक्त रिपोर्ट को आईना दिखाती हैं। क्या पढ़ना और क्या लिखना इन भाषायी कौशलों में बच्चे ख़ास दक्ष थे। इनकी लिखी कहानियों, कविताओं आदि से गुज़रते हुए ज़रा भी एहसास नहीं होता कि इन्हें लिखने वाले बच्चे कक्षा दूसरी, तीसरी या पांचवीं के हैं। इन बच्चों की लेखन क्षमता और लिखने के प्रति जिज्ञासा और ललक को देखते हुए हमें यह एहसास होता है क्या ये रिपोर्ट आसमान में बनाई जाती हैं? इन रिपोर्ट लेखन में किन्हें नरअंदाज़ किया जाता है? कहां से आते हैं ऐसे डेटा जो बताते हैं कि बच्चे पढ़ नहीं सकते। बच्चे लिख नहीं सकते।
कक्षा दूसरी और तीसरे के बच्चे जब नाटक क्या है और कहानी में क्या महत्वपूर्ण घटक होते है जो कहानी को रोचक बनाते हैं आदि का समुचित और प्रसांगिक विश्लेषण के साथ बताएं तो क्या कहना चाहेंगे। इस प्रकार के जवाबों से तीन दिन रू ब रू होने का अवसर मिला। इनमें यह उत्कंठा प्रबल थी कि मैं कहानी तो लिखता हूं। कविताएं तो लिख लेता हूं लेकिन मंच पर या सब के सामने अच्छे से प्रस्तुत नहीं कर पाता। आप तो बड़े हैं आपने तो कई प्रस्तुतियां देखीं होंगी हमें भी वे कौशल बताएं ताकि हम और बच्चों से पीछे न रहें। हम भी अपनी कहानी को बेहतर तरीके से प्रस्तुत कर सकें। इन बच्चों की तार्किक क्षमता और तथ्यपरक िंचंतन एक बार के लिए सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम इतने छोटे बच्चों से मिल रहे हैं या एक प्रखर और इतनी छोटी आयु में सृजनशीलता की बारीक बुनावटों को समझ और इस्तमाल कर रहे थे।

Tuesday, June 5, 2018

शिक्षा बिना बोझ के या सिलेबस जटिल का खेल



कौशलेंद्र प्रपन्न
बच्चों को क्या और कितना पढ़ना चाहिए यह राजनीतिक दल तय करेगी या कि शिक्षविद्ों के ऊपर यह जिम्मेदारी सौंपी जानी चाहिए। यह एक ऐसा मसला है जिसपर राजनीति धड़ों और अकादमिक समूहों के बीच हमेशा ही तनातनी रही है। लेकिन हमें यह नहीं भूलना होगा कि मतभिन्नताएं कितनी भी हों। हमारी चिंता के केंद्र में बच्चे के सर्वागींण विकास होना चाहिए। वह किसी भी कीमत पर निभाने के प्रयास करने चाहिए। पूर्व की सरकारें व राजनीतिक दलों ने शिक्षा में बदलाव परिवर्तन के नाम जो भी कदम उठाए हैं उसका विश्लेषण राजनीतिक कम अकामिक स्तर पर होना चाहिए।
हाल ही में मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावेडकर ने कहा है कि बच्चों पर करिकूलम के बोझ को करना होगा। हमारे बच्चों पर करिकूलम का बोझ है। बच्चों का विकास अवरूद्ध होता है। 1990 के आस-पास या इससे थोड़ा पीछे जाएं तो प्रसिद्ध वैज्ञानिक और शिक्षाविद् प्रो. यशपाल ने एजूकेशन बिदाउट बर्डेन की बात की थी। यानी शिक्षा बिना बोझ के की वकालत न केवल यशपाल ने नीति के स्तर पर की बल्कि पाठ्यपुस्तकों के निर्माण और पाठ्यचर्याओं में भी रद्दोबदल की मांग की थी। यह एक नए ज़िद्द को हमें अकादमिक स्तर पर समझना होगा कि जहां प्रो. यशपाल बस्ते बोझ को कम करने की मांग कर रहे थे वहीं वर्तमान सरकार करिकूलम के बोझ को कम करने की बात कर रही है। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के हवाले से कहा तो यह भी जा रहा है कि इस नीति में बच्चों की परीक्षा प्रणाली को भी बदला जाएगा। यानी कक्षा पांचवीं और आठवीं में फेल की प्रक्रिया को बदला जाएगा।
शिक्षा में परिवर्तन न तो कोई नई बात है और न ही अपूर्व घटना। बल्कि शिक्षा का स्वरूप हमेशा ही बदला किया है। शिक्षा का परिप्रेक्ष्य समय और कालानुसार बदलता रहा है। लेकिन जो चीज नहीं बदली है वह है शिक्षा का उद्देश्य। किसी भी कालखंड़ पर नज़र डालें शिक्षा का मकसद एक बेहतर इंसान बनान है। बच्चों को भविष्य के जीवन की तैयारी के रूप में भी शिक्षा के सरोकारों को रेखांकित किया जाता रहा है।
शिक्षा में करिकूलम, पाठ्यक्रम, पाठ्यपुस्तकें तो सहायिका की भूमिका निभाती हैं। ये सहगामी प्रक्रियाएं जिन्हें हम नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते। हम बस इतना कर सकते हैं कि इन सहभागी क्रियाओं को कैसे बेहतर तरीके से इस्तमाल करें ताकि शिक्षा के वृहत्तर मकसद का हासिल किया जा सके।
आज की तारीख़ में शिक्षा के उद्देश्य में यदि कोई बड़ी तक़्सीम हुई है तो वह यही कि हमारा फोकस बदल चुका है। हम पूरी तरह से शिक्षा को नंबरों के पहाड़ पर चढ़ा चुके हैं। जिसका परिणाम यह हुआ कि आज की तारीख़ में अंकों का मायने हमारे बच्चों की जिं़दगी दिशाएं तय करने लगी हैं। हालांकि कें्रदीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड जिस प्रकार से नबंरों को बढ़ा-चढ़ाकर कर परिणाम घोषित कर रही है इस बाबत उसने इस ग़लती को स्वीकार भी कर चुकी है।
वर्तमान में एमएचआरडी का मानना है कि सरकार ने पहली बार रेखांकित किया है कि बच्चों का सिलेबस जटिल है। इसे हल्का करना चाहिए। दूसरे शब्दों में कहें तो सरकारें जो अब तक रही हैं क्या उनके संज्ञान में ऐसी बड़ी घटना कभी आई ही नहीं या उन सरकारों की प्राथमिकता सूची में शिक्षा के इतने बड़े बोझ को नज़रअंदाज़ ही किया गया। दरअसल जब जब सरकारें सत्ता में आई हैं उन्होंने शिक्षा को अपना एजेंड़ा ज़रूर बनाया है। बस अंतर इतना रहा कि किसी ने बेहतरी के लिए कदम उठाए तो किसी ने अपने एजेंड़ा को पूरा करने के लिए शिक्षा का इस्माल किया।

Thursday, May 31, 2018

डर का दर्शन



कौशलेंद्र प्रपन्न
हम सब में एक डर है। हम सब एक भय में जीया करते हैं। शायद पूरी जिं़दगी डर में ही गुजार देते हैं। शायद हम खुल कर अपनी लाइफ नहीं जी पाते। शायद हम दूसरों की इच्छाओं, शर्तां, चाहतों को जी रहे होते हैं। अपनी लाइफ तो बस डर में ही कट जाती है। यदि हम डर के दर्शन में जाएं तो पाएंगे कि मनुष्य न केवल एक सामाजिक सदस्य है बल्कि समाज में रहने के नाते दूसरों की अपेक्षाओं, लालसाओं, उम्मींदों को भी जीया करता है। उसे हमेशा यह डर रहता है कि कहीं फलां नाराज़ न हो जाएं। कहीं फल्नीं रूठ न जाए। कहीं बॉस गुस्सा न हो जाए, कहीं रिश्तेदार हुक्का पानी न बंद कर दें। शायद यही वह डर का दर्शन है जिसमें हमारी पूरी जिं़दगी भय के साथ गुज़र जाती है। हालांकि दर्शन और उपनिषद् निर्भय होने की कामना करते हैं। ऋग्वेद के एक मंत्र में इसका झांकी मिलती है- ‘‘अभयंमित्रादभयंमित्रा...मम्मित्रम् भवंतु’’ इस मंत्र में कामना की गई कि हमें अपने मित्र से भी भय न हो। हमें अपने अमित्र या शत्रु या परिचित से भी भय न हो। हम निर्भय हो सकें। मेरी कामना है कि तमाम विश्व मेरा मित्र हो। हालांकि यह कामना बहुत कठिन नहीं है। लेकिन व्यवहारिक दृष्टि से दखें तो यह संभव नहीं है। क्योंकि हर कोई आपका मित्र नहीं हो सकता। सबकी अपनी अपनी सीमाएं हैं। सब के अपने स्वार्थ हैं। जहां स्वार्थों के बीच टकराहट होगी वहां मित्रवत् भाव बरकरार रखना ज़रा कठिन काम है।
पूरा भारतीय आर्ष ग्रंथ, मनोविज्ञान, दर्शन शास्त्र आदि मित्रवत् व्यवहार करने की वकालत करते हैं। यह अगल बात है कि हम सभी को खुश नहीं कर सकते। ख़ासकर जब आप किसी प्रमुख व शीर्ष पद पर हों तो हर कोई आपसे खुश रहे ऐसा संभव नहीं है। वह होना ज़रूरी भी नहीं। कोशिश तो की जा सकती है लेकिन दावा करना भूल होगा। कोई भी मैनेजर, डाइरेक्टर, सीइओ, या एमडी आदि पूरी कंपनी के हित के लिए कठोर कदम उठाते हैं। इसमें निश्चित ही किसी न किसी की हानि तो होती है। किसी न किसी का मुंह तो उतरेगा लेकिन क्या महज इस भय से कोई निर्णय को टाला जाना चाहिए? क्या आलोचना और निंदा के डर से कोई निर्णय नहीं लिया जाना चाहिए? आदि ऐसे सवाल हैं हां मैनेजमेंट के जानकार मानते हैं कि व्यापक हित के लिए कठोर से कठोर निर्णय भी लिए जाने चाहिए। वहीं गांधी जी मानना था कि यदि एक गांव के बरबाद होने से यदि एक शहर बचता है तो इसमें कोई हर्ज़ नहीं। एक शहर व राज्य के बरबाद होने से देश बचता हो तो राज्य व शहर को बरबाद होने में कोई हानि नहीं है। यही दर्शन और मनोविज्ञान मैनेजमेंट में भी अध्ययन किया जाता है और इन्हें माना जाता है। यदि एक व्यक्ति की वज़ह से कोई संस्था ख़राब हो रही हो। या फिर संस्थान के कर्मियों में निराशा घर कर रही हो, फिर लोग छोड़कर जा रहे हों तो ऐसे में मैनेजमेंट उस एक व्यक्ति को बदलने के निर्णय में पीछे नहीं हटेगी जिसकी वजह से पूरी संस्था पर ग़लत असर पड़ रहा हो। यहां डर नहीं भय नहीं बल्कि तार्किक कदम उठाने होते हैं।
डर व भय कई किस्म के होते हैं। मनोविज्ञान की दृष्टि ये देखें तो इसे फोबिया माना जाता है। कई किस्म की फाबिया का जिक्र मनोविज्ञान में आता है। पानी का डर, अंधेरे का डर, अनजान से डर, ऊंचाई से डर आदि। यह सूची लंबी हो सकती है। ख़ासकर मनोविश्लेषण और मनोचिकित्सा शास्त्र में विभिन्न तरह की फोबिया व भय का ट्रिटमेंट किया जाता है। दूसरे शब्दों में इन भयों का अध्ययन किय जाता है ताकि मनोरोगी को निदान प्रदान किया जा सके। जानकार मानते हैं कि हम न केवल व्यक्ति, वस्तु, परिस्थितियों से ही डरा करते हैं बल्कि सबसे बड़ा डर हमारा दूसरों की नज़र में असफल होना होता है। हम किसी भी कीमत पर फेल स्वीकार नहीं कर पाते। दूसरों की हंसी और दूसरों की नज़र में श्रेष्ठ साबित करने की चाहत कई बार हमें गहरे भय और निराशा में धकेल देती है। यानी हमारे डर व भय का एक सिरा दूसरों की नज़रों में असफल न होने, नकारा न होने की छवि से बचना है। जबकि हमें अपनी लाइफ अपनी शर्तां पर जीना आना चाहिए न कि दूसरों की इच्छाओं को ही ढोते रहे और कंधे, पीठ छिलते रहे।
असफलता का डर, लोगों के हंसने का डर, दूसरों की नज़रों में बेहतर साबित करने का डर आदि ऐसे आम डर हैं जिनसे हमसब रोज़ गुज़रा करते हैं। कोई हंस तो नहीं रहा है? कहीं कोई मेरी आलोचना तो नहीं कर रहा है? कोई मुझ से नाराज़ न हो जाए आदि िंचंताएं हमें डर की ओर धकेलती हैं। बच्चे जब आत्महत्या करते हैं। ख़ासकर दसवीं व बारहवीं के परीक्षा परिणाम के बाद तो इसके जड़ में यही वज़ह है लोग क्या कहेंगे? दोस्त क्या कहेंगे? मम्मी-पाप की उम्मीदें मुझ से बहुत थी। मैं तो नकारा हूं। मुझसे यह भी नही हो सका आदि मनोवृतियां व्यक्ति को डर के गिरफ्त में लाती हैं। जबकि मंथन करने की आवश्यकता यह है कि क्या आप उन लोगों के लिए पढ़ रहे थे? क्या उनके लिए जीवन के लक्ष्य तय कर रहे थे, क्या एक बेहतर इंसान उनके लिए बन रहे थे या आपको एक सफल व्यक्ति बनना ही था। आपको जीवन में अपनी शर्तां पर जीना ही था इसलिए जी रहे हैं।
कोई भी व्यक्ति लाइफ में असफल नहीं होना चाहता। लेकिन सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि हम अपनी सफलता के लिए किस शिद्दत से काम कर रहे हैं। कितनी प्लानिंग से योजना बनाकर उसे अमल कर रहे हैं। असफल होने के डर से बचने के लिए हमें अतिरिक्त मेहनत करनी होती है। तब यह डर भी खत्म हो जाता है।


Wednesday, May 30, 2018

इंटरनेट में खोते चैन




यह बात साबित हो चुकी है कि क्या वयस्क और क्या बच्चे सभी अपनी लाइफ से एक बड़ा हिस्सा इंटरनेट पर जाया किया करते हैं। कभी लाइक्स को देख कर इतने खुश हो जाते हैं गोया और कोई दुनिया में हमसे ज़्यादा खुश है ही नहीं। वहीं कम लाइक्स मिलने या न मिलने पर इतनी मायूस हो जामे हैं जैसे दुनिया में कोई प्यार करने वाला बचा ही नहीं। यह इंटरनेटी लव और केयर ऐसी बीमारी बन चुकी है कि हम वास्तविक जीवन में खुशियों की तलाश की बजाए आकाशीय सुख में खुश हो जाया करते हैं। 
हमारे आस-पास हज़ारों लाखों गेगा बाइट्स में सूचनाएं बह रही हैं। उनमें से कौन सी सूचना सचमुच हमारे लिए हैं इसका निर्णय नहीं कर पाते। हम तो यह भी तय नहीं कर पाते कि इन सूचनाओं में से कितने को अपनी ज़िंदगी में तवज्जो देनी है। 
थोड़ी थोड़ी बात पर जैसे कभी औज़ार निकाल लिया करते थे। वैसे ही आज हम थोड़ी सी कोई बात हुई नहीं कि सीधे इंटरनेट के पेट में गुदगुदी करने लगते हैं। जो भी सूचना इंटरनेट उगल पाता है उसे ब्रह्मत वाक्य की तरह मानने लगते हैं। 
यदि पेट दर्द हुआ, यदि सीने में दर्द हो रहा है तो इंटरनेट हजारों किस्म की बीमारियों के लक्षणों में आपको उलझा देगा। अब आप तनाव में आ जाते हैं अरे ये क्या हुआ? अब तो मेरी जिं़दगी ख़तरे में हैं आदि। जबकि हम विवेक और वैज्ञानिक चिंतन की बजाए उन्हें ही सच मानने लगते हैं। रातों की नींद ख़राब करने लगते हैं। 
इंटरनेट किसी वयैक्तिक ज़रूरतों को ध्यान में रखकर सूचनाएं संग्रहीत नहीं करता। बल्कि वह वैश्विक स्तर पर ज्ञान और सूचनाओं का सरलीकरण करता है। हर सूचना का अधिकारी वयैक्तिक और सामूहिक दोनों ही स्तरों के हो सकते हैं। यहां ध्यान देने की बात इतनी सी है कि हमें इंटरनेटी सूचना व ज्ञान को हासिल करते वक़्त इतना ख़्याल ज़रूर रखना चाहिए कि कौन सी सूचना व ज्ञान मेरे मकूल और कौन सी त्याज्य है। 
सूचना के विक्रेताओं और बाजार की नज़र ये देखें और डेटा मैनेजर के तौर पर समझने की कोशिश करें तो पाएंगे कि हर सूचना और ग्राहक की ज़रूरतों के अनुसार गढ़ा और बिकाउ बनाया जाता है। जो सूचना बाजार के अनुसार नहीं है उसे बाजार की शर्तां और मांग के अनुसार तैयार किया जाता है। 
आज की तारीख़ में दुनिया गोया डेटा में सिमट कर मुट्ठी में आ चुकी है। दुनिया के किसी भी कोने से किसी भी कोने में हम एक दूसरे की ख़बर ले और दे सकते हैं। यह तो एक काम हुआ। इंटरनेट महज हाल समाचार जानने और देने का माध्यम भर नहीं है बल्कि इसका इस्माल हमें व्यापकतौर पर करना सीखना होगा। मसलन सोशल मीडिया व प्लेटफॉम का प्रयोग क्या हम सिर्फ फोटो, जीपीएस लोकेशन शेयर के लिए ही करें या फिर इसका प्रयोग कुछ और सकारात्मक तौर पर भी हो सकता है इसओर भी हमें ध्यान देने की आवश्यकता है। 
हमारे बच्चे और वयस्क दोनों ही वर्ग सूचनाओं और डेटा का इस्तमाल अपनी जीवन शैली को बेहतर बनाने के लिए कर रहे हैं। लेकिन हम भूल जाते हैं कि जो भी सूचनाएं व जानकारी हम सोशल मीडिया व प्लेटफॉम पर फेंकते हैं वह फिर हमारी निजी नहीं रह जाती। वे तमाम सूचनाएं सबकी हो जाती है। हाल ही में एक सोशल साइट विवादों में रहा। इसके पीछे सवाल निजता का ही उठा। हम बिना सोचे समझे सोशल साइट्स पर अपनी तमाम कदमों, सांसों की धड़कनों को दर्ज़ कर खुश हो रहे होते हैं कि देखों देखों मैं आज यहां हूं। मैं यह कर रहा हूं। मैं यूं भी हूं आदि आदि। कई बार कोफ्त सी होती है कि क्यों हम अपनी निजी क्षणों को सरेआम करते हैं। क्यों हमें दूसरों को दिखाने व खुश करने में आनंद आता है। 
सूचनाओं और डेटा ने हमारी निजता का जिस कदर प्रभावित किया है उसका अंदाज़ा शायद हम अभी नहीं लगा सकते। लेकिन वह दिन दूर नहीं है जब हम सोशल मीडिया व प्लेटफॉम पर ही मिला करेंगे। हमारी तमाम निजताएं खत्म हो चुकी हांगी। हमारी ज़िंदगी एक डेटा में तब्दील हो जाएंगी। 
डेटा और सूचनाएं ज़रूरत के हिसाब से देनी और मिलनी चाहिए। जिसकों जितनी ज़रूरत हो उतनी ही सूचना देना बेहतर होता है। यदि आप पात्र के अनुसार सूचना नहीं देते तो वह ओवर फ्लो होने लगेगा। फिर हमें डेटा मैनेजर की आवश्यकता पड़ेगी। सूचनाओं को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना ऐसा हमें अपने आप से वायदा करना होगा। तब शायद हम अपनी जिं़दगी बेहतर ढंग से जी सकते हैं। जीवन की हर कड़ी और हर गांठें खोलने के लिए नहीं होतीं। कुछ तो ऐसे कोने होते हैं जो किसी ख़ास के साथ ही खोले जा सकते हैं। उन्हें सरेआम करना कहीं की भी समझदारी नहीं होती। 

Monday, May 28, 2018

पोजिटिविटी को बचाएं तो बचाएं कैसे




कौशलेंद्र प्रपन्न
हमारी पोजेटिव थॉट और पोजेटिव दुनिया पर हर वक़्त आघात और चोट पहुंचाई जाती है। इसमें हमारा परिवेश, हमारी रोज़दिन की दिनचर्या आदि भी शामिल हैं। इन नेगेटिव आक्रमण से ख़ुद को कैसे बचाएं यह एक बड़ी चुनौतियों में से एक है। हालांकि हमारी अंदर की दुनिया सकारात्मक सोच और चिंतन से लबरेज़ होता है लेकिन जैसे जैसे दिन चढ़ता है वैसे वैसे हमारा घर, परिवेश, ऑफिस आदि हमारी पोजेटिव दुनिया पर चोट करने लगते हैं। फर्ज़ कीजिए आप आप सुबह आपने ख़ुद से वायदा किया कि मैं अपने काम को पूरी शिद्दत से करूंगा। कोशिश करूंगा कि तय समय सीमा में पूरा कर लूंगा लेकिन इसी बीच आपका साथी आपको ऑफिस पॉलिटिक्स में उलझा देता है। आपको कल की घटनाओं में घसीटने लगता है। हम बिना सोचे समझे उसकी बातों में रस लेने लगते हैं। बल्कि कहना चाहिए उसके हांक पर चलने और घिसटने लगते हैं। यहीं हमारी ख़ुद की ताकत और आत्म विश्लेषण की क्षमता कमजोर पड़ने लगती है। दूसरे शब्दों में कहें तो अपने साथ काम करने वाले की नकारात्मक सोच और काम न करने के बहाने के बुने जाल में फंसते चले जाते हैं। शायद इन्हीं छोटी और पतली गली से हमारे अंदर की सकारात्मक सोच और क्षमता को चोट पहुंचाने का काम शुरू हो जाता है। कई बार हम बिना जाने समझे इस मकड़जाल में उलझते चले जाते हैं। जब पूरी तरह से इसमें फंस जाते हैं। तब एहसास होता है कि यह क्या हुआ? हमें तो अपने आप से किए वायदे पूरे करने थे। हमें तो तय समय सीमा में अपना काम पूरा करना था। देखते ही देखते दिन गुज़र जाता है। और हम अपने तय काम को कल के लिए टाल देते हैं। इस प्रकार से भी किसी और के नकारात्मक सोच और काम न करने की प्रवृत्ति को हम अपना चुके होते हैं।
किसी भी समाज में काम ने करने, नकारात्मक सोच वाले लोगों की कमी नहीं है। दोनो ही किस्म के लोग मिलेंगे। एक वह व्यक्ति जो हमेशा ही चार्ज रहता है। उससे बातें करें, मिलें तो लगता है कैसा व्यक्ति है जब भी मिलो हर वक़्त ऊर्जावान रहता है। हम कह भी देते हैं कि आपसे मिलकर लगता है व्यक्ति कभी भी थक नहीं सकता। आपसे मिलकर लगता है कि तमाम नकारात्मक परिवेश के बावजूद भी काम किया जा सकता है। काम ही क्या अपने अंदर की पोजिटिविटी को बचाया जा सकता है। हां ऐसे पोजेटिव सोच वाले साधारण ही इंसान होते हैं। ठीक हमारी तरह ही। बस यदि कोई अंतर होता है कि तो वह यही कि इस प्रकार के लोग हमेशा नकारात्मक सोच वालों के बीच रह कर भी अपनी सकारात्मक दुनिया को हानि नहीं पहुंचने देते। यह काम कोई ज़्यादा कठिन नहीं है लेकिन चुनौतियों भरा ज़रूर है। क्योंकि मानवीय स्वभाव के अनुसार हमें नकारात्मक सोच, गै़र ज़रूरी गॉशिप अपनी खींचती ही हैं। हमें दूसरे की निंदा करना। शिकायत करना, दूसरों में खोट निकालना में परनिंदा सुख मिला करता है। लेकिन हमें मालूम ही नहीं चलता कि कब हम परनिंदा रस में अपनी दुनिया को शुष्क बना बैठे।
हमारे आप-पास की परिस्थितियां और माहौल कई बार हमारी अंदर की दुनिया का भूगोल कैसा होगा यह तय किया करते हैं। हालांकि इस परिवेशीय दबावों से बचा भी जा सकता है लेकिन ज़रूरत इस बात की है कि हमें बेहद चौकन्ना रहना होता है। जो हम अक्सर नहीं हो पाते। यही कारण है कि परिवेशीय तनाव, नकारात्मक सोच हमारी सकारात्मक चिंतन पर चोट करने लगती है। ख़ासकर ऑफिस आदि में काफी आम देखा जाता है। एक व्यक्ति या समूह ऐसो होता है जो महज दिन पूरा करने के लिहाज़ से ही आता है। जो हमेशा काम करने वाले व सकारात्मक परिधि में रहने वाले ऊर्जावान समूह को विफल करने की कोशिश करते हैं। निदा फाज़ली का शेर मौजू है कि ‘‘दो चार किताबें पढ़ कर ये भी हम जैसे हो जाएंगे’’। पहले समूह वाले हमेशा प्रयास करते हैं कि दूसरे समूह के लोगों पर कैसे अपनी छाप छोड़ी जाए। इस प्रयास में वे कुछ भी करने पर उतारू होते हैं। बस उन्हें उनकी निंदा मंडली में शामिल हो जाएं। वहीं दूसरे समूह के लोगों पर हमेशा ख़तरा रहता है कि कब पहले समूह के लेगों का असर उनपर स्थाई न हो जाए।
सकारात्मक और नकारात्मक िंचतन और सोच के बीच हमेशा से ही रस्सा कस्सी रही है। क्या रामायण और क्या महाभारत। या फिर इतिहास के झरोखे से झांक लें। हमें ऐसी बहुत सी घटनाएं मिलेंगी जहां हम देख सकते हैं कि नकारात्मक चिंतन के लोग इसी जुगत में होते हैं कि कैसे कामगर की क्षमता और आंतरिक ऊर्जा को क्षति पहुंचाई जाएं। इस प्रकार के हमले चारें ओर हेते हैं। क्या परिवार के लोग और क्या समाज हर जगह हमें इस प्रकार के संघर्ष की कहानी दिखाई देगी। हम यदि सचेत नहीं हैं। चौकन्ने नहीं हैं तो हमारी पोजिटिविटी को हमेशा ही ख़तरा रहेगा।

Friday, May 25, 2018

चोला बदलती शिक्षा



कौशलेंद्र प्रपन्न 
शिक्षा जिस तेजी से अपना चोला बदल रही है उस रफ्तार से हमारी चिंतन शैली, विमर्श की गति नहीं बदल रही है। शायद हम शिक्षा के बदलते मिज़ाज को पहचानने में भूल कर रहे हैं। आज भी हम 1990 और 2000 के दशक में ठहर कर शिक्षा को देख और जी रहे हैं। यही कारण है कि हमारे लिए महज बीए, बीएस सी, बी कॉम जैसे पारंपरिक कोर्स ही लुभा रहे हैं। हालांकि अब के बच्चे और अभिभावक भी करवटें तो ले रहे हैं लेकिन शिक्षा के बाजार को समझने में पीछे हैं। क्योंकि यदि बच्चों की परीक्षा की प्रकृति को देखें तो बड़ी तेजी से एक परिवर्तन देखा जा सकता है कि बच्चे मेडिकल, इंजीनियरिंग के अलावा लॉ आदि में भी दिलचस्पी दिखाने लगे हैं। लेकिन यह तेजी और रूचि समय और बाजार की मांग की दृष्टि से समयानुकूल नहीं माना जा सकता। शिक्षा की दुनिया को समझना हो तो कई बार भारत के बाहर नज़रें डालनी पड़ेंगी। जहां शिक्षा महज स्नातक और परास्नातक तक महदूद नहीं रहा। बल्कि शिक्षा पारंपरिक चोले से बाहर निकल कर खेल कूद रही है। 
हर साल गर्मी की छुट्टियों में शिक्षा एक प्रकार से मैला और मेले की ढर्रे पर ढलती नजर आएगी। इधर स्कूलों की छुट्टी हुई नहीं उधर गतिविधियों का बाजार अपना सामान बेचने लगता है। गली गली, मुहल्ला मुहल्ला आपके बच्चे को एक बेहतर और चरफर इंसान बनाने के दावे करने लगता है। उनके तो दावे यह भी होते हैं कि हम आपके बच्चे को एक्टर, डांसर, थिएटर पर्सन और न जाने किन किन निर्माणों के खाब दिखाने लगते हैं। गोया बच्चे न हुए मिट्टी के लोदे हो गए। जो स्कूल साल भर में नहीं गढ़ पाए वे महज एक या डेढ माह में कर दिखाएंगे। हालांकि समय और श्रम पर भी निर्भर करता है कि किस बच्चे में कौन सी क्वालिटी डेवलप की जा सकती है। जो बच्चा एकदम गुम्मा रहता है। मुंह ही नहीं खोलता ऐसे बच्चों के अभिभावक चिंतित रहते हैं कि वह बोलता नहीं। गतिविधियों में भाग नहीं लेता आदि। कैसे भी उनका बच्चा और बच्चों के तर्ज पर शरारतें करने लगे, उसका कम्यूनिकेशन स्कील बेहतर हो जाए। मालूम नहीं यह तो अभिभावक ही बेहतर बता सकते हैं कि इन आधी मई और जून के माह में उनके बच्चों की कितनी ग्रुमिंग हो पाती है। कितनी अपेक्षाएं पाली होंगी और उनमें से कितना और किस प्रकार का परिवर्तन हो सका। जो भी हो आपका बच्चा डांस करना सीख पाए या नहीं लेकिन बाजार ने आपको सपने तो बेच ही दिए। 
एक सवाल यह भी उठता है कि नब्बे के दशक में इस प्रकार की समर कैंपां की बाढ़ नहीं आई थी। बच्चे इन छुट्टियों मौज मस्ती किया करते थे। दादा दादी, नाना-नानी के घर या फिर कहीं घूम-टहल आते थे। तब क्या बच्चों की ग्रुमिंग नहीं होती थी। क्या तब के बच्चे घर-घुस्सा हुआ करते थे? आदि ऐसे सवाल हैं जिनपर हम आज की बलबलाती गतिविधियों के उफान को समझ सकेंगे। ऐसे कत्तई नहीं है कि तब के बच्चों ने अपने जीवन में मकाम नहीं हासिल किया। या वे बच्चे इंट्रोवर्ट रहे गए। यदि ऐसा होता तो हमें बेहतर पत्रकार, लेखक, वैज्ञानिक, सोशल साइंटिस्ट, वक्ता नहीं मिलते। वहीं दूसरी तरफ मसला यह भी है कि क्या बच्चों की सर्वांगीण विकास की जिम्मेदारी स्कूल और शिक्षकों की नहीं होती है? क्या शिक्षक और स्कूल सिर्फ टेक्स्टबुक, करिकूलम आदि को पूरा कराने की जिम्मेदारी के आधार पर अपनी जवाबदेही से बच सकते हैं। क्योंकि शिक्षा का तो एक उद्देश्य और शायद मुख्य उद्देश्य बच्चे को एक सफल और सार्थक नागरिक बनाना है। यदि हमारी स्कूली शिक्षा इस जवाबदेही में पिछड़ती है तो हम कहीं न कहीं प्रकारांतर से बाजार को ऐसी गतिविधियों एवं समर कैंपों को बढ़ावा ही दे रहे हैं। 
हमारे बच्चे सिर्फ समर कैंपों के भरोसे नहीं छोड़े जा सकते। उन्हें इन समर कैंपों के तामझाम से बाहर निकालना होगा। क्योंकि बच्चों की ग्रुमिंग में इस प्रकार गतिविधियों की भूमिका होती है लेकिन इतनी भी नहीं कि वो स्कूली परिवेश पर भारी पड़ने लगे। हमें तो आज नहीं कल अपने स्कूली शिक्षा को ही दुरूस्त करना होगा। विश्व के अन्य कोनों में शिक्षा की बेहतरी के लिए क्या क्या और कौन से कदम उठाए जा रहे हैं उन्हें संज्ञान में लाना होगा। शायद यही वजह रही हो और थी भी कि समय समय पर शैक्षिक समझ बनाने के लिए शिक्षाकर्मी, शिक्षक, मंत्री आदि विदेशों का दौरा करते हैं ताकि वहां की शिक्षा और स्कूली तंत्र को समझा जा सके और उसे भारतीय परिवेश में मुकम्मल कैसे बनाया जाए इसपर एक रोड़मैप बनाया जाए। लेकिन क्या हक़ीकत से हम मुंह फेर सकते हैं कि इस प्रकार की शैक्षिक यात्राएं शैक्षिक-समझ से ज़्यादा व्यक्तिगत विकास और ग्रुमिंग में जाया हो जाता है। दिल्ली सरकार ने यही कोई तीन साल पहले पूरी दिल्ली के सरकारी स्कूलों से छांटकर 200 मेंटोर शिक्षक का दल बनाया था। उनमें से कुछ को बाहर भी ले जाया गया। ताकि दिल्ली के सरकारी स्कूलों की स्थिति को बेहतर बनाई जा सके। उस प्रोजक्ट का क्या हुआ? क्या हुआ उन तमाम कार्यशालाओं का जिसपर लाखों रुपए खर्च किए जा चुके। शिक्षा में पैसे खर्च करने को हर कोई तैयार है बस कमी इस बात की है कि हमारे पास काम करने ललक, क्षमता, दक्षता, टाइम मैनेजमेंट और समय पर अपने लक्ष्य को पाने की तड़प नहीं है। 

Thursday, May 24, 2018

हक़ीकत ए तालीम




आज की तारीख़ में उपयुक्त कैडिडेट पाना बेहद चुनौतियों भरा काम है। यदि आप बाजार में बेहद कैडिडेट की तलाश कर रहे हैं तो महज डिग्रीधारियों से आपका काम नहीं चलने वाला। डिग्रियां सभी के पास हैं। कोई नेट, पीएचडी, तो कोई एम एड भी हैं। लेकिन जब हक़ीकत से रू ब रू होते हैं तब घोर निराशा होती है। क्योंकि डिग्री तो है लेकिन डिग्री के अनुरूप उनके पास न तो समझ है और न ही अपेक्षित योग्यता। कहने को पोस्ट ग्रेजुएट हैं। प्रशिक्षकीय डिग्री भी हासिल की हुई है। जब आप ऐसे कैडिडेट की प्रोफाइल से गुज़रते हैं तो एक उम्मीद बंधती है कि कम से कम एक तो ऐसा प्रतिभागी मिला जो आपकी अपेक्षाओं पर खरा उतर रहा है। लेकिन जब उससे बातचीत करते हैं, कुछ गहरे में उतरते हैं तब हैरानी इस बात की होती है कि डिग्री अपनी जगह है और विषयी समझ बिल्कुल दूसरे छोर पर है। तब कई बार चिल्लाने का मन करेगा कि यह कैसी पढ़ाई है? कैसी तालीम दी जा रही है जिसमें डिग्रियां तो दी जा रही है किन्तु तद् तद् डिग्री के स्तरीय ज्ञान और समझ नहीं है। मालूम हो कि दिल्ली विश्ववद्यिलय में बीए या एम ए जिस खर्च हो जाते हैं उससे कम से कम चार गुणा अधिक खर्च पर निजी कॉलेज और विश्वविद्यालय में इन्हीं डिग्रियों को हासिल करने के लिए हमारे आज के युवा भीड़ लगा कर खड़े हैं। कहीं भी योग्यता और समझ की चिंता नज़र नहीं आती। 
हाल ही में विभिन्न पोस्ट के लिए कैंडिडेट के इंटरव्यू में बैठने का मौका मिला। बॉयोडेटा क्या ही बेहतरीन तरीके से बनाए गए थे। बॉयोडेटा को अच्छे से मैनेज कर और प्रेजेंटेबल भी बनाया गया था। जिसमें तमाम डिग्रियां, डिप्लोमा, विभिन्न सेमिनारों, वर्कशॉपों की लंबी सूची बनाई गई थी। उन बॉयोडेटा में कई तरह की हॉबी का भी ज़िक्र था। प्रसन्नता इस बात की थी कि कम से कम संस्थान को एक योग्य और सही कैंडिडेट मिल सकेगा। जो आगे चल कर संस्थान के मिशन, विज़न, और लक्ष्य को हासिल करने में अपनी समझ और योग्यता का इस्तमाल करेंगे। लेकिन जब बातचीत का सिलसिला निकला तो एक एक कर पिछड़ते चले गए। मुझे उनके पिछड़ने का दुख जितना नहीं था उससे कहीं ज़्यादा उनके पिछड़ने की वज़हों की पहचान कर कोफ्त से भर रहा था। अफ्सोस इस बात का था कि जिन कॉलेजों, विश्वविद्यालयों की पहचान अपनी शैक्षिक गुणवत्ता के लिए था वहां से ऐसे ऐसे छात्र बाजार में आ रहे हैं। ताज्जुब तो इस पर हुआ जब उनकी आंखों में इसका इल्म भी नहीं दिखा कि उन्हें दुख है कि जवाब नहीं दे पा रहे हैं। उन्हें इस बात का अंदाज़ा तक नहीं लगा कि जो सवाल उनके पूछे जा रहे हैं उसे वे समझ भी नहीं पा रहे हैं। साहित्य में भाषा व शब्द की तीन ताकतों की चर्चा होती है- अभिधा, व्यंजना और लक्षणा। वे प्रतिभागी इन तीनों की भाषायी जादू से बेख़बर थे। जबकि वे जिन पोस्ट के लिए आए थे वह भाषा विशेषज्ञ के लिए ही था। 
यदि आप शिक्षा जगत में है। उसमें भी स्कूली शिक्षा से आपका साबका रहा है तो आपसे इतनी तो अपेक्षा की ही जा सकती है कि आपने नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क का नाम सुना हो, आपने कभी भूलवश ही सही इस एनसीएफ को उलट पलट कर देखा हो, या फिर कहीं किसी से चर्चा सुनी हो या फिर अख़बारों, पत्रिकाओं में आलेख ही पढ़े हों। यदि आपने इंटरव्यू बोर्ड इसकी उम्मीद रखता है कि आपको एनसीएफ के बारे में मालूम होना चाहिए तो इसमें कोई अचरज की बात नहीं होनी चाहिए। लेकिन कुछ उत्तरों को पढ़ और सुनकर शिक्षण प्रोफेशन से ही विश्वास उठने सा लगा। सुबह उठकर अपने बड़ों का प्रणाम करना चाहिए, पैर छूना चाहिए, स्कूल नहा धोकर जाना चाहिए यह एनसीएफ भाषा-शिक्षण संबंधी सिफारिफ करता है। शिक्षा से जुड़े किसी भी व्यक्ति को इन उत्तरों पर हंसी से ज़्यादा उन संस्थानों से शिकायत होगी जहां से ऐसी समझ लेकर बच्चे बाजार में आ रहे हैं। 
दरअसल शैक्षिक संस्थान भी आज की तारीख़ में महज बाजार को तवज्जो देते हुए कोर्स और कोर्स के खेवनहारों को रखते हैं। जहां की फैकेल्टी स्वयं डिमोटिवेटेड होगी, ख़ुद ने कभी शोध पत्र न लिखे हों, जिनकी ख़ुद की स्कूली समझ पतली है वे किस प्रकार की शैक्षिक समझ बच्चों में संक्रमित करेंग इसका अनुमान लगाना ज़रा भी कठिन कठिन नहीं है। जब से बहुवैकल्पिक सवालों और परीक्षा का ढर्रा निकल और चल पड़ा है तब से विषयनिष्ठ समझ दूर की कौड़ी होती गई है। भाषा और शिक्षा शास्त्र में तो और स्थितियां चिंताजनक होती गई है। बच्चों को पांच वाक्य लिखने को दिया जाए तो उसमें साठ से सत्तर फीसदी ग़लतियां मिलेंगी जो व्याकरण और वर्तनी की दृष्टि से उचित नहीं है। वहीं तथ्य और समझ के स्तर पर भी उनकी अभिव्यक्ति की क्षमता का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। 

Wednesday, May 23, 2018

घरों में हो एक रोआन घर...




कौशलेंद्र प्रपन्न 
नागार्जुन ने कभी लिखा था, ‘‘कालिदास सच सच बतलाना तुम रोए थे या अज रोया था?’’ वहीं प्रसिद्ध उपन्यासकार,कवि और लेखक अज्ञेय ने अपनी कालजयी कृति शेखर एक जीवनी में लिखा है, पुरूष कितना दुर्भागा है कि वह रो भी नहीं सकता। मनोविज्ञान और व्यवहारवादी मानते हैं कि रोने से न केवल मन हल्का होता है बल्कि मस्तिष्क की तंतुएं खुलती हैं। वहीं कथा सम्राट प्रेमंचद ने भी रोने को पाक माना है और लिखते हैं कि रोने से मन प्रच्छालित हो जाता है। वह प्रायश्चित का महज साधन भी है। मनोविज्ञान ख़ासकर रोने की प्रक्रिया को मनुष्य के सहज प्रवृति में शामिल करता है। लेकिन व्यवहार में देखें तो पाएंगे कि जब भी किसी को रोते हुए देखते हैं तो कहीं न कहीं हमारा मन भी द्रवित हो जाता है। हम नहीं चाहते कि कोई रोए। यदि हम गैर करें तो हमारा समाजिकरण ऐसा होता है कि किसी भी लड़के या पुरूष को रोते हुए देखते हैं तो छूटते कह देते हैं क्या लड़कियों की तरह या स्त्री की तरह रो रहे हो। मर्द हो मर्द रोते नहीं। यह समाजिकरण कम से कम पुरूषों के साथ ताउम्र साथ रहता है। पुरूष चाहकर भी या कितना भी दुखी हो वह खुल कर रो नहीं सकता। वह कभी फफक फफक कर या फूट फूट कर रो नहीं पाता। यही कारण है कि पुरूष अंदर ही अंदर टूटने लगता है। वहीं महिलाएं रो कर अपना मन शांत कर लेती हैं और पुरूष शांत होकर भी अंदर से बेइंतेहां रो रहा होता है। पुरूष हमेशा ही अपने लोर को छुपाता है। कहीं भीतर से ढह रहा होता है लेकिन समाजिकरण उसे रोने नहीं देती। 
यदि आप रो नहीं सकते तो अंदर से टूटने लगते हैं। मनोविज्ञान तो यहां तक मानता है कि मनोचिकित्सा में रोने, बिलखने जैसे प्रक्रियाएं आम होती हैं। व्यक्ति लंबे समय से कोई दर्द, कोई टीस दबा कर जी रहा होता है। जब सही वक़्त मिलता है तो वह खुलकर और बेझिझक रोने लगता है। आज की तारीख़ में कोई भी ऐसा नहीं है जो तनाव में नहीं है। किसी भी लाइफ ऐसी नहीं है तो दर्द और कंफ्लिक्ट से परे है। ऐसे में व्यक्ति रोता है। रोता तब है कि वह अंदर से बिल्कुल टूट जाता है। लेकिन रोने को इतना कमतर या नीची नज़र से क्यों देखा जाता है। इसके पीछे बच्चों का सामाजिकरण मूल कारण है। बच्चे बचपन से ही घर और स्कूल, दोस्तों और परिवार में यही सुनते हुए बड़े होते हैं कि रोते नहीं। रोने वाले कमजोर होते हैं आदि। 
यदि हम इतिहास में झांकें तो बड़े-बड़े महलों में रानियों के लिए एक कोपभवन होता था। उस कोपभवन का प्रयोग रानियां तब इस्तमाल करती थीं जब दुखी होती थीं। जब उदास होती थीं। या जब राजा से रूस जाती थीं। उस कोप भवन में रानियां उदास या तो रोती रहती थीं या फिर ग़मज़दा पड़ी रहती थीं। मेरा तो मानना है कि जब घर बनाया जाए तो जैसे देवता घर बनाया जाता है। जैसे रसोई घर बनाया जाता है। जैसे नहान घर बनाया जाता है। कितना अच्छा हो कि घर में एक रोआन घर भी बनाया जाए। जिसे जब रोने की ज़रूरत महसूस हो तो वहां जाकर रो आए। हल्का हो जाए। रोना और रूठना, उदास होना मानवीय स्वभाव का हिस्सा है। रोने का मन करे या दुखी हों तो रो लेने में हर्ज़ नहीं है। लेकिन यह दिक्कतें तब पैदा करता है जब आप रोने को आदत में शामिल कर लेते हैं। रेने को आदत न बनाएं बल्कि मन हल्का करने के लिए प्रयोग करें। रोएं तब जब नितांत ज़रूरी हो। हर वक़्त रोना अच्छा नहीं होता। क्योंकि इसी समाज ऐसे रायबहादुर भी हैं जो आपके रोने का सबब जानकर आपका इस्तमाल करने से पीछे नहीं रहेंगे। सहानुभूति के बोल और स्पर्श के चक्कर में आप अपना सब कुछ लुटा देते हैं। 
इतिहास और मानवीय विकास की कहानी बताती है कि आंसूओं को हथियार भी बनाया गया है। इस कर्म में महिलाएं शायद एक कदम आगे हैं। माफी के साथ कहना पड़ रहा है कि कई बार महिलाएं आंसू और रूलाई का इस्तमाल घर में कलह और फसाद पैदा कराने में भी करती हैं। पत्नी का रोना या लोर से भर जाना घर की सुख शांति को खत्म भी कर देती है। इसलिए इस आंसू और रूदन का प्रयोग ग़लत दिशा में ले जाने से बचना प्रकारांतर से रोते हुए के प्रति सहानुभूति बरकरार रखने मे ंहम मदद ही करते हैं। 
जब किसी आदमी को रोते देखते हैं तो वह कम से कम मेरे लिए एक विदारक स्थिति होती है। उसमें भी जब आप किसी आदमी को वो भी उम्रदराज़ को रोते हुए देखना बहुत कष्टदायी होता है। मनोविश्लेषण में माना जाता है कि जब व्यक्ति अपनी पुरानी घटनाओं और अतीत में जाता है तब उसे बहुत सी ऐसी बातें छूने लगती हैं, याद आती हैं जहां तब तो वह रो नहीं सका लेकिन आज जब मौका मिला तो रोकर मन हल्का कर लेता है। रोते सिर्फ कहानी, उपन्यास, कविता के पात्र ही नहीं हैं बल्कि आम मनुष्य रोते हैं जिसकी सुबकी हमें साहित्य में सुनाई देती है। रोने और आंसू को हथियार बनाने से बचना और खुल कर रोना दोनों ही बातें हमारी लाइफ का हिस्सा हैं। 

Tuesday, May 22, 2018

मुलाकातें जो याद रह जाती हैं




मुलाकातें अक्सर वही याद रह जाती हैं जो सुखद होती हैं। कई बार दुखद मुलाकातें भी भूली नहीं जातीं। दूसरें शब्दों में कहें तो हम सामाजिक होने के नाते अपने जीवन में बल्कि रेज़ भी कई लोगों से मिला करते हैंं। उनमें से कुछ नाम और चेहरे यादगार बन जाते हैं। पिछले दिनों प्रसिद्ध कवि और संपादक अरूण शेतांश से मिलना हुआ। वजह तो कुछ और रही होगी लेकिन दिल्ली में इनसे मिलना पहली दफ़ा हुआ। दिल्ली में ही क्या शायद लाइफ में पहली बार मिले। हालांकि इनसे बातचीत फोन पर तो कई बार हुआ। इनकी रचनाओं से गुजरना भी कई बार रहा। जो कहीं न कहीं मिलने की तड़प को हवा देती रहीं। आख़िरकार अरूण जी की कविताओं से रू ब रू हो सका जो कहीं न कहीं स्मृतियों में दर्ज़ हो गईं। ‘‘वैसी नदी बची है देश में? सिका साफ जल पी सकूं भर पेट अंजूरी से उठा कर...’’ जिस तरह के बिंबों और प्रतीकों का प्रयोग इस कविता में है वह बेहद मौजू और प्रासंगिक है। इस मुलाकात में न केवल कविता पर चर्चा हुई बल्कि साहित्य और साहित्यकारों के रवैया, हिन्दी और साहित्यकारों की जिम्मेदारी पर भी विमर्श हुआ। 
ऐसे ही चलते फिरते भी हम कई लोगों से मिला करते हैं। किसी का चेहरा ही काफी होता है मुलाकात के वक़्त को कम करने के लिए। तो कुछ के बात करने के अंदाज़ और शैली बेहद ऊब पैदा करती हैं। इच्छा तो यहां तक होती है कि कैसे यह पल और जल्द सिमट जाए। कब इनसे छुटकारा मिले आदि। जब एक मुलाकाती व्यक्ति महज अपनी प्रसिद्धी, उपलब्धियों का गिनाने लगता है तब शायद घोर निराशा होती है कि क्या यह मुलाकात सच में मिलने के लिए है या उपलब्धियों को दर्ज़ कराने और अपनी उपस्थिति का एहसास कराने के लिए है। ऐसे में आत्मप्रशंसा के तत्व मुलाकात को कमतर कर देता है। यदि प्रसिद्धी है तो, उपलब्धि है तो वह ख़दु बोला करती है। उसी ख़ुद ही बोलने दीजिए बजाए कि आपको बोलना पड़े। कई बार आप भी ऐसे लोगों से मिले होंगे जिनसे दुबारा मिलने से पहले हज़ार बार सोचा करते हैं कि उफ!!! दुबारा उनकी सारी कहानी सुननी पड़ेगी। दुबारा जनाब बताएंगे कि कैसे फलां सम्मेलन, पुरस्कार में उन्हें तालियां मिली थीं। कैसे किसने उनके लिए शब्दों की लड़ियां लगाई थीं आदि। ऐसे में सुनने वाला बचता है। 
मुलाकातें कई बार इतनी गहरी होती हैं कि जिन्हें बार बार याद कर सुखद एहसास से भर जाते हैं। पिछले दिनों ऐसी ही मुलाकात बुर्ज़ ख़लिफा में शालीग्राम से मिलकर हुआ। लाइन में खड़ खड़े यूं ही बातचीत का सिलसिला निकल पड़ा और उन्होंने बताया कि किस प्रकार वे आज भी हिन्दी और भोजपुरी को बचाए हुए हैं। उनके साथ खड़ा उनका पंद्रह वर्षीय लड़का न तो हिन्दी बोल-समझ सकता था और अंग्रेजी। वह सिर्फ फ्रैच बोल-समझ सकता था। उन्होंने बताया कि उनकी तीसरी पीढ़ी भारत से माइग्रेट कर गई थी। लेकिन आज भी उन्हें भारत से लगाव है। हिन्दी और भोजपुरी से जुड़ाव महसूस किया करते हैं। उस मुलाकात में देश दुनिया की बात हुई। बात हुई भारतीय संस्कृति की। वो तो चाहते हैं उनका बच्चा भारतीय संस्कृति को जाने समझे लेकिन वो लाचार हैं। ऐसी ही एक और मुलाकात लेह में हुई। जगह भी सार्वजनिक कॉफी शॉप। बातों बातों में मालूम चला वो जनाब स्टेनजिन नेशनल स्कील इंडिया के नेशनल निदेशक हैं। बातों से ही तो हम किसी के बारे में जान पाते हैं। पहचान की एक कड़ी कभी तो खोलनी ही पड़ती है। हालांकि सार्वजनिक स्थानों, रेल, मेट्रो आदि में घोषणा की जाती है कि अपरिचितों से बात न करें। उनका दिया खाना न खाएं आदि। हालांकि सच है यह भी कि ऐसी कई घटनाएं हुईं हैं जिसमें हमें नुकसान भी उठाने पड़े हैं। लेकिन इस हक़ीकत से मुंह नहीं फेर सकते कि इन्हीं अपरिचितों में कुछ रिश्ते भी गहरे बन जाते हैं। 
कहने को तो पूरा विश्व ही परिवार हो चुका है। हर घर, हर देश हमारा घर है। लेकिन सच्चाई इससे बिल्कुल उलट है। हम अपने ही बनाए औरे में रहा करते हैं। हम खुलेंगे नही ंतो जुड़ेंगे कैसे। जब जुड़ेंगे नहीं तो वैश्विक परिवार में शामिल कैसे होंगे। आज हम ग्लोबल गांव के नागरिक हो चुके हैं। हमें वैसे ही बरतने भी हांेगे। एक दूसरे की संस्कृति, भाषा, बोली, संगीत आदि के साथ ही व्यक्ति को भी स्वीकार करने होंगे। यह तज़र्बा भी मजेदार रहा कि कुछ पाकिस्तानी परिवारों से भी मुलाकात हुई। वे रावलपिंड़ी के रहने वाले थे। जावेद की पत्नी ने पूछा भारत में आपका क्या रूटीन होता है? आपकी पत्नी ऑफिस जाती है? घर में कौन कौन हैं आदि। उनके सवालों में कई गिरहें थीं। जिन्हें वे समझना चाहती थीं। हमारे बारे में मीडिया और राजनेता से हटकर समझने की ललक थी। 
अरूण जी से ही यह मुलाकाती कहानी शुरू हुई थी। क्यों न उन्हीं पर खत्म की जाए। उनसे यदि कोई रिश्ता था तो वह मानवीय मूल्यों, साहित्य के दरकार और क्योंकि वे भी संवेदनशील रचनाकार हैं जिनकी बदौलत हम मिले। पहली बार मिले लेकिन एक पल के लिए भी यह एहसास नहीं हुआ कि यह हमारी पहली मुलाकात थी। आप भी कई लोगों से मिलते हैं। बल्कि मिलेंगे। मिलिए और मुलाकात यादगार ज़रूर बनाएं।   

Monday, May 21, 2018

हांजीमल और नाजीमल




कहानी कोई नई नहीं है। हम सब इस कहानी के पात्र, घटना, परिवेश में शामिल हो सकते हैं। ये कहानी ही ऐसी है। आज ज़िंदगी में हमने ऐसे कई पात्रों को देखा और सुना है। जो हमेशा ही हां जी हां जी किया करते हैं। बेशक वो आगे जाकर पीछे हट जाएं। लेकिन मुंह पर हरदम उनके हां जी ही हुआ करता है। कुछ समय के लिए यह शब्द सुनना बहुत अच्छा लगता है। लेकिन जब उनके हां जी और व्यवहार में दिखाई नहीं देता तब दुख होता है। तब हैरानी होती है। हमें महसूस होता है कि बेहतर था कि वह पहले ही ना कह देता। लेकिन ऐसे लोगों की आदत हो जाती है हर किसी के सामने और हर परिस्थिति में महज खुश करने के लिए उनके जबान पर हां ही होता है। ऐसे लोग बहुत जल्द पहचान भी लिए जाते हैं कि यह हां तो कह रहा है लेकिन अपनी जबान पर कायम रहेगा इसमें शक है। ऐसे लोगों पर हमेशा ही शंका के बादल बने रहते हैं। क्या नाते रिश्तेदार और क्या दोस्त या दफ्तर हर जगह ऐसे लोग बेहद चर्चित होते हैं। वहीं दूसरे किस्म के वे लोग हैं जिनके जबान पर हमेशा ही ना होता है। इन्हें आप ना जी कह सकते हैं। इससे पहले की प्रयास किया जाए। इससे पहले कि प्रयत्न किया जाए। वे छूटते ही कहते हैं ना जी यह तो न हो पाएगा। इनमें तो बहुत दिक्कत है। बहुत मुश्किल है। ऐसे लोग प्रयास करने से डरते हैं। बल्कि आप कह सकते हैं ऐसे लोग हर चीज, हर कोशिश और हर पहलकदमी को पहले पहल नकारात्मक नज़रे से देखने के आदि हो चुके होते हैं। ऐसे लोगों के साथ काम करना, योजना बनाना बहुत मुश्किल होता है। क्योंकि ये लोग थोड़ी देर के लिए ठहर कर सोचने और संभावनाओं की तलाश करने की बजाए रिटेलिएट करने में विश्वास करते हैं। इस किस्म के लोग भी घर-परिवार, दफ्तर, यार-दोस्तों की मंडली में मिल जाएंगे। ना जी मल ऐसे मनोदशा के होते हैं जिन्हें समझाना बेहद कठिन होता है। उन्हें सकारात्मक कदम उठाने में डर लगता हैं। बल्कि कह सकते हैं कि ऐसे लोगों में चुनौतियां स्वीकार करने में डर लगता है। ये लेग एक बने बनाए कंफर्ट जोन में रहना पसंद करते हैं। 
आपके आस-पास उक्त दोनों ही तरह के यार-दोस्त, सहकर्मी, रिश्तेदार ज़रूर होंगे। जिनके साथ रिश्ता निभाना बेहद कठिन होता है। यह तो बात हुई रिश्तेदारी की। दोस्ती निभाने की। लेकिन फ़र्ज कीजिए नाजी माल और हांजी मल आपके दफ्तर में भी हैं तो उनके साथ काम करना कितना कठिन होता है। इसके भुक्तभोगी होंगे आप। हांजी मल और नाजी मल दोनों की दो स्टी्रम स्थितियों में जीने वाले जीव है। इन्हें बीच का रास्ता दिखाई नहीं देता। इन्हें नई सोच, नए बदलाव, नई जिम्मेदारियों के बीच समायोजन स्थापित करने में डर लगता है। दूसरे शब्दों में कहें तो दोनों ही किस्म के लोग अपनी जिम्मेदारियों से पीछा छुड़ाने में तेज होते हैं। उन्हें मालूम है उनके इस बरताव की वजह से उन्हें कोई नए प्रोजेक्ट का हिस्सा नहीं बनाया जाता। उन्हें कोई नई जिम्मेदारी सौंपने से पहले मैनेजमेंट हज़ार बार सोचती है। क्योंकि उनकी आदतों से मैनेजर और संस्थान का हेड भी बखूबी वाकिफ होता है। उन्हें पता हेता है कि उसके हां में कहीं न कहीं न छुपा है जो स्पष्ट नहीं है। 
अगर ठहर कर विचार करें तो पाएंगे कि हांजी मल और नाजी मल जैसे मनोदशा व प्रवृत्तियों वाले लोगों से न केवल कंपनी, प्रोजेक्ट , संस्थान आदि को भारी नुकसारन उठाना पड़ता है। बल्कि कई बार रिश्तेदारी और दोस्तों में भी एक फांक पैदा करने में ऐसे लोग अहम भूमिका निभाते हैं। इनकी मनोरचना को बदलने के लिए यदि मैनेजमेंट प्रयास करे तो एक सूखे बांस की तरह तन जाते हैं। टूटना कबूल होता है। मगर झुकने में इन्हें परेशानी होती है। क्योंकि इन्होंने झुकना शायद सीखा ही नहीं। शायद यह मसला अपब्रिंगिं की भी है। इसे आप समाजीकरण कह सकते हैं। यदि किसी व्यक्ति की पूरी स्कूलिंग ऐसे ही नकारात्मक व जिम्मेदारी से परे रहने में हुई है तो वह उसके स्थाई स्वभाव का अंग हो जाता है। वह उसे चाह कर भी जल्दी ठीक नहीं कर पाता। वह चाहता तो है कि समायोजन स्थापित करे। लेकिन उसकी लंबे समय की ना कहने की आदत भारी पड़ती है। यह कुछ कुछ ऐसा ही है कि जिसे झूठ बोलने की आदत है वह कई बार बल्कि जानते हुए भी कि इस झूठ की आवश्यकता नहीं है मगर आदतन बोलता है। उसे मालूम होता है कि इस झूठ से उसका कोई ख़ास फायदा तो नहीं होगा मगर बोलने से रूका नहीं पाता। सो नाजी मल और हांजी मल जैसे लोगों के साथ भी कई बार ऐसी ही स्थितियां होती हैं। जो भी हो यदि कोई चीज, व्यवहार पसंद नहीं तो हां या ना स्पष्टता और दृढ़ता के साथ कहने का माद्दा होना चाहिए। क्योंकि इस ना से शुरू में तो किसी की नज़रों में खटक सकते हैं लेकिन दूरगामी प्रभाव देनों के लिए बेहतर होता है। हां या ना कहना महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि किन हालातों और किनके बीच हां जी और ना जी कह रहे हैं यह ख़ास मायने रखता है। 

Thursday, May 17, 2018

यूं चले जाना




मैथिली शरण गुप्त अपनी प्रसिद्ध काव्य रचना में यशोधरा की मन की बात लिखते हैं, जब गौतम बुद्ध बिना बताए रातों रात अपने बच्चे और पत्नी को छोड़ कर प्रस्थान कर जाते हैं। यशोधरा कहती है, सखी वे मुझसे कह कर जाते....जो तुम एक बार कहते हैं मैं क्षत्राणी स्वयं आरती उतार कर तुम्हें विदा करती। लेकिन तुम बिन बताए, बिना कहे, चोरों की तरह चले गए। यदि इस काव्य रचना को पढ़ें तो जीवन और व्यहार की कई सारी मानवीय संवेदना की परते खुलती चली जाती हैं। यदि हम अपने आस-पास नज़र डालें तो पाएंगे कि कई सारे लोग ऐसे होते हैं जो बिना बताए रातों रात शहर, कस्बे, कंपनी, दफ्तर आदि से दूर चले जाते हैं। वजहें कई हो सकती हैंं। उन्होंने क्यों नहीं बताया, मन में क्या था? आदि ऐसी गांठें हैं जिन्हें वे स्वयं ही खोल सकते थे। मगर अब वो हमारे बीच नहीं रहा करते। लेकिन कंपनी के एचआर और अधिकारी को सब मालूम होता है। क्यों कोई व्यक्ति रातों रात चला गया। या जाने को कहा गया। यह जाने और कहने पर जाने में बहुत बारीक अंतर है। जिसे ठहर कर समझने और महसूसने पर जाने के पीछे की कहानी समझ में आती है। जो भी हो जाने वाले के लिए हमेशा ही एक साफ्ट कॉरनर होता है। होना भी चाहिए। क्योंकि कौन, किस पस्थिति में गया। इसका सही सही भूगोल और निहितार्थ की परतें वही खोल सकता था। 
यदि समाज में देखें तो रेज़दिन हज़ारों की नौकरियां लगा करती हैं और हज़ारों के लिए रिटायरमेंट का दिन भी होता है। अवकाश प्राप्ति के दिन सरकारी नौकरियों में तो नियुक्ति के दिन ही तय कर दिए जाते हैं। व्यक्ति को मालूम होता है कि किस दिन, किस तारीख को उसे नौकरी से मुक्ति मिलेगी। लेकिन निजी कंपनियों की नौकरी में ज्वाइंनिंग और रिटायरमेंट की कोई तारीख़ पहले से मुकरर्र नहीं होती। निजी कंपनियों,संस्थानों आदि में सरकारी रिटायरमेंट की आयु सीमा से बाहर जाकर लोगों को हायर और फायर भी किया जाता है। हायर और फायर की प्रक्रिया में डिग्री, अनुभव उम्र से ज़्यादा यह देखी जाती है कि किस व्यक्ति में नई चुनौतियों को स्वीकार करने, उसे दुरूस्त करने, टीम को सही दिशा में मार्गदर्शन प्रदान करने और कंपनी या संस्था को नई ऊंचाई तक ले जाने की क्षमता और दक्षता है या नहीं। वह व्यक्ति उम्र में छोटा या बड़ा भी हो सकता है। सिर्फ इस बात को तवज्जो दी जाती है कि किसमें दूर दृष्टि, रणनीति बनाने, एक्जीक्यूट करने और प्रोजेक्ट को सफल बनाने की क्षमता और प्रवीणता है। 
हमारे बीच से कई बार ऐसे लोग, ऐसी रिश्ते नदारत हो जाते हैं जैसे वे कभी हमारे कंसर्न एरिया में थे ही नहीं। गोया वो रिश्ता हमारे लिए एक सिरे से गायब हो गया। जैसे वो कभी हमारे बीच था ही नहीं। लेकिन कोई भी व्यक्ति या रिश्ते अचानक यूं ही हमारे बीच से खत्म नहीं हो जाते। बल्कि दूर जाने, भूल जाने की प्रक्रिया दो स्तरों पर चल रही होती हैं। एक अंतर और दूसरा बाह्य। अंतर जगत में क्या चल रहा है इसका अनुमान लगाना ज़रा कठिन है। क्योंकि हर किसी की अपनी अंतर दुनिया हैं जहां वो निपट अकेला होता है। कोई रिश्तेदार, भाई-बहन, दोस्त कोई भी साथ नहीं होता। उसे ख़ ुद ही निर्णय लेने होते हैं। उन निर्णयों के लिए खुद ही जिम्मेदार होना होता है। बस रिश्तेदार या भाई-बहन महज राय दे सकते हैं किन्तु उसका ख़मियाज़ा व्यक्ति को स्वयं ही भुगतना पड़ता है। वहीं दूसरी ओर बाह्य स्तर पर जिस प्रकार की गतिविधियां चलती हैं उसका तो कभी कभी अनुमान लगाना कठिन नहीं है। लेकिन बाह्य परिस्थितियां कई बार हमारी ही भूलों, चूकों, ख़ामियों से भी संचालित होती हैं। जिसे नियंत्रण में लाया तो जा सकता है लेकिन ज़रा कठिन है। क्योंकि हम अपने कंफर्ट जोन से बाहर नहीं आना चाहते। हम अपनी पूर्वग्रह को बरकरार ही रखना चाहते हैं। दूसरे शब्दों में, हम अपनी कार्य शैली, सोच, विजन में रद्दो बदल के लिए तैयार नहीं होते। 
कंपनी व्यक्ति से नहीं बल्कि मिशन और विज़न से चला करती है। कई बार कंपनी व्यक्ति से और व्यक्ति कंपनी से पहचाना जाता है। वह इसलिए क्योंकि नेता (मैनेजर, निदेशक आदि) हमेशा अपनी स्पष्टता और चिंतन की व्यापकता के आधार पर व्यक्तिगत जीवन और कर्म क्षेत्र में सफल हो पाता है। महज़ फ़र्ज कीजिए यदि नेता स्वयं ही उलझा हो, विचार और दिशा की स्पष्टता ही नहीं है तो वह हमेशा ही दिग्भ्रमित दिखाई देगा और औरों को भी भ्रम में रखेगा। इसका ख़मियाजा कंपनी या फिर कई बार परिवार, दोस्तों आदि को भुगतना होता है। 

Tuesday, May 15, 2018

नाम गुम जाएगा...चेहरा ये बदल जाएगा...




कौशलेंद्र प्रपन्न 
वाट इज़ देयर इन द नेम...हिन्दी में कहें तो नाम में क्या रखा है? इन्हीं भावदशाओं और दर्शनों की करीब से पहचानते इस गीत की पंक्तियों को सुनें तो कई कहानियां एक के बाद उभरती चली जाएंगी। उन कहानियों के मज़मून बेशक अगल होंगे लेकिन कथ्य तकरीबन एक सा मिलेगा। कई बार हम व्यक्ति के नाम भूल जाते हैं लेकिन चेहरा देखते ही उसके साथ बिताए पल याद आने लगती हैं। वहीं कुछ के चेहरे सामने भी आए जाएं तो उस व्यक्ति का नाम याद नहीं कर पाते। दरअसल हम उन्हीं चेहरों, नामों को भूल जाते हैं याद याद रखते हैं जिनके साथ या तो सुखद पल गुजारे हैं या फिर जिन्हें याद कर आज को भी खट्टा कर लेते हैं। एक बाद के लिए आज पर अतीत चढ़ने लगता है। ऐसे में हम उन्हें ही याद रखना व मिलने की चाह रखते हैं जिनके साथ हमें सच में खुशी व प्रसन्नता मिलती। वह पल बेशक बेहद अल्पायु वाला ही क्यों न हो। नाम बार बार याद करने के बावजूद भी इस लिए भूल जाते हैं क्योंकि हमारी स्मृतियां उन्हीं सूचनाओं, नामों स्थानों आदि का याद रख पाने में सक्षम होती हैं जिनके साथ हमारी स्मृतियों मजबूत हुआ करती हैं।
नाम बदलने, स्थान बदलने और तस्वीरें बदल देने से कोई व्यक्ति व संस्था अपनी मूल प्रकृति नहीं बदल पाती। बल्कि आम जन की स्मृतियों में बसी यादों, एहसासातों और सपनों को हम नहीं धो सकते। कोई शहर अपना नाम हज़ार बार बदल ले। कोई व्यक्ति अपना नाम कोर्ट के द्वारा अपना नाम बदल ले लेकिन वह अपनों के लिए वही पप्पु, संजय, बबुआ और न जाने क्या क्या ही रहता है। ठीक वैसे ही आप या कि हम किसी भी ख़ास मकसद से किसी शहर, नगर,डगर का नाम बदल दें लेकिन पुरानी स्मृतियों में दर्ज़ नाम ही जबान पर आते हैं। 
हाल में कहें या फिर पहले भी डगरों, नगरों के नाम बदलें का फैशन चला था। वह फैशन था या कि दलगत हित लेकिन डगरों, नगरां, स्थानों के नाम धड़ाधड़ बदले गए। कनॉट प्लेस का राजीव चौक हो जाना, मुगलशराय का दीनदयाल उपाध्याय नगर हो जाना, अकबर रोड़ रातों रात महाराणा प्रताप में तब्दील हो जाना कई बार हैरान करती हैं। हम एक सड़क, पुल, गली, दफ्तर तो रातों रात नहीं बदल पाते। इसमें कई अड़चनें आती हैं लेकिन कैसे तुरत फुरत में हम डगरों, नगरों, चौराहों के नामों की तख़्तीयां बदल दिया करते हैं। कहीं कोई सुगबुगाहट नहीं होती। पिछले माह रामनवमी के ठीक आस-पास कई बड़े बड़े और प्रमुख स्थानों के साइन बोर्ड पर ‘‘राम राम’’ चस्पा कर दिए गए। किसने किया? कौन इसका जिम्मेदार है? कैसे इतनी ऊंचाई पर रातों रात राम राम नाम को चिपकाया गया? आदि। ये सवाल हमें पूछना चाहिए नगर निगम के अधिकारियों से कि जब संज्ञान में आया, किसी ने याद दिलाया तब तो उन साइन बोर्ड को साफ करने, राम राम के नाम को मिटाने की कम से कम कवायद ही सही किन्तु सक्रियाता तो दिखानी ही चाहिए थी। दिल्ली के तकरीबन बड़े और प्रमुख चौराहों, रेड लाइट्स के आस-पास के स्थान, दिशा प्रदर्शक बोर्ड पर राम राम के स्टीकर लगाए गए हैं। उन्हें कब और कौन उतारेगा? कौन इस पर एक्शन लेगा यह तो नहीं मालूम लेकिन इस प्रकार की प्रवृत्तियां शुभ नहीं मानी जा सकतीं। 
नामों और तस्वीरों के बदल जाने से तारीख़ें नहीं बदला करतीं। महज किसी ख़ास व्यक्ति की तस्वीर बदल दी तो क्या उम्मीद करते हैं उस व्यक्ति के अतीत को भी बदल देने का दावा करते हैं? शायद नहीं। शायद हम सिर्फ आज अपने ख़ाम अहम की तुष्टि भर ही करने की कोशिश कर रहे हैं। यही प्रवृत्ति इन दिनों नामों के बदलने और तस्वीरों को बदलकर हम साबित कर रहे हैं। क्यों हमें बार बार इतिहास में जाना चाहिए? क्यों हमें बार बार अतीत से दुखद और चुभन भरी और ठीस देने वाली घटनाएं ही चुन कर आज में लाना चाहिए। क्यों न हम अतीत व इतिहास से सुखद पल चुन कर लाएं। क्यों न अपनी भूलों को वहीं छोड़कर वहां से आगे की दिशाएं तय करने वाली सीखों को अपने साथ ज़ि़ंदा रखें ताकि भविष्य और वर्तमान के बेहतर बना सकें। 
मानवीय स्वभाव है कि हम बार बार सबसे पहले दुखते और चुभते पलों को याद किया करते हैं हमारे साथ ऐसा नहीं हुआ। वैसा नहीं हो सका। उसके मेरे साथ अच्छा नहीं किया। वह कभी मिलता और फोन नहीं करता आदि आदि। शिकायतों से शुरू होने वाले संवाद ज़्यादा सुखद और दीर्घजीवी नहीं हो पाते। नामों को बदलने की बजाए कामों से नामों को मर्ज कर दें तो कितना बेहतर हो। 

Friday, May 11, 2018

विकसने में संघर्ष बहुत है






कौशलेंद्र प्रपन्न 
सच हम नहीं, सच तुम नहीं, सच है हमज संघर्ष ही...संघर्ष से बच कर जीए तो क्या जीए तुम या कि हम...कवित की इन पंक्तियों को जगदीश गुप्त से उधार ली है। इन पंक्तियों में जिस प्रकार की चिरगारी है वह हमें जीवन में आगे बढ़ने में मदद करती है। बगैर संघर्ष में दुनिया का कोई भी व्यक्ति, संस्था, कंपनी आगे नहीं बढ़ी होगी। एक बात तो तय हो गई कि यदि जीवन में आगे बढ़ना है, विकसना है तो हमें किसी न किसी स्तर पर किसी न किसी रूप में संघर्ष करना ही पड़ता है। हर व्यक्ति और समाज के अनुसार उसके संघर्षों की प्रकृति निर्धारित होती है। किसी का संघर्ष चौदह वर्ष का होता है तो किसी का अल्पायु। लेकिन हरके जीवन की यह कहानी बड़ी पुरानी और सच्ची है कि संघर्ष तो करना ही पड़ा है। यदि हम अपने परिवेश पर नज़र डालें तो एसे कई व्यक्ति मिलेंगे जिन्होंने अपने जीवन में काफी संघर्ष किया। तब जाकर आज वो जीवन की सफलता के झंड़े लहरा रहे हैं। वहीं कुछ ऐसे भी लेगे मिलेंगे जिन्होंने मेहनत तो बहुत की लेकिन उसके अनुरूप उन्हें सफलता व सुख नहीं मिला। यदि ऐसे संघर्षां की कहानियों के तानाबाना करीब से देखें तो संभव है हमें ऐसी कोशिशें भी दिखाई देंगी जो महज दूसरों को दिखाने और प्रभावित करने के लिए किए जा रहे थे। वे अपनी संतुष्टि के लिए प्रयास नहीं कर रहे थे। यहां यह हक़ीकत समझ लेनी चाहिए कि हमें अपनी नज़रों और कोशिशों में सच्चे और ईमानदार होने की आवश्यकता है न कि औरों की नज़रों में। यह भी दिलचस्प है कि हम अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा दूसरों से अच्छे, लायक, आज्ञाकारी आदि के प्रमाण पत्र बटोरने में ज़ाया कर दिया करते हैं। जबकि हमें इस ओर ध्यान देना लाजमी होगा कि हम अपनी निगाहों में ईमानदार और प्रयास करने वाले हैं या नहीं। 
जब केई व्यक्ति, समाज, कस्बा, नगर विकसने की राह पर होता है तब कई तरह के संघर्षां, आलोचनाओं, निंदाओं और प्रोत्साहनों से गुज़रना होता है। इसे सहज मानवीय और विकास की प्रवृति के रूप में समझना चाहिए। जब कोई कस्बा व गांव विकास करता है तो पुरातन मान्यताओं वाले इसका विरोध परंपरा, मान्यताओं आदि के हवाले से उस विकसने की प्रक्रिया को नकारते हैं। जब कोई व्यक्ति विकसने और संघर्ष के पथ पर आगे बढ़ता दिखाई देता है तब हमारे ही आस-पास के लोग, सहयात्री हमारे प्रयासों की प्रशंसा करने, प्रोत्साहित करने की बज़ाए आपके सपनों, कोशिशों को नकारने और हतोत्साहित करने का प्रयास करते हैं। ऐसे वे क्यों करते हैं इनके वज़हों मानवीय स्वभावों में से एक है। इसे हम मानवीय विकसने की प्रक्रिया में बाहरी संघर्ष के रूप में पहचान सकते हैं। इस किस्म के बाहरी संघर्षों में साथ के लोगों की संवेदनात्मक, भावनात्मक, मनोवैज्ञानिक आदि दबावों को रख सकते हैं। वे कई बार स्वभावतः ऐसे करते हैं। उन्हें यह कबूल नहीं हो पाता कि उनके सामने का व्यक्ति विकसने की कोशिश कर रहा है। उन्हीं की नज़रों के आगे फलां व्यक्ति कैसे अपनी कॉम्यूनिकेशन, मैनेजमेंट,प्रेजेंटेशन आदि स्कील कैसे डेवलप कर सकता है। आदि कुछ बाह्य भय भी हमारे विकसने के राह में संघर्ष के रूप में मिला करते हैं। हमें इस प्रकार के संघर्षां से भी लड़ना और ख़ुद को बाहर निकालना होता है। 
कभी हमने बीज को जमीन से बाहर निकलते शायद न देखा हो। कभी देखने की कोशिश करें तो समझना आसान हो जाएगा कि एक बीज को जमीन से बाहर आने में कितनी मेहनत करनी पड़ती है। दूसरे शब्दों में एक नवजात बच्चे में जनमने में कितने संघर्षां का सामना करना पड़ता है। तब जाकर बच्चा इस दुनिया में आंखों खोलता है ऐसी दुनिया जो व्यक्ति के विकसने को संहर्ष स्वीकारने की बजाए इसबात में सुख की तलाश करता है कि वह अभी तक संघर्षशील है। । अभी तक प्रयासरत है। हालांकि इस हक़ीकत से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि हमारे फैलों ट्रेवलर में ऐसे भी चाहने वाले होते हैं जो हमारी विकसने की यात्रा में प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से शामिल होते हैं। उन्हें देखने और महसूसना अच्छा लगता है कि उनके बीच का कोई व्यक्ति प्रयास कर रहा है। उन्हें आपके विकसने में मदद करने में प्रसन्नता होती है। 
हमें यदि विकसना है तो बाहरी और आंतरिक संघर्षों से लड़ना और जीतना ही होगा। अभी हमने बाहरी संघर्षां की तो बात की लेकिन आंतरिक संघर्षं की चर्चा रह गई। इसे भी वलते चलते समझते चलें तो बेहतर होगा। आंतरिक संघर्षां मे ंहम अपनी क्षमताओं, कमजोरियों, अपनी सीमाओं, अपने कम्फर्ट जोन से बाहर निकलने आदि से डरते हैं। हमें अपनी सीमाओं और उड़ान का एहसास नहीं होता कि मेरी ख़ुद की क्षमता व सामर्थ्य कितनी है। जब हम अपनी क्षमताओं को पहचान लेते हैं तब रिस्क और संघर्षोंं से जल्दी और समुचिततौर पर बाहर निकल पाते हैं। नहीं तो हमारी अधिकांश ऊर्जा आंतरिक और बाह्य संघर्षां से लड़ने और उबरने में खत्म हो जाती है। जब हमें संघर्षां के उपरांत मिली सफलता का आनंद लेना होता है उस वक़्त भी जीवन संघर्षों में ही बसर करना हमारी मजबूरी हो जाती है। 

Wednesday, May 9, 2018

ये कैसी इबादत है लला!!!




कौशलेंद्र प्रपन्न 


ये कौन सी पाठ पढ़े हो लला मन लेत हौ देत छटाक नहीं...। कुछ ऐसी ही स्थिति कई बार राजनीतिक लोगों की ओर से आने वाले बयानों में लगता है। हाल ही में हरयाण के मुख्यमंत्री ने कहा और बाद में अपने वक्तव्य से में काफी ऑल्टर भी किया जैसा कि अकसर राजनीतिक लोग किया करते हैं। मसलन मेरा यह मतलब नहीं था। मेरे बयान को तोड़मरोड़ कर पेश किया गया आदि। तो बात हो रही थी इबादत की। फरमाया गया कि खुले में इबादत यानी नमाज़ की इज़ाजत नहीं होगी। तर्कोंं से पुल भी बांधे गए। अपनी बात व फरमान को सही ठहराने के लिए विभिन्न किन्तु परंतु का भी सहारा लिया गया। इबादत किसी की भी की जाए। पूर्जा अर्चना कोई भी करे। रत जग्गा किसी भी समुदाय की ओर से आयोजित की जा रही हो। रात भर जागरण कोई भी गाए। इसमें किसी को क्यों और कब आपत्ति हो सकती है? कब कोई अपनी आवाज़ कोर्ट व थाने में उठाता है? यह तब विरोध और बंद करने की मांग उठती है जब समाज के बुढ़े, बच्चे, बीमार, परीक्षार्थी प्रभावित होते हैं। कायदे से समय और स्थान को ध्यान में रखा जाना चाहिए इसमें किसी को भी कोई गुरेज़ नहीं होना चाहिए। 
इस बयान से पहले भी कई बार कोर्ट की ओर से आदेश आ चुके हैं कि रात ग्यारह के बाद कहीं कहीं दस बजे के बाद, म्यूजिकख् इबादत की अनुमति नहीं होगी। लेकिन हम जिस समाज में रहते हैं वहां यह भी देखते हैं कि खुलआम रात की पार्टियां, पूजा अर्चना, नाच गाने आदि धड़ल्ले होते हैं। कई लोग समय सीमा तोड़ने में अपनी शान समझते हैं। जबकि उन्हें यह भी सोचना चाहिए कि आस-पास रहने वाले बीमार, बुढ़े व बच्चे को कितनी दिक्कत होती होगी। आज आप कर रहे हैं कल आपको ही देखकर आपका पड़ोसी करेगा। उसके पास कौन से पैसे की कमी है। 
पूजा-अर्चना, नमाज़ आदि अत्यंत व्यक्तिगत और एकांत की साधना एवं कर्म है। एक बात समझनी होगी कि जो हमारा ऐकांतिक कर्म है उसे इतने खुले और प्रदर्शन के तर्ज़ पर करने से क्यां गौरव और अपनी मान्यताओं को मनवाने की ज़िद रखते हैं। हमें हमारी निजी मान्यताओं, सांप्रदायिक उत्सवों एवं आयोजनों में वैश्विक और समष्टि की सोच रखनी चाहिए। हालांकि यह कहना और करना बेहद मुश्किल है। किन्तु शुरू के कुछ मुश्किलातों को यदि पार कर गए तो नई पीढ़ी के लिए आदर्श हो सकते हैं। हज़ारों बच्चों, बुढ़े की दुआएं भी साथ होती हैं। जिन्हें आपने अपनी रात भर की चीखों, फिल्मी तर्ज पर पूजा-अर्चना, नाच-गान के शोर से निज़ात दिला दी। 
दरअसल शुरू कौन करे। कौन आगे आए और कह सके हमें मंदिर व मस्जिद में ही इबादत करनी है। यदि जगह है तो तमाम उत्सवों को तय परिसर में ही संपन्न किया जाएगा। इसके लिए किसी न किसी को तो लीड लेनी पड़ेगी। जो चुप्प हैं, ख़ामोश तामाशे में शामिल हैं उनसे बदलाव की उम्मीद करना बेईमानी होगी। यदि समाज में इस प्रकार की साम्प्रदायिक आयोजनों, सार्वजनिक उत्सवों, पूजा-अर्चना, इबादतों आदि कम करना है तो किसी ने किसी को तो आगे आना होगा। कब तक हम हमज सरकार, न्यायपालिका, कार्यपालिका आदि से ही उम्मीद करते रहें कि अब लोकतंत्र के चारों खम्भों के ज़रिए ही बदलाव घटित हो सकता है। ऐसे स्थिति पर नज़र डालें तो पाएंगे कि समय समय पर सरकार बेशक आंखें मूंद ले लेकिन न्यायपालिक बड़ी ही शिद्द से अपनी जिम्मेदारी निभाती है। इसी का परिणाम है कि साम्प्रदायिक पूजा स्थलों के नाम पर जिस प्रकार से अवैध सरकारी भूमि को हथियाया जाता है इस बाबत कोर्ट कई बार निर्देश जारी कर चुकी है। मंदिर व मज़ारों के नाम पर कई राज्यों, शहरों में महत्वपूर्ण स्थलों पर अवैध निर्माण कर साम्प्रदायिक पूजा-अर्चना स्थल में तब्दील किया जा चुका है। 
इबादत तो बिना किसी शोर और प्रपंच के किए जाते हैं। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने की एक कविता की पंक्ति उधार लेकर कहूं तो ‘‘प्रभू जी जब हारा हूं तब न आइए...’’ यहां तो मंज़र यह है कि जब भी उत्सव करने का मन करता है। मनोरंजन का माहौल बनाना होता है तो रत जग्गा का आयोजन खुले में सड़क और गली को घेर कर किया करते हैं। 

शिक्षकीय दुनिया की कहानी के पात्र

कौशलेंद्र प्रपन्न ‘‘ इक्कीस साल के बाद पहली बार किसी कार्यशाला में बैठा हूं। बहुत अच्छा लग रहा है। वरना तो जी ...